Ramcharitmanas · अध्याय 5
Sundara Kanda
सुन्दरकाण्ड
Hanuman's leap to Lanka, meeting Sita in the Ashoka grove, burning of Lanka — the most-chanted kanda.
- RCM 5.1001Open verse →
जामवंत के बचन सुहाए। सुनि हनुमंत हृदय अति भाए॥ तब लगि मोहि परिखेहु तुम्ह भाई। सहि दुख कंद मूल फल खाई॥
Meaning · English
Hanuman's heart was greatly cheered to hear Jambavan's auspicious words. 'Wait for me, brothers,' he said, 'sustained by roots, fruits and tubers.'
- RCM 5.1.2Open verse →
तब लगि मोहि परिखेहु तुम्ह भाई। सहि दुख कंद मूल फल खाई।।
अर्थ · Hindi
तब लगि मोहि परिखेहु तुम्ह भाई। सहि दुख कंद मूल फल खाई।।
- RCM 5.1.3Open verse →
जब लगि आवौं सीतहि देखी। होइहि काजु मोहि हरष बिसेषी।।
अर्थ · Hindi
जब लगि आवौं सीतहि देखी। होइहि काजु मोहि हरष बिसेषी।।
- RCM 5.1.4Open verse →
यह कहि नाइ सबन्हि कहुँ माथा। चलेउ हरषि हियँ धरि रघुनाथा।।
अर्थ · Hindi
यह कहि नाइ सबन्हि कहुँ माथा। चलेउ हरषि हियँ धरि रघुनाथा।।
- RCM 5.1.5Open verse →
सिंधु तीर एक भूधर सुंदर। कौतुक कूदि चढ़ेउ ता ऊपर।।
अर्थ · Hindi
सिंधु तीर एक भूधर सुंदर। कौतुक कूदि चढ़ेउ ता ऊपर।।
- RCM 5.1.6Open verse →
बार बार रघुबीर सँभारी। तरकेउ पवनतनय बल भारी।।
अर्थ · Hindi
बार बार रघुबीर सँभारी। तरकेउ पवनतनय बल भारी।।
- RCM 5.1.7Open verse →
जेहिं गिरि चरन देइ हनुमंता। चलेउ सो गा पाताल तुरंता।।
अर्थ · Hindi
जेहिं गिरि चरन देइ हनुमंता। चलेउ सो गा पाताल तुरंता।।
- RCM 5.1.8Open verse →
जिमि अमोघ रघुपति कर बाना। एही भाँति चलेउ हनुमाना।।
अर्थ · Hindi
जिमि अमोघ रघुपति कर बाना। एही भाँति चलेउ हनुमाना।।
- RCM 5.1.9Open verse →
जलनिधि रघुपति दूत बिचारी। तैं मैनाक होहि श्रमहारी।।
अर्थ · Hindi
जलनिधि रघुपति दूत बिचारी। तैं मैनाक होहि श्रमहारी।।
- RCM 5.1.10Open verse →
हनूमान तेहि परसा कर पुनि कीन्ह प्रनाम।
अर्थ · Hindi
हनूमान तेहि परसा कर पुनि कीन्ह प्रनाम।
- RCM 5.1.11Open verse →
राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ बिश्राम।।1।।
अर्थ · Hindi
राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ बिश्राम।।1।।
- RCM 5.2.1Open verse →
जात पवनसुत देवन्ह देखा। जानैं कहुँ बल बुद्धि बिसेषा।।
अर्थ · Hindi
जात पवनसुत देवन्ह देखा। जानैं कहुँ बल बुद्धि बिसेषा।।
- RCM 5.2.2Open verse →
सुरसा नाम अहिन्ह कै माता। पठइन्हि आइ कही तेहिं बाता।।
अर्थ · Hindi
सुरसा नाम अहिन्ह कै माता। पठइन्हि आइ कही तेहिं बाता।।
- RCM 5.2.3Open verse →
आजु सुरन्ह मोहि दीन्ह अहारा। सुनत बचन कह पवनकुमारा।।
अर्थ · Hindi
आजु सुरन्ह मोहि दीन्ह अहारा। सुनत बचन कह पवनकुमारा।।
- RCM 5.2.4Open verse →
राम काजु करि फिरि मैं आवौं। सीता कइ सुधि प्रभुहि सुनावौं।।
अर्थ · Hindi
राम काजु करि फिरि मैं आवौं। सीता कइ सुधि प्रभुहि सुनावौं।।
- RCM 5.2.5Open verse →
तब तव बदन पैठिहउँ आई। सत्य कहउँ मोहि जान दे माई।।
अर्थ · Hindi
तब तव बदन पैठिहउँ आई। सत्य कहउँ मोहि जान दे माई।।
- RCM 5.2.6Open verse →
कबनेहुँ जतन देइ नहिं जाना। ग्रससि न मोहि कहेउ हनुमाना।।
अर्थ · Hindi
कबनेहुँ जतन देइ नहिं जाना। ग्रससि न मोहि कहेउ हनुमाना।।
- RCM 5.2.7Open verse →
जोजन भरि तेहिं बदनु पसारा। कपि तनु कीन्ह दुगुन बिस्तारा।।
अर्थ · Hindi
जोजन भरि तेहिं बदनु पसारा। कपि तनु कीन्ह दुगुन बिस्तारा।।
- RCM 5.2.8Open verse →
सोरह जोजन मुख तेहिं ठयऊ। तुरत पवनसुत बत्तिस भयऊ।।
अर्थ · Hindi
सोरह जोजन मुख तेहिं ठयऊ। तुरत पवनसुत बत्तिस भयऊ।।
- RCM 5.2.9Open verse →
जस जस सुरसा बदनु बढ़ावा। तासु दून कपि रूप देखावा।।
अर्थ · Hindi
जस जस सुरसा बदनु बढ़ावा। तासु दून कपि रूप देखावा।।
- RCM 5.2.10Open verse →
सत जोजन तेहिं आनन कीन्हा। अति लघु रूप पवनसुत लीन्हा।।
अर्थ · Hindi
सत जोजन तेहिं आनन कीन्हा। अति लघु रूप पवनसुत लीन्हा।।
- RCM 5.2.11Open verse →
बदन पइठि पुनि बाहेर आवा। मागा बिदा ताहि सिरु नावा।।
अर्थ · Hindi
बदन पइठि पुनि बाहेर आवा। मागा बिदा ताहि सिरु नावा।।
- RCM 5.2.12Open verse →
मोहि सुरन्ह जेहि लागि पठावा। बुधि बल मरमु तोर मै पावा।।
अर्थ · Hindi
मोहि सुरन्ह जेहि लागि पठावा। बुधि बल मरमु तोर मै पावा।।
- RCM 5.2.13Open verse →
राम काजु सबु करिहहु तुम्ह बल बुद्धि निधान।
अर्थ · Hindi
राम काजु सबु करिहहु तुम्ह बल बुद्धि निधान।
- RCM 5.2.14Open verse →
आसिष देह गई सो हरषि चलेउ हनुमान।।2।।
अर्थ · Hindi
आसिष देह गई सो हरषि चलेउ हनुमान।।2।।
- RCM 5.3.1Open verse →
निसिचरि एक सिंधु महुँ रहई। करि माया नभु के खग गहई।।
अर्थ · Hindi
निसिचरि एक सिंधु महुँ रहई। करि माया नभु के खग गहई।।
- RCM 5.3.2Open verse →
जीव जंतु जे गगन उड़ाहीं। जल बिलोकि तिन्ह कै परिछाहीं।।
अर्थ · Hindi
जीव जंतु जे गगन उड़ाहीं। जल बिलोकि तिन्ह कै परिछाहीं।।
- RCM 5.3.3Open verse →
गहइ छाहँ सक सो न उड़ाई। एहि बिधि सदा गगनचर खाई।।
अर्थ · Hindi
गहइ छाहँ सक सो न उड़ाई। एहि बिधि सदा गगनचर खाई।।
- RCM 5.3.4Open verse →
सोइ छल हनूमान कहँ कीन्हा। तासु कपटु कपि तुरतहिं चीन्हा।।
अर्थ · Hindi
सोइ छल हनूमान कहँ कीन्हा। तासु कपटु कपि तुरतहिं चीन्हा।।
- RCM 5.3.5Open verse →
ताहि मारि मारुतसुत बीरा। बारिधि पार गयउ मतिधीरा।।
अर्थ · Hindi
ताहि मारि मारुतसुत बीरा। बारिधि पार गयउ मतिधीरा।।
- RCM 5.3.6Open verse →
तहाँ जाइ देखी बन सोभा। गुंजत चंचरीक मधु लोभा।।
अर्थ · Hindi
तहाँ जाइ देखी बन सोभा। गुंजत चंचरीक मधु लोभा।।
- RCM 5.3.7Open verse →
नाना तरु फल फूल सुहाए। खग मृग बृंद देखि मन भाए।।
अर्थ · Hindi
नाना तरु फल फूल सुहाए। खग मृग बृंद देखि मन भाए।।
- RCM 5.3.8Open verse →
सैल बिसाल देखि एक आगें। ता पर धाइ चढेउ भय त्यागें।।
अर्थ · Hindi
सैल बिसाल देखि एक आगें। ता पर धाइ चढेउ भय त्यागें।।
- RCM 5.3.9Open verse →
उमा न कछु कपि कै अधिकाई। प्रभु प्रताप जो कालहि खाई।।
अर्थ · Hindi
उमा न कछु कपि कै अधिकाई। प्रभु प्रताप जो कालहि खाई।।
- RCM 5.3.10Open verse →
गिरि पर चढि लंका तेहिं देखी। कहि न जाइ अति दुर्ग बिसेषी।।
अर्थ · Hindi
गिरि पर चढि लंका तेहिं देखी। कहि न जाइ अति दुर्ग बिसेषी।।
- RCM 5.3.11Open verse →
अति उतंग जलनिधि चहु पासा। कनक कोट कर परम प्रकासा।।
अर्थ · Hindi
अति उतंग जलनिधि चहु पासा। कनक कोट कर परम प्रकासा।।
- RCM 5.3.12Open verse →
कनक कोट बिचित्र मनि कृत सुंदरायतना घना।
अर्थ · Hindi
कनक कोट बिचित्र मनि कृत सुंदरायतना घना।
- RCM 5.3.13Open verse →
चउहट्ट हट्ट सुबट्ट बीथीं चारु पुर बहु बिधि बना।।
अर्थ · Hindi
चउहट्ट हट्ट सुबट्ट बीथीं चारु पुर बहु बिधि बना।।
- RCM 5.3.14Open verse →
गज बाजि खच्चर निकर पदचर रथ बरूथिन्ह को गनै।।
अर्थ · Hindi
गज बाजि खच्चर निकर पदचर रथ बरूथिन्ह को गनै।।
- RCM 5.3.15Open verse →
बहुरूप निसिचर जूथ अतिबल सेन बरनत नहिं बनै।।
अर्थ · Hindi
बहुरूप निसिचर जूथ अतिबल सेन बरनत नहिं बनै।।
- RCM 5.3.16Open verse →
बन बाग उपबन बाटिका सर कूप बापीं सोहहीं।
अर्थ · Hindi
बन बाग उपबन बाटिका सर कूप बापीं सोहहीं।
- RCM 5.3.17Open verse →
नर नाग सुर गंधर्ब कन्या रूप मुनि मन मोहहीं।।
अर्थ · Hindi
नर नाग सुर गंधर्ब कन्या रूप मुनि मन मोहहीं।।
- RCM 5.3.18Open verse →
कहुँ माल देह बिसाल सैल समान अतिबल गर्जहीं।
अर्थ · Hindi
कहुँ माल देह बिसाल सैल समान अतिबल गर्जहीं।
- RCM 5.3.19Open verse →
नाना अखारेन्ह भिरहिं बहु बिधि एक एकन्ह तर्जहीं।।
अर्थ · Hindi
नाना अखारेन्ह भिरहिं बहु बिधि एक एकन्ह तर्जहीं।।
- RCM 5.3.20Open verse →
करि जतन भट कोटिन्ह बिकट तन नगर चहुँ दिसि रच्छहीं।
अर्थ · Hindi
करि जतन भट कोटिन्ह बिकट तन नगर चहुँ दिसि रच्छहीं।
- RCM 5.3.21Open verse →
कहुँ महिष मानषु धेनु खर अज खल निसाचर भच्छहीं।।
अर्थ · Hindi
कहुँ महिष मानषु धेनु खर अज खल निसाचर भच्छहीं।।
- RCM 5.3.22Open verse →
एहि लागि तुलसीदास इन्ह की कथा कछु एक है कही।
अर्थ · Hindi
एहि लागि तुलसीदास इन्ह की कथा कछु एक है कही।
- RCM 5.3.23Open verse →
रघुबीर सर तीरथ सरीरन्हि त्यागि गति पैहहिं सही।।
अर्थ · Hindi
रघुबीर सर तीरथ सरीरन्हि त्यागि गति पैहहिं सही।।
- RCM 5.3.24Open verse →
पुर रखवारे देखि बहु कपि मन कीन्ह बिचार।
अर्थ · Hindi
पुर रखवारे देखि बहु कपि मन कीन्ह बिचार।
- RCM 5.3.25Open verse →
अति लघु रूप धरौं निसि नगर करौं पइसार।।3।।
अर्थ · Hindi
अति लघु रूप धरौं निसि नगर करौं पइसार।।3।।
- RCM 5.4.1Open verse →
मसक समान रूप कपि धरी। लंकहि चलेउ सुमिरि नरहरी।।
अर्थ · Hindi
मसक समान रूप कपि धरी। लंकहि चलेउ सुमिरि नरहरी।।
- RCM 5.4.2Open verse →
नाम लंकिनी एक निसिचरी। सो कह चलेसि मोहि निंदरी।।
अर्थ · Hindi
नाम लंकिनी एक निसिचरी। सो कह चलेसि मोहि निंदरी।।
- RCM 5.4.3Open verse →
जानेहि नहीं मरमु सठ मोरा। मोर अहार जहाँ लगि चोरा।।
अर्थ · Hindi
जानेहि नहीं मरमु सठ मोरा। मोर अहार जहाँ लगि चोरा।।
- RCM 5.4.4Open verse →
मुठिका एक महा कपि हनी। रुधिर बमत धरनीं ढनमनी।।
अर्थ · Hindi
मुठिका एक महा कपि हनी। रुधिर बमत धरनीं ढनमनी।।
- RCM 5.4.5Open verse →
पुनि संभारि उठि सो लंका। जोरि पानि कर बिनय संसका।।
अर्थ · Hindi
पुनि संभारि उठि सो लंका। जोरि पानि कर बिनय संसका।।
- RCM 5.4.6Open verse →
जब रावनहि ब्रह्म बर दीन्हा। चलत बिरंचि कहा मोहि चीन्हा।।
अर्थ · Hindi
जब रावनहि ब्रह्म बर दीन्हा। चलत बिरंचि कहा मोहि चीन्हा।।
- RCM 5.4.7Open verse →
बिकल होसि तैं कपि कें मारे। तब जानेसु निसिचर संघारे।।
अर्थ · Hindi
बिकल होसि तैं कपि कें मारे। तब जानेसु निसिचर संघारे।।
- RCM 5.4.8Open verse →
तात मोर अति पुन्य बहूता। देखेउँ नयन राम कर दूता।।
अर्थ · Hindi
तात मोर अति पुन्य बहूता। देखेउँ नयन राम कर दूता।।
- RCM 5.4.9Open verse →
तात स्वर्ग अपबर्ग सुख धरिअ तुला एक अंग।
अर्थ · Hindi
तात स्वर्ग अपबर्ग सुख धरिअ तुला एक अंग।
- RCM 5.4.10Open verse →
तूल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग।।4।।
अर्थ · Hindi
तूल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग।।4।।
- RCM 5.5.1Open verse →
प्रबिसि नगर कीजे सब काजा। हृदयँ राखि कौसलपुर राजा।।
अर्थ · Hindi
प्रबिसि नगर कीजे सब काजा। हृदयँ राखि कौसलपुर राजा।।
- RCM 5.5.2Open verse →
गरल सुधा रिपु करहिं मिताई। गोपद सिंधु अनल सितलाई।।
अर्थ · Hindi
गरल सुधा रिपु करहिं मिताई। गोपद सिंधु अनल सितलाई।।
- RCM 5.5.3Open verse →
गरुड़ सुमेरु रेनू सम ताही। राम कृपा करि चितवा जाही।।
अर्थ · Hindi
गरुड़ सुमेरु रेनू सम ताही। राम कृपा करि चितवा जाही।।
- RCM 5.5.4Open verse →
अति लघु रूप धरेउ हनुमाना। पैठा नगर सुमिरि भगवाना।।
अर्थ · Hindi
अति लघु रूप धरेउ हनुमाना। पैठा नगर सुमिरि भगवाना।।
- RCM 5.5.5Open verse →
मंदिर मंदिर प्रति करि सोधा। देखे जहँ तहँ अगनित जोधा।।
अर्थ · Hindi
मंदिर मंदिर प्रति करि सोधा। देखे जहँ तहँ अगनित जोधा।।
- RCM 5.5.6Open verse →
गयउ दसानन मंदिर माहीं। अति बिचित्र कहि जात सो नाहीं।।
अर्थ · Hindi
गयउ दसानन मंदिर माहीं। अति बिचित्र कहि जात सो नाहीं।।
- RCM 5.5.7Open verse →
सयन किए देखा कपि तेही। मंदिर महुँ न दीखि बैदेही।।
अर्थ · Hindi
सयन किए देखा कपि तेही। मंदिर महुँ न दीखि बैदेही।।
- RCM 5.5.8Open verse →
भवन एक पुनि दीख सुहावा। हरि मंदिर तहँ भिन्न बनावा।।
अर्थ · Hindi
भवन एक पुनि दीख सुहावा। हरि मंदिर तहँ भिन्न बनावा।।
- RCM 5.5.9Open verse →
रामायुध अंकित गृह सोभा बरनि न जाइ।
अर्थ · Hindi
रामायुध अंकित गृह सोभा बरनि न जाइ।
- RCM 5.5.10Open verse →
नव तुलसिका बृंद तहँ देखि हरषि कपिराइ।।5।।
अर्थ · Hindi
नव तुलसिका बृंद तहँ देखि हरषि कपिराइ।।5।।
- RCM 5.6.1Open verse →
लंका निसिचर निकर निवासा। इहाँ कहाँ सज्जन कर बासा।।
अर्थ · Hindi
लंका निसिचर निकर निवासा। इहाँ कहाँ सज्जन कर बासा।।
- RCM 5.6.2Open verse →
मन महुँ तरक करै कपि लागा। तेहीं समय बिभीषनु जागा।।
अर्थ · Hindi
मन महुँ तरक करै कपि लागा। तेहीं समय बिभीषनु जागा।।
- RCM 5.6.3Open verse →
राम राम तेहिं सुमिरन कीन्हा। हृदयँ हरष कपि सज्जन चीन्हा।।
अर्थ · Hindi
राम राम तेहिं सुमिरन कीन्हा। हृदयँ हरष कपि सज्जन चीन्हा।।
- RCM 5.6.4Open verse →
एहि सन हठि करिहउँ पहिचानी। साधु ते होइ न कारज हानी।।
अर्थ · Hindi
एहि सन हठि करिहउँ पहिचानी। साधु ते होइ न कारज हानी।।
- RCM 5.6.5Open verse →
बिप्र रुप धरि बचन सुनाए। सुनत बिभीषण उठि तहँ आए।।
अर्थ · Hindi
बिप्र रुप धरि बचन सुनाए। सुनत बिभीषण उठि तहँ आए।।
- RCM 5.6.6Open verse →
करि प्रनाम पूँछी कुसलाई। बिप्र कहहु निज कथा बुझाई।।
अर्थ · Hindi
करि प्रनाम पूँछी कुसलाई। बिप्र कहहु निज कथा बुझाई।।
- RCM 5.6.7Open verse →
की तुम्ह हरि दासन्ह महँ कोई। मोरें हृदय प्रीति अति होई।।
अर्थ · Hindi
की तुम्ह हरि दासन्ह महँ कोई। मोरें हृदय प्रीति अति होई।।
- RCM 5.6.8Open verse →
की तुम्ह रामु दीन अनुरागी। आयहु मोहि करन बड़भागी।।
अर्थ · Hindi
की तुम्ह रामु दीन अनुरागी। आयहु मोहि करन बड़भागी।।
- RCM 5.6.9Open verse →
तब हनुमंत कही सब राम कथा निज नाम।
अर्थ · Hindi
तब हनुमंत कही सब राम कथा निज नाम।
- RCM 5.6.10Open verse →
सुनत जुगल तन पुलक मन मगन सुमिरि गुन ग्राम।।6।।
अर्थ · Hindi
सुनत जुगल तन पुलक मन मगन सुमिरि गुन ग्राम।।6।।
- RCM 5.7.1Open verse →
सुनहु पवनसुत रहनि हमारी। जिमि दसनन्हि महुँ जीभ बिचारी।।
अर्थ · Hindi
सुनहु पवनसुत रहनि हमारी। जिमि दसनन्हि महुँ जीभ बिचारी।।
- RCM 5.7.2Open verse →
तात कबहुँ मोहि जानि अनाथा। करिहहिं कृपा भानुकुल नाथा।।
अर्थ · Hindi
तात कबहुँ मोहि जानि अनाथा। करिहहिं कृपा भानुकुल नाथा।।
- RCM 5.7.3Open verse →
तामस तनु कछु साधन नाहीं। प्रीति न पद सरोज मन माहीं।।
अर्थ · Hindi
तामस तनु कछु साधन नाहीं। प्रीति न पद सरोज मन माहीं।।
- RCM 5.7.4Open verse →
अब मोहि भा भरोस हनुमंता। बिनु हरिकृपा मिलहिं नहिं संता।।
अर्थ · Hindi
अब मोहि भा भरोस हनुमंता। बिनु हरिकृपा मिलहिं नहिं संता।।
- RCM 5.7.5Open verse →
जौ रघुबीर अनुग्रह कीन्हा। तौ तुम्ह मोहि दरसु हठि दीन्हा।।
अर्थ · Hindi
जौ रघुबीर अनुग्रह कीन्हा। तौ तुम्ह मोहि दरसु हठि दीन्हा।।
- RCM 5.7.6Open verse →
सुनहु बिभीषन प्रभु कै रीती। करहिं सदा सेवक पर प्रीती।।
अर्थ · Hindi
सुनहु बिभीषन प्रभु कै रीती। करहिं सदा सेवक पर प्रीती।।
- RCM 5.7.7Open verse →
कहहु कवन मैं परम कुलीना। कपि चंचल सबहीं बिधि हीना।।
अर्थ · Hindi
कहहु कवन मैं परम कुलीना। कपि चंचल सबहीं बिधि हीना।।
- RCM 5.7.8Open verse →
प्रात लेइ जो नाम हमारा। तेहि दिन ताहि न मिलै अहारा।।
अर्थ · Hindi
प्रात लेइ जो नाम हमारा। तेहि दिन ताहि न मिलै अहारा।।
- RCM 5.7.9Open verse →
अस मैं अधम सखा सुनु मोहू पर रघुबीर।
अर्थ · Hindi
अस मैं अधम सखा सुनु मोहू पर रघुबीर।
- RCM 5.7.10Open verse →
कीन्ही कृपा सुमिरि गुन भरे बिलोचन नीर।।7।।
अर्थ · Hindi
कीन्ही कृपा सुमिरि गुन भरे बिलोचन नीर।।7।।
- RCM 5.8.1Open verse →
जानतहूँ अस स्वामि बिसारी। फिरहिं ते काहे न होहिं दुखारी।।
अर्थ · Hindi
जानतहूँ अस स्वामि बिसारी। फिरहिं ते काहे न होहिं दुखारी।।
- RCM 5.8.2Open verse →
एहि बिधि कहत राम गुन ग्रामा। पावा अनिर्बाच्य बिश्रामा।।
अर्थ · Hindi
एहि बिधि कहत राम गुन ग्रामा। पावा अनिर्बाच्य बिश्रामा।।
- RCM 5.8.3Open verse →
पुनि सब कथा बिभीषन कही। जेहि बिधि जनकसुता तहँ रही।।
अर्थ · Hindi
पुनि सब कथा बिभीषन कही। जेहि बिधि जनकसुता तहँ रही।।
- RCM 5.8.4Open verse →
तब हनुमंत कहा सुनु भ्राता। देखी चहउँ जानकी माता।।
अर्थ · Hindi
तब हनुमंत कहा सुनु भ्राता। देखी चहउँ जानकी माता।।
- RCM 5.8.5Open verse →
जुगुति बिभीषन सकल सुनाई। चलेउ पवनसुत बिदा कराई।।
अर्थ · Hindi
जुगुति बिभीषन सकल सुनाई। चलेउ पवनसुत बिदा कराई।।
- RCM 5.8.6Open verse →
करि सोइ रूप गयउ पुनि तहवाँ। बन असोक सीता रह जहवाँ।।
अर्थ · Hindi
करि सोइ रूप गयउ पुनि तहवाँ। बन असोक सीता रह जहवाँ।।
- RCM 5.8.7Open verse →
देखि मनहि महुँ कीन्ह प्रनामा। बैठेहिं बीति जात निसि जामा।।
अर्थ · Hindi
देखि मनहि महुँ कीन्ह प्रनामा। बैठेहिं बीति जात निसि जामा।।
- RCM 5.8.8Open verse →
कृस तन सीस जटा एक बेनी। जपति हृदयँ रघुपति गुन श्रेनी।।
अर्थ · Hindi
कृस तन सीस जटा एक बेनी। जपति हृदयँ रघुपति गुन श्रेनी।।
- RCM 5.8.9Open verse →
निज पद नयन दिएँ मन राम पद कमल लीन।
अर्थ · Hindi
निज पद नयन दिएँ मन राम पद कमल लीन।
- RCM 5.8.10Open verse →
परम दुखी भा पवनसुत देखि जानकी दीन।।8।।
अर्थ · Hindi
परम दुखी भा पवनसुत देखि जानकी दीन।।8।।
- RCM 5.9.1Open verse →
तरु पल्लव महुँ रहा लुकाई। करइ बिचार करौं का भाई।।
अर्थ · Hindi
तरु पल्लव महुँ रहा लुकाई। करइ बिचार करौं का भाई।।
- RCM 5.9.2Open verse →
तेहि अवसर रावनु तहँ आवा। संग नारि बहु किएँ बनावा।।
अर्थ · Hindi
तेहि अवसर रावनु तहँ आवा। संग नारि बहु किएँ बनावा।।
- RCM 5.9.3Open verse →
बहु बिधि खल सीतहि समुझावा। साम दान भय भेद देखावा।।
अर्थ · Hindi
बहु बिधि खल सीतहि समुझावा। साम दान भय भेद देखावा।।
- RCM 5.9.4Open verse →
कह रावनु सुनु सुमुखि सयानी। मंदोदरी आदि सब रानी।।
अर्थ · Hindi
कह रावनु सुनु सुमुखि सयानी। मंदोदरी आदि सब रानी।।
- RCM 5.9.5Open verse →
तव अनुचरीं करउँ पन मोरा। एक बार बिलोकु मम ओरा।।
अर्थ · Hindi
तव अनुचरीं करउँ पन मोरा। एक बार बिलोकु मम ओरा।।
- RCM 5.9.6Open verse →
तृन धरि ओट कहति बैदेही। सुमिरि अवधपति परम सनेही।।
अर्थ · Hindi
तृन धरि ओट कहति बैदेही। सुमिरि अवधपति परम सनेही।।
- RCM 5.9.7Open verse →
सुनु दसमुख खद्योत प्रकासा। कबहुँ कि नलिनी करइ बिकासा।।
अर्थ · Hindi
सुनु दसमुख खद्योत प्रकासा। कबहुँ कि नलिनी करइ बिकासा।।
- RCM 5.9.8Open verse →
अस मन समुझु कहति जानकी। खल सुधि नहिं रघुबीर बान की।।
अर्थ · Hindi
अस मन समुझु कहति जानकी। खल सुधि नहिं रघुबीर बान की।।
- RCM 5.9.9Open verse →
सठ सूने हरि आनेहि मोहि। अधम निलज्ज लाज नहिं तोही।।
अर्थ · Hindi
सठ सूने हरि आनेहि मोहि। अधम निलज्ज लाज नहिं तोही।।
- RCM 5.9.10Open verse →
आपुहि सुनि खद्योत सम रामहि भानु समान।
अर्थ · Hindi
आपुहि सुनि खद्योत सम रामहि भानु समान।
- RCM 5.9.11Open verse →
परुष बचन सुनि काढ़ि असि बोला अति खिसिआन।।9।।
अर्थ · Hindi
परुष बचन सुनि काढ़ि असि बोला अति खिसिआन।।9।।
- RCM 5.10.1Open verse →
सीता तैं मम कृत अपमाना। कटिहउँ तव सिर कठिन कृपाना।।
अर्थ · Hindi
सीता तैं मम कृत अपमाना। कटिहउँ तव सिर कठिन कृपाना।।
- RCM 5.10.2Open verse →
नाहिं त सपदि मानु मम बानी। सुमुखि होति न त जीवन हानी।।
अर्थ · Hindi
नाहिं त सपदि मानु मम बानी। सुमुखि होति न त जीवन हानी।।
- RCM 5.10.3Open verse →
स्याम सरोज दाम सम सुंदर। प्रभु भुज करि कर सम दसकंधर।।
अर्थ · Hindi
स्याम सरोज दाम सम सुंदर। प्रभु भुज करि कर सम दसकंधर।।
- RCM 5.10.4Open verse →
सो भुज कंठ कि तव असि घोरा। सुनु सठ अस प्रवान पन मोरा।।
अर्थ · Hindi
सो भुज कंठ कि तव असि घोरा। सुनु सठ अस प्रवान पन मोरा।।
- RCM 5.10.5Open verse →
चंद्रहास हरु मम परितापं। रघुपति बिरह अनल संजातं।।
अर्थ · Hindi
चंद्रहास हरु मम परितापं। रघुपति बिरह अनल संजातं।।
- RCM 5.10.6Open verse →
सीतल निसित बहसि बर धारा। कह सीता हरु मम दुख भारा।।
अर्थ · Hindi
सीतल निसित बहसि बर धारा। कह सीता हरु मम दुख भारा।।
- RCM 5.10.7Open verse →
सुनत बचन पुनि मारन धावा। मयतनयाँ कहि नीति बुझावा।।
अर्थ · Hindi
सुनत बचन पुनि मारन धावा। मयतनयाँ कहि नीति बुझावा।।
- RCM 5.10.8Open verse →
कहेसि सकल निसिचरिन्ह बोलाई। सीतहि बहु बिधि त्रासहु जाई।।
अर्थ · Hindi
कहेसि सकल निसिचरिन्ह बोलाई। सीतहि बहु बिधि त्रासहु जाई।।
- RCM 5.10.9Open verse →
मास दिवस महुँ कहा न माना। तौ मैं मारबि काढ़ि कृपाना।।
अर्थ · Hindi
मास दिवस महुँ कहा न माना। तौ मैं मारबि काढ़ि कृपाना।।
- RCM 5.10.10Open verse →
भवन गयउ दसकंधर इहाँ पिसाचिनि बृंद।
अर्थ · Hindi
भवन गयउ दसकंधर इहाँ पिसाचिनि बृंद।
- RCM 5.10.11Open verse →
सीतहि त्रास देखावहि धरहिं रूप बहु मंद।।10।।
अर्थ · Hindi
सीतहि त्रास देखावहि धरहिं रूप बहु मंद।।10।।
- RCM 5.11.1Open verse →
त्रिजटा नाम राच्छसी एका। राम चरन रति निपुन बिबेका।।
अर्थ · Hindi
त्रिजटा नाम राच्छसी एका। राम चरन रति निपुन बिबेका।।
- RCM 5.11.2Open verse →
सबन्हौ बोलि सुनाएसि सपना। सीतहि सेइ करहु हित अपना।।
अर्थ · Hindi
सबन्हौ बोलि सुनाएसि सपना। सीतहि सेइ करहु हित अपना।।
- RCM 5.11.3Open verse →
सपनें बानर लंका जारी। जातुधान सेना सब मारी।।
अर्थ · Hindi
सपनें बानर लंका जारी। जातुधान सेना सब मारी।।
- RCM 5.11.4Open verse →
खर आरूढ़ नगन दससीसा। मुंडित सिर खंडित भुज बीसा।।
अर्थ · Hindi
खर आरूढ़ नगन दससीसा। मुंडित सिर खंडित भुज बीसा।।
- RCM 5.11.5Open verse →
एहि बिधि सो दच्छिन दिसि जाई। लंका मनहुँ बिभीषन पाई।।
अर्थ · Hindi
एहि बिधि सो दच्छिन दिसि जाई। लंका मनहुँ बिभीषन पाई।।
- RCM 5.11.6Open verse →
नगर फिरी रघुबीर दोहाई। तब प्रभु सीता बोलि पठाई।।
अर्थ · Hindi
नगर फिरी रघुबीर दोहाई। तब प्रभु सीता बोलि पठाई।।
- RCM 5.11.7Open verse →
यह सपना में कहउँ पुकारी। होइहि सत्य गएँ दिन चारी।।
अर्थ · Hindi
यह सपना में कहउँ पुकारी। होइहि सत्य गएँ दिन चारी।।
- RCM 5.11.8Open verse →
तासु बचन सुनि ते सब डरीं। जनकसुता के चरनन्हि परीं।।
अर्थ · Hindi
तासु बचन सुनि ते सब डरीं। जनकसुता के चरनन्हि परीं।।
- RCM 5.11.9Open verse →
जहँ तहँ गईं सकल तब सीता कर मन सोच।
अर्थ · Hindi
जहँ तहँ गईं सकल तब सीता कर मन सोच।
- RCM 5.11.10Open verse →
मास दिवस बीतें मोहि मारिहि निसिचर पोच।।11।।
अर्थ · Hindi
मास दिवस बीतें मोहि मारिहि निसिचर पोच।।11।।
- RCM 5.12.1Open verse →
त्रिजटा सन बोली कर जोरी। मातु बिपति संगिनि तैं मोरी।।
अर्थ · Hindi
त्रिजटा सन बोली कर जोरी। मातु बिपति संगिनि तैं मोरी।।
- RCM 5.12.2Open verse →
तजौं देह करु बेगि उपाई। दुसहु बिरहु अब नहिं सहि जाई।।
अर्थ · Hindi
तजौं देह करु बेगि उपाई। दुसहु बिरहु अब नहिं सहि जाई।।
- RCM 5.12.3Open verse →
आनि काठ रचु चिता बनाई। मातु अनल पुनि देहि लगाई।।
अर्थ · Hindi
आनि काठ रचु चिता बनाई। मातु अनल पुनि देहि लगाई।।
- RCM 5.12.4Open verse →
सत्य करहि मम प्रीति सयानी। सुनै को श्रवन सूल सम बानी।।
अर्थ · Hindi
सत्य करहि मम प्रीति सयानी। सुनै को श्रवन सूल सम बानी।।
- RCM 5.12.5Open verse →
सुनत बचन पद गहि समुझाएसि। प्रभु प्रताप बल सुजसु सुनाएसि।।
अर्थ · Hindi
सुनत बचन पद गहि समुझाएसि। प्रभु प्रताप बल सुजसु सुनाएसि।।
- RCM 5.12.6Open verse →
निसि न अनल मिल सुनु सुकुमारी। अस कहि सो निज भवन सिधारी।।
अर्थ · Hindi
निसि न अनल मिल सुनु सुकुमारी। अस कहि सो निज भवन सिधारी।।
- RCM 5.12.7Open verse →
कह सीता बिधि भा प्रतिकूला। मिलहि न पावक मिटिहि न सूला।।
अर्थ · Hindi
कह सीता बिधि भा प्रतिकूला। मिलहि न पावक मिटिहि न सूला।।
- RCM 5.12.8Open verse →
देखिअत प्रगट गगन अंगारा। अवनि न आवत एकउ तारा।।
अर्थ · Hindi
देखिअत प्रगट गगन अंगारा। अवनि न आवत एकउ तारा।।
- RCM 5.12.9Open verse →
पावकमय ससि स्त्रवत न आगी। मानहुँ मोहि जानि हतभागी।।
अर्थ · Hindi
पावकमय ससि स्त्रवत न आगी। मानहुँ मोहि जानि हतभागी।।
- RCM 5.12.10Open verse →
सुनहि बिनय मम बिटप असोका। सत्य नाम करु हरु मम सोका।।
अर्थ · Hindi
सुनहि बिनय मम बिटप असोका। सत्य नाम करु हरु मम सोका।।
- RCM 5.12.11Open verse →
नूतन किसलय अनल समाना। देहि अगिनि जनि करहि निदाना।।
अर्थ · Hindi
नूतन किसलय अनल समाना। देहि अगिनि जनि करहि निदाना।।
- RCM 5.12.12Open verse →
देखि परम बिरहाकुल सीता। सो छन कपिहि कलप सम बीता।।
अर्थ · Hindi
देखि परम बिरहाकुल सीता। सो छन कपिहि कलप सम बीता।।
- RCM 5.12.13Open verse →
कपि करि हृदयँ बिचार दीन्हि मुद्रिका डारी तब।
अर्थ · Hindi
कपि करि हृदयँ बिचार दीन्हि मुद्रिका डारी तब।
- RCM 5.12.14Open verse →
जनु असोक अंगार दीन्हि हरषि उठि कर गहेउ।।12।।
अर्थ · Hindi
जनु असोक अंगार दीन्हि हरषि उठि कर गहेउ।।12।।
- RCM 5.13.1Open verse →
तब देखी मुद्रिका मनोहर। राम नाम अंकित अति सुंदर।।
अर्थ · Hindi
तब देखी मुद्रिका मनोहर। राम नाम अंकित अति सुंदर।।
- RCM 5.13.2Open verse →
चकित चितव मुदरी पहिचानी। हरष बिषाद हृदयँ अकुलानी।।
अर्थ · Hindi
चकित चितव मुदरी पहिचानी। हरष बिषाद हृदयँ अकुलानी।।
- RCM 5.13.3Open verse →
जीति को सकइ अजय रघुराई। माया तें असि रचि नहिं जाई।।
अर्थ · Hindi
जीति को सकइ अजय रघुराई। माया तें असि रचि नहिं जाई।।
- RCM 5.13.4Open verse →
सीता मन बिचार कर नाना। मधुर बचन बोलेउ हनुमाना।।
अर्थ · Hindi
सीता मन बिचार कर नाना। मधुर बचन बोलेउ हनुमाना।।
- RCM 5.13.5Open verse →
रामचंद्र गुन बरनैं लागा। सुनतहिं सीता कर दुख भागा।।
अर्थ · Hindi
रामचंद्र गुन बरनैं लागा। सुनतहिं सीता कर दुख भागा।।
- RCM 5.13.6Open verse →
लागीं सुनैं श्रवन मन लाई। आदिहु तें सब कथा सुनाई।।
अर्थ · Hindi
लागीं सुनैं श्रवन मन लाई। आदिहु तें सब कथा सुनाई।।
- RCM 5.13.7Open verse →
श्रवनामृत जेहिं कथा सुहाई। कहि सो प्रगट होति किन भाई।।
अर्थ · Hindi
श्रवनामृत जेहिं कथा सुहाई। कहि सो प्रगट होति किन भाई।।
- RCM 5.13.8Open verse →
तब हनुमंत निकट चलि गयऊ। फिरि बैंठीं मन बिसमय भयऊ।।
अर्थ · Hindi
तब हनुमंत निकट चलि गयऊ। फिरि बैंठीं मन बिसमय भयऊ।।
- RCM 5.13.9Open verse →
राम दूत मैं मातु जानकी। सत्य सपथ करुनानिधान की।।
अर्थ · Hindi
राम दूत मैं मातु जानकी। सत्य सपथ करुनानिधान की।।
- RCM 5.13.10Open verse →
यह मुद्रिका मातु मैं आनी। दीन्हि राम तुम्ह कहँ सहिदानी।।
अर्थ · Hindi
यह मुद्रिका मातु मैं आनी। दीन्हि राम तुम्ह कहँ सहिदानी।।
- RCM 5.13.11Open verse →
नर बानरहि संग कहु कैसें। कहि कथा भइ संगति जैसें।।
अर्थ · Hindi
नर बानरहि संग कहु कैसें। कहि कथा भइ संगति जैसें।।
- RCM 5.13.12Open verse →
कपि के बचन सप्रेम सुनि उपजा मन बिस्वास।।
अर्थ · Hindi
कपि के बचन सप्रेम सुनि उपजा मन बिस्वास।।
- RCM 5.13.13Open verse →
जाना मन क्रम बचन यह कृपासिंधु कर दास।।13।।
अर्थ · Hindi
जाना मन क्रम बचन यह कृपासिंधु कर दास।।13।।
- RCM 5.14.1Open verse →
हरिजन जानि प्रीति अति गाढ़ी। सजल नयन पुलकावलि बाढ़ी।।
अर्थ · Hindi
हरिजन जानि प्रीति अति गाढ़ी। सजल नयन पुलकावलि बाढ़ी।।
- RCM 5.14.2Open verse →
बूड़त बिरह जलधि हनुमाना। भयउ तात मों कहुँ जलजाना।।
अर्थ · Hindi
बूड़त बिरह जलधि हनुमाना। भयउ तात मों कहुँ जलजाना।।
- RCM 5.14.3Open verse →
अब कहु कुसल जाउँ बलिहारी। अनुज सहित सुख भवन खरारी।।
अर्थ · Hindi
अब कहु कुसल जाउँ बलिहारी। अनुज सहित सुख भवन खरारी।।
- RCM 5.14.4Open verse →
कोमलचित कृपाल रघुराई। कपि केहि हेतु धरी निठुराई।।
अर्थ · Hindi
कोमलचित कृपाल रघुराई। कपि केहि हेतु धरी निठुराई।।
- RCM 5.14.5Open verse →
सहज बानि सेवक सुख दायक। कबहुँक सुरति करत रघुनायक।।
अर्थ · Hindi
सहज बानि सेवक सुख दायक। कबहुँक सुरति करत रघुनायक।।
- RCM 5.14.6Open verse →
कबहुँ नयन मम सीतल ताता। होइहहि निरखि स्याम मृदु गाता।।
अर्थ · Hindi
कबहुँ नयन मम सीतल ताता। होइहहि निरखि स्याम मृदु गाता।।
- RCM 5.14.7Open verse →
बचनु न आव नयन भरे बारी। अहह नाथ हौं निपट बिसारी।।
अर्थ · Hindi
बचनु न आव नयन भरे बारी। अहह नाथ हौं निपट बिसारी।।
- RCM 5.14.8Open verse →
देखि परम बिरहाकुल सीता। बोला कपि मृदु बचन बिनीता।।
अर्थ · Hindi
देखि परम बिरहाकुल सीता। बोला कपि मृदु बचन बिनीता।।
- RCM 5.14.9Open verse →
मातु कुसल प्रभु अनुज समेता। तव दुख दुखी सुकृपा निकेता।।
अर्थ · Hindi
मातु कुसल प्रभु अनुज समेता। तव दुख दुखी सुकृपा निकेता।।
- RCM 5.14.10Open verse →
जनि जननी मानहु जियँ ऊना। तुम्ह ते प्रेमु राम कें दूना।।
अर्थ · Hindi
जनि जननी मानहु जियँ ऊना। तुम्ह ते प्रेमु राम कें दूना।।
- RCM 5.14.11Open verse →
रघुपति कर संदेसु अब सुनु जननी धरि धीर।
अर्थ · Hindi
रघुपति कर संदेसु अब सुनु जननी धरि धीर।
- RCM 5.14.12Open verse →
अस कहि कपि गद गद भयउ भरे बिलोचन नीर।।14।।
अर्थ · Hindi
अस कहि कपि गद गद भयउ भरे बिलोचन नीर।।14।।
- RCM 5.15.1Open verse →
कहेउ राम बियोग तव सीता। मो कहुँ सकल भए बिपरीता।।
अर्थ · Hindi
कहेउ राम बियोग तव सीता। मो कहुँ सकल भए बिपरीता।।
- RCM 5.15.2Open verse →
नव तरु किसलय मनहुँ कृसानू। कालनिसा सम निसि ससि भानू।।
अर्थ · Hindi
नव तरु किसलय मनहुँ कृसानू। कालनिसा सम निसि ससि भानू।।
- RCM 5.15.3Open verse →
कुबलय बिपिन कुंत बन सरिसा। बारिद तपत तेल जनु बरिसा।।
अर्थ · Hindi
कुबलय बिपिन कुंत बन सरिसा। बारिद तपत तेल जनु बरिसा।।
- RCM 5.15.4Open verse →
जे हित रहे करत तेइ पीरा। उरग स्वास सम त्रिबिध समीरा।।
अर्थ · Hindi
जे हित रहे करत तेइ पीरा। उरग स्वास सम त्रिबिध समीरा।।
- RCM 5.15.5Open verse →
कहेहू तें कछु दुख घटि होई। काहि कहौं यह जान न कोई।।
अर्थ · Hindi
कहेहू तें कछु दुख घटि होई। काहि कहौं यह जान न कोई।।
- RCM 5.15.6Open verse →
तत्व प्रेम कर मम अरु तोरा। जानत प्रिया एकु मनु मोरा।।
अर्थ · Hindi
तत्व प्रेम कर मम अरु तोरा। जानत प्रिया एकु मनु मोरा।।
- RCM 5.15.7Open verse →
सो मनु सदा रहत तोहि पाहीं। जानु प्रीति रसु एतेनहि माहीं।।
अर्थ · Hindi
सो मनु सदा रहत तोहि पाहीं। जानु प्रीति रसु एतेनहि माहीं।।
- RCM 5.15.8Open verse →
प्रभु संदेसु सुनत बैदेही। मगन प्रेम तन सुधि नहिं तेही।।
अर्थ · Hindi
प्रभु संदेसु सुनत बैदेही। मगन प्रेम तन सुधि नहिं तेही।।
- RCM 5.15.9Open verse →
कह कपि हृदयँ धीर धरु माता। सुमिरु राम सेवक सुखदाता।।
अर्थ · Hindi
कह कपि हृदयँ धीर धरु माता। सुमिरु राम सेवक सुखदाता।।
- RCM 5.15.10Open verse →
उर आनहु रघुपति प्रभुताई। सुनि मम बचन तजहु कदराई।।
अर्थ · Hindi
उर आनहु रघुपति प्रभुताई। सुनि मम बचन तजहु कदराई।।
- RCM 5.15.11Open verse →
निसिचर निकर पतंग सम रघुपति बान कृसानु।
अर्थ · Hindi
निसिचर निकर पतंग सम रघुपति बान कृसानु।
- RCM 5.15.12Open verse →
जननी हृदयँ धीर धरु जरे निसाचर जानु।।15।।
अर्थ · Hindi
जननी हृदयँ धीर धरु जरे निसाचर जानु।।15।।
- RCM 5.16.1Open verse →
जौं रघुबीर होति सुधि पाई। करते नहिं बिलंबु रघुराई।।
अर्थ · Hindi
जौं रघुबीर होति सुधि पाई। करते नहिं बिलंबु रघुराई।।
- RCM 5.16.2Open verse →
रामबान रबि उएँ जानकी। तम बरूथ कहँ जातुधान की।।
अर्थ · Hindi
रामबान रबि उएँ जानकी। तम बरूथ कहँ जातुधान की।।
- RCM 5.16.3Open verse →
अबहिं मातु मैं जाउँ लवाई। प्रभु आयसु नहिं राम दोहाई।।
अर्थ · Hindi
अबहिं मातु मैं जाउँ लवाई। प्रभु आयसु नहिं राम दोहाई।।
- RCM 5.16.4Open verse →
कछुक दिवस जननी धरु धीरा। कपिन्ह सहित अइहहिं रघुबीरा।।
अर्थ · Hindi
कछुक दिवस जननी धरु धीरा। कपिन्ह सहित अइहहिं रघुबीरा।।
- RCM 5.16.5Open verse →
निसिचर मारि तोहि लै जैहहिं। तिहुँ पुर नारदादि जसु गैहहिं।।
अर्थ · Hindi
निसिचर मारि तोहि लै जैहहिं। तिहुँ पुर नारदादि जसु गैहहिं।।
- RCM 5.16.6Open verse →
हैं सुत कपि सब तुम्हहि समाना। जातुधान अति भट बलवाना।।
अर्थ · Hindi
हैं सुत कपि सब तुम्हहि समाना। जातुधान अति भट बलवाना।।
- RCM 5.16.7Open verse →
मोरें हृदय परम संदेहा। सुनि कपि प्रगट कीन्ह निज देहा।।
अर्थ · Hindi
मोरें हृदय परम संदेहा। सुनि कपि प्रगट कीन्ह निज देहा।।
- RCM 5.16.8Open verse →
कनक भूधराकार सरीरा। समर भयंकर अतिबल बीरा।।
अर्थ · Hindi
कनक भूधराकार सरीरा। समर भयंकर अतिबल बीरा।।
- RCM 5.16.9Open verse →
सीता मन भरोस तब भयऊ। पुनि लघु रूप पवनसुत लयऊ।।
अर्थ · Hindi
सीता मन भरोस तब भयऊ। पुनि लघु रूप पवनसुत लयऊ।।
- RCM 5.16.10Open verse →
सुनु माता साखामृग नहिं बल बुद्धि बिसाल।
अर्थ · Hindi
सुनु माता साखामृग नहिं बल बुद्धि बिसाल।
- RCM 5.16.11Open verse →
प्रभु प्रताप तें गरुड़हि खाइ परम लघु ब्याल।।16।।
अर्थ · Hindi
प्रभु प्रताप तें गरुड़हि खाइ परम लघु ब्याल।।16।।
- RCM 5.17.1Open verse →
मन संतोष सुनत कपि बानी। भगति प्रताप तेज बल सानी।।
अर्थ · Hindi
मन संतोष सुनत कपि बानी। भगति प्रताप तेज बल सानी।।
- RCM 5.17.2Open verse →
आसिष दीन्हि रामप्रिय जाना। होहु तात बल सील निधाना।।
अर्थ · Hindi
आसिष दीन्हि रामप्रिय जाना। होहु तात बल सील निधाना।।
- RCM 5.17.3Open verse →
अजर अमर गुननिधि सुत होहू। करहुँ बहुत रघुनायक छोहू।।
अर्थ · Hindi
अजर अमर गुननिधि सुत होहू। करहुँ बहुत रघुनायक छोहू।।
- RCM 5.17.4Open verse →
करहुँ कृपा प्रभु अस सुनि काना। निर्भर प्रेम मगन हनुमाना।।
अर्थ · Hindi
करहुँ कृपा प्रभु अस सुनि काना। निर्भर प्रेम मगन हनुमाना।।
- RCM 5.17.5Open verse →
बार बार नाएसि पद सीसा। बोला बचन जोरि कर कीसा।।
अर्थ · Hindi
बार बार नाएसि पद सीसा। बोला बचन जोरि कर कीसा।।
- RCM 5.17.6Open verse →
अब कृतकृत्य भयउँ मैं माता। आसिष तव अमोघ बिख्याता।।
अर्थ · Hindi
अब कृतकृत्य भयउँ मैं माता। आसिष तव अमोघ बिख्याता।।
- RCM 5.17.7Open verse →
सुनहु मातु मोहि अतिसय भूखा। लागि देखि सुंदर फल रूखा।।
अर्थ · Hindi
सुनहु मातु मोहि अतिसय भूखा। लागि देखि सुंदर फल रूखा।।
- RCM 5.17.8Open verse →
सुनु सुत करहिं बिपिन रखवारी। परम सुभट रजनीचर भारी।।
अर्थ · Hindi
सुनु सुत करहिं बिपिन रखवारी। परम सुभट रजनीचर भारी।।
- RCM 5.17.9Open verse →
तिन्ह कर भय माता मोहि नाहीं। जौं तुम्ह सुख मानहु मन माहीं।।
अर्थ · Hindi
तिन्ह कर भय माता मोहि नाहीं। जौं तुम्ह सुख मानहु मन माहीं।।
- RCM 5.17.10Open verse →
देखि बुद्धि बल निपुन कपि कहेउ जानकीं जाहु।
अर्थ · Hindi
देखि बुद्धि बल निपुन कपि कहेउ जानकीं जाहु।
- RCM 5.17.11Open verse →
रघुपति चरन हृदयँ धरि तात मधुर फल खाहु।।17।।
अर्थ · Hindi
रघुपति चरन हृदयँ धरि तात मधुर फल खाहु।।17।।
- RCM 5.18.1Open verse →
चलेउ नाइ सिरु पैठेउ बागा। फल खाएसि तरु तोरैं लागा।।
अर्थ · Hindi
चलेउ नाइ सिरु पैठेउ बागा। फल खाएसि तरु तोरैं लागा।।
- RCM 5.18.2Open verse →
रहे तहाँ बहु भट रखवारे। कछु मारेसि कछु जाइ पुकारे।।
अर्थ · Hindi
रहे तहाँ बहु भट रखवारे। कछु मारेसि कछु जाइ पुकारे।।
- RCM 5.18.3Open verse →
नाथ एक आवा कपि भारी। तेहिं असोक बाटिका उजारी।।
अर्थ · Hindi
नाथ एक आवा कपि भारी। तेहिं असोक बाटिका उजारी।।
- RCM 5.18.4Open verse →
खाएसि फल अरु बिटप उपारे। रच्छक मर्दि मर्दि महि डारे।।
अर्थ · Hindi
खाएसि फल अरु बिटप उपारे। रच्छक मर्दि मर्दि महि डारे।।
- RCM 5.18.5Open verse →
सुनि रावन पठए भट नाना। तिन्हहि देखि गर्जेउ हनुमाना।।
अर्थ · Hindi
सुनि रावन पठए भट नाना। तिन्हहि देखि गर्जेउ हनुमाना।।
- RCM 5.18.6Open verse →
सब रजनीचर कपि संघारे। गए पुकारत कछु अधमारे।।
अर्थ · Hindi
सब रजनीचर कपि संघारे। गए पुकारत कछु अधमारे।।
- RCM 5.18.7Open verse →
पुनि पठयउ तेहिं अच्छकुमारा। चला संग लै सुभट अपारा।।
अर्थ · Hindi
पुनि पठयउ तेहिं अच्छकुमारा। चला संग लै सुभट अपारा।।
- RCM 5.18.8Open verse →
आवत देखि बिटप गहि तर्जा। ताहि निपाति महाधुनि गर्जा।।
अर्थ · Hindi
आवत देखि बिटप गहि तर्जा। ताहि निपाति महाधुनि गर्जा।।
- RCM 5.18.9Open verse →
कछु मारेसि कछु मर्देसि कछु मिलएसि धरि धूरि।
अर्थ · Hindi
कछु मारेसि कछु मर्देसि कछु मिलएसि धरि धूरि।
- RCM 5.18.10Open verse →
कछु पुनि जाइ पुकारे प्रभु मर्कट बल भूरि।।18।।
अर्थ · Hindi
कछु पुनि जाइ पुकारे प्रभु मर्कट बल भूरि।।18।।
- RCM 5.19.1Open verse →
सुनि सुत बध लंकेस रिसाना। पठएसि मेघनाद बलवाना।।
अर्थ · Hindi
सुनि सुत बध लंकेस रिसाना। पठएसि मेघनाद बलवाना।।
- RCM 5.19.2Open verse →
मारसि जनि सुत बांधेसु ताही। देखिअ कपिहि कहाँ कर आही।।
अर्थ · Hindi
मारसि जनि सुत बांधेसु ताही। देखिअ कपिहि कहाँ कर आही।।
- RCM 5.19.3Open verse →
चला इंद्रजित अतुलित जोधा। बंधु निधन सुनि उपजा क्रोधा।।
अर्थ · Hindi
चला इंद्रजित अतुलित जोधा। बंधु निधन सुनि उपजा क्रोधा।।
- RCM 5.19.4Open verse →
कपि देखा दारुन भट आवा। कटकटाइ गर्जा अरु धावा।।
अर्थ · Hindi
कपि देखा दारुन भट आवा। कटकटाइ गर्जा अरु धावा।।
- RCM 5.19.5Open verse →
अति बिसाल तरु एक उपारा। बिरथ कीन्ह लंकेस कुमारा।।
अर्थ · Hindi
अति बिसाल तरु एक उपारा। बिरथ कीन्ह लंकेस कुमारा।।
- RCM 5.19.6Open verse →
रहे महाभट ताके संगा। गहि गहि कपि मर्दइ निज अंगा।।
अर्थ · Hindi
रहे महाभट ताके संगा। गहि गहि कपि मर्दइ निज अंगा।।
- RCM 5.19.7Open verse →
तिन्हहि निपाति ताहि सन बाजा। भिरे जुगल मानहुँ गजराजा।
अर्थ · Hindi
तिन्हहि निपाति ताहि सन बाजा। भिरे जुगल मानहुँ गजराजा।
- RCM 5.19.8Open verse →
मुठिका मारि चढ़ा तरु जाई। ताहि एक छन मुरुछा आई।।
अर्थ · Hindi
मुठिका मारि चढ़ा तरु जाई। ताहि एक छन मुरुछा आई।।
- RCM 5.19.9Open verse →
उठि बहोरि कीन्हिसि बहु माया। जीति न जाइ प्रभंजन जाया।।
अर्थ · Hindi
उठि बहोरि कीन्हिसि बहु माया। जीति न जाइ प्रभंजन जाया।।
- RCM 5.19.10Open verse →
ब्रह्म अस्त्र तेहिं साँधा कपि मन कीन्ह बिचार।
अर्थ · Hindi
ब्रह्म अस्त्र तेहिं साँधा कपि मन कीन्ह बिचार।
- RCM 5.19.11Open verse →
जौं न ब्रह्मसर मानउँ महिमा मिटइ अपार।।19।।
अर्थ · Hindi
जौं न ब्रह्मसर मानउँ महिमा मिटइ अपार।।19।।
- RCM 5.20.1Open verse →
ब्रह्मबान कपि कहुँ तेहि मारा। परतिहुँ बार कटकु संघारा।।
अर्थ · Hindi
ब्रह्मबान कपि कहुँ तेहि मारा। परतिहुँ बार कटकु संघारा।।
- RCM 5.20.2Open verse →
तेहि देखा कपि मुरुछित भयऊ। नागपास बाँधेसि लै गयऊ।।
अर्थ · Hindi
तेहि देखा कपि मुरुछित भयऊ। नागपास बाँधेसि लै गयऊ।।
- RCM 5.20.3Open verse →
जासु नाम जपि सुनहु भवानी। भव बंधन काटहिं नर ग्यानी।।
अर्थ · Hindi
जासु नाम जपि सुनहु भवानी। भव बंधन काटहिं नर ग्यानी।।
- RCM 5.20.4Open verse →
तासु दूत कि बंध तरु आवा। प्रभु कारज लगि कपिहिं बँधावा।।
अर्थ · Hindi
तासु दूत कि बंध तरु आवा। प्रभु कारज लगि कपिहिं बँधावा।।
- RCM 5.20.5Open verse →
कपि बंधन सुनि निसिचर धाए। कौतुक लागि सभाँ सब आए।।
अर्थ · Hindi
कपि बंधन सुनि निसिचर धाए। कौतुक लागि सभाँ सब आए।।
- RCM 5.20.6Open verse →
दसमुख सभा दीखि कपि जाई। कहि न जाइ कछु अति प्रभुताई।।
अर्थ · Hindi
दसमुख सभा दीखि कपि जाई। कहि न जाइ कछु अति प्रभुताई।।
- RCM 5.20.7Open verse →
कर जोरें सुर दिसिप बिनीता। भृकुटि बिलोकत सकल सभीता।।
अर्थ · Hindi
कर जोरें सुर दिसिप बिनीता। भृकुटि बिलोकत सकल सभीता।।
- RCM 5.20.8Open verse →
देखि प्रताप न कपि मन संका। जिमि अहिगन महुँ गरुड़ असंका।।
अर्थ · Hindi
देखि प्रताप न कपि मन संका। जिमि अहिगन महुँ गरुड़ असंका।।
- RCM 5.20.9Open verse →
कपिहि बिलोकि दसानन बिहसा कहि दुर्बाद।
अर्थ · Hindi
कपिहि बिलोकि दसानन बिहसा कहि दुर्बाद।
- RCM 5.20.10Open verse →
सुत बध सुरति कीन्हि पुनि उपजा हृदयँ बिषाद।।20।।
अर्थ · Hindi
सुत बध सुरति कीन्हि पुनि उपजा हृदयँ बिषाद।।20।।
- RCM 5.21.1Open verse →
कह लंकेस कवन तैं कीसा। केहिं के बल घालेहि बन खीसा।।
अर्थ · Hindi
कह लंकेस कवन तैं कीसा। केहिं के बल घालेहि बन खीसा।।
- RCM 5.21.2Open verse →
की धौं श्रवन सुनेहि नहिं मोही। देखउँ अति असंक सठ तोही।।
अर्थ · Hindi
की धौं श्रवन सुनेहि नहिं मोही। देखउँ अति असंक सठ तोही।।
- RCM 5.21.3Open verse →
मारे निसिचर केहिं अपराधा। कहु सठ तोहि न प्रान कइ बाधा।।
अर्थ · Hindi
मारे निसिचर केहिं अपराधा। कहु सठ तोहि न प्रान कइ बाधा।।
- RCM 5.21.4Open verse →
सुन रावन ब्रह्मांड निकाया। पाइ जासु बल बिरचित माया।।
अर्थ · Hindi
सुन रावन ब्रह्मांड निकाया। पाइ जासु बल बिरचित माया।।
- RCM 5.21.5Open verse →
जाकें बल बिरंचि हरि ईसा। पालत सृजत हरत दससीसा।
अर्थ · Hindi
जाकें बल बिरंचि हरि ईसा। पालत सृजत हरत दससीसा।
- RCM 5.21.6Open verse →
जा बल सीस धरत सहसानन। अंडकोस समेत गिरि कानन।।
अर्थ · Hindi
जा बल सीस धरत सहसानन। अंडकोस समेत गिरि कानन।।
- RCM 5.21.7Open verse →
धरइ जो बिबिध देह सुरत्राता। तुम्ह ते सठन्ह सिखावनु दाता।
अर्थ · Hindi
धरइ जो बिबिध देह सुरत्राता। तुम्ह ते सठन्ह सिखावनु दाता।
- RCM 5.21.8Open verse →
हर कोदंड कठिन जेहि भंजा। तेहि समेत नृप दल मद गंजा।।
अर्थ · Hindi
हर कोदंड कठिन जेहि भंजा। तेहि समेत नृप दल मद गंजा।।
- RCM 5.21.9Open verse →
खर दूषन त्रिसिरा अरु बाली। बधे सकल अतुलित बलसाली।।
अर्थ · Hindi
खर दूषन त्रिसिरा अरु बाली। बधे सकल अतुलित बलसाली।।
- RCM 5.21.10Open verse →
जाके बल लवलेस तें जितेहु चराचर झारि।
अर्थ · Hindi
जाके बल लवलेस तें जितेहु चराचर झारि।
- RCM 5.21.11Open verse →
तासु दूत मैं जा करि हरि आनेहु प्रिय नारि।।21।।
अर्थ · Hindi
तासु दूत मैं जा करि हरि आनेहु प्रिय नारि।।21।।
- RCM 5.22.1Open verse →
जानउँ मैं तुम्हारि प्रभुताई। सहसबाहु सन परी लराई।।
अर्थ · Hindi
जानउँ मैं तुम्हारि प्रभुताई। सहसबाहु सन परी लराई।।
- RCM 5.22.2Open verse →
समर बालि सन करि जसु पावा। सुनि कपि बचन बिहसि बिहरावा।।
अर्थ · Hindi
समर बालि सन करि जसु पावा। सुनि कपि बचन बिहसि बिहरावा।।
- RCM 5.22.3Open verse →
खायउँ फल प्रभु लागी भूँखा। कपि सुभाव तें तोरेउँ रूखा।।
अर्थ · Hindi
खायउँ फल प्रभु लागी भूँखा। कपि सुभाव तें तोरेउँ रूखा।।
- RCM 5.22.4Open verse →
सब कें देह परम प्रिय स्वामी। मारहिं मोहि कुमारग गामी।।
अर्थ · Hindi
सब कें देह परम प्रिय स्वामी। मारहिं मोहि कुमारग गामी।।
- RCM 5.22.5Open verse →
जिन्ह मोहि मारा ते मैं मारे। तेहि पर बाँधेउ तनयँ तुम्हारे।।
अर्थ · Hindi
जिन्ह मोहि मारा ते मैं मारे। तेहि पर बाँधेउ तनयँ तुम्हारे।।
- RCM 5.22.6Open verse →
मोहि न कछु बाँधे कइ लाजा। कीन्ह चहउँ निज प्रभु कर काजा।।
अर्थ · Hindi
मोहि न कछु बाँधे कइ लाजा। कीन्ह चहउँ निज प्रभु कर काजा।।
- RCM 5.22.7Open verse →
बिनती करउँ जोरि कर रावन। सुनहु मान तजि मोर सिखावन।।
अर्थ · Hindi
बिनती करउँ जोरि कर रावन। सुनहु मान तजि मोर सिखावन।।
- RCM 5.22.8Open verse →
देखहु तुम्ह निज कुलहि बिचारी। भ्रम तजि भजहु भगत भय हारी।।
अर्थ · Hindi
देखहु तुम्ह निज कुलहि बिचारी। भ्रम तजि भजहु भगत भय हारी।।
- RCM 5.22.9Open verse →
जाकें डर अति काल डेराई। जो सुर असुर चराचर खाई।।
अर्थ · Hindi
जाकें डर अति काल डेराई। जो सुर असुर चराचर खाई।।
- RCM 5.22.10Open verse →
तासों बयरु कबहुँ नहिं कीजै। मोरे कहें जानकी दीजै।।
अर्थ · Hindi
तासों बयरु कबहुँ नहिं कीजै। मोरे कहें जानकी दीजै।।
- RCM 5.22.11Open verse →
प्रनतपाल रघुनायक करुना सिंधु खरारि।
अर्थ · Hindi
प्रनतपाल रघुनायक करुना सिंधु खरारि।
- RCM 5.22.12Open verse →
गएँ सरन प्रभु राखिहैं तव अपराध बिसारि।।22।।
अर्थ · Hindi
गएँ सरन प्रभु राखिहैं तव अपराध बिसारि।।22।।
- RCM 5.23.1Open verse →
राम चरन पंकज उर धरहू। लंका अचल राज तुम्ह करहू।।
अर्थ · Hindi
राम चरन पंकज उर धरहू। लंका अचल राज तुम्ह करहू।।
- RCM 5.23.2Open verse →
रिषि पुलिस्त जसु बिमल मंयका। तेहि ससि महुँ जनि होहु कलंका।।
अर्थ · Hindi
रिषि पुलिस्त जसु बिमल मंयका। तेहि ससि महुँ जनि होहु कलंका।।
- RCM 5.23.3Open verse →
राम नाम बिनु गिरा न सोहा। देखु बिचारि त्यागि मद मोहा।।
अर्थ · Hindi
राम नाम बिनु गिरा न सोहा। देखु बिचारि त्यागि मद मोहा।।
- RCM 5.23.4Open verse →
बसन हीन नहिं सोह सुरारी। सब भूषण भूषित बर नारी।।
अर्थ · Hindi
बसन हीन नहिं सोह सुरारी। सब भूषण भूषित बर नारी।।
- RCM 5.23.5Open verse →
राम बिमुख संपति प्रभुताई। जाइ रही पाई बिनु पाई।।
अर्थ · Hindi
राम बिमुख संपति प्रभुताई। जाइ रही पाई बिनु पाई।।
- RCM 5.23.6Open verse →
सजल मूल जिन्ह सरितन्ह नाहीं। बरषि गए पुनि तबहिं सुखाहीं।।
अर्थ · Hindi
सजल मूल जिन्ह सरितन्ह नाहीं। बरषि गए पुनि तबहिं सुखाहीं।।
- RCM 5.23.7Open verse →
सुनु दसकंठ कहउँ पन रोपी। बिमुख राम त्राता नहिं कोपी।।
अर्थ · Hindi
सुनु दसकंठ कहउँ पन रोपी। बिमुख राम त्राता नहिं कोपी।।
- RCM 5.23.8Open verse →
संकर सहस बिष्नु अज तोही। सकहिं न राखि राम कर द्रोही।।
अर्थ · Hindi
संकर सहस बिष्नु अज तोही। सकहिं न राखि राम कर द्रोही।।
- RCM 5.23.9Open verse →
मोहमूल बहु सूल प्रद त्यागहु तम अभिमान।
अर्थ · Hindi
मोहमूल बहु सूल प्रद त्यागहु तम अभिमान।
- RCM 5.23.10Open verse →
भजहु राम रघुनायक कृपा सिंधु भगवान।।23।।
अर्थ · Hindi
भजहु राम रघुनायक कृपा सिंधु भगवान।।23।।
- RCM 5.24.1Open verse →
जदपि कहि कपि अति हित बानी। भगति बिबेक बिरति नय सानी।।
अर्थ · Hindi
जदपि कहि कपि अति हित बानी। भगति बिबेक बिरति नय सानी।।
- RCM 5.24.2Open verse →
बोला बिहसि महा अभिमानी। मिला हमहि कपि गुर बड़ ग्यानी।।
अर्थ · Hindi
बोला बिहसि महा अभिमानी। मिला हमहि कपि गुर बड़ ग्यानी।।
- RCM 5.24.3Open verse →
मृत्यु निकट आई खल तोही। लागेसि अधम सिखावन मोही।।
अर्थ · Hindi
मृत्यु निकट आई खल तोही। लागेसि अधम सिखावन मोही।।
- RCM 5.24.4Open verse →
उलटा होइहि कह हनुमाना। मतिभ्रम तोर प्रगट मैं जाना।।
अर्थ · Hindi
उलटा होइहि कह हनुमाना। मतिभ्रम तोर प्रगट मैं जाना।।
- RCM 5.24.5Open verse →
सुनि कपि बचन बहुत खिसिआना। बेगि न हरहुँ मूढ़ कर प्राना।।
अर्थ · Hindi
सुनि कपि बचन बहुत खिसिआना। बेगि न हरहुँ मूढ़ कर प्राना।।
- RCM 5.24.6Open verse →
सुनत निसाचर मारन धाए। सचिवन्ह सहित बिभीषनु आए।
अर्थ · Hindi
सुनत निसाचर मारन धाए। सचिवन्ह सहित बिभीषनु आए।
- RCM 5.24.7Open verse →
नाइ सीस करि बिनय बहूता। नीति बिरोध न मारिअ दूता।।
अर्थ · Hindi
नाइ सीस करि बिनय बहूता। नीति बिरोध न मारिअ दूता।।
- RCM 5.24.8Open verse →
आन दंड कछु करिअ गोसाँई। सबहीं कहा मंत्र भल भाई।।
अर्थ · Hindi
आन दंड कछु करिअ गोसाँई। सबहीं कहा मंत्र भल भाई।।
- RCM 5.24.9Open verse →
सुनत बिहसि बोला दसकंधर। अंग भंग करि पठइअ बंदर।।
अर्थ · Hindi
सुनत बिहसि बोला दसकंधर। अंग भंग करि पठइअ बंदर।।
- RCM 5.24.10Open verse →
कपि कें ममता पूँछ पर सबहि कहउँ समुझाइ।
अर्थ · Hindi
कपि कें ममता पूँछ पर सबहि कहउँ समुझाइ।
- RCM 5.24.11Open verse →
तेल बोरि पट बाँधि पुनि पावक देहु लगाइ।।24।।
अर्थ · Hindi
तेल बोरि पट बाँधि पुनि पावक देहु लगाइ।।24।।
- RCM 5.25.1Open verse →
पूँछहीन बानर तहँ जाइहि। तब सठ निज नाथहि लइ आइहि।।
अर्थ · Hindi
पूँछहीन बानर तहँ जाइहि। तब सठ निज नाथहि लइ आइहि।।
- RCM 5.25.2Open verse →
जिन्ह कै कीन्हसि बहुत बड़ाई। देखेउँमैं तिन्ह कै प्रभुताई।।
अर्थ · Hindi
जिन्ह कै कीन्हसि बहुत बड़ाई। देखेउँमैं तिन्ह कै प्रभुताई।।
- RCM 5.25.3Open verse →
बचन सुनत कपि मन मुसुकाना। भइ सहाय सारद मैं जाना।।
अर्थ · Hindi
बचन सुनत कपि मन मुसुकाना। भइ सहाय सारद मैं जाना।।
- RCM 5.25.4Open verse →
जातुधान सुनि रावन बचना। लागे रचैं मूढ़ सोइ रचना।।
अर्थ · Hindi
जातुधान सुनि रावन बचना। लागे रचैं मूढ़ सोइ रचना।।
- RCM 5.25.5Open verse →
रहा न नगर बसन घृत तेला। बाढ़ी पूँछ कीन्ह कपि खेला।।
अर्थ · Hindi
रहा न नगर बसन घृत तेला। बाढ़ी पूँछ कीन्ह कपि खेला।।
- RCM 5.25.6Open verse →
कौतुक कहँ आए पुरबासी। मारहिं चरन करहिं बहु हाँसी।।
अर्थ · Hindi
कौतुक कहँ आए पुरबासी। मारहिं चरन करहिं बहु हाँसी।।
- RCM 5.25.7Open verse →
बाजहिं ढोल देहिं सब तारी। नगर फेरि पुनि पूँछ प्रजारी।।
अर्थ · Hindi
बाजहिं ढोल देहिं सब तारी। नगर फेरि पुनि पूँछ प्रजारी।।
- RCM 5.25.8Open verse →
पावक जरत देखि हनुमंता। भयउ परम लघु रुप तुरंता।।
अर्थ · Hindi
पावक जरत देखि हनुमंता। भयउ परम लघु रुप तुरंता।।
- RCM 5.25.9Open verse →
निबुकि चढ़ेउ कपि कनक अटारीं। भई सभीत निसाचर नारीं।।
अर्थ · Hindi
निबुकि चढ़ेउ कपि कनक अटारीं। भई सभीत निसाचर नारीं।।
- RCM 5.25.10Open verse →
हरि प्रेरित तेहि अवसर चले मरुत उनचास।
अर्थ · Hindi
हरि प्रेरित तेहि अवसर चले मरुत उनचास।
- RCM 5.25.11Open verse →
अट्टहास करि गर्ज़ा कपि बढ़ि लाग अकास।।25।।
अर्थ · Hindi
अट्टहास करि गर्ज़ा कपि बढ़ि लाग अकास।।25।।
- RCM 5.26.1Open verse →
देह बिसाल परम हरुआई। मंदिर तें मंदिर चढ़ धाई।।
अर्थ · Hindi
देह बिसाल परम हरुआई। मंदिर तें मंदिर चढ़ धाई।।
- RCM 5.26.2Open verse →
जरइ नगर भा लोग बिहाला। झपट लपट बहु कोटि कराला।।
अर्थ · Hindi
जरइ नगर भा लोग बिहाला। झपट लपट बहु कोटि कराला।।
- RCM 5.26.3Open verse →
तात मातु हा सुनिअ पुकारा। एहि अवसर को हमहि उबारा।।
अर्थ · Hindi
तात मातु हा सुनिअ पुकारा। एहि अवसर को हमहि उबारा।।
- RCM 5.26.4Open verse →
हम जो कहा यह कपि नहिं होई। बानर रूप धरें सुर कोई।।
अर्थ · Hindi
हम जो कहा यह कपि नहिं होई। बानर रूप धरें सुर कोई।।
- RCM 5.26.5Open verse →
साधु अवग्या कर फलु ऐसा। जरइ नगर अनाथ कर जैसा।।
अर्थ · Hindi
साधु अवग्या कर फलु ऐसा। जरइ नगर अनाथ कर जैसा।।
- RCM 5.26.6Open verse →
जारा नगरु निमिष एक माहीं। एक बिभीषन कर गृह नाहीं।।
अर्थ · Hindi
जारा नगरु निमिष एक माहीं। एक बिभीषन कर गृह नाहीं।।
- RCM 5.26.7Open verse →
ता कर दूत अनल जेहिं सिरिजा। जरा न सो तेहि कारन गिरिजा।।
अर्थ · Hindi
ता कर दूत अनल जेहिं सिरिजा। जरा न सो तेहि कारन गिरिजा।।
- RCM 5.26.8Open verse →
उलटि पलटि लंका सब जारी। कूदि परा पुनि सिंधु मझारी।।
अर्थ · Hindi
उलटि पलटि लंका सब जारी। कूदि परा पुनि सिंधु मझारी।।
- RCM 5.26.9Open verse →
पूँछ बुझाइ खोइ श्रम धरि लघु रूप बहोरि।
अर्थ · Hindi
पूँछ बुझाइ खोइ श्रम धरि लघु रूप बहोरि।
- RCM 5.26.10Open verse →
जनकसुता के आगें ठाढ़ भयउ कर जोरि।।26।।
अर्थ · Hindi
जनकसुता के आगें ठाढ़ भयउ कर जोरि।।26।।
- RCM 5.27.1Open verse →
मातु मोहि दीजे कछु चीन्हा। जैसें रघुनायक मोहि दीन्हा।।
अर्थ · Hindi
मातु मोहि दीजे कछु चीन्हा। जैसें रघुनायक मोहि दीन्हा।।
- RCM 5.27.2Open verse →
चूड़ामनि उतारि तब दयऊ। हरष समेत पवनसुत लयऊ।।
अर्थ · Hindi
चूड़ामनि उतारि तब दयऊ। हरष समेत पवनसुत लयऊ।।
- RCM 5.27.3Open verse →
कहेहु तात अस मोर प्रनामा। सब प्रकार प्रभु पूरनकामा।।
अर्थ · Hindi
कहेहु तात अस मोर प्रनामा। सब प्रकार प्रभु पूरनकामा।।
- RCM 5.27.4Open verse →
दीन दयाल बिरिदु संभारी। हरहु नाथ मम संकट भारी।।
अर्थ · Hindi
दीन दयाल बिरिदु संभारी। हरहु नाथ मम संकट भारी।।
- RCM 5.27.5Open verse →
तात सक्रसुत कथा सुनाएहु। बान प्रताप प्रभुहि समुझाएहु।।
अर्थ · Hindi
तात सक्रसुत कथा सुनाएहु। बान प्रताप प्रभुहि समुझाएहु।।
- RCM 5.27.6Open verse →
मास दिवस महुँ नाथु न आवा। तौ पुनि मोहि जिअत नहिं पावा।।
अर्थ · Hindi
मास दिवस महुँ नाथु न आवा। तौ पुनि मोहि जिअत नहिं पावा।।
- RCM 5.27.7Open verse →
कहु कपि केहि बिधि राखौं प्राना। तुम्हहू तात कहत अब जाना।।
अर्थ · Hindi
कहु कपि केहि बिधि राखौं प्राना। तुम्हहू तात कहत अब जाना।।
- RCM 5.27.8Open verse →
तोहि देखि सीतलि भइ छाती। पुनि मो कहुँ सोइ दिनु सो राती।।
अर्थ · Hindi
तोहि देखि सीतलि भइ छाती। पुनि मो कहुँ सोइ दिनु सो राती।।
- RCM 5.27.9Open verse →
जनकसुतहि समुझाइ करि बहु बिधि धीरजु दीन्ह।
अर्थ · Hindi
जनकसुतहि समुझाइ करि बहु बिधि धीरजु दीन्ह।
- RCM 5.27.10Open verse →
चरन कमल सिरु नाइ कपि गवनु राम पहिं कीन्ह।।27।।
अर्थ · Hindi
चरन कमल सिरु नाइ कपि गवनु राम पहिं कीन्ह।।27।।
- RCM 5.28.1Open verse →
चलत महाधुनि गर्जेसि भारी। गर्भ स्त्रवहिं सुनि निसिचर नारी।।
अर्थ · Hindi
चलत महाधुनि गर्जेसि भारी। गर्भ स्त्रवहिं सुनि निसिचर नारी।।
- RCM 5.28.2Open verse →
नाघि सिंधु एहि पारहि आवा। सबद किलकिला कपिन्ह सुनावा।।
अर्थ · Hindi
नाघि सिंधु एहि पारहि आवा। सबद किलकिला कपिन्ह सुनावा।।
- RCM 5.28.3Open verse →
हरषे सब बिलोकि हनुमाना। नूतन जन्म कपिन्ह तब जाना।।
अर्थ · Hindi
हरषे सब बिलोकि हनुमाना। नूतन जन्म कपिन्ह तब जाना।।
- RCM 5.28.4Open verse →
मुख प्रसन्न तन तेज बिराजा। कीन्हेसि रामचन्द्र कर काजा।।
अर्थ · Hindi
मुख प्रसन्न तन तेज बिराजा। कीन्हेसि रामचन्द्र कर काजा।।
- RCM 5.28.5Open verse →
मिले सकल अति भए सुखारी। तलफत मीन पाव जिमि बारी।।
अर्थ · Hindi
मिले सकल अति भए सुखारी। तलफत मीन पाव जिमि बारी।।
- RCM 5.28.6Open verse →
चले हरषि रघुनायक पासा। पूँछत कहत नवल इतिहासा।।
अर्थ · Hindi
चले हरषि रघुनायक पासा। पूँछत कहत नवल इतिहासा।।
- RCM 5.28.7Open verse →
तब मधुबन भीतर सब आए। अंगद संमत मधु फल खाए।।
अर्थ · Hindi
तब मधुबन भीतर सब आए। अंगद संमत मधु फल खाए।।
- RCM 5.28.8Open verse →
रखवारे जब बरजन लागे। मुष्टि प्रहार हनत सब भागे।।
अर्थ · Hindi
रखवारे जब बरजन लागे। मुष्टि प्रहार हनत सब भागे।।
- RCM 5.28.9Open verse →
जाइ पुकारे ते सब बन उजार जुबराज।
अर्थ · Hindi
जाइ पुकारे ते सब बन उजार जुबराज।
- RCM 5.28.10Open verse →
सुनि सुग्रीव हरष कपि करि आए प्रभु काज।।28।।
अर्थ · Hindi
सुनि सुग्रीव हरष कपि करि आए प्रभु काज।।28।।
- RCM 5.29.1Open verse →
जौं न होति सीता सुधि पाई। मधुबन के फल सकहिं कि खाई।।
अर्थ · Hindi
जौं न होति सीता सुधि पाई। मधुबन के फल सकहिं कि खाई।।
- RCM 5.29.2Open verse →
एहि बिधि मन बिचार कर राजा। आइ गए कपि सहित समाजा।।
अर्थ · Hindi
एहि बिधि मन बिचार कर राजा। आइ गए कपि सहित समाजा।।
- RCM 5.29.3Open verse →
आइ सबन्हि नावा पद सीसा। मिलेउ सबन्हि अति प्रेम कपीसा।।
अर्थ · Hindi
आइ सबन्हि नावा पद सीसा। मिलेउ सबन्हि अति प्रेम कपीसा।।
- RCM 5.29.4Open verse →
पूँछी कुसल कुसल पद देखी। राम कृपाँ भा काजु बिसेषी।।
अर्थ · Hindi
पूँछी कुसल कुसल पद देखी। राम कृपाँ भा काजु बिसेषी।।
- RCM 5.29.5Open verse →
नाथ काजु कीन्हेउ हनुमाना। राखे सकल कपिन्ह के प्राना।।
अर्थ · Hindi
नाथ काजु कीन्हेउ हनुमाना। राखे सकल कपिन्ह के प्राना।।
- RCM 5.29.6Open verse →
सुनि सुग्रीव बहुरि तेहि मिलेऊ। कपिन्ह सहित रघुपति पहिं चलेऊ।
अर्थ · Hindi
सुनि सुग्रीव बहुरि तेहि मिलेऊ। कपिन्ह सहित रघुपति पहिं चलेऊ।
- RCM 5.29.7Open verse →
राम कपिन्ह जब आवत देखा। किएँ काजु मन हरष बिसेषा।।
अर्थ · Hindi
राम कपिन्ह जब आवत देखा। किएँ काजु मन हरष बिसेषा।।
- RCM 5.29.8Open verse →
फटिक सिला बैठे द्वौ भाई। परे सकल कपि चरनन्हि जाई।।
अर्थ · Hindi
फटिक सिला बैठे द्वौ भाई। परे सकल कपि चरनन्हि जाई।।
- RCM 5.29.9Open verse →
प्रीति सहित सब भेटे रघुपति करुना पुंज।
अर्थ · Hindi
प्रीति सहित सब भेटे रघुपति करुना पुंज।
- RCM 5.29.10Open verse →
पूँछी कुसल नाथ अब कुसल देखि पद कंज।।29।।
अर्थ · Hindi
पूँछी कुसल नाथ अब कुसल देखि पद कंज।।29।।
- RCM 5.30.1Open verse →
जामवंत कह सुनु रघुराया। जा पर नाथ करहु तुम्ह दाया।।
अर्थ · Hindi
जामवंत कह सुनु रघुराया। जा पर नाथ करहु तुम्ह दाया।।
- RCM 5.30.2Open verse →
ताहि सदा सुभ कुसल निरंतर। सुर नर मुनि प्रसन्न ता ऊपर।।
अर्थ · Hindi
ताहि सदा सुभ कुसल निरंतर। सुर नर मुनि प्रसन्न ता ऊपर।।
- RCM 5.30.3Open verse →
सोइ बिजई बिनई गुन सागर। तासु सुजसु त्रेलोक उजागर।।
अर्थ · Hindi
सोइ बिजई बिनई गुन सागर। तासु सुजसु त्रेलोक उजागर।।
- RCM 5.30.4Open verse →
प्रभु कीं कृपा भयउ सबु काजू। जन्म हमार सुफल भा आजू।।
अर्थ · Hindi
प्रभु कीं कृपा भयउ सबु काजू। जन्म हमार सुफल भा आजू।।
- RCM 5.30.5Open verse →
नाथ पवनसुत कीन्हि जो करनी। सहसहुँ मुख न जाइ सो बरनी।।
अर्थ · Hindi
नाथ पवनसुत कीन्हि जो करनी। सहसहुँ मुख न जाइ सो बरनी।।
- RCM 5.30.6Open verse →
पवनतनय के चरित सुहाए। जामवंत रघुपतिहि सुनाए।।
अर्थ · Hindi
पवनतनय के चरित सुहाए। जामवंत रघुपतिहि सुनाए।।
- RCM 5.30.7Open verse →
सुनत कृपानिधि मन अति भाए। पुनि हनुमान हरषि हियँ लाए।।
अर्थ · Hindi
सुनत कृपानिधि मन अति भाए। पुनि हनुमान हरषि हियँ लाए।।
- RCM 5.30.8Open verse →
कहहु तात केहि भाँति जानकी। रहति करति रच्छा स्वप्रान की।।
अर्थ · Hindi
कहहु तात केहि भाँति जानकी। रहति करति रच्छा स्वप्रान की।।
- RCM 5.30.9Open verse →
नाम पाहरु दिवस निसि ध्यान तुम्हार कपाट।
अर्थ · Hindi
नाम पाहरु दिवस निसि ध्यान तुम्हार कपाट।
- RCM 5.30.10Open verse →
लोचन निज पद जंत्रित जाहिं प्रान केहिं बाट।।30।।
अर्थ · Hindi
लोचन निज पद जंत्रित जाहिं प्रान केहिं बाट।।30।।
- RCM 5.31.1Open verse →
चलत मोहि चूड़ामनि दीन्ही। रघुपति हृदयँ लाइ सोइ लीन्ही।।
अर्थ · Hindi
चलत मोहि चूड़ामनि दीन्ही। रघुपति हृदयँ लाइ सोइ लीन्ही।।
- RCM 5.31.2Open verse →
नाथ जुगल लोचन भरि बारी। बचन कहे कछु जनककुमारी।।
अर्थ · Hindi
नाथ जुगल लोचन भरि बारी। बचन कहे कछु जनककुमारी।।
- RCM 5.31.3Open verse →
अनुज समेत गहेहु प्रभु चरना। दीन बंधु प्रनतारति हरना।।
अर्थ · Hindi
अनुज समेत गहेहु प्रभु चरना। दीन बंधु प्रनतारति हरना।।
- RCM 5.31.4Open verse →
मन क्रम बचन चरन अनुरागी। केहि अपराध नाथ हौं त्यागी।।
अर्थ · Hindi
मन क्रम बचन चरन अनुरागी। केहि अपराध नाथ हौं त्यागी।।
- RCM 5.31.5Open verse →
अवगुन एक मोर मैं माना। बिछुरत प्रान न कीन्ह पयाना।।
अर्थ · Hindi
अवगुन एक मोर मैं माना। बिछुरत प्रान न कीन्ह पयाना।।
- RCM 5.31.6Open verse →
नाथ सो नयनन्हि को अपराधा। निसरत प्रान करिहिं हठि बाधा।।
अर्थ · Hindi
नाथ सो नयनन्हि को अपराधा। निसरत प्रान करिहिं हठि बाधा।।
- RCM 5.31.7Open verse →
बिरह अगिनि तनु तूल समीरा। स्वास जरइ छन माहिं सरीरा।।
अर्थ · Hindi
बिरह अगिनि तनु तूल समीरा। स्वास जरइ छन माहिं सरीरा।।
- RCM 5.31.8Open verse →
नयन स्त्रवहि जलु निज हित लागी। जरैं न पाव देह बिरहागी।
अर्थ · Hindi
नयन स्त्रवहि जलु निज हित लागी। जरैं न पाव देह बिरहागी।
- RCM 5.31.9Open verse →
सीता के अति बिपति बिसाला। बिनहिं कहें भलि दीनदयाला।।
अर्थ · Hindi
सीता के अति बिपति बिसाला। बिनहिं कहें भलि दीनदयाला।।
- RCM 5.31.10Open verse →
निमिष निमिष करुनानिधि जाहिं कलप सम बीति।
अर्थ · Hindi
निमिष निमिष करुनानिधि जाहिं कलप सम बीति।
- RCM 5.31.11Open verse →
बेगि चलिय प्रभु आनिअ भुज बल खल दल जीति।।31।।
अर्थ · Hindi
बेगि चलिय प्रभु आनिअ भुज बल खल दल जीति।।31।।
- RCM 5.32.1Open verse →
सुनि सीता दुख प्रभु सुख अयना। भरि आए जल राजिव नयना।।
अर्थ · Hindi
सुनि सीता दुख प्रभु सुख अयना। भरि आए जल राजिव नयना।।
- RCM 5.32.2Open verse →
बचन काँय मन मम गति जाही। सपनेहुँ बूझिअ बिपति कि ताही।।
अर्थ · Hindi
बचन काँय मन मम गति जाही। सपनेहुँ बूझिअ बिपति कि ताही।।
- RCM 5.32.3Open verse →
कह हनुमंत बिपति प्रभु सोई। जब तव सुमिरन भजन न होई।।
अर्थ · Hindi
कह हनुमंत बिपति प्रभु सोई। जब तव सुमिरन भजन न होई।।
- RCM 5.32.4Open verse →
केतिक बात प्रभु जातुधान की। रिपुहि जीति आनिबी जानकी।।
अर्थ · Hindi
केतिक बात प्रभु जातुधान की। रिपुहि जीति आनिबी जानकी।।
- RCM 5.32.5Open verse →
सुनु कपि तोहि समान उपकारी। नहिं कोउ सुर नर मुनि तनुधारी।।
अर्थ · Hindi
सुनु कपि तोहि समान उपकारी। नहिं कोउ सुर नर मुनि तनुधारी।।
- RCM 5.32.6Open verse →
प्रति उपकार करौं का तोरा। सनमुख होइ न सकत मन मोरा।।
अर्थ · Hindi
प्रति उपकार करौं का तोरा। सनमुख होइ न सकत मन मोरा।।
- RCM 5.32.7Open verse →
सुनु सुत उरिन मैं नाहीं। देखेउँ करि बिचार मन माहीं।।
अर्थ · Hindi
सुनु सुत उरिन मैं नाहीं। देखेउँ करि बिचार मन माहीं।।
- RCM 5.32.8Open verse →
पुनि पुनि कपिहि चितव सुरत्राता। लोचन नीर पुलक अति गाता।।
अर्थ · Hindi
पुनि पुनि कपिहि चितव सुरत्राता। लोचन नीर पुलक अति गाता।।
- RCM 5.32.9Open verse →
सुनि प्रभु बचन बिलोकि मुख गात हरषि हनुमंत।
अर्थ · Hindi
सुनि प्रभु बचन बिलोकि मुख गात हरषि हनुमंत।
- RCM 5.32.10Open verse →
चरन परेउ प्रेमाकुल त्राहि त्राहि भगवंत।।32।।
अर्थ · Hindi
चरन परेउ प्रेमाकुल त्राहि त्राहि भगवंत।।32।।
- RCM 5.33.1Open verse →
बार बार प्रभु चहइ उठावा। प्रेम मगन तेहि उठब न भावा।।
अर्थ · Hindi
बार बार प्रभु चहइ उठावा। प्रेम मगन तेहि उठब न भावा।।
- RCM 5.33.2Open verse →
प्रभु कर पंकज कपि कें सीसा। सुमिरि सो दसा मगन गौरीसा।।
अर्थ · Hindi
प्रभु कर पंकज कपि कें सीसा। सुमिरि सो दसा मगन गौरीसा।।
- RCM 5.33.3Open verse →
सावधान मन करि पुनि संकर। लागे कहन कथा अति सुंदर।।
अर्थ · Hindi
सावधान मन करि पुनि संकर। लागे कहन कथा अति सुंदर।।
- RCM 5.33.4Open verse →
कपि उठाइ प्रभु हृदयँ लगावा। कर गहि परम निकट बैठावा।।
अर्थ · Hindi
कपि उठाइ प्रभु हृदयँ लगावा। कर गहि परम निकट बैठावा।।
- RCM 5.33.5Open verse →
कहु कपि रावन पालित लंका। केहि बिधि दहेउ दुर्ग अति बंका।।
अर्थ · Hindi
कहु कपि रावन पालित लंका। केहि बिधि दहेउ दुर्ग अति बंका।।
- RCM 5.33.6Open verse →
प्रभु प्रसन्न जाना हनुमाना। बोला बचन बिगत अभिमाना।।
अर्थ · Hindi
प्रभु प्रसन्न जाना हनुमाना। बोला बचन बिगत अभिमाना।।
- RCM 5.33.7Open verse →
साखामृग के बड़ि मनुसाई। साखा तें साखा पर जाई।।
अर्थ · Hindi
साखामृग के बड़ि मनुसाई। साखा तें साखा पर जाई।।
- RCM 5.33.8Open verse →
नाघि सिंधु हाटकपुर जारा। निसिचर गन बिधि बिपिन उजारा।
अर्थ · Hindi
नाघि सिंधु हाटकपुर जारा। निसिचर गन बिधि बिपिन उजारा।
- RCM 5.33.9Open verse →
सो सब तव प्रताप रघुराई। नाथ न कछू मोरि प्रभुताई।।
अर्थ · Hindi
सो सब तव प्रताप रघुराई। नाथ न कछू मोरि प्रभुताई।।
- RCM 5.33.10Open verse →
ता कहुँ प्रभु कछु अगम नहिं जा पर तुम्ह अनुकुल।
अर्थ · Hindi
ता कहुँ प्रभु कछु अगम नहिं जा पर तुम्ह अनुकुल।
- RCM 5.33.11Open verse →
तब प्रभावँ बड़वानलहिं जारि सकइ खलु तूल।।33।।
अर्थ · Hindi
तब प्रभावँ बड़वानलहिं जारि सकइ खलु तूल।।33।।
- RCM 5.34.1Open verse →
नाथ भगति अति सुखदायनी। देहु कृपा करि अनपायनी।।
अर्थ · Hindi
नाथ भगति अति सुखदायनी। देहु कृपा करि अनपायनी।।
- RCM 5.34.2Open verse →
सुनि प्रभु परम सरल कपि बानी। एवमस्तु तब कहेउ भवानी।।
अर्थ · Hindi
सुनि प्रभु परम सरल कपि बानी। एवमस्तु तब कहेउ भवानी।।
- RCM 5.34.3Open verse →
उमा राम सुभाउ जेहिं जाना। ताहि भजनु तजि भाव न आना।।
अर्थ · Hindi
उमा राम सुभाउ जेहिं जाना। ताहि भजनु तजि भाव न आना।।
- RCM 5.34.4Open verse →
यह संवाद जासु उर आवा। रघुपति चरन भगति सोइ पावा।।
अर्थ · Hindi
यह संवाद जासु उर आवा। रघुपति चरन भगति सोइ पावा।।
- RCM 5.34.5Open verse →
सुनि प्रभु बचन कहहिं कपिबृंदा। जय जय जय कृपाल सुखकंदा।।
अर्थ · Hindi
सुनि प्रभु बचन कहहिं कपिबृंदा। जय जय जय कृपाल सुखकंदा।।
- RCM 5.34.6Open verse →
तब रघुपति कपिपतिहि बोलावा। कहा चलैं कर करहु बनावा।।
अर्थ · Hindi
तब रघुपति कपिपतिहि बोलावा। कहा चलैं कर करहु बनावा।।
- RCM 5.34.7Open verse →
अब बिलंबु केहि कारन कीजे। तुरत कपिन्ह कहुँ आयसु दीजे।।
अर्थ · Hindi
अब बिलंबु केहि कारन कीजे। तुरत कपिन्ह कहुँ आयसु दीजे।।
- RCM 5.34.8Open verse →
कौतुक देखि सुमन बहु बरषी। नभ तें भवन चले सुर हरषी।।
अर्थ · Hindi
कौतुक देखि सुमन बहु बरषी। नभ तें भवन चले सुर हरषी।।
- RCM 5.34.9Open verse →
कपिपति बेगि बोलाए आए जूथप जूथ।
अर्थ · Hindi
कपिपति बेगि बोलाए आए जूथप जूथ।
- RCM 5.34.10Open verse →
नाना बरन अतुल बल बानर भालु बरूथ।।34।।
अर्थ · Hindi
नाना बरन अतुल बल बानर भालु बरूथ।।34।।
- RCM 5.35.1Open verse →
प्रभु पद पंकज नावहिं सीसा। गरजहिं भालु महाबल कीसा।।
अर्थ · Hindi
प्रभु पद पंकज नावहिं सीसा। गरजहिं भालु महाबल कीसा।।
- RCM 5.35.2Open verse →
देखी राम सकल कपि सेना। चितइ कृपा करि राजिव नैना।।
अर्थ · Hindi
देखी राम सकल कपि सेना। चितइ कृपा करि राजिव नैना।।
- RCM 5.35.3Open verse →
राम कृपा बल पाइ कपिंदा। भए पच्छजुत मनहुँ गिरिंदा।।
अर्थ · Hindi
राम कृपा बल पाइ कपिंदा। भए पच्छजुत मनहुँ गिरिंदा।।
- RCM 5.35.4Open verse →
हरषि राम तब कीन्ह पयाना। सगुन भए सुंदर सुभ नाना।।
अर्थ · Hindi
हरषि राम तब कीन्ह पयाना। सगुन भए सुंदर सुभ नाना।।
- RCM 5.35.5Open verse →
जासु सकल मंगलमय कीती। तासु पयान सगुन यह नीती।।
अर्थ · Hindi
जासु सकल मंगलमय कीती। तासु पयान सगुन यह नीती।।
- RCM 5.35.6Open verse →
प्रभु पयान जाना बैदेहीं। फरकि बाम अँग जनु कहि देहीं।।
अर्थ · Hindi
प्रभु पयान जाना बैदेहीं। फरकि बाम अँग जनु कहि देहीं।।
- RCM 5.35.7Open verse →
जोइ जोइ सगुन जानकिहि होई। असगुन भयउ रावनहि सोई।।
अर्थ · Hindi
जोइ जोइ सगुन जानकिहि होई। असगुन भयउ रावनहि सोई।।
- RCM 5.35.8Open verse →
चला कटकु को बरनैं पारा। गर्जहि बानर भालु अपारा।।
अर्थ · Hindi
चला कटकु को बरनैं पारा। गर्जहि बानर भालु अपारा।।
- RCM 5.35.9Open verse →
नख आयुध गिरि पादपधारी। चले गगन महि इच्छाचारी।।
अर्थ · Hindi
नख आयुध गिरि पादपधारी। चले गगन महि इच्छाचारी।।
- RCM 5.35.10Open verse →
केहरिनाद भालु कपि करहीं। डगमगाहिं दिग्गज चिक्करहीं।।
अर्थ · Hindi
केहरिनाद भालु कपि करहीं। डगमगाहिं दिग्गज चिक्करहीं।।
- RCM 5.35.11Open verse →
चिक्करहिं दिग्गज डोल महि गिरि लोल सागर खरभरे।
अर्थ · Hindi
चिक्करहिं दिग्गज डोल महि गिरि लोल सागर खरभरे।
- RCM 5.35.12Open verse →
मन हरष सभ गंधर्ब सुर मुनि नाग किन्नर दुख टरे।।
अर्थ · Hindi
मन हरष सभ गंधर्ब सुर मुनि नाग किन्नर दुख टरे।।
- RCM 5.35.13Open verse →
कटकटहिं मर्कट बिकट भट बहु कोटि कोटिन्ह धावहीं।
अर्थ · Hindi
कटकटहिं मर्कट बिकट भट बहु कोटि कोटिन्ह धावहीं।
- RCM 5.35.14Open verse →
जय राम प्रबल प्रताप कोसलनाथ गुन गन गावहीं।।1।।
अर्थ · Hindi
जय राम प्रबल प्रताप कोसलनाथ गुन गन गावहीं।।1।।
- RCM 5.35.15Open verse →
सहि सक न भार उदार अहिपति बार बारहिं मोहई।
अर्थ · Hindi
सहि सक न भार उदार अहिपति बार बारहिं मोहई।
- RCM 5.35.16Open verse →
गह दसन पुनि पुनि कमठ पृष्ट कठोर सो किमि सोहई।।
अर्थ · Hindi
गह दसन पुनि पुनि कमठ पृष्ट कठोर सो किमि सोहई।।
- RCM 5.35.17Open verse →
रघुबीर रुचिर प्रयान प्रस्थिति जानि परम सुहावनी।
अर्थ · Hindi
रघुबीर रुचिर प्रयान प्रस्थिति जानि परम सुहावनी।
- RCM 5.35.18Open verse →
जनु कमठ खर्पर सर्पराज सो लिखत अबिचल पावनी।।2।।
अर्थ · Hindi
जनु कमठ खर्पर सर्पराज सो लिखत अबिचल पावनी।।2।।
- RCM 5.35.19Open verse →
एहि बिधि जाइ कृपानिधि उतरे सागर तीर।
अर्थ · Hindi
एहि बिधि जाइ कृपानिधि उतरे सागर तीर।
- RCM 5.35.20Open verse →
जहँ तहँ लागे खान फल भालु बिपुल कपि बीर।।35।।
अर्थ · Hindi
जहँ तहँ लागे खान फल भालु बिपुल कपि बीर।।35।।
- RCM 5.36.1Open verse →
उहाँ निसाचर रहहिं ससंका। जब ते जारि गयउ कपि लंका।।
अर्थ · Hindi
उहाँ निसाचर रहहिं ससंका। जब ते जारि गयउ कपि लंका।।
- RCM 5.36.2Open verse →
निज निज गृहँ सब करहिं बिचारा। नहिं निसिचर कुल केर उबारा।।
अर्थ · Hindi
निज निज गृहँ सब करहिं बिचारा। नहिं निसिचर कुल केर उबारा।।
- RCM 5.36.3Open verse →
जासु दूत बल बरनि न जाई। तेहि आएँ पुर कवन भलाई।।
अर्थ · Hindi
जासु दूत बल बरनि न जाई। तेहि आएँ पुर कवन भलाई।।
- RCM 5.36.4Open verse →
दूतन्हि सन सुनि पुरजन बानी। मंदोदरी अधिक अकुलानी।।
अर्थ · Hindi
दूतन्हि सन सुनि पुरजन बानी। मंदोदरी अधिक अकुलानी।।
- RCM 5.36.5Open verse →
रहसि जोरि कर पति पग लागी। बोली बचन नीति रस पागी।।
अर्थ · Hindi
रहसि जोरि कर पति पग लागी। बोली बचन नीति रस पागी।।
- RCM 5.36.6Open verse →
कंत करष हरि सन परिहरहू। मोर कहा अति हित हियँ धरहु।।
अर्थ · Hindi
कंत करष हरि सन परिहरहू। मोर कहा अति हित हियँ धरहु।।
- RCM 5.36.7Open verse →
समुझत जासु दूत कइ करनी। स्त्रवहीं गर्भ रजनीचर धरनी।।
अर्थ · Hindi
समुझत जासु दूत कइ करनी। स्त्रवहीं गर्भ रजनीचर धरनी।।
- RCM 5.36.8Open verse →
तासु नारि निज सचिव बोलाई। पठवहु कंत जो चहहु भलाई।।
अर्थ · Hindi
तासु नारि निज सचिव बोलाई। पठवहु कंत जो चहहु भलाई।।
- RCM 5.36.9Open verse →
तब कुल कमल बिपिन दुखदाई। सीता सीत निसा सम आई।।
अर्थ · Hindi
तब कुल कमल बिपिन दुखदाई। सीता सीत निसा सम आई।।
- RCM 5.36.10Open verse →
सुनहु नाथ सीता बिनु दीन्हें। हित न तुम्हार संभु अज कीन्हें।।
अर्थ · Hindi
सुनहु नाथ सीता बिनु दीन्हें। हित न तुम्हार संभु अज कीन्हें।।
- RCM 5.36.11Open verse →
-राम बान अहि गन सरिस निकर निसाचर भेक।
अर्थ · Hindi
-राम बान अहि गन सरिस निकर निसाचर भेक।
- RCM 5.36.12Open verse →
जब लगि ग्रसत न तब लगि जतनु करहु तजि टेक।।36।।
अर्थ · Hindi
जब लगि ग्रसत न तब लगि जतनु करहु तजि टेक।।36।।
- RCM 5.37.1Open verse →
श्रवन सुनी सठ ता करि बानी। बिहसा जगत बिदित अभिमानी।।
अर्थ · Hindi
श्रवन सुनी सठ ता करि बानी। बिहसा जगत बिदित अभिमानी।।
- RCM 5.37.2Open verse →
सभय सुभाउ नारि कर साचा। मंगल महुँ भय मन अति काचा।।
अर्थ · Hindi
सभय सुभाउ नारि कर साचा। मंगल महुँ भय मन अति काचा।।
- RCM 5.37.3Open verse →
जौं आवइ मर्कट कटकाई। जिअहिं बिचारे निसिचर खाई।।
अर्थ · Hindi
जौं आवइ मर्कट कटकाई। जिअहिं बिचारे निसिचर खाई।।
- RCM 5.37.4Open verse →
कंपहिं लोकप जाकी त्रासा। तासु नारि सभीत बड़ि हासा।।
अर्थ · Hindi
कंपहिं लोकप जाकी त्रासा। तासु नारि सभीत बड़ि हासा।।
- RCM 5.37.5Open verse →
अस कहि बिहसि ताहि उर लाई। चलेउ सभाँ ममता अधिकाई।।
अर्थ · Hindi
अस कहि बिहसि ताहि उर लाई। चलेउ सभाँ ममता अधिकाई।।
- RCM 5.37.6Open verse →
मंदोदरी हृदयँ कर चिंता। भयउ कंत पर बिधि बिपरीता।।
अर्थ · Hindi
मंदोदरी हृदयँ कर चिंता। भयउ कंत पर बिधि बिपरीता।।
- RCM 5.37.7Open verse →
बैठेउ सभाँ खबरि असि पाई। सिंधु पार सेना सब आई।।
अर्थ · Hindi
बैठेउ सभाँ खबरि असि पाई। सिंधु पार सेना सब आई।।
- RCM 5.37.8Open verse →
बूझेसि सचिव उचित मत कहहू। ते सब हँसे मष्ट करि रहहू।।
अर्थ · Hindi
बूझेसि सचिव उचित मत कहहू। ते सब हँसे मष्ट करि रहहू।।
- RCM 5.37.9Open verse →
जितेहु सुरासुर तब श्रम नाहीं। नर बानर केहि लेखे माही।।
अर्थ · Hindi
जितेहु सुरासुर तब श्रम नाहीं। नर बानर केहि लेखे माही।।
- RCM 5.37.10Open verse →
सचिव बैद गुर तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस।
अर्थ · Hindi
सचिव बैद गुर तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस।
- RCM 5.37.11Open verse →
राज धर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास।।37।।
अर्थ · Hindi
राज धर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास।।37।।
- RCM 5.38.1Open verse →
सोइ रावन कहुँ बनि सहाई। अस्तुति करहिं सुनाइ सुनाई।।
अर्थ · Hindi
सोइ रावन कहुँ बनि सहाई। अस्तुति करहिं सुनाइ सुनाई।।
- RCM 5.38.2Open verse →
अवसर जानि बिभीषनु आवा। भ्राता चरन सीसु तेहिं नावा।।
अर्थ · Hindi
अवसर जानि बिभीषनु आवा। भ्राता चरन सीसु तेहिं नावा।।
- RCM 5.38.3Open verse →
पुनि सिरु नाइ बैठ निज आसन। बोला बचन पाइ अनुसासन।।
अर्थ · Hindi
पुनि सिरु नाइ बैठ निज आसन। बोला बचन पाइ अनुसासन।।
- RCM 5.38.4Open verse →
जौ कृपाल पूँछिहु मोहि बाता। मति अनुरुप कहउँ हित ताता।।
अर्थ · Hindi
जौ कृपाल पूँछिहु मोहि बाता। मति अनुरुप कहउँ हित ताता।।
- RCM 5.38.5Open verse →
जो आपन चाहै कल्याना। सुजसु सुमति सुभ गति सुख नाना।।
अर्थ · Hindi
जो आपन चाहै कल्याना। सुजसु सुमति सुभ गति सुख नाना।।
- RCM 5.38.6Open verse →
सो परनारि लिलार गोसाईं। तजउ चउथि के चंद कि नाई।।
अर्थ · Hindi
सो परनारि लिलार गोसाईं। तजउ चउथि के चंद कि नाई।।
- RCM 5.38.7Open verse →
चौदह भुवन एक पति होई। भूतद्रोह तिष्टइ नहिं सोई।।
अर्थ · Hindi
चौदह भुवन एक पति होई। भूतद्रोह तिष्टइ नहिं सोई।।
- RCM 5.38.8Open verse →
गुन सागर नागर नर जोऊ। अलप लोभ भल कहइ न कोऊ।।
अर्थ · Hindi
गुन सागर नागर नर जोऊ। अलप लोभ भल कहइ न कोऊ।।
- RCM 5.38.9Open verse →
काम क्रोध मद लोभ सब नाथ नरक के पंथ।
अर्थ · Hindi
काम क्रोध मद लोभ सब नाथ नरक के पंथ।
- RCM 5.38.10Open verse →
सब परिहरि रघुबीरहि भजहु भजहिं जेहि संत।।38।।
अर्थ · Hindi
सब परिहरि रघुबीरहि भजहु भजहिं जेहि संत।।38।।
- RCM 5.39.1Open verse →
तात राम नहिं नर भूपाला। भुवनेस्वर कालहु कर काला।।
अर्थ · Hindi
तात राम नहिं नर भूपाला। भुवनेस्वर कालहु कर काला।।
- RCM 5.39.2Open verse →
ब्रह्म अनामय अज भगवंता। ब्यापक अजित अनादि अनंता।।
अर्थ · Hindi
ब्रह्म अनामय अज भगवंता। ब्यापक अजित अनादि अनंता।।
- RCM 5.39.3Open verse →
गो द्विज धेनु देव हितकारी। कृपासिंधु मानुष तनुधारी।।
अर्थ · Hindi
गो द्विज धेनु देव हितकारी। कृपासिंधु मानुष तनुधारी।।
- RCM 5.39.4Open verse →
जन रंजन भंजन खल ब्राता। बेद धर्म रच्छक सुनु भ्राता।।
अर्थ · Hindi
जन रंजन भंजन खल ब्राता। बेद धर्म रच्छक सुनु भ्राता।।
- RCM 5.39.5Open verse →
ताहि बयरु तजि नाइअ माथा। प्रनतारति भंजन रघुनाथा।।
अर्थ · Hindi
ताहि बयरु तजि नाइअ माथा। प्रनतारति भंजन रघुनाथा।।
- RCM 5.39.6Open verse →
देहु नाथ प्रभु कहुँ बैदेही। भजहु राम बिनु हेतु सनेही।।
अर्थ · Hindi
देहु नाथ प्रभु कहुँ बैदेही। भजहु राम बिनु हेतु सनेही।।
- RCM 5.39.7Open verse →
सरन गएँ प्रभु ताहु न त्यागा। बिस्व द्रोह कृत अघ जेहि लागा।।
अर्थ · Hindi
सरन गएँ प्रभु ताहु न त्यागा। बिस्व द्रोह कृत अघ जेहि लागा।।
- RCM 5.39.8Open verse →
जासु नाम त्रय ताप नसावन। सोइ प्रभु प्रगट समुझु जियँ रावन।।
अर्थ · Hindi
जासु नाम त्रय ताप नसावन। सोइ प्रभु प्रगट समुझु जियँ रावन।।
- RCM 5.39.9Open verse →
बार बार पद लागउँ बिनय करउँ दससीस।
अर्थ · Hindi
बार बार पद लागउँ बिनय करउँ दससीस।
- RCM 5.39.10Open verse →
परिहरि मान मोह मद भजहु कोसलाधीस।।39(क)।।
अर्थ · Hindi
परिहरि मान मोह मद भजहु कोसलाधीस।।39(क)।।
- RCM 5.39.11Open verse →
मुनि पुलस्ति निज सिष्य सन कहि पठई यह बात।
अर्थ · Hindi
मुनि पुलस्ति निज सिष्य सन कहि पठई यह बात।
- RCM 5.39.12Open verse →
तुरत सो मैं प्रभु सन कही पाइ सुअवसरु तात।।39(ख)।।
अर्थ · Hindi
तुरत सो मैं प्रभु सन कही पाइ सुअवसरु तात।।39(ख)।।
- RCM 5.40.1Open verse →
माल्यवंत अति सचिव सयाना। तासु बचन सुनि अति सुख माना।।
अर्थ · Hindi
माल्यवंत अति सचिव सयाना। तासु बचन सुनि अति सुख माना।।
- RCM 5.40.2Open verse →
तात अनुज तव नीति बिभूषन। सो उर धरहु जो कहत बिभीषन।।
अर्थ · Hindi
तात अनुज तव नीति बिभूषन। सो उर धरहु जो कहत बिभीषन।।
- RCM 5.40.3Open verse →
रिपु उतकरष कहत सठ दोऊ। दूरि न करहु इहाँ हइ कोऊ।।
अर्थ · Hindi
रिपु उतकरष कहत सठ दोऊ। दूरि न करहु इहाँ हइ कोऊ।।
- RCM 5.40.4Open verse →
माल्यवंत गृह गयउ बहोरी। कहइ बिभीषनु पुनि कर जोरी।।
अर्थ · Hindi
माल्यवंत गृह गयउ बहोरी। कहइ बिभीषनु पुनि कर जोरी।।
- RCM 5.40.5Open verse →
सुमति कुमति सब कें उर रहहीं। नाथ पुरान निगम अस कहहीं।।
अर्थ · Hindi
सुमति कुमति सब कें उर रहहीं। नाथ पुरान निगम अस कहहीं।।
- RCM 5.40.6Open verse →
जहाँ सुमति तहँ संपति नाना। जहाँ कुमति तहँ बिपति निदाना।।
अर्थ · Hindi
जहाँ सुमति तहँ संपति नाना। जहाँ कुमति तहँ बिपति निदाना।।
- RCM 5.40.7Open verse →
तव उर कुमति बसी बिपरीता। हित अनहित मानहु रिपु प्रीता।।
अर्थ · Hindi
तव उर कुमति बसी बिपरीता। हित अनहित मानहु रिपु प्रीता।।
- RCM 5.40.8Open verse →
कालराति निसिचर कुल केरी। तेहि सीता पर प्रीति घनेरी।।
अर्थ · Hindi
कालराति निसिचर कुल केरी। तेहि सीता पर प्रीति घनेरी।।
- RCM 5.40.9Open verse →
तात चरन गहि मागउँ राखहु मोर दुलार।
अर्थ · Hindi
तात चरन गहि मागउँ राखहु मोर दुलार।
- RCM 5.40.10Open verse →
सीत देहु राम कहुँ अहित न होइ तुम्हार।।40।।
अर्थ · Hindi
सीत देहु राम कहुँ अहित न होइ तुम्हार।।40।।
- RCM 5.41.1Open verse →
बुध पुरान श्रुति संमत बानी। कही बिभीषन नीति बखानी।।
अर्थ · Hindi
बुध पुरान श्रुति संमत बानी। कही बिभीषन नीति बखानी।।
- RCM 5.41.2Open verse →
सुनत दसानन उठा रिसाई। खल तोहि निकट मुत्यु अब आई।।
अर्थ · Hindi
सुनत दसानन उठा रिसाई। खल तोहि निकट मुत्यु अब आई।।
- RCM 5.41.3Open verse →
जिअसि सदा सठ मोर जिआवा। रिपु कर पच्छ मूढ़ तोहि भावा।।
अर्थ · Hindi
जिअसि सदा सठ मोर जिआवा। रिपु कर पच्छ मूढ़ तोहि भावा।।
- RCM 5.41.4Open verse →
कहसि न खल अस को जग माहीं। भुज बल जाहि जिता मैं नाही।।
अर्थ · Hindi
कहसि न खल अस को जग माहीं। भुज बल जाहि जिता मैं नाही।।
- RCM 5.41.5Open verse →
मम पुर बसि तपसिन्ह पर प्रीती। सठ मिलु जाइ तिन्हहि कहु नीती।।
अर्थ · Hindi
मम पुर बसि तपसिन्ह पर प्रीती। सठ मिलु जाइ तिन्हहि कहु नीती।।
- RCM 5.41.6Open verse →
अस कहि कीन्हेसि चरन प्रहारा। अनुज गहे पद बारहिं बारा।।
अर्थ · Hindi
अस कहि कीन्हेसि चरन प्रहारा। अनुज गहे पद बारहिं बारा।।
- RCM 5.41.7Open verse →
उमा संत कइ इहइ बड़ाई। मंद करत जो करइ भलाई।।
अर्थ · Hindi
उमा संत कइ इहइ बड़ाई। मंद करत जो करइ भलाई।।
- RCM 5.41.8Open verse →
तुम्ह पितु सरिस भलेहिं मोहि मारा। रामु भजें हित नाथ तुम्हारा।।
अर्थ · Hindi
तुम्ह पितु सरिस भलेहिं मोहि मारा। रामु भजें हित नाथ तुम्हारा।।
- RCM 5.41.9Open verse →
सचिव संग लै नभ पथ गयऊ। सबहि सुनाइ कहत अस भयऊ।।
अर्थ · Hindi
सचिव संग लै नभ पथ गयऊ। सबहि सुनाइ कहत अस भयऊ।।
- RCM 5.41.10Open verse →
रामु सत्यसंकल्प प्रभु सभा कालबस तोरि।
अर्थ · Hindi
रामु सत्यसंकल्प प्रभु सभा कालबस तोरि।
- RCM 5.41.11Open verse →
मै रघुबीर सरन अब जाउँ देहु जनि खोरि।।41।।
अर्थ · Hindi
मै रघुबीर सरन अब जाउँ देहु जनि खोरि।।41।।
- RCM 5.42.1Open verse →
अस कहि चला बिभीषनु जबहीं। आयूहीन भए सब तबहीं।।
अर्थ · Hindi
अस कहि चला बिभीषनु जबहीं। आयूहीन भए सब तबहीं।।
- RCM 5.42.2Open verse →
साधु अवग्या तुरत भवानी। कर कल्यान अखिल कै हानी।।
अर्थ · Hindi
साधु अवग्या तुरत भवानी। कर कल्यान अखिल कै हानी।।
- RCM 5.42.3Open verse →
रावन जबहिं बिभीषन त्यागा। भयउ बिभव बिनु तबहिं अभागा।।
अर्थ · Hindi
रावन जबहिं बिभीषन त्यागा। भयउ बिभव बिनु तबहिं अभागा।।
- RCM 5.42.4Open verse →
चलेउ हरषि रघुनायक पाहीं। करत मनोरथ बहु मन माहीं।।
अर्थ · Hindi
चलेउ हरषि रघुनायक पाहीं। करत मनोरथ बहु मन माहीं।।
- RCM 5.42.5Open verse →
देखिहउँ जाइ चरन जलजाता। अरुन मृदुल सेवक सुखदाता।।
अर्थ · Hindi
देखिहउँ जाइ चरन जलजाता। अरुन मृदुल सेवक सुखदाता।।
- RCM 5.42.6Open verse →
जे पद परसि तरी रिषिनारी। दंडक कानन पावनकारी।।
अर्थ · Hindi
जे पद परसि तरी रिषिनारी। दंडक कानन पावनकारी।।
- RCM 5.42.7Open verse →
जे पद जनकसुताँ उर लाए। कपट कुरंग संग धर धाए।।
अर्थ · Hindi
जे पद जनकसुताँ उर लाए। कपट कुरंग संग धर धाए।।
- RCM 5.42.8Open verse →
हर उर सर सरोज पद जेई। अहोभाग्य मै देखिहउँ तेई।।
अर्थ · Hindi
हर उर सर सरोज पद जेई। अहोभाग्य मै देखिहउँ तेई।।
- RCM 5.42.9Open verse →
जिन्ह पायन्ह के पादुकन्हि भरतु रहे मन लाइ।
अर्थ · Hindi
जिन्ह पायन्ह के पादुकन्हि भरतु रहे मन लाइ।
- RCM 5.42.10Open verse →
ते पद आजु बिलोकिहउँ इन्ह नयनन्हि अब जाइ।।42।।
अर्थ · Hindi
ते पद आजु बिलोकिहउँ इन्ह नयनन्हि अब जाइ।।42।।
- RCM 5.43.1Open verse →
एहि बिधि करत सप्रेम बिचारा। आयउ सपदि सिंधु एहिं पारा।।
अर्थ · Hindi
एहि बिधि करत सप्रेम बिचारा। आयउ सपदि सिंधु एहिं पारा।।
- RCM 5.43.2Open verse →
कपिन्ह बिभीषनु आवत देखा। जाना कोउ रिपु दूत बिसेषा।।
अर्थ · Hindi
कपिन्ह बिभीषनु आवत देखा। जाना कोउ रिपु दूत बिसेषा।।
- RCM 5.43.3Open verse →
ताहि राखि कपीस पहिं आए। समाचार सब ताहि सुनाए।।
अर्थ · Hindi
ताहि राखि कपीस पहिं आए। समाचार सब ताहि सुनाए।।
- RCM 5.43.4Open verse →
कह सुग्रीव सुनहु रघुराई। आवा मिलन दसानन भाई।।
अर्थ · Hindi
कह सुग्रीव सुनहु रघुराई। आवा मिलन दसानन भाई।।
- RCM 5.43.5Open verse →
कह प्रभु सखा बूझिऐ काहा। कहइ कपीस सुनहु नरनाहा।।
अर्थ · Hindi
कह प्रभु सखा बूझिऐ काहा। कहइ कपीस सुनहु नरनाहा।।
- RCM 5.43.6Open verse →
जानि न जाइ निसाचर माया। कामरूप केहि कारन आया।।
अर्थ · Hindi
जानि न जाइ निसाचर माया। कामरूप केहि कारन आया।।
- RCM 5.43.7Open verse →
भेद हमार लेन सठ आवा। राखिअ बाँधि मोहि अस भावा।।
अर्थ · Hindi
भेद हमार लेन सठ आवा। राखिअ बाँधि मोहि अस भावा।।
- RCM 5.43.8Open verse →
सखा नीति तुम्ह नीकि बिचारी। मम पन सरनागत भयहारी।।
अर्थ · Hindi
सखा नीति तुम्ह नीकि बिचारी। मम पन सरनागत भयहारी।।
- RCM 5.43.9Open verse →
सुनि प्रभु बचन हरष हनुमाना। सरनागत बच्छल भगवाना।।
अर्थ · Hindi
सुनि प्रभु बचन हरष हनुमाना। सरनागत बच्छल भगवाना।।
- RCM 5.43.10Open verse →
सरनागत कहुँ जे तजहिं निज अनहित अनुमानि।
अर्थ · Hindi
सरनागत कहुँ जे तजहिं निज अनहित अनुमानि।
- RCM 5.43.11Open verse →
ते नर पावँर पापमय तिन्हहि बिलोकत हानि।।43।।
अर्थ · Hindi
ते नर पावँर पापमय तिन्हहि बिलोकत हानि।।43।।
- RCM 5.44.1Open verse →
कोटि बिप्र बध लागहिं जाहू। आएँ सरन तजउँ नहिं ताहू।।
अर्थ · Hindi
कोटि बिप्र बध लागहिं जाहू। आएँ सरन तजउँ नहिं ताहू।।
- RCM 5.44.2Open verse →
सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं। जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं।।
अर्थ · Hindi
सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं। जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं।।
- RCM 5.44.3Open verse →
पापवंत कर सहज सुभाऊ। भजनु मोर तेहि भाव न काऊ।।
अर्थ · Hindi
पापवंत कर सहज सुभाऊ। भजनु मोर तेहि भाव न काऊ।।
- RCM 5.44.4Open verse →
जौं पै दुष्टहदय सोइ होई। मोरें सनमुख आव कि सोई।।
अर्थ · Hindi
जौं पै दुष्टहदय सोइ होई। मोरें सनमुख आव कि सोई।।
- RCM 5.44.5Open verse →
निर्मल मन जन सो मोहि पावा। मोहि कपट छल छिद्र न भावा।।
अर्थ · Hindi
निर्मल मन जन सो मोहि पावा। मोहि कपट छल छिद्र न भावा।।
- RCM 5.44.6Open verse →
भेद लेन पठवा दससीसा। तबहुँ न कछु भय हानि कपीसा।।
अर्थ · Hindi
भेद लेन पठवा दससीसा। तबहुँ न कछु भय हानि कपीसा।।
- RCM 5.44.7Open verse →
जग महुँ सखा निसाचर जेते। लछिमनु हनइ निमिष महुँ तेते।।
अर्थ · Hindi
जग महुँ सखा निसाचर जेते। लछिमनु हनइ निमिष महुँ तेते।।
- RCM 5.44.8Open verse →
जौं सभीत आवा सरनाई। रखिहउँ ताहि प्रान की नाई।।
अर्थ · Hindi
जौं सभीत आवा सरनाई। रखिहउँ ताहि प्रान की नाई।।
- RCM 5.44.9Open verse →
उभय भाँति तेहि आनहु हँसि कह कृपानिकेत।
अर्थ · Hindi
उभय भाँति तेहि आनहु हँसि कह कृपानिकेत।
- RCM 5.44.10Open verse →
जय कृपाल कहि चले अंगद हनू समेत।।44।।
अर्थ · Hindi
जय कृपाल कहि चले अंगद हनू समेत।।44।।
- RCM 5.45.1Open verse →
सादर तेहि आगें करि बानर। चले जहाँ रघुपति करुनाकर।।
अर्थ · Hindi
सादर तेहि आगें करि बानर। चले जहाँ रघुपति करुनाकर।।
- RCM 5.45.2Open verse →
दूरिहि ते देखे द्वौ भ्राता। नयनानंद दान के दाता।।
अर्थ · Hindi
दूरिहि ते देखे द्वौ भ्राता। नयनानंद दान के दाता।।
- RCM 5.45.3Open verse →
बहुरि राम छबिधाम बिलोकी। रहेउ ठटुकि एकटक पल रोकी।।
अर्थ · Hindi
बहुरि राम छबिधाम बिलोकी। रहेउ ठटुकि एकटक पल रोकी।।
- RCM 5.45.4Open verse →
भुज प्रलंब कंजारुन लोचन। स्यामल गात प्रनत भय मोचन।।
अर्थ · Hindi
भुज प्रलंब कंजारुन लोचन। स्यामल गात प्रनत भय मोचन।।
- RCM 5.45.5Open verse →
सिंघ कंध आयत उर सोहा। आनन अमित मदन मन मोहा।।
अर्थ · Hindi
सिंघ कंध आयत उर सोहा। आनन अमित मदन मन मोहा।।
- RCM 5.45.6Open verse →
नयन नीर पुलकित अति गाता। मन धरि धीर कही मृदु बाता।।
अर्थ · Hindi
नयन नीर पुलकित अति गाता। मन धरि धीर कही मृदु बाता।।
- RCM 5.45.7Open verse →
नाथ दसानन कर मैं भ्राता। निसिचर बंस जनम सुरत्राता।।
अर्थ · Hindi
नाथ दसानन कर मैं भ्राता। निसिचर बंस जनम सुरत्राता।।
- RCM 5.45.8Open verse →
सहज पापप्रिय तामस देहा। जथा उलूकहि तम पर नेहा।।
अर्थ · Hindi
सहज पापप्रिय तामस देहा। जथा उलूकहि तम पर नेहा।।
- RCM 5.45.9Open verse →
श्रवन सुजसु सुनि आयउँ प्रभु भंजन भव भीर।
अर्थ · Hindi
श्रवन सुजसु सुनि आयउँ प्रभु भंजन भव भीर।
- RCM 5.45.10Open verse →
त्राहि त्राहि आरति हरन सरन सुखद रघुबीर।।45।।
अर्थ · Hindi
त्राहि त्राहि आरति हरन सरन सुखद रघुबीर।।45।।
- RCM 5.46.1Open verse →
अस कहि करत दंडवत देखा। तुरत उठे प्रभु हरष बिसेषा।।
अर्थ · Hindi
अस कहि करत दंडवत देखा। तुरत उठे प्रभु हरष बिसेषा।।
- RCM 5.46.2Open verse →
दीन बचन सुनि प्रभु मन भावा। भुज बिसाल गहि हृदयँ लगावा।।
अर्थ · Hindi
दीन बचन सुनि प्रभु मन भावा। भुज बिसाल गहि हृदयँ लगावा।।
- RCM 5.46.3Open verse →
अनुज सहित मिलि ढिग बैठारी। बोले बचन भगत भयहारी।।
अर्थ · Hindi
अनुज सहित मिलि ढिग बैठारी। बोले बचन भगत भयहारी।।
- RCM 5.46.4Open verse →
कहु लंकेस सहित परिवारा। कुसल कुठाहर बास तुम्हारा।।
अर्थ · Hindi
कहु लंकेस सहित परिवारा। कुसल कुठाहर बास तुम्हारा।।
- RCM 5.46.5Open verse →
खल मंडलीं बसहु दिनु राती। सखा धरम निबहइ केहि भाँती।।
अर्थ · Hindi
खल मंडलीं बसहु दिनु राती। सखा धरम निबहइ केहि भाँती।।
- RCM 5.46.6Open verse →
मैं जानउँ तुम्हारि सब रीती। अति नय निपुन न भाव अनीती।।
अर्थ · Hindi
मैं जानउँ तुम्हारि सब रीती। अति नय निपुन न भाव अनीती।।
- RCM 5.46.7Open verse →
बरु भल बास नरक कर ताता। दुष्ट संग जनि देइ बिधाता।।
अर्थ · Hindi
बरु भल बास नरक कर ताता। दुष्ट संग जनि देइ बिधाता।।
- RCM 5.46.8Open verse →
अब पद देखि कुसल रघुराया। जौं तुम्ह कीन्ह जानि जन दाया।।
अर्थ · Hindi
अब पद देखि कुसल रघुराया। जौं तुम्ह कीन्ह जानि जन दाया।।
- RCM 5.46.9Open verse →
तब लगि कुसल न जीव कहुँ सपनेहुँ मन बिश्राम।
अर्थ · Hindi
तब लगि कुसल न जीव कहुँ सपनेहुँ मन बिश्राम।
- RCM 5.46.10Open verse →
जब लगि भजत न राम कहुँ सोक धाम तजि काम।।46।।
अर्थ · Hindi
जब लगि भजत न राम कहुँ सोक धाम तजि काम।।46।।
- RCM 5.47.1Open verse →
तब लगि हृदयँ बसत खल नाना। लोभ मोह मच्छर मद माना।।
अर्थ · Hindi
तब लगि हृदयँ बसत खल नाना। लोभ मोह मच्छर मद माना।।
- RCM 5.47.2Open verse →
जब लगि उर न बसत रघुनाथा। धरें चाप सायक कटि भाथा।।
अर्थ · Hindi
जब लगि उर न बसत रघुनाथा। धरें चाप सायक कटि भाथा।।
- RCM 5.47.3Open verse →
ममता तरुन तमी अँधिआरी। राग द्वेष उलूक सुखकारी।।
अर्थ · Hindi
ममता तरुन तमी अँधिआरी। राग द्वेष उलूक सुखकारी।।
- RCM 5.47.4Open verse →
तब लगि बसति जीव मन माहीं। जब लगि प्रभु प्रताप रबि नाहीं।।
अर्थ · Hindi
तब लगि बसति जीव मन माहीं। जब लगि प्रभु प्रताप रबि नाहीं।।
- RCM 5.47.5Open verse →
अब मैं कुसल मिटे भय भारे। देखि राम पद कमल तुम्हारे।।
अर्थ · Hindi
अब मैं कुसल मिटे भय भारे। देखि राम पद कमल तुम्हारे।।
- RCM 5.47.6Open verse →
तुम्ह कृपाल जा पर अनुकूला। ताहि न ब्याप त्रिबिध भव सूला।।
अर्थ · Hindi
तुम्ह कृपाल जा पर अनुकूला। ताहि न ब्याप त्रिबिध भव सूला।।
- RCM 5.47.7Open verse →
मैं निसिचर अति अधम सुभाऊ। सुभ आचरनु कीन्ह नहिं काऊ।।
अर्थ · Hindi
मैं निसिचर अति अधम सुभाऊ। सुभ आचरनु कीन्ह नहिं काऊ।।
- RCM 5.47.8Open verse →
जासु रूप मुनि ध्यान न आवा। तेहिं प्रभु हरषि हृदयँ मोहि लावा।।
अर्थ · Hindi
जासु रूप मुनि ध्यान न आवा। तेहिं प्रभु हरषि हृदयँ मोहि लावा।।
- RCM 5.47.9Open verse →
-अहोभाग्य मम अमित अति राम कृपा सुख पुंज।
अर्थ · Hindi
-अहोभाग्य मम अमित अति राम कृपा सुख पुंज।
- RCM 5.47.10Open verse →
देखेउँ नयन बिरंचि सिब सेब्य जुगल पद कंज।।47।।
अर्थ · Hindi
देखेउँ नयन बिरंचि सिब सेब्य जुगल पद कंज।।47।।
- RCM 5.48.1Open verse →
सुनहु सखा निज कहउँ सुभाऊ। जान भुसुंडि संभु गिरिजाऊ।।
अर्थ · Hindi
सुनहु सखा निज कहउँ सुभाऊ। जान भुसुंडि संभु गिरिजाऊ।।
- RCM 5.48.2Open verse →
जौं नर होइ चराचर द्रोही। आवे सभय सरन तकि मोही।।
अर्थ · Hindi
जौं नर होइ चराचर द्रोही। आवे सभय सरन तकि मोही।।
- RCM 5.48.3Open verse →
तजि मद मोह कपट छल नाना। करउँ सद्य तेहि साधु समाना।।
अर्थ · Hindi
तजि मद मोह कपट छल नाना। करउँ सद्य तेहि साधु समाना।।
- RCM 5.48.4Open verse →
जननी जनक बंधु सुत दारा। तनु धनु भवन सुह्रद परिवारा।।
अर्थ · Hindi
जननी जनक बंधु सुत दारा। तनु धनु भवन सुह्रद परिवारा।।
- RCM 5.48.5Open verse →
सब कै ममता ताग बटोरी। मम पद मनहि बाँध बरि डोरी।।
अर्थ · Hindi
सब कै ममता ताग बटोरी। मम पद मनहि बाँध बरि डोरी।।
- RCM 5.48.6Open verse →
समदरसी इच्छा कछु नाहीं। हरष सोक भय नहिं मन माहीं।।
अर्थ · Hindi
समदरसी इच्छा कछु नाहीं। हरष सोक भय नहिं मन माहीं।।
- RCM 5.48.7Open verse →
अस सज्जन मम उर बस कैसें। लोभी हृदयँ बसइ धनु जैसें।।
अर्थ · Hindi
अस सज्जन मम उर बस कैसें। लोभी हृदयँ बसइ धनु जैसें।।
- RCM 5.48.8Open verse →
तुम्ह सारिखे संत प्रिय मोरें। धरउँ देह नहिं आन निहोरें।।
अर्थ · Hindi
तुम्ह सारिखे संत प्रिय मोरें। धरउँ देह नहिं आन निहोरें।।
- RCM 5.48.9Open verse →
सगुन उपासक परहित निरत नीति दृढ़ नेम।
अर्थ · Hindi
सगुन उपासक परहित निरत नीति दृढ़ नेम।
- RCM 5.48.10Open verse →
ते नर प्रान समान मम जिन्ह कें द्विज पद प्रेम।।48।।
अर्थ · Hindi
ते नर प्रान समान मम जिन्ह कें द्विज पद प्रेम।।48।।
- RCM 5.49.1Open verse →
सुनु लंकेस सकल गुन तोरें। तातें तुम्ह अतिसय प्रिय मोरें।।
अर्थ · Hindi
सुनु लंकेस सकल गुन तोरें। तातें तुम्ह अतिसय प्रिय मोरें।।
- RCM 5.49.2Open verse →
राम बचन सुनि बानर जूथा। सकल कहहिं जय कृपा बरूथा।।
अर्थ · Hindi
राम बचन सुनि बानर जूथा। सकल कहहिं जय कृपा बरूथा।।
- RCM 5.49.3Open verse →
सुनत बिभीषनु प्रभु कै बानी। नहिं अघात श्रवनामृत जानी।।
अर्थ · Hindi
सुनत बिभीषनु प्रभु कै बानी। नहिं अघात श्रवनामृत जानी।।
- RCM 5.49.4Open verse →
पद अंबुज गहि बारहिं बारा। हृदयँ समात न प्रेमु अपारा।।
अर्थ · Hindi
पद अंबुज गहि बारहिं बारा। हृदयँ समात न प्रेमु अपारा।।
- RCM 5.49.5Open verse →
सुनहु देव सचराचर स्वामी। प्रनतपाल उर अंतरजामी।।
अर्थ · Hindi
सुनहु देव सचराचर स्वामी। प्रनतपाल उर अंतरजामी।।
- RCM 5.49.6Open verse →
उर कछु प्रथम बासना रही। प्रभु पद प्रीति सरित सो बही।।
अर्थ · Hindi
उर कछु प्रथम बासना रही। प्रभु पद प्रीति सरित सो बही।।
- RCM 5.49.7Open verse →
अब कृपाल निज भगति पावनी। देहु सदा सिव मन भावनी।।
अर्थ · Hindi
अब कृपाल निज भगति पावनी। देहु सदा सिव मन भावनी।।
- RCM 5.49.8Open verse →
एवमस्तु कहि प्रभु रनधीरा। मागा तुरत सिंधु कर नीरा।।
अर्थ · Hindi
एवमस्तु कहि प्रभु रनधीरा। मागा तुरत सिंधु कर नीरा।।
- RCM 5.49.9Open verse →
जदपि सखा तव इच्छा नाहीं। मोर दरसु अमोघ जग माहीं।।
अर्थ · Hindi
जदपि सखा तव इच्छा नाहीं। मोर दरसु अमोघ जग माहीं।।
- RCM 5.49.10Open verse →
अस कहि राम तिलक तेहि सारा। सुमन बृष्टि नभ भई अपारा।।
अर्थ · Hindi
अस कहि राम तिलक तेहि सारा। सुमन बृष्टि नभ भई अपारा।।
- RCM 5.49.11Open verse →
रावन क्रोध अनल निज स्वास समीर प्रचंड।
अर्थ · Hindi
रावन क्रोध अनल निज स्वास समीर प्रचंड।
- RCM 5.49.12Open verse →
जरत बिभीषनु राखेउ दीन्हेहु राजु अखंड।।49(क)।।
अर्थ · Hindi
जरत बिभीषनु राखेउ दीन्हेहु राजु अखंड।।49(क)।।
- RCM 5.49.13Open verse →
जो संपति सिव रावनहि दीन्हि दिएँ दस माथ।
अर्थ · Hindi
जो संपति सिव रावनहि दीन्हि दिएँ दस माथ।
- RCM 5.49.14Open verse →
सोइ संपदा बिभीषनहि सकुचि दीन्ह रघुनाथ।।49(ख)।।
अर्थ · Hindi
सोइ संपदा बिभीषनहि सकुचि दीन्ह रघुनाथ।।49(ख)।।
- RCM 5.50.1Open verse →
अस प्रभु छाड़ि भजहिं जे आना। ते नर पसु बिनु पूँछ बिषाना।।
अर्थ · Hindi
अस प्रभु छाड़ि भजहिं जे आना। ते नर पसु बिनु पूँछ बिषाना।।
- RCM 5.50.2Open verse →
निज जन जानि ताहि अपनावा। प्रभु सुभाव कपि कुल मन भावा।।
अर्थ · Hindi
निज जन जानि ताहि अपनावा। प्रभु सुभाव कपि कुल मन भावा।।
- RCM 5.50.3Open verse →
पुनि सर्बग्य सर्ब उर बासी। सर्बरूप सब रहित उदासी।।
अर्थ · Hindi
पुनि सर्बग्य सर्ब उर बासी। सर्बरूप सब रहित उदासी।।
- RCM 5.50.4Open verse →
बोले बचन नीति प्रतिपालक। कारन मनुज दनुज कुल घालक।।
अर्थ · Hindi
बोले बचन नीति प्रतिपालक। कारन मनुज दनुज कुल घालक।।
- RCM 5.50.5Open verse →
सुनु कपीस लंकापति बीरा। केहि बिधि तरिअ जलधि गंभीरा।।
अर्थ · Hindi
सुनु कपीस लंकापति बीरा। केहि बिधि तरिअ जलधि गंभीरा।।
- RCM 5.50.6Open verse →
संकुल मकर उरग झष जाती। अति अगाध दुस्तर सब भाँती।।
अर्थ · Hindi
संकुल मकर उरग झष जाती। अति अगाध दुस्तर सब भाँती।।
- RCM 5.50.7Open verse →
कह लंकेस सुनहु रघुनायक। कोटि सिंधु सोषक तव सायक।।
अर्थ · Hindi
कह लंकेस सुनहु रघुनायक। कोटि सिंधु सोषक तव सायक।।
- RCM 5.50.8Open verse →
जद्यपि तदपि नीति असि गाई। बिनय करिअ सागर सन जाई।।
अर्थ · Hindi
जद्यपि तदपि नीति असि गाई। बिनय करिअ सागर सन जाई।।
- RCM 5.50.9Open verse →
प्रभु तुम्हार कुलगुर जलधि कहिहि उपाय बिचारि।
अर्थ · Hindi
प्रभु तुम्हार कुलगुर जलधि कहिहि उपाय बिचारि।
- RCM 5.50.10Open verse →
बिनु प्रयास सागर तरिहि सकल भालु कपि धारि।।50।।
अर्थ · Hindi
बिनु प्रयास सागर तरिहि सकल भालु कपि धारि।।50।।
- RCM 5.51.1Open verse →
सखा कही तुम्ह नीकि उपाई। करिअ दैव जौं होइ सहाई।।
अर्थ · Hindi
सखा कही तुम्ह नीकि उपाई। करिअ दैव जौं होइ सहाई।।
- RCM 5.51.2Open verse →
मंत्र न यह लछिमन मन भावा। राम बचन सुनि अति दुख पावा।।
अर्थ · Hindi
मंत्र न यह लछिमन मन भावा। राम बचन सुनि अति दुख पावा।।
- RCM 5.51.3Open verse →
नाथ दैव कर कवन भरोसा। सोषिअ सिंधु करिअ मन रोसा।।
अर्थ · Hindi
नाथ दैव कर कवन भरोसा। सोषिअ सिंधु करिअ मन रोसा।।
- RCM 5.51.4Open verse →
कादर मन कहुँ एक अधारा। दैव दैव आलसी पुकारा।।
अर्थ · Hindi
कादर मन कहुँ एक अधारा। दैव दैव आलसी पुकारा।।
- RCM 5.51.5Open verse →
सुनत बिहसि बोले रघुबीरा। ऐसेहिं करब धरहु मन धीरा।।
अर्थ · Hindi
सुनत बिहसि बोले रघुबीरा। ऐसेहिं करब धरहु मन धीरा।।
- RCM 5.51.6Open verse →
अस कहि प्रभु अनुजहि समुझाई। सिंधु समीप गए रघुराई।।
अर्थ · Hindi
अस कहि प्रभु अनुजहि समुझाई। सिंधु समीप गए रघुराई।।
- RCM 5.51.7Open verse →
प्रथम प्रनाम कीन्ह सिरु नाई। बैठे पुनि तट दर्भ डसाई।।
अर्थ · Hindi
प्रथम प्रनाम कीन्ह सिरु नाई। बैठे पुनि तट दर्भ डसाई।।
- RCM 5.51.8Open verse →
जबहिं बिभीषन प्रभु पहिं आए। पाछें रावन दूत पठाए।।
अर्थ · Hindi
जबहिं बिभीषन प्रभु पहिं आए। पाछें रावन दूत पठाए।।
- RCM 5.51.9Open verse →
सकल चरित तिन्ह देखे धरें कपट कपि देह।
अर्थ · Hindi
सकल चरित तिन्ह देखे धरें कपट कपि देह।
- RCM 5.51.10Open verse →
प्रभु गुन हृदयँ सराहहिं सरनागत पर नेह।।51।।
अर्थ · Hindi
प्रभु गुन हृदयँ सराहहिं सरनागत पर नेह।।51।।
- RCM 5.52.1Open verse →
प्रगट बखानहिं राम सुभाऊ। अति सप्रेम गा बिसरि दुराऊ।।
अर्थ · Hindi
प्रगट बखानहिं राम सुभाऊ। अति सप्रेम गा बिसरि दुराऊ।।
- RCM 5.52.2Open verse →
रिपु के दूत कपिन्ह तब जाने। सकल बाँधि कपीस पहिं आने।।
अर्थ · Hindi
रिपु के दूत कपिन्ह तब जाने। सकल बाँधि कपीस पहिं आने।।
- RCM 5.52.3Open verse →
कह सुग्रीव सुनहु सब बानर। अंग भंग करि पठवहु निसिचर।।
अर्थ · Hindi
कह सुग्रीव सुनहु सब बानर। अंग भंग करि पठवहु निसिचर।।
- RCM 5.52.4Open verse →
सुनि सुग्रीव बचन कपि धाए। बाँधि कटक चहु पास फिराए।।
अर्थ · Hindi
सुनि सुग्रीव बचन कपि धाए। बाँधि कटक चहु पास फिराए।।
- RCM 5.52.5Open verse →
बहु प्रकार मारन कपि लागे। दीन पुकारत तदपि न त्यागे।।
अर्थ · Hindi
बहु प्रकार मारन कपि लागे। दीन पुकारत तदपि न त्यागे।।
- RCM 5.52.6Open verse →
जो हमार हर नासा काना। तेहि कोसलाधीस कै आना।।
अर्थ · Hindi
जो हमार हर नासा काना। तेहि कोसलाधीस कै आना।।
- RCM 5.52.7Open verse →
सुनि लछिमन सब निकट बोलाए। दया लागि हँसि तुरत छोडाए।।
अर्थ · Hindi
सुनि लछिमन सब निकट बोलाए। दया लागि हँसि तुरत छोडाए।।
- RCM 5.52.8Open verse →
रावन कर दीजहु यह पाती। लछिमन बचन बाचु कुलघाती।।
अर्थ · Hindi
रावन कर दीजहु यह पाती। लछिमन बचन बाचु कुलघाती।।
- RCM 5.52.9Open verse →
कहेहु मुखागर मूढ़ सन मम संदेसु उदार।
अर्थ · Hindi
कहेहु मुखागर मूढ़ सन मम संदेसु उदार।
- RCM 5.52.10Open verse →
सीता देइ मिलेहु न त आवा काल तुम्हार।।52।।
अर्थ · Hindi
सीता देइ मिलेहु न त आवा काल तुम्हार।।52।।
- RCM 5.53.1Open verse →
तुरत नाइ लछिमन पद माथा। चले दूत बरनत गुन गाथा।।
अर्थ · Hindi
तुरत नाइ लछिमन पद माथा। चले दूत बरनत गुन गाथा।।
- RCM 5.53.2Open verse →
कहत राम जसु लंकाँ आए। रावन चरन सीस तिन्ह नाए।।
अर्थ · Hindi
कहत राम जसु लंकाँ आए। रावन चरन सीस तिन्ह नाए।।
- RCM 5.53.3Open verse →
बिहसि दसानन पूँछी बाता। कहसि न सुक आपनि कुसलाता।।
अर्थ · Hindi
बिहसि दसानन पूँछी बाता। कहसि न सुक आपनि कुसलाता।।
- RCM 5.53.4Open verse →
पुनि कहु खबरि बिभीषन केरी। जाहि मृत्यु आई अति नेरी।।
अर्थ · Hindi
पुनि कहु खबरि बिभीषन केरी। जाहि मृत्यु आई अति नेरी।।
- RCM 5.53.5Open verse →
करत राज लंका सठ त्यागी। होइहि जब कर कीट अभागी।।
अर्थ · Hindi
करत राज लंका सठ त्यागी। होइहि जब कर कीट अभागी।।
- RCM 5.53.6Open verse →
पुनि कहु भालु कीस कटकाई। कठिन काल प्रेरित चलि आई।।
अर्थ · Hindi
पुनि कहु भालु कीस कटकाई। कठिन काल प्रेरित चलि आई।।
- RCM 5.53.7Open verse →
जिन्ह के जीवन कर रखवारा। भयउ मृदुल चित सिंधु बिचारा।।
अर्थ · Hindi
जिन्ह के जीवन कर रखवारा। भयउ मृदुल चित सिंधु बिचारा।।
- RCM 5.53.8Open verse →
कहु तपसिन्ह कै बात बहोरी। जिन्ह के हृदयँ त्रास अति मोरी।।
अर्थ · Hindi
कहु तपसिन्ह कै बात बहोरी। जिन्ह के हृदयँ त्रास अति मोरी।।
- RCM 5.53.9Open verse →
-की भइ भेंट कि फिरि गए श्रवन सुजसु सुनि मोर।
अर्थ · Hindi
-की भइ भेंट कि फिरि गए श्रवन सुजसु सुनि मोर।
- RCM 5.53.10Open verse →
कहसि न रिपु दल तेज बल बहुत चकित चित तोर।।53।।
अर्थ · Hindi
कहसि न रिपु दल तेज बल बहुत चकित चित तोर।।53।।
- RCM 5.54.1Open verse →
नाथ कृपा करि पूँछेहु जैसें। मानहु कहा क्रोध तजि तैसें।।
अर्थ · Hindi
नाथ कृपा करि पूँछेहु जैसें। मानहु कहा क्रोध तजि तैसें।।
- RCM 5.54.2Open verse →
मिला जाइ जब अनुज तुम्हारा। जातहिं राम तिलक तेहि सारा।।
अर्थ · Hindi
मिला जाइ जब अनुज तुम्हारा। जातहिं राम तिलक तेहि सारा।।
- RCM 5.54.3Open verse →
रावन दूत हमहि सुनि काना। कपिन्ह बाँधि दीन्हे दुख नाना।।
अर्थ · Hindi
रावन दूत हमहि सुनि काना। कपिन्ह बाँधि दीन्हे दुख नाना।।
- RCM 5.54.4Open verse →
श्रवन नासिका काटै लागे। राम सपथ दीन्हे हम त्यागे।।
अर्थ · Hindi
श्रवन नासिका काटै लागे। राम सपथ दीन्हे हम त्यागे।।
- RCM 5.54.5Open verse →
पूँछिहु नाथ राम कटकाई। बदन कोटि सत बरनि न जाई।।
अर्थ · Hindi
पूँछिहु नाथ राम कटकाई। बदन कोटि सत बरनि न जाई।।
- RCM 5.54.6Open verse →
नाना बरन भालु कपि धारी। बिकटानन बिसाल भयकारी।।
अर्थ · Hindi
नाना बरन भालु कपि धारी। बिकटानन बिसाल भयकारी।।
- RCM 5.54.7Open verse →
जेहिं पुर दहेउ हतेउ सुत तोरा। सकल कपिन्ह महँ तेहि बलु थोरा।।
अर्थ · Hindi
जेहिं पुर दहेउ हतेउ सुत तोरा। सकल कपिन्ह महँ तेहि बलु थोरा।।
- RCM 5.54.8Open verse →
अमित नाम भट कठिन कराला। अमित नाग बल बिपुल बिसाला।।
अर्थ · Hindi
अमित नाम भट कठिन कराला। अमित नाग बल बिपुल बिसाला।।
- RCM 5.54.9Open verse →
द्विबिद मयंद नील नल अंगद गद बिकटासि।
अर्थ · Hindi
द्विबिद मयंद नील नल अंगद गद बिकटासि।
- RCM 5.54.10Open verse →
दधिमुख केहरि निसठ सठ जामवंत बलरासि।।54।।
अर्थ · Hindi
दधिमुख केहरि निसठ सठ जामवंत बलरासि।।54।।
- RCM 5.55.1Open verse →
ए कपि सब सुग्रीव समाना। इन्ह सम कोटिन्ह गनइ को नाना।।
अर्थ · Hindi
ए कपि सब सुग्रीव समाना। इन्ह सम कोटिन्ह गनइ को नाना।।
- RCM 5.55.2Open verse →
राम कृपाँ अतुलित बल तिन्हहीं। तृन समान त्रेलोकहि गनहीं।।
अर्थ · Hindi
राम कृपाँ अतुलित बल तिन्हहीं। तृन समान त्रेलोकहि गनहीं।।
- RCM 5.55.3Open verse →
अस मैं सुना श्रवन दसकंधर। पदुम अठारह जूथप बंदर।।
अर्थ · Hindi
अस मैं सुना श्रवन दसकंधर। पदुम अठारह जूथप बंदर।।
- RCM 5.55.4Open verse →
नाथ कटक महँ सो कपि नाहीं। जो न तुम्हहि जीतै रन माहीं।।
अर्थ · Hindi
नाथ कटक महँ सो कपि नाहीं। जो न तुम्हहि जीतै रन माहीं।।
- RCM 5.55.5Open verse →
परम क्रोध मीजहिं सब हाथा। आयसु पै न देहिं रघुनाथा।।
अर्थ · Hindi
परम क्रोध मीजहिं सब हाथा। आयसु पै न देहिं रघुनाथा।।
- RCM 5.55.6Open verse →
सोषहिं सिंधु सहित झष ब्याला। पूरहीं न त भरि कुधर बिसाला।।
अर्थ · Hindi
सोषहिं सिंधु सहित झष ब्याला। पूरहीं न त भरि कुधर बिसाला।।
- RCM 5.55.7Open verse →
मर्दि गर्द मिलवहिं दससीसा। ऐसेइ बचन कहहिं सब कीसा।।
अर्थ · Hindi
मर्दि गर्द मिलवहिं दससीसा। ऐसेइ बचन कहहिं सब कीसा।।
- RCM 5.55.8Open verse →
गर्जहिं तर्जहिं सहज असंका। मानहु ग्रसन चहत हहिं लंका।।
अर्थ · Hindi
गर्जहिं तर्जहिं सहज असंका। मानहु ग्रसन चहत हहिं लंका।।
- RCM 5.55.9Open verse →
-सहज सूर कपि भालु सब पुनि सिर पर प्रभु राम।
अर्थ · Hindi
-सहज सूर कपि भालु सब पुनि सिर पर प्रभु राम।
- RCM 5.55.10Open verse →
रावन काल कोटि कहु जीति सकहिं संग्राम।।55।।
अर्थ · Hindi
रावन काल कोटि कहु जीति सकहिं संग्राम।।55।।
- RCM 5.56.1Open verse →
राम तेज बल बुधि बिपुलाई। सेष सहस सत सकहिं न गाई।।
अर्थ · Hindi
राम तेज बल बुधि बिपुलाई। सेष सहस सत सकहिं न गाई।।
- RCM 5.56.2Open verse →
सक सर एक सोषि सत सागर। तब भ्रातहि पूँछेउ नय नागर।।
अर्थ · Hindi
सक सर एक सोषि सत सागर। तब भ्रातहि पूँछेउ नय नागर।।
- RCM 5.56.3Open verse →
तासु बचन सुनि सागर पाहीं। मागत पंथ कृपा मन माहीं।।
अर्थ · Hindi
तासु बचन सुनि सागर पाहीं। मागत पंथ कृपा मन माहीं।।
- RCM 5.56.4Open verse →
सुनत बचन बिहसा दससीसा। जौं असि मति सहाय कृत कीसा।।
अर्थ · Hindi
सुनत बचन बिहसा दससीसा। जौं असि मति सहाय कृत कीसा।।
- RCM 5.56.5Open verse →
सहज भीरु कर बचन दृढ़ाई। सागर सन ठानी मचलाई।।
अर्थ · Hindi
सहज भीरु कर बचन दृढ़ाई। सागर सन ठानी मचलाई।।
- RCM 5.56.6Open verse →
मूढ़ मृषा का करसि बड़ाई। रिपु बल बुद्धि थाह मैं पाई।।
अर्थ · Hindi
मूढ़ मृषा का करसि बड़ाई। रिपु बल बुद्धि थाह मैं पाई।।
- RCM 5.56.7Open verse →
सचिव सभीत बिभीषन जाकें। बिजय बिभूति कहाँ जग ताकें।।
अर्थ · Hindi
सचिव सभीत बिभीषन जाकें। बिजय बिभूति कहाँ जग ताकें।।
- RCM 5.56.8Open verse →
सुनि खल बचन दूत रिस बाढ़ी। समय बिचारि पत्रिका काढ़ी।।
अर्थ · Hindi
सुनि खल बचन दूत रिस बाढ़ी। समय बिचारि पत्रिका काढ़ी।।
- RCM 5.56.9Open verse →
रामानुज दीन्ही यह पाती। नाथ बचाइ जुड़ावहु छाती।।
अर्थ · Hindi
रामानुज दीन्ही यह पाती। नाथ बचाइ जुड़ावहु छाती।।
- RCM 5.56.10Open verse →
बिहसि बाम कर लीन्ही रावन। सचिव बोलि सठ लाग बचावन।।
अर्थ · Hindi
बिहसि बाम कर लीन्ही रावन। सचिव बोलि सठ लाग बचावन।।
- RCM 5.56.11Open verse →
बातन्ह मनहि रिझाइ सठ जनि घालसि कुल खीस।
अर्थ · Hindi
बातन्ह मनहि रिझाइ सठ जनि घालसि कुल खीस।
- RCM 5.56.12Open verse →
राम बिरोध न उबरसि सरन बिष्नु अज ईस।।56(क)।।
अर्थ · Hindi
राम बिरोध न उबरसि सरन बिष्नु अज ईस।।56(क)।।
- RCM 5.56.13Open verse →
की तजि मान अनुज इव प्रभु पद पंकज भृंग।
अर्थ · Hindi
की तजि मान अनुज इव प्रभु पद पंकज भृंग।
- RCM 5.56.14Open verse →
होहि कि राम सरानल खल कुल सहित पतंग।।56(ख)।।
अर्थ · Hindi
होहि कि राम सरानल खल कुल सहित पतंग।।56(ख)।।
- RCM 5.57.1Open verse →
सुनत सभय मन मुख मुसुकाई। कहत दसानन सबहि सुनाई।।
अर्थ · Hindi
सुनत सभय मन मुख मुसुकाई। कहत दसानन सबहि सुनाई।।
- RCM 5.57.2Open verse →
भूमि परा कर गहत अकासा। लघु तापस कर बाग बिलासा।।
अर्थ · Hindi
भूमि परा कर गहत अकासा। लघु तापस कर बाग बिलासा।।
- RCM 5.57.3Open verse →
कह सुक नाथ सत्य सब बानी। समुझहु छाड़ि प्रकृति अभिमानी।।
अर्थ · Hindi
कह सुक नाथ सत्य सब बानी। समुझहु छाड़ि प्रकृति अभिमानी।।
- RCM 5.57.4Open verse →
सुनहु बचन मम परिहरि क्रोधा। नाथ राम सन तजहु बिरोधा।।
अर्थ · Hindi
सुनहु बचन मम परिहरि क्रोधा। नाथ राम सन तजहु बिरोधा।।
- RCM 5.57.5Open verse →
अति कोमल रघुबीर सुभाऊ। जद्यपि अखिल लोक कर राऊ।।
अर्थ · Hindi
अति कोमल रघुबीर सुभाऊ। जद्यपि अखिल लोक कर राऊ।।
- RCM 5.57.6Open verse →
मिलत कृपा तुम्ह पर प्रभु करिही। उर अपराध न एकउ धरिही।।
अर्थ · Hindi
मिलत कृपा तुम्ह पर प्रभु करिही। उर अपराध न एकउ धरिही।।
- RCM 5.57.7Open verse →
जनकसुता रघुनाथहि दीजे। एतना कहा मोर प्रभु कीजे।
अर्थ · Hindi
जनकसुता रघुनाथहि दीजे। एतना कहा मोर प्रभु कीजे।
- RCM 5.57.8Open verse →
जब तेहिं कहा देन बैदेही। चरन प्रहार कीन्ह सठ तेही।।
अर्थ · Hindi
जब तेहिं कहा देन बैदेही। चरन प्रहार कीन्ह सठ तेही।।
- RCM 5.57.9Open verse →
नाइ चरन सिरु चला सो तहाँ। कृपासिंधु रघुनायक जहाँ।।
अर्थ · Hindi
नाइ चरन सिरु चला सो तहाँ। कृपासिंधु रघुनायक जहाँ।।
- RCM 5.57.10Open verse →
करि प्रनामु निज कथा सुनाई। राम कृपाँ आपनि गति पाई।।
अर्थ · Hindi
करि प्रनामु निज कथा सुनाई। राम कृपाँ आपनि गति पाई।।
- RCM 5.57.11Open verse →
रिषि अगस्ति कीं साप भवानी। राछस भयउ रहा मुनि ग्यानी।।
अर्थ · Hindi
रिषि अगस्ति कीं साप भवानी। राछस भयउ रहा मुनि ग्यानी।।
- RCM 5.57.12Open verse →
बंदि राम पद बारहिं बारा। मुनि निज आश्रम कहुँ पगु धारा।।
अर्थ · Hindi
बंदि राम पद बारहिं बारा। मुनि निज आश्रम कहुँ पगु धारा।।
- RCM 5.57.13Open verse →
बिनय न मानत जलधि जड़ गए तीन दिन बीति।
अर्थ · Hindi
बिनय न मानत जलधि जड़ गए तीन दिन बीति।
- RCM 5.57.14Open verse →
बोले राम सकोप तब भय बिनु होइ न प्रीति।।57।।
अर्थ · Hindi
बोले राम सकोप तब भय बिनु होइ न प्रीति।।57।।
- RCM 5.58.1Open verse →
लछिमन बान सरासन आनू। सोषौं बारिधि बिसिख कृसानू।।
अर्थ · Hindi
लछिमन बान सरासन आनू। सोषौं बारिधि बिसिख कृसानू।।
- RCM 5.58.2Open verse →
सठ सन बिनय कुटिल सन प्रीती। सहज कृपन सन सुंदर नीती।।
अर्थ · Hindi
सठ सन बिनय कुटिल सन प्रीती। सहज कृपन सन सुंदर नीती।।
- RCM 5.58.3Open verse →
ममता रत सन ग्यान कहानी। अति लोभी सन बिरति बखानी।।
अर्थ · Hindi
ममता रत सन ग्यान कहानी। अति लोभी सन बिरति बखानी।।
- RCM 5.58.4Open verse →
क्रोधिहि सम कामिहि हरि कथा। ऊसर बीज बएँ फल जथा।।
अर्थ · Hindi
क्रोधिहि सम कामिहि हरि कथा। ऊसर बीज बएँ फल जथा।।
- RCM 5.58.5Open verse →
अस कहि रघुपति चाप चढ़ावा। यह मत लछिमन के मन भावा।।
अर्थ · Hindi
अस कहि रघुपति चाप चढ़ावा। यह मत लछिमन के मन भावा।।
- RCM 5.58.6Open verse →
संघानेउ प्रभु बिसिख कराला। उठी उदधि उर अंतर ज्वाला।।
अर्थ · Hindi
संघानेउ प्रभु बिसिख कराला। उठी उदधि उर अंतर ज्वाला।।
- RCM 5.58.7Open verse →
मकर उरग झष गन अकुलाने। जरत जंतु जलनिधि जब जाने।।
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मकर उरग झष गन अकुलाने। जरत जंतु जलनिधि जब जाने।।
- RCM 5.58.8Open verse →
कनक थार भरि मनि गन नाना। बिप्र रूप आयउ तजि माना।।
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कनक थार भरि मनि गन नाना। बिप्र रूप आयउ तजि माना।।
- RCM 5.58.9Open verse →
काटेहिं पइ कदरी फरइ कोटि जतन कोउ सींच।
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काटेहिं पइ कदरी फरइ कोटि जतन कोउ सींच।
- RCM 5.58.10Open verse →
बिनय न मान खगेस सुनु डाटेहिं पइ नव नीच।।58।।
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बिनय न मान खगेस सुनु डाटेहिं पइ नव नीच।।58।।
- RCM 5.59.1Open verse →
सभय सिंधु गहि पद प्रभु केरे। छमहु नाथ सब अवगुन मेरे।।
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सभय सिंधु गहि पद प्रभु केरे। छमहु नाथ सब अवगुन मेरे।।
- RCM 5.59.2Open verse →
गगन समीर अनल जल धरनी। इन्ह कइ नाथ सहज जड़ करनी।।
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गगन समीर अनल जल धरनी। इन्ह कइ नाथ सहज जड़ करनी।।
- RCM 5.59.3Open verse →
तव प्रेरित मायाँ उपजाए। सृष्टि हेतु सब ग्रंथनि गाए।।
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तव प्रेरित मायाँ उपजाए। सृष्टि हेतु सब ग्रंथनि गाए।।
- RCM 5.59.4Open verse →
प्रभु आयसु जेहि कहँ जस अहई। सो तेहि भाँति रहे सुख लहई।।
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प्रभु आयसु जेहि कहँ जस अहई। सो तेहि भाँति रहे सुख लहई।।
- RCM 5.59.5Open verse →
प्रभु भल कीन्ही मोहि सिख दीन्ही। मरजादा पुनि तुम्हरी कीन्ही।।
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प्रभु भल कीन्ही मोहि सिख दीन्ही। मरजादा पुनि तुम्हरी कीन्ही।।
- RCM 5.59.6Open verse →
ढोल गवाँर सूद्र पसु नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी।।
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ढोल गवाँर सूद्र पसु नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी।।
- RCM 5.59.7Open verse →
प्रभु प्रताप मैं जाब सुखाई। उतरिहि कटकु न मोरि बड़ाई।।
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प्रभु प्रताप मैं जाब सुखाई। उतरिहि कटकु न मोरि बड़ाई।।
- RCM 5.59.8Open verse →
प्रभु अग्या अपेल श्रुति गाई। करौं सो बेगि जौ तुम्हहि सोहाई।।
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प्रभु अग्या अपेल श्रुति गाई। करौं सो बेगि जौ तुम्हहि सोहाई।।
- RCM 5.59.9Open verse →
सुनत बिनीत बचन अति कह कृपाल मुसुकाइ।
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सुनत बिनीत बचन अति कह कृपाल मुसुकाइ।
- RCM 5.59.10Open verse →
जेहि बिधि उतरै कपि कटकु तात सो कहहु उपाइ।।59।।
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जेहि बिधि उतरै कपि कटकु तात सो कहहु उपाइ।।59।।
- RCM 5.60.1Open verse →
नाथ नील नल कपि द्वौ भाई। लरिकाई रिषि आसिष पाई।।
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नाथ नील नल कपि द्वौ भाई। लरिकाई रिषि आसिष पाई।।
- RCM 5.60.2Open verse →
तिन्ह के परस किएँ गिरि भारे। तरिहहिं जलधि प्रताप तुम्हारे।।
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तिन्ह के परस किएँ गिरि भारे। तरिहहिं जलधि प्रताप तुम्हारे।।
- RCM 5.60.3Open verse →
मैं पुनि उर धरि प्रभुताई। करिहउँ बल अनुमान सहाई।।
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मैं पुनि उर धरि प्रभुताई। करिहउँ बल अनुमान सहाई।।
- RCM 5.60.4Open verse →
एहि बिधि नाथ पयोधि बँधाइअ। जेहिं यह सुजसु लोक तिहुँ गाइअ।।
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एहि बिधि नाथ पयोधि बँधाइअ। जेहिं यह सुजसु लोक तिहुँ गाइअ।।
- RCM 5.60.5Open verse →
एहि सर मम उत्तर तट बासी। हतहु नाथ खल नर अघ रासी।।
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एहि सर मम उत्तर तट बासी। हतहु नाथ खल नर अघ रासी।।
- RCM 5.60.6Open verse →
सुनि कृपाल सागर मन पीरा। तुरतहिं हरी राम रनधीरा।।
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सुनि कृपाल सागर मन पीरा। तुरतहिं हरी राम रनधीरा।।
- RCM 5.60.7Open verse →
देखि राम बल पौरुष भारी। हरषि पयोनिधि भयउ सुखारी।।
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देखि राम बल पौरुष भारी। हरषि पयोनिधि भयउ सुखारी।।
- RCM 5.60.8Open verse →
सकल चरित कहि प्रभुहि सुनावा। चरन बंदि पाथोधि सिधावा।।
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सकल चरित कहि प्रभुहि सुनावा। चरन बंदि पाथोधि सिधावा।।
- RCM 5.60.9Open verse →
निज भवन गवनेउ सिंधु श्रीरघुपतिहि यह मत भायऊ।
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निज भवन गवनेउ सिंधु श्रीरघुपतिहि यह मत भायऊ।
- RCM 5.60.10Open verse →
यह चरित कलि मलहर जथामति दास तुलसी गायऊ।।
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यह चरित कलि मलहर जथामति दास तुलसी गायऊ।।
- RCM 5.60.11Open verse →
सुख भवन संसय समन दवन बिषाद रघुपति गुन गना।।
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सुख भवन संसय समन दवन बिषाद रघुपति गुन गना।।
- RCM 5.60.12Open verse →
तजि सकल आस भरोस गावहि सुनहि संतत सठ मना।।
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तजि सकल आस भरोस गावहि सुनहि संतत सठ मना।।
- RCM 5.60.13Open verse →
सकल सुमंगल दायक रघुनायक गुन गान।
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सकल सुमंगल दायक रघुनायक गुन गान।
- RCM 5.60.14Open verse →
सादर सुनहिं ते तरहिं भव सिंधु बिना जलजान।।60।।
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सादर सुनहिं ते तरहिं भव सिंधु बिना जलजान।।60।।