की तुम्ह हरि दासन्ह महँ कोई। मोरें हृदय प्रीति अति होई।।
Ramcharitmanas
श्रीरामचरितमानस
मूल श्लोकः
की तुम्ह हरि दासन्ह महँ कोई। मोरें हृदय प्रीति अति होई।।
RCM 5.6.7
श्रीरामचरितमानस
मूल श्लोकः
की तुम्ह हरि दासन्ह महँ कोई। मोरें हृदय प्रीति अति होई।।
RCM 5.6.7
की तुम्ह हरि दासन्ह महँ कोई। मोरें हृदय प्रीति अति होई।।