धरि निज रुप गयउ पितु पाहीं। राम बिमुख राखा तेहि नाहीं।।
Ramcharitmanas
श्रीरामचरितमानस
मूल श्लोकः
धरि निज रुप गयउ पितु पाहीं। राम बिमुख राखा तेहि नाहीं।।
RCM 3.2.2
श्रीरामचरितमानस
मूल श्लोकः
धरि निज रुप गयउ पितु पाहीं। राम बिमुख राखा तेहि नाहीं।।
RCM 3.2.2
धरि निज रुप गयउ पितु पाहीं। राम बिमुख राखा तेहि नाहीं।।