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Ramcharitmanas · अध्याय 5

Sundara Kanda

सुन्दरकाण्ड

Hanuman's leap to Lanka, meeting Sita in the Ashoka grove, burning of Lanka — the most-chanted kanda.

  1. RCM 5.1001Open verse →

    जामवंत के बचन सुहाए। सुनि हनुमंत हृदय अति भाए॥ तब लगि मोहि परिखेहु तुम्ह भाई। सहि दुख कंद मूल फल खाई॥

    Meaning · English

    Hanuman's heart was greatly cheered to hear Jambavan's auspicious words. 'Wait for me, brothers,' he said, 'sustained by roots, fruits and tubers.'

  2. तब लगि मोहि परिखेहु तुम्ह भाई। सहि दुख कंद मूल फल खाई।।

    अर्थ · Hindi

    तब लगि मोहि परिखेहु तुम्ह भाई। सहि दुख कंद मूल फल खाई।।

  3. जब लगि आवौं सीतहि देखी। होइहि काजु मोहि हरष बिसेषी।।

    अर्थ · Hindi

    जब लगि आवौं सीतहि देखी। होइहि काजु मोहि हरष बिसेषी।।

  4. यह कहि नाइ सबन्हि कहुँ माथा। चलेउ हरषि हियँ धरि रघुनाथा।।

    अर्थ · Hindi

    यह कहि नाइ सबन्हि कहुँ माथा। चलेउ हरषि हियँ धरि रघुनाथा।।

  5. सिंधु तीर एक भूधर सुंदर। कौतुक कूदि चढ़ेउ ता ऊपर।।

    अर्थ · Hindi

    सिंधु तीर एक भूधर सुंदर। कौतुक कूदि चढ़ेउ ता ऊपर।।

  6. बार बार रघुबीर सँभारी। तरकेउ पवनतनय बल भारी।।

    अर्थ · Hindi

    बार बार रघुबीर सँभारी। तरकेउ पवनतनय बल भारी।।

  7. जेहिं गिरि चरन देइ हनुमंता। चलेउ सो गा पाताल तुरंता।।

    अर्थ · Hindi

    जेहिं गिरि चरन देइ हनुमंता। चलेउ सो गा पाताल तुरंता।।

  8. जिमि अमोघ रघुपति कर बाना। एही भाँति चलेउ हनुमाना।।

    अर्थ · Hindi

    जिमि अमोघ रघुपति कर बाना। एही भाँति चलेउ हनुमाना।।

  9. जलनिधि रघुपति दूत बिचारी। तैं मैनाक होहि श्रमहारी।।

    अर्थ · Hindi

    जलनिधि रघुपति दूत बिचारी। तैं मैनाक होहि श्रमहारी।।

  10. RCM 5.1.10Open verse →

    हनूमान तेहि परसा कर पुनि कीन्ह प्रनाम।

    अर्थ · Hindi

    हनूमान तेहि परसा कर पुनि कीन्ह प्रनाम।

  11. RCM 5.1.11Open verse →

    राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ बिश्राम।।1।।

    अर्थ · Hindi

    राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ बिश्राम।।1।।

  12. जात पवनसुत देवन्ह देखा। जानैं कहुँ बल बुद्धि बिसेषा।।

    अर्थ · Hindi

    जात पवनसुत देवन्ह देखा। जानैं कहुँ बल बुद्धि बिसेषा।।

  13. सुरसा नाम अहिन्ह कै माता। पठइन्हि आइ कही तेहिं बाता।।

    अर्थ · Hindi

    सुरसा नाम अहिन्ह कै माता। पठइन्हि आइ कही तेहिं बाता।।

  14. आजु सुरन्ह मोहि दीन्ह अहारा। सुनत बचन कह पवनकुमारा।।

    अर्थ · Hindi

    आजु सुरन्ह मोहि दीन्ह अहारा। सुनत बचन कह पवनकुमारा।।

  15. राम काजु करि फिरि मैं आवौं। सीता कइ सुधि प्रभुहि सुनावौं।।

    अर्थ · Hindi

    राम काजु करि फिरि मैं आवौं। सीता कइ सुधि प्रभुहि सुनावौं।।

  16. तब तव बदन पैठिहउँ आई। सत्य कहउँ मोहि जान दे माई।।

    अर्थ · Hindi

    तब तव बदन पैठिहउँ आई। सत्य कहउँ मोहि जान दे माई।।

  17. कबनेहुँ जतन देइ नहिं जाना। ग्रससि न मोहि कहेउ हनुमाना।।

    अर्थ · Hindi

    कबनेहुँ जतन देइ नहिं जाना। ग्रससि न मोहि कहेउ हनुमाना।।

  18. जोजन भरि तेहिं बदनु पसारा। कपि तनु कीन्ह दुगुन बिस्तारा।।

    अर्थ · Hindi

    जोजन भरि तेहिं बदनु पसारा। कपि तनु कीन्ह दुगुन बिस्तारा।।

  19. सोरह जोजन मुख तेहिं ठयऊ। तुरत पवनसुत बत्तिस भयऊ।।

    अर्थ · Hindi

    सोरह जोजन मुख तेहिं ठयऊ। तुरत पवनसुत बत्तिस भयऊ।।

  20. जस जस सुरसा बदनु बढ़ावा। तासु दून कपि रूप देखावा।।

    अर्थ · Hindi

    जस जस सुरसा बदनु बढ़ावा। तासु दून कपि रूप देखावा।।

  21. RCM 5.2.10Open verse →

    सत जोजन तेहिं आनन कीन्हा। अति लघु रूप पवनसुत लीन्हा।।

    अर्थ · Hindi

    सत जोजन तेहिं आनन कीन्हा। अति लघु रूप पवनसुत लीन्हा।।

  22. RCM 5.2.11Open verse →

    बदन पइठि पुनि बाहेर आवा। मागा बिदा ताहि सिरु नावा।।

    अर्थ · Hindi

    बदन पइठि पुनि बाहेर आवा। मागा बिदा ताहि सिरु नावा।।

  23. RCM 5.2.12Open verse →

    मोहि सुरन्ह जेहि लागि पठावा। बुधि बल मरमु तोर मै पावा।।

    अर्थ · Hindi

    मोहि सुरन्ह जेहि लागि पठावा। बुधि बल मरमु तोर मै पावा।।

  24. RCM 5.2.13Open verse →

    राम काजु सबु करिहहु तुम्ह बल बुद्धि निधान।

    अर्थ · Hindi

    राम काजु सबु करिहहु तुम्ह बल बुद्धि निधान।

  25. RCM 5.2.14Open verse →

    आसिष देह गई सो हरषि चलेउ हनुमान।।2।।

    अर्थ · Hindi

    आसिष देह गई सो हरषि चलेउ हनुमान।।2।।

  26. निसिचरि एक सिंधु महुँ रहई। करि माया नभु के खग गहई।।

    अर्थ · Hindi

    निसिचरि एक सिंधु महुँ रहई। करि माया नभु के खग गहई।।

  27. जीव जंतु जे गगन उड़ाहीं। जल बिलोकि तिन्ह कै परिछाहीं।।

    अर्थ · Hindi

    जीव जंतु जे गगन उड़ाहीं। जल बिलोकि तिन्ह कै परिछाहीं।।

  28. गहइ छाहँ सक सो न उड़ाई। एहि बिधि सदा गगनचर खाई।।

    अर्थ · Hindi

    गहइ छाहँ सक सो न उड़ाई। एहि बिधि सदा गगनचर खाई।।

  29. सोइ छल हनूमान कहँ कीन्हा। तासु कपटु कपि तुरतहिं चीन्हा।।

    अर्थ · Hindi

    सोइ छल हनूमान कहँ कीन्हा। तासु कपटु कपि तुरतहिं चीन्हा।।

  30. ताहि मारि मारुतसुत बीरा। बारिधि पार गयउ मतिधीरा।।

    अर्थ · Hindi

    ताहि मारि मारुतसुत बीरा। बारिधि पार गयउ मतिधीरा।।

  31. तहाँ जाइ देखी बन सोभा। गुंजत चंचरीक मधु लोभा।।

    अर्थ · Hindi

    तहाँ जाइ देखी बन सोभा। गुंजत चंचरीक मधु लोभा।।

  32. नाना तरु फल फूल सुहाए। खग मृग बृंद देखि मन भाए।।

    अर्थ · Hindi

    नाना तरु फल फूल सुहाए। खग मृग बृंद देखि मन भाए।।

  33. सैल बिसाल देखि एक आगें। ता पर धाइ चढेउ भय त्यागें।।

    अर्थ · Hindi

    सैल बिसाल देखि एक आगें। ता पर धाइ चढेउ भय त्यागें।।

  34. उमा न कछु कपि कै अधिकाई। प्रभु प्रताप जो कालहि खाई।।

    अर्थ · Hindi

    उमा न कछु कपि कै अधिकाई। प्रभु प्रताप जो कालहि खाई।।

  35. RCM 5.3.10Open verse →

    गिरि पर चढि लंका तेहिं देखी। कहि न जाइ अति दुर्ग बिसेषी।।

    अर्थ · Hindi

    गिरि पर चढि लंका तेहिं देखी। कहि न जाइ अति दुर्ग बिसेषी।।

  36. RCM 5.3.11Open verse →

    अति उतंग जलनिधि चहु पासा। कनक कोट कर परम प्रकासा।।

    अर्थ · Hindi

    अति उतंग जलनिधि चहु पासा। कनक कोट कर परम प्रकासा।।

  37. RCM 5.3.12Open verse →

    कनक कोट बिचित्र मनि कृत सुंदरायतना घना।

    अर्थ · Hindi

    कनक कोट बिचित्र मनि कृत सुंदरायतना घना।

  38. RCM 5.3.13Open verse →

    चउहट्ट हट्ट सुबट्ट बीथीं चारु पुर बहु बिधि बना।।

    अर्थ · Hindi

    चउहट्ट हट्ट सुबट्ट बीथीं चारु पुर बहु बिधि बना।।

  39. RCM 5.3.14Open verse →

    गज बाजि खच्चर निकर पदचर रथ बरूथिन्ह को गनै।।

    अर्थ · Hindi

    गज बाजि खच्चर निकर पदचर रथ बरूथिन्ह को गनै।।

  40. RCM 5.3.15Open verse →

    बहुरूप निसिचर जूथ अतिबल सेन बरनत नहिं बनै।।

    अर्थ · Hindi

    बहुरूप निसिचर जूथ अतिबल सेन बरनत नहिं बनै।।

  41. RCM 5.3.16Open verse →

    बन बाग उपबन बाटिका सर कूप बापीं सोहहीं।

    अर्थ · Hindi

    बन बाग उपबन बाटिका सर कूप बापीं सोहहीं।

  42. RCM 5.3.17Open verse →

    नर नाग सुर गंधर्ब कन्या रूप मुनि मन मोहहीं।।

    अर्थ · Hindi

    नर नाग सुर गंधर्ब कन्या रूप मुनि मन मोहहीं।।

  43. RCM 5.3.18Open verse →

    कहुँ माल देह बिसाल सैल समान अतिबल गर्जहीं।

    अर्थ · Hindi

    कहुँ माल देह बिसाल सैल समान अतिबल गर्जहीं।

  44. RCM 5.3.19Open verse →

    नाना अखारेन्ह भिरहिं बहु बिधि एक एकन्ह तर्जहीं।।

    अर्थ · Hindi

    नाना अखारेन्ह भिरहिं बहु बिधि एक एकन्ह तर्जहीं।।

  45. RCM 5.3.20Open verse →

    करि जतन भट कोटिन्ह बिकट तन नगर चहुँ दिसि रच्छहीं।

    अर्थ · Hindi

    करि जतन भट कोटिन्ह बिकट तन नगर चहुँ दिसि रच्छहीं।

  46. RCM 5.3.21Open verse →

    कहुँ महिष मानषु धेनु खर अज खल निसाचर भच्छहीं।।

    अर्थ · Hindi

    कहुँ महिष मानषु धेनु खर अज खल निसाचर भच्छहीं।।

  47. RCM 5.3.22Open verse →

    एहि लागि तुलसीदास इन्ह की कथा कछु एक है कही।

    अर्थ · Hindi

    एहि लागि तुलसीदास इन्ह की कथा कछु एक है कही।

  48. RCM 5.3.23Open verse →

    रघुबीर सर तीरथ सरीरन्हि त्यागि गति पैहहिं सही।।

    अर्थ · Hindi

    रघुबीर सर तीरथ सरीरन्हि त्यागि गति पैहहिं सही।।

  49. RCM 5.3.24Open verse →

    पुर रखवारे देखि बहु कपि मन कीन्ह बिचार।

    अर्थ · Hindi

    पुर रखवारे देखि बहु कपि मन कीन्ह बिचार।

  50. RCM 5.3.25Open verse →

    अति लघु रूप धरौं निसि नगर करौं पइसार।।3।।

    अर्थ · Hindi

    अति लघु रूप धरौं निसि नगर करौं पइसार।।3।।

  51. मसक समान रूप कपि धरी। लंकहि चलेउ सुमिरि नरहरी।।

    अर्थ · Hindi

    मसक समान रूप कपि धरी। लंकहि चलेउ सुमिरि नरहरी।।

  52. नाम लंकिनी एक निसिचरी। सो कह चलेसि मोहि निंदरी।।

    अर्थ · Hindi

    नाम लंकिनी एक निसिचरी। सो कह चलेसि मोहि निंदरी।।

  53. जानेहि नहीं मरमु सठ मोरा। मोर अहार जहाँ लगि चोरा।।

    अर्थ · Hindi

    जानेहि नहीं मरमु सठ मोरा। मोर अहार जहाँ लगि चोरा।।

  54. मुठिका एक महा कपि हनी। रुधिर बमत धरनीं ढनमनी।।

    अर्थ · Hindi

    मुठिका एक महा कपि हनी। रुधिर बमत धरनीं ढनमनी।।

  55. पुनि संभारि उठि सो लंका। जोरि पानि कर बिनय संसका।।

    अर्थ · Hindi

    पुनि संभारि उठि सो लंका। जोरि पानि कर बिनय संसका।।

  56. जब रावनहि ब्रह्म बर दीन्हा। चलत बिरंचि कहा मोहि चीन्हा।।

    अर्थ · Hindi

    जब रावनहि ब्रह्म बर दीन्हा। चलत बिरंचि कहा मोहि चीन्हा।।

  57. बिकल होसि तैं कपि कें मारे। तब जानेसु निसिचर संघारे।।

    अर्थ · Hindi

    बिकल होसि तैं कपि कें मारे। तब जानेसु निसिचर संघारे।।

  58. तात मोर अति पुन्य बहूता। देखेउँ नयन राम कर दूता।।

    अर्थ · Hindi

    तात मोर अति पुन्य बहूता। देखेउँ नयन राम कर दूता।।

  59. तात स्वर्ग अपबर्ग सुख धरिअ तुला एक अंग।

    अर्थ · Hindi

    तात स्वर्ग अपबर्ग सुख धरिअ तुला एक अंग।

  60. RCM 5.4.10Open verse →

    तूल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग।।4।।

    अर्थ · Hindi

    तूल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग।।4।।

  61. प्रबिसि नगर कीजे सब काजा। हृदयँ राखि कौसलपुर राजा।।

    अर्थ · Hindi

    प्रबिसि नगर कीजे सब काजा। हृदयँ राखि कौसलपुर राजा।।

  62. गरल सुधा रिपु करहिं मिताई। गोपद सिंधु अनल सितलाई।।

    अर्थ · Hindi

    गरल सुधा रिपु करहिं मिताई। गोपद सिंधु अनल सितलाई।।

  63. गरुड़ सुमेरु रेनू सम ताही। राम कृपा करि चितवा जाही।।

    अर्थ · Hindi

    गरुड़ सुमेरु रेनू सम ताही। राम कृपा करि चितवा जाही।।

  64. अति लघु रूप धरेउ हनुमाना। पैठा नगर सुमिरि भगवाना।।

    अर्थ · Hindi

    अति लघु रूप धरेउ हनुमाना। पैठा नगर सुमिरि भगवाना।।

  65. मंदिर मंदिर प्रति करि सोधा। देखे जहँ तहँ अगनित जोधा।।

    अर्थ · Hindi

    मंदिर मंदिर प्रति करि सोधा। देखे जहँ तहँ अगनित जोधा।।

  66. गयउ दसानन मंदिर माहीं। अति बिचित्र कहि जात सो नाहीं।।

    अर्थ · Hindi

    गयउ दसानन मंदिर माहीं। अति बिचित्र कहि जात सो नाहीं।।

  67. सयन किए देखा कपि तेही। मंदिर महुँ न दीखि बैदेही।।

    अर्थ · Hindi

    सयन किए देखा कपि तेही। मंदिर महुँ न दीखि बैदेही।।

  68. भवन एक पुनि दीख सुहावा। हरि मंदिर तहँ भिन्न बनावा।।

    अर्थ · Hindi

    भवन एक पुनि दीख सुहावा। हरि मंदिर तहँ भिन्न बनावा।।

  69. रामायुध अंकित गृह सोभा बरनि न जाइ।

    अर्थ · Hindi

    रामायुध अंकित गृह सोभा बरनि न जाइ।

  70. RCM 5.5.10Open verse →

    नव तुलसिका बृंद तहँ देखि हरषि कपिराइ।।5।।

    अर्थ · Hindi

    नव तुलसिका बृंद तहँ देखि हरषि कपिराइ।।5।।

  71. लंका निसिचर निकर निवासा। इहाँ कहाँ सज्जन कर बासा।।

    अर्थ · Hindi

    लंका निसिचर निकर निवासा। इहाँ कहाँ सज्जन कर बासा।।

  72. मन महुँ तरक करै कपि लागा। तेहीं समय बिभीषनु जागा।।

    अर्थ · Hindi

    मन महुँ तरक करै कपि लागा। तेहीं समय बिभीषनु जागा।।

  73. राम राम तेहिं सुमिरन कीन्हा। हृदयँ हरष कपि सज्जन चीन्हा।।

    अर्थ · Hindi

    राम राम तेहिं सुमिरन कीन्हा। हृदयँ हरष कपि सज्जन चीन्हा।।

  74. एहि सन हठि करिहउँ पहिचानी। साधु ते होइ न कारज हानी।।

    अर्थ · Hindi

    एहि सन हठि करिहउँ पहिचानी। साधु ते होइ न कारज हानी।।

  75. बिप्र रुप धरि बचन सुनाए। सुनत बिभीषण उठि तहँ आए।।

    अर्थ · Hindi

    बिप्र रुप धरि बचन सुनाए। सुनत बिभीषण उठि तहँ आए।।

  76. करि प्रनाम पूँछी कुसलाई। बिप्र कहहु निज कथा बुझाई।।

    अर्थ · Hindi

    करि प्रनाम पूँछी कुसलाई। बिप्र कहहु निज कथा बुझाई।।

  77. की तुम्ह हरि दासन्ह महँ कोई। मोरें हृदय प्रीति अति होई।।

    अर्थ · Hindi

    की तुम्ह हरि दासन्ह महँ कोई। मोरें हृदय प्रीति अति होई।।

  78. की तुम्ह रामु दीन अनुरागी। आयहु मोहि करन बड़भागी।।

    अर्थ · Hindi

    की तुम्ह रामु दीन अनुरागी। आयहु मोहि करन बड़भागी।।

  79. तब हनुमंत कही सब राम कथा निज नाम।

    अर्थ · Hindi

    तब हनुमंत कही सब राम कथा निज नाम।

  80. RCM 5.6.10Open verse →

    सुनत जुगल तन पुलक मन मगन सुमिरि गुन ग्राम।।6।।

    अर्थ · Hindi

    सुनत जुगल तन पुलक मन मगन सुमिरि गुन ग्राम।।6।।

  81. सुनहु पवनसुत रहनि हमारी। जिमि दसनन्हि महुँ जीभ बिचारी।।

    अर्थ · Hindi

    सुनहु पवनसुत रहनि हमारी। जिमि दसनन्हि महुँ जीभ बिचारी।।

  82. तात कबहुँ मोहि जानि अनाथा। करिहहिं कृपा भानुकुल नाथा।।

    अर्थ · Hindi

    तात कबहुँ मोहि जानि अनाथा। करिहहिं कृपा भानुकुल नाथा।।

  83. तामस तनु कछु साधन नाहीं। प्रीति न पद सरोज मन माहीं।।

    अर्थ · Hindi

    तामस तनु कछु साधन नाहीं। प्रीति न पद सरोज मन माहीं।।

  84. अब मोहि भा भरोस हनुमंता। बिनु हरिकृपा मिलहिं नहिं संता।।

    अर्थ · Hindi

    अब मोहि भा भरोस हनुमंता। बिनु हरिकृपा मिलहिं नहिं संता।।

  85. जौ रघुबीर अनुग्रह कीन्हा। तौ तुम्ह मोहि दरसु हठि दीन्हा।।

    अर्थ · Hindi

    जौ रघुबीर अनुग्रह कीन्हा। तौ तुम्ह मोहि दरसु हठि दीन्हा।।

  86. सुनहु बिभीषन प्रभु कै रीती। करहिं सदा सेवक पर प्रीती।।

    अर्थ · Hindi

    सुनहु बिभीषन प्रभु कै रीती। करहिं सदा सेवक पर प्रीती।।

  87. कहहु कवन मैं परम कुलीना। कपि चंचल सबहीं बिधि हीना।।

    अर्थ · Hindi

    कहहु कवन मैं परम कुलीना। कपि चंचल सबहीं बिधि हीना।।

  88. प्रात लेइ जो नाम हमारा। तेहि दिन ताहि न मिलै अहारा।।

    अर्थ · Hindi

    प्रात लेइ जो नाम हमारा। तेहि दिन ताहि न मिलै अहारा।।

  89. अस मैं अधम सखा सुनु मोहू पर रघुबीर।

    अर्थ · Hindi

    अस मैं अधम सखा सुनु मोहू पर रघुबीर।

  90. RCM 5.7.10Open verse →

    कीन्ही कृपा सुमिरि गुन भरे बिलोचन नीर।।7।।

    अर्थ · Hindi

    कीन्ही कृपा सुमिरि गुन भरे बिलोचन नीर।।7।।

  91. जानतहूँ अस स्वामि बिसारी। फिरहिं ते काहे न होहिं दुखारी।।

    अर्थ · Hindi

    जानतहूँ अस स्वामि बिसारी। फिरहिं ते काहे न होहिं दुखारी।।

  92. एहि बिधि कहत राम गुन ग्रामा। पावा अनिर्बाच्य बिश्रामा।।

    अर्थ · Hindi

    एहि बिधि कहत राम गुन ग्रामा। पावा अनिर्बाच्य बिश्रामा।।

  93. पुनि सब कथा बिभीषन कही। जेहि बिधि जनकसुता तहँ रही।।

    अर्थ · Hindi

    पुनि सब कथा बिभीषन कही। जेहि बिधि जनकसुता तहँ रही।।

  94. तब हनुमंत कहा सुनु भ्राता। देखी चहउँ जानकी माता।।

    अर्थ · Hindi

    तब हनुमंत कहा सुनु भ्राता। देखी चहउँ जानकी माता।।

  95. जुगुति बिभीषन सकल सुनाई। चलेउ पवनसुत बिदा कराई।।

    अर्थ · Hindi

    जुगुति बिभीषन सकल सुनाई। चलेउ पवनसुत बिदा कराई।।

  96. करि सोइ रूप गयउ पुनि तहवाँ। बन असोक सीता रह जहवाँ।।

    अर्थ · Hindi

    करि सोइ रूप गयउ पुनि तहवाँ। बन असोक सीता रह जहवाँ।।

  97. देखि मनहि महुँ कीन्ह प्रनामा। बैठेहिं बीति जात निसि जामा।।

    अर्थ · Hindi

    देखि मनहि महुँ कीन्ह प्रनामा। बैठेहिं बीति जात निसि जामा।।

  98. कृस तन सीस जटा एक बेनी। जपति हृदयँ रघुपति गुन श्रेनी।।

    अर्थ · Hindi

    कृस तन सीस जटा एक बेनी। जपति हृदयँ रघुपति गुन श्रेनी।।

  99. निज पद नयन दिएँ मन राम पद कमल लीन।

    अर्थ · Hindi

    निज पद नयन दिएँ मन राम पद कमल लीन।

  100. RCM 5.8.10Open verse →

    परम दुखी भा पवनसुत देखि जानकी दीन।।8।।

    अर्थ · Hindi

    परम दुखी भा पवनसुत देखि जानकी दीन।।8।।

  101. तरु पल्लव महुँ रहा लुकाई। करइ बिचार करौं का भाई।।

    अर्थ · Hindi

    तरु पल्लव महुँ रहा लुकाई। करइ बिचार करौं का भाई।।

  102. तेहि अवसर रावनु तहँ आवा। संग नारि बहु किएँ बनावा।।

    अर्थ · Hindi

    तेहि अवसर रावनु तहँ आवा। संग नारि बहु किएँ बनावा।।

  103. बहु बिधि खल सीतहि समुझावा। साम दान भय भेद देखावा।।

    अर्थ · Hindi

    बहु बिधि खल सीतहि समुझावा। साम दान भय भेद देखावा।।

  104. कह रावनु सुनु सुमुखि सयानी। मंदोदरी आदि सब रानी।।

    अर्थ · Hindi

    कह रावनु सुनु सुमुखि सयानी। मंदोदरी आदि सब रानी।।

  105. तव अनुचरीं करउँ पन मोरा। एक बार बिलोकु मम ओरा।।

    अर्थ · Hindi

    तव अनुचरीं करउँ पन मोरा। एक बार बिलोकु मम ओरा।।

  106. तृन धरि ओट कहति बैदेही। सुमिरि अवधपति परम सनेही।।

    अर्थ · Hindi

    तृन धरि ओट कहति बैदेही। सुमिरि अवधपति परम सनेही।।

  107. सुनु दसमुख खद्योत प्रकासा। कबहुँ कि नलिनी करइ बिकासा।।

    अर्थ · Hindi

    सुनु दसमुख खद्योत प्रकासा। कबहुँ कि नलिनी करइ बिकासा।।

  108. अस मन समुझु कहति जानकी। खल सुधि नहिं रघुबीर बान की।।

    अर्थ · Hindi

    अस मन समुझु कहति जानकी। खल सुधि नहिं रघुबीर बान की।।

  109. सठ सूने हरि आनेहि मोहि। अधम निलज्ज लाज नहिं तोही।।

    अर्थ · Hindi

    सठ सूने हरि आनेहि मोहि। अधम निलज्ज लाज नहिं तोही।।

  110. RCM 5.9.10Open verse →

    आपुहि सुनि खद्योत सम रामहि भानु समान।

    अर्थ · Hindi

    आपुहि सुनि खद्योत सम रामहि भानु समान।

  111. RCM 5.9.11Open verse →

    परुष बचन सुनि काढ़ि असि बोला अति खिसिआन।।9।।

    अर्थ · Hindi

    परुष बचन सुनि काढ़ि असि बोला अति खिसिआन।।9।।

  112. RCM 5.10.1Open verse →

    सीता तैं मम कृत अपमाना। कटिहउँ तव सिर कठिन कृपाना।।

    अर्थ · Hindi

    सीता तैं मम कृत अपमाना। कटिहउँ तव सिर कठिन कृपाना।।

  113. RCM 5.10.2Open verse →

    नाहिं त सपदि मानु मम बानी। सुमुखि होति न त जीवन हानी।।

    अर्थ · Hindi

    नाहिं त सपदि मानु मम बानी। सुमुखि होति न त जीवन हानी।।

  114. RCM 5.10.3Open verse →

    स्याम सरोज दाम सम सुंदर। प्रभु भुज करि कर सम दसकंधर।।

    अर्थ · Hindi

    स्याम सरोज दाम सम सुंदर। प्रभु भुज करि कर सम दसकंधर।।

  115. RCM 5.10.4Open verse →

    सो भुज कंठ कि तव असि घोरा। सुनु सठ अस प्रवान पन मोरा।।

    अर्थ · Hindi

    सो भुज कंठ कि तव असि घोरा। सुनु सठ अस प्रवान पन मोरा।।

  116. RCM 5.10.5Open verse →

    चंद्रहास हरु मम परितापं। रघुपति बिरह अनल संजातं।।

    अर्थ · Hindi

    चंद्रहास हरु मम परितापं। रघुपति बिरह अनल संजातं।।

  117. RCM 5.10.6Open verse →

    सीतल निसित बहसि बर धारा। कह सीता हरु मम दुख भारा।।

    अर्थ · Hindi

    सीतल निसित बहसि बर धारा। कह सीता हरु मम दुख भारा।।

  118. RCM 5.10.7Open verse →

    सुनत बचन पुनि मारन धावा। मयतनयाँ कहि नीति बुझावा।।

    अर्थ · Hindi

    सुनत बचन पुनि मारन धावा। मयतनयाँ कहि नीति बुझावा।।

  119. RCM 5.10.8Open verse →

    कहेसि सकल निसिचरिन्ह बोलाई। सीतहि बहु बिधि त्रासहु जाई।।

    अर्थ · Hindi

    कहेसि सकल निसिचरिन्ह बोलाई। सीतहि बहु बिधि त्रासहु जाई।।

  120. RCM 5.10.9Open verse →

    मास दिवस महुँ कहा न माना। तौ मैं मारबि काढ़ि कृपाना।।

    अर्थ · Hindi

    मास दिवस महुँ कहा न माना। तौ मैं मारबि काढ़ि कृपाना।।

  121. RCM 5.10.10Open verse →

    भवन गयउ दसकंधर इहाँ पिसाचिनि बृंद।

    अर्थ · Hindi

    भवन गयउ दसकंधर इहाँ पिसाचिनि बृंद।

  122. RCM 5.10.11Open verse →

    सीतहि त्रास देखावहि धरहिं रूप बहु मंद।।10।।

    अर्थ · Hindi

    सीतहि त्रास देखावहि धरहिं रूप बहु मंद।।10।।

  123. RCM 5.11.1Open verse →

    त्रिजटा नाम राच्छसी एका। राम चरन रति निपुन बिबेका।।

    अर्थ · Hindi

    त्रिजटा नाम राच्छसी एका। राम चरन रति निपुन बिबेका।।

  124. RCM 5.11.2Open verse →

    सबन्हौ बोलि सुनाएसि सपना। सीतहि सेइ करहु हित अपना।।

    अर्थ · Hindi

    सबन्हौ बोलि सुनाएसि सपना। सीतहि सेइ करहु हित अपना।।

  125. RCM 5.11.3Open verse →

    सपनें बानर लंका जारी। जातुधान सेना सब मारी।।

    अर्थ · Hindi

    सपनें बानर लंका जारी। जातुधान सेना सब मारी।।

  126. RCM 5.11.4Open verse →

    खर आरूढ़ नगन दससीसा। मुंडित सिर खंडित भुज बीसा।।

    अर्थ · Hindi

    खर आरूढ़ नगन दससीसा। मुंडित सिर खंडित भुज बीसा।।

  127. RCM 5.11.5Open verse →

    एहि बिधि सो दच्छिन दिसि जाई। लंका मनहुँ बिभीषन पाई।।

    अर्थ · Hindi

    एहि बिधि सो दच्छिन दिसि जाई। लंका मनहुँ बिभीषन पाई।।

  128. RCM 5.11.6Open verse →

    नगर फिरी रघुबीर दोहाई। तब प्रभु सीता बोलि पठाई।।

    अर्थ · Hindi

    नगर फिरी रघुबीर दोहाई। तब प्रभु सीता बोलि पठाई।।

  129. RCM 5.11.7Open verse →

    यह सपना में कहउँ पुकारी। होइहि सत्य गएँ दिन चारी।।

    अर्थ · Hindi

    यह सपना में कहउँ पुकारी। होइहि सत्य गएँ दिन चारी।।

  130. RCM 5.11.8Open verse →

    तासु बचन सुनि ते सब डरीं। जनकसुता के चरनन्हि परीं।।

    अर्थ · Hindi

    तासु बचन सुनि ते सब डरीं। जनकसुता के चरनन्हि परीं।।

  131. RCM 5.11.9Open verse →

    जहँ तहँ गईं सकल तब सीता कर मन सोच।

    अर्थ · Hindi

    जहँ तहँ गईं सकल तब सीता कर मन सोच।

  132. RCM 5.11.10Open verse →

    मास दिवस बीतें मोहि मारिहि निसिचर पोच।।11।।

    अर्थ · Hindi

    मास दिवस बीतें मोहि मारिहि निसिचर पोच।।11।।

  133. RCM 5.12.1Open verse →

    त्रिजटा सन बोली कर जोरी। मातु बिपति संगिनि तैं मोरी।।

    अर्थ · Hindi

    त्रिजटा सन बोली कर जोरी। मातु बिपति संगिनि तैं मोरी।।

  134. RCM 5.12.2Open verse →

    तजौं देह करु बेगि उपाई। दुसहु बिरहु अब नहिं सहि जाई।।

    अर्थ · Hindi

    तजौं देह करु बेगि उपाई। दुसहु बिरहु अब नहिं सहि जाई।।

  135. RCM 5.12.3Open verse →

    आनि काठ रचु चिता बनाई। मातु अनल पुनि देहि लगाई।।

    अर्थ · Hindi

    आनि काठ रचु चिता बनाई। मातु अनल पुनि देहि लगाई।।

  136. RCM 5.12.4Open verse →

    सत्य करहि मम प्रीति सयानी। सुनै को श्रवन सूल सम बानी।।

    अर्थ · Hindi

    सत्य करहि मम प्रीति सयानी। सुनै को श्रवन सूल सम बानी।।

  137. RCM 5.12.5Open verse →

    सुनत बचन पद गहि समुझाएसि। प्रभु प्रताप बल सुजसु सुनाएसि।।

    अर्थ · Hindi

    सुनत बचन पद गहि समुझाएसि। प्रभु प्रताप बल सुजसु सुनाएसि।।

  138. RCM 5.12.6Open verse →

    निसि न अनल मिल सुनु सुकुमारी। अस कहि सो निज भवन सिधारी।।

    अर्थ · Hindi

    निसि न अनल मिल सुनु सुकुमारी। अस कहि सो निज भवन सिधारी।।

  139. RCM 5.12.7Open verse →

    कह सीता बिधि भा प्रतिकूला। मिलहि न पावक मिटिहि न सूला।।

    अर्थ · Hindi

    कह सीता बिधि भा प्रतिकूला। मिलहि न पावक मिटिहि न सूला।।

  140. RCM 5.12.8Open verse →

    देखिअत प्रगट गगन अंगारा। अवनि न आवत एकउ तारा।।

    अर्थ · Hindi

    देखिअत प्रगट गगन अंगारा। अवनि न आवत एकउ तारा।।

  141. RCM 5.12.9Open verse →

    पावकमय ससि स्त्रवत न आगी। मानहुँ मोहि जानि हतभागी।।

    अर्थ · Hindi

    पावकमय ससि स्त्रवत न आगी। मानहुँ मोहि जानि हतभागी।।

  142. RCM 5.12.10Open verse →

    सुनहि बिनय मम बिटप असोका। सत्य नाम करु हरु मम सोका।।

    अर्थ · Hindi

    सुनहि बिनय मम बिटप असोका। सत्य नाम करु हरु मम सोका।।

  143. RCM 5.12.11Open verse →

    नूतन किसलय अनल समाना। देहि अगिनि जनि करहि निदाना।।

    अर्थ · Hindi

    नूतन किसलय अनल समाना। देहि अगिनि जनि करहि निदाना।।

  144. RCM 5.12.12Open verse →

    देखि परम बिरहाकुल सीता। सो छन कपिहि कलप सम बीता।।

    अर्थ · Hindi

    देखि परम बिरहाकुल सीता। सो छन कपिहि कलप सम बीता।।

  145. RCM 5.12.13Open verse →

    कपि करि हृदयँ बिचार दीन्हि मुद्रिका डारी तब।

    अर्थ · Hindi

    कपि करि हृदयँ बिचार दीन्हि मुद्रिका डारी तब।

  146. RCM 5.12.14Open verse →

    जनु असोक अंगार दीन्हि हरषि उठि कर गहेउ।।12।।

    अर्थ · Hindi

    जनु असोक अंगार दीन्हि हरषि उठि कर गहेउ।।12।।

  147. RCM 5.13.1Open verse →

    तब देखी मुद्रिका मनोहर। राम नाम अंकित अति सुंदर।।

    अर्थ · Hindi

    तब देखी मुद्रिका मनोहर। राम नाम अंकित अति सुंदर।।

  148. RCM 5.13.2Open verse →

    चकित चितव मुदरी पहिचानी। हरष बिषाद हृदयँ अकुलानी।।

    अर्थ · Hindi

    चकित चितव मुदरी पहिचानी। हरष बिषाद हृदयँ अकुलानी।।

  149. RCM 5.13.3Open verse →

    जीति को सकइ अजय रघुराई। माया तें असि रचि नहिं जाई।।

    अर्थ · Hindi

    जीति को सकइ अजय रघुराई। माया तें असि रचि नहिं जाई।।

  150. RCM 5.13.4Open verse →

    सीता मन बिचार कर नाना। मधुर बचन बोलेउ हनुमाना।।

    अर्थ · Hindi

    सीता मन बिचार कर नाना। मधुर बचन बोलेउ हनुमाना।।

  151. RCM 5.13.5Open verse →

    रामचंद्र गुन बरनैं लागा। सुनतहिं सीता कर दुख भागा।।

    अर्थ · Hindi

    रामचंद्र गुन बरनैं लागा। सुनतहिं सीता कर दुख भागा।।

  152. RCM 5.13.6Open verse →

    लागीं सुनैं श्रवन मन लाई। आदिहु तें सब कथा सुनाई।।

    अर्थ · Hindi

    लागीं सुनैं श्रवन मन लाई। आदिहु तें सब कथा सुनाई।।

  153. RCM 5.13.7Open verse →

    श्रवनामृत जेहिं कथा सुहाई। कहि सो प्रगट होति किन भाई।।

    अर्थ · Hindi

    श्रवनामृत जेहिं कथा सुहाई। कहि सो प्रगट होति किन भाई।।

  154. RCM 5.13.8Open verse →

    तब हनुमंत निकट चलि गयऊ। फिरि बैंठीं मन बिसमय भयऊ।।

    अर्थ · Hindi

    तब हनुमंत निकट चलि गयऊ। फिरि बैंठीं मन बिसमय भयऊ।।

  155. RCM 5.13.9Open verse →

    राम दूत मैं मातु जानकी। सत्य सपथ करुनानिधान की।।

    अर्थ · Hindi

    राम दूत मैं मातु जानकी। सत्य सपथ करुनानिधान की।।

  156. RCM 5.13.10Open verse →

    यह मुद्रिका मातु मैं आनी। दीन्हि राम तुम्ह कहँ सहिदानी।।

    अर्थ · Hindi

    यह मुद्रिका मातु मैं आनी। दीन्हि राम तुम्ह कहँ सहिदानी।।

  157. RCM 5.13.11Open verse →

    नर बानरहि संग कहु कैसें। कहि कथा भइ संगति जैसें।।

    अर्थ · Hindi

    नर बानरहि संग कहु कैसें। कहि कथा भइ संगति जैसें।।

  158. RCM 5.13.12Open verse →

    कपि के बचन सप्रेम सुनि उपजा मन बिस्वास।।

    अर्थ · Hindi

    कपि के बचन सप्रेम सुनि उपजा मन बिस्वास।।

  159. RCM 5.13.13Open verse →

    जाना मन क्रम बचन यह कृपासिंधु कर दास।।13।।

    अर्थ · Hindi

    जाना मन क्रम बचन यह कृपासिंधु कर दास।।13।।

  160. RCM 5.14.1Open verse →

    हरिजन जानि प्रीति अति गाढ़ी। सजल नयन पुलकावलि बाढ़ी।।

    अर्थ · Hindi

    हरिजन जानि प्रीति अति गाढ़ी। सजल नयन पुलकावलि बाढ़ी।।

  161. RCM 5.14.2Open verse →

    बूड़त बिरह जलधि हनुमाना। भयउ तात मों कहुँ जलजाना।।

    अर्थ · Hindi

    बूड़त बिरह जलधि हनुमाना। भयउ तात मों कहुँ जलजाना।।

  162. RCM 5.14.3Open verse →

    अब कहु कुसल जाउँ बलिहारी। अनुज सहित सुख भवन खरारी।।

    अर्थ · Hindi

    अब कहु कुसल जाउँ बलिहारी। अनुज सहित सुख भवन खरारी।।

  163. RCM 5.14.4Open verse →

    कोमलचित कृपाल रघुराई। कपि केहि हेतु धरी निठुराई।।

    अर्थ · Hindi

    कोमलचित कृपाल रघुराई। कपि केहि हेतु धरी निठुराई।।

  164. RCM 5.14.5Open verse →

    सहज बानि सेवक सुख दायक। कबहुँक सुरति करत रघुनायक।।

    अर्थ · Hindi

    सहज बानि सेवक सुख दायक। कबहुँक सुरति करत रघुनायक।।

  165. RCM 5.14.6Open verse →

    कबहुँ नयन मम सीतल ताता। होइहहि निरखि स्याम मृदु गाता।।

    अर्थ · Hindi

    कबहुँ नयन मम सीतल ताता। होइहहि निरखि स्याम मृदु गाता।।

  166. RCM 5.14.7Open verse →

    बचनु न आव नयन भरे बारी। अहह नाथ हौं निपट बिसारी।।

    अर्थ · Hindi

    बचनु न आव नयन भरे बारी। अहह नाथ हौं निपट बिसारी।।

  167. RCM 5.14.8Open verse →

    देखि परम बिरहाकुल सीता। बोला कपि मृदु बचन बिनीता।।

    अर्थ · Hindi

    देखि परम बिरहाकुल सीता। बोला कपि मृदु बचन बिनीता।।

  168. RCM 5.14.9Open verse →

    मातु कुसल प्रभु अनुज समेता। तव दुख दुखी सुकृपा निकेता।।

    अर्थ · Hindi

    मातु कुसल प्रभु अनुज समेता। तव दुख दुखी सुकृपा निकेता।।

  169. RCM 5.14.10Open verse →

    जनि जननी मानहु जियँ ऊना। तुम्ह ते प्रेमु राम कें दूना।।

    अर्थ · Hindi

    जनि जननी मानहु जियँ ऊना। तुम्ह ते प्रेमु राम कें दूना।।

  170. RCM 5.14.11Open verse →

    रघुपति कर संदेसु अब सुनु जननी धरि धीर।

    अर्थ · Hindi

    रघुपति कर संदेसु अब सुनु जननी धरि धीर।

  171. RCM 5.14.12Open verse →

    अस कहि कपि गद गद भयउ भरे बिलोचन नीर।।14।।

    अर्थ · Hindi

    अस कहि कपि गद गद भयउ भरे बिलोचन नीर।।14।।

  172. RCM 5.15.1Open verse →

    कहेउ राम बियोग तव सीता। मो कहुँ सकल भए बिपरीता।।

    अर्थ · Hindi

    कहेउ राम बियोग तव सीता। मो कहुँ सकल भए बिपरीता।।

  173. RCM 5.15.2Open verse →

    नव तरु किसलय मनहुँ कृसानू। कालनिसा सम निसि ससि भानू।।

    अर्थ · Hindi

    नव तरु किसलय मनहुँ कृसानू। कालनिसा सम निसि ससि भानू।।

  174. RCM 5.15.3Open verse →

    कुबलय बिपिन कुंत बन सरिसा। बारिद तपत तेल जनु बरिसा।।

    अर्थ · Hindi

    कुबलय बिपिन कुंत बन सरिसा। बारिद तपत तेल जनु बरिसा।।

  175. RCM 5.15.4Open verse →

    जे हित रहे करत तेइ पीरा। उरग स्वास सम त्रिबिध समीरा।।

    अर्थ · Hindi

    जे हित रहे करत तेइ पीरा। उरग स्वास सम त्रिबिध समीरा।।

  176. RCM 5.15.5Open verse →

    कहेहू तें कछु दुख घटि होई। काहि कहौं यह जान न कोई।।

    अर्थ · Hindi

    कहेहू तें कछु दुख घटि होई। काहि कहौं यह जान न कोई।।

  177. RCM 5.15.6Open verse →

    तत्व प्रेम कर मम अरु तोरा। जानत प्रिया एकु मनु मोरा।।

    अर्थ · Hindi

    तत्व प्रेम कर मम अरु तोरा। जानत प्रिया एकु मनु मोरा।।

  178. RCM 5.15.7Open verse →

    सो मनु सदा रहत तोहि पाहीं। जानु प्रीति रसु एतेनहि माहीं।।

    अर्थ · Hindi

    सो मनु सदा रहत तोहि पाहीं। जानु प्रीति रसु एतेनहि माहीं।।

  179. RCM 5.15.8Open verse →

    प्रभु संदेसु सुनत बैदेही। मगन प्रेम तन सुधि नहिं तेही।।

    अर्थ · Hindi

    प्रभु संदेसु सुनत बैदेही। मगन प्रेम तन सुधि नहिं तेही।।

  180. RCM 5.15.9Open verse →

    कह कपि हृदयँ धीर धरु माता। सुमिरु राम सेवक सुखदाता।।

    अर्थ · Hindi

    कह कपि हृदयँ धीर धरु माता। सुमिरु राम सेवक सुखदाता।।

  181. RCM 5.15.10Open verse →

    उर आनहु रघुपति प्रभुताई। सुनि मम बचन तजहु कदराई।।

    अर्थ · Hindi

    उर आनहु रघुपति प्रभुताई। सुनि मम बचन तजहु कदराई।।

  182. RCM 5.15.11Open verse →

    निसिचर निकर पतंग सम रघुपति बान कृसानु।

    अर्थ · Hindi

    निसिचर निकर पतंग सम रघुपति बान कृसानु।

  183. RCM 5.15.12Open verse →

    जननी हृदयँ धीर धरु जरे निसाचर जानु।।15।।

    अर्थ · Hindi

    जननी हृदयँ धीर धरु जरे निसाचर जानु।।15।।

  184. RCM 5.16.1Open verse →

    जौं रघुबीर होति सुधि पाई। करते नहिं बिलंबु रघुराई।।

    अर्थ · Hindi

    जौं रघुबीर होति सुधि पाई। करते नहिं बिलंबु रघुराई।।

  185. RCM 5.16.2Open verse →

    रामबान रबि उएँ जानकी। तम बरूथ कहँ जातुधान की।।

    अर्थ · Hindi

    रामबान रबि उएँ जानकी। तम बरूथ कहँ जातुधान की।।

  186. RCM 5.16.3Open verse →

    अबहिं मातु मैं जाउँ लवाई। प्रभु आयसु नहिं राम दोहाई।।

    अर्थ · Hindi

    अबहिं मातु मैं जाउँ लवाई। प्रभु आयसु नहिं राम दोहाई।।

  187. RCM 5.16.4Open verse →

    कछुक दिवस जननी धरु धीरा। कपिन्ह सहित अइहहिं रघुबीरा।।

    अर्थ · Hindi

    कछुक दिवस जननी धरु धीरा। कपिन्ह सहित अइहहिं रघुबीरा।।

  188. RCM 5.16.5Open verse →

    निसिचर मारि तोहि लै जैहहिं। तिहुँ पुर नारदादि जसु गैहहिं।।

    अर्थ · Hindi

    निसिचर मारि तोहि लै जैहहिं। तिहुँ पुर नारदादि जसु गैहहिं।।

  189. RCM 5.16.6Open verse →

    हैं सुत कपि सब तुम्हहि समाना। जातुधान अति भट बलवाना।।

    अर्थ · Hindi

    हैं सुत कपि सब तुम्हहि समाना। जातुधान अति भट बलवाना।।

  190. RCM 5.16.7Open verse →

    मोरें हृदय परम संदेहा। सुनि कपि प्रगट कीन्ह निज देहा।।

    अर्थ · Hindi

    मोरें हृदय परम संदेहा। सुनि कपि प्रगट कीन्ह निज देहा।।

  191. RCM 5.16.8Open verse →

    कनक भूधराकार सरीरा। समर भयंकर अतिबल बीरा।।

    अर्थ · Hindi

    कनक भूधराकार सरीरा। समर भयंकर अतिबल बीरा।।

  192. RCM 5.16.9Open verse →

    सीता मन भरोस तब भयऊ। पुनि लघु रूप पवनसुत लयऊ।।

    अर्थ · Hindi

    सीता मन भरोस तब भयऊ। पुनि लघु रूप पवनसुत लयऊ।।

  193. RCM 5.16.10Open verse →

    सुनु माता साखामृग नहिं बल बुद्धि बिसाल।

    अर्थ · Hindi

    सुनु माता साखामृग नहिं बल बुद्धि बिसाल।

  194. RCM 5.16.11Open verse →

    प्रभु प्रताप तें गरुड़हि खाइ परम लघु ब्याल।।16।।

    अर्थ · Hindi

    प्रभु प्रताप तें गरुड़हि खाइ परम लघु ब्याल।।16।।

  195. RCM 5.17.1Open verse →

    मन संतोष सुनत कपि बानी। भगति प्रताप तेज बल सानी।।

    अर्थ · Hindi

    मन संतोष सुनत कपि बानी। भगति प्रताप तेज बल सानी।।

  196. RCM 5.17.2Open verse →

    आसिष दीन्हि रामप्रिय जाना। होहु तात बल सील निधाना।।

    अर्थ · Hindi

    आसिष दीन्हि रामप्रिय जाना। होहु तात बल सील निधाना।।

  197. RCM 5.17.3Open verse →

    अजर अमर गुननिधि सुत होहू। करहुँ बहुत रघुनायक छोहू।।

    अर्थ · Hindi

    अजर अमर गुननिधि सुत होहू। करहुँ बहुत रघुनायक छोहू।।

  198. RCM 5.17.4Open verse →

    करहुँ कृपा प्रभु अस सुनि काना। निर्भर प्रेम मगन हनुमाना।।

    अर्थ · Hindi

    करहुँ कृपा प्रभु अस सुनि काना। निर्भर प्रेम मगन हनुमाना।।

  199. RCM 5.17.5Open verse →

    बार बार नाएसि पद सीसा। बोला बचन जोरि कर कीसा।।

    अर्थ · Hindi

    बार बार नाएसि पद सीसा। बोला बचन जोरि कर कीसा।।

  200. RCM 5.17.6Open verse →

    अब कृतकृत्य भयउँ मैं माता। आसिष तव अमोघ बिख्याता।।

    अर्थ · Hindi

    अब कृतकृत्य भयउँ मैं माता। आसिष तव अमोघ बिख्याता।।

  201. RCM 5.17.7Open verse →

    सुनहु मातु मोहि अतिसय भूखा। लागि देखि सुंदर फल रूखा।।

    अर्थ · Hindi

    सुनहु मातु मोहि अतिसय भूखा। लागि देखि सुंदर फल रूखा।।

  202. RCM 5.17.8Open verse →

    सुनु सुत करहिं बिपिन रखवारी। परम सुभट रजनीचर भारी।।

    अर्थ · Hindi

    सुनु सुत करहिं बिपिन रखवारी। परम सुभट रजनीचर भारी।।

  203. RCM 5.17.9Open verse →

    तिन्ह कर भय माता मोहि नाहीं। जौं तुम्ह सुख मानहु मन माहीं।।

    अर्थ · Hindi

    तिन्ह कर भय माता मोहि नाहीं। जौं तुम्ह सुख मानहु मन माहीं।।

  204. RCM 5.17.10Open verse →

    देखि बुद्धि बल निपुन कपि कहेउ जानकीं जाहु।

    अर्थ · Hindi

    देखि बुद्धि बल निपुन कपि कहेउ जानकीं जाहु।

  205. RCM 5.17.11Open verse →

    रघुपति चरन हृदयँ धरि तात मधुर फल खाहु।।17।।

    अर्थ · Hindi

    रघुपति चरन हृदयँ धरि तात मधुर फल खाहु।।17।।

  206. RCM 5.18.1Open verse →

    चलेउ नाइ सिरु पैठेउ बागा। फल खाएसि तरु तोरैं लागा।।

    अर्थ · Hindi

    चलेउ नाइ सिरु पैठेउ बागा। फल खाएसि तरु तोरैं लागा।।

  207. RCM 5.18.2Open verse →

    रहे तहाँ बहु भट रखवारे। कछु मारेसि कछु जाइ पुकारे।।

    अर्थ · Hindi

    रहे तहाँ बहु भट रखवारे। कछु मारेसि कछु जाइ पुकारे।।

  208. RCM 5.18.3Open verse →

    नाथ एक आवा कपि भारी। तेहिं असोक बाटिका उजारी।।

    अर्थ · Hindi

    नाथ एक आवा कपि भारी। तेहिं असोक बाटिका उजारी।।

  209. RCM 5.18.4Open verse →

    खाएसि फल अरु बिटप उपारे। रच्छक मर्दि मर्दि महि डारे।।

    अर्थ · Hindi

    खाएसि फल अरु बिटप उपारे। रच्छक मर्दि मर्दि महि डारे।।

  210. RCM 5.18.5Open verse →

    सुनि रावन पठए भट नाना। तिन्हहि देखि गर्जेउ हनुमाना।।

    अर्थ · Hindi

    सुनि रावन पठए भट नाना। तिन्हहि देखि गर्जेउ हनुमाना।।

  211. RCM 5.18.6Open verse →

    सब रजनीचर कपि संघारे। गए पुकारत कछु अधमारे।।

    अर्थ · Hindi

    सब रजनीचर कपि संघारे। गए पुकारत कछु अधमारे।।

  212. RCM 5.18.7Open verse →

    पुनि पठयउ तेहिं अच्छकुमारा। चला संग लै सुभट अपारा।।

    अर्थ · Hindi

    पुनि पठयउ तेहिं अच्छकुमारा। चला संग लै सुभट अपारा।।

  213. RCM 5.18.8Open verse →

    आवत देखि बिटप गहि तर्जा। ताहि निपाति महाधुनि गर्जा।।

    अर्थ · Hindi

    आवत देखि बिटप गहि तर्जा। ताहि निपाति महाधुनि गर्जा।।

  214. RCM 5.18.9Open verse →

    कछु मारेसि कछु मर्देसि कछु मिलएसि धरि धूरि।

    अर्थ · Hindi

    कछु मारेसि कछु मर्देसि कछु मिलएसि धरि धूरि।

  215. RCM 5.18.10Open verse →

    कछु पुनि जाइ पुकारे प्रभु मर्कट बल भूरि।।18।।

    अर्थ · Hindi

    कछु पुनि जाइ पुकारे प्रभु मर्कट बल भूरि।।18।।

  216. RCM 5.19.1Open verse →

    सुनि सुत बध लंकेस रिसाना। पठएसि मेघनाद बलवाना।।

    अर्थ · Hindi

    सुनि सुत बध लंकेस रिसाना। पठएसि मेघनाद बलवाना।।

  217. RCM 5.19.2Open verse →

    मारसि जनि सुत बांधेसु ताही। देखिअ कपिहि कहाँ कर आही।।

    अर्थ · Hindi

    मारसि जनि सुत बांधेसु ताही। देखिअ कपिहि कहाँ कर आही।।

  218. RCM 5.19.3Open verse →

    चला इंद्रजित अतुलित जोधा। बंधु निधन सुनि उपजा क्रोधा।।

    अर्थ · Hindi

    चला इंद्रजित अतुलित जोधा। बंधु निधन सुनि उपजा क्रोधा।।

  219. RCM 5.19.4Open verse →

    कपि देखा दारुन भट आवा। कटकटाइ गर्जा अरु धावा।।

    अर्थ · Hindi

    कपि देखा दारुन भट आवा। कटकटाइ गर्जा अरु धावा।।

  220. RCM 5.19.5Open verse →

    अति बिसाल तरु एक उपारा। बिरथ कीन्ह लंकेस कुमारा।।

    अर्थ · Hindi

    अति बिसाल तरु एक उपारा। बिरथ कीन्ह लंकेस कुमारा।।

  221. RCM 5.19.6Open verse →

    रहे महाभट ताके संगा। गहि गहि कपि मर्दइ निज अंगा।।

    अर्थ · Hindi

    रहे महाभट ताके संगा। गहि गहि कपि मर्दइ निज अंगा।।

  222. RCM 5.19.7Open verse →

    तिन्हहि निपाति ताहि सन बाजा। भिरे जुगल मानहुँ गजराजा।

    अर्थ · Hindi

    तिन्हहि निपाति ताहि सन बाजा। भिरे जुगल मानहुँ गजराजा।

  223. RCM 5.19.8Open verse →

    मुठिका मारि चढ़ा तरु जाई। ताहि एक छन मुरुछा आई।।

    अर्थ · Hindi

    मुठिका मारि चढ़ा तरु जाई। ताहि एक छन मुरुछा आई।।

  224. RCM 5.19.9Open verse →

    उठि बहोरि कीन्हिसि बहु माया। जीति न जाइ प्रभंजन जाया।।

    अर्थ · Hindi

    उठि बहोरि कीन्हिसि बहु माया। जीति न जाइ प्रभंजन जाया।।

  225. RCM 5.19.10Open verse →

    ब्रह्म अस्त्र तेहिं साँधा कपि मन कीन्ह बिचार।

    अर्थ · Hindi

    ब्रह्म अस्त्र तेहिं साँधा कपि मन कीन्ह बिचार।

  226. RCM 5.19.11Open verse →

    जौं न ब्रह्मसर मानउँ महिमा मिटइ अपार।।19।।

    अर्थ · Hindi

    जौं न ब्रह्मसर मानउँ महिमा मिटइ अपार।।19।।

  227. RCM 5.20.1Open verse →

    ब्रह्मबान कपि कहुँ तेहि मारा। परतिहुँ बार कटकु संघारा।।

    अर्थ · Hindi

    ब्रह्मबान कपि कहुँ तेहि मारा। परतिहुँ बार कटकु संघारा।।

  228. RCM 5.20.2Open verse →

    तेहि देखा कपि मुरुछित भयऊ। नागपास बाँधेसि लै गयऊ।।

    अर्थ · Hindi

    तेहि देखा कपि मुरुछित भयऊ। नागपास बाँधेसि लै गयऊ।।

  229. RCM 5.20.3Open verse →

    जासु नाम जपि सुनहु भवानी। भव बंधन काटहिं नर ग्यानी।।

    अर्थ · Hindi

    जासु नाम जपि सुनहु भवानी। भव बंधन काटहिं नर ग्यानी।।

  230. RCM 5.20.4Open verse →

    तासु दूत कि बंध तरु आवा। प्रभु कारज लगि कपिहिं बँधावा।।

    अर्थ · Hindi

    तासु दूत कि बंध तरु आवा। प्रभु कारज लगि कपिहिं बँधावा।।

  231. RCM 5.20.5Open verse →

    कपि बंधन सुनि निसिचर धाए। कौतुक लागि सभाँ सब आए।।

    अर्थ · Hindi

    कपि बंधन सुनि निसिचर धाए। कौतुक लागि सभाँ सब आए।।

  232. RCM 5.20.6Open verse →

    दसमुख सभा दीखि कपि जाई। कहि न जाइ कछु अति प्रभुताई।।

    अर्थ · Hindi

    दसमुख सभा दीखि कपि जाई। कहि न जाइ कछु अति प्रभुताई।।

  233. RCM 5.20.7Open verse →

    कर जोरें सुर दिसिप बिनीता। भृकुटि बिलोकत सकल सभीता।।

    अर्थ · Hindi

    कर जोरें सुर दिसिप बिनीता। भृकुटि बिलोकत सकल सभीता।।

  234. RCM 5.20.8Open verse →

    देखि प्रताप न कपि मन संका। जिमि अहिगन महुँ गरुड़ असंका।।

    अर्थ · Hindi

    देखि प्रताप न कपि मन संका। जिमि अहिगन महुँ गरुड़ असंका।।

  235. RCM 5.20.9Open verse →

    कपिहि बिलोकि दसानन बिहसा कहि दुर्बाद।

    अर्थ · Hindi

    कपिहि बिलोकि दसानन बिहसा कहि दुर्बाद।

  236. RCM 5.20.10Open verse →

    सुत बध सुरति कीन्हि पुनि उपजा हृदयँ बिषाद।।20।।

    अर्थ · Hindi

    सुत बध सुरति कीन्हि पुनि उपजा हृदयँ बिषाद।।20।।

  237. RCM 5.21.1Open verse →

    कह लंकेस कवन तैं कीसा। केहिं के बल घालेहि बन खीसा।।

    अर्थ · Hindi

    कह लंकेस कवन तैं कीसा। केहिं के बल घालेहि बन खीसा।।

  238. RCM 5.21.2Open verse →

    की धौं श्रवन सुनेहि नहिं मोही। देखउँ अति असंक सठ तोही।।

    अर्थ · Hindi

    की धौं श्रवन सुनेहि नहिं मोही। देखउँ अति असंक सठ तोही।।

  239. RCM 5.21.3Open verse →

    मारे निसिचर केहिं अपराधा। कहु सठ तोहि न प्रान कइ बाधा।।

    अर्थ · Hindi

    मारे निसिचर केहिं अपराधा। कहु सठ तोहि न प्रान कइ बाधा।।

  240. RCM 5.21.4Open verse →

    सुन रावन ब्रह्मांड निकाया। पाइ जासु बल बिरचित माया।।

    अर्थ · Hindi

    सुन रावन ब्रह्मांड निकाया। पाइ जासु बल बिरचित माया।।

  241. RCM 5.21.5Open verse →

    जाकें बल बिरंचि हरि ईसा। पालत सृजत हरत दससीसा।

    अर्थ · Hindi

    जाकें बल बिरंचि हरि ईसा। पालत सृजत हरत दससीसा।

  242. RCM 5.21.6Open verse →

    जा बल सीस धरत सहसानन। अंडकोस समेत गिरि कानन।।

    अर्थ · Hindi

    जा बल सीस धरत सहसानन। अंडकोस समेत गिरि कानन।।

  243. RCM 5.21.7Open verse →

    धरइ जो बिबिध देह सुरत्राता। तुम्ह ते सठन्ह सिखावनु दाता।

    अर्थ · Hindi

    धरइ जो बिबिध देह सुरत्राता। तुम्ह ते सठन्ह सिखावनु दाता।

  244. RCM 5.21.8Open verse →

    हर कोदंड कठिन जेहि भंजा। तेहि समेत नृप दल मद गंजा।।

    अर्थ · Hindi

    हर कोदंड कठिन जेहि भंजा। तेहि समेत नृप दल मद गंजा।।

  245. RCM 5.21.9Open verse →

    खर दूषन त्रिसिरा अरु बाली। बधे सकल अतुलित बलसाली।।

    अर्थ · Hindi

    खर दूषन त्रिसिरा अरु बाली। बधे सकल अतुलित बलसाली।।

  246. RCM 5.21.10Open verse →

    जाके बल लवलेस तें जितेहु चराचर झारि।

    अर्थ · Hindi

    जाके बल लवलेस तें जितेहु चराचर झारि।

  247. RCM 5.21.11Open verse →

    तासु दूत मैं जा करि हरि आनेहु प्रिय नारि।।21।।

    अर्थ · Hindi

    तासु दूत मैं जा करि हरि आनेहु प्रिय नारि।।21।।

  248. RCM 5.22.1Open verse →

    जानउँ मैं तुम्हारि प्रभुताई। सहसबाहु सन परी लराई।।

    अर्थ · Hindi

    जानउँ मैं तुम्हारि प्रभुताई। सहसबाहु सन परी लराई।।

  249. RCM 5.22.2Open verse →

    समर बालि सन करि जसु पावा। सुनि कपि बचन बिहसि बिहरावा।।

    अर्थ · Hindi

    समर बालि सन करि जसु पावा। सुनि कपि बचन बिहसि बिहरावा।।

  250. RCM 5.22.3Open verse →

    खायउँ फल प्रभु लागी भूँखा। कपि सुभाव तें तोरेउँ रूखा।।

    अर्थ · Hindi

    खायउँ फल प्रभु लागी भूँखा। कपि सुभाव तें तोरेउँ रूखा।।

  251. RCM 5.22.4Open verse →

    सब कें देह परम प्रिय स्वामी। मारहिं मोहि कुमारग गामी।।

    अर्थ · Hindi

    सब कें देह परम प्रिय स्वामी। मारहिं मोहि कुमारग गामी।।

  252. RCM 5.22.5Open verse →

    जिन्ह मोहि मारा ते मैं मारे। तेहि पर बाँधेउ तनयँ तुम्हारे।।

    अर्थ · Hindi

    जिन्ह मोहि मारा ते मैं मारे। तेहि पर बाँधेउ तनयँ तुम्हारे।।

  253. RCM 5.22.6Open verse →

    मोहि न कछु बाँधे कइ लाजा। कीन्ह चहउँ निज प्रभु कर काजा।।

    अर्थ · Hindi

    मोहि न कछु बाँधे कइ लाजा। कीन्ह चहउँ निज प्रभु कर काजा।।

  254. RCM 5.22.7Open verse →

    बिनती करउँ जोरि कर रावन। सुनहु मान तजि मोर सिखावन।।

    अर्थ · Hindi

    बिनती करउँ जोरि कर रावन। सुनहु मान तजि मोर सिखावन।।

  255. RCM 5.22.8Open verse →

    देखहु तुम्ह निज कुलहि बिचारी। भ्रम तजि भजहु भगत भय हारी।।

    अर्थ · Hindi

    देखहु तुम्ह निज कुलहि बिचारी। भ्रम तजि भजहु भगत भय हारी।।

  256. RCM 5.22.9Open verse →

    जाकें डर अति काल डेराई। जो सुर असुर चराचर खाई।।

    अर्थ · Hindi

    जाकें डर अति काल डेराई। जो सुर असुर चराचर खाई।।

  257. RCM 5.22.10Open verse →

    तासों बयरु कबहुँ नहिं कीजै। मोरे कहें जानकी दीजै।।

    अर्थ · Hindi

    तासों बयरु कबहुँ नहिं कीजै। मोरे कहें जानकी दीजै।।

  258. RCM 5.22.11Open verse →

    प्रनतपाल रघुनायक करुना सिंधु खरारि।

    अर्थ · Hindi

    प्रनतपाल रघुनायक करुना सिंधु खरारि।

  259. RCM 5.22.12Open verse →

    गएँ सरन प्रभु राखिहैं तव अपराध बिसारि।।22।।

    अर्थ · Hindi

    गएँ सरन प्रभु राखिहैं तव अपराध बिसारि।।22।।

  260. RCM 5.23.1Open verse →

    राम चरन पंकज उर धरहू। लंका अचल राज तुम्ह करहू।।

    अर्थ · Hindi

    राम चरन पंकज उर धरहू। लंका अचल राज तुम्ह करहू।।

  261. RCM 5.23.2Open verse →

    रिषि पुलिस्त जसु बिमल मंयका। तेहि ससि महुँ जनि होहु कलंका।।

    अर्थ · Hindi

    रिषि पुलिस्त जसु बिमल मंयका। तेहि ससि महुँ जनि होहु कलंका।।

  262. RCM 5.23.3Open verse →

    राम नाम बिनु गिरा न सोहा। देखु बिचारि त्यागि मद मोहा।।

    अर्थ · Hindi

    राम नाम बिनु गिरा न सोहा। देखु बिचारि त्यागि मद मोहा।।

  263. RCM 5.23.4Open verse →

    बसन हीन नहिं सोह सुरारी। सब भूषण भूषित बर नारी।।

    अर्थ · Hindi

    बसन हीन नहिं सोह सुरारी। सब भूषण भूषित बर नारी।।

  264. RCM 5.23.5Open verse →

    राम बिमुख संपति प्रभुताई। जाइ रही पाई बिनु पाई।।

    अर्थ · Hindi

    राम बिमुख संपति प्रभुताई। जाइ रही पाई बिनु पाई।।

  265. RCM 5.23.6Open verse →

    सजल मूल जिन्ह सरितन्ह नाहीं। बरषि गए पुनि तबहिं सुखाहीं।।

    अर्थ · Hindi

    सजल मूल जिन्ह सरितन्ह नाहीं। बरषि गए पुनि तबहिं सुखाहीं।।

  266. RCM 5.23.7Open verse →

    सुनु दसकंठ कहउँ पन रोपी। बिमुख राम त्राता नहिं कोपी।।

    अर्थ · Hindi

    सुनु दसकंठ कहउँ पन रोपी। बिमुख राम त्राता नहिं कोपी।।

  267. RCM 5.23.8Open verse →

    संकर सहस बिष्नु अज तोही। सकहिं न राखि राम कर द्रोही।।

    अर्थ · Hindi

    संकर सहस बिष्नु अज तोही। सकहिं न राखि राम कर द्रोही।।

  268. RCM 5.23.9Open verse →

    मोहमूल बहु सूल प्रद त्यागहु तम अभिमान।

    अर्थ · Hindi

    मोहमूल बहु सूल प्रद त्यागहु तम अभिमान।

  269. RCM 5.23.10Open verse →

    भजहु राम रघुनायक कृपा सिंधु भगवान।।23।।

    अर्थ · Hindi

    भजहु राम रघुनायक कृपा सिंधु भगवान।।23।।

  270. RCM 5.24.1Open verse →

    जदपि कहि कपि अति हित बानी। भगति बिबेक बिरति नय सानी।।

    अर्थ · Hindi

    जदपि कहि कपि अति हित बानी। भगति बिबेक बिरति नय सानी।।

  271. RCM 5.24.2Open verse →

    बोला बिहसि महा अभिमानी। मिला हमहि कपि गुर बड़ ग्यानी।।

    अर्थ · Hindi

    बोला बिहसि महा अभिमानी। मिला हमहि कपि गुर बड़ ग्यानी।।

  272. RCM 5.24.3Open verse →

    मृत्यु निकट आई खल तोही। लागेसि अधम सिखावन मोही।।

    अर्थ · Hindi

    मृत्यु निकट आई खल तोही। लागेसि अधम सिखावन मोही।।

  273. RCM 5.24.4Open verse →

    उलटा होइहि कह हनुमाना। मतिभ्रम तोर प्रगट मैं जाना।।

    अर्थ · Hindi

    उलटा होइहि कह हनुमाना। मतिभ्रम तोर प्रगट मैं जाना।।

  274. RCM 5.24.5Open verse →

    सुनि कपि बचन बहुत खिसिआना। बेगि न हरहुँ मूढ़ कर प्राना।।

    अर्थ · Hindi

    सुनि कपि बचन बहुत खिसिआना। बेगि न हरहुँ मूढ़ कर प्राना।।

  275. RCM 5.24.6Open verse →

    सुनत निसाचर मारन धाए। सचिवन्ह सहित बिभीषनु आए।

    अर्थ · Hindi

    सुनत निसाचर मारन धाए। सचिवन्ह सहित बिभीषनु आए।

  276. RCM 5.24.7Open verse →

    नाइ सीस करि बिनय बहूता। नीति बिरोध न मारिअ दूता।।

    अर्थ · Hindi

    नाइ सीस करि बिनय बहूता। नीति बिरोध न मारिअ दूता।।

  277. RCM 5.24.8Open verse →

    आन दंड कछु करिअ गोसाँई। सबहीं कहा मंत्र भल भाई।।

    अर्थ · Hindi

    आन दंड कछु करिअ गोसाँई। सबहीं कहा मंत्र भल भाई।।

  278. RCM 5.24.9Open verse →

    सुनत बिहसि बोला दसकंधर। अंग भंग करि पठइअ बंदर।।

    अर्थ · Hindi

    सुनत बिहसि बोला दसकंधर। अंग भंग करि पठइअ बंदर।।

  279. RCM 5.24.10Open verse →

    कपि कें ममता पूँछ पर सबहि कहउँ समुझाइ।

    अर्थ · Hindi

    कपि कें ममता पूँछ पर सबहि कहउँ समुझाइ।

  280. RCM 5.24.11Open verse →

    तेल बोरि पट बाँधि पुनि पावक देहु लगाइ।।24।।

    अर्थ · Hindi

    तेल बोरि पट बाँधि पुनि पावक देहु लगाइ।।24।।

  281. RCM 5.25.1Open verse →

    पूँछहीन बानर तहँ जाइहि। तब सठ निज नाथहि लइ आइहि।।

    अर्थ · Hindi

    पूँछहीन बानर तहँ जाइहि। तब सठ निज नाथहि लइ आइहि।।

  282. RCM 5.25.2Open verse →

    जिन्ह कै कीन्हसि बहुत बड़ाई। देखेउँमैं तिन्ह कै प्रभुताई।।

    अर्थ · Hindi

    जिन्ह कै कीन्हसि बहुत बड़ाई। देखेउँमैं तिन्ह कै प्रभुताई।।

  283. RCM 5.25.3Open verse →

    बचन सुनत कपि मन मुसुकाना। भइ सहाय सारद मैं जाना।।

    अर्थ · Hindi

    बचन सुनत कपि मन मुसुकाना। भइ सहाय सारद मैं जाना।।

  284. RCM 5.25.4Open verse →

    जातुधान सुनि रावन बचना। लागे रचैं मूढ़ सोइ रचना।।

    अर्थ · Hindi

    जातुधान सुनि रावन बचना। लागे रचैं मूढ़ सोइ रचना।।

  285. RCM 5.25.5Open verse →

    रहा न नगर बसन घृत तेला। बाढ़ी पूँछ कीन्ह कपि खेला।।

    अर्थ · Hindi

    रहा न नगर बसन घृत तेला। बाढ़ी पूँछ कीन्ह कपि खेला।।

  286. RCM 5.25.6Open verse →

    कौतुक कहँ आए पुरबासी। मारहिं चरन करहिं बहु हाँसी।।

    अर्थ · Hindi

    कौतुक कहँ आए पुरबासी। मारहिं चरन करहिं बहु हाँसी।।

  287. RCM 5.25.7Open verse →

    बाजहिं ढोल देहिं सब तारी। नगर फेरि पुनि पूँछ प्रजारी।।

    अर्थ · Hindi

    बाजहिं ढोल देहिं सब तारी। नगर फेरि पुनि पूँछ प्रजारी।।

  288. RCM 5.25.8Open verse →

    पावक जरत देखि हनुमंता। भयउ परम लघु रुप तुरंता।।

    अर्थ · Hindi

    पावक जरत देखि हनुमंता। भयउ परम लघु रुप तुरंता।।

  289. RCM 5.25.9Open verse →

    निबुकि चढ़ेउ कपि कनक अटारीं। भई सभीत निसाचर नारीं।।

    अर्थ · Hindi

    निबुकि चढ़ेउ कपि कनक अटारीं। भई सभीत निसाचर नारीं।।

  290. RCM 5.25.10Open verse →

    हरि प्रेरित तेहि अवसर चले मरुत उनचास।

    अर्थ · Hindi

    हरि प्रेरित तेहि अवसर चले मरुत उनचास।

  291. RCM 5.25.11Open verse →

    अट्टहास करि गर्ज़ा कपि बढ़ि लाग अकास।।25।।

    अर्थ · Hindi

    अट्टहास करि गर्ज़ा कपि बढ़ि लाग अकास।।25।।

  292. RCM 5.26.1Open verse →

    देह बिसाल परम हरुआई। मंदिर तें मंदिर चढ़ धाई।।

    अर्थ · Hindi

    देह बिसाल परम हरुआई। मंदिर तें मंदिर चढ़ धाई।।

  293. RCM 5.26.2Open verse →

    जरइ नगर भा लोग बिहाला। झपट लपट बहु कोटि कराला।।

    अर्थ · Hindi

    जरइ नगर भा लोग बिहाला। झपट लपट बहु कोटि कराला।।

  294. RCM 5.26.3Open verse →

    तात मातु हा सुनिअ पुकारा। एहि अवसर को हमहि उबारा।।

    अर्थ · Hindi

    तात मातु हा सुनिअ पुकारा। एहि अवसर को हमहि उबारा।।

  295. RCM 5.26.4Open verse →

    हम जो कहा यह कपि नहिं होई। बानर रूप धरें सुर कोई।।

    अर्थ · Hindi

    हम जो कहा यह कपि नहिं होई। बानर रूप धरें सुर कोई।।

  296. RCM 5.26.5Open verse →

    साधु अवग्या कर फलु ऐसा। जरइ नगर अनाथ कर जैसा।।

    अर्थ · Hindi

    साधु अवग्या कर फलु ऐसा। जरइ नगर अनाथ कर जैसा।।

  297. RCM 5.26.6Open verse →

    जारा नगरु निमिष एक माहीं। एक बिभीषन कर गृह नाहीं।।

    अर्थ · Hindi

    जारा नगरु निमिष एक माहीं। एक बिभीषन कर गृह नाहीं।।

  298. RCM 5.26.7Open verse →

    ता कर दूत अनल जेहिं सिरिजा। जरा न सो तेहि कारन गिरिजा।।

    अर्थ · Hindi

    ता कर दूत अनल जेहिं सिरिजा। जरा न सो तेहि कारन गिरिजा।।

  299. RCM 5.26.8Open verse →

    उलटि पलटि लंका सब जारी। कूदि परा पुनि सिंधु मझारी।।

    अर्थ · Hindi

    उलटि पलटि लंका सब जारी। कूदि परा पुनि सिंधु मझारी।।

  300. RCM 5.26.9Open verse →

    पूँछ बुझाइ खोइ श्रम धरि लघु रूप बहोरि।

    अर्थ · Hindi

    पूँछ बुझाइ खोइ श्रम धरि लघु रूप बहोरि।

  301. RCM 5.26.10Open verse →

    जनकसुता के आगें ठाढ़ भयउ कर जोरि।।26।।

    अर्थ · Hindi

    जनकसुता के आगें ठाढ़ भयउ कर जोरि।।26।।

  302. RCM 5.27.1Open verse →

    मातु मोहि दीजे कछु चीन्हा। जैसें रघुनायक मोहि दीन्हा।।

    अर्थ · Hindi

    मातु मोहि दीजे कछु चीन्हा। जैसें रघुनायक मोहि दीन्हा।।

  303. RCM 5.27.2Open verse →

    चूड़ामनि उतारि तब दयऊ। हरष समेत पवनसुत लयऊ।।

    अर्थ · Hindi

    चूड़ामनि उतारि तब दयऊ। हरष समेत पवनसुत लयऊ।।

  304. RCM 5.27.3Open verse →

    कहेहु तात अस मोर प्रनामा। सब प्रकार प्रभु पूरनकामा।।

    अर्थ · Hindi

    कहेहु तात अस मोर प्रनामा। सब प्रकार प्रभु पूरनकामा।।

  305. RCM 5.27.4Open verse →

    दीन दयाल बिरिदु संभारी। हरहु नाथ मम संकट भारी।।

    अर्थ · Hindi

    दीन दयाल बिरिदु संभारी। हरहु नाथ मम संकट भारी।।

  306. RCM 5.27.5Open verse →

    तात सक्रसुत कथा सुनाएहु। बान प्रताप प्रभुहि समुझाएहु।।

    अर्थ · Hindi

    तात सक्रसुत कथा सुनाएहु। बान प्रताप प्रभुहि समुझाएहु।।

  307. RCM 5.27.6Open verse →

    मास दिवस महुँ नाथु न आवा। तौ पुनि मोहि जिअत नहिं पावा।।

    अर्थ · Hindi

    मास दिवस महुँ नाथु न आवा। तौ पुनि मोहि जिअत नहिं पावा।।

  308. RCM 5.27.7Open verse →

    कहु कपि केहि बिधि राखौं प्राना। तुम्हहू तात कहत अब जाना।।

    अर्थ · Hindi

    कहु कपि केहि बिधि राखौं प्राना। तुम्हहू तात कहत अब जाना।।

  309. RCM 5.27.8Open verse →

    तोहि देखि सीतलि भइ छाती। पुनि मो कहुँ सोइ दिनु सो राती।।

    अर्थ · Hindi

    तोहि देखि सीतलि भइ छाती। पुनि मो कहुँ सोइ दिनु सो राती।।

  310. RCM 5.27.9Open verse →

    जनकसुतहि समुझाइ करि बहु बिधि धीरजु दीन्ह।

    अर्थ · Hindi

    जनकसुतहि समुझाइ करि बहु बिधि धीरजु दीन्ह।

  311. RCM 5.27.10Open verse →

    चरन कमल सिरु नाइ कपि गवनु राम पहिं कीन्ह।।27।।

    अर्थ · Hindi

    चरन कमल सिरु नाइ कपि गवनु राम पहिं कीन्ह।।27।।

  312. RCM 5.28.1Open verse →

    चलत महाधुनि गर्जेसि भारी। गर्भ स्त्रवहिं सुनि निसिचर नारी।।

    अर्थ · Hindi

    चलत महाधुनि गर्जेसि भारी। गर्भ स्त्रवहिं सुनि निसिचर नारी।।

  313. RCM 5.28.2Open verse →

    नाघि सिंधु एहि पारहि आवा। सबद किलकिला कपिन्ह सुनावा।।

    अर्थ · Hindi

    नाघि सिंधु एहि पारहि आवा। सबद किलकिला कपिन्ह सुनावा।।

  314. RCM 5.28.3Open verse →

    हरषे सब बिलोकि हनुमाना। नूतन जन्म कपिन्ह तब जाना।।

    अर्थ · Hindi

    हरषे सब बिलोकि हनुमाना। नूतन जन्म कपिन्ह तब जाना।।

  315. RCM 5.28.4Open verse →

    मुख प्रसन्न तन तेज बिराजा। कीन्हेसि रामचन्द्र कर काजा।।

    अर्थ · Hindi

    मुख प्रसन्न तन तेज बिराजा। कीन्हेसि रामचन्द्र कर काजा।।

  316. RCM 5.28.5Open verse →

    मिले सकल अति भए सुखारी। तलफत मीन पाव जिमि बारी।।

    अर्थ · Hindi

    मिले सकल अति भए सुखारी। तलफत मीन पाव जिमि बारी।।

  317. RCM 5.28.6Open verse →

    चले हरषि रघुनायक पासा। पूँछत कहत नवल इतिहासा।।

    अर्थ · Hindi

    चले हरषि रघुनायक पासा। पूँछत कहत नवल इतिहासा।।

  318. RCM 5.28.7Open verse →

    तब मधुबन भीतर सब आए। अंगद संमत मधु फल खाए।।

    अर्थ · Hindi

    तब मधुबन भीतर सब आए। अंगद संमत मधु फल खाए।।

  319. RCM 5.28.8Open verse →

    रखवारे जब बरजन लागे। मुष्टि प्रहार हनत सब भागे।।

    अर्थ · Hindi

    रखवारे जब बरजन लागे। मुष्टि प्रहार हनत सब भागे।।

  320. RCM 5.28.9Open verse →

    जाइ पुकारे ते सब बन उजार जुबराज।

    अर्थ · Hindi

    जाइ पुकारे ते सब बन उजार जुबराज।

  321. RCM 5.28.10Open verse →

    सुनि सुग्रीव हरष कपि करि आए प्रभु काज।।28।।

    अर्थ · Hindi

    सुनि सुग्रीव हरष कपि करि आए प्रभु काज।।28।।

  322. RCM 5.29.1Open verse →

    जौं न होति सीता सुधि पाई। मधुबन के फल सकहिं कि खाई।।

    अर्थ · Hindi

    जौं न होति सीता सुधि पाई। मधुबन के फल सकहिं कि खाई।।

  323. RCM 5.29.2Open verse →

    एहि बिधि मन बिचार कर राजा। आइ गए कपि सहित समाजा।।

    अर्थ · Hindi

    एहि बिधि मन बिचार कर राजा। आइ गए कपि सहित समाजा।।

  324. RCM 5.29.3Open verse →

    आइ सबन्हि नावा पद सीसा। मिलेउ सबन्हि अति प्रेम कपीसा।।

    अर्थ · Hindi

    आइ सबन्हि नावा पद सीसा। मिलेउ सबन्हि अति प्रेम कपीसा।।

  325. RCM 5.29.4Open verse →

    पूँछी कुसल कुसल पद देखी। राम कृपाँ भा काजु बिसेषी।।

    अर्थ · Hindi

    पूँछी कुसल कुसल पद देखी। राम कृपाँ भा काजु बिसेषी।।

  326. RCM 5.29.5Open verse →

    नाथ काजु कीन्हेउ हनुमाना। राखे सकल कपिन्ह के प्राना।।

    अर्थ · Hindi

    नाथ काजु कीन्हेउ हनुमाना। राखे सकल कपिन्ह के प्राना।।

  327. RCM 5.29.6Open verse →

    सुनि सुग्रीव बहुरि तेहि मिलेऊ। कपिन्ह सहित रघुपति पहिं चलेऊ।

    अर्थ · Hindi

    सुनि सुग्रीव बहुरि तेहि मिलेऊ। कपिन्ह सहित रघुपति पहिं चलेऊ।

  328. RCM 5.29.7Open verse →

    राम कपिन्ह जब आवत देखा। किएँ काजु मन हरष बिसेषा।।

    अर्थ · Hindi

    राम कपिन्ह जब आवत देखा। किएँ काजु मन हरष बिसेषा।।

  329. RCM 5.29.8Open verse →

    फटिक सिला बैठे द्वौ भाई। परे सकल कपि चरनन्हि जाई।।

    अर्थ · Hindi

    फटिक सिला बैठे द्वौ भाई। परे सकल कपि चरनन्हि जाई।।

  330. RCM 5.29.9Open verse →

    प्रीति सहित सब भेटे रघुपति करुना पुंज।

    अर्थ · Hindi

    प्रीति सहित सब भेटे रघुपति करुना पुंज।

  331. RCM 5.29.10Open verse →

    पूँछी कुसल नाथ अब कुसल देखि पद कंज।।29।।

    अर्थ · Hindi

    पूँछी कुसल नाथ अब कुसल देखि पद कंज।।29।।

  332. RCM 5.30.1Open verse →

    जामवंत कह सुनु रघुराया। जा पर नाथ करहु तुम्ह दाया।।

    अर्थ · Hindi

    जामवंत कह सुनु रघुराया। जा पर नाथ करहु तुम्ह दाया।।

  333. RCM 5.30.2Open verse →

    ताहि सदा सुभ कुसल निरंतर। सुर नर मुनि प्रसन्न ता ऊपर।।

    अर्थ · Hindi

    ताहि सदा सुभ कुसल निरंतर। सुर नर मुनि प्रसन्न ता ऊपर।।

  334. RCM 5.30.3Open verse →

    सोइ बिजई बिनई गुन सागर। तासु सुजसु त्रेलोक उजागर।।

    अर्थ · Hindi

    सोइ बिजई बिनई गुन सागर। तासु सुजसु त्रेलोक उजागर।।

  335. RCM 5.30.4Open verse →

    प्रभु कीं कृपा भयउ सबु काजू। जन्म हमार सुफल भा आजू।।

    अर्थ · Hindi

    प्रभु कीं कृपा भयउ सबु काजू। जन्म हमार सुफल भा आजू।।

  336. RCM 5.30.5Open verse →

    नाथ पवनसुत कीन्हि जो करनी। सहसहुँ मुख न जाइ सो बरनी।।

    अर्थ · Hindi

    नाथ पवनसुत कीन्हि जो करनी। सहसहुँ मुख न जाइ सो बरनी।।

  337. RCM 5.30.6Open verse →

    पवनतनय के चरित सुहाए। जामवंत रघुपतिहि सुनाए।।

    अर्थ · Hindi

    पवनतनय के चरित सुहाए। जामवंत रघुपतिहि सुनाए।।

  338. RCM 5.30.7Open verse →

    सुनत कृपानिधि मन अति भाए। पुनि हनुमान हरषि हियँ लाए।।

    अर्थ · Hindi

    सुनत कृपानिधि मन अति भाए। पुनि हनुमान हरषि हियँ लाए।।

  339. RCM 5.30.8Open verse →

    कहहु तात केहि भाँति जानकी। रहति करति रच्छा स्वप्रान की।।

    अर्थ · Hindi

    कहहु तात केहि भाँति जानकी। रहति करति रच्छा स्वप्रान की।।

  340. RCM 5.30.9Open verse →

    नाम पाहरु दिवस निसि ध्यान तुम्हार कपाट।

    अर्थ · Hindi

    नाम पाहरु दिवस निसि ध्यान तुम्हार कपाट।

  341. RCM 5.30.10Open verse →

    लोचन निज पद जंत्रित जाहिं प्रान केहिं बाट।।30।।

    अर्थ · Hindi

    लोचन निज पद जंत्रित जाहिं प्रान केहिं बाट।।30।।

  342. RCM 5.31.1Open verse →

    चलत मोहि चूड़ामनि दीन्ही। रघुपति हृदयँ लाइ सोइ लीन्ही।।

    अर्थ · Hindi

    चलत मोहि चूड़ामनि दीन्ही। रघुपति हृदयँ लाइ सोइ लीन्ही।।

  343. RCM 5.31.2Open verse →

    नाथ जुगल लोचन भरि बारी। बचन कहे कछु जनककुमारी।।

    अर्थ · Hindi

    नाथ जुगल लोचन भरि बारी। बचन कहे कछु जनककुमारी।।

  344. RCM 5.31.3Open verse →

    अनुज समेत गहेहु प्रभु चरना। दीन बंधु प्रनतारति हरना।।

    अर्थ · Hindi

    अनुज समेत गहेहु प्रभु चरना। दीन बंधु प्रनतारति हरना।।

  345. RCM 5.31.4Open verse →

    मन क्रम बचन चरन अनुरागी। केहि अपराध नाथ हौं त्यागी।।

    अर्थ · Hindi

    मन क्रम बचन चरन अनुरागी। केहि अपराध नाथ हौं त्यागी।।

  346. RCM 5.31.5Open verse →

    अवगुन एक मोर मैं माना। बिछुरत प्रान न कीन्ह पयाना।।

    अर्थ · Hindi

    अवगुन एक मोर मैं माना। बिछुरत प्रान न कीन्ह पयाना।।

  347. RCM 5.31.6Open verse →

    नाथ सो नयनन्हि को अपराधा। निसरत प्रान करिहिं हठि बाधा।।

    अर्थ · Hindi

    नाथ सो नयनन्हि को अपराधा। निसरत प्रान करिहिं हठि बाधा।।

  348. RCM 5.31.7Open verse →

    बिरह अगिनि तनु तूल समीरा। स्वास जरइ छन माहिं सरीरा।।

    अर्थ · Hindi

    बिरह अगिनि तनु तूल समीरा। स्वास जरइ छन माहिं सरीरा।।

  349. RCM 5.31.8Open verse →

    नयन स्त्रवहि जलु निज हित लागी। जरैं न पाव देह बिरहागी।

    अर्थ · Hindi

    नयन स्त्रवहि जलु निज हित लागी। जरैं न पाव देह बिरहागी।

  350. RCM 5.31.9Open verse →

    सीता के अति बिपति बिसाला। बिनहिं कहें भलि दीनदयाला।।

    अर्थ · Hindi

    सीता के अति बिपति बिसाला। बिनहिं कहें भलि दीनदयाला।।

  351. RCM 5.31.10Open verse →

    निमिष निमिष करुनानिधि जाहिं कलप सम बीति।

    अर्थ · Hindi

    निमिष निमिष करुनानिधि जाहिं कलप सम बीति।

  352. RCM 5.31.11Open verse →

    बेगि चलिय प्रभु आनिअ भुज बल खल दल जीति।।31।।

    अर्थ · Hindi

    बेगि चलिय प्रभु आनिअ भुज बल खल दल जीति।।31।।

  353. RCM 5.32.1Open verse →

    सुनि सीता दुख प्रभु सुख अयना। भरि आए जल राजिव नयना।।

    अर्थ · Hindi

    सुनि सीता दुख प्रभु सुख अयना। भरि आए जल राजिव नयना।।

  354. RCM 5.32.2Open verse →

    बचन काँय मन मम गति जाही। सपनेहुँ बूझिअ बिपति कि ताही।।

    अर्थ · Hindi

    बचन काँय मन मम गति जाही। सपनेहुँ बूझिअ बिपति कि ताही।।

  355. RCM 5.32.3Open verse →

    कह हनुमंत बिपति प्रभु सोई। जब तव सुमिरन भजन न होई।।

    अर्थ · Hindi

    कह हनुमंत बिपति प्रभु सोई। जब तव सुमिरन भजन न होई।।

  356. RCM 5.32.4Open verse →

    केतिक बात प्रभु जातुधान की। रिपुहि जीति आनिबी जानकी।।

    अर्थ · Hindi

    केतिक बात प्रभु जातुधान की। रिपुहि जीति आनिबी जानकी।।

  357. RCM 5.32.5Open verse →

    सुनु कपि तोहि समान उपकारी। नहिं कोउ सुर नर मुनि तनुधारी।।

    अर्थ · Hindi

    सुनु कपि तोहि समान उपकारी। नहिं कोउ सुर नर मुनि तनुधारी।।

  358. RCM 5.32.6Open verse →

    प्रति उपकार करौं का तोरा। सनमुख होइ न सकत मन मोरा।।

    अर्थ · Hindi

    प्रति उपकार करौं का तोरा। सनमुख होइ न सकत मन मोरा।।

  359. RCM 5.32.7Open verse →

    सुनु सुत उरिन मैं नाहीं। देखेउँ करि बिचार मन माहीं।।

    अर्थ · Hindi

    सुनु सुत उरिन मैं नाहीं। देखेउँ करि बिचार मन माहीं।।

  360. RCM 5.32.8Open verse →

    पुनि पुनि कपिहि चितव सुरत्राता। लोचन नीर पुलक अति गाता।।

    अर्थ · Hindi

    पुनि पुनि कपिहि चितव सुरत्राता। लोचन नीर पुलक अति गाता।।

  361. RCM 5.32.9Open verse →

    सुनि प्रभु बचन बिलोकि मुख गात हरषि हनुमंत।

    अर्थ · Hindi

    सुनि प्रभु बचन बिलोकि मुख गात हरषि हनुमंत।

  362. RCM 5.32.10Open verse →

    चरन परेउ प्रेमाकुल त्राहि त्राहि भगवंत।।32।।

    अर्थ · Hindi

    चरन परेउ प्रेमाकुल त्राहि त्राहि भगवंत।।32।।

  363. RCM 5.33.1Open verse →

    बार बार प्रभु चहइ उठावा। प्रेम मगन तेहि उठब न भावा।।

    अर्थ · Hindi

    बार बार प्रभु चहइ उठावा। प्रेम मगन तेहि उठब न भावा।।

  364. RCM 5.33.2Open verse →

    प्रभु कर पंकज कपि कें सीसा। सुमिरि सो दसा मगन गौरीसा।।

    अर्थ · Hindi

    प्रभु कर पंकज कपि कें सीसा। सुमिरि सो दसा मगन गौरीसा।।

  365. RCM 5.33.3Open verse →

    सावधान मन करि पुनि संकर। लागे कहन कथा अति सुंदर।।

    अर्थ · Hindi

    सावधान मन करि पुनि संकर। लागे कहन कथा अति सुंदर।।

  366. RCM 5.33.4Open verse →

    कपि उठाइ प्रभु हृदयँ लगावा। कर गहि परम निकट बैठावा।।

    अर्थ · Hindi

    कपि उठाइ प्रभु हृदयँ लगावा। कर गहि परम निकट बैठावा।।

  367. RCM 5.33.5Open verse →

    कहु कपि रावन पालित लंका। केहि बिधि दहेउ दुर्ग अति बंका।।

    अर्थ · Hindi

    कहु कपि रावन पालित लंका। केहि बिधि दहेउ दुर्ग अति बंका।।

  368. RCM 5.33.6Open verse →

    प्रभु प्रसन्न जाना हनुमाना। बोला बचन बिगत अभिमाना।।

    अर्थ · Hindi

    प्रभु प्रसन्न जाना हनुमाना। बोला बचन बिगत अभिमाना।।

  369. RCM 5.33.7Open verse →

    साखामृग के बड़ि मनुसाई। साखा तें साखा पर जाई।।

    अर्थ · Hindi

    साखामृग के बड़ि मनुसाई। साखा तें साखा पर जाई।।

  370. RCM 5.33.8Open verse →

    नाघि सिंधु हाटकपुर जारा। निसिचर गन बिधि बिपिन उजारा।

    अर्थ · Hindi

    नाघि सिंधु हाटकपुर जारा। निसिचर गन बिधि बिपिन उजारा।

  371. RCM 5.33.9Open verse →

    सो सब तव प्रताप रघुराई। नाथ न कछू मोरि प्रभुताई।।

    अर्थ · Hindi

    सो सब तव प्रताप रघुराई। नाथ न कछू मोरि प्रभुताई।।

  372. RCM 5.33.10Open verse →

    ता कहुँ प्रभु कछु अगम नहिं जा पर तुम्ह अनुकुल।

    अर्थ · Hindi

    ता कहुँ प्रभु कछु अगम नहिं जा पर तुम्ह अनुकुल।

  373. RCM 5.33.11Open verse →

    तब प्रभावँ बड़वानलहिं जारि सकइ खलु तूल।।33।।

    अर्थ · Hindi

    तब प्रभावँ बड़वानलहिं जारि सकइ खलु तूल।।33।।

  374. RCM 5.34.1Open verse →

    नाथ भगति अति सुखदायनी। देहु कृपा करि अनपायनी।।

    अर्थ · Hindi

    नाथ भगति अति सुखदायनी। देहु कृपा करि अनपायनी।।

  375. RCM 5.34.2Open verse →

    सुनि प्रभु परम सरल कपि बानी। एवमस्तु तब कहेउ भवानी।।

    अर्थ · Hindi

    सुनि प्रभु परम सरल कपि बानी। एवमस्तु तब कहेउ भवानी।।

  376. RCM 5.34.3Open verse →

    उमा राम सुभाउ जेहिं जाना। ताहि भजनु तजि भाव न आना।।

    अर्थ · Hindi

    उमा राम सुभाउ जेहिं जाना। ताहि भजनु तजि भाव न आना।।

  377. RCM 5.34.4Open verse →

    यह संवाद जासु उर आवा। रघुपति चरन भगति सोइ पावा।।

    अर्थ · Hindi

    यह संवाद जासु उर आवा। रघुपति चरन भगति सोइ पावा।।

  378. RCM 5.34.5Open verse →

    सुनि प्रभु बचन कहहिं कपिबृंदा। जय जय जय कृपाल सुखकंदा।।

    अर्थ · Hindi

    सुनि प्रभु बचन कहहिं कपिबृंदा। जय जय जय कृपाल सुखकंदा।।

  379. RCM 5.34.6Open verse →

    तब रघुपति कपिपतिहि बोलावा। कहा चलैं कर करहु बनावा।।

    अर्थ · Hindi

    तब रघुपति कपिपतिहि बोलावा। कहा चलैं कर करहु बनावा।।

  380. RCM 5.34.7Open verse →

    अब बिलंबु केहि कारन कीजे। तुरत कपिन्ह कहुँ आयसु दीजे।।

    अर्थ · Hindi

    अब बिलंबु केहि कारन कीजे। तुरत कपिन्ह कहुँ आयसु दीजे।।

  381. RCM 5.34.8Open verse →

    कौतुक देखि सुमन बहु बरषी। नभ तें भवन चले सुर हरषी।।

    अर्थ · Hindi

    कौतुक देखि सुमन बहु बरषी। नभ तें भवन चले सुर हरषी।।

  382. RCM 5.34.9Open verse →

    कपिपति बेगि बोलाए आए जूथप जूथ।

    अर्थ · Hindi

    कपिपति बेगि बोलाए आए जूथप जूथ।

  383. RCM 5.34.10Open verse →

    नाना बरन अतुल बल बानर भालु बरूथ।।34।।

    अर्थ · Hindi

    नाना बरन अतुल बल बानर भालु बरूथ।।34।।

  384. RCM 5.35.1Open verse →

    प्रभु पद पंकज नावहिं सीसा। गरजहिं भालु महाबल कीसा।।

    अर्थ · Hindi

    प्रभु पद पंकज नावहिं सीसा। गरजहिं भालु महाबल कीसा।।

  385. RCM 5.35.2Open verse →

    देखी राम सकल कपि सेना। चितइ कृपा करि राजिव नैना।।

    अर्थ · Hindi

    देखी राम सकल कपि सेना। चितइ कृपा करि राजिव नैना।।

  386. RCM 5.35.3Open verse →

    राम कृपा बल पाइ कपिंदा। भए पच्छजुत मनहुँ गिरिंदा।।

    अर्थ · Hindi

    राम कृपा बल पाइ कपिंदा। भए पच्छजुत मनहुँ गिरिंदा।।

  387. RCM 5.35.4Open verse →

    हरषि राम तब कीन्ह पयाना। सगुन भए सुंदर सुभ नाना।।

    अर्थ · Hindi

    हरषि राम तब कीन्ह पयाना। सगुन भए सुंदर सुभ नाना।।

  388. RCM 5.35.5Open verse →

    जासु सकल मंगलमय कीती। तासु पयान सगुन यह नीती।।

    अर्थ · Hindi

    जासु सकल मंगलमय कीती। तासु पयान सगुन यह नीती।।

  389. RCM 5.35.6Open verse →

    प्रभु पयान जाना बैदेहीं। फरकि बाम अँग जनु कहि देहीं।।

    अर्थ · Hindi

    प्रभु पयान जाना बैदेहीं। फरकि बाम अँग जनु कहि देहीं।।

  390. RCM 5.35.7Open verse →

    जोइ जोइ सगुन जानकिहि होई। असगुन भयउ रावनहि सोई।।

    अर्थ · Hindi

    जोइ जोइ सगुन जानकिहि होई। असगुन भयउ रावनहि सोई।।

  391. RCM 5.35.8Open verse →

    चला कटकु को बरनैं पारा। गर्जहि बानर भालु अपारा।।

    अर्थ · Hindi

    चला कटकु को बरनैं पारा। गर्जहि बानर भालु अपारा।।

  392. RCM 5.35.9Open verse →

    नख आयुध गिरि पादपधारी। चले गगन महि इच्छाचारी।।

    अर्थ · Hindi

    नख आयुध गिरि पादपधारी। चले गगन महि इच्छाचारी।।

  393. RCM 5.35.10Open verse →

    केहरिनाद भालु कपि करहीं। डगमगाहिं दिग्गज चिक्करहीं।।

    अर्थ · Hindi

    केहरिनाद भालु कपि करहीं। डगमगाहिं दिग्गज चिक्करहीं।।

  394. RCM 5.35.11Open verse →

    चिक्करहिं दिग्गज डोल महि गिरि लोल सागर खरभरे।

    अर्थ · Hindi

    चिक्करहिं दिग्गज डोल महि गिरि लोल सागर खरभरे।

  395. RCM 5.35.12Open verse →

    मन हरष सभ गंधर्ब सुर मुनि नाग किन्नर दुख टरे।।

    अर्थ · Hindi

    मन हरष सभ गंधर्ब सुर मुनि नाग किन्नर दुख टरे।।

  396. RCM 5.35.13Open verse →

    कटकटहिं मर्कट बिकट भट बहु कोटि कोटिन्ह धावहीं।

    अर्थ · Hindi

    कटकटहिं मर्कट बिकट भट बहु कोटि कोटिन्ह धावहीं।

  397. RCM 5.35.14Open verse →

    जय राम प्रबल प्रताप कोसलनाथ गुन गन गावहीं।।1।।

    अर्थ · Hindi

    जय राम प्रबल प्रताप कोसलनाथ गुन गन गावहीं।।1।।

  398. RCM 5.35.15Open verse →

    सहि सक न भार उदार अहिपति बार बारहिं मोहई।

    अर्थ · Hindi

    सहि सक न भार उदार अहिपति बार बारहिं मोहई।

  399. RCM 5.35.16Open verse →

    गह दसन पुनि पुनि कमठ पृष्ट कठोर सो किमि सोहई।।

    अर्थ · Hindi

    गह दसन पुनि पुनि कमठ पृष्ट कठोर सो किमि सोहई।।

  400. RCM 5.35.17Open verse →

    रघुबीर रुचिर प्रयान प्रस्थिति जानि परम सुहावनी।

    अर्थ · Hindi

    रघुबीर रुचिर प्रयान प्रस्थिति जानि परम सुहावनी।

  401. RCM 5.35.18Open verse →

    जनु कमठ खर्पर सर्पराज सो लिखत अबिचल पावनी।।2।।

    अर्थ · Hindi

    जनु कमठ खर्पर सर्पराज सो लिखत अबिचल पावनी।।2।।

  402. RCM 5.35.19Open verse →

    एहि बिधि जाइ कृपानिधि उतरे सागर तीर।

    अर्थ · Hindi

    एहि बिधि जाइ कृपानिधि उतरे सागर तीर।

  403. RCM 5.35.20Open verse →

    जहँ तहँ लागे खान फल भालु बिपुल कपि बीर।।35।।

    अर्थ · Hindi

    जहँ तहँ लागे खान फल भालु बिपुल कपि बीर।।35।।

  404. RCM 5.36.1Open verse →

    उहाँ निसाचर रहहिं ससंका। जब ते जारि गयउ कपि लंका।।

    अर्थ · Hindi

    उहाँ निसाचर रहहिं ससंका। जब ते जारि गयउ कपि लंका।।

  405. RCM 5.36.2Open verse →

    निज निज गृहँ सब करहिं बिचारा। नहिं निसिचर कुल केर उबारा।।

    अर्थ · Hindi

    निज निज गृहँ सब करहिं बिचारा। नहिं निसिचर कुल केर उबारा।।

  406. RCM 5.36.3Open verse →

    जासु दूत बल बरनि न जाई। तेहि आएँ पुर कवन भलाई।।

    अर्थ · Hindi

    जासु दूत बल बरनि न जाई। तेहि आएँ पुर कवन भलाई।।

  407. RCM 5.36.4Open verse →

    दूतन्हि सन सुनि पुरजन बानी। मंदोदरी अधिक अकुलानी।।

    अर्थ · Hindi

    दूतन्हि सन सुनि पुरजन बानी। मंदोदरी अधिक अकुलानी।।

  408. RCM 5.36.5Open verse →

    रहसि जोरि कर पति पग लागी। बोली बचन नीति रस पागी।।

    अर्थ · Hindi

    रहसि जोरि कर पति पग लागी। बोली बचन नीति रस पागी।।

  409. RCM 5.36.6Open verse →

    कंत करष हरि सन परिहरहू। मोर कहा अति हित हियँ धरहु।।

    अर्थ · Hindi

    कंत करष हरि सन परिहरहू। मोर कहा अति हित हियँ धरहु।।

  410. RCM 5.36.7Open verse →

    समुझत जासु दूत कइ करनी। स्त्रवहीं गर्भ रजनीचर धरनी।।

    अर्थ · Hindi

    समुझत जासु दूत कइ करनी। स्त्रवहीं गर्भ रजनीचर धरनी।।

  411. RCM 5.36.8Open verse →

    तासु नारि निज सचिव बोलाई। पठवहु कंत जो चहहु भलाई।।

    अर्थ · Hindi

    तासु नारि निज सचिव बोलाई। पठवहु कंत जो चहहु भलाई।।

  412. RCM 5.36.9Open verse →

    तब कुल कमल बिपिन दुखदाई। सीता सीत निसा सम आई।।

    अर्थ · Hindi

    तब कुल कमल बिपिन दुखदाई। सीता सीत निसा सम आई।।

  413. RCM 5.36.10Open verse →

    सुनहु नाथ सीता बिनु दीन्हें। हित न तुम्हार संभु अज कीन्हें।।

    अर्थ · Hindi

    सुनहु नाथ सीता बिनु दीन्हें। हित न तुम्हार संभु अज कीन्हें।।

  414. RCM 5.36.11Open verse →

    -राम बान अहि गन सरिस निकर निसाचर भेक।

    अर्थ · Hindi

    -राम बान अहि गन सरिस निकर निसाचर भेक।

  415. RCM 5.36.12Open verse →

    जब लगि ग्रसत न तब लगि जतनु करहु तजि टेक।।36।।

    अर्थ · Hindi

    जब लगि ग्रसत न तब लगि जतनु करहु तजि टेक।।36।।

  416. RCM 5.37.1Open verse →

    श्रवन सुनी सठ ता करि बानी। बिहसा जगत बिदित अभिमानी।।

    अर्थ · Hindi

    श्रवन सुनी सठ ता करि बानी। बिहसा जगत बिदित अभिमानी।।

  417. RCM 5.37.2Open verse →

    सभय सुभाउ नारि कर साचा। मंगल महुँ भय मन अति काचा।।

    अर्थ · Hindi

    सभय सुभाउ नारि कर साचा। मंगल महुँ भय मन अति काचा।।

  418. RCM 5.37.3Open verse →

    जौं आवइ मर्कट कटकाई। जिअहिं बिचारे निसिचर खाई।।

    अर्थ · Hindi

    जौं आवइ मर्कट कटकाई। जिअहिं बिचारे निसिचर खाई।।

  419. RCM 5.37.4Open verse →

    कंपहिं लोकप जाकी त्रासा। तासु नारि सभीत बड़ि हासा।।

    अर्थ · Hindi

    कंपहिं लोकप जाकी त्रासा। तासु नारि सभीत बड़ि हासा।।

  420. RCM 5.37.5Open verse →

    अस कहि बिहसि ताहि उर लाई। चलेउ सभाँ ममता अधिकाई।।

    अर्थ · Hindi

    अस कहि बिहसि ताहि उर लाई। चलेउ सभाँ ममता अधिकाई।।

  421. RCM 5.37.6Open verse →

    मंदोदरी हृदयँ कर चिंता। भयउ कंत पर बिधि बिपरीता।।

    अर्थ · Hindi

    मंदोदरी हृदयँ कर चिंता। भयउ कंत पर बिधि बिपरीता।।

  422. RCM 5.37.7Open verse →

    बैठेउ सभाँ खबरि असि पाई। सिंधु पार सेना सब आई।।

    अर्थ · Hindi

    बैठेउ सभाँ खबरि असि पाई। सिंधु पार सेना सब आई।।

  423. RCM 5.37.8Open verse →

    बूझेसि सचिव उचित मत कहहू। ते सब हँसे मष्ट करि रहहू।।

    अर्थ · Hindi

    बूझेसि सचिव उचित मत कहहू। ते सब हँसे मष्ट करि रहहू।।

  424. RCM 5.37.9Open verse →

    जितेहु सुरासुर तब श्रम नाहीं। नर बानर केहि लेखे माही।।

    अर्थ · Hindi

    जितेहु सुरासुर तब श्रम नाहीं। नर बानर केहि लेखे माही।।

  425. RCM 5.37.10Open verse →

    सचिव बैद गुर तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस।

    अर्थ · Hindi

    सचिव बैद गुर तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस।

  426. RCM 5.37.11Open verse →

    राज धर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास।।37।।

    अर्थ · Hindi

    राज धर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास।।37।।

  427. RCM 5.38.1Open verse →

    सोइ रावन कहुँ बनि सहाई। अस्तुति करहिं सुनाइ सुनाई।।

    अर्थ · Hindi

    सोइ रावन कहुँ बनि सहाई। अस्तुति करहिं सुनाइ सुनाई।।

  428. RCM 5.38.2Open verse →

    अवसर जानि बिभीषनु आवा। भ्राता चरन सीसु तेहिं नावा।।

    अर्थ · Hindi

    अवसर जानि बिभीषनु आवा। भ्राता चरन सीसु तेहिं नावा।।

  429. RCM 5.38.3Open verse →

    पुनि सिरु नाइ बैठ निज आसन। बोला बचन पाइ अनुसासन।।

    अर्थ · Hindi

    पुनि सिरु नाइ बैठ निज आसन। बोला बचन पाइ अनुसासन।।

  430. RCM 5.38.4Open verse →

    जौ कृपाल पूँछिहु मोहि बाता। मति अनुरुप कहउँ हित ताता।।

    अर्थ · Hindi

    जौ कृपाल पूँछिहु मोहि बाता। मति अनुरुप कहउँ हित ताता।।

  431. RCM 5.38.5Open verse →

    जो आपन चाहै कल्याना। सुजसु सुमति सुभ गति सुख नाना।।

    अर्थ · Hindi

    जो आपन चाहै कल्याना। सुजसु सुमति सुभ गति सुख नाना।।

  432. RCM 5.38.6Open verse →

    सो परनारि लिलार गोसाईं। तजउ चउथि के चंद कि नाई।।

    अर्थ · Hindi

    सो परनारि लिलार गोसाईं। तजउ चउथि के चंद कि नाई।।

  433. RCM 5.38.7Open verse →

    चौदह भुवन एक पति होई। भूतद्रोह तिष्टइ नहिं सोई।।

    अर्थ · Hindi

    चौदह भुवन एक पति होई। भूतद्रोह तिष्टइ नहिं सोई।।

  434. RCM 5.38.8Open verse →

    गुन सागर नागर नर जोऊ। अलप लोभ भल कहइ न कोऊ।।

    अर्थ · Hindi

    गुन सागर नागर नर जोऊ। अलप लोभ भल कहइ न कोऊ।।

  435. RCM 5.38.9Open verse →

    काम क्रोध मद लोभ सब नाथ नरक के पंथ।

    अर्थ · Hindi

    काम क्रोध मद लोभ सब नाथ नरक के पंथ।

  436. RCM 5.38.10Open verse →

    सब परिहरि रघुबीरहि भजहु भजहिं जेहि संत।।38।।

    अर्थ · Hindi

    सब परिहरि रघुबीरहि भजहु भजहिं जेहि संत।।38।।

  437. RCM 5.39.1Open verse →

    तात राम नहिं नर भूपाला। भुवनेस्वर कालहु कर काला।।

    अर्थ · Hindi

    तात राम नहिं नर भूपाला। भुवनेस्वर कालहु कर काला।।

  438. RCM 5.39.2Open verse →

    ब्रह्म अनामय अज भगवंता। ब्यापक अजित अनादि अनंता।।

    अर्थ · Hindi

    ब्रह्म अनामय अज भगवंता। ब्यापक अजित अनादि अनंता।।

  439. RCM 5.39.3Open verse →

    गो द्विज धेनु देव हितकारी। कृपासिंधु मानुष तनुधारी।।

    अर्थ · Hindi

    गो द्विज धेनु देव हितकारी। कृपासिंधु मानुष तनुधारी।।

  440. RCM 5.39.4Open verse →

    जन रंजन भंजन खल ब्राता। बेद धर्म रच्छक सुनु भ्राता।।

    अर्थ · Hindi

    जन रंजन भंजन खल ब्राता। बेद धर्म रच्छक सुनु भ्राता।।

  441. RCM 5.39.5Open verse →

    ताहि बयरु तजि नाइअ माथा। प्रनतारति भंजन रघुनाथा।।

    अर्थ · Hindi

    ताहि बयरु तजि नाइअ माथा। प्रनतारति भंजन रघुनाथा।।

  442. RCM 5.39.6Open verse →

    देहु नाथ प्रभु कहुँ बैदेही। भजहु राम बिनु हेतु सनेही।।

    अर्थ · Hindi

    देहु नाथ प्रभु कहुँ बैदेही। भजहु राम बिनु हेतु सनेही।।

  443. RCM 5.39.7Open verse →

    सरन गएँ प्रभु ताहु न त्यागा। बिस्व द्रोह कृत अघ जेहि लागा।।

    अर्थ · Hindi

    सरन गएँ प्रभु ताहु न त्यागा। बिस्व द्रोह कृत अघ जेहि लागा।।

  444. RCM 5.39.8Open verse →

    जासु नाम त्रय ताप नसावन। सोइ प्रभु प्रगट समुझु जियँ रावन।।

    अर्थ · Hindi

    जासु नाम त्रय ताप नसावन। सोइ प्रभु प्रगट समुझु जियँ रावन।।

  445. RCM 5.39.9Open verse →

    बार बार पद लागउँ बिनय करउँ दससीस।

    अर्थ · Hindi

    बार बार पद लागउँ बिनय करउँ दससीस।

  446. RCM 5.39.10Open verse →

    परिहरि मान मोह मद भजहु कोसलाधीस।।39(क)।।

    अर्थ · Hindi

    परिहरि मान मोह मद भजहु कोसलाधीस।।39(क)।।

  447. RCM 5.39.11Open verse →

    मुनि पुलस्ति निज सिष्य सन कहि पठई यह बात।

    अर्थ · Hindi

    मुनि पुलस्ति निज सिष्य सन कहि पठई यह बात।

  448. RCM 5.39.12Open verse →

    तुरत सो मैं प्रभु सन कही पाइ सुअवसरु तात।।39(ख)।।

    अर्थ · Hindi

    तुरत सो मैं प्रभु सन कही पाइ सुअवसरु तात।।39(ख)।।

  449. RCM 5.40.1Open verse →

    माल्यवंत अति सचिव सयाना। तासु बचन सुनि अति सुख माना।।

    अर्थ · Hindi

    माल्यवंत अति सचिव सयाना। तासु बचन सुनि अति सुख माना।।

  450. RCM 5.40.2Open verse →

    तात अनुज तव नीति बिभूषन। सो उर धरहु जो कहत बिभीषन।।

    अर्थ · Hindi

    तात अनुज तव नीति बिभूषन। सो उर धरहु जो कहत बिभीषन।।

  451. RCM 5.40.3Open verse →

    रिपु उतकरष कहत सठ दोऊ। दूरि न करहु इहाँ हइ कोऊ।।

    अर्थ · Hindi

    रिपु उतकरष कहत सठ दोऊ। दूरि न करहु इहाँ हइ कोऊ।।

  452. RCM 5.40.4Open verse →

    माल्यवंत गृह गयउ बहोरी। कहइ बिभीषनु पुनि कर जोरी।।

    अर्थ · Hindi

    माल्यवंत गृह गयउ बहोरी। कहइ बिभीषनु पुनि कर जोरी।।

  453. RCM 5.40.5Open verse →

    सुमति कुमति सब कें उर रहहीं। नाथ पुरान निगम अस कहहीं।।

    अर्थ · Hindi

    सुमति कुमति सब कें उर रहहीं। नाथ पुरान निगम अस कहहीं।।

  454. RCM 5.40.6Open verse →

    जहाँ सुमति तहँ संपति नाना। जहाँ कुमति तहँ बिपति निदाना।।

    अर्थ · Hindi

    जहाँ सुमति तहँ संपति नाना। जहाँ कुमति तहँ बिपति निदाना।।

  455. RCM 5.40.7Open verse →

    तव उर कुमति बसी बिपरीता। हित अनहित मानहु रिपु प्रीता।।

    अर्थ · Hindi

    तव उर कुमति बसी बिपरीता। हित अनहित मानहु रिपु प्रीता।।

  456. RCM 5.40.8Open verse →

    कालराति निसिचर कुल केरी। तेहि सीता पर प्रीति घनेरी।।

    अर्थ · Hindi

    कालराति निसिचर कुल केरी। तेहि सीता पर प्रीति घनेरी।।

  457. RCM 5.40.9Open verse →

    तात चरन गहि मागउँ राखहु मोर दुलार।

    अर्थ · Hindi

    तात चरन गहि मागउँ राखहु मोर दुलार।

  458. RCM 5.40.10Open verse →

    सीत देहु राम कहुँ अहित न होइ तुम्हार।।40।।

    अर्थ · Hindi

    सीत देहु राम कहुँ अहित न होइ तुम्हार।।40।।

  459. RCM 5.41.1Open verse →

    बुध पुरान श्रुति संमत बानी। कही बिभीषन नीति बखानी।।

    अर्थ · Hindi

    बुध पुरान श्रुति संमत बानी। कही बिभीषन नीति बखानी।।

  460. RCM 5.41.2Open verse →

    सुनत दसानन उठा रिसाई। खल तोहि निकट मुत्यु अब आई।।

    अर्थ · Hindi

    सुनत दसानन उठा रिसाई। खल तोहि निकट मुत्यु अब आई।।

  461. RCM 5.41.3Open verse →

    जिअसि सदा सठ मोर जिआवा। रिपु कर पच्छ मूढ़ तोहि भावा।।

    अर्थ · Hindi

    जिअसि सदा सठ मोर जिआवा। रिपु कर पच्छ मूढ़ तोहि भावा।।

  462. RCM 5.41.4Open verse →

    कहसि न खल अस को जग माहीं। भुज बल जाहि जिता मैं नाही।।

    अर्थ · Hindi

    कहसि न खल अस को जग माहीं। भुज बल जाहि जिता मैं नाही।।

  463. RCM 5.41.5Open verse →

    मम पुर बसि तपसिन्ह पर प्रीती। सठ मिलु जाइ तिन्हहि कहु नीती।।

    अर्थ · Hindi

    मम पुर बसि तपसिन्ह पर प्रीती। सठ मिलु जाइ तिन्हहि कहु नीती।।

  464. RCM 5.41.6Open verse →

    अस कहि कीन्हेसि चरन प्रहारा। अनुज गहे पद बारहिं बारा।।

    अर्थ · Hindi

    अस कहि कीन्हेसि चरन प्रहारा। अनुज गहे पद बारहिं बारा।।

  465. RCM 5.41.7Open verse →

    उमा संत कइ इहइ बड़ाई। मंद करत जो करइ भलाई।।

    अर्थ · Hindi

    उमा संत कइ इहइ बड़ाई। मंद करत जो करइ भलाई।।

  466. RCM 5.41.8Open verse →

    तुम्ह पितु सरिस भलेहिं मोहि मारा। रामु भजें हित नाथ तुम्हारा।।

    अर्थ · Hindi

    तुम्ह पितु सरिस भलेहिं मोहि मारा। रामु भजें हित नाथ तुम्हारा।।

  467. RCM 5.41.9Open verse →

    सचिव संग लै नभ पथ गयऊ। सबहि सुनाइ कहत अस भयऊ।।

    अर्थ · Hindi

    सचिव संग लै नभ पथ गयऊ। सबहि सुनाइ कहत अस भयऊ।।

  468. RCM 5.41.10Open verse →

    रामु सत्यसंकल्प प्रभु सभा कालबस तोरि।

    अर्थ · Hindi

    रामु सत्यसंकल्प प्रभु सभा कालबस तोरि।

  469. RCM 5.41.11Open verse →

    मै रघुबीर सरन अब जाउँ देहु जनि खोरि।।41।।

    अर्थ · Hindi

    मै रघुबीर सरन अब जाउँ देहु जनि खोरि।।41।।

  470. RCM 5.42.1Open verse →

    अस कहि चला बिभीषनु जबहीं। आयूहीन भए सब तबहीं।।

    अर्थ · Hindi

    अस कहि चला बिभीषनु जबहीं। आयूहीन भए सब तबहीं।।

  471. RCM 5.42.2Open verse →

    साधु अवग्या तुरत भवानी। कर कल्यान अखिल कै हानी।।

    अर्थ · Hindi

    साधु अवग्या तुरत भवानी। कर कल्यान अखिल कै हानी।।

  472. RCM 5.42.3Open verse →

    रावन जबहिं बिभीषन त्यागा। भयउ बिभव बिनु तबहिं अभागा।।

    अर्थ · Hindi

    रावन जबहिं बिभीषन त्यागा। भयउ बिभव बिनु तबहिं अभागा।।

  473. RCM 5.42.4Open verse →

    चलेउ हरषि रघुनायक पाहीं। करत मनोरथ बहु मन माहीं।।

    अर्थ · Hindi

    चलेउ हरषि रघुनायक पाहीं। करत मनोरथ बहु मन माहीं।।

  474. RCM 5.42.5Open verse →

    देखिहउँ जाइ चरन जलजाता। अरुन मृदुल सेवक सुखदाता।।

    अर्थ · Hindi

    देखिहउँ जाइ चरन जलजाता। अरुन मृदुल सेवक सुखदाता।।

  475. RCM 5.42.6Open verse →

    जे पद परसि तरी रिषिनारी। दंडक कानन पावनकारी।।

    अर्थ · Hindi

    जे पद परसि तरी रिषिनारी। दंडक कानन पावनकारी।।

  476. RCM 5.42.7Open verse →

    जे पद जनकसुताँ उर लाए। कपट कुरंग संग धर धाए।।

    अर्थ · Hindi

    जे पद जनकसुताँ उर लाए। कपट कुरंग संग धर धाए।।

  477. RCM 5.42.8Open verse →

    हर उर सर सरोज पद जेई। अहोभाग्य मै देखिहउँ तेई।।

    अर्थ · Hindi

    हर उर सर सरोज पद जेई। अहोभाग्य मै देखिहउँ तेई।।

  478. RCM 5.42.9Open verse →

    जिन्ह पायन्ह के पादुकन्हि भरतु रहे मन लाइ।

    अर्थ · Hindi

    जिन्ह पायन्ह के पादुकन्हि भरतु रहे मन लाइ।

  479. RCM 5.42.10Open verse →

    ते पद आजु बिलोकिहउँ इन्ह नयनन्हि अब जाइ।।42।।

    अर्थ · Hindi

    ते पद आजु बिलोकिहउँ इन्ह नयनन्हि अब जाइ।।42।।

  480. RCM 5.43.1Open verse →

    एहि बिधि करत सप्रेम बिचारा। आयउ सपदि सिंधु एहिं पारा।।

    अर्थ · Hindi

    एहि बिधि करत सप्रेम बिचारा। आयउ सपदि सिंधु एहिं पारा।।

  481. RCM 5.43.2Open verse →

    कपिन्ह बिभीषनु आवत देखा। जाना कोउ रिपु दूत बिसेषा।।

    अर्थ · Hindi

    कपिन्ह बिभीषनु आवत देखा। जाना कोउ रिपु दूत बिसेषा।।

  482. RCM 5.43.3Open verse →

    ताहि राखि कपीस पहिं आए। समाचार सब ताहि सुनाए।।

    अर्थ · Hindi

    ताहि राखि कपीस पहिं आए। समाचार सब ताहि सुनाए।।

  483. RCM 5.43.4Open verse →

    कह सुग्रीव सुनहु रघुराई। आवा मिलन दसानन भाई।।

    अर्थ · Hindi

    कह सुग्रीव सुनहु रघुराई। आवा मिलन दसानन भाई।।

  484. RCM 5.43.5Open verse →

    कह प्रभु सखा बूझिऐ काहा। कहइ कपीस सुनहु नरनाहा।।

    अर्थ · Hindi

    कह प्रभु सखा बूझिऐ काहा। कहइ कपीस सुनहु नरनाहा।।

  485. RCM 5.43.6Open verse →

    जानि न जाइ निसाचर माया। कामरूप केहि कारन आया।।

    अर्थ · Hindi

    जानि न जाइ निसाचर माया। कामरूप केहि कारन आया।।

  486. RCM 5.43.7Open verse →

    भेद हमार लेन सठ आवा। राखिअ बाँधि मोहि अस भावा।।

    अर्थ · Hindi

    भेद हमार लेन सठ आवा। राखिअ बाँधि मोहि अस भावा।।

  487. RCM 5.43.8Open verse →

    सखा नीति तुम्ह नीकि बिचारी। मम पन सरनागत भयहारी।।

    अर्थ · Hindi

    सखा नीति तुम्ह नीकि बिचारी। मम पन सरनागत भयहारी।।

  488. RCM 5.43.9Open verse →

    सुनि प्रभु बचन हरष हनुमाना। सरनागत बच्छल भगवाना।।

    अर्थ · Hindi

    सुनि प्रभु बचन हरष हनुमाना। सरनागत बच्छल भगवाना।।

  489. RCM 5.43.10Open verse →

    सरनागत कहुँ जे तजहिं निज अनहित अनुमानि।

    अर्थ · Hindi

    सरनागत कहुँ जे तजहिं निज अनहित अनुमानि।

  490. RCM 5.43.11Open verse →

    ते नर पावँर पापमय तिन्हहि बिलोकत हानि।।43।।

    अर्थ · Hindi

    ते नर पावँर पापमय तिन्हहि बिलोकत हानि।।43।।

  491. RCM 5.44.1Open verse →

    कोटि बिप्र बध लागहिं जाहू। आएँ सरन तजउँ नहिं ताहू।।

    अर्थ · Hindi

    कोटि बिप्र बध लागहिं जाहू। आएँ सरन तजउँ नहिं ताहू।।

  492. RCM 5.44.2Open verse →

    सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं। जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं।।

    अर्थ · Hindi

    सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं। जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं।।

  493. RCM 5.44.3Open verse →

    पापवंत कर सहज सुभाऊ। भजनु मोर तेहि भाव न काऊ।।

    अर्थ · Hindi

    पापवंत कर सहज सुभाऊ। भजनु मोर तेहि भाव न काऊ।।

  494. RCM 5.44.4Open verse →

    जौं पै दुष्टहदय सोइ होई। मोरें सनमुख आव कि सोई।।

    अर्थ · Hindi

    जौं पै दुष्टहदय सोइ होई। मोरें सनमुख आव कि सोई।।

  495. RCM 5.44.5Open verse →

    निर्मल मन जन सो मोहि पावा। मोहि कपट छल छिद्र न भावा।।

    अर्थ · Hindi

    निर्मल मन जन सो मोहि पावा। मोहि कपट छल छिद्र न भावा।।

  496. RCM 5.44.6Open verse →

    भेद लेन पठवा दससीसा। तबहुँ न कछु भय हानि कपीसा।।

    अर्थ · Hindi

    भेद लेन पठवा दससीसा। तबहुँ न कछु भय हानि कपीसा।।

  497. RCM 5.44.7Open verse →

    जग महुँ सखा निसाचर जेते। लछिमनु हनइ निमिष महुँ तेते।।

    अर्थ · Hindi

    जग महुँ सखा निसाचर जेते। लछिमनु हनइ निमिष महुँ तेते।।

  498. RCM 5.44.8Open verse →

    जौं सभीत आवा सरनाई। रखिहउँ ताहि प्रान की नाई।।

    अर्थ · Hindi

    जौं सभीत आवा सरनाई। रखिहउँ ताहि प्रान की नाई।।

  499. RCM 5.44.9Open verse →

    उभय भाँति तेहि आनहु हँसि कह कृपानिकेत।

    अर्थ · Hindi

    उभय भाँति तेहि आनहु हँसि कह कृपानिकेत।

  500. RCM 5.44.10Open verse →

    जय कृपाल कहि चले अंगद हनू समेत।।44।।

    अर्थ · Hindi

    जय कृपाल कहि चले अंगद हनू समेत।।44।।

  501. RCM 5.45.1Open verse →

    सादर तेहि आगें करि बानर। चले जहाँ रघुपति करुनाकर।।

    अर्थ · Hindi

    सादर तेहि आगें करि बानर। चले जहाँ रघुपति करुनाकर।।

  502. RCM 5.45.2Open verse →

    दूरिहि ते देखे द्वौ भ्राता। नयनानंद दान के दाता।।

    अर्थ · Hindi

    दूरिहि ते देखे द्वौ भ्राता। नयनानंद दान के दाता।।

  503. RCM 5.45.3Open verse →

    बहुरि राम छबिधाम बिलोकी। रहेउ ठटुकि एकटक पल रोकी।।

    अर्थ · Hindi

    बहुरि राम छबिधाम बिलोकी। रहेउ ठटुकि एकटक पल रोकी।।

  504. RCM 5.45.4Open verse →

    भुज प्रलंब कंजारुन लोचन। स्यामल गात प्रनत भय मोचन।।

    अर्थ · Hindi

    भुज प्रलंब कंजारुन लोचन। स्यामल गात प्रनत भय मोचन।।

  505. RCM 5.45.5Open verse →

    सिंघ कंध आयत उर सोहा। आनन अमित मदन मन मोहा।।

    अर्थ · Hindi

    सिंघ कंध आयत उर सोहा। आनन अमित मदन मन मोहा।।

  506. RCM 5.45.6Open verse →

    नयन नीर पुलकित अति गाता। मन धरि धीर कही मृदु बाता।।

    अर्थ · Hindi

    नयन नीर पुलकित अति गाता। मन धरि धीर कही मृदु बाता।।

  507. RCM 5.45.7Open verse →

    नाथ दसानन कर मैं भ्राता। निसिचर बंस जनम सुरत्राता।।

    अर्थ · Hindi

    नाथ दसानन कर मैं भ्राता। निसिचर बंस जनम सुरत्राता।।

  508. RCM 5.45.8Open verse →

    सहज पापप्रिय तामस देहा। जथा उलूकहि तम पर नेहा।।

    अर्थ · Hindi

    सहज पापप्रिय तामस देहा। जथा उलूकहि तम पर नेहा।।

  509. RCM 5.45.9Open verse →

    श्रवन सुजसु सुनि आयउँ प्रभु भंजन भव भीर।

    अर्थ · Hindi

    श्रवन सुजसु सुनि आयउँ प्रभु भंजन भव भीर।

  510. RCM 5.45.10Open verse →

    त्राहि त्राहि आरति हरन सरन सुखद रघुबीर।।45।।

    अर्थ · Hindi

    त्राहि त्राहि आरति हरन सरन सुखद रघुबीर।।45।।

  511. RCM 5.46.1Open verse →

    अस कहि करत दंडवत देखा। तुरत उठे प्रभु हरष बिसेषा।।

    अर्थ · Hindi

    अस कहि करत दंडवत देखा। तुरत उठे प्रभु हरष बिसेषा।।

  512. RCM 5.46.2Open verse →

    दीन बचन सुनि प्रभु मन भावा। भुज बिसाल गहि हृदयँ लगावा।।

    अर्थ · Hindi

    दीन बचन सुनि प्रभु मन भावा। भुज बिसाल गहि हृदयँ लगावा।।

  513. RCM 5.46.3Open verse →

    अनुज सहित मिलि ढिग बैठारी। बोले बचन भगत भयहारी।।

    अर्थ · Hindi

    अनुज सहित मिलि ढिग बैठारी। बोले बचन भगत भयहारी।।

  514. RCM 5.46.4Open verse →

    कहु लंकेस सहित परिवारा। कुसल कुठाहर बास तुम्हारा।।

    अर्थ · Hindi

    कहु लंकेस सहित परिवारा। कुसल कुठाहर बास तुम्हारा।।

  515. RCM 5.46.5Open verse →

    खल मंडलीं बसहु दिनु राती। सखा धरम निबहइ केहि भाँती।।

    अर्थ · Hindi

    खल मंडलीं बसहु दिनु राती। सखा धरम निबहइ केहि भाँती।।

  516. RCM 5.46.6Open verse →

    मैं जानउँ तुम्हारि सब रीती। अति नय निपुन न भाव अनीती।।

    अर्थ · Hindi

    मैं जानउँ तुम्हारि सब रीती। अति नय निपुन न भाव अनीती।।

  517. RCM 5.46.7Open verse →

    बरु भल बास नरक कर ताता। दुष्ट संग जनि देइ बिधाता।।

    अर्थ · Hindi

    बरु भल बास नरक कर ताता। दुष्ट संग जनि देइ बिधाता।।

  518. RCM 5.46.8Open verse →

    अब पद देखि कुसल रघुराया। जौं तुम्ह कीन्ह जानि जन दाया।।

    अर्थ · Hindi

    अब पद देखि कुसल रघुराया। जौं तुम्ह कीन्ह जानि जन दाया।।

  519. RCM 5.46.9Open verse →

    तब लगि कुसल न जीव कहुँ सपनेहुँ मन बिश्राम।

    अर्थ · Hindi

    तब लगि कुसल न जीव कहुँ सपनेहुँ मन बिश्राम।

  520. RCM 5.46.10Open verse →

    जब लगि भजत न राम कहुँ सोक धाम तजि काम।।46।।

    अर्थ · Hindi

    जब लगि भजत न राम कहुँ सोक धाम तजि काम।।46।।

  521. RCM 5.47.1Open verse →

    तब लगि हृदयँ बसत खल नाना। लोभ मोह मच्छर मद माना।।

    अर्थ · Hindi

    तब लगि हृदयँ बसत खल नाना। लोभ मोह मच्छर मद माना।।

  522. RCM 5.47.2Open verse →

    जब लगि उर न बसत रघुनाथा। धरें चाप सायक कटि भाथा।।

    अर्थ · Hindi

    जब लगि उर न बसत रघुनाथा। धरें चाप सायक कटि भाथा।।

  523. RCM 5.47.3Open verse →

    ममता तरुन तमी अँधिआरी। राग द्वेष उलूक सुखकारी।।

    अर्थ · Hindi

    ममता तरुन तमी अँधिआरी। राग द्वेष उलूक सुखकारी।।

  524. RCM 5.47.4Open verse →

    तब लगि बसति जीव मन माहीं। जब लगि प्रभु प्रताप रबि नाहीं।।

    अर्थ · Hindi

    तब लगि बसति जीव मन माहीं। जब लगि प्रभु प्रताप रबि नाहीं।।

  525. RCM 5.47.5Open verse →

    अब मैं कुसल मिटे भय भारे। देखि राम पद कमल तुम्हारे।।

    अर्थ · Hindi

    अब मैं कुसल मिटे भय भारे। देखि राम पद कमल तुम्हारे।।

  526. RCM 5.47.6Open verse →

    तुम्ह कृपाल जा पर अनुकूला। ताहि न ब्याप त्रिबिध भव सूला।।

    अर्थ · Hindi

    तुम्ह कृपाल जा पर अनुकूला। ताहि न ब्याप त्रिबिध भव सूला।।

  527. RCM 5.47.7Open verse →

    मैं निसिचर अति अधम सुभाऊ। सुभ आचरनु कीन्ह नहिं काऊ।।

    अर्थ · Hindi

    मैं निसिचर अति अधम सुभाऊ। सुभ आचरनु कीन्ह नहिं काऊ।।

  528. RCM 5.47.8Open verse →

    जासु रूप मुनि ध्यान न आवा। तेहिं प्रभु हरषि हृदयँ मोहि लावा।।

    अर्थ · Hindi

    जासु रूप मुनि ध्यान न आवा। तेहिं प्रभु हरषि हृदयँ मोहि लावा।।

  529. RCM 5.47.9Open verse →

    -अहोभाग्य मम अमित अति राम कृपा सुख पुंज।

    अर्थ · Hindi

    -अहोभाग्य मम अमित अति राम कृपा सुख पुंज।

  530. RCM 5.47.10Open verse →

    देखेउँ नयन बिरंचि सिब सेब्य जुगल पद कंज।।47।।

    अर्थ · Hindi

    देखेउँ नयन बिरंचि सिब सेब्य जुगल पद कंज।।47।।

  531. RCM 5.48.1Open verse →

    सुनहु सखा निज कहउँ सुभाऊ। जान भुसुंडि संभु गिरिजाऊ।।

    अर्थ · Hindi

    सुनहु सखा निज कहउँ सुभाऊ। जान भुसुंडि संभु गिरिजाऊ।।

  532. RCM 5.48.2Open verse →

    जौं नर होइ चराचर द्रोही। आवे सभय सरन तकि मोही।।

    अर्थ · Hindi

    जौं नर होइ चराचर द्रोही। आवे सभय सरन तकि मोही।।

  533. RCM 5.48.3Open verse →

    तजि मद मोह कपट छल नाना। करउँ सद्य तेहि साधु समाना।।

    अर्थ · Hindi

    तजि मद मोह कपट छल नाना। करउँ सद्य तेहि साधु समाना।।

  534. RCM 5.48.4Open verse →

    जननी जनक बंधु सुत दारा। तनु धनु भवन सुह्रद परिवारा।।

    अर्थ · Hindi

    जननी जनक बंधु सुत दारा। तनु धनु भवन सुह्रद परिवारा।।

  535. RCM 5.48.5Open verse →

    सब कै ममता ताग बटोरी। मम पद मनहि बाँध बरि डोरी।।

    अर्थ · Hindi

    सब कै ममता ताग बटोरी। मम पद मनहि बाँध बरि डोरी।।

  536. RCM 5.48.6Open verse →

    समदरसी इच्छा कछु नाहीं। हरष सोक भय नहिं मन माहीं।।

    अर्थ · Hindi

    समदरसी इच्छा कछु नाहीं। हरष सोक भय नहिं मन माहीं।।

  537. RCM 5.48.7Open verse →

    अस सज्जन मम उर बस कैसें। लोभी हृदयँ बसइ धनु जैसें।।

    अर्थ · Hindi

    अस सज्जन मम उर बस कैसें। लोभी हृदयँ बसइ धनु जैसें।।

  538. RCM 5.48.8Open verse →

    तुम्ह सारिखे संत प्रिय मोरें। धरउँ देह नहिं आन निहोरें।।

    अर्थ · Hindi

    तुम्ह सारिखे संत प्रिय मोरें। धरउँ देह नहिं आन निहोरें।।

  539. RCM 5.48.9Open verse →

    सगुन उपासक परहित निरत नीति दृढ़ नेम।

    अर्थ · Hindi

    सगुन उपासक परहित निरत नीति दृढ़ नेम।

  540. RCM 5.48.10Open verse →

    ते नर प्रान समान मम जिन्ह कें द्विज पद प्रेम।।48।।

    अर्थ · Hindi

    ते नर प्रान समान मम जिन्ह कें द्विज पद प्रेम।।48।।

  541. RCM 5.49.1Open verse →

    सुनु लंकेस सकल गुन तोरें। तातें तुम्ह अतिसय प्रिय मोरें।।

    अर्थ · Hindi

    सुनु लंकेस सकल गुन तोरें। तातें तुम्ह अतिसय प्रिय मोरें।।

  542. RCM 5.49.2Open verse →

    राम बचन सुनि बानर जूथा। सकल कहहिं जय कृपा बरूथा।।

    अर्थ · Hindi

    राम बचन सुनि बानर जूथा। सकल कहहिं जय कृपा बरूथा।।

  543. RCM 5.49.3Open verse →

    सुनत बिभीषनु प्रभु कै बानी। नहिं अघात श्रवनामृत जानी।।

    अर्थ · Hindi

    सुनत बिभीषनु प्रभु कै बानी। नहिं अघात श्रवनामृत जानी।।

  544. RCM 5.49.4Open verse →

    पद अंबुज गहि बारहिं बारा। हृदयँ समात न प्रेमु अपारा।।

    अर्थ · Hindi

    पद अंबुज गहि बारहिं बारा। हृदयँ समात न प्रेमु अपारा।।

  545. RCM 5.49.5Open verse →

    सुनहु देव सचराचर स्वामी। प्रनतपाल उर अंतरजामी।।

    अर्थ · Hindi

    सुनहु देव सचराचर स्वामी। प्रनतपाल उर अंतरजामी।।

  546. RCM 5.49.6Open verse →

    उर कछु प्रथम बासना रही। प्रभु पद प्रीति सरित सो बही।।

    अर्थ · Hindi

    उर कछु प्रथम बासना रही। प्रभु पद प्रीति सरित सो बही।।

  547. RCM 5.49.7Open verse →

    अब कृपाल निज भगति पावनी। देहु सदा सिव मन भावनी।।

    अर्थ · Hindi

    अब कृपाल निज भगति पावनी। देहु सदा सिव मन भावनी।।

  548. RCM 5.49.8Open verse →

    एवमस्तु कहि प्रभु रनधीरा। मागा तुरत सिंधु कर नीरा।।

    अर्थ · Hindi

    एवमस्तु कहि प्रभु रनधीरा। मागा तुरत सिंधु कर नीरा।।

  549. RCM 5.49.9Open verse →

    जदपि सखा तव इच्छा नाहीं। मोर दरसु अमोघ जग माहीं।।

    अर्थ · Hindi

    जदपि सखा तव इच्छा नाहीं। मोर दरसु अमोघ जग माहीं।।

  550. RCM 5.49.10Open verse →

    अस कहि राम तिलक तेहि सारा। सुमन बृष्टि नभ भई अपारा।।

    अर्थ · Hindi

    अस कहि राम तिलक तेहि सारा। सुमन बृष्टि नभ भई अपारा।।

  551. RCM 5.49.11Open verse →

    रावन क्रोध अनल निज स्वास समीर प्रचंड।

    अर्थ · Hindi

    रावन क्रोध अनल निज स्वास समीर प्रचंड।

  552. RCM 5.49.12Open verse →

    जरत बिभीषनु राखेउ दीन्हेहु राजु अखंड।।49(क)।।

    अर्थ · Hindi

    जरत बिभीषनु राखेउ दीन्हेहु राजु अखंड।।49(क)।।

  553. RCM 5.49.13Open verse →

    जो संपति सिव रावनहि दीन्हि दिएँ दस माथ।

    अर्थ · Hindi

    जो संपति सिव रावनहि दीन्हि दिएँ दस माथ।

  554. RCM 5.49.14Open verse →

    सोइ संपदा बिभीषनहि सकुचि दीन्ह रघुनाथ।।49(ख)।।

    अर्थ · Hindi

    सोइ संपदा बिभीषनहि सकुचि दीन्ह रघुनाथ।।49(ख)।।

  555. RCM 5.50.1Open verse →

    अस प्रभु छाड़ि भजहिं जे आना। ते नर पसु बिनु पूँछ बिषाना।।

    अर्थ · Hindi

    अस प्रभु छाड़ि भजहिं जे आना। ते नर पसु बिनु पूँछ बिषाना।।

  556. RCM 5.50.2Open verse →

    निज जन जानि ताहि अपनावा। प्रभु सुभाव कपि कुल मन भावा।।

    अर्थ · Hindi

    निज जन जानि ताहि अपनावा। प्रभु सुभाव कपि कुल मन भावा।।

  557. RCM 5.50.3Open verse →

    पुनि सर्बग्य सर्ब उर बासी। सर्बरूप सब रहित उदासी।।

    अर्थ · Hindi

    पुनि सर्बग्य सर्ब उर बासी। सर्बरूप सब रहित उदासी।।

  558. RCM 5.50.4Open verse →

    बोले बचन नीति प्रतिपालक। कारन मनुज दनुज कुल घालक।।

    अर्थ · Hindi

    बोले बचन नीति प्रतिपालक। कारन मनुज दनुज कुल घालक।।

  559. RCM 5.50.5Open verse →

    सुनु कपीस लंकापति बीरा। केहि बिधि तरिअ जलधि गंभीरा।।

    अर्थ · Hindi

    सुनु कपीस लंकापति बीरा। केहि बिधि तरिअ जलधि गंभीरा।।

  560. RCM 5.50.6Open verse →

    संकुल मकर उरग झष जाती। अति अगाध दुस्तर सब भाँती।।

    अर्थ · Hindi

    संकुल मकर उरग झष जाती। अति अगाध दुस्तर सब भाँती।।

  561. RCM 5.50.7Open verse →

    कह लंकेस सुनहु रघुनायक। कोटि सिंधु सोषक तव सायक।।

    अर्थ · Hindi

    कह लंकेस सुनहु रघुनायक। कोटि सिंधु सोषक तव सायक।।

  562. RCM 5.50.8Open verse →

    जद्यपि तदपि नीति असि गाई। बिनय करिअ सागर सन जाई।।

    अर्थ · Hindi

    जद्यपि तदपि नीति असि गाई। बिनय करिअ सागर सन जाई।।

  563. RCM 5.50.9Open verse →

    प्रभु तुम्हार कुलगुर जलधि कहिहि उपाय बिचारि।

    अर्थ · Hindi

    प्रभु तुम्हार कुलगुर जलधि कहिहि उपाय बिचारि।

  564. RCM 5.50.10Open verse →

    बिनु प्रयास सागर तरिहि सकल भालु कपि धारि।।50।।

    अर्थ · Hindi

    बिनु प्रयास सागर तरिहि सकल भालु कपि धारि।।50।।

  565. RCM 5.51.1Open verse →

    सखा कही तुम्ह नीकि उपाई। करिअ दैव जौं होइ सहाई।।

    अर्थ · Hindi

    सखा कही तुम्ह नीकि उपाई। करिअ दैव जौं होइ सहाई।।

  566. RCM 5.51.2Open verse →

    मंत्र न यह लछिमन मन भावा। राम बचन सुनि अति दुख पावा।।

    अर्थ · Hindi

    मंत्र न यह लछिमन मन भावा। राम बचन सुनि अति दुख पावा।।

  567. RCM 5.51.3Open verse →

    नाथ दैव कर कवन भरोसा। सोषिअ सिंधु करिअ मन रोसा।।

    अर्थ · Hindi

    नाथ दैव कर कवन भरोसा। सोषिअ सिंधु करिअ मन रोसा।।

  568. RCM 5.51.4Open verse →

    कादर मन कहुँ एक अधारा। दैव दैव आलसी पुकारा।।

    अर्थ · Hindi

    कादर मन कहुँ एक अधारा। दैव दैव आलसी पुकारा।।

  569. RCM 5.51.5Open verse →

    सुनत बिहसि बोले रघुबीरा। ऐसेहिं करब धरहु मन धीरा।।

    अर्थ · Hindi

    सुनत बिहसि बोले रघुबीरा। ऐसेहिं करब धरहु मन धीरा।।

  570. RCM 5.51.6Open verse →

    अस कहि प्रभु अनुजहि समुझाई। सिंधु समीप गए रघुराई।।

    अर्थ · Hindi

    अस कहि प्रभु अनुजहि समुझाई। सिंधु समीप गए रघुराई।।

  571. RCM 5.51.7Open verse →

    प्रथम प्रनाम कीन्ह सिरु नाई। बैठे पुनि तट दर्भ डसाई।।

    अर्थ · Hindi

    प्रथम प्रनाम कीन्ह सिरु नाई। बैठे पुनि तट दर्भ डसाई।।

  572. RCM 5.51.8Open verse →

    जबहिं बिभीषन प्रभु पहिं आए। पाछें रावन दूत पठाए।।

    अर्थ · Hindi

    जबहिं बिभीषन प्रभु पहिं आए। पाछें रावन दूत पठाए।।

  573. RCM 5.51.9Open verse →

    सकल चरित तिन्ह देखे धरें कपट कपि देह।

    अर्थ · Hindi

    सकल चरित तिन्ह देखे धरें कपट कपि देह।

  574. RCM 5.51.10Open verse →

    प्रभु गुन हृदयँ सराहहिं सरनागत पर नेह।।51।।

    अर्थ · Hindi

    प्रभु गुन हृदयँ सराहहिं सरनागत पर नेह।।51।।

  575. RCM 5.52.1Open verse →

    प्रगट बखानहिं राम सुभाऊ। अति सप्रेम गा बिसरि दुराऊ।।

    अर्थ · Hindi

    प्रगट बखानहिं राम सुभाऊ। अति सप्रेम गा बिसरि दुराऊ।।

  576. RCM 5.52.2Open verse →

    रिपु के दूत कपिन्ह तब जाने। सकल बाँधि कपीस पहिं आने।।

    अर्थ · Hindi

    रिपु के दूत कपिन्ह तब जाने। सकल बाँधि कपीस पहिं आने।।

  577. RCM 5.52.3Open verse →

    कह सुग्रीव सुनहु सब बानर। अंग भंग करि पठवहु निसिचर।।

    अर्थ · Hindi

    कह सुग्रीव सुनहु सब बानर। अंग भंग करि पठवहु निसिचर।।

  578. RCM 5.52.4Open verse →

    सुनि सुग्रीव बचन कपि धाए। बाँधि कटक चहु पास फिराए।।

    अर्थ · Hindi

    सुनि सुग्रीव बचन कपि धाए। बाँधि कटक चहु पास फिराए।।

  579. RCM 5.52.5Open verse →

    बहु प्रकार मारन कपि लागे। दीन पुकारत तदपि न त्यागे।।

    अर्थ · Hindi

    बहु प्रकार मारन कपि लागे। दीन पुकारत तदपि न त्यागे।।

  580. RCM 5.52.6Open verse →

    जो हमार हर नासा काना। तेहि कोसलाधीस कै आना।।

    अर्थ · Hindi

    जो हमार हर नासा काना। तेहि कोसलाधीस कै आना।।

  581. RCM 5.52.7Open verse →

    सुनि लछिमन सब निकट बोलाए। दया लागि हँसि तुरत छोडाए।।

    अर्थ · Hindi

    सुनि लछिमन सब निकट बोलाए। दया लागि हँसि तुरत छोडाए।।

  582. RCM 5.52.8Open verse →

    रावन कर दीजहु यह पाती। लछिमन बचन बाचु कुलघाती।।

    अर्थ · Hindi

    रावन कर दीजहु यह पाती। लछिमन बचन बाचु कुलघाती।।

  583. RCM 5.52.9Open verse →

    कहेहु मुखागर मूढ़ सन मम संदेसु उदार।

    अर्थ · Hindi

    कहेहु मुखागर मूढ़ सन मम संदेसु उदार।

  584. RCM 5.52.10Open verse →

    सीता देइ मिलेहु न त आवा काल तुम्हार।।52।।

    अर्थ · Hindi

    सीता देइ मिलेहु न त आवा काल तुम्हार।।52।।

  585. RCM 5.53.1Open verse →

    तुरत नाइ लछिमन पद माथा। चले दूत बरनत गुन गाथा।।

    अर्थ · Hindi

    तुरत नाइ लछिमन पद माथा। चले दूत बरनत गुन गाथा।।

  586. RCM 5.53.2Open verse →

    कहत राम जसु लंकाँ आए। रावन चरन सीस तिन्ह नाए।।

    अर्थ · Hindi

    कहत राम जसु लंकाँ आए। रावन चरन सीस तिन्ह नाए।।

  587. RCM 5.53.3Open verse →

    बिहसि दसानन पूँछी बाता। कहसि न सुक आपनि कुसलाता।।

    अर्थ · Hindi

    बिहसि दसानन पूँछी बाता। कहसि न सुक आपनि कुसलाता।।

  588. RCM 5.53.4Open verse →

    पुनि कहु खबरि बिभीषन केरी। जाहि मृत्यु आई अति नेरी।।

    अर्थ · Hindi

    पुनि कहु खबरि बिभीषन केरी। जाहि मृत्यु आई अति नेरी।।

  589. RCM 5.53.5Open verse →

    करत राज लंका सठ त्यागी। होइहि जब कर कीट अभागी।।

    अर्थ · Hindi

    करत राज लंका सठ त्यागी। होइहि जब कर कीट अभागी।।

  590. RCM 5.53.6Open verse →

    पुनि कहु भालु कीस कटकाई। कठिन काल प्रेरित चलि आई।।

    अर्थ · Hindi

    पुनि कहु भालु कीस कटकाई। कठिन काल प्रेरित चलि आई।।

  591. RCM 5.53.7Open verse →

    जिन्ह के जीवन कर रखवारा। भयउ मृदुल चित सिंधु बिचारा।।

    अर्थ · Hindi

    जिन्ह के जीवन कर रखवारा। भयउ मृदुल चित सिंधु बिचारा।।

  592. RCM 5.53.8Open verse →

    कहु तपसिन्ह कै बात बहोरी। जिन्ह के हृदयँ त्रास अति मोरी।।

    अर्थ · Hindi

    कहु तपसिन्ह कै बात बहोरी। जिन्ह के हृदयँ त्रास अति मोरी।।

  593. RCM 5.53.9Open verse →

    -की भइ भेंट कि फिरि गए श्रवन सुजसु सुनि मोर।

    अर्थ · Hindi

    -की भइ भेंट कि फिरि गए श्रवन सुजसु सुनि मोर।

  594. RCM 5.53.10Open verse →

    कहसि न रिपु दल तेज बल बहुत चकित चित तोर।।53।।

    अर्थ · Hindi

    कहसि न रिपु दल तेज बल बहुत चकित चित तोर।।53।।

  595. RCM 5.54.1Open verse →

    नाथ कृपा करि पूँछेहु जैसें। मानहु कहा क्रोध तजि तैसें।।

    अर्थ · Hindi

    नाथ कृपा करि पूँछेहु जैसें। मानहु कहा क्रोध तजि तैसें।।

  596. RCM 5.54.2Open verse →

    मिला जाइ जब अनुज तुम्हारा। जातहिं राम तिलक तेहि सारा।।

    अर्थ · Hindi

    मिला जाइ जब अनुज तुम्हारा। जातहिं राम तिलक तेहि सारा।।

  597. RCM 5.54.3Open verse →

    रावन दूत हमहि सुनि काना। कपिन्ह बाँधि दीन्हे दुख नाना।।

    अर्थ · Hindi

    रावन दूत हमहि सुनि काना। कपिन्ह बाँधि दीन्हे दुख नाना।।

  598. RCM 5.54.4Open verse →

    श्रवन नासिका काटै लागे। राम सपथ दीन्हे हम त्यागे।।

    अर्थ · Hindi

    श्रवन नासिका काटै लागे। राम सपथ दीन्हे हम त्यागे।।

  599. RCM 5.54.5Open verse →

    पूँछिहु नाथ राम कटकाई। बदन कोटि सत बरनि न जाई।।

    अर्थ · Hindi

    पूँछिहु नाथ राम कटकाई। बदन कोटि सत बरनि न जाई।।

  600. RCM 5.54.6Open verse →

    नाना बरन भालु कपि धारी। बिकटानन बिसाल भयकारी।।

    अर्थ · Hindi

    नाना बरन भालु कपि धारी। बिकटानन बिसाल भयकारी।।

  601. RCM 5.54.7Open verse →

    जेहिं पुर दहेउ हतेउ सुत तोरा। सकल कपिन्ह महँ तेहि बलु थोरा।।

    अर्थ · Hindi

    जेहिं पुर दहेउ हतेउ सुत तोरा। सकल कपिन्ह महँ तेहि बलु थोरा।।

  602. RCM 5.54.8Open verse →

    अमित नाम भट कठिन कराला। अमित नाग बल बिपुल बिसाला।।

    अर्थ · Hindi

    अमित नाम भट कठिन कराला। अमित नाग बल बिपुल बिसाला।।

  603. RCM 5.54.9Open verse →

    द्विबिद मयंद नील नल अंगद गद बिकटासि।

    अर्थ · Hindi

    द्विबिद मयंद नील नल अंगद गद बिकटासि।

  604. RCM 5.54.10Open verse →

    दधिमुख केहरि निसठ सठ जामवंत बलरासि।।54।।

    अर्थ · Hindi

    दधिमुख केहरि निसठ सठ जामवंत बलरासि।।54।।

  605. RCM 5.55.1Open verse →

    ए कपि सब सुग्रीव समाना। इन्ह सम कोटिन्ह गनइ को नाना।।

    अर्थ · Hindi

    ए कपि सब सुग्रीव समाना। इन्ह सम कोटिन्ह गनइ को नाना।।

  606. RCM 5.55.2Open verse →

    राम कृपाँ अतुलित बल तिन्हहीं। तृन समान त्रेलोकहि गनहीं।।

    अर्थ · Hindi

    राम कृपाँ अतुलित बल तिन्हहीं। तृन समान त्रेलोकहि गनहीं।।

  607. RCM 5.55.3Open verse →

    अस मैं सुना श्रवन दसकंधर। पदुम अठारह जूथप बंदर।।

    अर्थ · Hindi

    अस मैं सुना श्रवन दसकंधर। पदुम अठारह जूथप बंदर।।

  608. RCM 5.55.4Open verse →

    नाथ कटक महँ सो कपि नाहीं। जो न तुम्हहि जीतै रन माहीं।।

    अर्थ · Hindi

    नाथ कटक महँ सो कपि नाहीं। जो न तुम्हहि जीतै रन माहीं।।

  609. RCM 5.55.5Open verse →

    परम क्रोध मीजहिं सब हाथा। आयसु पै न देहिं रघुनाथा।।

    अर्थ · Hindi

    परम क्रोध मीजहिं सब हाथा। आयसु पै न देहिं रघुनाथा।।

  610. RCM 5.55.6Open verse →

    सोषहिं सिंधु सहित झष ब्याला। पूरहीं न त भरि कुधर बिसाला।।

    अर्थ · Hindi

    सोषहिं सिंधु सहित झष ब्याला। पूरहीं न त भरि कुधर बिसाला।।

  611. RCM 5.55.7Open verse →

    मर्दि गर्द मिलवहिं दससीसा। ऐसेइ बचन कहहिं सब कीसा।।

    अर्थ · Hindi

    मर्दि गर्द मिलवहिं दससीसा। ऐसेइ बचन कहहिं सब कीसा।।

  612. RCM 5.55.8Open verse →

    गर्जहिं तर्जहिं सहज असंका। मानहु ग्रसन चहत हहिं लंका।।

    अर्थ · Hindi

    गर्जहिं तर्जहिं सहज असंका। मानहु ग्रसन चहत हहिं लंका।।

  613. RCM 5.55.9Open verse →

    -सहज सूर कपि भालु सब पुनि सिर पर प्रभु राम।

    अर्थ · Hindi

    -सहज सूर कपि भालु सब पुनि सिर पर प्रभु राम।

  614. RCM 5.55.10Open verse →

    रावन काल कोटि कहु जीति सकहिं संग्राम।।55।।

    अर्थ · Hindi

    रावन काल कोटि कहु जीति सकहिं संग्राम।।55।।

  615. RCM 5.56.1Open verse →

    राम तेज बल बुधि बिपुलाई। सेष सहस सत सकहिं न गाई।।

    अर्थ · Hindi

    राम तेज बल बुधि बिपुलाई। सेष सहस सत सकहिं न गाई।।

  616. RCM 5.56.2Open verse →

    सक सर एक सोषि सत सागर। तब भ्रातहि पूँछेउ नय नागर।।

    अर्थ · Hindi

    सक सर एक सोषि सत सागर। तब भ्रातहि पूँछेउ नय नागर।।

  617. RCM 5.56.3Open verse →

    तासु बचन सुनि सागर पाहीं। मागत पंथ कृपा मन माहीं।।

    अर्थ · Hindi

    तासु बचन सुनि सागर पाहीं। मागत पंथ कृपा मन माहीं।।

  618. RCM 5.56.4Open verse →

    सुनत बचन बिहसा दससीसा। जौं असि मति सहाय कृत कीसा।।

    अर्थ · Hindi

    सुनत बचन बिहसा दससीसा। जौं असि मति सहाय कृत कीसा।।

  619. RCM 5.56.5Open verse →

    सहज भीरु कर बचन दृढ़ाई। सागर सन ठानी मचलाई।।

    अर्थ · Hindi

    सहज भीरु कर बचन दृढ़ाई। सागर सन ठानी मचलाई।।

  620. RCM 5.56.6Open verse →

    मूढ़ मृषा का करसि बड़ाई। रिपु बल बुद्धि थाह मैं पाई।।

    अर्थ · Hindi

    मूढ़ मृषा का करसि बड़ाई। रिपु बल बुद्धि थाह मैं पाई।।

  621. RCM 5.56.7Open verse →

    सचिव सभीत बिभीषन जाकें। बिजय बिभूति कहाँ जग ताकें।।

    अर्थ · Hindi

    सचिव सभीत बिभीषन जाकें। बिजय बिभूति कहाँ जग ताकें।।

  622. RCM 5.56.8Open verse →

    सुनि खल बचन दूत रिस बाढ़ी। समय बिचारि पत्रिका काढ़ी।।

    अर्थ · Hindi

    सुनि खल बचन दूत रिस बाढ़ी। समय बिचारि पत्रिका काढ़ी।।

  623. RCM 5.56.9Open verse →

    रामानुज दीन्ही यह पाती। नाथ बचाइ जुड़ावहु छाती।।

    अर्थ · Hindi

    रामानुज दीन्ही यह पाती। नाथ बचाइ जुड़ावहु छाती।।

  624. RCM 5.56.10Open verse →

    बिहसि बाम कर लीन्ही रावन। सचिव बोलि सठ लाग बचावन।।

    अर्थ · Hindi

    बिहसि बाम कर लीन्ही रावन। सचिव बोलि सठ लाग बचावन।।

  625. RCM 5.56.11Open verse →

    बातन्ह मनहि रिझाइ सठ जनि घालसि कुल खीस।

    अर्थ · Hindi

    बातन्ह मनहि रिझाइ सठ जनि घालसि कुल खीस।

  626. RCM 5.56.12Open verse →

    राम बिरोध न उबरसि सरन बिष्नु अज ईस।।56(क)।।

    अर्थ · Hindi

    राम बिरोध न उबरसि सरन बिष्नु अज ईस।।56(क)।।

  627. RCM 5.56.13Open verse →

    की तजि मान अनुज इव प्रभु पद पंकज भृंग।

    अर्थ · Hindi

    की तजि मान अनुज इव प्रभु पद पंकज भृंग।

  628. RCM 5.56.14Open verse →

    होहि कि राम सरानल खल कुल सहित पतंग।।56(ख)।।

    अर्थ · Hindi

    होहि कि राम सरानल खल कुल सहित पतंग।।56(ख)।।

  629. RCM 5.57.1Open verse →

    सुनत सभय मन मुख मुसुकाई। कहत दसानन सबहि सुनाई।।

    अर्थ · Hindi

    सुनत सभय मन मुख मुसुकाई। कहत दसानन सबहि सुनाई।।

  630. RCM 5.57.2Open verse →

    भूमि परा कर गहत अकासा। लघु तापस कर बाग बिलासा।।

    अर्थ · Hindi

    भूमि परा कर गहत अकासा। लघु तापस कर बाग बिलासा।।

  631. RCM 5.57.3Open verse →

    कह सुक नाथ सत्य सब बानी। समुझहु छाड़ि प्रकृति अभिमानी।।

    अर्थ · Hindi

    कह सुक नाथ सत्य सब बानी। समुझहु छाड़ि प्रकृति अभिमानी।।

  632. RCM 5.57.4Open verse →

    सुनहु बचन मम परिहरि क्रोधा। नाथ राम सन तजहु बिरोधा।।

    अर्थ · Hindi

    सुनहु बचन मम परिहरि क्रोधा। नाथ राम सन तजहु बिरोधा।।

  633. RCM 5.57.5Open verse →

    अति कोमल रघुबीर सुभाऊ। जद्यपि अखिल लोक कर राऊ।।

    अर्थ · Hindi

    अति कोमल रघुबीर सुभाऊ। जद्यपि अखिल लोक कर राऊ।।

  634. RCM 5.57.6Open verse →

    मिलत कृपा तुम्ह पर प्रभु करिही। उर अपराध न एकउ धरिही।।

    अर्थ · Hindi

    मिलत कृपा तुम्ह पर प्रभु करिही। उर अपराध न एकउ धरिही।।

  635. RCM 5.57.7Open verse →

    जनकसुता रघुनाथहि दीजे। एतना कहा मोर प्रभु कीजे।

    अर्थ · Hindi

    जनकसुता रघुनाथहि दीजे। एतना कहा मोर प्रभु कीजे।

  636. RCM 5.57.8Open verse →

    जब तेहिं कहा देन बैदेही। चरन प्रहार कीन्ह सठ तेही।।

    अर्थ · Hindi

    जब तेहिं कहा देन बैदेही। चरन प्रहार कीन्ह सठ तेही।।

  637. RCM 5.57.9Open verse →

    नाइ चरन सिरु चला सो तहाँ। कृपासिंधु रघुनायक जहाँ।।

    अर्थ · Hindi

    नाइ चरन सिरु चला सो तहाँ। कृपासिंधु रघुनायक जहाँ।।

  638. RCM 5.57.10Open verse →

    करि प्रनामु निज कथा सुनाई। राम कृपाँ आपनि गति पाई।।

    अर्थ · Hindi

    करि प्रनामु निज कथा सुनाई। राम कृपाँ आपनि गति पाई।।

  639. RCM 5.57.11Open verse →

    रिषि अगस्ति कीं साप भवानी। राछस भयउ रहा मुनि ग्यानी।।

    अर्थ · Hindi

    रिषि अगस्ति कीं साप भवानी। राछस भयउ रहा मुनि ग्यानी।।

  640. RCM 5.57.12Open verse →

    बंदि राम पद बारहिं बारा। मुनि निज आश्रम कहुँ पगु धारा।।

    अर्थ · Hindi

    बंदि राम पद बारहिं बारा। मुनि निज आश्रम कहुँ पगु धारा।।

  641. RCM 5.57.13Open verse →

    बिनय न मानत जलधि जड़ गए तीन दिन बीति।

    अर्थ · Hindi

    बिनय न मानत जलधि जड़ गए तीन दिन बीति।

  642. RCM 5.57.14Open verse →

    बोले राम सकोप तब भय बिनु होइ न प्रीति।।57।।

    अर्थ · Hindi

    बोले राम सकोप तब भय बिनु होइ न प्रीति।।57।।

  643. RCM 5.58.1Open verse →

    लछिमन बान सरासन आनू। सोषौं बारिधि बिसिख कृसानू।।

    अर्थ · Hindi

    लछिमन बान सरासन आनू। सोषौं बारिधि बिसिख कृसानू।।

  644. RCM 5.58.2Open verse →

    सठ सन बिनय कुटिल सन प्रीती। सहज कृपन सन सुंदर नीती।।

    अर्थ · Hindi

    सठ सन बिनय कुटिल सन प्रीती। सहज कृपन सन सुंदर नीती।।

  645. RCM 5.58.3Open verse →

    ममता रत सन ग्यान कहानी। अति लोभी सन बिरति बखानी।।

    अर्थ · Hindi

    ममता रत सन ग्यान कहानी। अति लोभी सन बिरति बखानी।।

  646. RCM 5.58.4Open verse →

    क्रोधिहि सम कामिहि हरि कथा। ऊसर बीज बएँ फल जथा।।

    अर्थ · Hindi

    क्रोधिहि सम कामिहि हरि कथा। ऊसर बीज बएँ फल जथा।।

  647. RCM 5.58.5Open verse →

    अस कहि रघुपति चाप चढ़ावा। यह मत लछिमन के मन भावा।।

    अर्थ · Hindi

    अस कहि रघुपति चाप चढ़ावा। यह मत लछिमन के मन भावा।।

  648. RCM 5.58.6Open verse →

    संघानेउ प्रभु बिसिख कराला। उठी उदधि उर अंतर ज्वाला।।

    अर्थ · Hindi

    संघानेउ प्रभु बिसिख कराला। उठी उदधि उर अंतर ज्वाला।।

  649. RCM 5.58.7Open verse →

    मकर उरग झष गन अकुलाने। जरत जंतु जलनिधि जब जाने।।

    अर्थ · Hindi

    मकर उरग झष गन अकुलाने। जरत जंतु जलनिधि जब जाने।।

  650. RCM 5.58.8Open verse →

    कनक थार भरि मनि गन नाना। बिप्र रूप आयउ तजि माना।।

    अर्थ · Hindi

    कनक थार भरि मनि गन नाना। बिप्र रूप आयउ तजि माना।।

  651. RCM 5.58.9Open verse →

    काटेहिं पइ कदरी फरइ कोटि जतन कोउ सींच।

    अर्थ · Hindi

    काटेहिं पइ कदरी फरइ कोटि जतन कोउ सींच।

  652. RCM 5.58.10Open verse →

    बिनय न मान खगेस सुनु डाटेहिं पइ नव नीच।।58।।

    अर्थ · Hindi

    बिनय न मान खगेस सुनु डाटेहिं पइ नव नीच।।58।।

  653. RCM 5.59.1Open verse →

    सभय सिंधु गहि पद प्रभु केरे। छमहु नाथ सब अवगुन मेरे।।

    अर्थ · Hindi

    सभय सिंधु गहि पद प्रभु केरे। छमहु नाथ सब अवगुन मेरे।।

  654. RCM 5.59.2Open verse →

    गगन समीर अनल जल धरनी। इन्ह कइ नाथ सहज जड़ करनी।।

    अर्थ · Hindi

    गगन समीर अनल जल धरनी। इन्ह कइ नाथ सहज जड़ करनी।।

  655. RCM 5.59.3Open verse →

    तव प्रेरित मायाँ उपजाए। सृष्टि हेतु सब ग्रंथनि गाए।।

    अर्थ · Hindi

    तव प्रेरित मायाँ उपजाए। सृष्टि हेतु सब ग्रंथनि गाए।।

  656. RCM 5.59.4Open verse →

    प्रभु आयसु जेहि कहँ जस अहई। सो तेहि भाँति रहे सुख लहई।।

    अर्थ · Hindi

    प्रभु आयसु जेहि कहँ जस अहई। सो तेहि भाँति रहे सुख लहई।।

  657. RCM 5.59.5Open verse →

    प्रभु भल कीन्ही मोहि सिख दीन्ही। मरजादा पुनि तुम्हरी कीन्ही।।

    अर्थ · Hindi

    प्रभु भल कीन्ही मोहि सिख दीन्ही। मरजादा पुनि तुम्हरी कीन्ही।।

  658. RCM 5.59.6Open verse →

    ढोल गवाँर सूद्र पसु नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी।।

    अर्थ · Hindi

    ढोल गवाँर सूद्र पसु नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी।।

  659. RCM 5.59.7Open verse →

    प्रभु प्रताप मैं जाब सुखाई। उतरिहि कटकु न मोरि बड़ाई।।

    अर्थ · Hindi

    प्रभु प्रताप मैं जाब सुखाई। उतरिहि कटकु न मोरि बड़ाई।।

  660. RCM 5.59.8Open verse →

    प्रभु अग्या अपेल श्रुति गाई। करौं सो बेगि जौ तुम्हहि सोहाई।।

    अर्थ · Hindi

    प्रभु अग्या अपेल श्रुति गाई। करौं सो बेगि जौ तुम्हहि सोहाई।।

  661. RCM 5.59.9Open verse →

    सुनत बिनीत बचन अति कह कृपाल मुसुकाइ।

    अर्थ · Hindi

    सुनत बिनीत बचन अति कह कृपाल मुसुकाइ।

  662. RCM 5.59.10Open verse →

    जेहि बिधि उतरै कपि कटकु तात सो कहहु उपाइ।।59।।

    अर्थ · Hindi

    जेहि बिधि उतरै कपि कटकु तात सो कहहु उपाइ।।59।।

  663. RCM 5.60.1Open verse →

    नाथ नील नल कपि द्वौ भाई। लरिकाई रिषि आसिष पाई।।

    अर्थ · Hindi

    नाथ नील नल कपि द्वौ भाई। लरिकाई रिषि आसिष पाई।।

  664. RCM 5.60.2Open verse →

    तिन्ह के परस किएँ गिरि भारे। तरिहहिं जलधि प्रताप तुम्हारे।।

    अर्थ · Hindi

    तिन्ह के परस किएँ गिरि भारे। तरिहहिं जलधि प्रताप तुम्हारे।।

  665. RCM 5.60.3Open verse →

    मैं पुनि उर धरि प्रभुताई। करिहउँ बल अनुमान सहाई।।

    अर्थ · Hindi

    मैं पुनि उर धरि प्रभुताई। करिहउँ बल अनुमान सहाई।।

  666. RCM 5.60.4Open verse →

    एहि बिधि नाथ पयोधि बँधाइअ। जेहिं यह सुजसु लोक तिहुँ गाइअ।।

    अर्थ · Hindi

    एहि बिधि नाथ पयोधि बँधाइअ। जेहिं यह सुजसु लोक तिहुँ गाइअ।।

  667. RCM 5.60.5Open verse →

    एहि सर मम उत्तर तट बासी। हतहु नाथ खल नर अघ रासी।।

    अर्थ · Hindi

    एहि सर मम उत्तर तट बासी। हतहु नाथ खल नर अघ रासी।।

  668. RCM 5.60.6Open verse →

    सुनि कृपाल सागर मन पीरा। तुरतहिं हरी राम रनधीरा।।

    अर्थ · Hindi

    सुनि कृपाल सागर मन पीरा। तुरतहिं हरी राम रनधीरा।।

  669. RCM 5.60.7Open verse →

    देखि राम बल पौरुष भारी। हरषि पयोनिधि भयउ सुखारी।।

    अर्थ · Hindi

    देखि राम बल पौरुष भारी। हरषि पयोनिधि भयउ सुखारी।।

  670. RCM 5.60.8Open verse →

    सकल चरित कहि प्रभुहि सुनावा। चरन बंदि पाथोधि सिधावा।।

    अर्थ · Hindi

    सकल चरित कहि प्रभुहि सुनावा। चरन बंदि पाथोधि सिधावा।।

  671. RCM 5.60.9Open verse →

    निज भवन गवनेउ सिंधु श्रीरघुपतिहि यह मत भायऊ।

    अर्थ · Hindi

    निज भवन गवनेउ सिंधु श्रीरघुपतिहि यह मत भायऊ।

  672. RCM 5.60.10Open verse →

    यह चरित कलि मलहर जथामति दास तुलसी गायऊ।।

    अर्थ · Hindi

    यह चरित कलि मलहर जथामति दास तुलसी गायऊ।।

  673. RCM 5.60.11Open verse →

    सुख भवन संसय समन दवन बिषाद रघुपति गुन गना।।

    अर्थ · Hindi

    सुख भवन संसय समन दवन बिषाद रघुपति गुन गना।।

  674. RCM 5.60.12Open verse →

    तजि सकल आस भरोस गावहि सुनहि संतत सठ मना।।

    अर्थ · Hindi

    तजि सकल आस भरोस गावहि सुनहि संतत सठ मना।।

  675. RCM 5.60.13Open verse →

    सकल सुमंगल दायक रघुनायक गुन गान।

    अर्थ · Hindi

    सकल सुमंगल दायक रघुनायक गुन गान।

  676. RCM 5.60.14Open verse →

    सादर सुनहिं ते तरहिं भव सिंधु बिना जलजान।।60।।

    अर्थ · Hindi

    सादर सुनहिं ते तरहिं भव सिंधु बिना जलजान।।60।।