Sant Seva ParishadSant Seva ParishadSSP · sant seva
← Verse view|📖 Ramcharitmanas · Ch 4
« Ch 3Ch 5 »

Ramcharitmanas · अध्याय 4

Kishkindha Kanda

किष्किन्धाकाण्ड

Alliance with Sugriva, slaying of Vali, the great vanara search for Sita.

  1. आगें चले बहुरि रघुराया। रिष्यमूक परवत निअराया।।

    अर्थ · Hindi

    आगें चले बहुरि रघुराया। रिष्यमूक परवत निअराया।।

  2. तहँ रह सचिव सहित सुग्रीवा। आवत देखि अतुल बल सींवा।।

    अर्थ · Hindi

    तहँ रह सचिव सहित सुग्रीवा। आवत देखि अतुल बल सींवा।।

  3. अति सभीत कह सुनु हनुमाना। पुरुष जुगल बल रूप निधाना।।

    अर्थ · Hindi

    अति सभीत कह सुनु हनुमाना। पुरुष जुगल बल रूप निधाना।।

  4. धरि बटु रूप देखु तैं जाई। कहेसु जानि जियँ सयन बुझाई।।

    अर्थ · Hindi

    धरि बटु रूप देखु तैं जाई। कहेसु जानि जियँ सयन बुझाई।।

  5. पठए बालि होहिं मन मैला। भागौं तुरत तजौं यह सैला।।

    अर्थ · Hindi

    पठए बालि होहिं मन मैला। भागौं तुरत तजौं यह सैला।।

  6. बिप्र रूप धरि कपि तहँ गयऊ। माथ नाइ पूछत अस भयऊ।।

    अर्थ · Hindi

    बिप्र रूप धरि कपि तहँ गयऊ। माथ नाइ पूछत अस भयऊ।।

  7. को तुम्ह स्यामल गौर सरीरा। छत्री रूप फिरहु बन बीरा।।

    अर्थ · Hindi

    को तुम्ह स्यामल गौर सरीरा। छत्री रूप फिरहु बन बीरा।।

  8. कठिन भूमि कोमल पद गामी। कवन हेतु बिचरहु बन स्वामी।।

    अर्थ · Hindi

    कठिन भूमि कोमल पद गामी। कवन हेतु बिचरहु बन स्वामी।।

  9. मृदुल मनोहर सुंदर गाता। सहत दुसह बन आतप बाता।।

    अर्थ · Hindi

    मृदुल मनोहर सुंदर गाता। सहत दुसह बन आतप बाता।।

  10. RCM 4.1.10Open verse →

    की तुम्ह तीनि देव महँ कोऊ। नर नारायन की तुम्ह दोऊ।।

    अर्थ · Hindi

    की तुम्ह तीनि देव महँ कोऊ। नर नारायन की तुम्ह दोऊ।।

  11. RCM 4.1.11Open verse →

    जग कारन तारन भव भंजन धरनी भार।

    अर्थ · Hindi

    जग कारन तारन भव भंजन धरनी भार।

  12. RCM 4.1.12Open verse →

    की तुम्ह अकिल भुवन पति लीन्ह मनुज अवतार।।1।।

    अर्थ · Hindi

    की तुम्ह अकिल भुवन पति लीन्ह मनुज अवतार।।1।।

  13. कोसलेस दसरथ के जाए । हम पितु बचन मानि बन आए।।

    अर्थ · Hindi

    कोसलेस दसरथ के जाए । हम पितु बचन मानि बन आए।।

  14. नाम राम लछिमन दौउ भाई। संग नारि सुकुमारि सुहाई।।

    अर्थ · Hindi

    नाम राम लछिमन दौउ भाई। संग नारि सुकुमारि सुहाई।।

  15. इहाँ हरि निसिचर बैदेही। बिप्र फिरहिं हम खोजत तेही।।

    अर्थ · Hindi

    इहाँ हरि निसिचर बैदेही। बिप्र फिरहिं हम खोजत तेही।।

  16. आपन चरित कहा हम गाई। कहहु बिप्र निज कथा बुझाई।।

    अर्थ · Hindi

    आपन चरित कहा हम गाई। कहहु बिप्र निज कथा बुझाई।।

  17. प्रभु पहिचानि परेउ गहि चरना। सो सुख उमा नहिं बरना।।

    अर्थ · Hindi

    प्रभु पहिचानि परेउ गहि चरना। सो सुख उमा नहिं बरना।।

  18. पुलकित तन मुख आव न बचना। देखत रुचिर बेष कै रचना।।

    अर्थ · Hindi

    पुलकित तन मुख आव न बचना। देखत रुचिर बेष कै रचना।।

  19. पुनि धीरजु धरि अस्तुति कीन्ही। हरष हृदयँ निज नाथहि चीन्ही।।

    अर्थ · Hindi

    पुनि धीरजु धरि अस्तुति कीन्ही। हरष हृदयँ निज नाथहि चीन्ही।।

  20. मोर न्याउ मैं पूछा साईं। तुम्ह पूछहु कस नर की नाईं।।

    अर्थ · Hindi

    मोर न्याउ मैं पूछा साईं। तुम्ह पूछहु कस नर की नाईं।।

  21. तव माया बस फिरउँ भुलाना। ता ते मैं नहिं प्रभु पहिचाना।।

    अर्थ · Hindi

    तव माया बस फिरउँ भुलाना। ता ते मैं नहिं प्रभु पहिचाना।।

  22. RCM 4.2.10Open verse →

    एकु मैं मंद मोहबस कुटिल हृदय अग्यान।

    अर्थ · Hindi

    एकु मैं मंद मोहबस कुटिल हृदय अग्यान।

  23. RCM 4.2.11Open verse →

    पुनि प्रभु मोहि बिसारेउ दीनबंधु भगवान।।2।।

    अर्थ · Hindi

    पुनि प्रभु मोहि बिसारेउ दीनबंधु भगवान।।2।।

  24. जदपि नाथ बहु अवगुन मोरें। सेवक प्रभुहि परै जनि भोरें।।

    अर्थ · Hindi

    जदपि नाथ बहु अवगुन मोरें। सेवक प्रभुहि परै जनि भोरें।।

  25. नाथ जीव तव मायाँ मोहा। सो निस्तरइ तुम्हारेहिं छोहा।।

    अर्थ · Hindi

    नाथ जीव तव मायाँ मोहा। सो निस्तरइ तुम्हारेहिं छोहा।।

  26. ता पर मैं रघुबीर दोहाई। जानउँ नहिं कछु भजन उपाई।।

    अर्थ · Hindi

    ता पर मैं रघुबीर दोहाई। जानउँ नहिं कछु भजन उपाई।।

  27. सेवक सुत पति मातु भरोसें। रहइ असोच बनइ प्रभु पोसें।।

    अर्थ · Hindi

    सेवक सुत पति मातु भरोसें। रहइ असोच बनइ प्रभु पोसें।।

  28. अस कहि परेउ चरन अकुलाई। निज तनु प्रगटि प्रीति उर छाई।।

    अर्थ · Hindi

    अस कहि परेउ चरन अकुलाई। निज तनु प्रगटि प्रीति उर छाई।।

  29. तब रघुपति उठाइ उर लावा। निज लोचन जल सींचि जुड़ावा।।

    अर्थ · Hindi

    तब रघुपति उठाइ उर लावा। निज लोचन जल सींचि जुड़ावा।।

  30. सुनु कपि जियँ मानसि जनि ऊना। तैं मम प्रिय लछिमन ते दूना।।

    अर्थ · Hindi

    सुनु कपि जियँ मानसि जनि ऊना। तैं मम प्रिय लछिमन ते दूना।।

  31. समदरसी मोहि कह सब कोऊ। सेवक प्रिय अनन्यगति सोऊ।।

    अर्थ · Hindi

    समदरसी मोहि कह सब कोऊ। सेवक प्रिय अनन्यगति सोऊ।।

  32. सो अनन्य जाकें असि मति न टरइ हनुमंत।

    अर्थ · Hindi

    सो अनन्य जाकें असि मति न टरइ हनुमंत।

  33. RCM 4.3.10Open verse →

    मैं सेवक सचराचर रूप स्वामि भगवंत।।3।।

    अर्थ · Hindi

    मैं सेवक सचराचर रूप स्वामि भगवंत।।3।।

  34. देखि पवन सुत पति अनुकूला। हृदयँ हरष बीती सब सूला।।

    अर्थ · Hindi

    देखि पवन सुत पति अनुकूला। हृदयँ हरष बीती सब सूला।।

  35. नाथ सैल पर कपिपति रहई। सो सुग्रीव दास तव अहई।।

    अर्थ · Hindi

    नाथ सैल पर कपिपति रहई। सो सुग्रीव दास तव अहई।।

  36. तेहि सन नाथ मयत्री कीजे। दीन जानि तेहि अभय करीजे।।

    अर्थ · Hindi

    तेहि सन नाथ मयत्री कीजे। दीन जानि तेहि अभय करीजे।।

  37. सो सीता कर खोज कराइहि। जहँ तहँ मरकट कोटि पठाइहि।।

    अर्थ · Hindi

    सो सीता कर खोज कराइहि। जहँ तहँ मरकट कोटि पठाइहि।।

  38. एहि बिधि सकल कथा समुझाई। लिए दुऔ जन पीठि चढ़ाई।।

    अर्थ · Hindi

    एहि बिधि सकल कथा समुझाई। लिए दुऔ जन पीठि चढ़ाई।।

  39. जब सुग्रीवँ राम कहुँ देखा। अतिसय जन्म धन्य करि लेखा।।

    अर्थ · Hindi

    जब सुग्रीवँ राम कहुँ देखा। अतिसय जन्म धन्य करि लेखा।।

  40. सादर मिलेउ नाइ पद माथा। भैंटेउ अनुज सहित रघुनाथा।।

    अर्थ · Hindi

    सादर मिलेउ नाइ पद माथा। भैंटेउ अनुज सहित रघुनाथा।।

  41. कपि कर मन बिचार एहि रीती। करिहहिं बिधि मो सन ए प्रीती।।

    अर्थ · Hindi

    कपि कर मन बिचार एहि रीती। करिहहिं बिधि मो सन ए प्रीती।।

  42. तब हनुमंत उभय दिसि की सब कथा सुनाइ।।

    अर्थ · Hindi

    तब हनुमंत उभय दिसि की सब कथा सुनाइ।।

  43. RCM 4.4.10Open verse →

    पावक साखी देइ करि जोरी प्रीती दृढ़ाइ।।4।।

    अर्थ · Hindi

    पावक साखी देइ करि जोरी प्रीती दृढ़ाइ।।4।।

  44. कीन्ही प्रीति कछु बीच न राखा। लछमिन राम चरित सब भाषा।।

    अर्थ · Hindi

    कीन्ही प्रीति कछु बीच न राखा। लछमिन राम चरित सब भाषा।।

  45. कह सुग्रीव नयन भरि बारी। मिलिहि नाथ मिथिलेसकुमारी।।

    अर्थ · Hindi

    कह सुग्रीव नयन भरि बारी। मिलिहि नाथ मिथिलेसकुमारी।।

  46. मंत्रिन्ह सहित इहाँ एक बारा। बैठ रहेउँ मैं करत बिचारा।।

    अर्थ · Hindi

    मंत्रिन्ह सहित इहाँ एक बारा। बैठ रहेउँ मैं करत बिचारा।।

  47. गगन पंथ देखी मैं जाता। परबस परी बहुत बिलपाता।।

    अर्थ · Hindi

    गगन पंथ देखी मैं जाता। परबस परी बहुत बिलपाता।।

  48. राम राम हा राम पुकारी। हमहि देखि दीन्हेउ पट डारी।।

    अर्थ · Hindi

    राम राम हा राम पुकारी। हमहि देखि दीन्हेउ पट डारी।।

  49. मागा राम तुरत तेहिं दीन्हा। पट उर लाइ सोच अति कीन्हा।।

    अर्थ · Hindi

    मागा राम तुरत तेहिं दीन्हा। पट उर लाइ सोच अति कीन्हा।।

  50. कह सुग्रीव सुनहु रघुबीरा। तजहु सोच मन आनहु धीरा।।

    अर्थ · Hindi

    कह सुग्रीव सुनहु रघुबीरा। तजहु सोच मन आनहु धीरा।।

  51. सब प्रकार करिहउँ सेवकाई। जेहि बिधि मिलिहि जानकी आई।।

    अर्थ · Hindi

    सब प्रकार करिहउँ सेवकाई। जेहि बिधि मिलिहि जानकी आई।।

  52. सखा बचन सुनि हरषे कृपासिधु बलसींव।

    अर्थ · Hindi

    सखा बचन सुनि हरषे कृपासिधु बलसींव।

  53. RCM 4.5.10Open verse →

    कारन कवन बसहु बन मोहि कहहु सुग्रीव ।।5।।

    अर्थ · Hindi

    कारन कवन बसहु बन मोहि कहहु सुग्रीव ।।5।।

  54. नात बालि अरु मैं द्वौ भाई। प्रीति रही कछु बरनि न जाई।।

    अर्थ · Hindi

    नात बालि अरु मैं द्वौ भाई। प्रीति रही कछु बरनि न जाई।।

  55. मय सुत मायावी तेहि नाऊँ। आवा सो प्रभु हमरें गाऊँ।।

    अर्थ · Hindi

    मय सुत मायावी तेहि नाऊँ। आवा सो प्रभु हमरें गाऊँ।।

  56. अर्ध राति पुर द्वार पुकारा। बाली रिपु बल सहै न पारा।।

    अर्थ · Hindi

    अर्ध राति पुर द्वार पुकारा। बाली रिपु बल सहै न पारा।।

  57. धावा बालि देखि सो भागा। मैं पुनि गयउँ बंधु सँग लागा।।

    अर्थ · Hindi

    धावा बालि देखि सो भागा। मैं पुनि गयउँ बंधु सँग लागा।।

  58. गिरिबर गुहाँ पैठ सो जाई। तब बालीं मोहि कहा बुझाई।।

    अर्थ · Hindi

    गिरिबर गुहाँ पैठ सो जाई। तब बालीं मोहि कहा बुझाई।।

  59. परिखेसु मोहि एक पखवारा। नहिं आवौं तब जानेसु मारा।।

    अर्थ · Hindi

    परिखेसु मोहि एक पखवारा। नहिं आवौं तब जानेसु मारा।।

  60. मास दिवस तहँ रहेउँ खरारी। निसरी रुधिर धार तहँ भारी।।

    अर्थ · Hindi

    मास दिवस तहँ रहेउँ खरारी। निसरी रुधिर धार तहँ भारी।।

  61. बालि हतेसि मोहि मारिहि आई। सिला देइ तहँ चलेउँ पराई।।

    अर्थ · Hindi

    बालि हतेसि मोहि मारिहि आई। सिला देइ तहँ चलेउँ पराई।।

  62. मंत्रिन्ह पुर देखा बिनु साईं। दीन्हेउ मोहि राज बरिआई।।

    अर्थ · Hindi

    मंत्रिन्ह पुर देखा बिनु साईं। दीन्हेउ मोहि राज बरिआई।।

  63. RCM 4.6.10Open verse →

    बालि ताहि मारि गृह आवा। देखि मोहि जियँ भेद बढ़ावा।।

    अर्थ · Hindi

    बालि ताहि मारि गृह आवा। देखि मोहि जियँ भेद बढ़ावा।।

  64. RCM 4.6.11Open verse →

    रिपु सम मोहि मारेसि अति भारी। हरि लीन्हेसि सर्बसु अरु नारी।।

    अर्थ · Hindi

    रिपु सम मोहि मारेसि अति भारी। हरि लीन्हेसि सर्बसु अरु नारी।।

  65. RCM 4.6.12Open verse →

    ताकें भय रघुबीर कृपाला। सकल भुवन मैं फिरेउँ बिहाला।।

    अर्थ · Hindi

    ताकें भय रघुबीर कृपाला। सकल भुवन मैं फिरेउँ बिहाला।।

  66. RCM 4.6.13Open verse →

    इहाँ साप बस आवत नाहीं। तदपि सभीत रहउँ मन माहीं।।

    अर्थ · Hindi

    इहाँ साप बस आवत नाहीं। तदपि सभीत रहउँ मन माहीं।।

  67. RCM 4.6.14Open verse →

    सुनि सेवक दुख दीनदयाला। फरकि उठीं द्वै भुजा बिसाला।।

    अर्थ · Hindi

    सुनि सेवक दुख दीनदयाला। फरकि उठीं द्वै भुजा बिसाला।।

  68. RCM 4.6.15Open verse →

    सुनु सुग्रीव मारिहउँ बालिहि एकहिं बान।

    अर्थ · Hindi

    सुनु सुग्रीव मारिहउँ बालिहि एकहिं बान।

  69. RCM 4.6.16Open verse →

    ब्रम्ह रुद्र सरनागत गएँ न उबरिहिं प्रान।।6।।

    अर्थ · Hindi

    ब्रम्ह रुद्र सरनागत गएँ न उबरिहिं प्रान।।6।।

  70. जे न मित्र दुख होहिं दुखारी। तिन्हहि बिलोकत पातक भारी।।

    अर्थ · Hindi

    जे न मित्र दुख होहिं दुखारी। तिन्हहि बिलोकत पातक भारी।।

  71. निज दुख गिरि सम रज करि जाना। मित्रक दुख रज मेरु समाना।।

    अर्थ · Hindi

    निज दुख गिरि सम रज करि जाना। मित्रक दुख रज मेरु समाना।।

  72. जिन्ह कें असि मति सहज न आई। ते सठ कत हठि करत मिताई।।

    अर्थ · Hindi

    जिन्ह कें असि मति सहज न आई। ते सठ कत हठि करत मिताई।।

  73. कुपथ निवारि सुपंथ चलावा। गुन प्रगटे अवगुनन्हि दुरावा।।

    अर्थ · Hindi

    कुपथ निवारि सुपंथ चलावा। गुन प्रगटे अवगुनन्हि दुरावा।।

  74. देत लेत मन संक न धरई। बल अनुमान सदा हित करई।।

    अर्थ · Hindi

    देत लेत मन संक न धरई। बल अनुमान सदा हित करई।।

  75. बिपति काल कर सतगुन नेहा। श्रुति कह संत मित्र गुन एहा।।

    अर्थ · Hindi

    बिपति काल कर सतगुन नेहा। श्रुति कह संत मित्र गुन एहा।।

  76. आगें कह मृदु बचन बनाई। पाछें अनहित मन कुटिलाई।।

    अर्थ · Hindi

    आगें कह मृदु बचन बनाई। पाछें अनहित मन कुटिलाई।।

  77. जा कर चित अहि गति सम भाई। अस कुमित्र परिहरेहि भलाई।।

    अर्थ · Hindi

    जा कर चित अहि गति सम भाई। अस कुमित्र परिहरेहि भलाई।।

  78. सेवक सठ नृप कृपन कुनारी। कपटी मित्र सूल सम चारी।।

    अर्थ · Hindi

    सेवक सठ नृप कृपन कुनारी। कपटी मित्र सूल सम चारी।।

  79. RCM 4.7.10Open verse →

    सखा सोच त्यागहु बल मोरें। सब बिधि घटब काज मैं तोरें।।

    अर्थ · Hindi

    सखा सोच त्यागहु बल मोरें। सब बिधि घटब काज मैं तोरें।।

  80. RCM 4.7.11Open verse →

    कह सुग्रीव सुनहु रघुबीरा। बालि महाबल अति रनधीरा।।

    अर्थ · Hindi

    कह सुग्रीव सुनहु रघुबीरा। बालि महाबल अति रनधीरा।।

  81. RCM 4.7.12Open verse →

    दुंदुभी अस्थि ताल देखराए। बिनु प्रयास रघुनाथ ढहाए।।

    अर्थ · Hindi

    दुंदुभी अस्थि ताल देखराए। बिनु प्रयास रघुनाथ ढहाए।।

  82. RCM 4.7.13Open verse →

    देखि अमित बल बाढ़ी प्रीती। बालि बधब इन्ह भइ परतीती।।

    अर्थ · Hindi

    देखि अमित बल बाढ़ी प्रीती। बालि बधब इन्ह भइ परतीती।।

  83. RCM 4.7.14Open verse →

    बार बार नावइ पद सीसा। प्रभुहि जानि मन हरष कपीसा।।

    अर्थ · Hindi

    बार बार नावइ पद सीसा। प्रभुहि जानि मन हरष कपीसा।।

  84. RCM 4.7.15Open verse →

    उपजा ग्यान बचन तब बोला। नाथ कृपाँ मन भयउ अलोला।।

    अर्थ · Hindi

    उपजा ग्यान बचन तब बोला। नाथ कृपाँ मन भयउ अलोला।।

  85. RCM 4.7.16Open verse →

    सुख संपति परिवार बड़ाई। सब परिहरि करिहउँ सेवकाई।।

    अर्थ · Hindi

    सुख संपति परिवार बड़ाई। सब परिहरि करिहउँ सेवकाई।।

  86. RCM 4.7.17Open verse →

    ए सब रामभगति के बाधक। कहहिं संत तब पद अवराधक।।

    अर्थ · Hindi

    ए सब रामभगति के बाधक। कहहिं संत तब पद अवराधक।।

  87. RCM 4.7.18Open verse →

    सत्रु मित्र सुख दुख जग माहीं। माया कृत परमारथ नाहीं।।

    अर्थ · Hindi

    सत्रु मित्र सुख दुख जग माहीं। माया कृत परमारथ नाहीं।।

  88. RCM 4.7.19Open verse →

    बालि परम हित जासु प्रसादा। मिलेहु राम तुम्ह समन बिषादा।।

    अर्थ · Hindi

    बालि परम हित जासु प्रसादा। मिलेहु राम तुम्ह समन बिषादा।।

  89. RCM 4.7.20Open verse →

    सपनें जेहि सन होइ लराई। जागें समुझत मन सकुचाई।।

    अर्थ · Hindi

    सपनें जेहि सन होइ लराई। जागें समुझत मन सकुचाई।।

  90. RCM 4.7.21Open verse →

    अब प्रभु कृपा करहु एहि भाँती। सब तजि भजनु करौं दिन राती।।

    अर्थ · Hindi

    अब प्रभु कृपा करहु एहि भाँती। सब तजि भजनु करौं दिन राती।।

  91. RCM 4.7.22Open verse →

    सुनि बिराग संजुत कपि बानी। बोले बिहँसि रामु धनुपानी।।

    अर्थ · Hindi

    सुनि बिराग संजुत कपि बानी। बोले बिहँसि रामु धनुपानी।।

  92. RCM 4.7.23Open verse →

    जो कछु कहेहु सत्य सब सोई। सखा बचन मम मृषा न होई।।

    अर्थ · Hindi

    जो कछु कहेहु सत्य सब सोई। सखा बचन मम मृषा न होई।।

  93. RCM 4.7.24Open verse →

    नट मरकट इव सबहि नचावत। रामु खगेस बेद अस गावत।।

    अर्थ · Hindi

    नट मरकट इव सबहि नचावत। रामु खगेस बेद अस गावत।।

  94. RCM 4.7.25Open verse →

    लै सुग्रीव संग रघुनाथा। चले चाप सायक गहि हाथा।।

    अर्थ · Hindi

    लै सुग्रीव संग रघुनाथा। चले चाप सायक गहि हाथा।।

  95. RCM 4.7.26Open verse →

    तब रघुपति सुग्रीव पठावा। गर्जेसि जाइ निकट बल पावा।।

    अर्थ · Hindi

    तब रघुपति सुग्रीव पठावा। गर्जेसि जाइ निकट बल पावा।।

  96. RCM 4.7.27Open verse →

    सुनत बालि क्रोधातुर धावा। गहि कर चरन नारि समुझावा।।

    अर्थ · Hindi

    सुनत बालि क्रोधातुर धावा। गहि कर चरन नारि समुझावा।।

  97. RCM 4.7.28Open verse →

    सुनु पति जिन्हहि मिलेउ सुग्रीवा। ते द्वौ बंधु तेज बल सींवा।।

    अर्थ · Hindi

    सुनु पति जिन्हहि मिलेउ सुग्रीवा। ते द्वौ बंधु तेज बल सींवा।।

  98. RCM 4.7.29Open verse →

    कोसलेस सुत लछिमन रामा। कालहु जीति सकहिं संग्रामा।।

    अर्थ · Hindi

    कोसलेस सुत लछिमन रामा। कालहु जीति सकहिं संग्रामा।।

  99. RCM 4.7.30Open verse →

    कह बालि सुनु भीरु प्रिय समदरसी रघुनाथ।

    अर्थ · Hindi

    कह बालि सुनु भीरु प्रिय समदरसी रघुनाथ।

  100. RCM 4.7.31Open verse →

    जौं कदाचि मोहि मारहिं तौ पुनि होउँ सनाथ।।7।।

    अर्थ · Hindi

    जौं कदाचि मोहि मारहिं तौ पुनि होउँ सनाथ।।7।।

  101. अस कहि चला महा अभिमानी। तृन समान सुग्रीवहि जानी।।

    अर्थ · Hindi

    अस कहि चला महा अभिमानी। तृन समान सुग्रीवहि जानी।।

  102. भिरे उभौ बाली अति तर्जा । मुठिका मारि महाधुनि गर्जा।।

    अर्थ · Hindi

    भिरे उभौ बाली अति तर्जा । मुठिका मारि महाधुनि गर्जा।।

  103. तब सुग्रीव बिकल होइ भागा। मुष्टि प्रहार बज्र सम लागा।।

    अर्थ · Hindi

    तब सुग्रीव बिकल होइ भागा। मुष्टि प्रहार बज्र सम लागा।।

  104. मैं जो कहा रघुबीर कृपाला। बंधु न होइ मोर यह काला।।

    अर्थ · Hindi

    मैं जो कहा रघुबीर कृपाला। बंधु न होइ मोर यह काला।।

  105. एकरूप तुम्ह भ्राता दोऊ। तेहि भ्रम तें नहिं मारेउँ सोऊ।।

    अर्थ · Hindi

    एकरूप तुम्ह भ्राता दोऊ। तेहि भ्रम तें नहिं मारेउँ सोऊ।।

  106. कर परसा सुग्रीव सरीरा। तनु भा कुलिस गई सब पीरा।।

    अर्थ · Hindi

    कर परसा सुग्रीव सरीरा। तनु भा कुलिस गई सब पीरा।।

  107. मेली कंठ सुमन कै माला। पठवा पुनि बल देइ बिसाला।।

    अर्थ · Hindi

    मेली कंठ सुमन कै माला। पठवा पुनि बल देइ बिसाला।।

  108. पुनि नाना बिधि भई लराई। बिटप ओट देखहिं रघुराई।।

    अर्थ · Hindi

    पुनि नाना बिधि भई लराई। बिटप ओट देखहिं रघुराई।।

  109. बहु छल बल सुग्रीव कर हियँ हारा भय मानि।

    अर्थ · Hindi

    बहु छल बल सुग्रीव कर हियँ हारा भय मानि।

  110. RCM 4.8.10Open verse →

    मारा बालि राम तब हृदय माझ सर तानि।।8।।

    अर्थ · Hindi

    मारा बालि राम तब हृदय माझ सर तानि।।8।।

  111. परा बिकल महि सर के लागें। पुनि उठि बैठ देखि प्रभु आगें।।

    अर्थ · Hindi

    परा बिकल महि सर के लागें। पुनि उठि बैठ देखि प्रभु आगें।।

  112. स्याम गात सिर जटा बनाएँ। अरुन नयन सर चाप चढ़ाएँ।।

    अर्थ · Hindi

    स्याम गात सिर जटा बनाएँ। अरुन नयन सर चाप चढ़ाएँ।।

  113. पुनि पुनि चितइ चरन चित दीन्हा। सुफल जन्म माना प्रभु चीन्हा।।

    अर्थ · Hindi

    पुनि पुनि चितइ चरन चित दीन्हा। सुफल जन्म माना प्रभु चीन्हा।।

  114. हृदयँ प्रीति मुख बचन कठोरा। बोला चितइ राम की ओरा।।

    अर्थ · Hindi

    हृदयँ प्रीति मुख बचन कठोरा। बोला चितइ राम की ओरा।।

  115. धर्म हेतु अवतरेहु गोसाई। मारेहु मोहि ब्याध की नाई।।

    अर्थ · Hindi

    धर्म हेतु अवतरेहु गोसाई। मारेहु मोहि ब्याध की नाई।।

  116. मैं बैरी सुग्रीव पिआरा। अवगुन कबन नाथ मोहि मारा।।

    अर्थ · Hindi

    मैं बैरी सुग्रीव पिआरा। अवगुन कबन नाथ मोहि मारा।।

  117. अनुज बधू भगिनी सुत नारी। सुनु सठ कन्या सम ए चारी।।

    अर्थ · Hindi

    अनुज बधू भगिनी सुत नारी। सुनु सठ कन्या सम ए चारी।।

  118. इन्हहि कुद्दष्टि बिलोकइ जोई। ताहि बधें कछु पाप न होई।।

    अर्थ · Hindi

    इन्हहि कुद्दष्टि बिलोकइ जोई। ताहि बधें कछु पाप न होई।।

  119. मुढ़ तोहि अतिसय अभिमाना। नारि सिखावन करसि न काना।।

    अर्थ · Hindi

    मुढ़ तोहि अतिसय अभिमाना। नारि सिखावन करसि न काना।।

  120. RCM 4.9.10Open verse →

    मम भुज बल आश्रित तेहि जानी। मारा चहसि अधम अभिमानी।।

    अर्थ · Hindi

    मम भुज बल आश्रित तेहि जानी। मारा चहसि अधम अभिमानी।।

  121. RCM 4.9.11Open verse →

    सुनहु राम स्वामी सन चल न चातुरी मोरि।

    अर्थ · Hindi

    सुनहु राम स्वामी सन चल न चातुरी मोरि।

  122. RCM 4.9.12Open verse →

    प्रभु अजहूँ मैं पापी अंतकाल गति तोरि।।9।।

    अर्थ · Hindi

    प्रभु अजहूँ मैं पापी अंतकाल गति तोरि।।9।।

  123. RCM 4.10.1Open verse →

    सुनत राम अति कोमल बानी। बालि सीस परसेउ निज पानी।।

    अर्थ · Hindi

    सुनत राम अति कोमल बानी। बालि सीस परसेउ निज पानी।।

  124. RCM 4.10.2Open verse →

    अचल करौं तनु राखहु प्राना। बालि कहा सुनु कृपानिधाना।।

    अर्थ · Hindi

    अचल करौं तनु राखहु प्राना। बालि कहा सुनु कृपानिधाना।।

  125. RCM 4.10.3Open verse →

    जन्म जन्म मुनि जतनु कराहीं। अंत राम कहि आवत नाहीं।।

    अर्थ · Hindi

    जन्म जन्म मुनि जतनु कराहीं। अंत राम कहि आवत नाहीं।।

  126. RCM 4.10.4Open verse →

    जासु नाम बल संकर कासी। देत सबहि सम गति अविनासी।।

    अर्थ · Hindi

    जासु नाम बल संकर कासी। देत सबहि सम गति अविनासी।।

  127. RCM 4.10.5Open verse →

    मम लोचन गोचर सोइ आवा। बहुरि कि प्रभु अस बनिहि बनावा।।

    अर्थ · Hindi

    मम लोचन गोचर सोइ आवा। बहुरि कि प्रभु अस बनिहि बनावा।।

  128. RCM 4.11.1Open verse →

    राम बालि निज धाम पठावा। नगर लोग सब ब्याकुल धावा।।

    अर्थ · Hindi

    राम बालि निज धाम पठावा। नगर लोग सब ब्याकुल धावा।।

  129. RCM 4.11.2Open verse →

    नाना बिधि बिलाप कर तारा। छूटे केस न देह सँभारा।।

    अर्थ · Hindi

    नाना बिधि बिलाप कर तारा। छूटे केस न देह सँभारा।।

  130. RCM 4.11.3Open verse →

    तारा बिकल देखि रघुराया । दीन्ह ग्यान हरि लीन्ही माया।।

    अर्थ · Hindi

    तारा बिकल देखि रघुराया । दीन्ह ग्यान हरि लीन्ही माया।।

  131. RCM 4.11.4Open verse →

    छिति जल पावक गगन समीरा। पंच रचित अति अधम सरीरा।।

    अर्थ · Hindi

    छिति जल पावक गगन समीरा। पंच रचित अति अधम सरीरा।।

  132. RCM 4.11.5Open verse →

    प्रगट सो तनु तव आगें सोवा। जीव नित्य केहि लगि तुम्ह रोवा।।

    अर्थ · Hindi

    प्रगट सो तनु तव आगें सोवा। जीव नित्य केहि लगि तुम्ह रोवा।।

  133. RCM 4.11.6Open verse →

    उपजा ग्यान चरन तब लागी। लीन्हेसि परम भगति बर मागी।।

    अर्थ · Hindi

    उपजा ग्यान चरन तब लागी। लीन्हेसि परम भगति बर मागी।।

  134. RCM 4.11.7Open verse →

    उमा दारु जोषित की नाई। सबहि नचावत रामु गोसाई।।

    अर्थ · Hindi

    उमा दारु जोषित की नाई। सबहि नचावत रामु गोसाई।।

  135. RCM 4.11.8Open verse →

    तब सुग्रीवहि आयसु दीन्हा। मृतक कर्म बिधिबत सब कीन्हा।।

    अर्थ · Hindi

    तब सुग्रीवहि आयसु दीन्हा। मृतक कर्म बिधिबत सब कीन्हा।।

  136. RCM 4.11.9Open verse →

    राम कहा अनुजहि समुझाई। राज देहु सुग्रीवहि जाई।।

    अर्थ · Hindi

    राम कहा अनुजहि समुझाई। राज देहु सुग्रीवहि जाई।।

  137. RCM 4.11.10Open verse →

    रघुपति चरन नाइ करि माथा। चले सकल प्रेरित रघुनाथा।।

    अर्थ · Hindi

    रघुपति चरन नाइ करि माथा। चले सकल प्रेरित रघुनाथा।।

  138. RCM 4.11.11Open verse →

    लछिमन तुरत बोलाए पुरजन बिप्र समाज।

    अर्थ · Hindi

    लछिमन तुरत बोलाए पुरजन बिप्र समाज।

  139. RCM 4.11.12Open verse →

    राजु दीन्ह सुग्रीव कहँ अंगद कहँ जुबराज।।11।।

    अर्थ · Hindi

    राजु दीन्ह सुग्रीव कहँ अंगद कहँ जुबराज।।11।।

  140. RCM 4.12.1Open verse →

    उमा राम सम हित जग माहीं। गुरु पितु मातु बंधु प्रभु नाहीं।।

    अर्थ · Hindi

    उमा राम सम हित जग माहीं। गुरु पितु मातु बंधु प्रभु नाहीं।।

  141. RCM 4.12.2Open verse →

    सुर नर मुनि सब कै यह रीती। स्वारथ लागि करहिं सब प्रीती।।

    अर्थ · Hindi

    सुर नर मुनि सब कै यह रीती। स्वारथ लागि करहिं सब प्रीती।।

  142. RCM 4.12.3Open verse →

    बालि त्रास ब्याकुल दिन राती। तन बहु ब्रन चिंताँ जर छाती।।

    अर्थ · Hindi

    बालि त्रास ब्याकुल दिन राती। तन बहु ब्रन चिंताँ जर छाती।।

  143. RCM 4.12.4Open verse →

    सोइ सुग्रीव कीन्ह कपिराऊ। अति कृपाल रघुबीर सुभाऊ।।

    अर्थ · Hindi

    सोइ सुग्रीव कीन्ह कपिराऊ। अति कृपाल रघुबीर सुभाऊ।।

  144. RCM 4.12.5Open verse →

    जानतहुँ अस प्रभु परिहरहीं। काहे न बिपति जाल नर परहीं।।

    अर्थ · Hindi

    जानतहुँ अस प्रभु परिहरहीं। काहे न बिपति जाल नर परहीं।।

  145. RCM 4.12.6Open verse →

    पुनि सुग्रीवहि लीन्ह बोलाई। बहु प्रकार नृपनीति सिखाई।।

    अर्थ · Hindi

    पुनि सुग्रीवहि लीन्ह बोलाई। बहु प्रकार नृपनीति सिखाई।।

  146. RCM 4.12.7Open verse →

    कह प्रभु सुनु सुग्रीव हरीसा। पुर न जाउँ दस चारि बरीसा।।

    अर्थ · Hindi

    कह प्रभु सुनु सुग्रीव हरीसा। पुर न जाउँ दस चारि बरीसा।।

  147. RCM 4.12.8Open verse →

    गत ग्रीषम बरषा रितु आई। रहिहउँ निकट सैल पर छाई।।

    अर्थ · Hindi

    गत ग्रीषम बरषा रितु आई। रहिहउँ निकट सैल पर छाई।।

  148. RCM 4.12.9Open verse →

    अंगद सहित करहु तुम्ह राजू। संतत हृदय धरेहु मम काजू।।

    अर्थ · Hindi

    अंगद सहित करहु तुम्ह राजू। संतत हृदय धरेहु मम काजू।।

  149. RCM 4.12.10Open verse →

    जब सुग्रीव भवन फिरि आए। रामु प्रबरषन गिरि पर छाए।।

    अर्थ · Hindi

    जब सुग्रीव भवन फिरि आए। रामु प्रबरषन गिरि पर छाए।।

  150. RCM 4.12.11Open verse →

    प्रथमहिं देवन्ह गिरि गुहा राखेउ रुचिर बनाइ।

    अर्थ · Hindi

    प्रथमहिं देवन्ह गिरि गुहा राखेउ रुचिर बनाइ।

  151. RCM 4.12.12Open verse →

    राम कृपानिधि कछु दिन बास करहिंगे आइ।।12।।

    अर्थ · Hindi

    राम कृपानिधि कछु दिन बास करहिंगे आइ।।12।।

  152. RCM 4.13.1Open verse →

    सुंदर बन कुसुमित अति सोभा। गुंजत मधुप निकर मधु लोभा।।

    अर्थ · Hindi

    सुंदर बन कुसुमित अति सोभा। गुंजत मधुप निकर मधु लोभा।।

  153. RCM 4.13.2Open verse →

    कंद मूल फल पत्र सुहाए। भए बहुत जब ते प्रभु आए ।।

    अर्थ · Hindi

    कंद मूल फल पत्र सुहाए। भए बहुत जब ते प्रभु आए ।।

  154. RCM 4.13.3Open verse →

    देखि मनोहर सैल अनूपा। रहे तहँ अनुज सहित सुरभूपा।।

    अर्थ · Hindi

    देखि मनोहर सैल अनूपा। रहे तहँ अनुज सहित सुरभूपा।।

  155. RCM 4.13.4Open verse →

    मधुकर खग मृग तनु धरि देवा। करहिं सिद्ध मुनि प्रभु कै सेवा।।

    अर्थ · Hindi

    मधुकर खग मृग तनु धरि देवा। करहिं सिद्ध मुनि प्रभु कै सेवा।।

  156. RCM 4.13.5Open verse →

    मंगलरुप भयउ बन तब ते । कीन्ह निवास रमापति जब ते।।

    अर्थ · Hindi

    मंगलरुप भयउ बन तब ते । कीन्ह निवास रमापति जब ते।।

  157. RCM 4.13.6Open verse →

    फटिक सिला अति सुभ्र सुहाई। सुख आसीन तहाँ द्वौ भाई।।

    अर्थ · Hindi

    फटिक सिला अति सुभ्र सुहाई। सुख आसीन तहाँ द्वौ भाई।।

  158. RCM 4.13.7Open verse →

    कहत अनुज सन कथा अनेका। भगति बिरति नृपनीति बिबेका।।

    अर्थ · Hindi

    कहत अनुज सन कथा अनेका। भगति बिरति नृपनीति बिबेका।।

  159. RCM 4.13.8Open verse →

    बरषा काल मेघ नभ छाए। गरजत लागत परम सुहाए।।

    अर्थ · Hindi

    बरषा काल मेघ नभ छाए। गरजत लागत परम सुहाए।।

  160. RCM 4.13.9Open verse →

    लछिमन देखु मोर गन नाचत बारिद पैखि।

    अर्थ · Hindi

    लछिमन देखु मोर गन नाचत बारिद पैखि।

  161. RCM 4.13.10Open verse →

    गृही बिरति रत हरष जस बिष्नु भगत कहुँ देखि।।13।।

    अर्थ · Hindi

    गृही बिरति रत हरष जस बिष्नु भगत कहुँ देखि।।13।।

  162. RCM 4.14.1Open verse →

    घन घमंड नभ गरजत घोरा। प्रिया हीन डरपत मन मोरा।।

    अर्थ · Hindi

    घन घमंड नभ गरजत घोरा। प्रिया हीन डरपत मन मोरा।।

  163. RCM 4.14.2Open verse →

    दामिनि दमक रह न घन माहीं। खल कै प्रीति जथा थिर नाहीं।।

    अर्थ · Hindi

    दामिनि दमक रह न घन माहीं। खल कै प्रीति जथा थिर नाहीं।।

  164. RCM 4.14.3Open verse →

    बरषहिं जलद भूमि निअराएँ। जथा नवहिं बुध बिद्या पाएँ।।

    अर्थ · Hindi

    बरषहिं जलद भूमि निअराएँ। जथा नवहिं बुध बिद्या पाएँ।।

  165. RCM 4.14.4Open verse →

    बूँद अघात सहहिं गिरि कैंसें । खल के बचन संत सह जैसें।।

    अर्थ · Hindi

    बूँद अघात सहहिं गिरि कैंसें । खल के बचन संत सह जैसें।।

  166. RCM 4.14.5Open verse →

    छुद्र नदीं भरि चलीं तोराई। जस थोरेहुँ धन खल इतराई।।

    अर्थ · Hindi

    छुद्र नदीं भरि चलीं तोराई। जस थोरेहुँ धन खल इतराई।।

  167. RCM 4.14.6Open verse →

    भूमि परत भा ढाबर पानी। जनु जीवहि माया लपटानी।।

    अर्थ · Hindi

    भूमि परत भा ढाबर पानी। जनु जीवहि माया लपटानी।।

  168. RCM 4.14.7Open verse →

    समिटि समिटि जल भरहिं तलावा। जिमि सदगुन सज्जन पहिं आवा।।

    अर्थ · Hindi

    समिटि समिटि जल भरहिं तलावा। जिमि सदगुन सज्जन पहिं आवा।।

  169. RCM 4.14.8Open verse →

    सरिता जल जलनिधि महुँ जाई। होई अचल जिमि जिव हरि पाई।।

    अर्थ · Hindi

    सरिता जल जलनिधि महुँ जाई। होई अचल जिमि जिव हरि पाई।।

  170. RCM 4.14.9Open verse →

    हरित भूमि तृन संकुल समुझि परहिं नहिं पंथ।

    अर्थ · Hindi

    हरित भूमि तृन संकुल समुझि परहिं नहिं पंथ।

  171. RCM 4.14.10Open verse →

    जिमि पाखंड बाद तें गुप्त होहिं सदग्रंथ।।14।।

    अर्थ · Hindi

    जिमि पाखंड बाद तें गुप्त होहिं सदग्रंथ।।14।।

  172. RCM 4.15.1Open verse →

    दादुर धुनि चहु दिसा सुहाई। बेद पढ़हिं जनु बटु समुदाई।।

    अर्थ · Hindi

    दादुर धुनि चहु दिसा सुहाई। बेद पढ़हिं जनु बटु समुदाई।।

  173. RCM 4.15.2Open verse →

    नव पल्लव भए बिटप अनेका। साधक मन जस मिलें बिबेका।।

    अर्थ · Hindi

    नव पल्लव भए बिटप अनेका। साधक मन जस मिलें बिबेका।।

  174. RCM 4.15.3Open verse →

    अर्क जबास पात बिनु भयऊ। जस सुराज खल उद्यम गयऊ।।

    अर्थ · Hindi

    अर्क जबास पात बिनु भयऊ। जस सुराज खल उद्यम गयऊ।।

  175. RCM 4.15.4Open verse →

    खोजत कतहुँ मिलइ नहिं धूरी। करइ क्रोध जिमि धरमहि दूरी।।

    अर्थ · Hindi

    खोजत कतहुँ मिलइ नहिं धूरी। करइ क्रोध जिमि धरमहि दूरी।।

  176. RCM 4.15.5Open verse →

    ससि संपन्न सोह महि कैसी। उपकारी कै संपति जैसी।।

    अर्थ · Hindi

    ससि संपन्न सोह महि कैसी। उपकारी कै संपति जैसी।।

  177. RCM 4.15.6Open verse →

    निसि तम घन खद्योत बिराजा। जनु दंभिन्ह कर मिला समाजा।।

    अर्थ · Hindi

    निसि तम घन खद्योत बिराजा। जनु दंभिन्ह कर मिला समाजा।।

  178. RCM 4.15.7Open verse →

    महाबृष्टि चलि फूटि किआरीं । जिमि सुतंत्र भएँ बिगरहिं नारीं।।

    अर्थ · Hindi

    महाबृष्टि चलि फूटि किआरीं । जिमि सुतंत्र भएँ बिगरहिं नारीं।।

  179. RCM 4.15.8Open verse →

    कृषी निरावहिं चतुर किसाना। जिमि बुध तजहिं मोह मद माना।।

    अर्थ · Hindi

    कृषी निरावहिं चतुर किसाना। जिमि बुध तजहिं मोह मद माना।।

  180. RCM 4.15.9Open verse →

    देखिअत चक्रबाक खग नाहीं। कलिहि पाइ जिमि धर्म पराहीं।।

    अर्थ · Hindi

    देखिअत चक्रबाक खग नाहीं। कलिहि पाइ जिमि धर्म पराहीं।।

  181. RCM 4.15.10Open verse →

    ऊषर बरषइ तृन नहिं जामा। जिमि हरिजन हियँ उपज न कामा।।

    अर्थ · Hindi

    ऊषर बरषइ तृन नहिं जामा। जिमि हरिजन हियँ उपज न कामा।।

  182. RCM 4.15.11Open verse →

    बिबिध जंतु संकुल महि भ्राजा। प्रजा बाढ़ जिमि पाइ सुराजा।।

    अर्थ · Hindi

    बिबिध जंतु संकुल महि भ्राजा। प्रजा बाढ़ जिमि पाइ सुराजा।।

  183. RCM 4.15.12Open verse →

    जहँ तहँ रहे पथिक थकि नाना। जिमि इंद्रिय गन उपजें ग्याना।।

    अर्थ · Hindi

    जहँ तहँ रहे पथिक थकि नाना। जिमि इंद्रिय गन उपजें ग्याना।।

  184. RCM 4.15.13Open verse →

    कबहुँ प्रबल बह मारुत जहँ तहँ मेघ बिलाहिं।

    अर्थ · Hindi

    कबहुँ प्रबल बह मारुत जहँ तहँ मेघ बिलाहिं।

  185. RCM 4.15.14Open verse →

    जिमि कपूत के उपजें कुल सद्धर्म नसाहिं।।15(क)।।

    अर्थ · Hindi

    जिमि कपूत के उपजें कुल सद्धर्म नसाहिं।।15(क)।।

  186. RCM 4.15.15Open verse →

    कबहुँ दिवस महँ निबिड़ तम कबहुँक प्रगट पतंग।

    अर्थ · Hindi

    कबहुँ दिवस महँ निबिड़ तम कबहुँक प्रगट पतंग।

  187. RCM 4.15.16Open verse →

    बिनसइ उपजइ ग्यान जिमि पाइ कुसंग सुसंग।।15(ख)।।

    अर्थ · Hindi

    बिनसइ उपजइ ग्यान जिमि पाइ कुसंग सुसंग।।15(ख)।।

  188. RCM 4.16.1Open verse →

    बरषा बिगत सरद रितु आई। लछिमन देखहु परम सुहाई।।

    अर्थ · Hindi

    बरषा बिगत सरद रितु आई। लछिमन देखहु परम सुहाई।।

  189. RCM 4.16.2Open verse →

    फूलें कास सकल महि छाई। जनु बरषाँ कृत प्रगट बुढ़ाई।।

    अर्थ · Hindi

    फूलें कास सकल महि छाई। जनु बरषाँ कृत प्रगट बुढ़ाई।।

  190. RCM 4.16.3Open verse →

    उदित अगस्ति पंथ जल सोषा। जिमि लोभहि सोषइ संतोषा।।

    अर्थ · Hindi

    उदित अगस्ति पंथ जल सोषा। जिमि लोभहि सोषइ संतोषा।।

  191. RCM 4.16.4Open verse →

    सरिता सर निर्मल जल सोहा। संत हृदय जस गत मद मोहा।।

    अर्थ · Hindi

    सरिता सर निर्मल जल सोहा। संत हृदय जस गत मद मोहा।।

  192. RCM 4.16.5Open verse →

    रस रस सूख सरित सर पानी। ममता त्याग करहिं जिमि ग्यानी।।

    अर्थ · Hindi

    रस रस सूख सरित सर पानी। ममता त्याग करहिं जिमि ग्यानी।।

  193. RCM 4.16.6Open verse →

    जानि सरद रितु खंजन आए। पाइ समय जिमि सुकृत सुहाए।।

    अर्थ · Hindi

    जानि सरद रितु खंजन आए। पाइ समय जिमि सुकृत सुहाए।।

  194. RCM 4.16.7Open verse →

    पंक न रेनु सोह असि धरनी। नीति निपुन नृप कै जसि करनी।।

    अर्थ · Hindi

    पंक न रेनु सोह असि धरनी। नीति निपुन नृप कै जसि करनी।।

  195. RCM 4.16.8Open verse →

    जल संकोच बिकल भइँ मीना। अबुध कुटुंबी जिमि धनहीना।।

    अर्थ · Hindi

    जल संकोच बिकल भइँ मीना। अबुध कुटुंबी जिमि धनहीना।।

  196. RCM 4.16.9Open verse →

    बिनु धन निर्मल सोह अकासा। हरिजन इव परिहरि सब आसा।।

    अर्थ · Hindi

    बिनु धन निर्मल सोह अकासा। हरिजन इव परिहरि सब आसा।।

  197. RCM 4.16.10Open verse →

    कहुँ कहुँ बृष्टि सारदी थोरी। कोउ एक पाव भगति जिमि मोरी।।

    अर्थ · Hindi

    कहुँ कहुँ बृष्टि सारदी थोरी। कोउ एक पाव भगति जिमि मोरी।।

  198. RCM 4.16.11Open verse →

    चले हरषि तजि नगर नृप तापस बनिक भिखारि।

    अर्थ · Hindi

    चले हरषि तजि नगर नृप तापस बनिक भिखारि।

  199. RCM 4.16.12Open verse →

    जिमि हरिभगत पाइ श्रम तजहि आश्रमी चारि।।16।।

    अर्थ · Hindi

    जिमि हरिभगत पाइ श्रम तजहि आश्रमी चारि।।16।।

  200. RCM 4.17.1Open verse →

    सुखी मीन जे नीर अगाधा। जिमि हरि सरन न एकउ बाधा।।

    अर्थ · Hindi

    सुखी मीन जे नीर अगाधा। जिमि हरि सरन न एकउ बाधा।।

  201. RCM 4.17.2Open verse →

    फूलें कमल सोह सर कैसा। निर्गुन ब्रम्ह सगुन भएँ जैसा।।

    अर्थ · Hindi

    फूलें कमल सोह सर कैसा। निर्गुन ब्रम्ह सगुन भएँ जैसा।।

  202. RCM 4.17.3Open verse →

    गुंजत मधुकर मुखर अनूपा। सुंदर खग रव नाना रूपा।।

    अर्थ · Hindi

    गुंजत मधुकर मुखर अनूपा। सुंदर खग रव नाना रूपा।।

  203. RCM 4.17.4Open verse →

    चक्रबाक मन दुख निसि पैखी। जिमि दुर्जन पर संपति देखी।।

    अर्थ · Hindi

    चक्रबाक मन दुख निसि पैखी। जिमि दुर्जन पर संपति देखी।।

  204. RCM 4.17.5Open verse →

    चातक रटत तृषा अति ओही। जिमि सुख लहइ न संकरद्रोही।।

    अर्थ · Hindi

    चातक रटत तृषा अति ओही। जिमि सुख लहइ न संकरद्रोही।।

  205. RCM 4.17.6Open verse →

    सरदातप निसि ससि अपहरई। संत दरस जिमि पातक टरई।।

    अर्थ · Hindi

    सरदातप निसि ससि अपहरई। संत दरस जिमि पातक टरई।।

  206. RCM 4.17.7Open verse →

    देखि इंदु चकोर समुदाई। चितवतहिं जिमि हरिजन हरि पाई।।

    अर्थ · Hindi

    देखि इंदु चकोर समुदाई। चितवतहिं जिमि हरिजन हरि पाई।।

  207. RCM 4.17.8Open verse →

    मसक दंस बीते हिम त्रासा। जिमि द्विज द्रोह किएँ कुल नासा।।

    अर्थ · Hindi

    मसक दंस बीते हिम त्रासा। जिमि द्विज द्रोह किएँ कुल नासा।।

  208. RCM 4.17.9Open verse →

    भूमि जीव संकुल रहे गए सरद रितु पाइ।

    अर्थ · Hindi

    भूमि जीव संकुल रहे गए सरद रितु पाइ।

  209. RCM 4.17.10Open verse →

    सदगुर मिले जाहिं जिमि संसय भ्रम समुदाइ।।17।।

    अर्थ · Hindi

    सदगुर मिले जाहिं जिमि संसय भ्रम समुदाइ।।17।।

  210. RCM 4.18.1Open verse →

    बरषा गत निर्मल रितु आई। सुधि न तात सीता कै पाई।।

    अर्थ · Hindi

    बरषा गत निर्मल रितु आई। सुधि न तात सीता कै पाई।।

  211. RCM 4.18.2Open verse →

    एक बार कैसेहुँ सुधि जानौं। कालहु जीत निमिष महुँ आनौं।।

    अर्थ · Hindi

    एक बार कैसेहुँ सुधि जानौं। कालहु जीत निमिष महुँ आनौं।।

  212. RCM 4.18.3Open verse →

    कतहुँ रहउ जौं जीवति होई। तात जतन करि आनेउँ सोई।।

    अर्थ · Hindi

    कतहुँ रहउ जौं जीवति होई। तात जतन करि आनेउँ सोई।।

  213. RCM 4.18.4Open verse →

    सुग्रीवहुँ सुधि मोरि बिसारी। पावा राज कोस पुर नारी।।

    अर्थ · Hindi

    सुग्रीवहुँ सुधि मोरि बिसारी। पावा राज कोस पुर नारी।।

  214. RCM 4.18.5Open verse →

    जेहिं सायक मारा मैं बाली। तेहिं सर हतौं मूढ़ कहँ काली।।

    अर्थ · Hindi

    जेहिं सायक मारा मैं बाली। तेहिं सर हतौं मूढ़ कहँ काली।।

  215. RCM 4.18.6Open verse →

    जासु कृपाँ छूटहीं मद मोहा। ता कहुँ उमा कि सपनेहुँ कोहा।।

    अर्थ · Hindi

    जासु कृपाँ छूटहीं मद मोहा। ता कहुँ उमा कि सपनेहुँ कोहा।।

  216. RCM 4.18.7Open verse →

    जानहिं यह चरित्र मुनि ग्यानी। जिन्ह रघुबीर चरन रति मानी।।

    अर्थ · Hindi

    जानहिं यह चरित्र मुनि ग्यानी। जिन्ह रघुबीर चरन रति मानी।।

  217. RCM 4.18.8Open verse →

    लछिमन क्रोधवंत प्रभु जाना। धनुष चढ़ाइ गहे कर बाना।।

    अर्थ · Hindi

    लछिमन क्रोधवंत प्रभु जाना। धनुष चढ़ाइ गहे कर बाना।।

  218. RCM 4.18.9Open verse →

    तब अनुजहि समुझावा रघुपति करुना सींव।।

    अर्थ · Hindi

    तब अनुजहि समुझावा रघुपति करुना सींव।।

  219. RCM 4.18.10Open verse →

    भय देखाइ लै आवहु तात सखा सुग्रीव।।18।।

    अर्थ · Hindi

    भय देखाइ लै आवहु तात सखा सुग्रीव।।18।।

  220. RCM 4.19.1Open verse →

    इहाँ पवनसुत हृदयँ बिचारा। राम काजु सुग्रीवँ बिसारा।।

    अर्थ · Hindi

    इहाँ पवनसुत हृदयँ बिचारा। राम काजु सुग्रीवँ बिसारा।।

  221. RCM 4.19.2Open verse →

    निकट जाइ चरनन्हि सिरु नावा। चारिहु बिधि तेहि कहि समुझावा।।

    अर्थ · Hindi

    निकट जाइ चरनन्हि सिरु नावा। चारिहु बिधि तेहि कहि समुझावा।।

  222. RCM 4.19.3Open verse →

    सुनि सुग्रीवँ परम भय माना। बिषयँ मोर हरि लीन्हेउ ग्याना।।

    अर्थ · Hindi

    सुनि सुग्रीवँ परम भय माना। बिषयँ मोर हरि लीन्हेउ ग्याना।।

  223. RCM 4.19.4Open verse →

    अब मारुतसुत दूत समूहा। पठवहु जहँ तहँ बानर जूहा।।

    अर्थ · Hindi

    अब मारुतसुत दूत समूहा। पठवहु जहँ तहँ बानर जूहा।।

  224. RCM 4.19.5Open verse →

    कहहु पाख महुँ आव न जोई। मोरें कर ता कर बध होई।।

    अर्थ · Hindi

    कहहु पाख महुँ आव न जोई। मोरें कर ता कर बध होई।।

  225. RCM 4.19.6Open verse →

    तब हनुमंत बोलाए दूता। सब कर करि सनमान बहूता।।

    अर्थ · Hindi

    तब हनुमंत बोलाए दूता। सब कर करि सनमान बहूता।।

  226. RCM 4.19.7Open verse →

    भय अरु प्रीति नीति देखाई। चले सकल चरनन्हि सिर नाई।।

    अर्थ · Hindi

    भय अरु प्रीति नीति देखाई। चले सकल चरनन्हि सिर नाई।।

  227. RCM 4.19.8Open verse →

    एहि अवसर लछिमन पुर आए। क्रोध देखि जहँ तहँ कपि धाए।।

    अर्थ · Hindi

    एहि अवसर लछिमन पुर आए। क्रोध देखि जहँ तहँ कपि धाए।।

  228. RCM 4.19.9Open verse →

    धनुष चढ़ाइ कहा तब जारि करउँ पुर छार।

    अर्थ · Hindi

    धनुष चढ़ाइ कहा तब जारि करउँ पुर छार।

  229. RCM 4.19.10Open verse →

    ब्याकुल नगर देखि तब आयउ बालिकुमार।।19।।

    अर्थ · Hindi

    ब्याकुल नगर देखि तब आयउ बालिकुमार।।19।।

  230. RCM 4.20.1Open verse →

    चरन नाइ सिरु बिनती कीन्ही। लछिमन अभय बाँह तेहि दीन्ही।।

    अर्थ · Hindi

    चरन नाइ सिरु बिनती कीन्ही। लछिमन अभय बाँह तेहि दीन्ही।।

  231. RCM 4.20.2Open verse →

    क्रोधवंत लछिमन सुनि काना। कह कपीस अति भयँ अकुलाना।।

    अर्थ · Hindi

    क्रोधवंत लछिमन सुनि काना। कह कपीस अति भयँ अकुलाना।।

  232. RCM 4.20.3Open verse →

    सुनु हनुमंत संग लै तारा। करि बिनती समुझाउ कुमारा।।

    अर्थ · Hindi

    सुनु हनुमंत संग लै तारा। करि बिनती समुझाउ कुमारा।।

  233. RCM 4.20.4Open verse →

    तारा सहित जाइ हनुमाना। चरन बंदि प्रभु सुजस बखाना।।

    अर्थ · Hindi

    तारा सहित जाइ हनुमाना। चरन बंदि प्रभु सुजस बखाना।।

  234. RCM 4.20.5Open verse →

    करि बिनती मंदिर लै आए। चरन पखारि पलँग बैठाए।।

    अर्थ · Hindi

    करि बिनती मंदिर लै आए। चरन पखारि पलँग बैठाए।।

  235. RCM 4.20.6Open verse →

    तब कपीस चरनन्हि सिरु नावा। गहि भुज लछिमन कंठ लगावा।।

    अर्थ · Hindi

    तब कपीस चरनन्हि सिरु नावा। गहि भुज लछिमन कंठ लगावा।।

  236. RCM 4.20.7Open verse →

    नाथ बिषय सम मद कछु नाहीं। मुनि मन मोह करइ छन माहीं।।

    अर्थ · Hindi

    नाथ बिषय सम मद कछु नाहीं। मुनि मन मोह करइ छन माहीं।।

  237. RCM 4.20.8Open verse →

    सुनत बिनीत बचन सुख पावा। लछिमन तेहि बहु बिधि समुझावा।।

    अर्थ · Hindi

    सुनत बिनीत बचन सुख पावा। लछिमन तेहि बहु बिधि समुझावा।।

  238. RCM 4.20.9Open verse →

    पवन तनय सब कथा सुनाई। जेहि बिधि गए दूत समुदाई।।

    अर्थ · Hindi

    पवन तनय सब कथा सुनाई। जेहि बिधि गए दूत समुदाई।।

  239. RCM 4.20.10Open verse →

    हरषि चले सुग्रीव तब अंगदादि कपि साथ।

    अर्थ · Hindi

    हरषि चले सुग्रीव तब अंगदादि कपि साथ।

  240. RCM 4.20.11Open verse →

    रामानुज आगें करि आए जहँ रघुनाथ।।20।।

    अर्थ · Hindi

    रामानुज आगें करि आए जहँ रघुनाथ।।20।।

  241. RCM 4.21.1Open verse →

    नाइ चरन सिरु कह कर जोरी। नाथ मोहि कछु नाहिन खोरी।।

    अर्थ · Hindi

    नाइ चरन सिरु कह कर जोरी। नाथ मोहि कछु नाहिन खोरी।।

  242. RCM 4.21.2Open verse →

    अतिसय प्रबल देव तब माया। छूटइ राम करहु जौं दाया।।

    अर्थ · Hindi

    अतिसय प्रबल देव तब माया। छूटइ राम करहु जौं दाया।।

  243. RCM 4.21.3Open verse →

    बिषय बस्य सुर नर मुनि स्वामी। मैं पावँर पसु कपि अति कामी।।

    अर्थ · Hindi

    बिषय बस्य सुर नर मुनि स्वामी। मैं पावँर पसु कपि अति कामी।।

  244. RCM 4.21.4Open verse →

    नारि नयन सर जाहि न लागा। घोर क्रोध तम निसि जो जागा।।

    अर्थ · Hindi

    नारि नयन सर जाहि न लागा। घोर क्रोध तम निसि जो जागा।।

  245. RCM 4.21.5Open verse →

    लोभ पाँस जेहिं गर न बँधाया। सो नर तुम्ह समान रघुराया।।

    अर्थ · Hindi

    लोभ पाँस जेहिं गर न बँधाया। सो नर तुम्ह समान रघुराया।।

  246. RCM 4.21.6Open verse →

    यह गुन साधन तें नहिं होई। तुम्हरी कृपाँ पाव कोइ कोई।।

    अर्थ · Hindi

    यह गुन साधन तें नहिं होई। तुम्हरी कृपाँ पाव कोइ कोई।।

  247. RCM 4.21.7Open verse →

    तब रघुपति बोले मुसकाई। तुम्ह प्रिय मोहि भरत जिमि भाई।।

    अर्थ · Hindi

    तब रघुपति बोले मुसकाई। तुम्ह प्रिय मोहि भरत जिमि भाई।।

  248. RCM 4.21.8Open verse →

    अब सोइ जतनु करहु मन लाई। जेहि बिधि सीता कै सुधि पाई।।

    अर्थ · Hindi

    अब सोइ जतनु करहु मन लाई। जेहि बिधि सीता कै सुधि पाई।।

  249. RCM 4.21.9Open verse →

    एहि बिधि होत बतकही आए बानर जूथ।

    अर्थ · Hindi

    एहि बिधि होत बतकही आए बानर जूथ।

  250. RCM 4.21.10Open verse →

    नाना बरन सकल दिसि देखिअ कीस बरुथ।।21।।

    अर्थ · Hindi

    नाना बरन सकल दिसि देखिअ कीस बरुथ।।21।।

  251. RCM 4.22.1Open verse →

    बानर कटक उमा में देखा। सो मूरुख जो करन चह लेखा।।

    अर्थ · Hindi

    बानर कटक उमा में देखा। सो मूरुख जो करन चह लेखा।।

  252. RCM 4.22.2Open verse →

    आइ राम पद नावहिं माथा। निरखि बदनु सब होहिं सनाथा।।

    अर्थ · Hindi

    आइ राम पद नावहिं माथा। निरखि बदनु सब होहिं सनाथा।।

  253. RCM 4.22.3Open verse →

    अस कपि एक न सेना माहीं। राम कुसल जेहि पूछी नाहीं।।

    अर्थ · Hindi

    अस कपि एक न सेना माहीं। राम कुसल जेहि पूछी नाहीं।।

  254. RCM 4.22.4Open verse →

    यह कछु नहिं प्रभु कइ अधिकाई। बिस्वरूप ब्यापक रघुराई।।

    अर्थ · Hindi

    यह कछु नहिं प्रभु कइ अधिकाई। बिस्वरूप ब्यापक रघुराई।।

  255. RCM 4.22.5Open verse →

    ठाढ़े जहँ तहँ आयसु पाई। कह सुग्रीव सबहि समुझाई।।

    अर्थ · Hindi

    ठाढ़े जहँ तहँ आयसु पाई। कह सुग्रीव सबहि समुझाई।।

  256. RCM 4.22.6Open verse →

    राम काजु अरु मोर निहोरा। बानर जूथ जाहु चहुँ ओरा।।

    अर्थ · Hindi

    राम काजु अरु मोर निहोरा। बानर जूथ जाहु चहुँ ओरा।।

  257. RCM 4.22.7Open verse →

    जनकसुता कहुँ खोजहु जाई। मास दिवस महँ आएहु भाई।।

    अर्थ · Hindi

    जनकसुता कहुँ खोजहु जाई। मास दिवस महँ आएहु भाई।।

  258. RCM 4.22.8Open verse →

    अवधि मेटि जो बिनु सुधि पाएँ। आवइ बनिहि सो मोहि मराएँ।।

    अर्थ · Hindi

    अवधि मेटि जो बिनु सुधि पाएँ। आवइ बनिहि सो मोहि मराएँ।।

  259. RCM 4.22.9Open verse →

    बचन सुनत सब बानर जहँ तहँ चले तुरंत ।

    अर्थ · Hindi

    बचन सुनत सब बानर जहँ तहँ चले तुरंत ।

  260. RCM 4.22.10Open verse →

    तब सुग्रीवँ बोलाए अंगद नल हनुमंत।।22।।

    अर्थ · Hindi

    तब सुग्रीवँ बोलाए अंगद नल हनुमंत।।22।।

  261. RCM 4.23.1Open verse →

    सुनहु नील अंगद हनुमाना। जामवंत मतिधीर सुजाना।।

    अर्थ · Hindi

    सुनहु नील अंगद हनुमाना। जामवंत मतिधीर सुजाना।।

  262. RCM 4.23.2Open verse →

    सकल सुभट मिलि दच्छिन जाहू। सीता सुधि पूँछेउ सब काहू।।

    अर्थ · Hindi

    सकल सुभट मिलि दच्छिन जाहू। सीता सुधि पूँछेउ सब काहू।।

  263. RCM 4.23.3Open verse →

    मन क्रम बचन सो जतन बिचारेहु। रामचंद्र कर काजु सँवारेहु।।

    अर्थ · Hindi

    मन क्रम बचन सो जतन बिचारेहु। रामचंद्र कर काजु सँवारेहु।।

  264. RCM 4.23.4Open verse →

    भानु पीठि सेइअ उर आगी। स्वामिहि सर्ब भाव छल त्यागी।।

    अर्थ · Hindi

    भानु पीठि सेइअ उर आगी। स्वामिहि सर्ब भाव छल त्यागी।।

  265. RCM 4.23.5Open verse →

    तजि माया सेइअ परलोका। मिटहिं सकल भव संभव सोका।।

    अर्थ · Hindi

    तजि माया सेइअ परलोका। मिटहिं सकल भव संभव सोका।।

  266. RCM 4.23.6Open verse →

    देह धरे कर यह फलु भाई। भजिअ राम सब काम बिहाई।।

    अर्थ · Hindi

    देह धरे कर यह फलु भाई। भजिअ राम सब काम बिहाई।।

  267. RCM 4.23.7Open verse →

    सोइ गुनग्य सोई बड़भागी । जो रघुबीर चरन अनुरागी।।

    अर्थ · Hindi

    सोइ गुनग्य सोई बड़भागी । जो रघुबीर चरन अनुरागी।।

  268. RCM 4.23.8Open verse →

    आयसु मागि चरन सिरु नाई। चले हरषि सुमिरत रघुराई।।

    अर्थ · Hindi

    आयसु मागि चरन सिरु नाई। चले हरषि सुमिरत रघुराई।।

  269. RCM 4.23.9Open verse →

    पाछें पवन तनय सिरु नावा। जानि काज प्रभु निकट बोलावा।।

    अर्थ · Hindi

    पाछें पवन तनय सिरु नावा। जानि काज प्रभु निकट बोलावा।।

  270. RCM 4.23.10Open verse →

    परसा सीस सरोरुह पानी। करमुद्रिका दीन्हि जन जानी।।

    अर्थ · Hindi

    परसा सीस सरोरुह पानी। करमुद्रिका दीन्हि जन जानी।।

  271. RCM 4.23.11Open verse →

    बहु प्रकार सीतहि समुझाएहु। कहि बल बिरह बेगि तुम्ह आएहु।।

    अर्थ · Hindi

    बहु प्रकार सीतहि समुझाएहु। कहि बल बिरह बेगि तुम्ह आएहु।।

  272. RCM 4.23.12Open verse →

    हनुमत जन्म सुफल करि माना। चलेउ हृदयँ धरि कृपानिधाना।।

    अर्थ · Hindi

    हनुमत जन्म सुफल करि माना। चलेउ हृदयँ धरि कृपानिधाना।।

  273. RCM 4.23.13Open verse →

    जद्यपि प्रभु जानत सब बाता। राजनीति राखत सुरत्राता।।

    अर्थ · Hindi

    जद्यपि प्रभु जानत सब बाता। राजनीति राखत सुरत्राता।।

  274. RCM 4.23.14Open verse →

    चले सकल बन खोजत सरिता सर गिरि खोह।

    अर्थ · Hindi

    चले सकल बन खोजत सरिता सर गिरि खोह।

  275. RCM 4.23.15Open verse →

    राम काज लयलीन मन बिसरा तन कर छोह।।23।।

    अर्थ · Hindi

    राम काज लयलीन मन बिसरा तन कर छोह।।23।।

  276. RCM 4.24.1Open verse →

    कतहुँ होइ निसिचर सैं भेटा। प्रान लेहिं एक एक चपेटा।।

    अर्थ · Hindi

    कतहुँ होइ निसिचर सैं भेटा। प्रान लेहिं एक एक चपेटा।।

  277. RCM 4.24.2Open verse →

    बहु प्रकार गिरि कानन हेरहिं। कोउ मुनि मिलत ताहि सब घेरहिं।।

    अर्थ · Hindi

    बहु प्रकार गिरि कानन हेरहिं। कोउ मुनि मिलत ताहि सब घेरहिं।।

  278. RCM 4.24.3Open verse →

    लागि तृषा अतिसय अकुलाने। मिलइ न जल घन गहन भुलाने।।

    अर्थ · Hindi

    लागि तृषा अतिसय अकुलाने। मिलइ न जल घन गहन भुलाने।।

  279. RCM 4.24.4Open verse →

    मन हनुमान कीन्ह अनुमाना। मरन चहत सब बिनु जल पाना।।

    अर्थ · Hindi

    मन हनुमान कीन्ह अनुमाना। मरन चहत सब बिनु जल पाना।।

  280. RCM 4.24.5Open verse →

    चढ़ि गिरि सिखर चहूँ दिसि देखा। भूमि बिबिर एक कौतुक पेखा।।

    अर्थ · Hindi

    चढ़ि गिरि सिखर चहूँ दिसि देखा। भूमि बिबिर एक कौतुक पेखा।।

  281. RCM 4.24.6Open verse →

    चक्रबाक बक हंस उड़ाहीं। बहुतक खग प्रबिसहिं तेहि माहीं।।

    अर्थ · Hindi

    चक्रबाक बक हंस उड़ाहीं। बहुतक खग प्रबिसहिं तेहि माहीं।।

  282. RCM 4.24.7Open verse →

    गिरि ते उतरि पवनसुत आवा। सब कहुँ लै सोइ बिबर देखावा।।

    अर्थ · Hindi

    गिरि ते उतरि पवनसुत आवा। सब कहुँ लै सोइ बिबर देखावा।।

  283. RCM 4.24.8Open verse →

    आगें कै हनुमंतहि लीन्हा। पैठे बिबर बिलंबु न कीन्हा।।

    अर्थ · Hindi

    आगें कै हनुमंतहि लीन्हा। पैठे बिबर बिलंबु न कीन्हा।।

  284. RCM 4.24.9Open verse →

    दीख जाइ उपवन बर सर बिगसित बहु कंज।

    अर्थ · Hindi

    दीख जाइ उपवन बर सर बिगसित बहु कंज।

  285. RCM 4.24.10Open verse →

    मंदिर एक रुचिर तहँ बैठि नारि तप पुंज।।24।।

    अर्थ · Hindi

    मंदिर एक रुचिर तहँ बैठि नारि तप पुंज।।24।।

  286. RCM 4.25.1Open verse →

    दूरि ते ताहि सबन्हि सिर नावा। पूछें निज बृत्तांत सुनावा।।

    अर्थ · Hindi

    दूरि ते ताहि सबन्हि सिर नावा। पूछें निज बृत्तांत सुनावा।।

  287. RCM 4.25.2Open verse →

    तेहिं तब कहा करहु जल पाना। खाहु सुरस सुंदर फल नाना।।

    अर्थ · Hindi

    तेहिं तब कहा करहु जल पाना। खाहु सुरस सुंदर फल नाना।।

  288. RCM 4.25.3Open verse →

    मज्जनु कीन्ह मधुर फल खाए। तासु निकट पुनि सब चलि आए।।

    अर्थ · Hindi

    मज्जनु कीन्ह मधुर फल खाए। तासु निकट पुनि सब चलि आए।।

  289. RCM 4.25.4Open verse →

    तेहिं सब आपनि कथा सुनाई। मैं अब जाब जहाँ रघुराई।।

    अर्थ · Hindi

    तेहिं सब आपनि कथा सुनाई। मैं अब जाब जहाँ रघुराई।।

  290. RCM 4.25.5Open verse →

    मूदहु नयन बिबर तजि जाहू। पैहहु सीतहि जनि पछिताहू।।

    अर्थ · Hindi

    मूदहु नयन बिबर तजि जाहू। पैहहु सीतहि जनि पछिताहू।।

  291. RCM 4.25.6Open verse →

    नयन मूदि पुनि देखहिं बीरा। ठाढ़े सकल सिंधु कें तीरा।।

    अर्थ · Hindi

    नयन मूदि पुनि देखहिं बीरा। ठाढ़े सकल सिंधु कें तीरा।।

  292. RCM 4.25.7Open verse →

    सो पुनि गई जहाँ रघुनाथा। जाइ कमल पद नाएसि माथा।।

    अर्थ · Hindi

    सो पुनि गई जहाँ रघुनाथा। जाइ कमल पद नाएसि माथा।।

  293. RCM 4.25.8Open verse →

    नाना भाँति बिनय तेहिं कीन्ही। अनपायनी भगति प्रभु दीन्ही।।

    अर्थ · Hindi

    नाना भाँति बिनय तेहिं कीन्ही। अनपायनी भगति प्रभु दीन्ही।।

  294. RCM 4.25.9Open verse →

    बदरीबन कहुँ सो गई प्रभु अग्या धरि सीस ।

    अर्थ · Hindi

    बदरीबन कहुँ सो गई प्रभु अग्या धरि सीस ।

  295. RCM 4.25.10Open verse →

    उर धरि राम चरन जुग जे बंदत अज ईस।।25।।

    अर्थ · Hindi

    उर धरि राम चरन जुग जे बंदत अज ईस।।25।।

  296. RCM 4.26.1Open verse →

    इहाँ बिचारहिं कपि मन माहीं। बीती अवधि काज कछु नाहीं।।

    अर्थ · Hindi

    इहाँ बिचारहिं कपि मन माहीं। बीती अवधि काज कछु नाहीं।।

  297. RCM 4.26.2Open verse →

    सब मिलि कहहिं परस्पर बाता। बिनु सुधि लएँ करब का भ्राता।।

    अर्थ · Hindi

    सब मिलि कहहिं परस्पर बाता। बिनु सुधि लएँ करब का भ्राता।।

  298. RCM 4.26.3Open verse →

    कह अंगद लोचन भरि बारी। दुहुँ प्रकार भइ मृत्यु हमारी।।

    अर्थ · Hindi

    कह अंगद लोचन भरि बारी। दुहुँ प्रकार भइ मृत्यु हमारी।।

  299. RCM 4.26.4Open verse →

    इहाँ न सुधि सीता कै पाई। उहाँ गएँ मारिहि कपिराई।।

    अर्थ · Hindi

    इहाँ न सुधि सीता कै पाई। उहाँ गएँ मारिहि कपिराई।।

  300. RCM 4.26.5Open verse →

    पिता बधे पर मारत मोही। राखा राम निहोर न ओही।।

    अर्थ · Hindi

    पिता बधे पर मारत मोही। राखा राम निहोर न ओही।।

  301. RCM 4.26.6Open verse →

    पुनि पुनि अंगद कह सब पाहीं। मरन भयउ कछु संसय नाहीं।।

    अर्थ · Hindi

    पुनि पुनि अंगद कह सब पाहीं। मरन भयउ कछु संसय नाहीं।।

  302. RCM 4.26.7Open verse →

    अंगद बचन सुनत कपि बीरा। बोलि न सकहिं नयन बह नीरा।।

    अर्थ · Hindi

    अंगद बचन सुनत कपि बीरा। बोलि न सकहिं नयन बह नीरा।।

  303. RCM 4.26.8Open verse →

    छन एक सोच मगन होइ रहे। पुनि अस वचन कहत सब भए।।

    अर्थ · Hindi

    छन एक सोच मगन होइ रहे। पुनि अस वचन कहत सब भए।।

  304. RCM 4.26.9Open verse →

    हम सीता कै सुधि लिन्हें बिना। नहिं जैंहैं जुबराज प्रबीना।।

    अर्थ · Hindi

    हम सीता कै सुधि लिन्हें बिना। नहिं जैंहैं जुबराज प्रबीना।।

  305. RCM 4.26.10Open verse →

    अस कहि लवन सिंधु तट जाई। बैठे कपि सब दर्भ डसाई।।

    अर्थ · Hindi

    अस कहि लवन सिंधु तट जाई। बैठे कपि सब दर्भ डसाई।।

  306. RCM 4.26.11Open verse →

    जामवंत अंगद दुख देखी। कहिं कथा उपदेस बिसेषी।।

    अर्थ · Hindi

    जामवंत अंगद दुख देखी। कहिं कथा उपदेस बिसेषी।।

  307. RCM 4.26.12Open verse →

    तात राम कहुँ नर जनि मानहु। निर्गुन ब्रम्ह अजित अज जानहु।।

    अर्थ · Hindi

    तात राम कहुँ नर जनि मानहु। निर्गुन ब्रम्ह अजित अज जानहु।।

  308. RCM 4.26.13Open verse →

    हम सब सेवक अति बड़भागी। संतत सगुन ब्रह्म अनुरागी।।

    अर्थ · Hindi

    हम सब सेवक अति बड़भागी। संतत सगुन ब्रह्म अनुरागी।।

  309. RCM 4.26.14Open verse →

    निज इच्छा प्रभु अवतरइ सुर महि गो द्विज लागि।

    अर्थ · Hindi

    निज इच्छा प्रभु अवतरइ सुर महि गो द्विज लागि।

  310. RCM 4.26.15Open verse →

    सगुन उपासक संग तहँ रहहिं मोच्छ सब त्यागि।।26।।

    अर्थ · Hindi

    सगुन उपासक संग तहँ रहहिं मोच्छ सब त्यागि।।26।।

  311. RCM 4.27.1Open verse →

    एहि बिधि कथा कहहि बहु भाँती गिरि कंदराँ सुनी संपाती।।

    अर्थ · Hindi

    एहि बिधि कथा कहहि बहु भाँती गिरि कंदराँ सुनी संपाती।।

  312. RCM 4.27.2Open verse →

    बाहेर होइ देखि बहु कीसा। मोहि अहार दीन्ह जगदीसा।।

    अर्थ · Hindi

    बाहेर होइ देखि बहु कीसा। मोहि अहार दीन्ह जगदीसा।।

  313. RCM 4.27.3Open verse →

    आजु सबहि कहँ भच्छन करऊँ। दिन बहु चले अहार बिनु मरऊँ।।

    अर्थ · Hindi

    आजु सबहि कहँ भच्छन करऊँ। दिन बहु चले अहार बिनु मरऊँ।।

  314. RCM 4.27.4Open verse →

    कबहुँ न मिल भरि उदर अहारा। आजु दीन्ह बिधि एकहिं बारा।।

    अर्थ · Hindi

    कबहुँ न मिल भरि उदर अहारा। आजु दीन्ह बिधि एकहिं बारा।।

  315. RCM 4.27.5Open verse →

    डरपे गीध बचन सुनि काना। अब भा मरन सत्य हम जाना।।

    अर्थ · Hindi

    डरपे गीध बचन सुनि काना। अब भा मरन सत्य हम जाना।।

  316. RCM 4.27.6Open verse →

    कपि सब उठे गीध कहँ देखी। जामवंत मन सोच बिसेषी।।

    अर्थ · Hindi

    कपि सब उठे गीध कहँ देखी। जामवंत मन सोच बिसेषी।।

  317. RCM 4.27.7Open verse →

    कह अंगद बिचारि मन माहीं। धन्य जटायू सम कोउ नाहीं।।

    अर्थ · Hindi

    कह अंगद बिचारि मन माहीं। धन्य जटायू सम कोउ नाहीं।।

  318. RCM 4.27.8Open verse →

    राम काज कारन तनु त्यागी । हरि पुर गयउ परम बड़ भागी।।

    अर्थ · Hindi

    राम काज कारन तनु त्यागी । हरि पुर गयउ परम बड़ भागी।।

  319. RCM 4.27.9Open verse →

    सुनि खग हरष सोक जुत बानी । आवा निकट कपिन्ह भय मानी।।

    अर्थ · Hindi

    सुनि खग हरष सोक जुत बानी । आवा निकट कपिन्ह भय मानी।।

  320. RCM 4.27.10Open verse →

    तिन्हहि अभय करि पूछेसि जाई। कथा सकल तिन्ह ताहि सुनाई।।

    अर्थ · Hindi

    तिन्हहि अभय करि पूछेसि जाई। कथा सकल तिन्ह ताहि सुनाई।।

  321. RCM 4.27.11Open verse →

    सुनि संपाति बंधु कै करनी। रघुपति महिमा बधुबिधि बरनी।।

    अर्थ · Hindi

    सुनि संपाति बंधु कै करनी। रघुपति महिमा बधुबिधि बरनी।।

  322. RCM 4.27.12Open verse →

    मोहि लै जाहु सिंधुतट देउँ तिलांजलि ताहि ।

    अर्थ · Hindi

    मोहि लै जाहु सिंधुतट देउँ तिलांजलि ताहि ।

  323. RCM 4.27.13Open verse →

    बचन सहाइ करवि मैं पैहहु खोजहु जाहि ।।27।।

    अर्थ · Hindi

    बचन सहाइ करवि मैं पैहहु खोजहु जाहि ।।27।।

  324. RCM 4.28.1Open verse →

    अनुज क्रिया करि सागर तीरा। कहि निज कथा सुनहु कपि बीरा।।

    अर्थ · Hindi

    अनुज क्रिया करि सागर तीरा। कहि निज कथा सुनहु कपि बीरा।।

  325. RCM 4.28.2Open verse →

    हम द्वौ बंधु प्रथम तरुनाई । गगन गए रबि निकट उडाई।।

    अर्थ · Hindi

    हम द्वौ बंधु प्रथम तरुनाई । गगन गए रबि निकट उडाई।।

  326. RCM 4.28.3Open verse →

    तेज न सहि सक सो फिरि आवा । मै अभिमानी रबि निअरावा ।।

    अर्थ · Hindi

    तेज न सहि सक सो फिरि आवा । मै अभिमानी रबि निअरावा ।।

  327. RCM 4.28.4Open verse →

    जरे पंख अति तेज अपारा । परेउँ भूमि करि घोर चिकारा ।।

    अर्थ · Hindi

    जरे पंख अति तेज अपारा । परेउँ भूमि करि घोर चिकारा ।।

  328. RCM 4.28.5Open verse →

    मुनि एक नाम चंद्रमा ओही। लागी दया देखी करि मोही।।

    अर्थ · Hindi

    मुनि एक नाम चंद्रमा ओही। लागी दया देखी करि मोही।।

  329. RCM 4.28.6Open verse →

    बहु प्रकार तेंहि ग्यान सुनावा । देहि जनित अभिमानी छड़ावा ।।

    अर्थ · Hindi

    बहु प्रकार तेंहि ग्यान सुनावा । देहि जनित अभिमानी छड़ावा ।।

  330. RCM 4.28.7Open verse →

    त्रेताँ ब्रह्म मनुज तनु धरिही। तासु नारि निसिचर पति हरिही।।

    अर्थ · Hindi

    त्रेताँ ब्रह्म मनुज तनु धरिही। तासु नारि निसिचर पति हरिही।।

  331. RCM 4.28.8Open verse →

    तासु खोज पठइहि प्रभू दूता। तिन्हहि मिलें तैं होब पुनीता।।

    अर्थ · Hindi

    तासु खोज पठइहि प्रभू दूता। तिन्हहि मिलें तैं होब पुनीता।।

  332. RCM 4.28.9Open verse →

    जमिहहिं पंख करसि जनि चिंता । तिन्हहि देखाइ देहेसु तैं सीता।।

    अर्थ · Hindi

    जमिहहिं पंख करसि जनि चिंता । तिन्हहि देखाइ देहेसु तैं सीता।।

  333. RCM 4.28.10Open verse →

    मुनि कइ गिरा सत्य भइ आजू । सुनि मम बचन करहु प्रभु काजू।।

    अर्थ · Hindi

    मुनि कइ गिरा सत्य भइ आजू । सुनि मम बचन करहु प्रभु काजू।।

  334. RCM 4.28.11Open verse →

    गिरि त्रिकूट ऊपर बस लंका । तहँ रह रावन सहज असंका ।।

    अर्थ · Hindi

    गिरि त्रिकूट ऊपर बस लंका । तहँ रह रावन सहज असंका ।।

  335. RCM 4.28.12Open verse →

    तहँ असोक उपबन जहँ रहई ।। सीता बैठि सोच रत अहई।।

    अर्थ · Hindi

    तहँ असोक उपबन जहँ रहई ।। सीता बैठि सोच रत अहई।।

  336. RCM 4.28.13Open verse →

    मैं देखउँ तुम्ह नाहि गीघहि दष्टि अपार।।

    अर्थ · Hindi

    मैं देखउँ तुम्ह नाहि गीघहि दष्टि अपार।।

  337. RCM 4.28.14Open verse →

    बूढ भयउँ न त करतेउँ कछुक सहाय तुम्हार।।28।।

    अर्थ · Hindi

    बूढ भयउँ न त करतेउँ कछुक सहाय तुम्हार।।28।।

  338. RCM 4.29.1Open verse →

    जो नाघइ सत जोजन सागर । करइ सो राम काज मति आगर ।।

    अर्थ · Hindi

    जो नाघइ सत जोजन सागर । करइ सो राम काज मति आगर ।।

  339. RCM 4.29.2Open verse →

    मोहि बिलोकि धरहु मन धीरा । राम कृपाँ कस भयउ सरीरा।।

    अर्थ · Hindi

    मोहि बिलोकि धरहु मन धीरा । राम कृपाँ कस भयउ सरीरा।।

  340. RCM 4.29.3Open verse →

    पापिउ जा कर नाम सुमिरहीं। अति अपार भवसागर तरहीं।।

    अर्थ · Hindi

    पापिउ जा कर नाम सुमिरहीं। अति अपार भवसागर तरहीं।।

  341. RCM 4.29.4Open verse →

    तासु दूत तुम्ह तजि कदराई। राम हृदयँ धरि करहु उपाई।।

    अर्थ · Hindi

    तासु दूत तुम्ह तजि कदराई। राम हृदयँ धरि करहु उपाई।।

  342. RCM 4.29.5Open verse →

    अस कहि गरुड़ गीध जब गयऊ। तिन्ह कें मन अति बिसमय भयऊ।।

    अर्थ · Hindi

    अस कहि गरुड़ गीध जब गयऊ। तिन्ह कें मन अति बिसमय भयऊ।।

  343. RCM 4.29.6Open verse →

    निज निज बल सब काहूँ भाषा। पार जाइ कर संसय राखा।।

    अर्थ · Hindi

    निज निज बल सब काहूँ भाषा। पार जाइ कर संसय राखा।।

  344. RCM 4.29.7Open verse →

    जरठ भयउँ अब कहइ रिछेसा। नहिं तन रहा प्रथम बल लेसा।।

    अर्थ · Hindi

    जरठ भयउँ अब कहइ रिछेसा। नहिं तन रहा प्रथम बल लेसा।।

  345. RCM 4.29.8Open verse →

    जबहिं त्रिबिक्रम भए खरारी। तब मैं तरुन रहेउँ बल भारी।।

    अर्थ · Hindi

    जबहिं त्रिबिक्रम भए खरारी। तब मैं तरुन रहेउँ बल भारी।।

  346. RCM 4.29.9Open verse →

    बलि बाँधत प्रभु बाढेउ सो तनु बरनि न जाई।

    अर्थ · Hindi

    बलि बाँधत प्रभु बाढेउ सो तनु बरनि न जाई।

  347. RCM 4.29.10Open verse →

    उभय धरी महँ दीन्ही सात प्रदच्छिन धाइ।।29।।

    अर्थ · Hindi

    उभय धरी महँ दीन्ही सात प्रदच्छिन धाइ।।29।।

  348. RCM 4.30.1Open verse →

    अंगद कहइ जाउँ मैं पारा। जियँ संसय कछु फिरती बारा।।

    अर्थ · Hindi

    अंगद कहइ जाउँ मैं पारा। जियँ संसय कछु फिरती बारा।।

  349. RCM 4.30.2Open verse →

    जामवंत कह तुम्ह सब लायक। पठइअ किमि सब ही कर नायक।।

    अर्थ · Hindi

    जामवंत कह तुम्ह सब लायक। पठइअ किमि सब ही कर नायक।।

  350. RCM 4.30.3Open verse →

    कहइ रीछपति सुनु हनुमाना। का चुप साधि रहेहु बलवाना।।

    अर्थ · Hindi

    कहइ रीछपति सुनु हनुमाना। का चुप साधि रहेहु बलवाना।।

  351. RCM 4.30.4Open verse →

    पवन तनय बल पवन समाना। बुधि बिबेक बिग्यान निधाना।।

    अर्थ · Hindi

    पवन तनय बल पवन समाना। बुधि बिबेक बिग्यान निधाना।।

  352. RCM 4.30.5Open verse →

    कवन सो काज कठिन जग माहीं। जो नहिं होइ तात तुम्ह पाहीं।।

    अर्थ · Hindi

    कवन सो काज कठिन जग माहीं। जो नहिं होइ तात तुम्ह पाहीं।।

  353. RCM 4.30.6Open verse →

    राम काज लगि तब अवतारा। सुनतहिं भयउ पर्वताकारा।।

    अर्थ · Hindi

    राम काज लगि तब अवतारा। सुनतहिं भयउ पर्वताकारा।।

  354. RCM 4.30.7Open verse →

    कनक बरन तन तेज बिराजा। मानहु अपर गिरिन्ह कर राजा।।

    अर्थ · Hindi

    कनक बरन तन तेज बिराजा। मानहु अपर गिरिन्ह कर राजा।।

  355. RCM 4.30.8Open verse →

    सिंहनाद करि बारहिं बारा। लीलहीं नाषउँ जलनिधि खारा।।

    अर्थ · Hindi

    सिंहनाद करि बारहिं बारा। लीलहीं नाषउँ जलनिधि खारा।।

  356. RCM 4.30.9Open verse →

    सहित सहाय रावनहि मारी। आनउँ इहाँ त्रिकूट उपारी।।

    अर्थ · Hindi

    सहित सहाय रावनहि मारी। आनउँ इहाँ त्रिकूट उपारी।।

  357. RCM 4.30.10Open verse →

    जामवंत मैं पूँछउँ तोही। उचित सिखावनु दीजहु मोही।।

    अर्थ · Hindi

    जामवंत मैं पूँछउँ तोही। उचित सिखावनु दीजहु मोही।।

  358. RCM 4.30.11Open verse →

    एतना करहु तात तुम्ह जाई। सीतहि देखि कहहु सुधि आई।।

    अर्थ · Hindi

    एतना करहु तात तुम्ह जाई। सीतहि देखि कहहु सुधि आई।।

  359. RCM 4.30.12Open verse →

    तब निज भुज बल राजिव नैना। कौतुक लागि संग कपि सेना।।

    अर्थ · Hindi

    तब निज भुज बल राजिव नैना। कौतुक लागि संग कपि सेना।।

  360. RCM 4.30.13Open verse →

    कपि सेन संग सँघारि निसिचर रामु सीतहि आनिहैं।

    अर्थ · Hindi

    कपि सेन संग सँघारि निसिचर रामु सीतहि आनिहैं।

  361. RCM 4.30.14Open verse →

    त्रैलोक पावन सुजसु सुर मुनि नारदादि बखानिहैं।।

    अर्थ · Hindi

    त्रैलोक पावन सुजसु सुर मुनि नारदादि बखानिहैं।।

  362. RCM 4.30.15Open verse →

    जो सुनत गावत कहत समुझत परम पद नर पावई।

    अर्थ · Hindi

    जो सुनत गावत कहत समुझत परम पद नर पावई।

  363. RCM 4.30.16Open verse →

    रघुबीर पद पाथोज मधुकर दास तुलसी गावई।।

    अर्थ · Hindi

    रघुबीर पद पाथोज मधुकर दास तुलसी गावई।।

  364. RCM 4.30.17Open verse →

    भव भेषज रघुनाथ जसु सुनहि जे नर अरु नारि।

    अर्थ · Hindi

    भव भेषज रघुनाथ जसु सुनहि जे नर अरु नारि।

  365. RCM 4.30.18Open verse →

    तिन्ह कर सकल मनोरथ सिद्ध करिहि त्रिसिरारि।।30(क)।।

    अर्थ · Hindi

    तिन्ह कर सकल मनोरथ सिद्ध करिहि त्रिसिरारि।।30(क)।।

  366. RCM 4.30.19Open verse →

    नीलोत्पल तन स्याम काम कोटि सोभा अधिक।

    अर्थ · Hindi

    नीलोत्पल तन स्याम काम कोटि सोभा अधिक।

  367. RCM 4.30.20Open verse →

    सुनिअ तासु गुन ग्राम जासु नाम अघ खग बधिक।।30(ख)।।

    अर्थ · Hindi

    सुनिअ तासु गुन ग्राम जासु नाम अघ खग बधिक।।30(ख)।।