Ramcharitmanas · अध्याय 3
Aranya Kanda
अरण्यकाण्ड
Life in the forest; the meeting with sages; the abduction of Sita by Ravana.
- RCM 3.1.1Open verse →
पुर नर भरत प्रीति मैं गाई। मति अनुरूप अनूप सुहाई।।
अर्थ · Hindi
पुर नर भरत प्रीति मैं गाई। मति अनुरूप अनूप सुहाई।।
- RCM 3.1.2Open verse →
अब प्रभु चरित सुनहु अति पावन। करत जे बन सुर नर मुनि भावन।।
अर्थ · Hindi
अब प्रभु चरित सुनहु अति पावन। करत जे बन सुर नर मुनि भावन।।
- RCM 3.1.3Open verse →
एक बार चुनि कुसुम सुहाए। निज कर भूषन राम बनाए।।
अर्थ · Hindi
एक बार चुनि कुसुम सुहाए। निज कर भूषन राम बनाए।।
- RCM 3.1.4Open verse →
सीतहि पहिराए प्रभु सादर। बैठे फटिक सिला पर सुंदर।।
अर्थ · Hindi
सीतहि पहिराए प्रभु सादर। बैठे फटिक सिला पर सुंदर।।
- RCM 3.1.5Open verse →
सुरपति सुत धरि बायस बेषा। सठ चाहत रघुपति बल देखा।।
अर्थ · Hindi
सुरपति सुत धरि बायस बेषा। सठ चाहत रघुपति बल देखा।।
- RCM 3.1.6Open verse →
जिमि पिपीलिका सागर थाहा। महा मंदमति पावन चाहा।।
अर्थ · Hindi
जिमि पिपीलिका सागर थाहा। महा मंदमति पावन चाहा।।
- RCM 3.1.7Open verse →
सीता चरन चौंच हति भागा। मूढ़ मंदमति कारन कागा।।
अर्थ · Hindi
सीता चरन चौंच हति भागा। मूढ़ मंदमति कारन कागा।।
- RCM 3.1.8Open verse →
चला रुधिर रघुनायक जाना। सींक धनुष सायक संधाना।।
अर्थ · Hindi
चला रुधिर रघुनायक जाना। सींक धनुष सायक संधाना।।
- RCM 3.1.9Open verse →
अति कृपाल रघुनायक सदा दीन पर नेह।
अर्थ · Hindi
अति कृपाल रघुनायक सदा दीन पर नेह।
- RCM 3.1.10Open verse →
ता सन आइ कीन्ह छलु मूरख अवगुन गेह।।1।।
अर्थ · Hindi
ता सन आइ कीन्ह छलु मूरख अवगुन गेह।।1।।
- RCM 3.2.1Open verse →
प्रेरित मंत्र ब्रह्मसर धावा। चला भाजि बायस भय पावा।।
अर्थ · Hindi
प्रेरित मंत्र ब्रह्मसर धावा। चला भाजि बायस भय पावा।।
- RCM 3.2.2Open verse →
धरि निज रुप गयउ पितु पाहीं। राम बिमुख राखा तेहि नाहीं।।
अर्थ · Hindi
धरि निज रुप गयउ पितु पाहीं। राम बिमुख राखा तेहि नाहीं।।
- RCM 3.2.3Open verse →
भा निरास उपजी मन त्रासा। जथा चक्र भय रिषि दुर्बासा।।
अर्थ · Hindi
भा निरास उपजी मन त्रासा। जथा चक्र भय रिषि दुर्बासा।।
- RCM 3.2.4Open verse →
ब्रह्मधाम सिवपुर सब लोका। फिरा श्रमित ब्याकुल भय सोका।।
अर्थ · Hindi
ब्रह्मधाम सिवपुर सब लोका। फिरा श्रमित ब्याकुल भय सोका।।
- RCM 3.2.5Open verse →
काहूँ बैठन कहा न ओही। राखि को सकइ राम कर द्रोही।।
अर्थ · Hindi
काहूँ बैठन कहा न ओही। राखि को सकइ राम कर द्रोही।।
- RCM 3.2.6Open verse →
मातु मृत्यु पितु समन समाना। सुधा होइ बिष सुनु हरिजाना।।
अर्थ · Hindi
मातु मृत्यु पितु समन समाना। सुधा होइ बिष सुनु हरिजाना।।
- RCM 3.2.7Open verse →
मित्र करइ सत रिपु कै करनी। ता कहँ बिबुधनदी बैतरनी।।
अर्थ · Hindi
मित्र करइ सत रिपु कै करनी। ता कहँ बिबुधनदी बैतरनी।।
- RCM 3.2.8Open verse →
सब जगु ताहि अनलहु ते ताता। जो रघुबीर बिमुख सुनु भ्राता।।
अर्थ · Hindi
सब जगु ताहि अनलहु ते ताता। जो रघुबीर बिमुख सुनु भ्राता।।
- RCM 3.2.9Open verse →
नारद देखा बिकल जयंता। लागि दया कोमल चित संता।।
अर्थ · Hindi
नारद देखा बिकल जयंता। लागि दया कोमल चित संता।।
- RCM 3.2.10Open verse →
पठवा तुरत राम पहिं ताही। कहेसि पुकारि प्रनत हित पाही।।
अर्थ · Hindi
पठवा तुरत राम पहिं ताही। कहेसि पुकारि प्रनत हित पाही।।
- RCM 3.2.11Open verse →
आतुर सभय गहेसि पद जाई। त्राहि त्राहि दयाल रघुराई।।
अर्थ · Hindi
आतुर सभय गहेसि पद जाई। त्राहि त्राहि दयाल रघुराई।।
- RCM 3.2.12Open verse →
अतुलित बल अतुलित प्रभुताई। मैं मतिमंद जानि नहिं पाई।।
अर्थ · Hindi
अतुलित बल अतुलित प्रभुताई। मैं मतिमंद जानि नहिं पाई।।
- RCM 3.2.13Open verse →
निज कृत कर्म जनित फल पायउँ। अब प्रभु पाहि सरन तकि आयउँ।।
अर्थ · Hindi
निज कृत कर्म जनित फल पायउँ। अब प्रभु पाहि सरन तकि आयउँ।।
- RCM 3.2.14Open verse →
सुनि कृपाल अति आरत बानी। एकनयन करि तजा भवानी।।
अर्थ · Hindi
सुनि कृपाल अति आरत बानी। एकनयन करि तजा भवानी।।
- RCM 3.2.15Open verse →
कीन्ह मोह बस द्रोह जद्यपि तेहि कर बध उचित।
अर्थ · Hindi
कीन्ह मोह बस द्रोह जद्यपि तेहि कर बध उचित।
- RCM 3.2.16Open verse →
प्रभु छाड़ेउ करि छोह को कृपाल रघुबीर सम।।2।।
अर्थ · Hindi
प्रभु छाड़ेउ करि छोह को कृपाल रघुबीर सम।।2।।
- RCM 3.3.1Open verse →
रघुपति चित्रकूट बसि नाना। चरित किए श्रुति सुधा समाना।।
अर्थ · Hindi
रघुपति चित्रकूट बसि नाना। चरित किए श्रुति सुधा समाना।।
- RCM 3.3.2Open verse →
बहुरि राम अस मन अनुमाना। होइहि भीर सबहिं मोहि जाना।।
अर्थ · Hindi
बहुरि राम अस मन अनुमाना। होइहि भीर सबहिं मोहि जाना।।
- RCM 3.3.3Open verse →
सकल मुनिन्ह सन बिदा कराई। सीता सहित चले द्वौ भाई।।
अर्थ · Hindi
सकल मुनिन्ह सन बिदा कराई। सीता सहित चले द्वौ भाई।।
- RCM 3.3.4Open verse →
अत्रि के आश्रम जब प्रभु गयऊ। सुनत महामुनि हरषित भयऊ।।
अर्थ · Hindi
अत्रि के आश्रम जब प्रभु गयऊ। सुनत महामुनि हरषित भयऊ।।
- RCM 3.3.5Open verse →
पुलकित गात अत्रि उठि धाए। देखि रामु आतुर चलि आए।।
अर्थ · Hindi
पुलकित गात अत्रि उठि धाए। देखि रामु आतुर चलि आए।।
- RCM 3.3.6Open verse →
करत दंडवत मुनि उर लाए। प्रेम बारि द्वौ जन अन्हवाए।।
अर्थ · Hindi
करत दंडवत मुनि उर लाए। प्रेम बारि द्वौ जन अन्हवाए।।
- RCM 3.3.7Open verse →
देखि राम छबि नयन जुड़ाने। सादर निज आश्रम तब आने।।
अर्थ · Hindi
देखि राम छबि नयन जुड़ाने। सादर निज आश्रम तब आने।।
- RCM 3.3.8Open verse →
करि पूजा कहि बचन सुहाए। दिए मूल फल प्रभु मन भाए।।
अर्थ · Hindi
करि पूजा कहि बचन सुहाए। दिए मूल फल प्रभु मन भाए।।
- RCM 3.3.9Open verse →
प्रभु आसन आसीन भरि लोचन सोभा निरखि।
अर्थ · Hindi
प्रभु आसन आसीन भरि लोचन सोभा निरखि।
- RCM 3.3.10Open verse →
मुनिबर परम प्रबीन जोरि पानि अस्तुति करत।।3।।
अर्थ · Hindi
मुनिबर परम प्रबीन जोरि पानि अस्तुति करत।।3।।
- RCM 3.4.1Open verse →
नमामि भक्त वत्सलं। कृपालु शील कोमलं।।
अर्थ · Hindi
नमामि भक्त वत्सलं। कृपालु शील कोमलं।।
- RCM 3.4.2Open verse →
भजामि ते पदांबुजं। अकामिनां स्वधामदं।।
अर्थ · Hindi
भजामि ते पदांबुजं। अकामिनां स्वधामदं।।
- RCM 3.4.3Open verse →
निकाम श्याम सुंदरं। भवाम्बुनाथ मंदरं।।
अर्थ · Hindi
निकाम श्याम सुंदरं। भवाम्बुनाथ मंदरं।।
- RCM 3.4.4Open verse →
प्रफुल्ल कंज लोचनं। मदादि दोष मोचनं।।
अर्थ · Hindi
प्रफुल्ल कंज लोचनं। मदादि दोष मोचनं।।
- RCM 3.4.5Open verse →
प्रलंब बाहु विक्रमं। प्रभोऽप्रमेय वैभवं।।
अर्थ · Hindi
प्रलंब बाहु विक्रमं। प्रभोऽप्रमेय वैभवं।।
- RCM 3.4.6Open verse →
निषंग चाप सायकं। धरं त्रिलोक नायकं।।
अर्थ · Hindi
निषंग चाप सायकं। धरं त्रिलोक नायकं।।
- RCM 3.4.7Open verse →
दिनेश वंश मंडनं। महेश चाप खंडनं।।
अर्थ · Hindi
दिनेश वंश मंडनं। महेश चाप खंडनं।।
- RCM 3.4.8Open verse →
मुनींद्र संत रंजनं। सुरारि वृंद भंजनं।।
अर्थ · Hindi
मुनींद्र संत रंजनं। सुरारि वृंद भंजनं।।
- RCM 3.4.9Open verse →
मनोज वैरि वंदितं। अजादि देव सेवितं।।
अर्थ · Hindi
मनोज वैरि वंदितं। अजादि देव सेवितं।।
- RCM 3.4.10Open verse →
विशुद्ध बोध विग्रहं। समस्त दूषणापहं।।
अर्थ · Hindi
विशुद्ध बोध विग्रहं। समस्त दूषणापहं।।
- RCM 3.4.11Open verse →
नमामि इंदिरा पतिं। सुखाकरं सतां गतिं।।
अर्थ · Hindi
नमामि इंदिरा पतिं। सुखाकरं सतां गतिं।।
- RCM 3.4.12Open verse →
भजे सशक्ति सानुजं। शची पतिं प्रियानुजं।।
अर्थ · Hindi
भजे सशक्ति सानुजं। शची पतिं प्रियानुजं।।
- RCM 3.4.13Open verse →
त्वदंघ्रि मूल ये नराः। भजंति हीन मत्सरा।।
अर्थ · Hindi
त्वदंघ्रि मूल ये नराः। भजंति हीन मत्सरा।।
- RCM 3.4.14Open verse →
पतंति नो भवार्णवे। वितर्क वीचि संकुले।।
अर्थ · Hindi
पतंति नो भवार्णवे। वितर्क वीचि संकुले।।
- RCM 3.4.15Open verse →
विविक्त वासिनः सदा। भजंति मुक्तये मुदा।।
अर्थ · Hindi
विविक्त वासिनः सदा। भजंति मुक्तये मुदा।।
- RCM 3.4.16Open verse →
निरस्य इंद्रियादिकं। प्रयांति ते गतिं स्वकं।।
अर्थ · Hindi
निरस्य इंद्रियादिकं। प्रयांति ते गतिं स्वकं।।
- RCM 3.4.17Open verse →
तमेकमभ्दुतं प्रभुं। निरीहमीश्वरं विभुं।।
अर्थ · Hindi
तमेकमभ्दुतं प्रभुं। निरीहमीश्वरं विभुं।।
- RCM 3.4.18Open verse →
जगद्गुरुं च शाश्वतं। तुरीयमेव केवलं।।
अर्थ · Hindi
जगद्गुरुं च शाश्वतं। तुरीयमेव केवलं।।
- RCM 3.4.19Open verse →
भजामि भाव वल्लभं। कुयोगिनां सुदुर्लभं।।
अर्थ · Hindi
भजामि भाव वल्लभं। कुयोगिनां सुदुर्लभं।।
- RCM 3.4.20Open verse →
स्वभक्त कल्प पादपं। समं सुसेव्यमन्वहं।।
अर्थ · Hindi
स्वभक्त कल्प पादपं। समं सुसेव्यमन्वहं।।
- RCM 3.4.21Open verse →
अनूप रूप भूपतिं। नतोऽहमुर्विजा पतिं।।
अर्थ · Hindi
अनूप रूप भूपतिं। नतोऽहमुर्विजा पतिं।।
- RCM 3.4.22Open verse →
प्रसीद मे नमामि ते। पदाब्ज भक्ति देहि मे।।
अर्थ · Hindi
प्रसीद मे नमामि ते। पदाब्ज भक्ति देहि मे।।
- RCM 3.4.23Open verse →
पठंति ये स्तवं इदं। नरादरेण ते पदं।।
अर्थ · Hindi
पठंति ये स्तवं इदं। नरादरेण ते पदं।।
- RCM 3.4.24Open verse →
व्रजंति नात्र संशयं। त्वदीय भक्ति संयुता।।
अर्थ · Hindi
व्रजंति नात्र संशयं। त्वदीय भक्ति संयुता।।
- RCM 3.5.1Open verse →
अनुसुइया के पद गहि सीता। मिली बहोरि सुसील बिनीता।।
अर्थ · Hindi
अनुसुइया के पद गहि सीता। मिली बहोरि सुसील बिनीता।।
- RCM 3.5.2Open verse →
रिषिपतिनी मन सुख अधिकाई। आसिष देइ निकट बैठाई।।
अर्थ · Hindi
रिषिपतिनी मन सुख अधिकाई। आसिष देइ निकट बैठाई।।
- RCM 3.5.3Open verse →
दिब्य बसन भूषन पहिराए। जे नित नूतन अमल सुहाए।।
अर्थ · Hindi
दिब्य बसन भूषन पहिराए। जे नित नूतन अमल सुहाए।।
- RCM 3.5.4Open verse →
कह रिषिबधू सरस मृदु बानी। नारिधर्म कछु ब्याज बखानी।।
अर्थ · Hindi
कह रिषिबधू सरस मृदु बानी। नारिधर्म कछु ब्याज बखानी।।
- RCM 3.5.5Open verse →
मातु पिता भ्राता हितकारी। मितप्रद सब सुनु राजकुमारी।।
अर्थ · Hindi
मातु पिता भ्राता हितकारी। मितप्रद सब सुनु राजकुमारी।।
- RCM 3.5.6Open verse →
अमित दानि भर्ता बयदेही। अधम सो नारि जो सेव न तेही।।
अर्थ · Hindi
अमित दानि भर्ता बयदेही। अधम सो नारि जो सेव न तेही।।
- RCM 3.5.7Open verse →
धीरज धर्म मित्र अरु नारी। आपद काल परिखिअहिं चारी।।
अर्थ · Hindi
धीरज धर्म मित्र अरु नारी। आपद काल परिखिअहिं चारी।।
- RCM 3.5.8Open verse →
बृद्ध रोगबस जड़ धनहीना। अधं बधिर क्रोधी अति दीना।।
अर्थ · Hindi
बृद्ध रोगबस जड़ धनहीना। अधं बधिर क्रोधी अति दीना।।
- RCM 3.5.9Open verse →
ऐसेहु पति कर किएँ अपमाना। नारि पाव जमपुर दुख नाना।।
अर्थ · Hindi
ऐसेहु पति कर किएँ अपमाना। नारि पाव जमपुर दुख नाना।।
- RCM 3.5.10Open verse →
एकइ धर्म एक ब्रत नेमा। कायँ बचन मन पति पद प्रेमा।।
अर्थ · Hindi
एकइ धर्म एक ब्रत नेमा। कायँ बचन मन पति पद प्रेमा।।
- RCM 3.5.11Open verse →
जग पति ब्रता चारि बिधि अहहिं। बेद पुरान संत सब कहहिं।।
अर्थ · Hindi
जग पति ब्रता चारि बिधि अहहिं। बेद पुरान संत सब कहहिं।।
- RCM 3.5.12Open verse →
उत्तम के अस बस मन माहीं। सपनेहुँ आन पुरुष जग नाहीं।।
अर्थ · Hindi
उत्तम के अस बस मन माहीं। सपनेहुँ आन पुरुष जग नाहीं।।
- RCM 3.5.13Open verse →
मध्यम परपति देखइ कैसें। भ्राता पिता पुत्र निज जैंसें।।
अर्थ · Hindi
मध्यम परपति देखइ कैसें। भ्राता पिता पुत्र निज जैंसें।।
- RCM 3.5.14Open verse →
धर्म बिचारि समुझि कुल रहई। सो निकिष्ट त्रिय श्रुति अस कहई।।
अर्थ · Hindi
धर्म बिचारि समुझि कुल रहई। सो निकिष्ट त्रिय श्रुति अस कहई।।
- RCM 3.5.15Open verse →
बिनु अवसर भय तें रह जोई। जानेहु अधम नारि जग सोई।।
अर्थ · Hindi
बिनु अवसर भय तें रह जोई। जानेहु अधम नारि जग सोई।।
- RCM 3.5.16Open verse →
पति बंचक परपति रति करई। रौरव नरक कल्प सत परई।।
अर्थ · Hindi
पति बंचक परपति रति करई। रौरव नरक कल्प सत परई।।
- RCM 3.5.17Open verse →
छन सुख लागि जनम सत कोटि। दुख न समुझ तेहि सम को खोटी।।
अर्थ · Hindi
छन सुख लागि जनम सत कोटि। दुख न समुझ तेहि सम को खोटी।।
- RCM 3.5.18Open verse →
बिनु श्रम नारि परम गति लहई। पतिब्रत धर्म छाड़ि छल गहई।।
अर्थ · Hindi
बिनु श्रम नारि परम गति लहई। पतिब्रत धर्म छाड़ि छल गहई।।
- RCM 3.5.19Open verse →
पति प्रतिकुल जनम जहँ जाई। बिधवा होई पाई तरुनाई।।
अर्थ · Hindi
पति प्रतिकुल जनम जहँ जाई। बिधवा होई पाई तरुनाई।।
- RCM 3.5.20Open verse →
सहज अपावनि नारि पति सेवत सुभ गति लहइ।
अर्थ · Hindi
सहज अपावनि नारि पति सेवत सुभ गति लहइ।
- RCM 3.5.21Open verse →
जसु गावत श्रुति चारि अजहु तुलसिका हरिहि प्रिय।।5(क)।।
अर्थ · Hindi
जसु गावत श्रुति चारि अजहु तुलसिका हरिहि प्रिय।।5(क)।।
- RCM 3.5.22Open verse →
सुनु सीता तव नाम सुमिर नारि पतिब्रत करहि।
अर्थ · Hindi
सुनु सीता तव नाम सुमिर नारि पतिब्रत करहि।
- RCM 3.5.23Open verse →
तोहि प्रानप्रिय राम कहिउँ कथा संसार हित।।5(ख)।।
अर्थ · Hindi
तोहि प्रानप्रिय राम कहिउँ कथा संसार हित।।5(ख)।।
- RCM 3.6.1Open verse →
सुनि जानकीं परम सुखु पावा। सादर तासु चरन सिरु नावा।।
अर्थ · Hindi
सुनि जानकीं परम सुखु पावा। सादर तासु चरन सिरु नावा।।
- RCM 3.6.2Open verse →
तब मुनि सन कह कृपानिधाना। आयसु होइ जाउँ बन आना।।
अर्थ · Hindi
तब मुनि सन कह कृपानिधाना। आयसु होइ जाउँ बन आना।।
- RCM 3.6.3Open verse →
संतत मो पर कृपा करेहू। सेवक जानि तजेहु जनि नेहू।।
अर्थ · Hindi
संतत मो पर कृपा करेहू। सेवक जानि तजेहु जनि नेहू।।
- RCM 3.6.4Open verse →
धर्म धुरंधर प्रभु कै बानी। सुनि सप्रेम बोले मुनि ग्यानी।।
अर्थ · Hindi
धर्म धुरंधर प्रभु कै बानी। सुनि सप्रेम बोले मुनि ग्यानी।।
- RCM 3.6.5Open verse →
जासु कृपा अज सिव सनकादी। चहत सकल परमारथ बादी।।
अर्थ · Hindi
जासु कृपा अज सिव सनकादी। चहत सकल परमारथ बादी।।
- RCM 3.6.6Open verse →
ते तुम्ह राम अकाम पिआरे। दीन बंधु मृदु बचन उचारे।।
अर्थ · Hindi
ते तुम्ह राम अकाम पिआरे। दीन बंधु मृदु बचन उचारे।।
- RCM 3.6.7Open verse →
अब जानी मैं श्री चतुराई। भजी तुम्हहि सब देव बिहाई।।
अर्थ · Hindi
अब जानी मैं श्री चतुराई। भजी तुम्हहि सब देव बिहाई।।
- RCM 3.6.8Open verse →
जेहि समान अतिसय नहिं कोई। ता कर सील कस न अस होई।।
अर्थ · Hindi
जेहि समान अतिसय नहिं कोई। ता कर सील कस न अस होई।।
- RCM 3.6.9Open verse →
केहि बिधि कहौं जाहु अब स्वामी। कहहु नाथ तुम्ह अंतरजामी।।
अर्थ · Hindi
केहि बिधि कहौं जाहु अब स्वामी। कहहु नाथ तुम्ह अंतरजामी।।
- RCM 3.6.10Open verse →
अस कहि प्रभु बिलोकि मुनि धीरा। लोचन जल बह पुलक सरीरा।।
अर्थ · Hindi
अस कहि प्रभु बिलोकि मुनि धीरा। लोचन जल बह पुलक सरीरा।।
- RCM 3.6.11Open verse →
तन पुलक निर्भर प्रेम पुरन नयन मुख पंकज दिए।
अर्थ · Hindi
तन पुलक निर्भर प्रेम पुरन नयन मुख पंकज दिए।
- RCM 3.6.12Open verse →
मन ग्यान गुन गोतीत प्रभु मैं दीख जप तप का किए।।
अर्थ · Hindi
मन ग्यान गुन गोतीत प्रभु मैं दीख जप तप का किए।।
- RCM 3.6.13Open verse →
जप जोग धर्म समूह तें नर भगति अनुपम पावई।
अर्थ · Hindi
जप जोग धर्म समूह तें नर भगति अनुपम पावई।
- RCM 3.6.14Open verse →
रधुबीर चरित पुनीत निसि दिन दास तुलसी गावई।।
अर्थ · Hindi
रधुबीर चरित पुनीत निसि दिन दास तुलसी गावई।।
- RCM 3.6.15Open verse →
कलिमल समन दमन मन राम सुजस सुखमूल।
अर्थ · Hindi
कलिमल समन दमन मन राम सुजस सुखमूल।
- RCM 3.6.16Open verse →
सादर सुनहि जे तिन्ह पर राम रहहिं अनुकूल।।6(क)।।
अर्थ · Hindi
सादर सुनहि जे तिन्ह पर राम रहहिं अनुकूल।।6(क)।।
- RCM 3.6.17Open verse →
कठिन काल मल कोस धर्म न ग्यान न जोग जप।
अर्थ · Hindi
कठिन काल मल कोस धर्म न ग्यान न जोग जप।
- RCM 3.6.18Open verse →
परिहरि सकल भरोस रामहि भजहिं ते चतुर नर।।6(ख)।।
अर्थ · Hindi
परिहरि सकल भरोस रामहि भजहिं ते चतुर नर।।6(ख)।।
- RCM 3.7.1Open verse →
मुनि पद कमल नाइ करि सीसा। चले बनहि सुर नर मुनि ईसा।।
अर्थ · Hindi
मुनि पद कमल नाइ करि सीसा। चले बनहि सुर नर मुनि ईसा।।
- RCM 3.7.2Open verse →
आगे राम अनुज पुनि पाछें। मुनि बर बेष बने अति काछें।।
अर्थ · Hindi
आगे राम अनुज पुनि पाछें। मुनि बर बेष बने अति काछें।।
- RCM 3.7.3Open verse →
उमय बीच श्री सोहइ कैसी। ब्रह्म जीव बिच माया जैसी।।
अर्थ · Hindi
उमय बीच श्री सोहइ कैसी। ब्रह्म जीव बिच माया जैसी।।
- RCM 3.7.4Open verse →
सरिता बन गिरि अवघट घाटा। पति पहिचानी देहिं बर बाटा।।
अर्थ · Hindi
सरिता बन गिरि अवघट घाटा। पति पहिचानी देहिं बर बाटा।।
- RCM 3.7.5Open verse →
जहँ जहँ जाहि देव रघुराया। करहिं मेध तहँ तहँ नभ छाया।।
अर्थ · Hindi
जहँ जहँ जाहि देव रघुराया। करहिं मेध तहँ तहँ नभ छाया।।
- RCM 3.7.6Open verse →
मिला असुर बिराध मग जाता। आवतहीं रघुवीर निपाता।।
अर्थ · Hindi
मिला असुर बिराध मग जाता। आवतहीं रघुवीर निपाता।।
- RCM 3.7.7Open verse →
तुरतहिं रुचिर रूप तेहिं पावा। देखि दुखी निज धाम पठावा।।
अर्थ · Hindi
तुरतहिं रुचिर रूप तेहिं पावा। देखि दुखी निज धाम पठावा।।
- RCM 3.7.8Open verse →
पुनि आए जहँ मुनि सरभंगा। सुंदर अनुज जानकी संगा।।
अर्थ · Hindi
पुनि आए जहँ मुनि सरभंगा। सुंदर अनुज जानकी संगा।।
- RCM 3.7.9Open verse →
देखी राम मुख पंकज मुनिबर लोचन भृंग।
अर्थ · Hindi
देखी राम मुख पंकज मुनिबर लोचन भृंग।
- RCM 3.7.10Open verse →
सादर पान करत अति धन्य जन्म सरभंग।।7।।
अर्थ · Hindi
सादर पान करत अति धन्य जन्म सरभंग।।7।।
- RCM 3.8.1Open verse →
कह मुनि सुनु रघुबीर कृपाला। संकर मानस राजमराला।।
अर्थ · Hindi
कह मुनि सुनु रघुबीर कृपाला। संकर मानस राजमराला।।
- RCM 3.8.2Open verse →
जात रहेउँ बिरंचि के धामा। सुनेउँ श्रवन बन ऐहहिं रामा।।
अर्थ · Hindi
जात रहेउँ बिरंचि के धामा। सुनेउँ श्रवन बन ऐहहिं रामा।।
- RCM 3.8.3Open verse →
चितवत पंथ रहेउँ दिन राती। अब प्रभु देखि जुड़ानी छाती।।
अर्थ · Hindi
चितवत पंथ रहेउँ दिन राती। अब प्रभु देखि जुड़ानी छाती।।
- RCM 3.8.4Open verse →
नाथ सकल साधन मैं हीना। कीन्ही कृपा जानि जन दीना।।
अर्थ · Hindi
नाथ सकल साधन मैं हीना। कीन्ही कृपा जानि जन दीना।।
- RCM 3.8.5Open verse →
सो कछु देव न मोहि निहोरा। निज पन राखेउ जन मन चोरा।।
अर्थ · Hindi
सो कछु देव न मोहि निहोरा। निज पन राखेउ जन मन चोरा।।
- RCM 3.8.6Open verse →
तब लगि रहहु दीन हित लागी। जब लगि मिलौं तुम्हहि तनु त्यागी।।
अर्थ · Hindi
तब लगि रहहु दीन हित लागी। जब लगि मिलौं तुम्हहि तनु त्यागी।।
- RCM 3.8.7Open verse →
जोग जग्य जप तप ब्रत कीन्हा। प्रभु कहँ देइ भगति बर लीन्हा।।
अर्थ · Hindi
जोग जग्य जप तप ब्रत कीन्हा। प्रभु कहँ देइ भगति बर लीन्हा।।
- RCM 3.8.8Open verse →
एहि बिधि सर रचि मुनि सरभंगा। बैठे हृदयँ छाड़ि सब संगा।।
अर्थ · Hindi
एहि बिधि सर रचि मुनि सरभंगा। बैठे हृदयँ छाड़ि सब संगा।।
- RCM 3.8.9Open verse →
सीता अनुज समेत प्रभु नील जलद तनु स्याम।
अर्थ · Hindi
सीता अनुज समेत प्रभु नील जलद तनु स्याम।
- RCM 3.8.10Open verse →
मम हियँ बसहु निरंतर सगुनरुप श्रीराम।।8।।
अर्थ · Hindi
मम हियँ बसहु निरंतर सगुनरुप श्रीराम।।8।।
- RCM 3.9.1Open verse →
अस कहि जोग अगिनि तनु जारा। राम कृपाँ बैकुंठ सिधारा।।
अर्थ · Hindi
अस कहि जोग अगिनि तनु जारा। राम कृपाँ बैकुंठ सिधारा।।
- RCM 3.9.2Open verse →
ताते मुनि हरि लीन न भयऊ। प्रथमहिं भेद भगति बर लयऊ।।
अर्थ · Hindi
ताते मुनि हरि लीन न भयऊ। प्रथमहिं भेद भगति बर लयऊ।।
- RCM 3.9.3Open verse →
रिषि निकाय मुनिबर गति देखि। सुखी भए निज हृदयँ बिसेषी।।
अर्थ · Hindi
रिषि निकाय मुनिबर गति देखि। सुखी भए निज हृदयँ बिसेषी।।
- RCM 3.9.4Open verse →
अस्तुति करहिं सकल मुनि बृंदा। जयति प्रनत हित करुना कंदा।।
अर्थ · Hindi
अस्तुति करहिं सकल मुनि बृंदा। जयति प्रनत हित करुना कंदा।।
- RCM 3.9.5Open verse →
पुनि रघुनाथ चले बन आगे। मुनिबर बृंद बिपुल सँग लागे।।
अर्थ · Hindi
पुनि रघुनाथ चले बन आगे। मुनिबर बृंद बिपुल सँग लागे।।
- RCM 3.9.6Open verse →
अस्थि समूह देखि रघुराया। पूछी मुनिन्ह लागि अति दाया।।
अर्थ · Hindi
अस्थि समूह देखि रघुराया। पूछी मुनिन्ह लागि अति दाया।।
- RCM 3.9.7Open verse →
जानतहुँ पूछिअ कस स्वामी। सबदरसी तुम्ह अंतरजामी।।
अर्थ · Hindi
जानतहुँ पूछिअ कस स्वामी। सबदरसी तुम्ह अंतरजामी।।
- RCM 3.9.8Open verse →
निसिचर निकर सकल मुनि खाए। सुनि रघुबीर नयन जल छाए।।
अर्थ · Hindi
निसिचर निकर सकल मुनि खाए। सुनि रघुबीर नयन जल छाए।।
- RCM 3.9.9Open verse →
निसिचर हीन करउँ महि भुज उठाइ पन कीन्ह।
अर्थ · Hindi
निसिचर हीन करउँ महि भुज उठाइ पन कीन्ह।
- RCM 3.9.10Open verse →
सकल मुनिन्ह के आश्रमन्हि जाइ जाइ सुख दीन्ह।।9।।
अर्थ · Hindi
सकल मुनिन्ह के आश्रमन्हि जाइ जाइ सुख दीन्ह।।9।।
- RCM 3.10.1Open verse →
मुनि अगस्ति कर सिष्य सुजाना। नाम सुतीछन रति भगवाना।।
अर्थ · Hindi
मुनि अगस्ति कर सिष्य सुजाना। नाम सुतीछन रति भगवाना।।
- RCM 3.10.2Open verse →
मन क्रम बचन राम पद सेवक। सपनेहुँ आन भरोस न देवक।।
अर्थ · Hindi
मन क्रम बचन राम पद सेवक। सपनेहुँ आन भरोस न देवक।।
- RCM 3.10.3Open verse →
प्रभु आगवनु श्रवन सुनि पावा। करत मनोरथ आतुर धावा।।
अर्थ · Hindi
प्रभु आगवनु श्रवन सुनि पावा। करत मनोरथ आतुर धावा।।
- RCM 3.10.4Open verse →
हे बिधि दीनबंधु रघुराया। मो से सठ पर करिहहिं दाया।।
अर्थ · Hindi
हे बिधि दीनबंधु रघुराया। मो से सठ पर करिहहिं दाया।।
- RCM 3.10.5Open verse →
सहित अनुज मोहि राम गोसाई। मिलिहहिं निज सेवक की नाई।।
अर्थ · Hindi
सहित अनुज मोहि राम गोसाई। मिलिहहिं निज सेवक की नाई।।
- RCM 3.10.6Open verse →
मोरे जियँ भरोस दृढ़ नाहीं। भगति बिरति न ग्यान मन माहीं।।
अर्थ · Hindi
मोरे जियँ भरोस दृढ़ नाहीं। भगति बिरति न ग्यान मन माहीं।।
- RCM 3.10.7Open verse →
नहिं सतसंग जोग जप जागा। नहिं दृढ़ चरन कमल अनुरागा।।
अर्थ · Hindi
नहिं सतसंग जोग जप जागा। नहिं दृढ़ चरन कमल अनुरागा।।
- RCM 3.10.8Open verse →
एक बानि करुनानिधान की। सो प्रिय जाकें गति न आन की।।
अर्थ · Hindi
एक बानि करुनानिधान की। सो प्रिय जाकें गति न आन की।।
- RCM 3.10.9Open verse →
होइहैं सुफल आजु मम लोचन। देखि बदन पंकज भव मोचन।।
अर्थ · Hindi
होइहैं सुफल आजु मम लोचन। देखि बदन पंकज भव मोचन।।
- RCM 3.10.10Open verse →
निर्भर प्रेम मगन मुनि ग्यानी। कहि न जाइ सो दसा भवानी।।
अर्थ · Hindi
निर्भर प्रेम मगन मुनि ग्यानी। कहि न जाइ सो दसा भवानी।।
- RCM 3.10.11Open verse →
दिसि अरु बिदिसि पंथ नहिं सूझा। को मैं चलेउँ कहाँ नहिं बूझा।।
अर्थ · Hindi
दिसि अरु बिदिसि पंथ नहिं सूझा। को मैं चलेउँ कहाँ नहिं बूझा।।
- RCM 3.10.12Open verse →
कबहुँक फिरि पाछें पुनि जाई। कबहुँक नृत्य करइ गुन गाई।।
अर्थ · Hindi
कबहुँक फिरि पाछें पुनि जाई। कबहुँक नृत्य करइ गुन गाई।।
- RCM 3.10.13Open verse →
अबिरल प्रेम भगति मुनि पाई। प्रभु देखैं तरु ओट लुकाई।।
अर्थ · Hindi
अबिरल प्रेम भगति मुनि पाई। प्रभु देखैं तरु ओट लुकाई।।
- RCM 3.10.14Open verse →
अतिसय प्रीति देखि रघुबीरा। प्रगटे हृदयँ हरन भव भीरा।।
अर्थ · Hindi
अतिसय प्रीति देखि रघुबीरा। प्रगटे हृदयँ हरन भव भीरा।।
- RCM 3.10.15Open verse →
मुनि मग माझ अचल होइ बैसा। पुलक सरीर पनस फल जैसा।।
अर्थ · Hindi
मुनि मग माझ अचल होइ बैसा। पुलक सरीर पनस फल जैसा।।
- RCM 3.10.16Open verse →
तब रघुनाथ निकट चलि आए। देखि दसा निज जन मन भाए।।
अर्थ · Hindi
तब रघुनाथ निकट चलि आए। देखि दसा निज जन मन भाए।।
- RCM 3.10.17Open verse →
मुनिहि राम बहु भाँति जगावा। जाग न ध्यानजनित सुख पावा।।
अर्थ · Hindi
मुनिहि राम बहु भाँति जगावा। जाग न ध्यानजनित सुख पावा।।
- RCM 3.10.18Open verse →
भूप रूप तब राम दुरावा। हृदयँ चतुर्भुज रूप देखावा।।
अर्थ · Hindi
भूप रूप तब राम दुरावा। हृदयँ चतुर्भुज रूप देखावा।।
- RCM 3.10.19Open verse →
मुनि अकुलाइ उठा तब कैसें। बिकल हीन मनि फनि बर जैसें।।
अर्थ · Hindi
मुनि अकुलाइ उठा तब कैसें। बिकल हीन मनि फनि बर जैसें।।
- RCM 3.10.20Open verse →
आगें देखि राम तन स्यामा। सीता अनुज सहित सुख धामा।।
अर्थ · Hindi
आगें देखि राम तन स्यामा। सीता अनुज सहित सुख धामा।।
- RCM 3.10.21Open verse →
परेउ लकुट इव चरनन्हि लागी। प्रेम मगन मुनिबर बड़भागी।।
अर्थ · Hindi
परेउ लकुट इव चरनन्हि लागी। प्रेम मगन मुनिबर बड़भागी।।
- RCM 3.10.22Open verse →
भुज बिसाल गहि लिए उठाई। परम प्रीति राखे उर लाई।।
अर्थ · Hindi
भुज बिसाल गहि लिए उठाई। परम प्रीति राखे उर लाई।।
- RCM 3.10.23Open verse →
मुनिहि मिलत अस सोह कृपाला। कनक तरुहि जनु भेंट तमाला।।
अर्थ · Hindi
मुनिहि मिलत अस सोह कृपाला। कनक तरुहि जनु भेंट तमाला।।
- RCM 3.10.24Open verse →
राम बदनु बिलोक मुनि ठाढ़ा। मानहुँ चित्र माझ लिखि काढ़ा।।
अर्थ · Hindi
राम बदनु बिलोक मुनि ठाढ़ा। मानहुँ चित्र माझ लिखि काढ़ा।।
- RCM 3.10.25Open verse →
तब मुनि हृदयँ धीर धीर गहि पद बारहिं बार।
अर्थ · Hindi
तब मुनि हृदयँ धीर धीर गहि पद बारहिं बार।
- RCM 3.10.26Open verse →
निज आश्रम प्रभु आनि करि पूजा बिबिध प्रकार।।10।।
अर्थ · Hindi
निज आश्रम प्रभु आनि करि पूजा बिबिध प्रकार।।10।।
- RCM 3.11.1Open verse →
कह मुनि प्रभु सुनु बिनती मोरी। अस्तुति करौं कवन बिधि तोरी।।
अर्थ · Hindi
कह मुनि प्रभु सुनु बिनती मोरी। अस्तुति करौं कवन बिधि तोरी।।
- RCM 3.11.2Open verse →
महिमा अमित मोरि मति थोरी। रबि सन्मुख खद्योत अँजोरी।।
अर्थ · Hindi
महिमा अमित मोरि मति थोरी। रबि सन्मुख खद्योत अँजोरी।।
- RCM 3.11.3Open verse →
श्याम तामरस दाम शरीरं। जटा मुकुट परिधन मुनिचीरं।।
अर्थ · Hindi
श्याम तामरस दाम शरीरं। जटा मुकुट परिधन मुनिचीरं।।
- RCM 3.11.4Open verse →
पाणि चाप शर कटि तूणीरं। नौमि निरंतर श्रीरघुवीरं।।
अर्थ · Hindi
पाणि चाप शर कटि तूणीरं। नौमि निरंतर श्रीरघुवीरं।।
- RCM 3.11.5Open verse →
मोह विपिन घन दहन कृशानुः। संत सरोरुह कानन भानुः।।
अर्थ · Hindi
मोह विपिन घन दहन कृशानुः। संत सरोरुह कानन भानुः।।
- RCM 3.11.6Open verse →
निशिचर करि वरूथ मृगराजः। त्रातु सदा नो भव खग बाजः।।
अर्थ · Hindi
निशिचर करि वरूथ मृगराजः। त्रातु सदा नो भव खग बाजः।।
- RCM 3.11.7Open verse →
अरुण नयन राजीव सुवेशं। सीता नयन चकोर निशेशं।।
अर्थ · Hindi
अरुण नयन राजीव सुवेशं। सीता नयन चकोर निशेशं।।
- RCM 3.11.8Open verse →
हर ह्रदि मानस बाल मरालं। नौमि राम उर बाहु विशालं।।
अर्थ · Hindi
हर ह्रदि मानस बाल मरालं। नौमि राम उर बाहु विशालं।।
- RCM 3.11.9Open verse →
संशय सर्प ग्रसन उरगादः। शमन सुकर्कश तर्क विषादः।।
अर्थ · Hindi
संशय सर्प ग्रसन उरगादः। शमन सुकर्कश तर्क विषादः।।
- RCM 3.11.10Open verse →
भव भंजन रंजन सुर यूथः। त्रातु सदा नो कृपा वरूथः।।
अर्थ · Hindi
भव भंजन रंजन सुर यूथः। त्रातु सदा नो कृपा वरूथः।।
- RCM 3.11.11Open verse →
निर्गुण सगुण विषम सम रूपं। ज्ञान गिरा गोतीतमनूपं।।
अर्थ · Hindi
निर्गुण सगुण विषम सम रूपं। ज्ञान गिरा गोतीतमनूपं।।
- RCM 3.11.12Open verse →
अमलमखिलमनवद्यमपारं। नौमि राम भंजन महि भारं।।
अर्थ · Hindi
अमलमखिलमनवद्यमपारं। नौमि राम भंजन महि भारं।।
- RCM 3.11.13Open verse →
भक्त कल्पपादप आरामः। तर्जन क्रोध लोभ मद कामः।।
अर्थ · Hindi
भक्त कल्पपादप आरामः। तर्जन क्रोध लोभ मद कामः।।
- RCM 3.11.14Open verse →
अति नागर भव सागर सेतुः। त्रातु सदा दिनकर कुल केतुः।।
अर्थ · Hindi
अति नागर भव सागर सेतुः। त्रातु सदा दिनकर कुल केतुः।।
- RCM 3.11.15Open verse →
अतुलित भुज प्रताप बल धामः। कलि मल विपुल विभंजन नामः।।
अर्थ · Hindi
अतुलित भुज प्रताप बल धामः। कलि मल विपुल विभंजन नामः।।
- RCM 3.11.16Open verse →
धर्म वर्म नर्मद गुण ग्रामः। संतत शं तनोतु मम रामः।।
अर्थ · Hindi
धर्म वर्म नर्मद गुण ग्रामः। संतत शं तनोतु मम रामः।।
- RCM 3.11.17Open verse →
जदपि बिरज ब्यापक अबिनासी। सब के हृदयँ निरंतर बासी।।
अर्थ · Hindi
जदपि बिरज ब्यापक अबिनासी। सब के हृदयँ निरंतर बासी।।
- RCM 3.11.18Open verse →
तदपि अनुज श्री सहित खरारी। बसतु मनसि मम काननचारी।।
अर्थ · Hindi
तदपि अनुज श्री सहित खरारी। बसतु मनसि मम काननचारी।।
- RCM 3.11.19Open verse →
जे जानहिं ते जानहुँ स्वामी। सगुन अगुन उर अंतरजामी।।
अर्थ · Hindi
जे जानहिं ते जानहुँ स्वामी। सगुन अगुन उर अंतरजामी।।
- RCM 3.11.20Open verse →
जो कोसल पति राजिव नयना। करउ सो राम हृदय मम अयना।
अर्थ · Hindi
जो कोसल पति राजिव नयना। करउ सो राम हृदय मम अयना।
- RCM 3.11.21Open verse →
अस अभिमान जाइ जनि भोरे। मैं सेवक रघुपति पति मोरे।।
अर्थ · Hindi
अस अभिमान जाइ जनि भोरे। मैं सेवक रघुपति पति मोरे।।
- RCM 3.11.22Open verse →
सुनि मुनि बचन राम मन भाए। बहुरि हरषि मुनिबर उर लाए।।
अर्थ · Hindi
सुनि मुनि बचन राम मन भाए। बहुरि हरषि मुनिबर उर लाए।।
- RCM 3.11.23Open verse →
परम प्रसन्न जानु मुनि मोही। जो बर मागहु देउ सो तोही।।
अर्थ · Hindi
परम प्रसन्न जानु मुनि मोही। जो बर मागहु देउ सो तोही।।
- RCM 3.11.24Open verse →
मुनि कह मै बर कबहुँ न जाचा। समुझि न परइ झूठ का साचा।।
अर्थ · Hindi
मुनि कह मै बर कबहुँ न जाचा। समुझि न परइ झूठ का साचा।।
- RCM 3.11.25Open verse →
तुम्हहि नीक लागै रघुराई। सो मोहि देहु दास सुखदाई।।
अर्थ · Hindi
तुम्हहि नीक लागै रघुराई। सो मोहि देहु दास सुखदाई।।
- RCM 3.11.26Open verse →
अबिरल भगति बिरति बिग्याना। होहु सकल गुन ग्यान निधाना।।
अर्थ · Hindi
अबिरल भगति बिरति बिग्याना। होहु सकल गुन ग्यान निधाना।।
- RCM 3.11.27Open verse →
प्रभु जो दीन्ह सो बरु मैं पावा। अब सो देहु मोहि जो भावा।।
अर्थ · Hindi
प्रभु जो दीन्ह सो बरु मैं पावा। अब सो देहु मोहि जो भावा।।
- RCM 3.11.28Open verse →
अनुज जानकी सहित प्रभु चाप बान धर राम।
अर्थ · Hindi
अनुज जानकी सहित प्रभु चाप बान धर राम।
- RCM 3.11.29Open verse →
मम हिय गगन इंदु इव बसहु सदा निहकाम।।11।।
अर्थ · Hindi
मम हिय गगन इंदु इव बसहु सदा निहकाम।।11।।
- RCM 3.12.1Open verse →
एवमस्तु करि रमानिवासा। हरषि चले कुभंज रिषि पासा।।
अर्थ · Hindi
एवमस्तु करि रमानिवासा। हरषि चले कुभंज रिषि पासा।।
- RCM 3.12.2Open verse →
बहुत दिवस गुर दरसन पाएँ। भए मोहि एहिं आश्रम आएँ।।
अर्थ · Hindi
बहुत दिवस गुर दरसन पाएँ। भए मोहि एहिं आश्रम आएँ।।
- RCM 3.12.3Open verse →
अब प्रभु संग जाउँ गुर पाहीं। तुम्ह कहँ नाथ निहोरा नाहीं।।
अर्थ · Hindi
अब प्रभु संग जाउँ गुर पाहीं। तुम्ह कहँ नाथ निहोरा नाहीं।।
- RCM 3.12.4Open verse →
देखि कृपानिधि मुनि चतुराई। लिए संग बिहसै द्वौ भाई।।
अर्थ · Hindi
देखि कृपानिधि मुनि चतुराई। लिए संग बिहसै द्वौ भाई।।
- RCM 3.12.5Open verse →
पंथ कहत निज भगति अनूपा। मुनि आश्रम पहुँचे सुरभूपा।।
अर्थ · Hindi
पंथ कहत निज भगति अनूपा। मुनि आश्रम पहुँचे सुरभूपा।।
- RCM 3.12.6Open verse →
तुरत सुतीछन गुर पहिं गयऊ। करि दंडवत कहत अस भयऊ।।
अर्थ · Hindi
तुरत सुतीछन गुर पहिं गयऊ। करि दंडवत कहत अस भयऊ।।
- RCM 3.12.7Open verse →
नाथ कौसलाधीस कुमारा। आए मिलन जगत आधारा।।
अर्थ · Hindi
नाथ कौसलाधीस कुमारा। आए मिलन जगत आधारा।।
- RCM 3.12.8Open verse →
राम अनुज समेत बैदेही। निसि दिनु देव जपत हहु जेही।।
अर्थ · Hindi
राम अनुज समेत बैदेही। निसि दिनु देव जपत हहु जेही।।
- RCM 3.12.9Open verse →
सुनत अगस्ति तुरत उठि धाए। हरि बिलोकि लोचन जल छाए।।
अर्थ · Hindi
सुनत अगस्ति तुरत उठि धाए। हरि बिलोकि लोचन जल छाए।।
- RCM 3.12.10Open verse →
मुनि पद कमल परे द्वौ भाई। रिषि अति प्रीति लिए उर लाई।।
अर्थ · Hindi
मुनि पद कमल परे द्वौ भाई। रिषि अति प्रीति लिए उर लाई।।
- RCM 3.12.11Open verse →
सादर कुसल पूछि मुनि ग्यानी। आसन बर बैठारे आनी।।
अर्थ · Hindi
सादर कुसल पूछि मुनि ग्यानी। आसन बर बैठारे आनी।।
- RCM 3.12.12Open verse →
पुनि करि बहु प्रकार प्रभु पूजा। मोहि सम भाग्यवंत नहिं दूजा।।
अर्थ · Hindi
पुनि करि बहु प्रकार प्रभु पूजा। मोहि सम भाग्यवंत नहिं दूजा।।
- RCM 3.12.13Open verse →
जहँ लगि रहे अपर मुनि बृंदा। हरषे सब बिलोकि सुखकंदा।।
अर्थ · Hindi
जहँ लगि रहे अपर मुनि बृंदा। हरषे सब बिलोकि सुखकंदा।।
- RCM 3.12.14Open verse →
मुनि समूह महँ बैठे सन्मुख सब की ओर।
अर्थ · Hindi
मुनि समूह महँ बैठे सन्मुख सब की ओर।
- RCM 3.12.15Open verse →
सरद इंदु तन चितवत मानहुँ निकर चकोर।।12।।
अर्थ · Hindi
सरद इंदु तन चितवत मानहुँ निकर चकोर।।12।।
- RCM 3.13.1Open verse →
तब रघुबीर कहा मुनि पाहीं। तुम्ह सन प्रभु दुराव कछु नाही।।
अर्थ · Hindi
तब रघुबीर कहा मुनि पाहीं। तुम्ह सन प्रभु दुराव कछु नाही।।
- RCM 3.13.2Open verse →
तुम्ह जानहु जेहि कारन आयउँ। ताते तात न कहि समुझायउँ।।
अर्थ · Hindi
तुम्ह जानहु जेहि कारन आयउँ। ताते तात न कहि समुझायउँ।।
- RCM 3.13.3Open verse →
अब सो मंत्र देहु प्रभु मोही। जेहि प्रकार मारौं मुनिद्रोही।।
अर्थ · Hindi
अब सो मंत्र देहु प्रभु मोही। जेहि प्रकार मारौं मुनिद्रोही।।
- RCM 3.13.4Open verse →
मुनि मुसकाने सुनि प्रभु बानी। पूछेहु नाथ मोहि का जानी।।
अर्थ · Hindi
मुनि मुसकाने सुनि प्रभु बानी। पूछेहु नाथ मोहि का जानी।।
- RCM 3.13.5Open verse →
तुम्हरेइँ भजन प्रभाव अघारी। जानउँ महिमा कछुक तुम्हारी।।
अर्थ · Hindi
तुम्हरेइँ भजन प्रभाव अघारी। जानउँ महिमा कछुक तुम्हारी।।
- RCM 3.13.6Open verse →
ऊमरि तरु बिसाल तव माया। फल ब्रह्मांड अनेक निकाया।।
अर्थ · Hindi
ऊमरि तरु बिसाल तव माया। फल ब्रह्मांड अनेक निकाया।।
- RCM 3.13.7Open verse →
जीव चराचर जंतु समाना। भीतर बसहि न जानहिं आना।।
अर्थ · Hindi
जीव चराचर जंतु समाना। भीतर बसहि न जानहिं आना।।
- RCM 3.13.8Open verse →
ते फल भच्छक कठिन कराला। तव भयँ डरत सदा सोउ काला।।
अर्थ · Hindi
ते फल भच्छक कठिन कराला। तव भयँ डरत सदा सोउ काला।।
- RCM 3.13.9Open verse →
ते तुम्ह सकल लोकपति साईं। पूँछेहु मोहि मनुज की नाईं।।
अर्थ · Hindi
ते तुम्ह सकल लोकपति साईं। पूँछेहु मोहि मनुज की नाईं।।
- RCM 3.13.10Open verse →
यह बर मागउँ कृपानिकेता। बसहु हृदयँ श्री अनुज समेता।।
अर्थ · Hindi
यह बर मागउँ कृपानिकेता। बसहु हृदयँ श्री अनुज समेता।।
- RCM 3.13.11Open verse →
अबिरल भगति बिरति सतसंगा। चरन सरोरुह प्रीति अभंगा।।
अर्थ · Hindi
अबिरल भगति बिरति सतसंगा। चरन सरोरुह प्रीति अभंगा।।
- RCM 3.13.12Open verse →
जद्यपि ब्रह्म अखंड अनंता। अनुभव गम्य भजहिं जेहि संता।।
अर्थ · Hindi
जद्यपि ब्रह्म अखंड अनंता। अनुभव गम्य भजहिं जेहि संता।।
- RCM 3.13.13Open verse →
अस तव रूप बखानउँ जानउँ। फिरि फिरि सगुन ब्रह्म रति मानउँ।।
अर्थ · Hindi
अस तव रूप बखानउँ जानउँ। फिरि फिरि सगुन ब्रह्म रति मानउँ।।
- RCM 3.13.14Open verse →
संतत दासन्ह देहु बड़ाई। तातें मोहि पूँछेहु रघुराई।।
अर्थ · Hindi
संतत दासन्ह देहु बड़ाई। तातें मोहि पूँछेहु रघुराई।।
- RCM 3.13.15Open verse →
है प्रभु परम मनोहर ठाऊँ। पावन पंचबटी तेहि नाऊँ।।
अर्थ · Hindi
है प्रभु परम मनोहर ठाऊँ। पावन पंचबटी तेहि नाऊँ।।
- RCM 3.13.16Open verse →
दंडक बन पुनीत प्रभु करहू। उग्र साप मुनिबर कर हरहू।।
अर्थ · Hindi
दंडक बन पुनीत प्रभु करहू। उग्र साप मुनिबर कर हरहू।।
- RCM 3.13.17Open verse →
बास करहु तहँ रघुकुल राया। कीजे सकल मुनिन्ह पर दाया।।
अर्थ · Hindi
बास करहु तहँ रघुकुल राया। कीजे सकल मुनिन्ह पर दाया।।
- RCM 3.13.18Open verse →
चले राम मुनि आयसु पाई। तुरतहिं पंचबटी निअराई।।
अर्थ · Hindi
चले राम मुनि आयसु पाई। तुरतहिं पंचबटी निअराई।।
- RCM 3.13.19Open verse →
गीधराज सैं भैंट भइ बहु बिधि प्रीति बढ़ाइ।।
अर्थ · Hindi
गीधराज सैं भैंट भइ बहु बिधि प्रीति बढ़ाइ।।
- RCM 3.13.20Open verse →
गोदावरी निकट प्रभु रहे परन गृह छाइ।।13।।
अर्थ · Hindi
गोदावरी निकट प्रभु रहे परन गृह छाइ।।13।।
- RCM 3.14.1Open verse →
जब ते राम कीन्ह तहँ बासा। सुखी भए मुनि बीती त्रासा।।
अर्थ · Hindi
जब ते राम कीन्ह तहँ बासा। सुखी भए मुनि बीती त्रासा।।
- RCM 3.14.2Open verse →
गिरि बन नदीं ताल छबि छाए। दिन दिन प्रति अति हौहिं सुहाए।।
अर्थ · Hindi
गिरि बन नदीं ताल छबि छाए। दिन दिन प्रति अति हौहिं सुहाए।।
- RCM 3.14.3Open verse →
खग मृग बृंद अनंदित रहहीं। मधुप मधुर गंजत छबि लहहीं।।
अर्थ · Hindi
खग मृग बृंद अनंदित रहहीं। मधुप मधुर गंजत छबि लहहीं।।
- RCM 3.14.4Open verse →
सो बन बरनि न सक अहिराजा। जहाँ प्रगट रघुबीर बिराजा।।
अर्थ · Hindi
सो बन बरनि न सक अहिराजा। जहाँ प्रगट रघुबीर बिराजा।।
- RCM 3.14.5Open verse →
एक बार प्रभु सुख आसीना। लछिमन बचन कहे छलहीना।।
अर्थ · Hindi
एक बार प्रभु सुख आसीना। लछिमन बचन कहे छलहीना।।
- RCM 3.14.6Open verse →
सुर नर मुनि सचराचर साईं। मैं पूछउँ निज प्रभु की नाई।।
अर्थ · Hindi
सुर नर मुनि सचराचर साईं। मैं पूछउँ निज प्रभु की नाई।।
- RCM 3.14.7Open verse →
मोहि समुझाइ कहहु सोइ देवा। सब तजि करौं चरन रज सेवा।।
अर्थ · Hindi
मोहि समुझाइ कहहु सोइ देवा। सब तजि करौं चरन रज सेवा।।
- RCM 3.14.8Open verse →
कहहु ग्यान बिराग अरु माया। कहहु सो भगति करहु जेहिं दाया।।
अर्थ · Hindi
कहहु ग्यान बिराग अरु माया। कहहु सो भगति करहु जेहिं दाया।।
- RCM 3.14.9Open verse →
ईस्वर जीव भेद प्रभु सकल कहौ समुझाइ।।
अर्थ · Hindi
ईस्वर जीव भेद प्रभु सकल कहौ समुझाइ।।
- RCM 3.14.10Open verse →
जातें होइ चरन रति सोक मोह भ्रम जाइ।।14।।
अर्थ · Hindi
जातें होइ चरन रति सोक मोह भ्रम जाइ।।14।।
- RCM 3.15.1Open verse →
थोरेहि महँ सब कहउँ बुझाई। सुनहु तात मति मन चित लाई।।
अर्थ · Hindi
थोरेहि महँ सब कहउँ बुझाई। सुनहु तात मति मन चित लाई।।
- RCM 3.15.2Open verse →
मैं अरु मोर तोर तैं माया। जेहिं बस कीन्हे जीव निकाया।।
अर्थ · Hindi
मैं अरु मोर तोर तैं माया। जेहिं बस कीन्हे जीव निकाया।।
- RCM 3.15.3Open verse →
गो गोचर जहँ लगि मन जाई। सो सब माया जानेहु भाई।।
अर्थ · Hindi
गो गोचर जहँ लगि मन जाई। सो सब माया जानेहु भाई।।
- RCM 3.15.4Open verse →
तेहि कर भेद सुनहु तुम्ह सोऊ। बिद्या अपर अबिद्या दोऊ।।
अर्थ · Hindi
तेहि कर भेद सुनहु तुम्ह सोऊ। बिद्या अपर अबिद्या दोऊ।।
- RCM 3.15.5Open verse →
एक दुष्ट अतिसय दुखरूपा। जा बस जीव परा भवकूपा।।
अर्थ · Hindi
एक दुष्ट अतिसय दुखरूपा। जा बस जीव परा भवकूपा।।
- RCM 3.15.6Open verse →
एक रचइ जग गुन बस जाकें। प्रभु प्रेरित नहिं निज बल ताकें।।
अर्थ · Hindi
एक रचइ जग गुन बस जाकें। प्रभु प्रेरित नहिं निज बल ताकें।।
- RCM 3.15.7Open verse →
ग्यान मान जहँ एकउ नाहीं। देख ब्रह्म समान सब माही।।
अर्थ · Hindi
ग्यान मान जहँ एकउ नाहीं। देख ब्रह्म समान सब माही।।
- RCM 3.15.8Open verse →
कहिअ तात सो परम बिरागी। तृन सम सिद्धि तीनि गुन त्यागी।।
अर्थ · Hindi
कहिअ तात सो परम बिरागी। तृन सम सिद्धि तीनि गुन त्यागी।।
- RCM 3.15.9Open verse →
माया ईस न आपु कहुँ जान कहिअ सो जीव।
अर्थ · Hindi
माया ईस न आपु कहुँ जान कहिअ सो जीव।
- RCM 3.15.10Open verse →
बंध मोच्छ प्रद सर्बपर माया प्रेरक सीव।।15।।
अर्थ · Hindi
बंध मोच्छ प्रद सर्बपर माया प्रेरक सीव।।15।।
- RCM 3.16.1Open verse →
धर्म तें बिरति जोग तें ग्याना। ग्यान मोच्छप्रद बेद बखाना।।
अर्थ · Hindi
धर्म तें बिरति जोग तें ग्याना। ग्यान मोच्छप्रद बेद बखाना।।
- RCM 3.16.2Open verse →
जातें बेगि द्रवउँ मैं भाई। सो मम भगति भगत सुखदाई।।
अर्थ · Hindi
जातें बेगि द्रवउँ मैं भाई। सो मम भगति भगत सुखदाई।।
- RCM 3.16.3Open verse →
सो सुतंत्र अवलंब न आना। तेहि आधीन ग्यान बिग्याना।।
अर्थ · Hindi
सो सुतंत्र अवलंब न आना। तेहि आधीन ग्यान बिग्याना।।
- RCM 3.16.4Open verse →
भगति तात अनुपम सुखमूला। मिलइ जो संत होइँ अनुकूला।।
अर्थ · Hindi
भगति तात अनुपम सुखमूला। मिलइ जो संत होइँ अनुकूला।।
- RCM 3.16.5Open verse →
भगति कि साधन कहउँ बखानी। सुगम पंथ मोहि पावहिं प्रानी।।
अर्थ · Hindi
भगति कि साधन कहउँ बखानी। सुगम पंथ मोहि पावहिं प्रानी।।
- RCM 3.16.6Open verse →
प्रथमहिं बिप्र चरन अति प्रीती। निज निज कर्म निरत श्रुति रीती।।
अर्थ · Hindi
प्रथमहिं बिप्र चरन अति प्रीती। निज निज कर्म निरत श्रुति रीती।।
- RCM 3.16.7Open verse →
एहि कर फल पुनि बिषय बिरागा। तब मम धर्म उपज अनुरागा।।
अर्थ · Hindi
एहि कर फल पुनि बिषय बिरागा। तब मम धर्म उपज अनुरागा।।
- RCM 3.16.8Open verse →
श्रवनादिक नव भक्ति दृढ़ाहीं। मम लीला रति अति मन माहीं।।
अर्थ · Hindi
श्रवनादिक नव भक्ति दृढ़ाहीं। मम लीला रति अति मन माहीं।।
- RCM 3.16.9Open verse →
संत चरन पंकज अति प्रेमा। मन क्रम बचन भजन दृढ़ नेमा।।
अर्थ · Hindi
संत चरन पंकज अति प्रेमा। मन क्रम बचन भजन दृढ़ नेमा।।
- RCM 3.16.10Open verse →
गुरु पितु मातु बंधु पति देवा। सब मोहि कहँ जाने दृढ़ सेवा।।
अर्थ · Hindi
गुरु पितु मातु बंधु पति देवा। सब मोहि कहँ जाने दृढ़ सेवा।।
- RCM 3.16.11Open verse →
मम गुन गावत पुलक सरीरा। गदगद गिरा नयन बह नीरा।।
अर्थ · Hindi
मम गुन गावत पुलक सरीरा। गदगद गिरा नयन बह नीरा।।
- RCM 3.16.12Open verse →
काम आदि मद दंभ न जाकें। तात निरंतर बस मैं ताकें।।
अर्थ · Hindi
काम आदि मद दंभ न जाकें। तात निरंतर बस मैं ताकें।।
- RCM 3.16.13Open verse →
बचन कर्म मन मोरि गति भजनु करहिं निःकाम।।
अर्थ · Hindi
बचन कर्म मन मोरि गति भजनु करहिं निःकाम।।
- RCM 3.16.14Open verse →
तिन्ह के हृदय कमल महुँ करउँ सदा बिश्राम।।16।।
अर्थ · Hindi
तिन्ह के हृदय कमल महुँ करउँ सदा बिश्राम।।16।।
- RCM 3.17.1Open verse →
भगति जोग सुनि अति सुख पावा। लछिमन प्रभु चरनन्हि सिरु नावा।।
अर्थ · Hindi
भगति जोग सुनि अति सुख पावा। लछिमन प्रभु चरनन्हि सिरु नावा।।
- RCM 3.17.2Open verse →
एहि बिधि गए कछुक दिन बीती। कहत बिराग ग्यान गुन नीती।।
अर्थ · Hindi
एहि बिधि गए कछुक दिन बीती। कहत बिराग ग्यान गुन नीती।।
- RCM 3.17.3Open verse →
सूपनखा रावन कै बहिनी। दुष्ट हृदय दारुन जस अहिनी।।
अर्थ · Hindi
सूपनखा रावन कै बहिनी। दुष्ट हृदय दारुन जस अहिनी।।
- RCM 3.17.4Open verse →
पंचबटी सो गइ एक बारा। देखि बिकल भइ जुगल कुमारा।।
अर्थ · Hindi
पंचबटी सो गइ एक बारा। देखि बिकल भइ जुगल कुमारा।।
- RCM 3.17.5Open verse →
भ्राता पिता पुत्र उरगारी। पुरुष मनोहर निरखत नारी।।
अर्थ · Hindi
भ्राता पिता पुत्र उरगारी। पुरुष मनोहर निरखत नारी।।
- RCM 3.17.6Open verse →
होइ बिकल सक मनहि न रोकी। जिमि रबिमनि द्रव रबिहि बिलोकी।।
अर्थ · Hindi
होइ बिकल सक मनहि न रोकी। जिमि रबिमनि द्रव रबिहि बिलोकी।।
- RCM 3.17.7Open verse →
रुचिर रुप धरि प्रभु पहिं जाई। बोली बचन बहुत मुसुकाई।।
अर्थ · Hindi
रुचिर रुप धरि प्रभु पहिं जाई। बोली बचन बहुत मुसुकाई।।
- RCM 3.17.8Open verse →
तुम्ह सम पुरुष न मो सम नारी। यह सँजोग बिधि रचा बिचारी।।
अर्थ · Hindi
तुम्ह सम पुरुष न मो सम नारी। यह सँजोग बिधि रचा बिचारी।।
- RCM 3.17.9Open verse →
मम अनुरूप पुरुष जग माहीं। देखेउँ खोजि लोक तिहु नाहीं।।
अर्थ · Hindi
मम अनुरूप पुरुष जग माहीं। देखेउँ खोजि लोक तिहु नाहीं।।
- RCM 3.17.10Open verse →
ताते अब लगि रहिउँ कुमारी। मनु माना कछु तुम्हहि निहारी।।
अर्थ · Hindi
ताते अब लगि रहिउँ कुमारी। मनु माना कछु तुम्हहि निहारी।।
- RCM 3.17.11Open verse →
सीतहि चितइ कही प्रभु बाता। अहइ कुआर मोर लघु भ्राता।।
अर्थ · Hindi
सीतहि चितइ कही प्रभु बाता। अहइ कुआर मोर लघु भ्राता।।
- RCM 3.17.12Open verse →
गइ लछिमन रिपु भगिनी जानी। प्रभु बिलोकि बोले मृदु बानी।।
अर्थ · Hindi
गइ लछिमन रिपु भगिनी जानी। प्रभु बिलोकि बोले मृदु बानी।।
- RCM 3.17.13Open verse →
सुंदरि सुनु मैं उन्ह कर दासा। पराधीन नहिं तोर सुपासा।।
अर्थ · Hindi
सुंदरि सुनु मैं उन्ह कर दासा। पराधीन नहिं तोर सुपासा।।
- RCM 3.17.14Open verse →
प्रभु समर्थ कोसलपुर राजा। जो कछु करहिं उनहि सब छाजा।।
अर्थ · Hindi
प्रभु समर्थ कोसलपुर राजा। जो कछु करहिं उनहि सब छाजा।।
- RCM 3.17.15Open verse →
सेवक सुख चह मान भिखारी। ब्यसनी धन सुभ गति बिभिचारी।।
अर्थ · Hindi
सेवक सुख चह मान भिखारी। ब्यसनी धन सुभ गति बिभिचारी।।
- RCM 3.17.16Open verse →
लोभी जसु चह चार गुमानी। नभ दुहि दूध चहत ए प्रानी।।
अर्थ · Hindi
लोभी जसु चह चार गुमानी। नभ दुहि दूध चहत ए प्रानी।।
- RCM 3.17.17Open verse →
पुनि फिरि राम निकट सो आई। प्रभु लछिमन पहिं बहुरि पठाई।।
अर्थ · Hindi
पुनि फिरि राम निकट सो आई। प्रभु लछिमन पहिं बहुरि पठाई।।
- RCM 3.17.18Open verse →
लछिमन कहा तोहि सो बरई। जो तृन तोरि लाज परिहरई।।
अर्थ · Hindi
लछिमन कहा तोहि सो बरई। जो तृन तोरि लाज परिहरई।।
- RCM 3.17.19Open verse →
तब खिसिआनि राम पहिं गई। रूप भयंकर प्रगटत भई।।
अर्थ · Hindi
तब खिसिआनि राम पहिं गई। रूप भयंकर प्रगटत भई।।
- RCM 3.17.20Open verse →
सीतहि सभय देखि रघुराई। कहा अनुज सन सयन बुझाई।।
अर्थ · Hindi
सीतहि सभय देखि रघुराई। कहा अनुज सन सयन बुझाई।।
- RCM 3.17.21Open verse →
लछिमन अति लाघवँ सो नाक कान बिनु कीन्हि।
अर्थ · Hindi
लछिमन अति लाघवँ सो नाक कान बिनु कीन्हि।
- RCM 3.17.22Open verse →
ताके कर रावन कहँ मनौ चुनौती दीन्हि।।17।।
अर्थ · Hindi
ताके कर रावन कहँ मनौ चुनौती दीन्हि।।17।।
- RCM 3.18.1Open verse →
नाक कान बिनु भइ बिकरारा। जनु स्त्रव सैल गैरु कै धारा।।
अर्थ · Hindi
नाक कान बिनु भइ बिकरारा। जनु स्त्रव सैल गैरु कै धारा।।
- RCM 3.18.2Open verse →
खर दूषन पहिं गइ बिलपाता। धिग धिग तव पौरुष बल भ्राता।।
अर्थ · Hindi
खर दूषन पहिं गइ बिलपाता। धिग धिग तव पौरुष बल भ्राता।।
- RCM 3.18.3Open verse →
तेहि पूछा सब कहेसि बुझाई। जातुधान सुनि सेन बनाई।।
अर्थ · Hindi
तेहि पूछा सब कहेसि बुझाई। जातुधान सुनि सेन बनाई।।
- RCM 3.18.4Open verse →
धाए निसिचर निकर बरूथा। जनु सपच्छ कज्जल गिरि जूथा।।
अर्थ · Hindi
धाए निसिचर निकर बरूथा। जनु सपच्छ कज्जल गिरि जूथा।।
- RCM 3.18.5Open verse →
नाना बाहन नानाकारा। नानायुध धर घोर अपारा।।
अर्थ · Hindi
नाना बाहन नानाकारा। नानायुध धर घोर अपारा।।
- RCM 3.18.6Open verse →
सुपनखा आगें करि लीनी। असुभ रूप श्रुति नासा हीनी।।
अर्थ · Hindi
सुपनखा आगें करि लीनी। असुभ रूप श्रुति नासा हीनी।।
- RCM 3.18.7Open verse →
असगुन अमित होहिं भयकारी। गनहिं न मृत्यु बिबस सब झारी।।
अर्थ · Hindi
असगुन अमित होहिं भयकारी। गनहिं न मृत्यु बिबस सब झारी।।
- RCM 3.18.8Open verse →
गर्जहि तर्जहिं गगन उड़ाहीं। देखि कटकु भट अति हरषाहीं।।
अर्थ · Hindi
गर्जहि तर्जहिं गगन उड़ाहीं। देखि कटकु भट अति हरषाहीं।।
- RCM 3.18.9Open verse →
कोउ कह जिअत धरहु द्वौ भाई। धरि मारहु तिय लेहु छड़ाई।।
अर्थ · Hindi
कोउ कह जिअत धरहु द्वौ भाई। धरि मारहु तिय लेहु छड़ाई।।
- RCM 3.18.10Open verse →
धूरि पूरि नभ मंडल रहा। राम बोलाइ अनुज सन कहा।।
अर्थ · Hindi
धूरि पूरि नभ मंडल रहा। राम बोलाइ अनुज सन कहा।।
- RCM 3.18.11Open verse →
लै जानकिहि जाहु गिरि कंदर। आवा निसिचर कटकु भयंकर।।
अर्थ · Hindi
लै जानकिहि जाहु गिरि कंदर। आवा निसिचर कटकु भयंकर।।
- RCM 3.18.12Open verse →
रहेहु सजग सुनि प्रभु कै बानी। चले सहित श्री सर धनु पानी।।
अर्थ · Hindi
रहेहु सजग सुनि प्रभु कै बानी। चले सहित श्री सर धनु पानी।।
- RCM 3.18.13Open verse →
देखि राम रिपुदल चलि आवा। बिहसि कठिन कोदंड चढ़ावा।।
अर्थ · Hindi
देखि राम रिपुदल चलि आवा। बिहसि कठिन कोदंड चढ़ावा।।
- RCM 3.19.1Open verse →
प्रभु बिलोकि सर सकहिं न डारी। थकित भई रजनीचर धारी।।
अर्थ · Hindi
प्रभु बिलोकि सर सकहिं न डारी। थकित भई रजनीचर धारी।।
- RCM 3.19.2Open verse →
सचिव बोलि बोले खर दूषन। यह कोउ नृपबालक नर भूषन।।
अर्थ · Hindi
सचिव बोलि बोले खर दूषन। यह कोउ नृपबालक नर भूषन।।
- RCM 3.19.3Open verse →
नाग असुर सुर नर मुनि जेते। देखे जिते हते हम केते।।
अर्थ · Hindi
नाग असुर सुर नर मुनि जेते। देखे जिते हते हम केते।।
- RCM 3.19.4Open verse →
हम भरि जन्म सुनहु सब भाई। देखी नहिं असि सुंदरताई।।
अर्थ · Hindi
हम भरि जन्म सुनहु सब भाई। देखी नहिं असि सुंदरताई।।
- RCM 3.19.5Open verse →
जद्यपि भगिनी कीन्ह कुरूपा। बध लायक नहिं पुरुष अनूपा।।
अर्थ · Hindi
जद्यपि भगिनी कीन्ह कुरूपा। बध लायक नहिं पुरुष अनूपा।।
- RCM 3.19.6Open verse →
देहु तुरत निज नारि दुराई। जीअत भवन जाहु द्वौ भाई।।
अर्थ · Hindi
देहु तुरत निज नारि दुराई। जीअत भवन जाहु द्वौ भाई।।
- RCM 3.19.7Open verse →
मोर कहा तुम्ह ताहि सुनावहु। तासु बचन सुनि आतुर आवहु।।
अर्थ · Hindi
मोर कहा तुम्ह ताहि सुनावहु। तासु बचन सुनि आतुर आवहु।।
- RCM 3.19.8Open verse →
दूतन्ह कहा राम सन जाई। सुनत राम बोले मुसकाई।।
अर्थ · Hindi
दूतन्ह कहा राम सन जाई। सुनत राम बोले मुसकाई।।
- RCM 3.19.9Open verse →
हम छत्री मृगया बन करहीं। तुम्ह से खल मृग खौजत फिरहीं।।
अर्थ · Hindi
हम छत्री मृगया बन करहीं। तुम्ह से खल मृग खौजत फिरहीं।।
- RCM 3.19.10Open verse →
रिपु बलवंत देखि नहिं डरहीं। एक बार कालहु सन लरहीं।।
अर्थ · Hindi
रिपु बलवंत देखि नहिं डरहीं। एक बार कालहु सन लरहीं।।
- RCM 3.19.11Open verse →
जद्यपि मनुज दनुज कुल घालक। मुनि पालक खल सालक बालक।।
अर्थ · Hindi
जद्यपि मनुज दनुज कुल घालक। मुनि पालक खल सालक बालक।।
- RCM 3.19.12Open verse →
जौं न होइ बल घर फिरि जाहू। समर बिमुख मैं हतउँ न काहू।।
अर्थ · Hindi
जौं न होइ बल घर फिरि जाहू। समर बिमुख मैं हतउँ न काहू।।
- RCM 3.19.13Open verse →
रन चढ़ि करिअ कपट चतुराई। रिपु पर कृपा परम कदराई।।
अर्थ · Hindi
रन चढ़ि करिअ कपट चतुराई। रिपु पर कृपा परम कदराई।।
- RCM 3.19.14Open verse →
दूतन्ह जाइ तुरत सब कहेऊ। सुनि खर दूषन उर अति दहेऊ।।
अर्थ · Hindi
दूतन्ह जाइ तुरत सब कहेऊ। सुनि खर दूषन उर अति दहेऊ।।
- RCM 3.20.1Open verse →
तब चले जान बबान कराल। फुंकरत जनु बहु ब्याल।।
अर्थ · Hindi
तब चले जान बबान कराल। फुंकरत जनु बहु ब्याल।।
- RCM 3.20.2Open verse →
कोपेउ समर श्रीराम। चले बिसिख निसित निकाम।।
अर्थ · Hindi
कोपेउ समर श्रीराम। चले बिसिख निसित निकाम।।
- RCM 3.20.3Open verse →
अवलोकि खरतर तीर। मुरि चले निसिचर बीर।।
अर्थ · Hindi
अवलोकि खरतर तीर। मुरि चले निसिचर बीर।।
- RCM 3.20.4Open verse →
भए क्रुद्ध तीनिउ भाइ। जो भागि रन ते जाइ।।
अर्थ · Hindi
भए क्रुद्ध तीनिउ भाइ। जो भागि रन ते जाइ।।
- RCM 3.20.5Open verse →
तेहि बधब हम निज पानि। फिरे मरन मन महुँ ठानि।।
अर्थ · Hindi
तेहि बधब हम निज पानि। फिरे मरन मन महुँ ठानि।।
- RCM 3.20.6Open verse →
आयुध अनेक प्रकार। सनमुख ते करहिं प्रहार।।
अर्थ · Hindi
आयुध अनेक प्रकार। सनमुख ते करहिं प्रहार।।
- RCM 3.20.7Open verse →
रिपु परम कोपे जानि। प्रभु धनुष सर संधानि।।
अर्थ · Hindi
रिपु परम कोपे जानि। प्रभु धनुष सर संधानि।।
- RCM 3.20.8Open verse →
छाँड़े बिपुल नाराच। लगे कटन बिकट पिसाच।।
अर्थ · Hindi
छाँड़े बिपुल नाराच। लगे कटन बिकट पिसाच।।
- RCM 3.20.9Open verse →
उर सीस भुज कर चरन। जहँ तहँ लगे महि परन।।
अर्थ · Hindi
उर सीस भुज कर चरन। जहँ तहँ लगे महि परन।।
- RCM 3.20.10Open verse →
चिक्करत लागत बान। धर परत कुधर समान।।
अर्थ · Hindi
चिक्करत लागत बान। धर परत कुधर समान।।
- RCM 3.20.11Open verse →
भट कटत तन सत खंड। पुनि उठत करि पाषंड।।
अर्थ · Hindi
भट कटत तन सत खंड। पुनि उठत करि पाषंड।।
- RCM 3.20.12Open verse →
नभ उड़त बहु भुज मुंड। बिनु मौलि धावत रुंड।।
अर्थ · Hindi
नभ उड़त बहु भुज मुंड। बिनु मौलि धावत रुंड।।
- RCM 3.20.13Open verse →
खग कंक काक सृगाल। कटकटहिं कठिन कराल।।
अर्थ · Hindi
खग कंक काक सृगाल। कटकटहिं कठिन कराल।।
- RCM 3.20.14Open verse →
कटकटहिं ज़ंबुक भूत प्रेत पिसाच खर्पर संचहीं।
अर्थ · Hindi
कटकटहिं ज़ंबुक भूत प्रेत पिसाच खर्पर संचहीं।
- RCM 3.20.15Open verse →
बेताल बीर कपाल ताल बजाइ जोगिनि नंचहीं।।
अर्थ · Hindi
बेताल बीर कपाल ताल बजाइ जोगिनि नंचहीं।।
- RCM 3.20.16Open verse →
रघुबीर बान प्रचंड खंडहिं भटन्ह के उर भुज सिरा।
अर्थ · Hindi
रघुबीर बान प्रचंड खंडहिं भटन्ह के उर भुज सिरा।
- RCM 3.20.17Open verse →
जहँ तहँ परहिं उठि लरहिं धर धरु धरु करहिं भयकर गिरा।।
अर्थ · Hindi
जहँ तहँ परहिं उठि लरहिं धर धरु धरु करहिं भयकर गिरा।।
- RCM 3.20.18Open verse →
अंतावरीं गहि उड़त गीध पिसाच कर गहि धावहीं।।
अर्थ · Hindi
अंतावरीं गहि उड़त गीध पिसाच कर गहि धावहीं।।
- RCM 3.20.19Open verse →
संग्राम पुर बासी मनहुँ बहु बाल गुड़ी उड़ावहीं।।
अर्थ · Hindi
संग्राम पुर बासी मनहुँ बहु बाल गुड़ी उड़ावहीं।।
- RCM 3.20.20Open verse →
मारे पछारे उर बिदारे बिपुल भट कहँरत परे।
अर्थ · Hindi
मारे पछारे उर बिदारे बिपुल भट कहँरत परे।
- RCM 3.20.21Open verse →
अवलोकि निज दल बिकल भट तिसिरादि खर दूषन फिरे।।
अर्थ · Hindi
अवलोकि निज दल बिकल भट तिसिरादि खर दूषन फिरे।।
- RCM 3.20.22Open verse →
सर सक्ति तोमर परसु सूल कृपान एकहि बारहीं।
अर्थ · Hindi
सर सक्ति तोमर परसु सूल कृपान एकहि बारहीं।
- RCM 3.20.23Open verse →
करि कोप श्रीरघुबीर पर अगनित निसाचर डारहीं।।
अर्थ · Hindi
करि कोप श्रीरघुबीर पर अगनित निसाचर डारहीं।।
- RCM 3.20.24Open verse →
प्रभु निमिष महुँ रिपु सर निवारि पचारि डारे सायका।
अर्थ · Hindi
प्रभु निमिष महुँ रिपु सर निवारि पचारि डारे सायका।
- RCM 3.20.25Open verse →
दस दस बिसिख उर माझ मारे सकल निसिचर नायका।।
अर्थ · Hindi
दस दस बिसिख उर माझ मारे सकल निसिचर नायका।।
- RCM 3.20.26Open verse →
महि परत उठि भट भिरत मरत न करत माया अति घनी।
अर्थ · Hindi
महि परत उठि भट भिरत मरत न करत माया अति घनी।
- RCM 3.20.27Open verse →
सुर डरत चौदह सहस प्रेत बिलोकि एक अवध धनी।।
अर्थ · Hindi
सुर डरत चौदह सहस प्रेत बिलोकि एक अवध धनी।।
- RCM 3.20.28Open verse →
सुर मुनि सभय प्रभु देखि मायानाथ अति कौतुक कर् यो।
अर्थ · Hindi
सुर मुनि सभय प्रभु देखि मायानाथ अति कौतुक कर् यो।
- RCM 3.20.29Open verse →
देखहि परसपर राम करि संग्राम रिपुदल लरि मर् यो।।
अर्थ · Hindi
देखहि परसपर राम करि संग्राम रिपुदल लरि मर् यो।।
- RCM 3.21.1Open verse →
जब रघुनाथ समर रिपु जीते। सुर नर मुनि सब के भय बीते।।
अर्थ · Hindi
जब रघुनाथ समर रिपु जीते। सुर नर मुनि सब के भय बीते।।
- RCM 3.21.2Open verse →
तब लछिमन सीतहि लै आए। प्रभु पद परत हरषि उर लाए।
अर्थ · Hindi
तब लछिमन सीतहि लै आए। प्रभु पद परत हरषि उर लाए।
- RCM 3.21.3Open verse →
सीता चितव स्याम मृदु गाता। परम प्रेम लोचन न अघाता।।
अर्थ · Hindi
सीता चितव स्याम मृदु गाता। परम प्रेम लोचन न अघाता।।
- RCM 3.21.4Open verse →
पंचवटीं बसि श्रीरघुनायक। करत चरित सुर मुनि सुखदायक।।
अर्थ · Hindi
पंचवटीं बसि श्रीरघुनायक। करत चरित सुर मुनि सुखदायक।।
- RCM 3.21.5Open verse →
धुआँ देखि खरदूषन केरा। जाइ सुपनखाँ रावन प्रेरा।।
अर्थ · Hindi
धुआँ देखि खरदूषन केरा। जाइ सुपनखाँ रावन प्रेरा।।
- RCM 3.21.6Open verse →
बोलि बचन क्रोध करि भारी। देस कोस कै सुरति बिसारी।।
अर्थ · Hindi
बोलि बचन क्रोध करि भारी। देस कोस कै सुरति बिसारी।।
- RCM 3.21.7Open verse →
करसि पान सोवसि दिनु राती। सुधि नहिं तव सिर पर आराती।।
अर्थ · Hindi
करसि पान सोवसि दिनु राती। सुधि नहिं तव सिर पर आराती।।
- RCM 3.21.8Open verse →
राज नीति बिनु धन बिनु धर्मा। हरिहि समर्पे बिनु सतकर्मा।।
अर्थ · Hindi
राज नीति बिनु धन बिनु धर्मा। हरिहि समर्पे बिनु सतकर्मा।।
- RCM 3.21.9Open verse →
बिद्या बिनु बिबेक उपजाएँ। श्रम फल पढ़े किएँ अरु पाएँ।।
अर्थ · Hindi
बिद्या बिनु बिबेक उपजाएँ। श्रम फल पढ़े किएँ अरु पाएँ।।
- RCM 3.21.10Open verse →
संग ते जती कुमंत्र ते राजा। मान ते ग्यान पान तें लाजा।।
अर्थ · Hindi
संग ते जती कुमंत्र ते राजा। मान ते ग्यान पान तें लाजा।।
- RCM 3.21.11Open verse →
प्रीति प्रनय बिनु मद ते गुनी। नासहि बेगि नीति अस सुनी।।
अर्थ · Hindi
प्रीति प्रनय बिनु मद ते गुनी। नासहि बेगि नीति अस सुनी।।
- RCM 3.21.12Open verse →
रिपु रुज पावक पाप प्रभु अहि गनिअ न छोट करि।
अर्थ · Hindi
रिपु रुज पावक पाप प्रभु अहि गनिअ न छोट करि।
- RCM 3.21.13Open verse →
अस कहि बिबिध बिलाप करि लागी रोदन करन।।21(क)।।
अर्थ · Hindi
अस कहि बिबिध बिलाप करि लागी रोदन करन।।21(क)।।
- RCM 3.21.14Open verse →
सभा माझ परि ब्याकुल बहु प्रकार कह रोइ।
अर्थ · Hindi
सभा माझ परि ब्याकुल बहु प्रकार कह रोइ।
- RCM 3.21.15Open verse →
तोहि जिअत दसकंधर मोरि कि असि गति होइ।।21(ख)।।
अर्थ · Hindi
तोहि जिअत दसकंधर मोरि कि असि गति होइ।।21(ख)।।
- RCM 3.22.1Open verse →
सुनत सभासद उठे अकुलाई। समुझाई गहि बाहँ उठाई।।
अर्थ · Hindi
सुनत सभासद उठे अकुलाई। समुझाई गहि बाहँ उठाई।।
- RCM 3.22.2Open verse →
कह लंकेस कहसि निज बाता। केंइँ तव नासा कान निपाता।।
अर्थ · Hindi
कह लंकेस कहसि निज बाता। केंइँ तव नासा कान निपाता।।
- RCM 3.22.3Open verse →
अवध नृपति दसरथ के जाए। पुरुष सिंघ बन खेलन आए।।
अर्थ · Hindi
अवध नृपति दसरथ के जाए। पुरुष सिंघ बन खेलन आए।।
- RCM 3.22.4Open verse →
समुझि परी मोहि उन्ह कै करनी। रहित निसाचर करिहहिं धरनी।।
अर्थ · Hindi
समुझि परी मोहि उन्ह कै करनी। रहित निसाचर करिहहिं धरनी।।
- RCM 3.22.5Open verse →
जिन्ह कर भुजबल पाइ दसानन। अभय भए बिचरत मुनि कानन।।
अर्थ · Hindi
जिन्ह कर भुजबल पाइ दसानन। अभय भए बिचरत मुनि कानन।।
- RCM 3.22.6Open verse →
देखत बालक काल समाना। परम धीर धन्वी गुन नाना।।
अर्थ · Hindi
देखत बालक काल समाना। परम धीर धन्वी गुन नाना।।
- RCM 3.22.7Open verse →
अतुलित बल प्रताप द्वौ भ्राता। खल बध रत सुर मुनि सुखदाता।।
अर्थ · Hindi
अतुलित बल प्रताप द्वौ भ्राता। खल बध रत सुर मुनि सुखदाता।।
- RCM 3.22.8Open verse →
सोभाधाम राम अस नामा। तिन्ह के संग नारि एक स्यामा।।
अर्थ · Hindi
सोभाधाम राम अस नामा। तिन्ह के संग नारि एक स्यामा।।
- RCM 3.22.9Open verse →
रुप रासि बिधि नारि सँवारी। रति सत कोटि तासु बलिहारी।।
अर्थ · Hindi
रुप रासि बिधि नारि सँवारी। रति सत कोटि तासु बलिहारी।।
- RCM 3.22.10Open verse →
तासु अनुज काटे श्रुति नासा। सुनि तव भगिनि करहिं परिहासा।।
अर्थ · Hindi
तासु अनुज काटे श्रुति नासा। सुनि तव भगिनि करहिं परिहासा।।
- RCM 3.22.11Open verse →
खर दूषन सुनि लगे पुकारा। छन महुँ सकल कटक उन्ह मारा।।
अर्थ · Hindi
खर दूषन सुनि लगे पुकारा। छन महुँ सकल कटक उन्ह मारा।।
- RCM 3.22.12Open verse →
खर दूषन तिसिरा कर घाता। सुनि दससीस जरे सब गाता।।
अर्थ · Hindi
खर दूषन तिसिरा कर घाता। सुनि दससीस जरे सब गाता।।
- RCM 3.22.13Open verse →
सुपनखहि समुझाइ करि बल बोलेसि बहु भाँति।
अर्थ · Hindi
सुपनखहि समुझाइ करि बल बोलेसि बहु भाँति।
- RCM 3.22.14Open verse →
गयउ भवन अति सोचबस नीद परइ नहिं राति।।22।।
अर्थ · Hindi
गयउ भवन अति सोचबस नीद परइ नहिं राति।।22।।
- RCM 3.23.1Open verse →
सुर नर असुर नाग खग माहीं। मोरे अनुचर कहँ कोउ नाहीं।।
अर्थ · Hindi
सुर नर असुर नाग खग माहीं। मोरे अनुचर कहँ कोउ नाहीं।।
- RCM 3.23.2Open verse →
खर दूषन मोहि सम बलवंता। तिन्हहि को मारइ बिनु भगवंता।।
अर्थ · Hindi
खर दूषन मोहि सम बलवंता। तिन्हहि को मारइ बिनु भगवंता।।
- RCM 3.23.3Open verse →
सुर रंजन भंजन महि भारा। जौं भगवंत लीन्ह अवतारा।।
अर्थ · Hindi
सुर रंजन भंजन महि भारा। जौं भगवंत लीन्ह अवतारा।।
- RCM 3.23.4Open verse →
तौ मै जाइ बैरु हठि करऊँ। प्रभु सर प्रान तजें भव तरऊँ।।
अर्थ · Hindi
तौ मै जाइ बैरु हठि करऊँ। प्रभु सर प्रान तजें भव तरऊँ।।
- RCM 3.23.5Open verse →
होइहि भजनु न तामस देहा। मन क्रम बचन मंत्र दृढ़ एहा।।
अर्थ · Hindi
होइहि भजनु न तामस देहा। मन क्रम बचन मंत्र दृढ़ एहा।।
- RCM 3.23.6Open verse →
जौं नररुप भूपसुत कोऊ। हरिहउँ नारि जीति रन दोऊ।।
अर्थ · Hindi
जौं नररुप भूपसुत कोऊ। हरिहउँ नारि जीति रन दोऊ।।
- RCM 3.23.7Open verse →
चला अकेल जान चढि तहवाँ। बस मारीच सिंधु तट जहवाँ।।
अर्थ · Hindi
चला अकेल जान चढि तहवाँ। बस मारीच सिंधु तट जहवाँ।।
- RCM 3.23.8Open verse →
इहाँ राम जसि जुगुति बनाई। सुनहु उमा सो कथा सुहाई।।
अर्थ · Hindi
इहाँ राम जसि जुगुति बनाई। सुनहु उमा सो कथा सुहाई।।
- RCM 3.23.9Open verse →
लछिमन गए बनहिं जब लेन मूल फल कंद।
अर्थ · Hindi
लछिमन गए बनहिं जब लेन मूल फल कंद।
- RCM 3.23.10Open verse →
जनकसुता सन बोले बिहसि कृपा सुख बृंद।। 23।।
अर्थ · Hindi
जनकसुता सन बोले बिहसि कृपा सुख बृंद।। 23।।
- RCM 3.24.1Open verse →
सुनहु प्रिया ब्रत रुचिर सुसीला। मैं कछु करबि ललित नरलीला।।
अर्थ · Hindi
सुनहु प्रिया ब्रत रुचिर सुसीला। मैं कछु करबि ललित नरलीला।।
- RCM 3.24.2Open verse →
तुम्ह पावक महुँ करहु निवासा। जौ लगि करौं निसाचर नासा।।
अर्थ · Hindi
तुम्ह पावक महुँ करहु निवासा। जौ लगि करौं निसाचर नासा।।
- RCM 3.24.3Open verse →
जबहिं राम सब कहा बखानी। प्रभु पद धरि हियँ अनल समानी।।
अर्थ · Hindi
जबहिं राम सब कहा बखानी। प्रभु पद धरि हियँ अनल समानी।।
- RCM 3.24.4Open verse →
निज प्रतिबिंब राखि तहँ सीता। तैसइ सील रुप सुबिनीता।।
अर्थ · Hindi
निज प्रतिबिंब राखि तहँ सीता। तैसइ सील रुप सुबिनीता।।
- RCM 3.24.5Open verse →
लछिमनहूँ यह मरमु न जाना। जो कछु चरित रचा भगवाना।।
अर्थ · Hindi
लछिमनहूँ यह मरमु न जाना। जो कछु चरित रचा भगवाना।।
- RCM 3.24.6Open verse →
दसमुख गयउ जहाँ मारीचा। नाइ माथ स्वारथ रत नीचा।।
अर्थ · Hindi
दसमुख गयउ जहाँ मारीचा। नाइ माथ स्वारथ रत नीचा।।
- RCM 3.24.7Open verse →
नवनि नीच कै अति दुखदाई। जिमि अंकुस धनु उरग बिलाई।।
अर्थ · Hindi
नवनि नीच कै अति दुखदाई। जिमि अंकुस धनु उरग बिलाई।।
- RCM 3.24.8Open verse →
भयदायक खल कै प्रिय बानी। जिमि अकाल के कुसुम भवानी।।
अर्थ · Hindi
भयदायक खल कै प्रिय बानी। जिमि अकाल के कुसुम भवानी।।
- RCM 3.24.9Open verse →
करि पूजा मारीच तब सादर पूछी बात।
अर्थ · Hindi
करि पूजा मारीच तब सादर पूछी बात।
- RCM 3.24.10Open verse →
कवन हेतु मन ब्यग्र अति अकसर आयहु तात।।24।।
अर्थ · Hindi
कवन हेतु मन ब्यग्र अति अकसर आयहु तात।।24।।
- RCM 3.25.1Open verse →
दसमुख सकल कथा तेहि आगें। कही सहित अभिमान अभागें।।
अर्थ · Hindi
दसमुख सकल कथा तेहि आगें। कही सहित अभिमान अभागें।।
- RCM 3.25.2Open verse →
होहु कपट मृग तुम्ह छलकारी। जेहि बिधि हरि आनौ नृपनारी।।
अर्थ · Hindi
होहु कपट मृग तुम्ह छलकारी। जेहि बिधि हरि आनौ नृपनारी।।
- RCM 3.25.3Open verse →
तेहिं पुनि कहा सुनहु दससीसा। ते नररुप चराचर ईसा।।
अर्थ · Hindi
तेहिं पुनि कहा सुनहु दससीसा। ते नररुप चराचर ईसा।।
- RCM 3.25.4Open verse →
तासों तात बयरु नहिं कीजे। मारें मरिअ जिआएँ जीजै।।
अर्थ · Hindi
तासों तात बयरु नहिं कीजे। मारें मरिअ जिआएँ जीजै।।
- RCM 3.25.5Open verse →
मुनि मख राखन गयउ कुमारा। बिनु फर सर रघुपति मोहि मारा।।
अर्थ · Hindi
मुनि मख राखन गयउ कुमारा। बिनु फर सर रघुपति मोहि मारा।।
- RCM 3.25.6Open verse →
सत जोजन आयउँ छन माहीं। तिन्ह सन बयरु किएँ भल नाहीं।।
अर्थ · Hindi
सत जोजन आयउँ छन माहीं। तिन्ह सन बयरु किएँ भल नाहीं।।
- RCM 3.25.7Open verse →
भइ मम कीट भृंग की नाई। जहँ तहँ मैं देखउँ दोउ भाई।।
अर्थ · Hindi
भइ मम कीट भृंग की नाई। जहँ तहँ मैं देखउँ दोउ भाई।।
- RCM 3.25.8Open verse →
जौं नर तात तदपि अति सूरा। तिन्हहि बिरोधि न आइहि पूरा।।
अर्थ · Hindi
जौं नर तात तदपि अति सूरा। तिन्हहि बिरोधि न आइहि पूरा।।
- RCM 3.25.9Open verse →
जेहिं ताड़का सुबाहु हति खंडेउ हर कोदंड।।
अर्थ · Hindi
जेहिं ताड़का सुबाहु हति खंडेउ हर कोदंड।।
- RCM 3.25.10Open verse →
खर दूषन तिसिरा बधेउ मनुज कि अस बरिबंड।।25।।
अर्थ · Hindi
खर दूषन तिसिरा बधेउ मनुज कि अस बरिबंड।।25।।
- RCM 3.26.1Open verse →
जाहु भवन कुल कुसल बिचारी। सुनत जरा दीन्हिसि बहु गारी।।
अर्थ · Hindi
जाहु भवन कुल कुसल बिचारी। सुनत जरा दीन्हिसि बहु गारी।।
- RCM 3.26.2Open verse →
गुरु जिमि मूढ़ करसि मम बोधा। कहु जग मोहि समान को जोधा।।
अर्थ · Hindi
गुरु जिमि मूढ़ करसि मम बोधा। कहु जग मोहि समान को जोधा।।
- RCM 3.26.3Open verse →
तब मारीच हृदयँ अनुमाना। नवहि बिरोधें नहिं कल्याना।।
अर्थ · Hindi
तब मारीच हृदयँ अनुमाना। नवहि बिरोधें नहिं कल्याना।।
- RCM 3.26.4Open verse →
सस्त्री मर्मी प्रभु सठ धनी। बैद बंदि कबि भानस गुनी।।
अर्थ · Hindi
सस्त्री मर्मी प्रभु सठ धनी। बैद बंदि कबि भानस गुनी।।
- RCM 3.26.5Open verse →
उभय भाँति देखा निज मरना। तब ताकिसि रघुनायक सरना।।
अर्थ · Hindi
उभय भाँति देखा निज मरना। तब ताकिसि रघुनायक सरना।।
- RCM 3.26.6Open verse →
उतरु देत मोहि बधब अभागें। कस न मरौं रघुपति सर लागें।।
अर्थ · Hindi
उतरु देत मोहि बधब अभागें। कस न मरौं रघुपति सर लागें।।
- RCM 3.26.7Open verse →
अस जियँ जानि दसानन संगा। चला राम पद प्रेम अभंगा।।
अर्थ · Hindi
अस जियँ जानि दसानन संगा। चला राम पद प्रेम अभंगा।।
- RCM 3.26.8Open verse →
मन अति हरष जनाव न तेही। आजु देखिहउँ परम सनेही।।
अर्थ · Hindi
मन अति हरष जनाव न तेही। आजु देखिहउँ परम सनेही।।
- RCM 3.27.1Open verse →
तेहि बन निकट दसानन गयऊ। तब मारीच कपटमृग भयऊ।।
अर्थ · Hindi
तेहि बन निकट दसानन गयऊ। तब मारीच कपटमृग भयऊ।।
- RCM 3.27.2Open verse →
अति बिचित्र कछु बरनि न जाई। कनक देह मनि रचित बनाई।।
अर्थ · Hindi
अति बिचित्र कछु बरनि न जाई। कनक देह मनि रचित बनाई।।
- RCM 3.27.3Open verse →
सीता परम रुचिर मृग देखा। अंग अंग सुमनोहर बेषा।।
अर्थ · Hindi
सीता परम रुचिर मृग देखा। अंग अंग सुमनोहर बेषा।।
- RCM 3.27.4Open verse →
सुनहु देव रघुबीर कृपाला। एहि मृग कर अति सुंदर छाला।।
अर्थ · Hindi
सुनहु देव रघुबीर कृपाला। एहि मृग कर अति सुंदर छाला।।
- RCM 3.27.5Open verse →
सत्यसंध प्रभु बधि करि एही। आनहु चर्म कहति बैदेही।।
अर्थ · Hindi
सत्यसंध प्रभु बधि करि एही। आनहु चर्म कहति बैदेही।।
- RCM 3.27.6Open verse →
तब रघुपति जानत सब कारन। उठे हरषि सुर काजु सँवारन।।
अर्थ · Hindi
तब रघुपति जानत सब कारन। उठे हरषि सुर काजु सँवारन।।
- RCM 3.27.7Open verse →
मृग बिलोकि कटि परिकर बाँधा। करतल चाप रुचिर सर साँधा।।
अर्थ · Hindi
मृग बिलोकि कटि परिकर बाँधा। करतल चाप रुचिर सर साँधा।।
- RCM 3.27.8Open verse →
प्रभु लछिमनिहि कहा समुझाई। फिरत बिपिन निसिचर बहु भाई।।
अर्थ · Hindi
प्रभु लछिमनिहि कहा समुझाई। फिरत बिपिन निसिचर बहु भाई।।
- RCM 3.27.9Open verse →
सीता केरि करेहु रखवारी। बुधि बिबेक बल समय बिचारी।।
अर्थ · Hindi
सीता केरि करेहु रखवारी। बुधि बिबेक बल समय बिचारी।।
- RCM 3.27.10Open verse →
प्रभुहि बिलोकि चला मृग भाजी। धाए रामु सरासन साजी।।
अर्थ · Hindi
प्रभुहि बिलोकि चला मृग भाजी। धाए रामु सरासन साजी।।
- RCM 3.27.11Open verse →
निगम नेति सिव ध्यान न पावा। मायामृग पाछें सो धावा।।
अर्थ · Hindi
निगम नेति सिव ध्यान न पावा। मायामृग पाछें सो धावा।।
- RCM 3.27.12Open verse →
कबहुँ निकट पुनि दूरि पराई। कबहुँक प्रगटइ कबहुँ छपाई।।
अर्थ · Hindi
कबहुँ निकट पुनि दूरि पराई। कबहुँक प्रगटइ कबहुँ छपाई।।
- RCM 3.27.13Open verse →
प्रगटत दुरत करत छल भूरी। एहि बिधि प्रभुहि गयउ लै दूरी।।
अर्थ · Hindi
प्रगटत दुरत करत छल भूरी। एहि बिधि प्रभुहि गयउ लै दूरी।।
- RCM 3.27.14Open verse →
तब तकि राम कठिन सर मारा। धरनि परेउ करि घोर पुकारा।।
अर्थ · Hindi
तब तकि राम कठिन सर मारा। धरनि परेउ करि घोर पुकारा।।
- RCM 3.27.15Open verse →
लछिमन कर प्रथमहिं लै नामा। पाछें सुमिरेसि मन महुँ रामा।।
अर्थ · Hindi
लछिमन कर प्रथमहिं लै नामा। पाछें सुमिरेसि मन महुँ रामा।।
- RCM 3.27.16Open verse →
प्रान तजत प्रगटेसि निज देहा। सुमिरेसि रामु समेत सनेहा।।
अर्थ · Hindi
प्रान तजत प्रगटेसि निज देहा। सुमिरेसि रामु समेत सनेहा।।
- RCM 3.27.17Open verse →
अंतर प्रेम तासु पहिचाना। मुनि दुर्लभ गति दीन्हि सुजाना।।
अर्थ · Hindi
अंतर प्रेम तासु पहिचाना। मुनि दुर्लभ गति दीन्हि सुजाना।।
- RCM 3.27.18Open verse →
बिपुल सुमन सुर बरषहिं गावहिं प्रभु गुन गाथ।
अर्थ · Hindi
बिपुल सुमन सुर बरषहिं गावहिं प्रभु गुन गाथ।
- RCM 3.27.19Open verse →
निज पद दीन्ह असुर कहुँ दीनबंधु रघुनाथ।।27।।
अर्थ · Hindi
निज पद दीन्ह असुर कहुँ दीनबंधु रघुनाथ।।27।।
- RCM 3.28.1Open verse →
खल बधि तुरत फिरे रघुबीरा। सोह चाप कर कटि तूनीरा।।
अर्थ · Hindi
खल बधि तुरत फिरे रघुबीरा। सोह चाप कर कटि तूनीरा।।
- RCM 3.28.2Open verse →
आरत गिरा सुनी जब सीता। कह लछिमन सन परम सभीता।।
अर्थ · Hindi
आरत गिरा सुनी जब सीता। कह लछिमन सन परम सभीता।।
- RCM 3.28.3Open verse →
जाहु बेगि संकट अति भ्राता। लछिमन बिहसि कहा सुनु माता।।
अर्थ · Hindi
जाहु बेगि संकट अति भ्राता। लछिमन बिहसि कहा सुनु माता।।
- RCM 3.28.4Open verse →
भृकुटि बिलास सृष्टि लय होई। सपनेहुँ संकट परइ कि सोई।।
अर्थ · Hindi
भृकुटि बिलास सृष्टि लय होई। सपनेहुँ संकट परइ कि सोई।।
- RCM 3.28.5Open verse →
मरम बचन जब सीता बोला। हरि प्रेरित लछिमन मन डोला।।
अर्थ · Hindi
मरम बचन जब सीता बोला। हरि प्रेरित लछिमन मन डोला।।
- RCM 3.28.6Open verse →
बन दिसि देव सौंपि सब काहू। चले जहाँ रावन ससि राहू।।
अर्थ · Hindi
बन दिसि देव सौंपि सब काहू। चले जहाँ रावन ससि राहू।।
- RCM 3.28.7Open verse →
सून बीच दसकंधर देखा। आवा निकट जती कें बेषा।।
अर्थ · Hindi
सून बीच दसकंधर देखा। आवा निकट जती कें बेषा।।
- RCM 3.28.8Open verse →
जाकें डर सुर असुर डेराहीं। निसि न नीद दिन अन्न न खाहीं।।
अर्थ · Hindi
जाकें डर सुर असुर डेराहीं। निसि न नीद दिन अन्न न खाहीं।।
- RCM 3.28.9Open verse →
सो दससीस स्वान की नाई। इत उत चितइ चला भड़िहाई।।
अर्थ · Hindi
सो दससीस स्वान की नाई। इत उत चितइ चला भड़िहाई।।
- RCM 3.28.10Open verse →
इमि कुपंथ पग देत खगेसा। रह न तेज बुधि बल लेसा।।
अर्थ · Hindi
इमि कुपंथ पग देत खगेसा। रह न तेज बुधि बल लेसा।।
- RCM 3.28.11Open verse →
नाना बिधि करि कथा सुहाई। राजनीति भय प्रीति देखाई।।
अर्थ · Hindi
नाना बिधि करि कथा सुहाई। राजनीति भय प्रीति देखाई।।
- RCM 3.28.12Open verse →
कह सीता सुनु जती गोसाईं। बोलेहु बचन दुष्ट की नाईं।।
अर्थ · Hindi
कह सीता सुनु जती गोसाईं। बोलेहु बचन दुष्ट की नाईं।।
- RCM 3.28.13Open verse →
तब रावन निज रूप देखावा। भई सभय जब नाम सुनावा।।
अर्थ · Hindi
तब रावन निज रूप देखावा। भई सभय जब नाम सुनावा।।
- RCM 3.28.14Open verse →
कह सीता धरि धीरजु गाढ़ा। आइ गयउ प्रभु रहु खल ठाढ़ा।।
अर्थ · Hindi
कह सीता धरि धीरजु गाढ़ा। आइ गयउ प्रभु रहु खल ठाढ़ा।।
- RCM 3.28.15Open verse →
जिमि हरिबधुहि छुद्र सस चाहा। भएसि कालबस निसिचर नाहा।।
अर्थ · Hindi
जिमि हरिबधुहि छुद्र सस चाहा। भएसि कालबस निसिचर नाहा।।
- RCM 3.28.16Open verse →
सुनत बचन दससीस रिसाना। मन महुँ चरन बंदि सुख माना।।
अर्थ · Hindi
सुनत बचन दससीस रिसाना। मन महुँ चरन बंदि सुख माना।।
- RCM 3.28.17Open verse →
क्रोधवंत तब रावन लीन्हिसि रथ बैठाइ।
अर्थ · Hindi
क्रोधवंत तब रावन लीन्हिसि रथ बैठाइ।
- RCM 3.28.18Open verse →
चला गगनपथ आतुर भयँ रथ हाँकि न जाइ।।28।।
अर्थ · Hindi
चला गगनपथ आतुर भयँ रथ हाँकि न जाइ।।28।।
- RCM 3.29.1Open verse →
हा जग एक बीर रघुराया। केहिं अपराध बिसारेहु दाया।।
अर्थ · Hindi
हा जग एक बीर रघुराया। केहिं अपराध बिसारेहु दाया।।
- RCM 3.29.2Open verse →
आरति हरन सरन सुखदायक। हा रघुकुल सरोज दिननायक।।
अर्थ · Hindi
आरति हरन सरन सुखदायक। हा रघुकुल सरोज दिननायक।।
- RCM 3.29.3Open verse →
हा लछिमन तुम्हार नहिं दोसा। सो फलु पायउँ कीन्हेउँ रोसा।।
अर्थ · Hindi
हा लछिमन तुम्हार नहिं दोसा। सो फलु पायउँ कीन्हेउँ रोसा।।
- RCM 3.29.4Open verse →
बिबिध बिलाप करति बैदेही। भूरि कृपा प्रभु दूरि सनेही।।
अर्थ · Hindi
बिबिध बिलाप करति बैदेही। भूरि कृपा प्रभु दूरि सनेही।।
- RCM 3.29.5Open verse →
बिपति मोरि को प्रभुहि सुनावा। पुरोडास चह रासभ खावा।।
अर्थ · Hindi
बिपति मोरि को प्रभुहि सुनावा। पुरोडास चह रासभ खावा।।
- RCM 3.29.6Open verse →
सीता कै बिलाप सुनि भारी। भए चराचर जीव दुखारी।।
अर्थ · Hindi
सीता कै बिलाप सुनि भारी। भए चराचर जीव दुखारी।।
- RCM 3.29.7Open verse →
गीधराज सुनि आरत बानी। रघुकुलतिलक नारि पहिचानी।।
अर्थ · Hindi
गीधराज सुनि आरत बानी। रघुकुलतिलक नारि पहिचानी।।
- RCM 3.29.8Open verse →
अधम निसाचर लीन्हे जाई। जिमि मलेछ बस कपिला गाई।।
अर्थ · Hindi
अधम निसाचर लीन्हे जाई। जिमि मलेछ बस कपिला गाई।।
- RCM 3.29.9Open verse →
सीते पुत्रि करसि जनि त्रासा। करिहउँ जातुधान कर नासा।।
अर्थ · Hindi
सीते पुत्रि करसि जनि त्रासा। करिहउँ जातुधान कर नासा।।
- RCM 3.29.10Open verse →
धावा क्रोधवंत खग कैसें। छूटइ पबि परबत कहुँ जैसे।।
अर्थ · Hindi
धावा क्रोधवंत खग कैसें। छूटइ पबि परबत कहुँ जैसे।।
- RCM 3.29.11Open verse →
रे रे दुष्ट ठाढ़ किन होही। निर्भय चलेसि न जानेहि मोही।।
अर्थ · Hindi
रे रे दुष्ट ठाढ़ किन होही। निर्भय चलेसि न जानेहि मोही।।
- RCM 3.29.12Open verse →
आवत देखि कृतांत समाना। फिरि दसकंधर कर अनुमाना।।
अर्थ · Hindi
आवत देखि कृतांत समाना। फिरि दसकंधर कर अनुमाना।।
- RCM 3.29.13Open verse →
की मैनाक कि खगपति होई। मम बल जान सहित पति सोई।।
अर्थ · Hindi
की मैनाक कि खगपति होई। मम बल जान सहित पति सोई।।
- RCM 3.29.14Open verse →
जाना जरठ जटायू एहा। मम कर तीरथ छाँड़िहि देहा।।
अर्थ · Hindi
जाना जरठ जटायू एहा। मम कर तीरथ छाँड़िहि देहा।।
- RCM 3.29.15Open verse →
सुनत गीध क्रोधातुर धावा। कह सुनु रावन मोर सिखावा।।
अर्थ · Hindi
सुनत गीध क्रोधातुर धावा। कह सुनु रावन मोर सिखावा।।
- RCM 3.29.16Open verse →
तजि जानकिहि कुसल गृह जाहू। नाहिं त अस होइहि बहुबाहू।।
अर्थ · Hindi
तजि जानकिहि कुसल गृह जाहू। नाहिं त अस होइहि बहुबाहू।।
- RCM 3.29.17Open verse →
राम रोष पावक अति घोरा। होइहि सकल सलभ कुल तोरा।।
अर्थ · Hindi
राम रोष पावक अति घोरा। होइहि सकल सलभ कुल तोरा।।
- RCM 3.29.18Open verse →
उतरु न देत दसानन जोधा। तबहिं गीध धावा करि क्रोधा।।
अर्थ · Hindi
उतरु न देत दसानन जोधा। तबहिं गीध धावा करि क्रोधा।।
- RCM 3.29.19Open verse →
धरि कच बिरथ कीन्ह महि गिरा। सीतहि राखि गीध पुनि फिरा।।
अर्थ · Hindi
धरि कच बिरथ कीन्ह महि गिरा। सीतहि राखि गीध पुनि फिरा।।
- RCM 3.29.20Open verse →
चौचन्ह मारि बिदारेसि देही। दंड एक भइ मुरुछा तेही।।
अर्थ · Hindi
चौचन्ह मारि बिदारेसि देही। दंड एक भइ मुरुछा तेही।।
- RCM 3.29.21Open verse →
तब सक्रोध निसिचर खिसिआना। काढ़ेसि परम कराल कृपाना।।
अर्थ · Hindi
तब सक्रोध निसिचर खिसिआना। काढ़ेसि परम कराल कृपाना।।
- RCM 3.29.22Open verse →
काटेसि पंख परा खग धरनी। सुमिरि राम करि अदभुत करनी।।
अर्थ · Hindi
काटेसि पंख परा खग धरनी। सुमिरि राम करि अदभुत करनी।।
- RCM 3.29.23Open verse →
सीतहि जानि चढ़ाइ बहोरी। चला उताइल त्रास न थोरी।।
अर्थ · Hindi
सीतहि जानि चढ़ाइ बहोरी। चला उताइल त्रास न थोरी।।
- RCM 3.29.24Open verse →
करति बिलाप जाति नभ सीता। ब्याध बिबस जनु मृगी सभीता।।
अर्थ · Hindi
करति बिलाप जाति नभ सीता। ब्याध बिबस जनु मृगी सभीता।।
- RCM 3.29.25Open verse →
गिरि पर बैठे कपिन्ह निहारी। कहि हरि नाम दीन्ह पट डारी।।
अर्थ · Hindi
गिरि पर बैठे कपिन्ह निहारी। कहि हरि नाम दीन्ह पट डारी।।
- RCM 3.29.26Open verse →
एहि बिधि सीतहि सो लै गयऊ। बन असोक महँ राखत भयऊ।।
अर्थ · Hindi
एहि बिधि सीतहि सो लै गयऊ। बन असोक महँ राखत भयऊ।।
- RCM 3.29.27Open verse →
हारि परा खल बहु बिधि भय अरु प्रीति देखाइ।
अर्थ · Hindi
हारि परा खल बहु बिधि भय अरु प्रीति देखाइ।
- RCM 3.29.28Open verse →
तब असोक पादप तर राखिसि जतन कराइ।।29(क)।।
अर्थ · Hindi
तब असोक पादप तर राखिसि जतन कराइ।।29(क)।।
- RCM 3.29.29Open verse →
जेहि बिधि कपट कुरंग सँग धाइ चले श्रीराम।
अर्थ · Hindi
जेहि बिधि कपट कुरंग सँग धाइ चले श्रीराम।
- RCM 3.29.30Open verse →
सो छबि सीता राखि उर रटति रहति हरिनाम।।29(ख)।।
अर्थ · Hindi
सो छबि सीता राखि उर रटति रहति हरिनाम।।29(ख)।।
- RCM 3.30.1Open verse →
रघुपति अनुजहि आवत देखी। बाहिज चिंता कीन्हि बिसेषी।।
अर्थ · Hindi
रघुपति अनुजहि आवत देखी। बाहिज चिंता कीन्हि बिसेषी।।
- RCM 3.30.2Open verse →
जनकसुता परिहरिहु अकेली। आयहु तात बचन मम पेली।।
अर्थ · Hindi
जनकसुता परिहरिहु अकेली। आयहु तात बचन मम पेली।।
- RCM 3.30.3Open verse →
निसिचर निकर फिरहिं बन माहीं। मम मन सीता आश्रम नाहीं।।
अर्थ · Hindi
निसिचर निकर फिरहिं बन माहीं। मम मन सीता आश्रम नाहीं।।
- RCM 3.30.4Open verse →
गहि पद कमल अनुज कर जोरी। कहेउ नाथ कछु मोहि न खोरी।।
अर्थ · Hindi
गहि पद कमल अनुज कर जोरी। कहेउ नाथ कछु मोहि न खोरी।।
- RCM 3.30.5Open verse →
अनुज समेत गए प्रभु तहवाँ। गोदावरि तट आश्रम जहवाँ।।
अर्थ · Hindi
अनुज समेत गए प्रभु तहवाँ। गोदावरि तट आश्रम जहवाँ।।
- RCM 3.30.6Open verse →
आश्रम देखि जानकी हीना। भए बिकल जस प्राकृत दीना।।
अर्थ · Hindi
आश्रम देखि जानकी हीना। भए बिकल जस प्राकृत दीना।।
- RCM 3.30.7Open verse →
हा गुन खानि जानकी सीता। रूप सील ब्रत नेम पुनीता।।
अर्थ · Hindi
हा गुन खानि जानकी सीता। रूप सील ब्रत नेम पुनीता।।
- RCM 3.30.8Open verse →
लछिमन समुझाए बहु भाँती। पूछत चले लता तरु पाँती।।
अर्थ · Hindi
लछिमन समुझाए बहु भाँती। पूछत चले लता तरु पाँती।।
- RCM 3.30.9Open verse →
हे खग मृग हे मधुकर श्रेनी। तुम्ह देखी सीता मृगनैनी।।
अर्थ · Hindi
हे खग मृग हे मधुकर श्रेनी। तुम्ह देखी सीता मृगनैनी।।
- RCM 3.30.10Open verse →
खंजन सुक कपोत मृग मीना। मधुप निकर कोकिला प्रबीना।।
अर्थ · Hindi
खंजन सुक कपोत मृग मीना। मधुप निकर कोकिला प्रबीना।।
- RCM 3.30.11Open verse →
कुंद कली दाड़िम दामिनी। कमल सरद ससि अहिभामिनी।।
अर्थ · Hindi
कुंद कली दाड़िम दामिनी। कमल सरद ससि अहिभामिनी।।
- RCM 3.30.12Open verse →
बरुन पास मनोज धनु हंसा। गज केहरि निज सुनत प्रसंसा।।
अर्थ · Hindi
बरुन पास मनोज धनु हंसा। गज केहरि निज सुनत प्रसंसा।।
- RCM 3.30.13Open verse →
श्रीफल कनक कदलि हरषाहीं। नेकु न संक सकुच मन माहीं।।
अर्थ · Hindi
श्रीफल कनक कदलि हरषाहीं। नेकु न संक सकुच मन माहीं।।
- RCM 3.30.14Open verse →
सुनु जानकी तोहि बिनु आजू। हरषे सकल पाइ जनु राजू।।
अर्थ · Hindi
सुनु जानकी तोहि बिनु आजू। हरषे सकल पाइ जनु राजू।।
- RCM 3.30.15Open verse →
किमि सहि जात अनख तोहि पाहीं । प्रिया बेगि प्रगटसि कस नाहीं।।
अर्थ · Hindi
किमि सहि जात अनख तोहि पाहीं । प्रिया बेगि प्रगटसि कस नाहीं।।
- RCM 3.30.16Open verse →
एहि बिधि खौजत बिलपत स्वामी। मनहुँ महा बिरही अति कामी।।
अर्थ · Hindi
एहि बिधि खौजत बिलपत स्वामी। मनहुँ महा बिरही अति कामी।।
- RCM 3.30.17Open verse →
पूरनकाम राम सुख रासी। मनुज चरित कर अज अबिनासी।।
अर्थ · Hindi
पूरनकाम राम सुख रासी। मनुज चरित कर अज अबिनासी।।
- RCM 3.30.18Open verse →
आगे परा गीधपति देखा। सुमिरत राम चरन जिन्ह रेखा।।
अर्थ · Hindi
आगे परा गीधपति देखा। सुमिरत राम चरन जिन्ह रेखा।।
- RCM 3.30.19Open verse →
कर सरोज सिर परसेउ कृपासिंधु रधुबीर।।
अर्थ · Hindi
कर सरोज सिर परसेउ कृपासिंधु रधुबीर।।
- RCM 3.30.20Open verse →
निरखि राम छबि धाम मुख बिगत भई सब पीर।।30।।
अर्थ · Hindi
निरखि राम छबि धाम मुख बिगत भई सब पीर।।30।।
- RCM 3.31.1Open verse →
तब कह गीध बचन धरि धीरा । सुनहु राम भंजन भव भीरा।।
अर्थ · Hindi
तब कह गीध बचन धरि धीरा । सुनहु राम भंजन भव भीरा।।
- RCM 3.31.2Open verse →
नाथ दसानन यह गति कीन्ही। तेहि खल जनकसुता हरि लीन्ही।।
अर्थ · Hindi
नाथ दसानन यह गति कीन्ही। तेहि खल जनकसुता हरि लीन्ही।।
- RCM 3.31.3Open verse →
लै दच्छिन दिसि गयउ गोसाई। बिलपति अति कुररी की नाई।।
अर्थ · Hindi
लै दच्छिन दिसि गयउ गोसाई। बिलपति अति कुररी की नाई।।
- RCM 3.31.4Open verse →
दरस लागी प्रभु राखेंउँ प्राना। चलन चहत अब कृपानिधाना।।
अर्थ · Hindi
दरस लागी प्रभु राखेंउँ प्राना। चलन चहत अब कृपानिधाना।।
- RCM 3.31.5Open verse →
राम कहा तनु राखहु ताता। मुख मुसकाइ कही तेहिं बाता।।
अर्थ · Hindi
राम कहा तनु राखहु ताता। मुख मुसकाइ कही तेहिं बाता।।
- RCM 3.31.6Open verse →
जा कर नाम मरत मुख आवा। अधमउ मुकुत होई श्रुति गावा।।
अर्थ · Hindi
जा कर नाम मरत मुख आवा। अधमउ मुकुत होई श्रुति गावा।।
- RCM 3.31.7Open verse →
सो मम लोचन गोचर आगें। राखौं देह नाथ केहि खाँगें।।
अर्थ · Hindi
सो मम लोचन गोचर आगें। राखौं देह नाथ केहि खाँगें।।
- RCM 3.31.8Open verse →
जल भरि नयन कहहिं रघुराई। तात कर्म निज ते गतिं पाई।।
अर्थ · Hindi
जल भरि नयन कहहिं रघुराई। तात कर्म निज ते गतिं पाई।।
- RCM 3.31.9Open verse →
परहित बस जिन्ह के मन माहीं। तिन्ह कहुँ जग दुर्लभ कछु नाहीं।।
अर्थ · Hindi
परहित बस जिन्ह के मन माहीं। तिन्ह कहुँ जग दुर्लभ कछु नाहीं।।
- RCM 3.31.10Open verse →
तनु तजि तात जाहु मम धामा। देउँ काह तुम्ह पूरनकामा।।
अर्थ · Hindi
तनु तजि तात जाहु मम धामा। देउँ काह तुम्ह पूरनकामा।।
- RCM 3.31.11Open verse →
सीता हरन तात जनि कहहु पिता सन जाइ।।
अर्थ · Hindi
सीता हरन तात जनि कहहु पिता सन जाइ।।
- RCM 3.31.12Open verse →
जौं मैं राम त कुल सहित कहिहि दसानन आइ।।31।।
अर्थ · Hindi
जौं मैं राम त कुल सहित कहिहि दसानन आइ।।31।।
- RCM 3.32.1Open verse →
गीध देह तजि धरि हरि रुपा। भूषन बहु पट पीत अनूपा।।
अर्थ · Hindi
गीध देह तजि धरि हरि रुपा। भूषन बहु पट पीत अनूपा।।
- RCM 3.32.2Open verse →
स्याम गात बिसाल भुज चारी। अस्तुति करत नयन भरि बारी।।
अर्थ · Hindi
स्याम गात बिसाल भुज चारी। अस्तुति करत नयन भरि बारी।।
- RCM 3.33.1Open verse →
कोमल चित अति दीनदयाला। कारन बिनु रघुनाथ कृपाला।।
अर्थ · Hindi
कोमल चित अति दीनदयाला। कारन बिनु रघुनाथ कृपाला।।
- RCM 3.33.2Open verse →
गीध अधम खग आमिष भोगी। गति दीन्हि जो जाचत जोगी।।
अर्थ · Hindi
गीध अधम खग आमिष भोगी। गति दीन्हि जो जाचत जोगी।।
- RCM 3.33.3Open verse →
सुनहु उमा ते लोग अभागी। हरि तजि होहिं बिषय अनुरागी।।
अर्थ · Hindi
सुनहु उमा ते लोग अभागी। हरि तजि होहिं बिषय अनुरागी।।
- RCM 3.33.4Open verse →
पुनि सीतहि खोजत द्वौ भाई। चले बिलोकत बन बहुताई।।
अर्थ · Hindi
पुनि सीतहि खोजत द्वौ भाई। चले बिलोकत बन बहुताई।।
- RCM 3.33.5Open verse →
संकुल लता बिटप घन कानन। बहु खग मृग तहँ गज पंचानन।।
अर्थ · Hindi
संकुल लता बिटप घन कानन। बहु खग मृग तहँ गज पंचानन।।
- RCM 3.33.6Open verse →
आवत पंथ कबंध निपाता। तेहिं सब कही साप कै बाता।।
अर्थ · Hindi
आवत पंथ कबंध निपाता। तेहिं सब कही साप कै बाता।।
- RCM 3.33.7Open verse →
दुरबासा मोहि दीन्ही सापा। प्रभु पद पेखि मिटा सो पापा।।
अर्थ · Hindi
दुरबासा मोहि दीन्ही सापा। प्रभु पद पेखि मिटा सो पापा।।
- RCM 3.33.8Open verse →
सुनु गंधर्ब कहउँ मै तोही। मोहि न सोहाइ ब्रह्मकुल द्रोही।।
अर्थ · Hindi
सुनु गंधर्ब कहउँ मै तोही। मोहि न सोहाइ ब्रह्मकुल द्रोही।।
- RCM 3.33.9Open verse →
मन क्रम बचन कपट तजि जो कर भूसुर सेव।
अर्थ · Hindi
मन क्रम बचन कपट तजि जो कर भूसुर सेव।
- RCM 3.33.10Open verse →
मोहि समेत बिरंचि सिव बस ताकें सब देव।।33।।
अर्थ · Hindi
मोहि समेत बिरंचि सिव बस ताकें सब देव।।33।।
- RCM 3.34.1Open verse →
सापत ताड़त परुष कहंता। बिप्र पूज्य अस गावहिं संता।।
अर्थ · Hindi
सापत ताड़त परुष कहंता। बिप्र पूज्य अस गावहिं संता।।
- RCM 3.34.2Open verse →
पूजिअ बिप्र सील गुन हीना। सूद्र न गुन गन ग्यान प्रबीना।।
अर्थ · Hindi
पूजिअ बिप्र सील गुन हीना। सूद्र न गुन गन ग्यान प्रबीना।।
- RCM 3.34.3Open verse →
कहि निज धर्म ताहि समुझावा। निज पद प्रीति देखि मन भावा।।
अर्थ · Hindi
कहि निज धर्म ताहि समुझावा। निज पद प्रीति देखि मन भावा।।
- RCM 3.34.4Open verse →
रघुपति चरन कमल सिरु नाई। गयउ गगन आपनि गति पाई।।
अर्थ · Hindi
रघुपति चरन कमल सिरु नाई। गयउ गगन आपनि गति पाई।।
- RCM 3.34.5Open verse →
ताहि देइ गति राम उदारा। सबरी कें आश्रम पगु धारा।।
अर्थ · Hindi
ताहि देइ गति राम उदारा। सबरी कें आश्रम पगु धारा।।
- RCM 3.34.6Open verse →
सबरी देखि राम गृहँ आए। मुनि के बचन समुझि जियँ भाए।।
अर्थ · Hindi
सबरी देखि राम गृहँ आए। मुनि के बचन समुझि जियँ भाए।।
- RCM 3.34.7Open verse →
सरसिज लोचन बाहु बिसाला। जटा मुकुट सिर उर बनमाला।।
अर्थ · Hindi
सरसिज लोचन बाहु बिसाला। जटा मुकुट सिर उर बनमाला।।
- RCM 3.34.8Open verse →
स्याम गौर सुंदर दोउ भाई। सबरी परी चरन लपटाई।।
अर्थ · Hindi
स्याम गौर सुंदर दोउ भाई। सबरी परी चरन लपटाई।।
- RCM 3.34.9Open verse →
प्रेम मगन मुख बचन न आवा। पुनि पुनि पद सरोज सिर नावा।।
अर्थ · Hindi
प्रेम मगन मुख बचन न आवा। पुनि पुनि पद सरोज सिर नावा।।
- RCM 3.34.10Open verse →
सादर जल लै चरन पखारे। पुनि सुंदर आसन बैठारे।।
अर्थ · Hindi
सादर जल लै चरन पखारे। पुनि सुंदर आसन बैठारे।।
- RCM 3.34.11Open verse →
कंद मूल फल सुरस अति दिए राम कहुँ आनि।
अर्थ · Hindi
कंद मूल फल सुरस अति दिए राम कहुँ आनि।
- RCM 3.34.12Open verse →
प्रेम सहित प्रभु खाए बारंबार बखानि।।34।।
अर्थ · Hindi
प्रेम सहित प्रभु खाए बारंबार बखानि।।34।।
- RCM 3.35.1Open verse →
पानि जोरि आगें भइ ठाढ़ी। प्रभुहि बिलोकि प्रीति अति बाढ़ी।।
अर्थ · Hindi
पानि जोरि आगें भइ ठाढ़ी। प्रभुहि बिलोकि प्रीति अति बाढ़ी।।
- RCM 3.35.2Open verse →
केहि बिधि अस्तुति करौ तुम्हारी। अधम जाति मैं जड़मति भारी।।
अर्थ · Hindi
केहि बिधि अस्तुति करौ तुम्हारी। अधम जाति मैं जड़मति भारी।।
- RCM 3.35.3Open verse →
अधम ते अधम अधम अति नारी। तिन्ह महँ मैं मतिमंद अघारी।।
अर्थ · Hindi
अधम ते अधम अधम अति नारी। तिन्ह महँ मैं मतिमंद अघारी।।
- RCM 3.35.4Open verse →
कह रघुपति सुनु भामिनि बाता। मानउँ एक भगति कर नाता।।
अर्थ · Hindi
कह रघुपति सुनु भामिनि बाता। मानउँ एक भगति कर नाता।।
- RCM 3.35.5Open verse →
जाति पाँति कुल धर्म बड़ाई। धन बल परिजन गुन चतुराई।।
अर्थ · Hindi
जाति पाँति कुल धर्म बड़ाई। धन बल परिजन गुन चतुराई।।
- RCM 3.35.6Open verse →
भगति हीन नर सोहइ कैसा। बिनु जल बारिद देखिअ जैसा।।
अर्थ · Hindi
भगति हीन नर सोहइ कैसा। बिनु जल बारिद देखिअ जैसा।।
- RCM 3.35.7Open verse →
नवधा भगति कहउँ तोहि पाहीं। सावधान सुनु धरु मन माहीं।।
अर्थ · Hindi
नवधा भगति कहउँ तोहि पाहीं। सावधान सुनु धरु मन माहीं।।
- RCM 3.35.8Open verse →
प्रथम भगति संतन्ह कर संगा। दूसरि रति मम कथा प्रसंगा।।
अर्थ · Hindi
प्रथम भगति संतन्ह कर संगा। दूसरि रति मम कथा प्रसंगा।।
- RCM 3.35.9Open verse →
गुर पद पंकज सेवा तीसरि भगति अमान।
अर्थ · Hindi
गुर पद पंकज सेवा तीसरि भगति अमान।
- RCM 3.35.10Open verse →
चौथि भगति मम गुन गन करइ कपट तजि गान।।35।।
अर्थ · Hindi
चौथि भगति मम गुन गन करइ कपट तजि गान।।35।।
- RCM 3.36.1Open verse →
मंत्र जाप मम दृढ़ बिस्वासा। पंचम भजन सो बेद प्रकासा।।
अर्थ · Hindi
मंत्र जाप मम दृढ़ बिस्वासा। पंचम भजन सो बेद प्रकासा।।
- RCM 3.36.2Open verse →
छठ दम सील बिरति बहु करमा। निरत निरंतर सज्जन धरमा।।
अर्थ · Hindi
छठ दम सील बिरति बहु करमा। निरत निरंतर सज्जन धरमा।।
- RCM 3.36.3Open verse →
सातवँ सम मोहि मय जग देखा। मोतें संत अधिक करि लेखा।।
अर्थ · Hindi
सातवँ सम मोहि मय जग देखा। मोतें संत अधिक करि लेखा।।
- RCM 3.36.4Open verse →
आठवँ जथालाभ संतोषा। सपनेहुँ नहिं देखइ परदोषा।।
अर्थ · Hindi
आठवँ जथालाभ संतोषा। सपनेहुँ नहिं देखइ परदोषा।।
- RCM 3.36.5Open verse →
नवम सरल सब सन छलहीना। मम भरोस हियँ हरष न दीना।।
अर्थ · Hindi
नवम सरल सब सन छलहीना। मम भरोस हियँ हरष न दीना।।
- RCM 3.36.6Open verse →
नव महुँ एकउ जिन्ह के होई। नारि पुरुष सचराचर कोई।।
अर्थ · Hindi
नव महुँ एकउ जिन्ह के होई। नारि पुरुष सचराचर कोई।।
- RCM 3.36.7Open verse →
सोइ अतिसय प्रिय भामिनि मोरे। सकल प्रकार भगति दृढ़ तोरें।।
अर्थ · Hindi
सोइ अतिसय प्रिय भामिनि मोरे। सकल प्रकार भगति दृढ़ तोरें।।
- RCM 3.36.8Open verse →
जोगि बृंद दुरलभ गति जोई। तो कहुँ आजु सुलभ भइ सोई।।
अर्थ · Hindi
जोगि बृंद दुरलभ गति जोई। तो कहुँ आजु सुलभ भइ सोई।।
- RCM 3.36.9Open verse →
मम दरसन फल परम अनूपा। जीव पाव निज सहज सरूपा।।
अर्थ · Hindi
मम दरसन फल परम अनूपा। जीव पाव निज सहज सरूपा।।
- RCM 3.36.10Open verse →
जनकसुता कइ सुधि भामिनी। जानहि कहु करिबरगामिनी।।
अर्थ · Hindi
जनकसुता कइ सुधि भामिनी। जानहि कहु करिबरगामिनी।।
- RCM 3.36.11Open verse →
पंपा सरहि जाहु रघुराई। तहँ होइहि सुग्रीव मिताई।।
अर्थ · Hindi
पंपा सरहि जाहु रघुराई। तहँ होइहि सुग्रीव मिताई।।
- RCM 3.36.12Open verse →
सो सब कहिहि देव रघुबीरा। जानतहूँ पूछहु मतिधीरा।।
अर्थ · Hindi
सो सब कहिहि देव रघुबीरा। जानतहूँ पूछहु मतिधीरा।।
- RCM 3.36.13Open verse →
बार बार प्रभु पद सिरु नाई। प्रेम सहित सब कथा सुनाई।।
अर्थ · Hindi
बार बार प्रभु पद सिरु नाई। प्रेम सहित सब कथा सुनाई।।
- RCM 3.37.1Open verse →
चले राम त्यागा बन सोऊ। अतुलित बल नर केहरि दोऊ।।
अर्थ · Hindi
चले राम त्यागा बन सोऊ। अतुलित बल नर केहरि दोऊ।।
- RCM 3.37.2Open verse →
बिरही इव प्रभु करत बिषादा। कहत कथा अनेक संबादा।।
अर्थ · Hindi
बिरही इव प्रभु करत बिषादा। कहत कथा अनेक संबादा।।
- RCM 3.37.3Open verse →
लछिमन देखु बिपिन कइ सोभा। देखत केहि कर मन नहिं छोभा।।
अर्थ · Hindi
लछिमन देखु बिपिन कइ सोभा। देखत केहि कर मन नहिं छोभा।।
- RCM 3.37.4Open verse →
नारि सहित सब खग मृग बृंदा। मानहुँ मोरि करत हहिं निंदा।।
अर्थ · Hindi
नारि सहित सब खग मृग बृंदा। मानहुँ मोरि करत हहिं निंदा।।
- RCM 3.37.5Open verse →
हमहि देखि मृग निकर पराहीं। मृगीं कहहिं तुम्ह कहँ भय नाहीं।।
अर्थ · Hindi
हमहि देखि मृग निकर पराहीं। मृगीं कहहिं तुम्ह कहँ भय नाहीं।।
- RCM 3.37.6Open verse →
तुम्ह आनंद करहु मृग जाए। कंचन मृग खोजन ए आए।।
अर्थ · Hindi
तुम्ह आनंद करहु मृग जाए। कंचन मृग खोजन ए आए।।
- RCM 3.37.7Open verse →
संग लाइ करिनीं करि लेहीं। मानहुँ मोहि सिखावनु देहीं।।
अर्थ · Hindi
संग लाइ करिनीं करि लेहीं। मानहुँ मोहि सिखावनु देहीं।।
- RCM 3.37.8Open verse →
सास्त्र सुचिंतित पुनि पुनि देखिअ। भूप सुसेवित बस नहिं लेखिअ।।
अर्थ · Hindi
सास्त्र सुचिंतित पुनि पुनि देखिअ। भूप सुसेवित बस नहिं लेखिअ।।
- RCM 3.37.9Open verse →
राखिअ नारि जदपि उर माहीं। जुबती सास्त्र नृपति बस नाहीं।।
अर्थ · Hindi
राखिअ नारि जदपि उर माहीं। जुबती सास्त्र नृपति बस नाहीं।।
- RCM 3.37.10Open verse →
देखहु तात बसंत सुहावा। प्रिया हीन मोहि भय उपजावा।।
अर्थ · Hindi
देखहु तात बसंत सुहावा। प्रिया हीन मोहि भय उपजावा।।
- RCM 3.37.11Open verse →
बिरह बिकल बलहीन मोहि जानेसि निपट अकेल।
अर्थ · Hindi
बिरह बिकल बलहीन मोहि जानेसि निपट अकेल।
- RCM 3.37.12Open verse →
सहित बिपिन मधुकर खग मदन कीन्ह बगमेल।।37(क)।।
अर्थ · Hindi
सहित बिपिन मधुकर खग मदन कीन्ह बगमेल।।37(क)।।
- RCM 3.37.13Open verse →
देखि गयउ भ्राता सहित तासु दूत सुनि बात।
अर्थ · Hindi
देखि गयउ भ्राता सहित तासु दूत सुनि बात।
- RCM 3.37.14Open verse →
डेरा कीन्हेउ मनहुँ तब कटकु हटकि मनजात।।37(ख)।।
अर्थ · Hindi
डेरा कीन्हेउ मनहुँ तब कटकु हटकि मनजात।।37(ख)।।
- RCM 3.38.1Open verse →
बिटप बिसाल लता अरुझानी। बिबिध बितान दिए जनु तानी।।
अर्थ · Hindi
बिटप बिसाल लता अरुझानी। बिबिध बितान दिए जनु तानी।।
- RCM 3.38.2Open verse →
कदलि ताल बर धुजा पताका। दैखि न मोह धीर मन जाका।।
अर्थ · Hindi
कदलि ताल बर धुजा पताका। दैखि न मोह धीर मन जाका।।
- RCM 3.38.3Open verse →
बिबिध भाँति फूले तरु नाना। जनु बानैत बने बहु बाना।।
अर्थ · Hindi
बिबिध भाँति फूले तरु नाना। जनु बानैत बने बहु बाना।।
- RCM 3.38.4Open verse →
कहुँ कहुँ सुन्दर बिटप सुहाए। जनु भट बिलग बिलग होइ छाए।।
अर्थ · Hindi
कहुँ कहुँ सुन्दर बिटप सुहाए। जनु भट बिलग बिलग होइ छाए।।
- RCM 3.38.5Open verse →
कूजत पिक मानहुँ गज माते। ढेक महोख ऊँट बिसराते।।
अर्थ · Hindi
कूजत पिक मानहुँ गज माते। ढेक महोख ऊँट बिसराते।।
- RCM 3.38.6Open verse →
मोर चकोर कीर बर बाजी। पारावत मराल सब ताजी।।
अर्थ · Hindi
मोर चकोर कीर बर बाजी। पारावत मराल सब ताजी।।
- RCM 3.38.7Open verse →
तीतिर लावक पदचर जूथा। बरनि न जाइ मनोज बरुथा।।
अर्थ · Hindi
तीतिर लावक पदचर जूथा। बरनि न जाइ मनोज बरुथा।।
- RCM 3.38.8Open verse →
रथ गिरि सिला दुंदुभी झरना। चातक बंदी गुन गन बरना।।
अर्थ · Hindi
रथ गिरि सिला दुंदुभी झरना। चातक बंदी गुन गन बरना।।
- RCM 3.38.9Open verse →
मधुकर मुखर भेरि सहनाई। त्रिबिध बयारि बसीठीं आई।।
अर्थ · Hindi
मधुकर मुखर भेरि सहनाई। त्रिबिध बयारि बसीठीं आई।।
- RCM 3.38.10Open verse →
चतुरंगिनी सेन सँग लीन्हें। बिचरत सबहि चुनौती दीन्हें।।
अर्थ · Hindi
चतुरंगिनी सेन सँग लीन्हें। बिचरत सबहि चुनौती दीन्हें।।
- RCM 3.38.11Open verse →
लछिमन देखत काम अनीका। रहहिं धीर तिन्ह कै जग लीका।।
अर्थ · Hindi
लछिमन देखत काम अनीका। रहहिं धीर तिन्ह कै जग लीका।।
- RCM 3.38.12Open verse →
एहि कें एक परम बल नारी। तेहि तें उबर सुभट सोइ भारी।।
अर्थ · Hindi
एहि कें एक परम बल नारी। तेहि तें उबर सुभट सोइ भारी।।
- RCM 3.38.13Open verse →
तात तीनि अति प्रबल खल काम क्रोध अरु लोभ।
अर्थ · Hindi
तात तीनि अति प्रबल खल काम क्रोध अरु लोभ।
- RCM 3.38.14Open verse →
मुनि बिग्यान धाम मन करहिं निमिष महुँ छोभ।।38(क)।।
अर्थ · Hindi
मुनि बिग्यान धाम मन करहिं निमिष महुँ छोभ।।38(क)।।
- RCM 3.38.15Open verse →
लोभ कें इच्छा दंभ बल काम कें केवल नारि।
अर्थ · Hindi
लोभ कें इच्छा दंभ बल काम कें केवल नारि।
- RCM 3.38.16Open verse →
क्रोध के परुष बचन बल मुनिबर कहहिं बिचारि।।38(ख)।।
अर्थ · Hindi
क्रोध के परुष बचन बल मुनिबर कहहिं बिचारि।।38(ख)।।
- RCM 3.39.1Open verse →
गुनातीत सचराचर स्वामी। राम उमा सब अंतरजामी।।
अर्थ · Hindi
गुनातीत सचराचर स्वामी। राम उमा सब अंतरजामी।।
- RCM 3.39.2Open verse →
कामिन्ह कै दीनता देखाई। धीरन्ह कें मन बिरति दृढ़ाई।।
अर्थ · Hindi
कामिन्ह कै दीनता देखाई। धीरन्ह कें मन बिरति दृढ़ाई।।
- RCM 3.39.3Open verse →
क्रोध मनोज लोभ मद माया। छूटहिं सकल राम कीं दाया।।
अर्थ · Hindi
क्रोध मनोज लोभ मद माया। छूटहिं सकल राम कीं दाया।।
- RCM 3.39.4Open verse →
सो नर इंद्रजाल नहिं भूला। जा पर होइ सो नट अनुकूला।।
अर्थ · Hindi
सो नर इंद्रजाल नहिं भूला। जा पर होइ सो नट अनुकूला।।
- RCM 3.39.5Open verse →
उमा कहउँ मैं अनुभव अपना। सत हरि भजनु जगत सब सपना।।
अर्थ · Hindi
उमा कहउँ मैं अनुभव अपना। सत हरि भजनु जगत सब सपना।।
- RCM 3.39.6Open verse →
पुनि प्रभु गए सरोबर तीरा। पंपा नाम सुभग गंभीरा।।
अर्थ · Hindi
पुनि प्रभु गए सरोबर तीरा। पंपा नाम सुभग गंभीरा।।
- RCM 3.39.7Open verse →
संत हृदय जस निर्मल बारी। बाँधे घाट मनोहर चारी।।
अर्थ · Hindi
संत हृदय जस निर्मल बारी। बाँधे घाट मनोहर चारी।।
- RCM 3.39.8Open verse →
जहँ तहँ पिअहिं बिबिध मृग नीरा। जनु उदार गृह जाचक भीरा।।
अर्थ · Hindi
जहँ तहँ पिअहिं बिबिध मृग नीरा। जनु उदार गृह जाचक भीरा।।
- RCM 3.39.9Open verse →
पुरइनि सबन ओट जल बेगि न पाइअ मर्म।
अर्थ · Hindi
पुरइनि सबन ओट जल बेगि न पाइअ मर्म।
- RCM 3.39.10Open verse →
मायाछन्न न देखिऐ जैसे निर्गुन ब्रह्म।।39(क)।।
अर्थ · Hindi
मायाछन्न न देखिऐ जैसे निर्गुन ब्रह्म।।39(क)।।
- RCM 3.39.11Open verse →
सुखि मीन सब एकरस अति अगाध जल माहिं।
अर्थ · Hindi
सुखि मीन सब एकरस अति अगाध जल माहिं।
- RCM 3.39.12Open verse →
जथा धर्मसीलन्ह के दिन सुख संजुत जाहिं।।39(ख)।।
अर्थ · Hindi
जथा धर्मसीलन्ह के दिन सुख संजुत जाहिं।।39(ख)।।
- RCM 3.40.1Open verse →
बिकसे सरसिज नाना रंगा। मधुर मुखर गुंजत बहु भृंगा।।
अर्थ · Hindi
बिकसे सरसिज नाना रंगा। मधुर मुखर गुंजत बहु भृंगा।।
- RCM 3.40.2Open verse →
बोलत जलकुक्कुट कलहंसा। प्रभु बिलोकि जनु करत प्रसंसा।।
अर्थ · Hindi
बोलत जलकुक्कुट कलहंसा। प्रभु बिलोकि जनु करत प्रसंसा।।
- RCM 3.40.3Open verse →
चक्रवाक बक खग समुदाई। देखत बनइ बरनि नहिं जाई।।
अर्थ · Hindi
चक्रवाक बक खग समुदाई। देखत बनइ बरनि नहिं जाई।।
- RCM 3.40.4Open verse →
सुन्दर खग गन गिरा सुहाई। जात पथिक जनु लेत बोलाई।।
अर्थ · Hindi
सुन्दर खग गन गिरा सुहाई। जात पथिक जनु लेत बोलाई।।
- RCM 3.40.5Open verse →
ताल समीप मुनिन्ह गृह छाए। चहु दिसि कानन बिटप सुहाए।।
अर्थ · Hindi
ताल समीप मुनिन्ह गृह छाए। चहु दिसि कानन बिटप सुहाए।।
- RCM 3.40.6Open verse →
चंपक बकुल कदंब तमाला। पाटल पनस परास रसाला।।
अर्थ · Hindi
चंपक बकुल कदंब तमाला। पाटल पनस परास रसाला।।
- RCM 3.40.7Open verse →
नव पल्लव कुसुमित तरु नाना। चंचरीक पटली कर गाना।।
अर्थ · Hindi
नव पल्लव कुसुमित तरु नाना। चंचरीक पटली कर गाना।।
- RCM 3.40.8Open verse →
सीतल मंद सुगंध सुभाऊ। संतत बहइ मनोहर बाऊ।।
अर्थ · Hindi
सीतल मंद सुगंध सुभाऊ। संतत बहइ मनोहर बाऊ।।
- RCM 3.40.9Open verse →
कुहू कुहू कोकिल धुनि करहीं। सुनि रव सरस ध्यान मुनि टरहीं।।
अर्थ · Hindi
कुहू कुहू कोकिल धुनि करहीं। सुनि रव सरस ध्यान मुनि टरहीं।।
- RCM 3.40.10Open verse →
फल भारन नमि बिटप सब रहे भूमि निअराइ।
अर्थ · Hindi
फल भारन नमि बिटप सब रहे भूमि निअराइ।
- RCM 3.40.11Open verse →
पर उपकारी पुरुष जिमि नवहिं सुसंपति पाइ।।40।।
अर्थ · Hindi
पर उपकारी पुरुष जिमि नवहिं सुसंपति पाइ।।40।।
- RCM 3.41.1Open verse →
देखि राम अति रुचिर तलावा। मज्जनु कीन्ह परम सुख पावा।।
अर्थ · Hindi
देखि राम अति रुचिर तलावा। मज्जनु कीन्ह परम सुख पावा।।
- RCM 3.41.2Open verse →
देखी सुंदर तरुबर छाया। बैठे अनुज सहित रघुराया।।
अर्थ · Hindi
देखी सुंदर तरुबर छाया। बैठे अनुज सहित रघुराया।।
- RCM 3.41.3Open verse →
तहँ पुनि सकल देव मुनि आए। अस्तुति करि निज धाम सिधाए।।
अर्थ · Hindi
तहँ पुनि सकल देव मुनि आए। अस्तुति करि निज धाम सिधाए।।
- RCM 3.41.4Open verse →
बैठे परम प्रसन्न कृपाला। कहत अनुज सन कथा रसाला।।
अर्थ · Hindi
बैठे परम प्रसन्न कृपाला। कहत अनुज सन कथा रसाला।।
- RCM 3.41.5Open verse →
बिरहवंत भगवंतहि देखी। नारद मन भा सोच बिसेषी।।
अर्थ · Hindi
बिरहवंत भगवंतहि देखी। नारद मन भा सोच बिसेषी।।
- RCM 3.41.6Open verse →
मोर साप करि अंगीकारा। सहत राम नाना दुख भारा।।
अर्थ · Hindi
मोर साप करि अंगीकारा। सहत राम नाना दुख भारा।।
- RCM 3.41.7Open verse →
ऐसे प्रभुहि बिलोकउँ जाई। पुनि न बनिहि अस अवसरु आई।।
अर्थ · Hindi
ऐसे प्रभुहि बिलोकउँ जाई। पुनि न बनिहि अस अवसरु आई।।
- RCM 3.41.8Open verse →
यह बिचारि नारद कर बीना। गए जहाँ प्रभु सुख आसीना।।
अर्थ · Hindi
यह बिचारि नारद कर बीना। गए जहाँ प्रभु सुख आसीना।।
- RCM 3.41.9Open verse →
गावत राम चरित मृदु बानी। प्रेम सहित बहु भाँति बखानी।।
अर्थ · Hindi
गावत राम चरित मृदु बानी। प्रेम सहित बहु भाँति बखानी।।
- RCM 3.41.10Open verse →
करत दंडवत लिए उठाई। राखे बहुत बार उर लाई।।
अर्थ · Hindi
करत दंडवत लिए उठाई। राखे बहुत बार उर लाई।।
- RCM 3.41.11Open verse →
स्वागत पूँछि निकट बैठारे। लछिमन सादर चरन पखारे।।
अर्थ · Hindi
स्वागत पूँछि निकट बैठारे। लछिमन सादर चरन पखारे।।
- RCM 3.41.12Open verse →
नाना बिधि बिनती करि प्रभु प्रसन्न जियँ जानि।
अर्थ · Hindi
नाना बिधि बिनती करि प्रभु प्रसन्न जियँ जानि।
- RCM 3.41.13Open verse →
नारद बोले बचन तब जोरि सरोरुह पानि।।41।।
अर्थ · Hindi
नारद बोले बचन तब जोरि सरोरुह पानि।।41।।
- RCM 3.42.1Open verse →
सुनहु उदार सहज रघुनायक। सुंदर अगम सुगम बर दायक।।
अर्थ · Hindi
सुनहु उदार सहज रघुनायक। सुंदर अगम सुगम बर दायक।।
- RCM 3.42.2Open verse →
देहु एक बर मागउँ स्वामी। जद्यपि जानत अंतरजामी।।
अर्थ · Hindi
देहु एक बर मागउँ स्वामी। जद्यपि जानत अंतरजामी।।
- RCM 3.42.3Open verse →
जानहु मुनि तुम्ह मोर सुभाऊ। जन सन कबहुँ कि करउँ दुराऊ।।
अर्थ · Hindi
जानहु मुनि तुम्ह मोर सुभाऊ। जन सन कबहुँ कि करउँ दुराऊ।।
- RCM 3.42.4Open verse →
कवन बस्तु असि प्रिय मोहि लागी। जो मुनिबर न सकहु तुम्ह मागी।।
अर्थ · Hindi
कवन बस्तु असि प्रिय मोहि लागी। जो मुनिबर न सकहु तुम्ह मागी।।
- RCM 3.42.5Open verse →
जन कहुँ कछु अदेय नहिं मोरें। अस बिस्वास तजहु जनि भोरें।।
अर्थ · Hindi
जन कहुँ कछु अदेय नहिं मोरें। अस बिस्वास तजहु जनि भोरें।।
- RCM 3.42.6Open verse →
तब नारद बोले हरषाई । अस बर मागउँ करउँ ढिठाई।।
अर्थ · Hindi
तब नारद बोले हरषाई । अस बर मागउँ करउँ ढिठाई।।
- RCM 3.42.7Open verse →
जद्यपि प्रभु के नाम अनेका। श्रुति कह अधिक एक तें एका।।
अर्थ · Hindi
जद्यपि प्रभु के नाम अनेका। श्रुति कह अधिक एक तें एका।।
- RCM 3.42.8Open verse →
राम सकल नामन्ह ते अधिका। होउ नाथ अघ खग गन बधिका।।
अर्थ · Hindi
राम सकल नामन्ह ते अधिका। होउ नाथ अघ खग गन बधिका।।
- RCM 3.42.9Open verse →
राका रजनी भगति तव राम नाम सोइ सोम।
अर्थ · Hindi
राका रजनी भगति तव राम नाम सोइ सोम।
- RCM 3.42.10Open verse →
अपर नाम उडगन बिमल बसुहुँ भगत उर ब्योम।।42(क)।।
अर्थ · Hindi
अपर नाम उडगन बिमल बसुहुँ भगत उर ब्योम।।42(क)।।
- RCM 3.42.11Open verse →
एवमस्तु मुनि सन कहेउ कृपासिंधु रघुनाथ।
अर्थ · Hindi
एवमस्तु मुनि सन कहेउ कृपासिंधु रघुनाथ।
- RCM 3.42.12Open verse →
तब नारद मन हरष अति प्रभु पद नायउ माथ।।42(ख)।।
अर्थ · Hindi
तब नारद मन हरष अति प्रभु पद नायउ माथ।।42(ख)।।
- RCM 3.43.1Open verse →
अति प्रसन्न रघुनाथहि जानी। पुनि नारद बोले मृदु बानी।।
अर्थ · Hindi
अति प्रसन्न रघुनाथहि जानी। पुनि नारद बोले मृदु बानी।।
- RCM 3.43.2Open verse →
राम जबहिं प्रेरेउ निज माया। मोहेहु मोहि सुनहु रघुराया।।
अर्थ · Hindi
राम जबहिं प्रेरेउ निज माया। मोहेहु मोहि सुनहु रघुराया।।
- RCM 3.43.3Open verse →
तब बिबाह मैं चाहउँ कीन्हा। प्रभु केहि कारन करै न दीन्हा।।
अर्थ · Hindi
तब बिबाह मैं चाहउँ कीन्हा। प्रभु केहि कारन करै न दीन्हा।।
- RCM 3.43.4Open verse →
सुनु मुनि तोहि कहउँ सहरोसा। भजहिं जे मोहि तजि सकल भरोसा।।
अर्थ · Hindi
सुनु मुनि तोहि कहउँ सहरोसा। भजहिं जे मोहि तजि सकल भरोसा।।
- RCM 3.43.5Open verse →
करउँ सदा तिन्ह कै रखवारी। जिमि बालक राखइ महतारी।।
अर्थ · Hindi
करउँ सदा तिन्ह कै रखवारी। जिमि बालक राखइ महतारी।।
- RCM 3.43.6Open verse →
गह सिसु बच्छ अनल अहि धाई। तहँ राखइ जननी अरगाई।।
अर्थ · Hindi
गह सिसु बच्छ अनल अहि धाई। तहँ राखइ जननी अरगाई।।
- RCM 3.43.7Open verse →
प्रौढ़ भएँ तेहि सुत पर माता। प्रीति करइ नहिं पाछिलि बाता।।
अर्थ · Hindi
प्रौढ़ भएँ तेहि सुत पर माता। प्रीति करइ नहिं पाछिलि बाता।।
- RCM 3.43.8Open verse →
मोरे प्रौढ़ तनय सम ग्यानी। बालक सुत सम दास अमानी।।
अर्थ · Hindi
मोरे प्रौढ़ तनय सम ग्यानी। बालक सुत सम दास अमानी।।
- RCM 3.43.9Open verse →
जनहि मोर बल निज बल ताही। दुहु कहँ काम क्रोध रिपु आही।।
अर्थ · Hindi
जनहि मोर बल निज बल ताही। दुहु कहँ काम क्रोध रिपु आही।।
- RCM 3.43.10Open verse →
यह बिचारि पंडित मोहि भजहीं। पाएहुँ ग्यान भगति नहिं तजहीं।।
अर्थ · Hindi
यह बिचारि पंडित मोहि भजहीं। पाएहुँ ग्यान भगति नहिं तजहीं।।
- RCM 3.43.11Open verse →
काम क्रोध लोभादि मद प्रबल मोह कै धारि।
अर्थ · Hindi
काम क्रोध लोभादि मद प्रबल मोह कै धारि।
- RCM 3.43.12Open verse →
तिन्ह महँ अति दारुन दुखद मायारूपी नारि।।43।।
अर्थ · Hindi
तिन्ह महँ अति दारुन दुखद मायारूपी नारि।।43।।
- RCM 3.44.1Open verse →
सुनि मुनि कह पुरान श्रुति संता। मोह बिपिन कहुँ नारि बसंता।।
अर्थ · Hindi
सुनि मुनि कह पुरान श्रुति संता। मोह बिपिन कहुँ नारि बसंता।।
- RCM 3.44.2Open verse →
जप तप नेम जलाश्रय झारी। होइ ग्रीषम सोषइ सब नारी।।
अर्थ · Hindi
जप तप नेम जलाश्रय झारी। होइ ग्रीषम सोषइ सब नारी।।
- RCM 3.44.3Open verse →
काम क्रोध मद मत्सर भेका। इन्हहि हरषप्रद बरषा एका।।
अर्थ · Hindi
काम क्रोध मद मत्सर भेका। इन्हहि हरषप्रद बरषा एका।।
- RCM 3.44.4Open verse →
दुर्बासना कुमुद समुदाई। तिन्ह कहँ सरद सदा सुखदाई।।
अर्थ · Hindi
दुर्बासना कुमुद समुदाई। तिन्ह कहँ सरद सदा सुखदाई।।
- RCM 3.44.5Open verse →
धर्म सकल सरसीरुह बृंदा। होइ हिम तिन्हहि दहइ सुख मंदा।।
अर्थ · Hindi
धर्म सकल सरसीरुह बृंदा। होइ हिम तिन्हहि दहइ सुख मंदा।।
- RCM 3.44.6Open verse →
पुनि ममता जवास बहुताई। पलुहइ नारि सिसिर रितु पाई।।
अर्थ · Hindi
पुनि ममता जवास बहुताई। पलुहइ नारि सिसिर रितु पाई।।
- RCM 3.44.7Open verse →
पाप उलूक निकर सुखकारी। नारि निबिड़ रजनी अँधिआरी।।
अर्थ · Hindi
पाप उलूक निकर सुखकारी। नारि निबिड़ रजनी अँधिआरी।।
- RCM 3.44.8Open verse →
बुधि बल सील सत्य सब मीना। बनसी सम त्रिय कहहिं प्रबीना।।
अर्थ · Hindi
बुधि बल सील सत्य सब मीना। बनसी सम त्रिय कहहिं प्रबीना।।
- RCM 3.44.9Open verse →
अवगुन मूल सूलप्रद प्रमदा सब दुख खानि।
अर्थ · Hindi
अवगुन मूल सूलप्रद प्रमदा सब दुख खानि।
- RCM 3.44.10Open verse →
ताते कीन्ह निवारन मुनि मैं यह जियँ जानि।।44।।
अर्थ · Hindi
ताते कीन्ह निवारन मुनि मैं यह जियँ जानि।।44।।
- RCM 3.45.1Open verse →
सुनि रघुपति के बचन सुहाए। मुनि तन पुलक नयन भरि आए।।
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सुनि रघुपति के बचन सुहाए। मुनि तन पुलक नयन भरि आए।।
- RCM 3.45.2Open verse →
कहहु कवन प्रभु कै असि रीती। सेवक पर ममता अरु प्रीती।।
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कहहु कवन प्रभु कै असि रीती। सेवक पर ममता अरु प्रीती।।
- RCM 3.45.3Open verse →
जे न भजहिं अस प्रभु भ्रम त्यागी। ग्यान रंक नर मंद अभागी।।
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जे न भजहिं अस प्रभु भ्रम त्यागी। ग्यान रंक नर मंद अभागी।।
- RCM 3.45.4Open verse →
पुनि सादर बोले मुनि नारद। सुनहु राम बिग्यान बिसारद।।
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पुनि सादर बोले मुनि नारद। सुनहु राम बिग्यान बिसारद।।
- RCM 3.45.5Open verse →
संतन्ह के लच्छन रघुबीरा। कहहु नाथ भव भंजन भीरा।।
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संतन्ह के लच्छन रघुबीरा। कहहु नाथ भव भंजन भीरा।।
- RCM 3.45.6Open verse →
सुनु मुनि संतन्ह के गुन कहऊँ। जिन्ह ते मैं उन्ह कें बस रहऊँ।।
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सुनु मुनि संतन्ह के गुन कहऊँ। जिन्ह ते मैं उन्ह कें बस रहऊँ।।
- RCM 3.45.7Open verse →
षट बिकार जित अनघ अकामा। अचल अकिंचन सुचि सुखधामा।।
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षट बिकार जित अनघ अकामा। अचल अकिंचन सुचि सुखधामा।।
- RCM 3.45.8Open verse →
अमितबोध अनीह मितभोगी। सत्यसार कबि कोबिद जोगी।।
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अमितबोध अनीह मितभोगी। सत्यसार कबि कोबिद जोगी।।
- RCM 3.45.9Open verse →
सावधान मानद मदहीना। धीर धर्म गति परम प्रबीना।।
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सावधान मानद मदहीना। धीर धर्म गति परम प्रबीना।।
- RCM 3.45.10Open verse →
गुनागार संसार दुख रहित बिगत संदेह।।
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गुनागार संसार दुख रहित बिगत संदेह।।
- RCM 3.45.11Open verse →
तजि मम चरन सरोज प्रिय तिन्ह कहुँ देह न गेह।।45।।
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तजि मम चरन सरोज प्रिय तिन्ह कहुँ देह न गेह।।45।।
- RCM 3.46.1Open verse →
निज गुन श्रवन सुनत सकुचाहीं। पर गुन सुनत अधिक हरषाहीं।।
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निज गुन श्रवन सुनत सकुचाहीं। पर गुन सुनत अधिक हरषाहीं।।
- RCM 3.46.2Open verse →
सम सीतल नहिं त्यागहिं नीती। सरल सुभाउ सबहिं सन प्रीती।।
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सम सीतल नहिं त्यागहिं नीती। सरल सुभाउ सबहिं सन प्रीती।।
- RCM 3.46.3Open verse →
जप तप ब्रत दम संजम नेमा। गुरु गोबिंद बिप्र पद प्रेमा।।
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जप तप ब्रत दम संजम नेमा। गुरु गोबिंद बिप्र पद प्रेमा।।
- RCM 3.46.4Open verse →
श्रद्धा छमा मयत्री दाया। मुदिता मम पद प्रीति अमाया।।
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श्रद्धा छमा मयत्री दाया। मुदिता मम पद प्रीति अमाया।।
- RCM 3.46.5Open verse →
बिरति बिबेक बिनय बिग्याना। बोध जथारथ बेद पुराना।।
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बिरति बिबेक बिनय बिग्याना। बोध जथारथ बेद पुराना।।
- RCM 3.46.6Open verse →
दंभ मान मद करहिं न काऊ। भूलि न देहिं कुमारग पाऊ।।
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दंभ मान मद करहिं न काऊ। भूलि न देहिं कुमारग पाऊ।।
- RCM 3.46.7Open verse →
गावहिं सुनहिं सदा मम लीला। हेतु रहित परहित रत सीला।।
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गावहिं सुनहिं सदा मम लीला। हेतु रहित परहित रत सीला।।
- RCM 3.46.8Open verse →
मुनि सुनु साधुन्ह के गुन जेते। कहि न सकहिं सारद श्रुति तेते।।
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मुनि सुनु साधुन्ह के गुन जेते। कहि न सकहिं सारद श्रुति तेते।।