Ramcharitmanas · अध्याय 4
Kishkindha Kanda
किष्किन्धाकाण्ड
Alliance with Sugriva, slaying of Vali, the great vanara search for Sita.
- RCM 4.1.1Open verse →
आगें चले बहुरि रघुराया। रिष्यमूक परवत निअराया।।
अर्थ · Hindi
आगें चले बहुरि रघुराया। रिष्यमूक परवत निअराया।।
- RCM 4.1.2Open verse →
तहँ रह सचिव सहित सुग्रीवा। आवत देखि अतुल बल सींवा।।
अर्थ · Hindi
तहँ रह सचिव सहित सुग्रीवा। आवत देखि अतुल बल सींवा।।
- RCM 4.1.3Open verse →
अति सभीत कह सुनु हनुमाना। पुरुष जुगल बल रूप निधाना।।
अर्थ · Hindi
अति सभीत कह सुनु हनुमाना। पुरुष जुगल बल रूप निधाना।।
- RCM 4.1.4Open verse →
धरि बटु रूप देखु तैं जाई। कहेसु जानि जियँ सयन बुझाई।।
अर्थ · Hindi
धरि बटु रूप देखु तैं जाई। कहेसु जानि जियँ सयन बुझाई।।
- RCM 4.1.5Open verse →
पठए बालि होहिं मन मैला। भागौं तुरत तजौं यह सैला।।
अर्थ · Hindi
पठए बालि होहिं मन मैला। भागौं तुरत तजौं यह सैला।।
- RCM 4.1.6Open verse →
बिप्र रूप धरि कपि तहँ गयऊ। माथ नाइ पूछत अस भयऊ।।
अर्थ · Hindi
बिप्र रूप धरि कपि तहँ गयऊ। माथ नाइ पूछत अस भयऊ।।
- RCM 4.1.7Open verse →
को तुम्ह स्यामल गौर सरीरा। छत्री रूप फिरहु बन बीरा।।
अर्थ · Hindi
को तुम्ह स्यामल गौर सरीरा। छत्री रूप फिरहु बन बीरा।।
- RCM 4.1.8Open verse →
कठिन भूमि कोमल पद गामी। कवन हेतु बिचरहु बन स्वामी।।
अर्थ · Hindi
कठिन भूमि कोमल पद गामी। कवन हेतु बिचरहु बन स्वामी।।
- RCM 4.1.9Open verse →
मृदुल मनोहर सुंदर गाता। सहत दुसह बन आतप बाता।।
अर्थ · Hindi
मृदुल मनोहर सुंदर गाता। सहत दुसह बन आतप बाता।।
- RCM 4.1.10Open verse →
की तुम्ह तीनि देव महँ कोऊ। नर नारायन की तुम्ह दोऊ।।
अर्थ · Hindi
की तुम्ह तीनि देव महँ कोऊ। नर नारायन की तुम्ह दोऊ।।
- RCM 4.1.11Open verse →
जग कारन तारन भव भंजन धरनी भार।
अर्थ · Hindi
जग कारन तारन भव भंजन धरनी भार।
- RCM 4.1.12Open verse →
की तुम्ह अकिल भुवन पति लीन्ह मनुज अवतार।।1।।
अर्थ · Hindi
की तुम्ह अकिल भुवन पति लीन्ह मनुज अवतार।।1।।
- RCM 4.2.1Open verse →
कोसलेस दसरथ के जाए । हम पितु बचन मानि बन आए।।
अर्थ · Hindi
कोसलेस दसरथ के जाए । हम पितु बचन मानि बन आए।।
- RCM 4.2.2Open verse →
नाम राम लछिमन दौउ भाई। संग नारि सुकुमारि सुहाई।।
अर्थ · Hindi
नाम राम लछिमन दौउ भाई। संग नारि सुकुमारि सुहाई।।
- RCM 4.2.3Open verse →
इहाँ हरि निसिचर बैदेही। बिप्र फिरहिं हम खोजत तेही।।
अर्थ · Hindi
इहाँ हरि निसिचर बैदेही। बिप्र फिरहिं हम खोजत तेही।।
- RCM 4.2.4Open verse →
आपन चरित कहा हम गाई। कहहु बिप्र निज कथा बुझाई।।
अर्थ · Hindi
आपन चरित कहा हम गाई। कहहु बिप्र निज कथा बुझाई।।
- RCM 4.2.5Open verse →
प्रभु पहिचानि परेउ गहि चरना। सो सुख उमा नहिं बरना।।
अर्थ · Hindi
प्रभु पहिचानि परेउ गहि चरना। सो सुख उमा नहिं बरना।।
- RCM 4.2.6Open verse →
पुलकित तन मुख आव न बचना। देखत रुचिर बेष कै रचना।।
अर्थ · Hindi
पुलकित तन मुख आव न बचना। देखत रुचिर बेष कै रचना।।
- RCM 4.2.7Open verse →
पुनि धीरजु धरि अस्तुति कीन्ही। हरष हृदयँ निज नाथहि चीन्ही।।
अर्थ · Hindi
पुनि धीरजु धरि अस्तुति कीन्ही। हरष हृदयँ निज नाथहि चीन्ही।।
- RCM 4.2.8Open verse →
मोर न्याउ मैं पूछा साईं। तुम्ह पूछहु कस नर की नाईं।।
अर्थ · Hindi
मोर न्याउ मैं पूछा साईं। तुम्ह पूछहु कस नर की नाईं।।
- RCM 4.2.9Open verse →
तव माया बस फिरउँ भुलाना। ता ते मैं नहिं प्रभु पहिचाना।।
अर्थ · Hindi
तव माया बस फिरउँ भुलाना। ता ते मैं नहिं प्रभु पहिचाना।।
- RCM 4.2.10Open verse →
एकु मैं मंद मोहबस कुटिल हृदय अग्यान।
अर्थ · Hindi
एकु मैं मंद मोहबस कुटिल हृदय अग्यान।
- RCM 4.2.11Open verse →
पुनि प्रभु मोहि बिसारेउ दीनबंधु भगवान।।2।।
अर्थ · Hindi
पुनि प्रभु मोहि बिसारेउ दीनबंधु भगवान।।2।।
- RCM 4.3.1Open verse →
जदपि नाथ बहु अवगुन मोरें। सेवक प्रभुहि परै जनि भोरें।।
अर्थ · Hindi
जदपि नाथ बहु अवगुन मोरें। सेवक प्रभुहि परै जनि भोरें।।
- RCM 4.3.2Open verse →
नाथ जीव तव मायाँ मोहा। सो निस्तरइ तुम्हारेहिं छोहा।।
अर्थ · Hindi
नाथ जीव तव मायाँ मोहा। सो निस्तरइ तुम्हारेहिं छोहा।।
- RCM 4.3.3Open verse →
ता पर मैं रघुबीर दोहाई। जानउँ नहिं कछु भजन उपाई।।
अर्थ · Hindi
ता पर मैं रघुबीर दोहाई। जानउँ नहिं कछु भजन उपाई।।
- RCM 4.3.4Open verse →
सेवक सुत पति मातु भरोसें। रहइ असोच बनइ प्रभु पोसें।।
अर्थ · Hindi
सेवक सुत पति मातु भरोसें। रहइ असोच बनइ प्रभु पोसें।।
- RCM 4.3.5Open verse →
अस कहि परेउ चरन अकुलाई। निज तनु प्रगटि प्रीति उर छाई।।
अर्थ · Hindi
अस कहि परेउ चरन अकुलाई। निज तनु प्रगटि प्रीति उर छाई।।
- RCM 4.3.6Open verse →
तब रघुपति उठाइ उर लावा। निज लोचन जल सींचि जुड़ावा।।
अर्थ · Hindi
तब रघुपति उठाइ उर लावा। निज लोचन जल सींचि जुड़ावा।।
- RCM 4.3.7Open verse →
सुनु कपि जियँ मानसि जनि ऊना। तैं मम प्रिय लछिमन ते दूना।।
अर्थ · Hindi
सुनु कपि जियँ मानसि जनि ऊना। तैं मम प्रिय लछिमन ते दूना।।
- RCM 4.3.8Open verse →
समदरसी मोहि कह सब कोऊ। सेवक प्रिय अनन्यगति सोऊ।।
अर्थ · Hindi
समदरसी मोहि कह सब कोऊ। सेवक प्रिय अनन्यगति सोऊ।।
- RCM 4.3.9Open verse →
सो अनन्य जाकें असि मति न टरइ हनुमंत।
अर्थ · Hindi
सो अनन्य जाकें असि मति न टरइ हनुमंत।
- RCM 4.3.10Open verse →
मैं सेवक सचराचर रूप स्वामि भगवंत।।3।।
अर्थ · Hindi
मैं सेवक सचराचर रूप स्वामि भगवंत।।3।।
- RCM 4.4.1Open verse →
देखि पवन सुत पति अनुकूला। हृदयँ हरष बीती सब सूला।।
अर्थ · Hindi
देखि पवन सुत पति अनुकूला। हृदयँ हरष बीती सब सूला।।
- RCM 4.4.2Open verse →
नाथ सैल पर कपिपति रहई। सो सुग्रीव दास तव अहई।।
अर्थ · Hindi
नाथ सैल पर कपिपति रहई। सो सुग्रीव दास तव अहई।।
- RCM 4.4.3Open verse →
तेहि सन नाथ मयत्री कीजे। दीन जानि तेहि अभय करीजे।।
अर्थ · Hindi
तेहि सन नाथ मयत्री कीजे। दीन जानि तेहि अभय करीजे।।
- RCM 4.4.4Open verse →
सो सीता कर खोज कराइहि। जहँ तहँ मरकट कोटि पठाइहि।।
अर्थ · Hindi
सो सीता कर खोज कराइहि। जहँ तहँ मरकट कोटि पठाइहि।।
- RCM 4.4.5Open verse →
एहि बिधि सकल कथा समुझाई। लिए दुऔ जन पीठि चढ़ाई।।
अर्थ · Hindi
एहि बिधि सकल कथा समुझाई। लिए दुऔ जन पीठि चढ़ाई।।
- RCM 4.4.6Open verse →
जब सुग्रीवँ राम कहुँ देखा। अतिसय जन्म धन्य करि लेखा।।
अर्थ · Hindi
जब सुग्रीवँ राम कहुँ देखा। अतिसय जन्म धन्य करि लेखा।।
- RCM 4.4.7Open verse →
सादर मिलेउ नाइ पद माथा। भैंटेउ अनुज सहित रघुनाथा।।
अर्थ · Hindi
सादर मिलेउ नाइ पद माथा। भैंटेउ अनुज सहित रघुनाथा।।
- RCM 4.4.8Open verse →
कपि कर मन बिचार एहि रीती। करिहहिं बिधि मो सन ए प्रीती।।
अर्थ · Hindi
कपि कर मन बिचार एहि रीती। करिहहिं बिधि मो सन ए प्रीती।।
- RCM 4.4.9Open verse →
तब हनुमंत उभय दिसि की सब कथा सुनाइ।।
अर्थ · Hindi
तब हनुमंत उभय दिसि की सब कथा सुनाइ।।
- RCM 4.4.10Open verse →
पावक साखी देइ करि जोरी प्रीती दृढ़ाइ।।4।।
अर्थ · Hindi
पावक साखी देइ करि जोरी प्रीती दृढ़ाइ।।4।।
- RCM 4.5.1Open verse →
कीन्ही प्रीति कछु बीच न राखा। लछमिन राम चरित सब भाषा।।
अर्थ · Hindi
कीन्ही प्रीति कछु बीच न राखा। लछमिन राम चरित सब भाषा।।
- RCM 4.5.2Open verse →
कह सुग्रीव नयन भरि बारी। मिलिहि नाथ मिथिलेसकुमारी।।
अर्थ · Hindi
कह सुग्रीव नयन भरि बारी। मिलिहि नाथ मिथिलेसकुमारी।।
- RCM 4.5.3Open verse →
मंत्रिन्ह सहित इहाँ एक बारा। बैठ रहेउँ मैं करत बिचारा।।
अर्थ · Hindi
मंत्रिन्ह सहित इहाँ एक बारा। बैठ रहेउँ मैं करत बिचारा।।
- RCM 4.5.4Open verse →
गगन पंथ देखी मैं जाता। परबस परी बहुत बिलपाता।।
अर्थ · Hindi
गगन पंथ देखी मैं जाता। परबस परी बहुत बिलपाता।।
- RCM 4.5.5Open verse →
राम राम हा राम पुकारी। हमहि देखि दीन्हेउ पट डारी।।
अर्थ · Hindi
राम राम हा राम पुकारी। हमहि देखि दीन्हेउ पट डारी।।
- RCM 4.5.6Open verse →
मागा राम तुरत तेहिं दीन्हा। पट उर लाइ सोच अति कीन्हा।।
अर्थ · Hindi
मागा राम तुरत तेहिं दीन्हा। पट उर लाइ सोच अति कीन्हा।।
- RCM 4.5.7Open verse →
कह सुग्रीव सुनहु रघुबीरा। तजहु सोच मन आनहु धीरा।।
अर्थ · Hindi
कह सुग्रीव सुनहु रघुबीरा। तजहु सोच मन आनहु धीरा।।
- RCM 4.5.8Open verse →
सब प्रकार करिहउँ सेवकाई। जेहि बिधि मिलिहि जानकी आई।।
अर्थ · Hindi
सब प्रकार करिहउँ सेवकाई। जेहि बिधि मिलिहि जानकी आई।।
- RCM 4.5.9Open verse →
सखा बचन सुनि हरषे कृपासिधु बलसींव।
अर्थ · Hindi
सखा बचन सुनि हरषे कृपासिधु बलसींव।
- RCM 4.5.10Open verse →
कारन कवन बसहु बन मोहि कहहु सुग्रीव ।।5।।
अर्थ · Hindi
कारन कवन बसहु बन मोहि कहहु सुग्रीव ।।5।।
- RCM 4.6.1Open verse →
नात बालि अरु मैं द्वौ भाई। प्रीति रही कछु बरनि न जाई।।
अर्थ · Hindi
नात बालि अरु मैं द्वौ भाई। प्रीति रही कछु बरनि न जाई।।
- RCM 4.6.2Open verse →
मय सुत मायावी तेहि नाऊँ। आवा सो प्रभु हमरें गाऊँ।।
अर्थ · Hindi
मय सुत मायावी तेहि नाऊँ। आवा सो प्रभु हमरें गाऊँ।।
- RCM 4.6.3Open verse →
अर्ध राति पुर द्वार पुकारा। बाली रिपु बल सहै न पारा।।
अर्थ · Hindi
अर्ध राति पुर द्वार पुकारा। बाली रिपु बल सहै न पारा।।
- RCM 4.6.4Open verse →
धावा बालि देखि सो भागा। मैं पुनि गयउँ बंधु सँग लागा।।
अर्थ · Hindi
धावा बालि देखि सो भागा। मैं पुनि गयउँ बंधु सँग लागा।।
- RCM 4.6.5Open verse →
गिरिबर गुहाँ पैठ सो जाई। तब बालीं मोहि कहा बुझाई।।
अर्थ · Hindi
गिरिबर गुहाँ पैठ सो जाई। तब बालीं मोहि कहा बुझाई।।
- RCM 4.6.6Open verse →
परिखेसु मोहि एक पखवारा। नहिं आवौं तब जानेसु मारा।।
अर्थ · Hindi
परिखेसु मोहि एक पखवारा। नहिं आवौं तब जानेसु मारा।।
- RCM 4.6.7Open verse →
मास दिवस तहँ रहेउँ खरारी। निसरी रुधिर धार तहँ भारी।।
अर्थ · Hindi
मास दिवस तहँ रहेउँ खरारी। निसरी रुधिर धार तहँ भारी।।
- RCM 4.6.8Open verse →
बालि हतेसि मोहि मारिहि आई। सिला देइ तहँ चलेउँ पराई।।
अर्थ · Hindi
बालि हतेसि मोहि मारिहि आई। सिला देइ तहँ चलेउँ पराई।।
- RCM 4.6.9Open verse →
मंत्रिन्ह पुर देखा बिनु साईं। दीन्हेउ मोहि राज बरिआई।।
अर्थ · Hindi
मंत्रिन्ह पुर देखा बिनु साईं। दीन्हेउ मोहि राज बरिआई।।
- RCM 4.6.10Open verse →
बालि ताहि मारि गृह आवा। देखि मोहि जियँ भेद बढ़ावा।।
अर्थ · Hindi
बालि ताहि मारि गृह आवा। देखि मोहि जियँ भेद बढ़ावा।।
- RCM 4.6.11Open verse →
रिपु सम मोहि मारेसि अति भारी। हरि लीन्हेसि सर्बसु अरु नारी।।
अर्थ · Hindi
रिपु सम मोहि मारेसि अति भारी। हरि लीन्हेसि सर्बसु अरु नारी।।
- RCM 4.6.12Open verse →
ताकें भय रघुबीर कृपाला। सकल भुवन मैं फिरेउँ बिहाला।।
अर्थ · Hindi
ताकें भय रघुबीर कृपाला। सकल भुवन मैं फिरेउँ बिहाला।।
- RCM 4.6.13Open verse →
इहाँ साप बस आवत नाहीं। तदपि सभीत रहउँ मन माहीं।।
अर्थ · Hindi
इहाँ साप बस आवत नाहीं। तदपि सभीत रहउँ मन माहीं।।
- RCM 4.6.14Open verse →
सुनि सेवक दुख दीनदयाला। फरकि उठीं द्वै भुजा बिसाला।।
अर्थ · Hindi
सुनि सेवक दुख दीनदयाला। फरकि उठीं द्वै भुजा बिसाला।।
- RCM 4.6.15Open verse →
सुनु सुग्रीव मारिहउँ बालिहि एकहिं बान।
अर्थ · Hindi
सुनु सुग्रीव मारिहउँ बालिहि एकहिं बान।
- RCM 4.6.16Open verse →
ब्रम्ह रुद्र सरनागत गएँ न उबरिहिं प्रान।।6।।
अर्थ · Hindi
ब्रम्ह रुद्र सरनागत गएँ न उबरिहिं प्रान।।6।।
- RCM 4.7.1Open verse →
जे न मित्र दुख होहिं दुखारी। तिन्हहि बिलोकत पातक भारी।।
अर्थ · Hindi
जे न मित्र दुख होहिं दुखारी। तिन्हहि बिलोकत पातक भारी।।
- RCM 4.7.2Open verse →
निज दुख गिरि सम रज करि जाना। मित्रक दुख रज मेरु समाना।।
अर्थ · Hindi
निज दुख गिरि सम रज करि जाना। मित्रक दुख रज मेरु समाना।।
- RCM 4.7.3Open verse →
जिन्ह कें असि मति सहज न आई। ते सठ कत हठि करत मिताई।।
अर्थ · Hindi
जिन्ह कें असि मति सहज न आई। ते सठ कत हठि करत मिताई।।
- RCM 4.7.4Open verse →
कुपथ निवारि सुपंथ चलावा। गुन प्रगटे अवगुनन्हि दुरावा।।
अर्थ · Hindi
कुपथ निवारि सुपंथ चलावा। गुन प्रगटे अवगुनन्हि दुरावा।।
- RCM 4.7.5Open verse →
देत लेत मन संक न धरई। बल अनुमान सदा हित करई।।
अर्थ · Hindi
देत लेत मन संक न धरई। बल अनुमान सदा हित करई।।
- RCM 4.7.6Open verse →
बिपति काल कर सतगुन नेहा। श्रुति कह संत मित्र गुन एहा।।
अर्थ · Hindi
बिपति काल कर सतगुन नेहा। श्रुति कह संत मित्र गुन एहा।।
- RCM 4.7.7Open verse →
आगें कह मृदु बचन बनाई। पाछें अनहित मन कुटिलाई।।
अर्थ · Hindi
आगें कह मृदु बचन बनाई। पाछें अनहित मन कुटिलाई।।
- RCM 4.7.8Open verse →
जा कर चित अहि गति सम भाई। अस कुमित्र परिहरेहि भलाई।।
अर्थ · Hindi
जा कर चित अहि गति सम भाई। अस कुमित्र परिहरेहि भलाई।।
- RCM 4.7.9Open verse →
सेवक सठ नृप कृपन कुनारी। कपटी मित्र सूल सम चारी।।
अर्थ · Hindi
सेवक सठ नृप कृपन कुनारी। कपटी मित्र सूल सम चारी।।
- RCM 4.7.10Open verse →
सखा सोच त्यागहु बल मोरें। सब बिधि घटब काज मैं तोरें।।
अर्थ · Hindi
सखा सोच त्यागहु बल मोरें। सब बिधि घटब काज मैं तोरें।।
- RCM 4.7.11Open verse →
कह सुग्रीव सुनहु रघुबीरा। बालि महाबल अति रनधीरा।।
अर्थ · Hindi
कह सुग्रीव सुनहु रघुबीरा। बालि महाबल अति रनधीरा।।
- RCM 4.7.12Open verse →
दुंदुभी अस्थि ताल देखराए। बिनु प्रयास रघुनाथ ढहाए।।
अर्थ · Hindi
दुंदुभी अस्थि ताल देखराए। बिनु प्रयास रघुनाथ ढहाए।।
- RCM 4.7.13Open verse →
देखि अमित बल बाढ़ी प्रीती। बालि बधब इन्ह भइ परतीती।।
अर्थ · Hindi
देखि अमित बल बाढ़ी प्रीती। बालि बधब इन्ह भइ परतीती।।
- RCM 4.7.14Open verse →
बार बार नावइ पद सीसा। प्रभुहि जानि मन हरष कपीसा।।
अर्थ · Hindi
बार बार नावइ पद सीसा। प्रभुहि जानि मन हरष कपीसा।।
- RCM 4.7.15Open verse →
उपजा ग्यान बचन तब बोला। नाथ कृपाँ मन भयउ अलोला।।
अर्थ · Hindi
उपजा ग्यान बचन तब बोला। नाथ कृपाँ मन भयउ अलोला।।
- RCM 4.7.16Open verse →
सुख संपति परिवार बड़ाई। सब परिहरि करिहउँ सेवकाई।।
अर्थ · Hindi
सुख संपति परिवार बड़ाई। सब परिहरि करिहउँ सेवकाई।।
- RCM 4.7.17Open verse →
ए सब रामभगति के बाधक। कहहिं संत तब पद अवराधक।।
अर्थ · Hindi
ए सब रामभगति के बाधक। कहहिं संत तब पद अवराधक।।
- RCM 4.7.18Open verse →
सत्रु मित्र सुख दुख जग माहीं। माया कृत परमारथ नाहीं।।
अर्थ · Hindi
सत्रु मित्र सुख दुख जग माहीं। माया कृत परमारथ नाहीं।।
- RCM 4.7.19Open verse →
बालि परम हित जासु प्रसादा। मिलेहु राम तुम्ह समन बिषादा।।
अर्थ · Hindi
बालि परम हित जासु प्रसादा। मिलेहु राम तुम्ह समन बिषादा।।
- RCM 4.7.20Open verse →
सपनें जेहि सन होइ लराई। जागें समुझत मन सकुचाई।।
अर्थ · Hindi
सपनें जेहि सन होइ लराई। जागें समुझत मन सकुचाई।।
- RCM 4.7.21Open verse →
अब प्रभु कृपा करहु एहि भाँती। सब तजि भजनु करौं दिन राती।।
अर्थ · Hindi
अब प्रभु कृपा करहु एहि भाँती। सब तजि भजनु करौं दिन राती।।
- RCM 4.7.22Open verse →
सुनि बिराग संजुत कपि बानी। बोले बिहँसि रामु धनुपानी।।
अर्थ · Hindi
सुनि बिराग संजुत कपि बानी। बोले बिहँसि रामु धनुपानी।।
- RCM 4.7.23Open verse →
जो कछु कहेहु सत्य सब सोई। सखा बचन मम मृषा न होई।।
अर्थ · Hindi
जो कछु कहेहु सत्य सब सोई। सखा बचन मम मृषा न होई।।
- RCM 4.7.24Open verse →
नट मरकट इव सबहि नचावत। रामु खगेस बेद अस गावत।।
अर्थ · Hindi
नट मरकट इव सबहि नचावत। रामु खगेस बेद अस गावत।।
- RCM 4.7.25Open verse →
लै सुग्रीव संग रघुनाथा। चले चाप सायक गहि हाथा।।
अर्थ · Hindi
लै सुग्रीव संग रघुनाथा। चले चाप सायक गहि हाथा।।
- RCM 4.7.26Open verse →
तब रघुपति सुग्रीव पठावा। गर्जेसि जाइ निकट बल पावा।।
अर्थ · Hindi
तब रघुपति सुग्रीव पठावा। गर्जेसि जाइ निकट बल पावा।।
- RCM 4.7.27Open verse →
सुनत बालि क्रोधातुर धावा। गहि कर चरन नारि समुझावा।।
अर्थ · Hindi
सुनत बालि क्रोधातुर धावा। गहि कर चरन नारि समुझावा।।
- RCM 4.7.28Open verse →
सुनु पति जिन्हहि मिलेउ सुग्रीवा। ते द्वौ बंधु तेज बल सींवा।।
अर्थ · Hindi
सुनु पति जिन्हहि मिलेउ सुग्रीवा। ते द्वौ बंधु तेज बल सींवा।।
- RCM 4.7.29Open verse →
कोसलेस सुत लछिमन रामा। कालहु जीति सकहिं संग्रामा।।
अर्थ · Hindi
कोसलेस सुत लछिमन रामा। कालहु जीति सकहिं संग्रामा।।
- RCM 4.7.30Open verse →
कह बालि सुनु भीरु प्रिय समदरसी रघुनाथ।
अर्थ · Hindi
कह बालि सुनु भीरु प्रिय समदरसी रघुनाथ।
- RCM 4.7.31Open verse →
जौं कदाचि मोहि मारहिं तौ पुनि होउँ सनाथ।।7।।
अर्थ · Hindi
जौं कदाचि मोहि मारहिं तौ पुनि होउँ सनाथ।।7।।
- RCM 4.8.1Open verse →
अस कहि चला महा अभिमानी। तृन समान सुग्रीवहि जानी।।
अर्थ · Hindi
अस कहि चला महा अभिमानी। तृन समान सुग्रीवहि जानी।।
- RCM 4.8.2Open verse →
भिरे उभौ बाली अति तर्जा । मुठिका मारि महाधुनि गर्जा।।
अर्थ · Hindi
भिरे उभौ बाली अति तर्जा । मुठिका मारि महाधुनि गर्जा।।
- RCM 4.8.3Open verse →
तब सुग्रीव बिकल होइ भागा। मुष्टि प्रहार बज्र सम लागा।।
अर्थ · Hindi
तब सुग्रीव बिकल होइ भागा। मुष्टि प्रहार बज्र सम लागा।।
- RCM 4.8.4Open verse →
मैं जो कहा रघुबीर कृपाला। बंधु न होइ मोर यह काला।।
अर्थ · Hindi
मैं जो कहा रघुबीर कृपाला। बंधु न होइ मोर यह काला।।
- RCM 4.8.5Open verse →
एकरूप तुम्ह भ्राता दोऊ। तेहि भ्रम तें नहिं मारेउँ सोऊ।।
अर्थ · Hindi
एकरूप तुम्ह भ्राता दोऊ। तेहि भ्रम तें नहिं मारेउँ सोऊ।।
- RCM 4.8.6Open verse →
कर परसा सुग्रीव सरीरा। तनु भा कुलिस गई सब पीरा।।
अर्थ · Hindi
कर परसा सुग्रीव सरीरा। तनु भा कुलिस गई सब पीरा।।
- RCM 4.8.7Open verse →
मेली कंठ सुमन कै माला। पठवा पुनि बल देइ बिसाला।।
अर्थ · Hindi
मेली कंठ सुमन कै माला। पठवा पुनि बल देइ बिसाला।।
- RCM 4.8.8Open verse →
पुनि नाना बिधि भई लराई। बिटप ओट देखहिं रघुराई।।
अर्थ · Hindi
पुनि नाना बिधि भई लराई। बिटप ओट देखहिं रघुराई।।
- RCM 4.8.9Open verse →
बहु छल बल सुग्रीव कर हियँ हारा भय मानि।
अर्थ · Hindi
बहु छल बल सुग्रीव कर हियँ हारा भय मानि।
- RCM 4.8.10Open verse →
मारा बालि राम तब हृदय माझ सर तानि।।8।।
अर्थ · Hindi
मारा बालि राम तब हृदय माझ सर तानि।।8।।
- RCM 4.9.1Open verse →
परा बिकल महि सर के लागें। पुनि उठि बैठ देखि प्रभु आगें।।
अर्थ · Hindi
परा बिकल महि सर के लागें। पुनि उठि बैठ देखि प्रभु आगें।।
- RCM 4.9.2Open verse →
स्याम गात सिर जटा बनाएँ। अरुन नयन सर चाप चढ़ाएँ।।
अर्थ · Hindi
स्याम गात सिर जटा बनाएँ। अरुन नयन सर चाप चढ़ाएँ।।
- RCM 4.9.3Open verse →
पुनि पुनि चितइ चरन चित दीन्हा। सुफल जन्म माना प्रभु चीन्हा।।
अर्थ · Hindi
पुनि पुनि चितइ चरन चित दीन्हा। सुफल जन्म माना प्रभु चीन्हा।।
- RCM 4.9.4Open verse →
हृदयँ प्रीति मुख बचन कठोरा। बोला चितइ राम की ओरा।।
अर्थ · Hindi
हृदयँ प्रीति मुख बचन कठोरा। बोला चितइ राम की ओरा।।
- RCM 4.9.5Open verse →
धर्म हेतु अवतरेहु गोसाई। मारेहु मोहि ब्याध की नाई।।
अर्थ · Hindi
धर्म हेतु अवतरेहु गोसाई। मारेहु मोहि ब्याध की नाई।।
- RCM 4.9.6Open verse →
मैं बैरी सुग्रीव पिआरा। अवगुन कबन नाथ मोहि मारा।।
अर्थ · Hindi
मैं बैरी सुग्रीव पिआरा। अवगुन कबन नाथ मोहि मारा।।
- RCM 4.9.7Open verse →
अनुज बधू भगिनी सुत नारी। सुनु सठ कन्या सम ए चारी।।
अर्थ · Hindi
अनुज बधू भगिनी सुत नारी। सुनु सठ कन्या सम ए चारी।।
- RCM 4.9.8Open verse →
इन्हहि कुद्दष्टि बिलोकइ जोई। ताहि बधें कछु पाप न होई।।
अर्थ · Hindi
इन्हहि कुद्दष्टि बिलोकइ जोई। ताहि बधें कछु पाप न होई।।
- RCM 4.9.9Open verse →
मुढ़ तोहि अतिसय अभिमाना। नारि सिखावन करसि न काना।।
अर्थ · Hindi
मुढ़ तोहि अतिसय अभिमाना। नारि सिखावन करसि न काना।।
- RCM 4.9.10Open verse →
मम भुज बल आश्रित तेहि जानी। मारा चहसि अधम अभिमानी।।
अर्थ · Hindi
मम भुज बल आश्रित तेहि जानी। मारा चहसि अधम अभिमानी।।
- RCM 4.9.11Open verse →
सुनहु राम स्वामी सन चल न चातुरी मोरि।
अर्थ · Hindi
सुनहु राम स्वामी सन चल न चातुरी मोरि।
- RCM 4.9.12Open verse →
प्रभु अजहूँ मैं पापी अंतकाल गति तोरि।।9।।
अर्थ · Hindi
प्रभु अजहूँ मैं पापी अंतकाल गति तोरि।।9।।
- RCM 4.10.1Open verse →
सुनत राम अति कोमल बानी। बालि सीस परसेउ निज पानी।।
अर्थ · Hindi
सुनत राम अति कोमल बानी। बालि सीस परसेउ निज पानी।।
- RCM 4.10.2Open verse →
अचल करौं तनु राखहु प्राना। बालि कहा सुनु कृपानिधाना।।
अर्थ · Hindi
अचल करौं तनु राखहु प्राना। बालि कहा सुनु कृपानिधाना।।
- RCM 4.10.3Open verse →
जन्म जन्म मुनि जतनु कराहीं। अंत राम कहि आवत नाहीं।।
अर्थ · Hindi
जन्म जन्म मुनि जतनु कराहीं। अंत राम कहि आवत नाहीं।।
- RCM 4.10.4Open verse →
जासु नाम बल संकर कासी। देत सबहि सम गति अविनासी।।
अर्थ · Hindi
जासु नाम बल संकर कासी। देत सबहि सम गति अविनासी।।
- RCM 4.10.5Open verse →
मम लोचन गोचर सोइ आवा। बहुरि कि प्रभु अस बनिहि बनावा।।
अर्थ · Hindi
मम लोचन गोचर सोइ आवा। बहुरि कि प्रभु अस बनिहि बनावा।।
- RCM 4.11.1Open verse →
राम बालि निज धाम पठावा। नगर लोग सब ब्याकुल धावा।।
अर्थ · Hindi
राम बालि निज धाम पठावा। नगर लोग सब ब्याकुल धावा।।
- RCM 4.11.2Open verse →
नाना बिधि बिलाप कर तारा। छूटे केस न देह सँभारा।।
अर्थ · Hindi
नाना बिधि बिलाप कर तारा। छूटे केस न देह सँभारा।।
- RCM 4.11.3Open verse →
तारा बिकल देखि रघुराया । दीन्ह ग्यान हरि लीन्ही माया।।
अर्थ · Hindi
तारा बिकल देखि रघुराया । दीन्ह ग्यान हरि लीन्ही माया।।
- RCM 4.11.4Open verse →
छिति जल पावक गगन समीरा। पंच रचित अति अधम सरीरा।।
अर्थ · Hindi
छिति जल पावक गगन समीरा। पंच रचित अति अधम सरीरा।।
- RCM 4.11.5Open verse →
प्रगट सो तनु तव आगें सोवा। जीव नित्य केहि लगि तुम्ह रोवा।।
अर्थ · Hindi
प्रगट सो तनु तव आगें सोवा। जीव नित्य केहि लगि तुम्ह रोवा।।
- RCM 4.11.6Open verse →
उपजा ग्यान चरन तब लागी। लीन्हेसि परम भगति बर मागी।।
अर्थ · Hindi
उपजा ग्यान चरन तब लागी। लीन्हेसि परम भगति बर मागी।।
- RCM 4.11.7Open verse →
उमा दारु जोषित की नाई। सबहि नचावत रामु गोसाई।।
अर्थ · Hindi
उमा दारु जोषित की नाई। सबहि नचावत रामु गोसाई।।
- RCM 4.11.8Open verse →
तब सुग्रीवहि आयसु दीन्हा। मृतक कर्म बिधिबत सब कीन्हा।।
अर्थ · Hindi
तब सुग्रीवहि आयसु दीन्हा। मृतक कर्म बिधिबत सब कीन्हा।।
- RCM 4.11.9Open verse →
राम कहा अनुजहि समुझाई। राज देहु सुग्रीवहि जाई।।
अर्थ · Hindi
राम कहा अनुजहि समुझाई। राज देहु सुग्रीवहि जाई।।
- RCM 4.11.10Open verse →
रघुपति चरन नाइ करि माथा। चले सकल प्रेरित रघुनाथा।।
अर्थ · Hindi
रघुपति चरन नाइ करि माथा। चले सकल प्रेरित रघुनाथा।।
- RCM 4.11.11Open verse →
लछिमन तुरत बोलाए पुरजन बिप्र समाज।
अर्थ · Hindi
लछिमन तुरत बोलाए पुरजन बिप्र समाज।
- RCM 4.11.12Open verse →
राजु दीन्ह सुग्रीव कहँ अंगद कहँ जुबराज।।11।।
अर्थ · Hindi
राजु दीन्ह सुग्रीव कहँ अंगद कहँ जुबराज।।11।।
- RCM 4.12.1Open verse →
उमा राम सम हित जग माहीं। गुरु पितु मातु बंधु प्रभु नाहीं।।
अर्थ · Hindi
उमा राम सम हित जग माहीं। गुरु पितु मातु बंधु प्रभु नाहीं।।
- RCM 4.12.2Open verse →
सुर नर मुनि सब कै यह रीती। स्वारथ लागि करहिं सब प्रीती।।
अर्थ · Hindi
सुर नर मुनि सब कै यह रीती। स्वारथ लागि करहिं सब प्रीती।।
- RCM 4.12.3Open verse →
बालि त्रास ब्याकुल दिन राती। तन बहु ब्रन चिंताँ जर छाती।।
अर्थ · Hindi
बालि त्रास ब्याकुल दिन राती। तन बहु ब्रन चिंताँ जर छाती।।
- RCM 4.12.4Open verse →
सोइ सुग्रीव कीन्ह कपिराऊ। अति कृपाल रघुबीर सुभाऊ।।
अर्थ · Hindi
सोइ सुग्रीव कीन्ह कपिराऊ। अति कृपाल रघुबीर सुभाऊ।।
- RCM 4.12.5Open verse →
जानतहुँ अस प्रभु परिहरहीं। काहे न बिपति जाल नर परहीं।।
अर्थ · Hindi
जानतहुँ अस प्रभु परिहरहीं। काहे न बिपति जाल नर परहीं।।
- RCM 4.12.6Open verse →
पुनि सुग्रीवहि लीन्ह बोलाई। बहु प्रकार नृपनीति सिखाई।।
अर्थ · Hindi
पुनि सुग्रीवहि लीन्ह बोलाई। बहु प्रकार नृपनीति सिखाई।।
- RCM 4.12.7Open verse →
कह प्रभु सुनु सुग्रीव हरीसा। पुर न जाउँ दस चारि बरीसा।।
अर्थ · Hindi
कह प्रभु सुनु सुग्रीव हरीसा। पुर न जाउँ दस चारि बरीसा।।
- RCM 4.12.8Open verse →
गत ग्रीषम बरषा रितु आई। रहिहउँ निकट सैल पर छाई।।
अर्थ · Hindi
गत ग्रीषम बरषा रितु आई। रहिहउँ निकट सैल पर छाई।।
- RCM 4.12.9Open verse →
अंगद सहित करहु तुम्ह राजू। संतत हृदय धरेहु मम काजू।।
अर्थ · Hindi
अंगद सहित करहु तुम्ह राजू। संतत हृदय धरेहु मम काजू।।
- RCM 4.12.10Open verse →
जब सुग्रीव भवन फिरि आए। रामु प्रबरषन गिरि पर छाए।।
अर्थ · Hindi
जब सुग्रीव भवन फिरि आए। रामु प्रबरषन गिरि पर छाए।।
- RCM 4.12.11Open verse →
प्रथमहिं देवन्ह गिरि गुहा राखेउ रुचिर बनाइ।
अर्थ · Hindi
प्रथमहिं देवन्ह गिरि गुहा राखेउ रुचिर बनाइ।
- RCM 4.12.12Open verse →
राम कृपानिधि कछु दिन बास करहिंगे आइ।।12।।
अर्थ · Hindi
राम कृपानिधि कछु दिन बास करहिंगे आइ।।12।।
- RCM 4.13.1Open verse →
सुंदर बन कुसुमित अति सोभा। गुंजत मधुप निकर मधु लोभा।।
अर्थ · Hindi
सुंदर बन कुसुमित अति सोभा। गुंजत मधुप निकर मधु लोभा।।
- RCM 4.13.2Open verse →
कंद मूल फल पत्र सुहाए। भए बहुत जब ते प्रभु आए ।।
अर्थ · Hindi
कंद मूल फल पत्र सुहाए। भए बहुत जब ते प्रभु आए ।।
- RCM 4.13.3Open verse →
देखि मनोहर सैल अनूपा। रहे तहँ अनुज सहित सुरभूपा।।
अर्थ · Hindi
देखि मनोहर सैल अनूपा। रहे तहँ अनुज सहित सुरभूपा।।
- RCM 4.13.4Open verse →
मधुकर खग मृग तनु धरि देवा। करहिं सिद्ध मुनि प्रभु कै सेवा।।
अर्थ · Hindi
मधुकर खग मृग तनु धरि देवा। करहिं सिद्ध मुनि प्रभु कै सेवा।।
- RCM 4.13.5Open verse →
मंगलरुप भयउ बन तब ते । कीन्ह निवास रमापति जब ते।।
अर्थ · Hindi
मंगलरुप भयउ बन तब ते । कीन्ह निवास रमापति जब ते।।
- RCM 4.13.6Open verse →
फटिक सिला अति सुभ्र सुहाई। सुख आसीन तहाँ द्वौ भाई।।
अर्थ · Hindi
फटिक सिला अति सुभ्र सुहाई। सुख आसीन तहाँ द्वौ भाई।।
- RCM 4.13.7Open verse →
कहत अनुज सन कथा अनेका। भगति बिरति नृपनीति बिबेका।।
अर्थ · Hindi
कहत अनुज सन कथा अनेका। भगति बिरति नृपनीति बिबेका।।
- RCM 4.13.8Open verse →
बरषा काल मेघ नभ छाए। गरजत लागत परम सुहाए।।
अर्थ · Hindi
बरषा काल मेघ नभ छाए। गरजत लागत परम सुहाए।।
- RCM 4.13.9Open verse →
लछिमन देखु मोर गन नाचत बारिद पैखि।
अर्थ · Hindi
लछिमन देखु मोर गन नाचत बारिद पैखि।
- RCM 4.13.10Open verse →
गृही बिरति रत हरष जस बिष्नु भगत कहुँ देखि।।13।।
अर्थ · Hindi
गृही बिरति रत हरष जस बिष्नु भगत कहुँ देखि।।13।।
- RCM 4.14.1Open verse →
घन घमंड नभ गरजत घोरा। प्रिया हीन डरपत मन मोरा।।
अर्थ · Hindi
घन घमंड नभ गरजत घोरा। प्रिया हीन डरपत मन मोरा।।
- RCM 4.14.2Open verse →
दामिनि दमक रह न घन माहीं। खल कै प्रीति जथा थिर नाहीं।।
अर्थ · Hindi
दामिनि दमक रह न घन माहीं। खल कै प्रीति जथा थिर नाहीं।।
- RCM 4.14.3Open verse →
बरषहिं जलद भूमि निअराएँ। जथा नवहिं बुध बिद्या पाएँ।।
अर्थ · Hindi
बरषहिं जलद भूमि निअराएँ। जथा नवहिं बुध बिद्या पाएँ।।
- RCM 4.14.4Open verse →
बूँद अघात सहहिं गिरि कैंसें । खल के बचन संत सह जैसें।।
अर्थ · Hindi
बूँद अघात सहहिं गिरि कैंसें । खल के बचन संत सह जैसें।।
- RCM 4.14.5Open verse →
छुद्र नदीं भरि चलीं तोराई। जस थोरेहुँ धन खल इतराई।।
अर्थ · Hindi
छुद्र नदीं भरि चलीं तोराई। जस थोरेहुँ धन खल इतराई।।
- RCM 4.14.6Open verse →
भूमि परत भा ढाबर पानी। जनु जीवहि माया लपटानी।।
अर्थ · Hindi
भूमि परत भा ढाबर पानी। जनु जीवहि माया लपटानी।।
- RCM 4.14.7Open verse →
समिटि समिटि जल भरहिं तलावा। जिमि सदगुन सज्जन पहिं आवा।।
अर्थ · Hindi
समिटि समिटि जल भरहिं तलावा। जिमि सदगुन सज्जन पहिं आवा।।
- RCM 4.14.8Open verse →
सरिता जल जलनिधि महुँ जाई। होई अचल जिमि जिव हरि पाई।।
अर्थ · Hindi
सरिता जल जलनिधि महुँ जाई। होई अचल जिमि जिव हरि पाई।।
- RCM 4.14.9Open verse →
हरित भूमि तृन संकुल समुझि परहिं नहिं पंथ।
अर्थ · Hindi
हरित भूमि तृन संकुल समुझि परहिं नहिं पंथ।
- RCM 4.14.10Open verse →
जिमि पाखंड बाद तें गुप्त होहिं सदग्रंथ।।14।।
अर्थ · Hindi
जिमि पाखंड बाद तें गुप्त होहिं सदग्रंथ।।14।।
- RCM 4.15.1Open verse →
दादुर धुनि चहु दिसा सुहाई। बेद पढ़हिं जनु बटु समुदाई।।
अर्थ · Hindi
दादुर धुनि चहु दिसा सुहाई। बेद पढ़हिं जनु बटु समुदाई।।
- RCM 4.15.2Open verse →
नव पल्लव भए बिटप अनेका। साधक मन जस मिलें बिबेका।।
अर्थ · Hindi
नव पल्लव भए बिटप अनेका। साधक मन जस मिलें बिबेका।।
- RCM 4.15.3Open verse →
अर्क जबास पात बिनु भयऊ। जस सुराज खल उद्यम गयऊ।।
अर्थ · Hindi
अर्क जबास पात बिनु भयऊ। जस सुराज खल उद्यम गयऊ।।
- RCM 4.15.4Open verse →
खोजत कतहुँ मिलइ नहिं धूरी। करइ क्रोध जिमि धरमहि दूरी।।
अर्थ · Hindi
खोजत कतहुँ मिलइ नहिं धूरी। करइ क्रोध जिमि धरमहि दूरी।।
- RCM 4.15.5Open verse →
ससि संपन्न सोह महि कैसी। उपकारी कै संपति जैसी।।
अर्थ · Hindi
ससि संपन्न सोह महि कैसी। उपकारी कै संपति जैसी।।
- RCM 4.15.6Open verse →
निसि तम घन खद्योत बिराजा। जनु दंभिन्ह कर मिला समाजा।।
अर्थ · Hindi
निसि तम घन खद्योत बिराजा। जनु दंभिन्ह कर मिला समाजा।।
- RCM 4.15.7Open verse →
महाबृष्टि चलि फूटि किआरीं । जिमि सुतंत्र भएँ बिगरहिं नारीं।।
अर्थ · Hindi
महाबृष्टि चलि फूटि किआरीं । जिमि सुतंत्र भएँ बिगरहिं नारीं।।
- RCM 4.15.8Open verse →
कृषी निरावहिं चतुर किसाना। जिमि बुध तजहिं मोह मद माना।।
अर्थ · Hindi
कृषी निरावहिं चतुर किसाना। जिमि बुध तजहिं मोह मद माना।।
- RCM 4.15.9Open verse →
देखिअत चक्रबाक खग नाहीं। कलिहि पाइ जिमि धर्म पराहीं।।
अर्थ · Hindi
देखिअत चक्रबाक खग नाहीं। कलिहि पाइ जिमि धर्म पराहीं।।
- RCM 4.15.10Open verse →
ऊषर बरषइ तृन नहिं जामा। जिमि हरिजन हियँ उपज न कामा।।
अर्थ · Hindi
ऊषर बरषइ तृन नहिं जामा। जिमि हरिजन हियँ उपज न कामा।।
- RCM 4.15.11Open verse →
बिबिध जंतु संकुल महि भ्राजा। प्रजा बाढ़ जिमि पाइ सुराजा।।
अर्थ · Hindi
बिबिध जंतु संकुल महि भ्राजा। प्रजा बाढ़ जिमि पाइ सुराजा।।
- RCM 4.15.12Open verse →
जहँ तहँ रहे पथिक थकि नाना। जिमि इंद्रिय गन उपजें ग्याना।।
अर्थ · Hindi
जहँ तहँ रहे पथिक थकि नाना। जिमि इंद्रिय गन उपजें ग्याना।।
- RCM 4.15.13Open verse →
कबहुँ प्रबल बह मारुत जहँ तहँ मेघ बिलाहिं।
अर्थ · Hindi
कबहुँ प्रबल बह मारुत जहँ तहँ मेघ बिलाहिं।
- RCM 4.15.14Open verse →
जिमि कपूत के उपजें कुल सद्धर्म नसाहिं।।15(क)।।
अर्थ · Hindi
जिमि कपूत के उपजें कुल सद्धर्म नसाहिं।।15(क)।।
- RCM 4.15.15Open verse →
कबहुँ दिवस महँ निबिड़ तम कबहुँक प्रगट पतंग।
अर्थ · Hindi
कबहुँ दिवस महँ निबिड़ तम कबहुँक प्रगट पतंग।
- RCM 4.15.16Open verse →
बिनसइ उपजइ ग्यान जिमि पाइ कुसंग सुसंग।।15(ख)।।
अर्थ · Hindi
बिनसइ उपजइ ग्यान जिमि पाइ कुसंग सुसंग।।15(ख)।।
- RCM 4.16.1Open verse →
बरषा बिगत सरद रितु आई। लछिमन देखहु परम सुहाई।।
अर्थ · Hindi
बरषा बिगत सरद रितु आई। लछिमन देखहु परम सुहाई।।
- RCM 4.16.2Open verse →
फूलें कास सकल महि छाई। जनु बरषाँ कृत प्रगट बुढ़ाई।।
अर्थ · Hindi
फूलें कास सकल महि छाई। जनु बरषाँ कृत प्रगट बुढ़ाई।।
- RCM 4.16.3Open verse →
उदित अगस्ति पंथ जल सोषा। जिमि लोभहि सोषइ संतोषा।।
अर्थ · Hindi
उदित अगस्ति पंथ जल सोषा। जिमि लोभहि सोषइ संतोषा।।
- RCM 4.16.4Open verse →
सरिता सर निर्मल जल सोहा। संत हृदय जस गत मद मोहा।।
अर्थ · Hindi
सरिता सर निर्मल जल सोहा। संत हृदय जस गत मद मोहा।।
- RCM 4.16.5Open verse →
रस रस सूख सरित सर पानी। ममता त्याग करहिं जिमि ग्यानी।।
अर्थ · Hindi
रस रस सूख सरित सर पानी। ममता त्याग करहिं जिमि ग्यानी।।
- RCM 4.16.6Open verse →
जानि सरद रितु खंजन आए। पाइ समय जिमि सुकृत सुहाए।।
अर्थ · Hindi
जानि सरद रितु खंजन आए। पाइ समय जिमि सुकृत सुहाए।।
- RCM 4.16.7Open verse →
पंक न रेनु सोह असि धरनी। नीति निपुन नृप कै जसि करनी।।
अर्थ · Hindi
पंक न रेनु सोह असि धरनी। नीति निपुन नृप कै जसि करनी।।
- RCM 4.16.8Open verse →
जल संकोच बिकल भइँ मीना। अबुध कुटुंबी जिमि धनहीना।।
अर्थ · Hindi
जल संकोच बिकल भइँ मीना। अबुध कुटुंबी जिमि धनहीना।।
- RCM 4.16.9Open verse →
बिनु धन निर्मल सोह अकासा। हरिजन इव परिहरि सब आसा।।
अर्थ · Hindi
बिनु धन निर्मल सोह अकासा। हरिजन इव परिहरि सब आसा।।
- RCM 4.16.10Open verse →
कहुँ कहुँ बृष्टि सारदी थोरी। कोउ एक पाव भगति जिमि मोरी।।
अर्थ · Hindi
कहुँ कहुँ बृष्टि सारदी थोरी। कोउ एक पाव भगति जिमि मोरी।।
- RCM 4.16.11Open verse →
चले हरषि तजि नगर नृप तापस बनिक भिखारि।
अर्थ · Hindi
चले हरषि तजि नगर नृप तापस बनिक भिखारि।
- RCM 4.16.12Open verse →
जिमि हरिभगत पाइ श्रम तजहि आश्रमी चारि।।16।।
अर्थ · Hindi
जिमि हरिभगत पाइ श्रम तजहि आश्रमी चारि।।16।।
- RCM 4.17.1Open verse →
सुखी मीन जे नीर अगाधा। जिमि हरि सरन न एकउ बाधा।।
अर्थ · Hindi
सुखी मीन जे नीर अगाधा। जिमि हरि सरन न एकउ बाधा।।
- RCM 4.17.2Open verse →
फूलें कमल सोह सर कैसा। निर्गुन ब्रम्ह सगुन भएँ जैसा।।
अर्थ · Hindi
फूलें कमल सोह सर कैसा। निर्गुन ब्रम्ह सगुन भएँ जैसा।।
- RCM 4.17.3Open verse →
गुंजत मधुकर मुखर अनूपा। सुंदर खग रव नाना रूपा।।
अर्थ · Hindi
गुंजत मधुकर मुखर अनूपा। सुंदर खग रव नाना रूपा।।
- RCM 4.17.4Open verse →
चक्रबाक मन दुख निसि पैखी। जिमि दुर्जन पर संपति देखी।।
अर्थ · Hindi
चक्रबाक मन दुख निसि पैखी। जिमि दुर्जन पर संपति देखी।।
- RCM 4.17.5Open verse →
चातक रटत तृषा अति ओही। जिमि सुख लहइ न संकरद्रोही।।
अर्थ · Hindi
चातक रटत तृषा अति ओही। जिमि सुख लहइ न संकरद्रोही।।
- RCM 4.17.6Open verse →
सरदातप निसि ससि अपहरई। संत दरस जिमि पातक टरई।।
अर्थ · Hindi
सरदातप निसि ससि अपहरई। संत दरस जिमि पातक टरई।।
- RCM 4.17.7Open verse →
देखि इंदु चकोर समुदाई। चितवतहिं जिमि हरिजन हरि पाई।।
अर्थ · Hindi
देखि इंदु चकोर समुदाई। चितवतहिं जिमि हरिजन हरि पाई।।
- RCM 4.17.8Open verse →
मसक दंस बीते हिम त्रासा। जिमि द्विज द्रोह किएँ कुल नासा।।
अर्थ · Hindi
मसक दंस बीते हिम त्रासा। जिमि द्विज द्रोह किएँ कुल नासा।।
- RCM 4.17.9Open verse →
भूमि जीव संकुल रहे गए सरद रितु पाइ।
अर्थ · Hindi
भूमि जीव संकुल रहे गए सरद रितु पाइ।
- RCM 4.17.10Open verse →
सदगुर मिले जाहिं जिमि संसय भ्रम समुदाइ।।17।।
अर्थ · Hindi
सदगुर मिले जाहिं जिमि संसय भ्रम समुदाइ।।17।।
- RCM 4.18.1Open verse →
बरषा गत निर्मल रितु आई। सुधि न तात सीता कै पाई।।
अर्थ · Hindi
बरषा गत निर्मल रितु आई। सुधि न तात सीता कै पाई।।
- RCM 4.18.2Open verse →
एक बार कैसेहुँ सुधि जानौं। कालहु जीत निमिष महुँ आनौं।।
अर्थ · Hindi
एक बार कैसेहुँ सुधि जानौं। कालहु जीत निमिष महुँ आनौं।।
- RCM 4.18.3Open verse →
कतहुँ रहउ जौं जीवति होई। तात जतन करि आनेउँ सोई।।
अर्थ · Hindi
कतहुँ रहउ जौं जीवति होई। तात जतन करि आनेउँ सोई।।
- RCM 4.18.4Open verse →
सुग्रीवहुँ सुधि मोरि बिसारी। पावा राज कोस पुर नारी।।
अर्थ · Hindi
सुग्रीवहुँ सुधि मोरि बिसारी। पावा राज कोस पुर नारी।।
- RCM 4.18.5Open verse →
जेहिं सायक मारा मैं बाली। तेहिं सर हतौं मूढ़ कहँ काली।।
अर्थ · Hindi
जेहिं सायक मारा मैं बाली। तेहिं सर हतौं मूढ़ कहँ काली।।
- RCM 4.18.6Open verse →
जासु कृपाँ छूटहीं मद मोहा। ता कहुँ उमा कि सपनेहुँ कोहा।।
अर्थ · Hindi
जासु कृपाँ छूटहीं मद मोहा। ता कहुँ उमा कि सपनेहुँ कोहा।।
- RCM 4.18.7Open verse →
जानहिं यह चरित्र मुनि ग्यानी। जिन्ह रघुबीर चरन रति मानी।।
अर्थ · Hindi
जानहिं यह चरित्र मुनि ग्यानी। जिन्ह रघुबीर चरन रति मानी।।
- RCM 4.18.8Open verse →
लछिमन क्रोधवंत प्रभु जाना। धनुष चढ़ाइ गहे कर बाना।।
अर्थ · Hindi
लछिमन क्रोधवंत प्रभु जाना। धनुष चढ़ाइ गहे कर बाना।।
- RCM 4.18.9Open verse →
तब अनुजहि समुझावा रघुपति करुना सींव।।
अर्थ · Hindi
तब अनुजहि समुझावा रघुपति करुना सींव।।
- RCM 4.18.10Open verse →
भय देखाइ लै आवहु तात सखा सुग्रीव।।18।।
अर्थ · Hindi
भय देखाइ लै आवहु तात सखा सुग्रीव।।18।।
- RCM 4.19.1Open verse →
इहाँ पवनसुत हृदयँ बिचारा। राम काजु सुग्रीवँ बिसारा।।
अर्थ · Hindi
इहाँ पवनसुत हृदयँ बिचारा। राम काजु सुग्रीवँ बिसारा।।
- RCM 4.19.2Open verse →
निकट जाइ चरनन्हि सिरु नावा। चारिहु बिधि तेहि कहि समुझावा।।
अर्थ · Hindi
निकट जाइ चरनन्हि सिरु नावा। चारिहु बिधि तेहि कहि समुझावा।।
- RCM 4.19.3Open verse →
सुनि सुग्रीवँ परम भय माना। बिषयँ मोर हरि लीन्हेउ ग्याना।।
अर्थ · Hindi
सुनि सुग्रीवँ परम भय माना। बिषयँ मोर हरि लीन्हेउ ग्याना।।
- RCM 4.19.4Open verse →
अब मारुतसुत दूत समूहा। पठवहु जहँ तहँ बानर जूहा।।
अर्थ · Hindi
अब मारुतसुत दूत समूहा। पठवहु जहँ तहँ बानर जूहा।।
- RCM 4.19.5Open verse →
कहहु पाख महुँ आव न जोई। मोरें कर ता कर बध होई।।
अर्थ · Hindi
कहहु पाख महुँ आव न जोई। मोरें कर ता कर बध होई।।
- RCM 4.19.6Open verse →
तब हनुमंत बोलाए दूता। सब कर करि सनमान बहूता।।
अर्थ · Hindi
तब हनुमंत बोलाए दूता। सब कर करि सनमान बहूता।।
- RCM 4.19.7Open verse →
भय अरु प्रीति नीति देखाई। चले सकल चरनन्हि सिर नाई।।
अर्थ · Hindi
भय अरु प्रीति नीति देखाई। चले सकल चरनन्हि सिर नाई।।
- RCM 4.19.8Open verse →
एहि अवसर लछिमन पुर आए। क्रोध देखि जहँ तहँ कपि धाए।।
अर्थ · Hindi
एहि अवसर लछिमन पुर आए। क्रोध देखि जहँ तहँ कपि धाए।।
- RCM 4.19.9Open verse →
धनुष चढ़ाइ कहा तब जारि करउँ पुर छार।
अर्थ · Hindi
धनुष चढ़ाइ कहा तब जारि करउँ पुर छार।
- RCM 4.19.10Open verse →
ब्याकुल नगर देखि तब आयउ बालिकुमार।।19।।
अर्थ · Hindi
ब्याकुल नगर देखि तब आयउ बालिकुमार।।19।।
- RCM 4.20.1Open verse →
चरन नाइ सिरु बिनती कीन्ही। लछिमन अभय बाँह तेहि दीन्ही।।
अर्थ · Hindi
चरन नाइ सिरु बिनती कीन्ही। लछिमन अभय बाँह तेहि दीन्ही।।
- RCM 4.20.2Open verse →
क्रोधवंत लछिमन सुनि काना। कह कपीस अति भयँ अकुलाना।।
अर्थ · Hindi
क्रोधवंत लछिमन सुनि काना। कह कपीस अति भयँ अकुलाना।।
- RCM 4.20.3Open verse →
सुनु हनुमंत संग लै तारा। करि बिनती समुझाउ कुमारा।।
अर्थ · Hindi
सुनु हनुमंत संग लै तारा। करि बिनती समुझाउ कुमारा।।
- RCM 4.20.4Open verse →
तारा सहित जाइ हनुमाना। चरन बंदि प्रभु सुजस बखाना।।
अर्थ · Hindi
तारा सहित जाइ हनुमाना। चरन बंदि प्रभु सुजस बखाना।।
- RCM 4.20.5Open verse →
करि बिनती मंदिर लै आए। चरन पखारि पलँग बैठाए।।
अर्थ · Hindi
करि बिनती मंदिर लै आए। चरन पखारि पलँग बैठाए।।
- RCM 4.20.6Open verse →
तब कपीस चरनन्हि सिरु नावा। गहि भुज लछिमन कंठ लगावा।।
अर्थ · Hindi
तब कपीस चरनन्हि सिरु नावा। गहि भुज लछिमन कंठ लगावा।।
- RCM 4.20.7Open verse →
नाथ बिषय सम मद कछु नाहीं। मुनि मन मोह करइ छन माहीं।।
अर्थ · Hindi
नाथ बिषय सम मद कछु नाहीं। मुनि मन मोह करइ छन माहीं।।
- RCM 4.20.8Open verse →
सुनत बिनीत बचन सुख पावा। लछिमन तेहि बहु बिधि समुझावा।।
अर्थ · Hindi
सुनत बिनीत बचन सुख पावा। लछिमन तेहि बहु बिधि समुझावा।।
- RCM 4.20.9Open verse →
पवन तनय सब कथा सुनाई। जेहि बिधि गए दूत समुदाई।।
अर्थ · Hindi
पवन तनय सब कथा सुनाई। जेहि बिधि गए दूत समुदाई।।
- RCM 4.20.10Open verse →
हरषि चले सुग्रीव तब अंगदादि कपि साथ।
अर्थ · Hindi
हरषि चले सुग्रीव तब अंगदादि कपि साथ।
- RCM 4.20.11Open verse →
रामानुज आगें करि आए जहँ रघुनाथ।।20।।
अर्थ · Hindi
रामानुज आगें करि आए जहँ रघुनाथ।।20।।
- RCM 4.21.1Open verse →
नाइ चरन सिरु कह कर जोरी। नाथ मोहि कछु नाहिन खोरी।।
अर्थ · Hindi
नाइ चरन सिरु कह कर जोरी। नाथ मोहि कछु नाहिन खोरी।।
- RCM 4.21.2Open verse →
अतिसय प्रबल देव तब माया। छूटइ राम करहु जौं दाया।।
अर्थ · Hindi
अतिसय प्रबल देव तब माया। छूटइ राम करहु जौं दाया।।
- RCM 4.21.3Open verse →
बिषय बस्य सुर नर मुनि स्वामी। मैं पावँर पसु कपि अति कामी।।
अर्थ · Hindi
बिषय बस्य सुर नर मुनि स्वामी। मैं पावँर पसु कपि अति कामी।।
- RCM 4.21.4Open verse →
नारि नयन सर जाहि न लागा। घोर क्रोध तम निसि जो जागा।।
अर्थ · Hindi
नारि नयन सर जाहि न लागा। घोर क्रोध तम निसि जो जागा।।
- RCM 4.21.5Open verse →
लोभ पाँस जेहिं गर न बँधाया। सो नर तुम्ह समान रघुराया।।
अर्थ · Hindi
लोभ पाँस जेहिं गर न बँधाया। सो नर तुम्ह समान रघुराया।।
- RCM 4.21.6Open verse →
यह गुन साधन तें नहिं होई। तुम्हरी कृपाँ पाव कोइ कोई।।
अर्थ · Hindi
यह गुन साधन तें नहिं होई। तुम्हरी कृपाँ पाव कोइ कोई।।
- RCM 4.21.7Open verse →
तब रघुपति बोले मुसकाई। तुम्ह प्रिय मोहि भरत जिमि भाई।।
अर्थ · Hindi
तब रघुपति बोले मुसकाई। तुम्ह प्रिय मोहि भरत जिमि भाई।।
- RCM 4.21.8Open verse →
अब सोइ जतनु करहु मन लाई। जेहि बिधि सीता कै सुधि पाई।।
अर्थ · Hindi
अब सोइ जतनु करहु मन लाई। जेहि बिधि सीता कै सुधि पाई।।
- RCM 4.21.9Open verse →
एहि बिधि होत बतकही आए बानर जूथ।
अर्थ · Hindi
एहि बिधि होत बतकही आए बानर जूथ।
- RCM 4.21.10Open verse →
नाना बरन सकल दिसि देखिअ कीस बरुथ।।21।।
अर्थ · Hindi
नाना बरन सकल दिसि देखिअ कीस बरुथ।।21।।
- RCM 4.22.1Open verse →
बानर कटक उमा में देखा। सो मूरुख जो करन चह लेखा।।
अर्थ · Hindi
बानर कटक उमा में देखा। सो मूरुख जो करन चह लेखा।।
- RCM 4.22.2Open verse →
आइ राम पद नावहिं माथा। निरखि बदनु सब होहिं सनाथा।।
अर्थ · Hindi
आइ राम पद नावहिं माथा। निरखि बदनु सब होहिं सनाथा।।
- RCM 4.22.3Open verse →
अस कपि एक न सेना माहीं। राम कुसल जेहि पूछी नाहीं।।
अर्थ · Hindi
अस कपि एक न सेना माहीं। राम कुसल जेहि पूछी नाहीं।।
- RCM 4.22.4Open verse →
यह कछु नहिं प्रभु कइ अधिकाई। बिस्वरूप ब्यापक रघुराई।।
अर्थ · Hindi
यह कछु नहिं प्रभु कइ अधिकाई। बिस्वरूप ब्यापक रघुराई।।
- RCM 4.22.5Open verse →
ठाढ़े जहँ तहँ आयसु पाई। कह सुग्रीव सबहि समुझाई।।
अर्थ · Hindi
ठाढ़े जहँ तहँ आयसु पाई। कह सुग्रीव सबहि समुझाई।।
- RCM 4.22.6Open verse →
राम काजु अरु मोर निहोरा। बानर जूथ जाहु चहुँ ओरा।।
अर्थ · Hindi
राम काजु अरु मोर निहोरा। बानर जूथ जाहु चहुँ ओरा।।
- RCM 4.22.7Open verse →
जनकसुता कहुँ खोजहु जाई। मास दिवस महँ आएहु भाई।।
अर्थ · Hindi
जनकसुता कहुँ खोजहु जाई। मास दिवस महँ आएहु भाई।।
- RCM 4.22.8Open verse →
अवधि मेटि जो बिनु सुधि पाएँ। आवइ बनिहि सो मोहि मराएँ।।
अर्थ · Hindi
अवधि मेटि जो बिनु सुधि पाएँ। आवइ बनिहि सो मोहि मराएँ।।
- RCM 4.22.9Open verse →
बचन सुनत सब बानर जहँ तहँ चले तुरंत ।
अर्थ · Hindi
बचन सुनत सब बानर जहँ तहँ चले तुरंत ।
- RCM 4.22.10Open verse →
तब सुग्रीवँ बोलाए अंगद नल हनुमंत।।22।।
अर्थ · Hindi
तब सुग्रीवँ बोलाए अंगद नल हनुमंत।।22।।
- RCM 4.23.1Open verse →
सुनहु नील अंगद हनुमाना। जामवंत मतिधीर सुजाना।।
अर्थ · Hindi
सुनहु नील अंगद हनुमाना। जामवंत मतिधीर सुजाना।।
- RCM 4.23.2Open verse →
सकल सुभट मिलि दच्छिन जाहू। सीता सुधि पूँछेउ सब काहू।।
अर्थ · Hindi
सकल सुभट मिलि दच्छिन जाहू। सीता सुधि पूँछेउ सब काहू।।
- RCM 4.23.3Open verse →
मन क्रम बचन सो जतन बिचारेहु। रामचंद्र कर काजु सँवारेहु।।
अर्थ · Hindi
मन क्रम बचन सो जतन बिचारेहु। रामचंद्र कर काजु सँवारेहु।।
- RCM 4.23.4Open verse →
भानु पीठि सेइअ उर आगी। स्वामिहि सर्ब भाव छल त्यागी।।
अर्थ · Hindi
भानु पीठि सेइअ उर आगी। स्वामिहि सर्ब भाव छल त्यागी।।
- RCM 4.23.5Open verse →
तजि माया सेइअ परलोका। मिटहिं सकल भव संभव सोका।।
अर्थ · Hindi
तजि माया सेइअ परलोका। मिटहिं सकल भव संभव सोका।।
- RCM 4.23.6Open verse →
देह धरे कर यह फलु भाई। भजिअ राम सब काम बिहाई।।
अर्थ · Hindi
देह धरे कर यह फलु भाई। भजिअ राम सब काम बिहाई।।
- RCM 4.23.7Open verse →
सोइ गुनग्य सोई बड़भागी । जो रघुबीर चरन अनुरागी।।
अर्थ · Hindi
सोइ गुनग्य सोई बड़भागी । जो रघुबीर चरन अनुरागी।।
- RCM 4.23.8Open verse →
आयसु मागि चरन सिरु नाई। चले हरषि सुमिरत रघुराई।।
अर्थ · Hindi
आयसु मागि चरन सिरु नाई। चले हरषि सुमिरत रघुराई।।
- RCM 4.23.9Open verse →
पाछें पवन तनय सिरु नावा। जानि काज प्रभु निकट बोलावा।।
अर्थ · Hindi
पाछें पवन तनय सिरु नावा। जानि काज प्रभु निकट बोलावा।।
- RCM 4.23.10Open verse →
परसा सीस सरोरुह पानी। करमुद्रिका दीन्हि जन जानी।।
अर्थ · Hindi
परसा सीस सरोरुह पानी। करमुद्रिका दीन्हि जन जानी।।
- RCM 4.23.11Open verse →
बहु प्रकार सीतहि समुझाएहु। कहि बल बिरह बेगि तुम्ह आएहु।।
अर्थ · Hindi
बहु प्रकार सीतहि समुझाएहु। कहि बल बिरह बेगि तुम्ह आएहु।।
- RCM 4.23.12Open verse →
हनुमत जन्म सुफल करि माना। चलेउ हृदयँ धरि कृपानिधाना।।
अर्थ · Hindi
हनुमत जन्म सुफल करि माना। चलेउ हृदयँ धरि कृपानिधाना।।
- RCM 4.23.13Open verse →
जद्यपि प्रभु जानत सब बाता। राजनीति राखत सुरत्राता।।
अर्थ · Hindi
जद्यपि प्रभु जानत सब बाता। राजनीति राखत सुरत्राता।।
- RCM 4.23.14Open verse →
चले सकल बन खोजत सरिता सर गिरि खोह।
अर्थ · Hindi
चले सकल बन खोजत सरिता सर गिरि खोह।
- RCM 4.23.15Open verse →
राम काज लयलीन मन बिसरा तन कर छोह।।23।।
अर्थ · Hindi
राम काज लयलीन मन बिसरा तन कर छोह।।23।।
- RCM 4.24.1Open verse →
कतहुँ होइ निसिचर सैं भेटा। प्रान लेहिं एक एक चपेटा।।
अर्थ · Hindi
कतहुँ होइ निसिचर सैं भेटा। प्रान लेहिं एक एक चपेटा।।
- RCM 4.24.2Open verse →
बहु प्रकार गिरि कानन हेरहिं। कोउ मुनि मिलत ताहि सब घेरहिं।।
अर्थ · Hindi
बहु प्रकार गिरि कानन हेरहिं। कोउ मुनि मिलत ताहि सब घेरहिं।।
- RCM 4.24.3Open verse →
लागि तृषा अतिसय अकुलाने। मिलइ न जल घन गहन भुलाने।।
अर्थ · Hindi
लागि तृषा अतिसय अकुलाने। मिलइ न जल घन गहन भुलाने।।
- RCM 4.24.4Open verse →
मन हनुमान कीन्ह अनुमाना। मरन चहत सब बिनु जल पाना।।
अर्थ · Hindi
मन हनुमान कीन्ह अनुमाना। मरन चहत सब बिनु जल पाना।।
- RCM 4.24.5Open verse →
चढ़ि गिरि सिखर चहूँ दिसि देखा। भूमि बिबिर एक कौतुक पेखा।।
अर्थ · Hindi
चढ़ि गिरि सिखर चहूँ दिसि देखा। भूमि बिबिर एक कौतुक पेखा।।
- RCM 4.24.6Open verse →
चक्रबाक बक हंस उड़ाहीं। बहुतक खग प्रबिसहिं तेहि माहीं।।
अर्थ · Hindi
चक्रबाक बक हंस उड़ाहीं। बहुतक खग प्रबिसहिं तेहि माहीं।।
- RCM 4.24.7Open verse →
गिरि ते उतरि पवनसुत आवा। सब कहुँ लै सोइ बिबर देखावा।।
अर्थ · Hindi
गिरि ते उतरि पवनसुत आवा। सब कहुँ लै सोइ बिबर देखावा।।
- RCM 4.24.8Open verse →
आगें कै हनुमंतहि लीन्हा। पैठे बिबर बिलंबु न कीन्हा।।
अर्थ · Hindi
आगें कै हनुमंतहि लीन्हा। पैठे बिबर बिलंबु न कीन्हा।।
- RCM 4.24.9Open verse →
दीख जाइ उपवन बर सर बिगसित बहु कंज।
अर्थ · Hindi
दीख जाइ उपवन बर सर बिगसित बहु कंज।
- RCM 4.24.10Open verse →
मंदिर एक रुचिर तहँ बैठि नारि तप पुंज।।24।।
अर्थ · Hindi
मंदिर एक रुचिर तहँ बैठि नारि तप पुंज।।24।।
- RCM 4.25.1Open verse →
दूरि ते ताहि सबन्हि सिर नावा। पूछें निज बृत्तांत सुनावा।।
अर्थ · Hindi
दूरि ते ताहि सबन्हि सिर नावा। पूछें निज बृत्तांत सुनावा।।
- RCM 4.25.2Open verse →
तेहिं तब कहा करहु जल पाना। खाहु सुरस सुंदर फल नाना।।
अर्थ · Hindi
तेहिं तब कहा करहु जल पाना। खाहु सुरस सुंदर फल नाना।।
- RCM 4.25.3Open verse →
मज्जनु कीन्ह मधुर फल खाए। तासु निकट पुनि सब चलि आए।।
अर्थ · Hindi
मज्जनु कीन्ह मधुर फल खाए। तासु निकट पुनि सब चलि आए।।
- RCM 4.25.4Open verse →
तेहिं सब आपनि कथा सुनाई। मैं अब जाब जहाँ रघुराई।।
अर्थ · Hindi
तेहिं सब आपनि कथा सुनाई। मैं अब जाब जहाँ रघुराई।।
- RCM 4.25.5Open verse →
मूदहु नयन बिबर तजि जाहू। पैहहु सीतहि जनि पछिताहू।।
अर्थ · Hindi
मूदहु नयन बिबर तजि जाहू। पैहहु सीतहि जनि पछिताहू।।
- RCM 4.25.6Open verse →
नयन मूदि पुनि देखहिं बीरा। ठाढ़े सकल सिंधु कें तीरा।।
अर्थ · Hindi
नयन मूदि पुनि देखहिं बीरा। ठाढ़े सकल सिंधु कें तीरा।।
- RCM 4.25.7Open verse →
सो पुनि गई जहाँ रघुनाथा। जाइ कमल पद नाएसि माथा।।
अर्थ · Hindi
सो पुनि गई जहाँ रघुनाथा। जाइ कमल पद नाएसि माथा।।
- RCM 4.25.8Open verse →
नाना भाँति बिनय तेहिं कीन्ही। अनपायनी भगति प्रभु दीन्ही।।
अर्थ · Hindi
नाना भाँति बिनय तेहिं कीन्ही। अनपायनी भगति प्रभु दीन्ही।।
- RCM 4.25.9Open verse →
बदरीबन कहुँ सो गई प्रभु अग्या धरि सीस ।
अर्थ · Hindi
बदरीबन कहुँ सो गई प्रभु अग्या धरि सीस ।
- RCM 4.25.10Open verse →
उर धरि राम चरन जुग जे बंदत अज ईस।।25।।
अर्थ · Hindi
उर धरि राम चरन जुग जे बंदत अज ईस।।25।।
- RCM 4.26.1Open verse →
इहाँ बिचारहिं कपि मन माहीं। बीती अवधि काज कछु नाहीं।।
अर्थ · Hindi
इहाँ बिचारहिं कपि मन माहीं। बीती अवधि काज कछु नाहीं।।
- RCM 4.26.2Open verse →
सब मिलि कहहिं परस्पर बाता। बिनु सुधि लएँ करब का भ्राता।।
अर्थ · Hindi
सब मिलि कहहिं परस्पर बाता। बिनु सुधि लएँ करब का भ्राता।।
- RCM 4.26.3Open verse →
कह अंगद लोचन भरि बारी। दुहुँ प्रकार भइ मृत्यु हमारी।।
अर्थ · Hindi
कह अंगद लोचन भरि बारी। दुहुँ प्रकार भइ मृत्यु हमारी।।
- RCM 4.26.4Open verse →
इहाँ न सुधि सीता कै पाई। उहाँ गएँ मारिहि कपिराई।।
अर्थ · Hindi
इहाँ न सुधि सीता कै पाई। उहाँ गएँ मारिहि कपिराई।।
- RCM 4.26.5Open verse →
पिता बधे पर मारत मोही। राखा राम निहोर न ओही।।
अर्थ · Hindi
पिता बधे पर मारत मोही। राखा राम निहोर न ओही।।
- RCM 4.26.6Open verse →
पुनि पुनि अंगद कह सब पाहीं। मरन भयउ कछु संसय नाहीं।।
अर्थ · Hindi
पुनि पुनि अंगद कह सब पाहीं। मरन भयउ कछु संसय नाहीं।।
- RCM 4.26.7Open verse →
अंगद बचन सुनत कपि बीरा। बोलि न सकहिं नयन बह नीरा।।
अर्थ · Hindi
अंगद बचन सुनत कपि बीरा। बोलि न सकहिं नयन बह नीरा।।
- RCM 4.26.8Open verse →
छन एक सोच मगन होइ रहे। पुनि अस वचन कहत सब भए।।
अर्थ · Hindi
छन एक सोच मगन होइ रहे। पुनि अस वचन कहत सब भए।।
- RCM 4.26.9Open verse →
हम सीता कै सुधि लिन्हें बिना। नहिं जैंहैं जुबराज प्रबीना।।
अर्थ · Hindi
हम सीता कै सुधि लिन्हें बिना। नहिं जैंहैं जुबराज प्रबीना।।
- RCM 4.26.10Open verse →
अस कहि लवन सिंधु तट जाई। बैठे कपि सब दर्भ डसाई।।
अर्थ · Hindi
अस कहि लवन सिंधु तट जाई। बैठे कपि सब दर्भ डसाई।।
- RCM 4.26.11Open verse →
जामवंत अंगद दुख देखी। कहिं कथा उपदेस बिसेषी।।
अर्थ · Hindi
जामवंत अंगद दुख देखी। कहिं कथा उपदेस बिसेषी।।
- RCM 4.26.12Open verse →
तात राम कहुँ नर जनि मानहु। निर्गुन ब्रम्ह अजित अज जानहु।।
अर्थ · Hindi
तात राम कहुँ नर जनि मानहु। निर्गुन ब्रम्ह अजित अज जानहु।।
- RCM 4.26.13Open verse →
हम सब सेवक अति बड़भागी। संतत सगुन ब्रह्म अनुरागी।।
अर्थ · Hindi
हम सब सेवक अति बड़भागी। संतत सगुन ब्रह्म अनुरागी।।
- RCM 4.26.14Open verse →
निज इच्छा प्रभु अवतरइ सुर महि गो द्विज लागि।
अर्थ · Hindi
निज इच्छा प्रभु अवतरइ सुर महि गो द्विज लागि।
- RCM 4.26.15Open verse →
सगुन उपासक संग तहँ रहहिं मोच्छ सब त्यागि।।26।।
अर्थ · Hindi
सगुन उपासक संग तहँ रहहिं मोच्छ सब त्यागि।।26।।
- RCM 4.27.1Open verse →
एहि बिधि कथा कहहि बहु भाँती गिरि कंदराँ सुनी संपाती।।
अर्थ · Hindi
एहि बिधि कथा कहहि बहु भाँती गिरि कंदराँ सुनी संपाती।।
- RCM 4.27.2Open verse →
बाहेर होइ देखि बहु कीसा। मोहि अहार दीन्ह जगदीसा।।
अर्थ · Hindi
बाहेर होइ देखि बहु कीसा। मोहि अहार दीन्ह जगदीसा।।
- RCM 4.27.3Open verse →
आजु सबहि कहँ भच्छन करऊँ। दिन बहु चले अहार बिनु मरऊँ।।
अर्थ · Hindi
आजु सबहि कहँ भच्छन करऊँ। दिन बहु चले अहार बिनु मरऊँ।।
- RCM 4.27.4Open verse →
कबहुँ न मिल भरि उदर अहारा। आजु दीन्ह बिधि एकहिं बारा।।
अर्थ · Hindi
कबहुँ न मिल भरि उदर अहारा। आजु दीन्ह बिधि एकहिं बारा।।
- RCM 4.27.5Open verse →
डरपे गीध बचन सुनि काना। अब भा मरन सत्य हम जाना।।
अर्थ · Hindi
डरपे गीध बचन सुनि काना। अब भा मरन सत्य हम जाना।।
- RCM 4.27.6Open verse →
कपि सब उठे गीध कहँ देखी। जामवंत मन सोच बिसेषी।।
अर्थ · Hindi
कपि सब उठे गीध कहँ देखी। जामवंत मन सोच बिसेषी।।
- RCM 4.27.7Open verse →
कह अंगद बिचारि मन माहीं। धन्य जटायू सम कोउ नाहीं।।
अर्थ · Hindi
कह अंगद बिचारि मन माहीं। धन्य जटायू सम कोउ नाहीं।।
- RCM 4.27.8Open verse →
राम काज कारन तनु त्यागी । हरि पुर गयउ परम बड़ भागी।।
अर्थ · Hindi
राम काज कारन तनु त्यागी । हरि पुर गयउ परम बड़ भागी।।
- RCM 4.27.9Open verse →
सुनि खग हरष सोक जुत बानी । आवा निकट कपिन्ह भय मानी।।
अर्थ · Hindi
सुनि खग हरष सोक जुत बानी । आवा निकट कपिन्ह भय मानी।।
- RCM 4.27.10Open verse →
तिन्हहि अभय करि पूछेसि जाई। कथा सकल तिन्ह ताहि सुनाई।।
अर्थ · Hindi
तिन्हहि अभय करि पूछेसि जाई। कथा सकल तिन्ह ताहि सुनाई।।
- RCM 4.27.11Open verse →
सुनि संपाति बंधु कै करनी। रघुपति महिमा बधुबिधि बरनी।।
अर्थ · Hindi
सुनि संपाति बंधु कै करनी। रघुपति महिमा बधुबिधि बरनी।।
- RCM 4.27.12Open verse →
मोहि लै जाहु सिंधुतट देउँ तिलांजलि ताहि ।
अर्थ · Hindi
मोहि लै जाहु सिंधुतट देउँ तिलांजलि ताहि ।
- RCM 4.27.13Open verse →
बचन सहाइ करवि मैं पैहहु खोजहु जाहि ।।27।।
अर्थ · Hindi
बचन सहाइ करवि मैं पैहहु खोजहु जाहि ।।27।।
- RCM 4.28.1Open verse →
अनुज क्रिया करि सागर तीरा। कहि निज कथा सुनहु कपि बीरा।।
अर्थ · Hindi
अनुज क्रिया करि सागर तीरा। कहि निज कथा सुनहु कपि बीरा।।
- RCM 4.28.2Open verse →
हम द्वौ बंधु प्रथम तरुनाई । गगन गए रबि निकट उडाई।।
अर्थ · Hindi
हम द्वौ बंधु प्रथम तरुनाई । गगन गए रबि निकट उडाई।।
- RCM 4.28.3Open verse →
तेज न सहि सक सो फिरि आवा । मै अभिमानी रबि निअरावा ।।
अर्थ · Hindi
तेज न सहि सक सो फिरि आवा । मै अभिमानी रबि निअरावा ।।
- RCM 4.28.4Open verse →
जरे पंख अति तेज अपारा । परेउँ भूमि करि घोर चिकारा ।।
अर्थ · Hindi
जरे पंख अति तेज अपारा । परेउँ भूमि करि घोर चिकारा ।।
- RCM 4.28.5Open verse →
मुनि एक नाम चंद्रमा ओही। लागी दया देखी करि मोही।।
अर्थ · Hindi
मुनि एक नाम चंद्रमा ओही। लागी दया देखी करि मोही।।
- RCM 4.28.6Open verse →
बहु प्रकार तेंहि ग्यान सुनावा । देहि जनित अभिमानी छड़ावा ।।
अर्थ · Hindi
बहु प्रकार तेंहि ग्यान सुनावा । देहि जनित अभिमानी छड़ावा ।।
- RCM 4.28.7Open verse →
त्रेताँ ब्रह्म मनुज तनु धरिही। तासु नारि निसिचर पति हरिही।।
अर्थ · Hindi
त्रेताँ ब्रह्म मनुज तनु धरिही। तासु नारि निसिचर पति हरिही।।
- RCM 4.28.8Open verse →
तासु खोज पठइहि प्रभू दूता। तिन्हहि मिलें तैं होब पुनीता।।
अर्थ · Hindi
तासु खोज पठइहि प्रभू दूता। तिन्हहि मिलें तैं होब पुनीता।।
- RCM 4.28.9Open verse →
जमिहहिं पंख करसि जनि चिंता । तिन्हहि देखाइ देहेसु तैं सीता।।
अर्थ · Hindi
जमिहहिं पंख करसि जनि चिंता । तिन्हहि देखाइ देहेसु तैं सीता।।
- RCM 4.28.10Open verse →
मुनि कइ गिरा सत्य भइ आजू । सुनि मम बचन करहु प्रभु काजू।।
अर्थ · Hindi
मुनि कइ गिरा सत्य भइ आजू । सुनि मम बचन करहु प्रभु काजू।।
- RCM 4.28.11Open verse →
गिरि त्रिकूट ऊपर बस लंका । तहँ रह रावन सहज असंका ।।
अर्थ · Hindi
गिरि त्रिकूट ऊपर बस लंका । तहँ रह रावन सहज असंका ।।
- RCM 4.28.12Open verse →
तहँ असोक उपबन जहँ रहई ।। सीता बैठि सोच रत अहई।।
अर्थ · Hindi
तहँ असोक उपबन जहँ रहई ।। सीता बैठि सोच रत अहई।।
- RCM 4.28.13Open verse →
मैं देखउँ तुम्ह नाहि गीघहि दष्टि अपार।।
अर्थ · Hindi
मैं देखउँ तुम्ह नाहि गीघहि दष्टि अपार।।
- RCM 4.28.14Open verse →
बूढ भयउँ न त करतेउँ कछुक सहाय तुम्हार।।28।।
अर्थ · Hindi
बूढ भयउँ न त करतेउँ कछुक सहाय तुम्हार।।28।।
- RCM 4.29.1Open verse →
जो नाघइ सत जोजन सागर । करइ सो राम काज मति आगर ।।
अर्थ · Hindi
जो नाघइ सत जोजन सागर । करइ सो राम काज मति आगर ।।
- RCM 4.29.2Open verse →
मोहि बिलोकि धरहु मन धीरा । राम कृपाँ कस भयउ सरीरा।।
अर्थ · Hindi
मोहि बिलोकि धरहु मन धीरा । राम कृपाँ कस भयउ सरीरा।।
- RCM 4.29.3Open verse →
पापिउ जा कर नाम सुमिरहीं। अति अपार भवसागर तरहीं।।
अर्थ · Hindi
पापिउ जा कर नाम सुमिरहीं। अति अपार भवसागर तरहीं।।
- RCM 4.29.4Open verse →
तासु दूत तुम्ह तजि कदराई। राम हृदयँ धरि करहु उपाई।।
अर्थ · Hindi
तासु दूत तुम्ह तजि कदराई। राम हृदयँ धरि करहु उपाई।।
- RCM 4.29.5Open verse →
अस कहि गरुड़ गीध जब गयऊ। तिन्ह कें मन अति बिसमय भयऊ।।
अर्थ · Hindi
अस कहि गरुड़ गीध जब गयऊ। तिन्ह कें मन अति बिसमय भयऊ।।
- RCM 4.29.6Open verse →
निज निज बल सब काहूँ भाषा। पार जाइ कर संसय राखा।।
अर्थ · Hindi
निज निज बल सब काहूँ भाषा। पार जाइ कर संसय राखा।।
- RCM 4.29.7Open verse →
जरठ भयउँ अब कहइ रिछेसा। नहिं तन रहा प्रथम बल लेसा।।
अर्थ · Hindi
जरठ भयउँ अब कहइ रिछेसा। नहिं तन रहा प्रथम बल लेसा।।
- RCM 4.29.8Open verse →
जबहिं त्रिबिक्रम भए खरारी। तब मैं तरुन रहेउँ बल भारी।।
अर्थ · Hindi
जबहिं त्रिबिक्रम भए खरारी। तब मैं तरुन रहेउँ बल भारी।।
- RCM 4.29.9Open verse →
बलि बाँधत प्रभु बाढेउ सो तनु बरनि न जाई।
अर्थ · Hindi
बलि बाँधत प्रभु बाढेउ सो तनु बरनि न जाई।
- RCM 4.29.10Open verse →
उभय धरी महँ दीन्ही सात प्रदच्छिन धाइ।।29।।
अर्थ · Hindi
उभय धरी महँ दीन्ही सात प्रदच्छिन धाइ।।29।।
- RCM 4.30.1Open verse →
अंगद कहइ जाउँ मैं पारा। जियँ संसय कछु फिरती बारा।।
अर्थ · Hindi
अंगद कहइ जाउँ मैं पारा। जियँ संसय कछु फिरती बारा।।
- RCM 4.30.2Open verse →
जामवंत कह तुम्ह सब लायक। पठइअ किमि सब ही कर नायक।।
अर्थ · Hindi
जामवंत कह तुम्ह सब लायक। पठइअ किमि सब ही कर नायक।।
- RCM 4.30.3Open verse →
कहइ रीछपति सुनु हनुमाना। का चुप साधि रहेहु बलवाना।।
अर्थ · Hindi
कहइ रीछपति सुनु हनुमाना। का चुप साधि रहेहु बलवाना।।
- RCM 4.30.4Open verse →
पवन तनय बल पवन समाना। बुधि बिबेक बिग्यान निधाना।।
अर्थ · Hindi
पवन तनय बल पवन समाना। बुधि बिबेक बिग्यान निधाना।।
- RCM 4.30.5Open verse →
कवन सो काज कठिन जग माहीं। जो नहिं होइ तात तुम्ह पाहीं।।
अर्थ · Hindi
कवन सो काज कठिन जग माहीं। जो नहिं होइ तात तुम्ह पाहीं।।
- RCM 4.30.6Open verse →
राम काज लगि तब अवतारा। सुनतहिं भयउ पर्वताकारा।।
अर्थ · Hindi
राम काज लगि तब अवतारा। सुनतहिं भयउ पर्वताकारा।।
- RCM 4.30.7Open verse →
कनक बरन तन तेज बिराजा। मानहु अपर गिरिन्ह कर राजा।।
अर्थ · Hindi
कनक बरन तन तेज बिराजा। मानहु अपर गिरिन्ह कर राजा।।
- RCM 4.30.8Open verse →
सिंहनाद करि बारहिं बारा। लीलहीं नाषउँ जलनिधि खारा।।
अर्थ · Hindi
सिंहनाद करि बारहिं बारा। लीलहीं नाषउँ जलनिधि खारा।।
- RCM 4.30.9Open verse →
सहित सहाय रावनहि मारी। आनउँ इहाँ त्रिकूट उपारी।।
अर्थ · Hindi
सहित सहाय रावनहि मारी। आनउँ इहाँ त्रिकूट उपारी।।
- RCM 4.30.10Open verse →
जामवंत मैं पूँछउँ तोही। उचित सिखावनु दीजहु मोही।।
अर्थ · Hindi
जामवंत मैं पूँछउँ तोही। उचित सिखावनु दीजहु मोही।।
- RCM 4.30.11Open verse →
एतना करहु तात तुम्ह जाई। सीतहि देखि कहहु सुधि आई।।
अर्थ · Hindi
एतना करहु तात तुम्ह जाई। सीतहि देखि कहहु सुधि आई।।
- RCM 4.30.12Open verse →
तब निज भुज बल राजिव नैना। कौतुक लागि संग कपि सेना।।
अर्थ · Hindi
तब निज भुज बल राजिव नैना। कौतुक लागि संग कपि सेना।।
- RCM 4.30.13Open verse →
कपि सेन संग सँघारि निसिचर रामु सीतहि आनिहैं।
अर्थ · Hindi
कपि सेन संग सँघारि निसिचर रामु सीतहि आनिहैं।
- RCM 4.30.14Open verse →
त्रैलोक पावन सुजसु सुर मुनि नारदादि बखानिहैं।।
अर्थ · Hindi
त्रैलोक पावन सुजसु सुर मुनि नारदादि बखानिहैं।।
- RCM 4.30.15Open verse →
जो सुनत गावत कहत समुझत परम पद नर पावई।
अर्थ · Hindi
जो सुनत गावत कहत समुझत परम पद नर पावई।
- RCM 4.30.16Open verse →
रघुबीर पद पाथोज मधुकर दास तुलसी गावई।।
अर्थ · Hindi
रघुबीर पद पाथोज मधुकर दास तुलसी गावई।।
- RCM 4.30.17Open verse →
भव भेषज रघुनाथ जसु सुनहि जे नर अरु नारि।
अर्थ · Hindi
भव भेषज रघुनाथ जसु सुनहि जे नर अरु नारि।
- RCM 4.30.18Open verse →
तिन्ह कर सकल मनोरथ सिद्ध करिहि त्रिसिरारि।।30(क)।।
अर्थ · Hindi
तिन्ह कर सकल मनोरथ सिद्ध करिहि त्रिसिरारि।।30(क)।।
- RCM 4.30.19Open verse →
नीलोत्पल तन स्याम काम कोटि सोभा अधिक।
अर्थ · Hindi
नीलोत्पल तन स्याम काम कोटि सोभा अधिक।
- RCM 4.30.20Open verse →
सुनिअ तासु गुन ग्राम जासु नाम अघ खग बधिक।।30(ख)।।
अर्थ · Hindi
सुनिअ तासु गुन ग्राम जासु नाम अघ खग बधिक।।30(ख)।।