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Ramcharitmanas · अध्याय 3

Aranya Kanda

अरण्यकाण्ड

Life in the forest; the meeting with sages; the abduction of Sita by Ravana.

  1. पुर नर भरत प्रीति मैं गाई। मति अनुरूप अनूप सुहाई।।

    अर्थ · Hindi

    पुर नर भरत प्रीति मैं गाई। मति अनुरूप अनूप सुहाई।।

  2. अब प्रभु चरित सुनहु अति पावन। करत जे बन सुर नर मुनि भावन।।

    अर्थ · Hindi

    अब प्रभु चरित सुनहु अति पावन। करत जे बन सुर नर मुनि भावन।।

  3. एक बार चुनि कुसुम सुहाए। निज कर भूषन राम बनाए।।

    अर्थ · Hindi

    एक बार चुनि कुसुम सुहाए। निज कर भूषन राम बनाए।।

  4. सीतहि पहिराए प्रभु सादर। बैठे फटिक सिला पर सुंदर।।

    अर्थ · Hindi

    सीतहि पहिराए प्रभु सादर। बैठे फटिक सिला पर सुंदर।।

  5. सुरपति सुत धरि बायस बेषा। सठ चाहत रघुपति बल देखा।।

    अर्थ · Hindi

    सुरपति सुत धरि बायस बेषा। सठ चाहत रघुपति बल देखा।।

  6. जिमि पिपीलिका सागर थाहा। महा मंदमति पावन चाहा।।

    अर्थ · Hindi

    जिमि पिपीलिका सागर थाहा। महा मंदमति पावन चाहा।।

  7. सीता चरन चौंच हति भागा। मूढ़ मंदमति कारन कागा।।

    अर्थ · Hindi

    सीता चरन चौंच हति भागा। मूढ़ मंदमति कारन कागा।।

  8. चला रुधिर रघुनायक जाना। सींक धनुष सायक संधाना।।

    अर्थ · Hindi

    चला रुधिर रघुनायक जाना। सींक धनुष सायक संधाना।।

  9. अति कृपाल रघुनायक सदा दीन पर नेह।

    अर्थ · Hindi

    अति कृपाल रघुनायक सदा दीन पर नेह।

  10. RCM 3.1.10Open verse →

    ता सन आइ कीन्ह छलु मूरख अवगुन गेह।।1।।

    अर्थ · Hindi

    ता सन आइ कीन्ह छलु मूरख अवगुन गेह।।1।।

  11. प्रेरित मंत्र ब्रह्मसर धावा। चला भाजि बायस भय पावा।।

    अर्थ · Hindi

    प्रेरित मंत्र ब्रह्मसर धावा। चला भाजि बायस भय पावा।।

  12. धरि निज रुप गयउ पितु पाहीं। राम बिमुख राखा तेहि नाहीं।।

    अर्थ · Hindi

    धरि निज रुप गयउ पितु पाहीं। राम बिमुख राखा तेहि नाहीं।।

  13. भा निरास उपजी मन त्रासा। जथा चक्र भय रिषि दुर्बासा।।

    अर्थ · Hindi

    भा निरास उपजी मन त्रासा। जथा चक्र भय रिषि दुर्बासा।।

  14. ब्रह्मधाम सिवपुर सब लोका। फिरा श्रमित ब्याकुल भय सोका।।

    अर्थ · Hindi

    ब्रह्मधाम सिवपुर सब लोका। फिरा श्रमित ब्याकुल भय सोका।।

  15. काहूँ बैठन कहा न ओही। राखि को सकइ राम कर द्रोही।।

    अर्थ · Hindi

    काहूँ बैठन कहा न ओही। राखि को सकइ राम कर द्रोही।।

  16. मातु मृत्यु पितु समन समाना। सुधा होइ बिष सुनु हरिजाना।।

    अर्थ · Hindi

    मातु मृत्यु पितु समन समाना। सुधा होइ बिष सुनु हरिजाना।।

  17. मित्र करइ सत रिपु कै करनी। ता कहँ बिबुधनदी बैतरनी।।

    अर्थ · Hindi

    मित्र करइ सत रिपु कै करनी। ता कहँ बिबुधनदी बैतरनी।।

  18. सब जगु ताहि अनलहु ते ताता। जो रघुबीर बिमुख सुनु भ्राता।।

    अर्थ · Hindi

    सब जगु ताहि अनलहु ते ताता। जो रघुबीर बिमुख सुनु भ्राता।।

  19. नारद देखा बिकल जयंता। लागि दया कोमल चित संता।।

    अर्थ · Hindi

    नारद देखा बिकल जयंता। लागि दया कोमल चित संता।।

  20. RCM 3.2.10Open verse →

    पठवा तुरत राम पहिं ताही। कहेसि पुकारि प्रनत हित पाही।।

    अर्थ · Hindi

    पठवा तुरत राम पहिं ताही। कहेसि पुकारि प्रनत हित पाही।।

  21. RCM 3.2.11Open verse →

    आतुर सभय गहेसि पद जाई। त्राहि त्राहि दयाल रघुराई।।

    अर्थ · Hindi

    आतुर सभय गहेसि पद जाई। त्राहि त्राहि दयाल रघुराई।।

  22. RCM 3.2.12Open verse →

    अतुलित बल अतुलित प्रभुताई। मैं मतिमंद जानि नहिं पाई।।

    अर्थ · Hindi

    अतुलित बल अतुलित प्रभुताई। मैं मतिमंद जानि नहिं पाई।।

  23. RCM 3.2.13Open verse →

    निज कृत कर्म जनित फल पायउँ। अब प्रभु पाहि सरन तकि आयउँ।।

    अर्थ · Hindi

    निज कृत कर्म जनित फल पायउँ। अब प्रभु पाहि सरन तकि आयउँ।।

  24. RCM 3.2.14Open verse →

    सुनि कृपाल अति आरत बानी। एकनयन करि तजा भवानी।।

    अर्थ · Hindi

    सुनि कृपाल अति आरत बानी। एकनयन करि तजा भवानी।।

  25. RCM 3.2.15Open verse →

    कीन्ह मोह बस द्रोह जद्यपि तेहि कर बध उचित।

    अर्थ · Hindi

    कीन्ह मोह बस द्रोह जद्यपि तेहि कर बध उचित।

  26. RCM 3.2.16Open verse →

    प्रभु छाड़ेउ करि छोह को कृपाल रघुबीर सम।।2।।

    अर्थ · Hindi

    प्रभु छाड़ेउ करि छोह को कृपाल रघुबीर सम।।2।।

  27. रघुपति चित्रकूट बसि नाना। चरित किए श्रुति सुधा समाना।।

    अर्थ · Hindi

    रघुपति चित्रकूट बसि नाना। चरित किए श्रुति सुधा समाना।।

  28. बहुरि राम अस मन अनुमाना। होइहि भीर सबहिं मोहि जाना।।

    अर्थ · Hindi

    बहुरि राम अस मन अनुमाना। होइहि भीर सबहिं मोहि जाना।।

  29. सकल मुनिन्ह सन बिदा कराई। सीता सहित चले द्वौ भाई।।

    अर्थ · Hindi

    सकल मुनिन्ह सन बिदा कराई। सीता सहित चले द्वौ भाई।।

  30. अत्रि के आश्रम जब प्रभु गयऊ। सुनत महामुनि हरषित भयऊ।।

    अर्थ · Hindi

    अत्रि के आश्रम जब प्रभु गयऊ। सुनत महामुनि हरषित भयऊ।।

  31. पुलकित गात अत्रि उठि धाए। देखि रामु आतुर चलि आए।।

    अर्थ · Hindi

    पुलकित गात अत्रि उठि धाए। देखि रामु आतुर चलि आए।।

  32. करत दंडवत मुनि उर लाए। प्रेम बारि द्वौ जन अन्हवाए।।

    अर्थ · Hindi

    करत दंडवत मुनि उर लाए। प्रेम बारि द्वौ जन अन्हवाए।।

  33. देखि राम छबि नयन जुड़ाने। सादर निज आश्रम तब आने।।

    अर्थ · Hindi

    देखि राम छबि नयन जुड़ाने। सादर निज आश्रम तब आने।।

  34. करि पूजा कहि बचन सुहाए। दिए मूल फल प्रभु मन भाए।।

    अर्थ · Hindi

    करि पूजा कहि बचन सुहाए। दिए मूल फल प्रभु मन भाए।।

  35. प्रभु आसन आसीन भरि लोचन सोभा निरखि।

    अर्थ · Hindi

    प्रभु आसन आसीन भरि लोचन सोभा निरखि।

  36. RCM 3.3.10Open verse →

    मुनिबर परम प्रबीन जोरि पानि अस्तुति करत।।3।।

    अर्थ · Hindi

    मुनिबर परम प्रबीन जोरि पानि अस्तुति करत।।3।।

  37. नमामि भक्त वत्सलं। कृपालु शील कोमलं।।

    अर्थ · Hindi

    नमामि भक्त वत्सलं। कृपालु शील कोमलं।।

  38. भजामि ते पदांबुजं। अकामिनां स्वधामदं।।

    अर्थ · Hindi

    भजामि ते पदांबुजं। अकामिनां स्वधामदं।।

  39. निकाम श्याम सुंदरं। भवाम्बुनाथ मंदरं।।

    अर्थ · Hindi

    निकाम श्याम सुंदरं। भवाम्बुनाथ मंदरं।।

  40. प्रफुल्ल कंज लोचनं। मदादि दोष मोचनं।।

    अर्थ · Hindi

    प्रफुल्ल कंज लोचनं। मदादि दोष मोचनं।।

  41. प्रलंब बाहु विक्रमं। प्रभोऽप्रमेय वैभवं।।

    अर्थ · Hindi

    प्रलंब बाहु विक्रमं। प्रभोऽप्रमेय वैभवं।।

  42. निषंग चाप सायकं। धरं त्रिलोक नायकं।।

    अर्थ · Hindi

    निषंग चाप सायकं। धरं त्रिलोक नायकं।।

  43. दिनेश वंश मंडनं। महेश चाप खंडनं।।

    अर्थ · Hindi

    दिनेश वंश मंडनं। महेश चाप खंडनं।।

  44. मुनींद्र संत रंजनं। सुरारि वृंद भंजनं।।

    अर्थ · Hindi

    मुनींद्र संत रंजनं। सुरारि वृंद भंजनं।।

  45. मनोज वैरि वंदितं। अजादि देव सेवितं।।

    अर्थ · Hindi

    मनोज वैरि वंदितं। अजादि देव सेवितं।।

  46. RCM 3.4.10Open verse →

    विशुद्ध बोध विग्रहं। समस्त दूषणापहं।।

    अर्थ · Hindi

    विशुद्ध बोध विग्रहं। समस्त दूषणापहं।।

  47. RCM 3.4.11Open verse →

    नमामि इंदिरा पतिं। सुखाकरं सतां गतिं।।

    अर्थ · Hindi

    नमामि इंदिरा पतिं। सुखाकरं सतां गतिं।।

  48. RCM 3.4.12Open verse →

    भजे सशक्ति सानुजं। शची पतिं प्रियानुजं।।

    अर्थ · Hindi

    भजे सशक्ति सानुजं। शची पतिं प्रियानुजं।।

  49. RCM 3.4.13Open verse →

    त्वदंघ्रि मूल ये नराः। भजंति हीन मत्सरा।।

    अर्थ · Hindi

    त्वदंघ्रि मूल ये नराः। भजंति हीन मत्सरा।।

  50. RCM 3.4.14Open verse →

    पतंति नो भवार्णवे। वितर्क वीचि संकुले।।

    अर्थ · Hindi

    पतंति नो भवार्णवे। वितर्क वीचि संकुले।।

  51. RCM 3.4.15Open verse →

    विविक्त वासिनः सदा। भजंति मुक्तये मुदा।।

    अर्थ · Hindi

    विविक्त वासिनः सदा। भजंति मुक्तये मुदा।।

  52. RCM 3.4.16Open verse →

    निरस्य इंद्रियादिकं। प्रयांति ते गतिं स्वकं।।

    अर्थ · Hindi

    निरस्य इंद्रियादिकं। प्रयांति ते गतिं स्वकं।।

  53. RCM 3.4.17Open verse →

    तमेकमभ्दुतं प्रभुं। निरीहमीश्वरं विभुं।।

    अर्थ · Hindi

    तमेकमभ्दुतं प्रभुं। निरीहमीश्वरं विभुं।।

  54. RCM 3.4.18Open verse →

    जगद्गुरुं च शाश्वतं। तुरीयमेव केवलं।।

    अर्थ · Hindi

    जगद्गुरुं च शाश्वतं। तुरीयमेव केवलं।।

  55. RCM 3.4.19Open verse →

    भजामि भाव वल्लभं। कुयोगिनां सुदुर्लभं।।

    अर्थ · Hindi

    भजामि भाव वल्लभं। कुयोगिनां सुदुर्लभं।।

  56. RCM 3.4.20Open verse →

    स्वभक्त कल्प पादपं। समं सुसेव्यमन्वहं।।

    अर्थ · Hindi

    स्वभक्त कल्प पादपं। समं सुसेव्यमन्वहं।।

  57. RCM 3.4.21Open verse →

    अनूप रूप भूपतिं। नतोऽहमुर्विजा पतिं।।

    अर्थ · Hindi

    अनूप रूप भूपतिं। नतोऽहमुर्विजा पतिं।।

  58. RCM 3.4.22Open verse →

    प्रसीद मे नमामि ते। पदाब्ज भक्ति देहि मे।।

    अर्थ · Hindi

    प्रसीद मे नमामि ते। पदाब्ज भक्ति देहि मे।।

  59. RCM 3.4.23Open verse →

    पठंति ये स्तवं इदं। नरादरेण ते पदं।।

    अर्थ · Hindi

    पठंति ये स्तवं इदं। नरादरेण ते पदं।।

  60. RCM 3.4.24Open verse →

    व्रजंति नात्र संशयं। त्वदीय भक्ति संयुता।।

    अर्थ · Hindi

    व्रजंति नात्र संशयं। त्वदीय भक्ति संयुता।।

  61. अनुसुइया के पद गहि सीता। मिली बहोरि सुसील बिनीता।।

    अर्थ · Hindi

    अनुसुइया के पद गहि सीता। मिली बहोरि सुसील बिनीता।।

  62. रिषिपतिनी मन सुख अधिकाई। आसिष देइ निकट बैठाई।।

    अर्थ · Hindi

    रिषिपतिनी मन सुख अधिकाई। आसिष देइ निकट बैठाई।।

  63. दिब्य बसन भूषन पहिराए। जे नित नूतन अमल सुहाए।।

    अर्थ · Hindi

    दिब्य बसन भूषन पहिराए। जे नित नूतन अमल सुहाए।।

  64. कह रिषिबधू सरस मृदु बानी। नारिधर्म कछु ब्याज बखानी।।

    अर्थ · Hindi

    कह रिषिबधू सरस मृदु बानी। नारिधर्म कछु ब्याज बखानी।।

  65. मातु पिता भ्राता हितकारी। मितप्रद सब सुनु राजकुमारी।।

    अर्थ · Hindi

    मातु पिता भ्राता हितकारी। मितप्रद सब सुनु राजकुमारी।।

  66. अमित दानि भर्ता बयदेही। अधम सो नारि जो सेव न तेही।।

    अर्थ · Hindi

    अमित दानि भर्ता बयदेही। अधम सो नारि जो सेव न तेही।।

  67. धीरज धर्म मित्र अरु नारी। आपद काल परिखिअहिं चारी।।

    अर्थ · Hindi

    धीरज धर्म मित्र अरु नारी। आपद काल परिखिअहिं चारी।।

  68. बृद्ध रोगबस जड़ धनहीना। अधं बधिर क्रोधी अति दीना।।

    अर्थ · Hindi

    बृद्ध रोगबस जड़ धनहीना। अधं बधिर क्रोधी अति दीना।।

  69. ऐसेहु पति कर किएँ अपमाना। नारि पाव जमपुर दुख नाना।।

    अर्थ · Hindi

    ऐसेहु पति कर किएँ अपमाना। नारि पाव जमपुर दुख नाना।।

  70. RCM 3.5.10Open verse →

    एकइ धर्म एक ब्रत नेमा। कायँ बचन मन पति पद प्रेमा।।

    अर्थ · Hindi

    एकइ धर्म एक ब्रत नेमा। कायँ बचन मन पति पद प्रेमा।।

  71. RCM 3.5.11Open verse →

    जग पति ब्रता चारि बिधि अहहिं। बेद पुरान संत सब कहहिं।।

    अर्थ · Hindi

    जग पति ब्रता चारि बिधि अहहिं। बेद पुरान संत सब कहहिं।।

  72. RCM 3.5.12Open verse →

    उत्तम के अस बस मन माहीं। सपनेहुँ आन पुरुष जग नाहीं।।

    अर्थ · Hindi

    उत्तम के अस बस मन माहीं। सपनेहुँ आन पुरुष जग नाहीं।।

  73. RCM 3.5.13Open verse →

    मध्यम परपति देखइ कैसें। भ्राता पिता पुत्र निज जैंसें।।

    अर्थ · Hindi

    मध्यम परपति देखइ कैसें। भ्राता पिता पुत्र निज जैंसें।।

  74. RCM 3.5.14Open verse →

    धर्म बिचारि समुझि कुल रहई। सो निकिष्ट त्रिय श्रुति अस कहई।।

    अर्थ · Hindi

    धर्म बिचारि समुझि कुल रहई। सो निकिष्ट त्रिय श्रुति अस कहई।।

  75. RCM 3.5.15Open verse →

    बिनु अवसर भय तें रह जोई। जानेहु अधम नारि जग सोई।।

    अर्थ · Hindi

    बिनु अवसर भय तें रह जोई। जानेहु अधम नारि जग सोई।।

  76. RCM 3.5.16Open verse →

    पति बंचक परपति रति करई। रौरव नरक कल्प सत परई।।

    अर्थ · Hindi

    पति बंचक परपति रति करई। रौरव नरक कल्प सत परई।।

  77. RCM 3.5.17Open verse →

    छन सुख लागि जनम सत कोटि। दुख न समुझ तेहि सम को खोटी।।

    अर्थ · Hindi

    छन सुख लागि जनम सत कोटि। दुख न समुझ तेहि सम को खोटी।।

  78. RCM 3.5.18Open verse →

    बिनु श्रम नारि परम गति लहई। पतिब्रत धर्म छाड़ि छल गहई।।

    अर्थ · Hindi

    बिनु श्रम नारि परम गति लहई। पतिब्रत धर्म छाड़ि छल गहई।।

  79. RCM 3.5.19Open verse →

    पति प्रतिकुल जनम जहँ जाई। बिधवा होई पाई तरुनाई।।

    अर्थ · Hindi

    पति प्रतिकुल जनम जहँ जाई। बिधवा होई पाई तरुनाई।।

  80. RCM 3.5.20Open verse →

    सहज अपावनि नारि पति सेवत सुभ गति लहइ।

    अर्थ · Hindi

    सहज अपावनि नारि पति सेवत सुभ गति लहइ।

  81. RCM 3.5.21Open verse →

    जसु गावत श्रुति चारि अजहु तुलसिका हरिहि प्रिय।।5(क)।।

    अर्थ · Hindi

    जसु गावत श्रुति चारि अजहु तुलसिका हरिहि प्रिय।।5(क)।।

  82. RCM 3.5.22Open verse →

    सुनु सीता तव नाम सुमिर नारि पतिब्रत करहि।

    अर्थ · Hindi

    सुनु सीता तव नाम सुमिर नारि पतिब्रत करहि।

  83. RCM 3.5.23Open verse →

    तोहि प्रानप्रिय राम कहिउँ कथा संसार हित।।5(ख)।।

    अर्थ · Hindi

    तोहि प्रानप्रिय राम कहिउँ कथा संसार हित।।5(ख)।।

  84. सुनि जानकीं परम सुखु पावा। सादर तासु चरन सिरु नावा।।

    अर्थ · Hindi

    सुनि जानकीं परम सुखु पावा। सादर तासु चरन सिरु नावा।।

  85. तब मुनि सन कह कृपानिधाना। आयसु होइ जाउँ बन आना।।

    अर्थ · Hindi

    तब मुनि सन कह कृपानिधाना। आयसु होइ जाउँ बन आना।।

  86. संतत मो पर कृपा करेहू। सेवक जानि तजेहु जनि नेहू।।

    अर्थ · Hindi

    संतत मो पर कृपा करेहू। सेवक जानि तजेहु जनि नेहू।।

  87. धर्म धुरंधर प्रभु कै बानी। सुनि सप्रेम बोले मुनि ग्यानी।।

    अर्थ · Hindi

    धर्म धुरंधर प्रभु कै बानी। सुनि सप्रेम बोले मुनि ग्यानी।।

  88. जासु कृपा अज सिव सनकादी। चहत सकल परमारथ बादी।।

    अर्थ · Hindi

    जासु कृपा अज सिव सनकादी। चहत सकल परमारथ बादी।।

  89. ते तुम्ह राम अकाम पिआरे। दीन बंधु मृदु बचन उचारे।।

    अर्थ · Hindi

    ते तुम्ह राम अकाम पिआरे। दीन बंधु मृदु बचन उचारे।।

  90. अब जानी मैं श्री चतुराई। भजी तुम्हहि सब देव बिहाई।।

    अर्थ · Hindi

    अब जानी मैं श्री चतुराई। भजी तुम्हहि सब देव बिहाई।।

  91. जेहि समान अतिसय नहिं कोई। ता कर सील कस न अस होई।।

    अर्थ · Hindi

    जेहि समान अतिसय नहिं कोई। ता कर सील कस न अस होई।।

  92. केहि बिधि कहौं जाहु अब स्वामी। कहहु नाथ तुम्ह अंतरजामी।।

    अर्थ · Hindi

    केहि बिधि कहौं जाहु अब स्वामी। कहहु नाथ तुम्ह अंतरजामी।।

  93. RCM 3.6.10Open verse →

    अस कहि प्रभु बिलोकि मुनि धीरा। लोचन जल बह पुलक सरीरा।।

    अर्थ · Hindi

    अस कहि प्रभु बिलोकि मुनि धीरा। लोचन जल बह पुलक सरीरा।।

  94. RCM 3.6.11Open verse →

    तन पुलक निर्भर प्रेम पुरन नयन मुख पंकज दिए।

    अर्थ · Hindi

    तन पुलक निर्भर प्रेम पुरन नयन मुख पंकज दिए।

  95. RCM 3.6.12Open verse →

    मन ग्यान गुन गोतीत प्रभु मैं दीख जप तप का किए।।

    अर्थ · Hindi

    मन ग्यान गुन गोतीत प्रभु मैं दीख जप तप का किए।।

  96. RCM 3.6.13Open verse →

    जप जोग धर्म समूह तें नर भगति अनुपम पावई।

    अर्थ · Hindi

    जप जोग धर्म समूह तें नर भगति अनुपम पावई।

  97. RCM 3.6.14Open verse →

    रधुबीर चरित पुनीत निसि दिन दास तुलसी गावई।।

    अर्थ · Hindi

    रधुबीर चरित पुनीत निसि दिन दास तुलसी गावई।।

  98. RCM 3.6.15Open verse →

    कलिमल समन दमन मन राम सुजस सुखमूल।

    अर्थ · Hindi

    कलिमल समन दमन मन राम सुजस सुखमूल।

  99. RCM 3.6.16Open verse →

    सादर सुनहि जे तिन्ह पर राम रहहिं अनुकूल।।6(क)।।

    अर्थ · Hindi

    सादर सुनहि जे तिन्ह पर राम रहहिं अनुकूल।।6(क)।।

  100. RCM 3.6.17Open verse →

    कठिन काल मल कोस धर्म न ग्यान न जोग जप।

    अर्थ · Hindi

    कठिन काल मल कोस धर्म न ग्यान न जोग जप।

  101. RCM 3.6.18Open verse →

    परिहरि सकल भरोस रामहि भजहिं ते चतुर नर।।6(ख)।।

    अर्थ · Hindi

    परिहरि सकल भरोस रामहि भजहिं ते चतुर नर।।6(ख)।।

  102. मुनि पद कमल नाइ करि सीसा। चले बनहि सुर नर मुनि ईसा।।

    अर्थ · Hindi

    मुनि पद कमल नाइ करि सीसा। चले बनहि सुर नर मुनि ईसा।।

  103. आगे राम अनुज पुनि पाछें। मुनि बर बेष बने अति काछें।।

    अर्थ · Hindi

    आगे राम अनुज पुनि पाछें। मुनि बर बेष बने अति काछें।।

  104. उमय बीच श्री सोहइ कैसी। ब्रह्म जीव बिच माया जैसी।।

    अर्थ · Hindi

    उमय बीच श्री सोहइ कैसी। ब्रह्म जीव बिच माया जैसी।।

  105. सरिता बन गिरि अवघट घाटा। पति पहिचानी देहिं बर बाटा।।

    अर्थ · Hindi

    सरिता बन गिरि अवघट घाटा। पति पहिचानी देहिं बर बाटा।।

  106. जहँ जहँ जाहि देव रघुराया। करहिं मेध तहँ तहँ नभ छाया।।

    अर्थ · Hindi

    जहँ जहँ जाहि देव रघुराया। करहिं मेध तहँ तहँ नभ छाया।।

  107. मिला असुर बिराध मग जाता। आवतहीं रघुवीर निपाता।।

    अर्थ · Hindi

    मिला असुर बिराध मग जाता। आवतहीं रघुवीर निपाता।।

  108. तुरतहिं रुचिर रूप तेहिं पावा। देखि दुखी निज धाम पठावा।।

    अर्थ · Hindi

    तुरतहिं रुचिर रूप तेहिं पावा। देखि दुखी निज धाम पठावा।।

  109. पुनि आए जहँ मुनि सरभंगा। सुंदर अनुज जानकी संगा।।

    अर्थ · Hindi

    पुनि आए जहँ मुनि सरभंगा। सुंदर अनुज जानकी संगा।।

  110. देखी राम मुख पंकज मुनिबर लोचन भृंग।

    अर्थ · Hindi

    देखी राम मुख पंकज मुनिबर लोचन भृंग।

  111. RCM 3.7.10Open verse →

    सादर पान करत अति धन्य जन्म सरभंग।।7।।

    अर्थ · Hindi

    सादर पान करत अति धन्य जन्म सरभंग।।7।।

  112. कह मुनि सुनु रघुबीर कृपाला। संकर मानस राजमराला।।

    अर्थ · Hindi

    कह मुनि सुनु रघुबीर कृपाला। संकर मानस राजमराला।।

  113. जात रहेउँ बिरंचि के धामा। सुनेउँ श्रवन बन ऐहहिं रामा।।

    अर्थ · Hindi

    जात रहेउँ बिरंचि के धामा। सुनेउँ श्रवन बन ऐहहिं रामा।।

  114. चितवत पंथ रहेउँ दिन राती। अब प्रभु देखि जुड़ानी छाती।।

    अर्थ · Hindi

    चितवत पंथ रहेउँ दिन राती। अब प्रभु देखि जुड़ानी छाती।।

  115. नाथ सकल साधन मैं हीना। कीन्ही कृपा जानि जन दीना।।

    अर्थ · Hindi

    नाथ सकल साधन मैं हीना। कीन्ही कृपा जानि जन दीना।।

  116. सो कछु देव न मोहि निहोरा। निज पन राखेउ जन मन चोरा।।

    अर्थ · Hindi

    सो कछु देव न मोहि निहोरा। निज पन राखेउ जन मन चोरा।।

  117. तब लगि रहहु दीन हित लागी। जब लगि मिलौं तुम्हहि तनु त्यागी।।

    अर्थ · Hindi

    तब लगि रहहु दीन हित लागी। जब लगि मिलौं तुम्हहि तनु त्यागी।।

  118. जोग जग्य जप तप ब्रत कीन्हा। प्रभु कहँ देइ भगति बर लीन्हा।।

    अर्थ · Hindi

    जोग जग्य जप तप ब्रत कीन्हा। प्रभु कहँ देइ भगति बर लीन्हा।।

  119. एहि बिधि सर रचि मुनि सरभंगा। बैठे हृदयँ छाड़ि सब संगा।।

    अर्थ · Hindi

    एहि बिधि सर रचि मुनि सरभंगा। बैठे हृदयँ छाड़ि सब संगा।।

  120. सीता अनुज समेत प्रभु नील जलद तनु स्याम।

    अर्थ · Hindi

    सीता अनुज समेत प्रभु नील जलद तनु स्याम।

  121. RCM 3.8.10Open verse →

    मम हियँ बसहु निरंतर सगुनरुप श्रीराम।।8।।

    अर्थ · Hindi

    मम हियँ बसहु निरंतर सगुनरुप श्रीराम।।8।।

  122. अस कहि जोग अगिनि तनु जारा। राम कृपाँ बैकुंठ सिधारा।।

    अर्थ · Hindi

    अस कहि जोग अगिनि तनु जारा। राम कृपाँ बैकुंठ सिधारा।।

  123. ताते मुनि हरि लीन न भयऊ। प्रथमहिं भेद भगति बर लयऊ।।

    अर्थ · Hindi

    ताते मुनि हरि लीन न भयऊ। प्रथमहिं भेद भगति बर लयऊ।।

  124. रिषि निकाय मुनिबर गति देखि। सुखी भए निज हृदयँ बिसेषी।।

    अर्थ · Hindi

    रिषि निकाय मुनिबर गति देखि। सुखी भए निज हृदयँ बिसेषी।।

  125. अस्तुति करहिं सकल मुनि बृंदा। जयति प्रनत हित करुना कंदा।।

    अर्थ · Hindi

    अस्तुति करहिं सकल मुनि बृंदा। जयति प्रनत हित करुना कंदा।।

  126. पुनि रघुनाथ चले बन आगे। मुनिबर बृंद बिपुल सँग लागे।।

    अर्थ · Hindi

    पुनि रघुनाथ चले बन आगे। मुनिबर बृंद बिपुल सँग लागे।।

  127. अस्थि समूह देखि रघुराया। पूछी मुनिन्ह लागि अति दाया।।

    अर्थ · Hindi

    अस्थि समूह देखि रघुराया। पूछी मुनिन्ह लागि अति दाया।।

  128. जानतहुँ पूछिअ कस स्वामी। सबदरसी तुम्ह अंतरजामी।।

    अर्थ · Hindi

    जानतहुँ पूछिअ कस स्वामी। सबदरसी तुम्ह अंतरजामी।।

  129. निसिचर निकर सकल मुनि खाए। सुनि रघुबीर नयन जल छाए।।

    अर्थ · Hindi

    निसिचर निकर सकल मुनि खाए। सुनि रघुबीर नयन जल छाए।।

  130. निसिचर हीन करउँ महि भुज उठाइ पन कीन्ह।

    अर्थ · Hindi

    निसिचर हीन करउँ महि भुज उठाइ पन कीन्ह।

  131. RCM 3.9.10Open verse →

    सकल मुनिन्ह के आश्रमन्हि जाइ जाइ सुख दीन्ह।।9।।

    अर्थ · Hindi

    सकल मुनिन्ह के आश्रमन्हि जाइ जाइ सुख दीन्ह।।9।।

  132. RCM 3.10.1Open verse →

    मुनि अगस्ति कर सिष्य सुजाना। नाम सुतीछन रति भगवाना।।

    अर्थ · Hindi

    मुनि अगस्ति कर सिष्य सुजाना। नाम सुतीछन रति भगवाना।।

  133. RCM 3.10.2Open verse →

    मन क्रम बचन राम पद सेवक। सपनेहुँ आन भरोस न देवक।।

    अर्थ · Hindi

    मन क्रम बचन राम पद सेवक। सपनेहुँ आन भरोस न देवक।।

  134. RCM 3.10.3Open verse →

    प्रभु आगवनु श्रवन सुनि पावा। करत मनोरथ आतुर धावा।।

    अर्थ · Hindi

    प्रभु आगवनु श्रवन सुनि पावा। करत मनोरथ आतुर धावा।।

  135. RCM 3.10.4Open verse →

    हे बिधि दीनबंधु रघुराया। मो से सठ पर करिहहिं दाया।।

    अर्थ · Hindi

    हे बिधि दीनबंधु रघुराया। मो से सठ पर करिहहिं दाया।।

  136. RCM 3.10.5Open verse →

    सहित अनुज मोहि राम गोसाई। मिलिहहिं निज सेवक की नाई।।

    अर्थ · Hindi

    सहित अनुज मोहि राम गोसाई। मिलिहहिं निज सेवक की नाई।।

  137. RCM 3.10.6Open verse →

    मोरे जियँ भरोस दृढ़ नाहीं। भगति बिरति न ग्यान मन माहीं।।

    अर्थ · Hindi

    मोरे जियँ भरोस दृढ़ नाहीं। भगति बिरति न ग्यान मन माहीं।।

  138. RCM 3.10.7Open verse →

    नहिं सतसंग जोग जप जागा। नहिं दृढ़ चरन कमल अनुरागा।।

    अर्थ · Hindi

    नहिं सतसंग जोग जप जागा। नहिं दृढ़ चरन कमल अनुरागा।।

  139. RCM 3.10.8Open verse →

    एक बानि करुनानिधान की। सो प्रिय जाकें गति न आन की।।

    अर्थ · Hindi

    एक बानि करुनानिधान की। सो प्रिय जाकें गति न आन की।।

  140. RCM 3.10.9Open verse →

    होइहैं सुफल आजु मम लोचन। देखि बदन पंकज भव मोचन।।

    अर्थ · Hindi

    होइहैं सुफल आजु मम लोचन। देखि बदन पंकज भव मोचन।।

  141. RCM 3.10.10Open verse →

    निर्भर प्रेम मगन मुनि ग्यानी। कहि न जाइ सो दसा भवानी।।

    अर्थ · Hindi

    निर्भर प्रेम मगन मुनि ग्यानी। कहि न जाइ सो दसा भवानी।।

  142. RCM 3.10.11Open verse →

    दिसि अरु बिदिसि पंथ नहिं सूझा। को मैं चलेउँ कहाँ नहिं बूझा।।

    अर्थ · Hindi

    दिसि अरु बिदिसि पंथ नहिं सूझा। को मैं चलेउँ कहाँ नहिं बूझा।।

  143. RCM 3.10.12Open verse →

    कबहुँक फिरि पाछें पुनि जाई। कबहुँक नृत्य करइ गुन गाई।।

    अर्थ · Hindi

    कबहुँक फिरि पाछें पुनि जाई। कबहुँक नृत्य करइ गुन गाई।।

  144. RCM 3.10.13Open verse →

    अबिरल प्रेम भगति मुनि पाई। प्रभु देखैं तरु ओट लुकाई।।

    अर्थ · Hindi

    अबिरल प्रेम भगति मुनि पाई। प्रभु देखैं तरु ओट लुकाई।।

  145. RCM 3.10.14Open verse →

    अतिसय प्रीति देखि रघुबीरा। प्रगटे हृदयँ हरन भव भीरा।।

    अर्थ · Hindi

    अतिसय प्रीति देखि रघुबीरा। प्रगटे हृदयँ हरन भव भीरा।।

  146. RCM 3.10.15Open verse →

    मुनि मग माझ अचल होइ बैसा। पुलक सरीर पनस फल जैसा।।

    अर्थ · Hindi

    मुनि मग माझ अचल होइ बैसा। पुलक सरीर पनस फल जैसा।।

  147. RCM 3.10.16Open verse →

    तब रघुनाथ निकट चलि आए। देखि दसा निज जन मन भाए।।

    अर्थ · Hindi

    तब रघुनाथ निकट चलि आए। देखि दसा निज जन मन भाए।।

  148. RCM 3.10.17Open verse →

    मुनिहि राम बहु भाँति जगावा। जाग न ध्यानजनित सुख पावा।।

    अर्थ · Hindi

    मुनिहि राम बहु भाँति जगावा। जाग न ध्यानजनित सुख पावा।।

  149. RCM 3.10.18Open verse →

    भूप रूप तब राम दुरावा। हृदयँ चतुर्भुज रूप देखावा।।

    अर्थ · Hindi

    भूप रूप तब राम दुरावा। हृदयँ चतुर्भुज रूप देखावा।।

  150. RCM 3.10.19Open verse →

    मुनि अकुलाइ उठा तब कैसें। बिकल हीन मनि फनि बर जैसें।।

    अर्थ · Hindi

    मुनि अकुलाइ उठा तब कैसें। बिकल हीन मनि फनि बर जैसें।।

  151. RCM 3.10.20Open verse →

    आगें देखि राम तन स्यामा। सीता अनुज सहित सुख धामा।।

    अर्थ · Hindi

    आगें देखि राम तन स्यामा। सीता अनुज सहित सुख धामा।।

  152. RCM 3.10.21Open verse →

    परेउ लकुट इव चरनन्हि लागी। प्रेम मगन मुनिबर बड़भागी।।

    अर्थ · Hindi

    परेउ लकुट इव चरनन्हि लागी। प्रेम मगन मुनिबर बड़भागी।।

  153. RCM 3.10.22Open verse →

    भुज बिसाल गहि लिए उठाई। परम प्रीति राखे उर लाई।।

    अर्थ · Hindi

    भुज बिसाल गहि लिए उठाई। परम प्रीति राखे उर लाई।।

  154. RCM 3.10.23Open verse →

    मुनिहि मिलत अस सोह कृपाला। कनक तरुहि जनु भेंट तमाला।।

    अर्थ · Hindi

    मुनिहि मिलत अस सोह कृपाला। कनक तरुहि जनु भेंट तमाला।।

  155. RCM 3.10.24Open verse →

    राम बदनु बिलोक मुनि ठाढ़ा। मानहुँ चित्र माझ लिखि काढ़ा।।

    अर्थ · Hindi

    राम बदनु बिलोक मुनि ठाढ़ा। मानहुँ चित्र माझ लिखि काढ़ा।।

  156. RCM 3.10.25Open verse →

    तब मुनि हृदयँ धीर धीर गहि पद बारहिं बार।

    अर्थ · Hindi

    तब मुनि हृदयँ धीर धीर गहि पद बारहिं बार।

  157. RCM 3.10.26Open verse →

    निज आश्रम प्रभु आनि करि पूजा बिबिध प्रकार।।10।।

    अर्थ · Hindi

    निज आश्रम प्रभु आनि करि पूजा बिबिध प्रकार।।10।।

  158. RCM 3.11.1Open verse →

    कह मुनि प्रभु सुनु बिनती मोरी। अस्तुति करौं कवन बिधि तोरी।।

    अर्थ · Hindi

    कह मुनि प्रभु सुनु बिनती मोरी। अस्तुति करौं कवन बिधि तोरी।।

  159. RCM 3.11.2Open verse →

    महिमा अमित मोरि मति थोरी। रबि सन्मुख खद्योत अँजोरी।।

    अर्थ · Hindi

    महिमा अमित मोरि मति थोरी। रबि सन्मुख खद्योत अँजोरी।।

  160. RCM 3.11.3Open verse →

    श्याम तामरस दाम शरीरं। जटा मुकुट परिधन मुनिचीरं।।

    अर्थ · Hindi

    श्याम तामरस दाम शरीरं। जटा मुकुट परिधन मुनिचीरं।।

  161. RCM 3.11.4Open verse →

    पाणि चाप शर कटि तूणीरं। नौमि निरंतर श्रीरघुवीरं।।

    अर्थ · Hindi

    पाणि चाप शर कटि तूणीरं। नौमि निरंतर श्रीरघुवीरं।।

  162. RCM 3.11.5Open verse →

    मोह विपिन घन दहन कृशानुः। संत सरोरुह कानन भानुः।।

    अर्थ · Hindi

    मोह विपिन घन दहन कृशानुः। संत सरोरुह कानन भानुः।।

  163. RCM 3.11.6Open verse →

    निशिचर करि वरूथ मृगराजः। त्रातु सदा नो भव खग बाजः।।

    अर्थ · Hindi

    निशिचर करि वरूथ मृगराजः। त्रातु सदा नो भव खग बाजः।।

  164. RCM 3.11.7Open verse →

    अरुण नयन राजीव सुवेशं। सीता नयन चकोर निशेशं।।

    अर्थ · Hindi

    अरुण नयन राजीव सुवेशं। सीता नयन चकोर निशेशं।।

  165. RCM 3.11.8Open verse →

    हर ह्रदि मानस बाल मरालं। नौमि राम उर बाहु विशालं।।

    अर्थ · Hindi

    हर ह्रदि मानस बाल मरालं। नौमि राम उर बाहु विशालं।।

  166. RCM 3.11.9Open verse →

    संशय सर्प ग्रसन उरगादः। शमन सुकर्कश तर्क विषादः।।

    अर्थ · Hindi

    संशय सर्प ग्रसन उरगादः। शमन सुकर्कश तर्क विषादः।।

  167. RCM 3.11.10Open verse →

    भव भंजन रंजन सुर यूथः। त्रातु सदा नो कृपा वरूथः।।

    अर्थ · Hindi

    भव भंजन रंजन सुर यूथः। त्रातु सदा नो कृपा वरूथः।।

  168. RCM 3.11.11Open verse →

    निर्गुण सगुण विषम सम रूपं। ज्ञान गिरा गोतीतमनूपं।।

    अर्थ · Hindi

    निर्गुण सगुण विषम सम रूपं। ज्ञान गिरा गोतीतमनूपं।।

  169. RCM 3.11.12Open verse →

    अमलमखिलमनवद्यमपारं। नौमि राम भंजन महि भारं।।

    अर्थ · Hindi

    अमलमखिलमनवद्यमपारं। नौमि राम भंजन महि भारं।।

  170. RCM 3.11.13Open verse →

    भक्त कल्पपादप आरामः। तर्जन क्रोध लोभ मद कामः।।

    अर्थ · Hindi

    भक्त कल्पपादप आरामः। तर्जन क्रोध लोभ मद कामः।।

  171. RCM 3.11.14Open verse →

    अति नागर भव सागर सेतुः। त्रातु सदा दिनकर कुल केतुः।।

    अर्थ · Hindi

    अति नागर भव सागर सेतुः। त्रातु सदा दिनकर कुल केतुः।।

  172. RCM 3.11.15Open verse →

    अतुलित भुज प्रताप बल धामः। कलि मल विपुल विभंजन नामः।।

    अर्थ · Hindi

    अतुलित भुज प्रताप बल धामः। कलि मल विपुल विभंजन नामः।।

  173. RCM 3.11.16Open verse →

    धर्म वर्म नर्मद गुण ग्रामः। संतत शं तनोतु मम रामः।।

    अर्थ · Hindi

    धर्म वर्म नर्मद गुण ग्रामः। संतत शं तनोतु मम रामः।।

  174. RCM 3.11.17Open verse →

    जदपि बिरज ब्यापक अबिनासी। सब के हृदयँ निरंतर बासी।।

    अर्थ · Hindi

    जदपि बिरज ब्यापक अबिनासी। सब के हृदयँ निरंतर बासी।।

  175. RCM 3.11.18Open verse →

    तदपि अनुज श्री सहित खरारी। बसतु मनसि मम काननचारी।।

    अर्थ · Hindi

    तदपि अनुज श्री सहित खरारी। बसतु मनसि मम काननचारी।।

  176. RCM 3.11.19Open verse →

    जे जानहिं ते जानहुँ स्वामी। सगुन अगुन उर अंतरजामी।।

    अर्थ · Hindi

    जे जानहिं ते जानहुँ स्वामी। सगुन अगुन उर अंतरजामी।।

  177. RCM 3.11.20Open verse →

    जो कोसल पति राजिव नयना। करउ सो राम हृदय मम अयना।

    अर्थ · Hindi

    जो कोसल पति राजिव नयना। करउ सो राम हृदय मम अयना।

  178. RCM 3.11.21Open verse →

    अस अभिमान जाइ जनि भोरे। मैं सेवक रघुपति पति मोरे।।

    अर्थ · Hindi

    अस अभिमान जाइ जनि भोरे। मैं सेवक रघुपति पति मोरे।।

  179. RCM 3.11.22Open verse →

    सुनि मुनि बचन राम मन भाए। बहुरि हरषि मुनिबर उर लाए।।

    अर्थ · Hindi

    सुनि मुनि बचन राम मन भाए। बहुरि हरषि मुनिबर उर लाए।।

  180. RCM 3.11.23Open verse →

    परम प्रसन्न जानु मुनि मोही। जो बर मागहु देउ सो तोही।।

    अर्थ · Hindi

    परम प्रसन्न जानु मुनि मोही। जो बर मागहु देउ सो तोही।।

  181. RCM 3.11.24Open verse →

    मुनि कह मै बर कबहुँ न जाचा। समुझि न परइ झूठ का साचा।।

    अर्थ · Hindi

    मुनि कह मै बर कबहुँ न जाचा। समुझि न परइ झूठ का साचा।।

  182. RCM 3.11.25Open verse →

    तुम्हहि नीक लागै रघुराई। सो मोहि देहु दास सुखदाई।।

    अर्थ · Hindi

    तुम्हहि नीक लागै रघुराई। सो मोहि देहु दास सुखदाई।।

  183. RCM 3.11.26Open verse →

    अबिरल भगति बिरति बिग्याना। होहु सकल गुन ग्यान निधाना।।

    अर्थ · Hindi

    अबिरल भगति बिरति बिग्याना। होहु सकल गुन ग्यान निधाना।।

  184. RCM 3.11.27Open verse →

    प्रभु जो दीन्ह सो बरु मैं पावा। अब सो देहु मोहि जो भावा।।

    अर्थ · Hindi

    प्रभु जो दीन्ह सो बरु मैं पावा। अब सो देहु मोहि जो भावा।।

  185. RCM 3.11.28Open verse →

    अनुज जानकी सहित प्रभु चाप बान धर राम।

    अर्थ · Hindi

    अनुज जानकी सहित प्रभु चाप बान धर राम।

  186. RCM 3.11.29Open verse →

    मम हिय गगन इंदु इव बसहु सदा निहकाम।।11।।

    अर्थ · Hindi

    मम हिय गगन इंदु इव बसहु सदा निहकाम।।11।।

  187. RCM 3.12.1Open verse →

    एवमस्तु करि रमानिवासा। हरषि चले कुभंज रिषि पासा।।

    अर्थ · Hindi

    एवमस्तु करि रमानिवासा। हरषि चले कुभंज रिषि पासा।।

  188. RCM 3.12.2Open verse →

    बहुत दिवस गुर दरसन पाएँ। भए मोहि एहिं आश्रम आएँ।।

    अर्थ · Hindi

    बहुत दिवस गुर दरसन पाएँ। भए मोहि एहिं आश्रम आएँ।।

  189. RCM 3.12.3Open verse →

    अब प्रभु संग जाउँ गुर पाहीं। तुम्ह कहँ नाथ निहोरा नाहीं।।

    अर्थ · Hindi

    अब प्रभु संग जाउँ गुर पाहीं। तुम्ह कहँ नाथ निहोरा नाहीं।।

  190. RCM 3.12.4Open verse →

    देखि कृपानिधि मुनि चतुराई। लिए संग बिहसै द्वौ भाई।।

    अर्थ · Hindi

    देखि कृपानिधि मुनि चतुराई। लिए संग बिहसै द्वौ भाई।।

  191. RCM 3.12.5Open verse →

    पंथ कहत निज भगति अनूपा। मुनि आश्रम पहुँचे सुरभूपा।।

    अर्थ · Hindi

    पंथ कहत निज भगति अनूपा। मुनि आश्रम पहुँचे सुरभूपा।।

  192. RCM 3.12.6Open verse →

    तुरत सुतीछन गुर पहिं गयऊ। करि दंडवत कहत अस भयऊ।।

    अर्थ · Hindi

    तुरत सुतीछन गुर पहिं गयऊ। करि दंडवत कहत अस भयऊ।।

  193. RCM 3.12.7Open verse →

    नाथ कौसलाधीस कुमारा। आए मिलन जगत आधारा।।

    अर्थ · Hindi

    नाथ कौसलाधीस कुमारा। आए मिलन जगत आधारा।।

  194. RCM 3.12.8Open verse →

    राम अनुज समेत बैदेही। निसि दिनु देव जपत हहु जेही।।

    अर्थ · Hindi

    राम अनुज समेत बैदेही। निसि दिनु देव जपत हहु जेही।।

  195. RCM 3.12.9Open verse →

    सुनत अगस्ति तुरत उठि धाए। हरि बिलोकि लोचन जल छाए।।

    अर्थ · Hindi

    सुनत अगस्ति तुरत उठि धाए। हरि बिलोकि लोचन जल छाए।।

  196. RCM 3.12.10Open verse →

    मुनि पद कमल परे द्वौ भाई। रिषि अति प्रीति लिए उर लाई।।

    अर्थ · Hindi

    मुनि पद कमल परे द्वौ भाई। रिषि अति प्रीति लिए उर लाई।।

  197. RCM 3.12.11Open verse →

    सादर कुसल पूछि मुनि ग्यानी। आसन बर बैठारे आनी।।

    अर्थ · Hindi

    सादर कुसल पूछि मुनि ग्यानी। आसन बर बैठारे आनी।।

  198. RCM 3.12.12Open verse →

    पुनि करि बहु प्रकार प्रभु पूजा। मोहि सम भाग्यवंत नहिं दूजा।।

    अर्थ · Hindi

    पुनि करि बहु प्रकार प्रभु पूजा। मोहि सम भाग्यवंत नहिं दूजा।।

  199. RCM 3.12.13Open verse →

    जहँ लगि रहे अपर मुनि बृंदा। हरषे सब बिलोकि सुखकंदा।।

    अर्थ · Hindi

    जहँ लगि रहे अपर मुनि बृंदा। हरषे सब बिलोकि सुखकंदा।।

  200. RCM 3.12.14Open verse →

    मुनि समूह महँ बैठे सन्मुख सब की ओर।

    अर्थ · Hindi

    मुनि समूह महँ बैठे सन्मुख सब की ओर।

  201. RCM 3.12.15Open verse →

    सरद इंदु तन चितवत मानहुँ निकर चकोर।।12।।

    अर्थ · Hindi

    सरद इंदु तन चितवत मानहुँ निकर चकोर।।12।।

  202. RCM 3.13.1Open verse →

    तब रघुबीर कहा मुनि पाहीं। तुम्ह सन प्रभु दुराव कछु नाही।।

    अर्थ · Hindi

    तब रघुबीर कहा मुनि पाहीं। तुम्ह सन प्रभु दुराव कछु नाही।।

  203. RCM 3.13.2Open verse →

    तुम्ह जानहु जेहि कारन आयउँ। ताते तात न कहि समुझायउँ।।

    अर्थ · Hindi

    तुम्ह जानहु जेहि कारन आयउँ। ताते तात न कहि समुझायउँ।।

  204. RCM 3.13.3Open verse →

    अब सो मंत्र देहु प्रभु मोही। जेहि प्रकार मारौं मुनिद्रोही।।

    अर्थ · Hindi

    अब सो मंत्र देहु प्रभु मोही। जेहि प्रकार मारौं मुनिद्रोही।।

  205. RCM 3.13.4Open verse →

    मुनि मुसकाने सुनि प्रभु बानी। पूछेहु नाथ मोहि का जानी।।

    अर्थ · Hindi

    मुनि मुसकाने सुनि प्रभु बानी। पूछेहु नाथ मोहि का जानी।।

  206. RCM 3.13.5Open verse →

    तुम्हरेइँ भजन प्रभाव अघारी। जानउँ महिमा कछुक तुम्हारी।।

    अर्थ · Hindi

    तुम्हरेइँ भजन प्रभाव अघारी। जानउँ महिमा कछुक तुम्हारी।।

  207. RCM 3.13.6Open verse →

    ऊमरि तरु बिसाल तव माया। फल ब्रह्मांड अनेक निकाया।।

    अर्थ · Hindi

    ऊमरि तरु बिसाल तव माया। फल ब्रह्मांड अनेक निकाया।।

  208. RCM 3.13.7Open verse →

    जीव चराचर जंतु समाना। भीतर बसहि न जानहिं आना।।

    अर्थ · Hindi

    जीव चराचर जंतु समाना। भीतर बसहि न जानहिं आना।।

  209. RCM 3.13.8Open verse →

    ते फल भच्छक कठिन कराला। तव भयँ डरत सदा सोउ काला।।

    अर्थ · Hindi

    ते फल भच्छक कठिन कराला। तव भयँ डरत सदा सोउ काला।।

  210. RCM 3.13.9Open verse →

    ते तुम्ह सकल लोकपति साईं। पूँछेहु मोहि मनुज की नाईं।।

    अर्थ · Hindi

    ते तुम्ह सकल लोकपति साईं। पूँछेहु मोहि मनुज की नाईं।।

  211. RCM 3.13.10Open verse →

    यह बर मागउँ कृपानिकेता। बसहु हृदयँ श्री अनुज समेता।।

    अर्थ · Hindi

    यह बर मागउँ कृपानिकेता। बसहु हृदयँ श्री अनुज समेता।।

  212. RCM 3.13.11Open verse →

    अबिरल भगति बिरति सतसंगा। चरन सरोरुह प्रीति अभंगा।।

    अर्थ · Hindi

    अबिरल भगति बिरति सतसंगा। चरन सरोरुह प्रीति अभंगा।।

  213. RCM 3.13.12Open verse →

    जद्यपि ब्रह्म अखंड अनंता। अनुभव गम्य भजहिं जेहि संता।।

    अर्थ · Hindi

    जद्यपि ब्रह्म अखंड अनंता। अनुभव गम्य भजहिं जेहि संता।।

  214. RCM 3.13.13Open verse →

    अस तव रूप बखानउँ जानउँ। फिरि फिरि सगुन ब्रह्म रति मानउँ।।

    अर्थ · Hindi

    अस तव रूप बखानउँ जानउँ। फिरि फिरि सगुन ब्रह्म रति मानउँ।।

  215. RCM 3.13.14Open verse →

    संतत दासन्ह देहु बड़ाई। तातें मोहि पूँछेहु रघुराई।।

    अर्थ · Hindi

    संतत दासन्ह देहु बड़ाई। तातें मोहि पूँछेहु रघुराई।।

  216. RCM 3.13.15Open verse →

    है प्रभु परम मनोहर ठाऊँ। पावन पंचबटी तेहि नाऊँ।।

    अर्थ · Hindi

    है प्रभु परम मनोहर ठाऊँ। पावन पंचबटी तेहि नाऊँ।।

  217. RCM 3.13.16Open verse →

    दंडक बन पुनीत प्रभु करहू। उग्र साप मुनिबर कर हरहू।।

    अर्थ · Hindi

    दंडक बन पुनीत प्रभु करहू। उग्र साप मुनिबर कर हरहू।।

  218. RCM 3.13.17Open verse →

    बास करहु तहँ रघुकुल राया। कीजे सकल मुनिन्ह पर दाया।।

    अर्थ · Hindi

    बास करहु तहँ रघुकुल राया। कीजे सकल मुनिन्ह पर दाया।।

  219. RCM 3.13.18Open verse →

    चले राम मुनि आयसु पाई। तुरतहिं पंचबटी निअराई।।

    अर्थ · Hindi

    चले राम मुनि आयसु पाई। तुरतहिं पंचबटी निअराई।।

  220. RCM 3.13.19Open verse →

    गीधराज सैं भैंट भइ बहु बिधि प्रीति बढ़ाइ।।

    अर्थ · Hindi

    गीधराज सैं भैंट भइ बहु बिधि प्रीति बढ़ाइ।।

  221. RCM 3.13.20Open verse →

    गोदावरी निकट प्रभु रहे परन गृह छाइ।।13।।

    अर्थ · Hindi

    गोदावरी निकट प्रभु रहे परन गृह छाइ।।13।।

  222. RCM 3.14.1Open verse →

    जब ते राम कीन्ह तहँ बासा। सुखी भए मुनि बीती त्रासा।।

    अर्थ · Hindi

    जब ते राम कीन्ह तहँ बासा। सुखी भए मुनि बीती त्रासा।।

  223. RCM 3.14.2Open verse →

    गिरि बन नदीं ताल छबि छाए। दिन दिन प्रति अति हौहिं सुहाए।।

    अर्थ · Hindi

    गिरि बन नदीं ताल छबि छाए। दिन दिन प्रति अति हौहिं सुहाए।।

  224. RCM 3.14.3Open verse →

    खग मृग बृंद अनंदित रहहीं। मधुप मधुर गंजत छबि लहहीं।।

    अर्थ · Hindi

    खग मृग बृंद अनंदित रहहीं। मधुप मधुर गंजत छबि लहहीं।।

  225. RCM 3.14.4Open verse →

    सो बन बरनि न सक अहिराजा। जहाँ प्रगट रघुबीर बिराजा।।

    अर्थ · Hindi

    सो बन बरनि न सक अहिराजा। जहाँ प्रगट रघुबीर बिराजा।।

  226. RCM 3.14.5Open verse →

    एक बार प्रभु सुख आसीना। लछिमन बचन कहे छलहीना।।

    अर्थ · Hindi

    एक बार प्रभु सुख आसीना। लछिमन बचन कहे छलहीना।।

  227. RCM 3.14.6Open verse →

    सुर नर मुनि सचराचर साईं। मैं पूछउँ निज प्रभु की नाई।।

    अर्थ · Hindi

    सुर नर मुनि सचराचर साईं। मैं पूछउँ निज प्रभु की नाई।।

  228. RCM 3.14.7Open verse →

    मोहि समुझाइ कहहु सोइ देवा। सब तजि करौं चरन रज सेवा।।

    अर्थ · Hindi

    मोहि समुझाइ कहहु सोइ देवा। सब तजि करौं चरन रज सेवा।।

  229. RCM 3.14.8Open verse →

    कहहु ग्यान बिराग अरु माया। कहहु सो भगति करहु जेहिं दाया।।

    अर्थ · Hindi

    कहहु ग्यान बिराग अरु माया। कहहु सो भगति करहु जेहिं दाया।।

  230. RCM 3.14.9Open verse →

    ईस्वर जीव भेद प्रभु सकल कहौ समुझाइ।।

    अर्थ · Hindi

    ईस्वर जीव भेद प्रभु सकल कहौ समुझाइ।।

  231. RCM 3.14.10Open verse →

    जातें होइ चरन रति सोक मोह भ्रम जाइ।।14।।

    अर्थ · Hindi

    जातें होइ चरन रति सोक मोह भ्रम जाइ।।14।।

  232. RCM 3.15.1Open verse →

    थोरेहि महँ सब कहउँ बुझाई। सुनहु तात मति मन चित लाई।।

    अर्थ · Hindi

    थोरेहि महँ सब कहउँ बुझाई। सुनहु तात मति मन चित लाई।।

  233. RCM 3.15.2Open verse →

    मैं अरु मोर तोर तैं माया। जेहिं बस कीन्हे जीव निकाया।।

    अर्थ · Hindi

    मैं अरु मोर तोर तैं माया। जेहिं बस कीन्हे जीव निकाया।।

  234. RCM 3.15.3Open verse →

    गो गोचर जहँ लगि मन जाई। सो सब माया जानेहु भाई।।

    अर्थ · Hindi

    गो गोचर जहँ लगि मन जाई। सो सब माया जानेहु भाई।।

  235. RCM 3.15.4Open verse →

    तेहि कर भेद सुनहु तुम्ह सोऊ। बिद्या अपर अबिद्या दोऊ।।

    अर्थ · Hindi

    तेहि कर भेद सुनहु तुम्ह सोऊ। बिद्या अपर अबिद्या दोऊ।।

  236. RCM 3.15.5Open verse →

    एक दुष्ट अतिसय दुखरूपा। जा बस जीव परा भवकूपा।।

    अर्थ · Hindi

    एक दुष्ट अतिसय दुखरूपा। जा बस जीव परा भवकूपा।।

  237. RCM 3.15.6Open verse →

    एक रचइ जग गुन बस जाकें। प्रभु प्रेरित नहिं निज बल ताकें।।

    अर्थ · Hindi

    एक रचइ जग गुन बस जाकें। प्रभु प्रेरित नहिं निज बल ताकें।।

  238. RCM 3.15.7Open verse →

    ग्यान मान जहँ एकउ नाहीं। देख ब्रह्म समान सब माही।।

    अर्थ · Hindi

    ग्यान मान जहँ एकउ नाहीं। देख ब्रह्म समान सब माही।।

  239. RCM 3.15.8Open verse →

    कहिअ तात सो परम बिरागी। तृन सम सिद्धि तीनि गुन त्यागी।।

    अर्थ · Hindi

    कहिअ तात सो परम बिरागी। तृन सम सिद्धि तीनि गुन त्यागी।।

  240. RCM 3.15.9Open verse →

    माया ईस न आपु कहुँ जान कहिअ सो जीव।

    अर्थ · Hindi

    माया ईस न आपु कहुँ जान कहिअ सो जीव।

  241. RCM 3.15.10Open verse →

    बंध मोच्छ प्रद सर्बपर माया प्रेरक सीव।।15।।

    अर्थ · Hindi

    बंध मोच्छ प्रद सर्बपर माया प्रेरक सीव।।15।।

  242. RCM 3.16.1Open verse →

    धर्म तें बिरति जोग तें ग्याना। ग्यान मोच्छप्रद बेद बखाना।।

    अर्थ · Hindi

    धर्म तें बिरति जोग तें ग्याना। ग्यान मोच्छप्रद बेद बखाना।।

  243. RCM 3.16.2Open verse →

    जातें बेगि द्रवउँ मैं भाई। सो मम भगति भगत सुखदाई।।

    अर्थ · Hindi

    जातें बेगि द्रवउँ मैं भाई। सो मम भगति भगत सुखदाई।।

  244. RCM 3.16.3Open verse →

    सो सुतंत्र अवलंब न आना। तेहि आधीन ग्यान बिग्याना।।

    अर्थ · Hindi

    सो सुतंत्र अवलंब न आना। तेहि आधीन ग्यान बिग्याना।।

  245. RCM 3.16.4Open verse →

    भगति तात अनुपम सुखमूला। मिलइ जो संत होइँ अनुकूला।।

    अर्थ · Hindi

    भगति तात अनुपम सुखमूला। मिलइ जो संत होइँ अनुकूला।।

  246. RCM 3.16.5Open verse →

    भगति कि साधन कहउँ बखानी। सुगम पंथ मोहि पावहिं प्रानी।।

    अर्थ · Hindi

    भगति कि साधन कहउँ बखानी। सुगम पंथ मोहि पावहिं प्रानी।।

  247. RCM 3.16.6Open verse →

    प्रथमहिं बिप्र चरन अति प्रीती। निज निज कर्म निरत श्रुति रीती।।

    अर्थ · Hindi

    प्रथमहिं बिप्र चरन अति प्रीती। निज निज कर्म निरत श्रुति रीती।।

  248. RCM 3.16.7Open verse →

    एहि कर फल पुनि बिषय बिरागा। तब मम धर्म उपज अनुरागा।।

    अर्थ · Hindi

    एहि कर फल पुनि बिषय बिरागा। तब मम धर्म उपज अनुरागा।।

  249. RCM 3.16.8Open verse →

    श्रवनादिक नव भक्ति दृढ़ाहीं। मम लीला रति अति मन माहीं।।

    अर्थ · Hindi

    श्रवनादिक नव भक्ति दृढ़ाहीं। मम लीला रति अति मन माहीं।।

  250. RCM 3.16.9Open verse →

    संत चरन पंकज अति प्रेमा। मन क्रम बचन भजन दृढ़ नेमा।।

    अर्थ · Hindi

    संत चरन पंकज अति प्रेमा। मन क्रम बचन भजन दृढ़ नेमा।।

  251. RCM 3.16.10Open verse →

    गुरु पितु मातु बंधु पति देवा। सब मोहि कहँ जाने दृढ़ सेवा।।

    अर्थ · Hindi

    गुरु पितु मातु बंधु पति देवा। सब मोहि कहँ जाने दृढ़ सेवा।।

  252. RCM 3.16.11Open verse →

    मम गुन गावत पुलक सरीरा। गदगद गिरा नयन बह नीरा।।

    अर्थ · Hindi

    मम गुन गावत पुलक सरीरा। गदगद गिरा नयन बह नीरा।।

  253. RCM 3.16.12Open verse →

    काम आदि मद दंभ न जाकें। तात निरंतर बस मैं ताकें।।

    अर्थ · Hindi

    काम आदि मद दंभ न जाकें। तात निरंतर बस मैं ताकें।।

  254. RCM 3.16.13Open verse →

    बचन कर्म मन मोरि गति भजनु करहिं निःकाम।।

    अर्थ · Hindi

    बचन कर्म मन मोरि गति भजनु करहिं निःकाम।।

  255. RCM 3.16.14Open verse →

    तिन्ह के हृदय कमल महुँ करउँ सदा बिश्राम।।16।।

    अर्थ · Hindi

    तिन्ह के हृदय कमल महुँ करउँ सदा बिश्राम।।16।।

  256. RCM 3.17.1Open verse →

    भगति जोग सुनि अति सुख पावा। लछिमन प्रभु चरनन्हि सिरु नावा।।

    अर्थ · Hindi

    भगति जोग सुनि अति सुख पावा। लछिमन प्रभु चरनन्हि सिरु नावा।।

  257. RCM 3.17.2Open verse →

    एहि बिधि गए कछुक दिन बीती। कहत बिराग ग्यान गुन नीती।।

    अर्थ · Hindi

    एहि बिधि गए कछुक दिन बीती। कहत बिराग ग्यान गुन नीती।।

  258. RCM 3.17.3Open verse →

    सूपनखा रावन कै बहिनी। दुष्ट हृदय दारुन जस अहिनी।।

    अर्थ · Hindi

    सूपनखा रावन कै बहिनी। दुष्ट हृदय दारुन जस अहिनी।।

  259. RCM 3.17.4Open verse →

    पंचबटी सो गइ एक बारा। देखि बिकल भइ जुगल कुमारा।।

    अर्थ · Hindi

    पंचबटी सो गइ एक बारा। देखि बिकल भइ जुगल कुमारा।।

  260. RCM 3.17.5Open verse →

    भ्राता पिता पुत्र उरगारी। पुरुष मनोहर निरखत नारी।।

    अर्थ · Hindi

    भ्राता पिता पुत्र उरगारी। पुरुष मनोहर निरखत नारी।।

  261. RCM 3.17.6Open verse →

    होइ बिकल सक मनहि न रोकी। जिमि रबिमनि द्रव रबिहि बिलोकी।।

    अर्थ · Hindi

    होइ बिकल सक मनहि न रोकी। जिमि रबिमनि द्रव रबिहि बिलोकी।।

  262. RCM 3.17.7Open verse →

    रुचिर रुप धरि प्रभु पहिं जाई। बोली बचन बहुत मुसुकाई।।

    अर्थ · Hindi

    रुचिर रुप धरि प्रभु पहिं जाई। बोली बचन बहुत मुसुकाई।।

  263. RCM 3.17.8Open verse →

    तुम्ह सम पुरुष न मो सम नारी। यह सँजोग बिधि रचा बिचारी।।

    अर्थ · Hindi

    तुम्ह सम पुरुष न मो सम नारी। यह सँजोग बिधि रचा बिचारी।।

  264. RCM 3.17.9Open verse →

    मम अनुरूप पुरुष जग माहीं। देखेउँ खोजि लोक तिहु नाहीं।।

    अर्थ · Hindi

    मम अनुरूप पुरुष जग माहीं। देखेउँ खोजि लोक तिहु नाहीं।।

  265. RCM 3.17.10Open verse →

    ताते अब लगि रहिउँ कुमारी। मनु माना कछु तुम्हहि निहारी।।

    अर्थ · Hindi

    ताते अब लगि रहिउँ कुमारी। मनु माना कछु तुम्हहि निहारी।।

  266. RCM 3.17.11Open verse →

    सीतहि चितइ कही प्रभु बाता। अहइ कुआर मोर लघु भ्राता।।

    अर्थ · Hindi

    सीतहि चितइ कही प्रभु बाता। अहइ कुआर मोर लघु भ्राता।।

  267. RCM 3.17.12Open verse →

    गइ लछिमन रिपु भगिनी जानी। प्रभु बिलोकि बोले मृदु बानी।।

    अर्थ · Hindi

    गइ लछिमन रिपु भगिनी जानी। प्रभु बिलोकि बोले मृदु बानी।।

  268. RCM 3.17.13Open verse →

    सुंदरि सुनु मैं उन्ह कर दासा। पराधीन नहिं तोर सुपासा।।

    अर्थ · Hindi

    सुंदरि सुनु मैं उन्ह कर दासा। पराधीन नहिं तोर सुपासा।।

  269. RCM 3.17.14Open verse →

    प्रभु समर्थ कोसलपुर राजा। जो कछु करहिं उनहि सब छाजा।।

    अर्थ · Hindi

    प्रभु समर्थ कोसलपुर राजा। जो कछु करहिं उनहि सब छाजा।।

  270. RCM 3.17.15Open verse →

    सेवक सुख चह मान भिखारी। ब्यसनी धन सुभ गति बिभिचारी।।

    अर्थ · Hindi

    सेवक सुख चह मान भिखारी। ब्यसनी धन सुभ गति बिभिचारी।।

  271. RCM 3.17.16Open verse →

    लोभी जसु चह चार गुमानी। नभ दुहि दूध चहत ए प्रानी।।

    अर्थ · Hindi

    लोभी जसु चह चार गुमानी। नभ दुहि दूध चहत ए प्रानी।।

  272. RCM 3.17.17Open verse →

    पुनि फिरि राम निकट सो आई। प्रभु लछिमन पहिं बहुरि पठाई।।

    अर्थ · Hindi

    पुनि फिरि राम निकट सो आई। प्रभु लछिमन पहिं बहुरि पठाई।।

  273. RCM 3.17.18Open verse →

    लछिमन कहा तोहि सो बरई। जो तृन तोरि लाज परिहरई।।

    अर्थ · Hindi

    लछिमन कहा तोहि सो बरई। जो तृन तोरि लाज परिहरई।।

  274. RCM 3.17.19Open verse →

    तब खिसिआनि राम पहिं गई। रूप भयंकर प्रगटत भई।।

    अर्थ · Hindi

    तब खिसिआनि राम पहिं गई। रूप भयंकर प्रगटत भई।।

  275. RCM 3.17.20Open verse →

    सीतहि सभय देखि रघुराई। कहा अनुज सन सयन बुझाई।।

    अर्थ · Hindi

    सीतहि सभय देखि रघुराई। कहा अनुज सन सयन बुझाई।।

  276. RCM 3.17.21Open verse →

    लछिमन अति लाघवँ सो नाक कान बिनु कीन्हि।

    अर्थ · Hindi

    लछिमन अति लाघवँ सो नाक कान बिनु कीन्हि।

  277. RCM 3.17.22Open verse →

    ताके कर रावन कहँ मनौ चुनौती दीन्हि।।17।।

    अर्थ · Hindi

    ताके कर रावन कहँ मनौ चुनौती दीन्हि।।17।।

  278. RCM 3.18.1Open verse →

    नाक कान बिनु भइ बिकरारा। जनु स्त्रव सैल गैरु कै धारा।।

    अर्थ · Hindi

    नाक कान बिनु भइ बिकरारा। जनु स्त्रव सैल गैरु कै धारा।।

  279. RCM 3.18.2Open verse →

    खर दूषन पहिं गइ बिलपाता। धिग धिग तव पौरुष बल भ्राता।।

    अर्थ · Hindi

    खर दूषन पहिं गइ बिलपाता। धिग धिग तव पौरुष बल भ्राता।।

  280. RCM 3.18.3Open verse →

    तेहि पूछा सब कहेसि बुझाई। जातुधान सुनि सेन बनाई।।

    अर्थ · Hindi

    तेहि पूछा सब कहेसि बुझाई। जातुधान सुनि सेन बनाई।।

  281. RCM 3.18.4Open verse →

    धाए निसिचर निकर बरूथा। जनु सपच्छ कज्जल गिरि जूथा।।

    अर्थ · Hindi

    धाए निसिचर निकर बरूथा। जनु सपच्छ कज्जल गिरि जूथा।।

  282. RCM 3.18.5Open verse →

    नाना बाहन नानाकारा। नानायुध धर घोर अपारा।।

    अर्थ · Hindi

    नाना बाहन नानाकारा। नानायुध धर घोर अपारा।।

  283. RCM 3.18.6Open verse →

    सुपनखा आगें करि लीनी। असुभ रूप श्रुति नासा हीनी।।

    अर्थ · Hindi

    सुपनखा आगें करि लीनी। असुभ रूप श्रुति नासा हीनी।।

  284. RCM 3.18.7Open verse →

    असगुन अमित होहिं भयकारी। गनहिं न मृत्यु बिबस सब झारी।।

    अर्थ · Hindi

    असगुन अमित होहिं भयकारी। गनहिं न मृत्यु बिबस सब झारी।।

  285. RCM 3.18.8Open verse →

    गर्जहि तर्जहिं गगन उड़ाहीं। देखि कटकु भट अति हरषाहीं।।

    अर्थ · Hindi

    गर्जहि तर्जहिं गगन उड़ाहीं। देखि कटकु भट अति हरषाहीं।।

  286. RCM 3.18.9Open verse →

    कोउ कह जिअत धरहु द्वौ भाई। धरि मारहु तिय लेहु छड़ाई।।

    अर्थ · Hindi

    कोउ कह जिअत धरहु द्वौ भाई। धरि मारहु तिय लेहु छड़ाई।।

  287. RCM 3.18.10Open verse →

    धूरि पूरि नभ मंडल रहा। राम बोलाइ अनुज सन कहा।।

    अर्थ · Hindi

    धूरि पूरि नभ मंडल रहा। राम बोलाइ अनुज सन कहा।।

  288. RCM 3.18.11Open verse →

    लै जानकिहि जाहु गिरि कंदर। आवा निसिचर कटकु भयंकर।।

    अर्थ · Hindi

    लै जानकिहि जाहु गिरि कंदर। आवा निसिचर कटकु भयंकर।।

  289. RCM 3.18.12Open verse →

    रहेहु सजग सुनि प्रभु कै बानी। चले सहित श्री सर धनु पानी।।

    अर्थ · Hindi

    रहेहु सजग सुनि प्रभु कै बानी। चले सहित श्री सर धनु पानी।।

  290. RCM 3.18.13Open verse →

    देखि राम रिपुदल चलि आवा। बिहसि कठिन कोदंड चढ़ावा।।

    अर्थ · Hindi

    देखि राम रिपुदल चलि आवा। बिहसि कठिन कोदंड चढ़ावा।।

  291. RCM 3.19.1Open verse →

    प्रभु बिलोकि सर सकहिं न डारी। थकित भई रजनीचर धारी।।

    अर्थ · Hindi

    प्रभु बिलोकि सर सकहिं न डारी। थकित भई रजनीचर धारी।।

  292. RCM 3.19.2Open verse →

    सचिव बोलि बोले खर दूषन। यह कोउ नृपबालक नर भूषन।।

    अर्थ · Hindi

    सचिव बोलि बोले खर दूषन। यह कोउ नृपबालक नर भूषन।।

  293. RCM 3.19.3Open verse →

    नाग असुर सुर नर मुनि जेते। देखे जिते हते हम केते।।

    अर्थ · Hindi

    नाग असुर सुर नर मुनि जेते। देखे जिते हते हम केते।।

  294. RCM 3.19.4Open verse →

    हम भरि जन्म सुनहु सब भाई। देखी नहिं असि सुंदरताई।।

    अर्थ · Hindi

    हम भरि जन्म सुनहु सब भाई। देखी नहिं असि सुंदरताई।।

  295. RCM 3.19.5Open verse →

    जद्यपि भगिनी कीन्ह कुरूपा। बध लायक नहिं पुरुष अनूपा।।

    अर्थ · Hindi

    जद्यपि भगिनी कीन्ह कुरूपा। बध लायक नहिं पुरुष अनूपा।।

  296. RCM 3.19.6Open verse →

    देहु तुरत निज नारि दुराई। जीअत भवन जाहु द्वौ भाई।।

    अर्थ · Hindi

    देहु तुरत निज नारि दुराई। जीअत भवन जाहु द्वौ भाई।।

  297. RCM 3.19.7Open verse →

    मोर कहा तुम्ह ताहि सुनावहु। तासु बचन सुनि आतुर आवहु।।

    अर्थ · Hindi

    मोर कहा तुम्ह ताहि सुनावहु। तासु बचन सुनि आतुर आवहु।।

  298. RCM 3.19.8Open verse →

    दूतन्ह कहा राम सन जाई। सुनत राम बोले मुसकाई।।

    अर्थ · Hindi

    दूतन्ह कहा राम सन जाई। सुनत राम बोले मुसकाई।।

  299. RCM 3.19.9Open verse →

    हम छत्री मृगया बन करहीं। तुम्ह से खल मृग खौजत फिरहीं।।

    अर्थ · Hindi

    हम छत्री मृगया बन करहीं। तुम्ह से खल मृग खौजत फिरहीं।।

  300. RCM 3.19.10Open verse →

    रिपु बलवंत देखि नहिं डरहीं। एक बार कालहु सन लरहीं।।

    अर्थ · Hindi

    रिपु बलवंत देखि नहिं डरहीं। एक बार कालहु सन लरहीं।।

  301. RCM 3.19.11Open verse →

    जद्यपि मनुज दनुज कुल घालक। मुनि पालक खल सालक बालक।।

    अर्थ · Hindi

    जद्यपि मनुज दनुज कुल घालक। मुनि पालक खल सालक बालक।।

  302. RCM 3.19.12Open verse →

    जौं न होइ बल घर फिरि जाहू। समर बिमुख मैं हतउँ न काहू।।

    अर्थ · Hindi

    जौं न होइ बल घर फिरि जाहू। समर बिमुख मैं हतउँ न काहू।।

  303. RCM 3.19.13Open verse →

    रन चढ़ि करिअ कपट चतुराई। रिपु पर कृपा परम कदराई।।

    अर्थ · Hindi

    रन चढ़ि करिअ कपट चतुराई। रिपु पर कृपा परम कदराई।।

  304. RCM 3.19.14Open verse →

    दूतन्ह जाइ तुरत सब कहेऊ। सुनि खर दूषन उर अति दहेऊ।।

    अर्थ · Hindi

    दूतन्ह जाइ तुरत सब कहेऊ। सुनि खर दूषन उर अति दहेऊ।।

  305. RCM 3.20.1Open verse →

    तब चले जान बबान कराल। फुंकरत जनु बहु ब्याल।।

    अर्थ · Hindi

    तब चले जान बबान कराल। फुंकरत जनु बहु ब्याल।।

  306. RCM 3.20.2Open verse →

    कोपेउ समर श्रीराम। चले बिसिख निसित निकाम।।

    अर्थ · Hindi

    कोपेउ समर श्रीराम। चले बिसिख निसित निकाम।।

  307. RCM 3.20.3Open verse →

    अवलोकि खरतर तीर। मुरि चले निसिचर बीर।।

    अर्थ · Hindi

    अवलोकि खरतर तीर। मुरि चले निसिचर बीर।।

  308. RCM 3.20.4Open verse →

    भए क्रुद्ध तीनिउ भाइ। जो भागि रन ते जाइ।।

    अर्थ · Hindi

    भए क्रुद्ध तीनिउ भाइ। जो भागि रन ते जाइ।।

  309. RCM 3.20.5Open verse →

    तेहि बधब हम निज पानि। फिरे मरन मन महुँ ठानि।।

    अर्थ · Hindi

    तेहि बधब हम निज पानि। फिरे मरन मन महुँ ठानि।।

  310. RCM 3.20.6Open verse →

    आयुध अनेक प्रकार। सनमुख ते करहिं प्रहार।।

    अर्थ · Hindi

    आयुध अनेक प्रकार। सनमुख ते करहिं प्रहार।।

  311. RCM 3.20.7Open verse →

    रिपु परम कोपे जानि। प्रभु धनुष सर संधानि।।

    अर्थ · Hindi

    रिपु परम कोपे जानि। प्रभु धनुष सर संधानि।।

  312. RCM 3.20.8Open verse →

    छाँड़े बिपुल नाराच। लगे कटन बिकट पिसाच।।

    अर्थ · Hindi

    छाँड़े बिपुल नाराच। लगे कटन बिकट पिसाच।।

  313. RCM 3.20.9Open verse →

    उर सीस भुज कर चरन। जहँ तहँ लगे महि परन।।

    अर्थ · Hindi

    उर सीस भुज कर चरन। जहँ तहँ लगे महि परन।।

  314. RCM 3.20.10Open verse →

    चिक्करत लागत बान। धर परत कुधर समान।।

    अर्थ · Hindi

    चिक्करत लागत बान। धर परत कुधर समान।।

  315. RCM 3.20.11Open verse →

    भट कटत तन सत खंड। पुनि उठत करि पाषंड।।

    अर्थ · Hindi

    भट कटत तन सत खंड। पुनि उठत करि पाषंड।।

  316. RCM 3.20.12Open verse →

    नभ उड़त बहु भुज मुंड। बिनु मौलि धावत रुंड।।

    अर्थ · Hindi

    नभ उड़त बहु भुज मुंड। बिनु मौलि धावत रुंड।।

  317. RCM 3.20.13Open verse →

    खग कंक काक सृगाल। कटकटहिं कठिन कराल।।

    अर्थ · Hindi

    खग कंक काक सृगाल। कटकटहिं कठिन कराल।।

  318. RCM 3.20.14Open verse →

    कटकटहिं ज़ंबुक भूत प्रेत पिसाच खर्पर संचहीं।

    अर्थ · Hindi

    कटकटहिं ज़ंबुक भूत प्रेत पिसाच खर्पर संचहीं।

  319. RCM 3.20.15Open verse →

    बेताल बीर कपाल ताल बजाइ जोगिनि नंचहीं।।

    अर्थ · Hindi

    बेताल बीर कपाल ताल बजाइ जोगिनि नंचहीं।।

  320. RCM 3.20.16Open verse →

    रघुबीर बान प्रचंड खंडहिं भटन्ह के उर भुज सिरा।

    अर्थ · Hindi

    रघुबीर बान प्रचंड खंडहिं भटन्ह के उर भुज सिरा।

  321. RCM 3.20.17Open verse →

    जहँ तहँ परहिं उठि लरहिं धर धरु धरु करहिं भयकर गिरा।।

    अर्थ · Hindi

    जहँ तहँ परहिं उठि लरहिं धर धरु धरु करहिं भयकर गिरा।।

  322. RCM 3.20.18Open verse →

    अंतावरीं गहि उड़त गीध पिसाच कर गहि धावहीं।।

    अर्थ · Hindi

    अंतावरीं गहि उड़त गीध पिसाच कर गहि धावहीं।।

  323. RCM 3.20.19Open verse →

    संग्राम पुर बासी मनहुँ बहु बाल गुड़ी उड़ावहीं।।

    अर्थ · Hindi

    संग्राम पुर बासी मनहुँ बहु बाल गुड़ी उड़ावहीं।।

  324. RCM 3.20.20Open verse →

    मारे पछारे उर बिदारे बिपुल भट कहँरत परे।

    अर्थ · Hindi

    मारे पछारे उर बिदारे बिपुल भट कहँरत परे।

  325. RCM 3.20.21Open verse →

    अवलोकि निज दल बिकल भट तिसिरादि खर दूषन फिरे।।

    अर्थ · Hindi

    अवलोकि निज दल बिकल भट तिसिरादि खर दूषन फिरे।।

  326. RCM 3.20.22Open verse →

    सर सक्ति तोमर परसु सूल कृपान एकहि बारहीं।

    अर्थ · Hindi

    सर सक्ति तोमर परसु सूल कृपान एकहि बारहीं।

  327. RCM 3.20.23Open verse →

    करि कोप श्रीरघुबीर पर अगनित निसाचर डारहीं।।

    अर्थ · Hindi

    करि कोप श्रीरघुबीर पर अगनित निसाचर डारहीं।।

  328. RCM 3.20.24Open verse →

    प्रभु निमिष महुँ रिपु सर निवारि पचारि डारे सायका।

    अर्थ · Hindi

    प्रभु निमिष महुँ रिपु सर निवारि पचारि डारे सायका।

  329. RCM 3.20.25Open verse →

    दस दस बिसिख उर माझ मारे सकल निसिचर नायका।।

    अर्थ · Hindi

    दस दस बिसिख उर माझ मारे सकल निसिचर नायका।।

  330. RCM 3.20.26Open verse →

    महि परत उठि भट भिरत मरत न करत माया अति घनी।

    अर्थ · Hindi

    महि परत उठि भट भिरत मरत न करत माया अति घनी।

  331. RCM 3.20.27Open verse →

    सुर डरत चौदह सहस प्रेत बिलोकि एक अवध धनी।।

    अर्थ · Hindi

    सुर डरत चौदह सहस प्रेत बिलोकि एक अवध धनी।।

  332. RCM 3.20.28Open verse →

    सुर मुनि सभय प्रभु देखि मायानाथ अति कौतुक कर् यो।

    अर्थ · Hindi

    सुर मुनि सभय प्रभु देखि मायानाथ अति कौतुक कर् यो।

  333. RCM 3.20.29Open verse →

    देखहि परसपर राम करि संग्राम रिपुदल लरि मर् यो।।

    अर्थ · Hindi

    देखहि परसपर राम करि संग्राम रिपुदल लरि मर् यो।।

  334. RCM 3.21.1Open verse →

    जब रघुनाथ समर रिपु जीते। सुर नर मुनि सब के भय बीते।।

    अर्थ · Hindi

    जब रघुनाथ समर रिपु जीते। सुर नर मुनि सब के भय बीते।।

  335. RCM 3.21.2Open verse →

    तब लछिमन सीतहि लै आए। प्रभु पद परत हरषि उर लाए।

    अर्थ · Hindi

    तब लछिमन सीतहि लै आए। प्रभु पद परत हरषि उर लाए।

  336. RCM 3.21.3Open verse →

    सीता चितव स्याम मृदु गाता। परम प्रेम लोचन न अघाता।।

    अर्थ · Hindi

    सीता चितव स्याम मृदु गाता। परम प्रेम लोचन न अघाता।।

  337. RCM 3.21.4Open verse →

    पंचवटीं बसि श्रीरघुनायक। करत चरित सुर मुनि सुखदायक।।

    अर्थ · Hindi

    पंचवटीं बसि श्रीरघुनायक। करत चरित सुर मुनि सुखदायक।।

  338. RCM 3.21.5Open verse →

    धुआँ देखि खरदूषन केरा। जाइ सुपनखाँ रावन प्रेरा।।

    अर्थ · Hindi

    धुआँ देखि खरदूषन केरा। जाइ सुपनखाँ रावन प्रेरा।।

  339. RCM 3.21.6Open verse →

    बोलि बचन क्रोध करि भारी। देस कोस कै सुरति बिसारी।।

    अर्थ · Hindi

    बोलि बचन क्रोध करि भारी। देस कोस कै सुरति बिसारी।।

  340. RCM 3.21.7Open verse →

    करसि पान सोवसि दिनु राती। सुधि नहिं तव सिर पर आराती।।

    अर्थ · Hindi

    करसि पान सोवसि दिनु राती। सुधि नहिं तव सिर पर आराती।।

  341. RCM 3.21.8Open verse →

    राज नीति बिनु धन बिनु धर्मा। हरिहि समर्पे बिनु सतकर्मा।।

    अर्थ · Hindi

    राज नीति बिनु धन बिनु धर्मा। हरिहि समर्पे बिनु सतकर्मा।।

  342. RCM 3.21.9Open verse →

    बिद्या बिनु बिबेक उपजाएँ। श्रम फल पढ़े किएँ अरु पाएँ।।

    अर्थ · Hindi

    बिद्या बिनु बिबेक उपजाएँ। श्रम फल पढ़े किएँ अरु पाएँ।।

  343. RCM 3.21.10Open verse →

    संग ते जती कुमंत्र ते राजा। मान ते ग्यान पान तें लाजा।।

    अर्थ · Hindi

    संग ते जती कुमंत्र ते राजा। मान ते ग्यान पान तें लाजा।।

  344. RCM 3.21.11Open verse →

    प्रीति प्रनय बिनु मद ते गुनी। नासहि बेगि नीति अस सुनी।।

    अर्थ · Hindi

    प्रीति प्रनय बिनु मद ते गुनी। नासहि बेगि नीति अस सुनी।।

  345. RCM 3.21.12Open verse →

    रिपु रुज पावक पाप प्रभु अहि गनिअ न छोट करि।

    अर्थ · Hindi

    रिपु रुज पावक पाप प्रभु अहि गनिअ न छोट करि।

  346. RCM 3.21.13Open verse →

    अस कहि बिबिध बिलाप करि लागी रोदन करन।।21(क)।।

    अर्थ · Hindi

    अस कहि बिबिध बिलाप करि लागी रोदन करन।।21(क)।।

  347. RCM 3.21.14Open verse →

    सभा माझ परि ब्याकुल बहु प्रकार कह रोइ।

    अर्थ · Hindi

    सभा माझ परि ब्याकुल बहु प्रकार कह रोइ।

  348. RCM 3.21.15Open verse →

    तोहि जिअत दसकंधर मोरि कि असि गति होइ।।21(ख)।।

    अर्थ · Hindi

    तोहि जिअत दसकंधर मोरि कि असि गति होइ।।21(ख)।।

  349. RCM 3.22.1Open verse →

    सुनत सभासद उठे अकुलाई। समुझाई गहि बाहँ उठाई।।

    अर्थ · Hindi

    सुनत सभासद उठे अकुलाई। समुझाई गहि बाहँ उठाई।।

  350. RCM 3.22.2Open verse →

    कह लंकेस कहसि निज बाता। केंइँ तव नासा कान निपाता।।

    अर्थ · Hindi

    कह लंकेस कहसि निज बाता। केंइँ तव नासा कान निपाता।।

  351. RCM 3.22.3Open verse →

    अवध नृपति दसरथ के जाए। पुरुष सिंघ बन खेलन आए।।

    अर्थ · Hindi

    अवध नृपति दसरथ के जाए। पुरुष सिंघ बन खेलन आए।।

  352. RCM 3.22.4Open verse →

    समुझि परी मोहि उन्ह कै करनी। रहित निसाचर करिहहिं धरनी।।

    अर्थ · Hindi

    समुझि परी मोहि उन्ह कै करनी। रहित निसाचर करिहहिं धरनी।।

  353. RCM 3.22.5Open verse →

    जिन्ह कर भुजबल पाइ दसानन। अभय भए बिचरत मुनि कानन।।

    अर्थ · Hindi

    जिन्ह कर भुजबल पाइ दसानन। अभय भए बिचरत मुनि कानन।।

  354. RCM 3.22.6Open verse →

    देखत बालक काल समाना। परम धीर धन्वी गुन नाना।।

    अर्थ · Hindi

    देखत बालक काल समाना। परम धीर धन्वी गुन नाना।।

  355. RCM 3.22.7Open verse →

    अतुलित बल प्रताप द्वौ भ्राता। खल बध रत सुर मुनि सुखदाता।।

    अर्थ · Hindi

    अतुलित बल प्रताप द्वौ भ्राता। खल बध रत सुर मुनि सुखदाता।।

  356. RCM 3.22.8Open verse →

    सोभाधाम राम अस नामा। तिन्ह के संग नारि एक स्यामा।।

    अर्थ · Hindi

    सोभाधाम राम अस नामा। तिन्ह के संग नारि एक स्यामा।।

  357. RCM 3.22.9Open verse →

    रुप रासि बिधि नारि सँवारी। रति सत कोटि तासु बलिहारी।।

    अर्थ · Hindi

    रुप रासि बिधि नारि सँवारी। रति सत कोटि तासु बलिहारी।।

  358. RCM 3.22.10Open verse →

    तासु अनुज काटे श्रुति नासा। सुनि तव भगिनि करहिं परिहासा।।

    अर्थ · Hindi

    तासु अनुज काटे श्रुति नासा। सुनि तव भगिनि करहिं परिहासा।।

  359. RCM 3.22.11Open verse →

    खर दूषन सुनि लगे पुकारा। छन महुँ सकल कटक उन्ह मारा।।

    अर्थ · Hindi

    खर दूषन सुनि लगे पुकारा। छन महुँ सकल कटक उन्ह मारा।।

  360. RCM 3.22.12Open verse →

    खर दूषन तिसिरा कर घाता। सुनि दससीस जरे सब गाता।।

    अर्थ · Hindi

    खर दूषन तिसिरा कर घाता। सुनि दससीस जरे सब गाता।।

  361. RCM 3.22.13Open verse →

    सुपनखहि समुझाइ करि बल बोलेसि बहु भाँति।

    अर्थ · Hindi

    सुपनखहि समुझाइ करि बल बोलेसि बहु भाँति।

  362. RCM 3.22.14Open verse →

    गयउ भवन अति सोचबस नीद परइ नहिं राति।।22।।

    अर्थ · Hindi

    गयउ भवन अति सोचबस नीद परइ नहिं राति।।22।।

  363. RCM 3.23.1Open verse →

    सुर नर असुर नाग खग माहीं। मोरे अनुचर कहँ कोउ नाहीं।।

    अर्थ · Hindi

    सुर नर असुर नाग खग माहीं। मोरे अनुचर कहँ कोउ नाहीं।।

  364. RCM 3.23.2Open verse →

    खर दूषन मोहि सम बलवंता। तिन्हहि को मारइ बिनु भगवंता।।

    अर्थ · Hindi

    खर दूषन मोहि सम बलवंता। तिन्हहि को मारइ बिनु भगवंता।।

  365. RCM 3.23.3Open verse →

    सुर रंजन भंजन महि भारा। जौं भगवंत लीन्ह अवतारा।।

    अर्थ · Hindi

    सुर रंजन भंजन महि भारा। जौं भगवंत लीन्ह अवतारा।।

  366. RCM 3.23.4Open verse →

    तौ मै जाइ बैरु हठि करऊँ। प्रभु सर प्रान तजें भव तरऊँ।।

    अर्थ · Hindi

    तौ मै जाइ बैरु हठि करऊँ। प्रभु सर प्रान तजें भव तरऊँ।।

  367. RCM 3.23.5Open verse →

    होइहि भजनु न तामस देहा। मन क्रम बचन मंत्र दृढ़ एहा।।

    अर्थ · Hindi

    होइहि भजनु न तामस देहा। मन क्रम बचन मंत्र दृढ़ एहा।।

  368. RCM 3.23.6Open verse →

    जौं नररुप भूपसुत कोऊ। हरिहउँ नारि जीति रन दोऊ।।

    अर्थ · Hindi

    जौं नररुप भूपसुत कोऊ। हरिहउँ नारि जीति रन दोऊ।।

  369. RCM 3.23.7Open verse →

    चला अकेल जान चढि तहवाँ। बस मारीच सिंधु तट जहवाँ।।

    अर्थ · Hindi

    चला अकेल जान चढि तहवाँ। बस मारीच सिंधु तट जहवाँ।।

  370. RCM 3.23.8Open verse →

    इहाँ राम जसि जुगुति बनाई। सुनहु उमा सो कथा सुहाई।।

    अर्थ · Hindi

    इहाँ राम जसि जुगुति बनाई। सुनहु उमा सो कथा सुहाई।।

  371. RCM 3.23.9Open verse →

    लछिमन गए बनहिं जब लेन मूल फल कंद।

    अर्थ · Hindi

    लछिमन गए बनहिं जब लेन मूल फल कंद।

  372. RCM 3.23.10Open verse →

    जनकसुता सन बोले बिहसि कृपा सुख बृंद।। 23।।

    अर्थ · Hindi

    जनकसुता सन बोले बिहसि कृपा सुख बृंद।। 23।।

  373. RCM 3.24.1Open verse →

    सुनहु प्रिया ब्रत रुचिर सुसीला। मैं कछु करबि ललित नरलीला।।

    अर्थ · Hindi

    सुनहु प्रिया ब्रत रुचिर सुसीला। मैं कछु करबि ललित नरलीला।।

  374. RCM 3.24.2Open verse →

    तुम्ह पावक महुँ करहु निवासा। जौ लगि करौं निसाचर नासा।।

    अर्थ · Hindi

    तुम्ह पावक महुँ करहु निवासा। जौ लगि करौं निसाचर नासा।।

  375. RCM 3.24.3Open verse →

    जबहिं राम सब कहा बखानी। प्रभु पद धरि हियँ अनल समानी।।

    अर्थ · Hindi

    जबहिं राम सब कहा बखानी। प्रभु पद धरि हियँ अनल समानी।।

  376. RCM 3.24.4Open verse →

    निज प्रतिबिंब राखि तहँ सीता। तैसइ सील रुप सुबिनीता।।

    अर्थ · Hindi

    निज प्रतिबिंब राखि तहँ सीता। तैसइ सील रुप सुबिनीता।।

  377. RCM 3.24.5Open verse →

    लछिमनहूँ यह मरमु न जाना। जो कछु चरित रचा भगवाना।।

    अर्थ · Hindi

    लछिमनहूँ यह मरमु न जाना। जो कछु चरित रचा भगवाना।।

  378. RCM 3.24.6Open verse →

    दसमुख गयउ जहाँ मारीचा। नाइ माथ स्वारथ रत नीचा।।

    अर्थ · Hindi

    दसमुख गयउ जहाँ मारीचा। नाइ माथ स्वारथ रत नीचा।।

  379. RCM 3.24.7Open verse →

    नवनि नीच कै अति दुखदाई। जिमि अंकुस धनु उरग बिलाई।।

    अर्थ · Hindi

    नवनि नीच कै अति दुखदाई। जिमि अंकुस धनु उरग बिलाई।।

  380. RCM 3.24.8Open verse →

    भयदायक खल कै प्रिय बानी। जिमि अकाल के कुसुम भवानी।।

    अर्थ · Hindi

    भयदायक खल कै प्रिय बानी। जिमि अकाल के कुसुम भवानी।।

  381. RCM 3.24.9Open verse →

    करि पूजा मारीच तब सादर पूछी बात।

    अर्थ · Hindi

    करि पूजा मारीच तब सादर पूछी बात।

  382. RCM 3.24.10Open verse →

    कवन हेतु मन ब्यग्र अति अकसर आयहु तात।।24।।

    अर्थ · Hindi

    कवन हेतु मन ब्यग्र अति अकसर आयहु तात।।24।।

  383. RCM 3.25.1Open verse →

    दसमुख सकल कथा तेहि आगें। कही सहित अभिमान अभागें।।

    अर्थ · Hindi

    दसमुख सकल कथा तेहि आगें। कही सहित अभिमान अभागें।।

  384. RCM 3.25.2Open verse →

    होहु कपट मृग तुम्ह छलकारी। जेहि बिधि हरि आनौ नृपनारी।।

    अर्थ · Hindi

    होहु कपट मृग तुम्ह छलकारी। जेहि बिधि हरि आनौ नृपनारी।।

  385. RCM 3.25.3Open verse →

    तेहिं पुनि कहा सुनहु दससीसा। ते नररुप चराचर ईसा।।

    अर्थ · Hindi

    तेहिं पुनि कहा सुनहु दससीसा। ते नररुप चराचर ईसा।।

  386. RCM 3.25.4Open verse →

    तासों तात बयरु नहिं कीजे। मारें मरिअ जिआएँ जीजै।।

    अर्थ · Hindi

    तासों तात बयरु नहिं कीजे। मारें मरिअ जिआएँ जीजै।।

  387. RCM 3.25.5Open verse →

    मुनि मख राखन गयउ कुमारा। बिनु फर सर रघुपति मोहि मारा।।

    अर्थ · Hindi

    मुनि मख राखन गयउ कुमारा। बिनु फर सर रघुपति मोहि मारा।।

  388. RCM 3.25.6Open verse →

    सत जोजन आयउँ छन माहीं। तिन्ह सन बयरु किएँ भल नाहीं।।

    अर्थ · Hindi

    सत जोजन आयउँ छन माहीं। तिन्ह सन बयरु किएँ भल नाहीं।।

  389. RCM 3.25.7Open verse →

    भइ मम कीट भृंग की नाई। जहँ तहँ मैं देखउँ दोउ भाई।।

    अर्थ · Hindi

    भइ मम कीट भृंग की नाई। जहँ तहँ मैं देखउँ दोउ भाई।।

  390. RCM 3.25.8Open verse →

    जौं नर तात तदपि अति सूरा। तिन्हहि बिरोधि न आइहि पूरा।।

    अर्थ · Hindi

    जौं नर तात तदपि अति सूरा। तिन्हहि बिरोधि न आइहि पूरा।।

  391. RCM 3.25.9Open verse →

    जेहिं ताड़का सुबाहु हति खंडेउ हर कोदंड।।

    अर्थ · Hindi

    जेहिं ताड़का सुबाहु हति खंडेउ हर कोदंड।।

  392. RCM 3.25.10Open verse →

    खर दूषन तिसिरा बधेउ मनुज कि अस बरिबंड।।25।।

    अर्थ · Hindi

    खर दूषन तिसिरा बधेउ मनुज कि अस बरिबंड।।25।।

  393. RCM 3.26.1Open verse →

    जाहु भवन कुल कुसल बिचारी। सुनत जरा दीन्हिसि बहु गारी।।

    अर्थ · Hindi

    जाहु भवन कुल कुसल बिचारी। सुनत जरा दीन्हिसि बहु गारी।।

  394. RCM 3.26.2Open verse →

    गुरु जिमि मूढ़ करसि मम बोधा। कहु जग मोहि समान को जोधा।।

    अर्थ · Hindi

    गुरु जिमि मूढ़ करसि मम बोधा। कहु जग मोहि समान को जोधा।।

  395. RCM 3.26.3Open verse →

    तब मारीच हृदयँ अनुमाना। नवहि बिरोधें नहिं कल्याना।।

    अर्थ · Hindi

    तब मारीच हृदयँ अनुमाना। नवहि बिरोधें नहिं कल्याना।।

  396. RCM 3.26.4Open verse →

    सस्त्री मर्मी प्रभु सठ धनी। बैद बंदि कबि भानस गुनी।।

    अर्थ · Hindi

    सस्त्री मर्मी प्रभु सठ धनी। बैद बंदि कबि भानस गुनी।।

  397. RCM 3.26.5Open verse →

    उभय भाँति देखा निज मरना। तब ताकिसि रघुनायक सरना।।

    अर्थ · Hindi

    उभय भाँति देखा निज मरना। तब ताकिसि रघुनायक सरना।।

  398. RCM 3.26.6Open verse →

    उतरु देत मोहि बधब अभागें। कस न मरौं रघुपति सर लागें।।

    अर्थ · Hindi

    उतरु देत मोहि बधब अभागें। कस न मरौं रघुपति सर लागें।।

  399. RCM 3.26.7Open verse →

    अस जियँ जानि दसानन संगा। चला राम पद प्रेम अभंगा।।

    अर्थ · Hindi

    अस जियँ जानि दसानन संगा। चला राम पद प्रेम अभंगा।।

  400. RCM 3.26.8Open verse →

    मन अति हरष जनाव न तेही। आजु देखिहउँ परम सनेही।।

    अर्थ · Hindi

    मन अति हरष जनाव न तेही। आजु देखिहउँ परम सनेही।।

  401. RCM 3.27.1Open verse →

    तेहि बन निकट दसानन गयऊ। तब मारीच कपटमृग भयऊ।।

    अर्थ · Hindi

    तेहि बन निकट दसानन गयऊ। तब मारीच कपटमृग भयऊ।।

  402. RCM 3.27.2Open verse →

    अति बिचित्र कछु बरनि न जाई। कनक देह मनि रचित बनाई।।

    अर्थ · Hindi

    अति बिचित्र कछु बरनि न जाई। कनक देह मनि रचित बनाई।।

  403. RCM 3.27.3Open verse →

    सीता परम रुचिर मृग देखा। अंग अंग सुमनोहर बेषा।।

    अर्थ · Hindi

    सीता परम रुचिर मृग देखा। अंग अंग सुमनोहर बेषा।।

  404. RCM 3.27.4Open verse →

    सुनहु देव रघुबीर कृपाला। एहि मृग कर अति सुंदर छाला।।

    अर्थ · Hindi

    सुनहु देव रघुबीर कृपाला। एहि मृग कर अति सुंदर छाला।।

  405. RCM 3.27.5Open verse →

    सत्यसंध प्रभु बधि करि एही। आनहु चर्म कहति बैदेही।।

    अर्थ · Hindi

    सत्यसंध प्रभु बधि करि एही। आनहु चर्म कहति बैदेही।।

  406. RCM 3.27.6Open verse →

    तब रघुपति जानत सब कारन। उठे हरषि सुर काजु सँवारन।।

    अर्थ · Hindi

    तब रघुपति जानत सब कारन। उठे हरषि सुर काजु सँवारन।।

  407. RCM 3.27.7Open verse →

    मृग बिलोकि कटि परिकर बाँधा। करतल चाप रुचिर सर साँधा।।

    अर्थ · Hindi

    मृग बिलोकि कटि परिकर बाँधा। करतल चाप रुचिर सर साँधा।।

  408. RCM 3.27.8Open verse →

    प्रभु लछिमनिहि कहा समुझाई। फिरत बिपिन निसिचर बहु भाई।।

    अर्थ · Hindi

    प्रभु लछिमनिहि कहा समुझाई। फिरत बिपिन निसिचर बहु भाई।।

  409. RCM 3.27.9Open verse →

    सीता केरि करेहु रखवारी। बुधि बिबेक बल समय बिचारी।।

    अर्थ · Hindi

    सीता केरि करेहु रखवारी। बुधि बिबेक बल समय बिचारी।।

  410. RCM 3.27.10Open verse →

    प्रभुहि बिलोकि चला मृग भाजी। धाए रामु सरासन साजी।।

    अर्थ · Hindi

    प्रभुहि बिलोकि चला मृग भाजी। धाए रामु सरासन साजी।।

  411. RCM 3.27.11Open verse →

    निगम नेति सिव ध्यान न पावा। मायामृग पाछें सो धावा।।

    अर्थ · Hindi

    निगम नेति सिव ध्यान न पावा। मायामृग पाछें सो धावा।।

  412. RCM 3.27.12Open verse →

    कबहुँ निकट पुनि दूरि पराई। कबहुँक प्रगटइ कबहुँ छपाई।।

    अर्थ · Hindi

    कबहुँ निकट पुनि दूरि पराई। कबहुँक प्रगटइ कबहुँ छपाई।।

  413. RCM 3.27.13Open verse →

    प्रगटत दुरत करत छल भूरी। एहि बिधि प्रभुहि गयउ लै दूरी।।

    अर्थ · Hindi

    प्रगटत दुरत करत छल भूरी। एहि बिधि प्रभुहि गयउ लै दूरी।।

  414. RCM 3.27.14Open verse →

    तब तकि राम कठिन सर मारा। धरनि परेउ करि घोर पुकारा।।

    अर्थ · Hindi

    तब तकि राम कठिन सर मारा। धरनि परेउ करि घोर पुकारा।।

  415. RCM 3.27.15Open verse →

    लछिमन कर प्रथमहिं लै नामा। पाछें सुमिरेसि मन महुँ रामा।।

    अर्थ · Hindi

    लछिमन कर प्रथमहिं लै नामा। पाछें सुमिरेसि मन महुँ रामा।।

  416. RCM 3.27.16Open verse →

    प्रान तजत प्रगटेसि निज देहा। सुमिरेसि रामु समेत सनेहा।।

    अर्थ · Hindi

    प्रान तजत प्रगटेसि निज देहा। सुमिरेसि रामु समेत सनेहा।।

  417. RCM 3.27.17Open verse →

    अंतर प्रेम तासु पहिचाना। मुनि दुर्लभ गति दीन्हि सुजाना।।

    अर्थ · Hindi

    अंतर प्रेम तासु पहिचाना। मुनि दुर्लभ गति दीन्हि सुजाना।।

  418. RCM 3.27.18Open verse →

    बिपुल सुमन सुर बरषहिं गावहिं प्रभु गुन गाथ।

    अर्थ · Hindi

    बिपुल सुमन सुर बरषहिं गावहिं प्रभु गुन गाथ।

  419. RCM 3.27.19Open verse →

    निज पद दीन्ह असुर कहुँ दीनबंधु रघुनाथ।।27।।

    अर्थ · Hindi

    निज पद दीन्ह असुर कहुँ दीनबंधु रघुनाथ।।27।।

  420. RCM 3.28.1Open verse →

    खल बधि तुरत फिरे रघुबीरा। सोह चाप कर कटि तूनीरा।।

    अर्थ · Hindi

    खल बधि तुरत फिरे रघुबीरा। सोह चाप कर कटि तूनीरा।।

  421. RCM 3.28.2Open verse →

    आरत गिरा सुनी जब सीता। कह लछिमन सन परम सभीता।।

    अर्थ · Hindi

    आरत गिरा सुनी जब सीता। कह लछिमन सन परम सभीता।।

  422. RCM 3.28.3Open verse →

    जाहु बेगि संकट अति भ्राता। लछिमन बिहसि कहा सुनु माता।।

    अर्थ · Hindi

    जाहु बेगि संकट अति भ्राता। लछिमन बिहसि कहा सुनु माता।।

  423. RCM 3.28.4Open verse →

    भृकुटि बिलास सृष्टि लय होई। सपनेहुँ संकट परइ कि सोई।।

    अर्थ · Hindi

    भृकुटि बिलास सृष्टि लय होई। सपनेहुँ संकट परइ कि सोई।।

  424. RCM 3.28.5Open verse →

    मरम बचन जब सीता बोला। हरि प्रेरित लछिमन मन डोला।।

    अर्थ · Hindi

    मरम बचन जब सीता बोला। हरि प्रेरित लछिमन मन डोला।।

  425. RCM 3.28.6Open verse →

    बन दिसि देव सौंपि सब काहू। चले जहाँ रावन ससि राहू।।

    अर्थ · Hindi

    बन दिसि देव सौंपि सब काहू। चले जहाँ रावन ससि राहू।।

  426. RCM 3.28.7Open verse →

    सून बीच दसकंधर देखा। आवा निकट जती कें बेषा।।

    अर्थ · Hindi

    सून बीच दसकंधर देखा। आवा निकट जती कें बेषा।।

  427. RCM 3.28.8Open verse →

    जाकें डर सुर असुर डेराहीं। निसि न नीद दिन अन्न न खाहीं।।

    अर्थ · Hindi

    जाकें डर सुर असुर डेराहीं। निसि न नीद दिन अन्न न खाहीं।।

  428. RCM 3.28.9Open verse →

    सो दससीस स्वान की नाई। इत उत चितइ चला भड़िहाई।।

    अर्थ · Hindi

    सो दससीस स्वान की नाई। इत उत चितइ चला भड़िहाई।।

  429. RCM 3.28.10Open verse →

    इमि कुपंथ पग देत खगेसा। रह न तेज बुधि बल लेसा।।

    अर्थ · Hindi

    इमि कुपंथ पग देत खगेसा। रह न तेज बुधि बल लेसा।।

  430. RCM 3.28.11Open verse →

    नाना बिधि करि कथा सुहाई। राजनीति भय प्रीति देखाई।।

    अर्थ · Hindi

    नाना बिधि करि कथा सुहाई। राजनीति भय प्रीति देखाई।।

  431. RCM 3.28.12Open verse →

    कह सीता सुनु जती गोसाईं। बोलेहु बचन दुष्ट की नाईं।।

    अर्थ · Hindi

    कह सीता सुनु जती गोसाईं। बोलेहु बचन दुष्ट की नाईं।।

  432. RCM 3.28.13Open verse →

    तब रावन निज रूप देखावा। भई सभय जब नाम सुनावा।।

    अर्थ · Hindi

    तब रावन निज रूप देखावा। भई सभय जब नाम सुनावा।।

  433. RCM 3.28.14Open verse →

    कह सीता धरि धीरजु गाढ़ा। आइ गयउ प्रभु रहु खल ठाढ़ा।।

    अर्थ · Hindi

    कह सीता धरि धीरजु गाढ़ा। आइ गयउ प्रभु रहु खल ठाढ़ा।।

  434. RCM 3.28.15Open verse →

    जिमि हरिबधुहि छुद्र सस चाहा। भएसि कालबस निसिचर नाहा।।

    अर्थ · Hindi

    जिमि हरिबधुहि छुद्र सस चाहा। भएसि कालबस निसिचर नाहा।।

  435. RCM 3.28.16Open verse →

    सुनत बचन दससीस रिसाना। मन महुँ चरन बंदि सुख माना।।

    अर्थ · Hindi

    सुनत बचन दससीस रिसाना। मन महुँ चरन बंदि सुख माना।।

  436. RCM 3.28.17Open verse →

    क्रोधवंत तब रावन लीन्हिसि रथ बैठाइ।

    अर्थ · Hindi

    क्रोधवंत तब रावन लीन्हिसि रथ बैठाइ।

  437. RCM 3.28.18Open verse →

    चला गगनपथ आतुर भयँ रथ हाँकि न जाइ।।28।।

    अर्थ · Hindi

    चला गगनपथ आतुर भयँ रथ हाँकि न जाइ।।28।।

  438. RCM 3.29.1Open verse →

    हा जग एक बीर रघुराया। केहिं अपराध बिसारेहु दाया।।

    अर्थ · Hindi

    हा जग एक बीर रघुराया। केहिं अपराध बिसारेहु दाया।।

  439. RCM 3.29.2Open verse →

    आरति हरन सरन सुखदायक। हा रघुकुल सरोज दिननायक।।

    अर्थ · Hindi

    आरति हरन सरन सुखदायक। हा रघुकुल सरोज दिननायक।।

  440. RCM 3.29.3Open verse →

    हा लछिमन तुम्हार नहिं दोसा। सो फलु पायउँ कीन्हेउँ रोसा।।

    अर्थ · Hindi

    हा लछिमन तुम्हार नहिं दोसा। सो फलु पायउँ कीन्हेउँ रोसा।।

  441. RCM 3.29.4Open verse →

    बिबिध बिलाप करति बैदेही। भूरि कृपा प्रभु दूरि सनेही।।

    अर्थ · Hindi

    बिबिध बिलाप करति बैदेही। भूरि कृपा प्रभु दूरि सनेही।।

  442. RCM 3.29.5Open verse →

    बिपति मोरि को प्रभुहि सुनावा। पुरोडास चह रासभ खावा।।

    अर्थ · Hindi

    बिपति मोरि को प्रभुहि सुनावा। पुरोडास चह रासभ खावा।।

  443. RCM 3.29.6Open verse →

    सीता कै बिलाप सुनि भारी। भए चराचर जीव दुखारी।।

    अर्थ · Hindi

    सीता कै बिलाप सुनि भारी। भए चराचर जीव दुखारी।।

  444. RCM 3.29.7Open verse →

    गीधराज सुनि आरत बानी। रघुकुलतिलक नारि पहिचानी।।

    अर्थ · Hindi

    गीधराज सुनि आरत बानी। रघुकुलतिलक नारि पहिचानी।।

  445. RCM 3.29.8Open verse →

    अधम निसाचर लीन्हे जाई। जिमि मलेछ बस कपिला गाई।।

    अर्थ · Hindi

    अधम निसाचर लीन्हे जाई। जिमि मलेछ बस कपिला गाई।।

  446. RCM 3.29.9Open verse →

    सीते पुत्रि करसि जनि त्रासा। करिहउँ जातुधान कर नासा।।

    अर्थ · Hindi

    सीते पुत्रि करसि जनि त्रासा। करिहउँ जातुधान कर नासा।।

  447. RCM 3.29.10Open verse →

    धावा क्रोधवंत खग कैसें। छूटइ पबि परबत कहुँ जैसे।।

    अर्थ · Hindi

    धावा क्रोधवंत खग कैसें। छूटइ पबि परबत कहुँ जैसे।।

  448. RCM 3.29.11Open verse →

    रे रे दुष्ट ठाढ़ किन होही। निर्भय चलेसि न जानेहि मोही।।

    अर्थ · Hindi

    रे रे दुष्ट ठाढ़ किन होही। निर्भय चलेसि न जानेहि मोही।।

  449. RCM 3.29.12Open verse →

    आवत देखि कृतांत समाना। फिरि दसकंधर कर अनुमाना।।

    अर्थ · Hindi

    आवत देखि कृतांत समाना। फिरि दसकंधर कर अनुमाना।।

  450. RCM 3.29.13Open verse →

    की मैनाक कि खगपति होई। मम बल जान सहित पति सोई।।

    अर्थ · Hindi

    की मैनाक कि खगपति होई। मम बल जान सहित पति सोई।।

  451. RCM 3.29.14Open verse →

    जाना जरठ जटायू एहा। मम कर तीरथ छाँड़िहि देहा।।

    अर्थ · Hindi

    जाना जरठ जटायू एहा। मम कर तीरथ छाँड़िहि देहा।।

  452. RCM 3.29.15Open verse →

    सुनत गीध क्रोधातुर धावा। कह सुनु रावन मोर सिखावा।।

    अर्थ · Hindi

    सुनत गीध क्रोधातुर धावा। कह सुनु रावन मोर सिखावा।।

  453. RCM 3.29.16Open verse →

    तजि जानकिहि कुसल गृह जाहू। नाहिं त अस होइहि बहुबाहू।।

    अर्थ · Hindi

    तजि जानकिहि कुसल गृह जाहू। नाहिं त अस होइहि बहुबाहू।।

  454. RCM 3.29.17Open verse →

    राम रोष पावक अति घोरा। होइहि सकल सलभ कुल तोरा।।

    अर्थ · Hindi

    राम रोष पावक अति घोरा। होइहि सकल सलभ कुल तोरा।।

  455. RCM 3.29.18Open verse →

    उतरु न देत दसानन जोधा। तबहिं गीध धावा करि क्रोधा।।

    अर्थ · Hindi

    उतरु न देत दसानन जोधा। तबहिं गीध धावा करि क्रोधा।।

  456. RCM 3.29.19Open verse →

    धरि कच बिरथ कीन्ह महि गिरा। सीतहि राखि गीध पुनि फिरा।।

    अर्थ · Hindi

    धरि कच बिरथ कीन्ह महि गिरा। सीतहि राखि गीध पुनि फिरा।।

  457. RCM 3.29.20Open verse →

    चौचन्ह मारि बिदारेसि देही। दंड एक भइ मुरुछा तेही।।

    अर्थ · Hindi

    चौचन्ह मारि बिदारेसि देही। दंड एक भइ मुरुछा तेही।।

  458. RCM 3.29.21Open verse →

    तब सक्रोध निसिचर खिसिआना। काढ़ेसि परम कराल कृपाना।।

    अर्थ · Hindi

    तब सक्रोध निसिचर खिसिआना। काढ़ेसि परम कराल कृपाना।।

  459. RCM 3.29.22Open verse →

    काटेसि पंख परा खग धरनी। सुमिरि राम करि अदभुत करनी।।

    अर्थ · Hindi

    काटेसि पंख परा खग धरनी। सुमिरि राम करि अदभुत करनी।।

  460. RCM 3.29.23Open verse →

    सीतहि जानि चढ़ाइ बहोरी। चला उताइल त्रास न थोरी।।

    अर्थ · Hindi

    सीतहि जानि चढ़ाइ बहोरी। चला उताइल त्रास न थोरी।।

  461. RCM 3.29.24Open verse →

    करति बिलाप जाति नभ सीता। ब्याध बिबस जनु मृगी सभीता।।

    अर्थ · Hindi

    करति बिलाप जाति नभ सीता। ब्याध बिबस जनु मृगी सभीता।।

  462. RCM 3.29.25Open verse →

    गिरि पर बैठे कपिन्ह निहारी। कहि हरि नाम दीन्ह पट डारी।।

    अर्थ · Hindi

    गिरि पर बैठे कपिन्ह निहारी। कहि हरि नाम दीन्ह पट डारी।।

  463. RCM 3.29.26Open verse →

    एहि बिधि सीतहि सो लै गयऊ। बन असोक महँ राखत भयऊ।।

    अर्थ · Hindi

    एहि बिधि सीतहि सो लै गयऊ। बन असोक महँ राखत भयऊ।।

  464. RCM 3.29.27Open verse →

    हारि परा खल बहु बिधि भय अरु प्रीति देखाइ।

    अर्थ · Hindi

    हारि परा खल बहु बिधि भय अरु प्रीति देखाइ।

  465. RCM 3.29.28Open verse →

    तब असोक पादप तर राखिसि जतन कराइ।।29(क)।।

    अर्थ · Hindi

    तब असोक पादप तर राखिसि जतन कराइ।।29(क)।।

  466. RCM 3.29.29Open verse →

    जेहि बिधि कपट कुरंग सँग धाइ चले श्रीराम।

    अर्थ · Hindi

    जेहि बिधि कपट कुरंग सँग धाइ चले श्रीराम।

  467. RCM 3.29.30Open verse →

    सो छबि सीता राखि उर रटति रहति हरिनाम।।29(ख)।।

    अर्थ · Hindi

    सो छबि सीता राखि उर रटति रहति हरिनाम।।29(ख)।।

  468. RCM 3.30.1Open verse →

    रघुपति अनुजहि आवत देखी। बाहिज चिंता कीन्हि बिसेषी।।

    अर्थ · Hindi

    रघुपति अनुजहि आवत देखी। बाहिज चिंता कीन्हि बिसेषी।।

  469. RCM 3.30.2Open verse →

    जनकसुता परिहरिहु अकेली। आयहु तात बचन मम पेली।।

    अर्थ · Hindi

    जनकसुता परिहरिहु अकेली। आयहु तात बचन मम पेली।।

  470. RCM 3.30.3Open verse →

    निसिचर निकर फिरहिं बन माहीं। मम मन सीता आश्रम नाहीं।।

    अर्थ · Hindi

    निसिचर निकर फिरहिं बन माहीं। मम मन सीता आश्रम नाहीं।।

  471. RCM 3.30.4Open verse →

    गहि पद कमल अनुज कर जोरी। कहेउ नाथ कछु मोहि न खोरी।।

    अर्थ · Hindi

    गहि पद कमल अनुज कर जोरी। कहेउ नाथ कछु मोहि न खोरी।।

  472. RCM 3.30.5Open verse →

    अनुज समेत गए प्रभु तहवाँ। गोदावरि तट आश्रम जहवाँ।।

    अर्थ · Hindi

    अनुज समेत गए प्रभु तहवाँ। गोदावरि तट आश्रम जहवाँ।।

  473. RCM 3.30.6Open verse →

    आश्रम देखि जानकी हीना। भए बिकल जस प्राकृत दीना।।

    अर्थ · Hindi

    आश्रम देखि जानकी हीना। भए बिकल जस प्राकृत दीना।।

  474. RCM 3.30.7Open verse →

    हा गुन खानि जानकी सीता। रूप सील ब्रत नेम पुनीता।।

    अर्थ · Hindi

    हा गुन खानि जानकी सीता। रूप सील ब्रत नेम पुनीता।।

  475. RCM 3.30.8Open verse →

    लछिमन समुझाए बहु भाँती। पूछत चले लता तरु पाँती।।

    अर्थ · Hindi

    लछिमन समुझाए बहु भाँती। पूछत चले लता तरु पाँती।।

  476. RCM 3.30.9Open verse →

    हे खग मृग हे मधुकर श्रेनी। तुम्ह देखी सीता मृगनैनी।।

    अर्थ · Hindi

    हे खग मृग हे मधुकर श्रेनी। तुम्ह देखी सीता मृगनैनी।।

  477. RCM 3.30.10Open verse →

    खंजन सुक कपोत मृग मीना। मधुप निकर कोकिला प्रबीना।।

    अर्थ · Hindi

    खंजन सुक कपोत मृग मीना। मधुप निकर कोकिला प्रबीना।।

  478. RCM 3.30.11Open verse →

    कुंद कली दाड़िम दामिनी। कमल सरद ससि अहिभामिनी।।

    अर्थ · Hindi

    कुंद कली दाड़िम दामिनी। कमल सरद ससि अहिभामिनी।।

  479. RCM 3.30.12Open verse →

    बरुन पास मनोज धनु हंसा। गज केहरि निज सुनत प्रसंसा।।

    अर्थ · Hindi

    बरुन पास मनोज धनु हंसा। गज केहरि निज सुनत प्रसंसा।।

  480. RCM 3.30.13Open verse →

    श्रीफल कनक कदलि हरषाहीं। नेकु न संक सकुच मन माहीं।।

    अर्थ · Hindi

    श्रीफल कनक कदलि हरषाहीं। नेकु न संक सकुच मन माहीं।।

  481. RCM 3.30.14Open verse →

    सुनु जानकी तोहि बिनु आजू। हरषे सकल पाइ जनु राजू।।

    अर्थ · Hindi

    सुनु जानकी तोहि बिनु आजू। हरषे सकल पाइ जनु राजू।।

  482. RCM 3.30.15Open verse →

    किमि सहि जात अनख तोहि पाहीं । प्रिया बेगि प्रगटसि कस नाहीं।।

    अर्थ · Hindi

    किमि सहि जात अनख तोहि पाहीं । प्रिया बेगि प्रगटसि कस नाहीं।।

  483. RCM 3.30.16Open verse →

    एहि बिधि खौजत बिलपत स्वामी। मनहुँ महा बिरही अति कामी।।

    अर्थ · Hindi

    एहि बिधि खौजत बिलपत स्वामी। मनहुँ महा बिरही अति कामी।।

  484. RCM 3.30.17Open verse →

    पूरनकाम राम सुख रासी। मनुज चरित कर अज अबिनासी।।

    अर्थ · Hindi

    पूरनकाम राम सुख रासी। मनुज चरित कर अज अबिनासी।।

  485. RCM 3.30.18Open verse →

    आगे परा गीधपति देखा। सुमिरत राम चरन जिन्ह रेखा।।

    अर्थ · Hindi

    आगे परा गीधपति देखा। सुमिरत राम चरन जिन्ह रेखा।।

  486. RCM 3.30.19Open verse →

    कर सरोज सिर परसेउ कृपासिंधु रधुबीर।।

    अर्थ · Hindi

    कर सरोज सिर परसेउ कृपासिंधु रधुबीर।।

  487. RCM 3.30.20Open verse →

    निरखि राम छबि धाम मुख बिगत भई सब पीर।।30।।

    अर्थ · Hindi

    निरखि राम छबि धाम मुख बिगत भई सब पीर।।30।।

  488. RCM 3.31.1Open verse →

    तब कह गीध बचन धरि धीरा । सुनहु राम भंजन भव भीरा।।

    अर्थ · Hindi

    तब कह गीध बचन धरि धीरा । सुनहु राम भंजन भव भीरा।।

  489. RCM 3.31.2Open verse →

    नाथ दसानन यह गति कीन्ही। तेहि खल जनकसुता हरि लीन्ही।।

    अर्थ · Hindi

    नाथ दसानन यह गति कीन्ही। तेहि खल जनकसुता हरि लीन्ही।।

  490. RCM 3.31.3Open verse →

    लै दच्छिन दिसि गयउ गोसाई। बिलपति अति कुररी की नाई।।

    अर्थ · Hindi

    लै दच्छिन दिसि गयउ गोसाई। बिलपति अति कुररी की नाई।।

  491. RCM 3.31.4Open verse →

    दरस लागी प्रभु राखेंउँ प्राना। चलन चहत अब कृपानिधाना।।

    अर्थ · Hindi

    दरस लागी प्रभु राखेंउँ प्राना। चलन चहत अब कृपानिधाना।।

  492. RCM 3.31.5Open verse →

    राम कहा तनु राखहु ताता। मुख मुसकाइ कही तेहिं बाता।।

    अर्थ · Hindi

    राम कहा तनु राखहु ताता। मुख मुसकाइ कही तेहिं बाता।।

  493. RCM 3.31.6Open verse →

    जा कर नाम मरत मुख आवा। अधमउ मुकुत होई श्रुति गावा।।

    अर्थ · Hindi

    जा कर नाम मरत मुख आवा। अधमउ मुकुत होई श्रुति गावा।।

  494. RCM 3.31.7Open verse →

    सो मम लोचन गोचर आगें। राखौं देह नाथ केहि खाँगें।।

    अर्थ · Hindi

    सो मम लोचन गोचर आगें। राखौं देह नाथ केहि खाँगें।।

  495. RCM 3.31.8Open verse →

    जल भरि नयन कहहिं रघुराई। तात कर्म निज ते गतिं पाई।।

    अर्थ · Hindi

    जल भरि नयन कहहिं रघुराई। तात कर्म निज ते गतिं पाई।।

  496. RCM 3.31.9Open verse →

    परहित बस जिन्ह के मन माहीं। तिन्ह कहुँ जग दुर्लभ कछु नाहीं।।

    अर्थ · Hindi

    परहित बस जिन्ह के मन माहीं। तिन्ह कहुँ जग दुर्लभ कछु नाहीं।।

  497. RCM 3.31.10Open verse →

    तनु तजि तात जाहु मम धामा। देउँ काह तुम्ह पूरनकामा।।

    अर्थ · Hindi

    तनु तजि तात जाहु मम धामा। देउँ काह तुम्ह पूरनकामा।।

  498. RCM 3.31.11Open verse →

    सीता हरन तात जनि कहहु पिता सन जाइ।।

    अर्थ · Hindi

    सीता हरन तात जनि कहहु पिता सन जाइ।।

  499. RCM 3.31.12Open verse →

    जौं मैं राम त कुल सहित कहिहि दसानन आइ।।31।।

    अर्थ · Hindi

    जौं मैं राम त कुल सहित कहिहि दसानन आइ।।31।।

  500. RCM 3.32.1Open verse →

    गीध देह तजि धरि हरि रुपा। भूषन बहु पट पीत अनूपा।।

    अर्थ · Hindi

    गीध देह तजि धरि हरि रुपा। भूषन बहु पट पीत अनूपा।।

  501. RCM 3.32.2Open verse →

    स्याम गात बिसाल भुज चारी। अस्तुति करत नयन भरि बारी।।

    अर्थ · Hindi

    स्याम गात बिसाल भुज चारी। अस्तुति करत नयन भरि बारी।।

  502. RCM 3.33.1Open verse →

    कोमल चित अति दीनदयाला। कारन बिनु रघुनाथ कृपाला।।

    अर्थ · Hindi

    कोमल चित अति दीनदयाला। कारन बिनु रघुनाथ कृपाला।।

  503. RCM 3.33.2Open verse →

    गीध अधम खग आमिष भोगी। गति दीन्हि जो जाचत जोगी।।

    अर्थ · Hindi

    गीध अधम खग आमिष भोगी। गति दीन्हि जो जाचत जोगी।।

  504. RCM 3.33.3Open verse →

    सुनहु उमा ते लोग अभागी। हरि तजि होहिं बिषय अनुरागी।।

    अर्थ · Hindi

    सुनहु उमा ते लोग अभागी। हरि तजि होहिं बिषय अनुरागी।।

  505. RCM 3.33.4Open verse →

    पुनि सीतहि खोजत द्वौ भाई। चले बिलोकत बन बहुताई।।

    अर्थ · Hindi

    पुनि सीतहि खोजत द्वौ भाई। चले बिलोकत बन बहुताई।।

  506. RCM 3.33.5Open verse →

    संकुल लता बिटप घन कानन। बहु खग मृग तहँ गज पंचानन।।

    अर्थ · Hindi

    संकुल लता बिटप घन कानन। बहु खग मृग तहँ गज पंचानन।।

  507. RCM 3.33.6Open verse →

    आवत पंथ कबंध निपाता। तेहिं सब कही साप कै बाता।।

    अर्थ · Hindi

    आवत पंथ कबंध निपाता। तेहिं सब कही साप कै बाता।।

  508. RCM 3.33.7Open verse →

    दुरबासा मोहि दीन्ही सापा। प्रभु पद पेखि मिटा सो पापा।।

    अर्थ · Hindi

    दुरबासा मोहि दीन्ही सापा। प्रभु पद पेखि मिटा सो पापा।।

  509. RCM 3.33.8Open verse →

    सुनु गंधर्ब कहउँ मै तोही। मोहि न सोहाइ ब्रह्मकुल द्रोही।।

    अर्थ · Hindi

    सुनु गंधर्ब कहउँ मै तोही। मोहि न सोहाइ ब्रह्मकुल द्रोही।।

  510. RCM 3.33.9Open verse →

    मन क्रम बचन कपट तजि जो कर भूसुर सेव।

    अर्थ · Hindi

    मन क्रम बचन कपट तजि जो कर भूसुर सेव।

  511. RCM 3.33.10Open verse →

    मोहि समेत बिरंचि सिव बस ताकें सब देव।।33।।

    अर्थ · Hindi

    मोहि समेत बिरंचि सिव बस ताकें सब देव।।33।।

  512. RCM 3.34.1Open verse →

    सापत ताड़त परुष कहंता। बिप्र पूज्य अस गावहिं संता।।

    अर्थ · Hindi

    सापत ताड़त परुष कहंता। बिप्र पूज्य अस गावहिं संता।।

  513. RCM 3.34.2Open verse →

    पूजिअ बिप्र सील गुन हीना। सूद्र न गुन गन ग्यान प्रबीना।।

    अर्थ · Hindi

    पूजिअ बिप्र सील गुन हीना। सूद्र न गुन गन ग्यान प्रबीना।।

  514. RCM 3.34.3Open verse →

    कहि निज धर्म ताहि समुझावा। निज पद प्रीति देखि मन भावा।।

    अर्थ · Hindi

    कहि निज धर्म ताहि समुझावा। निज पद प्रीति देखि मन भावा।।

  515. RCM 3.34.4Open verse →

    रघुपति चरन कमल सिरु नाई। गयउ गगन आपनि गति पाई।।

    अर्थ · Hindi

    रघुपति चरन कमल सिरु नाई। गयउ गगन आपनि गति पाई।।

  516. RCM 3.34.5Open verse →

    ताहि देइ गति राम उदारा। सबरी कें आश्रम पगु धारा।।

    अर्थ · Hindi

    ताहि देइ गति राम उदारा। सबरी कें आश्रम पगु धारा।।

  517. RCM 3.34.6Open verse →

    सबरी देखि राम गृहँ आए। मुनि के बचन समुझि जियँ भाए।।

    अर्थ · Hindi

    सबरी देखि राम गृहँ आए। मुनि के बचन समुझि जियँ भाए।।

  518. RCM 3.34.7Open verse →

    सरसिज लोचन बाहु बिसाला। जटा मुकुट सिर उर बनमाला।।

    अर्थ · Hindi

    सरसिज लोचन बाहु बिसाला। जटा मुकुट सिर उर बनमाला।।

  519. RCM 3.34.8Open verse →

    स्याम गौर सुंदर दोउ भाई। सबरी परी चरन लपटाई।।

    अर्थ · Hindi

    स्याम गौर सुंदर दोउ भाई। सबरी परी चरन लपटाई।।

  520. RCM 3.34.9Open verse →

    प्रेम मगन मुख बचन न आवा। पुनि पुनि पद सरोज सिर नावा।।

    अर्थ · Hindi

    प्रेम मगन मुख बचन न आवा। पुनि पुनि पद सरोज सिर नावा।।

  521. RCM 3.34.10Open verse →

    सादर जल लै चरन पखारे। पुनि सुंदर आसन बैठारे।।

    अर्थ · Hindi

    सादर जल लै चरन पखारे। पुनि सुंदर आसन बैठारे।।

  522. RCM 3.34.11Open verse →

    कंद मूल फल सुरस अति दिए राम कहुँ आनि।

    अर्थ · Hindi

    कंद मूल फल सुरस अति दिए राम कहुँ आनि।

  523. RCM 3.34.12Open verse →

    प्रेम सहित प्रभु खाए बारंबार बखानि।।34।।

    अर्थ · Hindi

    प्रेम सहित प्रभु खाए बारंबार बखानि।।34।।

  524. RCM 3.35.1Open verse →

    पानि जोरि आगें भइ ठाढ़ी। प्रभुहि बिलोकि प्रीति अति बाढ़ी।।

    अर्थ · Hindi

    पानि जोरि आगें भइ ठाढ़ी। प्रभुहि बिलोकि प्रीति अति बाढ़ी।।

  525. RCM 3.35.2Open verse →

    केहि बिधि अस्तुति करौ तुम्हारी। अधम जाति मैं जड़मति भारी।।

    अर्थ · Hindi

    केहि बिधि अस्तुति करौ तुम्हारी। अधम जाति मैं जड़मति भारी।।

  526. RCM 3.35.3Open verse →

    अधम ते अधम अधम अति नारी। तिन्ह महँ मैं मतिमंद अघारी।।

    अर्थ · Hindi

    अधम ते अधम अधम अति नारी। तिन्ह महँ मैं मतिमंद अघारी।।

  527. RCM 3.35.4Open verse →

    कह रघुपति सुनु भामिनि बाता। मानउँ एक भगति कर नाता।।

    अर्थ · Hindi

    कह रघुपति सुनु भामिनि बाता। मानउँ एक भगति कर नाता।।

  528. RCM 3.35.5Open verse →

    जाति पाँति कुल धर्म बड़ाई। धन बल परिजन गुन चतुराई।।

    अर्थ · Hindi

    जाति पाँति कुल धर्म बड़ाई। धन बल परिजन गुन चतुराई।।

  529. RCM 3.35.6Open verse →

    भगति हीन नर सोहइ कैसा। बिनु जल बारिद देखिअ जैसा।।

    अर्थ · Hindi

    भगति हीन नर सोहइ कैसा। बिनु जल बारिद देखिअ जैसा।।

  530. RCM 3.35.7Open verse →

    नवधा भगति कहउँ तोहि पाहीं। सावधान सुनु धरु मन माहीं।।

    अर्थ · Hindi

    नवधा भगति कहउँ तोहि पाहीं। सावधान सुनु धरु मन माहीं।।

  531. RCM 3.35.8Open verse →

    प्रथम भगति संतन्ह कर संगा। दूसरि रति मम कथा प्रसंगा।।

    अर्थ · Hindi

    प्रथम भगति संतन्ह कर संगा। दूसरि रति मम कथा प्रसंगा।।

  532. RCM 3.35.9Open verse →

    गुर पद पंकज सेवा तीसरि भगति अमान।

    अर्थ · Hindi

    गुर पद पंकज सेवा तीसरि भगति अमान।

  533. RCM 3.35.10Open verse →

    चौथि भगति मम गुन गन करइ कपट तजि गान।।35।।

    अर्थ · Hindi

    चौथि भगति मम गुन गन करइ कपट तजि गान।।35।।

  534. RCM 3.36.1Open verse →

    मंत्र जाप मम दृढ़ बिस्वासा। पंचम भजन सो बेद प्रकासा।।

    अर्थ · Hindi

    मंत्र जाप मम दृढ़ बिस्वासा। पंचम भजन सो बेद प्रकासा।।

  535. RCM 3.36.2Open verse →

    छठ दम सील बिरति बहु करमा। निरत निरंतर सज्जन धरमा।।

    अर्थ · Hindi

    छठ दम सील बिरति बहु करमा। निरत निरंतर सज्जन धरमा।।

  536. RCM 3.36.3Open verse →

    सातवँ सम मोहि मय जग देखा। मोतें संत अधिक करि लेखा।।

    अर्थ · Hindi

    सातवँ सम मोहि मय जग देखा। मोतें संत अधिक करि लेखा।।

  537. RCM 3.36.4Open verse →

    आठवँ जथालाभ संतोषा। सपनेहुँ नहिं देखइ परदोषा।।

    अर्थ · Hindi

    आठवँ जथालाभ संतोषा। सपनेहुँ नहिं देखइ परदोषा।।

  538. RCM 3.36.5Open verse →

    नवम सरल सब सन छलहीना। मम भरोस हियँ हरष न दीना।।

    अर्थ · Hindi

    नवम सरल सब सन छलहीना। मम भरोस हियँ हरष न दीना।।

  539. RCM 3.36.6Open verse →

    नव महुँ एकउ जिन्ह के होई। नारि पुरुष सचराचर कोई।।

    अर्थ · Hindi

    नव महुँ एकउ जिन्ह के होई। नारि पुरुष सचराचर कोई।।

  540. RCM 3.36.7Open verse →

    सोइ अतिसय प्रिय भामिनि मोरे। सकल प्रकार भगति दृढ़ तोरें।।

    अर्थ · Hindi

    सोइ अतिसय प्रिय भामिनि मोरे। सकल प्रकार भगति दृढ़ तोरें।।

  541. RCM 3.36.8Open verse →

    जोगि बृंद दुरलभ गति जोई। तो कहुँ आजु सुलभ भइ सोई।।

    अर्थ · Hindi

    जोगि बृंद दुरलभ गति जोई। तो कहुँ आजु सुलभ भइ सोई।।

  542. RCM 3.36.9Open verse →

    मम दरसन फल परम अनूपा। जीव पाव निज सहज सरूपा।।

    अर्थ · Hindi

    मम दरसन फल परम अनूपा। जीव पाव निज सहज सरूपा।।

  543. RCM 3.36.10Open verse →

    जनकसुता कइ सुधि भामिनी। जानहि कहु करिबरगामिनी।।

    अर्थ · Hindi

    जनकसुता कइ सुधि भामिनी। जानहि कहु करिबरगामिनी।।

  544. RCM 3.36.11Open verse →

    पंपा सरहि जाहु रघुराई। तहँ होइहि सुग्रीव मिताई।।

    अर्थ · Hindi

    पंपा सरहि जाहु रघुराई। तहँ होइहि सुग्रीव मिताई।।

  545. RCM 3.36.12Open verse →

    सो सब कहिहि देव रघुबीरा। जानतहूँ पूछहु मतिधीरा।।

    अर्थ · Hindi

    सो सब कहिहि देव रघुबीरा। जानतहूँ पूछहु मतिधीरा।।

  546. RCM 3.36.13Open verse →

    बार बार प्रभु पद सिरु नाई। प्रेम सहित सब कथा सुनाई।।

    अर्थ · Hindi

    बार बार प्रभु पद सिरु नाई। प्रेम सहित सब कथा सुनाई।।

  547. RCM 3.37.1Open verse →

    चले राम त्यागा बन सोऊ। अतुलित बल नर केहरि दोऊ।।

    अर्थ · Hindi

    चले राम त्यागा बन सोऊ। अतुलित बल नर केहरि दोऊ।।

  548. RCM 3.37.2Open verse →

    बिरही इव प्रभु करत बिषादा। कहत कथा अनेक संबादा।।

    अर्थ · Hindi

    बिरही इव प्रभु करत बिषादा। कहत कथा अनेक संबादा।।

  549. RCM 3.37.3Open verse →

    लछिमन देखु बिपिन कइ सोभा। देखत केहि कर मन नहिं छोभा।।

    अर्थ · Hindi

    लछिमन देखु बिपिन कइ सोभा। देखत केहि कर मन नहिं छोभा।।

  550. RCM 3.37.4Open verse →

    नारि सहित सब खग मृग बृंदा। मानहुँ मोरि करत हहिं निंदा।।

    अर्थ · Hindi

    नारि सहित सब खग मृग बृंदा। मानहुँ मोरि करत हहिं निंदा।।

  551. RCM 3.37.5Open verse →

    हमहि देखि मृग निकर पराहीं। मृगीं कहहिं तुम्ह कहँ भय नाहीं।।

    अर्थ · Hindi

    हमहि देखि मृग निकर पराहीं। मृगीं कहहिं तुम्ह कहँ भय नाहीं।।

  552. RCM 3.37.6Open verse →

    तुम्ह आनंद करहु मृग जाए। कंचन मृग खोजन ए आए।।

    अर्थ · Hindi

    तुम्ह आनंद करहु मृग जाए। कंचन मृग खोजन ए आए।।

  553. RCM 3.37.7Open verse →

    संग लाइ करिनीं करि लेहीं। मानहुँ मोहि सिखावनु देहीं।।

    अर्थ · Hindi

    संग लाइ करिनीं करि लेहीं। मानहुँ मोहि सिखावनु देहीं।।

  554. RCM 3.37.8Open verse →

    सास्त्र सुचिंतित पुनि पुनि देखिअ। भूप सुसेवित बस नहिं लेखिअ।।

    अर्थ · Hindi

    सास्त्र सुचिंतित पुनि पुनि देखिअ। भूप सुसेवित बस नहिं लेखिअ।।

  555. RCM 3.37.9Open verse →

    राखिअ नारि जदपि उर माहीं। जुबती सास्त्र नृपति बस नाहीं।।

    अर्थ · Hindi

    राखिअ नारि जदपि उर माहीं। जुबती सास्त्र नृपति बस नाहीं।।

  556. RCM 3.37.10Open verse →

    देखहु तात बसंत सुहावा। प्रिया हीन मोहि भय उपजावा।।

    अर्थ · Hindi

    देखहु तात बसंत सुहावा। प्रिया हीन मोहि भय उपजावा।।

  557. RCM 3.37.11Open verse →

    बिरह बिकल बलहीन मोहि जानेसि निपट अकेल।

    अर्थ · Hindi

    बिरह बिकल बलहीन मोहि जानेसि निपट अकेल।

  558. RCM 3.37.12Open verse →

    सहित बिपिन मधुकर खग मदन कीन्ह बगमेल।।37(क)।।

    अर्थ · Hindi

    सहित बिपिन मधुकर खग मदन कीन्ह बगमेल।।37(क)।।

  559. RCM 3.37.13Open verse →

    देखि गयउ भ्राता सहित तासु दूत सुनि बात।

    अर्थ · Hindi

    देखि गयउ भ्राता सहित तासु दूत सुनि बात।

  560. RCM 3.37.14Open verse →

    डेरा कीन्हेउ मनहुँ तब कटकु हटकि मनजात।।37(ख)।।

    अर्थ · Hindi

    डेरा कीन्हेउ मनहुँ तब कटकु हटकि मनजात।।37(ख)।।

  561. RCM 3.38.1Open verse →

    बिटप बिसाल लता अरुझानी। बिबिध बितान दिए जनु तानी।।

    अर्थ · Hindi

    बिटप बिसाल लता अरुझानी। बिबिध बितान दिए जनु तानी।।

  562. RCM 3.38.2Open verse →

    कदलि ताल बर धुजा पताका। दैखि न मोह धीर मन जाका।।

    अर्थ · Hindi

    कदलि ताल बर धुजा पताका। दैखि न मोह धीर मन जाका।।

  563. RCM 3.38.3Open verse →

    बिबिध भाँति फूले तरु नाना। जनु बानैत बने बहु बाना।।

    अर्थ · Hindi

    बिबिध भाँति फूले तरु नाना। जनु बानैत बने बहु बाना।।

  564. RCM 3.38.4Open verse →

    कहुँ कहुँ सुन्दर बिटप सुहाए। जनु भट बिलग बिलग होइ छाए।।

    अर्थ · Hindi

    कहुँ कहुँ सुन्दर बिटप सुहाए। जनु भट बिलग बिलग होइ छाए।।

  565. RCM 3.38.5Open verse →

    कूजत पिक मानहुँ गज माते। ढेक महोख ऊँट बिसराते।।

    अर्थ · Hindi

    कूजत पिक मानहुँ गज माते। ढेक महोख ऊँट बिसराते।।

  566. RCM 3.38.6Open verse →

    मोर चकोर कीर बर बाजी। पारावत मराल सब ताजी।।

    अर्थ · Hindi

    मोर चकोर कीर बर बाजी। पारावत मराल सब ताजी।।

  567. RCM 3.38.7Open verse →

    तीतिर लावक पदचर जूथा। बरनि न जाइ मनोज बरुथा।।

    अर्थ · Hindi

    तीतिर लावक पदचर जूथा। बरनि न जाइ मनोज बरुथा।।

  568. RCM 3.38.8Open verse →

    रथ गिरि सिला दुंदुभी झरना। चातक बंदी गुन गन बरना।।

    अर्थ · Hindi

    रथ गिरि सिला दुंदुभी झरना। चातक बंदी गुन गन बरना।।

  569. RCM 3.38.9Open verse →

    मधुकर मुखर भेरि सहनाई। त्रिबिध बयारि बसीठीं आई।।

    अर्थ · Hindi

    मधुकर मुखर भेरि सहनाई। त्रिबिध बयारि बसीठीं आई।।

  570. RCM 3.38.10Open verse →

    चतुरंगिनी सेन सँग लीन्हें। बिचरत सबहि चुनौती दीन्हें।।

    अर्थ · Hindi

    चतुरंगिनी सेन सँग लीन्हें। बिचरत सबहि चुनौती दीन्हें।।

  571. RCM 3.38.11Open verse →

    लछिमन देखत काम अनीका। रहहिं धीर तिन्ह कै जग लीका।।

    अर्थ · Hindi

    लछिमन देखत काम अनीका। रहहिं धीर तिन्ह कै जग लीका।।

  572. RCM 3.38.12Open verse →

    एहि कें एक परम बल नारी। तेहि तें उबर सुभट सोइ भारी।।

    अर्थ · Hindi

    एहि कें एक परम बल नारी। तेहि तें उबर सुभट सोइ भारी।।

  573. RCM 3.38.13Open verse →

    तात तीनि अति प्रबल खल काम क्रोध अरु लोभ।

    अर्थ · Hindi

    तात तीनि अति प्रबल खल काम क्रोध अरु लोभ।

  574. RCM 3.38.14Open verse →

    मुनि बिग्यान धाम मन करहिं निमिष महुँ छोभ।।38(क)।।

    अर्थ · Hindi

    मुनि बिग्यान धाम मन करहिं निमिष महुँ छोभ।।38(क)।।

  575. RCM 3.38.15Open verse →

    लोभ कें इच्छा दंभ बल काम कें केवल नारि।

    अर्थ · Hindi

    लोभ कें इच्छा दंभ बल काम कें केवल नारि।

  576. RCM 3.38.16Open verse →

    क्रोध के परुष बचन बल मुनिबर कहहिं बिचारि।।38(ख)।।

    अर्थ · Hindi

    क्रोध के परुष बचन बल मुनिबर कहहिं बिचारि।।38(ख)।।

  577. RCM 3.39.1Open verse →

    गुनातीत सचराचर स्वामी। राम उमा सब अंतरजामी।।

    अर्थ · Hindi

    गुनातीत सचराचर स्वामी। राम उमा सब अंतरजामी।।

  578. RCM 3.39.2Open verse →

    कामिन्ह कै दीनता देखाई। धीरन्ह कें मन बिरति दृढ़ाई।।

    अर्थ · Hindi

    कामिन्ह कै दीनता देखाई। धीरन्ह कें मन बिरति दृढ़ाई।।

  579. RCM 3.39.3Open verse →

    क्रोध मनोज लोभ मद माया। छूटहिं सकल राम कीं दाया।।

    अर्थ · Hindi

    क्रोध मनोज लोभ मद माया। छूटहिं सकल राम कीं दाया।।

  580. RCM 3.39.4Open verse →

    सो नर इंद्रजाल नहिं भूला। जा पर होइ सो नट अनुकूला।।

    अर्थ · Hindi

    सो नर इंद्रजाल नहिं भूला। जा पर होइ सो नट अनुकूला।।

  581. RCM 3.39.5Open verse →

    उमा कहउँ मैं अनुभव अपना। सत हरि भजनु जगत सब सपना।।

    अर्थ · Hindi

    उमा कहउँ मैं अनुभव अपना। सत हरि भजनु जगत सब सपना।।

  582. RCM 3.39.6Open verse →

    पुनि प्रभु गए सरोबर तीरा। पंपा नाम सुभग गंभीरा।।

    अर्थ · Hindi

    पुनि प्रभु गए सरोबर तीरा। पंपा नाम सुभग गंभीरा।।

  583. RCM 3.39.7Open verse →

    संत हृदय जस निर्मल बारी। बाँधे घाट मनोहर चारी।।

    अर्थ · Hindi

    संत हृदय जस निर्मल बारी। बाँधे घाट मनोहर चारी।।

  584. RCM 3.39.8Open verse →

    जहँ तहँ पिअहिं बिबिध मृग नीरा। जनु उदार गृह जाचक भीरा।।

    अर्थ · Hindi

    जहँ तहँ पिअहिं बिबिध मृग नीरा। जनु उदार गृह जाचक भीरा।।

  585. RCM 3.39.9Open verse →

    पुरइनि सबन ओट जल बेगि न पाइअ मर्म।

    अर्थ · Hindi

    पुरइनि सबन ओट जल बेगि न पाइअ मर्म।

  586. RCM 3.39.10Open verse →

    मायाछन्न न देखिऐ जैसे निर्गुन ब्रह्म।।39(क)।।

    अर्थ · Hindi

    मायाछन्न न देखिऐ जैसे निर्गुन ब्रह्म।।39(क)।।

  587. RCM 3.39.11Open verse →

    सुखि मीन सब एकरस अति अगाध जल माहिं।

    अर्थ · Hindi

    सुखि मीन सब एकरस अति अगाध जल माहिं।

  588. RCM 3.39.12Open verse →

    जथा धर्मसीलन्ह के दिन सुख संजुत जाहिं।।39(ख)।।

    अर्थ · Hindi

    जथा धर्मसीलन्ह के दिन सुख संजुत जाहिं।।39(ख)।।

  589. RCM 3.40.1Open verse →

    बिकसे सरसिज नाना रंगा। मधुर मुखर गुंजत बहु भृंगा।।

    अर्थ · Hindi

    बिकसे सरसिज नाना रंगा। मधुर मुखर गुंजत बहु भृंगा।।

  590. RCM 3.40.2Open verse →

    बोलत जलकुक्कुट कलहंसा। प्रभु बिलोकि जनु करत प्रसंसा।।

    अर्थ · Hindi

    बोलत जलकुक्कुट कलहंसा। प्रभु बिलोकि जनु करत प्रसंसा।।

  591. RCM 3.40.3Open verse →

    चक्रवाक बक खग समुदाई। देखत बनइ बरनि नहिं जाई।।

    अर्थ · Hindi

    चक्रवाक बक खग समुदाई। देखत बनइ बरनि नहिं जाई।।

  592. RCM 3.40.4Open verse →

    सुन्दर खग गन गिरा सुहाई। जात पथिक जनु लेत बोलाई।।

    अर्थ · Hindi

    सुन्दर खग गन गिरा सुहाई। जात पथिक जनु लेत बोलाई।।

  593. RCM 3.40.5Open verse →

    ताल समीप मुनिन्ह गृह छाए। चहु दिसि कानन बिटप सुहाए।।

    अर्थ · Hindi

    ताल समीप मुनिन्ह गृह छाए। चहु दिसि कानन बिटप सुहाए।।

  594. RCM 3.40.6Open verse →

    चंपक बकुल कदंब तमाला। पाटल पनस परास रसाला।।

    अर्थ · Hindi

    चंपक बकुल कदंब तमाला। पाटल पनस परास रसाला।।

  595. RCM 3.40.7Open verse →

    नव पल्लव कुसुमित तरु नाना। चंचरीक पटली कर गाना।।

    अर्थ · Hindi

    नव पल्लव कुसुमित तरु नाना। चंचरीक पटली कर गाना।।

  596. RCM 3.40.8Open verse →

    सीतल मंद सुगंध सुभाऊ। संतत बहइ मनोहर बाऊ।।

    अर्थ · Hindi

    सीतल मंद सुगंध सुभाऊ। संतत बहइ मनोहर बाऊ।।

  597. RCM 3.40.9Open verse →

    कुहू कुहू कोकिल धुनि करहीं। सुनि रव सरस ध्यान मुनि टरहीं।।

    अर्थ · Hindi

    कुहू कुहू कोकिल धुनि करहीं। सुनि रव सरस ध्यान मुनि टरहीं।।

  598. RCM 3.40.10Open verse →

    फल भारन नमि बिटप सब रहे भूमि निअराइ।

    अर्थ · Hindi

    फल भारन नमि बिटप सब रहे भूमि निअराइ।

  599. RCM 3.40.11Open verse →

    पर उपकारी पुरुष जिमि नवहिं सुसंपति पाइ।।40।।

    अर्थ · Hindi

    पर उपकारी पुरुष जिमि नवहिं सुसंपति पाइ।।40।।

  600. RCM 3.41.1Open verse →

    देखि राम अति रुचिर तलावा। मज्जनु कीन्ह परम सुख पावा।।

    अर्थ · Hindi

    देखि राम अति रुचिर तलावा। मज्जनु कीन्ह परम सुख पावा।।

  601. RCM 3.41.2Open verse →

    देखी सुंदर तरुबर छाया। बैठे अनुज सहित रघुराया।।

    अर्थ · Hindi

    देखी सुंदर तरुबर छाया। बैठे अनुज सहित रघुराया।।

  602. RCM 3.41.3Open verse →

    तहँ पुनि सकल देव मुनि आए। अस्तुति करि निज धाम सिधाए।।

    अर्थ · Hindi

    तहँ पुनि सकल देव मुनि आए। अस्तुति करि निज धाम सिधाए।।

  603. RCM 3.41.4Open verse →

    बैठे परम प्रसन्न कृपाला। कहत अनुज सन कथा रसाला।।

    अर्थ · Hindi

    बैठे परम प्रसन्न कृपाला। कहत अनुज सन कथा रसाला।।

  604. RCM 3.41.5Open verse →

    बिरहवंत भगवंतहि देखी। नारद मन भा सोच बिसेषी।।

    अर्थ · Hindi

    बिरहवंत भगवंतहि देखी। नारद मन भा सोच बिसेषी।।

  605. RCM 3.41.6Open verse →

    मोर साप करि अंगीकारा। सहत राम नाना दुख भारा।।

    अर्थ · Hindi

    मोर साप करि अंगीकारा। सहत राम नाना दुख भारा।।

  606. RCM 3.41.7Open verse →

    ऐसे प्रभुहि बिलोकउँ जाई। पुनि न बनिहि अस अवसरु आई।।

    अर्थ · Hindi

    ऐसे प्रभुहि बिलोकउँ जाई। पुनि न बनिहि अस अवसरु आई।।

  607. RCM 3.41.8Open verse →

    यह बिचारि नारद कर बीना। गए जहाँ प्रभु सुख आसीना।।

    अर्थ · Hindi

    यह बिचारि नारद कर बीना। गए जहाँ प्रभु सुख आसीना।।

  608. RCM 3.41.9Open verse →

    गावत राम चरित मृदु बानी। प्रेम सहित बहु भाँति बखानी।।

    अर्थ · Hindi

    गावत राम चरित मृदु बानी। प्रेम सहित बहु भाँति बखानी।।

  609. RCM 3.41.10Open verse →

    करत दंडवत लिए उठाई। राखे बहुत बार उर लाई।।

    अर्थ · Hindi

    करत दंडवत लिए उठाई। राखे बहुत बार उर लाई।।

  610. RCM 3.41.11Open verse →

    स्वागत पूँछि निकट बैठारे। लछिमन सादर चरन पखारे।।

    अर्थ · Hindi

    स्वागत पूँछि निकट बैठारे। लछिमन सादर चरन पखारे।।

  611. RCM 3.41.12Open verse →

    नाना बिधि बिनती करि प्रभु प्रसन्न जियँ जानि।

    अर्थ · Hindi

    नाना बिधि बिनती करि प्रभु प्रसन्न जियँ जानि।

  612. RCM 3.41.13Open verse →

    नारद बोले बचन तब जोरि सरोरुह पानि।।41।।

    अर्थ · Hindi

    नारद बोले बचन तब जोरि सरोरुह पानि।।41।।

  613. RCM 3.42.1Open verse →

    सुनहु उदार सहज रघुनायक। सुंदर अगम सुगम बर दायक।।

    अर्थ · Hindi

    सुनहु उदार सहज रघुनायक। सुंदर अगम सुगम बर दायक।।

  614. RCM 3.42.2Open verse →

    देहु एक बर मागउँ स्वामी। जद्यपि जानत अंतरजामी।।

    अर्थ · Hindi

    देहु एक बर मागउँ स्वामी। जद्यपि जानत अंतरजामी।।

  615. RCM 3.42.3Open verse →

    जानहु मुनि तुम्ह मोर सुभाऊ। जन सन कबहुँ कि करउँ दुराऊ।।

    अर्थ · Hindi

    जानहु मुनि तुम्ह मोर सुभाऊ। जन सन कबहुँ कि करउँ दुराऊ।।

  616. RCM 3.42.4Open verse →

    कवन बस्तु असि प्रिय मोहि लागी। जो मुनिबर न सकहु तुम्ह मागी।।

    अर्थ · Hindi

    कवन बस्तु असि प्रिय मोहि लागी। जो मुनिबर न सकहु तुम्ह मागी।।

  617. RCM 3.42.5Open verse →

    जन कहुँ कछु अदेय नहिं मोरें। अस बिस्वास तजहु जनि भोरें।।

    अर्थ · Hindi

    जन कहुँ कछु अदेय नहिं मोरें। अस बिस्वास तजहु जनि भोरें।।

  618. RCM 3.42.6Open verse →

    तब नारद बोले हरषाई । अस बर मागउँ करउँ ढिठाई।।

    अर्थ · Hindi

    तब नारद बोले हरषाई । अस बर मागउँ करउँ ढिठाई।।

  619. RCM 3.42.7Open verse →

    जद्यपि प्रभु के नाम अनेका। श्रुति कह अधिक एक तें एका।।

    अर्थ · Hindi

    जद्यपि प्रभु के नाम अनेका। श्रुति कह अधिक एक तें एका।।

  620. RCM 3.42.8Open verse →

    राम सकल नामन्ह ते अधिका। होउ नाथ अघ खग गन बधिका।।

    अर्थ · Hindi

    राम सकल नामन्ह ते अधिका। होउ नाथ अघ खग गन बधिका।।

  621. RCM 3.42.9Open verse →

    राका रजनी भगति तव राम नाम सोइ सोम।

    अर्थ · Hindi

    राका रजनी भगति तव राम नाम सोइ सोम।

  622. RCM 3.42.10Open verse →

    अपर नाम उडगन बिमल बसुहुँ भगत उर ब्योम।।42(क)।।

    अर्थ · Hindi

    अपर नाम उडगन बिमल बसुहुँ भगत उर ब्योम।।42(क)।।

  623. RCM 3.42.11Open verse →

    एवमस्तु मुनि सन कहेउ कृपासिंधु रघुनाथ।

    अर्थ · Hindi

    एवमस्तु मुनि सन कहेउ कृपासिंधु रघुनाथ।

  624. RCM 3.42.12Open verse →

    तब नारद मन हरष अति प्रभु पद नायउ माथ।।42(ख)।।

    अर्थ · Hindi

    तब नारद मन हरष अति प्रभु पद नायउ माथ।।42(ख)।।

  625. RCM 3.43.1Open verse →

    अति प्रसन्न रघुनाथहि जानी। पुनि नारद बोले मृदु बानी।।

    अर्थ · Hindi

    अति प्रसन्न रघुनाथहि जानी। पुनि नारद बोले मृदु बानी।।

  626. RCM 3.43.2Open verse →

    राम जबहिं प्रेरेउ निज माया। मोहेहु मोहि सुनहु रघुराया।।

    अर्थ · Hindi

    राम जबहिं प्रेरेउ निज माया। मोहेहु मोहि सुनहु रघुराया।।

  627. RCM 3.43.3Open verse →

    तब बिबाह मैं चाहउँ कीन्हा। प्रभु केहि कारन करै न दीन्हा।।

    अर्थ · Hindi

    तब बिबाह मैं चाहउँ कीन्हा। प्रभु केहि कारन करै न दीन्हा।।

  628. RCM 3.43.4Open verse →

    सुनु मुनि तोहि कहउँ सहरोसा। भजहिं जे मोहि तजि सकल भरोसा।।

    अर्थ · Hindi

    सुनु मुनि तोहि कहउँ सहरोसा। भजहिं जे मोहि तजि सकल भरोसा।।

  629. RCM 3.43.5Open verse →

    करउँ सदा तिन्ह कै रखवारी। जिमि बालक राखइ महतारी।।

    अर्थ · Hindi

    करउँ सदा तिन्ह कै रखवारी। जिमि बालक राखइ महतारी।।

  630. RCM 3.43.6Open verse →

    गह सिसु बच्छ अनल अहि धाई। तहँ राखइ जननी अरगाई।।

    अर्थ · Hindi

    गह सिसु बच्छ अनल अहि धाई। तहँ राखइ जननी अरगाई।।

  631. RCM 3.43.7Open verse →

    प्रौढ़ भएँ तेहि सुत पर माता। प्रीति करइ नहिं पाछिलि बाता।।

    अर्थ · Hindi

    प्रौढ़ भएँ तेहि सुत पर माता। प्रीति करइ नहिं पाछिलि बाता।।

  632. RCM 3.43.8Open verse →

    मोरे प्रौढ़ तनय सम ग्यानी। बालक सुत सम दास अमानी।।

    अर्थ · Hindi

    मोरे प्रौढ़ तनय सम ग्यानी। बालक सुत सम दास अमानी।।

  633. RCM 3.43.9Open verse →

    जनहि मोर बल निज बल ताही। दुहु कहँ काम क्रोध रिपु आही।।

    अर्थ · Hindi

    जनहि मोर बल निज बल ताही। दुहु कहँ काम क्रोध रिपु आही।।

  634. RCM 3.43.10Open verse →

    यह बिचारि पंडित मोहि भजहीं। पाएहुँ ग्यान भगति नहिं तजहीं।।

    अर्थ · Hindi

    यह बिचारि पंडित मोहि भजहीं। पाएहुँ ग्यान भगति नहिं तजहीं।।

  635. RCM 3.43.11Open verse →

    काम क्रोध लोभादि मद प्रबल मोह कै धारि।

    अर्थ · Hindi

    काम क्रोध लोभादि मद प्रबल मोह कै धारि।

  636. RCM 3.43.12Open verse →

    तिन्ह महँ अति दारुन दुखद मायारूपी नारि।।43।।

    अर्थ · Hindi

    तिन्ह महँ अति दारुन दुखद मायारूपी नारि।।43।।

  637. RCM 3.44.1Open verse →

    सुनि मुनि कह पुरान श्रुति संता। मोह बिपिन कहुँ नारि बसंता।।

    अर्थ · Hindi

    सुनि मुनि कह पुरान श्रुति संता। मोह बिपिन कहुँ नारि बसंता।।

  638. RCM 3.44.2Open verse →

    जप तप नेम जलाश्रय झारी। होइ ग्रीषम सोषइ सब नारी।।

    अर्थ · Hindi

    जप तप नेम जलाश्रय झारी। होइ ग्रीषम सोषइ सब नारी।।

  639. RCM 3.44.3Open verse →

    काम क्रोध मद मत्सर भेका। इन्हहि हरषप्रद बरषा एका।।

    अर्थ · Hindi

    काम क्रोध मद मत्सर भेका। इन्हहि हरषप्रद बरषा एका।।

  640. RCM 3.44.4Open verse →

    दुर्बासना कुमुद समुदाई। तिन्ह कहँ सरद सदा सुखदाई।।

    अर्थ · Hindi

    दुर्बासना कुमुद समुदाई। तिन्ह कहँ सरद सदा सुखदाई।।

  641. RCM 3.44.5Open verse →

    धर्म सकल सरसीरुह बृंदा। होइ हिम तिन्हहि दहइ सुख मंदा।।

    अर्थ · Hindi

    धर्म सकल सरसीरुह बृंदा। होइ हिम तिन्हहि दहइ सुख मंदा।।

  642. RCM 3.44.6Open verse →

    पुनि ममता जवास बहुताई। पलुहइ नारि सिसिर रितु पाई।।

    अर्थ · Hindi

    पुनि ममता जवास बहुताई। पलुहइ नारि सिसिर रितु पाई।।

  643. RCM 3.44.7Open verse →

    पाप उलूक निकर सुखकारी। नारि निबिड़ रजनी अँधिआरी।।

    अर्थ · Hindi

    पाप उलूक निकर सुखकारी। नारि निबिड़ रजनी अँधिआरी।।

  644. RCM 3.44.8Open verse →

    बुधि बल सील सत्य सब मीना। बनसी सम त्रिय कहहिं प्रबीना।।

    अर्थ · Hindi

    बुधि बल सील सत्य सब मीना। बनसी सम त्रिय कहहिं प्रबीना।।

  645. RCM 3.44.9Open verse →

    अवगुन मूल सूलप्रद प्रमदा सब दुख खानि।

    अर्थ · Hindi

    अवगुन मूल सूलप्रद प्रमदा सब दुख खानि।

  646. RCM 3.44.10Open verse →

    ताते कीन्ह निवारन मुनि मैं यह जियँ जानि।।44।।

    अर्थ · Hindi

    ताते कीन्ह निवारन मुनि मैं यह जियँ जानि।।44।।

  647. RCM 3.45.1Open verse →

    सुनि रघुपति के बचन सुहाए। मुनि तन पुलक नयन भरि आए।।

    अर्थ · Hindi

    सुनि रघुपति के बचन सुहाए। मुनि तन पुलक नयन भरि आए।।

  648. RCM 3.45.2Open verse →

    कहहु कवन प्रभु कै असि रीती। सेवक पर ममता अरु प्रीती।।

    अर्थ · Hindi

    कहहु कवन प्रभु कै असि रीती। सेवक पर ममता अरु प्रीती।।

  649. RCM 3.45.3Open verse →

    जे न भजहिं अस प्रभु भ्रम त्यागी। ग्यान रंक नर मंद अभागी।।

    अर्थ · Hindi

    जे न भजहिं अस प्रभु भ्रम त्यागी। ग्यान रंक नर मंद अभागी।।

  650. RCM 3.45.4Open verse →

    पुनि सादर बोले मुनि नारद। सुनहु राम बिग्यान बिसारद।।

    अर्थ · Hindi

    पुनि सादर बोले मुनि नारद। सुनहु राम बिग्यान बिसारद।।

  651. RCM 3.45.5Open verse →

    संतन्ह के लच्छन रघुबीरा। कहहु नाथ भव भंजन भीरा।।

    अर्थ · Hindi

    संतन्ह के लच्छन रघुबीरा। कहहु नाथ भव भंजन भीरा।।

  652. RCM 3.45.6Open verse →

    सुनु मुनि संतन्ह के गुन कहऊँ। जिन्ह ते मैं उन्ह कें बस रहऊँ।।

    अर्थ · Hindi

    सुनु मुनि संतन्ह के गुन कहऊँ। जिन्ह ते मैं उन्ह कें बस रहऊँ।।

  653. RCM 3.45.7Open verse →

    षट बिकार जित अनघ अकामा। अचल अकिंचन सुचि सुखधामा।।

    अर्थ · Hindi

    षट बिकार जित अनघ अकामा। अचल अकिंचन सुचि सुखधामा।।

  654. RCM 3.45.8Open verse →

    अमितबोध अनीह मितभोगी। सत्यसार कबि कोबिद जोगी।।

    अर्थ · Hindi

    अमितबोध अनीह मितभोगी। सत्यसार कबि कोबिद जोगी।।

  655. RCM 3.45.9Open verse →

    सावधान मानद मदहीना। धीर धर्म गति परम प्रबीना।।

    अर्थ · Hindi

    सावधान मानद मदहीना। धीर धर्म गति परम प्रबीना।।

  656. RCM 3.45.10Open verse →

    गुनागार संसार दुख रहित बिगत संदेह।।

    अर्थ · Hindi

    गुनागार संसार दुख रहित बिगत संदेह।।

  657. RCM 3.45.11Open verse →

    तजि मम चरन सरोज प्रिय तिन्ह कहुँ देह न गेह।।45।।

    अर्थ · Hindi

    तजि मम चरन सरोज प्रिय तिन्ह कहुँ देह न गेह।।45।।

  658. RCM 3.46.1Open verse →

    निज गुन श्रवन सुनत सकुचाहीं। पर गुन सुनत अधिक हरषाहीं।।

    अर्थ · Hindi

    निज गुन श्रवन सुनत सकुचाहीं। पर गुन सुनत अधिक हरषाहीं।।

  659. RCM 3.46.2Open verse →

    सम सीतल नहिं त्यागहिं नीती। सरल सुभाउ सबहिं सन प्रीती।।

    अर्थ · Hindi

    सम सीतल नहिं त्यागहिं नीती। सरल सुभाउ सबहिं सन प्रीती।।

  660. RCM 3.46.3Open verse →

    जप तप ब्रत दम संजम नेमा। गुरु गोबिंद बिप्र पद प्रेमा।।

    अर्थ · Hindi

    जप तप ब्रत दम संजम नेमा। गुरु गोबिंद बिप्र पद प्रेमा।।

  661. RCM 3.46.4Open verse →

    श्रद्धा छमा मयत्री दाया। मुदिता मम पद प्रीति अमाया।।

    अर्थ · Hindi

    श्रद्धा छमा मयत्री दाया। मुदिता मम पद प्रीति अमाया।।

  662. RCM 3.46.5Open verse →

    बिरति बिबेक बिनय बिग्याना। बोध जथारथ बेद पुराना।।

    अर्थ · Hindi

    बिरति बिबेक बिनय बिग्याना। बोध जथारथ बेद पुराना।।

  663. RCM 3.46.6Open verse →

    दंभ मान मद करहिं न काऊ। भूलि न देहिं कुमारग पाऊ।।

    अर्थ · Hindi

    दंभ मान मद करहिं न काऊ। भूलि न देहिं कुमारग पाऊ।।

  664. RCM 3.46.7Open verse →

    गावहिं सुनहिं सदा मम लीला। हेतु रहित परहित रत सीला।।

    अर्थ · Hindi

    गावहिं सुनहिं सदा मम लीला। हेतु रहित परहित रत सीला।।

  665. RCM 3.46.8Open verse →

    मुनि सुनु साधुन्ह के गुन जेते। कहि न सकहिं सारद श्रुति तेते।।

    अर्थ · Hindi

    मुनि सुनु साधुन्ह के गुन जेते। कहि न सकहिं सारद श्रुति तेते।।