Ramcharitmanas · अध्याय 2
Ayodhya Kanda
अयोध्याकाण्ड
Kaikeyi's boon, Rama's exile, Bharata's pilgrimage to Chitrakoot.
- RCM 2.1.1Open verse →
जब तें रामु ब्याहि घर आए। नित नव मंगल मोद बधाए।।
अर्थ · Hindi
जब तें रामु ब्याहि घर आए। नित नव मंगल मोद बधाए।।
- RCM 2.1.2Open verse →
भुवन चारिदस भूधर भारी। सुकृत मेघ बरषहि सुख बारी।।
अर्थ · Hindi
भुवन चारिदस भूधर भारी। सुकृत मेघ बरषहि सुख बारी।।
- RCM 2.1.3Open verse →
रिधि सिधि संपति नदीं सुहाई। उमगि अवध अंबुधि कहुँ आई।।
अर्थ · Hindi
रिधि सिधि संपति नदीं सुहाई। उमगि अवध अंबुधि कहुँ आई।।
- RCM 2.1.4Open verse →
मनिगन पुर नर नारि सुजाती। सुचि अमोल सुंदर सब भाँती।।
अर्थ · Hindi
मनिगन पुर नर नारि सुजाती। सुचि अमोल सुंदर सब भाँती।।
- RCM 2.1.5Open verse →
कहि न जाइ कछु नगर बिभूती। जनु एतनिअ बिरंचि करतूती।।
अर्थ · Hindi
कहि न जाइ कछु नगर बिभूती। जनु एतनिअ बिरंचि करतूती।।
- RCM 2.1.6Open verse →
सब बिधि सब पुर लोग सुखारी। रामचंद मुख चंदु निहारी।।
अर्थ · Hindi
सब बिधि सब पुर लोग सुखारी। रामचंद मुख चंदु निहारी।।
- RCM 2.1.7Open verse →
मुदित मातु सब सखीं सहेली। फलित बिलोकि मनोरथ बेली।।
अर्थ · Hindi
मुदित मातु सब सखीं सहेली। फलित बिलोकि मनोरथ बेली।।
- RCM 2.1.8Open verse →
राम रूपु गुनसीलु सुभाऊ। प्रमुदित होइ देखि सुनि राऊ।।
अर्थ · Hindi
राम रूपु गुनसीलु सुभाऊ। प्रमुदित होइ देखि सुनि राऊ।।
- RCM 2.1.9Open verse →
सब कें उर अभिलाषु अस कहहिं मनाइ महेसु।
अर्थ · Hindi
सब कें उर अभिलाषु अस कहहिं मनाइ महेसु।
- RCM 2.1.10Open verse →
आप अछत जुबराज पद रामहि देउ नरेसु।।1।।
अर्थ · Hindi
आप अछत जुबराज पद रामहि देउ नरेसु।।1।।
- RCM 2.2.1Open verse →
एक समय सब सहित समाजा। राजसभाँ रघुराजु बिराजा।।
अर्थ · Hindi
एक समय सब सहित समाजा। राजसभाँ रघुराजु बिराजा।।
- RCM 2.2.2Open verse →
सकल सुकृत मूरति नरनाहू। राम सुजसु सुनि अतिहि उछाहू।।
अर्थ · Hindi
सकल सुकृत मूरति नरनाहू। राम सुजसु सुनि अतिहि उछाहू।।
- RCM 2.2.3Open verse →
नृप सब रहहिं कृपा अभिलाषें। लोकप करहिं प्रीति रुख राखें।।
अर्थ · Hindi
नृप सब रहहिं कृपा अभिलाषें। लोकप करहिं प्रीति रुख राखें।।
- RCM 2.2.4Open verse →
तिभुवन तीनि काल जग माहीं। भूरि भाग दसरथ सम नाहीं।।
अर्थ · Hindi
तिभुवन तीनि काल जग माहीं। भूरि भाग दसरथ सम नाहीं।।
- RCM 2.2.5Open verse →
मंगलमूल रामु सुत जासू। जो कछु कहिज थोर सबु तासू।।
अर्थ · Hindi
मंगलमूल रामु सुत जासू। जो कछु कहिज थोर सबु तासू।।
- RCM 2.2.6Open verse →
रायँ सुभायँ मुकुरु कर लीन्हा। बदनु बिलोकि मुकुट सम कीन्हा।।
अर्थ · Hindi
रायँ सुभायँ मुकुरु कर लीन्हा। बदनु बिलोकि मुकुट सम कीन्हा।।
- RCM 2.2.7Open verse →
श्रवन समीप भए सित केसा। मनहुँ जरठपनु अस उपदेसा।।
अर्थ · Hindi
श्रवन समीप भए सित केसा। मनहुँ जरठपनु अस उपदेसा।।
- RCM 2.2.8Open verse →
नृप जुबराज राम कहुँ देहू। जीवन जनम लाहु किन लेहू।।
अर्थ · Hindi
नृप जुबराज राम कहुँ देहू। जीवन जनम लाहु किन लेहू।।
- RCM 2.2.9Open verse →
यह बिचारु उर आनि नृप सुदिनु सुअवसरु पाइ।
अर्थ · Hindi
यह बिचारु उर आनि नृप सुदिनु सुअवसरु पाइ।
- RCM 2.2.10Open verse →
प्रेम पुलकि तन मुदित मन गुरहि सुनायउ जाइ।।2।।
अर्थ · Hindi
प्रेम पुलकि तन मुदित मन गुरहि सुनायउ जाइ।।2।।
- RCM 2.3.1Open verse →
कहइ भुआलु सुनिअ मुनिनायक। भए राम सब बिधि सब लायक।।
अर्थ · Hindi
कहइ भुआलु सुनिअ मुनिनायक। भए राम सब बिधि सब लायक।।
- RCM 2.3.2Open verse →
सेवक सचिव सकल पुरबासी। जे हमारे अरि मित्र उदासी।।
अर्थ · Hindi
सेवक सचिव सकल पुरबासी। जे हमारे अरि मित्र उदासी।।
- RCM 2.3.3Open verse →
सबहि रामु प्रिय जेहि बिधि मोही। प्रभु असीस जनु तनु धरि सोही।।
अर्थ · Hindi
सबहि रामु प्रिय जेहि बिधि मोही। प्रभु असीस जनु तनु धरि सोही।।
- RCM 2.3.4Open verse →
बिप्र सहित परिवार गोसाईं। करहिं छोहु सब रौरिहि नाई।।
अर्थ · Hindi
बिप्र सहित परिवार गोसाईं। करहिं छोहु सब रौरिहि नाई।।
- RCM 2.3.5Open verse →
जे गुर चरन रेनु सिर धरहीं। ते जनु सकल बिभव बस करहीं।।
अर्थ · Hindi
जे गुर चरन रेनु सिर धरहीं। ते जनु सकल बिभव बस करहीं।।
- RCM 2.3.6Open verse →
मोहि सम यहु अनुभयउ न दूजें। सबु पायउँ रज पावनि पूजें।।
अर्थ · Hindi
मोहि सम यहु अनुभयउ न दूजें। सबु पायउँ रज पावनि पूजें।।
- RCM 2.3.7Open verse →
अब अभिलाषु एकु मन मोरें। पूजहि नाथ अनुग्रह तोरें।।
अर्थ · Hindi
अब अभिलाषु एकु मन मोरें। पूजहि नाथ अनुग्रह तोरें।।
- RCM 2.3.8Open verse →
मुनि प्रसन्न लखि सहज सनेहू। कहेउ नरेस रजायसु देहू।।
अर्थ · Hindi
मुनि प्रसन्न लखि सहज सनेहू। कहेउ नरेस रजायसु देहू।।
- RCM 2.3.9Open verse →
राजन राउर नामु जसु सब अभिमत दातार।
अर्थ · Hindi
राजन राउर नामु जसु सब अभिमत दातार।
- RCM 2.3.10Open verse →
फल अनुगामी महिप मनि मन अभिलाषु तुम्हार।।3।।
अर्थ · Hindi
फल अनुगामी महिप मनि मन अभिलाषु तुम्हार।।3।।
- RCM 2.4.1Open verse →
सब बिधि गुरु प्रसन्न जियँ जानी। बोलेउ राउ रहँसि मृदु बानी।।
अर्थ · Hindi
सब बिधि गुरु प्रसन्न जियँ जानी। बोलेउ राउ रहँसि मृदु बानी।।
- RCM 2.4.2Open verse →
नाथ रामु करिअहिं जुबराजू। कहिअ कृपा करि करिअ समाजू।।
अर्थ · Hindi
नाथ रामु करिअहिं जुबराजू। कहिअ कृपा करि करिअ समाजू।।
- RCM 2.4.3Open verse →
मोहि अछत यहु होइ उछाहू। लहहिं लोग सब लोचन लाहू।।
अर्थ · Hindi
मोहि अछत यहु होइ उछाहू। लहहिं लोग सब लोचन लाहू।।
- RCM 2.4.4Open verse →
प्रभु प्रसाद सिव सबइ निबाहीं। यह लालसा एक मन माहीं।।
अर्थ · Hindi
प्रभु प्रसाद सिव सबइ निबाहीं। यह लालसा एक मन माहीं।।
- RCM 2.4.5Open verse →
पुनि न सोच तनु रहउ कि जाऊ। जेहिं न होइ पाछें पछिताऊ।।
अर्थ · Hindi
पुनि न सोच तनु रहउ कि जाऊ। जेहिं न होइ पाछें पछिताऊ।।
- RCM 2.4.6Open verse →
सुनि मुनि दसरथ बचन सुहाए। मंगल मोद मूल मन भाए।।
अर्थ · Hindi
सुनि मुनि दसरथ बचन सुहाए। मंगल मोद मूल मन भाए।।
- RCM 2.4.7Open verse →
सुनु नृप जासु बिमुख पछिताहीं। जासु भजन बिनु जरनि न जाहीं।।
अर्थ · Hindi
सुनु नृप जासु बिमुख पछिताहीं। जासु भजन बिनु जरनि न जाहीं।।
- RCM 2.4.8Open verse →
भयउ तुम्हार तनय सोइ स्वामी। रामु पुनीत प्रेम अनुगामी।।
अर्थ · Hindi
भयउ तुम्हार तनय सोइ स्वामी। रामु पुनीत प्रेम अनुगामी।।
- RCM 2.4.9Open verse →
बेगि बिलंबु न करिअ नृप साजिअ सबुइ समाजु।
अर्थ · Hindi
बेगि बिलंबु न करिअ नृप साजिअ सबुइ समाजु।
- RCM 2.4.10Open verse →
सुदिन सुमंगलु तबहिं जब रामु होहिं जुबराजु।।4।।
अर्थ · Hindi
सुदिन सुमंगलु तबहिं जब रामु होहिं जुबराजु।।4।।
- RCM 2.5.1Open verse →
मुदित महिपति मंदिर आए। सेवक सचिव सुमंत्रु बोलाए।।
अर्थ · Hindi
मुदित महिपति मंदिर आए। सेवक सचिव सुमंत्रु बोलाए।।
- RCM 2.5.2Open verse →
कहि जयजीव सीस तिन्ह नाए। भूप सुमंगल बचन सुनाए।।
अर्थ · Hindi
कहि जयजीव सीस तिन्ह नाए। भूप सुमंगल बचन सुनाए।।
- RCM 2.5.3Open verse →
जौं पाँचहि मत लागै नीका। करहु हरषि हियँ रामहि टीका।।
अर्थ · Hindi
जौं पाँचहि मत लागै नीका। करहु हरषि हियँ रामहि टीका।।
- RCM 2.5.4Open verse →
मंत्री मुदित सुनत प्रिय बानी। अभिमत बिरवँ परेउ जनु पानी।।
अर्थ · Hindi
मंत्री मुदित सुनत प्रिय बानी। अभिमत बिरवँ परेउ जनु पानी।।
- RCM 2.5.5Open verse →
बिनती सचिव करहि कर जोरी। जिअहु जगतपति बरिस करोरी।।
अर्थ · Hindi
बिनती सचिव करहि कर जोरी। जिअहु जगतपति बरिस करोरी।।
- RCM 2.5.6Open verse →
जग मंगल भल काजु बिचारा। बेगिअ नाथ न लाइअ बारा।।
अर्थ · Hindi
जग मंगल भल काजु बिचारा। बेगिअ नाथ न लाइअ बारा।।
- RCM 2.5.7Open verse →
नृपहि मोदु सुनि सचिव सुभाषा। बढ़त बौंड़ जनु लही सुसाखा।।
अर्थ · Hindi
नृपहि मोदु सुनि सचिव सुभाषा। बढ़त बौंड़ जनु लही सुसाखा।।
- RCM 2.5.8Open verse →
कहेउ भूप मुनिराज कर जोइ जोइ आयसु होइ।
अर्थ · Hindi
कहेउ भूप मुनिराज कर जोइ जोइ आयसु होइ।
- RCM 2.5.9Open verse →
राम राज अभिषेक हित बेगि करहु सोइ सोइ।।5।।
अर्थ · Hindi
राम राज अभिषेक हित बेगि करहु सोइ सोइ।।5।।
- RCM 2.6.1Open verse →
हरषि मुनीस कहेउ मृदु बानी। आनहु सकल सुतीरथ पानी।।
अर्थ · Hindi
हरषि मुनीस कहेउ मृदु बानी। आनहु सकल सुतीरथ पानी।।
- RCM 2.6.2Open verse →
औषध मूल फूल फल पाना। कहे नाम गनि मंगल नाना।।
अर्थ · Hindi
औषध मूल फूल फल पाना। कहे नाम गनि मंगल नाना।।
- RCM 2.6.3Open verse →
चामर चरम बसन बहु भाँती। रोम पाट पट अगनित जाती।।
अर्थ · Hindi
चामर चरम बसन बहु भाँती। रोम पाट पट अगनित जाती।।
- RCM 2.6.4Open verse →
मनिगन मंगल बस्तु अनेका। जो जग जोगु भूप अभिषेका।।
अर्थ · Hindi
मनिगन मंगल बस्तु अनेका। जो जग जोगु भूप अभिषेका।।
- RCM 2.6.5Open verse →
बेद बिदित कहि सकल बिधाना। कहेउ रचहु पुर बिबिध बिताना।।
अर्थ · Hindi
बेद बिदित कहि सकल बिधाना। कहेउ रचहु पुर बिबिध बिताना।।
- RCM 2.6.6Open verse →
सफल रसाल पूगफल केरा। रोपहु बीथिन्ह पुर चहुँ फेरा।।
अर्थ · Hindi
सफल रसाल पूगफल केरा। रोपहु बीथिन्ह पुर चहुँ फेरा।।
- RCM 2.6.7Open verse →
रचहु मंजु मनि चौकें चारू। कहहु बनावन बेगि बजारू।।
अर्थ · Hindi
रचहु मंजु मनि चौकें चारू। कहहु बनावन बेगि बजारू।।
- RCM 2.6.8Open verse →
पूजहु गनपति गुर कुलदेवा। सब बिधि करहु भूमिसुर सेवा।।
अर्थ · Hindi
पूजहु गनपति गुर कुलदेवा। सब बिधि करहु भूमिसुर सेवा।।
- RCM 2.6.9Open verse →
ध्वज पताक तोरन कलस सजहु तुरग रथ नाग।
अर्थ · Hindi
ध्वज पताक तोरन कलस सजहु तुरग रथ नाग।
- RCM 2.6.10Open verse →
सिर धरि मुनिबर बचन सबु निज निज काजहिं लाग।।6।।
अर्थ · Hindi
सिर धरि मुनिबर बचन सबु निज निज काजहिं लाग।।6।।
- RCM 2.7.1Open verse →
जो मुनीस जेहि आयसु दीन्हा। सो तेहिं काजु प्रथम जनु कीन्हा।।
अर्थ · Hindi
जो मुनीस जेहि आयसु दीन्हा। सो तेहिं काजु प्रथम जनु कीन्हा।।
- RCM 2.7.2Open verse →
बिप्र साधु सुर पूजत राजा। करत राम हित मंगल काजा।।
अर्थ · Hindi
बिप्र साधु सुर पूजत राजा। करत राम हित मंगल काजा।।
- RCM 2.7.3Open verse →
सुनत राम अभिषेक सुहावा। बाज गहागह अवध बधावा।।
अर्थ · Hindi
सुनत राम अभिषेक सुहावा। बाज गहागह अवध बधावा।।
- RCM 2.7.4Open verse →
राम सीय तन सगुन जनाए। फरकहिं मंगल अंग सुहाए।।
अर्थ · Hindi
राम सीय तन सगुन जनाए। फरकहिं मंगल अंग सुहाए।।
- RCM 2.7.5Open verse →
पुलकि सप्रेम परसपर कहहीं। भरत आगमनु सूचक अहहीं।।
अर्थ · Hindi
पुलकि सप्रेम परसपर कहहीं। भरत आगमनु सूचक अहहीं।।
- RCM 2.7.6Open verse →
भए बहुत दिन अति अवसेरी। सगुन प्रतीति भेंट प्रिय केरी।।
अर्थ · Hindi
भए बहुत दिन अति अवसेरी। सगुन प्रतीति भेंट प्रिय केरी।।
- RCM 2.7.7Open verse →
भरत सरिस प्रिय को जग माहीं। इहइ सगुन फलु दूसर नाहीं।।
अर्थ · Hindi
भरत सरिस प्रिय को जग माहीं। इहइ सगुन फलु दूसर नाहीं।।
- RCM 2.7.8Open verse →
रामहि बंधु सोच दिन राती। अंडन्हि कमठ ह्रदउ जेहि भाँती।।
अर्थ · Hindi
रामहि बंधु सोच दिन राती। अंडन्हि कमठ ह्रदउ जेहि भाँती।।
- RCM 2.7.9Open verse →
एहि अवसर मंगलु परम सुनि रहँसेउ रनिवासु।
अर्थ · Hindi
एहि अवसर मंगलु परम सुनि रहँसेउ रनिवासु।
- RCM 2.7.10Open verse →
सोभत लखि बिधु बढ़त जनु बारिधि बीचि बिलासु।।7।।
अर्थ · Hindi
सोभत लखि बिधु बढ़त जनु बारिधि बीचि बिलासु।।7।।
- RCM 2.8.1Open verse →
प्रथम जाइ जिन्ह बचन सुनाए। भूषन बसन भूरि तिन्ह पाए।।
अर्थ · Hindi
प्रथम जाइ जिन्ह बचन सुनाए। भूषन बसन भूरि तिन्ह पाए।।
- RCM 2.8.2Open verse →
प्रेम पुलकि तन मन अनुरागीं। मंगल कलस सजन सब लागीं।।
अर्थ · Hindi
प्रेम पुलकि तन मन अनुरागीं। मंगल कलस सजन सब लागीं।।
- RCM 2.8.3Open verse →
चौकें चारु सुमित्राँ पुरी। मनिमय बिबिध भाँति अति रुरी।।
अर्थ · Hindi
चौकें चारु सुमित्राँ पुरी। मनिमय बिबिध भाँति अति रुरी।।
- RCM 2.8.4Open verse →
आनँद मगन राम महतारी। दिए दान बहु बिप्र हँकारी।।
अर्थ · Hindi
आनँद मगन राम महतारी। दिए दान बहु बिप्र हँकारी।।
- RCM 2.8.5Open verse →
पूजीं ग्रामदेबि सुर नागा। कहेउ बहोरि देन बलिभागा।।
अर्थ · Hindi
पूजीं ग्रामदेबि सुर नागा। कहेउ बहोरि देन बलिभागा।।
- RCM 2.8.6Open verse →
जेहि बिधि होइ राम कल्यानू। देहु दया करि सो बरदानू।।
अर्थ · Hindi
जेहि बिधि होइ राम कल्यानू। देहु दया करि सो बरदानू।।
- RCM 2.8.7Open verse →
गावहिं मंगल कोकिलबयनीं। बिधुबदनीं मृगसावकनयनीं।।
अर्थ · Hindi
गावहिं मंगल कोकिलबयनीं। बिधुबदनीं मृगसावकनयनीं।।
- RCM 2.8.8Open verse →
राम राज अभिषेकु सुनि हियँ हरषे नर नारि।
अर्थ · Hindi
राम राज अभिषेकु सुनि हियँ हरषे नर नारि।
- RCM 2.8.9Open verse →
लगे सुमंगल सजन सब बिधि अनुकूल बिचारि।।8।।
अर्थ · Hindi
लगे सुमंगल सजन सब बिधि अनुकूल बिचारि।।8।।
- RCM 2.9.1Open verse →
तब नरनाहँ बसिष्ठु बोलाए। रामधाम सिख देन पठाए।।
अर्थ · Hindi
तब नरनाहँ बसिष्ठु बोलाए। रामधाम सिख देन पठाए।।
- RCM 2.9.2Open verse →
गुर आगमनु सुनत रघुनाथा। द्वार आइ पद नायउ माथा।।
अर्थ · Hindi
गुर आगमनु सुनत रघुनाथा। द्वार आइ पद नायउ माथा।।
- RCM 2.9.3Open verse →
सादर अरघ देइ घर आने। सोरह भाँति पूजि सनमाने।।
अर्थ · Hindi
सादर अरघ देइ घर आने। सोरह भाँति पूजि सनमाने।।
- RCM 2.9.4Open verse →
गहे चरन सिय सहित बहोरी। बोले रामु कमल कर जोरी।।
अर्थ · Hindi
गहे चरन सिय सहित बहोरी। बोले रामु कमल कर जोरी।।
- RCM 2.9.5Open verse →
सेवक सदन स्वामि आगमनू। मंगल मूल अमंगल दमनू।।
अर्थ · Hindi
सेवक सदन स्वामि आगमनू। मंगल मूल अमंगल दमनू।।
- RCM 2.9.6Open verse →
तदपि उचित जनु बोलि सप्रीती। पठइअ काज नाथ असि नीती।।
अर्थ · Hindi
तदपि उचित जनु बोलि सप्रीती। पठइअ काज नाथ असि नीती।।
- RCM 2.9.7Open verse →
प्रभुता तजि प्रभु कीन्ह सनेहू। भयउ पुनीत आजु यहु गेहू।।
अर्थ · Hindi
प्रभुता तजि प्रभु कीन्ह सनेहू। भयउ पुनीत आजु यहु गेहू।।
- RCM 2.9.8Open verse →
आयसु होइ सो करौं गोसाई। सेवक लहइ स्वामि सेवकाई।।
अर्थ · Hindi
आयसु होइ सो करौं गोसाई। सेवक लहइ स्वामि सेवकाई।।
- RCM 2.9.9Open verse →
सुनि सनेह साने बचन मुनि रघुबरहि प्रसंस।
अर्थ · Hindi
सुनि सनेह साने बचन मुनि रघुबरहि प्रसंस।
- RCM 2.9.10Open verse →
राम कस न तुम्ह कहहु अस हंस बंस अवतंस।।9।।
अर्थ · Hindi
राम कस न तुम्ह कहहु अस हंस बंस अवतंस।।9।।
- RCM 2.10.1Open verse →
बरनि राम गुन सीलु सुभाऊ। बोले प्रेम पुलकि मुनिराऊ।।
अर्थ · Hindi
बरनि राम गुन सीलु सुभाऊ। बोले प्रेम पुलकि मुनिराऊ।।
- RCM 2.10.2Open verse →
भूप सजेउ अभिषेक समाजू। चाहत देन तुम्हहि जुबराजू।।
अर्थ · Hindi
भूप सजेउ अभिषेक समाजू। चाहत देन तुम्हहि जुबराजू।।
- RCM 2.10.3Open verse →
राम करहु सब संजम आजू। जौं बिधि कुसल निबाहै काजू।।
अर्थ · Hindi
राम करहु सब संजम आजू। जौं बिधि कुसल निबाहै काजू।।
- RCM 2.10.4Open verse →
गुरु सिख देइ राय पहिं गयउ। राम हृदयँ अस बिसमउ भयऊ।।
अर्थ · Hindi
गुरु सिख देइ राय पहिं गयउ। राम हृदयँ अस बिसमउ भयऊ।।
- RCM 2.10.5Open verse →
जनमे एक संग सब भाई। भोजन सयन केलि लरिकाई।।
अर्थ · Hindi
जनमे एक संग सब भाई। भोजन सयन केलि लरिकाई।।
- RCM 2.10.6Open verse →
करनबेध उपबीत बिआहा। संग संग सब भए उछाहा।।
अर्थ · Hindi
करनबेध उपबीत बिआहा। संग संग सब भए उछाहा।।
- RCM 2.10.7Open verse →
बिमल बंस यहु अनुचित एकू। बंधु बिहाइ बड़ेहि अभिषेकू।।
अर्थ · Hindi
बिमल बंस यहु अनुचित एकू। बंधु बिहाइ बड़ेहि अभिषेकू।।
- RCM 2.10.8Open verse →
प्रभु सप्रेम पछितानि सुहाई। हरउ भगत मन कै कुटिलाई।।
अर्थ · Hindi
प्रभु सप्रेम पछितानि सुहाई। हरउ भगत मन कै कुटिलाई।।
- RCM 2.10.9Open verse →
तेहि अवसर आए लखन मगन प्रेम आनंद।
अर्थ · Hindi
तेहि अवसर आए लखन मगन प्रेम आनंद।
- RCM 2.10.10Open verse →
सनमाने प्रिय बचन कहि रघुकुल कैरव चंद।।10।।
अर्थ · Hindi
सनमाने प्रिय बचन कहि रघुकुल कैरव चंद।।10।।
- RCM 2.11.1Open verse →
बाजहिं बाजने बिबिध बिधाना। पुर प्रमोदु नहिं जाइ बखाना।।
अर्थ · Hindi
बाजहिं बाजने बिबिध बिधाना। पुर प्रमोदु नहिं जाइ बखाना।।
- RCM 2.11.2Open verse →
भरत आगमनु सकल मनावहिं। आवहुँ बेगि नयन फलु पावहिं।।
अर्थ · Hindi
भरत आगमनु सकल मनावहिं। आवहुँ बेगि नयन फलु पावहिं।।
- RCM 2.11.3Open verse →
हाट बाट घर गलीं अथाई। कहहिं परसपर लोग लोगाई।।
अर्थ · Hindi
हाट बाट घर गलीं अथाई। कहहिं परसपर लोग लोगाई।।
- RCM 2.11.4Open verse →
कालि लगन भलि केतिक बारा। पूजिहि बिधि अभिलाषु हमारा।।
अर्थ · Hindi
कालि लगन भलि केतिक बारा। पूजिहि बिधि अभिलाषु हमारा।।
- RCM 2.11.5Open verse →
कनक सिंघासन सीय समेता। बैठहिं रामु होइ चित चेता।।
अर्थ · Hindi
कनक सिंघासन सीय समेता। बैठहिं रामु होइ चित चेता।।
- RCM 2.11.6Open verse →
सकल कहहिं कब होइहि काली। बिघन मनावहिं देव कुचाली।।
अर्थ · Hindi
सकल कहहिं कब होइहि काली। बिघन मनावहिं देव कुचाली।।
- RCM 2.11.7Open verse →
तिन्हहि सोहाइ न अवध बधावा। चोरहि चंदिनि राति न भावा।।
अर्थ · Hindi
तिन्हहि सोहाइ न अवध बधावा। चोरहि चंदिनि राति न भावा।।
- RCM 2.11.8Open verse →
सारद बोलि बिनय सुर करहीं। बारहिं बार पाय लै परहीं।।
अर्थ · Hindi
सारद बोलि बिनय सुर करहीं। बारहिं बार पाय लै परहीं।।
- RCM 2.11.9Open verse →
बिपति हमारि बिलोकि बड़ि मातु करिअ सोइ आजु।
अर्थ · Hindi
बिपति हमारि बिलोकि बड़ि मातु करिअ सोइ आजु।
- RCM 2.11.10Open verse →
रामु जाहिं बन राजु तजि होइ सकल सुरकाजु।।11।।
अर्थ · Hindi
रामु जाहिं बन राजु तजि होइ सकल सुरकाजु।।11।।
- RCM 2.12.1Open verse →
सुनि सुर बिनय ठाढ़ि पछिताती। भइउँ सरोज बिपिन हिमराती।।
अर्थ · Hindi
सुनि सुर बिनय ठाढ़ि पछिताती। भइउँ सरोज बिपिन हिमराती।।
- RCM 2.12.2Open verse →
देखि देव पुनि कहहिं निहोरी। मातु तोहि नहिं थोरिउ खोरी।।
अर्थ · Hindi
देखि देव पुनि कहहिं निहोरी। मातु तोहि नहिं थोरिउ खोरी।।
- RCM 2.12.3Open verse →
बिसमय हरष रहित रघुराऊ। तुम्ह जानहु सब राम प्रभाऊ।।
अर्थ · Hindi
बिसमय हरष रहित रघुराऊ। तुम्ह जानहु सब राम प्रभाऊ।।
- RCM 2.12.4Open verse →
जीव करम बस सुख दुख भागी। जाइअ अवध देव हित लागी।।
अर्थ · Hindi
जीव करम बस सुख दुख भागी। जाइअ अवध देव हित लागी।।
- RCM 2.12.5Open verse →
बार बार गहि चरन सँकोचौ। चली बिचारि बिबुध मति पोची।।
अर्थ · Hindi
बार बार गहि चरन सँकोचौ। चली बिचारि बिबुध मति पोची।।
- RCM 2.12.6Open verse →
ऊँच निवासु नीचि करतूती। देखि न सकहिं पराइ बिभूती।।
अर्थ · Hindi
ऊँच निवासु नीचि करतूती। देखि न सकहिं पराइ बिभूती।।
- RCM 2.12.7Open verse →
आगिल काजु बिचारि बहोरी। करहहिं चाह कुसल कबि मोरी।।
अर्थ · Hindi
आगिल काजु बिचारि बहोरी। करहहिं चाह कुसल कबि मोरी।।
- RCM 2.12.8Open verse →
हरषि हृदयँ दसरथ पुर आई। जनु ग्रह दसा दुसह दुखदाई।।
अर्थ · Hindi
हरषि हृदयँ दसरथ पुर आई। जनु ग्रह दसा दुसह दुखदाई।।
- RCM 2.12.9Open verse →
नामु मंथरा मंदमति चेरी कैकेइ केरि।
अर्थ · Hindi
नामु मंथरा मंदमति चेरी कैकेइ केरि।
- RCM 2.12.10Open verse →
अजस पेटारी ताहि करि गई गिरा मति फेरि।।12।।
अर्थ · Hindi
अजस पेटारी ताहि करि गई गिरा मति फेरि।।12।।
- RCM 2.13.1Open verse →
दीख मंथरा नगरु बनावा। मंजुल मंगल बाज बधावा।।
अर्थ · Hindi
दीख मंथरा नगरु बनावा। मंजुल मंगल बाज बधावा।।
- RCM 2.13.2Open verse →
पूछेसि लोगन्ह काह उछाहू। राम तिलकु सुनि भा उर दाहू।।
अर्थ · Hindi
पूछेसि लोगन्ह काह उछाहू। राम तिलकु सुनि भा उर दाहू।।
- RCM 2.13.3Open verse →
करइ बिचारु कुबुद्धि कुजाती। होइ अकाजु कवनि बिधि राती।।
अर्थ · Hindi
करइ बिचारु कुबुद्धि कुजाती। होइ अकाजु कवनि बिधि राती।।
- RCM 2.13.4Open verse →
देखि लागि मधु कुटिल किराती। जिमि गवँ तकइ लेउँ केहि भाँती।।
अर्थ · Hindi
देखि लागि मधु कुटिल किराती। जिमि गवँ तकइ लेउँ केहि भाँती।।
- RCM 2.13.5Open verse →
भरत मातु पहिं गइ बिलखानी। का अनमनि हसि कह हँसि रानी।।
अर्थ · Hindi
भरत मातु पहिं गइ बिलखानी। का अनमनि हसि कह हँसि रानी।।
- RCM 2.13.6Open verse →
ऊतरु देइ न लेइ उसासू। नारि चरित करि ढारइ आँसू।।
अर्थ · Hindi
ऊतरु देइ न लेइ उसासू। नारि चरित करि ढारइ आँसू।।
- RCM 2.13.7Open verse →
हँसि कह रानि गालु बड़ तोरें। दीन्ह लखन सिख अस मन मोरें।।
अर्थ · Hindi
हँसि कह रानि गालु बड़ तोरें। दीन्ह लखन सिख अस मन मोरें।।
- RCM 2.13.8Open verse →
तबहुँ न बोल चेरि बड़ि पापिनि। छाड़इ स्वास कारि जनु साँपिनि।।
अर्थ · Hindi
तबहुँ न बोल चेरि बड़ि पापिनि। छाड़इ स्वास कारि जनु साँपिनि।।
- RCM 2.13.9Open verse →
सभय रानि कह कहसि किन कुसल रामु महिपालु।
अर्थ · Hindi
सभय रानि कह कहसि किन कुसल रामु महिपालु।
- RCM 2.13.10Open verse →
लखनु भरतु रिपुदमनु सुनि भा कुबरी उर सालु।।13।।
अर्थ · Hindi
लखनु भरतु रिपुदमनु सुनि भा कुबरी उर सालु।।13।।
- RCM 2.14.1Open verse →
कत सिख देइ हमहि कोउ माई। गालु करब केहि कर बलु पाई।।
अर्थ · Hindi
कत सिख देइ हमहि कोउ माई। गालु करब केहि कर बलु पाई।।
- RCM 2.14.2Open verse →
रामहि छाड़ि कुसल केहि आजू। जेहि जनेसु देइ जुबराजू।।
अर्थ · Hindi
रामहि छाड़ि कुसल केहि आजू। जेहि जनेसु देइ जुबराजू।।
- RCM 2.14.3Open verse →
भयउ कौसिलहि बिधि अति दाहिन। देखत गरब रहत उर नाहिन।।
अर्थ · Hindi
भयउ कौसिलहि बिधि अति दाहिन। देखत गरब रहत उर नाहिन।।
- RCM 2.14.4Open verse →
देखेहु कस न जाइ सब सोभा। जो अवलोकि मोर मनु छोभा।।
अर्थ · Hindi
देखेहु कस न जाइ सब सोभा। जो अवलोकि मोर मनु छोभा।।
- RCM 2.14.5Open verse →
पूतु बिदेस न सोचु तुम्हारें। जानति हहु बस नाहु हमारें।।
अर्थ · Hindi
पूतु बिदेस न सोचु तुम्हारें। जानति हहु बस नाहु हमारें।।
- RCM 2.14.6Open verse →
नीद बहुत प्रिय सेज तुराई। लखहु न भूप कपट चतुराई।।
अर्थ · Hindi
नीद बहुत प्रिय सेज तुराई। लखहु न भूप कपट चतुराई।।
- RCM 2.14.7Open verse →
सुनि प्रिय बचन मलिन मनु जानी। झुकी रानि अब रहु अरगानी।।
अर्थ · Hindi
सुनि प्रिय बचन मलिन मनु जानी। झुकी रानि अब रहु अरगानी।।
- RCM 2.14.8Open verse →
पुनि अस कबहुँ कहसि घरफोरी। तब धरि जीभ कढ़ावउँ तोरी।।
अर्थ · Hindi
पुनि अस कबहुँ कहसि घरफोरी। तब धरि जीभ कढ़ावउँ तोरी।।
- RCM 2.14.9Open verse →
काने खोरे कूबरे कुटिल कुचाली जानि।
अर्थ · Hindi
काने खोरे कूबरे कुटिल कुचाली जानि।
- RCM 2.14.10Open verse →
तिय बिसेषि पुनि चेरि कहि भरतमातु मुसुकानि।।14।।
अर्थ · Hindi
तिय बिसेषि पुनि चेरि कहि भरतमातु मुसुकानि।।14।।
- RCM 2.15.1Open verse →
प्रियबादिनि सिख दीन्हिउँ तोही। सपनेहुँ तो पर कोपु न मोही।।
अर्थ · Hindi
प्रियबादिनि सिख दीन्हिउँ तोही। सपनेहुँ तो पर कोपु न मोही।।
- RCM 2.15.2Open verse →
सुदिनु सुमंगल दायकु सोई। तोर कहा फुर जेहि दिन होई।।
अर्थ · Hindi
सुदिनु सुमंगल दायकु सोई। तोर कहा फुर जेहि दिन होई।।
- RCM 2.15.3Open verse →
जेठ स्वामि सेवक लघु भाई। यह दिनकर कुल रीति सुहाई।।
अर्थ · Hindi
जेठ स्वामि सेवक लघु भाई। यह दिनकर कुल रीति सुहाई।।
- RCM 2.15.4Open verse →
राम तिलकु जौं साँचेहुँ काली। देउँ मागु मन भावत आली।।
अर्थ · Hindi
राम तिलकु जौं साँचेहुँ काली। देउँ मागु मन भावत आली।।
- RCM 2.15.5Open verse →
कौसल्या सम सब महतारी। रामहि सहज सुभायँ पिआरी।।
अर्थ · Hindi
कौसल्या सम सब महतारी। रामहि सहज सुभायँ पिआरी।।
- RCM 2.15.6Open verse →
मो पर करहिं सनेहु बिसेषी। मैं करि प्रीति परीछा देखी।।
अर्थ · Hindi
मो पर करहिं सनेहु बिसेषी। मैं करि प्रीति परीछा देखी।।
- RCM 2.15.7Open verse →
जौं बिधि जनमु देइ करि छोहू। होहुँ राम सिय पूत पुतोहू।।
अर्थ · Hindi
जौं बिधि जनमु देइ करि छोहू। होहुँ राम सिय पूत पुतोहू।।
- RCM 2.15.8Open verse →
प्रान तें अधिक रामु प्रिय मोरें। तिन्ह कें तिलक छोभु कस तोरें।।
अर्थ · Hindi
प्रान तें अधिक रामु प्रिय मोरें। तिन्ह कें तिलक छोभु कस तोरें।।
- RCM 2.15.9Open verse →
भरत सपथ तोहि सत्य कहु परिहरि कपट दुराउ।
अर्थ · Hindi
भरत सपथ तोहि सत्य कहु परिहरि कपट दुराउ।
- RCM 2.15.10Open verse →
हरष समय बिसमउ करसि कारन मोहि सुनाउ।।15।।
अर्थ · Hindi
हरष समय बिसमउ करसि कारन मोहि सुनाउ।।15।।
- RCM 2.16.1Open verse →
एकहिं बार आस सब पूजी। अब कछु कहब जीभ करि दूजी।।
अर्थ · Hindi
एकहिं बार आस सब पूजी। अब कछु कहब जीभ करि दूजी।।
- RCM 2.16.2Open verse →
फोरै जोगु कपारु अभागा। भलेउ कहत दुख रउरेहि लागा।।
अर्थ · Hindi
फोरै जोगु कपारु अभागा। भलेउ कहत दुख रउरेहि लागा।।
- RCM 2.16.3Open verse →
कहहिं झूठि फुरि बात बनाई। ते प्रिय तुम्हहि करुइ मैं माई।।
अर्थ · Hindi
कहहिं झूठि फुरि बात बनाई। ते प्रिय तुम्हहि करुइ मैं माई।।
- RCM 2.16.4Open verse →
हमहुँ कहबि अब ठकुरसोहाती। नाहिं त मौन रहब दिनु राती।।
अर्थ · Hindi
हमहुँ कहबि अब ठकुरसोहाती। नाहिं त मौन रहब दिनु राती।।
- RCM 2.16.5Open verse →
करि कुरूप बिधि परबस कीन्हा। बवा सो लुनिअ लहिअ जो दीन्हा।।
अर्थ · Hindi
करि कुरूप बिधि परबस कीन्हा। बवा सो लुनिअ लहिअ जो दीन्हा।।
- RCM 2.16.6Open verse →
कोउ नृप होउ हमहि का हानी। चेरि छाड़ि अब होब कि रानी।।
अर्थ · Hindi
कोउ नृप होउ हमहि का हानी। चेरि छाड़ि अब होब कि रानी।।
- RCM 2.16.7Open verse →
जारै जोगु सुभाउ हमारा। अनभल देखि न जाइ तुम्हारा।।
अर्थ · Hindi
जारै जोगु सुभाउ हमारा। अनभल देखि न जाइ तुम्हारा।।
- RCM 2.16.8Open verse →
तातें कछुक बात अनुसारी। छमिअ देबि बड़ि चूक हमारी।।
अर्थ · Hindi
तातें कछुक बात अनुसारी। छमिअ देबि बड़ि चूक हमारी।।
- RCM 2.16.9Open verse →
गूढ़ कपट प्रिय बचन सुनि तीय अधरबुधि रानि।
अर्थ · Hindi
गूढ़ कपट प्रिय बचन सुनि तीय अधरबुधि रानि।
- RCM 2.16.10Open verse →
सुरमाया बस बैरिनिहि सुह्द जानि पतिआनि।।16।।
अर्थ · Hindi
सुरमाया बस बैरिनिहि सुह्द जानि पतिआनि।।16।।
- RCM 2.17.1Open verse →
सादर पुनि पुनि पूँछति ओही। सबरी गान मृगी जनु मोही।।
अर्थ · Hindi
सादर पुनि पुनि पूँछति ओही। सबरी गान मृगी जनु मोही।।
- RCM 2.17.2Open verse →
तसि मति फिरी अहइ जसि भाबी। रहसी चेरि घात जनु फाबी।।
अर्थ · Hindi
तसि मति फिरी अहइ जसि भाबी। रहसी चेरि घात जनु फाबी।।
- RCM 2.17.3Open verse →
तुम्ह पूँछहु मैं कहत डेराऊँ। धरेउ मोर घरफोरी नाऊँ।।
अर्थ · Hindi
तुम्ह पूँछहु मैं कहत डेराऊँ। धरेउ मोर घरफोरी नाऊँ।।
- RCM 2.17.4Open verse →
सजि प्रतीति बहुबिधि गढ़ि छोली। अवध साढ़साती तब बोली।।
अर्थ · Hindi
सजि प्रतीति बहुबिधि गढ़ि छोली। अवध साढ़साती तब बोली।।
- RCM 2.17.5Open verse →
प्रिय सिय रामु कहा तुम्ह रानी। रामहि तुम्ह प्रिय सो फुरि बानी।।
अर्थ · Hindi
प्रिय सिय रामु कहा तुम्ह रानी। रामहि तुम्ह प्रिय सो फुरि बानी।।
- RCM 2.17.6Open verse →
रहा प्रथम अब ते दिन बीते। समउ फिरें रिपु होहिं पिंरीते।।
अर्थ · Hindi
रहा प्रथम अब ते दिन बीते। समउ फिरें रिपु होहिं पिंरीते।।
- RCM 2.17.7Open verse →
भानु कमल कुल पोषनिहारा। बिनु जल जारि करइ सोइ छारा।।
अर्थ · Hindi
भानु कमल कुल पोषनिहारा। बिनु जल जारि करइ सोइ छारा।।
- RCM 2.17.8Open verse →
जरि तुम्हारि चह सवति उखारी। रूँधहु करि उपाउ बर बारी।।
अर्थ · Hindi
जरि तुम्हारि चह सवति उखारी। रूँधहु करि उपाउ बर बारी।।
- RCM 2.17.9Open verse →
तुम्हहि न सोचु सोहाग बल निज बस जानहु राउ।
अर्थ · Hindi
तुम्हहि न सोचु सोहाग बल निज बस जानहु राउ।
- RCM 2.17.10Open verse →
मन मलीन मुह मीठ नृप राउर सरल सुभाउ।।17।।
अर्थ · Hindi
मन मलीन मुह मीठ नृप राउर सरल सुभाउ।।17।।
- RCM 2.18.1Open verse →
चतुर गँभीर राम महतारी। बीचु पाइ निज बात सँवारी।।
अर्थ · Hindi
चतुर गँभीर राम महतारी। बीचु पाइ निज बात सँवारी।।
- RCM 2.18.2Open verse →
पठए भरतु भूप ननिअउरें। राम मातु मत जानव रउरें।।
अर्थ · Hindi
पठए भरतु भूप ननिअउरें। राम मातु मत जानव रउरें।।
- RCM 2.18.3Open verse →
सेवहिं सकल सवति मोहि नीकें। गरबित भरत मातु बल पी कें।।
अर्थ · Hindi
सेवहिं सकल सवति मोहि नीकें। गरबित भरत मातु बल पी कें।।
- RCM 2.18.4Open verse →
सालु तुम्हार कौसिलहि माई। कपट चतुर नहिं होइ जनाई।।
अर्थ · Hindi
सालु तुम्हार कौसिलहि माई। कपट चतुर नहिं होइ जनाई।।
- RCM 2.18.5Open verse →
राजहि तुम्ह पर प्रेमु बिसेषी। सवति सुभाउ सकइ नहिं देखी।।
अर्थ · Hindi
राजहि तुम्ह पर प्रेमु बिसेषी। सवति सुभाउ सकइ नहिं देखी।।
- RCM 2.18.6Open verse →
रची प्रंपचु भूपहि अपनाई। राम तिलक हित लगन धराई।।
अर्थ · Hindi
रची प्रंपचु भूपहि अपनाई। राम तिलक हित लगन धराई।।
- RCM 2.18.7Open verse →
यह कुल उचित राम कहुँ टीका। सबहि सोहाइ मोहि सुठि नीका।।
अर्थ · Hindi
यह कुल उचित राम कहुँ टीका। सबहि सोहाइ मोहि सुठि नीका।।
- RCM 2.18.8Open verse →
आगिलि बात समुझि डरु मोही। देउ दैउ फिरि सो फलु ओही।।
अर्थ · Hindi
आगिलि बात समुझि डरु मोही। देउ दैउ फिरि सो फलु ओही।।
- RCM 2.18.9Open verse →
रचि पचि कोटिक कुटिलपन कीन्हेसि कपट प्रबोधु।।
अर्थ · Hindi
रचि पचि कोटिक कुटिलपन कीन्हेसि कपट प्रबोधु।।
- RCM 2.18.10Open verse →
कहिसि कथा सत सवति कै जेहि बिधि बाढ़ बिरोधु।।18।।
अर्थ · Hindi
कहिसि कथा सत सवति कै जेहि बिधि बाढ़ बिरोधु।।18।।
- RCM 2.19.1Open verse →
भावी बस प्रतीति उर आई। पूँछ रानि पुनि सपथ देवाई।।
अर्थ · Hindi
भावी बस प्रतीति उर आई। पूँछ रानि पुनि सपथ देवाई।।
- RCM 2.19.2Open verse →
का पूछहुँ तुम्ह अबहुँ न जाना। निज हित अनहित पसु पहिचाना।।
अर्थ · Hindi
का पूछहुँ तुम्ह अबहुँ न जाना। निज हित अनहित पसु पहिचाना।।
- RCM 2.19.3Open verse →
भयउ पाखु दिन सजत समाजू। तुम्ह पाई सुधि मोहि सन आजू।।
अर्थ · Hindi
भयउ पाखु दिन सजत समाजू। तुम्ह पाई सुधि मोहि सन आजू।।
- RCM 2.19.4Open verse →
खाइअ पहिरिअ राज तुम्हारें। सत्य कहें नहिं दोषु हमारें।।
अर्थ · Hindi
खाइअ पहिरिअ राज तुम्हारें। सत्य कहें नहिं दोषु हमारें।।
- RCM 2.19.5Open verse →
जौं असत्य कछु कहब बनाई। तौ बिधि देइहि हमहि सजाई।।
अर्थ · Hindi
जौं असत्य कछु कहब बनाई। तौ बिधि देइहि हमहि सजाई।।
- RCM 2.19.6Open verse →
रामहि तिलक कालि जौं भयऊ। तुम्ह कहुँ बिपति बीजु बिधि बयऊ।।
अर्थ · Hindi
रामहि तिलक कालि जौं भयऊ। तुम्ह कहुँ बिपति बीजु बिधि बयऊ।।
- RCM 2.19.7Open verse →
रेख खँचाइ कहउँ बलु भाषी। भामिनि भइहु दूध कइ माखी।।
अर्थ · Hindi
रेख खँचाइ कहउँ बलु भाषी। भामिनि भइहु दूध कइ माखी।।
- RCM 2.19.8Open verse →
जौं सुत सहित करहु सेवकाई। तौ घर रहहु न आन उपाई।।
अर्थ · Hindi
जौं सुत सहित करहु सेवकाई। तौ घर रहहु न आन उपाई।।
- RCM 2.19.9Open verse →
कद्रूँ बिनतहि दीन्ह दुखु तुम्हहि कौसिलाँ देब।
अर्थ · Hindi
कद्रूँ बिनतहि दीन्ह दुखु तुम्हहि कौसिलाँ देब।
- RCM 2.19.10Open verse →
भरतु बंदिगृह सेइहहिं लखनु राम के नेब।।19।।
अर्थ · Hindi
भरतु बंदिगृह सेइहहिं लखनु राम के नेब।।19।।
- RCM 2.20.1Open verse →
कैकयसुता सुनत कटु बानी। कहि न सकइ कछु सहमि सुखानी।।
अर्थ · Hindi
कैकयसुता सुनत कटु बानी। कहि न सकइ कछु सहमि सुखानी।।
- RCM 2.20.2Open verse →
तन पसेउ कदली जिमि काँपी। कुबरीं दसन जीभ तब चाँपी।।
अर्थ · Hindi
तन पसेउ कदली जिमि काँपी। कुबरीं दसन जीभ तब चाँपी।।
- RCM 2.20.3Open verse →
कहि कहि कोटिक कपट कहानी। धीरजु धरहु प्रबोधिसि रानी।।
अर्थ · Hindi
कहि कहि कोटिक कपट कहानी। धीरजु धरहु प्रबोधिसि रानी।।
- RCM 2.20.4Open verse →
फिरा करमु प्रिय लागि कुचाली। बकिहि सराहइ मानि मराली।।
अर्थ · Hindi
फिरा करमु प्रिय लागि कुचाली। बकिहि सराहइ मानि मराली।।
- RCM 2.20.5Open verse →
सुनु मंथरा बात फुरि तोरी। दहिनि आँखि नित फरकइ मोरी।।
अर्थ · Hindi
सुनु मंथरा बात फुरि तोरी। दहिनि आँखि नित फरकइ मोरी।।
- RCM 2.20.6Open verse →
दिन प्रति देखउँ राति कुसपने। कहउँ न तोहि मोह बस अपने।।
अर्थ · Hindi
दिन प्रति देखउँ राति कुसपने। कहउँ न तोहि मोह बस अपने।।
- RCM 2.20.7Open verse →
काह करौ सखि सूध सुभाऊ। दाहिन बाम न जानउँ काऊ।।
अर्थ · Hindi
काह करौ सखि सूध सुभाऊ। दाहिन बाम न जानउँ काऊ।।
- RCM 2.20.8Open verse →
अपने चलत न आजु लगि अनभल काहुक कीन्ह।
अर्थ · Hindi
अपने चलत न आजु लगि अनभल काहुक कीन्ह।
- RCM 2.20.9Open verse →
केहिं अघ एकहि बार मोहि दैअँ दुसह दुखु दीन्ह।।20।।
अर्थ · Hindi
केहिं अघ एकहि बार मोहि दैअँ दुसह दुखु दीन्ह।।20।।
- RCM 2.21.1Open verse →
नैहर जनमु भरब बरु जाइ। जिअत न करबि सवति सेवकाई।।
अर्थ · Hindi
नैहर जनमु भरब बरु जाइ। जिअत न करबि सवति सेवकाई।।
- RCM 2.21.2Open verse →
अरि बस दैउ जिआवत जाही। मरनु नीक तेहि जीवन चाही।।
अर्थ · Hindi
अरि बस दैउ जिआवत जाही। मरनु नीक तेहि जीवन चाही।।
- RCM 2.21.3Open verse →
दीन बचन कह बहुबिधि रानी। सुनि कुबरीं तियमाया ठानी।।
अर्थ · Hindi
दीन बचन कह बहुबिधि रानी। सुनि कुबरीं तियमाया ठानी।।
- RCM 2.21.4Open verse →
अस कस कहहु मानि मन ऊना। सुखु सोहागु तुम्ह कहुँ दिन दूना।।
अर्थ · Hindi
अस कस कहहु मानि मन ऊना। सुखु सोहागु तुम्ह कहुँ दिन दूना।।
- RCM 2.21.5Open verse →
जेहिं राउर अति अनभल ताका। सोइ पाइहि यहु फलु परिपाका।।
अर्थ · Hindi
जेहिं राउर अति अनभल ताका। सोइ पाइहि यहु फलु परिपाका।।
- RCM 2.21.6Open verse →
जब तें कुमत सुना मैं स्वामिनि। भूख न बासर नींद न जामिनि।।
अर्थ · Hindi
जब तें कुमत सुना मैं स्वामिनि। भूख न बासर नींद न जामिनि।।
- RCM 2.21.7Open verse →
पूँछेउ गुनिन्ह रेख तिन्ह खाँची। भरत भुआल होहिं यह साँची।।
अर्थ · Hindi
पूँछेउ गुनिन्ह रेख तिन्ह खाँची। भरत भुआल होहिं यह साँची।।
- RCM 2.21.8Open verse →
भामिनि करहु त कहौं उपाऊ। है तुम्हरीं सेवा बस राऊ।।
अर्थ · Hindi
भामिनि करहु त कहौं उपाऊ। है तुम्हरीं सेवा बस राऊ।।
- RCM 2.21.9Open verse →
परउँ कूप तुअ बचन पर सकउँ पूत पति त्यागि।
अर्थ · Hindi
परउँ कूप तुअ बचन पर सकउँ पूत पति त्यागि।
- RCM 2.21.10Open verse →
कहसि मोर दुखु देखि बड़ कस न करब हित लागि।।21।।
अर्थ · Hindi
कहसि मोर दुखु देखि बड़ कस न करब हित लागि।।21।।
- RCM 2.22.1Open verse →
कुबरीं करि कबुली कैकेई। कपट छुरी उर पाहन टेई।।
अर्थ · Hindi
कुबरीं करि कबुली कैकेई। कपट छुरी उर पाहन टेई।।
- RCM 2.22.2Open verse →
लखइ न रानि निकट दुखु कैंसे। चरइ हरित तिन बलिपसु जैसें।।
अर्थ · Hindi
लखइ न रानि निकट दुखु कैंसे। चरइ हरित तिन बलिपसु जैसें।।
- RCM 2.22.3Open verse →
सुनत बात मृदु अंत कठोरी। देति मनहुँ मधु माहुर घोरी।।
अर्थ · Hindi
सुनत बात मृदु अंत कठोरी। देति मनहुँ मधु माहुर घोरी।।
- RCM 2.22.4Open verse →
कहइ चेरि सुधि अहइ कि नाही। स्वामिनि कहिहु कथा मोहि पाहीं।।
अर्थ · Hindi
कहइ चेरि सुधि अहइ कि नाही। स्वामिनि कहिहु कथा मोहि पाहीं।।
- RCM 2.22.5Open verse →
दुइ बरदान भूप सन थाती। मागहु आजु जुड़ावहु छाती।।
अर्थ · Hindi
दुइ बरदान भूप सन थाती। मागहु आजु जुड़ावहु छाती।।
- RCM 2.22.6Open verse →
सुतहि राजु रामहि बनवासू। देहु लेहु सब सवति हुलासु।।
अर्थ · Hindi
सुतहि राजु रामहि बनवासू। देहु लेहु सब सवति हुलासु।।
- RCM 2.22.7Open verse →
भूपति राम सपथ जब करई। तब मागेहु जेहिं बचनु न टरई।।
अर्थ · Hindi
भूपति राम सपथ जब करई। तब मागेहु जेहिं बचनु न टरई।।
- RCM 2.22.8Open verse →
होइ अकाजु आजु निसि बीतें। बचनु मोर प्रिय मानेहु जी तें।।
अर्थ · Hindi
होइ अकाजु आजु निसि बीतें। बचनु मोर प्रिय मानेहु जी तें।।
- RCM 2.22.9Open verse →
बड़ कुघातु करि पातकिनि कहेसि कोपगृहँ जाहु।
अर्थ · Hindi
बड़ कुघातु करि पातकिनि कहेसि कोपगृहँ जाहु।
- RCM 2.22.10Open verse →
काजु सँवारेहु सजग सबु सहसा जनि पतिआहु।।22।।
अर्थ · Hindi
काजु सँवारेहु सजग सबु सहसा जनि पतिआहु।।22।।
- RCM 2.23.1Open verse →
कुबरिहि रानि प्रानप्रिय जानी। बार बार बड़ि बुद्धि बखानी।।
अर्थ · Hindi
कुबरिहि रानि प्रानप्रिय जानी। बार बार बड़ि बुद्धि बखानी।।
- RCM 2.23.2Open verse →
तोहि सम हित न मोर संसारा। बहे जात कइ भइसि अधारा।।
अर्थ · Hindi
तोहि सम हित न मोर संसारा। बहे जात कइ भइसि अधारा।।
- RCM 2.23.3Open verse →
जौं बिधि पुरब मनोरथु काली। करौं तोहि चख पूतरि आली।।
अर्थ · Hindi
जौं बिधि पुरब मनोरथु काली। करौं तोहि चख पूतरि आली।।
- RCM 2.23.4Open verse →
बहुबिधि चेरिहि आदरु देई। कोपभवन गवनि कैकेई।।
अर्थ · Hindi
बहुबिधि चेरिहि आदरु देई। कोपभवन गवनि कैकेई।।
- RCM 2.23.5Open verse →
बिपति बीजु बरषा रितु चेरी। भुइँ भइ कुमति कैकेई केरी।।
अर्थ · Hindi
बिपति बीजु बरषा रितु चेरी। भुइँ भइ कुमति कैकेई केरी।।
- RCM 2.23.6Open verse →
पाइ कपट जलु अंकुर जामा। बर दोउ दल दुख फल परिनामा।।
अर्थ · Hindi
पाइ कपट जलु अंकुर जामा। बर दोउ दल दुख फल परिनामा।।
- RCM 2.23.7Open verse →
कोप समाजु साजि सबु सोई। राजु करत निज कुमति बिगोई।।
अर्थ · Hindi
कोप समाजु साजि सबु सोई। राजु करत निज कुमति बिगोई।।
- RCM 2.23.8Open verse →
राउर नगर कोलाहलु होई। यह कुचालि कछु जान न कोई।।
अर्थ · Hindi
राउर नगर कोलाहलु होई। यह कुचालि कछु जान न कोई।।
- RCM 2.23.9Open verse →
प्रमुदित पुर नर नारि। सब सजहिं सुमंगलचार।
अर्थ · Hindi
प्रमुदित पुर नर नारि। सब सजहिं सुमंगलचार।
- RCM 2.23.10Open verse →
एक प्रबिसहिं एक निर्गमहिं भीर भूप दरबार।।23।।
अर्थ · Hindi
एक प्रबिसहिं एक निर्गमहिं भीर भूप दरबार।।23।।
- RCM 2.24.1Open verse →
बाल सखा सुन हियँ हरषाहीं। मिलि दस पाँच राम पहिं जाहीं।।
अर्थ · Hindi
बाल सखा सुन हियँ हरषाहीं। मिलि दस पाँच राम पहिं जाहीं।।
- RCM 2.24.2Open verse →
प्रभु आदरहिं प्रेमु पहिचानी। पूँछहिं कुसल खेम मृदु बानी।।
अर्थ · Hindi
प्रभु आदरहिं प्रेमु पहिचानी। पूँछहिं कुसल खेम मृदु बानी।।
- RCM 2.24.3Open verse →
फिरहिं भवन प्रिय आयसु पाई। करत परसपर राम बड़ाई।।
अर्थ · Hindi
फिरहिं भवन प्रिय आयसु पाई। करत परसपर राम बड़ाई।।
- RCM 2.24.4Open verse →
को रघुबीर सरिस संसारा। सीलु सनेह निबाहनिहारा।
अर्थ · Hindi
को रघुबीर सरिस संसारा। सीलु सनेह निबाहनिहारा।
- RCM 2.24.5Open verse →
जेंहि जेंहि जोनि करम बस भ्रमहीं। तहँ तहँ ईसु देउ यह हमहीं।।
अर्थ · Hindi
जेंहि जेंहि जोनि करम बस भ्रमहीं। तहँ तहँ ईसु देउ यह हमहीं।।
- RCM 2.24.6Open verse →
सेवक हम स्वामी सियनाहू। होउ नात यह ओर निबाहू।।
अर्थ · Hindi
सेवक हम स्वामी सियनाहू। होउ नात यह ओर निबाहू।।
- RCM 2.24.7Open verse →
अस अभिलाषु नगर सब काहू। कैकयसुता ह्दयँ अति दाहू।।
अर्थ · Hindi
अस अभिलाषु नगर सब काहू। कैकयसुता ह्दयँ अति दाहू।।
- RCM 2.24.8Open verse →
को न कुसंगति पाइ नसाई। रहइ न नीच मतें चतुराई।।
अर्थ · Hindi
को न कुसंगति पाइ नसाई। रहइ न नीच मतें चतुराई।।
- RCM 2.24.9Open verse →
साँस समय सानंद नृपु गयउ कैकेई गेहँ।
अर्थ · Hindi
साँस समय सानंद नृपु गयउ कैकेई गेहँ।
- RCM 2.24.10Open verse →
गवनु निठुरता निकट किय जनु धरि देह सनेहँ।।24।।
अर्थ · Hindi
गवनु निठुरता निकट किय जनु धरि देह सनेहँ।।24।।
- RCM 2.25.1Open verse →
कोपभवन सुनि सकुचेउ राउ। भय बस अगहुड़ परइ न पाऊ।।
अर्थ · Hindi
कोपभवन सुनि सकुचेउ राउ। भय बस अगहुड़ परइ न पाऊ।।
- RCM 2.25.2Open verse →
सुरपति बसइ बाहँबल जाके। नरपति सकल रहहिं रुख ताकें।।
अर्थ · Hindi
सुरपति बसइ बाहँबल जाके। नरपति सकल रहहिं रुख ताकें।।
- RCM 2.25.3Open verse →
सो सुनि तिय रिस गयउ सुखाई। देखहु काम प्रताप बड़ाई।।
अर्थ · Hindi
सो सुनि तिय रिस गयउ सुखाई। देखहु काम प्रताप बड़ाई।।
- RCM 2.25.4Open verse →
सूल कुलिस असि अँगवनिहारे। ते रतिनाथ सुमन सर मारे।।
अर्थ · Hindi
सूल कुलिस असि अँगवनिहारे। ते रतिनाथ सुमन सर मारे।।
- RCM 2.25.5Open verse →
सभय नरेसु प्रिया पहिं गयऊ। देखि दसा दुखु दारुन भयऊ।।
अर्थ · Hindi
सभय नरेसु प्रिया पहिं गयऊ। देखि दसा दुखु दारुन भयऊ।।
- RCM 2.25.6Open verse →
भूमि सयन पटु मोट पुराना। दिए डारि तन भूषण नाना।।
अर्थ · Hindi
भूमि सयन पटु मोट पुराना। दिए डारि तन भूषण नाना।।
- RCM 2.25.7Open verse →
कुमतिहि कसि कुबेषता फाबी। अन अहिवातु सूच जनु भाबी।।
अर्थ · Hindi
कुमतिहि कसि कुबेषता फाबी। अन अहिवातु सूच जनु भाबी।।
- RCM 2.25.8Open verse →
जाइ निकट नृपु कह मृदु बानी। प्रानप्रिया केहि हेतु रिसानी।।
अर्थ · Hindi
जाइ निकट नृपु कह मृदु बानी। प्रानप्रिया केहि हेतु रिसानी।।
- RCM 2.26.1Open verse →
अनहित तोर प्रिया केइँ कीन्हा। केहि दुइ सिर केहि जमु चह लीन्हा।।
अर्थ · Hindi
अनहित तोर प्रिया केइँ कीन्हा। केहि दुइ सिर केहि जमु चह लीन्हा।।
- RCM 2.26.2Open verse →
कहु केहि रंकहि करौ नरेसू। कहु केहि नृपहि निकासौं देसू।।
अर्थ · Hindi
कहु केहि रंकहि करौ नरेसू। कहु केहि नृपहि निकासौं देसू।।
- RCM 2.26.3Open verse →
सकउँ तोर अरि अमरउ मारी। काह कीट बपुरे नर नारी।।
अर्थ · Hindi
सकउँ तोर अरि अमरउ मारी। काह कीट बपुरे नर नारी।।
- RCM 2.26.4Open verse →
जानसि मोर सुभाउ बरोरू। मनु तव आनन चंद चकोरू।।
अर्थ · Hindi
जानसि मोर सुभाउ बरोरू। मनु तव आनन चंद चकोरू।।
- RCM 2.26.5Open verse →
प्रिया प्रान सुत सरबसु मोरें। परिजन प्रजा सकल बस तोरें।।
अर्थ · Hindi
प्रिया प्रान सुत सरबसु मोरें। परिजन प्रजा सकल बस तोरें।।
- RCM 2.26.6Open verse →
जौं कछु कहौ कपटु करि तोही। भामिनि राम सपथ सत मोही।।
अर्थ · Hindi
जौं कछु कहौ कपटु करि तोही। भामिनि राम सपथ सत मोही।।
- RCM 2.26.7Open verse →
बिहसि मागु मनभावति बाता। भूषन सजहि मनोहर गाता।।
अर्थ · Hindi
बिहसि मागु मनभावति बाता। भूषन सजहि मनोहर गाता।।
- RCM 2.26.8Open verse →
घरी कुघरी समुझि जियँ देखू। बेगि प्रिया परिहरहि कुबेषू।।
अर्थ · Hindi
घरी कुघरी समुझि जियँ देखू। बेगि प्रिया परिहरहि कुबेषू।।
- RCM 2.26.9Open verse →
यह सुनि मन गुनि सपथ बड़ि बिहसि उठी मतिमंद।
अर्थ · Hindi
यह सुनि मन गुनि सपथ बड़ि बिहसि उठी मतिमंद।
- RCM 2.26.10Open verse →
भूषन सजति बिलोकि मृगु मनहुँ किरातिनि फंद।।26।।
अर्थ · Hindi
भूषन सजति बिलोकि मृगु मनहुँ किरातिनि फंद।।26।।
- RCM 2.27.1Open verse →
पुनि कह राउ सुह्रद जियँ जानी। प्रेम पुलकि मृदु मंजुल बानी।।
अर्थ · Hindi
पुनि कह राउ सुह्रद जियँ जानी। प्रेम पुलकि मृदु मंजुल बानी।।
- RCM 2.27.2Open verse →
भामिनि भयउ तोर मनभावा। घर घर नगर अनंद बधावा।।
अर्थ · Hindi
भामिनि भयउ तोर मनभावा। घर घर नगर अनंद बधावा।।
- RCM 2.27.3Open verse →
रामहि देउँ कालि जुबराजू। सजहि सुलोचनि मंगल साजू।।
अर्थ · Hindi
रामहि देउँ कालि जुबराजू। सजहि सुलोचनि मंगल साजू।।
- RCM 2.27.4Open verse →
दलकि उठेउ सुनि ह्रदउ कठोरू। जनु छुइ गयउ पाक बरतोरू।।
अर्थ · Hindi
दलकि उठेउ सुनि ह्रदउ कठोरू। जनु छुइ गयउ पाक बरतोरू।।
- RCM 2.27.5Open verse →
ऐसिउ पीर बिहसि तेहि गोई। चोर नारि जिमि प्रगटि न रोई।।
अर्थ · Hindi
ऐसिउ पीर बिहसि तेहि गोई। चोर नारि जिमि प्रगटि न रोई।।
- RCM 2.27.6Open verse →
लखहिं न भूप कपट चतुराई। कोटि कुटिल मनि गुरू पढ़ाई।।
अर्थ · Hindi
लखहिं न भूप कपट चतुराई। कोटि कुटिल मनि गुरू पढ़ाई।।
- RCM 2.27.7Open verse →
जद्यपि नीति निपुन नरनाहू। नारिचरित जलनिधि अवगाहू।।
अर्थ · Hindi
जद्यपि नीति निपुन नरनाहू। नारिचरित जलनिधि अवगाहू।।
- RCM 2.27.8Open verse →
कपट सनेहु बढ़ाइ बहोरी। बोली बिहसि नयन मुहु मोरी।।
अर्थ · Hindi
कपट सनेहु बढ़ाइ बहोरी। बोली बिहसि नयन मुहु मोरी।।
- RCM 2.27.9Open verse →
मागु मागु पै कहहु पिय कबहुँ न देहु न लेहु।
अर्थ · Hindi
मागु मागु पै कहहु पिय कबहुँ न देहु न लेहु।
- RCM 2.27.10Open verse →
देन कहेहु बरदान दुइ तेउ पावत संदेहु।।27।।
अर्थ · Hindi
देन कहेहु बरदान दुइ तेउ पावत संदेहु।।27।।
- RCM 2.28.1Open verse →
जानेउँ मरमु राउ हँसि कहई। तुम्हहि कोहाब परम प्रिय अहई।।
अर्थ · Hindi
जानेउँ मरमु राउ हँसि कहई। तुम्हहि कोहाब परम प्रिय अहई।।
- RCM 2.28.2Open verse →
थाति राखि न मागिहु काऊ। बिसरि गयउ मोहि भोर सुभाऊ।।
अर्थ · Hindi
थाति राखि न मागिहु काऊ। बिसरि गयउ मोहि भोर सुभाऊ।।
- RCM 2.28.3Open verse →
झूठेहुँ हमहि दोषु जनि देहू। दुइ कै चारि मागि मकु लेहू।।
अर्थ · Hindi
झूठेहुँ हमहि दोषु जनि देहू। दुइ कै चारि मागि मकु लेहू।।
- RCM 2.28.4Open verse →
रघुकुल रीति सदा चलि आई। प्रान जाहुँ बरु बचनु न जाई।।
अर्थ · Hindi
रघुकुल रीति सदा चलि आई। प्रान जाहुँ बरु बचनु न जाई।।
- RCM 2.28.5Open verse →
नहिं असत्य सम पातक पुंजा। गिरि सम होहिं कि कोटिक गुंजा।।
अर्थ · Hindi
नहिं असत्य सम पातक पुंजा। गिरि सम होहिं कि कोटिक गुंजा।।
- RCM 2.28.6Open verse →
सत्यमूल सब सुकृत सुहाए। बेद पुरान बिदित मनु गाए।।
अर्थ · Hindi
सत्यमूल सब सुकृत सुहाए। बेद पुरान बिदित मनु गाए।।
- RCM 2.28.7Open verse →
तेहि पर राम सपथ करि आई। सुकृत सनेह अवधि रघुराई।।
अर्थ · Hindi
तेहि पर राम सपथ करि आई। सुकृत सनेह अवधि रघुराई।।
- RCM 2.28.8Open verse →
बात दृढ़ाइ कुमति हँसि बोली। कुमत कुबिहग कुलह जनु खोली।।
अर्थ · Hindi
बात दृढ़ाइ कुमति हँसि बोली। कुमत कुबिहग कुलह जनु खोली।।
- RCM 2.28.9Open verse →
भूप मनोरथ सुभग बनु सुख सुबिहंग समाजु।
अर्थ · Hindi
भूप मनोरथ सुभग बनु सुख सुबिहंग समाजु।
- RCM 2.28.10Open verse →
भिल्लनि जिमि छाड़न चहति बचनु भयंकरु बाजु।।28।।
अर्थ · Hindi
भिल्लनि जिमि छाड़न चहति बचनु भयंकरु बाजु।।28।।
- RCM 2.29.1Open verse →
सुनहु प्रानप्रिय भावत जी का। देहु एक बर भरतहि टीका।।
अर्थ · Hindi
सुनहु प्रानप्रिय भावत जी का। देहु एक बर भरतहि टीका।।
- RCM 2.29.2Open verse →
मागउँ दूसर बर कर जोरी। पुरवहु नाथ मनोरथ मोरी।।
अर्थ · Hindi
मागउँ दूसर बर कर जोरी। पुरवहु नाथ मनोरथ मोरी।।
- RCM 2.29.3Open verse →
तापस बेष बिसेषि उदासी। चौदह बरिस रामु बनबासी।।
अर्थ · Hindi
तापस बेष बिसेषि उदासी। चौदह बरिस रामु बनबासी।।
- RCM 2.29.4Open verse →
सुनि मृदु बचन भूप हियँ सोकू। ससि कर छुअत बिकल जिमि कोकू।।
अर्थ · Hindi
सुनि मृदु बचन भूप हियँ सोकू। ससि कर छुअत बिकल जिमि कोकू।।
- RCM 2.29.5Open verse →
गयउ सहमि नहिं कछु कहि आवा। जनु सचान बन झपटेउ लावा।।
अर्थ · Hindi
गयउ सहमि नहिं कछु कहि आवा। जनु सचान बन झपटेउ लावा।।
- RCM 2.29.6Open verse →
बिबरन भयउ निपट नरपालू। दामिनि हनेउ मनहुँ तरु तालू।।
अर्थ · Hindi
बिबरन भयउ निपट नरपालू। दामिनि हनेउ मनहुँ तरु तालू।।
- RCM 2.29.7Open verse →
माथे हाथ मूदि दोउ लोचन। तनु धरि सोचु लाग जनु सोचन।।
अर्थ · Hindi
माथे हाथ मूदि दोउ लोचन। तनु धरि सोचु लाग जनु सोचन।।
- RCM 2.29.8Open verse →
मोर मनोरथु सुरतरु फूला। फरत करिनि जिमि हतेउ समूला।।
अर्थ · Hindi
मोर मनोरथु सुरतरु फूला। फरत करिनि जिमि हतेउ समूला।।
- RCM 2.29.9Open verse →
अवध उजारि कीन्हि कैकेईं। दीन्हसि अचल बिपति कै नेईं।।
अर्थ · Hindi
अवध उजारि कीन्हि कैकेईं। दीन्हसि अचल बिपति कै नेईं।।
- RCM 2.29.10Open verse →
कवनें अवसर का भयउ गयउँ नारि बिस्वास।
अर्थ · Hindi
कवनें अवसर का भयउ गयउँ नारि बिस्वास।
- RCM 2.29.11Open verse →
जोग सिद्धि फल समय जिमि जतिहि अबिद्या नास।।29।।
अर्थ · Hindi
जोग सिद्धि फल समय जिमि जतिहि अबिद्या नास।।29।।
- RCM 2.30.1Open verse →
एहि बिधि राउ मनहिं मन झाँखा। देखि कुभाँति कुमति मन माखा।।
अर्थ · Hindi
एहि बिधि राउ मनहिं मन झाँखा। देखि कुभाँति कुमति मन माखा।।
- RCM 2.30.2Open verse →
भरतु कि राउर पूत न होहीं। आनेहु मोल बेसाहि कि मोही।।
अर्थ · Hindi
भरतु कि राउर पूत न होहीं। आनेहु मोल बेसाहि कि मोही।।
- RCM 2.30.3Open verse →
जो सुनि सरु अस लाग तुम्हारें। काहे न बोलहु बचनु सँभारे।।
अर्थ · Hindi
जो सुनि सरु अस लाग तुम्हारें। काहे न बोलहु बचनु सँभारे।।
- RCM 2.30.4Open verse →
देहु उतरु अनु करहु कि नाहीं। सत्यसंध तुम्ह रघुकुल माहीं।।
अर्थ · Hindi
देहु उतरु अनु करहु कि नाहीं। सत्यसंध तुम्ह रघुकुल माहीं।।
- RCM 2.30.5Open verse →
देन कहेहु अब जनि बरु देहू। तजहुँ सत्य जग अपजसु लेहू।।
अर्थ · Hindi
देन कहेहु अब जनि बरु देहू। तजहुँ सत्य जग अपजसु लेहू।।
- RCM 2.30.6Open verse →
सत्य सराहि कहेहु बरु देना। जानेहु लेइहि मागि चबेना।।
अर्थ · Hindi
सत्य सराहि कहेहु बरु देना। जानेहु लेइहि मागि चबेना।।
- RCM 2.30.7Open verse →
सिबि दधीचि बलि जो कछु भाषा। तनु धनु तजेउ बचन पनु राखा।।
अर्थ · Hindi
सिबि दधीचि बलि जो कछु भाषा। तनु धनु तजेउ बचन पनु राखा।।
- RCM 2.30.8Open verse →
अति कटु बचन कहति कैकेई। मानहुँ लोन जरे पर देई।।
अर्थ · Hindi
अति कटु बचन कहति कैकेई। मानहुँ लोन जरे पर देई।।
- RCM 2.30.9Open verse →
धरम धुरंधर धीर धरि नयन उघारे रायँ।
अर्थ · Hindi
धरम धुरंधर धीर धरि नयन उघारे रायँ।
- RCM 2.30.10Open verse →
सिरु धुनि लीन्हि उसास असि मारेसि मोहि कुठायँ।।30।।
अर्थ · Hindi
सिरु धुनि लीन्हि उसास असि मारेसि मोहि कुठायँ।।30।।
- RCM 2.31.1Open verse →
आगें दीखि जरत रिस भारी। मनहुँ रोष तरवारि उघारी।।
अर्थ · Hindi
आगें दीखि जरत रिस भारी। मनहुँ रोष तरवारि उघारी।।
- RCM 2.31.2Open verse →
मूठि कुबुद्धि धार निठुराई। धरी कूबरीं सान बनाई।।
अर्थ · Hindi
मूठि कुबुद्धि धार निठुराई। धरी कूबरीं सान बनाई।।
- RCM 2.31.3Open verse →
लखी महीप कराल कठोरा। सत्य कि जीवनु लेइहि मोरा।।
अर्थ · Hindi
लखी महीप कराल कठोरा। सत्य कि जीवनु लेइहि मोरा।।
- RCM 2.31.4Open verse →
बोले राउ कठिन करि छाती। बानी सबिनय तासु सोहाती।।
अर्थ · Hindi
बोले राउ कठिन करि छाती। बानी सबिनय तासु सोहाती।।
- RCM 2.31.5Open verse →
प्रिया बचन कस कहसि कुभाँती। भीर प्रतीति प्रीति करि हाँती।।
अर्थ · Hindi
प्रिया बचन कस कहसि कुभाँती। भीर प्रतीति प्रीति करि हाँती।।
- RCM 2.31.6Open verse →
मोरें भरतु रामु दुइ आँखी। सत्य कहउँ करि संकरू साखी।।
अर्थ · Hindi
मोरें भरतु रामु दुइ आँखी। सत्य कहउँ करि संकरू साखी।।
- RCM 2.31.7Open verse →
अवसि दूतु मैं पठइब प्राता। ऐहहिं बेगि सुनत दोउ भ्राता।।
अर्थ · Hindi
अवसि दूतु मैं पठइब प्राता। ऐहहिं बेगि सुनत दोउ भ्राता।।
- RCM 2.31.8Open verse →
सुदिन सोधि सबु साजु सजाई। देउँ भरत कहुँ राजु बजाई।।
अर्थ · Hindi
सुदिन सोधि सबु साजु सजाई। देउँ भरत कहुँ राजु बजाई।।
- RCM 2.31.9Open verse →
लोभु न रामहि राजु कर बहुत भरत पर प्रीति।
अर्थ · Hindi
लोभु न रामहि राजु कर बहुत भरत पर प्रीति।
- RCM 2.31.10Open verse →
मैं बड़ छोट बिचारि जियँ करत रहेउँ नृपनीति।।31।।
अर्थ · Hindi
मैं बड़ छोट बिचारि जियँ करत रहेउँ नृपनीति।।31।।
- RCM 2.32.1Open verse →
राम सपथ सत कहुउँ सुभाऊ। राममातु कछु कहेउ न काऊ।।
अर्थ · Hindi
राम सपथ सत कहुउँ सुभाऊ। राममातु कछु कहेउ न काऊ।।
- RCM 2.32.2Open verse →
मैं सबु कीन्ह तोहि बिनु पूँछें। तेहि तें परेउ मनोरथु छूछें।।
अर्थ · Hindi
मैं सबु कीन्ह तोहि बिनु पूँछें। तेहि तें परेउ मनोरथु छूछें।।
- RCM 2.32.3Open verse →
रिस परिहरू अब मंगल साजू। कछु दिन गएँ भरत जुबराजू।।
अर्थ · Hindi
रिस परिहरू अब मंगल साजू। कछु दिन गएँ भरत जुबराजू।।
- RCM 2.32.4Open verse →
एकहि बात मोहि दुखु लागा। बर दूसर असमंजस मागा।।
अर्थ · Hindi
एकहि बात मोहि दुखु लागा। बर दूसर असमंजस मागा।।
- RCM 2.32.5Open verse →
अजहुँ हृदय जरत तेहि आँचा। रिस परिहास कि साँचेहुँ साँचा।।
अर्थ · Hindi
अजहुँ हृदय जरत तेहि आँचा। रिस परिहास कि साँचेहुँ साँचा।।
- RCM 2.32.6Open verse →
कहु तजि रोषु राम अपराधू। सबु कोउ कहइ रामु सुठि साधू।।
अर्थ · Hindi
कहु तजि रोषु राम अपराधू। सबु कोउ कहइ रामु सुठि साधू।।
- RCM 2.32.7Open verse →
तुहूँ सराहसि करसि सनेहू। अब सुनि मोहि भयउ संदेहू।।
अर्थ · Hindi
तुहूँ सराहसि करसि सनेहू। अब सुनि मोहि भयउ संदेहू।।
- RCM 2.32.8Open verse →
जासु सुभाउ अरिहि अनुकूला। सो किमि करिहि मातु प्रतिकूला।।
अर्थ · Hindi
जासु सुभाउ अरिहि अनुकूला। सो किमि करिहि मातु प्रतिकूला।।
- RCM 2.32.9Open verse →
प्रिया हास रिस परिहरहि मागु बिचारि बिबेकु।
अर्थ · Hindi
प्रिया हास रिस परिहरहि मागु बिचारि बिबेकु।
- RCM 2.32.10Open verse →
जेहिं देखाँ अब नयन भरि भरत राज अभिषेकु।।32।।
अर्थ · Hindi
जेहिं देखाँ अब नयन भरि भरत राज अभिषेकु।।32।।
- RCM 2.33.1Open verse →
जिऐ मीन बरू बारि बिहीना। मनि बिनु फनिकु जिऐ दुख दीना।।
अर्थ · Hindi
जिऐ मीन बरू बारि बिहीना। मनि बिनु फनिकु जिऐ दुख दीना।।
- RCM 2.33.2Open verse →
कहउँ सुभाउ न छलु मन माहीं। जीवनु मोर राम बिनु नाहीं।।
अर्थ · Hindi
कहउँ सुभाउ न छलु मन माहीं। जीवनु मोर राम बिनु नाहीं।।
- RCM 2.33.3Open verse →
समुझि देखु जियँ प्रिया प्रबीना। जीवनु राम दरस आधीना।।
अर्थ · Hindi
समुझि देखु जियँ प्रिया प्रबीना। जीवनु राम दरस आधीना।।
- RCM 2.33.4Open verse →
सुनि म्रदु बचन कुमति अति जरई। मनहुँ अनल आहुति घृत परई।।
अर्थ · Hindi
सुनि म्रदु बचन कुमति अति जरई। मनहुँ अनल आहुति घृत परई।।
- RCM 2.33.5Open verse →
कहइ करहु किन कोटि उपाया। इहाँ न लागिहि राउरि माया।।
अर्थ · Hindi
कहइ करहु किन कोटि उपाया। इहाँ न लागिहि राउरि माया।।
- RCM 2.33.6Open verse →
देहु कि लेहु अजसु करि नाहीं। मोहि न बहुत प्रपंच सोहाहीं।
अर्थ · Hindi
देहु कि लेहु अजसु करि नाहीं। मोहि न बहुत प्रपंच सोहाहीं।
- RCM 2.33.7Open verse →
रामु साधु तुम्ह साधु सयाने। राममातु भलि सब पहिचाने।।
अर्थ · Hindi
रामु साधु तुम्ह साधु सयाने। राममातु भलि सब पहिचाने।।
- RCM 2.33.8Open verse →
जस कौसिलाँ मोर भल ताका। तस फलु उन्हहि देउँ करि साका।।
अर्थ · Hindi
जस कौसिलाँ मोर भल ताका। तस फलु उन्हहि देउँ करि साका।।
- RCM 2.33.9Open verse →
होत प्रात मुनिबेष धरि जौं न रामु बन जाहिं।
अर्थ · Hindi
होत प्रात मुनिबेष धरि जौं न रामु बन जाहिं।
- RCM 2.33.10Open verse →
मोर मरनु राउर अजस नृप समुझिअ मन माहिं।।33।।
अर्थ · Hindi
मोर मरनु राउर अजस नृप समुझिअ मन माहिं।।33।।
- RCM 2.34.1Open verse →
अस कहि कुटिल भई उठि ठाढ़ी। मानहुँ रोष तरंगिनि बाढ़ी।।
अर्थ · Hindi
अस कहि कुटिल भई उठि ठाढ़ी। मानहुँ रोष तरंगिनि बाढ़ी।।
- RCM 2.34.2Open verse →
पाप पहार प्रगट भइ सोई। भरी क्रोध जल जाइ न जोई।।
अर्थ · Hindi
पाप पहार प्रगट भइ सोई। भरी क्रोध जल जाइ न जोई।।
- RCM 2.34.3Open verse →
दोउ बर कूल कठिन हठ धारा। भवँर कूबरी बचन प्रचारा।।
अर्थ · Hindi
दोउ बर कूल कठिन हठ धारा। भवँर कूबरी बचन प्रचारा।।
- RCM 2.34.4Open verse →
ढाहत भूपरूप तरु मूला। चली बिपति बारिधि अनुकूला।।
अर्थ · Hindi
ढाहत भूपरूप तरु मूला। चली बिपति बारिधि अनुकूला।।
- RCM 2.34.5Open verse →
लखी नरेस बात फुरि साँची। तिय मिस मीचु सीस पर नाची।।
अर्थ · Hindi
लखी नरेस बात फुरि साँची। तिय मिस मीचु सीस पर नाची।।
- RCM 2.34.6Open verse →
गहि पद बिनय कीन्ह बैठारी। जनि दिनकर कुल होसि कुठारी।।
अर्थ · Hindi
गहि पद बिनय कीन्ह बैठारी। जनि दिनकर कुल होसि कुठारी।।
- RCM 2.34.7Open verse →
मागु माथ अबहीं देउँ तोही। राम बिरहँ जनि मारसि मोही।।
अर्थ · Hindi
मागु माथ अबहीं देउँ तोही। राम बिरहँ जनि मारसि मोही।।
- RCM 2.34.8Open verse →
राखु राम कहुँ जेहि तेहि भाँती। नाहिं त जरिहि जनम भरि छाती।।
अर्थ · Hindi
राखु राम कहुँ जेहि तेहि भाँती। नाहिं त जरिहि जनम भरि छाती।।
- RCM 2.34.9Open verse →
देखी ब्याधि असाध नृपु परेउ धरनि धुनि माथ।
अर्थ · Hindi
देखी ब्याधि असाध नृपु परेउ धरनि धुनि माथ।
- RCM 2.34.10Open verse →
कहत परम आरत बचन राम राम रघुनाथ।।34।।
अर्थ · Hindi
कहत परम आरत बचन राम राम रघुनाथ।।34।।
- RCM 2.35.1Open verse →
ब्याकुल राउ सिथिल सब गाता। करिनि कलपतरु मनहुँ निपाता।।
अर्थ · Hindi
ब्याकुल राउ सिथिल सब गाता। करिनि कलपतरु मनहुँ निपाता।।
- RCM 2.35.2Open verse →
कंठु सूख मुख आव न बानी। जनु पाठीनु दीन बिनु पानी।।
अर्थ · Hindi
कंठु सूख मुख आव न बानी। जनु पाठीनु दीन बिनु पानी।।
- RCM 2.35.3Open verse →
पुनि कह कटु कठोर कैकेई। मनहुँ घाय महुँ माहुर देई।।
अर्थ · Hindi
पुनि कह कटु कठोर कैकेई। मनहुँ घाय महुँ माहुर देई।।
- RCM 2.35.4Open verse →
जौं अंतहुँ अस करतबु रहेऊ। मागु मागु तुम्ह केहिं बल कहेऊ।।
अर्थ · Hindi
जौं अंतहुँ अस करतबु रहेऊ। मागु मागु तुम्ह केहिं बल कहेऊ।।
- RCM 2.35.5Open verse →
दुइ कि होइ एक समय भुआला। हँसब ठठाइ फुलाउब गाला।।
अर्थ · Hindi
दुइ कि होइ एक समय भुआला। हँसब ठठाइ फुलाउब गाला।।
- RCM 2.35.6Open verse →
दानि कहाउब अरु कृपनाई। होइ कि खेम कुसल रौताई।।
अर्थ · Hindi
दानि कहाउब अरु कृपनाई। होइ कि खेम कुसल रौताई।।
- RCM 2.35.7Open verse →
छाड़हु बचनु कि धीरजु धरहू। जनि अबला जिमि करुना करहू।।
अर्थ · Hindi
छाड़हु बचनु कि धीरजु धरहू। जनि अबला जिमि करुना करहू।।
- RCM 2.35.8Open verse →
तनु तिय तनय धामु धनु धरनी। सत्यसंध कहुँ तृन सम बरनी।।
अर्थ · Hindi
तनु तिय तनय धामु धनु धरनी। सत्यसंध कहुँ तृन सम बरनी।।
- RCM 2.35.9Open verse →
मरम बचन सुनि राउ कह कहु कछु दोषु न तोर।
अर्थ · Hindi
मरम बचन सुनि राउ कह कहु कछु दोषु न तोर।
- RCM 2.35.10Open verse →
लागेउ तोहि पिसाच जिमि कालु कहावत मोर।।35।।
अर्थ · Hindi
लागेउ तोहि पिसाच जिमि कालु कहावत मोर।।35।।
- RCM 2.36.1Open verse →
चहत न भरत भूपतहि भोरें। बिधि बस कुमति बसी जिय तोरें।।
अर्थ · Hindi
चहत न भरत भूपतहि भोरें। बिधि बस कुमति बसी जिय तोरें।।
- RCM 2.36.2Open verse →
सो सबु मोर पाप परिनामू। भयउ कुठाहर जेहिं बिधि बामू।।
अर्थ · Hindi
सो सबु मोर पाप परिनामू। भयउ कुठाहर जेहिं बिधि बामू।।
- RCM 2.36.3Open verse →
सुबस बसिहि फिरि अवध सुहाई। सब गुन धाम राम प्रभुताई।।
अर्थ · Hindi
सुबस बसिहि फिरि अवध सुहाई। सब गुन धाम राम प्रभुताई।।
- RCM 2.36.4Open verse →
करिहहिं भाइ सकल सेवकाई। होइहि तिहुँ पुर राम बड़ाई।।
अर्थ · Hindi
करिहहिं भाइ सकल सेवकाई। होइहि तिहुँ पुर राम बड़ाई।।
- RCM 2.36.5Open verse →
तोर कलंकु मोर पछिताऊ। मुएहुँ न मिटहि न जाइहि काऊ।।
अर्थ · Hindi
तोर कलंकु मोर पछिताऊ। मुएहुँ न मिटहि न जाइहि काऊ।।
- RCM 2.36.6Open verse →
अब तोहि नीक लाग करु सोई। लोचन ओट बैठु मुहु गोई।।
अर्थ · Hindi
अब तोहि नीक लाग करु सोई। लोचन ओट बैठु मुहु गोई।।
- RCM 2.36.7Open verse →
जब लगि जिऔं कहउँ कर जोरी। तब लगि जनि कछु कहसि बहोरी।।
अर्थ · Hindi
जब लगि जिऔं कहउँ कर जोरी। तब लगि जनि कछु कहसि बहोरी।।
- RCM 2.36.8Open verse →
फिरि पछितैहसि अंत अभागी। मारसि गाइ नहारु लागी।।
अर्थ · Hindi
फिरि पछितैहसि अंत अभागी। मारसि गाइ नहारु लागी।।
- RCM 2.36.9Open verse →
परेउ राउ कहि कोटि बिधि काहे करसि निदानु।
अर्थ · Hindi
परेउ राउ कहि कोटि बिधि काहे करसि निदानु।
- RCM 2.36.10Open verse →
कपट सयानि न कहति कछु जागति मनहुँ मसानु।।36।।
अर्थ · Hindi
कपट सयानि न कहति कछु जागति मनहुँ मसानु।।36।।
- RCM 2.37.1Open verse →
राम राम रट बिकल भुआलू। जनु बिनु पंख बिहंग बेहालू।।
अर्थ · Hindi
राम राम रट बिकल भुआलू। जनु बिनु पंख बिहंग बेहालू।।
- RCM 2.37.2Open verse →
हृदयँ मनाव भोरु जनि होई। रामहि जाइ कहै जनि कोई।।
अर्थ · Hindi
हृदयँ मनाव भोरु जनि होई। रामहि जाइ कहै जनि कोई।।
- RCM 2.37.3Open verse →
उदउ करहु जनि रबि रघुकुल गुर। अवध बिलोकि सूल होइहि उर।।
अर्थ · Hindi
उदउ करहु जनि रबि रघुकुल गुर। अवध बिलोकि सूल होइहि उर।।
- RCM 2.37.4Open verse →
भूप प्रीति कैकइ कठिनाई। उभय अवधि बिधि रची बनाई।।
अर्थ · Hindi
भूप प्रीति कैकइ कठिनाई। उभय अवधि बिधि रची बनाई।।
- RCM 2.37.5Open verse →
बिलपत नृपहि भयउ भिनुसारा। बीना बेनु संख धुनि द्वारा।।
अर्थ · Hindi
बिलपत नृपहि भयउ भिनुसारा। बीना बेनु संख धुनि द्वारा।।
- RCM 2.37.6Open verse →
पढ़हिं भाट गुन गावहिं गायक। सुनत नृपहि जनु लागहिं सायक।।
अर्थ · Hindi
पढ़हिं भाट गुन गावहिं गायक। सुनत नृपहि जनु लागहिं सायक।।
- RCM 2.37.7Open verse →
मंगल सकल सोहाहिं न कैसें। सहगामिनिहि बिभूषन जैसें।।
अर्थ · Hindi
मंगल सकल सोहाहिं न कैसें। सहगामिनिहि बिभूषन जैसें।।
- RCM 2.37.8Open verse →
तेहिं निसि नीद परी नहि काहू। राम दरस लालसा उछाहू।।
अर्थ · Hindi
तेहिं निसि नीद परी नहि काहू। राम दरस लालसा उछाहू।।
- RCM 2.37.9Open verse →
द्वार भीर सेवक सचिव कहहिं उदित रबि देखि।
अर्थ · Hindi
द्वार भीर सेवक सचिव कहहिं उदित रबि देखि।
- RCM 2.37.10Open verse →
जागेउ अजहुँ न अवधपति कारनु कवनु बिसेषि।।37।।
अर्थ · Hindi
जागेउ अजहुँ न अवधपति कारनु कवनु बिसेषि।।37।।
- RCM 2.38.1Open verse →
पछिले पहर भूपु नित जागा। आजु हमहि बड़ अचरजु लागा।।
अर्थ · Hindi
पछिले पहर भूपु नित जागा। आजु हमहि बड़ अचरजु लागा।।
- RCM 2.38.2Open verse →
जाहु सुमंत्र जगावहु जाई। कीजिअ काजु रजायसु पाई।।
अर्थ · Hindi
जाहु सुमंत्र जगावहु जाई। कीजिअ काजु रजायसु पाई।।
- RCM 2.38.3Open verse →
गए सुमंत्रु तब राउर माही। देखि भयावन जात डेराहीं।।
अर्थ · Hindi
गए सुमंत्रु तब राउर माही। देखि भयावन जात डेराहीं।।
- RCM 2.38.4Open verse →
धाइ खाइ जनु जाइ न हेरा। मानहुँ बिपति बिषाद बसेरा।।
अर्थ · Hindi
धाइ खाइ जनु जाइ न हेरा। मानहुँ बिपति बिषाद बसेरा।।
- RCM 2.38.5Open verse →
पूछें कोउ न ऊतरु देई। गए जेंहिं भवन भूप कैकैई।।
अर्थ · Hindi
पूछें कोउ न ऊतरु देई। गए जेंहिं भवन भूप कैकैई।।
- RCM 2.38.6Open verse →
कहि जयजीव बैठ सिरु नाई। दैखि भूप गति गयउ सुखाई।।
अर्थ · Hindi
कहि जयजीव बैठ सिरु नाई। दैखि भूप गति गयउ सुखाई।।
- RCM 2.38.7Open verse →
सोच बिकल बिबरन महि परेऊ। मानहुँ कमल मूलु परिहरेऊ।।
अर्थ · Hindi
सोच बिकल बिबरन महि परेऊ। मानहुँ कमल मूलु परिहरेऊ।।
- RCM 2.38.8Open verse →
सचिउ सभीत सकइ नहिं पूँछी। बोली असुभ भरी सुभ छूछी।।
अर्थ · Hindi
सचिउ सभीत सकइ नहिं पूँछी। बोली असुभ भरी सुभ छूछी।।
- RCM 2.38.9Open verse →
परी न राजहि नीद निसि हेतु जान जगदीसु।
अर्थ · Hindi
परी न राजहि नीद निसि हेतु जान जगदीसु।
- RCM 2.38.10Open verse →
रामु रामु रटि भोरु किय कहइ न मरमु महीसु।।38।।
अर्थ · Hindi
रामु रामु रटि भोरु किय कहइ न मरमु महीसु।।38।।
- RCM 2.39.1Open verse →
आनहु रामहि बेगि बोलाई। समाचार तब पूँछेहु आई।।
अर्थ · Hindi
आनहु रामहि बेगि बोलाई। समाचार तब पूँछेहु आई।।
- RCM 2.39.2Open verse →
चलेउ सुमंत्र राय रूख जानी। लखी कुचालि कीन्हि कछु रानी।।
अर्थ · Hindi
चलेउ सुमंत्र राय रूख जानी। लखी कुचालि कीन्हि कछु रानी।।
- RCM 2.39.3Open verse →
सोच बिकल मग परइ न पाऊ। रामहि बोलि कहिहि का राऊ।।
अर्थ · Hindi
सोच बिकल मग परइ न पाऊ। रामहि बोलि कहिहि का राऊ।।
- RCM 2.39.4Open verse →
उर धरि धीरजु गयउ दुआरें। पूछँहिं सकल देखि मनु मारें।।
अर्थ · Hindi
उर धरि धीरजु गयउ दुआरें। पूछँहिं सकल देखि मनु मारें।।
- RCM 2.39.5Open verse →
समाधानु करि सो सबही का। गयउ जहाँ दिनकर कुल टीका।।
अर्थ · Hindi
समाधानु करि सो सबही का। गयउ जहाँ दिनकर कुल टीका।।
- RCM 2.39.6Open verse →
रामु सुमंत्रहि आवत देखा। आदरु कीन्ह पिता सम लेखा।।
अर्थ · Hindi
रामु सुमंत्रहि आवत देखा। आदरु कीन्ह पिता सम लेखा।।
- RCM 2.39.7Open verse →
निरखि बदनु कहि भूप रजाई। रघुकुलदीपहि चलेउ लेवाई।।
अर्थ · Hindi
निरखि बदनु कहि भूप रजाई। रघुकुलदीपहि चलेउ लेवाई।।
- RCM 2.39.8Open verse →
रामु कुभाँति सचिव सँग जाहीं। देखि लोग जहँ तहँ बिलखाहीं।।
अर्थ · Hindi
रामु कुभाँति सचिव सँग जाहीं। देखि लोग जहँ तहँ बिलखाहीं।।
- RCM 2.39.9Open verse →
जाइ दीख रघुबंसमनि नरपति निपट कुसाजु।।
अर्थ · Hindi
जाइ दीख रघुबंसमनि नरपति निपट कुसाजु।।
- RCM 2.39.10Open verse →
सहमि परेउ लखि सिंघिनिहि मनहुँ बृद्ध गजराजु।।39।।
अर्थ · Hindi
सहमि परेउ लखि सिंघिनिहि मनहुँ बृद्ध गजराजु।।39।।
- RCM 2.40.1Open verse →
सूखहिं अधर जरइ सबु अंगू। मनहुँ दीन मनिहीन भुअंगू।।
अर्थ · Hindi
सूखहिं अधर जरइ सबु अंगू। मनहुँ दीन मनिहीन भुअंगू।।
- RCM 2.40.2Open verse →
सरुष समीप दीखि कैकेई। मानहुँ मीचु घरी गनि लेई।।
अर्थ · Hindi
सरुष समीप दीखि कैकेई। मानहुँ मीचु घरी गनि लेई।।
- RCM 2.40.3Open verse →
करुनामय मृदु राम सुभाऊ। प्रथम दीख दुखु सुना न काऊ।।
अर्थ · Hindi
करुनामय मृदु राम सुभाऊ। प्रथम दीख दुखु सुना न काऊ।।
- RCM 2.40.4Open verse →
तदपि धीर धरि समउ बिचारी। पूँछी मधुर बचन महतारी।।
अर्थ · Hindi
तदपि धीर धरि समउ बिचारी। पूँछी मधुर बचन महतारी।।
- RCM 2.40.5Open verse →
मोहि कहु मातु तात दुख कारन। करिअ जतन जेहिं होइ निवारन।।
अर्थ · Hindi
मोहि कहु मातु तात दुख कारन। करिअ जतन जेहिं होइ निवारन।।
- RCM 2.40.6Open verse →
सुनहु राम सबु कारन एहू। राजहि तुम पर बहुत सनेहू।।
अर्थ · Hindi
सुनहु राम सबु कारन एहू। राजहि तुम पर बहुत सनेहू।।
- RCM 2.40.7Open verse →
देन कहेन्हि मोहि दुइ बरदाना। मागेउँ जो कछु मोहि सोहाना।
अर्थ · Hindi
देन कहेन्हि मोहि दुइ बरदाना। मागेउँ जो कछु मोहि सोहाना।
- RCM 2.40.8Open verse →
सो सुनि भयउ भूप उर सोचू। छाड़ि न सकहिं तुम्हार सँकोचू।।
अर्थ · Hindi
सो सुनि भयउ भूप उर सोचू। छाड़ि न सकहिं तुम्हार सँकोचू।।
- RCM 2.40.9Open verse →
सुत सनेह इत बचनु उत संकट परेउ नरेसु।
अर्थ · Hindi
सुत सनेह इत बचनु उत संकट परेउ नरेसु।
- RCM 2.40.10Open verse →
सकहु न आयसु धरहु सिर मेटहु कठिन कलेसु।।40।।
अर्थ · Hindi
सकहु न आयसु धरहु सिर मेटहु कठिन कलेसु।।40।।
- RCM 2.41.1Open verse →
निधरक बैठि कहइ कटु बानी। सुनत कठिनता अति अकुलानी।।
अर्थ · Hindi
निधरक बैठि कहइ कटु बानी। सुनत कठिनता अति अकुलानी।।
- RCM 2.41.2Open verse →
जीभ कमान बचन सर नाना। मनहुँ महिप मृदु लच्छ समाना।।
अर्थ · Hindi
जीभ कमान बचन सर नाना। मनहुँ महिप मृदु लच्छ समाना।।
- RCM 2.41.3Open verse →
जनु कठोरपनु धरें सरीरू। सिखइ धनुषबिद्या बर बीरू।।
अर्थ · Hindi
जनु कठोरपनु धरें सरीरू। सिखइ धनुषबिद्या बर बीरू।।
- RCM 2.41.4Open verse →
सब प्रसंगु रघुपतिहि सुनाई। बैठि मनहुँ तनु धरि निठुराई।।
अर्थ · Hindi
सब प्रसंगु रघुपतिहि सुनाई। बैठि मनहुँ तनु धरि निठुराई।।
- RCM 2.41.5Open verse →
मन मुसकाइ भानुकुल भानु। रामु सहज आनंद निधानू।।
अर्थ · Hindi
मन मुसकाइ भानुकुल भानु। रामु सहज आनंद निधानू।।
- RCM 2.41.6Open verse →
बोले बचन बिगत सब दूषन। मृदु मंजुल जनु बाग बिभूषन।।
अर्थ · Hindi
बोले बचन बिगत सब दूषन। मृदु मंजुल जनु बाग बिभूषन।।
- RCM 2.41.7Open verse →
सुनु जननी सोइ सुतु बड़भागी। जो पितु मातु बचन अनुरागी।।
अर्थ · Hindi
सुनु जननी सोइ सुतु बड़भागी। जो पितु मातु बचन अनुरागी।।
- RCM 2.41.8Open verse →
तनय मातु पितु तोषनिहारा। दुर्लभ जननि सकल संसारा।।
अर्थ · Hindi
तनय मातु पितु तोषनिहारा। दुर्लभ जननि सकल संसारा।।
- RCM 2.41.9Open verse →
मुनिगन मिलनु बिसेषि बन सबहि भाँति हित मोर।
अर्थ · Hindi
मुनिगन मिलनु बिसेषि बन सबहि भाँति हित मोर।
- RCM 2.41.10Open verse →
तेहि महँ पितु आयसु बहुरि संमत जननी तोर।।41।।
अर्थ · Hindi
तेहि महँ पितु आयसु बहुरि संमत जननी तोर।।41।।
- RCM 2.42.1Open verse →
भरत प्रानप्रिय पावहिं राजू। बिधि सब बिधि मोहि सनमुख आजु।
अर्थ · Hindi
भरत प्रानप्रिय पावहिं राजू। बिधि सब बिधि मोहि सनमुख आजु।
- RCM 2.42.2Open verse →
जों न जाउँ बन ऐसेहु काजा। प्रथम गनिअ मोहि मूढ़ समाजा।।
अर्थ · Hindi
जों न जाउँ बन ऐसेहु काजा। प्रथम गनिअ मोहि मूढ़ समाजा।।
- RCM 2.42.3Open verse →
सेवहिं अरँडु कलपतरु त्यागी। परिहरि अमृत लेहिं बिषु मागी।।
अर्थ · Hindi
सेवहिं अरँडु कलपतरु त्यागी। परिहरि अमृत लेहिं बिषु मागी।।
- RCM 2.42.4Open verse →
तेउ न पाइ अस समउ चुकाहीं। देखु बिचारि मातु मन माहीं।।
अर्थ · Hindi
तेउ न पाइ अस समउ चुकाहीं। देखु बिचारि मातु मन माहीं।।
- RCM 2.42.5Open verse →
अंब एक दुखु मोहि बिसेषी। निपट बिकल नरनायकु देखी।।
अर्थ · Hindi
अंब एक दुखु मोहि बिसेषी। निपट बिकल नरनायकु देखी।।
- RCM 2.42.6Open verse →
थोरिहिं बात पितहि दुख भारी। होति प्रतीति न मोहि महतारी।।
अर्थ · Hindi
थोरिहिं बात पितहि दुख भारी। होति प्रतीति न मोहि महतारी।।
- RCM 2.42.7Open verse →
राउ धीर गुन उदधि अगाधू। भा मोहि ते कछु बड़ अपराधू।।
अर्थ · Hindi
राउ धीर गुन उदधि अगाधू। भा मोहि ते कछु बड़ अपराधू।।
- RCM 2.42.8Open verse →
जातें मोहि न कहत कछु राऊ। मोरि सपथ तोहि कहु सतिभाऊ।।
अर्थ · Hindi
जातें मोहि न कहत कछु राऊ। मोरि सपथ तोहि कहु सतिभाऊ।।
- RCM 2.42.9Open verse →
सहज सरल रघुबर बचन कुमति कुटिल करि जान।
अर्थ · Hindi
सहज सरल रघुबर बचन कुमति कुटिल करि जान।
- RCM 2.42.10Open verse →
चलइ जोंक जल बक्रगति जद्यपि सलिलु समान।।42।।
अर्थ · Hindi
चलइ जोंक जल बक्रगति जद्यपि सलिलु समान।।42।।
- RCM 2.43.1Open verse →
रहसी रानि राम रुख पाई। बोली कपट सनेहु जनाई।।
अर्थ · Hindi
रहसी रानि राम रुख पाई। बोली कपट सनेहु जनाई।।
- RCM 2.43.2Open verse →
सपथ तुम्हार भरत कै आना। हेतु न दूसर मै कछु जाना।।
अर्थ · Hindi
सपथ तुम्हार भरत कै आना। हेतु न दूसर मै कछु जाना।।
- RCM 2.43.3Open verse →
तुम्ह अपराध जोगु नहिं ताता। जननी जनक बंधु सुखदाता।।
अर्थ · Hindi
तुम्ह अपराध जोगु नहिं ताता। जननी जनक बंधु सुखदाता।।
- RCM 2.43.4Open verse →
राम सत्य सबु जो कछु कहहू। तुम्ह पितु मातु बचन रत अहहू।।
अर्थ · Hindi
राम सत्य सबु जो कछु कहहू। तुम्ह पितु मातु बचन रत अहहू।।
- RCM 2.43.5Open verse →
पितहि बुझाइ कहहु बलि सोई। चौथेंपन जेहिं अजसु न होई।।
अर्थ · Hindi
पितहि बुझाइ कहहु बलि सोई। चौथेंपन जेहिं अजसु न होई।।
- RCM 2.43.6Open verse →
तुम्ह सम सुअन सुकृत जेहिं दीन्हे। उचित न तासु निरादरु कीन्हे।।
अर्थ · Hindi
तुम्ह सम सुअन सुकृत जेहिं दीन्हे। उचित न तासु निरादरु कीन्हे।।
- RCM 2.43.7Open verse →
लागहिं कुमुख बचन सुभ कैसे। मगहँ गयादिक तीरथ जैसे।।
अर्थ · Hindi
लागहिं कुमुख बचन सुभ कैसे। मगहँ गयादिक तीरथ जैसे।।
- RCM 2.43.8Open verse →
रामहि मातु बचन सब भाए। जिमि सुरसरि गत सलिल सुहाए।।
अर्थ · Hindi
रामहि मातु बचन सब भाए। जिमि सुरसरि गत सलिल सुहाए।।
- RCM 2.43.9Open verse →
गइ मुरुछा रामहि सुमिरि नृप फिरि करवट लीन्ह।
अर्थ · Hindi
गइ मुरुछा रामहि सुमिरि नृप फिरि करवट लीन्ह।
- RCM 2.43.10Open verse →
सचिव राम आगमन कहि बिनय समय सम कीन्ह।।43।।
अर्थ · Hindi
सचिव राम आगमन कहि बिनय समय सम कीन्ह।।43।।
- RCM 2.44.1Open verse →
अवनिप अकनि रामु पगु धारे। धरि धीरजु तब नयन उघारे।।
अर्थ · Hindi
अवनिप अकनि रामु पगु धारे। धरि धीरजु तब नयन उघारे।।
- RCM 2.44.2Open verse →
सचिवँ सँभारि राउ बैठारे। चरन परत नृप रामु निहारे।।
अर्थ · Hindi
सचिवँ सँभारि राउ बैठारे। चरन परत नृप रामु निहारे।।
- RCM 2.44.3Open verse →
लिए सनेह बिकल उर लाई। गै मनि मनहुँ फनिक फिरि पाई।।
अर्थ · Hindi
लिए सनेह बिकल उर लाई। गै मनि मनहुँ फनिक फिरि पाई।।
- RCM 2.44.4Open verse →
रामहि चितइ रहेउ नरनाहू। चला बिलोचन बारि प्रबाहू।।
अर्थ · Hindi
रामहि चितइ रहेउ नरनाहू। चला बिलोचन बारि प्रबाहू।।
- RCM 2.44.5Open verse →
सोक बिबस कछु कहै न पारा। हृदयँ लगावत बारहिं बारा।।
अर्थ · Hindi
सोक बिबस कछु कहै न पारा। हृदयँ लगावत बारहिं बारा।।
- RCM 2.44.6Open verse →
बिधिहि मनाव राउ मन माहीं। जेहिं रघुनाथ न कानन जाहीं।।
अर्थ · Hindi
बिधिहि मनाव राउ मन माहीं। जेहिं रघुनाथ न कानन जाहीं।।
- RCM 2.44.7Open verse →
सुमिरि महेसहि कहइ निहोरी। बिनती सुनहु सदासिव मोरी।।
अर्थ · Hindi
सुमिरि महेसहि कहइ निहोरी। बिनती सुनहु सदासिव मोरी।।
- RCM 2.44.8Open verse →
आसुतोष तुम्ह अवढर दानी। आरति हरहु दीन जनु जानी।।
अर्थ · Hindi
आसुतोष तुम्ह अवढर दानी। आरति हरहु दीन जनु जानी।।
- RCM 2.44.9Open verse →
तुम्ह प्रेरक सब के हृदयँ सो मति रामहि देहु।
अर्थ · Hindi
तुम्ह प्रेरक सब के हृदयँ सो मति रामहि देहु।
- RCM 2.44.10Open verse →
बचनु मोर तजि रहहि घर परिहरि सीलु सनेहु।।44।।
अर्थ · Hindi
बचनु मोर तजि रहहि घर परिहरि सीलु सनेहु।।44।।
- RCM 2.45.1Open verse →
अजसु होउ जग सुजसु नसाऊ। नरक परौ बरु सुरपुरु जाऊ।।
अर्थ · Hindi
अजसु होउ जग सुजसु नसाऊ। नरक परौ बरु सुरपुरु जाऊ।।
- RCM 2.45.2Open verse →
सब दुख दुसह सहावहु मोही। लोचन ओट रामु जनि होंही।।
अर्थ · Hindi
सब दुख दुसह सहावहु मोही। लोचन ओट रामु जनि होंही।।
- RCM 2.45.3Open verse →
अस मन गुनइ राउ नहिं बोला। पीपर पात सरिस मनु डोला।।
अर्थ · Hindi
अस मन गुनइ राउ नहिं बोला। पीपर पात सरिस मनु डोला।।
- RCM 2.45.4Open verse →
रघुपति पितहि प्रेमबस जानी। पुनि कछु कहिहि मातु अनुमानी।।
अर्थ · Hindi
रघुपति पितहि प्रेमबस जानी। पुनि कछु कहिहि मातु अनुमानी।।
- RCM 2.45.5Open verse →
देस काल अवसर अनुसारी। बोले बचन बिनीत बिचारी।।
अर्थ · Hindi
देस काल अवसर अनुसारी। बोले बचन बिनीत बिचारी।।
- RCM 2.45.6Open verse →
तात कहउँ कछु करउँ ढिठाई। अनुचितु छमब जानि लरिकाई।।
अर्थ · Hindi
तात कहउँ कछु करउँ ढिठाई। अनुचितु छमब जानि लरिकाई।।
- RCM 2.45.7Open verse →
अति लघु बात लागि दुखु पावा। काहुँ न मोहि कहि प्रथम जनावा।।
अर्थ · Hindi
अति लघु बात लागि दुखु पावा। काहुँ न मोहि कहि प्रथम जनावा।।
- RCM 2.45.8Open verse →
देखि गोसाइँहि पूँछिउँ माता। सुनि प्रसंगु भए सीतल गाता।।
अर्थ · Hindi
देखि गोसाइँहि पूँछिउँ माता। सुनि प्रसंगु भए सीतल गाता।।
- RCM 2.45.9Open verse →
मंगल समय सनेह बस सोच परिहरिअ तात।
अर्थ · Hindi
मंगल समय सनेह बस सोच परिहरिअ तात।
- RCM 2.45.10Open verse →
आयसु देइअ हरषि हियँ कहि पुलके प्रभु गात।।45।।
अर्थ · Hindi
आयसु देइअ हरषि हियँ कहि पुलके प्रभु गात।।45।।
- RCM 2.46.1Open verse →
धन्य जनमु जगतीतल तासू। पितहि प्रमोदु चरित सुनि जासू।।
अर्थ · Hindi
धन्य जनमु जगतीतल तासू। पितहि प्रमोदु चरित सुनि जासू।।
- RCM 2.46.2Open verse →
चारि पदारथ करतल ताकें। प्रिय पितु मातु प्रान सम जाकें।।
अर्थ · Hindi
चारि पदारथ करतल ताकें। प्रिय पितु मातु प्रान सम जाकें।।
- RCM 2.46.3Open verse →
आयसु पालि जनम फलु पाई। ऐहउँ बेगिहिं होउ रजाई।।
अर्थ · Hindi
आयसु पालि जनम फलु पाई। ऐहउँ बेगिहिं होउ रजाई।।
- RCM 2.46.4Open verse →
बिदा मातु सन आवउँ मागी। चलिहउँ बनहि बहुरि पग लागी।।
अर्थ · Hindi
बिदा मातु सन आवउँ मागी। चलिहउँ बनहि बहुरि पग लागी।।
- RCM 2.46.5Open verse →
अस कहि राम गवनु तब कीन्हा। भूप सोक बसु उतरु न दीन्हा।।
अर्थ · Hindi
अस कहि राम गवनु तब कीन्हा। भूप सोक बसु उतरु न दीन्हा।।
- RCM 2.46.6Open verse →
नगर ब्यापि गइ बात सुतीछी। छुअत चढ़ी जनु सब तन बीछी।।
अर्थ · Hindi
नगर ब्यापि गइ बात सुतीछी। छुअत चढ़ी जनु सब तन बीछी।।
- RCM 2.46.7Open verse →
सुनि भए बिकल सकल नर नारी। बेलि बिटप जिमि देखि दवारी।।
अर्थ · Hindi
सुनि भए बिकल सकल नर नारी। बेलि बिटप जिमि देखि दवारी।।
- RCM 2.46.8Open verse →
जो जहँ सुनइ धुनइ सिरु सोई। बड़ बिषादु नहिं धीरजु होई।।
अर्थ · Hindi
जो जहँ सुनइ धुनइ सिरु सोई। बड़ बिषादु नहिं धीरजु होई।।
- RCM 2.46.9Open verse →
मुख सुखाहिं लोचन स्त्रवहि सोकु न हृदयँ समाइ।
अर्थ · Hindi
मुख सुखाहिं लोचन स्त्रवहि सोकु न हृदयँ समाइ।
- RCM 2.46.10Open verse →
मनहुँ करुन रस कटकई उतरी अवध बजाइ।।46।।
अर्थ · Hindi
मनहुँ करुन रस कटकई उतरी अवध बजाइ।।46।।
- RCM 2.47.1Open verse →
मिलेहि माझ बिधि बात बेगारी। जहँ तहँ देहिं कैकेइहि गारी।।
अर्थ · Hindi
मिलेहि माझ बिधि बात बेगारी। जहँ तहँ देहिं कैकेइहि गारी।।
- RCM 2.47.2Open verse →
एहि पापिनिहि बूझि का परेऊ। छाइ भवन पर पावकु धरेऊ।।
अर्थ · Hindi
एहि पापिनिहि बूझि का परेऊ। छाइ भवन पर पावकु धरेऊ।।
- RCM 2.47.3Open verse →
निज कर नयन काढ़ि चह दीखा। डारि सुधा बिषु चाहत चीखा।।
अर्थ · Hindi
निज कर नयन काढ़ि चह दीखा। डारि सुधा बिषु चाहत चीखा।।
- RCM 2.47.4Open verse →
कुटिल कठोर कुबुद्धि अभागी। भइ रघुबंस बेनु बन आगी।।
अर्थ · Hindi
कुटिल कठोर कुबुद्धि अभागी। भइ रघुबंस बेनु बन आगी।।
- RCM 2.47.5Open verse →
पालव बैठि पेड़ु एहिं काटा। सुख महुँ सोक ठाटु धरि ठाटा।।
अर्थ · Hindi
पालव बैठि पेड़ु एहिं काटा। सुख महुँ सोक ठाटु धरि ठाटा।।
- RCM 2.47.6Open verse →
सदा रामु एहि प्रान समाना। कारन कवन कुटिलपनु ठाना।।
अर्थ · Hindi
सदा रामु एहि प्रान समाना। कारन कवन कुटिलपनु ठाना।।
- RCM 2.47.7Open verse →
सत्य कहहिं कबि नारि सुभाऊ। सब बिधि अगहु अगाध दुराऊ।।
अर्थ · Hindi
सत्य कहहिं कबि नारि सुभाऊ। सब बिधि अगहु अगाध दुराऊ।।
- RCM 2.47.8Open verse →
निज प्रतिबिंबु बरुकु गहि जाई। जानि न जाइ नारि गति भाई।।
अर्थ · Hindi
निज प्रतिबिंबु बरुकु गहि जाई। जानि न जाइ नारि गति भाई।।
- RCM 2.47.9Open verse →
काह न पावकु जारि सक का न समुद्र समाइ।
अर्थ · Hindi
काह न पावकु जारि सक का न समुद्र समाइ।
- RCM 2.47.10Open verse →
का न करै अबला प्रबल केहि जग कालु न खाइ।।47।।
अर्थ · Hindi
का न करै अबला प्रबल केहि जग कालु न खाइ।।47।।
- RCM 2.48.1Open verse →
का सुनाइ बिधि काह सुनावा। का देखाइ चह काह देखावा।।
अर्थ · Hindi
का सुनाइ बिधि काह सुनावा। का देखाइ चह काह देखावा।।
- RCM 2.48.2Open verse →
एक कहहिं भल भूप न कीन्हा। बरु बिचारि नहिं कुमतिहि दीन्हा।।
अर्थ · Hindi
एक कहहिं भल भूप न कीन्हा। बरु बिचारि नहिं कुमतिहि दीन्हा।।
- RCM 2.48.3Open verse →
जो हठि भयउ सकल दुख भाजनु। अबला बिबस ग्यानु गुनु गा जनु।।
अर्थ · Hindi
जो हठि भयउ सकल दुख भाजनु। अबला बिबस ग्यानु गुनु गा जनु।।
- RCM 2.48.4Open verse →
एक धरम परमिति पहिचाने। नृपहि दोसु नहिं देहिं सयाने।।
अर्थ · Hindi
एक धरम परमिति पहिचाने। नृपहि दोसु नहिं देहिं सयाने।।
- RCM 2.48.5Open verse →
सिबि दधीचि हरिचंद कहानी। एक एक सन कहहिं बखानी।।
अर्थ · Hindi
सिबि दधीचि हरिचंद कहानी। एक एक सन कहहिं बखानी।।
- RCM 2.48.6Open verse →
एक भरत कर संमत कहहीं। एक उदास भायँ सुनि रहहीं।।
अर्थ · Hindi
एक भरत कर संमत कहहीं। एक उदास भायँ सुनि रहहीं।।
- RCM 2.48.7Open verse →
कान मूदि कर रद गहि जीहा। एक कहहिं यह बात अलीहा।।
अर्थ · Hindi
कान मूदि कर रद गहि जीहा। एक कहहिं यह बात अलीहा।।
- RCM 2.48.8Open verse →
सुकृत जाहिं अस कहत तुम्हारे। रामु भरत कहुँ प्रानपिआरे।।
अर्थ · Hindi
सुकृत जाहिं अस कहत तुम्हारे। रामु भरत कहुँ प्रानपिआरे।।
- RCM 2.48.9Open verse →
चंदु चवै बरु अनल कन सुधा होइ बिषतूल।
अर्थ · Hindi
चंदु चवै बरु अनल कन सुधा होइ बिषतूल।
- RCM 2.48.10Open verse →
सपनेहुँ कबहुँ न करहिं किछु भरतु राम प्रतिकूल।।48।।
अर्थ · Hindi
सपनेहुँ कबहुँ न करहिं किछु भरतु राम प्रतिकूल।।48।।
- RCM 2.49.1Open verse →
एक बिधातहिं दूषनु देंहीं। सुधा देखाइ दीन्ह बिषु जेहीं।।
अर्थ · Hindi
एक बिधातहिं दूषनु देंहीं। सुधा देखाइ दीन्ह बिषु जेहीं।।
- RCM 2.49.2Open verse →
खरभरु नगर सोचु सब काहू। दुसह दाहु उर मिटा उछाहू।।
अर्थ · Hindi
खरभरु नगर सोचु सब काहू। दुसह दाहु उर मिटा उछाहू।।
- RCM 2.49.3Open verse →
बिप्रबधू कुलमान्य जठेरी। जे प्रिय परम कैकेई केरी।।
अर्थ · Hindi
बिप्रबधू कुलमान्य जठेरी। जे प्रिय परम कैकेई केरी।।
- RCM 2.49.4Open verse →
लगीं देन सिख सीलु सराही। बचन बानसम लागहिं ताही।।
अर्थ · Hindi
लगीं देन सिख सीलु सराही। बचन बानसम लागहिं ताही।।
- RCM 2.49.5Open verse →
भरतु न मोहि प्रिय राम समाना। सदा कहहु यहु सबु जगु जाना।।
अर्थ · Hindi
भरतु न मोहि प्रिय राम समाना। सदा कहहु यहु सबु जगु जाना।।
- RCM 2.49.6Open verse →
करहु राम पर सहज सनेहू। केहिं अपराध आजु बनु देहू।।
अर्थ · Hindi
करहु राम पर सहज सनेहू। केहिं अपराध आजु बनु देहू।।
- RCM 2.49.7Open verse →
कबहुँ न कियहु सवति आरेसू। प्रीति प्रतीति जान सबु देसू।।
अर्थ · Hindi
कबहुँ न कियहु सवति आरेसू। प्रीति प्रतीति जान सबु देसू।।
- RCM 2.49.8Open verse →
कौसल्याँ अब काह बिगारा। तुम्ह जेहि लागि बज्र पुर पारा।।
अर्थ · Hindi
कौसल्याँ अब काह बिगारा। तुम्ह जेहि लागि बज्र पुर पारा।।
- RCM 2.49.9Open verse →
सीय कि पिय सँगु परिहरिहि लखनु कि रहिहहिं धाम।
अर्थ · Hindi
सीय कि पिय सँगु परिहरिहि लखनु कि रहिहहिं धाम।
- RCM 2.49.10Open verse →
राजु कि भूँजब भरत पुर नृपु कि जिइहि बिनु राम।।49।।
अर्थ · Hindi
राजु कि भूँजब भरत पुर नृपु कि जिइहि बिनु राम।।49।।
- RCM 2.50.1Open verse →
अस बिचारि उर छाड़हु कोहू। सोक कलंक कोठि जनि होहू।।
अर्थ · Hindi
अस बिचारि उर छाड़हु कोहू। सोक कलंक कोठि जनि होहू।।
- RCM 2.50.2Open verse →
भरतहि अवसि देहु जुबराजू। कानन काह राम कर काजू।।
अर्थ · Hindi
भरतहि अवसि देहु जुबराजू। कानन काह राम कर काजू।।
- RCM 2.50.3Open verse →
नाहिन रामु राज के भूखे। धरम धुरीन बिषय रस रूखे।।
अर्थ · Hindi
नाहिन रामु राज के भूखे। धरम धुरीन बिषय रस रूखे।।
- RCM 2.50.4Open verse →
गुर गृह बसहुँ रामु तजि गेहू। नृप सन अस बरु दूसर लेहू।।
अर्थ · Hindi
गुर गृह बसहुँ रामु तजि गेहू। नृप सन अस बरु दूसर लेहू।।
- RCM 2.50.5Open verse →
जौं नहिं लगिहहु कहें हमारे। नहिं लागिहि कछु हाथ तुम्हारे।।
अर्थ · Hindi
जौं नहिं लगिहहु कहें हमारे। नहिं लागिहि कछु हाथ तुम्हारे।।
- RCM 2.50.6Open verse →
जौं परिहास कीन्हि कछु होई। तौ कहि प्रगट जनावहु सोई।।
अर्थ · Hindi
जौं परिहास कीन्हि कछु होई। तौ कहि प्रगट जनावहु सोई।।
- RCM 2.50.7Open verse →
राम सरिस सुत कानन जोगू। काह कहिहि सुनि तुम्ह कहुँ लोगू।।
अर्थ · Hindi
राम सरिस सुत कानन जोगू। काह कहिहि सुनि तुम्ह कहुँ लोगू।।
- RCM 2.50.8Open verse →
उठहु बेगि सोइ करहु उपाई। जेहि बिधि सोकु कलंकु नसाई।।
अर्थ · Hindi
उठहु बेगि सोइ करहु उपाई। जेहि बिधि सोकु कलंकु नसाई।।
- RCM 2.51.1Open verse →
उतरु न देइ दुसह रिस रूखी। मृगिन्ह चितव जनु बाघिनि भूखी।।
अर्थ · Hindi
उतरु न देइ दुसह रिस रूखी। मृगिन्ह चितव जनु बाघिनि भूखी।।
- RCM 2.51.2Open verse →
ब्याधि असाधि जानि तिन्ह त्यागी। चलीं कहत मतिमंद अभागी।।
अर्थ · Hindi
ब्याधि असाधि जानि तिन्ह त्यागी। चलीं कहत मतिमंद अभागी।।
- RCM 2.51.3Open verse →
राजु करत यह दैअँ बिगोई। कीन्हेसि अस जस करइ न कोई।।
अर्थ · Hindi
राजु करत यह दैअँ बिगोई। कीन्हेसि अस जस करइ न कोई।।
- RCM 2.51.4Open verse →
एहि बिधि बिलपहिं पुर नर नारीं। देहिं कुचालिहि कोटिक गारीं।।
अर्थ · Hindi
एहि बिधि बिलपहिं पुर नर नारीं। देहिं कुचालिहि कोटिक गारीं।।
- RCM 2.51.5Open verse →
जरहिं बिषम जर लेहिं उसासा। कवनि राम बिनु जीवन आसा।।
अर्थ · Hindi
जरहिं बिषम जर लेहिं उसासा। कवनि राम बिनु जीवन आसा।।
- RCM 2.51.6Open verse →
बिपुल बियोग प्रजा अकुलानी। जनु जलचर गन सूखत पानी।।
अर्थ · Hindi
बिपुल बियोग प्रजा अकुलानी। जनु जलचर गन सूखत पानी।।
- RCM 2.51.7Open verse →
अति बिषाद बस लोग लोगाई। गए मातु पहिं रामु गोसाई।।
अर्थ · Hindi
अति बिषाद बस लोग लोगाई। गए मातु पहिं रामु गोसाई।।
- RCM 2.51.8Open verse →
मुख प्रसन्न चित चौगुन चाऊ। मिटा सोचु जनि राखै राऊ।।
अर्थ · Hindi
मुख प्रसन्न चित चौगुन चाऊ। मिटा सोचु जनि राखै राऊ।।
- RCM 2.51.9Open verse →
नव गयंदु रघुबीर मनु राजु अलान समान।
अर्थ · Hindi
नव गयंदु रघुबीर मनु राजु अलान समान।
- RCM 2.51.10Open verse →
छूट जानि बन गवनु सुनि उर अनंदु अधिकान।।51।।
अर्थ · Hindi
छूट जानि बन गवनु सुनि उर अनंदु अधिकान।।51।।
- RCM 2.52.1Open verse →
रघुकुलतिलक जोरि दोउ हाथा। मुदित मातु पद नायउ माथा।।
अर्थ · Hindi
रघुकुलतिलक जोरि दोउ हाथा। मुदित मातु पद नायउ माथा।।
- RCM 2.52.2Open verse →
दीन्हि असीस लाइ उर लीन्हे। भूषन बसन निछावरि कीन्हे।।
अर्थ · Hindi
दीन्हि असीस लाइ उर लीन्हे। भूषन बसन निछावरि कीन्हे।।
- RCM 2.52.3Open verse →
बार बार मुख चुंबति माता। नयन नेह जलु पुलकित गाता।।
अर्थ · Hindi
बार बार मुख चुंबति माता। नयन नेह जलु पुलकित गाता।।
- RCM 2.52.4Open verse →
गोद राखि पुनि हृदयँ लगाए। स्त्रवत प्रेनरस पयद सुहाए।।
अर्थ · Hindi
गोद राखि पुनि हृदयँ लगाए। स्त्रवत प्रेनरस पयद सुहाए।।
- RCM 2.52.5Open verse →
प्रेमु प्रमोदु न कछु कहि जाई। रंक धनद पदबी जनु पाई।।
अर्थ · Hindi
प्रेमु प्रमोदु न कछु कहि जाई। रंक धनद पदबी जनु पाई।।
- RCM 2.52.6Open verse →
सादर सुंदर बदनु निहारी। बोली मधुर बचन महतारी।।
अर्थ · Hindi
सादर सुंदर बदनु निहारी। बोली मधुर बचन महतारी।।
- RCM 2.52.7Open verse →
कहहु तात जननी बलिहारी। कबहिं लगन मुद मंगलकारी।।
अर्थ · Hindi
कहहु तात जननी बलिहारी। कबहिं लगन मुद मंगलकारी।।
- RCM 2.52.8Open verse →
सुकृत सील सुख सीवँ सुहाई। जनम लाभ कइ अवधि अघाई।।
अर्थ · Hindi
सुकृत सील सुख सीवँ सुहाई। जनम लाभ कइ अवधि अघाई।।
- RCM 2.52.9Open verse →
जेहि चाहत नर नारि सब अति आरत एहि भाँति।
अर्थ · Hindi
जेहि चाहत नर नारि सब अति आरत एहि भाँति।
- RCM 2.52.10Open verse →
जिमि चातक चातकि तृषित बृष्टि सरद रितु स्वाति।।52।।
अर्थ · Hindi
जिमि चातक चातकि तृषित बृष्टि सरद रितु स्वाति।।52।।
- RCM 2.53.1Open verse →
तात जाउँ बलि बेगि नहाहू। जो मन भाव मधुर कछु खाहू।।
अर्थ · Hindi
तात जाउँ बलि बेगि नहाहू। जो मन भाव मधुर कछु खाहू।।
- RCM 2.53.2Open verse →
पितु समीप तब जाएहु भैआ। भइ बड़ि बार जाइ बलि मैआ।।
अर्थ · Hindi
पितु समीप तब जाएहु भैआ। भइ बड़ि बार जाइ बलि मैआ।।
- RCM 2.53.3Open verse →
मातु बचन सुनि अति अनुकूला। जनु सनेह सुरतरु के फूला।।
अर्थ · Hindi
मातु बचन सुनि अति अनुकूला। जनु सनेह सुरतरु के फूला।।
- RCM 2.53.4Open verse →
सुख मकरंद भरे श्रियमूला। निरखि राम मनु भवरुँ न भूला।।
अर्थ · Hindi
सुख मकरंद भरे श्रियमूला। निरखि राम मनु भवरुँ न भूला।।
- RCM 2.53.5Open verse →
धरम धुरीन धरम गति जानी। कहेउ मातु सन अति मृदु बानी।।
अर्थ · Hindi
धरम धुरीन धरम गति जानी। कहेउ मातु सन अति मृदु बानी।।
- RCM 2.53.6Open verse →
पिताँ दीन्ह मोहि कानन राजू। जहँ सब भाँति मोर बड़ काजू।।
अर्थ · Hindi
पिताँ दीन्ह मोहि कानन राजू। जहँ सब भाँति मोर बड़ काजू।।
- RCM 2.53.7Open verse →
आयसु देहि मुदित मन माता। जेहिं मुद मंगल कानन जाता।।
अर्थ · Hindi
आयसु देहि मुदित मन माता। जेहिं मुद मंगल कानन जाता।।
- RCM 2.53.8Open verse →
जनि सनेह बस डरपसि भोरें। आनँदु अंब अनुग्रह तोरें।।
अर्थ · Hindi
जनि सनेह बस डरपसि भोरें। आनँदु अंब अनुग्रह तोरें।।
- RCM 2.53.9Open verse →
बरष चारिदस बिपिन बसि करि पितु बचन प्रमान।
अर्थ · Hindi
बरष चारिदस बिपिन बसि करि पितु बचन प्रमान।
- RCM 2.53.10Open verse →
आइ पाय पुनि देखिहउँ मनु जनि करसि मलान।।53।।
अर्थ · Hindi
आइ पाय पुनि देखिहउँ मनु जनि करसि मलान।।53।।
- RCM 2.54.1Open verse →
बचन बिनीत मधुर रघुबर के। सर सम लगे मातु उर करके।।
अर्थ · Hindi
बचन बिनीत मधुर रघुबर के। सर सम लगे मातु उर करके।।
- RCM 2.54.2Open verse →
सहमि सूखि सुनि सीतलि बानी। जिमि जवास परें पावस पानी।।
अर्थ · Hindi
सहमि सूखि सुनि सीतलि बानी। जिमि जवास परें पावस पानी।।
- RCM 2.54.3Open verse →
कहि न जाइ कछु हृदय बिषादू। मनहुँ मृगी सुनि केहरि नादू।।
अर्थ · Hindi
कहि न जाइ कछु हृदय बिषादू। मनहुँ मृगी सुनि केहरि नादू।।
- RCM 2.54.4Open verse →
नयन सजल तन थर थर काँपी। माजहि खाइ मीन जनु मापी।।
अर्थ · Hindi
नयन सजल तन थर थर काँपी। माजहि खाइ मीन जनु मापी।।
- RCM 2.54.5Open verse →
धरि धीरजु सुत बदनु निहारी। गदगद बचन कहति महतारी।।
अर्थ · Hindi
धरि धीरजु सुत बदनु निहारी। गदगद बचन कहति महतारी।।
- RCM 2.54.6Open verse →
तात पितहि तुम्ह प्रानपिआरे। देखि मुदित नित चरित तुम्हारे।।
अर्थ · Hindi
तात पितहि तुम्ह प्रानपिआरे। देखि मुदित नित चरित तुम्हारे।।
- RCM 2.54.7Open verse →
राजु देन कहुँ सुभ दिन साधा। कहेउ जान बन केहिं अपराधा।।
अर्थ · Hindi
राजु देन कहुँ सुभ दिन साधा। कहेउ जान बन केहिं अपराधा।।
- RCM 2.54.8Open verse →
तात सुनावहु मोहि निदानू। को दिनकर कुल भयउ कृसानू।।
अर्थ · Hindi
तात सुनावहु मोहि निदानू। को दिनकर कुल भयउ कृसानू।।
- RCM 2.54.9Open verse →
निरखि राम रुख सचिवसुत कारनु कहेउ बुझाइ।
अर्थ · Hindi
निरखि राम रुख सचिवसुत कारनु कहेउ बुझाइ।
- RCM 2.54.10Open verse →
सुनि प्रसंगु रहि मूक जिमि दसा बरनि नहिं जाइ।।54।।
अर्थ · Hindi
सुनि प्रसंगु रहि मूक जिमि दसा बरनि नहिं जाइ।।54।।
- RCM 2.55.1Open verse →
राखि न सकइ न कहि सक जाहू। दुहूँ भाँति उर दारुन दाहू।।
अर्थ · Hindi
राखि न सकइ न कहि सक जाहू। दुहूँ भाँति उर दारुन दाहू।।
- RCM 2.55.2Open verse →
लिखत सुधाकर गा लिखि राहू। बिधि गति बाम सदा सब काहू।।
अर्थ · Hindi
लिखत सुधाकर गा लिखि राहू। बिधि गति बाम सदा सब काहू।।
- RCM 2.55.3Open verse →
धरम सनेह उभयँ मति घेरी। भइ गति साँप छुछुंदरि केरी।।
अर्थ · Hindi
धरम सनेह उभयँ मति घेरी। भइ गति साँप छुछुंदरि केरी।।
- RCM 2.55.4Open verse →
राखउँ सुतहि करउँ अनुरोधू। धरमु जाइ अरु बंधु बिरोधू।।
अर्थ · Hindi
राखउँ सुतहि करउँ अनुरोधू। धरमु जाइ अरु बंधु बिरोधू।।
- RCM 2.55.5Open verse →
कहउँ जान बन तौ बड़ि हानी। संकट सोच बिबस भइ रानी।।
अर्थ · Hindi
कहउँ जान बन तौ बड़ि हानी। संकट सोच बिबस भइ रानी।।
- RCM 2.55.6Open verse →
बहुरि समुझि तिय धरमु सयानी। रामु भरतु दोउ सुत सम जानी।।
अर्थ · Hindi
बहुरि समुझि तिय धरमु सयानी। रामु भरतु दोउ सुत सम जानी।।
- RCM 2.55.7Open verse →
सरल सुभाउ राम महतारी। बोली बचन धीर धरि भारी।।
अर्थ · Hindi
सरल सुभाउ राम महतारी। बोली बचन धीर धरि भारी।।
- RCM 2.55.8Open verse →
तात जाउँ बलि कीन्हेहु नीका। पितु आयसु सब धरमक टीका।।
अर्थ · Hindi
तात जाउँ बलि कीन्हेहु नीका। पितु आयसु सब धरमक टीका।।
- RCM 2.55.9Open verse →
राजु देन कहि दीन्ह बनु मोहि न सो दुख लेसु।
अर्थ · Hindi
राजु देन कहि दीन्ह बनु मोहि न सो दुख लेसु।
- RCM 2.55.10Open verse →
तुम्ह बिनु भरतहि भूपतिहि प्रजहि प्रचंड कलेसु।।55।।
अर्थ · Hindi
तुम्ह बिनु भरतहि भूपतिहि प्रजहि प्रचंड कलेसु।।55।।
- RCM 2.56.1Open verse →
जौं केवल पितु आयसु ताता। तौ जनि जाहु जानि बड़ि माता।।
अर्थ · Hindi
जौं केवल पितु आयसु ताता। तौ जनि जाहु जानि बड़ि माता।।
- RCM 2.56.2Open verse →
जौं पितु मातु कहेउ बन जाना। तौं कानन सत अवध समाना।।
अर्थ · Hindi
जौं पितु मातु कहेउ बन जाना। तौं कानन सत अवध समाना।।
- RCM 2.56.3Open verse →
पितु बनदेव मातु बनदेवी। खग मृग चरन सरोरुह सेवी।।
अर्थ · Hindi
पितु बनदेव मातु बनदेवी। खग मृग चरन सरोरुह सेवी।।
- RCM 2.56.4Open verse →
अंतहुँ उचित नृपहि बनबासू। बय बिलोकि हियँ होइ हराँसू।।
अर्थ · Hindi
अंतहुँ उचित नृपहि बनबासू। बय बिलोकि हियँ होइ हराँसू।।
- RCM 2.56.5Open verse →
बड़भागी बनु अवध अभागी। जो रघुबंसतिलक तुम्ह त्यागी।।
अर्थ · Hindi
बड़भागी बनु अवध अभागी। जो रघुबंसतिलक तुम्ह त्यागी।।
- RCM 2.56.6Open verse →
जौं सुत कहौ संग मोहि लेहू। तुम्हरे हृदयँ होइ संदेहू।।
अर्थ · Hindi
जौं सुत कहौ संग मोहि लेहू। तुम्हरे हृदयँ होइ संदेहू।।
- RCM 2.56.7Open verse →
पूत परम प्रिय तुम्ह सबही के। प्रान प्रान के जीवन जी के।।
अर्थ · Hindi
पूत परम प्रिय तुम्ह सबही के। प्रान प्रान के जीवन जी के।।
- RCM 2.56.8Open verse →
ते तुम्ह कहहु मातु बन जाऊँ। मैं सुनि बचन बैठि पछिताऊँ।।
अर्थ · Hindi
ते तुम्ह कहहु मातु बन जाऊँ। मैं सुनि बचन बैठि पछिताऊँ।।
- RCM 2.56.9Open verse →
यह बिचारि नहिं करउँ हठ झूठ सनेहु बढ़ाइ।
अर्थ · Hindi
यह बिचारि नहिं करउँ हठ झूठ सनेहु बढ़ाइ।
- RCM 2.56.10Open verse →
मानि मातु कर नात बलि सुरति बिसरि जनि जाइ।।56।।
अर्थ · Hindi
मानि मातु कर नात बलि सुरति बिसरि जनि जाइ।।56।।
- RCM 2.57.1Open verse →
देव पितर सब तुन्हहि गोसाई। राखहुँ पलक नयन की नाई।।
अर्थ · Hindi
देव पितर सब तुन्हहि गोसाई। राखहुँ पलक नयन की नाई।।
- RCM 2.57.2Open verse →
अवधि अंबु प्रिय परिजन मीना। तुम्ह करुनाकर धरम धुरीना।।
अर्थ · Hindi
अवधि अंबु प्रिय परिजन मीना। तुम्ह करुनाकर धरम धुरीना।।
- RCM 2.57.3Open verse →
अस बिचारि सोइ करहु उपाई। सबहि जिअत जेहिं भेंटेहु आई।।
अर्थ · Hindi
अस बिचारि सोइ करहु उपाई। सबहि जिअत जेहिं भेंटेहु आई।।
- RCM 2.57.4Open verse →
जाहु सुखेन बनहि बलि जाऊँ। करि अनाथ जन परिजन गाऊँ।।
अर्थ · Hindi
जाहु सुखेन बनहि बलि जाऊँ। करि अनाथ जन परिजन गाऊँ।।
- RCM 2.57.5Open verse →
सब कर आजु सुकृत फल बीता। भयउ कराल कालु बिपरीता।।
अर्थ · Hindi
सब कर आजु सुकृत फल बीता। भयउ कराल कालु बिपरीता।।
- RCM 2.57.6Open verse →
बहुबिधि बिलपि चरन लपटानी। परम अभागिनि आपुहि जानी।।
अर्थ · Hindi
बहुबिधि बिलपि चरन लपटानी। परम अभागिनि आपुहि जानी।।
- RCM 2.57.7Open verse →
दारुन दुसह दाहु उर ब्यापा। बरनि न जाहिं बिलाप कलापा।।
अर्थ · Hindi
दारुन दुसह दाहु उर ब्यापा। बरनि न जाहिं बिलाप कलापा।।
- RCM 2.57.8Open verse →
राम उठाइ मातु उर लाई। कहि मृदु बचन बहुरि समुझाई।।
अर्थ · Hindi
राम उठाइ मातु उर लाई। कहि मृदु बचन बहुरि समुझाई।।
- RCM 2.57.9Open verse →
समाचार तेहि समय सुनि सीय उठी अकुलाइ।
अर्थ · Hindi
समाचार तेहि समय सुनि सीय उठी अकुलाइ।
- RCM 2.57.10Open verse →
जाइ सासु पद कमल जुग बंदि बैठि सिरु नाइ।।57।।
अर्थ · Hindi
जाइ सासु पद कमल जुग बंदि बैठि सिरु नाइ।।57।।
- RCM 2.58.1Open verse →
दीन्हि असीस सासु मृदु बानी। अति सुकुमारि देखि अकुलानी।।
अर्थ · Hindi
दीन्हि असीस सासु मृदु बानी। अति सुकुमारि देखि अकुलानी।।
- RCM 2.58.2Open verse →
बैठि नमितमुख सोचति सीता। रूप रासि पति प्रेम पुनीता।।
अर्थ · Hindi
बैठि नमितमुख सोचति सीता। रूप रासि पति प्रेम पुनीता।।
- RCM 2.58.3Open verse →
चलन चहत बन जीवननाथू। केहि सुकृती सन होइहि साथू।।
अर्थ · Hindi
चलन चहत बन जीवननाथू। केहि सुकृती सन होइहि साथू।।
- RCM 2.58.4Open verse →
की तनु प्रान कि केवल प्राना। बिधि करतबु कछु जाइ न जाना।।
अर्थ · Hindi
की तनु प्रान कि केवल प्राना। बिधि करतबु कछु जाइ न जाना।।
- RCM 2.58.5Open verse →
चारु चरन नख लेखति धरनी। नूपुर मुखर मधुर कबि बरनी।।
अर्थ · Hindi
चारु चरन नख लेखति धरनी। नूपुर मुखर मधुर कबि बरनी।।
- RCM 2.58.6Open verse →
मनहुँ प्रेम बस बिनती करहीं। हमहि सीय पद जनि परिहरहीं।।
अर्थ · Hindi
मनहुँ प्रेम बस बिनती करहीं। हमहि सीय पद जनि परिहरहीं।।
- RCM 2.58.7Open verse →
मंजु बिलोचन मोचति बारी। बोली देखि राम महतारी।।
अर्थ · Hindi
मंजु बिलोचन मोचति बारी। बोली देखि राम महतारी।।
- RCM 2.58.8Open verse →
तात सुनहु सिय अति सुकुमारी। सासु ससुर परिजनहि पिआरी।।
अर्थ · Hindi
तात सुनहु सिय अति सुकुमारी। सासु ससुर परिजनहि पिआरी।।
- RCM 2.58.9Open verse →
पिता जनक भूपाल मनि ससुर भानुकुल भानु।
अर्थ · Hindi
पिता जनक भूपाल मनि ससुर भानुकुल भानु।
- RCM 2.58.10Open verse →
पति रबिकुल कैरव बिपिन बिधु गुन रूप निधानु।।58।।
अर्थ · Hindi
पति रबिकुल कैरव बिपिन बिधु गुन रूप निधानु।।58।।
- RCM 2.59.1Open verse →
मैं पुनि पुत्रबधू प्रिय पाई। रूप रासि गुन सील सुहाई।।
अर्थ · Hindi
मैं पुनि पुत्रबधू प्रिय पाई। रूप रासि गुन सील सुहाई।।
- RCM 2.59.2Open verse →
नयन पुतरि करि प्रीति बढ़ाई। राखेउँ प्रान जानिकिहिं लाई।।
अर्थ · Hindi
नयन पुतरि करि प्रीति बढ़ाई। राखेउँ प्रान जानिकिहिं लाई।।
- RCM 2.59.3Open verse →
कलपबेलि जिमि बहुबिधि लाली। सींचि सनेह सलिल प्रतिपाली।।
अर्थ · Hindi
कलपबेलि जिमि बहुबिधि लाली। सींचि सनेह सलिल प्रतिपाली।।
- RCM 2.59.4Open verse →
फूलत फलत भयउ बिधि बामा। जानि न जाइ काह परिनामा।।
अर्थ · Hindi
फूलत फलत भयउ बिधि बामा। जानि न जाइ काह परिनामा।।
- RCM 2.59.5Open verse →
पलँग पीठ तजि गोद हिंड़ोरा। सियँ न दीन्ह पगु अवनि कठोरा।।
अर्थ · Hindi
पलँग पीठ तजि गोद हिंड़ोरा। सियँ न दीन्ह पगु अवनि कठोरा।।
- RCM 2.59.6Open verse →
जिअनमूरि जिमि जोगवत रहऊँ। दीप बाति नहिं टारन कहऊँ।।
अर्थ · Hindi
जिअनमूरि जिमि जोगवत रहऊँ। दीप बाति नहिं टारन कहऊँ।।
- RCM 2.59.7Open verse →
सोइ सिय चलन चहति बन साथा। आयसु काह होइ रघुनाथा।
अर्थ · Hindi
सोइ सिय चलन चहति बन साथा। आयसु काह होइ रघुनाथा।
- RCM 2.59.8Open verse →
चंद किरन रस रसिक चकोरी। रबि रुख नयन सकइ किमि जोरी।।
अर्थ · Hindi
चंद किरन रस रसिक चकोरी। रबि रुख नयन सकइ किमि जोरी।।
- RCM 2.59.9Open verse →
करि केहरि निसिचर चरहिं दुष्ट जंतु बन भूरि।
अर्थ · Hindi
करि केहरि निसिचर चरहिं दुष्ट जंतु बन भूरि।
- RCM 2.59.10Open verse →
बिष बाटिकाँ कि सोह सुत सुभग सजीवनि मूरि।।59।।
अर्थ · Hindi
बिष बाटिकाँ कि सोह सुत सुभग सजीवनि मूरि।।59।।
- RCM 2.60.1Open verse →
बन हित कोल किरात किसोरी। रचीं बिरंचि बिषय सुख भोरी।।
अर्थ · Hindi
बन हित कोल किरात किसोरी। रचीं बिरंचि बिषय सुख भोरी।।
- RCM 2.60.2Open verse →
पाइन कृमि जिमि कठिन सुभाऊ। तिन्हहि कलेसु न कानन काऊ।।
अर्थ · Hindi
पाइन कृमि जिमि कठिन सुभाऊ। तिन्हहि कलेसु न कानन काऊ।।
- RCM 2.60.3Open verse →
कै तापस तिय कानन जोगू। जिन्ह तप हेतु तजा सब भोगू।।
अर्थ · Hindi
कै तापस तिय कानन जोगू। जिन्ह तप हेतु तजा सब भोगू।।
- RCM 2.60.4Open verse →
सिय बन बसिहि तात केहि भाँती। चित्रलिखित कपि देखि डेराती।।
अर्थ · Hindi
सिय बन बसिहि तात केहि भाँती। चित्रलिखित कपि देखि डेराती।।
- RCM 2.60.5Open verse →
सुरसर सुभग बनज बन चारी। डाबर जोगु कि हंसकुमारी।।
अर्थ · Hindi
सुरसर सुभग बनज बन चारी। डाबर जोगु कि हंसकुमारी।।
- RCM 2.60.6Open verse →
अस बिचारि जस आयसु होई। मैं सिख देउँ जानकिहि सोई।।
अर्थ · Hindi
अस बिचारि जस आयसु होई। मैं सिख देउँ जानकिहि सोई।।
- RCM 2.60.7Open verse →
जौं सिय भवन रहै कह अंबा। मोहि कहँ होइ बहुत अवलंबा।।
अर्थ · Hindi
जौं सिय भवन रहै कह अंबा। मोहि कहँ होइ बहुत अवलंबा।।
- RCM 2.60.8Open verse →
सुनि रघुबीर मातु प्रिय बानी। सील सनेह सुधाँ जनु सानी।।
अर्थ · Hindi
सुनि रघुबीर मातु प्रिय बानी। सील सनेह सुधाँ जनु सानी।।
- RCM 2.60.9Open verse →
कहि प्रिय बचन बिबेकमय कीन्हि मातु परितोष।
अर्थ · Hindi
कहि प्रिय बचन बिबेकमय कीन्हि मातु परितोष।
- RCM 2.60.10Open verse →
लगे प्रबोधन जानकिहि प्रगटि बिपिन गुन दोष।।60।।
अर्थ · Hindi
लगे प्रबोधन जानकिहि प्रगटि बिपिन गुन दोष।।60।।
- RCM 2.61.1Open verse →
मातु समीप कहत सकुचाहीं। बोले समउ समुझि मन माहीं।।
अर्थ · Hindi
मातु समीप कहत सकुचाहीं। बोले समउ समुझि मन माहीं।।
- RCM 2.61.2Open verse →
राजकुमारि सिखावन सुनहू। आन भाँति जियँ जनि कछु गुनहू।।
अर्थ · Hindi
राजकुमारि सिखावन सुनहू। आन भाँति जियँ जनि कछु गुनहू।।
- RCM 2.61.3Open verse →
आपन मोर नीक जौं चहहू। बचनु हमार मानि गृह रहहू।।
अर्थ · Hindi
आपन मोर नीक जौं चहहू। बचनु हमार मानि गृह रहहू।।
- RCM 2.61.4Open verse →
आयसु मोर सासु सेवकाई। सब बिधि भामिनि भवन भलाई।।
अर्थ · Hindi
आयसु मोर सासु सेवकाई। सब बिधि भामिनि भवन भलाई।।
- RCM 2.61.5Open verse →
एहि ते अधिक धरमु नहिं दूजा। सादर सासु ससुर पद पूजा।।
अर्थ · Hindi
एहि ते अधिक धरमु नहिं दूजा। सादर सासु ससुर पद पूजा।।
- RCM 2.61.6Open verse →
जब जब मातु करिहि सुधि मोरी। होइहि प्रेम बिकल मति भोरी।।
अर्थ · Hindi
जब जब मातु करिहि सुधि मोरी। होइहि प्रेम बिकल मति भोरी।।
- RCM 2.61.7Open verse →
तब तब तुम्ह कहि कथा पुरानी। सुंदरि समुझाएहु मृदु बानी।।
अर्थ · Hindi
तब तब तुम्ह कहि कथा पुरानी। सुंदरि समुझाएहु मृदु बानी।।
- RCM 2.61.8Open verse →
कहउँ सुभायँ सपथ सत मोही। सुमुखि मातु हित राखउँ तोही।।
अर्थ · Hindi
कहउँ सुभायँ सपथ सत मोही। सुमुखि मातु हित राखउँ तोही।।
- RCM 2.61.9Open verse →
गुर श्रुति संमत धरम फलु पाइअ बिनहिं कलेस।
अर्थ · Hindi
गुर श्रुति संमत धरम फलु पाइअ बिनहिं कलेस।
- RCM 2.61.10Open verse →
हठ बस सब संकट सहे गालव नहुष नरेस।।61।।
अर्थ · Hindi
हठ बस सब संकट सहे गालव नहुष नरेस।।61।।
- RCM 2.62.1Open verse →
मैं पुनि करि प्रवान पितु बानी। बेगि फिरब सुनु सुमुखि सयानी।।
अर्थ · Hindi
मैं पुनि करि प्रवान पितु बानी। बेगि फिरब सुनु सुमुखि सयानी।।
- RCM 2.62.2Open verse →
दिवस जात नहिं लागिहि बारा। सुंदरि सिखवनु सुनहु हमारा।।
अर्थ · Hindi
दिवस जात नहिं लागिहि बारा। सुंदरि सिखवनु सुनहु हमारा।।
- RCM 2.62.3Open verse →
जौ हठ करहु प्रेम बस बामा। तौ तुम्ह दुखु पाउब परिनामा।।
अर्थ · Hindi
जौ हठ करहु प्रेम बस बामा। तौ तुम्ह दुखु पाउब परिनामा।।
- RCM 2.62.4Open verse →
काननु कठिन भयंकरु भारी। घोर घामु हिम बारि बयारी।।
अर्थ · Hindi
काननु कठिन भयंकरु भारी। घोर घामु हिम बारि बयारी।।
- RCM 2.62.5Open verse →
कुस कंटक मग काँकर नाना। चलब पयादेहिं बिनु पदत्राना।।
अर्थ · Hindi
कुस कंटक मग काँकर नाना। चलब पयादेहिं बिनु पदत्राना।।
- RCM 2.62.6Open verse →
चरन कमल मुदु मंजु तुम्हारे। मारग अगम भूमिधर भारे।।
अर्थ · Hindi
चरन कमल मुदु मंजु तुम्हारे। मारग अगम भूमिधर भारे।।
- RCM 2.62.7Open verse →
कंदर खोह नदीं नद नारे। अगम अगाध न जाहिं निहारे।।
अर्थ · Hindi
कंदर खोह नदीं नद नारे। अगम अगाध न जाहिं निहारे।।
- RCM 2.62.8Open verse →
भालु बाघ बृक केहरि नागा। करहिं नाद सुनि धीरजु भागा।।
अर्थ · Hindi
भालु बाघ बृक केहरि नागा। करहिं नाद सुनि धीरजु भागा।।
- RCM 2.62.9Open verse →
भूमि सयन बलकल बसन असनु कंद फल मूल।
अर्थ · Hindi
भूमि सयन बलकल बसन असनु कंद फल मूल।
- RCM 2.62.10Open verse →
ते कि सदा सब दिन मिलिहिं सबुइ समय अनुकूल।।62।।
अर्थ · Hindi
ते कि सदा सब दिन मिलिहिं सबुइ समय अनुकूल।।62।।
- RCM 2.63.1Open verse →
नर अहार रजनीचर चरहीं। कपट बेष बिधि कोटिक करहीं।।
अर्थ · Hindi
नर अहार रजनीचर चरहीं। कपट बेष बिधि कोटिक करहीं।।
- RCM 2.63.2Open verse →
लागइ अति पहार कर पानी। बिपिन बिपति नहिं जाइ बखानी।।
अर्थ · Hindi
लागइ अति पहार कर पानी। बिपिन बिपति नहिं जाइ बखानी।।
- RCM 2.63.3Open verse →
ब्याल कराल बिहग बन घोरा। निसिचर निकर नारि नर चोरा।।
अर्थ · Hindi
ब्याल कराल बिहग बन घोरा। निसिचर निकर नारि नर चोरा।।
- RCM 2.63.4Open verse →
डरपहिं धीर गहन सुधि आएँ। मृगलोचनि तुम्ह भीरु सुभाएँ।।
अर्थ · Hindi
डरपहिं धीर गहन सुधि आएँ। मृगलोचनि तुम्ह भीरु सुभाएँ।।
- RCM 2.63.5Open verse →
हंसगवनि तुम्ह नहिं बन जोगू। सुनि अपजसु मोहि देइहि लोगू।।
अर्थ · Hindi
हंसगवनि तुम्ह नहिं बन जोगू। सुनि अपजसु मोहि देइहि लोगू।।
- RCM 2.63.6Open verse →
मानस सलिल सुधाँ प्रतिपाली। जिअइ कि लवन पयोधि मराली।।
अर्थ · Hindi
मानस सलिल सुधाँ प्रतिपाली। जिअइ कि लवन पयोधि मराली।।
- RCM 2.63.7Open verse →
नव रसाल बन बिहरनसीला। सोह कि कोकिल बिपिन करीला।।
अर्थ · Hindi
नव रसाल बन बिहरनसीला। सोह कि कोकिल बिपिन करीला।।
- RCM 2.63.8Open verse →
रहहु भवन अस हृदयँ बिचारी। चंदबदनि दुखु कानन भारी।।
अर्थ · Hindi
रहहु भवन अस हृदयँ बिचारी। चंदबदनि दुखु कानन भारी।।
- RCM 2.63.9Open verse →
सहज सुह्द गुर स्वामि सिख जो न करइ सिर मानि।।
अर्थ · Hindi
सहज सुह्द गुर स्वामि सिख जो न करइ सिर मानि।।
- RCM 2.63.10Open verse →
सो पछिताइ अघाइ उर अवसि होइ हित हानि।।63।।
अर्थ · Hindi
सो पछिताइ अघाइ उर अवसि होइ हित हानि।।63।।
- RCM 2.64.1Open verse →
सुनि मृदु बचन मनोहर पिय के। लोचन ललित भरे जल सिय के।।
अर्थ · Hindi
सुनि मृदु बचन मनोहर पिय के। लोचन ललित भरे जल सिय के।।
- RCM 2.64.2Open verse →
सीतल सिख दाहक भइ कैंसें। चकइहि सरद चंद निसि जैंसें।।
अर्थ · Hindi
सीतल सिख दाहक भइ कैंसें। चकइहि सरद चंद निसि जैंसें।।
- RCM 2.64.3Open verse →
उतरु न आव बिकल बैदेही। तजन चहत सुचि स्वामि सनेही।।
अर्थ · Hindi
उतरु न आव बिकल बैदेही। तजन चहत सुचि स्वामि सनेही।।
- RCM 2.64.4Open verse →
बरबस रोकि बिलोचन बारी। धरि धीरजु उर अवनिकुमारी।।
अर्थ · Hindi
बरबस रोकि बिलोचन बारी। धरि धीरजु उर अवनिकुमारी।।
- RCM 2.64.5Open verse →
लागि सासु पग कह कर जोरी। छमबि देबि बड़ि अबिनय मोरी।।
अर्थ · Hindi
लागि सासु पग कह कर जोरी। छमबि देबि बड़ि अबिनय मोरी।।
- RCM 2.64.6Open verse →
दीन्हि प्रानपति मोहि सिख सोई। जेहि बिधि मोर परम हित होई।।
अर्थ · Hindi
दीन्हि प्रानपति मोहि सिख सोई। जेहि बिधि मोर परम हित होई।।
- RCM 2.64.7Open verse →
मैं पुनि समुझि दीखि मन माहीं। पिय बियोग सम दुखु जग नाहीं।।
अर्थ · Hindi
मैं पुनि समुझि दीखि मन माहीं। पिय बियोग सम दुखु जग नाहीं।।
- RCM 2.64.8Open verse →
प्राननाथ करुनायतन सुंदर सुखद सुजान।
अर्थ · Hindi
प्राननाथ करुनायतन सुंदर सुखद सुजान।
- RCM 2.64.9Open verse →
तुम्ह बिनु रघुकुल कुमुद बिधु सुरपुर नरक समान।।64।।
अर्थ · Hindi
तुम्ह बिनु रघुकुल कुमुद बिधु सुरपुर नरक समान।।64।।
- RCM 2.65.1Open verse →
मातु पिता भगिनी प्रिय भाई। प्रिय परिवारु सुह्रद समुदाई।।
अर्थ · Hindi
मातु पिता भगिनी प्रिय भाई। प्रिय परिवारु सुह्रद समुदाई।।
- RCM 2.65.2Open verse →
सासु ससुर गुर सजन सहाई। सुत सुंदर सुसील सुखदाई।।
अर्थ · Hindi
सासु ससुर गुर सजन सहाई। सुत सुंदर सुसील सुखदाई।।
- RCM 2.65.3Open verse →
जहँ लगि नाथ नेह अरु नाते। पिय बिनु तियहि तरनिहु ते ताते।।
अर्थ · Hindi
जहँ लगि नाथ नेह अरु नाते। पिय बिनु तियहि तरनिहु ते ताते।।
- RCM 2.65.4Open verse →
तनु धनु धामु धरनि पुर राजू। पति बिहीन सबु सोक समाजू।।
अर्थ · Hindi
तनु धनु धामु धरनि पुर राजू। पति बिहीन सबु सोक समाजू।।
- RCM 2.65.5Open verse →
भोग रोगसम भूषन भारू। जम जातना सरिस संसारू।।
अर्थ · Hindi
भोग रोगसम भूषन भारू। जम जातना सरिस संसारू।।
- RCM 2.65.6Open verse →
प्राननाथ तुम्ह बिनु जग माहीं। मो कहुँ सुखद कतहुँ कछु नाहीं।।
अर्थ · Hindi
प्राननाथ तुम्ह बिनु जग माहीं। मो कहुँ सुखद कतहुँ कछु नाहीं।।
- RCM 2.65.7Open verse →
जिय बिनु देह नदी बिनु बारी। तैसिअ नाथ पुरुष बिनु नारी।।
अर्थ · Hindi
जिय बिनु देह नदी बिनु बारी। तैसिअ नाथ पुरुष बिनु नारी।।
- RCM 2.65.8Open verse →
नाथ सकल सुख साथ तुम्हारें। सरद बिमल बिधु बदनु निहारें।।
अर्थ · Hindi
नाथ सकल सुख साथ तुम्हारें। सरद बिमल बिधु बदनु निहारें।।
- RCM 2.65.9Open verse →
खग मृग परिजन नगरु बनु बलकल बिमल दुकूल।
अर्थ · Hindi
खग मृग परिजन नगरु बनु बलकल बिमल दुकूल।
- RCM 2.65.10Open verse →
नाथ साथ सुरसदन सम परनसाल सुख मूल।।65।।
अर्थ · Hindi
नाथ साथ सुरसदन सम परनसाल सुख मूल।।65।।
- RCM 2.66.1Open verse →
बनदेवीं बनदेव उदारा। करिहहिं सासु ससुर सम सारा।।
अर्थ · Hindi
बनदेवीं बनदेव उदारा। करिहहिं सासु ससुर सम सारा।।
- RCM 2.66.2Open verse →
कुस किसलय साथरी सुहाई। प्रभु सँग मंजु मनोज तुराई।।
अर्थ · Hindi
कुस किसलय साथरी सुहाई। प्रभु सँग मंजु मनोज तुराई।।
- RCM 2.66.3Open verse →
कंद मूल फल अमिअ अहारू। अवध सौध सत सरिस पहारू।।
अर्थ · Hindi
कंद मूल फल अमिअ अहारू। अवध सौध सत सरिस पहारू।।
- RCM 2.66.4Open verse →
छिनु छिनु प्रभु पद कमल बिलोकि। रहिहउँ मुदित दिवस जिमि कोकी।।
अर्थ · Hindi
छिनु छिनु प्रभु पद कमल बिलोकि। रहिहउँ मुदित दिवस जिमि कोकी।।
- RCM 2.66.5Open verse →
बन दुख नाथ कहे बहुतेरे। भय बिषाद परिताप घनेरे।।
अर्थ · Hindi
बन दुख नाथ कहे बहुतेरे। भय बिषाद परिताप घनेरे।।
- RCM 2.66.6Open verse →
प्रभु बियोग लवलेस समाना। सब मिलि होहिं न कृपानिधाना।।
अर्थ · Hindi
प्रभु बियोग लवलेस समाना। सब मिलि होहिं न कृपानिधाना।।
- RCM 2.66.7Open verse →
अस जियँ जानि सुजान सिरोमनि। लेइअ संग मोहि छाड़िअ जनि।।
अर्थ · Hindi
अस जियँ जानि सुजान सिरोमनि। लेइअ संग मोहि छाड़िअ जनि।।
- RCM 2.66.8Open verse →
बिनती बहुत करौं का स्वामी। करुनामय उर अंतरजामी।।
अर्थ · Hindi
बिनती बहुत करौं का स्वामी। करुनामय उर अंतरजामी।।
- RCM 2.66.9Open verse →
राखिअ अवध जो अवधि लगि रहत न जनिअहिं प्रान।
अर्थ · Hindi
राखिअ अवध जो अवधि लगि रहत न जनिअहिं प्रान।
- RCM 2.66.10Open verse →
दीनबंधु संदर सुखद सील सनेह निधान।।66।।
अर्थ · Hindi
दीनबंधु संदर सुखद सील सनेह निधान।।66।।
- RCM 2.67.1Open verse →
मोहि मग चलत न होइहि हारी। छिनु छिनु चरन सरोज निहारी।।
अर्थ · Hindi
मोहि मग चलत न होइहि हारी। छिनु छिनु चरन सरोज निहारी।।
- RCM 2.67.2Open verse →
सबहि भाँति पिय सेवा करिहौं। मारग जनित सकल श्रम हरिहौं।।
अर्थ · Hindi
सबहि भाँति पिय सेवा करिहौं। मारग जनित सकल श्रम हरिहौं।।
- RCM 2.67.3Open verse →
पाय पखारी बैठि तरु छाहीं। करिहउँ बाउ मुदित मन माहीं।।
अर्थ · Hindi
पाय पखारी बैठि तरु छाहीं। करिहउँ बाउ मुदित मन माहीं।।
- RCM 2.67.4Open verse →
श्रम कन सहित स्याम तनु देखें। कहँ दुख समउ प्रानपति पेखें।।
अर्थ · Hindi
श्रम कन सहित स्याम तनु देखें। कहँ दुख समउ प्रानपति पेखें।।
- RCM 2.67.5Open verse →
सम महि तृन तरुपल्लव डासी। पाग पलोटिहि सब निसि दासी।।
अर्थ · Hindi
सम महि तृन तरुपल्लव डासी। पाग पलोटिहि सब निसि दासी।।
- RCM 2.67.6Open verse →
बारबार मृदु मूरति जोही। लागहि तात बयारि न मोही।
अर्थ · Hindi
बारबार मृदु मूरति जोही। लागहि तात बयारि न मोही।
- RCM 2.67.7Open verse →
को प्रभु सँग मोहि चितवनिहारा। सिंघबधुहि जिमि ससक सिआरा।।
अर्थ · Hindi
को प्रभु सँग मोहि चितवनिहारा। सिंघबधुहि जिमि ससक सिआरा।।
- RCM 2.67.8Open verse →
मैं सुकुमारि नाथ बन जोगू। तुम्हहि उचित तप मो कहुँ भोगू।।
अर्थ · Hindi
मैं सुकुमारि नाथ बन जोगू। तुम्हहि उचित तप मो कहुँ भोगू।।
- RCM 2.67.9Open verse →
ऐसेउ बचन कठोर सुनि जौं न ह्रदउ बिलगान।
अर्थ · Hindi
ऐसेउ बचन कठोर सुनि जौं न ह्रदउ बिलगान।
- RCM 2.67.10Open verse →
तौ प्रभु बिषम बियोग दुख सहिहहिं पावँर प्रान।।67।।
अर्थ · Hindi
तौ प्रभु बिषम बियोग दुख सहिहहिं पावँर प्रान।।67।।
- RCM 2.68.1Open verse →
अस कहि सीय बिकल भइ भारी। बचन बियोगु न सकी सँभारी।।
अर्थ · Hindi
अस कहि सीय बिकल भइ भारी। बचन बियोगु न सकी सँभारी।।
- RCM 2.68.2Open verse →
देखि दसा रघुपति जियँ जाना। हठि राखें नहिं राखिहि प्राना।।
अर्थ · Hindi
देखि दसा रघुपति जियँ जाना। हठि राखें नहिं राखिहि प्राना।।
- RCM 2.68.3Open verse →
कहेउ कृपाल भानुकुलनाथा। परिहरि सोचु चलहु बन साथा।।
अर्थ · Hindi
कहेउ कृपाल भानुकुलनाथा। परिहरि सोचु चलहु बन साथा।।
- RCM 2.68.4Open verse →
नहिं बिषाद कर अवसरु आजू। बेगि करहु बन गवन समाजू।।
अर्थ · Hindi
नहिं बिषाद कर अवसरु आजू। बेगि करहु बन गवन समाजू।।
- RCM 2.68.5Open verse →
कहि प्रिय बचन प्रिया समुझाई। लगे मातु पद आसिष पाई।।
अर्थ · Hindi
कहि प्रिय बचन प्रिया समुझाई। लगे मातु पद आसिष पाई।।
- RCM 2.68.6Open verse →
बेगि प्रजा दुख मेटब आई। जननी निठुर बिसरि जनि जाई।।
अर्थ · Hindi
बेगि प्रजा दुख मेटब आई। जननी निठुर बिसरि जनि जाई।।
- RCM 2.68.7Open verse →
फिरहि दसा बिधि बहुरि कि मोरी। देखिहउँ नयन मनोहर जोरी।।
अर्थ · Hindi
फिरहि दसा बिधि बहुरि कि मोरी। देखिहउँ नयन मनोहर जोरी।।
- RCM 2.68.8Open verse →
सुदिन सुघरी तात कब होइहि। जननी जिअत बदन बिधु जोइहि।।
अर्थ · Hindi
सुदिन सुघरी तात कब होइहि। जननी जिअत बदन बिधु जोइहि।।
- RCM 2.68.9Open verse →
बहुरि बच्छ कहि लालु कहि रघुपति रघुबर तात।
अर्थ · Hindi
बहुरि बच्छ कहि लालु कहि रघुपति रघुबर तात।
- RCM 2.68.10Open verse →
कबहिं बोलाइ लगाइ हियँ हरषि निरखिहउँ गात।।68।।
अर्थ · Hindi
कबहिं बोलाइ लगाइ हियँ हरषि निरखिहउँ गात।।68।।
- RCM 2.69.1Open verse →
लखि सनेह कातरि महतारी। बचनु न आव बिकल भइ भारी।।
अर्थ · Hindi
लखि सनेह कातरि महतारी। बचनु न आव बिकल भइ भारी।।
- RCM 2.69.2Open verse →
राम प्रबोधु कीन्ह बिधि नाना। समउ सनेहु न जाइ बखाना।।
अर्थ · Hindi
राम प्रबोधु कीन्ह बिधि नाना। समउ सनेहु न जाइ बखाना।।
- RCM 2.69.3Open verse →
तब जानकी सासु पग लागी। सुनिअ माय मैं परम अभागी।।
अर्थ · Hindi
तब जानकी सासु पग लागी। सुनिअ माय मैं परम अभागी।।
- RCM 2.69.4Open verse →
सेवा समय दैअँ बनु दीन्हा। मोर मनोरथु सफल न कीन्हा।।
अर्थ · Hindi
सेवा समय दैअँ बनु दीन्हा। मोर मनोरथु सफल न कीन्हा।।
- RCM 2.69.5Open verse →
तजब छोभु जनि छाड़िअ छोहू। करमु कठिन कछु दोसु न मोहू।।
अर्थ · Hindi
तजब छोभु जनि छाड़िअ छोहू। करमु कठिन कछु दोसु न मोहू।।
- RCM 2.69.6Open verse →
सुनि सिय बचन सासु अकुलानी। दसा कवनि बिधि कहौं बखानी।।
अर्थ · Hindi
सुनि सिय बचन सासु अकुलानी। दसा कवनि बिधि कहौं बखानी।।
- RCM 2.69.7Open verse →
बारहि बार लाइ उर लीन्ही। धरि धीरजु सिख आसिष दीन्ही।।
अर्थ · Hindi
बारहि बार लाइ उर लीन्ही। धरि धीरजु सिख आसिष दीन्ही।।
- RCM 2.69.8Open verse →
अचल होउ अहिवातु तुम्हारा। जब लगि गंग जमुन जल धारा।।
अर्थ · Hindi
अचल होउ अहिवातु तुम्हारा। जब लगि गंग जमुन जल धारा।।
- RCM 2.69.9Open verse →
सीतहि सासु असीस सिख दीन्हि अनेक प्रकार।
अर्थ · Hindi
सीतहि सासु असीस सिख दीन्हि अनेक प्रकार।
- RCM 2.69.10Open verse →
चली नाइ पद पदुम सिरु अति हित बारहिं बार।।69।।
अर्थ · Hindi
चली नाइ पद पदुम सिरु अति हित बारहिं बार।।69।।
- RCM 2.70.1Open verse →
समाचार जब लछिमन पाए। ब्याकुल बिलख बदन उठि धाए।।
अर्थ · Hindi
समाचार जब लछिमन पाए। ब्याकुल बिलख बदन उठि धाए।।
- RCM 2.70.2Open verse →
कंप पुलक तन नयन सनीरा। गहे चरन अति प्रेम अधीरा।।
अर्थ · Hindi
कंप पुलक तन नयन सनीरा। गहे चरन अति प्रेम अधीरा।।
- RCM 2.70.3Open verse →
कहि न सकत कछु चितवत ठाढ़े। मीनु दीन जनु जल तें काढ़े।।
अर्थ · Hindi
कहि न सकत कछु चितवत ठाढ़े। मीनु दीन जनु जल तें काढ़े।।
- RCM 2.70.4Open verse →
सोचु हृदयँ बिधि का होनिहारा। सबु सुखु सुकृत सिरान हमारा।।
अर्थ · Hindi
सोचु हृदयँ बिधि का होनिहारा। सबु सुखु सुकृत सिरान हमारा।।
- RCM 2.70.5Open verse →
मो कहुँ काह कहब रघुनाथा। रखिहहिं भवन कि लेहहिं साथा।।
अर्थ · Hindi
मो कहुँ काह कहब रघुनाथा। रखिहहिं भवन कि लेहहिं साथा।।
- RCM 2.70.6Open verse →
राम बिलोकि बंधु कर जोरें। देह गेह सब सन तृनु तोरें।।
अर्थ · Hindi
राम बिलोकि बंधु कर जोरें। देह गेह सब सन तृनु तोरें।।
- RCM 2.70.7Open verse →
बोले बचनु राम नय नागर। सील सनेह सरल सुख सागर।।
अर्थ · Hindi
बोले बचनु राम नय नागर। सील सनेह सरल सुख सागर।।
- RCM 2.70.8Open verse →
तात प्रेम बस जनि कदराहू। समुझि हृदयँ परिनाम उछाहू।।
अर्थ · Hindi
तात प्रेम बस जनि कदराहू। समुझि हृदयँ परिनाम उछाहू।।
- RCM 2.70.9Open verse →
मातु पिता गुरु स्वामि सिख सिर धरि करहि सुभायँ।
अर्थ · Hindi
मातु पिता गुरु स्वामि सिख सिर धरि करहि सुभायँ।
- RCM 2.70.10Open verse →
लहेउ लाभु तिन्ह जनम कर नतरु जनमु जग जायँ।।70।।
अर्थ · Hindi
लहेउ लाभु तिन्ह जनम कर नतरु जनमु जग जायँ।।70।।
- RCM 2.71.1Open verse →
अस जियँ जानि सुनहु सिख भाई। करहु मातु पितु पद सेवकाई।।
अर्थ · Hindi
अस जियँ जानि सुनहु सिख भाई। करहु मातु पितु पद सेवकाई।।
- RCM 2.71.2Open verse →
भवन भरतु रिपुसूदन नाहीं। राउ बृद्ध मम दुखु मन माहीं।।
अर्थ · Hindi
भवन भरतु रिपुसूदन नाहीं। राउ बृद्ध मम दुखु मन माहीं।।
- RCM 2.71.3Open verse →
मैं बन जाउँ तुम्हहि लेइ साथा। होइ सबहि बिधि अवध अनाथा।।
अर्थ · Hindi
मैं बन जाउँ तुम्हहि लेइ साथा। होइ सबहि बिधि अवध अनाथा।।
- RCM 2.71.4Open verse →
गुरु पितु मातु प्रजा परिवारू। सब कहुँ परइ दुसह दुख भारू।।
अर्थ · Hindi
गुरु पितु मातु प्रजा परिवारू। सब कहुँ परइ दुसह दुख भारू।।
- RCM 2.71.5Open verse →
रहहु करहु सब कर परितोषू। नतरु तात होइहि बड़ दोषू।।
अर्थ · Hindi
रहहु करहु सब कर परितोषू। नतरु तात होइहि बड़ दोषू।।
- RCM 2.71.6Open verse →
जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी। सो नृपु अवसि नरक अधिकारी।।
अर्थ · Hindi
जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी। सो नृपु अवसि नरक अधिकारी।।
- RCM 2.71.7Open verse →
रहहु तात असि नीति बिचारी। सुनत लखनु भए ब्याकुल भारी।।
अर्थ · Hindi
रहहु तात असि नीति बिचारी। सुनत लखनु भए ब्याकुल भारी।।
- RCM 2.71.8Open verse →
सिअरें बचन सूखि गए कैंसें। परसत तुहिन तामरसु जैसें।।
अर्थ · Hindi
सिअरें बचन सूखि गए कैंसें। परसत तुहिन तामरसु जैसें।।
- RCM 2.71.9Open verse →
उतरु न आवत प्रेम बस गहे चरन अकुलाइ।
अर्थ · Hindi
उतरु न आवत प्रेम बस गहे चरन अकुलाइ।
- RCM 2.71.10Open verse →
नाथ दासु मैं स्वामि तुम्ह तजहु त काह बसाइ।।71।।
अर्थ · Hindi
नाथ दासु मैं स्वामि तुम्ह तजहु त काह बसाइ।।71।।
- RCM 2.72.1Open verse →
दीन्हि मोहि सिख नीकि गोसाईं। लागि अगम अपनी कदराईं।।
अर्थ · Hindi
दीन्हि मोहि सिख नीकि गोसाईं। लागि अगम अपनी कदराईं।।
- RCM 2.72.2Open verse →
नरबर धीर धरम धुर धारी। निगम नीति कहुँ ते अधिकारी।।
अर्थ · Hindi
नरबर धीर धरम धुर धारी। निगम नीति कहुँ ते अधिकारी।।
- RCM 2.72.3Open verse →
मैं सिसु प्रभु सनेहँ प्रतिपाला। मंदरु मेरु कि लेहिं मराला।।
अर्थ · Hindi
मैं सिसु प्रभु सनेहँ प्रतिपाला। मंदरु मेरु कि लेहिं मराला।।
- RCM 2.72.4Open verse →
गुर पितु मातु न जानउँ काहू। कहउँ सुभाउ नाथ पतिआहू।।
अर्थ · Hindi
गुर पितु मातु न जानउँ काहू। कहउँ सुभाउ नाथ पतिआहू।।
- RCM 2.72.5Open verse →
जहँ लगि जगत सनेह सगाई। प्रीति प्रतीति निगम निजु गाई।।
अर्थ · Hindi
जहँ लगि जगत सनेह सगाई। प्रीति प्रतीति निगम निजु गाई।।
- RCM 2.72.6Open verse →
मोरें सबइ एक तुम्ह स्वामी। दीनबंधु उर अंतरजामी।।
अर्थ · Hindi
मोरें सबइ एक तुम्ह स्वामी। दीनबंधु उर अंतरजामी।।
- RCM 2.72.7Open verse →
धरम नीति उपदेसिअ ताही। कीरति भूति सुगति प्रिय जाही।।
अर्थ · Hindi
धरम नीति उपदेसिअ ताही। कीरति भूति सुगति प्रिय जाही।।
- RCM 2.72.8Open verse →
मन क्रम बचन चरन रत होई। कृपासिंधु परिहरिअ कि सोई।।
अर्थ · Hindi
मन क्रम बचन चरन रत होई। कृपासिंधु परिहरिअ कि सोई।।
- RCM 2.72.9Open verse →
करुनासिंधु सुबंध के सुनि मृदु बचन बिनीत।
अर्थ · Hindi
करुनासिंधु सुबंध के सुनि मृदु बचन बिनीत।
- RCM 2.72.10Open verse →
समुझाए उर लाइ प्रभु जानि सनेहँ सभीत।।72।।
अर्थ · Hindi
समुझाए उर लाइ प्रभु जानि सनेहँ सभीत।।72।।
- RCM 2.73.1Open verse →
मागहु बिदा मातु सन जाई। आवहु बेगि चलहु बन भाई।।
अर्थ · Hindi
मागहु बिदा मातु सन जाई। आवहु बेगि चलहु बन भाई।।
- RCM 2.73.2Open verse →
मुदित भए सुनि रघुबर बानी। भयउ लाभ बड़ गइ बड़ि हानी।।
अर्थ · Hindi
मुदित भए सुनि रघुबर बानी। भयउ लाभ बड़ गइ बड़ि हानी।।
- RCM 2.73.3Open verse →
हरषित ह्दयँ मातु पहिं आए। मनहुँ अंध फिरि लोचन पाए।
अर्थ · Hindi
हरषित ह्दयँ मातु पहिं आए। मनहुँ अंध फिरि लोचन पाए।
- RCM 2.73.4Open verse →
जाइ जननि पग नायउ माथा। मनु रघुनंदन जानकि साथा।।
अर्थ · Hindi
जाइ जननि पग नायउ माथा। मनु रघुनंदन जानकि साथा।।
- RCM 2.73.5Open verse →
पूँछे मातु मलिन मन देखी। लखन कही सब कथा बिसेषी।।
अर्थ · Hindi
पूँछे मातु मलिन मन देखी। लखन कही सब कथा बिसेषी।।
- RCM 2.73.6Open verse →
गई सहमि सुनि बचन कठोरा। मृगी देखि दव जनु चहु ओरा।।
अर्थ · Hindi
गई सहमि सुनि बचन कठोरा। मृगी देखि दव जनु चहु ओरा।।
- RCM 2.73.7Open verse →
लखन लखेउ भा अनरथ आजू। एहिं सनेह बस करब अकाजू।।
अर्थ · Hindi
लखन लखेउ भा अनरथ आजू। एहिं सनेह बस करब अकाजू।।
- RCM 2.73.8Open verse →
मागत बिदा सभय सकुचाहीं। जाइ संग बिधि कहिहि कि नाही।।
अर्थ · Hindi
मागत बिदा सभय सकुचाहीं। जाइ संग बिधि कहिहि कि नाही।।
- RCM 2.73.9Open verse →
समुझि सुमित्राँ राम सिय रूप सुसीलु सुभाउ।
अर्थ · Hindi
समुझि सुमित्राँ राम सिय रूप सुसीलु सुभाउ।
- RCM 2.73.10Open verse →
नृप सनेहु लखि धुनेउ सिरु पापिनि दीन्ह कुदाउ।।73।।
अर्थ · Hindi
नृप सनेहु लखि धुनेउ सिरु पापिनि दीन्ह कुदाउ।।73।।
- RCM 2.74.1Open verse →
धीरजु धरेउ कुअवसर जानी। सहज सुह्द बोली मृदु बानी।।
अर्थ · Hindi
धीरजु धरेउ कुअवसर जानी। सहज सुह्द बोली मृदु बानी।।
- RCM 2.74.2Open verse →
तात तुम्हारि मातु बैदेही। पिता रामु सब भाँति सनेही।।
अर्थ · Hindi
तात तुम्हारि मातु बैदेही। पिता रामु सब भाँति सनेही।।
- RCM 2.74.3Open verse →
अवध तहाँ जहँ राम निवासू। तहँइँ दिवसु जहँ भानु प्रकासू।।
अर्थ · Hindi
अवध तहाँ जहँ राम निवासू। तहँइँ दिवसु जहँ भानु प्रकासू।।
- RCM 2.74.4Open verse →
जौ पै सीय रामु बन जाहीं। अवध तुम्हार काजु कछु नाहिं।।
अर्थ · Hindi
जौ पै सीय रामु बन जाहीं। अवध तुम्हार काजु कछु नाहिं।।
- RCM 2.74.5Open verse →
गुर पितु मातु बंधु सुर साई। सेइअहिं सकल प्रान की नाईं।।
अर्थ · Hindi
गुर पितु मातु बंधु सुर साई। सेइअहिं सकल प्रान की नाईं।।
- RCM 2.74.6Open verse →
रामु प्रानप्रिय जीवन जी के। स्वारथ रहित सखा सबही कै।।
अर्थ · Hindi
रामु प्रानप्रिय जीवन जी के। स्वारथ रहित सखा सबही कै।।
- RCM 2.74.7Open verse →
पूजनीय प्रिय परम जहाँ तें। सब मानिअहिं राम के नातें।।
अर्थ · Hindi
पूजनीय प्रिय परम जहाँ तें। सब मानिअहिं राम के नातें।।
- RCM 2.74.8Open verse →
अस जियँ जानि संग बन जाहू। लेहु तात जग जीवन लाहू।।
अर्थ · Hindi
अस जियँ जानि संग बन जाहू। लेहु तात जग जीवन लाहू।।
- RCM 2.74.9Open verse →
भूरि भाग भाजनु भयहु मोहि समेत बलि जाउँ।
अर्थ · Hindi
भूरि भाग भाजनु भयहु मोहि समेत बलि जाउँ।
- RCM 2.74.10Open verse →
जौम तुम्हरें मन छाड़ि छलु कीन्ह राम पद ठाउँ।।74।।
अर्थ · Hindi
जौम तुम्हरें मन छाड़ि छलु कीन्ह राम पद ठाउँ।।74।।
- RCM 2.75.1Open verse →
पुत्रवती जुबती जग सोई। रघुपति भगतु जासु सुतु होई।।
अर्थ · Hindi
पुत्रवती जुबती जग सोई। रघुपति भगतु जासु सुतु होई।।
- RCM 2.75.2Open verse →
नतरु बाँझ भलि बादि बिआनी। राम बिमुख सुत तें हित जानी।।
अर्थ · Hindi
नतरु बाँझ भलि बादि बिआनी। राम बिमुख सुत तें हित जानी।।
- RCM 2.75.3Open verse →
तुम्हरेहिं भाग रामु बन जाहीं। दूसर हेतु तात कछु नाहीं।।
अर्थ · Hindi
तुम्हरेहिं भाग रामु बन जाहीं। दूसर हेतु तात कछु नाहीं।।
- RCM 2.75.4Open verse →
सकल सुकृत कर बड़ फलु एहू। राम सीय पद सहज सनेहू।।
अर्थ · Hindi
सकल सुकृत कर बड़ फलु एहू। राम सीय पद सहज सनेहू।।
- RCM 2.75.5Open verse →
राग रोषु इरिषा मदु मोहू। जनि सपनेहुँ इन्ह के बस होहू।।
अर्थ · Hindi
राग रोषु इरिषा मदु मोहू। जनि सपनेहुँ इन्ह के बस होहू।।
- RCM 2.75.6Open verse →
सकल प्रकार बिकार बिहाई। मन क्रम बचन करेहु सेवकाई।।
अर्थ · Hindi
सकल प्रकार बिकार बिहाई। मन क्रम बचन करेहु सेवकाई।।
- RCM 2.75.7Open verse →
तुम्ह कहुँ बन सब भाँति सुपासू। सँग पितु मातु रामु सिय जासू।।
अर्थ · Hindi
तुम्ह कहुँ बन सब भाँति सुपासू। सँग पितु मातु रामु सिय जासू।।
- RCM 2.75.8Open verse →
जेहिं न रामु बन लहहिं कलेसू। सुत सोइ करेहु इहइ उपदेसू।।
अर्थ · Hindi
जेहिं न रामु बन लहहिं कलेसू। सुत सोइ करेहु इहइ उपदेसू।।
- RCM 2.75.9Open verse →
उपदेसु यहु जेहिं तात तुम्हरे राम सिय सुख पावहीं।
अर्थ · Hindi
उपदेसु यहु जेहिं तात तुम्हरे राम सिय सुख पावहीं।
- RCM 2.75.10Open verse →
पितु मातु प्रिय परिवार पुर सुख सुरति बन बिसरावहीं।।
अर्थ · Hindi
पितु मातु प्रिय परिवार पुर सुख सुरति बन बिसरावहीं।।
- RCM 2.75.11Open verse →
तुलसी प्रभुहि सिख देइ आयसु दीन्ह पुनि आसिष दई।
अर्थ · Hindi
तुलसी प्रभुहि सिख देइ आयसु दीन्ह पुनि आसिष दई।
- RCM 2.75.12Open verse →
रति होउ अबिरल अमल सिय रघुबीर पद नित नित नई।।
अर्थ · Hindi
रति होउ अबिरल अमल सिय रघुबीर पद नित नित नई।।
- RCM 2.75.13Open verse →
मातु चरन सिरु नाइ चले तुरत संकित हृदयँ।
अर्थ · Hindi
मातु चरन सिरु नाइ चले तुरत संकित हृदयँ।
- RCM 2.75.14Open verse →
बागुर बिषम तोराइ मनहुँ भाग मृगु भाग बस।।75।।
अर्थ · Hindi
बागुर बिषम तोराइ मनहुँ भाग मृगु भाग बस।।75।।
- RCM 2.76.1Open verse →
गए लखनु जहँ जानकिनाथू। भे मन मुदित पाइ प्रिय साथू।।
अर्थ · Hindi
गए लखनु जहँ जानकिनाथू। भे मन मुदित पाइ प्रिय साथू।।
- RCM 2.76.2Open verse →
बंदि राम सिय चरन सुहाए। चले संग नृपमंदिर आए।।
अर्थ · Hindi
बंदि राम सिय चरन सुहाए। चले संग नृपमंदिर आए।।
- RCM 2.76.3Open verse →
कहहिं परसपर पुर नर नारी। भलि बनाइ बिधि बात बिगारी।।
अर्थ · Hindi
कहहिं परसपर पुर नर नारी। भलि बनाइ बिधि बात बिगारी।।
- RCM 2.76.4Open verse →
तन कृस दुखु बदन मलीने। बिकल मनहुँ माखी मधु छीने।।
अर्थ · Hindi
तन कृस दुखु बदन मलीने। बिकल मनहुँ माखी मधु छीने।।
- RCM 2.76.5Open verse →
कर मीजहिं सिरु धुनि पछिताहीं। जनु बिन पंख बिहग अकुलाहीं।।
अर्थ · Hindi
कर मीजहिं सिरु धुनि पछिताहीं। जनु बिन पंख बिहग अकुलाहीं।।
- RCM 2.76.6Open verse →
भइ बड़ि भीर भूप दरबारा। बरनि न जाइ बिषादु अपारा।।
अर्थ · Hindi
भइ बड़ि भीर भूप दरबारा। बरनि न जाइ बिषादु अपारा।।
- RCM 2.76.7Open verse →
सचिवँ उठाइ राउ बैठारे। कहि प्रिय बचन रामु पगु धारे।।
अर्थ · Hindi
सचिवँ उठाइ राउ बैठारे। कहि प्रिय बचन रामु पगु धारे।।
- RCM 2.76.8Open verse →
सिय समेत दोउ तनय निहारी। ब्याकुल भयउ भूमिपति भारी।।
अर्थ · Hindi
सिय समेत दोउ तनय निहारी। ब्याकुल भयउ भूमिपति भारी।।
- RCM 2.76.9Open verse →
सीय सहित सुत सुभग दोउ देखि देखि अकुलाइ।
अर्थ · Hindi
सीय सहित सुत सुभग दोउ देखि देखि अकुलाइ।
- RCM 2.76.10Open verse →
बारहिं बार सनेह बस राउ लेइ उर लाइ।।76।।
अर्थ · Hindi
बारहिं बार सनेह बस राउ लेइ उर लाइ।।76।।
- RCM 2.77.1Open verse →
सकइ न बोलि बिकल नरनाहू। सोक जनित उर दारुन दाहू।।
अर्थ · Hindi
सकइ न बोलि बिकल नरनाहू। सोक जनित उर दारुन दाहू।।
- RCM 2.77.2Open verse →
नाइ सीसु पद अति अनुरागा। उठि रघुबीर बिदा तब मागा।।
अर्थ · Hindi
नाइ सीसु पद अति अनुरागा। उठि रघुबीर बिदा तब मागा।।
- RCM 2.77.3Open verse →
पितु असीस आयसु मोहि दीजै। हरष समय बिसमउ कत कीजै।।
अर्थ · Hindi
पितु असीस आयसु मोहि दीजै। हरष समय बिसमउ कत कीजै।।
- RCM 2.77.4Open verse →
तात किएँ प्रिय प्रेम प्रमादू। जसु जग जाइ होइ अपबादू।।
अर्थ · Hindi
तात किएँ प्रिय प्रेम प्रमादू। जसु जग जाइ होइ अपबादू।।
- RCM 2.77.5Open verse →
सुनि सनेह बस उठि नरनाहाँ। बैठारे रघुपति गहि बाहाँ।।
अर्थ · Hindi
सुनि सनेह बस उठि नरनाहाँ। बैठारे रघुपति गहि बाहाँ।।
- RCM 2.77.6Open verse →
सुनहु तात तुम्ह कहुँ मुनि कहहीं। रामु चराचर नायक अहहीं।।
अर्थ · Hindi
सुनहु तात तुम्ह कहुँ मुनि कहहीं। रामु चराचर नायक अहहीं।।
- RCM 2.77.7Open verse →
सुभ अरु असुभ करम अनुहारी। ईस देइ फलु ह्दयँ बिचारी।।
अर्थ · Hindi
सुभ अरु असुभ करम अनुहारी। ईस देइ फलु ह्दयँ बिचारी।।
- RCM 2.77.8Open verse →
करइ जो करम पाव फल सोई। निगम नीति असि कह सबु कोई।।
अर्थ · Hindi
करइ जो करम पाव फल सोई। निगम नीति असि कह सबु कोई।।
- RCM 2.77.9Open verse →
औरु करै अपराधु कोउ और पाव फल भोगु।
अर्थ · Hindi
औरु करै अपराधु कोउ और पाव फल भोगु।
- RCM 2.77.10Open verse →
अति बिचित्र भगवंत गति को जग जानै जोगु।।77।।
अर्थ · Hindi
अति बिचित्र भगवंत गति को जग जानै जोगु।।77।।
- RCM 2.78.1Open verse →
रायँ राम राखन हित लागी। बहुत उपाय किए छलु त्यागी।।
अर्थ · Hindi
रायँ राम राखन हित लागी। बहुत उपाय किए छलु त्यागी।।
- RCM 2.78.2Open verse →
लखी राम रुख रहत न जाने। धरम धुरंधर धीर सयाने।।
अर्थ · Hindi
लखी राम रुख रहत न जाने। धरम धुरंधर धीर सयाने।।
- RCM 2.78.3Open verse →
तब नृप सीय लाइ उर लीन्ही। अति हित बहुत भाँति सिख दीन्ही।।
अर्थ · Hindi
तब नृप सीय लाइ उर लीन्ही। अति हित बहुत भाँति सिख दीन्ही।।
- RCM 2.78.4Open verse →
कहि बन के दुख दुसह सुनाए। सासु ससुर पितु सुख समुझाए।।
अर्थ · Hindi
कहि बन के दुख दुसह सुनाए। सासु ससुर पितु सुख समुझाए।।
- RCM 2.78.5Open verse →
सिय मनु राम चरन अनुरागा। घरु न सुगमु बनु बिषमु न लागा।।
अर्थ · Hindi
सिय मनु राम चरन अनुरागा। घरु न सुगमु बनु बिषमु न लागा।।
- RCM 2.78.6Open verse →
औरउ सबहिं सीय समुझाई। कहि कहि बिपिन बिपति अधिकाई।।
अर्थ · Hindi
औरउ सबहिं सीय समुझाई। कहि कहि बिपिन बिपति अधिकाई।।
- RCM 2.78.7Open verse →
सचिव नारि गुर नारि सयानी। सहित सनेह कहहिं मृदु बानी।।
अर्थ · Hindi
सचिव नारि गुर नारि सयानी। सहित सनेह कहहिं मृदु बानी।।
- RCM 2.78.8Open verse →
तुम्ह कहुँ तौ न दीन्ह बनबासू। करहु जो कहहिं ससुर गुर सासू।।
अर्थ · Hindi
तुम्ह कहुँ तौ न दीन्ह बनबासू। करहु जो कहहिं ससुर गुर सासू।।
- RCM 2.78.9Open verse →
-सिख सीतलि हित मधुर मृदु सुनि सीतहि न सोहानि।
अर्थ · Hindi
-सिख सीतलि हित मधुर मृदु सुनि सीतहि न सोहानि।
- RCM 2.78.10Open verse →
सरद चंद चंदनि लगत जनु चकई अकुलानि।।78।।
अर्थ · Hindi
सरद चंद चंदनि लगत जनु चकई अकुलानि।।78।।
- RCM 2.79.1Open verse →
सीय सकुच बस उतरु न देई। सो सुनि तमकि उठी कैकेई।।
अर्थ · Hindi
सीय सकुच बस उतरु न देई। सो सुनि तमकि उठी कैकेई।।
- RCM 2.79.2Open verse →
मुनि पट भूषन भाजन आनी। आगें धरि बोली मृदु बानी।।
अर्थ · Hindi
मुनि पट भूषन भाजन आनी। आगें धरि बोली मृदु बानी।।
- RCM 2.79.3Open verse →
नृपहि प्रान प्रिय तुम्ह रघुबीरा। सील सनेह न छाड़िहि भीरा।।
अर्थ · Hindi
नृपहि प्रान प्रिय तुम्ह रघुबीरा। सील सनेह न छाड़िहि भीरा।।
- RCM 2.79.4Open verse →
सुकृत सुजसु परलोकु नसाऊ। तुम्हहि जान बन कहिहि न काऊ।।
अर्थ · Hindi
सुकृत सुजसु परलोकु नसाऊ। तुम्हहि जान बन कहिहि न काऊ।।
- RCM 2.79.5Open verse →
अस बिचारि सोइ करहु जो भावा। राम जननि सिख सुनि सुखु पावा।।
अर्थ · Hindi
अस बिचारि सोइ करहु जो भावा। राम जननि सिख सुनि सुखु पावा।।
- RCM 2.79.6Open verse →
भूपहि बचन बानसम लागे। करहिं न प्रान पयान अभागे।।
अर्थ · Hindi
भूपहि बचन बानसम लागे। करहिं न प्रान पयान अभागे।।
- RCM 2.79.7Open verse →
लोग बिकल मुरुछित नरनाहू। काह करिअ कछु सूझ न काहू।।
अर्थ · Hindi
लोग बिकल मुरुछित नरनाहू। काह करिअ कछु सूझ न काहू।।
- RCM 2.79.8Open verse →
रामु तुरत मुनि बेषु बनाई। चले जनक जननिहि सिरु नाई।।
अर्थ · Hindi
रामु तुरत मुनि बेषु बनाई। चले जनक जननिहि सिरु नाई।।
- RCM 2.79.9Open verse →
सजि बन साजु समाजु सबु बनिता बंधु समेत।
अर्थ · Hindi
सजि बन साजु समाजु सबु बनिता बंधु समेत।
- RCM 2.79.10Open verse →
बंदि बिप्र गुर चरन प्रभु चले करि सबहि अचेत।।79।।
अर्थ · Hindi
बंदि बिप्र गुर चरन प्रभु चले करि सबहि अचेत।।79।।
- RCM 2.80.1Open verse →
निकसि बसिष्ठ द्वार भए ठाढ़े। देखे लोग बिरह दव दाढ़े।।
अर्थ · Hindi
निकसि बसिष्ठ द्वार भए ठाढ़े। देखे लोग बिरह दव दाढ़े।।
- RCM 2.80.2Open verse →
कहि प्रिय बचन सकल समुझाए। बिप्र बृंद रघुबीर बोलाए।।
अर्थ · Hindi
कहि प्रिय बचन सकल समुझाए। बिप्र बृंद रघुबीर बोलाए।।
- RCM 2.80.3Open verse →
गुर सन कहि बरषासन दीन्हे। आदर दान बिनय बस कीन्हे।।
अर्थ · Hindi
गुर सन कहि बरषासन दीन्हे। आदर दान बिनय बस कीन्हे।।
- RCM 2.80.4Open verse →
जाचक दान मान संतोषे। मीत पुनीत प्रेम परितोषे।।
अर्थ · Hindi
जाचक दान मान संतोषे। मीत पुनीत प्रेम परितोषे।।
- RCM 2.80.5Open verse →
दासीं दास बोलाइ बहोरी। गुरहि सौंपि बोले कर जोरी।।
अर्थ · Hindi
दासीं दास बोलाइ बहोरी। गुरहि सौंपि बोले कर जोरी।।
- RCM 2.80.6Open verse →
सब कै सार सँभार गोसाईं। करबि जनक जननी की नाई।।
अर्थ · Hindi
सब कै सार सँभार गोसाईं। करबि जनक जननी की नाई।।
- RCM 2.80.7Open verse →
बारहिं बार जोरि जुग पानी। कहत रामु सब सन मृदु बानी।।
अर्थ · Hindi
बारहिं बार जोरि जुग पानी। कहत रामु सब सन मृदु बानी।।
- RCM 2.80.8Open verse →
सोइ सब भाँति मोर हितकारी। जेहि तें रहै भुआल सुखारी।।
अर्थ · Hindi
सोइ सब भाँति मोर हितकारी। जेहि तें रहै भुआल सुखारी।।
- RCM 2.80.9Open verse →
मातु सकल मोरे बिरहँ जेहिं न होहिं दुख दीन।
अर्थ · Hindi
मातु सकल मोरे बिरहँ जेहिं न होहिं दुख दीन।
- RCM 2.80.10Open verse →
सोइ उपाउ तुम्ह करेहु सब पुर जन परम प्रबीन।।80।।
अर्थ · Hindi
सोइ उपाउ तुम्ह करेहु सब पुर जन परम प्रबीन।।80।।
- RCM 2.81.1Open verse →
एहि बिधि राम सबहि समुझावा। गुर पद पदुम हरषि सिरु नावा।
अर्थ · Hindi
एहि बिधि राम सबहि समुझावा। गुर पद पदुम हरषि सिरु नावा।
- RCM 2.81.2Open verse →
गनपती गौरि गिरीसु मनाई। चले असीस पाइ रघुराई।।
अर्थ · Hindi
गनपती गौरि गिरीसु मनाई। चले असीस पाइ रघुराई।।
- RCM 2.81.3Open verse →
राम चलत अति भयउ बिषादू। सुनि न जाइ पुर आरत नादू।।
अर्थ · Hindi
राम चलत अति भयउ बिषादू। सुनि न जाइ पुर आरत नादू।।
- RCM 2.81.4Open verse →
कुसगुन लंक अवध अति सोकू। हहरष बिषाद बिबस सुरलोकू।।
अर्थ · Hindi
कुसगुन लंक अवध अति सोकू। हहरष बिषाद बिबस सुरलोकू।।
- RCM 2.81.5Open verse →
गइ मुरुछा तब भूपति जागे। बोलि सुमंत्रु कहन अस लागे।।
अर्थ · Hindi
गइ मुरुछा तब भूपति जागे। बोलि सुमंत्रु कहन अस लागे।।
- RCM 2.81.6Open verse →
रामु चले बन प्रान न जाहीं। केहि सुख लागि रहत तन माहीं।
अर्थ · Hindi
रामु चले बन प्रान न जाहीं। केहि सुख लागि रहत तन माहीं।
- RCM 2.81.7Open verse →
एहि तें कवन ब्यथा बलवाना। जो दुखु पाइ तजहिं तनु प्राना।।
अर्थ · Hindi
एहि तें कवन ब्यथा बलवाना। जो दुखु पाइ तजहिं तनु प्राना।।
- RCM 2.81.8Open verse →
पुनि धरि धीर कहइ नरनाहू। लै रथु संग सखा तुम्ह जाहू।।
अर्थ · Hindi
पुनि धरि धीर कहइ नरनाहू। लै रथु संग सखा तुम्ह जाहू।।
- RCM 2.81.9Open verse →
-सुठि सुकुमार कुमार दोउ जनकसुता सुकुमारि।
अर्थ · Hindi
-सुठि सुकुमार कुमार दोउ जनकसुता सुकुमारि।
- RCM 2.81.10Open verse →
रथ चढ़ाइ देखराइ बनु फिरेहु गएँ दिन चारि।।81।।
अर्थ · Hindi
रथ चढ़ाइ देखराइ बनु फिरेहु गएँ दिन चारि।।81।।
- RCM 2.82.1Open verse →
जौ नहिं फिरहिं धीर दोउ भाई। सत्यसंध दृढ़ब्रत रघुराई।।
अर्थ · Hindi
जौ नहिं फिरहिं धीर दोउ भाई। सत्यसंध दृढ़ब्रत रघुराई।।
- RCM 2.82.2Open verse →
तौ तुम्ह बिनय करेहु कर जोरी। फेरिअ प्रभु मिथिलेसकिसोरी।।
अर्थ · Hindi
तौ तुम्ह बिनय करेहु कर जोरी। फेरिअ प्रभु मिथिलेसकिसोरी।।
- RCM 2.82.3Open verse →
जब सिय कानन देखि डेराई। कहेहु मोरि सिख अवसरु पाई।।
अर्थ · Hindi
जब सिय कानन देखि डेराई। कहेहु मोरि सिख अवसरु पाई।।
- RCM 2.82.4Open verse →
सासु ससुर अस कहेउ सँदेसू। पुत्रि फिरिअ बन बहुत कलेसू।।
अर्थ · Hindi
सासु ससुर अस कहेउ सँदेसू। पुत्रि फिरिअ बन बहुत कलेसू।।
- RCM 2.82.5Open verse →
पितृगृह कबहुँ कबहुँ ससुरारी। रहेहु जहाँ रुचि होइ तुम्हारी।।
अर्थ · Hindi
पितृगृह कबहुँ कबहुँ ससुरारी। रहेहु जहाँ रुचि होइ तुम्हारी।।
- RCM 2.82.6Open verse →
एहि बिधि करेहु उपाय कदंबा। फिरइ त होइ प्रान अवलंबा।।
अर्थ · Hindi
एहि बिधि करेहु उपाय कदंबा। फिरइ त होइ प्रान अवलंबा।।
- RCM 2.82.7Open verse →
नाहिं त मोर मरनु परिनामा। कछु न बसाइ भएँ बिधि बामा।।
अर्थ · Hindi
नाहिं त मोर मरनु परिनामा। कछु न बसाइ भएँ बिधि बामा।।
- RCM 2.82.8Open verse →
अस कहि मुरुछि परा महि राऊ। रामु लखनु सिय आनि देखाऊ।।
अर्थ · Hindi
अस कहि मुरुछि परा महि राऊ। रामु लखनु सिय आनि देखाऊ।।
- RCM 2.82.9Open verse →
-पाइ रजायसु नाइ सिरु रथु अति बेग बनाइ।
अर्थ · Hindi
-पाइ रजायसु नाइ सिरु रथु अति बेग बनाइ।
- RCM 2.82.10Open verse →
गयउ जहाँ बाहेर नगर सीय सहित दोउ भाइ।।82।।
अर्थ · Hindi
गयउ जहाँ बाहेर नगर सीय सहित दोउ भाइ।।82।।
- RCM 2.83.1Open verse →
तब सुमंत्र नृप बचन सुनाए। करि बिनती रथ रामु चढ़ाए।।
अर्थ · Hindi
तब सुमंत्र नृप बचन सुनाए। करि बिनती रथ रामु चढ़ाए।।
- RCM 2.83.2Open verse →
चढ़ि रथ सीय सहित दोउ भाई। चले हृदयँ अवधहि सिरु नाई।।
अर्थ · Hindi
चढ़ि रथ सीय सहित दोउ भाई। चले हृदयँ अवधहि सिरु नाई।।
- RCM 2.83.3Open verse →
चलत रामु लखि अवध अनाथा। बिकल लोग सब लागे साथा।।
अर्थ · Hindi
चलत रामु लखि अवध अनाथा। बिकल लोग सब लागे साथा।।
- RCM 2.83.4Open verse →
कृपासिंधु बहुबिधि समुझावहिं। फिरहिं प्रेम बस पुनि फिरि आवहिं।।
अर्थ · Hindi
कृपासिंधु बहुबिधि समुझावहिं। फिरहिं प्रेम बस पुनि फिरि आवहिं।।
- RCM 2.83.5Open verse →
लागति अवध भयावनि भारी। मानहुँ कालराति अँधिआरी।।
अर्थ · Hindi
लागति अवध भयावनि भारी। मानहुँ कालराति अँधिआरी।।
- RCM 2.83.6Open verse →
घोर जंतु सम पुर नर नारी। डरपहिं एकहि एक निहारी।।
अर्थ · Hindi
घोर जंतु सम पुर नर नारी। डरपहिं एकहि एक निहारी।।
- RCM 2.83.7Open verse →
घर मसान परिजन जनु भूता। सुत हित मीत मनहुँ जमदूता।।
अर्थ · Hindi
घर मसान परिजन जनु भूता। सुत हित मीत मनहुँ जमदूता।।
- RCM 2.83.8Open verse →
बागन्ह बिटप बेलि कुम्हिलाहीं। सरित सरोवर देखि न जाहीं।।
अर्थ · Hindi
बागन्ह बिटप बेलि कुम्हिलाहीं। सरित सरोवर देखि न जाहीं।।
- RCM 2.83.9Open verse →
हय गय कोटिन्ह केलिमृग पुरपसु चातक मोर।
अर्थ · Hindi
हय गय कोटिन्ह केलिमृग पुरपसु चातक मोर।
- RCM 2.83.10Open verse →
पिक रथांग सुक सारिका सारस हंस चकोर।।83।।
अर्थ · Hindi
पिक रथांग सुक सारिका सारस हंस चकोर।।83।।
- RCM 2.84.1Open verse →
राम बियोग बिकल सब ठाढ़े। जहँ तहँ मनहुँ चित्र लिखि काढ़े।।
अर्थ · Hindi
राम बियोग बिकल सब ठाढ़े। जहँ तहँ मनहुँ चित्र लिखि काढ़े।।
- RCM 2.84.2Open verse →
नगरु सफल बनु गहबर भारी। खग मृग बिपुल सकल नर नारी।।
अर्थ · Hindi
नगरु सफल बनु गहबर भारी। खग मृग बिपुल सकल नर नारी।।
- RCM 2.84.3Open verse →
बिधि कैकेई किरातिनि कीन्ही। जेंहि दव दुसह दसहुँ दिसि दीन्ही।।
अर्थ · Hindi
बिधि कैकेई किरातिनि कीन्ही। जेंहि दव दुसह दसहुँ दिसि दीन्ही।।
- RCM 2.84.4Open verse →
सहि न सके रघुबर बिरहागी। चले लोग सब ब्याकुल भागी।।
अर्थ · Hindi
सहि न सके रघुबर बिरहागी। चले लोग सब ब्याकुल भागी।।
- RCM 2.84.5Open verse →
सबहिं बिचार कीन्ह मन माहीं। राम लखन सिय बिनु सुखु नाहीं।।
अर्थ · Hindi
सबहिं बिचार कीन्ह मन माहीं। राम लखन सिय बिनु सुखु नाहीं।।
- RCM 2.84.6Open verse →
जहाँ रामु तहँ सबुइ समाजू। बिनु रघुबीर अवध नहिं काजू।।
अर्थ · Hindi
जहाँ रामु तहँ सबुइ समाजू। बिनु रघुबीर अवध नहिं काजू।।
- RCM 2.84.7Open verse →
चले साथ अस मंत्रु दृढ़ाई। सुर दुर्लभ सुख सदन बिहाई।।
अर्थ · Hindi
चले साथ अस मंत्रु दृढ़ाई। सुर दुर्लभ सुख सदन बिहाई।।
- RCM 2.84.8Open verse →
राम चरन पंकज प्रिय जिन्हही। बिषय भोग बस करहिं कि तिन्हही।।
अर्थ · Hindi
राम चरन पंकज प्रिय जिन्हही। बिषय भोग बस करहिं कि तिन्हही।।
- RCM 2.84.9Open verse →
बालक बृद्ध बिहाइ गृँह लगे लोग सब साथ।
अर्थ · Hindi
बालक बृद्ध बिहाइ गृँह लगे लोग सब साथ।
- RCM 2.84.10Open verse →
तमसा तीर निवासु किय प्रथम दिवस रघुनाथ।।84।।
अर्थ · Hindi
तमसा तीर निवासु किय प्रथम दिवस रघुनाथ।।84।।
- RCM 2.85.1Open verse →
रघुपति प्रजा प्रेमबस देखी। सदय हृदयँ दुखु भयउ बिसेषी।।
अर्थ · Hindi
रघुपति प्रजा प्रेमबस देखी। सदय हृदयँ दुखु भयउ बिसेषी।।
- RCM 2.85.2Open verse →
करुनामय रघुनाथ गोसाँई। बेगि पाइअहिं पीर पराई।।
अर्थ · Hindi
करुनामय रघुनाथ गोसाँई। बेगि पाइअहिं पीर पराई।।
- RCM 2.85.3Open verse →
कहि सप्रेम मृदु बचन सुहाए। बहुबिधि राम लोग समुझाए।।
अर्थ · Hindi
कहि सप्रेम मृदु बचन सुहाए। बहुबिधि राम लोग समुझाए।।
- RCM 2.85.4Open verse →
किए धरम उपदेस घनेरे। लोग प्रेम बस फिरहिं न फेरे।।
अर्थ · Hindi
किए धरम उपदेस घनेरे। लोग प्रेम बस फिरहिं न फेरे।।
- RCM 2.85.5Open verse →
सीलु सनेहु छाड़ि नहिं जाई। असमंजस बस भे रघुराई।।
अर्थ · Hindi
सीलु सनेहु छाड़ि नहिं जाई। असमंजस बस भे रघुराई।।
- RCM 2.85.6Open verse →
लोग सोग श्रम बस गए सोई। कछुक देवमायाँ मति मोई।।
अर्थ · Hindi
लोग सोग श्रम बस गए सोई। कछुक देवमायाँ मति मोई।।
- RCM 2.85.7Open verse →
जबहिं जाम जुग जामिनि बीती। राम सचिव सन कहेउ सप्रीती।।
अर्थ · Hindi
जबहिं जाम जुग जामिनि बीती। राम सचिव सन कहेउ सप्रीती।।
- RCM 2.85.8Open verse →
खोज मारि रथु हाँकहु ताता। आन उपायँ बनिहि नहिं बाता।।
अर्थ · Hindi
खोज मारि रथु हाँकहु ताता। आन उपायँ बनिहि नहिं बाता।।
- RCM 2.85.9Open verse →
राम लखन सुय जान चढ़ि संभु चरन सिरु नाइ।।
अर्थ · Hindi
राम लखन सुय जान चढ़ि संभु चरन सिरु नाइ।।
- RCM 2.85.10Open verse →
सचिवँ चलायउ तुरत रथु इत उत खोज दुराइ।।85।।
अर्थ · Hindi
सचिवँ चलायउ तुरत रथु इत उत खोज दुराइ।।85।।
- RCM 2.86.1Open verse →
जागे सकल लोग भएँ भोरू। गे रघुनाथ भयउ अति सोरू।।
अर्थ · Hindi
जागे सकल लोग भएँ भोरू। गे रघुनाथ भयउ अति सोरू।।
- RCM 2.86.2Open verse →
रथ कर खोज कतहहुँ नहिं पावहिं। राम राम कहि चहु दिसि धावहिं।।
अर्थ · Hindi
रथ कर खोज कतहहुँ नहिं पावहिं। राम राम कहि चहु दिसि धावहिं।।
- RCM 2.86.3Open verse →
मनहुँ बारिनिधि बूड़ जहाजू। भयउ बिकल बड़ बनिक समाजू।।
अर्थ · Hindi
मनहुँ बारिनिधि बूड़ जहाजू। भयउ बिकल बड़ बनिक समाजू।।
- RCM 2.86.4Open verse →
एकहि एक देंहिं उपदेसू। तजे राम हम जानि कलेसू।।
अर्थ · Hindi
एकहि एक देंहिं उपदेसू। तजे राम हम जानि कलेसू।।
- RCM 2.86.5Open verse →
निंदहिं आपु सराहहिं मीना। धिग जीवनु रघुबीर बिहीना।।
अर्थ · Hindi
निंदहिं आपु सराहहिं मीना। धिग जीवनु रघुबीर बिहीना।।
- RCM 2.86.6Open verse →
जौं पै प्रिय बियोगु बिधि कीन्हा। तौ कस मरनु न मागें दीन्हा।।
अर्थ · Hindi
जौं पै प्रिय बियोगु बिधि कीन्हा। तौ कस मरनु न मागें दीन्हा।।
- RCM 2.86.7Open verse →
एहि बिधि करत प्रलाप कलापा। आए अवध भरे परितापा।।
अर्थ · Hindi
एहि बिधि करत प्रलाप कलापा। आए अवध भरे परितापा।।
- RCM 2.86.8Open verse →
बिषम बियोगु न जाइ बखाना। अवधि आस सब राखहिं प्राना।।
अर्थ · Hindi
बिषम बियोगु न जाइ बखाना। अवधि आस सब राखहिं प्राना।।
- RCM 2.86.9Open verse →
राम दरस हित नेम ब्रत लगे करन नर नारि।
अर्थ · Hindi
राम दरस हित नेम ब्रत लगे करन नर नारि।
- RCM 2.86.10Open verse →
मनहुँ कोक कोकी कमल दीन बिहीन तमारि।।86।।
अर्थ · Hindi
मनहुँ कोक कोकी कमल दीन बिहीन तमारि।।86।।
- RCM 2.87.1Open verse →
सीता सचिव सहित दोउ भाई। सृंगबेरपुर पहुँचे जाई।।
अर्थ · Hindi
सीता सचिव सहित दोउ भाई। सृंगबेरपुर पहुँचे जाई।।
- RCM 2.87.2Open verse →
उतरे राम देवसरि देखी। कीन्ह दंडवत हरषु बिसेषी।।
अर्थ · Hindi
उतरे राम देवसरि देखी। कीन्ह दंडवत हरषु बिसेषी।।
- RCM 2.87.3Open verse →
लखन सचिवँ सियँ किए प्रनामा। सबहि सहित सुखु पायउ रामा।।
अर्थ · Hindi
लखन सचिवँ सियँ किए प्रनामा। सबहि सहित सुखु पायउ रामा।।
- RCM 2.87.4Open verse →
गंग सकल मुद मंगल मूला। सब सुख करनि हरनि सब सूला।।
अर्थ · Hindi
गंग सकल मुद मंगल मूला। सब सुख करनि हरनि सब सूला।।
- RCM 2.87.5Open verse →
कहि कहि कोटिक कथा प्रसंगा। रामु बिलोकहिं गंग तरंगा।।
अर्थ · Hindi
कहि कहि कोटिक कथा प्रसंगा। रामु बिलोकहिं गंग तरंगा।।
- RCM 2.87.6Open verse →
सचिवहि अनुजहि प्रियहि सुनाई। बिबुध नदी महिमा अधिकाई।।
अर्थ · Hindi
सचिवहि अनुजहि प्रियहि सुनाई। बिबुध नदी महिमा अधिकाई।।
- RCM 2.87.7Open verse →
मज्जनु कीन्ह पंथ श्रम गयऊ। सुचि जलु पिअत मुदित मन भयऊ।।
अर्थ · Hindi
मज्जनु कीन्ह पंथ श्रम गयऊ। सुचि जलु पिअत मुदित मन भयऊ।।
- RCM 2.87.8Open verse →
सुमिरत जाहि मिटइ श्रम भारू। तेहि श्रम यह लौकिक ब्यवहारू।।
अर्थ · Hindi
सुमिरत जाहि मिटइ श्रम भारू। तेहि श्रम यह लौकिक ब्यवहारू।।
- RCM 2.87.9Open verse →
सुध्द सचिदानंदमय कंद भानुकुल केतु।
अर्थ · Hindi
सुध्द सचिदानंदमय कंद भानुकुल केतु।
- RCM 2.87.10Open verse →
चरित करत नर अनुहरत संसृति सागर सेतु।।87।।
अर्थ · Hindi
चरित करत नर अनुहरत संसृति सागर सेतु।।87।।
- RCM 2.88.1Open verse →
यह सुधि गुहँ निषाद जब पाई। मुदित लिए प्रिय बंधु बोलाई।।
अर्थ · Hindi
यह सुधि गुहँ निषाद जब पाई। मुदित लिए प्रिय बंधु बोलाई।।
- RCM 2.88.2Open verse →
लिए फल मूल भेंट भरि भारा। मिलन चलेउ हिंयँ हरषु अपारा।।
अर्थ · Hindi
लिए फल मूल भेंट भरि भारा। मिलन चलेउ हिंयँ हरषु अपारा।।
- RCM 2.88.3Open verse →
करि दंडवत भेंट धरि आगें। प्रभुहि बिलोकत अति अनुरागें।।
अर्थ · Hindi
करि दंडवत भेंट धरि आगें। प्रभुहि बिलोकत अति अनुरागें।।
- RCM 2.88.4Open verse →
सहज सनेह बिबस रघुराई। पूँछी कुसल निकट बैठाई।।
अर्थ · Hindi
सहज सनेह बिबस रघुराई। पूँछी कुसल निकट बैठाई।।
- RCM 2.88.5Open verse →
नाथ कुसल पद पंकज देखें। भयउँ भागभाजन जन लेखें।।
अर्थ · Hindi
नाथ कुसल पद पंकज देखें। भयउँ भागभाजन जन लेखें।।
- RCM 2.88.6Open verse →
देव धरनि धनु धामु तुम्हारा। मैं जनु नीचु सहित परिवारा।।
अर्थ · Hindi
देव धरनि धनु धामु तुम्हारा। मैं जनु नीचु सहित परिवारा।।
- RCM 2.88.7Open verse →
कृपा करिअ पुर धारिअ पाऊ। थापिय जनु सबु लोगु सिहाऊ।।
अर्थ · Hindi
कृपा करिअ पुर धारिअ पाऊ। थापिय जनु सबु लोगु सिहाऊ।।
- RCM 2.88.8Open verse →
कहेहु सत्य सबु सखा सुजाना। मोहि दीन्ह पितु आयसु आना।।
अर्थ · Hindi
कहेहु सत्य सबु सखा सुजाना। मोहि दीन्ह पितु आयसु आना।।
- RCM 2.88.9Open verse →
बरष चारिदस बासु बन मुनि ब्रत बेषु अहारु।
अर्थ · Hindi
बरष चारिदस बासु बन मुनि ब्रत बेषु अहारु।
- RCM 2.88.10Open verse →
ग्राम बासु नहिं उचित सुनि गुहहि भयउ दुखु भारु।।88।।
अर्थ · Hindi
ग्राम बासु नहिं उचित सुनि गुहहि भयउ दुखु भारु।।88।।
- RCM 2.89.1Open verse →
राम लखन सिय रूप निहारी। कहहिं सप्रेम ग्राम नर नारी।।
अर्थ · Hindi
राम लखन सिय रूप निहारी। कहहिं सप्रेम ग्राम नर नारी।।
- RCM 2.89.2Open verse →
ते पितु मातु कहहु सखि कैसे। जिन्ह पठए बन बालक ऐसे।।
अर्थ · Hindi
ते पितु मातु कहहु सखि कैसे। जिन्ह पठए बन बालक ऐसे।।
- RCM 2.89.3Open verse →
एक कहहिं भल भूपति कीन्हा। लोयन लाहु हमहि बिधि दीन्हा।।
अर्थ · Hindi
एक कहहिं भल भूपति कीन्हा। लोयन लाहु हमहि बिधि दीन्हा।।
- RCM 2.89.4Open verse →
तब निषादपति उर अनुमाना। तरु सिंसुपा मनोहर जाना।।
अर्थ · Hindi
तब निषादपति उर अनुमाना। तरु सिंसुपा मनोहर जाना।।
- RCM 2.89.5Open verse →
लै रघुनाथहि ठाउँ देखावा। कहेउ राम सब भाँति सुहावा।।
अर्थ · Hindi
लै रघुनाथहि ठाउँ देखावा। कहेउ राम सब भाँति सुहावा।।
- RCM 2.89.6Open verse →
पुरजन करि जोहारु घर आए। रघुबर संध्या करन सिधाए।।
अर्थ · Hindi
पुरजन करि जोहारु घर आए। रघुबर संध्या करन सिधाए।।
- RCM 2.89.7Open verse →
गुहँ सँवारि साँथरी डसाई। कुस किसलयमय मृदुल सुहाई।।
अर्थ · Hindi
गुहँ सँवारि साँथरी डसाई। कुस किसलयमय मृदुल सुहाई।।
- RCM 2.89.8Open verse →
सुचि फल मूल मधुर मृदु जानी। दोना भरि भरि राखेसि पानी।।
अर्थ · Hindi
सुचि फल मूल मधुर मृदु जानी। दोना भरि भरि राखेसि पानी।।
- RCM 2.89.9Open verse →
सिय सुमंत्र भ्राता सहित कंद मूल फल खाइ।
अर्थ · Hindi
सिय सुमंत्र भ्राता सहित कंद मूल फल खाइ।
- RCM 2.89.10Open verse →
सयन कीन्ह रघुबंसमनि पाय पलोटत भाइ।।89।।
अर्थ · Hindi
सयन कीन्ह रघुबंसमनि पाय पलोटत भाइ।।89।।
- RCM 2.90.1Open verse →
उठे लखनु प्रभु सोवत जानी। कहि सचिवहि सोवन मृदु बानी।।
अर्थ · Hindi
उठे लखनु प्रभु सोवत जानी। कहि सचिवहि सोवन मृदु बानी।।
- RCM 2.90.2Open verse →
कछुक दूर सजि बान सरासन। जागन लगे बैठि बीरासन।।
अर्थ · Hindi
कछुक दूर सजि बान सरासन। जागन लगे बैठि बीरासन।।
- RCM 2.90.3Open verse →
गुँह बोलाइ पाहरू प्रतीती। ठावँ ठाँव राखे अति प्रीती।।
अर्थ · Hindi
गुँह बोलाइ पाहरू प्रतीती। ठावँ ठाँव राखे अति प्रीती।।
- RCM 2.90.4Open verse →
आपु लखन पहिं बैठेउ जाई। कटि भाथी सर चाप चढ़ाई।।
अर्थ · Hindi
आपु लखन पहिं बैठेउ जाई। कटि भाथी सर चाप चढ़ाई।।
- RCM 2.90.5Open verse →
सोवत प्रभुहि निहारि निषादू। भयउ प्रेम बस ह्दयँ बिषादू।।
अर्थ · Hindi
सोवत प्रभुहि निहारि निषादू। भयउ प्रेम बस ह्दयँ बिषादू।।
- RCM 2.90.6Open verse →
तनु पुलकित जलु लोचन बहई। बचन सप्रेम लखन सन कहई।।
अर्थ · Hindi
तनु पुलकित जलु लोचन बहई। बचन सप्रेम लखन सन कहई।।
- RCM 2.90.7Open verse →
भूपति भवन सुभायँ सुहावा। सुरपति सदनु न पटतर पावा।।
अर्थ · Hindi
भूपति भवन सुभायँ सुहावा। सुरपति सदनु न पटतर पावा।।
- RCM 2.90.8Open verse →
मनिमय रचित चारु चौबारे। जनु रतिपति निज हाथ सँवारे।।
अर्थ · Hindi
मनिमय रचित चारु चौबारे। जनु रतिपति निज हाथ सँवारे।।
- RCM 2.90.9Open verse →
सुचि सुबिचित्र सुभोगमय सुमन सुगंध सुबास।
अर्थ · Hindi
सुचि सुबिचित्र सुभोगमय सुमन सुगंध सुबास।
- RCM 2.90.10Open verse →
पलँग मंजु मनिदीप जहँ सब बिधि सकल सुपास।।90।।
अर्थ · Hindi
पलँग मंजु मनिदीप जहँ सब बिधि सकल सुपास।।90।।
- RCM 2.91.1Open verse →
बिबिध बसन उपधान तुराई। छीर फेन मृदु बिसद सुहाई।।
अर्थ · Hindi
बिबिध बसन उपधान तुराई। छीर फेन मृदु बिसद सुहाई।।
- RCM 2.91.2Open verse →
तहँ सिय रामु सयन निसि करहीं। निज छबि रति मनोज मदु हरहीं।।
अर्थ · Hindi
तहँ सिय रामु सयन निसि करहीं। निज छबि रति मनोज मदु हरहीं।।
- RCM 2.91.3Open verse →
ते सिय रामु साथरीं सोए। श्रमित बसन बिनु जाहिं न जोए।।
अर्थ · Hindi
ते सिय रामु साथरीं सोए। श्रमित बसन बिनु जाहिं न जोए।।
- RCM 2.91.4Open verse →
मातु पिता परिजन पुरबासी। सखा सुसील दास अरु दासी।।
अर्थ · Hindi
मातु पिता परिजन पुरबासी। सखा सुसील दास अरु दासी।।
- RCM 2.91.5Open verse →
जोगवहिं जिन्हहि प्रान की नाई। महि सोवत तेइ राम गोसाईं।।
अर्थ · Hindi
जोगवहिं जिन्हहि प्रान की नाई। महि सोवत तेइ राम गोसाईं।।
- RCM 2.91.6Open verse →
पिता जनक जग बिदित प्रभाऊ। ससुर सुरेस सखा रघुराऊ।।
अर्थ · Hindi
पिता जनक जग बिदित प्रभाऊ। ससुर सुरेस सखा रघुराऊ।।
- RCM 2.91.7Open verse →
रामचंदु पति सो बैदेही। सोवत महि बिधि बाम न केही।।
अर्थ · Hindi
रामचंदु पति सो बैदेही। सोवत महि बिधि बाम न केही।।
- RCM 2.91.8Open verse →
सिय रघुबीर कि कानन जोगू। करम प्रधान सत्य कह लोगू।।
अर्थ · Hindi
सिय रघुबीर कि कानन जोगू। करम प्रधान सत्य कह लोगू।।
- RCM 2.91.9Open verse →
कैकयनंदिनि मंदमति कठिन कुटिलपनु कीन्ह।
अर्थ · Hindi
कैकयनंदिनि मंदमति कठिन कुटिलपनु कीन्ह।
- RCM 2.91.10Open verse →
जेहीं रघुनंदन जानकिहि सुख अवसर दुखु दीन्ह।।91।।
अर्थ · Hindi
जेहीं रघुनंदन जानकिहि सुख अवसर दुखु दीन्ह।।91।।
- RCM 2.92.1Open verse →
भइ दिनकर कुल बिटप कुठारी। कुमति कीन्ह सब बिस्व दुखारी।।
अर्थ · Hindi
भइ दिनकर कुल बिटप कुठारी। कुमति कीन्ह सब बिस्व दुखारी।।
- RCM 2.92.2Open verse →
भयउ बिषादु निषादहि भारी। राम सीय महि सयन निहारी।।
अर्थ · Hindi
भयउ बिषादु निषादहि भारी। राम सीय महि सयन निहारी।।
- RCM 2.92.3Open verse →
बोले लखन मधुर मृदु बानी। ग्यान बिराग भगति रस सानी।।
अर्थ · Hindi
बोले लखन मधुर मृदु बानी। ग्यान बिराग भगति रस सानी।।
- RCM 2.92.4Open verse →
काहु न कोउ सुख दुख कर दाता। निज कृत करम भोग सबु भ्राता।।
अर्थ · Hindi
काहु न कोउ सुख दुख कर दाता। निज कृत करम भोग सबु भ्राता।।
- RCM 2.92.5Open verse →
जोग बियोग भोग भल मंदा। हित अनहित मध्यम भ्रम फंदा।।
अर्थ · Hindi
जोग बियोग भोग भल मंदा। हित अनहित मध्यम भ्रम फंदा।।
- RCM 2.92.6Open verse →
जनमु मरनु जहँ लगि जग जालू। संपती बिपति करमु अरु कालू।।
अर्थ · Hindi
जनमु मरनु जहँ लगि जग जालू। संपती बिपति करमु अरु कालू।।
- RCM 2.92.7Open verse →
धरनि धामु धनु पुर परिवारू। सरगु नरकु जहँ लगि ब्यवहारू।।
अर्थ · Hindi
धरनि धामु धनु पुर परिवारू। सरगु नरकु जहँ लगि ब्यवहारू।।
- RCM 2.92.8Open verse →
देखिअ सुनिअ गुनिअ मन माहीं। मोह मूल परमारथु नाहीं।।
अर्थ · Hindi
देखिअ सुनिअ गुनिअ मन माहीं। मोह मूल परमारथु नाहीं।।
- RCM 2.92.9Open verse →
सपनें होइ भिखारि नृप रंकु नाकपति होइ।
अर्थ · Hindi
सपनें होइ भिखारि नृप रंकु नाकपति होइ।
- RCM 2.92.10Open verse →
जागें लाभु न हानि कछु तिमि प्रपंच जियँ जोइ।।92।।
अर्थ · Hindi
जागें लाभु न हानि कछु तिमि प्रपंच जियँ जोइ।।92।।
- RCM 2.93.1Open verse →
अस बिचारि नहिं कीजअ रोसू। काहुहि बादि न देइअ दोसू।।
अर्थ · Hindi
अस बिचारि नहिं कीजअ रोसू। काहुहि बादि न देइअ दोसू।।
- RCM 2.93.2Open verse →
मोह निसाँ सबु सोवनिहारा। देखिअ सपन अनेक प्रकारा।।
अर्थ · Hindi
मोह निसाँ सबु सोवनिहारा। देखिअ सपन अनेक प्रकारा।।
- RCM 2.93.3Open verse →
एहिं जग जामिनि जागहिं जोगी। परमारथी प्रपंच बियोगी।।
अर्थ · Hindi
एहिं जग जामिनि जागहिं जोगी। परमारथी प्रपंच बियोगी।।
- RCM 2.93.4Open verse →
जानिअ तबहिं जीव जग जागा। जब जब बिषय बिलास बिरागा।।
अर्थ · Hindi
जानिअ तबहिं जीव जग जागा। जब जब बिषय बिलास बिरागा।।
- RCM 2.93.5Open verse →
होइ बिबेकु मोह भ्रम भागा। तब रघुनाथ चरन अनुरागा।।
अर्थ · Hindi
होइ बिबेकु मोह भ्रम भागा। तब रघुनाथ चरन अनुरागा।।
- RCM 2.93.6Open verse →
सखा परम परमारथु एहू। मन क्रम बचन राम पद नेहू।।
अर्थ · Hindi
सखा परम परमारथु एहू। मन क्रम बचन राम पद नेहू।।
- RCM 2.93.7Open verse →
राम ब्रह्म परमारथ रूपा। अबिगत अलख अनादि अनूपा।।
अर्थ · Hindi
राम ब्रह्म परमारथ रूपा। अबिगत अलख अनादि अनूपा।।
- RCM 2.93.8Open verse →
सकल बिकार रहित गतभेदा। कहि नित नेति निरूपहिं बेदा।
अर्थ · Hindi
सकल बिकार रहित गतभेदा। कहि नित नेति निरूपहिं बेदा।
- RCM 2.93.9Open verse →
भगत भूमि भूसुर सुरभि सुर हित लागि कृपाल।
अर्थ · Hindi
भगत भूमि भूसुर सुरभि सुर हित लागि कृपाल।
- RCM 2.93.10Open verse →
करत चरित धरि मनुज तनु सुनत मिटहि जग जाल।।93।।
अर्थ · Hindi
करत चरित धरि मनुज तनु सुनत मिटहि जग जाल।।93।।
- RCM 2.94.1Open verse →
सखा समुझि अस परिहरि मोहु। सिय रघुबीर चरन रत होहू।।
अर्थ · Hindi
सखा समुझि अस परिहरि मोहु। सिय रघुबीर चरन रत होहू।।
- RCM 2.94.2Open verse →
कहत राम गुन भा भिनुसारा। जागे जग मंगल सुखदारा।।
अर्थ · Hindi
कहत राम गुन भा भिनुसारा। जागे जग मंगल सुखदारा।।
- RCM 2.94.3Open verse →
सकल सोच करि राम नहावा। सुचि सुजान बट छीर मगावा।।
अर्थ · Hindi
सकल सोच करि राम नहावा। सुचि सुजान बट छीर मगावा।।
- RCM 2.94.4Open verse →
अनुज सहित सिर जटा बनाए। देखि सुमंत्र नयन जल छाए।।
अर्थ · Hindi
अनुज सहित सिर जटा बनाए। देखि सुमंत्र नयन जल छाए।।
- RCM 2.94.5Open verse →
हृदयँ दाहु अति बदन मलीना। कह कर जोरि बचन अति दीना।।
अर्थ · Hindi
हृदयँ दाहु अति बदन मलीना। कह कर जोरि बचन अति दीना।।
- RCM 2.94.6Open verse →
नाथ कहेउ अस कोसलनाथा। लै रथु जाहु राम कें साथा।।
अर्थ · Hindi
नाथ कहेउ अस कोसलनाथा। लै रथु जाहु राम कें साथा।।
- RCM 2.94.7Open verse →
बनु देखाइ सुरसरि अन्हवाई। आनेहु फेरि बेगि दोउ भाई।।
अर्थ · Hindi
बनु देखाइ सुरसरि अन्हवाई। आनेहु फेरि बेगि दोउ भाई।।
- RCM 2.94.8Open verse →
लखनु रामु सिय आनेहु फेरी। संसय सकल सँकोच निबेरी।।
अर्थ · Hindi
लखनु रामु सिय आनेहु फेरी। संसय सकल सँकोच निबेरी।।
- RCM 2.94.9Open verse →
नृप अस कहेउ गोसाईं जस कहइ करौं बलि सोइ।
अर्थ · Hindi
नृप अस कहेउ गोसाईं जस कहइ करौं बलि सोइ।
- RCM 2.94.10Open verse →
करि बिनती पायन्ह परेउ दीन्ह बाल जिमि रोइ।।94।।
अर्थ · Hindi
करि बिनती पायन्ह परेउ दीन्ह बाल जिमि रोइ।।94।।
- RCM 2.95.1Open verse →
तात कृपा करि कीजिअ सोई। जातें अवध अनाथ न होई।।
अर्थ · Hindi
तात कृपा करि कीजिअ सोई। जातें अवध अनाथ न होई।।
- RCM 2.95.2Open verse →
मंत्रहि राम उठाइ प्रबोधा। तात धरम मतु तुम्ह सबु सोधा।।
अर्थ · Hindi
मंत्रहि राम उठाइ प्रबोधा। तात धरम मतु तुम्ह सबु सोधा।।
- RCM 2.95.3Open verse →
सिबि दधीचि हरिचंद नरेसा। सहे धरम हित कोटि कलेसा।।
अर्थ · Hindi
सिबि दधीचि हरिचंद नरेसा। सहे धरम हित कोटि कलेसा।।
- RCM 2.95.4Open verse →
रंतिदेव बलि भूप सुजाना। धरमु धरेउ सहि संकट नाना।।
अर्थ · Hindi
रंतिदेव बलि भूप सुजाना। धरमु धरेउ सहि संकट नाना।।
- RCM 2.95.5Open verse →
धरमु न दूसर सत्य समाना। आगम निगम पुरान बखाना।।
अर्थ · Hindi
धरमु न दूसर सत्य समाना। आगम निगम पुरान बखाना।।
- RCM 2.95.6Open verse →
मैं सोइ धरमु सुलभ करि पावा। तजें तिहूँ पुर अपजसु छावा।।
अर्थ · Hindi
मैं सोइ धरमु सुलभ करि पावा। तजें तिहूँ पुर अपजसु छावा।।
- RCM 2.95.7Open verse →
संभावित कहुँ अपजस लाहू। मरन कोटि सम दारुन दाहू।।
अर्थ · Hindi
संभावित कहुँ अपजस लाहू। मरन कोटि सम दारुन दाहू।।
- RCM 2.95.8Open verse →
तुम्ह सन तात बहुत का कहऊँ। दिएँ उतरु फिरि पातकु लहऊँ।।
अर्थ · Hindi
तुम्ह सन तात बहुत का कहऊँ। दिएँ उतरु फिरि पातकु लहऊँ।।
- RCM 2.95.9Open verse →
पितु पद गहि कहि कोटि नति बिनय करब कर जोरि।
अर्थ · Hindi
पितु पद गहि कहि कोटि नति बिनय करब कर जोरि।
- RCM 2.95.10Open verse →
चिंता कवनिहु बात कै तात करिअ जनि मोरि।।95।।
अर्थ · Hindi
चिंता कवनिहु बात कै तात करिअ जनि मोरि।।95।।
- RCM 2.96.1Open verse →
तुम्ह पुनि पितु सम अति हित मोरें। बिनती करउँ तात कर जोरें।।
अर्थ · Hindi
तुम्ह पुनि पितु सम अति हित मोरें। बिनती करउँ तात कर जोरें।।
- RCM 2.96.2Open verse →
सब बिधि सोइ करतब्य तुम्हारें। दुख न पाव पितु सोच हमारें।।
अर्थ · Hindi
सब बिधि सोइ करतब्य तुम्हारें। दुख न पाव पितु सोच हमारें।।
- RCM 2.96.3Open verse →
सुनि रघुनाथ सचिव संबादू। भयउ सपरिजन बिकल निषादू।।
अर्थ · Hindi
सुनि रघुनाथ सचिव संबादू। भयउ सपरिजन बिकल निषादू।।
- RCM 2.96.4Open verse →
पुनि कछु लखन कही कटु बानी। प्रभु बरजे बड़ अनुचित जानी।।
अर्थ · Hindi
पुनि कछु लखन कही कटु बानी। प्रभु बरजे बड़ अनुचित जानी।।
- RCM 2.96.5Open verse →
सकुचि राम निज सपथ देवाई। लखन सँदेसु कहिअ जनि जाई।।
अर्थ · Hindi
सकुचि राम निज सपथ देवाई। लखन सँदेसु कहिअ जनि जाई।।
- RCM 2.96.6Open verse →
कह सुमंत्रु पुनि भूप सँदेसू। सहि न सकिहि सिय बिपिन कलेसू।।
अर्थ · Hindi
कह सुमंत्रु पुनि भूप सँदेसू। सहि न सकिहि सिय बिपिन कलेसू।।
- RCM 2.96.7Open verse →
जेहि बिधि अवध आव फिरि सीया। सोइ रघुबरहि तुम्हहि करनीया।।
अर्थ · Hindi
जेहि बिधि अवध आव फिरि सीया। सोइ रघुबरहि तुम्हहि करनीया।।
- RCM 2.96.8Open verse →
नतरु निपट अवलंब बिहीना। मैं न जिअब जिमि जल बिनु मीना।।
अर्थ · Hindi
नतरु निपट अवलंब बिहीना। मैं न जिअब जिमि जल बिनु मीना।।
- RCM 2.96.9Open verse →
मइकें ससरें सकल सुख जबहिं जहाँ मनु मान।।
अर्थ · Hindi
मइकें ससरें सकल सुख जबहिं जहाँ मनु मान।।
- RCM 2.96.10Open verse →
तँह तब रहिहि सुखेन सिय जब लगि बिपति बिहान।।96।।
अर्थ · Hindi
तँह तब रहिहि सुखेन सिय जब लगि बिपति बिहान।।96।।
- RCM 2.97.1Open verse →
बिनती भूप कीन्ह जेहि भाँती। आरति प्रीति न सो कहि जाती।।
अर्थ · Hindi
बिनती भूप कीन्ह जेहि भाँती। आरति प्रीति न सो कहि जाती।।
- RCM 2.97.2Open verse →
पितु सँदेसु सुनि कृपानिधाना। सियहि दीन्ह सिख कोटि बिधाना।।
अर्थ · Hindi
पितु सँदेसु सुनि कृपानिधाना। सियहि दीन्ह सिख कोटि बिधाना।।
- RCM 2.97.3Open verse →
सासु ससुर गुर प्रिय परिवारू। फिरतु त सब कर मिटै खभारू।।
अर्थ · Hindi
सासु ससुर गुर प्रिय परिवारू। फिरतु त सब कर मिटै खभारू।।
- RCM 2.97.4Open verse →
सुनि पति बचन कहति बैदेही। सुनहु प्रानपति परम सनेही।।
अर्थ · Hindi
सुनि पति बचन कहति बैदेही। सुनहु प्रानपति परम सनेही।।
- RCM 2.97.5Open verse →
प्रभु करुनामय परम बिबेकी। तनु तजि रहति छाँह किमि छेंकी।।
अर्थ · Hindi
प्रभु करुनामय परम बिबेकी। तनु तजि रहति छाँह किमि छेंकी।।
- RCM 2.97.6Open verse →
प्रभा जाइ कहँ भानु बिहाई। कहँ चंद्रिका चंदु तजि जाई।।
अर्थ · Hindi
प्रभा जाइ कहँ भानु बिहाई। कहँ चंद्रिका चंदु तजि जाई।।
- RCM 2.97.7Open verse →
पतिहि प्रेममय बिनय सुनाई। कहति सचिव सन गिरा सुहाई।।
अर्थ · Hindi
पतिहि प्रेममय बिनय सुनाई। कहति सचिव सन गिरा सुहाई।।
- RCM 2.97.8Open verse →
तुम्ह पितु ससुर सरिस हितकारी। उतरु देउँ फिरि अनुचित भारी।।
अर्थ · Hindi
तुम्ह पितु ससुर सरिस हितकारी। उतरु देउँ फिरि अनुचित भारी।।
- RCM 2.97.9Open verse →
आरति बस सनमुख भइउँ बिलगु न मानब तात।
अर्थ · Hindi
आरति बस सनमुख भइउँ बिलगु न मानब तात।
- RCM 2.97.10Open verse →
आरजसुत पद कमल बिनु बादि जहाँ लगि नात।।97।।
अर्थ · Hindi
आरजसुत पद कमल बिनु बादि जहाँ लगि नात।।97।।
- RCM 2.98.1Open verse →
पितु बैभव बिलास मैं डीठा। नृप मनि मुकुट मिलित पद पीठा।।
अर्थ · Hindi
पितु बैभव बिलास मैं डीठा। नृप मनि मुकुट मिलित पद पीठा।।
- RCM 2.98.2Open verse →
सुखनिधान अस पितु गृह मोरें। पिय बिहीन मन भाव न भोरें।।
अर्थ · Hindi
सुखनिधान अस पितु गृह मोरें। पिय बिहीन मन भाव न भोरें।।
- RCM 2.98.3Open verse →
ससुर चक्कवइ कोसलराऊ। भुवन चारिदस प्रगट प्रभाऊ।।
अर्थ · Hindi
ससुर चक्कवइ कोसलराऊ। भुवन चारिदस प्रगट प्रभाऊ।।
- RCM 2.98.4Open verse →
आगें होइ जेहि सुरपति लेई। अरध सिंघासन आसनु देई।।
अर्थ · Hindi
आगें होइ जेहि सुरपति लेई। अरध सिंघासन आसनु देई।।
- RCM 2.98.5Open verse →
ससुरु एतादृस अवध निवासू। प्रिय परिवारु मातु सम सासू।।
अर्थ · Hindi
ससुरु एतादृस अवध निवासू। प्रिय परिवारु मातु सम सासू।।
- RCM 2.98.6Open verse →
बिनु रघुपति पद पदुम परागा। मोहि केउ सपनेहुँ सुखद न लागा।।
अर्थ · Hindi
बिनु रघुपति पद पदुम परागा। मोहि केउ सपनेहुँ सुखद न लागा।।
- RCM 2.98.7Open verse →
अगम पंथ बनभूमि पहारा। करि केहरि सर सरित अपारा।।
अर्थ · Hindi
अगम पंथ बनभूमि पहारा। करि केहरि सर सरित अपारा।।
- RCM 2.98.8Open verse →
कोल किरात कुरंग बिहंगा। मोहि सब सुखद प्रानपति संगा।।
अर्थ · Hindi
कोल किरात कुरंग बिहंगा। मोहि सब सुखद प्रानपति संगा।।
- RCM 2.98.9Open verse →
सासु ससुर सन मोरि हुँति बिनय करबि परि पायँ।।
अर्थ · Hindi
सासु ससुर सन मोरि हुँति बिनय करबि परि पायँ।।
- RCM 2.98.10Open verse →
मोर सोचु जनि करिअ कछु मैं बन सुखी सुभायँ।।98।।
अर्थ · Hindi
मोर सोचु जनि करिअ कछु मैं बन सुखी सुभायँ।।98।।
- RCM 2.99.1Open verse →
प्राननाथ प्रिय देवर साथा। बीर धुरीन धरें धनु भाथा।।
अर्थ · Hindi
प्राननाथ प्रिय देवर साथा। बीर धुरीन धरें धनु भाथा।।
- RCM 2.99.2Open verse →
नहिं मग श्रमु भ्रमु दुख मन मोरें। मोहि लगि सोचु करिअ जनि भोरें।।
अर्थ · Hindi
नहिं मग श्रमु भ्रमु दुख मन मोरें। मोहि लगि सोचु करिअ जनि भोरें।।
- RCM 2.99.3Open verse →
सुनि सुमंत्रु सिय सीतलि बानी। भयउ बिकल जनु फनि मनि हानी।।
अर्थ · Hindi
सुनि सुमंत्रु सिय सीतलि बानी। भयउ बिकल जनु फनि मनि हानी।।
- RCM 2.99.4Open verse →
नयन सूझ नहिं सुनइ न काना। कहि न सकइ कछु अति अकुलाना।।
अर्थ · Hindi
नयन सूझ नहिं सुनइ न काना। कहि न सकइ कछु अति अकुलाना।।
- RCM 2.99.5Open verse →
राम प्रबोधु कीन्ह बहु भाँति। तदपि होति नहिं सीतलि छाती।।
अर्थ · Hindi
राम प्रबोधु कीन्ह बहु भाँति। तदपि होति नहिं सीतलि छाती।।
- RCM 2.99.6Open verse →
जतन अनेक साथ हित कीन्हे। उचित उतर रघुनंदन दीन्हे।।
अर्थ · Hindi
जतन अनेक साथ हित कीन्हे। उचित उतर रघुनंदन दीन्हे।।
- RCM 2.99.7Open verse →
मेटि जाइ नहिं राम रजाई। कठिन करम गति कछु न बसाई।।
अर्थ · Hindi
मेटि जाइ नहिं राम रजाई। कठिन करम गति कछु न बसाई।।
- RCM 2.99.8Open verse →
राम लखन सिय पद सिरु नाई। फिरेउ बनिक जिमि मूर गवाँई।।
अर्थ · Hindi
राम लखन सिय पद सिरु नाई। फिरेउ बनिक जिमि मूर गवाँई।।
- RCM 2.99.9Open verse →
-रथ हाँकेउ हय राम तन हेरि हेरि हिहिनाहिं।
अर्थ · Hindi
-रथ हाँकेउ हय राम तन हेरि हेरि हिहिनाहिं।
- RCM 2.99.10Open verse →
देखि निषाद बिषादबस धुनहिं सीस पछिताहिं।।99।।
अर्थ · Hindi
देखि निषाद बिषादबस धुनहिं सीस पछिताहिं।।99।।
- RCM 2.100.1Open verse →
जासु बियोग बिकल पसु ऐसे। प्रजा मातु पितु जिइहहिं कैसें।।
अर्थ · Hindi
जासु बियोग बिकल पसु ऐसे। प्रजा मातु पितु जिइहहिं कैसें।।
- RCM 2.100.2Open verse →
बरबस राम सुमंत्रु पठाए। सुरसरि तीर आपु तब आए।।
अर्थ · Hindi
बरबस राम सुमंत्रु पठाए। सुरसरि तीर आपु तब आए।।
- RCM 2.100.3Open verse →
मागी नाव न केवटु आना। कहइ तुम्हार मरमु मैं जाना।।
अर्थ · Hindi
मागी नाव न केवटु आना। कहइ तुम्हार मरमु मैं जाना।।
- RCM 2.100.4Open verse →
चरन कमल रज कहुँ सबु कहई। मानुष करनि मूरि कछु अहई।।
अर्थ · Hindi
चरन कमल रज कहुँ सबु कहई। मानुष करनि मूरि कछु अहई।।
- RCM 2.100.5Open verse →
छुअत सिला भइ नारि सुहाई। पाहन तें न काठ कठिनाई।।
अर्थ · Hindi
छुअत सिला भइ नारि सुहाई। पाहन तें न काठ कठिनाई।।
- RCM 2.100.6Open verse →
तरनिउ मुनि घरिनि होइ जाई। बाट परइ मोरि नाव उड़ाई।।
अर्थ · Hindi
तरनिउ मुनि घरिनि होइ जाई। बाट परइ मोरि नाव उड़ाई।।
- RCM 2.100.7Open verse →
एहिं प्रतिपालउँ सबु परिवारू। नहिं जानउँ कछु अउर कबारू।।
अर्थ · Hindi
एहिं प्रतिपालउँ सबु परिवारू। नहिं जानउँ कछु अउर कबारू।।
- RCM 2.100.8Open verse →
जौ प्रभु पार अवसि गा चहहू। मोहि पद पदुम पखारन कहहू।।
अर्थ · Hindi
जौ प्रभु पार अवसि गा चहहू। मोहि पद पदुम पखारन कहहू।।
- RCM 2.101.1Open verse →
कृपासिंधु बोले मुसुकाई। सोइ करु जेंहि तव नाव न जाई।।
अर्थ · Hindi
कृपासिंधु बोले मुसुकाई। सोइ करु जेंहि तव नाव न जाई।।
- RCM 2.101.2Open verse →
वेगि आनु जल पाय पखारू। होत बिलंबु उतारहि पारू।।
अर्थ · Hindi
वेगि आनु जल पाय पखारू। होत बिलंबु उतारहि पारू।।
- RCM 2.101.3Open verse →
जासु नाम सुमरत एक बारा। उतरहिं नर भवसिंधु अपारा।।
अर्थ · Hindi
जासु नाम सुमरत एक बारा। उतरहिं नर भवसिंधु अपारा।।
- RCM 2.101.4Open verse →
सोइ कृपालु केवटहि निहोरा। जेहिं जगु किय तिहु पगहु ते थोरा।।
अर्थ · Hindi
सोइ कृपालु केवटहि निहोरा। जेहिं जगु किय तिहु पगहु ते थोरा।।
- RCM 2.101.5Open verse →
पद नख निरखि देवसरि हरषी। सुनि प्रभु बचन मोहँ मति करषी।।
अर्थ · Hindi
पद नख निरखि देवसरि हरषी। सुनि प्रभु बचन मोहँ मति करषी।।
- RCM 2.101.6Open verse →
केवट राम रजायसु पावा। पानि कठवता भरि लेइ आवा।।
अर्थ · Hindi
केवट राम रजायसु पावा। पानि कठवता भरि लेइ आवा।।
- RCM 2.101.7Open verse →
अति आनंद उमगि अनुरागा। चरन सरोज पखारन लागा।।
अर्थ · Hindi
अति आनंद उमगि अनुरागा। चरन सरोज पखारन लागा।।
- RCM 2.101.8Open verse →
बरषि सुमन सुर सकल सिहाहीं। एहि सम पुन्यपुंज कोउ नाहीं।।
अर्थ · Hindi
बरषि सुमन सुर सकल सिहाहीं। एहि सम पुन्यपुंज कोउ नाहीं।।
- RCM 2.101.9Open verse →
पद पखारि जलु पान करि आपु सहित परिवार।
अर्थ · Hindi
पद पखारि जलु पान करि आपु सहित परिवार।
- RCM 2.101.10Open verse →
पितर पारु करि प्रभुहि पुनि मुदित गयउ लेइ पार।।101।।
अर्थ · Hindi
पितर पारु करि प्रभुहि पुनि मुदित गयउ लेइ पार।।101।।
- RCM 2.102.1Open verse →
उतरि ठाड़ भए सुरसरि रेता। सीयराम गुह लखन समेता।।
अर्थ · Hindi
उतरि ठाड़ भए सुरसरि रेता। सीयराम गुह लखन समेता।।
- RCM 2.102.2Open verse →
केवट उतरि दंडवत कीन्हा। प्रभुहि सकुच एहि नहिं कछु दीन्हा।।
अर्थ · Hindi
केवट उतरि दंडवत कीन्हा। प्रभुहि सकुच एहि नहिं कछु दीन्हा।।
- RCM 2.102.3Open verse →
पिय हिय की सिय जाननिहारी। मनि मुदरी मन मुदित उतारी।।
अर्थ · Hindi
पिय हिय की सिय जाननिहारी। मनि मुदरी मन मुदित उतारी।।
- RCM 2.102.4Open verse →
कहेउ कृपाल लेहि उतराई। केवट चरन गहे अकुलाई।।
अर्थ · Hindi
कहेउ कृपाल लेहि उतराई। केवट चरन गहे अकुलाई।।
- RCM 2.102.5Open verse →
नाथ आजु मैं काह न पावा। मिटे दोष दुख दारिद दावा।।
अर्थ · Hindi
नाथ आजु मैं काह न पावा। मिटे दोष दुख दारिद दावा।।
- RCM 2.102.6Open verse →
बहुत काल मैं कीन्हि मजूरी। आजु दीन्ह बिधि बनि भलि भूरी।।
अर्थ · Hindi
बहुत काल मैं कीन्हि मजूरी। आजु दीन्ह बिधि बनि भलि भूरी।।
- RCM 2.102.7Open verse →
अब कछु नाथ न चाहिअ मोरें। दीनदयाल अनुग्रह तोरें।।
अर्थ · Hindi
अब कछु नाथ न चाहिअ मोरें। दीनदयाल अनुग्रह तोरें।।
- RCM 2.102.8Open verse →
फिरती बार मोहि जे देबा। सो प्रसादु मैं सिर धरि लेबा।।
अर्थ · Hindi
फिरती बार मोहि जे देबा। सो प्रसादु मैं सिर धरि लेबा।।
- RCM 2.102.9Open verse →
बहुत कीन्ह प्रभु लखन सियँ नहिं कछु केवटु लेइ।
अर्थ · Hindi
बहुत कीन्ह प्रभु लखन सियँ नहिं कछु केवटु लेइ।
- RCM 2.102.10Open verse →
बिदा कीन्ह करुनायतन भगति बिमल बरु देइ।।102।।
अर्थ · Hindi
बिदा कीन्ह करुनायतन भगति बिमल बरु देइ।।102।।
- RCM 2.103.1Open verse →
तब मज्जनु करि रघुकुलनाथा। पूजि पारथिव नायउ माथा।।
अर्थ · Hindi
तब मज्जनु करि रघुकुलनाथा। पूजि पारथिव नायउ माथा।।
- RCM 2.103.2Open verse →
सियँ सुरसरिहि कहेउ कर जोरी। मातु मनोरथ पुरउबि मोरी।।
अर्थ · Hindi
सियँ सुरसरिहि कहेउ कर जोरी। मातु मनोरथ पुरउबि मोरी।।
- RCM 2.103.3Open verse →
पति देवर संग कुसल बहोरी। आइ करौं जेहिं पूजा तोरी।।
अर्थ · Hindi
पति देवर संग कुसल बहोरी। आइ करौं जेहिं पूजा तोरी।।
- RCM 2.103.4Open verse →
सुनि सिय बिनय प्रेम रस सानी। भइ तब बिमल बारि बर बानी।।
अर्थ · Hindi
सुनि सिय बिनय प्रेम रस सानी। भइ तब बिमल बारि बर बानी।।
- RCM 2.103.5Open verse →
सुनु रघुबीर प्रिया बैदेही। तव प्रभाउ जग बिदित न केही।।
अर्थ · Hindi
सुनु रघुबीर प्रिया बैदेही। तव प्रभाउ जग बिदित न केही।।
- RCM 2.103.6Open verse →
लोकप होहिं बिलोकत तोरें। तोहि सेवहिं सब सिधि कर जोरें।।
अर्थ · Hindi
लोकप होहिं बिलोकत तोरें। तोहि सेवहिं सब सिधि कर जोरें।।
- RCM 2.103.7Open verse →
तुम्ह जो हमहि बड़ि बिनय सुनाई। कृपा कीन्हि मोहि दीन्हि बड़ाई।।
अर्थ · Hindi
तुम्ह जो हमहि बड़ि बिनय सुनाई। कृपा कीन्हि मोहि दीन्हि बड़ाई।।
- RCM 2.103.8Open verse →
तदपि देबि मैं देबि असीसा। सफल होपन हित निज बागीसा।।
अर्थ · Hindi
तदपि देबि मैं देबि असीसा। सफल होपन हित निज बागीसा।।
- RCM 2.103.9Open verse →
प्राननाथ देवर सहित कुसल कोसला आइ।
अर्थ · Hindi
प्राननाथ देवर सहित कुसल कोसला आइ।
- RCM 2.103.10Open verse →
पूजहि सब मनकामना सुजसु रहिहि जग छाइ।।103।।
अर्थ · Hindi
पूजहि सब मनकामना सुजसु रहिहि जग छाइ।।103।।
- RCM 2.104.1Open verse →
गंग बचन सुनि मंगल मूला। मुदित सीय सुरसरि अनुकुला।।
अर्थ · Hindi
गंग बचन सुनि मंगल मूला। मुदित सीय सुरसरि अनुकुला।।
- RCM 2.104.2Open verse →
तब प्रभु गुहहि कहेउ घर जाहू। सुनत सूख मुखु भा उर दाहू।।
अर्थ · Hindi
तब प्रभु गुहहि कहेउ घर जाहू। सुनत सूख मुखु भा उर दाहू।।
- RCM 2.104.3Open verse →
दीन बचन गुह कह कर जोरी। बिनय सुनहु रघुकुलमनि मोरी।।
अर्थ · Hindi
दीन बचन गुह कह कर जोरी। बिनय सुनहु रघुकुलमनि मोरी।।
- RCM 2.104.4Open verse →
नाथ साथ रहि पंथु देखाई। करि दिन चारि चरन सेवकाई।।
अर्थ · Hindi
नाथ साथ रहि पंथु देखाई। करि दिन चारि चरन सेवकाई।।
- RCM 2.104.5Open verse →
जेहिं बन जाइ रहब रघुराई। परनकुटी मैं करबि सुहाई।।
अर्थ · Hindi
जेहिं बन जाइ रहब रघुराई। परनकुटी मैं करबि सुहाई।।
- RCM 2.104.6Open verse →
तब मोहि कहँ जसि देब रजाई। सोइ करिहउँ रघुबीर दोहाई।।
अर्थ · Hindi
तब मोहि कहँ जसि देब रजाई। सोइ करिहउँ रघुबीर दोहाई।।
- RCM 2.104.7Open verse →
सहज सनेह राम लखि तासु। संग लीन्ह गुह हृदय हुलासू।।
अर्थ · Hindi
सहज सनेह राम लखि तासु। संग लीन्ह गुह हृदय हुलासू।।
- RCM 2.104.8Open verse →
पुनि गुहँ ग्याति बोलि सब लीन्हे। करि परितोषु बिदा तब कीन्हे।।
अर्थ · Hindi
पुनि गुहँ ग्याति बोलि सब लीन्हे। करि परितोषु बिदा तब कीन्हे।।
- RCM 2.104.9Open verse →
तब गनपति सिव सुमिरि प्रभु नाइ सुरसरिहि माथ।
अर्थ · Hindi
तब गनपति सिव सुमिरि प्रभु नाइ सुरसरिहि माथ।
- RCM 2.104.10Open verse →
सखा अनुज सिया सहित बन गवनु कीन्ह रधुनाथ।।104।।
अर्थ · Hindi
सखा अनुज सिया सहित बन गवनु कीन्ह रधुनाथ।।104।।
- RCM 2.105.1Open verse →
तेहि दिन भयउ बिटप तर बासू। लखन सखाँ सब कीन्ह सुपासू।।
अर्थ · Hindi
तेहि दिन भयउ बिटप तर बासू। लखन सखाँ सब कीन्ह सुपासू।।
- RCM 2.105.2Open verse →
प्रात प्रातकृत करि रधुसाई। तीरथराजु दीख प्रभु जाई।।
अर्थ · Hindi
प्रात प्रातकृत करि रधुसाई। तीरथराजु दीख प्रभु जाई।।
- RCM 2.105.3Open verse →
सचिव सत्य श्रध्दा प्रिय नारी। माधव सरिस मीतु हितकारी।।
अर्थ · Hindi
सचिव सत्य श्रध्दा प्रिय नारी। माधव सरिस मीतु हितकारी।।
- RCM 2.105.4Open verse →
चारि पदारथ भरा भँडारु। पुन्य प्रदेस देस अति चारु।।
अर्थ · Hindi
चारि पदारथ भरा भँडारु। पुन्य प्रदेस देस अति चारु।।
- RCM 2.105.5Open verse →
छेत्र अगम गढ़ु गाढ़ सुहावा। सपनेहुँ नहिं प्रतिपच्छिन्ह पावा।।
अर्थ · Hindi
छेत्र अगम गढ़ु गाढ़ सुहावा। सपनेहुँ नहिं प्रतिपच्छिन्ह पावा।।
- RCM 2.105.6Open verse →
सेन सकल तीरथ बर बीरा। कलुष अनीक दलन रनधीरा।।
अर्थ · Hindi
सेन सकल तीरथ बर बीरा। कलुष अनीक दलन रनधीरा।।
- RCM 2.105.7Open verse →
संगमु सिंहासनु सुठि सोहा। छत्रु अखयबटु मुनि मनु मोहा।।
अर्थ · Hindi
संगमु सिंहासनु सुठि सोहा। छत्रु अखयबटु मुनि मनु मोहा।।
- RCM 2.105.8Open verse →
चवँर जमुन अरु गंग तरंगा। देखि होहिं दुख दारिद भंगा।।
अर्थ · Hindi
चवँर जमुन अरु गंग तरंगा। देखि होहिं दुख दारिद भंगा।।
- RCM 2.105.9Open verse →
सेवहिं सुकृति साधु सुचि पावहिं सब मनकाम।
अर्थ · Hindi
सेवहिं सुकृति साधु सुचि पावहिं सब मनकाम।
- RCM 2.105.10Open verse →
बंदी बेद पुरान गन कहहिं बिमल गुन ग्राम।।105।।
अर्थ · Hindi
बंदी बेद पुरान गन कहहिं बिमल गुन ग्राम।।105।।
- RCM 2.106.1Open verse →
को कहि सकइ प्रयाग प्रभाऊ। कलुष पुंज कुंजर मृगराऊ।।
अर्थ · Hindi
को कहि सकइ प्रयाग प्रभाऊ। कलुष पुंज कुंजर मृगराऊ।।
- RCM 2.106.2Open verse →
अस तीरथपति देखि सुहावा। सुख सागर रघुबर सुखु पावा।।
अर्थ · Hindi
अस तीरथपति देखि सुहावा। सुख सागर रघुबर सुखु पावा।।
- RCM 2.106.3Open verse →
कहि सिय लखनहि सखहि सुनाई। श्रीमुख तीरथराज बड़ाई।।
अर्थ · Hindi
कहि सिय लखनहि सखहि सुनाई। श्रीमुख तीरथराज बड़ाई।।
- RCM 2.106.4Open verse →
करि प्रनामु देखत बन बागा। कहत महातम अति अनुरागा।।
अर्थ · Hindi
करि प्रनामु देखत बन बागा। कहत महातम अति अनुरागा।।
- RCM 2.106.5Open verse →
एहि बिधि आइ बिलोकी बेनी। सुमिरत सकल सुमंगल देनी।।
अर्थ · Hindi
एहि बिधि आइ बिलोकी बेनी। सुमिरत सकल सुमंगल देनी।।
- RCM 2.106.6Open verse →
मुदित नहाइ कीन्हि सिव सेवा। पुजि जथाबिधि तीरथ देवा।।
अर्थ · Hindi
मुदित नहाइ कीन्हि सिव सेवा। पुजि जथाबिधि तीरथ देवा।।
- RCM 2.106.7Open verse →
तब प्रभु भरद्वाज पहिं आए। करत दंडवत मुनि उर लाए।।
अर्थ · Hindi
तब प्रभु भरद्वाज पहिं आए। करत दंडवत मुनि उर लाए।।
- RCM 2.106.8Open verse →
मुनि मन मोद न कछु कहि जाइ। ब्रह्मानंद रासि जनु पाई।।
अर्थ · Hindi
मुनि मन मोद न कछु कहि जाइ। ब्रह्मानंद रासि जनु पाई।।
- RCM 2.106.9Open verse →
दीन्हि असीस मुनीस उर अति अनंदु अस जानि।
अर्थ · Hindi
दीन्हि असीस मुनीस उर अति अनंदु अस जानि।
- RCM 2.106.10Open verse →
लोचन गोचर सुकृत फल मनहुँ किए बिधि आनि।।106।।
अर्थ · Hindi
लोचन गोचर सुकृत फल मनहुँ किए बिधि आनि।।106।।
- RCM 2.107.1Open verse →
कुसल प्रस्न करि आसन दीन्हे। पूजि प्रेम परिपूरन कीन्हे।।
अर्थ · Hindi
कुसल प्रस्न करि आसन दीन्हे। पूजि प्रेम परिपूरन कीन्हे।।
- RCM 2.107.2Open verse →
कंद मूल फल अंकुर नीके। दिए आनि मुनि मनहुँ अमी के।।
अर्थ · Hindi
कंद मूल फल अंकुर नीके। दिए आनि मुनि मनहुँ अमी के।।
- RCM 2.107.3Open verse →
सीय लखन जन सहित सुहाए। अति रुचि राम मूल फल खाए।।
अर्थ · Hindi
सीय लखन जन सहित सुहाए। अति रुचि राम मूल फल खाए।।
- RCM 2.107.4Open verse →
भए बिगतश्रम रामु सुखारे। भरव्दाज मृदु बचन उचारे।।
अर्थ · Hindi
भए बिगतश्रम रामु सुखारे। भरव्दाज मृदु बचन उचारे।।
- RCM 2.107.5Open verse →
आजु सुफल तपु तीरथ त्यागू। आजु सुफल जप जोग बिरागू।।
अर्थ · Hindi
आजु सुफल तपु तीरथ त्यागू। आजु सुफल जप जोग बिरागू।।
- RCM 2.107.6Open verse →
सफल सकल सुभ साधन साजू। राम तुम्हहि अवलोकत आजू।।
अर्थ · Hindi
सफल सकल सुभ साधन साजू। राम तुम्हहि अवलोकत आजू।।
- RCM 2.107.7Open verse →
लाभ अवधि सुख अवधि न दूजी। तुम्हारें दरस आस सब पूजी।।
अर्थ · Hindi
लाभ अवधि सुख अवधि न दूजी। तुम्हारें दरस आस सब पूजी।।
- RCM 2.107.8Open verse →
अब करि कृपा देहु बर एहू। निज पद सरसिज सहज सनेहू।।
अर्थ · Hindi
अब करि कृपा देहु बर एहू। निज पद सरसिज सहज सनेहू।।
- RCM 2.107.9Open verse →
करम बचन मन छाड़ि छलु जब लगि जनु न तुम्हार।
अर्थ · Hindi
करम बचन मन छाड़ि छलु जब लगि जनु न तुम्हार।
- RCM 2.107.10Open verse →
तब लगि सुखु सपनेहुँ नहीं किएँ कोटि उपचार।।
अर्थ · Hindi
तब लगि सुखु सपनेहुँ नहीं किएँ कोटि उपचार।।
- RCM 2.108.1Open verse →
सुनि मुनि बचन रामु सकुचाने। भाव भगति आनंद अघाने।।
अर्थ · Hindi
सुनि मुनि बचन रामु सकुचाने। भाव भगति आनंद अघाने।।
- RCM 2.108.2Open verse →
तब रघुबर मुनि सुजसु सुहावा। कोटि भाँति कहि सबहि सुनावा।।
अर्थ · Hindi
तब रघुबर मुनि सुजसु सुहावा। कोटि भाँति कहि सबहि सुनावा।।
- RCM 2.108.3Open verse →
सो बड सो सब गुन गन गेहू। जेहि मुनीस तुम्ह आदर देहू।।
अर्थ · Hindi
सो बड सो सब गुन गन गेहू। जेहि मुनीस तुम्ह आदर देहू।।
- RCM 2.108.4Open verse →
मुनि रघुबीर परसपर नवहीं। बचन अगोचर सुखु अनुभवहीं।।
अर्थ · Hindi
मुनि रघुबीर परसपर नवहीं। बचन अगोचर सुखु अनुभवहीं।।
- RCM 2.108.5Open verse →
यह सुधि पाइ प्रयाग निवासी। बटु तापस मुनि सिद्ध उदासी।।
अर्थ · Hindi
यह सुधि पाइ प्रयाग निवासी। बटु तापस मुनि सिद्ध उदासी।।
- RCM 2.108.6Open verse →
भरद्वाज आश्रम सब आए। देखन दसरथ सुअन सुहाए।।
अर्थ · Hindi
भरद्वाज आश्रम सब आए। देखन दसरथ सुअन सुहाए।।
- RCM 2.108.7Open verse →
राम प्रनाम कीन्ह सब काहू। मुदित भए लहि लोयन लाहू।।
अर्थ · Hindi
राम प्रनाम कीन्ह सब काहू। मुदित भए लहि लोयन लाहू।।
- RCM 2.108.8Open verse →
देहिं असीस परम सुखु पाई। फिरे सराहत सुंदरताई।।
अर्थ · Hindi
देहिं असीस परम सुखु पाई। फिरे सराहत सुंदरताई।।
- RCM 2.108.9Open verse →
राम कीन्ह बिश्राम निसि प्रात प्रयाग नहाइ।
अर्थ · Hindi
राम कीन्ह बिश्राम निसि प्रात प्रयाग नहाइ।
- RCM 2.108.10Open verse →
चले सहित सिय लखन जन मुददित मुनिहि सिरु नाइ।।108।।
अर्थ · Hindi
चले सहित सिय लखन जन मुददित मुनिहि सिरु नाइ।।108।।
- RCM 2.109.1Open verse →
राम सप्रेम कहेउ मुनि पाहीं। नाथ कहिअ हम केहि मग जाहीं।।
अर्थ · Hindi
राम सप्रेम कहेउ मुनि पाहीं। नाथ कहिअ हम केहि मग जाहीं।।
- RCM 2.109.2Open verse →
मुनि मन बिहसि राम सन कहहीं। सुगम सकल मग तुम्ह कहुँ अहहीं।।
अर्थ · Hindi
मुनि मन बिहसि राम सन कहहीं। सुगम सकल मग तुम्ह कहुँ अहहीं।।
- RCM 2.109.3Open verse →
साथ लागि मुनि सिष्य बोलाए। सुनि मन मुदित पचासक आए।।
अर्थ · Hindi
साथ लागि मुनि सिष्य बोलाए। सुनि मन मुदित पचासक आए।।
- RCM 2.109.4Open verse →
सबन्हि राम पर प्रेम अपारा। सकल कहहि मगु दीख हमारा।।
अर्थ · Hindi
सबन्हि राम पर प्रेम अपारा। सकल कहहि मगु दीख हमारा।।
- RCM 2.109.5Open verse →
मुनि बटु चारि संग तब दीन्हे। जिन्ह बहु जनम सुकृत सब कीन्हे।।
अर्थ · Hindi
मुनि बटु चारि संग तब दीन्हे। जिन्ह बहु जनम सुकृत सब कीन्हे।।
- RCM 2.109.6Open verse →
करि प्रनामु रिषि आयसु पाई। प्रमुदित हृदयँ चले रघुराई।।
अर्थ · Hindi
करि प्रनामु रिषि आयसु पाई। प्रमुदित हृदयँ चले रघुराई।।
- RCM 2.109.7Open verse →
ग्राम निकट जब निकसहि जाई। देखहि दरसु नारि नर धाई।।
अर्थ · Hindi
ग्राम निकट जब निकसहि जाई। देखहि दरसु नारि नर धाई।।
- RCM 2.109.8Open verse →
होहि सनाथ जनम फलु पाई। फिरहि दुखित मनु संग पठाई।।
अर्थ · Hindi
होहि सनाथ जनम फलु पाई। फिरहि दुखित मनु संग पठाई।।
- RCM 2.109.9Open verse →
बिदा किए बटु बिनय करि फिरे पाइ मन काम।
अर्थ · Hindi
बिदा किए बटु बिनय करि फिरे पाइ मन काम।
- RCM 2.109.10Open verse →
उतरि नहाए जमुन जल जो सरीर सम स्याम।।109।।
अर्थ · Hindi
उतरि नहाए जमुन जल जो सरीर सम स्याम।।109।।
- RCM 2.110.1Open verse →
सुनत तीरवासी नर नारी। धाए निज निज काज बिसारी।।
अर्थ · Hindi
सुनत तीरवासी नर नारी। धाए निज निज काज बिसारी।।
- RCM 2.110.2Open verse →
लखन राम सिय सुन्दरताई। देखि करहिं निज भाग्य बड़ाई।।
अर्थ · Hindi
लखन राम सिय सुन्दरताई। देखि करहिं निज भाग्य बड़ाई।।
- RCM 2.110.3Open verse →
अति लालसा बसहिं मन माहीं। नाउँ गाउँ बूझत सकुचाहीं।।
अर्थ · Hindi
अति लालसा बसहिं मन माहीं। नाउँ गाउँ बूझत सकुचाहीं।।
- RCM 2.110.4Open verse →
जे तिन्ह महुँ बयबिरिध सयाने। तिन्ह करि जुगुति रामु पहिचाने।।
अर्थ · Hindi
जे तिन्ह महुँ बयबिरिध सयाने। तिन्ह करि जुगुति रामु पहिचाने।।
- RCM 2.110.5Open verse →
सकल कथा तिन्ह सबहि सुनाई। बनहि चले पितु आयसु पाई।।
अर्थ · Hindi
सकल कथा तिन्ह सबहि सुनाई। बनहि चले पितु आयसु पाई।।
- RCM 2.110.6Open verse →
सुनि सबिषाद सकल पछिताहीं। रानी रायँ कीन्ह भल नाहीं।।
अर्थ · Hindi
सुनि सबिषाद सकल पछिताहीं। रानी रायँ कीन्ह भल नाहीं।।
- RCM 2.110.7Open verse →
तेहि अवसर एक तापसु आवा। तेजपुंज लघुबयस सुहावा।।
अर्थ · Hindi
तेहि अवसर एक तापसु आवा। तेजपुंज लघुबयस सुहावा।।
- RCM 2.110.8Open verse →
कवि अलखित गति बेषु बिरागी। मन क्रम बचन राम अनुरागी।।
अर्थ · Hindi
कवि अलखित गति बेषु बिरागी। मन क्रम बचन राम अनुरागी।।
- RCM 2.110.9Open verse →
सजल नयन तन पुलकि निज इष्टदेउ पहिचानि।
अर्थ · Hindi
सजल नयन तन पुलकि निज इष्टदेउ पहिचानि।
- RCM 2.110.10Open verse →
परेउ दंड जिमि धरनितल दसा न जाइ बखानि।।110।।
अर्थ · Hindi
परेउ दंड जिमि धरनितल दसा न जाइ बखानि।।110।।
- RCM 2.111.1Open verse →
राम सप्रेम पुलकि उर लावा। परम रंक जनु पारसु पावा।।
अर्थ · Hindi
राम सप्रेम पुलकि उर लावा। परम रंक जनु पारसु पावा।।
- RCM 2.111.2Open verse →
मनहुँ प्रेमु परमारथु दोऊ। मिलत धरे तन कह सबु कोऊ।।
अर्थ · Hindi
मनहुँ प्रेमु परमारथु दोऊ। मिलत धरे तन कह सबु कोऊ।।
- RCM 2.111.3Open verse →
बहुरि लखन पायन्ह सोइ लागा। लीन्ह उठाइ उमगि अनुरागा।।
अर्थ · Hindi
बहुरि लखन पायन्ह सोइ लागा। लीन्ह उठाइ उमगि अनुरागा।।
- RCM 2.111.4Open verse →
पुनि सिय चरन धूरि धरि सीसा। जननि जानि सिसु दीन्हि असीसा।।
अर्थ · Hindi
पुनि सिय चरन धूरि धरि सीसा। जननि जानि सिसु दीन्हि असीसा।।
- RCM 2.111.5Open verse →
कीन्ह निषाद दंडवत तेही। मिलेउ मुदित लखि राम सनेही।।
अर्थ · Hindi
कीन्ह निषाद दंडवत तेही। मिलेउ मुदित लखि राम सनेही।।
- RCM 2.111.6Open verse →
पिअत नयन पुट रूपु पियूषा। मुदित सुअसनु पाइ जिमि भूखा।।
अर्थ · Hindi
पिअत नयन पुट रूपु पियूषा। मुदित सुअसनु पाइ जिमि भूखा।।
- RCM 2.111.7Open verse →
ते पितु मातु कहहु सखि कैसे। जिन्ह पठए बन बालक ऐसे।।
अर्थ · Hindi
ते पितु मातु कहहु सखि कैसे। जिन्ह पठए बन बालक ऐसे।।
- RCM 2.111.8Open verse →
राम लखन सिय रूपु निहारी। होहिं सनेह बिकल नर नारी।।
अर्थ · Hindi
राम लखन सिय रूपु निहारी। होहिं सनेह बिकल नर नारी।।
- RCM 2.111.9Open verse →
तब रघुबीर अनेक बिधि सखहि सिखावनु दीन्ह।
अर्थ · Hindi
तब रघुबीर अनेक बिधि सखहि सिखावनु दीन्ह।
- RCM 2.111.10Open verse →
राम रजायसु सीस धरि भवन गवनु तेंइँ कीन्ह।।111।।
अर्थ · Hindi
राम रजायसु सीस धरि भवन गवनु तेंइँ कीन्ह।।111।।
- RCM 2.112.1Open verse →
पुनि सियँ राम लखन कर जोरी। जमुनहि कीन्ह प्रनामु बहोरी।।
अर्थ · Hindi
पुनि सियँ राम लखन कर जोरी। जमुनहि कीन्ह प्रनामु बहोरी।।
- RCM 2.112.2Open verse →
चले ससीय मुदित दोउ भाई। रबितनुजा कइ करत बड़ाई।।
अर्थ · Hindi
चले ससीय मुदित दोउ भाई। रबितनुजा कइ करत बड़ाई।।
- RCM 2.112.3Open verse →
पथिक अनेक मिलहिं मग जाता। कहहिं सप्रेम देखि दोउ भ्राता।।
अर्थ · Hindi
पथिक अनेक मिलहिं मग जाता। कहहिं सप्रेम देखि दोउ भ्राता।।
- RCM 2.112.4Open verse →
राज लखन सब अंग तुम्हारें। देखि सोचु अति हृदय हमारें।।
अर्थ · Hindi
राज लखन सब अंग तुम्हारें। देखि सोचु अति हृदय हमारें।।
- RCM 2.112.5Open verse →
मारग चलहु पयादेहि पाएँ। ज्योतिषु झूठ हमारें भाएँ।।
अर्थ · Hindi
मारग चलहु पयादेहि पाएँ। ज्योतिषु झूठ हमारें भाएँ।।
- RCM 2.112.6Open verse →
अगमु पंथ गिरि कानन भारी। तेहि महँ साथ नारि सुकुमारी।।
अर्थ · Hindi
अगमु पंथ गिरि कानन भारी। तेहि महँ साथ नारि सुकुमारी।।
- RCM 2.112.7Open verse →
करि केहरि बन जाइ न जोई। हम सँग चलहि जो आयसु होई।।
अर्थ · Hindi
करि केहरि बन जाइ न जोई। हम सँग चलहि जो आयसु होई।।
- RCM 2.112.8Open verse →
जाब जहाँ लगि तहँ पहुँचाई। फिरब बहोरि तुम्हहि सिरु नाई।।
अर्थ · Hindi
जाब जहाँ लगि तहँ पहुँचाई। फिरब बहोरि तुम्हहि सिरु नाई।।
- RCM 2.112.9Open verse →
एहि बिधि पूँछहिं प्रेम बस पुलक गात जलु नैन।
अर्थ · Hindi
एहि बिधि पूँछहिं प्रेम बस पुलक गात जलु नैन।
- RCM 2.112.10Open verse →
कृपासिंधु फेरहि तिन्हहि कहि बिनीत मृदु बैन।।112।।
अर्थ · Hindi
कृपासिंधु फेरहि तिन्हहि कहि बिनीत मृदु बैन।।112।।
- RCM 2.113.1Open verse →
जे पुर गाँव बसहिं मग माहीं। तिन्हहि नाग सुर नगर सिहाहीं।।
अर्थ · Hindi
जे पुर गाँव बसहिं मग माहीं। तिन्हहि नाग सुर नगर सिहाहीं।।
- RCM 2.113.2Open verse →
केहि सुकृतीं केहि घरीं बसाए। धन्य पुन्यमय परम सुहाए।।
अर्थ · Hindi
केहि सुकृतीं केहि घरीं बसाए। धन्य पुन्यमय परम सुहाए।।
- RCM 2.113.3Open verse →
जहँ जहँ राम चरन चलि जाहीं। तिन्ह समान अमरावति नाहीं।।
अर्थ · Hindi
जहँ जहँ राम चरन चलि जाहीं। तिन्ह समान अमरावति नाहीं।।
- RCM 2.113.4Open verse →
पुन्यपुंज मग निकट निवासी। तिन्हहि सराहहिं सुरपुरबासी।।
अर्थ · Hindi
पुन्यपुंज मग निकट निवासी। तिन्हहि सराहहिं सुरपुरबासी।।
- RCM 2.113.5Open verse →
जे भरि नयन बिलोकहिं रामहि। सीता लखन सहित घनस्यामहि।।
अर्थ · Hindi
जे भरि नयन बिलोकहिं रामहि। सीता लखन सहित घनस्यामहि।।
- RCM 2.113.6Open verse →
जे सर सरित राम अवगाहहिं। तिन्हहि देव सर सरित सराहहिं।।
अर्थ · Hindi
जे सर सरित राम अवगाहहिं। तिन्हहि देव सर सरित सराहहिं।।
- RCM 2.113.7Open verse →
जेहि तरु तर प्रभु बैठहिं जाई। करहिं कलपतरु तासु बड़ाई।।
अर्थ · Hindi
जेहि तरु तर प्रभु बैठहिं जाई। करहिं कलपतरु तासु बड़ाई।।
- RCM 2.113.8Open verse →
परसि राम पद पदुम परागा। मानति भूमि भूरि निज भागा।।
अर्थ · Hindi
परसि राम पद पदुम परागा। मानति भूमि भूरि निज भागा।।
- RCM 2.113.9Open verse →
छाँह करहि घन बिबुधगन बरषहि सुमन सिहाहिं।
अर्थ · Hindi
छाँह करहि घन बिबुधगन बरषहि सुमन सिहाहिं।
- RCM 2.113.10Open verse →
देखत गिरि बन बिहग मृग रामु चले मग जाहिं।।113।।
अर्थ · Hindi
देखत गिरि बन बिहग मृग रामु चले मग जाहिं।।113।।
- RCM 2.114.1Open verse →
सीता लखन सहित रघुराई। गाँव निकट जब निकसहिं जाई।।
अर्थ · Hindi
सीता लखन सहित रघुराई। गाँव निकट जब निकसहिं जाई।।
- RCM 2.114.2Open verse →
सुनि सब बाल बृद्ध नर नारी। चलहिं तुरत गृहकाजु बिसारी।।
अर्थ · Hindi
सुनि सब बाल बृद्ध नर नारी। चलहिं तुरत गृहकाजु बिसारी।।
- RCM 2.114.3Open verse →
राम लखन सिय रूप निहारी। पाइ नयनफलु होहिं सुखारी।।
अर्थ · Hindi
राम लखन सिय रूप निहारी। पाइ नयनफलु होहिं सुखारी।।
- RCM 2.114.4Open verse →
सजल बिलोचन पुलक सरीरा। सब भए मगन देखि दोउ बीरा।।
अर्थ · Hindi
सजल बिलोचन पुलक सरीरा। सब भए मगन देखि दोउ बीरा।।
- RCM 2.114.5Open verse →
बरनि न जाइ दसा तिन्ह केरी। लहि जनु रंकन्ह सुरमनि ढेरी।।
अर्थ · Hindi
बरनि न जाइ दसा तिन्ह केरी। लहि जनु रंकन्ह सुरमनि ढेरी।।
- RCM 2.114.6Open verse →
एकन्ह एक बोलि सिख देहीं। लोचन लाहु लेहु छन एहीं।।
अर्थ · Hindi
एकन्ह एक बोलि सिख देहीं। लोचन लाहु लेहु छन एहीं।।
- RCM 2.114.7Open verse →
रामहि देखि एक अनुरागे। चितवत चले जाहिं सँग लागे।।
अर्थ · Hindi
रामहि देखि एक अनुरागे। चितवत चले जाहिं सँग लागे।।
- RCM 2.114.8Open verse →
एक नयन मग छबि उर आनी। होहिं सिथिल तन मन बर बानी।।
अर्थ · Hindi
एक नयन मग छबि उर आनी। होहिं सिथिल तन मन बर बानी।।
- RCM 2.114.9Open verse →
एक देखिं बट छाँह भलि डासि मृदुल तृन पात।
अर्थ · Hindi
एक देखिं बट छाँह भलि डासि मृदुल तृन पात।
- RCM 2.114.10Open verse →
कहहिं गवाँइअ छिनुकु श्रमु गवनब अबहिं कि प्रात।।114।।
अर्थ · Hindi
कहहिं गवाँइअ छिनुकु श्रमु गवनब अबहिं कि प्रात।।114।।
- RCM 2.115.1Open verse →
एक कलस भरि आनहिं पानी। अँचइअ नाथ कहहिं मृदु बानी।।
अर्थ · Hindi
एक कलस भरि आनहिं पानी। अँचइअ नाथ कहहिं मृदु बानी।।
- RCM 2.115.2Open verse →
सुनि प्रिय बचन प्रीति अति देखी। राम कृपाल सुसील बिसेषी।।
अर्थ · Hindi
सुनि प्रिय बचन प्रीति अति देखी। राम कृपाल सुसील बिसेषी।।
- RCM 2.115.3Open verse →
जानी श्रमित सीय मन माहीं। घरिक बिलंबु कीन्ह बट छाहीं।।
अर्थ · Hindi
जानी श्रमित सीय मन माहीं। घरिक बिलंबु कीन्ह बट छाहीं।।
- RCM 2.115.4Open verse →
मुदित नारि नर देखहिं सोभा। रूप अनूप नयन मनु लोभा।।
अर्थ · Hindi
मुदित नारि नर देखहिं सोभा। रूप अनूप नयन मनु लोभा।।
- RCM 2.115.5Open verse →
एकटक सब सोहहिं चहुँ ओरा। रामचंद्र मुख चंद चकोरा।।
अर्थ · Hindi
एकटक सब सोहहिं चहुँ ओरा। रामचंद्र मुख चंद चकोरा।।
- RCM 2.115.6Open verse →
तरुन तमाल बरन तनु सोहा। देखत कोटि मदन मनु मोहा।।
अर्थ · Hindi
तरुन तमाल बरन तनु सोहा। देखत कोटि मदन मनु मोहा।।
- RCM 2.115.7Open verse →
दामिनि बरन लखन सुठि नीके। नख सिख सुभग भावते जी के।।
अर्थ · Hindi
दामिनि बरन लखन सुठि नीके। नख सिख सुभग भावते जी के।।
- RCM 2.115.8Open verse →
मुनिपट कटिन्ह कसें तूनीरा। सोहहिं कर कमलिनि धनु तीरा।।
अर्थ · Hindi
मुनिपट कटिन्ह कसें तूनीरा। सोहहिं कर कमलिनि धनु तीरा।।
- RCM 2.115.9Open verse →
जटा मुकुट सीसनि सुभग उर भुज नयन बिसाल।
अर्थ · Hindi
जटा मुकुट सीसनि सुभग उर भुज नयन बिसाल।
- RCM 2.115.10Open verse →
सरद परब बिधु बदन बर लसत स्वेद कन जाल।।115।।
अर्थ · Hindi
सरद परब बिधु बदन बर लसत स्वेद कन जाल।।115।।
- RCM 2.116.1Open verse →
बरनि न जाइ मनोहर जोरी। सोभा बहुत थोरि मति मोरी।।
अर्थ · Hindi
बरनि न जाइ मनोहर जोरी। सोभा बहुत थोरि मति मोरी।।
- RCM 2.116.2Open verse →
राम लखन सिय सुंदरताई। सब चितवहिं चित मन मति लाई।।
अर्थ · Hindi
राम लखन सिय सुंदरताई। सब चितवहिं चित मन मति लाई।।
- RCM 2.116.3Open verse →
थके नारि नर प्रेम पिआसे। मनहुँ मृगी मृग देखि दिआ से।।
अर्थ · Hindi
थके नारि नर प्रेम पिआसे। मनहुँ मृगी मृग देखि दिआ से।।
- RCM 2.116.4Open verse →
सीय समीप ग्रामतिय जाहीं। पूँछत अति सनेहँ सकुचाहीं।।
अर्थ · Hindi
सीय समीप ग्रामतिय जाहीं। पूँछत अति सनेहँ सकुचाहीं।।
- RCM 2.116.5Open verse →
बार बार सब लागहिं पाएँ। कहहिं बचन मृदु सरल सुभाएँ।।
अर्थ · Hindi
बार बार सब लागहिं पाएँ। कहहिं बचन मृदु सरल सुभाएँ।।
- RCM 2.116.6Open verse →
राजकुमारि बिनय हम करहीं। तिय सुभायँ कछु पूँछत डरहीं।
अर्थ · Hindi
राजकुमारि बिनय हम करहीं। तिय सुभायँ कछु पूँछत डरहीं।
- RCM 2.116.7Open verse →
स्वामिनि अबिनय छमबि हमारी। बिलगु न मानब जानि गवाँरी।।
अर्थ · Hindi
स्वामिनि अबिनय छमबि हमारी। बिलगु न मानब जानि गवाँरी।।
- RCM 2.116.8Open verse →
राजकुअँर दोउ सहज सलोने। इन्ह तें लही दुति मरकत सोने।।
अर्थ · Hindi
राजकुअँर दोउ सहज सलोने। इन्ह तें लही दुति मरकत सोने।।
- RCM 2.116.9Open verse →
स्यामल गौर किसोर बर सुंदर सुषमा ऐन।
अर्थ · Hindi
स्यामल गौर किसोर बर सुंदर सुषमा ऐन।
- RCM 2.116.10Open verse →
सरद सर्बरीनाथ मुखु सरद सरोरुह नैन।।116।।
अर्थ · Hindi
सरद सर्बरीनाथ मुखु सरद सरोरुह नैन।।116।।
- RCM 2.117.1Open verse →
कोटि मनोज लजावनिहारे। सुमुखि कहहु को आहिं तुम्हारे।।
अर्थ · Hindi
कोटि मनोज लजावनिहारे। सुमुखि कहहु को आहिं तुम्हारे।।
- RCM 2.117.2Open verse →
सुनि सनेहमय मंजुल बानी। सकुची सिय मन महुँ मुसुकानी।।
अर्थ · Hindi
सुनि सनेहमय मंजुल बानी। सकुची सिय मन महुँ मुसुकानी।।
- RCM 2.117.3Open verse →
तिन्हहि बिलोकि बिलोकति धरनी। दुहुँ सकोच सकुचित बरबरनी।।
अर्थ · Hindi
तिन्हहि बिलोकि बिलोकति धरनी। दुहुँ सकोच सकुचित बरबरनी।।
- RCM 2.117.4Open verse →
सकुचि सप्रेम बाल मृग नयनी। बोली मधुर बचन पिकबयनी।।
अर्थ · Hindi
सकुचि सप्रेम बाल मृग नयनी। बोली मधुर बचन पिकबयनी।।
- RCM 2.117.5Open verse →
सहज सुभाय सुभग तन गोरे। नामु लखनु लघु देवर मोरे।।
अर्थ · Hindi
सहज सुभाय सुभग तन गोरे। नामु लखनु लघु देवर मोरे।।
- RCM 2.117.6Open verse →
बहुरि बदनु बिधु अंचल ढाँकी। पिय तन चितइ भौंह करि बाँकी।।
अर्थ · Hindi
बहुरि बदनु बिधु अंचल ढाँकी। पिय तन चितइ भौंह करि बाँकी।।
- RCM 2.117.7Open verse →
खंजन मंजु तिरीछे नयननि। निज पति कहेउ तिन्हहि सियँ सयननि।।
अर्थ · Hindi
खंजन मंजु तिरीछे नयननि। निज पति कहेउ तिन्हहि सियँ सयननि।।
- RCM 2.117.8Open verse →
भइ मुदित सब ग्रामबधूटीं। रंकन्ह राय रासि जनु लूटीं।।
अर्थ · Hindi
भइ मुदित सब ग्रामबधूटीं। रंकन्ह राय रासि जनु लूटीं।।
- RCM 2.117.9Open verse →
अति सप्रेम सिय पायँ परि बहुबिधि देहिं असीस।
अर्थ · Hindi
अति सप्रेम सिय पायँ परि बहुबिधि देहिं असीस।
- RCM 2.117.10Open verse →
सदा सोहागिनि होहु तुम्ह जब लगि महि अहि सीस।।117।।
अर्थ · Hindi
सदा सोहागिनि होहु तुम्ह जब लगि महि अहि सीस।।117।।
- RCM 2.118.1Open verse →
पारबती सम पतिप्रिय होहू। देबि न हम पर छाड़ब छोहू।।
अर्थ · Hindi
पारबती सम पतिप्रिय होहू। देबि न हम पर छाड़ब छोहू।।
- RCM 2.118.2Open verse →
पुनि पुनि बिनय करिअ कर जोरी। जौं एहि मारग फिरिअ बहोरी।।
अर्थ · Hindi
पुनि पुनि बिनय करिअ कर जोरी। जौं एहि मारग फिरिअ बहोरी।।
- RCM 2.118.3Open verse →
दरसनु देब जानि निज दासी। लखीं सीयँ सब प्रेम पिआसी।।
अर्थ · Hindi
दरसनु देब जानि निज दासी। लखीं सीयँ सब प्रेम पिआसी।।
- RCM 2.118.4Open verse →
मधुर बचन कहि कहि परितोषीं। जनु कुमुदिनीं कौमुदीं पोषीं।।
अर्थ · Hindi
मधुर बचन कहि कहि परितोषीं। जनु कुमुदिनीं कौमुदीं पोषीं।।
- RCM 2.118.5Open verse →
तबहिं लखन रघुबर रुख जानी। पूँछेउ मगु लोगन्हि मृदु बानी।।
अर्थ · Hindi
तबहिं लखन रघुबर रुख जानी। पूँछेउ मगु लोगन्हि मृदु बानी।।
- RCM 2.118.6Open verse →
सुनत नारि नर भए दुखारी। पुलकित गात बिलोचन बारी।।
अर्थ · Hindi
सुनत नारि नर भए दुखारी। पुलकित गात बिलोचन बारी।।
- RCM 2.118.7Open verse →
मिटा मोदु मन भए मलीने। बिधि निधि दीन्ह लेत जनु छीने।।
अर्थ · Hindi
मिटा मोदु मन भए मलीने। बिधि निधि दीन्ह लेत जनु छीने।।
- RCM 2.118.8Open verse →
समुझि करम गति धीरजु कीन्हा। सोधि सुगम मगु तिन्ह कहि दीन्हा।।
अर्थ · Hindi
समुझि करम गति धीरजु कीन्हा। सोधि सुगम मगु तिन्ह कहि दीन्हा।।
- RCM 2.118.9Open verse →
लखन जानकी सहित तब गवनु कीन्ह रघुनाथ।
अर्थ · Hindi
लखन जानकी सहित तब गवनु कीन्ह रघुनाथ।
- RCM 2.118.10Open verse →
फेरे सब प्रिय बचन कहि लिए लाइ मन साथ।।118।।
अर्थ · Hindi
फेरे सब प्रिय बचन कहि लिए लाइ मन साथ।।118।।
- RCM 2.119.1Open verse →
फिरत नारि नर अति पछिताहीं। देअहि दोषु देहिं मन माहीं।।
अर्थ · Hindi
फिरत नारि नर अति पछिताहीं। देअहि दोषु देहिं मन माहीं।।
- RCM 2.119.2Open verse →
सहित बिषाद परसपर कहहीं। बिधि करतब उलटे सब अहहीं।।
अर्थ · Hindi
सहित बिषाद परसपर कहहीं। बिधि करतब उलटे सब अहहीं।।
- RCM 2.119.3Open verse →
निपट निरंकुस निठुर निसंकू। जेहिं ससि कीन्ह सरुज सकलंकू।।
अर्थ · Hindi
निपट निरंकुस निठुर निसंकू। जेहिं ससि कीन्ह सरुज सकलंकू।।
- RCM 2.119.4Open verse →
रूख कलपतरु सागरु खारा। तेहिं पठए बन राजकुमारा।।
अर्थ · Hindi
रूख कलपतरु सागरु खारा। तेहिं पठए बन राजकुमारा।।
- RCM 2.119.5Open verse →
जौं पे इन्हहि दीन्ह बनबासू। कीन्ह बादि बिधि भोग बिलासू।।
अर्थ · Hindi
जौं पे इन्हहि दीन्ह बनबासू। कीन्ह बादि बिधि भोग बिलासू।।
- RCM 2.119.6Open verse →
ए बिचरहिं मग बिनु पदत्राना। रचे बादि बिधि बाहन नाना।।
अर्थ · Hindi
ए बिचरहिं मग बिनु पदत्राना। रचे बादि बिधि बाहन नाना।।
- RCM 2.119.7Open verse →
ए महि परहिं डासि कुस पाता। सुभग सेज कत सृजत बिधाता।।
अर्थ · Hindi
ए महि परहिं डासि कुस पाता। सुभग सेज कत सृजत बिधाता।।
- RCM 2.119.8Open verse →
तरुबर बास इन्हहि बिधि दीन्हा। धवल धाम रचि रचि श्रमु कीन्हा।।
अर्थ · Hindi
तरुबर बास इन्हहि बिधि दीन्हा। धवल धाम रचि रचि श्रमु कीन्हा।।
- RCM 2.120.1Open verse →
जौं ए कंद मूल फल खाहीं। बादि सुधादि असन जग माहीं।।
अर्थ · Hindi
जौं ए कंद मूल फल खाहीं। बादि सुधादि असन जग माहीं।।
- RCM 2.120.2Open verse →
एक कहहिं ए सहज सुहाए। आपु प्रगट भए बिधि न बनाए।।
अर्थ · Hindi
एक कहहिं ए सहज सुहाए। आपु प्रगट भए बिधि न बनाए।।
- RCM 2.120.3Open verse →
जहँ लगि बेद कही बिधि करनी। श्रवन नयन मन गोचर बरनी।।
अर्थ · Hindi
जहँ लगि बेद कही बिधि करनी। श्रवन नयन मन गोचर बरनी।।
- RCM 2.120.4Open verse →
देखहु खोजि भुअन दस चारी। कहँ अस पुरुष कहाँ असि नारी।।
अर्थ · Hindi
देखहु खोजि भुअन दस चारी। कहँ अस पुरुष कहाँ असि नारी।।
- RCM 2.120.5Open verse →
इन्हहि देखि बिधि मनु अनुरागा। पटतर जोग बनावै लागा।।
अर्थ · Hindi
इन्हहि देखि बिधि मनु अनुरागा। पटतर जोग बनावै लागा।।
- RCM 2.120.6Open verse →
कीन्ह बहुत श्रम ऐक न आए। तेहिं इरिषा बन आनि दुराए।।
अर्थ · Hindi
कीन्ह बहुत श्रम ऐक न आए। तेहिं इरिषा बन आनि दुराए।।
- RCM 2.120.7Open verse →
एक कहहिं हम बहुत न जानहिं। आपुहि परम धन्य करि मानहिं।।
अर्थ · Hindi
एक कहहिं हम बहुत न जानहिं। आपुहि परम धन्य करि मानहिं।।
- RCM 2.120.8Open verse →
ते पुनि पुन्यपुंज हम लेखे। जे देखहिं देखिहहिं जिन्ह देखे।।
अर्थ · Hindi
ते पुनि पुन्यपुंज हम लेखे। जे देखहिं देखिहहिं जिन्ह देखे।।
- RCM 2.120.9Open verse →
एहि बिधि कहि कहि बचन प्रिय लेहिं नयन भरि नीर।
अर्थ · Hindi
एहि बिधि कहि कहि बचन प्रिय लेहिं नयन भरि नीर।
- RCM 2.120.10Open verse →
किमि चलिहहि मारग अगम सुठि सुकुमार सरीर।।120।।
अर्थ · Hindi
किमि चलिहहि मारग अगम सुठि सुकुमार सरीर।।120।।
- RCM 2.121.1Open verse →
नारि सनेह बिकल बस होहीं। चकई साँझ समय जनु सोहीं।।
अर्थ · Hindi
नारि सनेह बिकल बस होहीं। चकई साँझ समय जनु सोहीं।।
- RCM 2.121.2Open verse →
मृदु पद कमल कठिन मगु जानी। गहबरि हृदयँ कहहिं बर बानी।।
अर्थ · Hindi
मृदु पद कमल कठिन मगु जानी। गहबरि हृदयँ कहहिं बर बानी।।
- RCM 2.121.3Open verse →
परसत मृदुल चरन अरुनारे। सकुचति महि जिमि हृदय हमारे।।
अर्थ · Hindi
परसत मृदुल चरन अरुनारे। सकुचति महि जिमि हृदय हमारे।।
- RCM 2.121.4Open verse →
जौं जगदीस इन्हहि बनु दीन्हा। कस न सुमनमय मारगु कीन्हा।।
अर्थ · Hindi
जौं जगदीस इन्हहि बनु दीन्हा। कस न सुमनमय मारगु कीन्हा।।
- RCM 2.121.5Open verse →
जौं मागा पाइअ बिधि पाहीं। ए रखिअहिं सखि आँखिन्ह माहीं।।
अर्थ · Hindi
जौं मागा पाइअ बिधि पाहीं। ए रखिअहिं सखि आँखिन्ह माहीं।।
- RCM 2.121.6Open verse →
जे नर नारि न अवसर आए। तिन्ह सिय रामु न देखन पाए।।
अर्थ · Hindi
जे नर नारि न अवसर आए। तिन्ह सिय रामु न देखन पाए।।
- RCM 2.121.7Open verse →
सुनि सुरुप बूझहिं अकुलाई। अब लगि गए कहाँ लगि भाई।।
अर्थ · Hindi
सुनि सुरुप बूझहिं अकुलाई। अब लगि गए कहाँ लगि भाई।।
- RCM 2.121.8Open verse →
समरथ धाइ बिलोकहिं जाई। प्रमुदित फिरहिं जनमफलु पाई।।
अर्थ · Hindi
समरथ धाइ बिलोकहिं जाई। प्रमुदित फिरहिं जनमफलु पाई।।
- RCM 2.121.9Open verse →
अबला बालक बृद्ध जन कर मीजहिं पछिताहिं।।
अर्थ · Hindi
अबला बालक बृद्ध जन कर मीजहिं पछिताहिं।।
- RCM 2.121.10Open verse →
होहिं प्रेमबस लोग इमि रामु जहाँ जहँ जाहिं।।121।।
अर्थ · Hindi
होहिं प्रेमबस लोग इमि रामु जहाँ जहँ जाहिं।।121।।
- RCM 2.122.1Open verse →
गाँव गाँव अस होइ अनंदू। देखि भानुकुल कैरव चंदू।।
अर्थ · Hindi
गाँव गाँव अस होइ अनंदू। देखि भानुकुल कैरव चंदू।।
- RCM 2.122.2Open verse →
जे कछु समाचार सुनि पावहिं। ते नृप रानिहि दोसु लगावहिं।।
अर्थ · Hindi
जे कछु समाचार सुनि पावहिं। ते नृप रानिहि दोसु लगावहिं।।
- RCM 2.122.3Open verse →
कहहिं एक अति भल नरनाहू। दीन्ह हमहि जोइ लोचन लाहू।।
अर्थ · Hindi
कहहिं एक अति भल नरनाहू। दीन्ह हमहि जोइ लोचन लाहू।।
- RCM 2.122.4Open verse →
कहहिं परस्पर लोग लोगाईं। बातें सरल सनेह सुहाईं।।
अर्थ · Hindi
कहहिं परस्पर लोग लोगाईं। बातें सरल सनेह सुहाईं।।
- RCM 2.122.5Open verse →
ते पितु मातु धन्य जिन्ह जाए। धन्य सो नगरु जहाँ तें आए।।
अर्थ · Hindi
ते पितु मातु धन्य जिन्ह जाए। धन्य सो नगरु जहाँ तें आए।।
- RCM 2.122.6Open verse →
धन्य सो देसु सैलु बन गाऊँ। जहँ जहँ जाहिं धन्य सोइ ठाऊँ।।
अर्थ · Hindi
धन्य सो देसु सैलु बन गाऊँ। जहँ जहँ जाहिं धन्य सोइ ठाऊँ।।
- RCM 2.122.7Open verse →
सुख पायउ बिरंचि रचि तेही। ए जेहि के सब भाँति सनेही।।
अर्थ · Hindi
सुख पायउ बिरंचि रचि तेही। ए जेहि के सब भाँति सनेही।।
- RCM 2.122.8Open verse →
राम लखन पथि कथा सुहाई। रही सकल मग कानन छाई।।
अर्थ · Hindi
राम लखन पथि कथा सुहाई। रही सकल मग कानन छाई।।
- RCM 2.122.9Open verse →
एहि बिधि रघुकुल कमल रबि मग लोगन्ह सुख देत।
अर्थ · Hindi
एहि बिधि रघुकुल कमल रबि मग लोगन्ह सुख देत।
- RCM 2.122.10Open verse →
जाहिं चले देखत बिपिन सिय सौमित्रि समेत।।122।।
अर्थ · Hindi
जाहिं चले देखत बिपिन सिय सौमित्रि समेत।।122।।
- RCM 2.123.1Open verse →
आगे रामु लखनु बने पाछें। तापस बेष बिराजत काछें।।
अर्थ · Hindi
आगे रामु लखनु बने पाछें। तापस बेष बिराजत काछें।।
- RCM 2.123.2Open verse →
उभय बीच सिय सोहति कैसे। ब्रह्म जीव बिच माया जैसे।।
अर्थ · Hindi
उभय बीच सिय सोहति कैसे। ब्रह्म जीव बिच माया जैसे।।
- RCM 2.123.3Open verse →
बहुरि कहउँ छबि जसि मन बसई। जनु मधु मदन मध्य रति लसई।।
अर्थ · Hindi
बहुरि कहउँ छबि जसि मन बसई। जनु मधु मदन मध्य रति लसई।।
- RCM 2.123.4Open verse →
उपमा बहुरि कहउँ जियँ जोही। जनु बुध बिधु बिच रोहिनि सोही।।
अर्थ · Hindi
उपमा बहुरि कहउँ जियँ जोही। जनु बुध बिधु बिच रोहिनि सोही।।
- RCM 2.123.5Open verse →
प्रभु पद रेख बीच बिच सीता। धरति चरन मग चलति सभीता।।
अर्थ · Hindi
प्रभु पद रेख बीच बिच सीता। धरति चरन मग चलति सभीता।।
- RCM 2.123.6Open verse →
सीय राम पद अंक बराएँ। लखन चलहिं मगु दाहिन लाएँ।।
अर्थ · Hindi
सीय राम पद अंक बराएँ। लखन चलहिं मगु दाहिन लाएँ।।
- RCM 2.123.7Open verse →
राम लखन सिय प्रीति सुहाई। बचन अगोचर किमि कहि जाई।।
अर्थ · Hindi
राम लखन सिय प्रीति सुहाई। बचन अगोचर किमि कहि जाई।।
- RCM 2.123.8Open verse →
खग मृग मगन देखि छबि होहीं। लिए चोरि चित राम बटोहीं।।
अर्थ · Hindi
खग मृग मगन देखि छबि होहीं। लिए चोरि चित राम बटोहीं।।
- RCM 2.123.9Open verse →
जिन्ह जिन्ह देखे पथिक प्रिय सिय समेत दोउ भाइ।
अर्थ · Hindi
जिन्ह जिन्ह देखे पथिक प्रिय सिय समेत दोउ भाइ।
- RCM 2.123.10Open verse →
भव मगु अगमु अनंदु तेइ बिनु श्रम रहे सिराइ।।123।।
अर्थ · Hindi
भव मगु अगमु अनंदु तेइ बिनु श्रम रहे सिराइ।।123।।
- RCM 2.124.1Open verse →
अजहुँ जासु उर सपनेहुँ काऊ। बसहुँ लखनु सिय रामु बटाऊ।।
अर्थ · Hindi
अजहुँ जासु उर सपनेहुँ काऊ। बसहुँ लखनु सिय रामु बटाऊ।।
- RCM 2.124.2Open verse →
राम धाम पथ पाइहि सोई। जो पथ पाव कबहुँ मुनि कोई।।
अर्थ · Hindi
राम धाम पथ पाइहि सोई। जो पथ पाव कबहुँ मुनि कोई।।
- RCM 2.124.3Open verse →
तब रघुबीर श्रमित सिय जानी। देखि निकट बटु सीतल पानी।।
अर्थ · Hindi
तब रघुबीर श्रमित सिय जानी। देखि निकट बटु सीतल पानी।।
- RCM 2.124.4Open verse →
तहँ बसि कंद मूल फल खाई। प्रात नहाइ चले रघुराई।।
अर्थ · Hindi
तहँ बसि कंद मूल फल खाई। प्रात नहाइ चले रघुराई।।
- RCM 2.124.5Open verse →
देखत बन सर सैल सुहाए। बालमीकि आश्रम प्रभु आए।।
अर्थ · Hindi
देखत बन सर सैल सुहाए। बालमीकि आश्रम प्रभु आए।।
- RCM 2.124.6Open verse →
राम दीख मुनि बासु सुहावन। सुंदर गिरि काननु जलु पावन।।
अर्थ · Hindi
राम दीख मुनि बासु सुहावन। सुंदर गिरि काननु जलु पावन।।
- RCM 2.124.7Open verse →
सरनि सरोज बिटप बन फूले। गुंजत मंजु मधुप रस भूले।।
अर्थ · Hindi
सरनि सरोज बिटप बन फूले। गुंजत मंजु मधुप रस भूले।।
- RCM 2.124.8Open verse →
खग मृग बिपुल कोलाहल करहीं। बिरहित बैर मुदित मन चरहीं।।
अर्थ · Hindi
खग मृग बिपुल कोलाहल करहीं। बिरहित बैर मुदित मन चरहीं।।
- RCM 2.124.9Open verse →
सुचि सुंदर आश्रमु निरखि हरषे राजिवनेन।
अर्थ · Hindi
सुचि सुंदर आश्रमु निरखि हरषे राजिवनेन।
- RCM 2.124.10Open verse →
सुनि रघुबर आगमनु मुनि आगें आयउ लेन।।124।।
अर्थ · Hindi
सुनि रघुबर आगमनु मुनि आगें आयउ लेन।।124।।
- RCM 2.125.1Open verse →
मुनि कहुँ राम दंडवत कीन्हा। आसिरबादु बिप्रबर दीन्हा।।
अर्थ · Hindi
मुनि कहुँ राम दंडवत कीन्हा। आसिरबादु बिप्रबर दीन्हा।।
- RCM 2.125.2Open verse →
देखि राम छबि नयन जुड़ाने। करि सनमानु आश्रमहिं आने।।
अर्थ · Hindi
देखि राम छबि नयन जुड़ाने। करि सनमानु आश्रमहिं आने।।
- RCM 2.125.3Open verse →
मुनिबर अतिथि प्रानप्रिय पाए। कंद मूल फल मधुर मगाए।।
अर्थ · Hindi
मुनिबर अतिथि प्रानप्रिय पाए। कंद मूल फल मधुर मगाए।।
- RCM 2.125.4Open verse →
सिय सौमित्रि राम फल खाए। तब मुनि आश्रम दिए सुहाए।।
अर्थ · Hindi
सिय सौमित्रि राम फल खाए। तब मुनि आश्रम दिए सुहाए।।
- RCM 2.125.5Open verse →
बालमीकि मन आनँदु भारी। मंगल मूरति नयन निहारी।।
अर्थ · Hindi
बालमीकि मन आनँदु भारी। मंगल मूरति नयन निहारी।।
- RCM 2.125.6Open verse →
तब कर कमल जोरि रघुराई। बोले बचन श्रवन सुखदाई।।
अर्थ · Hindi
तब कर कमल जोरि रघुराई। बोले बचन श्रवन सुखदाई।।
- RCM 2.125.7Open verse →
तुम्ह त्रिकाल दरसी मुनिनाथा। बिस्व बदर जिमि तुम्हरें हाथा।।
अर्थ · Hindi
तुम्ह त्रिकाल दरसी मुनिनाथा। बिस्व बदर जिमि तुम्हरें हाथा।।
- RCM 2.125.8Open verse →
अस कहि प्रभु सब कथा बखानी। जेहि जेहि भाँति दीन्ह बनु रानी।।
अर्थ · Hindi
अस कहि प्रभु सब कथा बखानी। जेहि जेहि भाँति दीन्ह बनु रानी।।
- RCM 2.125.9Open verse →
तात बचन पुनि मातु हित भाइ भरत अस राउ।
अर्थ · Hindi
तात बचन पुनि मातु हित भाइ भरत अस राउ।
- RCM 2.125.10Open verse →
मो कहुँ दरस तुम्हार प्रभु सबु मम पुन्य प्रभाउ।।125।।
अर्थ · Hindi
मो कहुँ दरस तुम्हार प्रभु सबु मम पुन्य प्रभाउ।।125।।
- RCM 2.126.1Open verse →
देखि पाय मुनिराय तुम्हारे। भए सुकृत सब सुफल हमारे।।
अर्थ · Hindi
देखि पाय मुनिराय तुम्हारे। भए सुकृत सब सुफल हमारे।।
- RCM 2.126.2Open verse →
अब जहँ राउर आयसु होई। मुनि उदबेगु न पावै कोई।।
अर्थ · Hindi
अब जहँ राउर आयसु होई। मुनि उदबेगु न पावै कोई।।
- RCM 2.126.3Open verse →
मुनि तापस जिन्ह तें दुखु लहहीं। ते नरेस बिनु पावक दहहीं।।
अर्थ · Hindi
मुनि तापस जिन्ह तें दुखु लहहीं। ते नरेस बिनु पावक दहहीं।।
- RCM 2.126.4Open verse →
मंगल मूल बिप्र परितोषू। दहइ कोटि कुल भूसुर रोषू।।
अर्थ · Hindi
मंगल मूल बिप्र परितोषू। दहइ कोटि कुल भूसुर रोषू।।
- RCM 2.126.5Open verse →
अस जियँ जानि कहिअ सोइ ठाऊँ। सिय सौमित्रि सहित जहँ जाऊँ।।
अर्थ · Hindi
अस जियँ जानि कहिअ सोइ ठाऊँ। सिय सौमित्रि सहित जहँ जाऊँ।।
- RCM 2.126.6Open verse →
तहँ रचि रुचिर परन तृन साला। बासु करौ कछु काल कृपाला।।
अर्थ · Hindi
तहँ रचि रुचिर परन तृन साला। बासु करौ कछु काल कृपाला।।
- RCM 2.126.7Open verse →
सहज सरल सुनि रघुबर बानी। साधु साधु बोले मुनि ग्यानी।।
अर्थ · Hindi
सहज सरल सुनि रघुबर बानी। साधु साधु बोले मुनि ग्यानी।।
- RCM 2.126.8Open verse →
कस न कहहु अस रघुकुलकेतू। तुम्ह पालक संतत श्रुति सेतू।।
अर्थ · Hindi
कस न कहहु अस रघुकुलकेतू। तुम्ह पालक संतत श्रुति सेतू।।
- RCM 2.127.1Open verse →
जगु पेखन तुम्ह देखनिहारे। बिधि हरि संभु नचावनिहारे।।
अर्थ · Hindi
जगु पेखन तुम्ह देखनिहारे। बिधि हरि संभु नचावनिहारे।।
- RCM 2.127.2Open verse →
तेउ न जानहिं मरमु तुम्हारा। औरु तुम्हहि को जाननिहारा।।
अर्थ · Hindi
तेउ न जानहिं मरमु तुम्हारा। औरु तुम्हहि को जाननिहारा।।
- RCM 2.127.3Open verse →
सोइ जानइ जेहि देहु जनाई। जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई।।
अर्थ · Hindi
सोइ जानइ जेहि देहु जनाई। जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई।।
- RCM 2.127.4Open verse →
तुम्हरिहि कृपाँ तुम्हहि रघुनंदन। जानहिं भगत भगत उर चंदन।।
अर्थ · Hindi
तुम्हरिहि कृपाँ तुम्हहि रघुनंदन। जानहिं भगत भगत उर चंदन।।
- RCM 2.127.5Open verse →
चिदानंदमय देह तुम्हारी। बिगत बिकार जान अधिकारी।।
अर्थ · Hindi
चिदानंदमय देह तुम्हारी। बिगत बिकार जान अधिकारी।।
- RCM 2.127.6Open verse →
नर तनु धरेहु संत सुर काजा। कहहु करहु जस प्राकृत राजा।।
अर्थ · Hindi
नर तनु धरेहु संत सुर काजा। कहहु करहु जस प्राकृत राजा।।
- RCM 2.127.7Open verse →
राम देखि सुनि चरित तुम्हारे। जड़ मोहहिं बुध होहिं सुखारे।।
अर्थ · Hindi
राम देखि सुनि चरित तुम्हारे। जड़ मोहहिं बुध होहिं सुखारे।।
- RCM 2.127.8Open verse →
तुम्ह जो कहहु करहु सबु साँचा। जस काछिअ तस चाहिअ नाचा।।
अर्थ · Hindi
तुम्ह जो कहहु करहु सबु साँचा। जस काछिअ तस चाहिअ नाचा।।
- RCM 2.127.9Open verse →
पूँछेहु मोहि कि रहौं कहँ मैं पूँछत सकुचाउँ।
अर्थ · Hindi
पूँछेहु मोहि कि रहौं कहँ मैं पूँछत सकुचाउँ।
- RCM 2.127.10Open verse →
जहँ न होहु तहँ देहु कहि तुम्हहि देखावौं ठाउँ।।127।।
अर्थ · Hindi
जहँ न होहु तहँ देहु कहि तुम्हहि देखावौं ठाउँ।।127।।
- RCM 2.128.1Open verse →
सुनि मुनि बचन प्रेम रस साने। सकुचि राम मन महुँ मुसुकाने।।
अर्थ · Hindi
सुनि मुनि बचन प्रेम रस साने। सकुचि राम मन महुँ मुसुकाने।।
- RCM 2.128.2Open verse →
बालमीकि हँसि कहहिं बहोरी। बानी मधुर अमिअ रस बोरी।।
अर्थ · Hindi
बालमीकि हँसि कहहिं बहोरी। बानी मधुर अमिअ रस बोरी।।
- RCM 2.128.3Open verse →
सुनहु राम अब कहउँ निकेता। जहाँ बसहु सिय लखन समेता।।
अर्थ · Hindi
सुनहु राम अब कहउँ निकेता। जहाँ बसहु सिय लखन समेता।।
- RCM 2.128.4Open verse →
जिन्ह के श्रवन समुद्र समाना। कथा तुम्हारि सुभग सरि नाना।।
अर्थ · Hindi
जिन्ह के श्रवन समुद्र समाना। कथा तुम्हारि सुभग सरि नाना।।
- RCM 2.128.5Open verse →
भरहिं निरंतर होहिं न पूरे। तिन्ह के हिय तुम्ह कहुँ गृह रूरे।।
अर्थ · Hindi
भरहिं निरंतर होहिं न पूरे। तिन्ह के हिय तुम्ह कहुँ गृह रूरे।।
- RCM 2.128.6Open verse →
लोचन चातक जिन्ह करि राखे। रहहिं दरस जलधर अभिलाषे।।
अर्थ · Hindi
लोचन चातक जिन्ह करि राखे। रहहिं दरस जलधर अभिलाषे।।
- RCM 2.128.7Open verse →
निदरहिं सरित सिंधु सर भारी। रूप बिंदु जल होहिं सुखारी।।
अर्थ · Hindi
निदरहिं सरित सिंधु सर भारी। रूप बिंदु जल होहिं सुखारी।।
- RCM 2.128.8Open verse →
तिन्ह के हृदय सदन सुखदायक। बसहु बंधु सिय सह रघुनायक।।
अर्थ · Hindi
तिन्ह के हृदय सदन सुखदायक। बसहु बंधु सिय सह रघुनायक।।
- RCM 2.128.9Open verse →
जसु तुम्हार मानस बिमल हंसिनि जीहा जासु।
अर्थ · Hindi
जसु तुम्हार मानस बिमल हंसिनि जीहा जासु।
- RCM 2.128.10Open verse →
मुकुताहल गुन गन चुनइ राम बसहु हियँ तासु।।128।।
अर्थ · Hindi
मुकुताहल गुन गन चुनइ राम बसहु हियँ तासु।।128।।
- RCM 2.129.1Open verse →
प्रभु प्रसाद सुचि सुभग सुबासा। सादर जासु लहइ नित नासा।।
अर्थ · Hindi
प्रभु प्रसाद सुचि सुभग सुबासा। सादर जासु लहइ नित नासा।।
- RCM 2.129.2Open verse →
तुम्हहि निबेदित भोजन करहीं। प्रभु प्रसाद पट भूषन धरहीं।।
अर्थ · Hindi
तुम्हहि निबेदित भोजन करहीं। प्रभु प्रसाद पट भूषन धरहीं।।
- RCM 2.129.3Open verse →
सीस नवहिं सुर गुरु द्विज देखी। प्रीति सहित करि बिनय बिसेषी।।
अर्थ · Hindi
सीस नवहिं सुर गुरु द्विज देखी। प्रीति सहित करि बिनय बिसेषी।।
- RCM 2.129.4Open verse →
कर नित करहिं राम पद पूजा। राम भरोस हृदयँ नहि दूजा।।
अर्थ · Hindi
कर नित करहिं राम पद पूजा। राम भरोस हृदयँ नहि दूजा।।
- RCM 2.129.5Open verse →
चरन राम तीरथ चलि जाहीं। राम बसहु तिन्ह के मन माहीं।।
अर्थ · Hindi
चरन राम तीरथ चलि जाहीं। राम बसहु तिन्ह के मन माहीं।।
- RCM 2.129.6Open verse →
मंत्रराजु नित जपहिं तुम्हारा। पूजहिं तुम्हहि सहित परिवारा।।
अर्थ · Hindi
मंत्रराजु नित जपहिं तुम्हारा। पूजहिं तुम्हहि सहित परिवारा।।
- RCM 2.129.7Open verse →
तरपन होम करहिं बिधि नाना। बिप्र जेवाँइ देहिं बहु दाना।।
अर्थ · Hindi
तरपन होम करहिं बिधि नाना। बिप्र जेवाँइ देहिं बहु दाना।।
- RCM 2.129.8Open verse →
तुम्ह तें अधिक गुरहि जियँ जानी। सकल भायँ सेवहिं सनमानी।।
अर्थ · Hindi
तुम्ह तें अधिक गुरहि जियँ जानी। सकल भायँ सेवहिं सनमानी।।
- RCM 2.130.1Open verse →
काम कोह मद मान न मोहा। लोभ न छोभ न राग न द्रोहा।।
अर्थ · Hindi
काम कोह मद मान न मोहा। लोभ न छोभ न राग न द्रोहा।।
- RCM 2.130.2Open verse →
जिन्ह कें कपट दंभ नहिं माया। तिन्ह कें हृदय बसहु रघुराया।।
अर्थ · Hindi
जिन्ह कें कपट दंभ नहिं माया। तिन्ह कें हृदय बसहु रघुराया।।
- RCM 2.130.3Open verse →
सब के प्रिय सब के हितकारी। दुख सुख सरिस प्रसंसा गारी।।
अर्थ · Hindi
सब के प्रिय सब के हितकारी। दुख सुख सरिस प्रसंसा गारी।।
- RCM 2.130.4Open verse →
कहहिं सत्य प्रिय बचन बिचारी। जागत सोवत सरन तुम्हारी।।
अर्थ · Hindi
कहहिं सत्य प्रिय बचन बिचारी। जागत सोवत सरन तुम्हारी।।
- RCM 2.130.5Open verse →
तुम्हहि छाड़ि गति दूसरि नाहीं। राम बसहु तिन्ह के मन माहीं।।
अर्थ · Hindi
तुम्हहि छाड़ि गति दूसरि नाहीं। राम बसहु तिन्ह के मन माहीं।।
- RCM 2.130.6Open verse →
जननी सम जानहिं परनारी। धनु पराव बिष तें बिष भारी।।
अर्थ · Hindi
जननी सम जानहिं परनारी। धनु पराव बिष तें बिष भारी।।
- RCM 2.130.7Open verse →
जे हरषहिं पर संपति देखी। दुखित होहिं पर बिपति बिसेषी।।
अर्थ · Hindi
जे हरषहिं पर संपति देखी। दुखित होहिं पर बिपति बिसेषी।।
- RCM 2.130.8Open verse →
जिन्हहि राम तुम्ह प्रानपिआरे। तिन्ह के मन सुभ सदन तुम्हारे।।
अर्थ · Hindi
जिन्हहि राम तुम्ह प्रानपिआरे। तिन्ह के मन सुभ सदन तुम्हारे।।
- RCM 2.130.9Open verse →
स्वामि सखा पितु मातु गुर जिन्ह के सब तुम्ह तात।
अर्थ · Hindi
स्वामि सखा पितु मातु गुर जिन्ह के सब तुम्ह तात।
- RCM 2.130.10Open verse →
मन मंदिर तिन्ह कें बसहु सीय सहित दोउ भ्रात।।130।।
अर्थ · Hindi
मन मंदिर तिन्ह कें बसहु सीय सहित दोउ भ्रात।।130।।
- RCM 2.131.1Open verse →
अवगुन तजि सब के गुन गहहीं। बिप्र धेनु हित संकट सहहीं।।
अर्थ · Hindi
अवगुन तजि सब के गुन गहहीं। बिप्र धेनु हित संकट सहहीं।।
- RCM 2.131.2Open verse →
नीति निपुन जिन्ह कइ जग लीका। घर तुम्हार तिन्ह कर मनु नीका।।
अर्थ · Hindi
नीति निपुन जिन्ह कइ जग लीका। घर तुम्हार तिन्ह कर मनु नीका।।
- RCM 2.131.3Open verse →
गुन तुम्हार समुझइ निज दोसा। जेहि सब भाँति तुम्हार भरोसा।।
अर्थ · Hindi
गुन तुम्हार समुझइ निज दोसा। जेहि सब भाँति तुम्हार भरोसा।।
- RCM 2.131.4Open verse →
राम भगत प्रिय लागहिं जेही। तेहि उर बसहु सहित बैदेही।।
अर्थ · Hindi
राम भगत प्रिय लागहिं जेही। तेहि उर बसहु सहित बैदेही।।
- RCM 2.131.5Open verse →
जाति पाँति धनु धरम बड़ाई। प्रिय परिवार सदन सुखदाई।।
अर्थ · Hindi
जाति पाँति धनु धरम बड़ाई। प्रिय परिवार सदन सुखदाई।।
- RCM 2.131.6Open verse →
सब तजि तुम्हहि रहइ उर लाई। तेहि के हृदयँ रहहु रघुराई।।
अर्थ · Hindi
सब तजि तुम्हहि रहइ उर लाई। तेहि के हृदयँ रहहु रघुराई।।
- RCM 2.131.7Open verse →
सरगु नरकु अपबरगु समाना। जहँ तहँ देख धरें धनु बाना।।
अर्थ · Hindi
सरगु नरकु अपबरगु समाना। जहँ तहँ देख धरें धनु बाना।।
- RCM 2.131.8Open verse →
करम बचन मन राउर चेरा। राम करहु तेहि कें उर डेरा।।
अर्थ · Hindi
करम बचन मन राउर चेरा। राम करहु तेहि कें उर डेरा।।
- RCM 2.131.9Open verse →
जाहि न चाहिअ कबहुँ कछु तुम्ह सन सहज सनेहु।
अर्थ · Hindi
जाहि न चाहिअ कबहुँ कछु तुम्ह सन सहज सनेहु।
- RCM 2.131.10Open verse →
बसहु निरंतर तासु मन सो राउर निज गेहु।।131।।
अर्थ · Hindi
बसहु निरंतर तासु मन सो राउर निज गेहु।।131।।
- RCM 2.132.1Open verse →
एहि बिधि मुनिबर भवन देखाए। बचन सप्रेम राम मन भाए।।
अर्थ · Hindi
एहि बिधि मुनिबर भवन देखाए। बचन सप्रेम राम मन भाए।।
- RCM 2.132.2Open verse →
कह मुनि सुनहु भानुकुलनायक। आश्रम कहउँ समय सुखदायक।।
अर्थ · Hindi
कह मुनि सुनहु भानुकुलनायक। आश्रम कहउँ समय सुखदायक।।
- RCM 2.132.3Open verse →
चित्रकूट गिरि करहु निवासू। तहँ तुम्हार सब भाँति सुपासू।।
अर्थ · Hindi
चित्रकूट गिरि करहु निवासू। तहँ तुम्हार सब भाँति सुपासू।।
- RCM 2.132.4Open verse →
सैलु सुहावन कानन चारू। करि केहरि मृग बिहग बिहारू।।
अर्थ · Hindi
सैलु सुहावन कानन चारू। करि केहरि मृग बिहग बिहारू।।
- RCM 2.132.5Open verse →
नदी पुनीत पुरान बखानी। अत्रिप्रिया निज तपबल आनी।।
अर्थ · Hindi
नदी पुनीत पुरान बखानी। अत्रिप्रिया निज तपबल आनी।।
- RCM 2.132.6Open verse →
सुरसरि धार नाउँ मंदाकिनि। जो सब पातक पोतक डाकिनि।।
अर्थ · Hindi
सुरसरि धार नाउँ मंदाकिनि। जो सब पातक पोतक डाकिनि।।
- RCM 2.132.7Open verse →
अत्रि आदि मुनिबर बहु बसहीं। करहिं जोग जप तप तन कसहीं।।
अर्थ · Hindi
अत्रि आदि मुनिबर बहु बसहीं। करहिं जोग जप तप तन कसहीं।।
- RCM 2.132.8Open verse →
चलहु सफल श्रम सब कर करहू। राम देहु गौरव गिरिबरहू।।
अर्थ · Hindi
चलहु सफल श्रम सब कर करहू। राम देहु गौरव गिरिबरहू।।
- RCM 2.132.9Open verse →
चित्रकूट महिमा अमित कहीं महामुनि गाइ।
अर्थ · Hindi
चित्रकूट महिमा अमित कहीं महामुनि गाइ।
- RCM 2.132.10Open verse →
आए नहाए सरित बर सिय समेत दोउ भाइ।।132।।
अर्थ · Hindi
आए नहाए सरित बर सिय समेत दोउ भाइ।।132।।
- RCM 2.133.1Open verse →
रघुबर कहेउ लखन भल घाटू। करहु कतहुँ अब ठाहर ठाटू।।
अर्थ · Hindi
रघुबर कहेउ लखन भल घाटू। करहु कतहुँ अब ठाहर ठाटू।।
- RCM 2.133.2Open verse →
लखन दीख पय उतर करारा। चहुँ दिसि फिरेउ धनुष जिमि नारा।।
अर्थ · Hindi
लखन दीख पय उतर करारा। चहुँ दिसि फिरेउ धनुष जिमि नारा।।
- RCM 2.133.3Open verse →
नदी पनच सर सम दम दाना। सकल कलुष कलि साउज नाना।।
अर्थ · Hindi
नदी पनच सर सम दम दाना। सकल कलुष कलि साउज नाना।।
- RCM 2.133.4Open verse →
चित्रकूट जनु अचल अहेरी। चुकइ न घात मार मुठभेरी।।
अर्थ · Hindi
चित्रकूट जनु अचल अहेरी। चुकइ न घात मार मुठभेरी।।
- RCM 2.133.5Open verse →
अस कहि लखन ठाउँ देखरावा। थलु बिलोकि रघुबर सुखु पावा।।
अर्थ · Hindi
अस कहि लखन ठाउँ देखरावा। थलु बिलोकि रघुबर सुखु पावा।।
- RCM 2.133.6Open verse →
रमेउ राम मनु देवन्ह जाना। चले सहित सुर थपति प्रधाना।।
अर्थ · Hindi
रमेउ राम मनु देवन्ह जाना। चले सहित सुर थपति प्रधाना।।
- RCM 2.133.7Open verse →
कोल किरात बेष सब आए। रचे परन तृन सदन सुहाए।।
अर्थ · Hindi
कोल किरात बेष सब आए। रचे परन तृन सदन सुहाए।।
- RCM 2.133.8Open verse →
बरनि न जाहि मंजु दुइ साला। एक ललित लघु एक बिसाला।।
अर्थ · Hindi
बरनि न जाहि मंजु दुइ साला। एक ललित लघु एक बिसाला।।
- RCM 2.133.9Open verse →
लखन जानकी सहित प्रभु राजत रुचिर निकेत।
अर्थ · Hindi
लखन जानकी सहित प्रभु राजत रुचिर निकेत।
- RCM 2.133.10Open verse →
सोह मदनु मुनि बेष जनु रति रितुराज समेत।।133।।
अर्थ · Hindi
सोह मदनु मुनि बेष जनु रति रितुराज समेत।।133।।
- RCM 2.134.1Open verse →
अमर नाग किंनर दिसिपाला। चित्रकूट आए तेहि काला।।
अर्थ · Hindi
अमर नाग किंनर दिसिपाला। चित्रकूट आए तेहि काला।।
- RCM 2.134.2Open verse →
राम प्रनामु कीन्ह सब काहू। मुदित देव लहि लोचन लाहू।।
अर्थ · Hindi
राम प्रनामु कीन्ह सब काहू। मुदित देव लहि लोचन लाहू।।
- RCM 2.134.3Open verse →
बरषि सुमन कह देव समाजू। नाथ सनाथ भए हम आजू।।
अर्थ · Hindi
बरषि सुमन कह देव समाजू। नाथ सनाथ भए हम आजू।।
- RCM 2.134.4Open verse →
करि बिनती दुख दुसह सुनाए। हरषित निज निज सदन सिधाए।।
अर्थ · Hindi
करि बिनती दुख दुसह सुनाए। हरषित निज निज सदन सिधाए।।
- RCM 2.134.5Open verse →
चित्रकूट रघुनंदनु छाए। समाचार सुनि सुनि मुनि आए।।
अर्थ · Hindi
चित्रकूट रघुनंदनु छाए। समाचार सुनि सुनि मुनि आए।।
- RCM 2.134.6Open verse →
आवत देखि मुदित मुनिबृंदा। कीन्ह दंडवत रघुकुल चंदा।।
अर्थ · Hindi
आवत देखि मुदित मुनिबृंदा। कीन्ह दंडवत रघुकुल चंदा।।
- RCM 2.134.7Open verse →
मुनि रघुबरहि लाइ उर लेहीं। सुफल होन हित आसिष देहीं।।
अर्थ · Hindi
मुनि रघुबरहि लाइ उर लेहीं। सुफल होन हित आसिष देहीं।।
- RCM 2.134.8Open verse →
सिय सौमित्र राम छबि देखहिं। साधन सकल सफल करि लेखहिं।।
अर्थ · Hindi
सिय सौमित्र राम छबि देखहिं। साधन सकल सफल करि लेखहिं।।
- RCM 2.134.9Open verse →
जथाजोग सनमानि प्रभु बिदा किए मुनिबृंद।
अर्थ · Hindi
जथाजोग सनमानि प्रभु बिदा किए मुनिबृंद।
- RCM 2.134.10Open verse →
करहि जोग जप जाग तप निज आश्रमन्हि सुछंद।।134।।
अर्थ · Hindi
करहि जोग जप जाग तप निज आश्रमन्हि सुछंद।।134।।
- RCM 2.135.1Open verse →
यह सुधि कोल किरातन्ह पाई। हरषे जनु नव निधि घर आई।।
अर्थ · Hindi
यह सुधि कोल किरातन्ह पाई। हरषे जनु नव निधि घर आई।।
- RCM 2.135.2Open verse →
कंद मूल फल भरि भरि दोना। चले रंक जनु लूटन सोना।।
अर्थ · Hindi
कंद मूल फल भरि भरि दोना। चले रंक जनु लूटन सोना।।
- RCM 2.135.3Open verse →
तिन्ह महँ जिन्ह देखे दोउ भ्राता। अपर तिन्हहि पूँछहि मगु जाता।।
अर्थ · Hindi
तिन्ह महँ जिन्ह देखे दोउ भ्राता। अपर तिन्हहि पूँछहि मगु जाता।।
- RCM 2.135.4Open verse →
कहत सुनत रघुबीर निकाई। आइ सबन्हि देखे रघुराई।।
अर्थ · Hindi
कहत सुनत रघुबीर निकाई। आइ सबन्हि देखे रघुराई।।
- RCM 2.135.5Open verse →
करहिं जोहारु भेंट धरि आगे। प्रभुहि बिलोकहिं अति अनुरागे।।
अर्थ · Hindi
करहिं जोहारु भेंट धरि आगे। प्रभुहि बिलोकहिं अति अनुरागे।।
- RCM 2.135.6Open verse →
चित्र लिखे जनु जहँ तहँ ठाढ़े। पुलक सरीर नयन जल बाढ़े।।
अर्थ · Hindi
चित्र लिखे जनु जहँ तहँ ठाढ़े। पुलक सरीर नयन जल बाढ़े।।
- RCM 2.135.7Open verse →
राम सनेह मगन सब जाने। कहि प्रिय बचन सकल सनमाने।।
अर्थ · Hindi
राम सनेह मगन सब जाने। कहि प्रिय बचन सकल सनमाने।।
- RCM 2.135.8Open verse →
प्रभुहि जोहारि बहोरि बहोरी। बचन बिनीत कहहिं कर जोरी।।
अर्थ · Hindi
प्रभुहि जोहारि बहोरि बहोरी। बचन बिनीत कहहिं कर जोरी।।
- RCM 2.135.9Open verse →
अब हम नाथ सनाथ सब भए देखि प्रभु पाय।
अर्थ · Hindi
अब हम नाथ सनाथ सब भए देखि प्रभु पाय।
- RCM 2.135.10Open verse →
भाग हमारे आगमनु राउर कोसलराय।।135।।
अर्थ · Hindi
भाग हमारे आगमनु राउर कोसलराय।।135।।
- RCM 2.136.1Open verse →
धन्य भूमि बन पंथ पहारा। जहँ जहँ नाथ पाउ तुम्ह धारा।।
अर्थ · Hindi
धन्य भूमि बन पंथ पहारा। जहँ जहँ नाथ पाउ तुम्ह धारा।।
- RCM 2.136.2Open verse →
धन्य बिहग मृग काननचारी। सफल जनम भए तुम्हहि निहारी।।
अर्थ · Hindi
धन्य बिहग मृग काननचारी। सफल जनम भए तुम्हहि निहारी।।
- RCM 2.136.3Open verse →
हम सब धन्य सहित परिवारा। दीख दरसु भरि नयन तुम्हारा।।
अर्थ · Hindi
हम सब धन्य सहित परिवारा। दीख दरसु भरि नयन तुम्हारा।।
- RCM 2.136.4Open verse →
कीन्ह बासु भल ठाउँ बिचारी। इहाँ सकल रितु रहब सुखारी।।
अर्थ · Hindi
कीन्ह बासु भल ठाउँ बिचारी। इहाँ सकल रितु रहब सुखारी।।
- RCM 2.136.5Open verse →
हम सब भाँति करब सेवकाई। करि केहरि अहि बाघ बराई।।
अर्थ · Hindi
हम सब भाँति करब सेवकाई। करि केहरि अहि बाघ बराई।।
- RCM 2.136.6Open verse →
बन बेहड़ गिरि कंदर खोहा। सब हमार प्रभु पग पग जोहा।।
अर्थ · Hindi
बन बेहड़ गिरि कंदर खोहा। सब हमार प्रभु पग पग जोहा।।
- RCM 2.136.7Open verse →
तहँ तहँ तुम्हहि अहेर खेलाउब। सर निरझर जलठाउँ देखाउब।।
अर्थ · Hindi
तहँ तहँ तुम्हहि अहेर खेलाउब। सर निरझर जलठाउँ देखाउब।।
- RCM 2.136.8Open verse →
हम सेवक परिवार समेता। नाथ न सकुचब आयसु देता।।
अर्थ · Hindi
हम सेवक परिवार समेता। नाथ न सकुचब आयसु देता।।
- RCM 2.136.9Open verse →
बेद बचन मुनि मन अगम ते प्रभु करुना ऐन।
अर्थ · Hindi
बेद बचन मुनि मन अगम ते प्रभु करुना ऐन।
- RCM 2.136.10Open verse →
बचन किरातन्ह के सुनत जिमि पितु बालक बैन।।136।।
अर्थ · Hindi
बचन किरातन्ह के सुनत जिमि पितु बालक बैन।।136।।
- RCM 2.137.1Open verse →
रामहि केवल प्रेमु पिआरा। जानि लेउ जो जाननिहारा।।
अर्थ · Hindi
रामहि केवल प्रेमु पिआरा। जानि लेउ जो जाननिहारा।।
- RCM 2.137.2Open verse →
राम सकल बनचर तब तोषे। कहि मृदु बचन प्रेम परिपोषे।।
अर्थ · Hindi
राम सकल बनचर तब तोषे। कहि मृदु बचन प्रेम परिपोषे।।
- RCM 2.137.3Open verse →
बिदा किए सिर नाइ सिधाए। प्रभु गुन कहत सुनत घर आए।।
अर्थ · Hindi
बिदा किए सिर नाइ सिधाए। प्रभु गुन कहत सुनत घर आए।।
- RCM 2.137.4Open verse →
एहि बिधि सिय समेत दोउ भाई। बसहिं बिपिन सुर मुनि सुखदाई।।
अर्थ · Hindi
एहि बिधि सिय समेत दोउ भाई। बसहिं बिपिन सुर मुनि सुखदाई।।
- RCM 2.137.5Open verse →
जब ते आइ रहे रघुनायकु। तब तें भयउ बनु मंगलदायकु।।
अर्थ · Hindi
जब ते आइ रहे रघुनायकु। तब तें भयउ बनु मंगलदायकु।।
- RCM 2.137.6Open verse →
फूलहिं फलहिं बिटप बिधि नाना।।मंजु बलित बर बेलि बिताना।।
अर्थ · Hindi
फूलहिं फलहिं बिटप बिधि नाना।।मंजु बलित बर बेलि बिताना।।
- RCM 2.137.7Open verse →
सुरतरु सरिस सुभायँ सुहाए। मनहुँ बिबुध बन परिहरि आए।।
अर्थ · Hindi
सुरतरु सरिस सुभायँ सुहाए। मनहुँ बिबुध बन परिहरि आए।।
- RCM 2.137.8Open verse →
गंज मंजुतर मधुकर श्रेनी। त्रिबिध बयारि बहइ सुख देनी।।
अर्थ · Hindi
गंज मंजुतर मधुकर श्रेनी। त्रिबिध बयारि बहइ सुख देनी।।
- RCM 2.137.9Open verse →
नीलकंठ कलकंठ सुक चातक चक्क चकोर।
अर्थ · Hindi
नीलकंठ कलकंठ सुक चातक चक्क चकोर।
- RCM 2.137.10Open verse →
भाँति भाँति बोलहिं बिहग श्रवन सुखद चित चोर।।137।।
अर्थ · Hindi
भाँति भाँति बोलहिं बिहग श्रवन सुखद चित चोर।।137।।
- RCM 2.138.1Open verse →
केरि केहरि कपि कोल कुरंगा। बिगतबैर बिचरहिं सब संगा।।
अर्थ · Hindi
केरि केहरि कपि कोल कुरंगा। बिगतबैर बिचरहिं सब संगा।।
- RCM 2.138.2Open verse →
फिरत अहेर राम छबि देखी। होहिं मुदित मृगबंद बिसेषी।।
अर्थ · Hindi
फिरत अहेर राम छबि देखी। होहिं मुदित मृगबंद बिसेषी।।
- RCM 2.138.3Open verse →
बिबुध बिपिन जहँ लगि जग माहीं। देखि राम बनु सकल सिहाहीं।।
अर्थ · Hindi
बिबुध बिपिन जहँ लगि जग माहीं। देखि राम बनु सकल सिहाहीं।।
- RCM 2.138.4Open verse →
सुरसरि सरसइ दिनकर कन्या। मेकलसुता गोदावरि धन्या।।
अर्थ · Hindi
सुरसरि सरसइ दिनकर कन्या। मेकलसुता गोदावरि धन्या।।
- RCM 2.138.5Open verse →
सब सर सिंधु नदी नद नाना। मंदाकिनि कर करहिं बखाना।।
अर्थ · Hindi
सब सर सिंधु नदी नद नाना। मंदाकिनि कर करहिं बखाना।।
- RCM 2.138.6Open verse →
उदय अस्त गिरि अरु कैलासू। मंदर मेरु सकल सुरबासू।।
अर्थ · Hindi
उदय अस्त गिरि अरु कैलासू। मंदर मेरु सकल सुरबासू।।
- RCM 2.138.7Open verse →
सैल हिमाचल आदिक जेते। चित्रकूट जसु गावहिं तेते।।
अर्थ · Hindi
सैल हिमाचल आदिक जेते। चित्रकूट जसु गावहिं तेते।।
- RCM 2.138.8Open verse →
बिंधि मुदित मन सुखु न समाई। श्रम बिनु बिपुल बड़ाई पाई।।
अर्थ · Hindi
बिंधि मुदित मन सुखु न समाई। श्रम बिनु बिपुल बड़ाई पाई।।
- RCM 2.138.9Open verse →
चित्रकूट के बिहग मृग बेलि बिटप तृन जाति।
अर्थ · Hindi
चित्रकूट के बिहग मृग बेलि बिटप तृन जाति।
- RCM 2.138.10Open verse →
पुन्य पुंज सब धन्य अस कहहिं देव दिन राति।।138।।
अर्थ · Hindi
पुन्य पुंज सब धन्य अस कहहिं देव दिन राति।।138।।
- RCM 2.139.1Open verse →
नयनवंत रघुबरहि बिलोकी। पाइ जनम फल होहिं बिसोकी।।
अर्थ · Hindi
नयनवंत रघुबरहि बिलोकी। पाइ जनम फल होहिं बिसोकी।।
- RCM 2.139.2Open verse →
परसि चरन रज अचर सुखारी। भए परम पद के अधिकारी।।
अर्थ · Hindi
परसि चरन रज अचर सुखारी। भए परम पद के अधिकारी।।
- RCM 2.139.3Open verse →
सो बनु सैलु सुभायँ सुहावन। मंगलमय अति पावन पावन।।
अर्थ · Hindi
सो बनु सैलु सुभायँ सुहावन। मंगलमय अति पावन पावन।।
- RCM 2.139.4Open verse →
महिमा कहिअ कवनि बिधि तासू। सुखसागर जहँ कीन्ह निवासू।।
अर्थ · Hindi
महिमा कहिअ कवनि बिधि तासू। सुखसागर जहँ कीन्ह निवासू।।
- RCM 2.139.5Open verse →
पय पयोधि तजि अवध बिहाई। जहँ सिय लखनु रामु रहे आई।।
अर्थ · Hindi
पय पयोधि तजि अवध बिहाई। जहँ सिय लखनु रामु रहे आई।।
- RCM 2.139.6Open verse →
कहि न सकहिं सुषमा जसि कानन। जौं सत सहस होंहिं सहसानन।।
अर्थ · Hindi
कहि न सकहिं सुषमा जसि कानन। जौं सत सहस होंहिं सहसानन।।
- RCM 2.139.7Open verse →
सो मैं बरनि कहौं बिधि केहीं। डाबर कमठ कि मंदर लेहीं।।
अर्थ · Hindi
सो मैं बरनि कहौं बिधि केहीं। डाबर कमठ कि मंदर लेहीं।।
- RCM 2.139.8Open verse →
सेवहिं लखनु करम मन बानी। जाइ न सीलु सनेहु बखानी।।
अर्थ · Hindi
सेवहिं लखनु करम मन बानी। जाइ न सीलु सनेहु बखानी।।
- RCM 2.139.9Open verse →
-छिनु छिनु लखि सिय राम पद जानि आपु पर नेहु।
अर्थ · Hindi
-छिनु छिनु लखि सिय राम पद जानि आपु पर नेहु।
- RCM 2.139.10Open verse →
करत न सपनेहुँ लखनु चितु बंधु मातु पितु गेहु।।139।।
अर्थ · Hindi
करत न सपनेहुँ लखनु चितु बंधु मातु पितु गेहु।।139।।
- RCM 2.140.1Open verse →
राम संग सिय रहति सुखारी। पुर परिजन गृह सुरति बिसारी।।
अर्थ · Hindi
राम संग सिय रहति सुखारी। पुर परिजन गृह सुरति बिसारी।।
- RCM 2.140.2Open verse →
छिनु छिनु पिय बिधु बदनु निहारी। प्रमुदित मनहुँ चकोरकुमारी।।
अर्थ · Hindi
छिनु छिनु पिय बिधु बदनु निहारी। प्रमुदित मनहुँ चकोरकुमारी।।
- RCM 2.140.3Open verse →
नाह नेहु नित बढ़त बिलोकी। हरषित रहति दिवस जिमि कोकी।।
अर्थ · Hindi
नाह नेहु नित बढ़त बिलोकी। हरषित रहति दिवस जिमि कोकी।।
- RCM 2.140.4Open verse →
सिय मनु राम चरन अनुरागा। अवध सहस सम बनु प्रिय लागा।।
अर्थ · Hindi
सिय मनु राम चरन अनुरागा। अवध सहस सम बनु प्रिय लागा।।
- RCM 2.140.5Open verse →
परनकुटी प्रिय प्रियतम संगा। प्रिय परिवारु कुरंग बिहंगा।।
अर्थ · Hindi
परनकुटी प्रिय प्रियतम संगा। प्रिय परिवारु कुरंग बिहंगा।।
- RCM 2.140.6Open verse →
सासु ससुर सम मुनितिय मुनिबर। असनु अमिअ सम कंद मूल फर।।
अर्थ · Hindi
सासु ससुर सम मुनितिय मुनिबर। असनु अमिअ सम कंद मूल फर।।
- RCM 2.140.7Open verse →
नाथ साथ साँथरी सुहाई। मयन सयन सय सम सुखदाई।।
अर्थ · Hindi
नाथ साथ साँथरी सुहाई। मयन सयन सय सम सुखदाई।।
- RCM 2.140.8Open verse →
लोकप होहिं बिलोकत जासू। तेहि कि मोहि सक बिषय बिलासू।।
अर्थ · Hindi
लोकप होहिं बिलोकत जासू। तेहि कि मोहि सक बिषय बिलासू।।
- RCM 2.140.9Open verse →
-सुमिरत रामहि तजहिं जन तृन सम बिषय बिलासु।
अर्थ · Hindi
-सुमिरत रामहि तजहिं जन तृन सम बिषय बिलासु।
- RCM 2.140.10Open verse →
रामप्रिया जग जननि सिय कछु न आचरजु तासु।।140।।
अर्थ · Hindi
रामप्रिया जग जननि सिय कछु न आचरजु तासु।।140।।
- RCM 2.141.1Open verse →
सीय लखन जेहि बिधि सुखु लहहीं। सोइ रघुनाथ करहि सोइ कहहीं।।
अर्थ · Hindi
सीय लखन जेहि बिधि सुखु लहहीं। सोइ रघुनाथ करहि सोइ कहहीं।।
- RCM 2.141.2Open verse →
कहहिं पुरातन कथा कहानी। सुनहिं लखनु सिय अति सुखु मानी।
अर्थ · Hindi
कहहिं पुरातन कथा कहानी। सुनहिं लखनु सिय अति सुखु मानी।
- RCM 2.141.3Open verse →
जब जब रामु अवध सुधि करहीं। तब तब बारि बिलोचन भरहीं।।
अर्थ · Hindi
जब जब रामु अवध सुधि करहीं। तब तब बारि बिलोचन भरहीं।।
- RCM 2.141.4Open verse →
सुमिरि मातु पितु परिजन भाई। भरत सनेहु सीलु सेवकाई।।
अर्थ · Hindi
सुमिरि मातु पितु परिजन भाई। भरत सनेहु सीलु सेवकाई।।
- RCM 2.141.5Open verse →
कृपासिंधु प्रभु होहिं दुखारी। धीरजु धरहिं कुसमउ बिचारी।।
अर्थ · Hindi
कृपासिंधु प्रभु होहिं दुखारी। धीरजु धरहिं कुसमउ बिचारी।।
- RCM 2.141.6Open verse →
लखि सिय लखनु बिकल होइ जाहीं। जिमि पुरुषहि अनुसर परिछाहीं।।
अर्थ · Hindi
लखि सिय लखनु बिकल होइ जाहीं। जिमि पुरुषहि अनुसर परिछाहीं।।
- RCM 2.141.7Open verse →
प्रिया बंधु गति लखि रघुनंदनु। धीर कृपाल भगत उर चंदनु।।
अर्थ · Hindi
प्रिया बंधु गति लखि रघुनंदनु। धीर कृपाल भगत उर चंदनु।।
- RCM 2.141.8Open verse →
लगे कहन कछु कथा पुनीता। सुनि सुखु लहहिं लखनु अरु सीता।।
अर्थ · Hindi
लगे कहन कछु कथा पुनीता। सुनि सुखु लहहिं लखनु अरु सीता।।
- RCM 2.141.9Open verse →
रामु लखन सीता सहित सोहत परन निकेत।
अर्थ · Hindi
रामु लखन सीता सहित सोहत परन निकेत।
- RCM 2.141.10Open verse →
जिमि बासव बस अमरपुर सची जयंत समेत।।141।।
अर्थ · Hindi
जिमि बासव बस अमरपुर सची जयंत समेत।।141।।
- RCM 2.142.1Open verse →
जोगवहिं प्रभु सिय लखनहिं कैसें। पलक बिलोचन गोलक जैसें।।
अर्थ · Hindi
जोगवहिं प्रभु सिय लखनहिं कैसें। पलक बिलोचन गोलक जैसें।।
- RCM 2.142.2Open verse →
सेवहिं लखनु सीय रघुबीरहि। जिमि अबिबेकी पुरुष सरीरहि।।
अर्थ · Hindi
सेवहिं लखनु सीय रघुबीरहि। जिमि अबिबेकी पुरुष सरीरहि।।
- RCM 2.142.3Open verse →
एहि बिधि प्रभु बन बसहिं सुखारी। खग मृग सुर तापस हितकारी।।
अर्थ · Hindi
एहि बिधि प्रभु बन बसहिं सुखारी। खग मृग सुर तापस हितकारी।।
- RCM 2.142.4Open verse →
कहेउँ राम बन गवनु सुहावा। सुनहु सुमंत्र अवध जिमि आवा।।
अर्थ · Hindi
कहेउँ राम बन गवनु सुहावा। सुनहु सुमंत्र अवध जिमि आवा।।
- RCM 2.142.5Open verse →
फिरेउ निषादु प्रभुहि पहुँचाई। सचिव सहित रथ देखेसि आई।।
अर्थ · Hindi
फिरेउ निषादु प्रभुहि पहुँचाई। सचिव सहित रथ देखेसि आई।।
- RCM 2.142.6Open verse →
मंत्री बिकल बिलोकि निषादू। कहि न जाइ जस भयउ बिषादू।।
अर्थ · Hindi
मंत्री बिकल बिलोकि निषादू। कहि न जाइ जस भयउ बिषादू।।
- RCM 2.142.7Open verse →
राम राम सिय लखन पुकारी। परेउ धरनितल ब्याकुल भारी।।
अर्थ · Hindi
राम राम सिय लखन पुकारी। परेउ धरनितल ब्याकुल भारी।।
- RCM 2.142.8Open verse →
देखि दखिन दिसि हय हिहिनाहीं। जनु बिनु पंख बिहग अकुलाहीं।।
अर्थ · Hindi
देखि दखिन दिसि हय हिहिनाहीं। जनु बिनु पंख बिहग अकुलाहीं।।
- RCM 2.142.9Open verse →
नहिं तृन चरहिं पिअहिं जलु मोचहिं लोचन बारि।
अर्थ · Hindi
नहिं तृन चरहिं पिअहिं जलु मोचहिं लोचन बारि।
- RCM 2.142.10Open verse →
ब्याकुल भए निषाद सब रघुबर बाजि निहारि।।142।।
अर्थ · Hindi
ब्याकुल भए निषाद सब रघुबर बाजि निहारि।।142।।
- RCM 2.143.1Open verse →
धरि धीरज तब कहइ निषादू। अब सुमंत्र परिहरहु बिषादू।।
अर्थ · Hindi
धरि धीरज तब कहइ निषादू। अब सुमंत्र परिहरहु बिषादू।।
- RCM 2.143.2Open verse →
तुम्ह पंडित परमारथ ग्याता। धरहु धीर लखि बिमुख बिधाता
अर्थ · Hindi
तुम्ह पंडित परमारथ ग्याता। धरहु धीर लखि बिमुख बिधाता
- RCM 2.143.3Open verse →
बिबिध कथा कहि कहि मृदु बानी। रथ बैठारेउ बरबस आनी।।
अर्थ · Hindi
बिबिध कथा कहि कहि मृदु बानी। रथ बैठारेउ बरबस आनी।।
- RCM 2.143.4Open verse →
सोक सिथिल रथ सकइ न हाँकी। रघुबर बिरह पीर उर बाँकी।।
अर्थ · Hindi
सोक सिथिल रथ सकइ न हाँकी। रघुबर बिरह पीर उर बाँकी।।
- RCM 2.143.5Open verse →
चरफराहिं मग चलहिं न घोरे। बन मृग मनहुँ आनि रथ जोरे।।
अर्थ · Hindi
चरफराहिं मग चलहिं न घोरे। बन मृग मनहुँ आनि रथ जोरे।।
- RCM 2.143.6Open verse →
अढ़ुकि परहिं फिरि हेरहिं पीछें। राम बियोगि बिकल दुख तीछें।।
अर्थ · Hindi
अढ़ुकि परहिं फिरि हेरहिं पीछें। राम बियोगि बिकल दुख तीछें।।
- RCM 2.143.7Open verse →
जो कह रामु लखनु बैदेही। हिंकरि हिंकरि हित हेरहिं तेही।।
अर्थ · Hindi
जो कह रामु लखनु बैदेही। हिंकरि हिंकरि हित हेरहिं तेही।।
- RCM 2.143.8Open verse →
बाजि बिरह गति कहि किमि जाती। बिनु मनि फनिक बिकल जेहि भाँती।।
अर्थ · Hindi
बाजि बिरह गति कहि किमि जाती। बिनु मनि फनिक बिकल जेहि भाँती।।
- RCM 2.143.9Open verse →
भयउ निषाद बिषादबस देखत सचिव तुरंग।
अर्थ · Hindi
भयउ निषाद बिषादबस देखत सचिव तुरंग।
- RCM 2.143.10Open verse →
बोलि सुसेवक चारि तब दिए सारथी संग।।143।।
अर्थ · Hindi
बोलि सुसेवक चारि तब दिए सारथी संग।।143।।
- RCM 2.144.1Open verse →
गुह सारथिहि फिरेउ पहुँचाई। बिरहु बिषादु बरनि नहिं जाई।।
अर्थ · Hindi
गुह सारथिहि फिरेउ पहुँचाई। बिरहु बिषादु बरनि नहिं जाई।।
- RCM 2.144.2Open verse →
चले अवध लेइ रथहि निषादा। होहि छनहिं छन मगन बिषादा।।
अर्थ · Hindi
चले अवध लेइ रथहि निषादा। होहि छनहिं छन मगन बिषादा।।
- RCM 2.144.3Open verse →
सोच सुमंत्र बिकल दुख दीना। धिग जीवन रघुबीर बिहीना।।
अर्थ · Hindi
सोच सुमंत्र बिकल दुख दीना। धिग जीवन रघुबीर बिहीना।।
- RCM 2.144.4Open verse →
रहिहि न अंतहुँ अधम सरीरू। जसु न लहेउ बिछुरत रघुबीरू।।
अर्थ · Hindi
रहिहि न अंतहुँ अधम सरीरू। जसु न लहेउ बिछुरत रघुबीरू।।
- RCM 2.144.5Open verse →
भए अजस अघ भाजन प्राना। कवन हेतु नहिं करत पयाना।।
अर्थ · Hindi
भए अजस अघ भाजन प्राना। कवन हेतु नहिं करत पयाना।।
- RCM 2.144.6Open verse →
अहह मंद मनु अवसर चूका। अजहुँ न हृदय होत दुइ टूका।।
अर्थ · Hindi
अहह मंद मनु अवसर चूका। अजहुँ न हृदय होत दुइ टूका।।
- RCM 2.144.7Open verse →
मीजि हाथ सिरु धुनि पछिताई। मनहँ कृपन धन रासि गवाँई।।
अर्थ · Hindi
मीजि हाथ सिरु धुनि पछिताई। मनहँ कृपन धन रासि गवाँई।।
- RCM 2.144.8Open verse →
बिरिद बाँधि बर बीरु कहाई। चलेउ समर जनु सुभट पराई।।
अर्थ · Hindi
बिरिद बाँधि बर बीरु कहाई। चलेउ समर जनु सुभट पराई।।
- RCM 2.144.9Open verse →
बिप्र बिबेकी बेदबिद संमत साधु सुजाति।
अर्थ · Hindi
बिप्र बिबेकी बेदबिद संमत साधु सुजाति।
- RCM 2.144.10Open verse →
जिमि धोखें मदपान कर सचिव सोच तेहि भाँति।।144।।
अर्थ · Hindi
जिमि धोखें मदपान कर सचिव सोच तेहि भाँति।।144।।
- RCM 2.145.1Open verse →
जिमि कुलीन तिय साधु सयानी। पतिदेवता करम मन बानी।।
अर्थ · Hindi
जिमि कुलीन तिय साधु सयानी। पतिदेवता करम मन बानी।।
- RCM 2.145.2Open verse →
रहै करम बस परिहरि नाहू। सचिव हृदयँ तिमि दारुन दाहु।।
अर्थ · Hindi
रहै करम बस परिहरि नाहू। सचिव हृदयँ तिमि दारुन दाहु।।
- RCM 2.145.3Open verse →
लोचन सजल डीठि भइ थोरी। सुनइ न श्रवन बिकल मति भोरी।।
अर्थ · Hindi
लोचन सजल डीठि भइ थोरी। सुनइ न श्रवन बिकल मति भोरी।।
- RCM 2.145.4Open verse →
सूखहिं अधर लागि मुहँ लाटी। जिउ न जाइ उर अवधि कपाटी।।
अर्थ · Hindi
सूखहिं अधर लागि मुहँ लाटी। जिउ न जाइ उर अवधि कपाटी।।
- RCM 2.145.5Open verse →
बिबरन भयउ न जाइ निहारी। मारेसि मनहुँ पिता महतारी।।
अर्थ · Hindi
बिबरन भयउ न जाइ निहारी। मारेसि मनहुँ पिता महतारी।।
- RCM 2.145.6Open verse →
हानि गलानि बिपुल मन ब्यापी। जमपुर पंथ सोच जिमि पापी।।
अर्थ · Hindi
हानि गलानि बिपुल मन ब्यापी। जमपुर पंथ सोच जिमि पापी।।
- RCM 2.145.7Open verse →
बचनु न आव हृदयँ पछिताई। अवध काह मैं देखब जाई।।
अर्थ · Hindi
बचनु न आव हृदयँ पछिताई। अवध काह मैं देखब जाई।।
- RCM 2.145.8Open verse →
राम रहित रथ देखिहि जोई। सकुचिहि मोहि बिलोकत सोई।।
अर्थ · Hindi
राम रहित रथ देखिहि जोई। सकुचिहि मोहि बिलोकत सोई।।
- RCM 2.145.9Open verse →
-धाइ पूँछिहहिं मोहि जब बिकल नगर नर नारि।
अर्थ · Hindi
-धाइ पूँछिहहिं मोहि जब बिकल नगर नर नारि।
- RCM 2.145.10Open verse →
उतरु देब मैं सबहि तब हृदयँ बज्रु बैठारि।।145।।
अर्थ · Hindi
उतरु देब मैं सबहि तब हृदयँ बज्रु बैठारि।।145।।
- RCM 2.146.1Open verse →
पुछिहहिं दीन दुखित सब माता। कहब काह मैं तिन्हहि बिधाता।।
अर्थ · Hindi
पुछिहहिं दीन दुखित सब माता। कहब काह मैं तिन्हहि बिधाता।।
- RCM 2.146.2Open verse →
पूछिहि जबहिं लखन महतारी। कहिहउँ कवन सँदेस सुखारी।।
अर्थ · Hindi
पूछिहि जबहिं लखन महतारी। कहिहउँ कवन सँदेस सुखारी।।
- RCM 2.146.3Open verse →
राम जननि जब आइहि धाई। सुमिरि बच्छु जिमि धेनु लवाई।।
अर्थ · Hindi
राम जननि जब आइहि धाई। सुमिरि बच्छु जिमि धेनु लवाई।।
- RCM 2.146.4Open verse →
पूँछत उतरु देब मैं तेही। गे बनु राम लखनु बैदेही।।
अर्थ · Hindi
पूँछत उतरु देब मैं तेही। गे बनु राम लखनु बैदेही।।
- RCM 2.146.5Open verse →
जोइ पूँछिहि तेहि ऊतरु देबा।जाइ अवध अब यहु सुखु लेबा।।
अर्थ · Hindi
जोइ पूँछिहि तेहि ऊतरु देबा।जाइ अवध अब यहु सुखु लेबा।।
- RCM 2.146.6Open verse →
पूँछिहि जबहिं राउ दुख दीना। जिवनु जासु रघुनाथ अधीना।।
अर्थ · Hindi
पूँछिहि जबहिं राउ दुख दीना। जिवनु जासु रघुनाथ अधीना।।
- RCM 2.146.7Open verse →
देहउँ उतरु कौनु मुहु लाई। आयउँ कुसल कुअँर पहुँचाई।।
अर्थ · Hindi
देहउँ उतरु कौनु मुहु लाई। आयउँ कुसल कुअँर पहुँचाई।।
- RCM 2.146.8Open verse →
सुनत लखन सिय राम सँदेसू। तृन जिमि तनु परिहरिहि नरेसू।।
अर्थ · Hindi
सुनत लखन सिय राम सँदेसू। तृन जिमि तनु परिहरिहि नरेसू।।
- RCM 2.146.9Open verse →
-ह्रदउ न बिदरेउ पंक जिमि बिछुरत प्रीतमु नीरु।।
अर्थ · Hindi
-ह्रदउ न बिदरेउ पंक जिमि बिछुरत प्रीतमु नीरु।।
- RCM 2.146.10Open verse →
जानत हौं मोहि दीन्ह बिधि यहु जातना सरीरु।।146।।
अर्थ · Hindi
जानत हौं मोहि दीन्ह बिधि यहु जातना सरीरु।।146।।
- RCM 2.147.1Open verse →
एहि बिधि करत पंथ पछितावा। तमसा तीर तुरत रथु आवा।।
अर्थ · Hindi
एहि बिधि करत पंथ पछितावा। तमसा तीर तुरत रथु आवा।।
- RCM 2.147.2Open verse →
बिदा किए करि बिनय निषादा। फिरे पायँ परि बिकल बिषादा।।
अर्थ · Hindi
बिदा किए करि बिनय निषादा। फिरे पायँ परि बिकल बिषादा।।
- RCM 2.147.3Open verse →
पैठत नगर सचिव सकुचाई। जनु मारेसि गुर बाँभन गाई।।
अर्थ · Hindi
पैठत नगर सचिव सकुचाई। जनु मारेसि गुर बाँभन गाई।।
- RCM 2.147.4Open verse →
बैठि बिटप तर दिवसु गवाँवा। साँझ समय तब अवसरु पावा।।
अर्थ · Hindi
बैठि बिटप तर दिवसु गवाँवा। साँझ समय तब अवसरु पावा।।
- RCM 2.147.5Open verse →
अवध प्रबेसु कीन्ह अँधिआरें। पैठ भवन रथु राखि दुआरें।।
अर्थ · Hindi
अवध प्रबेसु कीन्ह अँधिआरें। पैठ भवन रथु राखि दुआरें।।
- RCM 2.147.6Open verse →
जिन्ह जिन्ह समाचार सुनि पाए। भूप द्वार रथु देखन आए।।
अर्थ · Hindi
जिन्ह जिन्ह समाचार सुनि पाए। भूप द्वार रथु देखन आए।।
- RCM 2.147.7Open verse →
रथु पहिचानि बिकल लखि घोरे। गरहिं गात जिमि आतप ओरे।।
अर्थ · Hindi
रथु पहिचानि बिकल लखि घोरे। गरहिं गात जिमि आतप ओरे।।
- RCM 2.147.8Open verse →
नगर नारि नर ब्याकुल कैंसें। निघटत नीर मीनगन जैंसें।।
अर्थ · Hindi
नगर नारि नर ब्याकुल कैंसें। निघटत नीर मीनगन जैंसें।।
- RCM 2.147.9Open verse →
-सचिव आगमनु सुनत सबु बिकल भयउ रनिवासु।
अर्थ · Hindi
-सचिव आगमनु सुनत सबु बिकल भयउ रनिवासु।
- RCM 2.147.10Open verse →
भवन भयंकरु लाग तेहि मानहुँ प्रेत निवासु।।147।।
अर्थ · Hindi
भवन भयंकरु लाग तेहि मानहुँ प्रेत निवासु।।147।।
- RCM 2.148.1Open verse →
अति आरति सब पूँछहिं रानी। उतरु न आव बिकल भइ बानी।।
अर्थ · Hindi
अति आरति सब पूँछहिं रानी। उतरु न आव बिकल भइ बानी।।
- RCM 2.148.2Open verse →
सुनइ न श्रवन नयन नहिं सूझा। कहहु कहाँ नृप तेहि तेहि बूझा।।
अर्थ · Hindi
सुनइ न श्रवन नयन नहिं सूझा। कहहु कहाँ नृप तेहि तेहि बूझा।।
- RCM 2.148.3Open verse →
दासिन्ह दीख सचिव बिकलाई। कौसल्या गृहँ गईं लवाई।।
अर्थ · Hindi
दासिन्ह दीख सचिव बिकलाई। कौसल्या गृहँ गईं लवाई।।
- RCM 2.148.4Open verse →
जाइ सुमंत्र दीख कस राजा। अमिअ रहित जनु चंदु बिराजा।।
अर्थ · Hindi
जाइ सुमंत्र दीख कस राजा। अमिअ रहित जनु चंदु बिराजा।।
- RCM 2.148.5Open verse →
आसन सयन बिभूषन हीना। परेउ भूमितल निपट मलीना।।
अर्थ · Hindi
आसन सयन बिभूषन हीना। परेउ भूमितल निपट मलीना।।
- RCM 2.148.6Open verse →
लेइ उसासु सोच एहि भाँती। सुरपुर तें जनु खँसेउ जजाती।।
अर्थ · Hindi
लेइ उसासु सोच एहि भाँती। सुरपुर तें जनु खँसेउ जजाती।।
- RCM 2.148.7Open verse →
लेत सोच भरि छिनु छिनु छाती। जनु जरि पंख परेउ संपाती।।
अर्थ · Hindi
लेत सोच भरि छिनु छिनु छाती। जनु जरि पंख परेउ संपाती।।
- RCM 2.148.8Open verse →
राम राम कह राम सनेही। पुनि कह राम लखन बैदेही।।
अर्थ · Hindi
राम राम कह राम सनेही। पुनि कह राम लखन बैदेही।।
- RCM 2.148.9Open verse →
देखि सचिवँ जय जीव कहि कीन्हेउ दंड प्रनामु।
अर्थ · Hindi
देखि सचिवँ जय जीव कहि कीन्हेउ दंड प्रनामु।
- RCM 2.148.10Open verse →
सुनत उठेउ ब्याकुल नृपति कहु सुमंत्र कहँ रामु।।148।।
अर्थ · Hindi
सुनत उठेउ ब्याकुल नृपति कहु सुमंत्र कहँ रामु।।148।।
- RCM 2.149.1Open verse →
भूप सुमंत्रु लीन्ह उर लाई। बूड़त कछु अधार जनु पाई।।
अर्थ · Hindi
भूप सुमंत्रु लीन्ह उर लाई। बूड़त कछु अधार जनु पाई।।
- RCM 2.149.2Open verse →
सहित सनेह निकट बैठारी। पूँछत राउ नयन भरि बारी।।
अर्थ · Hindi
सहित सनेह निकट बैठारी। पूँछत राउ नयन भरि बारी।।
- RCM 2.149.3Open verse →
राम कुसल कहु सखा सनेही। कहँ रघुनाथु लखनु बैदेही।।
अर्थ · Hindi
राम कुसल कहु सखा सनेही। कहँ रघुनाथु लखनु बैदेही।।
- RCM 2.149.4Open verse →
आने फेरि कि बनहि सिधाए। सुनत सचिव लोचन जल छाए।।
अर्थ · Hindi
आने फेरि कि बनहि सिधाए। सुनत सचिव लोचन जल छाए।।
- RCM 2.149.5Open verse →
सोक बिकल पुनि पूँछ नरेसू। कहु सिय राम लखन संदेसू।।
अर्थ · Hindi
सोक बिकल पुनि पूँछ नरेसू। कहु सिय राम लखन संदेसू।।
- RCM 2.149.6Open verse →
राम रूप गुन सील सुभाऊ। सुमिरि सुमिरि उर सोचत राऊ।।
अर्थ · Hindi
राम रूप गुन सील सुभाऊ। सुमिरि सुमिरि उर सोचत राऊ।।
- RCM 2.149.7Open verse →
राउ सुनाइ दीन्ह बनबासू। सुनि मन भयउ न हरषु हराँसू।।
अर्थ · Hindi
राउ सुनाइ दीन्ह बनबासू। सुनि मन भयउ न हरषु हराँसू।।
- RCM 2.149.8Open verse →
सो सुत बिछुरत गए न प्राना। को पापी बड़ मोहि समाना।।
अर्थ · Hindi
सो सुत बिछुरत गए न प्राना। को पापी बड़ मोहि समाना।।
- RCM 2.149.9Open verse →
सखा रामु सिय लखनु जहँ तहाँ मोहि पहुँचाउ।
अर्थ · Hindi
सखा रामु सिय लखनु जहँ तहाँ मोहि पहुँचाउ।
- RCM 2.149.10Open verse →
नाहिं त चाहत चलन अब प्रान कहउँ सतिभाउ।।149।।
अर्थ · Hindi
नाहिं त चाहत चलन अब प्रान कहउँ सतिभाउ।।149।।
- RCM 2.150.1Open verse →
पुनि पुनि पूँछत मंत्रहि राऊ। प्रियतम सुअन सँदेस सुनाऊ।।
अर्थ · Hindi
पुनि पुनि पूँछत मंत्रहि राऊ। प्रियतम सुअन सँदेस सुनाऊ।।
- RCM 2.150.2Open verse →
करहि सखा सोइ बेगि उपाऊ। रामु लखनु सिय नयन देखाऊ।।
अर्थ · Hindi
करहि सखा सोइ बेगि उपाऊ। रामु लखनु सिय नयन देखाऊ।।
- RCM 2.150.3Open verse →
सचिव धीर धरि कह मुदु बानी। महाराज तुम्ह पंडित ग्यानी।।
अर्थ · Hindi
सचिव धीर धरि कह मुदु बानी। महाराज तुम्ह पंडित ग्यानी।।
- RCM 2.150.4Open verse →
बीर सुधीर धुरंधर देवा। साधु समाजु सदा तुम्ह सेवा।।
अर्थ · Hindi
बीर सुधीर धुरंधर देवा। साधु समाजु सदा तुम्ह सेवा।।
- RCM 2.150.5Open verse →
जनम मरन सब दुख भोगा। हानि लाभ प्रिय मिलन बियोगा।।
अर्थ · Hindi
जनम मरन सब दुख भोगा। हानि लाभ प्रिय मिलन बियोगा।।
- RCM 2.150.6Open verse →
काल करम बस हौहिं गोसाईं। बरबस राति दिवस की नाईं।।
अर्थ · Hindi
काल करम बस हौहिं गोसाईं। बरबस राति दिवस की नाईं।।
- RCM 2.150.7Open verse →
सुख हरषहिं जड़ दुख बिलखाहीं। दोउ सम धीर धरहिं मन माहीं।।
अर्थ · Hindi
सुख हरषहिं जड़ दुख बिलखाहीं। दोउ सम धीर धरहिं मन माहीं।।
- RCM 2.150.8Open verse →
धीरज धरहु बिबेकु बिचारी। छाड़िअ सोच सकल हितकारी।।
अर्थ · Hindi
धीरज धरहु बिबेकु बिचारी। छाड़िअ सोच सकल हितकारी।।
- RCM 2.150.9Open verse →
प्रथम बासु तमसा भयउ दूसर सुरसरि तीर।
अर्थ · Hindi
प्रथम बासु तमसा भयउ दूसर सुरसरि तीर।
- RCM 2.150.10Open verse →
न्हाई रहे जलपानु करि सिय समेत दोउ बीर।।150।।
अर्थ · Hindi
न्हाई रहे जलपानु करि सिय समेत दोउ बीर।।150।।
- RCM 2.151.1Open verse →
केवट कीन्हि बहुत सेवकाई। सो जामिनि सिंगरौर गवाँई।।
अर्थ · Hindi
केवट कीन्हि बहुत सेवकाई। सो जामिनि सिंगरौर गवाँई।।
- RCM 2.151.2Open verse →
होत प्रात बट छीरु मगावा। जटा मुकुट निज सीस बनावा।।
अर्थ · Hindi
होत प्रात बट छीरु मगावा। जटा मुकुट निज सीस बनावा।।
- RCM 2.151.3Open verse →
राम सखाँ तब नाव मगाई। प्रिया चढ़ाइ चढ़े रघुराई।।
अर्थ · Hindi
राम सखाँ तब नाव मगाई। प्रिया चढ़ाइ चढ़े रघुराई।।
- RCM 2.151.4Open verse →
लखन बान धनु धरे बनाई। आपु चढ़े प्रभु आयसु पाई।।
अर्थ · Hindi
लखन बान धनु धरे बनाई। आपु चढ़े प्रभु आयसु पाई।।
- RCM 2.151.5Open verse →
बिकल बिलोकि मोहि रघुबीरा। बोले मधुर बचन धरि धीरा।।
अर्थ · Hindi
बिकल बिलोकि मोहि रघुबीरा। बोले मधुर बचन धरि धीरा।।
- RCM 2.151.6Open verse →
तात प्रनामु तात सन कहेहु। बार बार पद पंकज गहेहू।।
अर्थ · Hindi
तात प्रनामु तात सन कहेहु। बार बार पद पंकज गहेहू।।
- RCM 2.151.7Open verse →
करबि पायँ परि बिनय बहोरी। तात करिअ जनि चिंता मोरी।।
अर्थ · Hindi
करबि पायँ परि बिनय बहोरी। तात करिअ जनि चिंता मोरी।।
- RCM 2.151.8Open verse →
बन मग मंगल कुसल हमारें। कृपा अनुग्रह पुन्य तुम्हारें।।
अर्थ · Hindi
बन मग मंगल कुसल हमारें। कृपा अनुग्रह पुन्य तुम्हारें।।
- RCM 2.152.1Open verse →
पुरजन परिजन सकल निहोरी। तात सुनाएहु बिनती मोरी।।
अर्थ · Hindi
पुरजन परिजन सकल निहोरी। तात सुनाएहु बिनती मोरी।।
- RCM 2.152.2Open verse →
सोइ सब भाँति मोर हितकारी। जातें रह नरनाहु सुखारी।।
अर्थ · Hindi
सोइ सब भाँति मोर हितकारी। जातें रह नरनाहु सुखारी।।
- RCM 2.152.3Open verse →
कहब सँदेसु भरत के आएँ। नीति न तजिअ राजपदु पाएँ।।
अर्थ · Hindi
कहब सँदेसु भरत के आएँ। नीति न तजिअ राजपदु पाएँ।।
- RCM 2.152.4Open verse →
पालेहु प्रजहि करम मन बानी। सेएहु मातु सकल सम जानी।।
अर्थ · Hindi
पालेहु प्रजहि करम मन बानी। सेएहु मातु सकल सम जानी।।
- RCM 2.152.5Open verse →
ओर निबाहेहु भायप भाई। करि पितु मातु सुजन सेवकाई।।
अर्थ · Hindi
ओर निबाहेहु भायप भाई। करि पितु मातु सुजन सेवकाई।।
- RCM 2.152.6Open verse →
तात भाँति तेहि राखब राऊ। सोच मोर जेहिं करै न काऊ।।
अर्थ · Hindi
तात भाँति तेहि राखब राऊ। सोच मोर जेहिं करै न काऊ।।
- RCM 2.152.7Open verse →
लखन कहे कछु बचन कठोरा। बरजि राम पुनि मोहि निहोरा।।
अर्थ · Hindi
लखन कहे कछु बचन कठोरा। बरजि राम पुनि मोहि निहोरा।।
- RCM 2.152.8Open verse →
बार बार निज सपथ देवाई। कहबि न तात लखन लरिकाई।।
अर्थ · Hindi
बार बार निज सपथ देवाई। कहबि न तात लखन लरिकाई।।
- RCM 2.152.9Open verse →
कहि प्रनाम कछु कहन लिय सिय भइ सिथिल सनेह।
अर्थ · Hindi
कहि प्रनाम कछु कहन लिय सिय भइ सिथिल सनेह।
- RCM 2.152.10Open verse →
थकित बचन लोचन सजल पुलक पल्लवित देह।।152।।
अर्थ · Hindi
थकित बचन लोचन सजल पुलक पल्लवित देह।।152।।
- RCM 2.153.1Open verse →
तेहि अवसर रघुबर रूख पाई। केवट पारहि नाव चलाई।।
अर्थ · Hindi
तेहि अवसर रघुबर रूख पाई। केवट पारहि नाव चलाई।।
- RCM 2.153.2Open verse →
रघुकुलतिलक चले एहि भाँती। देखउँ ठाढ़ कुलिस धरि छाती।।
अर्थ · Hindi
रघुकुलतिलक चले एहि भाँती। देखउँ ठाढ़ कुलिस धरि छाती।।
- RCM 2.153.3Open verse →
मैं आपन किमि कहौं कलेसू। जिअत फिरेउँ लेइ राम सँदेसू।।
अर्थ · Hindi
मैं आपन किमि कहौं कलेसू। जिअत फिरेउँ लेइ राम सँदेसू।।
- RCM 2.153.4Open verse →
अस कहि सचिव बचन रहि गयऊ। हानि गलानि सोच बस भयऊ।।
अर्थ · Hindi
अस कहि सचिव बचन रहि गयऊ। हानि गलानि सोच बस भयऊ।।
- RCM 2.153.5Open verse →
सुत बचन सुनतहिं नरनाहू। परेउ धरनि उर दारुन दाहू।।
अर्थ · Hindi
सुत बचन सुनतहिं नरनाहू। परेउ धरनि उर दारुन दाहू।।
- RCM 2.153.6Open verse →
तलफत बिषम मोह मन मापा। माजा मनहुँ मीन कहुँ ब्यापा।।
अर्थ · Hindi
तलफत बिषम मोह मन मापा। माजा मनहुँ मीन कहुँ ब्यापा।।
- RCM 2.153.7Open verse →
करि बिलाप सब रोवहिं रानी। महा बिपति किमि जाइ बखानी।।
अर्थ · Hindi
करि बिलाप सब रोवहिं रानी। महा बिपति किमि जाइ बखानी।।
- RCM 2.153.8Open verse →
सुनि बिलाप दुखहू दुखु लागा। धीरजहू कर धीरजु भागा।।
अर्थ · Hindi
सुनि बिलाप दुखहू दुखु लागा। धीरजहू कर धीरजु भागा।।
- RCM 2.153.9Open verse →
भयउ कोलाहलु अवध अति सुनि नृप राउर सोरु।
अर्थ · Hindi
भयउ कोलाहलु अवध अति सुनि नृप राउर सोरु।
- RCM 2.153.10Open verse →
बिपुल बिहग बन परेउ निसि मानहुँ कुलिस कठोरु।।153।।
अर्थ · Hindi
बिपुल बिहग बन परेउ निसि मानहुँ कुलिस कठोरु।।153।।
- RCM 2.154.1Open verse →
प्रान कंठगत भयउ भुआलू। मनि बिहीन जनु ब्याकुल ब्यालू।।
अर्थ · Hindi
प्रान कंठगत भयउ भुआलू। मनि बिहीन जनु ब्याकुल ब्यालू।।
- RCM 2.154.2Open verse →
इद्रीं सकल बिकल भइँ भारी। जनु सर सरसिज बनु बिनु बारी।।
अर्थ · Hindi
इद्रीं सकल बिकल भइँ भारी। जनु सर सरसिज बनु बिनु बारी।।
- RCM 2.154.3Open verse →
कौसल्याँ नृपु दीख मलाना। रबिकुल रबि अँथयउ जियँ जाना।
अर्थ · Hindi
कौसल्याँ नृपु दीख मलाना। रबिकुल रबि अँथयउ जियँ जाना।
- RCM 2.154.4Open verse →
उर धरि धीर राम महतारी। बोली बचन समय अनुसारी।।
अर्थ · Hindi
उर धरि धीर राम महतारी। बोली बचन समय अनुसारी।।
- RCM 2.154.5Open verse →
नाथ समुझि मन करिअ बिचारू। राम बियोग पयोधि अपारू।।
अर्थ · Hindi
नाथ समुझि मन करिअ बिचारू। राम बियोग पयोधि अपारू।।
- RCM 2.154.6Open verse →
करनधार तुम्ह अवध जहाजू। चढ़ेउ सकल प्रिय पथिक समाजू।।
अर्थ · Hindi
करनधार तुम्ह अवध जहाजू। चढ़ेउ सकल प्रिय पथिक समाजू।।
- RCM 2.154.7Open verse →
धीरजु धरिअ त पाइअ पारू। नाहिं त बूड़िहि सबु परिवारू।।
अर्थ · Hindi
धीरजु धरिअ त पाइअ पारू। नाहिं त बूड़िहि सबु परिवारू।।
- RCM 2.154.8Open verse →
जौं जियँ धरिअ बिनय पिय मोरी। रामु लखनु सिय मिलहिं बहोरी।।
अर्थ · Hindi
जौं जियँ धरिअ बिनय पिय मोरी। रामु लखनु सिय मिलहिं बहोरी।।
- RCM 2.154.9Open verse →
प्रिया बचन मृदु सुनत नृपु चितयउ आँखि उघारि।
अर्थ · Hindi
प्रिया बचन मृदु सुनत नृपु चितयउ आँखि उघारि।
- RCM 2.154.10Open verse →
तलफत मीन मलीन जनु सींचत सीतल बारि।।154।।
अर्थ · Hindi
तलफत मीन मलीन जनु सींचत सीतल बारि।।154।।
- RCM 2.155.1Open verse →
धरि धीरजु उठी बैठ भुआलू। कहु सुमंत्र कहँ राम कृपालू।।
अर्थ · Hindi
धरि धीरजु उठी बैठ भुआलू। कहु सुमंत्र कहँ राम कृपालू।।
- RCM 2.155.2Open verse →
कहाँ लखनु कहँ रामु सनेही। कहँ प्रिय पुत्रबधू बैदेही।।
अर्थ · Hindi
कहाँ लखनु कहँ रामु सनेही। कहँ प्रिय पुत्रबधू बैदेही।।
- RCM 2.155.3Open verse →
बिलपत राउ बिकल बहु भाँती। भइ जुग सरिस सिराति न राती।।
अर्थ · Hindi
बिलपत राउ बिकल बहु भाँती। भइ जुग सरिस सिराति न राती।।
- RCM 2.155.4Open verse →
तापस अंध साप सुधि आई। कौसल्यहि सब कथा सुनाई।।
अर्थ · Hindi
तापस अंध साप सुधि आई। कौसल्यहि सब कथा सुनाई।।
- RCM 2.155.5Open verse →
भयउ बिकल बरनत इतिहासा। राम रहित धिग जीवन आसा।।
अर्थ · Hindi
भयउ बिकल बरनत इतिहासा। राम रहित धिग जीवन आसा।।
- RCM 2.155.6Open verse →
सो तनु राखि करब मैं काहा। जेंहि न प्रेम पनु मोर निबाहा।।
अर्थ · Hindi
सो तनु राखि करब मैं काहा। जेंहि न प्रेम पनु मोर निबाहा।।
- RCM 2.155.7Open verse →
हा रघुनंदन प्रान पिरीते। तुम्ह बिनु जिअत बहुत दिन बीते।।
अर्थ · Hindi
हा रघुनंदन प्रान पिरीते। तुम्ह बिनु जिअत बहुत दिन बीते।।
- RCM 2.155.8Open verse →
हा जानकी लखन हा रघुबर। हा पितु हित चित चातक जलधर।
अर्थ · Hindi
हा जानकी लखन हा रघुबर। हा पितु हित चित चातक जलधर।
- RCM 2.155.9Open verse →
राम राम कहि राम कहि राम राम कहि राम।
अर्थ · Hindi
राम राम कहि राम कहि राम राम कहि राम।
- RCM 2.155.10Open verse →
तनु परिहरि रघुबर बिरहँ राउ गयउ सुरधाम।।155।।
अर्थ · Hindi
तनु परिहरि रघुबर बिरहँ राउ गयउ सुरधाम।।155।।
- RCM 2.156.1Open verse →
जिअन मरन फलु दसरथ पावा। अंड अनेक अमल जसु छावा।।
अर्थ · Hindi
जिअन मरन फलु दसरथ पावा। अंड अनेक अमल जसु छावा।।
- RCM 2.156.2Open verse →
जिअत राम बिधु बदनु निहारा। राम बिरह करि मरनु सँवारा।।
अर्थ · Hindi
जिअत राम बिधु बदनु निहारा। राम बिरह करि मरनु सँवारा।।
- RCM 2.156.3Open verse →
सोक बिकल सब रोवहिं रानी। रूपु सील बलु तेजु बखानी।।
अर्थ · Hindi
सोक बिकल सब रोवहिं रानी। रूपु सील बलु तेजु बखानी।।
- RCM 2.156.4Open verse →
करहिं बिलाप अनेक प्रकारा। परहीं भूमितल बारहिं बारा।।
अर्थ · Hindi
करहिं बिलाप अनेक प्रकारा। परहीं भूमितल बारहिं बारा।।
- RCM 2.156.5Open verse →
बिलपहिं बिकल दास अरु दासी। घर घर रुदनु करहिं पुरबासी।।
अर्थ · Hindi
बिलपहिं बिकल दास अरु दासी। घर घर रुदनु करहिं पुरबासी।।
- RCM 2.156.6Open verse →
अँथयउ आजु भानुकुल भानू। धरम अवधि गुन रूप निधानू।।
अर्थ · Hindi
अँथयउ आजु भानुकुल भानू। धरम अवधि गुन रूप निधानू।।
- RCM 2.156.7Open verse →
गारीं सकल कैकइहि देहीं। नयन बिहीन कीन्ह जग जेहीं।।
अर्थ · Hindi
गारीं सकल कैकइहि देहीं। नयन बिहीन कीन्ह जग जेहीं।।
- RCM 2.156.8Open verse →
एहि बिधि बिलपत रैनि बिहानी। आए सकल महामुनि ग्यानी।।
अर्थ · Hindi
एहि बिधि बिलपत रैनि बिहानी। आए सकल महामुनि ग्यानी।।
- RCM 2.156.9Open verse →
तब बसिष्ठ मुनि समय सम कहि अनेक इतिहास।
अर्थ · Hindi
तब बसिष्ठ मुनि समय सम कहि अनेक इतिहास।
- RCM 2.156.10Open verse →
सोक नेवारेउ सबहि कर निज बिग्यान प्रकास।।156।।
अर्थ · Hindi
सोक नेवारेउ सबहि कर निज बिग्यान प्रकास।।156।।
- RCM 2.157.1Open verse →
तेल नाँव भरि नृप तनु राखा। दूत बोलाइ बहुरि अस भाषा।।
अर्थ · Hindi
तेल नाँव भरि नृप तनु राखा। दूत बोलाइ बहुरि अस भाषा।।
- RCM 2.157.2Open verse →
धावहु बेगि भरत पहिं जाहू। नृप सुधि कतहुँ कहहु जनि काहू।।
अर्थ · Hindi
धावहु बेगि भरत पहिं जाहू। नृप सुधि कतहुँ कहहु जनि काहू।।
- RCM 2.157.3Open verse →
एतनेइ कहेहु भरत सन जाई। गुर बोलाई पठयउ दोउ भाई।।
अर्थ · Hindi
एतनेइ कहेहु भरत सन जाई। गुर बोलाई पठयउ दोउ भाई।।
- RCM 2.157.4Open verse →
सुनि मुनि आयसु धावन धाए। चले बेग बर बाजि लजाए।।
अर्थ · Hindi
सुनि मुनि आयसु धावन धाए। चले बेग बर बाजि लजाए।।
- RCM 2.157.5Open verse →
अनरथु अवध अरंभेउ जब तें। कुसगुन होहिं भरत कहुँ तब तें।।
अर्थ · Hindi
अनरथु अवध अरंभेउ जब तें। कुसगुन होहिं भरत कहुँ तब तें।।
- RCM 2.157.6Open verse →
देखहिं राति भयानक सपना। जागि करहिं कटु कोटि कलपना।।
अर्थ · Hindi
देखहिं राति भयानक सपना। जागि करहिं कटु कोटि कलपना।।
- RCM 2.157.7Open verse →
बिप्र जेवाँइ देहिं दिन दाना। सिव अभिषेक करहिं बिधि नाना।।
अर्थ · Hindi
बिप्र जेवाँइ देहिं दिन दाना। सिव अभिषेक करहिं बिधि नाना।।
- RCM 2.157.8Open verse →
मागहिं हृदयँ महेस मनाई। कुसल मातु पितु परिजन भाई।।
अर्थ · Hindi
मागहिं हृदयँ महेस मनाई। कुसल मातु पितु परिजन भाई।।
- RCM 2.157.9Open verse →
एहि बिधि सोचत भरत मन धावन पहुँचे आइ।
अर्थ · Hindi
एहि बिधि सोचत भरत मन धावन पहुँचे आइ।
- RCM 2.157.10Open verse →
गुर अनुसासन श्रवन सुनि चले गनेसु मनाइ।।157।।
अर्थ · Hindi
गुर अनुसासन श्रवन सुनि चले गनेसु मनाइ।।157।।
- RCM 2.158.1Open verse →
चले समीर बेग हय हाँके। नाघत सरित सैल बन बाँके।।
अर्थ · Hindi
चले समीर बेग हय हाँके। नाघत सरित सैल बन बाँके।।
- RCM 2.158.2Open verse →
हृदयँ सोचु बड़ कछु न सोहाई। अस जानहिं जियँ जाउँ उड़ाई।।
अर्थ · Hindi
हृदयँ सोचु बड़ कछु न सोहाई। अस जानहिं जियँ जाउँ उड़ाई।।
- RCM 2.158.3Open verse →
एक निमेष बरस सम जाई। एहि बिधि भरत नगर निअराई।।
अर्थ · Hindi
एक निमेष बरस सम जाई। एहि बिधि भरत नगर निअराई।।
- RCM 2.158.4Open verse →
असगुन होहिं नगर पैठारा। रटहिं कुभाँति कुखेत करारा।।
अर्थ · Hindi
असगुन होहिं नगर पैठारा। रटहिं कुभाँति कुखेत करारा।।
- RCM 2.158.5Open verse →
खर सिआर बोलहिं प्रतिकूला। सुनि सुनि होइ भरत मन सूला।।
अर्थ · Hindi
खर सिआर बोलहिं प्रतिकूला। सुनि सुनि होइ भरत मन सूला।।
- RCM 2.158.6Open verse →
श्रीहत सर सरिता बन बागा। नगरु बिसेषि भयावनु लागा।।
अर्थ · Hindi
श्रीहत सर सरिता बन बागा। नगरु बिसेषि भयावनु लागा।।
- RCM 2.158.7Open verse →
खग मृग हय गय जाहिं न जोए। राम बियोग कुरोग बिगोए।।
अर्थ · Hindi
खग मृग हय गय जाहिं न जोए। राम बियोग कुरोग बिगोए।।
- RCM 2.158.8Open verse →
नगर नारि नर निपट दुखारी। मनहुँ सबन्हि सब संपति हारी।।
अर्थ · Hindi
नगर नारि नर निपट दुखारी। मनहुँ सबन्हि सब संपति हारी।।
- RCM 2.158.9Open verse →
पुरजन मिलिहिं न कहहिं कछु गवँहिं जोहारहिं जाहिं।
अर्थ · Hindi
पुरजन मिलिहिं न कहहिं कछु गवँहिं जोहारहिं जाहिं।
- RCM 2.158.10Open verse →
भरत कुसल पूँछि न सकहिं भय बिषाद मन माहिं।।158।।
अर्थ · Hindi
भरत कुसल पूँछि न सकहिं भय बिषाद मन माहिं।।158।।
- RCM 2.159.1Open verse →
हाट बाट नहिं जाइ निहारी। जनु पुर दहँ दिसि लागि दवारी।।
अर्थ · Hindi
हाट बाट नहिं जाइ निहारी। जनु पुर दहँ दिसि लागि दवारी।।
- RCM 2.159.2Open verse →
आवत सुत सुनि कैकयनंदिनि। हरषी रबिकुल जलरुह चंदिनि।।
अर्थ · Hindi
आवत सुत सुनि कैकयनंदिनि। हरषी रबिकुल जलरुह चंदिनि।।
- RCM 2.159.3Open verse →
सजि आरती मुदित उठि धाई। द्वारेहिं भेंटि भवन लेइ आई।।
अर्थ · Hindi
सजि आरती मुदित उठि धाई। द्वारेहिं भेंटि भवन लेइ आई।।
- RCM 2.159.4Open verse →
भरत दुखित परिवारु निहारा। मानहुँ तुहिन बनज बनु मारा।।
अर्थ · Hindi
भरत दुखित परिवारु निहारा। मानहुँ तुहिन बनज बनु मारा।।
- RCM 2.159.5Open verse →
कैकेई हरषित एहि भाँति। मनहुँ मुदित दव लाइ किराती।।
अर्थ · Hindi
कैकेई हरषित एहि भाँति। मनहुँ मुदित दव लाइ किराती।।
- RCM 2.159.6Open verse →
सुतहि ससोच देखि मनु मारें। पूँछति नैहर कुसल हमारें।।
अर्थ · Hindi
सुतहि ससोच देखि मनु मारें। पूँछति नैहर कुसल हमारें।।
- RCM 2.159.7Open verse →
सकल कुसल कहि भरत सुनाई। पूँछी निज कुल कुसल भलाई।।
अर्थ · Hindi
सकल कुसल कहि भरत सुनाई। पूँछी निज कुल कुसल भलाई।।
- RCM 2.159.8Open verse →
कहु कहँ तात कहाँ सब माता। कहँ सिय राम लखन प्रिय भ्राता।।
अर्थ · Hindi
कहु कहँ तात कहाँ सब माता। कहँ सिय राम लखन प्रिय भ्राता।।
- RCM 2.159.9Open verse →
सुनि सुत बचन सनेहमय कपट नीर भरि नैन।
अर्थ · Hindi
सुनि सुत बचन सनेहमय कपट नीर भरि नैन।
- RCM 2.159.10Open verse →
भरत श्रवन मन सूल सम पापिनि बोली बैन।।159।।
अर्थ · Hindi
भरत श्रवन मन सूल सम पापिनि बोली बैन।।159।।
- RCM 2.160.1Open verse →
तात बात मैं सकल सँवारी। भै मंथरा सहाय बिचारी।।
अर्थ · Hindi
तात बात मैं सकल सँवारी। भै मंथरा सहाय बिचारी।।
- RCM 2.160.2Open verse →
कछुक काज बिधि बीच बिगारेउ। भूपति सुरपति पुर पगु धारेउ।।
अर्थ · Hindi
कछुक काज बिधि बीच बिगारेउ। भूपति सुरपति पुर पगु धारेउ।।
- RCM 2.160.3Open verse →
सुनत भरतु भए बिबस बिषादा। जनु सहमेउ करि केहरि नादा।।
अर्थ · Hindi
सुनत भरतु भए बिबस बिषादा। जनु सहमेउ करि केहरि नादा।।
- RCM 2.160.4Open verse →
तात तात हा तात पुकारी। परे भूमितल ब्याकुल भारी।।
अर्थ · Hindi
तात तात हा तात पुकारी। परे भूमितल ब्याकुल भारी।।
- RCM 2.160.5Open verse →
चलत न देखन पायउँ तोही। तात न रामहि सौंपेहु मोही।।
अर्थ · Hindi
चलत न देखन पायउँ तोही। तात न रामहि सौंपेहु मोही।।
- RCM 2.160.6Open verse →
बहुरि धीर धरि उठे सँभारी। कहु पितु मरन हेतु महतारी।।
अर्थ · Hindi
बहुरि धीर धरि उठे सँभारी। कहु पितु मरन हेतु महतारी।।
- RCM 2.160.7Open verse →
सुनि सुत बचन कहति कैकेई। मरमु पाँछि जनु माहुर देई।।
अर्थ · Hindi
सुनि सुत बचन कहति कैकेई। मरमु पाँछि जनु माहुर देई।।
- RCM 2.160.8Open verse →
आदिहु तें सब आपनि करनी। कुटिल कठोर मुदित मन बरनी।।
अर्थ · Hindi
आदिहु तें सब आपनि करनी। कुटिल कठोर मुदित मन बरनी।।
- RCM 2.160.9Open verse →
भरतहि बिसरेउ पितु मरन सुनत राम बन गौनु।
अर्थ · Hindi
भरतहि बिसरेउ पितु मरन सुनत राम बन गौनु।
- RCM 2.160.10Open verse →
हेतु अपनपउ जानि जियँ थकित रहे धरि मौनु।।160।।
अर्थ · Hindi
हेतु अपनपउ जानि जियँ थकित रहे धरि मौनु।।160।।
- RCM 2.161.1Open verse →
बिकल बिलोकि सुतहि समुझावति। मनहुँ जरे पर लोनु लगावति।।
अर्थ · Hindi
बिकल बिलोकि सुतहि समुझावति। मनहुँ जरे पर लोनु लगावति।।
- RCM 2.161.2Open verse →
तात राउ नहिं सोचे जोगू। बिढ़इ सुकृत जसु कीन्हेउ भोगू।।
अर्थ · Hindi
तात राउ नहिं सोचे जोगू। बिढ़इ सुकृत जसु कीन्हेउ भोगू।।
- RCM 2.161.3Open verse →
जीवत सकल जनम फल पाए। अंत अमरपति सदन सिधाए।।
अर्थ · Hindi
जीवत सकल जनम फल पाए। अंत अमरपति सदन सिधाए।।
- RCM 2.161.4Open verse →
अस अनुमानि सोच परिहरहू। सहित समाज राज पुर करहू।।
अर्थ · Hindi
अस अनुमानि सोच परिहरहू। सहित समाज राज पुर करहू।।
- RCM 2.161.5Open verse →
सुनि सुठि सहमेउ राजकुमारू। पाकें छत जनु लाग अँगारू।।
अर्थ · Hindi
सुनि सुठि सहमेउ राजकुमारू। पाकें छत जनु लाग अँगारू।।
- RCM 2.161.6Open verse →
धीरज धरि भरि लेहिं उसासा। पापनि सबहि भाँति कुल नासा।।
अर्थ · Hindi
धीरज धरि भरि लेहिं उसासा। पापनि सबहि भाँति कुल नासा।।
- RCM 2.161.7Open verse →
जौं पै कुरुचि रही अति तोही। जनमत काहे न मारे मोही।।
अर्थ · Hindi
जौं पै कुरुचि रही अति तोही। जनमत काहे न मारे मोही।।
- RCM 2.161.8Open verse →
पेड़ काटि तैं पालउ सींचा। मीन जिअन निति बारि उलीचा।।
अर्थ · Hindi
पेड़ काटि तैं पालउ सींचा। मीन जिअन निति बारि उलीचा।।
- RCM 2.161.9Open verse →
हंसबंसु दसरथु जनकु राम लखन से भाइ।
अर्थ · Hindi
हंसबंसु दसरथु जनकु राम लखन से भाइ।
- RCM 2.161.10Open verse →
जननी तूँ जननी भई बिधि सन कछु न बसाइ।।161।।
अर्थ · Hindi
जननी तूँ जननी भई बिधि सन कछु न बसाइ।।161।।
- RCM 2.162.1Open verse →
जब तैं कुमति कुमत जियँ ठयऊ। खंड खंड होइ ह्रदउ न गयऊ।।
अर्थ · Hindi
जब तैं कुमति कुमत जियँ ठयऊ। खंड खंड होइ ह्रदउ न गयऊ।।
- RCM 2.162.2Open verse →
बर मागत मन भइ नहिं पीरा। गरि न जीह मुहँ परेउ न कीरा।।
अर्थ · Hindi
बर मागत मन भइ नहिं पीरा। गरि न जीह मुहँ परेउ न कीरा।।
- RCM 2.162.3Open verse →
भूपँ प्रतीत तोरि किमि कीन्ही। मरन काल बिधि मति हरि लीन्ही।।
अर्थ · Hindi
भूपँ प्रतीत तोरि किमि कीन्ही। मरन काल बिधि मति हरि लीन्ही।।
- RCM 2.162.4Open verse →
बिधिहुँ न नारि हृदय गति जानी। सकल कपट अघ अवगुन खानी।।
अर्थ · Hindi
बिधिहुँ न नारि हृदय गति जानी। सकल कपट अघ अवगुन खानी।।
- RCM 2.162.5Open verse →
सरल सुसील धरम रत राऊ। सो किमि जानै तीय सुभाऊ।।
अर्थ · Hindi
सरल सुसील धरम रत राऊ। सो किमि जानै तीय सुभाऊ।।
- RCM 2.162.6Open verse →
अस को जीव जंतु जग माहीं। जेहि रघुनाथ प्रानप्रिय नाहीं।।
अर्थ · Hindi
अस को जीव जंतु जग माहीं। जेहि रघुनाथ प्रानप्रिय नाहीं।।
- RCM 2.162.7Open verse →
भे अति अहित रामु तेउ तोही। को तू अहसि सत्य कहु मोही।।
अर्थ · Hindi
भे अति अहित रामु तेउ तोही। को तू अहसि सत्य कहु मोही।।
- RCM 2.162.8Open verse →
जो हसि सो हसि मुहँ मसि लाई। आँखि ओट उठि बैठहिं जाई।।
अर्थ · Hindi
जो हसि सो हसि मुहँ मसि लाई। आँखि ओट उठि बैठहिं जाई।।
- RCM 2.162.9Open verse →
राम बिरोधी हृदय तें प्रगट कीन्ह बिधि मोहि।
अर्थ · Hindi
राम बिरोधी हृदय तें प्रगट कीन्ह बिधि मोहि।
- RCM 2.162.10Open verse →
मो समान को पातकी बादि कहउँ कछु तोहि।।162।।
अर्थ · Hindi
मो समान को पातकी बादि कहउँ कछु तोहि।।162।।
- RCM 2.163.1Open verse →
सुनि सत्रुघुन मातु कुटिलाई। जरहिं गात रिस कछु न बसाई।।
अर्थ · Hindi
सुनि सत्रुघुन मातु कुटिलाई। जरहिं गात रिस कछु न बसाई।।
- RCM 2.163.2Open verse →
तेहि अवसर कुबरी तहँ आई। बसन बिभूषन बिबिध बनाई।।
अर्थ · Hindi
तेहि अवसर कुबरी तहँ आई। बसन बिभूषन बिबिध बनाई।।
- RCM 2.163.3Open verse →
लखि रिस भरेउ लखन लघु भाई। बरत अनल घृत आहुति पाई।।
अर्थ · Hindi
लखि रिस भरेउ लखन लघु भाई। बरत अनल घृत आहुति पाई।।
- RCM 2.163.4Open verse →
हुमगि लात तकि कूबर मारा। परि मुह भर महि करत पुकारा।।
अर्थ · Hindi
हुमगि लात तकि कूबर मारा। परि मुह भर महि करत पुकारा।।
- RCM 2.163.5Open verse →
कूबर टूटेउ फूट कपारू। दलित दसन मुख रुधिर प्रचारू।।
अर्थ · Hindi
कूबर टूटेउ फूट कपारू। दलित दसन मुख रुधिर प्रचारू।।
- RCM 2.163.6Open verse →
आह दइअ मैं काह नसावा। करत नीक फलु अनइस पावा।।
अर्थ · Hindi
आह दइअ मैं काह नसावा। करत नीक फलु अनइस पावा।।
- RCM 2.163.7Open verse →
सुनि रिपुहन लखि नख सिख खोटी। लगे घसीटन धरि धरि झोंटी।।
अर्थ · Hindi
सुनि रिपुहन लखि नख सिख खोटी। लगे घसीटन धरि धरि झोंटी।।
- RCM 2.163.8Open verse →
भरत दयानिधि दीन्हि छड़ाई। कौसल्या पहिं गे दोउ भाई।।
अर्थ · Hindi
भरत दयानिधि दीन्हि छड़ाई। कौसल्या पहिं गे दोउ भाई।।
- RCM 2.163.9Open verse →
मलिन बसन बिबरन बिकल कृस सरीर दुख भार।
अर्थ · Hindi
मलिन बसन बिबरन बिकल कृस सरीर दुख भार।
- RCM 2.163.10Open verse →
कनक कलप बर बेलि बन मानहुँ हनी तुसार।।163।।
अर्थ · Hindi
कनक कलप बर बेलि बन मानहुँ हनी तुसार।।163।।
- RCM 2.164.1Open verse →
भरतहि देखि मातु उठि धाई। मुरुछित अवनि परी झइँ आई।।
अर्थ · Hindi
भरतहि देखि मातु उठि धाई। मुरुछित अवनि परी झइँ आई।।
- RCM 2.164.2Open verse →
देखत भरतु बिकल भए भारी। परे चरन तन दसा बिसारी।।
अर्थ · Hindi
देखत भरतु बिकल भए भारी। परे चरन तन दसा बिसारी।।
- RCM 2.164.3Open verse →
मातु तात कहँ देहि देखाई। कहँ सिय रामु लखनु दोउ भाई।।
अर्थ · Hindi
मातु तात कहँ देहि देखाई। कहँ सिय रामु लखनु दोउ भाई।।
- RCM 2.164.4Open verse →
कैकइ कत जनमी जग माझा। जौं जनमि त भइ काहे न बाँझा।।
अर्थ · Hindi
कैकइ कत जनमी जग माझा। जौं जनमि त भइ काहे न बाँझा।।
- RCM 2.164.5Open verse →
कुल कलंकु जेहिं जनमेउ मोही। अपजस भाजन प्रियजन द्रोही।।
अर्थ · Hindi
कुल कलंकु जेहिं जनमेउ मोही। अपजस भाजन प्रियजन द्रोही।।
- RCM 2.164.6Open verse →
को तिभुवन मोहि सरिस अभागी। गति असि तोरि मातु जेहि लागी।।
अर्थ · Hindi
को तिभुवन मोहि सरिस अभागी। गति असि तोरि मातु जेहि लागी।।
- RCM 2.164.7Open verse →
पितु सुरपुर बन रघुबर केतू। मैं केवल सब अनरथ हेतु।।
अर्थ · Hindi
पितु सुरपुर बन रघुबर केतू। मैं केवल सब अनरथ हेतु।।
- RCM 2.164.8Open verse →
धिग मोहि भयउँ बेनु बन आगी। दुसह दाह दुख दूषन भागी।।
अर्थ · Hindi
धिग मोहि भयउँ बेनु बन आगी। दुसह दाह दुख दूषन भागी।।
- RCM 2.164.9Open verse →
मातु भरत के बचन मृदु सुनि सुनि उठी सँभारि।।
अर्थ · Hindi
मातु भरत के बचन मृदु सुनि सुनि उठी सँभारि।।
- RCM 2.164.10Open verse →
लिए उठाइ लगाइ उर लोचन मोचति बारि।।164।।
अर्थ · Hindi
लिए उठाइ लगाइ उर लोचन मोचति बारि।।164।।
- RCM 2.165.1Open verse →
सरल सुभाय मायँ हियँ लाए। अति हित मनहुँ राम फिरि आए।।
अर्थ · Hindi
सरल सुभाय मायँ हियँ लाए। अति हित मनहुँ राम फिरि आए।।
- RCM 2.165.2Open verse →
भेंटेउ बहुरि लखन लघु भाई। सोकु सनेहु न हृदयँ समाई।।
अर्थ · Hindi
भेंटेउ बहुरि लखन लघु भाई। सोकु सनेहु न हृदयँ समाई।।
- RCM 2.165.3Open verse →
देखि सुभाउ कहत सबु कोई। राम मातु अस काहे न होई।।
अर्थ · Hindi
देखि सुभाउ कहत सबु कोई। राम मातु अस काहे न होई।।
- RCM 2.165.4Open verse →
माताँ भरतु गोद बैठारे। आँसु पौंछि मृदु बचन उचारे।।
अर्थ · Hindi
माताँ भरतु गोद बैठारे। आँसु पौंछि मृदु बचन उचारे।।
- RCM 2.165.5Open verse →
अजहुँ बच्छ बलि धीरज धरहू। कुसमउ समुझि सोक परिहरहू।।
अर्थ · Hindi
अजहुँ बच्छ बलि धीरज धरहू। कुसमउ समुझि सोक परिहरहू।।
- RCM 2.165.6Open verse →
जनि मानहु हियँ हानि गलानी। काल करम गति अघटित जानि।।
अर्थ · Hindi
जनि मानहु हियँ हानि गलानी। काल करम गति अघटित जानि।।
- RCM 2.165.7Open verse →
काहुहि दोसु देहु जनि ताता। भा मोहि सब बिधि बाम बिधाता।।
अर्थ · Hindi
काहुहि दोसु देहु जनि ताता। भा मोहि सब बिधि बाम बिधाता।।
- RCM 2.165.8Open verse →
जो एतेहुँ दुख मोहि जिआवा। अजहुँ को जानइ का तेहि भावा।।
अर्थ · Hindi
जो एतेहुँ दुख मोहि जिआवा। अजहुँ को जानइ का तेहि भावा।।
- RCM 2.165.9Open verse →
पितु आयस भूषन बसन तात तजे रघुबीर।
अर्थ · Hindi
पितु आयस भूषन बसन तात तजे रघुबीर।
- RCM 2.165.10Open verse →
बिसमउ हरषु न हृदयँ कछु पहिरे बलकल चीर। 165।।
अर्थ · Hindi
बिसमउ हरषु न हृदयँ कछु पहिरे बलकल चीर। 165।।
- RCM 2.166.1Open verse →
मुख प्रसन्न मन रंग न रोषू। सब कर सब बिधि करि परितोषू।।
अर्थ · Hindi
मुख प्रसन्न मन रंग न रोषू। सब कर सब बिधि करि परितोषू।।
- RCM 2.166.2Open verse →
चले बिपिन सुनि सिय सँग लागी। रहइ न राम चरन अनुरागी।।
अर्थ · Hindi
चले बिपिन सुनि सिय सँग लागी। रहइ न राम चरन अनुरागी।।
- RCM 2.166.3Open verse →
सुनतहिं लखनु चले उठि साथा। रहहिं न जतन किए रघुनाथा।।
अर्थ · Hindi
सुनतहिं लखनु चले उठि साथा। रहहिं न जतन किए रघुनाथा।।
- RCM 2.166.4Open verse →
तब रघुपति सबही सिरु नाई। चले संग सिय अरु लघु भाई।।
अर्थ · Hindi
तब रघुपति सबही सिरु नाई। चले संग सिय अरु लघु भाई।।
- RCM 2.166.5Open verse →
रामु लखनु सिय बनहि सिधाए। गइउँ न संग न प्रान पठाए।।
अर्थ · Hindi
रामु लखनु सिय बनहि सिधाए। गइउँ न संग न प्रान पठाए।।
- RCM 2.166.6Open verse →
यहु सबु भा इन्ह आँखिन्ह आगें। तउ न तजा तनु जीव अभागें।।
अर्थ · Hindi
यहु सबु भा इन्ह आँखिन्ह आगें। तउ न तजा तनु जीव अभागें।।
- RCM 2.166.7Open verse →
मोहि न लाज निज नेहु निहारी। राम सरिस सुत मैं महतारी।।
अर्थ · Hindi
मोहि न लाज निज नेहु निहारी। राम सरिस सुत मैं महतारी।।
- RCM 2.166.8Open verse →
जिऐ मरै भल भूपति जाना। मोर हृदय सत कुलिस समाना।।
अर्थ · Hindi
जिऐ मरै भल भूपति जाना। मोर हृदय सत कुलिस समाना।।
- RCM 2.166.9Open verse →
कौसल्या के बचन सुनि भरत सहित रनिवास।
अर्थ · Hindi
कौसल्या के बचन सुनि भरत सहित रनिवास।
- RCM 2.166.10Open verse →
ब्याकुल बिलपत राजगृह मानहुँ सोक नेवासु।।166।।
अर्थ · Hindi
ब्याकुल बिलपत राजगृह मानहुँ सोक नेवासु।।166।।
- RCM 2.167.1Open verse →
बिलपहिं बिकल भरत दोउ भाई। कौसल्याँ लिए हृदयँ लगाई।।
अर्थ · Hindi
बिलपहिं बिकल भरत दोउ भाई। कौसल्याँ लिए हृदयँ लगाई।।
- RCM 2.167.2Open verse →
भाँति अनेक भरतु समुझाए। कहि बिबेकमय बचन सुनाए।।
अर्थ · Hindi
भाँति अनेक भरतु समुझाए। कहि बिबेकमय बचन सुनाए।।
- RCM 2.167.3Open verse →
भरतहुँ मातु सकल समुझाईं। कहि पुरान श्रुति कथा सुहाईं।।
अर्थ · Hindi
भरतहुँ मातु सकल समुझाईं। कहि पुरान श्रुति कथा सुहाईं।।
- RCM 2.167.4Open verse →
छल बिहीन सुचि सरल सुबानी। बोले भरत जोरि जुग पानी।।
अर्थ · Hindi
छल बिहीन सुचि सरल सुबानी। बोले भरत जोरि जुग पानी।।
- RCM 2.167.5Open verse →
जे अघ मातु पिता सुत मारें। गाइ गोठ महिसुर पुर जारें।।
अर्थ · Hindi
जे अघ मातु पिता सुत मारें। गाइ गोठ महिसुर पुर जारें।।
- RCM 2.167.6Open verse →
जे अघ तिय बालक बध कीन्हें। मीत महीपति माहुर दीन्हें।।
अर्थ · Hindi
जे अघ तिय बालक बध कीन्हें। मीत महीपति माहुर दीन्हें।।
- RCM 2.167.7Open verse →
जे पातक उपपातक अहहीं। करम बचन मन भव कबि कहहीं।।
अर्थ · Hindi
जे पातक उपपातक अहहीं। करम बचन मन भव कबि कहहीं।।
- RCM 2.167.8Open verse →
ते पातक मोहि होहुँ बिधाता। जौं यहु होइ मोर मत माता।।
अर्थ · Hindi
ते पातक मोहि होहुँ बिधाता। जौं यहु होइ मोर मत माता।।
- RCM 2.167.9Open verse →
जे परिहरि हरि हर चरन भजहिं भूतगन घोर।
अर्थ · Hindi
जे परिहरि हरि हर चरन भजहिं भूतगन घोर।
- RCM 2.167.10Open verse →
तेहि कइ गति मोहि देउ बिधि जौं जननी मत मोर।।167।।
अर्थ · Hindi
तेहि कइ गति मोहि देउ बिधि जौं जननी मत मोर।।167।।
- RCM 2.168.1Open verse →
बेचहिं बेदु धरमु दुहि लेहीं। पिसुन पराय पाप कहि देहीं।।
अर्थ · Hindi
बेचहिं बेदु धरमु दुहि लेहीं। पिसुन पराय पाप कहि देहीं।।
- RCM 2.168.2Open verse →
कपटी कुटिल कलहप्रिय क्रोधी। बेद बिदूषक बिस्व बिरोधी।।
अर्थ · Hindi
कपटी कुटिल कलहप्रिय क्रोधी। बेद बिदूषक बिस्व बिरोधी।।
- RCM 2.168.3Open verse →
लोभी लंपट लोलुपचारा। जे ताकहिं परधनु परदारा।।
अर्थ · Hindi
लोभी लंपट लोलुपचारा। जे ताकहिं परधनु परदारा।।
- RCM 2.168.4Open verse →
पावौं मैं तिन्ह के गति घोरा। जौं जननी यहु संमत मोरा।।
अर्थ · Hindi
पावौं मैं तिन्ह के गति घोरा। जौं जननी यहु संमत मोरा।।
- RCM 2.168.5Open verse →
जे नहिं साधुसंग अनुरागे। परमारथ पथ बिमुख अभागे।।
अर्थ · Hindi
जे नहिं साधुसंग अनुरागे। परमारथ पथ बिमुख अभागे।।
- RCM 2.168.6Open verse →
जे न भजहिं हरि नरतनु पाई। जिन्हहि न हरि हर सुजसु सोहाई।।
अर्थ · Hindi
जे न भजहिं हरि नरतनु पाई। जिन्हहि न हरि हर सुजसु सोहाई।।
- RCM 2.168.7Open verse →
तजि श्रुतिपंथु बाम पथ चलहीं। बंचक बिरचि बेष जगु छलहीं।।
अर्थ · Hindi
तजि श्रुतिपंथु बाम पथ चलहीं। बंचक बिरचि बेष जगु छलहीं।।
- RCM 2.168.8Open verse →
तिन्ह कै गति मोहि संकर देऊ। जननी जौं यहु जानौं भेऊ।।
अर्थ · Hindi
तिन्ह कै गति मोहि संकर देऊ। जननी जौं यहु जानौं भेऊ।।
- RCM 2.168.9Open verse →
मातु भरत के बचन सुनि साँचे सरल सुभायँ।
अर्थ · Hindi
मातु भरत के बचन सुनि साँचे सरल सुभायँ।
- RCM 2.168.10Open verse →
कहति राम प्रिय तात तुम्ह सदा बचन मन कायँ।।168।।
अर्थ · Hindi
कहति राम प्रिय तात तुम्ह सदा बचन मन कायँ।।168।।
- RCM 2.169.1Open verse →
राम प्रानहु तें प्रान तुम्हारे। तुम्ह रघुपतिहि प्रानहु तें प्यारे।।
अर्थ · Hindi
राम प्रानहु तें प्रान तुम्हारे। तुम्ह रघुपतिहि प्रानहु तें प्यारे।।
- RCM 2.169.2Open verse →
बिधु बिष चवै स्त्रवै हिमु आगी। होइ बारिचर बारि बिरागी।।
अर्थ · Hindi
बिधु बिष चवै स्त्रवै हिमु आगी। होइ बारिचर बारि बिरागी।।
- RCM 2.169.3Open verse →
भएँ ग्यानु बरु मिटै न मोहू। तुम्ह रामहि प्रतिकूल न होहू।।
अर्थ · Hindi
भएँ ग्यानु बरु मिटै न मोहू। तुम्ह रामहि प्रतिकूल न होहू।।
- RCM 2.169.4Open verse →
मत तुम्हार यहु जो जग कहहीं। सो सपनेहुँ सुख सुगति न लहहीं।।
अर्थ · Hindi
मत तुम्हार यहु जो जग कहहीं। सो सपनेहुँ सुख सुगति न लहहीं।।
- RCM 2.169.5Open verse →
अस कहि मातु भरतु हियँ लाए। थन पय स्त्रवहिं नयन जल छाए।।
अर्थ · Hindi
अस कहि मातु भरतु हियँ लाए। थन पय स्त्रवहिं नयन जल छाए।।
- RCM 2.169.6Open verse →
करत बिलाप बहुत यहि भाँती। बैठेहिं बीति गइ सब राती।।
अर्थ · Hindi
करत बिलाप बहुत यहि भाँती। बैठेहिं बीति गइ सब राती।।
- RCM 2.169.7Open verse →
बामदेउ बसिष्ठ तब आए। सचिव महाजन सकल बोलाए।।
अर्थ · Hindi
बामदेउ बसिष्ठ तब आए। सचिव महाजन सकल बोलाए।।
- RCM 2.169.8Open verse →
मुनि बहु भाँति भरत उपदेसे। कहि परमारथ बचन सुदेसे।।
अर्थ · Hindi
मुनि बहु भाँति भरत उपदेसे। कहि परमारथ बचन सुदेसे।।
- RCM 2.169.9Open verse →
तात हृदयँ धीरजु धरहु करहु जो अवसर आजु।
अर्थ · Hindi
तात हृदयँ धीरजु धरहु करहु जो अवसर आजु।
- RCM 2.169.10Open verse →
उठे भरत गुर बचन सुनि करन कहेउ सबु साजु।।169।।
अर्थ · Hindi
उठे भरत गुर बचन सुनि करन कहेउ सबु साजु।।169।।
- RCM 2.170.1Open verse →
नृपतनु बेद बिदित अन्हवावा। परम बिचित्र बिमानु बनावा।।
अर्थ · Hindi
नृपतनु बेद बिदित अन्हवावा। परम बिचित्र बिमानु बनावा।।
- RCM 2.170.2Open verse →
गहि पद भरत मातु सब राखी। रहीं रानि दरसन अभिलाषी।।
अर्थ · Hindi
गहि पद भरत मातु सब राखी। रहीं रानि दरसन अभिलाषी।।
- RCM 2.170.3Open verse →
चंदन अगर भार बहु आए। अमित अनेक सुगंध सुहाए।।
अर्थ · Hindi
चंदन अगर भार बहु आए। अमित अनेक सुगंध सुहाए।।
- RCM 2.170.4Open verse →
सरजु तीर रचि चिता बनाई। जनु सुरपुर सोपान सुहाई।।
अर्थ · Hindi
सरजु तीर रचि चिता बनाई। जनु सुरपुर सोपान सुहाई।।
- RCM 2.170.5Open verse →
एहि बिधि दाह क्रिया सब कीन्ही। बिधिवत न्हाइ तिलांजुलि दीन्ही।।
अर्थ · Hindi
एहि बिधि दाह क्रिया सब कीन्ही। बिधिवत न्हाइ तिलांजुलि दीन्ही।।
- RCM 2.170.6Open verse →
सोधि सुमृति सब बेद पुराना। कीन्ह भरत दसगात बिधाना।।
अर्थ · Hindi
सोधि सुमृति सब बेद पुराना। कीन्ह भरत दसगात बिधाना।।
- RCM 2.170.7Open verse →
जहँ जस मुनिबर आयसु दीन्हा। तहँ तस सहस भाँति सबु कीन्हा।।
अर्थ · Hindi
जहँ जस मुनिबर आयसु दीन्हा। तहँ तस सहस भाँति सबु कीन्हा।।
- RCM 2.170.8Open verse →
भए बिसुद्ध दिए सब दाना। धेनु बाजि गज बाहन नाना।।
अर्थ · Hindi
भए बिसुद्ध दिए सब दाना। धेनु बाजि गज बाहन नाना।।
- RCM 2.170.9Open verse →
सिंघासन भूषन बसन अन्न धरनि धन धाम।
अर्थ · Hindi
सिंघासन भूषन बसन अन्न धरनि धन धाम।
- RCM 2.170.10Open verse →
दिए भरत लहि भूमिसुर भे परिपूरन काम।।170।।
अर्थ · Hindi
दिए भरत लहि भूमिसुर भे परिपूरन काम।।170।।
- RCM 2.171.1Open verse →
पितु हित भरत कीन्हि जसि करनी। सो मुख लाख जाइ नहिं बरनी।।
अर्थ · Hindi
पितु हित भरत कीन्हि जसि करनी। सो मुख लाख जाइ नहिं बरनी।।
- RCM 2.171.2Open verse →
सुदिनु सोधि मुनिबर तब आए। सचिव महाजन सकल बोलाए।।
अर्थ · Hindi
सुदिनु सोधि मुनिबर तब आए। सचिव महाजन सकल बोलाए।।
- RCM 2.171.3Open verse →
बैठे राजसभाँ सब जाई। पठए बोलि भरत दोउ भाई।।
अर्थ · Hindi
बैठे राजसभाँ सब जाई। पठए बोलि भरत दोउ भाई।।
- RCM 2.171.4Open verse →
भरतु बसिष्ठ निकट बैठारे। नीति धरममय बचन उचारे।।
अर्थ · Hindi
भरतु बसिष्ठ निकट बैठारे। नीति धरममय बचन उचारे।।
- RCM 2.171.5Open verse →
प्रथम कथा सब मुनिबर बरनी। कैकइ कुटिल कीन्हि जसि करनी।।
अर्थ · Hindi
प्रथम कथा सब मुनिबर बरनी। कैकइ कुटिल कीन्हि जसि करनी।।
- RCM 2.171.6Open verse →
भूप धरमब्रतु सत्य सराहा। जेहिं तनु परिहरि प्रेमु निबाहा।।
अर्थ · Hindi
भूप धरमब्रतु सत्य सराहा। जेहिं तनु परिहरि प्रेमु निबाहा।।
- RCM 2.171.7Open verse →
कहत राम गुन सील सुभाऊ। सजल नयन पुलकेउ मुनिराऊ।।
अर्थ · Hindi
कहत राम गुन सील सुभाऊ। सजल नयन पुलकेउ मुनिराऊ।।
- RCM 2.171.8Open verse →
बहुरि लखन सिय प्रीति बखानी। सोक सनेह मगन मुनि ग्यानी।।
अर्थ · Hindi
बहुरि लखन सिय प्रीति बखानी। सोक सनेह मगन मुनि ग्यानी।।
- RCM 2.171.9Open verse →
सुनहु भरत भावी प्रबल बिलखि कहेउ मुनिनाथ।
अर्थ · Hindi
सुनहु भरत भावी प्रबल बिलखि कहेउ मुनिनाथ।
- RCM 2.171.10Open verse →
हानि लाभु जीवन मरनु जसु अपजसु बिधि हाथ।।171।।
अर्थ · Hindi
हानि लाभु जीवन मरनु जसु अपजसु बिधि हाथ।।171।।
- RCM 2.172.1Open verse →
अस बिचारि केहि देइअ दोसू। ब्यरथ काहि पर कीजिअ रोसू।।
अर्थ · Hindi
अस बिचारि केहि देइअ दोसू। ब्यरथ काहि पर कीजिअ रोसू।।
- RCM 2.172.2Open verse →
तात बिचारु केहि करहु मन माहीं। सोच जोगु दसरथु नृपु नाहीं।।
अर्थ · Hindi
तात बिचारु केहि करहु मन माहीं। सोच जोगु दसरथु नृपु नाहीं।।
- RCM 2.172.3Open verse →
सोचिअ बिप्र जो बेद बिहीना। तजि निज धरमु बिषय लयलीना।।
अर्थ · Hindi
सोचिअ बिप्र जो बेद बिहीना। तजि निज धरमु बिषय लयलीना।।
- RCM 2.172.4Open verse →
सोचिअ नृपति जो नीति न जाना। जेहि न प्रजा प्रिय प्रान समाना।।
अर्थ · Hindi
सोचिअ नृपति जो नीति न जाना। जेहि न प्रजा प्रिय प्रान समाना।।
- RCM 2.172.5Open verse →
सोचिअ बयसु कृपन धनवानू। जो न अतिथि सिव भगति सुजानू।।
अर्थ · Hindi
सोचिअ बयसु कृपन धनवानू। जो न अतिथि सिव भगति सुजानू।।
- RCM 2.172.6Open verse →
सोचिअ सूद्रु बिप्र अवमानी। मुखर मानप्रिय ग्यान गुमानी।।
अर्थ · Hindi
सोचिअ सूद्रु बिप्र अवमानी। मुखर मानप्रिय ग्यान गुमानी।।
- RCM 2.172.7Open verse →
सोचिअ पुनि पति बंचक नारी। कुटिल कलहप्रिय इच्छाचारी।।
अर्थ · Hindi
सोचिअ पुनि पति बंचक नारी। कुटिल कलहप्रिय इच्छाचारी।।
- RCM 2.172.8Open verse →
सोचिअ बटु निज ब्रतु परिहरई। जो नहिं गुर आयसु अनुसरई।।
अर्थ · Hindi
सोचिअ बटु निज ब्रतु परिहरई। जो नहिं गुर आयसु अनुसरई।।
- RCM 2.172.9Open verse →
सोचिअ गृही जो मोह बस करइ करम पथ त्याग।
अर्थ · Hindi
सोचिअ गृही जो मोह बस करइ करम पथ त्याग।
- RCM 2.172.10Open verse →
सोचिअ जति प्रंपच रत बिगत बिबेक बिराग।।172।।
अर्थ · Hindi
सोचिअ जति प्रंपच रत बिगत बिबेक बिराग।।172।।
- RCM 2.173.1Open verse →
बैखानस सोइ सोचै जोगु। तपु बिहाइ जेहि भावइ भोगू।।
अर्थ · Hindi
बैखानस सोइ सोचै जोगु। तपु बिहाइ जेहि भावइ भोगू।।
- RCM 2.173.2Open verse →
सोचिअ पिसुन अकारन क्रोधी। जननि जनक गुर बंधु बिरोधी।।
अर्थ · Hindi
सोचिअ पिसुन अकारन क्रोधी। जननि जनक गुर बंधु बिरोधी।।
- RCM 2.173.3Open verse →
सब बिधि सोचिअ पर अपकारी। निज तनु पोषक निरदय भारी।।
अर्थ · Hindi
सब बिधि सोचिअ पर अपकारी। निज तनु पोषक निरदय भारी।।
- RCM 2.173.4Open verse →
सोचनीय सबहि बिधि सोई। जो न छाड़ि छलु हरि जन होई।।
अर्थ · Hindi
सोचनीय सबहि बिधि सोई। जो न छाड़ि छलु हरि जन होई।।
- RCM 2.173.5Open verse →
सोचनीय नहिं कोसलराऊ। भुवन चारिदस प्रगट प्रभाऊ।।
अर्थ · Hindi
सोचनीय नहिं कोसलराऊ। भुवन चारिदस प्रगट प्रभाऊ।।
- RCM 2.173.6Open verse →
भयउ न अहइ न अब होनिहारा। भूप भरत जस पिता तुम्हारा।।
अर्थ · Hindi
भयउ न अहइ न अब होनिहारा। भूप भरत जस पिता तुम्हारा।।
- RCM 2.173.7Open verse →
बिधि हरि हरु सुरपति दिसिनाथा। बरनहिं सब दसरथ गुन गाथा।।
अर्थ · Hindi
बिधि हरि हरु सुरपति दिसिनाथा। बरनहिं सब दसरथ गुन गाथा।।
- RCM 2.173.8Open verse →
कहहु तात केहि भाँति कोउ करिहि बड़ाई तासु।
अर्थ · Hindi
कहहु तात केहि भाँति कोउ करिहि बड़ाई तासु।
- RCM 2.173.9Open verse →
राम लखन तुम्ह सत्रुहन सरिस सुअन सुचि जासु।।173।।
अर्थ · Hindi
राम लखन तुम्ह सत्रुहन सरिस सुअन सुचि जासु।।173।।
- RCM 2.174.1Open verse →
सब प्रकार भूपति बड़भागी। बादि बिषादु करिअ तेहि लागी।।
अर्थ · Hindi
सब प्रकार भूपति बड़भागी। बादि बिषादु करिअ तेहि लागी।।
- RCM 2.174.2Open verse →
यहु सुनि समुझि सोचु परिहरहू। सिर धरि राज रजायसु करहू।।
अर्थ · Hindi
यहु सुनि समुझि सोचु परिहरहू। सिर धरि राज रजायसु करहू।।
- RCM 2.174.3Open verse →
राँय राजपदु तुम्ह कहुँ दीन्हा। पिता बचनु फुर चाहिअ कीन्हा।।
अर्थ · Hindi
राँय राजपदु तुम्ह कहुँ दीन्हा। पिता बचनु फुर चाहिअ कीन्हा।।
- RCM 2.174.4Open verse →
तजे रामु जेहिं बचनहि लागी। तनु परिहरेउ राम बिरहागी।।
अर्थ · Hindi
तजे रामु जेहिं बचनहि लागी। तनु परिहरेउ राम बिरहागी।।
- RCM 2.174.5Open verse →
नृपहि बचन प्रिय नहिं प्रिय प्राना। करहु तात पितु बचन प्रवाना।।
अर्थ · Hindi
नृपहि बचन प्रिय नहिं प्रिय प्राना। करहु तात पितु बचन प्रवाना।।
- RCM 2.174.6Open verse →
करहु सीस धरि भूप रजाई। हइ तुम्ह कहँ सब भाँति भलाई।।
अर्थ · Hindi
करहु सीस धरि भूप रजाई। हइ तुम्ह कहँ सब भाँति भलाई।।
- RCM 2.174.7Open verse →
परसुराम पितु अग्या राखी। मारी मातु लोक सब साखी।।
अर्थ · Hindi
परसुराम पितु अग्या राखी। मारी मातु लोक सब साखी।।
- RCM 2.174.8Open verse →
तनय जजातिहि जौबनु दयऊ। पितु अग्याँ अघ अजसु न भयऊ।।
अर्थ · Hindi
तनय जजातिहि जौबनु दयऊ। पितु अग्याँ अघ अजसु न भयऊ।।
- RCM 2.174.9Open verse →
अनुचित उचित बिचारु तजि जे पालहिं पितु बैन।
अर्थ · Hindi
अनुचित उचित बिचारु तजि जे पालहिं पितु बैन।
- RCM 2.174.10Open verse →
ते भाजन सुख सुजस के बसहिं अमरपति ऐन।।174।।
अर्थ · Hindi
ते भाजन सुख सुजस के बसहिं अमरपति ऐन।।174।।
- RCM 2.175.1Open verse →
अवसि नरेस बचन फुर करहू। पालहु प्रजा सोकु परिहरहू।।
अर्थ · Hindi
अवसि नरेस बचन फुर करहू। पालहु प्रजा सोकु परिहरहू।।
- RCM 2.175.2Open verse →
सुरपुर नृप पाइहि परितोषू। तुम्ह कहुँ सुकृत सुजसु नहिं दोषू।।
अर्थ · Hindi
सुरपुर नृप पाइहि परितोषू। तुम्ह कहुँ सुकृत सुजसु नहिं दोषू।।
- RCM 2.175.3Open verse →
बेद बिदित संमत सबही का। जेहि पितु देइ सो पावइ टीका।।
अर्थ · Hindi
बेद बिदित संमत सबही का। जेहि पितु देइ सो पावइ टीका।।
- RCM 2.175.4Open verse →
करहु राजु परिहरहु गलानी। मानहु मोर बचन हित जानी।।
अर्थ · Hindi
करहु राजु परिहरहु गलानी। मानहु मोर बचन हित जानी।।
- RCM 2.175.5Open verse →
सुनि सुखु लहब राम बैदेहीं। अनुचित कहब न पंडित केहीं।।
अर्थ · Hindi
सुनि सुखु लहब राम बैदेहीं। अनुचित कहब न पंडित केहीं।।
- RCM 2.175.6Open verse →
कौसल्यादि सकल महतारीं। तेउ प्रजा सुख होहिं सुखारीं।।
अर्थ · Hindi
कौसल्यादि सकल महतारीं। तेउ प्रजा सुख होहिं सुखारीं।।
- RCM 2.175.7Open verse →
परम तुम्हार राम कर जानिहि। सो सब बिधि तुम्ह सन भल मानिहि।।
अर्थ · Hindi
परम तुम्हार राम कर जानिहि। सो सब बिधि तुम्ह सन भल मानिहि।।
- RCM 2.175.8Open verse →
सौंपेहु राजु राम कै आएँ। सेवा करेहु सनेह सुहाएँ।।
अर्थ · Hindi
सौंपेहु राजु राम कै आएँ। सेवा करेहु सनेह सुहाएँ।।
- RCM 2.175.9Open verse →
कीजिअ गुर आयसु अवसि कहहिं सचिव कर जोरि।
अर्थ · Hindi
कीजिअ गुर आयसु अवसि कहहिं सचिव कर जोरि।
- RCM 2.175.10Open verse →
रघुपति आएँ उचित जस तस तब करब बहोरि।।175।।
अर्थ · Hindi
रघुपति आएँ उचित जस तस तब करब बहोरि।।175।।
- RCM 2.176.1Open verse →
कौसल्या धरि धीरजु कहई। पूत पथ्य गुर आयसु अहई।।
अर्थ · Hindi
कौसल्या धरि धीरजु कहई। पूत पथ्य गुर आयसु अहई।।
- RCM 2.176.2Open verse →
सो आदरिअ करिअ हित मानी। तजिअ बिषादु काल गति जानी।।
अर्थ · Hindi
सो आदरिअ करिअ हित मानी। तजिअ बिषादु काल गति जानी।।
- RCM 2.176.3Open verse →
बन रघुपति सुरपति नरनाहू। तुम्ह एहि भाँति तात कदराहू।।
अर्थ · Hindi
बन रघुपति सुरपति नरनाहू। तुम्ह एहि भाँति तात कदराहू।।
- RCM 2.176.4Open verse →
परिजन प्रजा सचिव सब अंबा। तुम्हही सुत सब कहँ अवलंबा।।
अर्थ · Hindi
परिजन प्रजा सचिव सब अंबा। तुम्हही सुत सब कहँ अवलंबा।।
- RCM 2.176.5Open verse →
लखि बिधि बाम कालु कठिनाई। धीरजु धरहु मातु बलि जाई।।
अर्थ · Hindi
लखि बिधि बाम कालु कठिनाई। धीरजु धरहु मातु बलि जाई।।
- RCM 2.176.6Open verse →
सिर धरि गुर आयसु अनुसरहू। प्रजा पालि परिजन दुखु हरहू।।
अर्थ · Hindi
सिर धरि गुर आयसु अनुसरहू। प्रजा पालि परिजन दुखु हरहू।।
- RCM 2.176.7Open verse →
गुर के बचन सचिव अभिनंदनु। सुने भरत हिय हित जनु चंदनु।।
अर्थ · Hindi
गुर के बचन सचिव अभिनंदनु। सुने भरत हिय हित जनु चंदनु।।
- RCM 2.176.8Open verse →
सुनी बहोरि मातु मृदु बानी। सील सनेह सरल रस सानी।।
अर्थ · Hindi
सुनी बहोरि मातु मृदु बानी। सील सनेह सरल रस सानी।।
- RCM 2.177.1Open verse →
मोहि उपदेसु दीन्ह गुर नीका। प्रजा सचिव संमत सबही का।।
अर्थ · Hindi
मोहि उपदेसु दीन्ह गुर नीका। प्रजा सचिव संमत सबही का।।
- RCM 2.177.2Open verse →
मातु उचित धरि आयसु दीन्हा। अवसि सीस धरि चाहउँ कीन्हा।।
अर्थ · Hindi
मातु उचित धरि आयसु दीन्हा। अवसि सीस धरि चाहउँ कीन्हा।।
- RCM 2.177.3Open verse →
गुर पितु मातु स्वामि हित बानी। सुनि मन मुदित करिअ भलि जानी।।
अर्थ · Hindi
गुर पितु मातु स्वामि हित बानी। सुनि मन मुदित करिअ भलि जानी।।
- RCM 2.177.4Open verse →
उचित कि अनुचित किएँ बिचारू। धरमु जाइ सिर पातक भारू।।
अर्थ · Hindi
उचित कि अनुचित किएँ बिचारू। धरमु जाइ सिर पातक भारू।।
- RCM 2.177.5Open verse →
तुम्ह तौ देहु सरल सिख सोई। जो आचरत मोर भल होई।।
अर्थ · Hindi
तुम्ह तौ देहु सरल सिख सोई। जो आचरत मोर भल होई।।
- RCM 2.177.6Open verse →
जद्यपि यह समुझत हउँ नीकें। तदपि होत परितोषु न जी कें।।
अर्थ · Hindi
जद्यपि यह समुझत हउँ नीकें। तदपि होत परितोषु न जी कें।।
- RCM 2.177.7Open verse →
अब तुम्ह बिनय मोरि सुनि लेहू। मोहि अनुहरत सिखावनु देहू।।
अर्थ · Hindi
अब तुम्ह बिनय मोरि सुनि लेहू। मोहि अनुहरत सिखावनु देहू।।
- RCM 2.177.8Open verse →
ऊतरु देउँ छमब अपराधू। दुखित दोष गुन गनहिं न साधू।।
अर्थ · Hindi
ऊतरु देउँ छमब अपराधू। दुखित दोष गुन गनहिं न साधू।।
- RCM 2.177.9Open verse →
पितु सुरपुर सिय रामु बन करन कहहु मोहि राजु।
अर्थ · Hindi
पितु सुरपुर सिय रामु बन करन कहहु मोहि राजु।
- RCM 2.177.10Open verse →
एहि तें जानहु मोर हित कै आपन बड़ काजु।।177।।
अर्थ · Hindi
एहि तें जानहु मोर हित कै आपन बड़ काजु।।177।।
- RCM 2.178.1Open verse →
हित हमार सियपति सेवकाई। सो हरि लीन्ह मातु कुटिलाई।।
अर्थ · Hindi
हित हमार सियपति सेवकाई। सो हरि लीन्ह मातु कुटिलाई।।
- RCM 2.178.2Open verse →
मैं अनुमानि दीख मन माहीं। आन उपायँ मोर हित नाहीं।।
अर्थ · Hindi
मैं अनुमानि दीख मन माहीं। आन उपायँ मोर हित नाहीं।।
- RCM 2.178.3Open verse →
सोक समाजु राजु केहि लेखें। लखन राम सिय बिनु पद देखें।।
अर्थ · Hindi
सोक समाजु राजु केहि लेखें। लखन राम सिय बिनु पद देखें।।
- RCM 2.178.4Open verse →
बादि बसन बिनु भूषन भारू। बादि बिरति बिनु ब्रह्म बिचारू।।
अर्थ · Hindi
बादि बसन बिनु भूषन भारू। बादि बिरति बिनु ब्रह्म बिचारू।।
- RCM 2.178.5Open verse →
सरुज सरीर बादि बहु भोगा। बिनु हरिभगति जायँ जप जोगा।।
अर्थ · Hindi
सरुज सरीर बादि बहु भोगा। बिनु हरिभगति जायँ जप जोगा।।
- RCM 2.178.6Open verse →
जायँ जीव बिनु देह सुहाई। बादि मोर सबु बिनु रघुराई।।
अर्थ · Hindi
जायँ जीव बिनु देह सुहाई। बादि मोर सबु बिनु रघुराई।।
- RCM 2.178.7Open verse →
जाउँ राम पहिं आयसु देहू। एकहिं आँक मोर हित एहू।।
अर्थ · Hindi
जाउँ राम पहिं आयसु देहू। एकहिं आँक मोर हित एहू।।
- RCM 2.178.8Open verse →
मोहि नृप करि भल आपन चहहू। सोउ सनेह जड़ता बस कहहू।।
अर्थ · Hindi
मोहि नृप करि भल आपन चहहू। सोउ सनेह जड़ता बस कहहू।।
- RCM 2.178.9Open verse →
कैकेई सुअ कुटिलमति राम बिमुख गतलाज।
अर्थ · Hindi
कैकेई सुअ कुटिलमति राम बिमुख गतलाज।
- RCM 2.178.10Open verse →
तुम्ह चाहत सुखु मोहबस मोहि से अधम कें राज।।178।।
अर्थ · Hindi
तुम्ह चाहत सुखु मोहबस मोहि से अधम कें राज।।178।।
- RCM 2.179.1Open verse →
कहउँ साँचु सब सुनि पतिआहू। चाहिअ धरमसील नरनाहू।।
अर्थ · Hindi
कहउँ साँचु सब सुनि पतिआहू। चाहिअ धरमसील नरनाहू।।
- RCM 2.179.2Open verse →
मोहि राजु हठि देइहहु जबहीं। रसा रसातल जाइहि तबहीं।।
अर्थ · Hindi
मोहि राजु हठि देइहहु जबहीं। रसा रसातल जाइहि तबहीं।।
- RCM 2.179.3Open verse →
मोहि समान को पाप निवासू। जेहि लगि सीय राम बनबासू।।
अर्थ · Hindi
मोहि समान को पाप निवासू। जेहि लगि सीय राम बनबासू।।
- RCM 2.179.4Open verse →
रायँ राम कहुँ काननु दीन्हा। बिछुरत गमनु अमरपुर कीन्हा।।
अर्थ · Hindi
रायँ राम कहुँ काननु दीन्हा। बिछुरत गमनु अमरपुर कीन्हा।।
- RCM 2.179.5Open verse →
मैं सठु सब अनरथ कर हेतू। बैठ बात सब सुनउँ सचेतू।।
अर्थ · Hindi
मैं सठु सब अनरथ कर हेतू। बैठ बात सब सुनउँ सचेतू।।
- RCM 2.179.6Open verse →
बिनु रघुबीर बिलोकि अबासू। रहे प्रान सहि जग उपहासू।।
अर्थ · Hindi
बिनु रघुबीर बिलोकि अबासू। रहे प्रान सहि जग उपहासू।।
- RCM 2.179.7Open verse →
राम पुनीत बिषय रस रूखे। लोलुप भूमि भोग के भूखे।।
अर्थ · Hindi
राम पुनीत बिषय रस रूखे। लोलुप भूमि भोग के भूखे।।
- RCM 2.179.8Open verse →
कहँ लगि कहौं हृदय कठिनाई। निदरि कुलिसु जेहिं लही बड़ाई।।
अर्थ · Hindi
कहँ लगि कहौं हृदय कठिनाई। निदरि कुलिसु जेहिं लही बड़ाई।।
- RCM 2.179.9Open verse →
कारन तें कारजु कठिन होइ दोसु नहि मोर।
अर्थ · Hindi
कारन तें कारजु कठिन होइ दोसु नहि मोर।
- RCM 2.179.10Open verse →
कुलिस अस्थि तें उपल तें लोह कराल कठोर।।179।।
अर्थ · Hindi
कुलिस अस्थि तें उपल तें लोह कराल कठोर।।179।।
- RCM 2.180.1Open verse →
कैकेई भव तनु अनुरागे। पाँवर प्रान अघाइ अभागे।।
अर्थ · Hindi
कैकेई भव तनु अनुरागे। पाँवर प्रान अघाइ अभागे।।
- RCM 2.180.2Open verse →
जौं प्रिय बिरहँ प्रान प्रिय लागे। देखब सुनब बहुत अब आगे।।
अर्थ · Hindi
जौं प्रिय बिरहँ प्रान प्रिय लागे। देखब सुनब बहुत अब आगे।।
- RCM 2.180.3Open verse →
लखन राम सिय कहुँ बनु दीन्हा। पठइ अमरपुर पति हित कीन्हा।।
अर्थ · Hindi
लखन राम सिय कहुँ बनु दीन्हा। पठइ अमरपुर पति हित कीन्हा।।
- RCM 2.180.4Open verse →
लीन्ह बिधवपन अपजसु आपू। दीन्हेउ प्रजहि सोकु संतापू।।
अर्थ · Hindi
लीन्ह बिधवपन अपजसु आपू। दीन्हेउ प्रजहि सोकु संतापू।।
- RCM 2.180.5Open verse →
मोहि दीन्ह सुखु सुजसु सुराजू। कीन्ह कैकेईं सब कर काजू।।
अर्थ · Hindi
मोहि दीन्ह सुखु सुजसु सुराजू। कीन्ह कैकेईं सब कर काजू।।
- RCM 2.180.6Open verse →
एहि तें मोर काह अब नीका। तेहि पर देन कहहु तुम्ह टीका।।
अर्थ · Hindi
एहि तें मोर काह अब नीका। तेहि पर देन कहहु तुम्ह टीका।।
- RCM 2.180.7Open verse →
कैकई जठर जनमि जग माहीं। यह मोहि कहँ कछु अनुचित नाहीं।।
अर्थ · Hindi
कैकई जठर जनमि जग माहीं। यह मोहि कहँ कछु अनुचित नाहीं।।
- RCM 2.180.8Open verse →
मोरि बात सब बिधिहिं बनाई। प्रजा पाँच कत करहु सहाई।।
अर्थ · Hindi
मोरि बात सब बिधिहिं बनाई। प्रजा पाँच कत करहु सहाई।।
- RCM 2.180.9Open verse →
ग्रह ग्रहीत पुनि बात बस तेहि पुनि बीछी मार।
अर्थ · Hindi
ग्रह ग्रहीत पुनि बात बस तेहि पुनि बीछी मार।
- RCM 2.180.10Open verse →
तेहि पिआइअ बारुनी कहहु काह उपचार।।180।।
अर्थ · Hindi
तेहि पिआइअ बारुनी कहहु काह उपचार।।180।।
- RCM 2.181.1Open verse →
कैकइ सुअन जोगु जग जोई। चतुर बिरंचि दीन्ह मोहि सोई।।
अर्थ · Hindi
कैकइ सुअन जोगु जग जोई। चतुर बिरंचि दीन्ह मोहि सोई।।
- RCM 2.181.2Open verse →
दसरथ तनय राम लघु भाई। दीन्हि मोहि बिधि बादि बड़ाई।।
अर्थ · Hindi
दसरथ तनय राम लघु भाई। दीन्हि मोहि बिधि बादि बड़ाई।।
- RCM 2.181.3Open verse →
तुम्ह सब कहहु कढ़ावन टीका। राय रजायसु सब कहँ नीका।।
अर्थ · Hindi
तुम्ह सब कहहु कढ़ावन टीका। राय रजायसु सब कहँ नीका।।
- RCM 2.181.4Open verse →
उतरु देउँ केहि बिधि केहि केही। कहहु सुखेन जथा रुचि जेही।।
अर्थ · Hindi
उतरु देउँ केहि बिधि केहि केही। कहहु सुखेन जथा रुचि जेही।।
- RCM 2.181.5Open verse →
मोहि कुमातु समेत बिहाई। कहहु कहिहि के कीन्ह भलाई।।
अर्थ · Hindi
मोहि कुमातु समेत बिहाई। कहहु कहिहि के कीन्ह भलाई।।
- RCM 2.181.6Open verse →
मो बिनु को सचराचर माहीं। जेहि सिय रामु प्रानप्रिय नाहीं।।
अर्थ · Hindi
मो बिनु को सचराचर माहीं। जेहि सिय रामु प्रानप्रिय नाहीं।।
- RCM 2.181.7Open verse →
परम हानि सब कहँ बड़ लाहू। अदिनु मोर नहि दूषन काहू।।
अर्थ · Hindi
परम हानि सब कहँ बड़ लाहू। अदिनु मोर नहि दूषन काहू।।
- RCM 2.181.8Open verse →
संसय सील प्रेम बस अहहू। सबुइ उचित सब जो कछु कहहू।।
अर्थ · Hindi
संसय सील प्रेम बस अहहू। सबुइ उचित सब जो कछु कहहू।।
- RCM 2.181.9Open verse →
राम मातु सुठि सरलचित मो पर प्रेमु बिसेषि।
अर्थ · Hindi
राम मातु सुठि सरलचित मो पर प्रेमु बिसेषि।
- RCM 2.181.10Open verse →
कहइ सुभाय सनेह बस मोरि दीनता देखि।।181।
अर्थ · Hindi
कहइ सुभाय सनेह बस मोरि दीनता देखि।।181।
- RCM 2.182.1Open verse →
गुर बिबेक सागर जगु जाना। जिन्हहि बिस्व कर बदर समाना।।
अर्थ · Hindi
गुर बिबेक सागर जगु जाना। जिन्हहि बिस्व कर बदर समाना।।
- RCM 2.182.2Open verse →
मो कहँ तिलक साज सज सोऊ। भएँ बिधि बिमुख बिमुख सबु कोऊ।।
अर्थ · Hindi
मो कहँ तिलक साज सज सोऊ। भएँ बिधि बिमुख बिमुख सबु कोऊ।।
- RCM 2.182.3Open verse →
परिहरि रामु सीय जग माहीं। कोउ न कहिहि मोर मत नाहीं।।
अर्थ · Hindi
परिहरि रामु सीय जग माहीं। कोउ न कहिहि मोर मत नाहीं।।
- RCM 2.182.4Open verse →
सो मैं सुनब सहब सुखु मानी। अंतहुँ कीच तहाँ जहँ पानी।।
अर्थ · Hindi
सो मैं सुनब सहब सुखु मानी। अंतहुँ कीच तहाँ जहँ पानी।।
- RCM 2.182.5Open verse →
डरु न मोहि जग कहिहि कि पोचू। परलोकहु कर नाहिन सोचू।।
अर्थ · Hindi
डरु न मोहि जग कहिहि कि पोचू। परलोकहु कर नाहिन सोचू।।
- RCM 2.182.6Open verse →
एकइ उर बस दुसह दवारी। मोहि लगि भे सिय रामु दुखारी।।
अर्थ · Hindi
एकइ उर बस दुसह दवारी। मोहि लगि भे सिय रामु दुखारी।।
- RCM 2.182.7Open verse →
जीवन लाहु लखन भल पावा। सबु तजि राम चरन मनु लावा।।
अर्थ · Hindi
जीवन लाहु लखन भल पावा। सबु तजि राम चरन मनु लावा।।
- RCM 2.182.8Open verse →
मोर जनम रघुबर बन लागी। झूठ काह पछिताउँ अभागी।।
अर्थ · Hindi
मोर जनम रघुबर बन लागी। झूठ काह पछिताउँ अभागी।।
- RCM 2.182.9Open verse →
आपनि दारुन दीनता कहउँ सबहि सिरु नाइ।
अर्थ · Hindi
आपनि दारुन दीनता कहउँ सबहि सिरु नाइ।
- RCM 2.182.10Open verse →
देखें बिनु रघुनाथ पद जिय कै जरनि न जाइ।।182।।
अर्थ · Hindi
देखें बिनु रघुनाथ पद जिय कै जरनि न जाइ।।182।।
- RCM 2.183.1Open verse →
आन उपाउ मोहि नहि सूझा। को जिय कै रघुबर बिनु बूझा।।
अर्थ · Hindi
आन उपाउ मोहि नहि सूझा। को जिय कै रघुबर बिनु बूझा।।
- RCM 2.183.2Open verse →
एकहिं आँक इहइ मन माहीं। प्रातकाल चलिहउँ प्रभु पाहीं।।
अर्थ · Hindi
एकहिं आँक इहइ मन माहीं। प्रातकाल चलिहउँ प्रभु पाहीं।।
- RCM 2.183.3Open verse →
जद्यपि मैं अनभल अपराधी। भै मोहि कारन सकल उपाधी।।
अर्थ · Hindi
जद्यपि मैं अनभल अपराधी। भै मोहि कारन सकल उपाधी।।
- RCM 2.183.4Open verse →
तदपि सरन सनमुख मोहि देखी। छमि सब करिहहिं कृपा बिसेषी।।
अर्थ · Hindi
तदपि सरन सनमुख मोहि देखी। छमि सब करिहहिं कृपा बिसेषी।।
- RCM 2.183.5Open verse →
सील सकुच सुठि सरल सुभाऊ। कृपा सनेह सदन रघुराऊ।।
अर्थ · Hindi
सील सकुच सुठि सरल सुभाऊ। कृपा सनेह सदन रघुराऊ।।
- RCM 2.183.6Open verse →
अरिहुक अनभल कीन्ह न रामा। मैं सिसु सेवक जद्यपि बामा।।
अर्थ · Hindi
अरिहुक अनभल कीन्ह न रामा। मैं सिसु सेवक जद्यपि बामा।।
- RCM 2.183.7Open verse →
तुम्ह पै पाँच मोर भल मानी। आयसु आसिष देहु सुबानी।।
अर्थ · Hindi
तुम्ह पै पाँच मोर भल मानी। आयसु आसिष देहु सुबानी।।
- RCM 2.183.8Open verse →
जेहिं सुनि बिनय मोहि जनु जानी। आवहिं बहुरि रामु रजधानी।।
अर्थ · Hindi
जेहिं सुनि बिनय मोहि जनु जानी। आवहिं बहुरि रामु रजधानी।।
- RCM 2.183.9Open verse →
जद्यपि जनमु कुमातु तें मैं सठु सदा सदोस।
अर्थ · Hindi
जद्यपि जनमु कुमातु तें मैं सठु सदा सदोस।
- RCM 2.183.10Open verse →
आपन जानि न त्यागिहहिं मोहि रघुबीर भरोस।।183।।
अर्थ · Hindi
आपन जानि न त्यागिहहिं मोहि रघुबीर भरोस।।183।।
- RCM 2.184.1Open verse →
भरत बचन सब कहँ प्रिय लागे। राम सनेह सुधाँ जनु पागे।।
अर्थ · Hindi
भरत बचन सब कहँ प्रिय लागे। राम सनेह सुधाँ जनु पागे।।
- RCM 2.184.2Open verse →
लोग बियोग बिषम बिष दागे। मंत्र सबीज सुनत जनु जागे।।
अर्थ · Hindi
लोग बियोग बिषम बिष दागे। मंत्र सबीज सुनत जनु जागे।।
- RCM 2.184.3Open verse →
मातु सचिव गुर पुर नर नारी। सकल सनेहँ बिकल भए भारी।।
अर्थ · Hindi
मातु सचिव गुर पुर नर नारी। सकल सनेहँ बिकल भए भारी।।
- RCM 2.184.4Open verse →
भरतहि कहहि सराहि सराही। राम प्रेम मूरति तनु आही।।
अर्थ · Hindi
भरतहि कहहि सराहि सराही। राम प्रेम मूरति तनु आही।।
- RCM 2.184.5Open verse →
तात भरत अस काहे न कहहू। प्रान समान राम प्रिय अहहू।।
अर्थ · Hindi
तात भरत अस काहे न कहहू। प्रान समान राम प्रिय अहहू।।
- RCM 2.184.6Open verse →
जो पावँरु अपनी जड़ताई। तुम्हहि सुगाइ मातु कुटिलाई।।
अर्थ · Hindi
जो पावँरु अपनी जड़ताई। तुम्हहि सुगाइ मातु कुटिलाई।।
- RCM 2.184.7Open verse →
सो सठु कोटिक पुरुष समेता। बसिहि कलप सत नरक निकेता।।
अर्थ · Hindi
सो सठु कोटिक पुरुष समेता। बसिहि कलप सत नरक निकेता।।
- RCM 2.184.8Open verse →
अहि अघ अवगुन नहि मनि गहई। हरइ गरल दुख दारिद दहई।।
अर्थ · Hindi
अहि अघ अवगुन नहि मनि गहई। हरइ गरल दुख दारिद दहई।।
- RCM 2.184.9Open verse →
अवसि चलिअ बन रामु जहँ भरत मंत्रु भल कीन्ह।
अर्थ · Hindi
अवसि चलिअ बन रामु जहँ भरत मंत्रु भल कीन्ह।
- RCM 2.184.10Open verse →
सोक सिंधु बूड़त सबहि तुम्ह अवलंबनु दीन्ह।।184।।
अर्थ · Hindi
सोक सिंधु बूड़त सबहि तुम्ह अवलंबनु दीन्ह।।184।।
- RCM 2.185.1Open verse →
भा सब कें मन मोदु न थोरा। जनु घन धुनि सुनि चातक मोरा।।
अर्थ · Hindi
भा सब कें मन मोदु न थोरा। जनु घन धुनि सुनि चातक मोरा।।
- RCM 2.185.2Open verse →
चलत प्रात लखि निरनउ नीके। भरतु प्रानप्रिय भे सबही के।।
अर्थ · Hindi
चलत प्रात लखि निरनउ नीके। भरतु प्रानप्रिय भे सबही के।।
- RCM 2.185.3Open verse →
मुनिहि बंदि भरतहि सिरु नाई। चले सकल घर बिदा कराई।।
अर्थ · Hindi
मुनिहि बंदि भरतहि सिरु नाई। चले सकल घर बिदा कराई।।
- RCM 2.185.4Open verse →
धन्य भरत जीवनु जग माहीं। सीलु सनेहु सराहत जाहीं।।
अर्थ · Hindi
धन्य भरत जीवनु जग माहीं। सीलु सनेहु सराहत जाहीं।।
- RCM 2.185.5Open verse →
कहहि परसपर भा बड़ काजू। सकल चलै कर साजहिं साजू।।
अर्थ · Hindi
कहहि परसपर भा बड़ काजू। सकल चलै कर साजहिं साजू।।
- RCM 2.185.6Open verse →
जेहि राखहिं रहु घर रखवारी। सो जानइ जनु गरदनि मारी।।
अर्थ · Hindi
जेहि राखहिं रहु घर रखवारी। सो जानइ जनु गरदनि मारी।।
- RCM 2.185.7Open verse →
कोउ कह रहन कहिअ नहिं काहू। को न चहइ जग जीवन लाहू।।
अर्थ · Hindi
कोउ कह रहन कहिअ नहिं काहू। को न चहइ जग जीवन लाहू।।
- RCM 2.185.8Open verse →
जरउ सो संपति सदन सुखु सुहद मातु पितु भाइ।
अर्थ · Hindi
जरउ सो संपति सदन सुखु सुहद मातु पितु भाइ।
- RCM 2.185.9Open verse →
सनमुख होत जो राम पद करै न सहस सहाइ।।185।।
अर्थ · Hindi
सनमुख होत जो राम पद करै न सहस सहाइ।।185।।
- RCM 2.186.1Open verse →
घर घर साजहिं बाहन नाना। हरषु हृदयँ परभात पयाना।।
अर्थ · Hindi
घर घर साजहिं बाहन नाना। हरषु हृदयँ परभात पयाना।।
- RCM 2.186.2Open verse →
भरत जाइ घर कीन्ह बिचारू। नगरु बाजि गज भवन भँडारू।।
अर्थ · Hindi
भरत जाइ घर कीन्ह बिचारू। नगरु बाजि गज भवन भँडारू।।
- RCM 2.186.3Open verse →
संपति सब रघुपति कै आही। जौ बिनु जतन चलौं तजि ताही।।
अर्थ · Hindi
संपति सब रघुपति कै आही। जौ बिनु जतन चलौं तजि ताही।।
- RCM 2.186.4Open verse →
तौ परिनाम न मोरि भलाई। पाप सिरोमनि साइँ दोहाई।।
अर्थ · Hindi
तौ परिनाम न मोरि भलाई। पाप सिरोमनि साइँ दोहाई।।
- RCM 2.186.5Open verse →
करइ स्वामि हित सेवकु सोई। दूषन कोटि देइ किन कोई।।
अर्थ · Hindi
करइ स्वामि हित सेवकु सोई। दूषन कोटि देइ किन कोई।।
- RCM 2.186.6Open verse →
अस बिचारि सुचि सेवक बोले। जे सपनेहुँ निज धरम न डोले।।
अर्थ · Hindi
अस बिचारि सुचि सेवक बोले। जे सपनेहुँ निज धरम न डोले।।
- RCM 2.186.7Open verse →
कहि सबु मरमु धरमु भल भाषा। जो जेहि लायक सो तेहिं राखा।।
अर्थ · Hindi
कहि सबु मरमु धरमु भल भाषा। जो जेहि लायक सो तेहिं राखा।।
- RCM 2.186.8Open verse →
करि सबु जतनु राखि रखवारे। राम मातु पहिं भरतु सिधारे।।
अर्थ · Hindi
करि सबु जतनु राखि रखवारे। राम मातु पहिं भरतु सिधारे।।
- RCM 2.186.9Open verse →
आरत जननी जानि सब भरत सनेह सुजान।
अर्थ · Hindi
आरत जननी जानि सब भरत सनेह सुजान।
- RCM 2.186.10Open verse →
कहेउ बनावन पालकीं सजन सुखासन जान।।186।।
अर्थ · Hindi
कहेउ बनावन पालकीं सजन सुखासन जान।।186।।
- RCM 2.187.1Open verse →
चक्क चक्कि जिमि पुर नर नारी। चहत प्रात उर आरत भारी।।
अर्थ · Hindi
चक्क चक्कि जिमि पुर नर नारी। चहत प्रात उर आरत भारी।।
- RCM 2.187.2Open verse →
जागत सब निसि भयउ बिहाना। भरत बोलाए सचिव सुजाना।।
अर्थ · Hindi
जागत सब निसि भयउ बिहाना। भरत बोलाए सचिव सुजाना।।
- RCM 2.187.3Open verse →
कहेउ लेहु सबु तिलक समाजू। बनहिं देब मुनि रामहिं राजू।।
अर्थ · Hindi
कहेउ लेहु सबु तिलक समाजू। बनहिं देब मुनि रामहिं राजू।।
- RCM 2.187.4Open verse →
बेगि चलहु सुनि सचिव जोहारे। तुरत तुरग रथ नाग सँवारे।।
अर्थ · Hindi
बेगि चलहु सुनि सचिव जोहारे। तुरत तुरग रथ नाग सँवारे।।
- RCM 2.187.5Open verse →
अरुंधती अरु अगिनि समाऊ। रथ चढ़ि चले प्रथम मुनिराऊ।।
अर्थ · Hindi
अरुंधती अरु अगिनि समाऊ। रथ चढ़ि चले प्रथम मुनिराऊ।।
- RCM 2.187.6Open verse →
बिप्र बृंद चढ़ि बाहन नाना। चले सकल तप तेज निधाना।।
अर्थ · Hindi
बिप्र बृंद चढ़ि बाहन नाना। चले सकल तप तेज निधाना।।
- RCM 2.187.7Open verse →
नगर लोग सब सजि सजि जाना। चित्रकूट कहँ कीन्ह पयाना।।
अर्थ · Hindi
नगर लोग सब सजि सजि जाना। चित्रकूट कहँ कीन्ह पयाना।।
- RCM 2.187.8Open verse →
सिबिका सुभग न जाहिं बखानी। चढ़ि चढ़ि चलत भई सब रानी।।
अर्थ · Hindi
सिबिका सुभग न जाहिं बखानी। चढ़ि चढ़ि चलत भई सब रानी।।
- RCM 2.187.9Open verse →
सौंपि नगर सुचि सेवकनि सादर सकल चलाइ।
अर्थ · Hindi
सौंपि नगर सुचि सेवकनि सादर सकल चलाइ।
- RCM 2.187.10Open verse →
सुमिरि राम सिय चरन तब चले भरत दोउ भाइ।।187।।
अर्थ · Hindi
सुमिरि राम सिय चरन तब चले भरत दोउ भाइ।।187।।
- RCM 2.188.1Open verse →
राम दरस बस सब नर नारी। जनु करि करिनि चले तकि बारी।।
अर्थ · Hindi
राम दरस बस सब नर नारी। जनु करि करिनि चले तकि बारी।।
- RCM 2.188.2Open verse →
बन सिय रामु समुझि मन माहीं। सानुज भरत पयादेहिं जाहीं।।
अर्थ · Hindi
बन सिय रामु समुझि मन माहीं। सानुज भरत पयादेहिं जाहीं।।
- RCM 2.188.3Open verse →
देखि सनेहु लोग अनुरागे। उतरि चले हय गय रथ त्यागे।।
अर्थ · Hindi
देखि सनेहु लोग अनुरागे। उतरि चले हय गय रथ त्यागे।।
- RCM 2.188.4Open verse →
जाइ समीप राखि निज डोली। राम मातु मृदु बानी बोली।।
अर्थ · Hindi
जाइ समीप राखि निज डोली। राम मातु मृदु बानी बोली।।
- RCM 2.188.5Open verse →
तात चढ़हु रथ बलि महतारी। होइहि प्रिय परिवारु दुखारी।।
अर्थ · Hindi
तात चढ़हु रथ बलि महतारी। होइहि प्रिय परिवारु दुखारी।।
- RCM 2.188.6Open verse →
तुम्हरें चलत चलिहि सबु लोगू। सकल सोक कृस नहिं मग जोगू।।
अर्थ · Hindi
तुम्हरें चलत चलिहि सबु लोगू। सकल सोक कृस नहिं मग जोगू।।
- RCM 2.188.7Open verse →
सिर धरि बचन चरन सिरु नाई। रथ चढ़ि चलत भए दोउ भाई।।
अर्थ · Hindi
सिर धरि बचन चरन सिरु नाई। रथ चढ़ि चलत भए दोउ भाई।।
- RCM 2.188.8Open verse →
तमसा प्रथम दिवस करि बासू। दूसर गोमति तीर निवासू।।
अर्थ · Hindi
तमसा प्रथम दिवस करि बासू। दूसर गोमति तीर निवासू।।
- RCM 2.188.9Open verse →
पय अहार फल असन एक निसि भोजन एक लोग।
अर्थ · Hindi
पय अहार फल असन एक निसि भोजन एक लोग।
- RCM 2.188.10Open verse →
करत राम हित नेम ब्रत परिहरि भूषन भोग।।188।।
अर्थ · Hindi
करत राम हित नेम ब्रत परिहरि भूषन भोग।।188।।
- RCM 2.189.1Open verse →
सई तीर बसि चले बिहाने। सृंगबेरपुर सब निअराने।।
अर्थ · Hindi
सई तीर बसि चले बिहाने। सृंगबेरपुर सब निअराने।।
- RCM 2.189.2Open verse →
समाचार सब सुने निषादा। हृदयँ बिचार करइ सबिषादा।।
अर्थ · Hindi
समाचार सब सुने निषादा। हृदयँ बिचार करइ सबिषादा।।
- RCM 2.189.3Open verse →
कारन कवन भरतु बन जाहीं। है कछु कपट भाउ मन माहीं।।
अर्थ · Hindi
कारन कवन भरतु बन जाहीं। है कछु कपट भाउ मन माहीं।।
- RCM 2.189.4Open verse →
जौं पै जियँ न होति कुटिलाई। तौ कत लीन्ह संग कटकाई।।
अर्थ · Hindi
जौं पै जियँ न होति कुटिलाई। तौ कत लीन्ह संग कटकाई।।
- RCM 2.189.5Open verse →
जानहिं सानुज रामहि मारी। करउँ अकंटक राजु सुखारी।।
अर्थ · Hindi
जानहिं सानुज रामहि मारी। करउँ अकंटक राजु सुखारी।।
- RCM 2.189.6Open verse →
भरत न राजनीति उर आनी। तब कलंकु अब जीवन हानी।।
अर्थ · Hindi
भरत न राजनीति उर आनी। तब कलंकु अब जीवन हानी।।
- RCM 2.189.7Open verse →
सकल सुरासुर जुरहिं जुझारा। रामहि समर न जीतनिहारा।।
अर्थ · Hindi
सकल सुरासुर जुरहिं जुझारा। रामहि समर न जीतनिहारा।।
- RCM 2.189.8Open verse →
का आचरजु भरतु अस करहीं। नहिं बिष बेलि अमिअ फल फरहीं।।
अर्थ · Hindi
का आचरजु भरतु अस करहीं। नहिं बिष बेलि अमिअ फल फरहीं।।
- RCM 2.189.9Open verse →
अस बिचारि गुहँ ग्याति सन कहेउ सजग सब होहु।
अर्थ · Hindi
अस बिचारि गुहँ ग्याति सन कहेउ सजग सब होहु।
- RCM 2.189.10Open verse →
हथवाँसहु बोरहु तरनि कीजिअ घाटारोहु।।189।।
अर्थ · Hindi
हथवाँसहु बोरहु तरनि कीजिअ घाटारोहु।।189।।
- RCM 2.190.1Open verse →
होहु सँजोइल रोकहु घाटा। ठाटहु सकल मरै के ठाटा।।
अर्थ · Hindi
होहु सँजोइल रोकहु घाटा। ठाटहु सकल मरै के ठाटा।।
- RCM 2.190.2Open verse →
सनमुख लोह भरत सन लेऊँ। जिअत न सुरसरि उतरन देऊँ।।
अर्थ · Hindi
सनमुख लोह भरत सन लेऊँ। जिअत न सुरसरि उतरन देऊँ।।
- RCM 2.190.3Open verse →
समर मरनु पुनि सुरसरि तीरा। राम काजु छनभंगु सरीरा।।
अर्थ · Hindi
समर मरनु पुनि सुरसरि तीरा। राम काजु छनभंगु सरीरा।।
- RCM 2.190.4Open verse →
भरत भाइ नृपु मै जन नीचू। बड़ें भाग असि पाइअ मीचू।।
अर्थ · Hindi
भरत भाइ नृपु मै जन नीचू। बड़ें भाग असि पाइअ मीचू।।
- RCM 2.190.5Open verse →
स्वामि काज करिहउँ रन रारी। जस धवलिहउँ भुवन दस चारी।।
अर्थ · Hindi
स्वामि काज करिहउँ रन रारी। जस धवलिहउँ भुवन दस चारी।।
- RCM 2.190.6Open verse →
तजउँ प्रान रघुनाथ निहोरें। दुहूँ हाथ मुद मोदक मोरें।।
अर्थ · Hindi
तजउँ प्रान रघुनाथ निहोरें। दुहूँ हाथ मुद मोदक मोरें।।
- RCM 2.190.7Open verse →
साधु समाज न जाकर लेखा। राम भगत महुँ जासु न रेखा।।
अर्थ · Hindi
साधु समाज न जाकर लेखा। राम भगत महुँ जासु न रेखा।।
- RCM 2.190.8Open verse →
जायँ जिअत जग सो महि भारू। जननी जौबन बिटप कुठारू।।
अर्थ · Hindi
जायँ जिअत जग सो महि भारू। जननी जौबन बिटप कुठारू।।
- RCM 2.190.9Open verse →
बिगत बिषाद निषादपति सबहि बढ़ाइ उछाहु।
अर्थ · Hindi
बिगत बिषाद निषादपति सबहि बढ़ाइ उछाहु।
- RCM 2.190.10Open verse →
सुमिरि राम मागेउ तुरत तरकस धनुष सनाहु।।190।।
अर्थ · Hindi
सुमिरि राम मागेउ तुरत तरकस धनुष सनाहु।।190।।
- RCM 2.191.1Open verse →
बेगहु भाइहु सजहु सँजोऊ। सुनि रजाइ कदराइ न कोऊ।।
अर्थ · Hindi
बेगहु भाइहु सजहु सँजोऊ। सुनि रजाइ कदराइ न कोऊ।।
- RCM 2.191.2Open verse →
भलेहिं नाथ सब कहहिं सहरषा। एकहिं एक बढ़ावइ करषा।।
अर्थ · Hindi
भलेहिं नाथ सब कहहिं सहरषा। एकहिं एक बढ़ावइ करषा।।
- RCM 2.191.3Open verse →
चले निषाद जोहारि जोहारी। सूर सकल रन रूचइ रारी।।
अर्थ · Hindi
चले निषाद जोहारि जोहारी। सूर सकल रन रूचइ रारी।।
- RCM 2.191.4Open verse →
सुमिरि राम पद पंकज पनहीं। भाथीं बाँधि चढ़ाइन्हि धनहीं।।
अर्थ · Hindi
सुमिरि राम पद पंकज पनहीं। भाथीं बाँधि चढ़ाइन्हि धनहीं।।
- RCM 2.191.5Open verse →
अँगरी पहिरि कूँड़ि सिर धरहीं। फरसा बाँस सेल सम करहीं।।
अर्थ · Hindi
अँगरी पहिरि कूँड़ि सिर धरहीं। फरसा बाँस सेल सम करहीं।।
- RCM 2.191.6Open verse →
एक कुसल अति ओड़न खाँड़े। कूदहि गगन मनहुँ छिति छाँड़े।।
अर्थ · Hindi
एक कुसल अति ओड़न खाँड़े। कूदहि गगन मनहुँ छिति छाँड़े।।
- RCM 2.191.7Open verse →
निज निज साजु समाजु बनाई। गुह राउतहि जोहारे जाई।।
अर्थ · Hindi
निज निज साजु समाजु बनाई। गुह राउतहि जोहारे जाई।।
- RCM 2.191.8Open verse →
देखि सुभट सब लायक जाने। लै लै नाम सकल सनमाने।।
अर्थ · Hindi
देखि सुभट सब लायक जाने। लै लै नाम सकल सनमाने।।
- RCM 2.191.9Open verse →
भाइहु लावहु धोख जनि आजु काज बड़ मोहि।
अर्थ · Hindi
भाइहु लावहु धोख जनि आजु काज बड़ मोहि।
- RCM 2.191.10Open verse →
सुनि सरोष बोले सुभट बीर अधीर न होहि।।191।।
अर्थ · Hindi
सुनि सरोष बोले सुभट बीर अधीर न होहि।।191।।
- RCM 2.192.1Open verse →
राम प्रताप नाथ बल तोरे। करहिं कटकु बिनु भट बिनु घोरे।।
अर्थ · Hindi
राम प्रताप नाथ बल तोरे। करहिं कटकु बिनु भट बिनु घोरे।।
- RCM 2.192.2Open verse →
जीवत पाउ न पाछें धरहीं। रुंड मुंडमय मेदिनि करहीं।।
अर्थ · Hindi
जीवत पाउ न पाछें धरहीं। रुंड मुंडमय मेदिनि करहीं।।
- RCM 2.192.3Open verse →
दीख निषादनाथ भल टोलू। कहेउ बजाउ जुझाऊ ढोलू।।
अर्थ · Hindi
दीख निषादनाथ भल टोलू। कहेउ बजाउ जुझाऊ ढोलू।।
- RCM 2.192.4Open verse →
एतना कहत छींक भइ बाँए। कहेउ सगुनिअन्ह खेत सुहाए।।
अर्थ · Hindi
एतना कहत छींक भइ बाँए। कहेउ सगुनिअन्ह खेत सुहाए।।
- RCM 2.192.5Open verse →
बूढ़ु एकु कह सगुन बिचारी। भरतहि मिलिअ न होइहि रारी।।
अर्थ · Hindi
बूढ़ु एकु कह सगुन बिचारी। भरतहि मिलिअ न होइहि रारी।।
- RCM 2.192.6Open verse →
रामहि भरतु मनावन जाहीं। सगुन कहइ अस बिग्रहु नाहीं।।
अर्थ · Hindi
रामहि भरतु मनावन जाहीं। सगुन कहइ अस बिग्रहु नाहीं।।
- RCM 2.192.7Open verse →
सुनि गुह कहइ नीक कह बूढ़ा। सहसा करि पछिताहिं बिमूढ़ा।।
अर्थ · Hindi
सुनि गुह कहइ नीक कह बूढ़ा। सहसा करि पछिताहिं बिमूढ़ा।।
- RCM 2.192.8Open verse →
भरत सुभाउ सीलु बिनु बूझें। बड़ि हित हानि जानि बिनु जूझें।।
अर्थ · Hindi
भरत सुभाउ सीलु बिनु बूझें। बड़ि हित हानि जानि बिनु जूझें।।
- RCM 2.192.9Open verse →
गहहु घाट भट समिटि सब लेउँ मरम मिलि जाइ।
अर्थ · Hindi
गहहु घाट भट समिटि सब लेउँ मरम मिलि जाइ।
- RCM 2.192.10Open verse →
बूझि मित्र अरि मध्य गति तस तब करिहउँ आइ।।192।।
अर्थ · Hindi
बूझि मित्र अरि मध्य गति तस तब करिहउँ आइ।।192।।
- RCM 2.193.1Open verse →
लखन सनेहु सुभायँ सुहाएँ। बैरु प्रीति नहिं दुरइँ दुराएँ।।
अर्थ · Hindi
लखन सनेहु सुभायँ सुहाएँ। बैरु प्रीति नहिं दुरइँ दुराएँ।।
- RCM 2.193.2Open verse →
अस कहि भेंट सँजोवन लागे। कंद मूल फल खग मृग मागे।।
अर्थ · Hindi
अस कहि भेंट सँजोवन लागे। कंद मूल फल खग मृग मागे।।
- RCM 2.193.3Open verse →
मीन पीन पाठीन पुराने। भरि भरि भार कहारन्ह आने।।
अर्थ · Hindi
मीन पीन पाठीन पुराने। भरि भरि भार कहारन्ह आने।।
- RCM 2.193.4Open verse →
मिलन साजु सजि मिलन सिधाए। मंगल मूल सगुन सुभ पाए।।
अर्थ · Hindi
मिलन साजु सजि मिलन सिधाए। मंगल मूल सगुन सुभ पाए।।
- RCM 2.193.5Open verse →
देखि दूरि तें कहि निज नामू। कीन्ह मुनीसहि दंड प्रनामू।।
अर्थ · Hindi
देखि दूरि तें कहि निज नामू। कीन्ह मुनीसहि दंड प्रनामू।।
- RCM 2.193.6Open verse →
जानि रामप्रिय दीन्हि असीसा। भरतहि कहेउ बुझाइ मुनीसा।।
अर्थ · Hindi
जानि रामप्रिय दीन्हि असीसा। भरतहि कहेउ बुझाइ मुनीसा।।
- RCM 2.193.7Open verse →
राम सखा सुनि संदनु त्यागा। चले उतरि उमगत अनुरागा।।
अर्थ · Hindi
राम सखा सुनि संदनु त्यागा। चले उतरि उमगत अनुरागा।।
- RCM 2.193.8Open verse →
गाउँ जाति गुहँ नाउँ सुनाई। कीन्ह जोहारु माथ महि लाई।।
अर्थ · Hindi
गाउँ जाति गुहँ नाउँ सुनाई। कीन्ह जोहारु माथ महि लाई।।
- RCM 2.193.9Open verse →
करत दंडवत देखि तेहि भरत लीन्ह उर लाइ।
अर्थ · Hindi
करत दंडवत देखि तेहि भरत लीन्ह उर लाइ।
- RCM 2.193.10Open verse →
मनहुँ लखन सन भेंट भइ प्रेम न हृदयँ समाइ।।193।।
अर्थ · Hindi
मनहुँ लखन सन भेंट भइ प्रेम न हृदयँ समाइ।।193।।
- RCM 2.194.1Open verse →
भेंटत भरतु ताहि अति प्रीती। लोग सिहाहिं प्रेम कै रीती।।
अर्थ · Hindi
भेंटत भरतु ताहि अति प्रीती। लोग सिहाहिं प्रेम कै रीती।।
- RCM 2.194.2Open verse →
धन्य धन्य धुनि मंगल मूला। सुर सराहि तेहि बरिसहिं फूला।।
अर्थ · Hindi
धन्य धन्य धुनि मंगल मूला। सुर सराहि तेहि बरिसहिं फूला।।
- RCM 2.194.3Open verse →
लोक बेद सब भाँतिहिं नीचा। जासु छाँह छुइ लेइअ सींचा।।
अर्थ · Hindi
लोक बेद सब भाँतिहिं नीचा। जासु छाँह छुइ लेइअ सींचा।।
- RCM 2.194.4Open verse →
तेहि भरि अंक राम लघु भ्राता। मिलत पुलक परिपूरित गाता।।
अर्थ · Hindi
तेहि भरि अंक राम लघु भ्राता। मिलत पुलक परिपूरित गाता।।
- RCM 2.194.5Open verse →
राम राम कहि जे जमुहाहीं। तिन्हहि न पाप पुंज समुहाहीं।।
अर्थ · Hindi
राम राम कहि जे जमुहाहीं। तिन्हहि न पाप पुंज समुहाहीं।।
- RCM 2.194.6Open verse →
यह तौ राम लाइ उर लीन्हा। कुल समेत जगु पावन कीन्हा।।
अर्थ · Hindi
यह तौ राम लाइ उर लीन्हा। कुल समेत जगु पावन कीन्हा।।
- RCM 2.194.7Open verse →
करमनास जलु सुरसरि परई। तेहि को कहहु सीस नहिं धरई।।
अर्थ · Hindi
करमनास जलु सुरसरि परई। तेहि को कहहु सीस नहिं धरई।।
- RCM 2.194.8Open verse →
उलटा नामु जपत जगु जाना। बालमीकि भए ब्रह्म समाना।।
अर्थ · Hindi
उलटा नामु जपत जगु जाना। बालमीकि भए ब्रह्म समाना।।
- RCM 2.194.9Open verse →
स्वपच सबर खस जमन जड़ पावँर कोल किरात।
अर्थ · Hindi
स्वपच सबर खस जमन जड़ पावँर कोल किरात।
- RCM 2.194.10Open verse →
रामु कहत पावन परम होत भुवन बिख्यात।।194।।
अर्थ · Hindi
रामु कहत पावन परम होत भुवन बिख्यात।।194।।
- RCM 2.195.1Open verse →
नहिं अचिरजु जुग जुग चलि आई। केहि न दीन्हि रघुबीर बड़ाई।।
अर्थ · Hindi
नहिं अचिरजु जुग जुग चलि आई। केहि न दीन्हि रघुबीर बड़ाई।।
- RCM 2.195.2Open verse →
राम नाम महिमा सुर कहहीं। सुनि सुनि अवधलोग सुखु लहहीं।।
अर्थ · Hindi
राम नाम महिमा सुर कहहीं। सुनि सुनि अवधलोग सुखु लहहीं।।
- RCM 2.195.3Open verse →
रामसखहि मिलि भरत सप्रेमा। पूँछी कुसल सुमंगल खेमा।।
अर्थ · Hindi
रामसखहि मिलि भरत सप्रेमा। पूँछी कुसल सुमंगल खेमा।।
- RCM 2.195.4Open verse →
देखि भरत कर सील सनेहू। भा निषाद तेहि समय बिदेहू।।
अर्थ · Hindi
देखि भरत कर सील सनेहू। भा निषाद तेहि समय बिदेहू।।
- RCM 2.195.5Open verse →
सकुच सनेहु मोदु मन बाढ़ा। भरतहि चितवत एकटक ठाढ़ा।।
अर्थ · Hindi
सकुच सनेहु मोदु मन बाढ़ा। भरतहि चितवत एकटक ठाढ़ा।।
- RCM 2.195.6Open verse →
धरि धीरजु पद बंदि बहोरी। बिनय सप्रेम करत कर जोरी।।
अर्थ · Hindi
धरि धीरजु पद बंदि बहोरी। बिनय सप्रेम करत कर जोरी।।
- RCM 2.195.7Open verse →
कुसल मूल पद पंकज पेखी। मैं तिहुँ काल कुसल निज लेखी।।
अर्थ · Hindi
कुसल मूल पद पंकज पेखी। मैं तिहुँ काल कुसल निज लेखी।।
- RCM 2.195.8Open verse →
अब प्रभु परम अनुग्रह तोरें। सहित कोटि कुल मंगल मोरें।।
अर्थ · Hindi
अब प्रभु परम अनुग्रह तोरें। सहित कोटि कुल मंगल मोरें।।
- RCM 2.195.9Open verse →
समुझि मोरि करतूति कुलु प्रभु महिमा जियँ जोइ।
अर्थ · Hindi
समुझि मोरि करतूति कुलु प्रभु महिमा जियँ जोइ।
- RCM 2.195.10Open verse →
जो न भजइ रघुबीर पद जग बिधि बंचित सोइ।।195।।
अर्थ · Hindi
जो न भजइ रघुबीर पद जग बिधि बंचित सोइ।।195।।
- RCM 2.196.1Open verse →
कपटी कायर कुमति कुजाती। लोक बेद बाहेर सब भाँती।।
अर्थ · Hindi
कपटी कायर कुमति कुजाती। लोक बेद बाहेर सब भाँती।।
- RCM 2.196.2Open verse →
राम कीन्ह आपन जबही तें। भयउँ भुवन भूषन तबही तें।।
अर्थ · Hindi
राम कीन्ह आपन जबही तें। भयउँ भुवन भूषन तबही तें।।
- RCM 2.196.3Open verse →
देखि प्रीति सुनि बिनय सुहाई। मिलेउ बहोरि भरत लघु भाई।।
अर्थ · Hindi
देखि प्रीति सुनि बिनय सुहाई। मिलेउ बहोरि भरत लघु भाई।।
- RCM 2.196.4Open verse →
कहि निषाद निज नाम सुबानीं। सादर सकल जोहारीं रानीं।।
अर्थ · Hindi
कहि निषाद निज नाम सुबानीं। सादर सकल जोहारीं रानीं।।
- RCM 2.196.5Open verse →
जानि लखन सम देहिं असीसा। जिअहु सुखी सय लाख बरीसा।।
अर्थ · Hindi
जानि लखन सम देहिं असीसा। जिअहु सुखी सय लाख बरीसा।।
- RCM 2.196.6Open verse →
निरखि निषादु नगर नर नारी। भए सुखी जनु लखनु निहारी।।
अर्थ · Hindi
निरखि निषादु नगर नर नारी। भए सुखी जनु लखनु निहारी।।
- RCM 2.196.7Open verse →
कहहिं लहेउ एहिं जीवन लाहू। भेंटेउ रामभद्र भरि बाहू।।
अर्थ · Hindi
कहहिं लहेउ एहिं जीवन लाहू। भेंटेउ रामभद्र भरि बाहू।।
- RCM 2.196.8Open verse →
सुनि निषादु निज भाग बड़ाई। प्रमुदित मन लइ चलेउ लेवाई।।
अर्थ · Hindi
सुनि निषादु निज भाग बड़ाई। प्रमुदित मन लइ चलेउ लेवाई।।
- RCM 2.196.9Open verse →
सनकारे सेवक सकल चले स्वामि रुख पाइ।
अर्थ · Hindi
सनकारे सेवक सकल चले स्वामि रुख पाइ।
- RCM 2.196.10Open verse →
घर तरु तर सर बाग बन बास बनाएन्हि जाइ।।196।।
अर्थ · Hindi
घर तरु तर सर बाग बन बास बनाएन्हि जाइ।।196।।
- RCM 2.197.1Open verse →
सृंगबेरपुर भरत दीख जब। भे सनेहँ सब अंग सिथिल तब।।
अर्थ · Hindi
सृंगबेरपुर भरत दीख जब। भे सनेहँ सब अंग सिथिल तब।।
- RCM 2.197.2Open verse →
सोहत दिएँ निषादहि लागू। जनु तनु धरें बिनय अनुरागू।।
अर्थ · Hindi
सोहत दिएँ निषादहि लागू। जनु तनु धरें बिनय अनुरागू।।
- RCM 2.197.3Open verse →
एहि बिधि भरत सेनु सबु संगा। दीखि जाइ जग पावनि गंगा।।
अर्थ · Hindi
एहि बिधि भरत सेनु सबु संगा। दीखि जाइ जग पावनि गंगा।।
- RCM 2.197.4Open verse →
रामघाट कहँ कीन्ह प्रनामू। भा मनु मगनु मिले जनु रामू।।
अर्थ · Hindi
रामघाट कहँ कीन्ह प्रनामू। भा मनु मगनु मिले जनु रामू।।
- RCM 2.197.5Open verse →
करहिं प्रनाम नगर नर नारी। मुदित ब्रह्ममय बारि निहारी।।
अर्थ · Hindi
करहिं प्रनाम नगर नर नारी। मुदित ब्रह्ममय बारि निहारी।।
- RCM 2.197.6Open verse →
करि मज्जनु मागहिं कर जोरी। रामचंद्र पद प्रीति न थोरी।।
अर्थ · Hindi
करि मज्जनु मागहिं कर जोरी। रामचंद्र पद प्रीति न थोरी।।
- RCM 2.197.7Open verse →
भरत कहेउ सुरसरि तव रेनू। सकल सुखद सेवक सुरधेनू।।
अर्थ · Hindi
भरत कहेउ सुरसरि तव रेनू। सकल सुखद सेवक सुरधेनू।।
- RCM 2.197.8Open verse →
जोरि पानि बर मागउँ एहू। सीय राम पद सहज सनेहू।।
अर्थ · Hindi
जोरि पानि बर मागउँ एहू। सीय राम पद सहज सनेहू।।
- RCM 2.197.9Open verse →
एहि बिधि मज्जनु भरतु करि गुर अनुसासन पाइ।
अर्थ · Hindi
एहि बिधि मज्जनु भरतु करि गुर अनुसासन पाइ।
- RCM 2.197.10Open verse →
मातु नहानीं जानि सब डेरा चले लवाइ।।197।।
अर्थ · Hindi
मातु नहानीं जानि सब डेरा चले लवाइ।।197।।
- RCM 2.198.1Open verse →
जहँ तहँ लोगन्ह डेरा कीन्हा। भरत सोधु सबही कर लीन्हा।।
अर्थ · Hindi
जहँ तहँ लोगन्ह डेरा कीन्हा। भरत सोधु सबही कर लीन्हा।।
- RCM 2.198.2Open verse →
सुर सेवा करि आयसु पाई। राम मातु पहिं गे दोउ भाई।।
अर्थ · Hindi
सुर सेवा करि आयसु पाई। राम मातु पहिं गे दोउ भाई।।
- RCM 2.198.3Open verse →
चरन चाँपि कहि कहि मृदु बानी। जननीं सकल भरत सनमानी।।
अर्थ · Hindi
चरन चाँपि कहि कहि मृदु बानी। जननीं सकल भरत सनमानी।।
- RCM 2.198.4Open verse →
भाइहि सौंपि मातु सेवकाई। आपु निषादहि लीन्ह बोलाई।।
अर्थ · Hindi
भाइहि सौंपि मातु सेवकाई। आपु निषादहि लीन्ह बोलाई।।
- RCM 2.198.5Open verse →
चले सखा कर सों कर जोरें। सिथिल सरीर सनेह न थोरें।।
अर्थ · Hindi
चले सखा कर सों कर जोरें। सिथिल सरीर सनेह न थोरें।।
- RCM 2.198.6Open verse →
पूँछत सखहि सो ठाउँ देखाऊ। नेकु नयन मन जरनि जुड़ाऊ।।
अर्थ · Hindi
पूँछत सखहि सो ठाउँ देखाऊ। नेकु नयन मन जरनि जुड़ाऊ।।
- RCM 2.198.7Open verse →
जहँ सिय रामु लखनु निसि सोए। कहत भरे जल लोचन कोए।।
अर्थ · Hindi
जहँ सिय रामु लखनु निसि सोए। कहत भरे जल लोचन कोए।।
- RCM 2.198.8Open verse →
भरत बचन सुनि भयउ बिषादू। तुरत तहाँ लइ गयउ निषादू।।
अर्थ · Hindi
भरत बचन सुनि भयउ बिषादू। तुरत तहाँ लइ गयउ निषादू।।
- RCM 2.198.9Open verse →
जहँ सिंसुपा पुनीत तर रघुबर किय बिश्रामु।
अर्थ · Hindi
जहँ सिंसुपा पुनीत तर रघुबर किय बिश्रामु।
- RCM 2.198.10Open verse →
अति सनेहँ सादर भरत कीन्हेउ दंड प्रनामु।।198।।
अर्थ · Hindi
अति सनेहँ सादर भरत कीन्हेउ दंड प्रनामु।।198।।
- RCM 2.199.1Open verse →
कुस साँथरीनिहारि सुहाई। कीन्ह प्रनामु प्रदच्छिन जाई।।
अर्थ · Hindi
कुस साँथरीनिहारि सुहाई। कीन्ह प्रनामु प्रदच्छिन जाई।।
- RCM 2.199.2Open verse →
चरन रेख रज आँखिन्ह लाई। बनइ न कहत प्रीति अधिकाई।।
अर्थ · Hindi
चरन रेख रज आँखिन्ह लाई। बनइ न कहत प्रीति अधिकाई।।
- RCM 2.199.3Open verse →
कनक बिंदु दुइ चारिक देखे। राखे सीस सीय सम लेखे।।
अर्थ · Hindi
कनक बिंदु दुइ चारिक देखे। राखे सीस सीय सम लेखे।।
- RCM 2.199.4Open verse →
सजल बिलोचन हृदयँ गलानी। कहत सखा सन बचन सुबानी।।
अर्थ · Hindi
सजल बिलोचन हृदयँ गलानी। कहत सखा सन बचन सुबानी।।
- RCM 2.199.5Open verse →
श्रीहत सीय बिरहँ दुतिहीना। जथा अवध नर नारि बिलीना।।
अर्थ · Hindi
श्रीहत सीय बिरहँ दुतिहीना। जथा अवध नर नारि बिलीना।।
- RCM 2.199.6Open verse →
पिता जनक देउँ पटतर केही। करतल भोगु जोगु जग जेही।।
अर्थ · Hindi
पिता जनक देउँ पटतर केही। करतल भोगु जोगु जग जेही।।
- RCM 2.199.7Open verse →
ससुर भानुकुल भानु भुआलू। जेहि सिहात अमरावतिपालू।।
अर्थ · Hindi
ससुर भानुकुल भानु भुआलू। जेहि सिहात अमरावतिपालू।।
- RCM 2.199.8Open verse →
प्राननाथु रघुनाथ गोसाई। जो बड़ होत सो राम बड़ाई।।
अर्थ · Hindi
प्राननाथु रघुनाथ गोसाई। जो बड़ होत सो राम बड़ाई।।
- RCM 2.199.9Open verse →
पति देवता सुतीय मनि सीय साँथरी देखि।
अर्थ · Hindi
पति देवता सुतीय मनि सीय साँथरी देखि।
- RCM 2.199.10Open verse →
बिहरत ह्रदउ न हहरि हर पबि तें कठिन बिसेषि।।199।।
अर्थ · Hindi
बिहरत ह्रदउ न हहरि हर पबि तें कठिन बिसेषि।।199।।
- RCM 2.200.1Open verse →
लालन जोगु लखन लघु लोने। भे न भाइ अस अहहिं न होने।।
अर्थ · Hindi
लालन जोगु लखन लघु लोने। भे न भाइ अस अहहिं न होने।।
- RCM 2.200.2Open verse →
पुरजन प्रिय पितु मातु दुलारे। सिय रघुबरहि प्रानपिआरे।।
अर्थ · Hindi
पुरजन प्रिय पितु मातु दुलारे। सिय रघुबरहि प्रानपिआरे।।
- RCM 2.200.3Open verse →
मृदु मूरति सुकुमार सुभाऊ। तात बाउ तन लाग न काऊ।।
अर्थ · Hindi
मृदु मूरति सुकुमार सुभाऊ। तात बाउ तन लाग न काऊ।।
- RCM 2.200.4Open verse →
ते बन सहहिं बिपति सब भाँती। निदरे कोटि कुलिस एहिं छाती।।
अर्थ · Hindi
ते बन सहहिं बिपति सब भाँती। निदरे कोटि कुलिस एहिं छाती।।
- RCM 2.200.5Open verse →
राम जनमि जगु कीन्ह उजागर। रूप सील सुख सब गुन सागर।।
अर्थ · Hindi
राम जनमि जगु कीन्ह उजागर। रूप सील सुख सब गुन सागर।।
- RCM 2.200.6Open verse →
पुरजन परिजन गुर पितु माता। राम सुभाउ सबहि सुखदाता।।
अर्थ · Hindi
पुरजन परिजन गुर पितु माता। राम सुभाउ सबहि सुखदाता।।
- RCM 2.200.7Open verse →
बैरिउ राम बड़ाई करहीं। बोलनि मिलनि बिनय मन हरहीं।।
अर्थ · Hindi
बैरिउ राम बड़ाई करहीं। बोलनि मिलनि बिनय मन हरहीं।।
- RCM 2.200.8Open verse →
सारद कोटि कोटि सत सेषा। करि न सकहिं प्रभु गुन गन लेखा।।
अर्थ · Hindi
सारद कोटि कोटि सत सेषा। करि न सकहिं प्रभु गुन गन लेखा।।
- RCM 2.200.9Open verse →
सुखस्वरुप रघुबंसमनि मंगल मोद निधान।
अर्थ · Hindi
सुखस्वरुप रघुबंसमनि मंगल मोद निधान।
- RCM 2.200.10Open verse →
ते सोवत कुस डासि महि बिधि गति अति बलवान।।200।।
अर्थ · Hindi
ते सोवत कुस डासि महि बिधि गति अति बलवान।।200।।
- RCM 2.201.1Open verse →
राम सुना दुखु कान न काऊ। जीवनतरु जिमि जोगवइ राऊ।।
अर्थ · Hindi
राम सुना दुखु कान न काऊ। जीवनतरु जिमि जोगवइ राऊ।।
- RCM 2.201.2Open verse →
पलक नयन फनि मनि जेहि भाँती। जोगवहिं जननि सकल दिन राती।।
अर्थ · Hindi
पलक नयन फनि मनि जेहि भाँती। जोगवहिं जननि सकल दिन राती।।
- RCM 2.201.3Open verse →
ते अब फिरत बिपिन पदचारी। कंद मूल फल फूल अहारी।।
अर्थ · Hindi
ते अब फिरत बिपिन पदचारी। कंद मूल फल फूल अहारी।।
- RCM 2.201.4Open verse →
धिग कैकेई अमंगल मूला। भइसि प्रान प्रियतम प्रतिकूला।।
अर्थ · Hindi
धिग कैकेई अमंगल मूला। भइसि प्रान प्रियतम प्रतिकूला।।
- RCM 2.201.5Open verse →
मैं धिग धिग अघ उदधि अभागी। सबु उतपातु भयउ जेहि लागी।।
अर्थ · Hindi
मैं धिग धिग अघ उदधि अभागी। सबु उतपातु भयउ जेहि लागी।।
- RCM 2.201.6Open verse →
कुल कलंकु करि सृजेउ बिधाताँ। साइँदोह मोहि कीन्ह कुमाताँ।।
अर्थ · Hindi
कुल कलंकु करि सृजेउ बिधाताँ। साइँदोह मोहि कीन्ह कुमाताँ।।
- RCM 2.201.7Open verse →
सुनि सप्रेम समुझाव निषादू। नाथ करिअ कत बादि बिषादू।।
अर्थ · Hindi
सुनि सप्रेम समुझाव निषादू। नाथ करिअ कत बादि बिषादू।।
- RCM 2.201.8Open verse →
राम तुम्हहि प्रिय तुम्ह प्रिय रामहि। यह निरजोसु दोसु बिधि बामहि।।
अर्थ · Hindi
राम तुम्हहि प्रिय तुम्ह प्रिय रामहि। यह निरजोसु दोसु बिधि बामहि।।
- RCM 2.202.1Open verse →
सखा बचन सुनि उर धरि धीरा। बास चले सुमिरत रघुबीरा।।
अर्थ · Hindi
सखा बचन सुनि उर धरि धीरा। बास चले सुमिरत रघुबीरा।।
- RCM 2.202.2Open verse →
यह सुधि पाइ नगर नर नारी। चले बिलोकन आरत भारी।।
अर्थ · Hindi
यह सुधि पाइ नगर नर नारी। चले बिलोकन आरत भारी।।
- RCM 2.202.3Open verse →
परदखिना करि करहिं प्रनामा। देहिं कैकइहि खोरि निकामा।।
अर्थ · Hindi
परदखिना करि करहिं प्रनामा। देहिं कैकइहि खोरि निकामा।।
- RCM 2.202.4Open verse →
भरी भरि बारि बिलोचन लेंहीं। बाम बिधाताहि दूषन देहीं।।
अर्थ · Hindi
भरी भरि बारि बिलोचन लेंहीं। बाम बिधाताहि दूषन देहीं।।
- RCM 2.202.5Open verse →
एक सराहहिं भरत सनेहू। कोउ कह नृपति निबाहेउ नेहू।।
अर्थ · Hindi
एक सराहहिं भरत सनेहू। कोउ कह नृपति निबाहेउ नेहू।।
- RCM 2.202.6Open verse →
निंदहिं आपु सराहि निषादहि। को कहि सकइ बिमोह बिषादहि।।
अर्थ · Hindi
निंदहिं आपु सराहि निषादहि। को कहि सकइ बिमोह बिषादहि।।
- RCM 2.202.7Open verse →
एहि बिधि राति लोगु सबु जागा। भा भिनुसार गुदारा लागा।।
अर्थ · Hindi
एहि बिधि राति लोगु सबु जागा। भा भिनुसार गुदारा लागा।।
- RCM 2.202.8Open verse →
गुरहि सुनावँ चढ़ाइ सुहाईं। नईं नाव सब मातु चढ़ाईं।।
अर्थ · Hindi
गुरहि सुनावँ चढ़ाइ सुहाईं। नईं नाव सब मातु चढ़ाईं।।
- RCM 2.202.9Open verse →
दंड चारि महँ भा सबु पारा। उतरि भरत तब सबहि सँभारा।।
अर्थ · Hindi
दंड चारि महँ भा सबु पारा। उतरि भरत तब सबहि सँभारा।।
- RCM 2.202.10Open verse →
प्रातक्रिया करि मातु पद बंदि गुरहि सिरु नाइ।
अर्थ · Hindi
प्रातक्रिया करि मातु पद बंदि गुरहि सिरु नाइ।
- RCM 2.202.11Open verse →
आगें किए निषाद गन दीन्हेउ कटकु चलाइ।।202।।
अर्थ · Hindi
आगें किए निषाद गन दीन्हेउ कटकु चलाइ।।202।।
- RCM 2.203.1Open verse →
कियउ निषादनाथु अगुआईं। मातु पालकीं सकल चलाईं।।
अर्थ · Hindi
कियउ निषादनाथु अगुआईं। मातु पालकीं सकल चलाईं।।
- RCM 2.203.2Open verse →
साथ बोलाइ भाइ लघु दीन्हा। बिप्रन्ह सहित गवनु गुर कीन्हा।।
अर्थ · Hindi
साथ बोलाइ भाइ लघु दीन्हा। बिप्रन्ह सहित गवनु गुर कीन्हा।।
- RCM 2.203.3Open verse →
आपु सुरसरिहि कीन्ह प्रनामू। सुमिरे लखन सहित सिय रामू।।
अर्थ · Hindi
आपु सुरसरिहि कीन्ह प्रनामू। सुमिरे लखन सहित सिय रामू।।
- RCM 2.203.4Open verse →
गवने भरत पयोदेहिं पाए। कोतल संग जाहिं डोरिआए।।
अर्थ · Hindi
गवने भरत पयोदेहिं पाए। कोतल संग जाहिं डोरिआए।।
- RCM 2.203.5Open verse →
कहहिं सुसेवक बारहिं बारा। होइअ नाथ अस्व असवारा।।
अर्थ · Hindi
कहहिं सुसेवक बारहिं बारा। होइअ नाथ अस्व असवारा।।
- RCM 2.203.6Open verse →
रामु पयोदेहि पायँ सिधाए। हम कहँ रथ गज बाजि बनाए।।
अर्थ · Hindi
रामु पयोदेहि पायँ सिधाए। हम कहँ रथ गज बाजि बनाए।।
- RCM 2.203.7Open verse →
सिर भर जाउँ उचित अस मोरा। सब तें सेवक धरमु कठोरा।।
अर्थ · Hindi
सिर भर जाउँ उचित अस मोरा। सब तें सेवक धरमु कठोरा।।
- RCM 2.203.8Open verse →
देखि भरत गति सुनि मृदु बानी। सब सेवक गन गरहिं गलानी।।
अर्थ · Hindi
देखि भरत गति सुनि मृदु बानी। सब सेवक गन गरहिं गलानी।।
- RCM 2.203.9Open verse →
भरत तीसरे पहर कहँ कीन्ह प्रबेसु प्रयाग।
अर्थ · Hindi
भरत तीसरे पहर कहँ कीन्ह प्रबेसु प्रयाग।
- RCM 2.203.10Open verse →
कहत राम सिय राम सिय उमगि उमगि अनुराग।।203।।
अर्थ · Hindi
कहत राम सिय राम सिय उमगि उमगि अनुराग।।203।।
- RCM 2.204.1Open verse →
झलका झलकत पायन्ह कैंसें। पंकज कोस ओस कन जैसें।।
अर्थ · Hindi
झलका झलकत पायन्ह कैंसें। पंकज कोस ओस कन जैसें।।
- RCM 2.204.2Open verse →
भरत पयादेहिं आए आजू। भयउ दुखित सुनि सकल समाजू।।
अर्थ · Hindi
भरत पयादेहिं आए आजू। भयउ दुखित सुनि सकल समाजू।।
- RCM 2.204.3Open verse →
खबरि लीन्ह सब लोग नहाए। कीन्ह प्रनामु त्रिबेनिहिं आए।।
अर्थ · Hindi
खबरि लीन्ह सब लोग नहाए। कीन्ह प्रनामु त्रिबेनिहिं आए।।
- RCM 2.204.4Open verse →
सबिधि सितासित नीर नहाने। दिए दान महिसुर सनमाने।।
अर्थ · Hindi
सबिधि सितासित नीर नहाने। दिए दान महिसुर सनमाने।।
- RCM 2.204.5Open verse →
देखत स्यामल धवल हलोरे। पुलकि सरीर भरत कर जोरे।।
अर्थ · Hindi
देखत स्यामल धवल हलोरे। पुलकि सरीर भरत कर जोरे।।
- RCM 2.204.6Open verse →
सकल काम प्रद तीरथराऊ। बेद बिदित जग प्रगट प्रभाऊ।।
अर्थ · Hindi
सकल काम प्रद तीरथराऊ। बेद बिदित जग प्रगट प्रभाऊ।।
- RCM 2.204.7Open verse →
मागउँ भीख त्यागि निज धरमू। आरत काह न करइ कुकरमू।।
अर्थ · Hindi
मागउँ भीख त्यागि निज धरमू। आरत काह न करइ कुकरमू।।
- RCM 2.204.8Open verse →
अस जियँ जानि सुजान सुदानी। सफल करहिं जग जाचक बानी।।
अर्थ · Hindi
अस जियँ जानि सुजान सुदानी। सफल करहिं जग जाचक बानी।।
- RCM 2.204.9Open verse →
अरथ न धरम न काम रुचि गति न चहउँ निरबान।
अर्थ · Hindi
अरथ न धरम न काम रुचि गति न चहउँ निरबान।
- RCM 2.204.10Open verse →
जनम जनम रति राम पद यह बरदानु न आन।।204।।
अर्थ · Hindi
जनम जनम रति राम पद यह बरदानु न आन।।204।।
- RCM 2.205.1Open verse →
जानहुँ रामु कुटिल करि मोही। लोग कहउ गुर साहिब द्रोही।।
अर्थ · Hindi
जानहुँ रामु कुटिल करि मोही। लोग कहउ गुर साहिब द्रोही।।
- RCM 2.205.2Open verse →
सीता राम चरन रति मोरें। अनुदिन बढ़उ अनुग्रह तोरें।।
अर्थ · Hindi
सीता राम चरन रति मोरें। अनुदिन बढ़उ अनुग्रह तोरें।।
- RCM 2.205.3Open verse →
जलदु जनम भरि सुरति बिसारउ। जाचत जलु पबि पाहन डारउ।।
अर्थ · Hindi
जलदु जनम भरि सुरति बिसारउ। जाचत जलु पबि पाहन डारउ।।
- RCM 2.205.4Open verse →
चातकु रटनि घटें घटि जाई। बढ़े प्रेमु सब भाँति भलाई।।
अर्थ · Hindi
चातकु रटनि घटें घटि जाई। बढ़े प्रेमु सब भाँति भलाई।।
- RCM 2.205.5Open verse →
कनकहिं बान चढ़इ जिमि दाहें। तिमि प्रियतम पद नेम निबाहें।।
अर्थ · Hindi
कनकहिं बान चढ़इ जिमि दाहें। तिमि प्रियतम पद नेम निबाहें।।
- RCM 2.205.6Open verse →
भरत बचन सुनि माझ त्रिबेनी। भइ मृदु बानि सुमंगल देनी।।
अर्थ · Hindi
भरत बचन सुनि माझ त्रिबेनी। भइ मृदु बानि सुमंगल देनी।।
- RCM 2.205.7Open verse →
तात भरत तुम्ह सब बिधि साधू। राम चरन अनुराग अगाधू।।
अर्थ · Hindi
तात भरत तुम्ह सब बिधि साधू। राम चरन अनुराग अगाधू।।
- RCM 2.205.8Open verse →
बाद गलानि करहु मन माहीं। तुम्ह सम रामहि कोउ प्रिय नाहीं।।
अर्थ · Hindi
बाद गलानि करहु मन माहीं। तुम्ह सम रामहि कोउ प्रिय नाहीं।।
- RCM 2.205.9Open verse →
तनु पुलकेउ हियँ हरषु सुनि बेनि बचन अनुकूल।
अर्थ · Hindi
तनु पुलकेउ हियँ हरषु सुनि बेनि बचन अनुकूल।
- RCM 2.205.10Open verse →
भरत धन्य कहि धन्य सुर हरषित बरषहिं फूल।।205।।
अर्थ · Hindi
भरत धन्य कहि धन्य सुर हरषित बरषहिं फूल।।205।।
- RCM 2.206.1Open verse →
प्रमुदित तीरथराज निवासी। बैखानस बटु गृही उदासी।।
अर्थ · Hindi
प्रमुदित तीरथराज निवासी। बैखानस बटु गृही उदासी।।
- RCM 2.206.2Open verse →
कहहिं परसपर मिलि दस पाँचा। भरत सनेह सीलु सुचि साँचा।।
अर्थ · Hindi
कहहिं परसपर मिलि दस पाँचा। भरत सनेह सीलु सुचि साँचा।।
- RCM 2.206.3Open verse →
सुनत राम गुन ग्राम सुहाए। भरद्वाज मुनिबर पहिं आए।।
अर्थ · Hindi
सुनत राम गुन ग्राम सुहाए। भरद्वाज मुनिबर पहिं आए।।
- RCM 2.206.4Open verse →
दंड प्रनामु करत मुनि देखे। मूरतिमंत भाग्य निज लेखे।।
अर्थ · Hindi
दंड प्रनामु करत मुनि देखे। मूरतिमंत भाग्य निज लेखे।।
- RCM 2.206.5Open verse →
धाइ उठाइ लाइ उर लीन्हे। दीन्हि असीस कृतारथ कीन्हे।।
अर्थ · Hindi
धाइ उठाइ लाइ उर लीन्हे। दीन्हि असीस कृतारथ कीन्हे।।
- RCM 2.206.6Open verse →
आसनु दीन्ह नाइ सिरु बैठे। चहत सकुच गृहँ जनु भजि पैठे।।
अर्थ · Hindi
आसनु दीन्ह नाइ सिरु बैठे। चहत सकुच गृहँ जनु भजि पैठे।।
- RCM 2.206.7Open verse →
मुनि पूँछब कछु यह बड़ सोचू। बोले रिषि लखि सीलु सँकोचू।।
अर्थ · Hindi
मुनि पूँछब कछु यह बड़ सोचू। बोले रिषि लखि सीलु सँकोचू।।
- RCM 2.206.8Open verse →
सुनहु भरत हम सब सुधि पाई। बिधि करतब पर किछु न बसाई।।
अर्थ · Hindi
सुनहु भरत हम सब सुधि पाई। बिधि करतब पर किछु न बसाई।।
- RCM 2.206.9Open verse →
तुम्ह गलानि जियँ जनि करहु समुझी मातु करतूति।
अर्थ · Hindi
तुम्ह गलानि जियँ जनि करहु समुझी मातु करतूति।
- RCM 2.206.10Open verse →
तात कैकइहि दोसु नहिं गई गिरा मति धूति।।206।।
अर्थ · Hindi
तात कैकइहि दोसु नहिं गई गिरा मति धूति।।206।।
- RCM 2.207.1Open verse →
यहउ कहत भल कहिहि न कोऊ। लोकु बेद बुध संमत दोऊ।।
अर्थ · Hindi
यहउ कहत भल कहिहि न कोऊ। लोकु बेद बुध संमत दोऊ।।
- RCM 2.207.2Open verse →
तात तुम्हार बिमल जसु गाई। पाइहि लोकउ बेदु बड़ाई।।
अर्थ · Hindi
तात तुम्हार बिमल जसु गाई। पाइहि लोकउ बेदु बड़ाई।।
- RCM 2.207.3Open verse →
लोक बेद संमत सबु कहई। जेहि पितु देइ राजु सो लहई।।
अर्थ · Hindi
लोक बेद संमत सबु कहई। जेहि पितु देइ राजु सो लहई।।
- RCM 2.207.4Open verse →
राउ सत्यब्रत तुम्हहि बोलाई। देत राजु सुखु धरमु बड़ाई।।
अर्थ · Hindi
राउ सत्यब्रत तुम्हहि बोलाई। देत राजु सुखु धरमु बड़ाई।।
- RCM 2.207.5Open verse →
राम गवनु बन अनरथ मूला। जो सुनि सकल बिस्व भइ सूला।।
अर्थ · Hindi
राम गवनु बन अनरथ मूला। जो सुनि सकल बिस्व भइ सूला।।
- RCM 2.207.6Open verse →
सो भावी बस रानि अयानी। करि कुचालि अंतहुँ पछितानी।।
अर्थ · Hindi
सो भावी बस रानि अयानी। करि कुचालि अंतहुँ पछितानी।।
- RCM 2.207.7Open verse →
तहँउँ तुम्हार अलप अपराधू। कहै सो अधम अयान असाधू।।
अर्थ · Hindi
तहँउँ तुम्हार अलप अपराधू। कहै सो अधम अयान असाधू।।
- RCM 2.207.8Open verse →
करतेहु राजु त तुम्हहि न दोषू। रामहि होत सुनत संतोषू।।
अर्थ · Hindi
करतेहु राजु त तुम्हहि न दोषू। रामहि होत सुनत संतोषू।।
- RCM 2.207.9Open verse →
अब अति कीन्हेहु भरत भल तुम्हहि उचित मत एहु।
अर्थ · Hindi
अब अति कीन्हेहु भरत भल तुम्हहि उचित मत एहु।
- RCM 2.207.10Open verse →
सकल सुमंगल मूल जग रघुबर चरन सनेहु।।207।।
अर्थ · Hindi
सकल सुमंगल मूल जग रघुबर चरन सनेहु।।207।।
- RCM 2.208.1Open verse →
सो तुम्हार धनु जीवनु प्राना। भूरिभाग को तुम्हहि समाना।।
अर्थ · Hindi
सो तुम्हार धनु जीवनु प्राना। भूरिभाग को तुम्हहि समाना।।
- RCM 2.208.2Open verse →
यह तम्हार आचरजु न ताता। दसरथ सुअन राम प्रिय भ्राता।।
अर्थ · Hindi
यह तम्हार आचरजु न ताता। दसरथ सुअन राम प्रिय भ्राता।।
- RCM 2.208.3Open verse →
सुनहु भरत रघुबर मन माहीं। पेम पात्रु तुम्ह सम कोउ नाहीं।।
अर्थ · Hindi
सुनहु भरत रघुबर मन माहीं। पेम पात्रु तुम्ह सम कोउ नाहीं।।
- RCM 2.208.4Open verse →
लखन राम सीतहि अति प्रीती। निसि सब तुम्हहि सराहत बीती।।
अर्थ · Hindi
लखन राम सीतहि अति प्रीती। निसि सब तुम्हहि सराहत बीती।।
- RCM 2.208.5Open verse →
जाना मरमु नहात प्रयागा। मगन होहिं तुम्हरें अनुरागा।।
अर्थ · Hindi
जाना मरमु नहात प्रयागा। मगन होहिं तुम्हरें अनुरागा।।
- RCM 2.208.6Open verse →
तुम्ह पर अस सनेहु रघुबर कें। सुख जीवन जग जस जड़ नर कें।।
अर्थ · Hindi
तुम्ह पर अस सनेहु रघुबर कें। सुख जीवन जग जस जड़ नर कें।।
- RCM 2.208.7Open verse →
यह न अधिक रघुबीर बड़ाई। प्रनत कुटुंब पाल रघुराई।।
अर्थ · Hindi
यह न अधिक रघुबीर बड़ाई। प्रनत कुटुंब पाल रघुराई।।
- RCM 2.208.8Open verse →
तुम्ह तौ भरत मोर मत एहू। धरें देह जनु राम सनेहू।।
अर्थ · Hindi
तुम्ह तौ भरत मोर मत एहू। धरें देह जनु राम सनेहू।।
- RCM 2.208.9Open verse →
तुम्ह कहँ भरत कलंक यह हम सब कहँ उपदेसु।
अर्थ · Hindi
तुम्ह कहँ भरत कलंक यह हम सब कहँ उपदेसु।
- RCM 2.208.10Open verse →
राम भगति रस सिद्धि हित भा यह समउ गनेसु।।208।।
अर्थ · Hindi
राम भगति रस सिद्धि हित भा यह समउ गनेसु।।208।।
- RCM 2.209.1Open verse →
नव बिधु बिमल तात जसु तोरा। रघुबर किंकर कुमुद चकोरा।।
अर्थ · Hindi
नव बिधु बिमल तात जसु तोरा। रघुबर किंकर कुमुद चकोरा।।
- RCM 2.209.2Open verse →
उदित सदा अँथइहि कबहूँ ना। घटिहि न जग नभ दिन दिन दूना।।
अर्थ · Hindi
उदित सदा अँथइहि कबहूँ ना। घटिहि न जग नभ दिन दिन दूना।।
- RCM 2.209.3Open verse →
कोक तिलोक प्रीति अति करिही। प्रभु प्रताप रबि छबिहि न हरिही।।
अर्थ · Hindi
कोक तिलोक प्रीति अति करिही। प्रभु प्रताप रबि छबिहि न हरिही।।
- RCM 2.209.4Open verse →
निसि दिन सुखद सदा सब काहू। ग्रसिहि न कैकइ करतबु राहू।।
अर्थ · Hindi
निसि दिन सुखद सदा सब काहू। ग्रसिहि न कैकइ करतबु राहू।।
- RCM 2.209.5Open verse →
पूरन राम सुपेम पियूषा। गुर अवमान दोष नहिं दूषा।।
अर्थ · Hindi
पूरन राम सुपेम पियूषा। गुर अवमान दोष नहिं दूषा।।
- RCM 2.209.6Open verse →
राम भगत अब अमिअँ अघाहूँ। कीन्हेहु सुलभ सुधा बसुधाहूँ।।
अर्थ · Hindi
राम भगत अब अमिअँ अघाहूँ। कीन्हेहु सुलभ सुधा बसुधाहूँ।।
- RCM 2.209.7Open verse →
भूप भगीरथ सुरसरि आनी। सुमिरत सकल सुंमगल खानी।।
अर्थ · Hindi
भूप भगीरथ सुरसरि आनी। सुमिरत सकल सुंमगल खानी।।
- RCM 2.209.8Open verse →
दसरथ गुन गन बरनि न जाहीं। अधिकु कहा जेहि सम जग नाहीं।।
अर्थ · Hindi
दसरथ गुन गन बरनि न जाहीं। अधिकु कहा जेहि सम जग नाहीं।।
- RCM 2.209.9Open verse →
जासु सनेह सकोच बस राम प्रगट भए आइ।।
अर्थ · Hindi
जासु सनेह सकोच बस राम प्रगट भए आइ।।
- RCM 2.209.10Open verse →
जे हर हिय नयननि कबहुँ निरखे नहीं अघाइ।।209।।
अर्थ · Hindi
जे हर हिय नयननि कबहुँ निरखे नहीं अघाइ।।209।।
- RCM 2.210.1Open verse →
कीरति बिधु तुम्ह कीन्ह अनूपा। जहँ बस राम पेम मृगरूपा।।
अर्थ · Hindi
कीरति बिधु तुम्ह कीन्ह अनूपा। जहँ बस राम पेम मृगरूपा।।
- RCM 2.210.2Open verse →
तात गलानि करहु जियँ जाएँ। डरहु दरिद्रहि पारसु पाएँ।।।।
अर्थ · Hindi
तात गलानि करहु जियँ जाएँ। डरहु दरिद्रहि पारसु पाएँ।।।।
- RCM 2.210.3Open verse →
सुनहु भरत हम झूठ न कहहीं। उदासीन तापस बन रहहीं।।
अर्थ · Hindi
सुनहु भरत हम झूठ न कहहीं। उदासीन तापस बन रहहीं।।
- RCM 2.210.4Open verse →
सब साधन कर सुफल सुहावा। लखन राम सिय दरसनु पावा।।
अर्थ · Hindi
सब साधन कर सुफल सुहावा। लखन राम सिय दरसनु पावा।।
- RCM 2.210.5Open verse →
तेहि फल कर फलु दरस तुम्हारा। सहित पयाग सुभाग हमारा।।
अर्थ · Hindi
तेहि फल कर फलु दरस तुम्हारा। सहित पयाग सुभाग हमारा।।
- RCM 2.210.6Open verse →
भरत धन्य तुम्ह जसु जगु जयऊ। कहि अस पेम मगन पुनि भयऊ।।
अर्थ · Hindi
भरत धन्य तुम्ह जसु जगु जयऊ। कहि अस पेम मगन पुनि भयऊ।।
- RCM 2.210.7Open verse →
सुनि मुनि बचन सभासद हरषे। साधु सराहि सुमन सुर बरषे।।
अर्थ · Hindi
सुनि मुनि बचन सभासद हरषे। साधु सराहि सुमन सुर बरषे।।
- RCM 2.210.8Open verse →
धन्य धन्य धुनि गगन पयागा। सुनि सुनि भरतु मगन अनुरागा।।
अर्थ · Hindi
धन्य धन्य धुनि गगन पयागा। सुनि सुनि भरतु मगन अनुरागा।।
- RCM 2.210.9Open verse →
पुलक गात हियँ रामु सिय सजल सरोरुह नैन।
अर्थ · Hindi
पुलक गात हियँ रामु सिय सजल सरोरुह नैन।
- RCM 2.210.10Open verse →
करि प्रनामु मुनि मंडलिहि बोले गदगद बैन।।210।।
अर्थ · Hindi
करि प्रनामु मुनि मंडलिहि बोले गदगद बैन।।210।।
- RCM 2.211.1Open verse →
मुनि समाजु अरु तीरथराजू। साँचिहुँ सपथ अघाइ अकाजू।।
अर्थ · Hindi
मुनि समाजु अरु तीरथराजू। साँचिहुँ सपथ अघाइ अकाजू।।
- RCM 2.211.2Open verse →
एहिं थल जौं किछु कहिअ बनाई। एहि सम अधिक न अघ अधमाई।।
अर्थ · Hindi
एहिं थल जौं किछु कहिअ बनाई। एहि सम अधिक न अघ अधमाई।।
- RCM 2.211.3Open verse →
तुम्ह सर्बग्य कहउँ सतिभाऊ। उर अंतरजामी रघुराऊ।।
अर्थ · Hindi
तुम्ह सर्बग्य कहउँ सतिभाऊ। उर अंतरजामी रघुराऊ।।
- RCM 2.211.4Open verse →
मोहि न मातु करतब कर सोचू। नहिं दुखु जियँ जगु जानिहि पोचू।।
अर्थ · Hindi
मोहि न मातु करतब कर सोचू। नहिं दुखु जियँ जगु जानिहि पोचू।।
- RCM 2.211.5Open verse →
नाहिन डरु बिगरिहि परलोकू। पितहु मरन कर मोहि न सोकू।।
अर्थ · Hindi
नाहिन डरु बिगरिहि परलोकू। पितहु मरन कर मोहि न सोकू।।
- RCM 2.211.6Open verse →
सुकृत सुजस भरि भुअन सुहाए। लछिमन राम सरिस सुत पाए।।
अर्थ · Hindi
सुकृत सुजस भरि भुअन सुहाए। लछिमन राम सरिस सुत पाए।।
- RCM 2.211.7Open verse →
राम बिरहँ तजि तनु छनभंगू। भूप सोच कर कवन प्रसंगू।।
अर्थ · Hindi
राम बिरहँ तजि तनु छनभंगू। भूप सोच कर कवन प्रसंगू।।
- RCM 2.211.8Open verse →
राम लखन सिय बिनु पग पनहीं। करि मुनि बेष फिरहिं बन बनही।।
अर्थ · Hindi
राम लखन सिय बिनु पग पनहीं। करि मुनि बेष फिरहिं बन बनही।।
- RCM 2.211.9Open verse →
अजिन बसन फल असन महि सयन डासि कुस पात।
अर्थ · Hindi
अजिन बसन फल असन महि सयन डासि कुस पात।
- RCM 2.211.10Open verse →
बसि तरु तर नित सहत हिम आतप बरषा बात।।211।।
अर्थ · Hindi
बसि तरु तर नित सहत हिम आतप बरषा बात।।211।।
- RCM 2.212.1Open verse →
एहि दुख दाहँ दहइ दिन छाती। भूख न बासर नीद न राती।।
अर्थ · Hindi
एहि दुख दाहँ दहइ दिन छाती। भूख न बासर नीद न राती।।
- RCM 2.212.2Open verse →
एहि कुरोग कर औषधु नाहीं। सोधेउँ सकल बिस्व मन माहीं।।
अर्थ · Hindi
एहि कुरोग कर औषधु नाहीं। सोधेउँ सकल बिस्व मन माहीं।।
- RCM 2.212.3Open verse →
मातु कुमत बढ़ई अघ मूला। तेहिं हमार हित कीन्ह बँसूला।।
अर्थ · Hindi
मातु कुमत बढ़ई अघ मूला। तेहिं हमार हित कीन्ह बँसूला।।
- RCM 2.212.4Open verse →
कलि कुकाठ कर कीन्ह कुजंत्रू। गाड़ि अवधि पढ़ि कठिन कुमंत्रु।।
अर्थ · Hindi
कलि कुकाठ कर कीन्ह कुजंत्रू। गाड़ि अवधि पढ़ि कठिन कुमंत्रु।।
- RCM 2.212.5Open verse →
मोहि लगि यहु कुठाटु तेहिं ठाटा। घालेसि सब जगु बारहबाटा।।
अर्थ · Hindi
मोहि लगि यहु कुठाटु तेहिं ठाटा। घालेसि सब जगु बारहबाटा।।
- RCM 2.212.6Open verse →
मिटइ कुजोगु राम फिरि आएँ। बसइ अवध नहिं आन उपाएँ।।
अर्थ · Hindi
मिटइ कुजोगु राम फिरि आएँ। बसइ अवध नहिं आन उपाएँ।।
- RCM 2.212.7Open verse →
भरत बचन सुनि मुनि सुखु पाई। सबहिं कीन्ह बहु भाँति बड़ाई।।
अर्थ · Hindi
भरत बचन सुनि मुनि सुखु पाई। सबहिं कीन्ह बहु भाँति बड़ाई।।
- RCM 2.212.8Open verse →
तात करहु जनि सोचु बिसेषी। सब दुखु मिटहि राम पग देखी।।
अर्थ · Hindi
तात करहु जनि सोचु बिसेषी। सब दुखु मिटहि राम पग देखी।।
- RCM 2.212.9Open verse →
करि प्रबोध मुनिबर कहेउ अतिथि पेमप्रिय होहु।
अर्थ · Hindi
करि प्रबोध मुनिबर कहेउ अतिथि पेमप्रिय होहु।
- RCM 2.212.10Open verse →
कंद मूल फल फूल हम देहिं लेहु करि छोहु।।212।।
अर्थ · Hindi
कंद मूल फल फूल हम देहिं लेहु करि छोहु।।212।।
- RCM 2.213.1Open verse →
सुनि मुनि बचन भरत हिंय सोचू। भयउ कुअवसर कठिन सँकोचू।।
अर्थ · Hindi
सुनि मुनि बचन भरत हिंय सोचू। भयउ कुअवसर कठिन सँकोचू।।
- RCM 2.213.2Open verse →
जानि गरुइ गुर गिरा बहोरी। चरन बंदि बोले कर जोरी।।
अर्थ · Hindi
जानि गरुइ गुर गिरा बहोरी। चरन बंदि बोले कर जोरी।।
- RCM 2.213.3Open verse →
सिर धरि आयसु करिअ तुम्हारा। परम धरम यहु नाथ हमारा।।
अर्थ · Hindi
सिर धरि आयसु करिअ तुम्हारा। परम धरम यहु नाथ हमारा।।
- RCM 2.213.4Open verse →
भरत बचन मुनिबर मन भाए। सुचि सेवक सिष निकट बोलाए।।
अर्थ · Hindi
भरत बचन मुनिबर मन भाए। सुचि सेवक सिष निकट बोलाए।।
- RCM 2.213.5Open verse →
चाहिए कीन्ह भरत पहुनाई। कंद मूल फल आनहु जाई।।
अर्थ · Hindi
चाहिए कीन्ह भरत पहुनाई। कंद मूल फल आनहु जाई।।
- RCM 2.213.6Open verse →
भलेहीं नाथ कहि तिन्ह सिर नाए। प्रमुदित निज निज काज सिधाए।।
अर्थ · Hindi
भलेहीं नाथ कहि तिन्ह सिर नाए। प्रमुदित निज निज काज सिधाए।।
- RCM 2.213.7Open verse →
मुनिहि सोच पाहुन बड़ नेवता। तसि पूजा चाहिअ जस देवता।।
अर्थ · Hindi
मुनिहि सोच पाहुन बड़ नेवता। तसि पूजा चाहिअ जस देवता।।
- RCM 2.213.8Open verse →
सुनि रिधि सिधि अनिमादिक आई। आयसु होइ सो करहिं गोसाई।।
अर्थ · Hindi
सुनि रिधि सिधि अनिमादिक आई। आयसु होइ सो करहिं गोसाई।।
- RCM 2.213.9Open verse →
राम बिरह ब्याकुल भरतु सानुज सहित समाज।
अर्थ · Hindi
राम बिरह ब्याकुल भरतु सानुज सहित समाज।
- RCM 2.213.10Open verse →
पहुनाई करि हरहु श्रम कहा मुदित मुनिराज।।213।।
अर्थ · Hindi
पहुनाई करि हरहु श्रम कहा मुदित मुनिराज।।213।।
- RCM 2.214.1Open verse →
रिधि सिधि सिर धरि मुनिबर बानी। बड़भागिनि आपुहि अनुमानी।।
अर्थ · Hindi
रिधि सिधि सिर धरि मुनिबर बानी। बड़भागिनि आपुहि अनुमानी।।
- RCM 2.214.2Open verse →
कहहिं परसपर सिधि समुदाई। अतुलित अतिथि राम लघु भाई।।
अर्थ · Hindi
कहहिं परसपर सिधि समुदाई। अतुलित अतिथि राम लघु भाई।।
- RCM 2.214.3Open verse →
मुनि पद बंदि करिअ सोइ आजू। होइ सुखी सब राज समाजू।।
अर्थ · Hindi
मुनि पद बंदि करिअ सोइ आजू। होइ सुखी सब राज समाजू।।
- RCM 2.214.4Open verse →
अस कहि रचेउ रुचिर गृह नाना। जेहि बिलोकि बिलखाहिं बिमाना।।
अर्थ · Hindi
अस कहि रचेउ रुचिर गृह नाना। जेहि बिलोकि बिलखाहिं बिमाना।।
- RCM 2.214.5Open verse →
भोग बिभूति भूरि भरि राखे। देखत जिन्हहि अमर अभिलाषे।।
अर्थ · Hindi
भोग बिभूति भूरि भरि राखे। देखत जिन्हहि अमर अभिलाषे।।
- RCM 2.214.6Open verse →
दासीं दास साजु सब लीन्हें। जोगवत रहहिं मनहि मनु दीन्हें।।
अर्थ · Hindi
दासीं दास साजु सब लीन्हें। जोगवत रहहिं मनहि मनु दीन्हें।।
- RCM 2.214.7Open verse →
सब समाजु सजि सिधि पल माहीं। जे सुख सुरपुर सपनेहुँ नाहीं।।
अर्थ · Hindi
सब समाजु सजि सिधि पल माहीं। जे सुख सुरपुर सपनेहुँ नाहीं।।
- RCM 2.214.8Open verse →
प्रथमहिं बास दिए सब केही। सुंदर सुखद जथा रुचि जेही।।
अर्थ · Hindi
प्रथमहिं बास दिए सब केही। सुंदर सुखद जथा रुचि जेही।।
- RCM 2.214.9Open verse →
बहुरि सपरिजन भरत कहुँ रिषि अस आयसु दीन्ह।
अर्थ · Hindi
बहुरि सपरिजन भरत कहुँ रिषि अस आयसु दीन्ह।
- RCM 2.214.10Open verse →
बिधि बिसमय दायकु बिभव मुनिबर तपबल कीन्ह।।214।।
अर्थ · Hindi
बिधि बिसमय दायकु बिभव मुनिबर तपबल कीन्ह।।214।।
- RCM 2.215.1Open verse →
मुनि प्रभाउ जब भरत बिलोका। सब लघु लगे लोकपति लोका।।
अर्थ · Hindi
मुनि प्रभाउ जब भरत बिलोका। सब लघु लगे लोकपति लोका।।
- RCM 2.215.2Open verse →
सुख समाजु नहिं जाइ बखानी। देखत बिरति बिसारहीं ग्यानी।।
अर्थ · Hindi
सुख समाजु नहिं जाइ बखानी। देखत बिरति बिसारहीं ग्यानी।।
- RCM 2.215.3Open verse →
आसन सयन सुबसन बिताना। बन बाटिका बिहग मृग नाना।।
अर्थ · Hindi
आसन सयन सुबसन बिताना। बन बाटिका बिहग मृग नाना।।
- RCM 2.215.4Open verse →
सुरभि फूल फल अमिअ समाना। बिमल जलासय बिबिध बिधाना।
अर्थ · Hindi
सुरभि फूल फल अमिअ समाना। बिमल जलासय बिबिध बिधाना।
- RCM 2.215.5Open verse →
असन पान सुच अमिअ अमी से। देखि लोग सकुचात जमी से।।
अर्थ · Hindi
असन पान सुच अमिअ अमी से। देखि लोग सकुचात जमी से।।
- RCM 2.215.6Open verse →
सुर सुरभी सुरतरु सबही कें। लखि अभिलाषु सुरेस सची कें।।
अर्थ · Hindi
सुर सुरभी सुरतरु सबही कें। लखि अभिलाषु सुरेस सची कें।।
- RCM 2.215.7Open verse →
रितु बसंत बह त्रिबिध बयारी। सब कहँ सुलभ पदारथ चारी।।
अर्थ · Hindi
रितु बसंत बह त्रिबिध बयारी। सब कहँ सुलभ पदारथ चारी।।
- RCM 2.215.8Open verse →
स्त्रक चंदन बनितादिक भोगा। देखि हरष बिसमय बस लोगा।।
अर्थ · Hindi
स्त्रक चंदन बनितादिक भोगा। देखि हरष बिसमय बस लोगा।।
- RCM 2.215.9Open verse →
संपत चकई भरतु चक मुनि आयस खेलवार।।
अर्थ · Hindi
संपत चकई भरतु चक मुनि आयस खेलवार।।
- RCM 2.215.10Open verse →
तेहि निसि आश्रम पिंजराँ राखे भा भिनुसार।।215।।
अर्थ · Hindi
तेहि निसि आश्रम पिंजराँ राखे भा भिनुसार।।215।।
- RCM 2.216.1Open verse →
कीन्ह निमज्जनु तीरथराजा। नाइ मुनिहि सिरु सहित समाजा।।
अर्थ · Hindi
कीन्ह निमज्जनु तीरथराजा। नाइ मुनिहि सिरु सहित समाजा।।
- RCM 2.216.2Open verse →
रिषि आयसु असीस सिर राखी। करि दंडवत बिनय बहु भाषी।।
अर्थ · Hindi
रिषि आयसु असीस सिर राखी। करि दंडवत बिनय बहु भाषी।।
- RCM 2.216.3Open verse →
पथ गति कुसल साथ सब लीन्हे। चले चित्रकूटहिं चितु दीन्हें।।
अर्थ · Hindi
पथ गति कुसल साथ सब लीन्हे। चले चित्रकूटहिं चितु दीन्हें।।
- RCM 2.216.4Open verse →
रामसखा कर दीन्हें लागू। चलत देह धरि जनु अनुरागू।।
अर्थ · Hindi
रामसखा कर दीन्हें लागू। चलत देह धरि जनु अनुरागू।।
- RCM 2.216.5Open verse →
नहिं पद त्रान सीस नहिं छाया। पेमु नेमु ब्रतु धरमु अमाया।।
अर्थ · Hindi
नहिं पद त्रान सीस नहिं छाया। पेमु नेमु ब्रतु धरमु अमाया।।
- RCM 2.216.6Open verse →
लखन राम सिय पंथ कहानी। पूँछत सखहि कहत मृदु बानी।।
अर्थ · Hindi
लखन राम सिय पंथ कहानी। पूँछत सखहि कहत मृदु बानी।।
- RCM 2.216.7Open verse →
राम बास थल बिटप बिलोकें। उर अनुराग रहत नहिं रोकैं।।
अर्थ · Hindi
राम बास थल बिटप बिलोकें। उर अनुराग रहत नहिं रोकैं।।
- RCM 2.216.8Open verse →
दैखि दसा सुर बरिसहिं फूला। भइ मृदु महि मगु मंगल मूला।।
अर्थ · Hindi
दैखि दसा सुर बरिसहिं फूला। भइ मृदु महि मगु मंगल मूला।।
- RCM 2.216.9Open verse →
किएँ जाहिं छाया जलद सुखद बहइ बर बात।
अर्थ · Hindi
किएँ जाहिं छाया जलद सुखद बहइ बर बात।
- RCM 2.216.10Open verse →
तस मगु भयउ न राम कहँ जस भा भरतहि जात।।216।।
अर्थ · Hindi
तस मगु भयउ न राम कहँ जस भा भरतहि जात।।216।।
- RCM 2.217.1Open verse →
जड़ चेतन मग जीव घनेरे। जे चितए प्रभु जिन्ह प्रभु हेरे।।
अर्थ · Hindi
जड़ चेतन मग जीव घनेरे। जे चितए प्रभु जिन्ह प्रभु हेरे।।
- RCM 2.217.2Open verse →
ते सब भए परम पद जोगू। भरत दरस मेटा भव रोगू।।
अर्थ · Hindi
ते सब भए परम पद जोगू। भरत दरस मेटा भव रोगू।।
- RCM 2.217.3Open verse →
यह बड़ि बात भरत कइ नाहीं। सुमिरत जिनहि रामु मन माहीं।।
अर्थ · Hindi
यह बड़ि बात भरत कइ नाहीं। सुमिरत जिनहि रामु मन माहीं।।
- RCM 2.217.4Open verse →
बारक राम कहत जग जेऊ। होत तरन तारन नर तेऊ।।
अर्थ · Hindi
बारक राम कहत जग जेऊ। होत तरन तारन नर तेऊ।।
- RCM 2.217.5Open verse →
भरतु राम प्रिय पुनि लघु भ्राता। कस न होइ मगु मंगलदाता।।
अर्थ · Hindi
भरतु राम प्रिय पुनि लघु भ्राता। कस न होइ मगु मंगलदाता।।
- RCM 2.217.6Open verse →
सिद्ध साधु मुनिबर अस कहहीं। भरतहि निरखि हरषु हियँ लहहीं।।
अर्थ · Hindi
सिद्ध साधु मुनिबर अस कहहीं। भरतहि निरखि हरषु हियँ लहहीं।।
- RCM 2.217.7Open verse →
देखि प्रभाउ सुरेसहि सोचू। जगु भल भलेहि पोच कहुँ पोचू।।
अर्थ · Hindi
देखि प्रभाउ सुरेसहि सोचू। जगु भल भलेहि पोच कहुँ पोचू।।
- RCM 2.217.8Open verse →
गुर सन कहेउ करिअ प्रभु सोई। रामहि भरतहि भेंट न होई।।
अर्थ · Hindi
गुर सन कहेउ करिअ प्रभु सोई। रामहि भरतहि भेंट न होई।।
- RCM 2.217.9Open verse →
रामु सँकोची प्रेम बस भरत सपेम पयोधि।
अर्थ · Hindi
रामु सँकोची प्रेम बस भरत सपेम पयोधि।
- RCM 2.217.10Open verse →
बनी बात बेगरन चहति करिअ जतनु छलु सोधि।।217।।
अर्थ · Hindi
बनी बात बेगरन चहति करिअ जतनु छलु सोधि।।217।।
- RCM 2.218.1Open verse →
बचन सुनत सुरगुरु मुसकाने। सहसनयन बिनु लोचन जाने।।
अर्थ · Hindi
बचन सुनत सुरगुरु मुसकाने। सहसनयन बिनु लोचन जाने।।
- RCM 2.218.2Open verse →
मायापति सेवक सन माया। करइ त उलटि परइ सुरराया।।
अर्थ · Hindi
मायापति सेवक सन माया। करइ त उलटि परइ सुरराया।।
- RCM 2.218.3Open verse →
तब किछु कीन्ह राम रुख जानी। अब कुचालि करि होइहि हानी।।
अर्थ · Hindi
तब किछु कीन्ह राम रुख जानी। अब कुचालि करि होइहि हानी।।
- RCM 2.218.4Open verse →
सुनु सुरेस रघुनाथ सुभाऊ। निज अपराध रिसाहिं न काऊ।।
अर्थ · Hindi
सुनु सुरेस रघुनाथ सुभाऊ। निज अपराध रिसाहिं न काऊ।।
- RCM 2.218.5Open verse →
जो अपराधु भगत कर करई। राम रोष पावक सो जरई।।
अर्थ · Hindi
जो अपराधु भगत कर करई। राम रोष पावक सो जरई।।
- RCM 2.218.6Open verse →
लोकहुँ बेद बिदित इतिहासा। यह महिमा जानहिं दुरबासा।।
अर्थ · Hindi
लोकहुँ बेद बिदित इतिहासा। यह महिमा जानहिं दुरबासा।।
- RCM 2.218.7Open verse →
भरत सरिस को राम सनेही। जगु जप राम रामु जप जेही।।
अर्थ · Hindi
भरत सरिस को राम सनेही। जगु जप राम रामु जप जेही।।
- RCM 2.218.8Open verse →
मनहुँ न आनिअ अमरपति रघुबर भगत अकाजु।
अर्थ · Hindi
मनहुँ न आनिअ अमरपति रघुबर भगत अकाजु।
- RCM 2.218.9Open verse →
अजसु लोक परलोक दुख दिन दिन सोक समाजु।।218।।
अर्थ · Hindi
अजसु लोक परलोक दुख दिन दिन सोक समाजु।।218।।
- RCM 2.219.1Open verse →
सुनु सुरेस उपदेसु हमारा। रामहि सेवकु परम पिआरा।।
अर्थ · Hindi
सुनु सुरेस उपदेसु हमारा। रामहि सेवकु परम पिआरा।।
- RCM 2.219.2Open verse →
मानत सुखु सेवक सेवकाई। सेवक बैर बैरु अधिकाई।।
अर्थ · Hindi
मानत सुखु सेवक सेवकाई। सेवक बैर बैरु अधिकाई।।
- RCM 2.219.3Open verse →
जद्यपि सम नहिं राग न रोषू। गहहिं न पाप पूनु गुन दोषू।।
अर्थ · Hindi
जद्यपि सम नहिं राग न रोषू। गहहिं न पाप पूनु गुन दोषू।।
- RCM 2.219.4Open verse →
करम प्रधान बिस्व करि राखा। जो जस करइ सो तस फलु चाखा।।
अर्थ · Hindi
करम प्रधान बिस्व करि राखा। जो जस करइ सो तस फलु चाखा।।
- RCM 2.219.5Open verse →
तदपि करहिं सम बिषम बिहारा। भगत अभगत हृदय अनुसारा।।
अर्थ · Hindi
तदपि करहिं सम बिषम बिहारा। भगत अभगत हृदय अनुसारा।।
- RCM 2.219.6Open verse →
अगुन अलेप अमान एकरस। रामु सगुन भए भगत पेम बस।।
अर्थ · Hindi
अगुन अलेप अमान एकरस। रामु सगुन भए भगत पेम बस।।
- RCM 2.219.7Open verse →
राम सदा सेवक रुचि राखी। बेद पुरान साधु सुर साखी।।
अर्थ · Hindi
राम सदा सेवक रुचि राखी। बेद पुरान साधु सुर साखी।।
- RCM 2.219.8Open verse →
अस जियँ जानि तजहु कुटिलाई। करहु भरत पद प्रीति सुहाई।।
अर्थ · Hindi
अस जियँ जानि तजहु कुटिलाई। करहु भरत पद प्रीति सुहाई।।
- RCM 2.219.9Open verse →
राम भगत परहित निरत पर दुख दुखी दयाल।
अर्थ · Hindi
राम भगत परहित निरत पर दुख दुखी दयाल।
- RCM 2.219.10Open verse →
भगत सिरोमनि भरत तें जनि डरपहु सुरपाल।।219।।
अर्थ · Hindi
भगत सिरोमनि भरत तें जनि डरपहु सुरपाल।।219।।
- RCM 2.220.1Open verse →
सत्यसंध प्रभु सुर हितकारी। भरत राम आयस अनुसारी।।
अर्थ · Hindi
सत्यसंध प्रभु सुर हितकारी। भरत राम आयस अनुसारी।।
- RCM 2.220.2Open verse →
स्वारथ बिबस बिकल तुम्ह होहू। भरत दोसु नहिं राउर मोहू।।
अर्थ · Hindi
स्वारथ बिबस बिकल तुम्ह होहू। भरत दोसु नहिं राउर मोहू।।
- RCM 2.220.3Open verse →
सुनि सुरबर सुरगुर बर बानी। भा प्रमोदु मन मिटी गलानी।।
अर्थ · Hindi
सुनि सुरबर सुरगुर बर बानी। भा प्रमोदु मन मिटी गलानी।।
- RCM 2.220.4Open verse →
बरषि प्रसून हरषि सुरराऊ। लगे सराहन भरत सुभाऊ।।
अर्थ · Hindi
बरषि प्रसून हरषि सुरराऊ। लगे सराहन भरत सुभाऊ।।
- RCM 2.220.5Open verse →
एहि बिधि भरत चले मग जाहीं। दसा देखि मुनि सिद्ध सिहाहीं।।
अर्थ · Hindi
एहि बिधि भरत चले मग जाहीं। दसा देखि मुनि सिद्ध सिहाहीं।।
- RCM 2.220.6Open verse →
जबहिं रामु कहि लेहिं उसासा। उमगत पेमु मनहँ चहु पासा।।
अर्थ · Hindi
जबहिं रामु कहि लेहिं उसासा। उमगत पेमु मनहँ चहु पासा।।
- RCM 2.220.7Open verse →
द्रवहिं बचन सुनि कुलिस पषाना। पुरजन पेमु न जाइ बखाना।।
अर्थ · Hindi
द्रवहिं बचन सुनि कुलिस पषाना। पुरजन पेमु न जाइ बखाना।।
- RCM 2.220.8Open verse →
बीच बास करि जमुनहिं आए। निरखि नीरु लोचन जल छाए।।
अर्थ · Hindi
बीच बास करि जमुनहिं आए। निरखि नीरु लोचन जल छाए।।
- RCM 2.220.9Open verse →
रघुबर बरन बिलोकि बर बारि समेत समाज।
अर्थ · Hindi
रघुबर बरन बिलोकि बर बारि समेत समाज।
- RCM 2.220.10Open verse →
होत मगन बारिधि बिरह चढ़े बिबेक जहाज।।220।।
अर्थ · Hindi
होत मगन बारिधि बिरह चढ़े बिबेक जहाज।।220।।
- RCM 2.221.1Open verse →
जमुन तीर तेहि दिन करि बासू। भयउ समय सम सबहि सुपासू।।
अर्थ · Hindi
जमुन तीर तेहि दिन करि बासू। भयउ समय सम सबहि सुपासू।।
- RCM 2.221.2Open verse →
रातहिं घाट घाट की तरनी। आईं अगनित जाहिं न बरनी।।
अर्थ · Hindi
रातहिं घाट घाट की तरनी। आईं अगनित जाहिं न बरनी।।
- RCM 2.221.3Open verse →
प्रात पार भए एकहि खेंवाँ। तोषे रामसखा की सेवाँ।।
अर्थ · Hindi
प्रात पार भए एकहि खेंवाँ। तोषे रामसखा की सेवाँ।।
- RCM 2.221.4Open verse →
चले नहाइ नदिहि सिर नाई। साथ निषादनाथ दोउ भाई।।
अर्थ · Hindi
चले नहाइ नदिहि सिर नाई। साथ निषादनाथ दोउ भाई।।
- RCM 2.221.5Open verse →
आगें मुनिबर बाहन आछें। राजसमाज जाइ सबु पाछें।।
अर्थ · Hindi
आगें मुनिबर बाहन आछें। राजसमाज जाइ सबु पाछें।।
- RCM 2.221.6Open verse →
तेहिं पाछें दोउ बंधु पयादें। भूषन बसन बेष सुठि सादें।।
अर्थ · Hindi
तेहिं पाछें दोउ बंधु पयादें। भूषन बसन बेष सुठि सादें।।
- RCM 2.221.7Open verse →
सेवक सुह्रद सचिवसुत साथा। सुमिरत लखनु सीय रघुनाथा।।
अर्थ · Hindi
सेवक सुह्रद सचिवसुत साथा। सुमिरत लखनु सीय रघुनाथा।।
- RCM 2.221.8Open verse →
जहँ जहँ राम बास बिश्रामा। तहँ तहँ करहिं सप्रेम प्रनामा।।
अर्थ · Hindi
जहँ जहँ राम बास बिश्रामा। तहँ तहँ करहिं सप्रेम प्रनामा।।
- RCM 2.221.9Open verse →
मगबासी नर नारि सुनि धाम काम तजि धाइ।
अर्थ · Hindi
मगबासी नर नारि सुनि धाम काम तजि धाइ।
- RCM 2.221.10Open verse →
देखि सरूप सनेह सब मुदित जनम फलु पाइ।।221।।
अर्थ · Hindi
देखि सरूप सनेह सब मुदित जनम फलु पाइ।।221।।
- RCM 2.222.1Open verse →
कहहिं सपेम एक एक पाहीं। रामु लखनु सखि होहिं कि नाहीं।।
अर्थ · Hindi
कहहिं सपेम एक एक पाहीं। रामु लखनु सखि होहिं कि नाहीं।।
- RCM 2.222.2Open verse →
बय बपु बरन रूप सोइ आली। सीलु सनेहु सरिस सम चाली।।
अर्थ · Hindi
बय बपु बरन रूप सोइ आली। सीलु सनेहु सरिस सम चाली।।
- RCM 2.222.3Open verse →
बेषु न सो सखि सीय न संगा। आगें अनी चली चतुरंगा।।
अर्थ · Hindi
बेषु न सो सखि सीय न संगा। आगें अनी चली चतुरंगा।।
- RCM 2.222.4Open verse →
नहिं प्रसन्न मुख मानस खेदा। सखि संदेहु होइ एहिं भेदा।।
अर्थ · Hindi
नहिं प्रसन्न मुख मानस खेदा। सखि संदेहु होइ एहिं भेदा।।
- RCM 2.222.5Open verse →
तासु तरक तियगन मन मानी। कहहिं सकल तेहि सम न सयानी।।
अर्थ · Hindi
तासु तरक तियगन मन मानी। कहहिं सकल तेहि सम न सयानी।।
- RCM 2.222.6Open verse →
तेहि सराहि बानी फुरि पूजी। बोली मधुर बचन तिय दूजी।।
अर्थ · Hindi
तेहि सराहि बानी फुरि पूजी। बोली मधुर बचन तिय दूजी।।
- RCM 2.222.7Open verse →
कहि सपेम सब कथाप्रसंगू। जेहि बिधि राम राज रस भंगू।।
अर्थ · Hindi
कहि सपेम सब कथाप्रसंगू। जेहि बिधि राम राज रस भंगू।।
- RCM 2.222.8Open verse →
भरतहि बहुरि सराहन लागी। सील सनेह सुभाय सुभागी।।
अर्थ · Hindi
भरतहि बहुरि सराहन लागी। सील सनेह सुभाय सुभागी।।
- RCM 2.222.9Open verse →
चलत पयादें खात फल पिता दीन्ह तजि राजु।
अर्थ · Hindi
चलत पयादें खात फल पिता दीन्ह तजि राजु।
- RCM 2.222.10Open verse →
जात मनावन रघुबरहि भरत सरिस को आजु।।222।।
अर्थ · Hindi
जात मनावन रघुबरहि भरत सरिस को आजु।।222।।
- RCM 2.223.1Open verse →
भायप भगति भरत आचरनू। कहत सुनत दुख दूषन हरनू।।
अर्थ · Hindi
भायप भगति भरत आचरनू। कहत सुनत दुख दूषन हरनू।।
- RCM 2.223.2Open verse →
जो कछु कहब थोर सखि सोई। राम बंधु अस काहे न होई।।
अर्थ · Hindi
जो कछु कहब थोर सखि सोई। राम बंधु अस काहे न होई।।
- RCM 2.223.3Open verse →
हम सब सानुज भरतहि देखें। भइन्ह धन्य जुबती जन लेखें।।
अर्थ · Hindi
हम सब सानुज भरतहि देखें। भइन्ह धन्य जुबती जन लेखें।।
- RCM 2.223.4Open verse →
सुनि गुन देखि दसा पछिताहीं। कैकइ जननि जोगु सुतु नाहीं।।
अर्थ · Hindi
सुनि गुन देखि दसा पछिताहीं। कैकइ जननि जोगु सुतु नाहीं।।
- RCM 2.223.5Open verse →
कोउ कह दूषनु रानिहि नाहिन। बिधि सबु कीन्ह हमहि जो दाहिन।।
अर्थ · Hindi
कोउ कह दूषनु रानिहि नाहिन। बिधि सबु कीन्ह हमहि जो दाहिन।।
- RCM 2.223.6Open verse →
कहँ हम लोक बेद बिधि हीनी। लघु तिय कुल करतूति मलीनी।।
अर्थ · Hindi
कहँ हम लोक बेद बिधि हीनी। लघु तिय कुल करतूति मलीनी।।
- RCM 2.223.7Open verse →
बसहिं कुदेस कुगाँव कुबामा। कहँ यह दरसु पुन्य परिनामा।।
अर्थ · Hindi
बसहिं कुदेस कुगाँव कुबामा। कहँ यह दरसु पुन्य परिनामा।।
- RCM 2.223.8Open verse →
अस अनंदु अचिरिजु प्रति ग्रामा। जनु मरुभूमि कलपतरु जामा।।
अर्थ · Hindi
अस अनंदु अचिरिजु प्रति ग्रामा। जनु मरुभूमि कलपतरु जामा।।
- RCM 2.223.9Open verse →
भरत दरसु देखत खुलेउ मग लोगन्ह कर भागु।
अर्थ · Hindi
भरत दरसु देखत खुलेउ मग लोगन्ह कर भागु।
- RCM 2.223.10Open verse →
जनु सिंघलबासिन्ह भयउ बिधि बस सुलभ प्रयागु।।223।।
अर्थ · Hindi
जनु सिंघलबासिन्ह भयउ बिधि बस सुलभ प्रयागु।।223।।
- RCM 2.224.1Open verse →
निज गुन सहित राम गुन गाथा। सुनत जाहिं सुमिरत रघुनाथा।।
अर्थ · Hindi
निज गुन सहित राम गुन गाथा। सुनत जाहिं सुमिरत रघुनाथा।।
- RCM 2.224.2Open verse →
तीरथ मुनि आश्रम सुरधामा। निरखि निमज्जहिं करहिं प्रनामा।।
अर्थ · Hindi
तीरथ मुनि आश्रम सुरधामा। निरखि निमज्जहिं करहिं प्रनामा।।
- RCM 2.224.3Open verse →
मनहीं मन मागहिं बरु एहू। सीय राम पद पदुम सनेहू।।
अर्थ · Hindi
मनहीं मन मागहिं बरु एहू। सीय राम पद पदुम सनेहू।।
- RCM 2.224.4Open verse →
मिलहिं किरात कोल बनबासी। बैखानस बटु जती उदासी।।
अर्थ · Hindi
मिलहिं किरात कोल बनबासी। बैखानस बटु जती उदासी।।
- RCM 2.224.5Open verse →
करि प्रनामु पूँछहिं जेहिं तेही। केहि बन लखनु रामु बैदेही।।
अर्थ · Hindi
करि प्रनामु पूँछहिं जेहिं तेही। केहि बन लखनु रामु बैदेही।।
- RCM 2.224.6Open verse →
ते प्रभु समाचार सब कहहीं। भरतहि देखि जनम फलु लहहीं।।
अर्थ · Hindi
ते प्रभु समाचार सब कहहीं। भरतहि देखि जनम फलु लहहीं।।
- RCM 2.224.7Open verse →
जे जन कहहिं कुसल हम देखे। ते प्रिय राम लखन सम लेखे।।
अर्थ · Hindi
जे जन कहहिं कुसल हम देखे। ते प्रिय राम लखन सम लेखे।।
- RCM 2.224.8Open verse →
एहि बिधि बूझत सबहि सुबानी। सुनत राम बनबास कहानी।।
अर्थ · Hindi
एहि बिधि बूझत सबहि सुबानी। सुनत राम बनबास कहानी।।
- RCM 2.224.9Open verse →
तेहि बासर बसि प्रातहीं चले सुमिरि रघुनाथ।
अर्थ · Hindi
तेहि बासर बसि प्रातहीं चले सुमिरि रघुनाथ।
- RCM 2.224.10Open verse →
राम दरस की लालसा भरत सरिस सब साथ।।224।।
अर्थ · Hindi
राम दरस की लालसा भरत सरिस सब साथ।।224।।
- RCM 2.225.1Open verse →
मंगल सगुन होहिं सब काहू। फरकहिं सुखद बिलोचन बाहू।।
अर्थ · Hindi
मंगल सगुन होहिं सब काहू। फरकहिं सुखद बिलोचन बाहू।।
- RCM 2.225.2Open verse →
भरतहि सहित समाज उछाहू। मिलिहहिं रामु मिटहि दुख दाहू।।
अर्थ · Hindi
भरतहि सहित समाज उछाहू। मिलिहहिं रामु मिटहि दुख दाहू।।
- RCM 2.225.3Open verse →
करत मनोरथ जस जियँ जाके। जाहिं सनेह सुराँ सब छाके।।
अर्थ · Hindi
करत मनोरथ जस जियँ जाके। जाहिं सनेह सुराँ सब छाके।।
- RCM 2.225.4Open verse →
सिथिल अंग पग मग डगि डोलहिं। बिहबल बचन पेम बस बोलहिं।।
अर्थ · Hindi
सिथिल अंग पग मग डगि डोलहिं। बिहबल बचन पेम बस बोलहिं।।
- RCM 2.225.5Open verse →
रामसखाँ तेहि समय देखावा। सैल सिरोमनि सहज सुहावा।।
अर्थ · Hindi
रामसखाँ तेहि समय देखावा। सैल सिरोमनि सहज सुहावा।।
- RCM 2.225.6Open verse →
जासु समीप सरित पय तीरा। सीय समेत बसहिं दोउ बीरा।।
अर्थ · Hindi
जासु समीप सरित पय तीरा। सीय समेत बसहिं दोउ बीरा।।
- RCM 2.225.7Open verse →
देखि करहिं सब दंड प्रनामा। कहि जय जानकि जीवन रामा।।
अर्थ · Hindi
देखि करहिं सब दंड प्रनामा। कहि जय जानकि जीवन रामा।।
- RCM 2.225.8Open verse →
प्रेम मगन अस राज समाजू। जनु फिरि अवध चले रघुराजू।।
अर्थ · Hindi
प्रेम मगन अस राज समाजू। जनु फिरि अवध चले रघुराजू।।
- RCM 2.225.9Open verse →
भरत प्रेमु तेहि समय जस तस कहि सकइ न सेषु।
अर्थ · Hindi
भरत प्रेमु तेहि समय जस तस कहि सकइ न सेषु।
- RCM 2.225.10Open verse →
कबिहिं अगम जिमि ब्रह्मसुखु अह मम मलिन जनेषु।।225।
अर्थ · Hindi
कबिहिं अगम जिमि ब्रह्मसुखु अह मम मलिन जनेषु।।225।
- RCM 2.226.1Open verse →
सकल सनेह सिथिल रघुबर कें। गए कोस दुइ दिनकर ढरकें।।
अर्थ · Hindi
सकल सनेह सिथिल रघुबर कें। गए कोस दुइ दिनकर ढरकें।।
- RCM 2.226.2Open verse →
जलु थलु देखि बसे निसि बीतें। कीन्ह गवन रघुनाथ पिरीतें।।
अर्थ · Hindi
जलु थलु देखि बसे निसि बीतें। कीन्ह गवन रघुनाथ पिरीतें।।
- RCM 2.226.3Open verse →
उहाँ रामु रजनी अवसेषा। जागे सीयँ सपन अस देखा।।
अर्थ · Hindi
उहाँ रामु रजनी अवसेषा। जागे सीयँ सपन अस देखा।।
- RCM 2.226.4Open verse →
सहित समाज भरत जनु आए। नाथ बियोग ताप तन ताए।।
अर्थ · Hindi
सहित समाज भरत जनु आए। नाथ बियोग ताप तन ताए।।
- RCM 2.226.5Open verse →
सकल मलिन मन दीन दुखारी। देखीं सासु आन अनुहारी।।
अर्थ · Hindi
सकल मलिन मन दीन दुखारी। देखीं सासु आन अनुहारी।।
- RCM 2.226.6Open verse →
सुनि सिय सपन भरे जल लोचन। भए सोचबस सोच बिमोचन।।
अर्थ · Hindi
सुनि सिय सपन भरे जल लोचन। भए सोचबस सोच बिमोचन।।
- RCM 2.226.7Open verse →
लखन सपन यह नीक न होई। कठिन कुचाह सुनाइहि कोई।।
अर्थ · Hindi
लखन सपन यह नीक न होई। कठिन कुचाह सुनाइहि कोई।।
- RCM 2.226.8Open verse →
अस कहि बंधु समेत नहाने। पूजि पुरारि साधु सनमाने।।
अर्थ · Hindi
अस कहि बंधु समेत नहाने। पूजि पुरारि साधु सनमाने।।
- RCM 2.227.1Open verse →
बहुरि सोचबस भे सियरवनू। कारन कवन भरत आगवनू।।
अर्थ · Hindi
बहुरि सोचबस भे सियरवनू। कारन कवन भरत आगवनू।।
- RCM 2.227.2Open verse →
एक आइ अस कहा बहोरी। सेन संग चतुरंग न थोरी।।
अर्थ · Hindi
एक आइ अस कहा बहोरी। सेन संग चतुरंग न थोरी।।
- RCM 2.227.3Open verse →
सो सुनि रामहि भा अति सोचू। इत पितु बच इत बंधु सकोचू।।
अर्थ · Hindi
सो सुनि रामहि भा अति सोचू। इत पितु बच इत बंधु सकोचू।।
- RCM 2.227.4Open verse →
भरत सुभाउ समुझि मन माहीं। प्रभु चित हित थिति पावत नाही।।
अर्थ · Hindi
भरत सुभाउ समुझि मन माहीं। प्रभु चित हित थिति पावत नाही।।
- RCM 2.227.5Open verse →
समाधान तब भा यह जाने। भरतु कहे महुँ साधु सयाने।।
अर्थ · Hindi
समाधान तब भा यह जाने। भरतु कहे महुँ साधु सयाने।।
- RCM 2.227.6Open verse →
लखन लखेउ प्रभु हृदयँ खभारू। कहत समय सम नीति बिचारू।।
अर्थ · Hindi
लखन लखेउ प्रभु हृदयँ खभारू। कहत समय सम नीति बिचारू।।
- RCM 2.227.7Open verse →
बिनु पूँछ कछु कहउँ गोसाईं। सेवकु समयँ न ढीठ ढिठाई।।
अर्थ · Hindi
बिनु पूँछ कछु कहउँ गोसाईं। सेवकु समयँ न ढीठ ढिठाई।।
- RCM 2.227.8Open verse →
तुम्ह सर्बग्य सिरोमनि स्वामी। आपनि समुझि कहउँ अनुगामी।।
अर्थ · Hindi
तुम्ह सर्बग्य सिरोमनि स्वामी। आपनि समुझि कहउँ अनुगामी।।
- RCM 2.227.9Open verse →
नाथ सुह्रद सुठि सरल चित सील सनेह निधान।।
अर्थ · Hindi
नाथ सुह्रद सुठि सरल चित सील सनेह निधान।।
- RCM 2.227.10Open verse →
सब पर प्रीति प्रतीति जियँ जानिअ आपु समान।।227।।
अर्थ · Hindi
सब पर प्रीति प्रतीति जियँ जानिअ आपु समान।।227।।
- RCM 2.228.1Open verse →
बिषई जीव पाइ प्रभुताई। मूढ़ मोह बस होहिं जनाई।।
अर्थ · Hindi
बिषई जीव पाइ प्रभुताई। मूढ़ मोह बस होहिं जनाई।।
- RCM 2.228.2Open verse →
भरतु नीति रत साधु सुजाना। प्रभु पद प्रेम सकल जगु जाना।।
अर्थ · Hindi
भरतु नीति रत साधु सुजाना। प्रभु पद प्रेम सकल जगु जाना।।
- RCM 2.228.3Open verse →
तेऊ आजु राम पदु पाई। चले धरम मरजाद मेटाई।।
अर्थ · Hindi
तेऊ आजु राम पदु पाई। चले धरम मरजाद मेटाई।।
- RCM 2.228.4Open verse →
कुटिल कुबंध कुअवसरु ताकी। जानि राम बनवास एकाकी।।
अर्थ · Hindi
कुटिल कुबंध कुअवसरु ताकी। जानि राम बनवास एकाकी।।
- RCM 2.228.5Open verse →
करि कुमंत्रु मन साजि समाजू। आए करै अकंटक राजू।।
अर्थ · Hindi
करि कुमंत्रु मन साजि समाजू। आए करै अकंटक राजू।।
- RCM 2.228.6Open verse →
कोटि प्रकार कलपि कुटलाई। आए दल बटोरि दोउ भाई।।
अर्थ · Hindi
कोटि प्रकार कलपि कुटलाई। आए दल बटोरि दोउ भाई।।
- RCM 2.228.7Open verse →
जौं जियँ होति न कपट कुचाली। केहि सोहाति रथ बाजि गजाली।।
अर्थ · Hindi
जौं जियँ होति न कपट कुचाली। केहि सोहाति रथ बाजि गजाली।।
- RCM 2.228.8Open verse →
भरतहि दोसु देइ को जाएँ। जग बौराइ राज पदु पाएँ।।
अर्थ · Hindi
भरतहि दोसु देइ को जाएँ। जग बौराइ राज पदु पाएँ।।
- RCM 2.228.9Open verse →
ससि गुर तिय गामी नघुषु चढ़ेउ भूमिसुर जान।
अर्थ · Hindi
ससि गुर तिय गामी नघुषु चढ़ेउ भूमिसुर जान।
- RCM 2.228.10Open verse →
लोक बेद तें बिमुख भा अधम न बेन समान।।228।।
अर्थ · Hindi
लोक बेद तें बिमुख भा अधम न बेन समान।।228।।
- RCM 2.229.1Open verse →
सहसबाहु सुरनाथु त्रिसंकू। केहि न राजमद दीन्ह कलंकू।।
अर्थ · Hindi
सहसबाहु सुरनाथु त्रिसंकू। केहि न राजमद दीन्ह कलंकू।।
- RCM 2.229.2Open verse →
भरत कीन्ह यह उचित उपाऊ। रिपु रिन रंच न राखब काऊ।।
अर्थ · Hindi
भरत कीन्ह यह उचित उपाऊ। रिपु रिन रंच न राखब काऊ।।
- RCM 2.229.3Open verse →
एक कीन्हि नहिं भरत भलाई। निदरे रामु जानि असहाई।।
अर्थ · Hindi
एक कीन्हि नहिं भरत भलाई। निदरे रामु जानि असहाई।।
- RCM 2.229.4Open verse →
समुझि परिहि सोउ आजु बिसेषी। समर सरोष राम मुखु पेखी।।
अर्थ · Hindi
समुझि परिहि सोउ आजु बिसेषी। समर सरोष राम मुखु पेखी।।
- RCM 2.229.5Open verse →
एतना कहत नीति रस भूला। रन रस बिटपु पुलक मिस फूला।।
अर्थ · Hindi
एतना कहत नीति रस भूला। रन रस बिटपु पुलक मिस फूला।।
- RCM 2.229.6Open verse →
प्रभु पद बंदि सीस रज राखी। बोले सत्य सहज बलु भाषी।।
अर्थ · Hindi
प्रभु पद बंदि सीस रज राखी। बोले सत्य सहज बलु भाषी।।
- RCM 2.229.7Open verse →
अनुचित नाथ न मानब मोरा। भरत हमहि उपचार न थोरा।।
अर्थ · Hindi
अनुचित नाथ न मानब मोरा। भरत हमहि उपचार न थोरा।।
- RCM 2.229.8Open verse →
कहँ लगि सहिअ रहिअ मनु मारें। नाथ साथ धनु हाथ हमारें।।
अर्थ · Hindi
कहँ लगि सहिअ रहिअ मनु मारें। नाथ साथ धनु हाथ हमारें।।
- RCM 2.229.9Open verse →
छत्रि जाति रघुकुल जनमु राम अनुग जगु जान।
अर्थ · Hindi
छत्रि जाति रघुकुल जनमु राम अनुग जगु जान।
- RCM 2.229.10Open verse →
लातहुँ मारें चढ़ति सिर नीच को धूरि समान।।229।।
अर्थ · Hindi
लातहुँ मारें चढ़ति सिर नीच को धूरि समान।।229।।
- RCM 2.230.1Open verse →
उठि कर जोरि रजायसु मागा। मनहुँ बीर रस सोवत जागा।।
अर्थ · Hindi
उठि कर जोरि रजायसु मागा। मनहुँ बीर रस सोवत जागा।।
- RCM 2.230.2Open verse →
बाँधि जटा सिर कसि कटि भाथा। साजि सरासनु सायकु हाथा।।
अर्थ · Hindi
बाँधि जटा सिर कसि कटि भाथा। साजि सरासनु सायकु हाथा।।
- RCM 2.230.3Open verse →
आजु राम सेवक जसु लेऊँ। भरतहि समर सिखावन देऊँ।।
अर्थ · Hindi
आजु राम सेवक जसु लेऊँ। भरतहि समर सिखावन देऊँ।।
- RCM 2.230.4Open verse →
राम निरादर कर फलु पाई। सोवहुँ समर सेज दोउ भाई।।
अर्थ · Hindi
राम निरादर कर फलु पाई। सोवहुँ समर सेज दोउ भाई।।
- RCM 2.230.5Open verse →
आइ बना भल सकल समाजू। प्रगट करउँ रिस पाछिल आजू।।
अर्थ · Hindi
आइ बना भल सकल समाजू। प्रगट करउँ रिस पाछिल आजू।।
- RCM 2.230.6Open verse →
जिमि करि निकर दलइ मृगराजू। लेइ लपेटि लवा जिमि बाजू।।
अर्थ · Hindi
जिमि करि निकर दलइ मृगराजू। लेइ लपेटि लवा जिमि बाजू।।
- RCM 2.230.7Open verse →
तैसेहिं भरतहि सेन समेता। सानुज निदरि निपातउँ खेता।।
अर्थ · Hindi
तैसेहिं भरतहि सेन समेता। सानुज निदरि निपातउँ खेता।।
- RCM 2.230.8Open verse →
जौं सहाय कर संकरु आई। तौ मारउँ रन राम दोहाई।।
अर्थ · Hindi
जौं सहाय कर संकरु आई। तौ मारउँ रन राम दोहाई।।
- RCM 2.230.9Open verse →
अति सरोष माखे लखनु लखि सुनि सपथ प्रवान।
अर्थ · Hindi
अति सरोष माखे लखनु लखि सुनि सपथ प्रवान।
- RCM 2.230.10Open verse →
सभय लोक सब लोकपति चाहत भभरि भगान।।230।।
अर्थ · Hindi
सभय लोक सब लोकपति चाहत भभरि भगान।।230।।
- RCM 2.231.1Open verse →
जगु भय मगन गगन भइ बानी। लखन बाहुबलु बिपुल बखानी।।
अर्थ · Hindi
जगु भय मगन गगन भइ बानी। लखन बाहुबलु बिपुल बखानी।।
- RCM 2.231.2Open verse →
तात प्रताप प्रभाउ तुम्हारा। को कहि सकइ को जाननिहारा।।
अर्थ · Hindi
तात प्रताप प्रभाउ तुम्हारा। को कहि सकइ को जाननिहारा।।
- RCM 2.231.3Open verse →
अनुचित उचित काजु किछु होऊ। समुझि करिअ भल कह सबु कोऊ।।
अर्थ · Hindi
अनुचित उचित काजु किछु होऊ। समुझि करिअ भल कह सबु कोऊ।।
- RCM 2.231.4Open verse →
सहसा करि पाछैं पछिताहीं। कहहिं बेद बुध ते बुध नाहीं।।
अर्थ · Hindi
सहसा करि पाछैं पछिताहीं। कहहिं बेद बुध ते बुध नाहीं।।
- RCM 2.231.5Open verse →
सुनि सुर बचन लखन सकुचाने। राम सीयँ सादर सनमाने।।
अर्थ · Hindi
सुनि सुर बचन लखन सकुचाने। राम सीयँ सादर सनमाने।।
- RCM 2.231.6Open verse →
कही तात तुम्ह नीति सुहाई। सब तें कठिन राजमदु भाई।।
अर्थ · Hindi
कही तात तुम्ह नीति सुहाई। सब तें कठिन राजमदु भाई।।
- RCM 2.231.7Open verse →
जो अचवँत नृप मातहिं तेई। नाहिन साधुसभा जेहिं सेई।।
अर्थ · Hindi
जो अचवँत नृप मातहिं तेई। नाहिन साधुसभा जेहिं सेई।।
- RCM 2.231.8Open verse →
सुनहु लखन भल भरत सरीसा। बिधि प्रपंच महँ सुना न दीसा।।
अर्थ · Hindi
सुनहु लखन भल भरत सरीसा। बिधि प्रपंच महँ सुना न दीसा।।
- RCM 2.231.9Open verse →
भरतहि होइ न राजमदु बिधि हरि हर पद पाइ।।
अर्थ · Hindi
भरतहि होइ न राजमदु बिधि हरि हर पद पाइ।।
- RCM 2.231.10Open verse →
कबहुँ कि काँजी सीकरनि छीरसिंधु बिनसाइ।।231।।
अर्थ · Hindi
कबहुँ कि काँजी सीकरनि छीरसिंधु बिनसाइ।।231।।
- RCM 2.232.1Open verse →
तिमिरु तरुन तरनिहि मकु गिलई। गगनु मगन मकु मेघहिं मिलई।।
अर्थ · Hindi
तिमिरु तरुन तरनिहि मकु गिलई। गगनु मगन मकु मेघहिं मिलई।।
- RCM 2.232.2Open verse →
गोपद जल बूड़हिं घटजोनी। सहज छमा बरु छाड़ै छोनी।।
अर्थ · Hindi
गोपद जल बूड़हिं घटजोनी। सहज छमा बरु छाड़ै छोनी।।
- RCM 2.232.3Open verse →
मसक फूँक मकु मेरु उड़ाई। होइ न नृपमदु भरतहि भाई।।
अर्थ · Hindi
मसक फूँक मकु मेरु उड़ाई। होइ न नृपमदु भरतहि भाई।।
- RCM 2.232.4Open verse →
लखन तुम्हार सपथ पितु आना। सुचि सुबंधु नहिं भरत समाना।।
अर्थ · Hindi
लखन तुम्हार सपथ पितु आना। सुचि सुबंधु नहिं भरत समाना।।
- RCM 2.232.5Open verse →
सगुन खीरु अवगुन जलु ताता। मिलइ रचइ परपंचु बिधाता।।
अर्थ · Hindi
सगुन खीरु अवगुन जलु ताता। मिलइ रचइ परपंचु बिधाता।।
- RCM 2.232.6Open verse →
भरतु हंस रबिबंस तड़ागा। जनमि कीन्ह गुन दोष बिभागा।।
अर्थ · Hindi
भरतु हंस रबिबंस तड़ागा। जनमि कीन्ह गुन दोष बिभागा।।
- RCM 2.232.7Open verse →
गहि गुन पय तजि अवगुन बारी। निज जस जगत कीन्हि उजिआरी।।
अर्थ · Hindi
गहि गुन पय तजि अवगुन बारी। निज जस जगत कीन्हि उजिआरी।।
- RCM 2.232.8Open verse →
कहत भरत गुन सीलु सुभाऊ। पेम पयोधि मगन रघुराऊ।।
अर्थ · Hindi
कहत भरत गुन सीलु सुभाऊ। पेम पयोधि मगन रघुराऊ।।
- RCM 2.232.9Open verse →
सुनि रघुबर बानी बिबुध देखि भरत पर हेतु।
अर्थ · Hindi
सुनि रघुबर बानी बिबुध देखि भरत पर हेतु।
- RCM 2.232.10Open verse →
सकल सराहत राम सो प्रभु को कृपानिकेतु।।232।।
अर्थ · Hindi
सकल सराहत राम सो प्रभु को कृपानिकेतु।।232।।
- RCM 2.233.1Open verse →
जौं न होत जग जनम भरत को। सकल धरम धुर धरनि धरत को।।
अर्थ · Hindi
जौं न होत जग जनम भरत को। सकल धरम धुर धरनि धरत को।।
- RCM 2.233.2Open verse →
कबि कुल अगम भरत गुन गाथा। को जानइ तुम्ह बिनु रघुनाथा।।
अर्थ · Hindi
कबि कुल अगम भरत गुन गाथा। को जानइ तुम्ह बिनु रघुनाथा।।
- RCM 2.233.3Open verse →
लखन राम सियँ सुनि सुर बानी। अति सुखु लहेउ न जाइ बखानी।।
अर्थ · Hindi
लखन राम सियँ सुनि सुर बानी। अति सुखु लहेउ न जाइ बखानी।।
- RCM 2.233.4Open verse →
इहाँ भरतु सब सहित सहाए। मंदाकिनीं पुनीत नहाए।।
अर्थ · Hindi
इहाँ भरतु सब सहित सहाए। मंदाकिनीं पुनीत नहाए।।
- RCM 2.233.5Open verse →
सरित समीप राखि सब लोगा। मागि मातु गुर सचिव नियोगा।।
अर्थ · Hindi
सरित समीप राखि सब लोगा। मागि मातु गुर सचिव नियोगा।।
- RCM 2.233.6Open verse →
चले भरतु जहँ सिय रघुराई। साथ निषादनाथु लघु भाई।।
अर्थ · Hindi
चले भरतु जहँ सिय रघुराई। साथ निषादनाथु लघु भाई।।
- RCM 2.233.7Open verse →
समुझि मातु करतब सकुचाहीं। करत कुतरक कोटि मन माहीं।।
अर्थ · Hindi
समुझि मातु करतब सकुचाहीं। करत कुतरक कोटि मन माहीं।।
- RCM 2.233.8Open verse →
रामु लखनु सिय सुनि मम नाऊँ। उठि जनि अनत जाहिं तजि ठाऊँ।।
अर्थ · Hindi
रामु लखनु सिय सुनि मम नाऊँ। उठि जनि अनत जाहिं तजि ठाऊँ।।
- RCM 2.233.9Open verse →
मातु मते महुँ मानि मोहि जो कछु करहिं सो थोर।
अर्थ · Hindi
मातु मते महुँ मानि मोहि जो कछु करहिं सो थोर।
- RCM 2.233.10Open verse →
अघ अवगुन छमि आदरहिं समुझि आपनी ओर।।233।।
अर्थ · Hindi
अघ अवगुन छमि आदरहिं समुझि आपनी ओर।।233।।
- RCM 2.234.1Open verse →
जौं परिहरहिं मलिन मनु जानी। जौ सनमानहिं सेवकु मानी।।
अर्थ · Hindi
जौं परिहरहिं मलिन मनु जानी। जौ सनमानहिं सेवकु मानी।।
- RCM 2.234.2Open verse →
मोरें सरन रामहि की पनही। राम सुस्वामि दोसु सब जनही।।
अर्थ · Hindi
मोरें सरन रामहि की पनही। राम सुस्वामि दोसु सब जनही।।
- RCM 2.234.3Open verse →
जग जस भाजन चातक मीना। नेम पेम निज निपुन नबीना।।
अर्थ · Hindi
जग जस भाजन चातक मीना। नेम पेम निज निपुन नबीना।।
- RCM 2.234.4Open verse →
अस मन गुनत चले मग जाता। सकुच सनेहँ सिथिल सब गाता।।
अर्थ · Hindi
अस मन गुनत चले मग जाता। सकुच सनेहँ सिथिल सब गाता।।
- RCM 2.234.5Open verse →
फेरत मनहुँ मातु कृत खोरी। चलत भगति बल धीरज धोरी।।
अर्थ · Hindi
फेरत मनहुँ मातु कृत खोरी। चलत भगति बल धीरज धोरी।।
- RCM 2.234.6Open verse →
जब समुझत रघुनाथ सुभाऊ। तब पथ परत उताइल पाऊ।।
अर्थ · Hindi
जब समुझत रघुनाथ सुभाऊ। तब पथ परत उताइल पाऊ।।
- RCM 2.234.7Open verse →
भरत दसा तेहि अवसर कैसी। जल प्रबाहँ जल अलि गति जैसी।।
अर्थ · Hindi
भरत दसा तेहि अवसर कैसी। जल प्रबाहँ जल अलि गति जैसी।।
- RCM 2.234.8Open verse →
देखि भरत कर सोचु सनेहू। भा निषाद तेहि समयँ बिदेहू।।
अर्थ · Hindi
देखि भरत कर सोचु सनेहू। भा निषाद तेहि समयँ बिदेहू।।
- RCM 2.234.9Open verse →
लगे होन मंगल सगुन सुनि गुनि कहत निषादु।
अर्थ · Hindi
लगे होन मंगल सगुन सुनि गुनि कहत निषादु।
- RCM 2.234.10Open verse →
मिटिहि सोचु होइहि हरषु पुनि परिनाम बिषादु।।234।।
अर्थ · Hindi
मिटिहि सोचु होइहि हरषु पुनि परिनाम बिषादु।।234।।
- RCM 2.235.1Open verse →
सेवक बचन सत्य सब जाने। आश्रम निकट जाइ निअराने।।
अर्थ · Hindi
सेवक बचन सत्य सब जाने। आश्रम निकट जाइ निअराने।।
- RCM 2.235.2Open verse →
भरत दीख बन सैल समाजू। मुदित छुधित जनु पाइ सुनाजू।।
अर्थ · Hindi
भरत दीख बन सैल समाजू। मुदित छुधित जनु पाइ सुनाजू।।
- RCM 2.235.3Open verse →
ईति भीति जनु प्रजा दुखारी। त्रिबिध ताप पीड़ित ग्रह मारी।।
अर्थ · Hindi
ईति भीति जनु प्रजा दुखारी। त्रिबिध ताप पीड़ित ग्रह मारी।।
- RCM 2.235.4Open verse →
जाइ सुराज सुदेस सुखारी। होहिं भरत गति तेहि अनुहारी।।
अर्थ · Hindi
जाइ सुराज सुदेस सुखारी। होहिं भरत गति तेहि अनुहारी।।
- RCM 2.235.5Open verse →
राम बास बन संपति भ्राजा। सुखी प्रजा जनु पाइ सुराजा।।
अर्थ · Hindi
राम बास बन संपति भ्राजा। सुखी प्रजा जनु पाइ सुराजा।।
- RCM 2.235.6Open verse →
सचिव बिरागु बिबेकु नरेसू। बिपिन सुहावन पावन देसू।।
अर्थ · Hindi
सचिव बिरागु बिबेकु नरेसू। बिपिन सुहावन पावन देसू।।
- RCM 2.235.7Open verse →
भट जम नियम सैल रजधानी। सांति सुमति सुचि सुंदर रानी।।
अर्थ · Hindi
भट जम नियम सैल रजधानी। सांति सुमति सुचि सुंदर रानी।।
- RCM 2.235.8Open verse →
सकल अंग संपन्न सुराऊ। राम चरन आश्रित चित चाऊ।।
अर्थ · Hindi
सकल अंग संपन्न सुराऊ। राम चरन आश्रित चित चाऊ।।
- RCM 2.235.9Open verse →
जीति मोह महिपालु दल सहित बिबेक भुआलु।
अर्थ · Hindi
जीति मोह महिपालु दल सहित बिबेक भुआलु।
- RCM 2.235.10Open verse →
करत अकंटक राजु पुरँ सुख संपदा सुकालु।।235।।
अर्थ · Hindi
करत अकंटक राजु पुरँ सुख संपदा सुकालु।।235।।
- RCM 2.236.1Open verse →
बन प्रदेस मुनि बास घनेरे। जनु पुर नगर गाउँ गन खेरे।।
अर्थ · Hindi
बन प्रदेस मुनि बास घनेरे। जनु पुर नगर गाउँ गन खेरे।।
- RCM 2.236.2Open verse →
बिपुल बिचित्र बिहग मृग नाना। प्रजा समाजु न जाइ बखाना।।
अर्थ · Hindi
बिपुल बिचित्र बिहग मृग नाना। प्रजा समाजु न जाइ बखाना।।
- RCM 2.236.3Open verse →
खगहा करि हरि बाघ बराहा। देखि महिष बृष साजु सराहा।।
अर्थ · Hindi
खगहा करि हरि बाघ बराहा। देखि महिष बृष साजु सराहा।।
- RCM 2.236.4Open verse →
बयरु बिहाइ चरहिं एक संगा। जहँ तहँ मनहुँ सेन चतुरंगा।।
अर्थ · Hindi
बयरु बिहाइ चरहिं एक संगा। जहँ तहँ मनहुँ सेन चतुरंगा।।
- RCM 2.236.5Open verse →
झरना झरहिं मत्त गज गाजहिं। मनहुँ निसान बिबिधि बिधि बाजहिं।।
अर्थ · Hindi
झरना झरहिं मत्त गज गाजहिं। मनहुँ निसान बिबिधि बिधि बाजहिं।।
- RCM 2.236.6Open verse →
चक चकोर चातक सुक पिक गन। कूजत मंजु मराल मुदित मन।।
अर्थ · Hindi
चक चकोर चातक सुक पिक गन। कूजत मंजु मराल मुदित मन।।
- RCM 2.236.7Open verse →
अलिगन गावत नाचत मोरा। जनु सुराज मंगल चहु ओरा।।
अर्थ · Hindi
अलिगन गावत नाचत मोरा। जनु सुराज मंगल चहु ओरा।।
- RCM 2.236.8Open verse →
बेलि बिटप तृन सफल सफूला। सब समाजु मुद मंगल मूला।।
अर्थ · Hindi
बेलि बिटप तृन सफल सफूला। सब समाजु मुद मंगल मूला।।
- RCM 2.236.9Open verse →
राम सैल सोभा निरखि भरत हृदयँ अति पेमु।
अर्थ · Hindi
राम सैल सोभा निरखि भरत हृदयँ अति पेमु।
- RCM 2.236.10Open verse →
तापस तप फलु पाइ जिमि सुखी सिरानें नेमु।।236।।
अर्थ · Hindi
तापस तप फलु पाइ जिमि सुखी सिरानें नेमु।।236।।
- RCM 2.237.1Open verse →
तब केवट ऊँचें चढ़ि धाई। कहेउ भरत सन भुजा उठाई।।
अर्थ · Hindi
तब केवट ऊँचें चढ़ि धाई। कहेउ भरत सन भुजा उठाई।।
- RCM 2.237.2Open verse →
नाथ देखिअहिं बिटप बिसाला। पाकरि जंबु रसाल तमाला।।
अर्थ · Hindi
नाथ देखिअहिं बिटप बिसाला। पाकरि जंबु रसाल तमाला।।
- RCM 2.237.3Open verse →
जिन्ह तरुबरन्ह मध्य बटु सोहा। मंजु बिसाल देखि मनु मोहा।।
अर्थ · Hindi
जिन्ह तरुबरन्ह मध्य बटु सोहा। मंजु बिसाल देखि मनु मोहा।।
- RCM 2.237.4Open verse →
नील सघन पल्ल्व फल लाला। अबिरल छाहँ सुखद सब काला।।
अर्थ · Hindi
नील सघन पल्ल्व फल लाला। अबिरल छाहँ सुखद सब काला।।
- RCM 2.237.5Open verse →
मानहुँ तिमिर अरुनमय रासी। बिरची बिधि सँकेलि सुषमा सी।।
अर्थ · Hindi
मानहुँ तिमिर अरुनमय रासी। बिरची बिधि सँकेलि सुषमा सी।।
- RCM 2.237.6Open verse →
ए तरु सरित समीप गोसाँई। रघुबर परनकुटी जहँ छाई।।
अर्थ · Hindi
ए तरु सरित समीप गोसाँई। रघुबर परनकुटी जहँ छाई।।
- RCM 2.237.7Open verse →
तुलसी तरुबर बिबिध सुहाए। कहुँ कहुँ सियँ कहुँ लखन लगाए।।
अर्थ · Hindi
तुलसी तरुबर बिबिध सुहाए। कहुँ कहुँ सियँ कहुँ लखन लगाए।।
- RCM 2.237.8Open verse →
बट छायाँ बेदिका बनाई। सियँ निज पानि सरोज सुहाई।।
अर्थ · Hindi
बट छायाँ बेदिका बनाई। सियँ निज पानि सरोज सुहाई।।
- RCM 2.237.9Open verse →
जहाँ बैठि मुनिगन सहित नित सिय रामु सुजान।
अर्थ · Hindi
जहाँ बैठि मुनिगन सहित नित सिय रामु सुजान।
- RCM 2.237.10Open verse →
सुनहिं कथा इतिहास सब आगम निगम पुरान।।237।।
अर्थ · Hindi
सुनहिं कथा इतिहास सब आगम निगम पुरान।।237।।
- RCM 2.238.1Open verse →
सखा बचन सुनि बिटप निहारी। उमगे भरत बिलोचन बारी।।
अर्थ · Hindi
सखा बचन सुनि बिटप निहारी। उमगे भरत बिलोचन बारी।।
- RCM 2.238.2Open verse →
करत प्रनाम चले दोउ भाई। कहत प्रीति सारद सकुचाई।।
अर्थ · Hindi
करत प्रनाम चले दोउ भाई। कहत प्रीति सारद सकुचाई।।
- RCM 2.238.3Open verse →
हरषहिं निरखि राम पद अंका। मानहुँ पारसु पायउ रंका।।
अर्थ · Hindi
हरषहिं निरखि राम पद अंका। मानहुँ पारसु पायउ रंका।।
- RCM 2.238.4Open verse →
रज सिर धरि हियँ नयनन्हि लावहिं। रघुबर मिलन सरिस सुख पावहिं।।
अर्थ · Hindi
रज सिर धरि हियँ नयनन्हि लावहिं। रघुबर मिलन सरिस सुख पावहिं।।
- RCM 2.238.5Open verse →
देखि भरत गति अकथ अतीवा। प्रेम मगन मृग खग जड़ जीवा।।
अर्थ · Hindi
देखि भरत गति अकथ अतीवा। प्रेम मगन मृग खग जड़ जीवा।।
- RCM 2.238.6Open verse →
सखहि सनेह बिबस मग भूला। कहि सुपंथ सुर बरषहिं फूला।।
अर्थ · Hindi
सखहि सनेह बिबस मग भूला। कहि सुपंथ सुर बरषहिं फूला।।
- RCM 2.238.7Open verse →
निरखि सिद्ध साधक अनुरागे। सहज सनेहु सराहन लागे।।
अर्थ · Hindi
निरखि सिद्ध साधक अनुरागे। सहज सनेहु सराहन लागे।।
- RCM 2.238.8Open verse →
होत न भूतल भाउ भरत को। अचर सचर चर अचर करत को।।
अर्थ · Hindi
होत न भूतल भाउ भरत को। अचर सचर चर अचर करत को।।
- RCM 2.238.9Open verse →
पेम अमिअ मंदरु बिरहु भरतु पयोधि गँभीर।
अर्थ · Hindi
पेम अमिअ मंदरु बिरहु भरतु पयोधि गँभीर।
- RCM 2.238.10Open verse →
मथि प्रगटेउ सुर साधु हित कृपासिंधु रघुबीर।।238।।
अर्थ · Hindi
मथि प्रगटेउ सुर साधु हित कृपासिंधु रघुबीर।।238।।
- RCM 2.239.1Open verse →
सखा समेत मनोहर जोटा। लखेउ न लखन सघन बन ओटा।।
अर्थ · Hindi
सखा समेत मनोहर जोटा। लखेउ न लखन सघन बन ओटा।।
- RCM 2.239.2Open verse →
भरत दीख प्रभु आश्रमु पावन। सकल सुमंगल सदनु सुहावन।।
अर्थ · Hindi
भरत दीख प्रभु आश्रमु पावन। सकल सुमंगल सदनु सुहावन।।
- RCM 2.239.3Open verse →
करत प्रबेस मिटे दुख दावा। जनु जोगीं परमारथु पावा।।
अर्थ · Hindi
करत प्रबेस मिटे दुख दावा। जनु जोगीं परमारथु पावा।।
- RCM 2.239.4Open verse →
देखे भरत लखन प्रभु आगे। पूँछे बचन कहत अनुरागे।।
अर्थ · Hindi
देखे भरत लखन प्रभु आगे। पूँछे बचन कहत अनुरागे।।
- RCM 2.239.5Open verse →
सीस जटा कटि मुनि पट बाँधें। तून कसें कर सरु धनु काँधें।।
अर्थ · Hindi
सीस जटा कटि मुनि पट बाँधें। तून कसें कर सरु धनु काँधें।।
- RCM 2.239.6Open verse →
बेदी पर मुनि साधु समाजू। सीय सहित राजत रघुराजू।।
अर्थ · Hindi
बेदी पर मुनि साधु समाजू। सीय सहित राजत रघुराजू।।
- RCM 2.239.7Open verse →
बलकल बसन जटिल तनु स्यामा। जनु मुनि बेष कीन्ह रति कामा।।
अर्थ · Hindi
बलकल बसन जटिल तनु स्यामा। जनु मुनि बेष कीन्ह रति कामा।।
- RCM 2.239.8Open verse →
कर कमलनि धनु सायकु फेरत। जिय की जरनि हरत हँसि हेरत।।
अर्थ · Hindi
कर कमलनि धनु सायकु फेरत। जिय की जरनि हरत हँसि हेरत।।
- RCM 2.239.9Open verse →
लसत मंजु मुनि मंडली मध्य सीय रघुचंदु।
अर्थ · Hindi
लसत मंजु मुनि मंडली मध्य सीय रघुचंदु।
- RCM 2.239.10Open verse →
ग्यान सभाँ जनु तनु धरे भगति सच्चिदानंदु।।239।।
अर्थ · Hindi
ग्यान सभाँ जनु तनु धरे भगति सच्चिदानंदु।।239।।
- RCM 2.240.1Open verse →
सानुज सखा समेत मगन मन। बिसरे हरष सोक सुख दुख गन।।
अर्थ · Hindi
सानुज सखा समेत मगन मन। बिसरे हरष सोक सुख दुख गन।।
- RCM 2.240.2Open verse →
पाहि नाथ कहि पाहि गोसाई। भूतल परे लकुट की नाई।।
अर्थ · Hindi
पाहि नाथ कहि पाहि गोसाई। भूतल परे लकुट की नाई।।
- RCM 2.240.3Open verse →
बचन सपेम लखन पहिचाने। करत प्रनामु भरत जियँ जाने।।
अर्थ · Hindi
बचन सपेम लखन पहिचाने। करत प्रनामु भरत जियँ जाने।।
- RCM 2.240.4Open verse →
बंधु सनेह सरस एहि ओरा। उत साहिब सेवा बस जोरा।।
अर्थ · Hindi
बंधु सनेह सरस एहि ओरा। उत साहिब सेवा बस जोरा।।
- RCM 2.240.5Open verse →
मिलि न जाइ नहिं गुदरत बनई। सुकबि लखन मन की गति भनई।।
अर्थ · Hindi
मिलि न जाइ नहिं गुदरत बनई। सुकबि लखन मन की गति भनई।।
- RCM 2.240.6Open verse →
रहे राखि सेवा पर भारू। चढ़ी चंग जनु खैंच खेलारू।।
अर्थ · Hindi
रहे राखि सेवा पर भारू। चढ़ी चंग जनु खैंच खेलारू।।
- RCM 2.240.7Open verse →
कहत सप्रेम नाइ महि माथा। भरत प्रनाम करत रघुनाथा।।
अर्थ · Hindi
कहत सप्रेम नाइ महि माथा। भरत प्रनाम करत रघुनाथा।।
- RCM 2.240.8Open verse →
उठे रामु सुनि पेम अधीरा। कहुँ पट कहुँ निषंग धनु तीरा।।
अर्थ · Hindi
उठे रामु सुनि पेम अधीरा। कहुँ पट कहुँ निषंग धनु तीरा।।
- RCM 2.240.9Open verse →
बरबस लिए उठाइ उर लाए कृपानिधान।
अर्थ · Hindi
बरबस लिए उठाइ उर लाए कृपानिधान।
- RCM 2.240.10Open verse →
भरत राम की मिलनि लखि बिसरे सबहि अपान।।240।।
अर्थ · Hindi
भरत राम की मिलनि लखि बिसरे सबहि अपान।।240।।
- RCM 2.241.1Open verse →
मिलनि प्रीति किमि जाइ बखानी। कबिकुल अगम करम मन बानी।।
अर्थ · Hindi
मिलनि प्रीति किमि जाइ बखानी। कबिकुल अगम करम मन बानी।।
- RCM 2.241.2Open verse →
परम पेम पूरन दोउ भाई। मन बुधि चित अहमिति बिसराई।।
अर्थ · Hindi
परम पेम पूरन दोउ भाई। मन बुधि चित अहमिति बिसराई।।
- RCM 2.241.3Open verse →
कहहु सुपेम प्रगट को करई। केहि छाया कबि मति अनुसरई।।
अर्थ · Hindi
कहहु सुपेम प्रगट को करई। केहि छाया कबि मति अनुसरई।।
- RCM 2.241.4Open verse →
कबिहि अरथ आखर बलु साँचा। अनुहरि ताल गतिहि नटु नाचा।।
अर्थ · Hindi
कबिहि अरथ आखर बलु साँचा। अनुहरि ताल गतिहि नटु नाचा।।
- RCM 2.241.5Open verse →
अगम सनेह भरत रघुबर को। जहँ न जाइ मनु बिधि हरि हर को।।
अर्थ · Hindi
अगम सनेह भरत रघुबर को। जहँ न जाइ मनु बिधि हरि हर को।।
- RCM 2.241.6Open verse →
सो मैं कुमति कहौं केहि भाँती। बाज सुराग कि गाँडर ताँती।।
अर्थ · Hindi
सो मैं कुमति कहौं केहि भाँती। बाज सुराग कि गाँडर ताँती।।
- RCM 2.241.7Open verse →
मिलनि बिलोकि भरत रघुबर की। सुरगन सभय धकधकी धरकी।।
अर्थ · Hindi
मिलनि बिलोकि भरत रघुबर की। सुरगन सभय धकधकी धरकी।।
- RCM 2.241.8Open verse →
समुझाए सुरगुरु जड़ जागे। बरषि प्रसून प्रसंसन लागे।।
अर्थ · Hindi
समुझाए सुरगुरु जड़ जागे। बरषि प्रसून प्रसंसन लागे।।
- RCM 2.241.9Open verse →
मिलि सपेम रिपुसूदनहि केवटु भेंटेउ राम।
अर्थ · Hindi
मिलि सपेम रिपुसूदनहि केवटु भेंटेउ राम।
- RCM 2.241.10Open verse →
भूरि भायँ भेंटे भरत लछिमन करत प्रनाम।।241।।
अर्थ · Hindi
भूरि भायँ भेंटे भरत लछिमन करत प्रनाम।।241।।
- RCM 2.242.1Open verse →
भेंटेउ लखन ललकि लघु भाई। बहुरि निषादु लीन्ह उर लाई।।
अर्थ · Hindi
भेंटेउ लखन ललकि लघु भाई। बहुरि निषादु लीन्ह उर लाई।।
- RCM 2.242.2Open verse →
पुनि मुनिगन दुहुँ भाइन्ह बंदे। अभिमत आसिष पाइ अनंदे।।
अर्थ · Hindi
पुनि मुनिगन दुहुँ भाइन्ह बंदे। अभिमत आसिष पाइ अनंदे।।
- RCM 2.242.3Open verse →
सानुज भरत उमगि अनुरागा। धरि सिर सिय पद पदुम परागा।।
अर्थ · Hindi
सानुज भरत उमगि अनुरागा। धरि सिर सिय पद पदुम परागा।।
- RCM 2.242.4Open verse →
पुनि पुनि करत प्रनाम उठाए। सिर कर कमल परसि बैठाए।।
अर्थ · Hindi
पुनि पुनि करत प्रनाम उठाए। सिर कर कमल परसि बैठाए।।
- RCM 2.242.5Open verse →
सीयँ असीस दीन्हि मन माहीं। मगन सनेहँ देह सुधि नाहीं।।
अर्थ · Hindi
सीयँ असीस दीन्हि मन माहीं। मगन सनेहँ देह सुधि नाहीं।।
- RCM 2.242.6Open verse →
सब बिधि सानुकूल लखि सीता। भे निसोच उर अपडर बीता।।
अर्थ · Hindi
सब बिधि सानुकूल लखि सीता। भे निसोच उर अपडर बीता।।
- RCM 2.242.7Open verse →
कोउ किछु कहइ न कोउ किछु पूँछा। प्रेम भरा मन निज गति छूँछा।।
अर्थ · Hindi
कोउ किछु कहइ न कोउ किछु पूँछा। प्रेम भरा मन निज गति छूँछा।।
- RCM 2.242.8Open verse →
तेहि अवसर केवटु धीरजु धरि। जोरि पानि बिनवत प्रनामु करि।।
अर्थ · Hindi
तेहि अवसर केवटु धीरजु धरि। जोरि पानि बिनवत प्रनामु करि।।
- RCM 2.242.9Open verse →
नाथ साथ मुनिनाथ के मातु सकल पुर लोग।
अर्थ · Hindi
नाथ साथ मुनिनाथ के मातु सकल पुर लोग।
- RCM 2.242.10Open verse →
सेवक सेनप सचिव सब आए बिकल बियोग।।242।।
अर्थ · Hindi
सेवक सेनप सचिव सब आए बिकल बियोग।।242।।
- RCM 2.243.1Open verse →
सीलसिंधु सुनि गुर आगवनू। सिय समीप राखे रिपुदवनू।।
अर्थ · Hindi
सीलसिंधु सुनि गुर आगवनू। सिय समीप राखे रिपुदवनू।।
- RCM 2.243.2Open verse →
चले सबेग रामु तेहि काला। धीर धरम धुर दीनदयाला।।
अर्थ · Hindi
चले सबेग रामु तेहि काला। धीर धरम धुर दीनदयाला।।
- RCM 2.243.3Open verse →
गुरहि देखि सानुज अनुरागे। दंड प्रनाम करन प्रभु लागे।।
अर्थ · Hindi
गुरहि देखि सानुज अनुरागे। दंड प्रनाम करन प्रभु लागे।।
- RCM 2.243.4Open verse →
मुनिबर धाइ लिए उर लाई। प्रेम उमगि भेंटे दोउ भाई।।
अर्थ · Hindi
मुनिबर धाइ लिए उर लाई। प्रेम उमगि भेंटे दोउ भाई।।
- RCM 2.243.5Open verse →
प्रेम पुलकि केवट कहि नामू। कीन्ह दूरि तें दंड प्रनामू।।
अर्थ · Hindi
प्रेम पुलकि केवट कहि नामू। कीन्ह दूरि तें दंड प्रनामू।।
- RCM 2.243.6Open verse →
रामसखा रिषि बरबस भेंटा। जनु महि लुठत सनेह समेटा।।
अर्थ · Hindi
रामसखा रिषि बरबस भेंटा। जनु महि लुठत सनेह समेटा।।
- RCM 2.243.7Open verse →
रघुपति भगति सुमंगल मूला। नभ सराहि सुर बरिसहिं फूला।।
अर्थ · Hindi
रघुपति भगति सुमंगल मूला। नभ सराहि सुर बरिसहिं फूला।।
- RCM 2.243.8Open verse →
एहि सम निपट नीच कोउ नाहीं। बड़ बसिष्ठ सम को जग माहीं।।
अर्थ · Hindi
एहि सम निपट नीच कोउ नाहीं। बड़ बसिष्ठ सम को जग माहीं।।
- RCM 2.243.9Open verse →
जेहि लखि लखनहु तें अधिक मिले मुदित मुनिराउ।
अर्थ · Hindi
जेहि लखि लखनहु तें अधिक मिले मुदित मुनिराउ।
- RCM 2.243.10Open verse →
सो सीतापति भजन को प्रगट प्रताप प्रभाउ।।243।।
अर्थ · Hindi
सो सीतापति भजन को प्रगट प्रताप प्रभाउ।।243।।
- RCM 2.244.1Open verse →
आरत लोग राम सबु जाना। करुनाकर सुजान भगवाना।।
अर्थ · Hindi
आरत लोग राम सबु जाना। करुनाकर सुजान भगवाना।।
- RCM 2.244.2Open verse →
जो जेहि भायँ रहा अभिलाषी। तेहि तेहि कै तसि तसि रुख राखी।।
अर्थ · Hindi
जो जेहि भायँ रहा अभिलाषी। तेहि तेहि कै तसि तसि रुख राखी।।
- RCM 2.244.3Open verse →
सानुज मिलि पल महु सब काहू। कीन्ह दूरि दुखु दारुन दाहू।।
अर्थ · Hindi
सानुज मिलि पल महु सब काहू। कीन्ह दूरि दुखु दारुन दाहू।।
- RCM 2.244.4Open verse →
यह बड़ि बातँ राम कै नाहीं। जिमि घट कोटि एक रबि छाहीं।।
अर्थ · Hindi
यह बड़ि बातँ राम कै नाहीं। जिमि घट कोटि एक रबि छाहीं।।
- RCM 2.244.5Open verse →
मिलि केवटिहि उमगि अनुरागा। पुरजन सकल सराहहिं भागा।।
अर्थ · Hindi
मिलि केवटिहि उमगि अनुरागा। पुरजन सकल सराहहिं भागा।।
- RCM 2.244.6Open verse →
देखीं राम दुखित महतारीं। जनु सुबेलि अवलीं हिम मारीं।।
अर्थ · Hindi
देखीं राम दुखित महतारीं। जनु सुबेलि अवलीं हिम मारीं।।
- RCM 2.244.7Open verse →
प्रथम राम भेंटी कैकेई। सरल सुभायँ भगति मति भेई।।
अर्थ · Hindi
प्रथम राम भेंटी कैकेई। सरल सुभायँ भगति मति भेई।।
- RCM 2.244.8Open verse →
पग परि कीन्ह प्रबोधु बहोरी। काल करम बिधि सिर धरि खोरी।।
अर्थ · Hindi
पग परि कीन्ह प्रबोधु बहोरी। काल करम बिधि सिर धरि खोरी।।
- RCM 2.244.9Open verse →
भेटीं रघुबर मातु सब करि प्रबोधु परितोषु।।
अर्थ · Hindi
भेटीं रघुबर मातु सब करि प्रबोधु परितोषु।।
- RCM 2.244.10Open verse →
अंब ईस आधीन जगु काहु न देइअ दोषु।।244।।
अर्थ · Hindi
अंब ईस आधीन जगु काहु न देइअ दोषु।।244।।
- RCM 2.245.1Open verse →
गुरतिय पद बंदे दुहु भाई। सहित बिप्रतिय जे सँग आई।।
अर्थ · Hindi
गुरतिय पद बंदे दुहु भाई। सहित बिप्रतिय जे सँग आई।।
- RCM 2.245.2Open verse →
गंग गौरि सम सब सनमानीं।।देहिं असीस मुदित मृदु बानी।।
अर्थ · Hindi
गंग गौरि सम सब सनमानीं।।देहिं असीस मुदित मृदु बानी।।
- RCM 2.245.3Open verse →
गहि पद लगे सुमित्रा अंका। जनु भेटीं संपति अति रंका।।
अर्थ · Hindi
गहि पद लगे सुमित्रा अंका। जनु भेटीं संपति अति रंका।।
- RCM 2.245.4Open verse →
पुनि जननि चरननि दोउ भ्राता। परे पेम ब्याकुल सब गाता।।
अर्थ · Hindi
पुनि जननि चरननि दोउ भ्राता। परे पेम ब्याकुल सब गाता।।
- RCM 2.245.5Open verse →
अति अनुराग अंब उर लाए। नयन सनेह सलिल अन्हवाए।।
अर्थ · Hindi
अति अनुराग अंब उर लाए। नयन सनेह सलिल अन्हवाए।।
- RCM 2.245.6Open verse →
तेहि अवसर कर हरष बिषादू। किमि कबि कहै मूक जिमि स्वादू।।
अर्थ · Hindi
तेहि अवसर कर हरष बिषादू। किमि कबि कहै मूक जिमि स्वादू।।
- RCM 2.245.7Open verse →
मिलि जननहि सानुज रघुराऊ। गुर सन कहेउ कि धारिअ पाऊ।।
अर्थ · Hindi
मिलि जननहि सानुज रघुराऊ। गुर सन कहेउ कि धारिअ पाऊ।।
- RCM 2.245.8Open verse →
पुरजन पाइ मुनीस नियोगू। जल थल तकि तकि उतरेउ लोगू।।
अर्थ · Hindi
पुरजन पाइ मुनीस नियोगू। जल थल तकि तकि उतरेउ लोगू।।
- RCM 2.245.9Open verse →
महिसुर मंत्री मातु गुर गने लोग लिए साथ।।
अर्थ · Hindi
महिसुर मंत्री मातु गुर गने लोग लिए साथ।।
- RCM 2.245.10Open verse →
पावन आश्रम गवनु किय भरत लखन रघुनाथ।।245।।
अर्थ · Hindi
पावन आश्रम गवनु किय भरत लखन रघुनाथ।।245।।
- RCM 2.246.1Open verse →
सीय आइ मुनिबर पग लागी। उचित असीस लही मन मागी।।
अर्थ · Hindi
सीय आइ मुनिबर पग लागी। उचित असीस लही मन मागी।।
- RCM 2.246.2Open verse →
गुरपतिनिहि मुनितियन्ह समेता। मिली पेमु कहि जाइ न जेता।।
अर्थ · Hindi
गुरपतिनिहि मुनितियन्ह समेता। मिली पेमु कहि जाइ न जेता।।
- RCM 2.246.3Open verse →
बंदि बंदि पग सिय सबही के। आसिरबचन लहे प्रिय जी के।।
अर्थ · Hindi
बंदि बंदि पग सिय सबही के। आसिरबचन लहे प्रिय जी के।।
- RCM 2.246.4Open verse →
सासु सकल जब सीयँ निहारीं। मूदे नयन सहमि सुकुमारीं।।
अर्थ · Hindi
सासु सकल जब सीयँ निहारीं। मूदे नयन सहमि सुकुमारीं।।
- RCM 2.246.5Open verse →
परीं बधिक बस मनहुँ मरालीं। काह कीन्ह करतार कुचालीं।।
अर्थ · Hindi
परीं बधिक बस मनहुँ मरालीं। काह कीन्ह करतार कुचालीं।।
- RCM 2.246.6Open verse →
तिन्ह सिय निरखि निपट दुखु पावा। सो सबु सहिअ जो दैउ सहावा।।
अर्थ · Hindi
तिन्ह सिय निरखि निपट दुखु पावा। सो सबु सहिअ जो दैउ सहावा।।
- RCM 2.246.7Open verse →
जनकसुता तब उर धरि धीरा। नील नलिन लोयन भरि नीरा।।
अर्थ · Hindi
जनकसुता तब उर धरि धीरा। नील नलिन लोयन भरि नीरा।।
- RCM 2.246.8Open verse →
मिली सकल सासुन्ह सिय जाई। तेहि अवसर करुना महि छाई।।
अर्थ · Hindi
मिली सकल सासुन्ह सिय जाई। तेहि अवसर करुना महि छाई।।
- RCM 2.246.9Open verse →
लागि लागि पग सबनि सिय भेंटति अति अनुराग।।
अर्थ · Hindi
लागि लागि पग सबनि सिय भेंटति अति अनुराग।।
- RCM 2.246.10Open verse →
हृदयँ असीसहिं पेम बस रहिअहु भरी सोहाग।।246।।
अर्थ · Hindi
हृदयँ असीसहिं पेम बस रहिअहु भरी सोहाग।।246।।
- RCM 2.247.1Open verse →
बिकल सनेहँ सीय सब रानीं। बैठन सबहि कहेउ गुर ग्यानीं।।
अर्थ · Hindi
बिकल सनेहँ सीय सब रानीं। बैठन सबहि कहेउ गुर ग्यानीं।।
- RCM 2.247.2Open verse →
कहि जग गति मायिक मुनिनाथा। कहे कछुक परमारथ गाथा।।
अर्थ · Hindi
कहि जग गति मायिक मुनिनाथा। कहे कछुक परमारथ गाथा।।
- RCM 2.247.3Open verse →
नृप कर सुरपुर गवनु सुनावा। सुनि रघुनाथ दुसह दुखु पावा।।
अर्थ · Hindi
नृप कर सुरपुर गवनु सुनावा। सुनि रघुनाथ दुसह दुखु पावा।।
- RCM 2.247.4Open verse →
मरन हेतु निज नेहु बिचारी। भे अति बिकल धीर धुर धारी।।
अर्थ · Hindi
मरन हेतु निज नेहु बिचारी। भे अति बिकल धीर धुर धारी।।
- RCM 2.247.5Open verse →
कुलिस कठोर सुनत कटु बानी। बिलपत लखन सीय सब रानी।।
अर्थ · Hindi
कुलिस कठोर सुनत कटु बानी। बिलपत लखन सीय सब रानी।।
- RCM 2.247.6Open verse →
सोक बिकल अति सकल समाजू। मानहुँ राजु अकाजेउ आजू।।
अर्थ · Hindi
सोक बिकल अति सकल समाजू। मानहुँ राजु अकाजेउ आजू।।
- RCM 2.247.7Open verse →
मुनिबर बहुरि राम समुझाए। सहित समाज सुसरित नहाए।।
अर्थ · Hindi
मुनिबर बहुरि राम समुझाए। सहित समाज सुसरित नहाए।।
- RCM 2.247.8Open verse →
ब्रतु निरंबु तेहि दिन प्रभु कीन्हा। मुनिहु कहें जलु काहुँ न लीन्हा।।
अर्थ · Hindi
ब्रतु निरंबु तेहि दिन प्रभु कीन्हा। मुनिहु कहें जलु काहुँ न लीन्हा।।
- RCM 2.247.9Open verse →
भोरु भएँ रघुनंदनहि जो मुनि आयसु दीन्ह।।
अर्थ · Hindi
भोरु भएँ रघुनंदनहि जो मुनि आयसु दीन्ह।।
- RCM 2.247.10Open verse →
श्रद्धा भगति समेत प्रभु सो सबु सादरु कीन्ह।।247।।
अर्थ · Hindi
श्रद्धा भगति समेत प्रभु सो सबु सादरु कीन्ह।।247।।
- RCM 2.248.1Open verse →
करि पितु क्रिया बेद जसि बरनी। भे पुनीत पातक तम तरनी।।
अर्थ · Hindi
करि पितु क्रिया बेद जसि बरनी। भे पुनीत पातक तम तरनी।।
- RCM 2.248.2Open verse →
जासु नाम पावक अघ तूला। सुमिरत सकल सुमंगल मूला।।
अर्थ · Hindi
जासु नाम पावक अघ तूला। सुमिरत सकल सुमंगल मूला।।
- RCM 2.248.3Open verse →
सुद्ध सो भयउ साधु संमत अस। तीरथ आवाहन सुरसरि जस।।
अर्थ · Hindi
सुद्ध सो भयउ साधु संमत अस। तीरथ आवाहन सुरसरि जस।।
- RCM 2.248.4Open verse →
सुद्ध भएँ दुइ बासर बीते। बोले गुर सन राम पिरीते।।
अर्थ · Hindi
सुद्ध भएँ दुइ बासर बीते। बोले गुर सन राम पिरीते।।
- RCM 2.248.5Open verse →
नाथ लोग सब निपट दुखारी। कंद मूल फल अंबु अहारी।।
अर्थ · Hindi
नाथ लोग सब निपट दुखारी। कंद मूल फल अंबु अहारी।।
- RCM 2.248.6Open verse →
सानुज भरतु सचिव सब माता। देखि मोहि पल जिमि जुग जाता।।
अर्थ · Hindi
सानुज भरतु सचिव सब माता। देखि मोहि पल जिमि जुग जाता।।
- RCM 2.248.7Open verse →
सब समेत पुर धारिअ पाऊ। आपु इहाँ अमरावति राऊ।।
अर्थ · Hindi
सब समेत पुर धारिअ पाऊ। आपु इहाँ अमरावति राऊ।।
- RCM 2.248.8Open verse →
बहुत कहेउँ सब कियउँ ढिठाई। उचित होइ तस करिअ गोसाँई।।
अर्थ · Hindi
बहुत कहेउँ सब कियउँ ढिठाई। उचित होइ तस करिअ गोसाँई।।
- RCM 2.248.9Open verse →
धर्म सेतु करुनायतन कस न कहहु अस राम।
अर्थ · Hindi
धर्म सेतु करुनायतन कस न कहहु अस राम।
- RCM 2.248.10Open verse →
लोग दुखित दिन दुइ दरस देखि लहहुँ बिश्राम।।248।।
अर्थ · Hindi
लोग दुखित दिन दुइ दरस देखि लहहुँ बिश्राम।।248।।
- RCM 2.249.1Open verse →
राम बचन सुनि सभय समाजू। जनु जलनिधि महुँ बिकल जहाजू।।
अर्थ · Hindi
राम बचन सुनि सभय समाजू। जनु जलनिधि महुँ बिकल जहाजू।।
- RCM 2.249.2Open verse →
सुनि गुर गिरा सुमंगल मूला। भयउ मनहुँ मारुत अनुकुला।।
अर्थ · Hindi
सुनि गुर गिरा सुमंगल मूला। भयउ मनहुँ मारुत अनुकुला।।
- RCM 2.249.3Open verse →
पावन पयँ तिहुँ काल नहाहीं। जो बिलोकि अंघ ओघ नसाहीं।।
अर्थ · Hindi
पावन पयँ तिहुँ काल नहाहीं। जो बिलोकि अंघ ओघ नसाहीं।।
- RCM 2.249.4Open verse →
मंगलमूरति लोचन भरि भरि। निरखहिं हरषि दंडवत करि करि।।
अर्थ · Hindi
मंगलमूरति लोचन भरि भरि। निरखहिं हरषि दंडवत करि करि।।
- RCM 2.249.5Open verse →
राम सैल बन देखन जाहीं। जहँ सुख सकल सकल दुख नाहीं।।
अर्थ · Hindi
राम सैल बन देखन जाहीं। जहँ सुख सकल सकल दुख नाहीं।।
- RCM 2.249.6Open verse →
झरना झरिहिं सुधासम बारी। त्रिबिध तापहर त्रिबिध बयारी।।
अर्थ · Hindi
झरना झरिहिं सुधासम बारी। त्रिबिध तापहर त्रिबिध बयारी।।
- RCM 2.249.7Open verse →
बिटप बेलि तृन अगनित जाती। फल प्रसून पल्लव बहु भाँती।।
अर्थ · Hindi
बिटप बेलि तृन अगनित जाती। फल प्रसून पल्लव बहु भाँती।।
- RCM 2.249.8Open verse →
सुंदर सिला सुखद तरु छाहीं। जाइ बरनि बन छबि केहि पाहीं।।
अर्थ · Hindi
सुंदर सिला सुखद तरु छाहीं। जाइ बरनि बन छबि केहि पाहीं।।
- RCM 2.249.9Open verse →
सरनि सरोरुह जल बिहग कूजत गुंजत भृंग।
अर्थ · Hindi
सरनि सरोरुह जल बिहग कूजत गुंजत भृंग।
- RCM 2.249.10Open verse →
बैर बिगत बिहरत बिपिन मृग बिहंग बहुरंग।।249।।
अर्थ · Hindi
बैर बिगत बिहरत बिपिन मृग बिहंग बहुरंग।।249।।
- RCM 2.250.1Open verse →
कोल किरात भिल्ल बनबासी। मधु सुचि सुंदर स्वादु सुधा सी।।
अर्थ · Hindi
कोल किरात भिल्ल बनबासी। मधु सुचि सुंदर स्वादु सुधा सी।।
- RCM 2.250.2Open verse →
भरि भरि परन पुटीं रचि रुरी। कंद मूल फल अंकुर जूरी।।
अर्थ · Hindi
भरि भरि परन पुटीं रचि रुरी। कंद मूल फल अंकुर जूरी।।
- RCM 2.250.3Open verse →
सबहि देहिं करि बिनय प्रनामा। कहि कहि स्वाद भेद गुन नामा।।
अर्थ · Hindi
सबहि देहिं करि बिनय प्रनामा। कहि कहि स्वाद भेद गुन नामा।।
- RCM 2.250.4Open verse →
देहिं लोग बहु मोल न लेहीं। फेरत राम दोहाई देहीं।।
अर्थ · Hindi
देहिं लोग बहु मोल न लेहीं। फेरत राम दोहाई देहीं।।
- RCM 2.250.5Open verse →
कहहिं सनेह मगन मृदु बानी। मानत साधु पेम पहिचानी।।
अर्थ · Hindi
कहहिं सनेह मगन मृदु बानी। मानत साधु पेम पहिचानी।।
- RCM 2.250.6Open verse →
तुम्ह सुकृती हम नीच निषादा। पावा दरसनु राम प्रसादा।।
अर्थ · Hindi
तुम्ह सुकृती हम नीच निषादा। पावा दरसनु राम प्रसादा।।
- RCM 2.250.7Open verse →
हमहि अगम अति दरसु तुम्हारा। जस मरु धरनि देवधुनि धारा।।
अर्थ · Hindi
हमहि अगम अति दरसु तुम्हारा। जस मरु धरनि देवधुनि धारा।।
- RCM 2.250.8Open verse →
राम कृपाल निषाद नेवाजा। परिजन प्रजउ चहिअ जस राजा।।
अर्थ · Hindi
राम कृपाल निषाद नेवाजा। परिजन प्रजउ चहिअ जस राजा।।
- RCM 2.250.9Open verse →
यह जिंयँ जानि सँकोचु तजि करिअ छोहु लखि नेहु।
अर्थ · Hindi
यह जिंयँ जानि सँकोचु तजि करिअ छोहु लखि नेहु।
- RCM 2.250.10Open verse →
हमहि कृतारथ करन लगि फल तृन अंकुर लेहु।।250।।
अर्थ · Hindi
हमहि कृतारथ करन लगि फल तृन अंकुर लेहु।।250।।
- RCM 2.251.1Open verse →
तुम्ह प्रिय पाहुने बन पगु धारे। सेवा जोगु न भाग हमारे।।
अर्थ · Hindi
तुम्ह प्रिय पाहुने बन पगु धारे। सेवा जोगु न भाग हमारे।।
- RCM 2.251.2Open verse →
देब काह हम तुम्हहि गोसाँई। ईधनु पात किरात मिताई।।
अर्थ · Hindi
देब काह हम तुम्हहि गोसाँई। ईधनु पात किरात मिताई।।
- RCM 2.251.3Open verse →
यह हमारि अति बड़ि सेवकाई। लेहि न बासन बसन चोराई।।
अर्थ · Hindi
यह हमारि अति बड़ि सेवकाई। लेहि न बासन बसन चोराई।।
- RCM 2.251.4Open verse →
हम जड़ जीव जीव गन घाती। कुटिल कुचाली कुमति कुजाती।।
अर्थ · Hindi
हम जड़ जीव जीव गन घाती। कुटिल कुचाली कुमति कुजाती।।
- RCM 2.251.5Open verse →
पाप करत निसि बासर जाहीं। नहिं पट कटि नहि पेट अघाहीं।।
अर्थ · Hindi
पाप करत निसि बासर जाहीं। नहिं पट कटि नहि पेट अघाहीं।।
- RCM 2.251.6Open verse →
सपोनेहुँ धरम बुद्धि कस काऊ। यह रघुनंदन दरस प्रभाऊ।।
अर्थ · Hindi
सपोनेहुँ धरम बुद्धि कस काऊ। यह रघुनंदन दरस प्रभाऊ।।
- RCM 2.251.7Open verse →
जब तें प्रभु पद पदुम निहारे। मिटे दुसह दुख दोष हमारे।।
अर्थ · Hindi
जब तें प्रभु पद पदुम निहारे। मिटे दुसह दुख दोष हमारे।।
- RCM 2.251.8Open verse →
बचन सुनत पुरजन अनुरागे। तिन्ह के भाग सराहन लागे।।
अर्थ · Hindi
बचन सुनत पुरजन अनुरागे। तिन्ह के भाग सराहन लागे।।
- RCM 2.252.1Open verse →
पुर जन नारि मगन अति प्रीती। बासर जाहिं पलक सम बीती।।
अर्थ · Hindi
पुर जन नारि मगन अति प्रीती। बासर जाहिं पलक सम बीती।।
- RCM 2.252.2Open verse →
सीय सासु प्रति बेष बनाई। सादर करइ सरिस सेवकाई।।
अर्थ · Hindi
सीय सासु प्रति बेष बनाई। सादर करइ सरिस सेवकाई।।
- RCM 2.252.3Open verse →
लखा न मरमु राम बिनु काहूँ। माया सब सिय माया माहूँ।।
अर्थ · Hindi
लखा न मरमु राम बिनु काहूँ। माया सब सिय माया माहूँ।।
- RCM 2.252.4Open verse →
सीयँ सासु सेवा बस कीन्हीं। तिन्ह लहि सुख सिख आसिष दीन्हीं।।
अर्थ · Hindi
सीयँ सासु सेवा बस कीन्हीं। तिन्ह लहि सुख सिख आसिष दीन्हीं।।
- RCM 2.252.5Open verse →
लखि सिय सहित सरल दोउ भाई। कुटिल रानि पछितानि अघाई।।
अर्थ · Hindi
लखि सिय सहित सरल दोउ भाई। कुटिल रानि पछितानि अघाई।।
- RCM 2.252.6Open verse →
अवनि जमहि जाचति कैकेई। महि न बीचु बिधि मीचु न देई।।
अर्थ · Hindi
अवनि जमहि जाचति कैकेई। महि न बीचु बिधि मीचु न देई।।
- RCM 2.252.7Open verse →
लोकहुँ बेद बिदित कबि कहहीं। राम बिमुख थलु नरक न लहहीं।।
अर्थ · Hindi
लोकहुँ बेद बिदित कबि कहहीं। राम बिमुख थलु नरक न लहहीं।।
- RCM 2.252.8Open verse →
यहु संसउ सब के मन माहीं। राम गवनु बिधि अवध कि नाहीं।।
अर्थ · Hindi
यहु संसउ सब के मन माहीं। राम गवनु बिधि अवध कि नाहीं।।
- RCM 2.252.9Open verse →
निसि न नीद नहिं भूख दिन भरतु बिकल सुचि सोच।
अर्थ · Hindi
निसि न नीद नहिं भूख दिन भरतु बिकल सुचि सोच।
- RCM 2.252.10Open verse →
नीच कीच बिच मगन जस मीनहि सलिल सँकोच।।252।।
अर्थ · Hindi
नीच कीच बिच मगन जस मीनहि सलिल सँकोच।।252।।
- RCM 2.253.1Open verse →
कीन्ही मातु मिस काल कुचाली। ईति भीति जस पाकत साली।।
अर्थ · Hindi
कीन्ही मातु मिस काल कुचाली। ईति भीति जस पाकत साली।।
- RCM 2.253.2Open verse →
केहि बिधि होइ राम अभिषेकू। मोहि अवकलत उपाउ न एकू।।
अर्थ · Hindi
केहि बिधि होइ राम अभिषेकू। मोहि अवकलत उपाउ न एकू।।
- RCM 2.253.3Open verse →
अवसि फिरहिं गुर आयसु मानी। मुनि पुनि कहब राम रुचि जानी।।
अर्थ · Hindi
अवसि फिरहिं गुर आयसु मानी। मुनि पुनि कहब राम रुचि जानी।।
- RCM 2.253.4Open verse →
मातु कहेहुँ बहुरहिं रघुराऊ। राम जननि हठ करबि कि काऊ।।
अर्थ · Hindi
मातु कहेहुँ बहुरहिं रघुराऊ। राम जननि हठ करबि कि काऊ।।
- RCM 2.253.5Open verse →
मोहि अनुचर कर केतिक बाता। तेहि महँ कुसमउ बाम बिधाता।।
अर्थ · Hindi
मोहि अनुचर कर केतिक बाता। तेहि महँ कुसमउ बाम बिधाता।।
- RCM 2.253.6Open verse →
जौं हठ करउँ त निपट कुकरमू। हरगिरि तें गुरु सेवक धरमू।।
अर्थ · Hindi
जौं हठ करउँ त निपट कुकरमू। हरगिरि तें गुरु सेवक धरमू।।
- RCM 2.253.7Open verse →
एकउ जुगुति न मन ठहरानी। सोचत भरतहि रैनि बिहानी।।
अर्थ · Hindi
एकउ जुगुति न मन ठहरानी। सोचत भरतहि रैनि बिहानी।।
- RCM 2.253.8Open verse →
प्रात नहाइ प्रभुहि सिर नाई। बैठत पठए रिषयँ बोलाई।।
अर्थ · Hindi
प्रात नहाइ प्रभुहि सिर नाई। बैठत पठए रिषयँ बोलाई।।
- RCM 2.253.9Open verse →
गुर पद कमल प्रनामु करि बैठे आयसु पाइ।
अर्थ · Hindi
गुर पद कमल प्रनामु करि बैठे आयसु पाइ।
- RCM 2.253.10Open verse →
बिप्र महाजन सचिव सब जुरे सभासद आइ।।253।।
अर्थ · Hindi
बिप्र महाजन सचिव सब जुरे सभासद आइ।।253।।
- RCM 2.254.1Open verse →
बोले मुनिबरु समय समाना। सुनहु सभासद भरत सुजाना।।
अर्थ · Hindi
बोले मुनिबरु समय समाना। सुनहु सभासद भरत सुजाना।।
- RCM 2.254.2Open verse →
धरम धुरीन भानुकुल भानू। राजा रामु स्वबस भगवानू।।
अर्थ · Hindi
धरम धुरीन भानुकुल भानू। राजा रामु स्वबस भगवानू।।
- RCM 2.254.3Open verse →
सत्यसंध पालक श्रुति सेतू। राम जनमु जग मंगल हेतू।।
अर्थ · Hindi
सत्यसंध पालक श्रुति सेतू। राम जनमु जग मंगल हेतू।।
- RCM 2.254.4Open verse →
गुर पितु मातु बचन अनुसारी। खल दलु दलन देव हितकारी।।
अर्थ · Hindi
गुर पितु मातु बचन अनुसारी। खल दलु दलन देव हितकारी।।
- RCM 2.254.5Open verse →
नीति प्रीति परमारथ स्वारथु। कोउ न राम सम जान जथारथु।।
अर्थ · Hindi
नीति प्रीति परमारथ स्वारथु। कोउ न राम सम जान जथारथु।।
- RCM 2.254.6Open verse →
बिधि हरि हरु ससि रबि दिसिपाला। माया जीव करम कुलि काला।।
अर्थ · Hindi
बिधि हरि हरु ससि रबि दिसिपाला। माया जीव करम कुलि काला।।
- RCM 2.254.7Open verse →
अहिप महिप जहँ लगि प्रभुताई। जोग सिद्धि निगमागम गाई।।
अर्थ · Hindi
अहिप महिप जहँ लगि प्रभुताई। जोग सिद्धि निगमागम गाई।।
- RCM 2.254.8Open verse →
करि बिचार जिंयँ देखहु नीकें। राम रजाइ सीस सबही कें।।
अर्थ · Hindi
करि बिचार जिंयँ देखहु नीकें। राम रजाइ सीस सबही कें।।
- RCM 2.254.9Open verse →
राखें राम रजाइ रुख हम सब कर हित होइ।
अर्थ · Hindi
राखें राम रजाइ रुख हम सब कर हित होइ।
- RCM 2.254.10Open verse →
समुझि सयाने करहु अब सब मिलि संमत सोइ।।254।।
अर्थ · Hindi
समुझि सयाने करहु अब सब मिलि संमत सोइ।।254।।
- RCM 2.255.1Open verse →
सब कहुँ सुखद राम अभिषेकू। मंगल मोद मूल मग एकू।।
अर्थ · Hindi
सब कहुँ सुखद राम अभिषेकू। मंगल मोद मूल मग एकू।।
- RCM 2.255.2Open verse →
केहि बिधि अवध चलहिं रघुराऊ। कहहु समुझि सोइ करिअ उपाऊ।।
अर्थ · Hindi
केहि बिधि अवध चलहिं रघुराऊ। कहहु समुझि सोइ करिअ उपाऊ।।
- RCM 2.255.3Open verse →
सब सादर सुनि मुनिबर बानी। नय परमारथ स्वारथ सानी।।
अर्थ · Hindi
सब सादर सुनि मुनिबर बानी। नय परमारथ स्वारथ सानी।।
- RCM 2.255.4Open verse →
उतरु न आव लोग भए भोरे। तब सिरु नाइ भरत कर जोरे।।
अर्थ · Hindi
उतरु न आव लोग भए भोरे। तब सिरु नाइ भरत कर जोरे।।
- RCM 2.255.5Open verse →
भानुबंस भए भूप घनेरे। अधिक एक तें एक बड़ेरे।।
अर्थ · Hindi
भानुबंस भए भूप घनेरे। अधिक एक तें एक बड़ेरे।।
- RCM 2.255.6Open verse →
जनमु हेतु सब कहँ पितु माता। करम सुभासुभ देइ बिधाता।।
अर्थ · Hindi
जनमु हेतु सब कहँ पितु माता। करम सुभासुभ देइ बिधाता।।
- RCM 2.255.7Open verse →
दलि दुख सजइ सकल कल्याना। अस असीस राउरि जगु जाना।।
अर्थ · Hindi
दलि दुख सजइ सकल कल्याना। अस असीस राउरि जगु जाना।।
- RCM 2.255.8Open verse →
सो गोसाइँ बिधि गति जेहिं छेंकी। सकइ को टारि टेक जो टेकी।।
अर्थ · Hindi
सो गोसाइँ बिधि गति जेहिं छेंकी। सकइ को टारि टेक जो टेकी।।
- RCM 2.255.9Open verse →
बूझिअ मोहि उपाउ अब सो सब मोर अभागु।
अर्थ · Hindi
बूझिअ मोहि उपाउ अब सो सब मोर अभागु।
- RCM 2.255.10Open verse →
सुनि सनेहमय बचन गुर उर उमगा अनुरागु।।255।।
अर्थ · Hindi
सुनि सनेहमय बचन गुर उर उमगा अनुरागु।।255।।
- RCM 2.256.1Open verse →
तात बात फुरि राम कृपाहीं। राम बिमुख सिधि सपनेहुँ नाहीं।।
अर्थ · Hindi
तात बात फुरि राम कृपाहीं। राम बिमुख सिधि सपनेहुँ नाहीं।।
- RCM 2.256.2Open verse →
सकुचउँ तात कहत एक बाता। अरध तजहिं बुध सरबस जाता।।
अर्थ · Hindi
सकुचउँ तात कहत एक बाता। अरध तजहिं बुध सरबस जाता।।
- RCM 2.256.3Open verse →
तुम्ह कानन गवनहु दोउ भाई। फेरिअहिं लखन सीय रघुराई।।
अर्थ · Hindi
तुम्ह कानन गवनहु दोउ भाई। फेरिअहिं लखन सीय रघुराई।।
- RCM 2.256.4Open verse →
सुनि सुबचन हरषे दोउ भ्राता। भे प्रमोद परिपूरन गाता।।
अर्थ · Hindi
सुनि सुबचन हरषे दोउ भ्राता। भे प्रमोद परिपूरन गाता।।
- RCM 2.256.5Open verse →
मन प्रसन्न तन तेजु बिराजा। जनु जिय राउ रामु भए राजा।।
अर्थ · Hindi
मन प्रसन्न तन तेजु बिराजा। जनु जिय राउ रामु भए राजा।।
- RCM 2.256.6Open verse →
बहुत लाभ लोगन्ह लघु हानी। सम दुख सुख सब रोवहिं रानी।।
अर्थ · Hindi
बहुत लाभ लोगन्ह लघु हानी। सम दुख सुख सब रोवहिं रानी।।
- RCM 2.256.7Open verse →
कहहिं भरतु मुनि कहा सो कीन्हे। फलु जग जीवन्ह अभिमत दीन्हे।।
अर्थ · Hindi
कहहिं भरतु मुनि कहा सो कीन्हे। फलु जग जीवन्ह अभिमत दीन्हे।।
- RCM 2.256.8Open verse →
कानन करउँ जनम भरि बासू। एहिं तें अधिक न मोर सुपासू।।
अर्थ · Hindi
कानन करउँ जनम भरि बासू। एहिं तें अधिक न मोर सुपासू।।
- RCM 2.256.9Open verse →
अँतरजामी रामु सिय तुम्ह सरबग्य सुजान।
अर्थ · Hindi
अँतरजामी रामु सिय तुम्ह सरबग्य सुजान।
- RCM 2.256.10Open verse →
जो फुर कहहु त नाथ निज कीजिअ बचनु प्रवान।।256।।
अर्थ · Hindi
जो फुर कहहु त नाथ निज कीजिअ बचनु प्रवान।।256।।
- RCM 2.257.1Open verse →
भरत बचन सुनि देखि सनेहू। सभा सहित मुनि भए बिदेहू।।
अर्थ · Hindi
भरत बचन सुनि देखि सनेहू। सभा सहित मुनि भए बिदेहू।।
- RCM 2.257.2Open verse →
भरत महा महिमा जलरासी। मुनि मति ठाढ़ि तीर अबला सी।।
अर्थ · Hindi
भरत महा महिमा जलरासी। मुनि मति ठाढ़ि तीर अबला सी।।
- RCM 2.257.3Open verse →
गा चह पार जतनु हियँ हेरा। पावति नाव न बोहितु बेरा।।
अर्थ · Hindi
गा चह पार जतनु हियँ हेरा। पावति नाव न बोहितु बेरा।।
- RCM 2.257.4Open verse →
औरु करिहि को भरत बड़ाई। सरसी सीपि कि सिंधु समाई।।
अर्थ · Hindi
औरु करिहि को भरत बड़ाई। सरसी सीपि कि सिंधु समाई।।
- RCM 2.257.5Open verse →
भरतु मुनिहि मन भीतर भाए। सहित समाज राम पहिं आए।।
अर्थ · Hindi
भरतु मुनिहि मन भीतर भाए। सहित समाज राम पहिं आए।।
- RCM 2.257.6Open verse →
प्रभु प्रनामु करि दीन्ह सुआसनु। बैठे सब सुनि मुनि अनुसासनु।।
अर्थ · Hindi
प्रभु प्रनामु करि दीन्ह सुआसनु। बैठे सब सुनि मुनि अनुसासनु।।
- RCM 2.257.7Open verse →
बोले मुनिबरु बचन बिचारी। देस काल अवसर अनुहारी।।
अर्थ · Hindi
बोले मुनिबरु बचन बिचारी। देस काल अवसर अनुहारी।।
- RCM 2.257.8Open verse →
सुनहु राम सरबग्य सुजाना। धरम नीति गुन ग्यान निधाना।।
अर्थ · Hindi
सुनहु राम सरबग्य सुजाना। धरम नीति गुन ग्यान निधाना।।
- RCM 2.257.9Open verse →
सब के उर अंतर बसहु जानहु भाउ कुभाउ।
अर्थ · Hindi
सब के उर अंतर बसहु जानहु भाउ कुभाउ।
- RCM 2.257.10Open verse →
पुरजन जननी भरत हित होइ सो कहिअ उपाउ।।257।।
अर्थ · Hindi
पुरजन जननी भरत हित होइ सो कहिअ उपाउ।।257।।
- RCM 2.258.1Open verse →
आरत कहहिं बिचारि न काऊ। सूझ जूआरिहि आपन दाऊ।।
अर्थ · Hindi
आरत कहहिं बिचारि न काऊ। सूझ जूआरिहि आपन दाऊ।।
- RCM 2.258.2Open verse →
सुनि मुनि बचन कहत रघुराऊ। नाथ तुम्हारेहि हाथ उपाऊ।।
अर्थ · Hindi
सुनि मुनि बचन कहत रघुराऊ। नाथ तुम्हारेहि हाथ उपाऊ।।
- RCM 2.258.3Open verse →
सब कर हित रुख राउरि राखें। आयसु किएँ मुदित फुर भाषें।।
अर्थ · Hindi
सब कर हित रुख राउरि राखें। आयसु किएँ मुदित फुर भाषें।।
- RCM 2.258.4Open verse →
प्रथम जो आयसु मो कहुँ होई। माथें मानि करौ सिख सोई।।
अर्थ · Hindi
प्रथम जो आयसु मो कहुँ होई। माथें मानि करौ सिख सोई।।
- RCM 2.258.5Open verse →
पुनि जेहि कहँ जस कहब गोसाईं। सो सब भाँति घटिहि सेवकाईं।।
अर्थ · Hindi
पुनि जेहि कहँ जस कहब गोसाईं। सो सब भाँति घटिहि सेवकाईं।।
- RCM 2.258.6Open verse →
कह मुनि राम सत्य तुम्ह भाषा। भरत सनेहँ बिचारु न राखा।।
अर्थ · Hindi
कह मुनि राम सत्य तुम्ह भाषा। भरत सनेहँ बिचारु न राखा।।
- RCM 2.258.7Open verse →
तेहि तें कहउँ बहोरि बहोरी। भरत भगति बस भइ मति मोरी।।
अर्थ · Hindi
तेहि तें कहउँ बहोरि बहोरी। भरत भगति बस भइ मति मोरी।।
- RCM 2.258.8Open verse →
मोरें जान भरत रुचि राखि। जो कीजिअ सो सुभ सिव साखी।।
अर्थ · Hindi
मोरें जान भरत रुचि राखि। जो कीजिअ सो सुभ सिव साखी।।
- RCM 2.258.9Open verse →
भरत बिनय सादर सुनिअ करिअ बिचारु बहोरि।
अर्थ · Hindi
भरत बिनय सादर सुनिअ करिअ बिचारु बहोरि।
- RCM 2.258.10Open verse →
करब साधुमत लोकमत नृपनय निगम निचोरि।।258।।
अर्थ · Hindi
करब साधुमत लोकमत नृपनय निगम निचोरि।।258।।
- RCM 2.259.1Open verse →
गुरु अनुराग भरत पर देखी। राम ह्दयँ आनंदु बिसेषी।।
अर्थ · Hindi
गुरु अनुराग भरत पर देखी। राम ह्दयँ आनंदु बिसेषी।।
- RCM 2.259.2Open verse →
भरतहि धरम धुरंधर जानी। निज सेवक तन मानस बानी।।
अर्थ · Hindi
भरतहि धरम धुरंधर जानी। निज सेवक तन मानस बानी।।
- RCM 2.259.3Open verse →
बोले गुर आयस अनुकूला। बचन मंजु मृदु मंगलमूला।।
अर्थ · Hindi
बोले गुर आयस अनुकूला। बचन मंजु मृदु मंगलमूला।।
- RCM 2.259.4Open verse →
नाथ सपथ पितु चरन दोहाई। भयउ न भुअन भरत सम भाई।।
अर्थ · Hindi
नाथ सपथ पितु चरन दोहाई। भयउ न भुअन भरत सम भाई।।
- RCM 2.259.5Open verse →
जे गुर पद अंबुज अनुरागी। ते लोकहुँ बेदहुँ बड़भागी।।
अर्थ · Hindi
जे गुर पद अंबुज अनुरागी। ते लोकहुँ बेदहुँ बड़भागी।।
- RCM 2.259.6Open verse →
राउर जा पर अस अनुरागू। को कहि सकइ भरत कर भागू।।
अर्थ · Hindi
राउर जा पर अस अनुरागू। को कहि सकइ भरत कर भागू।।
- RCM 2.259.7Open verse →
लखि लघु बंधु बुद्धि सकुचाई। करत बदन पर भरत बड़ाई।।
अर्थ · Hindi
लखि लघु बंधु बुद्धि सकुचाई। करत बदन पर भरत बड़ाई।।
- RCM 2.259.8Open verse →
भरतु कहहीं सोइ किएँ भलाई। अस कहि राम रहे अरगाई।।
अर्थ · Hindi
भरतु कहहीं सोइ किएँ भलाई। अस कहि राम रहे अरगाई।।
- RCM 2.259.9Open verse →
तब मुनि बोले भरत सन सब सँकोचु तजि तात।
अर्थ · Hindi
तब मुनि बोले भरत सन सब सँकोचु तजि तात।
- RCM 2.259.10Open verse →
कृपासिंधु प्रिय बंधु सन कहहु हृदय कै बात।।259।।
अर्थ · Hindi
कृपासिंधु प्रिय बंधु सन कहहु हृदय कै बात।।259।।
- RCM 2.260.1Open verse →
सुनि मुनि बचन राम रुख पाई। गुरु साहिब अनुकूल अघाई।।
अर्थ · Hindi
सुनि मुनि बचन राम रुख पाई। गुरु साहिब अनुकूल अघाई।।
- RCM 2.260.2Open verse →
लखि अपने सिर सबु छरु भारू। कहि न सकहिं कछु करहिं बिचारू।।
अर्थ · Hindi
लखि अपने सिर सबु छरु भारू। कहि न सकहिं कछु करहिं बिचारू।।
- RCM 2.260.3Open verse →
पुलकि सरीर सभाँ भए ठाढें। नीरज नयन नेह जल बाढ़ें।।
अर्थ · Hindi
पुलकि सरीर सभाँ भए ठाढें। नीरज नयन नेह जल बाढ़ें।।
- RCM 2.260.4Open verse →
कहब मोर मुनिनाथ निबाहा। एहि तें अधिक कहौं मैं काहा।
अर्थ · Hindi
कहब मोर मुनिनाथ निबाहा। एहि तें अधिक कहौं मैं काहा।
- RCM 2.260.5Open verse →
मैं जानउँ निज नाथ सुभाऊ। अपराधिहु पर कोह न काऊ।।
अर्थ · Hindi
मैं जानउँ निज नाथ सुभाऊ। अपराधिहु पर कोह न काऊ।।
- RCM 2.260.6Open verse →
मो पर कृपा सनेह बिसेषी। खेलत खुनिस न कबहूँ देखी।।
अर्थ · Hindi
मो पर कृपा सनेह बिसेषी। खेलत खुनिस न कबहूँ देखी।।
- RCM 2.260.7Open verse →
सिसुपन तेम परिहरेउँ न संगू। कबहुँ न कीन्ह मोर मन भंगू।।
अर्थ · Hindi
सिसुपन तेम परिहरेउँ न संगू। कबहुँ न कीन्ह मोर मन भंगू।।
- RCM 2.260.8Open verse →
मैं प्रभु कृपा रीति जियँ जोही। हारेहुँ खेल जितावहिं मोही।।
अर्थ · Hindi
मैं प्रभु कृपा रीति जियँ जोही। हारेहुँ खेल जितावहिं मोही।।
- RCM 2.260.9Open verse →
महूँ सनेह सकोच बस सनमुख कही न बैन।
अर्थ · Hindi
महूँ सनेह सकोच बस सनमुख कही न बैन।
- RCM 2.260.10Open verse →
दरसन तृपित न आजु लगि पेम पिआसे नैन।।260।।
अर्थ · Hindi
दरसन तृपित न आजु लगि पेम पिआसे नैन।।260।।
- RCM 2.261.1Open verse →
बिधि न सकेउ सहि मोर दुलारा। नीच बीचु जननी मिस पारा।
अर्थ · Hindi
बिधि न सकेउ सहि मोर दुलारा। नीच बीचु जननी मिस पारा।
- RCM 2.261.2Open verse →
यहउ कहत मोहि आजु न सोभा। अपनीं समुझि साधु सुचि को भा।।
अर्थ · Hindi
यहउ कहत मोहि आजु न सोभा। अपनीं समुझि साधु सुचि को भा।।
- RCM 2.261.3Open verse →
मातु मंदि मैं साधु सुचाली। उर अस आनत कोटि कुचाली।।
अर्थ · Hindi
मातु मंदि मैं साधु सुचाली। उर अस आनत कोटि कुचाली।।
- RCM 2.261.4Open verse →
फरइ कि कोदव बालि सुसाली। मुकुता प्रसव कि संबुक काली।।
अर्थ · Hindi
फरइ कि कोदव बालि सुसाली। मुकुता प्रसव कि संबुक काली।।
- RCM 2.261.5Open verse →
सपनेहुँ दोसक लेसु न काहू। मोर अभाग उदधि अवगाहू।।
अर्थ · Hindi
सपनेहुँ दोसक लेसु न काहू। मोर अभाग उदधि अवगाहू।।
- RCM 2.261.6Open verse →
बिनु समुझें निज अघ परिपाकू। जारिउँ जायँ जननि कहि काकू।।
अर्थ · Hindi
बिनु समुझें निज अघ परिपाकू। जारिउँ जायँ जननि कहि काकू।।
- RCM 2.261.7Open verse →
हृदयँ हेरि हारेउँ सब ओरा। एकहि भाँति भलेहिं भल मोरा।।
अर्थ · Hindi
हृदयँ हेरि हारेउँ सब ओरा। एकहि भाँति भलेहिं भल मोरा।।
- RCM 2.261.8Open verse →
गुर गोसाइँ साहिब सिय रामू। लागत मोहि नीक परिनामू।।
अर्थ · Hindi
गुर गोसाइँ साहिब सिय रामू। लागत मोहि नीक परिनामू।।
- RCM 2.261.9Open verse →
साधु सभा गुर प्रभु निकट कहउँ सुथल सति भाउ।
अर्थ · Hindi
साधु सभा गुर प्रभु निकट कहउँ सुथल सति भाउ।
- RCM 2.261.10Open verse →
प्रेम प्रपंचु कि झूठ फुर जानहिं मुनि रघुराउ।।261।।
अर्थ · Hindi
प्रेम प्रपंचु कि झूठ फुर जानहिं मुनि रघुराउ।।261।।
- RCM 2.262.1Open verse →
भूपति मरन पेम पनु राखी। जननी कुमति जगतु सबु साखी।।
अर्थ · Hindi
भूपति मरन पेम पनु राखी। जननी कुमति जगतु सबु साखी।।
- RCM 2.262.2Open verse →
देखि न जाहि बिकल महतारी। जरहिं दुसह जर पुर नर नारी।।
अर्थ · Hindi
देखि न जाहि बिकल महतारी। जरहिं दुसह जर पुर नर नारी।।
- RCM 2.262.3Open verse →
महीं सकल अनरथ कर मूला। सो सुनि समुझि सहिउँ सब सूला।।
अर्थ · Hindi
महीं सकल अनरथ कर मूला। सो सुनि समुझि सहिउँ सब सूला।।
- RCM 2.262.4Open verse →
सुनि बन गवनु कीन्ह रघुनाथा। करि मुनि बेष लखन सिय साथा।।
अर्थ · Hindi
सुनि बन गवनु कीन्ह रघुनाथा। करि मुनि बेष लखन सिय साथा।।
- RCM 2.262.5Open verse →
बिनु पानहिन्ह पयादेहि पाएँ। संकरु साखि रहेउँ एहि घाएँ।।
अर्थ · Hindi
बिनु पानहिन्ह पयादेहि पाएँ। संकरु साखि रहेउँ एहि घाएँ।।
- RCM 2.262.6Open verse →
बहुरि निहार निषाद सनेहू। कुलिस कठिन उर भयउ न बेहू।।
अर्थ · Hindi
बहुरि निहार निषाद सनेहू। कुलिस कठिन उर भयउ न बेहू।।
- RCM 2.262.7Open verse →
अब सबु आँखिन्ह देखेउँ आई। जिअत जीव जड़ सबइ सहाई।।
अर्थ · Hindi
अब सबु आँखिन्ह देखेउँ आई। जिअत जीव जड़ सबइ सहाई।।
- RCM 2.262.8Open verse →
जिन्हहि निरखि मग साँपिनि बीछी। तजहिं बिषम बिषु तामस तीछी।।
अर्थ · Hindi
जिन्हहि निरखि मग साँपिनि बीछी। तजहिं बिषम बिषु तामस तीछी।।
- RCM 2.262.9Open verse →
तेइ रघुनंदनु लखनु सिय अनहित लागे जाहि।
अर्थ · Hindi
तेइ रघुनंदनु लखनु सिय अनहित लागे जाहि।
- RCM 2.262.10Open verse →
तासु तनय तजि दुसह दुख दैउ सहावइ काहि।।262।।
अर्थ · Hindi
तासु तनय तजि दुसह दुख दैउ सहावइ काहि।।262।।
- RCM 2.263.1Open verse →
सुनि अति बिकल भरत बर बानी। आरति प्रीति बिनय नय सानी।।
अर्थ · Hindi
सुनि अति बिकल भरत बर बानी। आरति प्रीति बिनय नय सानी।।
- RCM 2.263.2Open verse →
सोक मगन सब सभाँ खभारू। मनहुँ कमल बन परेउ तुसारू।।
अर्थ · Hindi
सोक मगन सब सभाँ खभारू। मनहुँ कमल बन परेउ तुसारू।।
- RCM 2.263.3Open verse →
कहि अनेक बिधि कथा पुरानी। भरत प्रबोधु कीन्ह मुनि ग्यानी।।
अर्थ · Hindi
कहि अनेक बिधि कथा पुरानी। भरत प्रबोधु कीन्ह मुनि ग्यानी।।
- RCM 2.263.4Open verse →
बोले उचित बचन रघुनंदू। दिनकर कुल कैरव बन चंदू।।
अर्थ · Hindi
बोले उचित बचन रघुनंदू। दिनकर कुल कैरव बन चंदू।।
- RCM 2.263.5Open verse →
तात जाँय जियँ करहु गलानी। ईस अधीन जीव गति जानी।।
अर्थ · Hindi
तात जाँय जियँ करहु गलानी। ईस अधीन जीव गति जानी।।
- RCM 2.263.6Open verse →
तीनि काल तिभुअन मत मोरें। पुन्यसिलोक तात तर तोरे।।
अर्थ · Hindi
तीनि काल तिभुअन मत मोरें। पुन्यसिलोक तात तर तोरे।।
- RCM 2.263.7Open verse →
उर आनत तुम्ह पर कुटिलाई। जाइ लोकु परलोकु नसाई।।
अर्थ · Hindi
उर आनत तुम्ह पर कुटिलाई। जाइ लोकु परलोकु नसाई।।
- RCM 2.263.8Open verse →
दोसु देहिं जननिहि जड़ तेई। जिन्ह गुर साधु सभा नहिं सेई।।
अर्थ · Hindi
दोसु देहिं जननिहि जड़ तेई। जिन्ह गुर साधु सभा नहिं सेई।।
- RCM 2.263.9Open verse →
मिटिहहिं पाप प्रपंच सब अखिल अमंगल भार।
अर्थ · Hindi
मिटिहहिं पाप प्रपंच सब अखिल अमंगल भार।
- RCM 2.263.10Open verse →
लोक सुजसु परलोक सुखु सुमिरत नामु तुम्हार।।263।।
अर्थ · Hindi
लोक सुजसु परलोक सुखु सुमिरत नामु तुम्हार।।263।।
- RCM 2.264.1Open verse →
कहउँ सुभाउ सत्य सिव साखी। भरत भूमि रह राउरि राखी।।
अर्थ · Hindi
कहउँ सुभाउ सत्य सिव साखी। भरत भूमि रह राउरि राखी।।
- RCM 2.264.2Open verse →
तात कुतरक करहु जनि जाएँ। बैर पेम नहि दुरइ दुराएँ।।
अर्थ · Hindi
तात कुतरक करहु जनि जाएँ। बैर पेम नहि दुरइ दुराएँ।।
- RCM 2.264.3Open verse →
मुनि गन निकट बिहग मृग जाहीं। बाधक बधिक बिलोकि पराहीं।।
अर्थ · Hindi
मुनि गन निकट बिहग मृग जाहीं। बाधक बधिक बिलोकि पराहीं।।
- RCM 2.264.4Open verse →
हित अनहित पसु पच्छिउ जाना। मानुष तनु गुन ग्यान निधाना।।
अर्थ · Hindi
हित अनहित पसु पच्छिउ जाना। मानुष तनु गुन ग्यान निधाना।।
- RCM 2.264.5Open verse →
तात तुम्हहि मैं जानउँ नीकें। करौं काह असमंजस जीकें।।
अर्थ · Hindi
तात तुम्हहि मैं जानउँ नीकें। करौं काह असमंजस जीकें।।
- RCM 2.264.6Open verse →
राखेउ रायँ सत्य मोहि त्यागी। तनु परिहरेउ पेम पन लागी।।
अर्थ · Hindi
राखेउ रायँ सत्य मोहि त्यागी। तनु परिहरेउ पेम पन लागी।।
- RCM 2.264.7Open verse →
तासु बचन मेटत मन सोचू। तेहि तें अधिक तुम्हार सँकोचू।।
अर्थ · Hindi
तासु बचन मेटत मन सोचू। तेहि तें अधिक तुम्हार सँकोचू।।
- RCM 2.264.8Open verse →
ता पर गुर मोहि आयसु दीन्हा। अवसि जो कहहु चहउँ सोइ कीन्हा।।
अर्थ · Hindi
ता पर गुर मोहि आयसु दीन्हा। अवसि जो कहहु चहउँ सोइ कीन्हा।।
- RCM 2.264.9Open verse →
मनु प्रसन्न करि सकुच तजि कहहु करौं सोइ आजु।
अर्थ · Hindi
मनु प्रसन्न करि सकुच तजि कहहु करौं सोइ आजु।
- RCM 2.264.10Open verse →
सत्यसंध रघुबर बचन सुनि भा सुखी समाजु।।264।।
अर्थ · Hindi
सत्यसंध रघुबर बचन सुनि भा सुखी समाजु।।264।।
- RCM 2.265.1Open verse →
सुर गन सहित सभय सुरराजू। सोचहिं चाहत होन अकाजू।।
अर्थ · Hindi
सुर गन सहित सभय सुरराजू। सोचहिं चाहत होन अकाजू।।
- RCM 2.265.2Open verse →
बनत उपाउ करत कछु नाहीं। राम सरन सब गे मन माहीं।।
अर्थ · Hindi
बनत उपाउ करत कछु नाहीं। राम सरन सब गे मन माहीं।।
- RCM 2.265.3Open verse →
बहुरि बिचारि परस्पर कहहीं। रघुपति भगत भगति बस अहहीं।
अर्थ · Hindi
बहुरि बिचारि परस्पर कहहीं। रघुपति भगत भगति बस अहहीं।
- RCM 2.265.4Open verse →
सुधि करि अंबरीष दुरबासा। भे सुर सुरपति निपट निरासा।।
अर्थ · Hindi
सुधि करि अंबरीष दुरबासा। भे सुर सुरपति निपट निरासा।।
- RCM 2.265.5Open verse →
सहे सुरन्ह बहु काल बिषादा। नरहरि किए प्रगट प्रहलादा।।
अर्थ · Hindi
सहे सुरन्ह बहु काल बिषादा। नरहरि किए प्रगट प्रहलादा।।
- RCM 2.265.6Open verse →
लगि लगि कान कहहिं धुनि माथा। अब सुर काज भरत के हाथा।।
अर्थ · Hindi
लगि लगि कान कहहिं धुनि माथा। अब सुर काज भरत के हाथा।।
- RCM 2.265.7Open verse →
आन उपाउ न देखिअ देवा। मानत रामु सुसेवक सेवा।।
अर्थ · Hindi
आन उपाउ न देखिअ देवा। मानत रामु सुसेवक सेवा।।
- RCM 2.265.8Open verse →
हियँ सपेम सुमिरहु सब भरतहि। निज गुन सील राम बस करतहि।।
अर्थ · Hindi
हियँ सपेम सुमिरहु सब भरतहि। निज गुन सील राम बस करतहि।।
- RCM 2.265.9Open verse →
सुनि सुर मत सुरगुर कहेउ भल तुम्हार बड़ भागु।
अर्थ · Hindi
सुनि सुर मत सुरगुर कहेउ भल तुम्हार बड़ भागु।
- RCM 2.265.10Open verse →
सकल सुमंगल मूल जग भरत चरन अनुरागु।।265।।
अर्थ · Hindi
सकल सुमंगल मूल जग भरत चरन अनुरागु।।265।।
- RCM 2.266.1Open verse →
सीतापति सेवक सेवकाई। कामधेनु सय सरिस सुहाई।।
अर्थ · Hindi
सीतापति सेवक सेवकाई। कामधेनु सय सरिस सुहाई।।
- RCM 2.266.2Open verse →
भरत भगति तुम्हरें मन आई। तजहु सोचु बिधि बात बनाई।।
अर्थ · Hindi
भरत भगति तुम्हरें मन आई। तजहु सोचु बिधि बात बनाई।।
- RCM 2.266.3Open verse →
देखु देवपति भरत प्रभाऊ। सहज सुभायँ बिबस रघुराऊ।।
अर्थ · Hindi
देखु देवपति भरत प्रभाऊ। सहज सुभायँ बिबस रघुराऊ।।
- RCM 2.266.4Open verse →
मन थिर करहु देव डरु नाहीं। भरतहि जानि राम परिछाहीं।।
अर्थ · Hindi
मन थिर करहु देव डरु नाहीं। भरतहि जानि राम परिछाहीं।।
- RCM 2.266.5Open verse →
सुनो सुरगुर सुर संमत सोचू। अंतरजामी प्रभुहि सकोचू।।
अर्थ · Hindi
सुनो सुरगुर सुर संमत सोचू। अंतरजामी प्रभुहि सकोचू।।
- RCM 2.266.6Open verse →
निज सिर भारु भरत जियँ जाना। करत कोटि बिधि उर अनुमाना।।
अर्थ · Hindi
निज सिर भारु भरत जियँ जाना। करत कोटि बिधि उर अनुमाना।।
- RCM 2.266.7Open verse →
करि बिचारु मन दीन्ही ठीका। राम रजायस आपन नीका।।
अर्थ · Hindi
करि बिचारु मन दीन्ही ठीका। राम रजायस आपन नीका।।
- RCM 2.266.8Open verse →
निज पन तजि राखेउ पनु मोरा। छोहु सनेहु कीन्ह नहिं थोरा।।
अर्थ · Hindi
निज पन तजि राखेउ पनु मोरा। छोहु सनेहु कीन्ह नहिं थोरा।।
- RCM 2.266.9Open verse →
कीन्ह अनुग्रह अमित अति सब बिधि सीतानाथ।
अर्थ · Hindi
कीन्ह अनुग्रह अमित अति सब बिधि सीतानाथ।
- RCM 2.266.10Open verse →
करि प्रनामु बोले भरतु जोरि जलज जुग हाथ।।266।।
अर्थ · Hindi
करि प्रनामु बोले भरतु जोरि जलज जुग हाथ।।266।।
- RCM 2.267.1Open verse →
कहौं कहावौं का अब स्वामी। कृपा अंबुनिधि अंतरजामी।।
अर्थ · Hindi
कहौं कहावौं का अब स्वामी। कृपा अंबुनिधि अंतरजामी।।
- RCM 2.267.2Open verse →
गुर प्रसन्न साहिब अनुकूला। मिटी मलिन मन कलपित सूला।।
अर्थ · Hindi
गुर प्रसन्न साहिब अनुकूला। मिटी मलिन मन कलपित सूला।।
- RCM 2.267.3Open verse →
अपडर डरेउँ न सोच समूलें। रबिहि न दोसु देव दिसि भूलें।।
अर्थ · Hindi
अपडर डरेउँ न सोच समूलें। रबिहि न दोसु देव दिसि भूलें।।
- RCM 2.267.4Open verse →
मोर अभागु मातु कुटिलाई। बिधि गति बिषम काल कठिनाई।।
अर्थ · Hindi
मोर अभागु मातु कुटिलाई। बिधि गति बिषम काल कठिनाई।।
- RCM 2.267.5Open verse →
पाउ रोपि सब मिलि मोहि घाला। प्रनतपाल पन आपन पाला।।
अर्थ · Hindi
पाउ रोपि सब मिलि मोहि घाला। प्रनतपाल पन आपन पाला।।
- RCM 2.267.6Open verse →
यह नइ रीति न राउरि होई। लोकहुँ बेद बिदित नहिं गोई।।
अर्थ · Hindi
यह नइ रीति न राउरि होई। लोकहुँ बेद बिदित नहिं गोई।।
- RCM 2.267.7Open verse →
जगु अनभल भल एकु गोसाईं। कहिअ होइ भल कासु भलाईं।।
अर्थ · Hindi
जगु अनभल भल एकु गोसाईं। कहिअ होइ भल कासु भलाईं।।
- RCM 2.267.8Open verse →
देउ देवतरु सरिस सुभाऊ। सनमुख बिमुख न काहुहि काऊ।।
अर्थ · Hindi
देउ देवतरु सरिस सुभाऊ। सनमुख बिमुख न काहुहि काऊ।।
- RCM 2.267.9Open verse →
जाइ निकट पहिचानि तरु छाहँ समनि सब सोच।
अर्थ · Hindi
जाइ निकट पहिचानि तरु छाहँ समनि सब सोच।
- RCM 2.267.10Open verse →
मागत अभिमत पाव जग राउ रंकु भल पोच।।267।।
अर्थ · Hindi
मागत अभिमत पाव जग राउ रंकु भल पोच।।267।।
- RCM 2.268.1Open verse →
लखि सब बिधि गुर स्वामि सनेहू। मिटेउ छोभु नहिं मन संदेहू।।
अर्थ · Hindi
लखि सब बिधि गुर स्वामि सनेहू। मिटेउ छोभु नहिं मन संदेहू।।
- RCM 2.268.2Open verse →
अब करुनाकर कीजिअ सोई। जन हित प्रभु चित छोभु न होई।।
अर्थ · Hindi
अब करुनाकर कीजिअ सोई। जन हित प्रभु चित छोभु न होई।।
- RCM 2.268.3Open verse →
जो सेवकु साहिबहि सँकोची। निज हित चहइ तासु मति पोची।।
अर्थ · Hindi
जो सेवकु साहिबहि सँकोची। निज हित चहइ तासु मति पोची।।
- RCM 2.268.4Open verse →
सेवक हित साहिब सेवकाई। करै सकल सुख लोभ बिहाई।।
अर्थ · Hindi
सेवक हित साहिब सेवकाई। करै सकल सुख लोभ बिहाई।।
- RCM 2.268.5Open verse →
स्वारथु नाथ फिरें सबही का। किएँ रजाइ कोटि बिधि नीका।।
अर्थ · Hindi
स्वारथु नाथ फिरें सबही का। किएँ रजाइ कोटि बिधि नीका।।
- RCM 2.268.6Open verse →
यह स्वारथ परमारथ सारु। सकल सुकृत फल सुगति सिंगारु।।
अर्थ · Hindi
यह स्वारथ परमारथ सारु। सकल सुकृत फल सुगति सिंगारु।।
- RCM 2.268.7Open verse →
देव एक बिनती सुनि मोरी। उचित होइ तस करब बहोरी।।
अर्थ · Hindi
देव एक बिनती सुनि मोरी। उचित होइ तस करब बहोरी।।
- RCM 2.268.8Open verse →
तिलक समाजु साजि सबु आना। करिअ सुफल प्रभु जौं मनु माना।।
अर्थ · Hindi
तिलक समाजु साजि सबु आना। करिअ सुफल प्रभु जौं मनु माना।।
- RCM 2.268.9Open verse →
सानुज पठइअ मोहि बन कीजिअ सबहि सनाथ।
अर्थ · Hindi
सानुज पठइअ मोहि बन कीजिअ सबहि सनाथ।
- RCM 2.268.10Open verse →
नतरु फेरिअहिं बंधु दोउ नाथ चलौं मैं साथ।।268।।
अर्थ · Hindi
नतरु फेरिअहिं बंधु दोउ नाथ चलौं मैं साथ।।268।।
- RCM 2.269.1Open verse →
नतरु जाहिं बन तीनिउ भाई। बहुरिअ सीय सहित रघुराई।।
अर्थ · Hindi
नतरु जाहिं बन तीनिउ भाई। बहुरिअ सीय सहित रघुराई।।
- RCM 2.269.2Open verse →
जेहि बिधि प्रभु प्रसन्न मन होई। करुना सागर कीजिअ सोई।।
अर्थ · Hindi
जेहि बिधि प्रभु प्रसन्न मन होई। करुना सागर कीजिअ सोई।।
- RCM 2.269.3Open verse →
देवँ दीन्ह सबु मोहि अभारु। मोरें नीति न धरम बिचारु।।
अर्थ · Hindi
देवँ दीन्ह सबु मोहि अभारु। मोरें नीति न धरम बिचारु।।
- RCM 2.269.4Open verse →
कहउँ बचन सब स्वारथ हेतू। रहत न आरत कें चित चेतू।।
अर्थ · Hindi
कहउँ बचन सब स्वारथ हेतू। रहत न आरत कें चित चेतू।।
- RCM 2.269.5Open verse →
उतरु देइ सुनि स्वामि रजाई। सो सेवकु लखि लाज लजाई।।
अर्थ · Hindi
उतरु देइ सुनि स्वामि रजाई। सो सेवकु लखि लाज लजाई।।
- RCM 2.269.6Open verse →
अस मैं अवगुन उदधि अगाधू। स्वामि सनेहँ सराहत साधू।।
अर्थ · Hindi
अस मैं अवगुन उदधि अगाधू। स्वामि सनेहँ सराहत साधू।।
- RCM 2.269.7Open verse →
अब कृपाल मोहि सो मत भावा। सकुच स्वामि मन जाइँ न पावा।।
अर्थ · Hindi
अब कृपाल मोहि सो मत भावा। सकुच स्वामि मन जाइँ न पावा।।
- RCM 2.269.8Open verse →
प्रभु पद सपथ कहउँ सति भाऊ। जग मंगल हित एक उपाऊ।।
अर्थ · Hindi
प्रभु पद सपथ कहउँ सति भाऊ। जग मंगल हित एक उपाऊ।।
- RCM 2.269.9Open verse →
प्रभु प्रसन्न मन सकुच तजि जो जेहि आयसु देब।
अर्थ · Hindi
प्रभु प्रसन्न मन सकुच तजि जो जेहि आयसु देब।
- RCM 2.269.10Open verse →
सो सिर धरि धरि करिहि सबु मिटिहि अनट अवरेब।।269।।
अर्थ · Hindi
सो सिर धरि धरि करिहि सबु मिटिहि अनट अवरेब।।269।।
- RCM 2.270.1Open verse →
भरत बचन सुचि सुनि सुर हरषे। साधु सराहि सुमन सुर बरषे।।
अर्थ · Hindi
भरत बचन सुचि सुनि सुर हरषे। साधु सराहि सुमन सुर बरषे।।
- RCM 2.270.2Open verse →
असमंजस बस अवध नेवासी। प्रमुदित मन तापस बनबासी।।
अर्थ · Hindi
असमंजस बस अवध नेवासी। प्रमुदित मन तापस बनबासी।।
- RCM 2.270.3Open verse →
चुपहिं रहे रघुनाथ सँकोची। प्रभु गति देखि सभा सब सोची।।
अर्थ · Hindi
चुपहिं रहे रघुनाथ सँकोची। प्रभु गति देखि सभा सब सोची।।
- RCM 2.270.4Open verse →
जनक दूत तेहि अवसर आए। मुनि बसिष्ठँ सुनि बेगि बोलाए।।
अर्थ · Hindi
जनक दूत तेहि अवसर आए। मुनि बसिष्ठँ सुनि बेगि बोलाए।।
- RCM 2.270.5Open verse →
करि प्रनाम तिन्ह रामु निहारे। बेषु देखि भए निपट दुखारे।।
अर्थ · Hindi
करि प्रनाम तिन्ह रामु निहारे। बेषु देखि भए निपट दुखारे।।
- RCM 2.270.6Open verse →
दूतन्ह मुनिबर बूझी बाता। कहहु बिदेह भूप कुसलाता।।
अर्थ · Hindi
दूतन्ह मुनिबर बूझी बाता। कहहु बिदेह भूप कुसलाता।।
- RCM 2.270.7Open verse →
सुनि सकुचाइ नाइ महि माथा। बोले चर बर जोरें हाथा।।
अर्थ · Hindi
सुनि सकुचाइ नाइ महि माथा। बोले चर बर जोरें हाथा।।
- RCM 2.270.8Open verse →
बूझब राउर सादर साईं। कुसल हेतु सो भयउ गोसाईं।।
अर्थ · Hindi
बूझब राउर सादर साईं। कुसल हेतु सो भयउ गोसाईं।।
- RCM 2.270.9Open verse →
नाहि त कोसल नाथ कें साथ कुसल गइ नाथ।
अर्थ · Hindi
नाहि त कोसल नाथ कें साथ कुसल गइ नाथ।
- RCM 2.270.10Open verse →
मिथिला अवध बिसेष तें जगु सब भयउ अनाथ।।270।।
अर्थ · Hindi
मिथिला अवध बिसेष तें जगु सब भयउ अनाथ।।270।।
- RCM 2.271.1Open verse →
कोसलपति गति सुनि जनकौरा। भे सब लोक सोक बस बौरा।।
अर्थ · Hindi
कोसलपति गति सुनि जनकौरा। भे सब लोक सोक बस बौरा।।
- RCM 2.271.2Open verse →
जेहिं देखे तेहि समय बिदेहू। नामु सत्य अस लाग न केहू।।
अर्थ · Hindi
जेहिं देखे तेहि समय बिदेहू। नामु सत्य अस लाग न केहू।।
- RCM 2.271.3Open verse →
रानि कुचालि सुनत नरपालहि। सूझ न कछु जस मनि बिनु ब्यालहि।।
अर्थ · Hindi
रानि कुचालि सुनत नरपालहि। सूझ न कछु जस मनि बिनु ब्यालहि।।
- RCM 2.271.4Open verse →
भरत राज रघुबर बनबासू। भा मिथिलेसहि हृदयँ हराँसू।।
अर्थ · Hindi
भरत राज रघुबर बनबासू। भा मिथिलेसहि हृदयँ हराँसू।।
- RCM 2.271.5Open verse →
नृप बूझे बुध सचिव समाजू। कहहु बिचारि उचित का आजू।।
अर्थ · Hindi
नृप बूझे बुध सचिव समाजू। कहहु बिचारि उचित का आजू।।
- RCM 2.271.6Open verse →
समुझि अवध असमंजस दोऊ। चलिअ कि रहिअ न कह कछु कोऊ।।
अर्थ · Hindi
समुझि अवध असमंजस दोऊ। चलिअ कि रहिअ न कह कछु कोऊ।।
- RCM 2.271.7Open verse →
नृपहि धीर धरि हृदयँ बिचारी। पठए अवध चतुर चर चारी।।
अर्थ · Hindi
नृपहि धीर धरि हृदयँ बिचारी। पठए अवध चतुर चर चारी।।
- RCM 2.271.8Open verse →
बूझि भरत सति भाउ कुभाऊ। आएहु बेगि न होइ लखाऊ।।
अर्थ · Hindi
बूझि भरत सति भाउ कुभाऊ। आएहु बेगि न होइ लखाऊ।।
- RCM 2.271.9Open verse →
गए अवध चर भरत गति बूझि देखि करतूति।
अर्थ · Hindi
गए अवध चर भरत गति बूझि देखि करतूति।
- RCM 2.271.10Open verse →
चले चित्रकूटहि भरतु चार चले तेरहूति।।271।।
अर्थ · Hindi
चले चित्रकूटहि भरतु चार चले तेरहूति।।271।।
- RCM 2.272.1Open verse →
दूतन्ह आइ भरत कइ करनी। जनक समाज जथामति बरनी।।
अर्थ · Hindi
दूतन्ह आइ भरत कइ करनी। जनक समाज जथामति बरनी।।
- RCM 2.272.2Open verse →
सुनि गुर परिजन सचिव महीपति। भे सब सोच सनेहँ बिकल अति।।
अर्थ · Hindi
सुनि गुर परिजन सचिव महीपति। भे सब सोच सनेहँ बिकल अति।।
- RCM 2.272.3Open verse →
धरि धीरजु करि भरत बड़ाई। लिए सुभट साहनी बोलाई।।
अर्थ · Hindi
धरि धीरजु करि भरत बड़ाई। लिए सुभट साहनी बोलाई।।
- RCM 2.272.4Open verse →
घर पुर देस राखि रखवारे। हय गय रथ बहु जान सँवारे।।
अर्थ · Hindi
घर पुर देस राखि रखवारे। हय गय रथ बहु जान सँवारे।।
- RCM 2.272.5Open verse →
दुघरी साधि चले ततकाला। किए बिश्रामु न मग महीपाला।।
अर्थ · Hindi
दुघरी साधि चले ततकाला। किए बिश्रामु न मग महीपाला।।
- RCM 2.272.6Open verse →
भोरहिं आजु नहाइ प्रयागा। चले जमुन उतरन सबु लागा।।
अर्थ · Hindi
भोरहिं आजु नहाइ प्रयागा। चले जमुन उतरन सबु लागा।।
- RCM 2.272.7Open verse →
खबरि लेन हम पठए नाथा। तिन्ह कहि अस महि नायउ माथा।।
अर्थ · Hindi
खबरि लेन हम पठए नाथा। तिन्ह कहि अस महि नायउ माथा।।
- RCM 2.272.8Open verse →
साथ किरात छ सातक दीन्हे। मुनिबर तुरत बिदा चर कीन्हे।।
अर्थ · Hindi
साथ किरात छ सातक दीन्हे। मुनिबर तुरत बिदा चर कीन्हे।।
- RCM 2.272.9Open verse →
सुनत जनक आगवनु सबु हरषेउ अवध समाजु।
अर्थ · Hindi
सुनत जनक आगवनु सबु हरषेउ अवध समाजु।
- RCM 2.272.10Open verse →
रघुनंदनहि सकोचु बड़ सोच बिबस सुरराजु।।272।।
अर्थ · Hindi
रघुनंदनहि सकोचु बड़ सोच बिबस सुरराजु।।272।।
- RCM 2.273.1Open verse →
गरइ गलानि कुटिल कैकेई। काहि कहै केहि दूषनु देई।।
अर्थ · Hindi
गरइ गलानि कुटिल कैकेई। काहि कहै केहि दूषनु देई।।
- RCM 2.273.2Open verse →
अस मन आनि मुदित नर नारी। भयउ बहोरि रहब दिन चारी।।
अर्थ · Hindi
अस मन आनि मुदित नर नारी। भयउ बहोरि रहब दिन चारी।।
- RCM 2.273.3Open verse →
एहि प्रकार गत बासर सोऊ। प्रात नहान लाग सबु कोऊ।।
अर्थ · Hindi
एहि प्रकार गत बासर सोऊ। प्रात नहान लाग सबु कोऊ।।
- RCM 2.273.4Open verse →
करि मज्जनु पूजहिं नर नारी। गनप गौरि तिपुरारि तमारी।।
अर्थ · Hindi
करि मज्जनु पूजहिं नर नारी। गनप गौरि तिपुरारि तमारी।।
- RCM 2.273.5Open verse →
रमा रमन पद बंदि बहोरी। बिनवहिं अंजुलि अंचल जोरी।।
अर्थ · Hindi
रमा रमन पद बंदि बहोरी। बिनवहिं अंजुलि अंचल जोरी।।
- RCM 2.273.6Open verse →
राजा रामु जानकी रानी। आनँद अवधि अवध रजधानी।।
अर्थ · Hindi
राजा रामु जानकी रानी। आनँद अवधि अवध रजधानी।।
- RCM 2.273.7Open verse →
सुबस बसउ फिरि सहित समाजा। भरतहि रामु करहुँ जुबराजा।।
अर्थ · Hindi
सुबस बसउ फिरि सहित समाजा। भरतहि रामु करहुँ जुबराजा।।
- RCM 2.273.8Open verse →
एहि सुख सुधाँ सींची सब काहू। देव देहु जग जीवन लाहू।।
अर्थ · Hindi
एहि सुख सुधाँ सींची सब काहू। देव देहु जग जीवन लाहू।।
- RCM 2.273.9Open verse →
गुर समाज भाइन्ह सहित राम राजु पुर होउ।
अर्थ · Hindi
गुर समाज भाइन्ह सहित राम राजु पुर होउ।
- RCM 2.273.10Open verse →
अछत राम राजा अवध मरिअ माग सबु कोउ।।273।।
अर्थ · Hindi
अछत राम राजा अवध मरिअ माग सबु कोउ।।273।।
- RCM 2.274.1Open verse →
सुनि सनेहमय पुरजन बानी। निंदहिं जोग बिरति मुनि ग्यानी।।
अर्थ · Hindi
सुनि सनेहमय पुरजन बानी। निंदहिं जोग बिरति मुनि ग्यानी।।
- RCM 2.274.2Open verse →
एहि बिधि नित्यकरम करि पुरजन। रामहि करहिं प्रनाम पुलकि तन।।
अर्थ · Hindi
एहि बिधि नित्यकरम करि पुरजन। रामहि करहिं प्रनाम पुलकि तन।।
- RCM 2.274.3Open verse →
ऊँच नीच मध्यम नर नारी। लहहिं दरसु निज निज अनुहारी।।
अर्थ · Hindi
ऊँच नीच मध्यम नर नारी। लहहिं दरसु निज निज अनुहारी।।
- RCM 2.274.4Open verse →
सावधान सबही सनमानहिं। सकल सराहत कृपानिधानहिं।।
अर्थ · Hindi
सावधान सबही सनमानहिं। सकल सराहत कृपानिधानहिं।।
- RCM 2.274.5Open verse →
लरिकाइहि ते रघुबर बानी। पालत नीति प्रीति पहिचानी।।
अर्थ · Hindi
लरिकाइहि ते रघुबर बानी। पालत नीति प्रीति पहिचानी।।
- RCM 2.274.6Open verse →
सील सकोच सिंधु रघुराऊ। सुमुख सुलोचन सरल सुभाऊ।।
अर्थ · Hindi
सील सकोच सिंधु रघुराऊ। सुमुख सुलोचन सरल सुभाऊ।।
- RCM 2.274.7Open verse →
कहत राम गुन गन अनुरागे। सब निज भाग सराहन लागे।।
अर्थ · Hindi
कहत राम गुन गन अनुरागे। सब निज भाग सराहन लागे।।
- RCM 2.274.8Open verse →
हम सम पुन्य पुंज जग थोरे। जिन्हहि रामु जानत करि मोरे।।
अर्थ · Hindi
हम सम पुन्य पुंज जग थोरे। जिन्हहि रामु जानत करि मोरे।।
- RCM 2.274.9Open verse →
प्रेम मगन तेहि समय सब सुनि आवत मिथिलेसु।
अर्थ · Hindi
प्रेम मगन तेहि समय सब सुनि आवत मिथिलेसु।
- RCM 2.274.10Open verse →
सहित सभा संभ्रम उठेउ रबिकुल कमल दिनेसु।।274।।
अर्थ · Hindi
सहित सभा संभ्रम उठेउ रबिकुल कमल दिनेसु।।274।।
- RCM 2.275.1Open verse →
भाइ सचिव गुर पुरजन साथा। आगें गवनु कीन्ह रघुनाथा।।
अर्थ · Hindi
भाइ सचिव गुर पुरजन साथा। आगें गवनु कीन्ह रघुनाथा।।
- RCM 2.275.2Open verse →
गिरिबरु दीख जनकपति जबहीं। करि प्रनाम रथ त्यागेउ तबहीं।।
अर्थ · Hindi
गिरिबरु दीख जनकपति जबहीं। करि प्रनाम रथ त्यागेउ तबहीं।।
- RCM 2.275.3Open verse →
राम दरस लालसा उछाहू। पथ श्रम लेसु कलेसु न काहू।।
अर्थ · Hindi
राम दरस लालसा उछाहू। पथ श्रम लेसु कलेसु न काहू।।
- RCM 2.275.4Open verse →
मन तहँ जहँ रघुबर बैदेही। बिनु मन तन दुख सुख सुधि केही।।
अर्थ · Hindi
मन तहँ जहँ रघुबर बैदेही। बिनु मन तन दुख सुख सुधि केही।।
- RCM 2.275.5Open verse →
आवत जनकु चले एहि भाँती। सहित समाज प्रेम मति माती।।
अर्थ · Hindi
आवत जनकु चले एहि भाँती। सहित समाज प्रेम मति माती।।
- RCM 2.275.6Open verse →
आए निकट देखि अनुरागे। सादर मिलन परसपर लागे।।
अर्थ · Hindi
आए निकट देखि अनुरागे। सादर मिलन परसपर लागे।।
- RCM 2.275.7Open verse →
लगे जनक मुनिजन पद बंदन। रिषिन्ह प्रनामु कीन्ह रघुनंदन।।
अर्थ · Hindi
लगे जनक मुनिजन पद बंदन। रिषिन्ह प्रनामु कीन्ह रघुनंदन।।
- RCM 2.275.8Open verse →
भाइन्ह सहित रामु मिलि राजहि। चले लवाइ समेत समाजहि।।
अर्थ · Hindi
भाइन्ह सहित रामु मिलि राजहि। चले लवाइ समेत समाजहि।।
- RCM 2.275.9Open verse →
आश्रम सागर सांत रस पूरन पावन पाथु।
अर्थ · Hindi
आश्रम सागर सांत रस पूरन पावन पाथु।
- RCM 2.275.10Open verse →
सेन मनहुँ करुना सरित लिएँ जाहिं रघुनाथु।।275।।
अर्थ · Hindi
सेन मनहुँ करुना सरित लिएँ जाहिं रघुनाथु।।275।।
- RCM 2.276.1Open verse →
बोरति ग्यान बिराग करारे। बचन ससोक मिलत नद नारे।।
अर्थ · Hindi
बोरति ग्यान बिराग करारे। बचन ससोक मिलत नद नारे।।
- RCM 2.276.2Open verse →
सोच उसास समीर तंरगा। धीरज तट तरुबर कर भंगा।।
अर्थ · Hindi
सोच उसास समीर तंरगा। धीरज तट तरुबर कर भंगा।।
- RCM 2.276.3Open verse →
बिषम बिषाद तोरावति धारा। भय भ्रम भवँर अबर्त अपारा।।
अर्थ · Hindi
बिषम बिषाद तोरावति धारा। भय भ्रम भवँर अबर्त अपारा।।
- RCM 2.276.4Open verse →
केवट बुध बिद्या बड़ि नावा। सकहिं न खेइ ऐक नहिं आवा।।
अर्थ · Hindi
केवट बुध बिद्या बड़ि नावा। सकहिं न खेइ ऐक नहिं आवा।।
- RCM 2.276.5Open verse →
बनचर कोल किरात बिचारे। थके बिलोकि पथिक हियँ हारे।।
अर्थ · Hindi
बनचर कोल किरात बिचारे। थके बिलोकि पथिक हियँ हारे।।
- RCM 2.276.6Open verse →
आश्रम उदधि मिली जब जाई। मनहुँ उठेउ अंबुधि अकुलाई।।
अर्थ · Hindi
आश्रम उदधि मिली जब जाई। मनहुँ उठेउ अंबुधि अकुलाई।।
- RCM 2.276.7Open verse →
सोक बिकल दोउ राज समाजा। रहा न ग्यानु न धीरजु लाजा।।
अर्थ · Hindi
सोक बिकल दोउ राज समाजा। रहा न ग्यानु न धीरजु लाजा।।
- RCM 2.276.8Open verse →
भूप रूप गुन सील सराही। रोवहिं सोक सिंधु अवगाही।।
अर्थ · Hindi
भूप रूप गुन सील सराही। रोवहिं सोक सिंधु अवगाही।।
- RCM 2.277.1Open verse →
जासु ग्यानु रबि भव निसि नासा। बचन किरन मुनि कमल बिकासा।।
अर्थ · Hindi
जासु ग्यानु रबि भव निसि नासा। बचन किरन मुनि कमल बिकासा।।
- RCM 2.277.2Open verse →
तेहि कि मोह ममता निअराई। यह सिय राम सनेह बड़ाई।।
अर्थ · Hindi
तेहि कि मोह ममता निअराई। यह सिय राम सनेह बड़ाई।।
- RCM 2.277.3Open verse →
बिषई साधक सिद्ध सयाने। त्रिबिध जीव जग बेद बखाने।।
अर्थ · Hindi
बिषई साधक सिद्ध सयाने। त्रिबिध जीव जग बेद बखाने।।
- RCM 2.277.4Open verse →
राम सनेह सरस मन जासू। साधु सभाँ बड़ आदर तासू।।
अर्थ · Hindi
राम सनेह सरस मन जासू। साधु सभाँ बड़ आदर तासू।।
- RCM 2.277.5Open verse →
सोह न राम पेम बिनु ग्यानू। करनधार बिनु जिमि जलजानू।।
अर्थ · Hindi
सोह न राम पेम बिनु ग्यानू। करनधार बिनु जिमि जलजानू।।
- RCM 2.277.6Open verse →
मुनि बहुबिधि बिदेहु समुझाए। रामघाट सब लोग नहाए।।
अर्थ · Hindi
मुनि बहुबिधि बिदेहु समुझाए। रामघाट सब लोग नहाए।।
- RCM 2.277.7Open verse →
सकल सोक संकुल नर नारी। सो बासरु बीतेउ बिनु बारी।।
अर्थ · Hindi
सकल सोक संकुल नर नारी। सो बासरु बीतेउ बिनु बारी।।
- RCM 2.277.8Open verse →
पसु खग मृगन्ह न कीन्ह अहारू। प्रिय परिजन कर कौन बिचारू।।
अर्थ · Hindi
पसु खग मृगन्ह न कीन्ह अहारू। प्रिय परिजन कर कौन बिचारू।।
- RCM 2.277.9Open verse →
दोउ समाज निमिराजु रघुराजु नहाने प्रात।
अर्थ · Hindi
दोउ समाज निमिराजु रघुराजु नहाने प्रात।
- RCM 2.277.10Open verse →
बैठे सब बट बिटप तर मन मलीन कृस गात।।277।।
अर्थ · Hindi
बैठे सब बट बिटप तर मन मलीन कृस गात।।277।।
- RCM 2.278.1Open verse →
जे महिसुर दसरथ पुर बासी। जे मिथिलापति नगर निवासी।।
अर्थ · Hindi
जे महिसुर दसरथ पुर बासी। जे मिथिलापति नगर निवासी।।
- RCM 2.278.2Open verse →
हंस बंस गुर जनक पुरोधा। जिन्ह जग मगु परमारथु सोधा।।
अर्थ · Hindi
हंस बंस गुर जनक पुरोधा। जिन्ह जग मगु परमारथु सोधा।।
- RCM 2.278.3Open verse →
लगे कहन उपदेस अनेका। सहित धरम नय बिरति बिबेका।।
अर्थ · Hindi
लगे कहन उपदेस अनेका। सहित धरम नय बिरति बिबेका।।
- RCM 2.278.4Open verse →
कौसिक कहि कहि कथा पुरानीं। समुझाई सब सभा सुबानीं।।
अर्थ · Hindi
कौसिक कहि कहि कथा पुरानीं। समुझाई सब सभा सुबानीं।।
- RCM 2.278.5Open verse →
तब रघुनाथ कोसिकहि कहेऊ। नाथ कालि जल बिनु सबु रहेऊ।।
अर्थ · Hindi
तब रघुनाथ कोसिकहि कहेऊ। नाथ कालि जल बिनु सबु रहेऊ।।
- RCM 2.278.6Open verse →
मुनि कह उचित कहत रघुराई। गयउ बीति दिन पहर अढ़ाई।।
अर्थ · Hindi
मुनि कह उचित कहत रघुराई। गयउ बीति दिन पहर अढ़ाई।।
- RCM 2.278.7Open verse →
रिषि रुख लखि कह तेरहुतिराजू। इहाँ उचित नहिं असन अनाजू।।
अर्थ · Hindi
रिषि रुख लखि कह तेरहुतिराजू। इहाँ उचित नहिं असन अनाजू।।
- RCM 2.278.8Open verse →
कहा भूप भल सबहि सोहाना। पाइ रजायसु चले नहाना।।
अर्थ · Hindi
कहा भूप भल सबहि सोहाना। पाइ रजायसु चले नहाना।।
- RCM 2.278.9Open verse →
तेहि अवसर फल फूल दल मूल अनेक प्रकार।
अर्थ · Hindi
तेहि अवसर फल फूल दल मूल अनेक प्रकार।
- RCM 2.278.10Open verse →
लइ आए बनचर बिपुल भरि भरि काँवरि भार।।278।।
अर्थ · Hindi
लइ आए बनचर बिपुल भरि भरि काँवरि भार।।278।।
- RCM 2.279.1Open verse →
कामद मे गिरि राम प्रसादा। अवलोकत अपहरत बिषादा।।
अर्थ · Hindi
कामद मे गिरि राम प्रसादा। अवलोकत अपहरत बिषादा।।
- RCM 2.279.2Open verse →
सर सरिता बन भूमि बिभागा। जनु उमगत आनँद अनुरागा।।
अर्थ · Hindi
सर सरिता बन भूमि बिभागा। जनु उमगत आनँद अनुरागा।।
- RCM 2.279.3Open verse →
बेलि बिटप सब सफल सफूला। बोलत खग मृग अलि अनुकूला।।
अर्थ · Hindi
बेलि बिटप सब सफल सफूला। बोलत खग मृग अलि अनुकूला।।
- RCM 2.279.4Open verse →
तेहि अवसर बन अधिक उछाहू। त्रिबिध समीर सुखद सब काहू।।
अर्थ · Hindi
तेहि अवसर बन अधिक उछाहू। त्रिबिध समीर सुखद सब काहू।।
- RCM 2.279.5Open verse →
जाइ न बरनि मनोहरताई। जनु महि करति जनक पहुनाई।।
अर्थ · Hindi
जाइ न बरनि मनोहरताई। जनु महि करति जनक पहुनाई।।
- RCM 2.279.6Open verse →
तब सब लोग नहाइ नहाई। राम जनक मुनि आयसु पाई।।
अर्थ · Hindi
तब सब लोग नहाइ नहाई। राम जनक मुनि आयसु पाई।।
- RCM 2.279.7Open verse →
देखि देखि तरुबर अनुरागे। जहँ तहँ पुरजन उतरन लागे।।
अर्थ · Hindi
देखि देखि तरुबर अनुरागे। जहँ तहँ पुरजन उतरन लागे।।
- RCM 2.279.8Open verse →
दल फल मूल कंद बिधि नाना। पावन सुंदर सुधा समाना।।
अर्थ · Hindi
दल फल मूल कंद बिधि नाना। पावन सुंदर सुधा समाना।।
- RCM 2.279.9Open verse →
सादर सब कहँ रामगुर पठए भरि भरि भार।
अर्थ · Hindi
सादर सब कहँ रामगुर पठए भरि भरि भार।
- RCM 2.279.10Open verse →
पूजि पितर सुर अतिथि गुर लगे करन फरहार।।279।।
अर्थ · Hindi
पूजि पितर सुर अतिथि गुर लगे करन फरहार।।279।।
- RCM 2.280.1Open verse →
एहि बिधि बासर बीते चारी। रामु निरखि नर नारि सुखारी।।
अर्थ · Hindi
एहि बिधि बासर बीते चारी। रामु निरखि नर नारि सुखारी।।
- RCM 2.280.2Open verse →
दुहु समाज असि रुचि मन माहीं। बिनु सिय राम फिरब भल नाहीं।।
अर्थ · Hindi
दुहु समाज असि रुचि मन माहीं। बिनु सिय राम फिरब भल नाहीं।।
- RCM 2.280.3Open verse →
सीता राम संग बनबासू। कोटि अमरपुर सरिस सुपासू।।
अर्थ · Hindi
सीता राम संग बनबासू। कोटि अमरपुर सरिस सुपासू।।
- RCM 2.280.4Open verse →
परिहरि लखन रामु बैदेही। जेहि घरु भाव बाम बिधि तेही।।
अर्थ · Hindi
परिहरि लखन रामु बैदेही। जेहि घरु भाव बाम बिधि तेही।।
- RCM 2.280.5Open verse →
दाहिन दइउ होइ जब सबही। राम समीप बसिअ बन तबही।।
अर्थ · Hindi
दाहिन दइउ होइ जब सबही। राम समीप बसिअ बन तबही।।
- RCM 2.280.6Open verse →
मंदाकिनि मज्जनु तिहु काला। राम दरसु मुद मंगल माला।।
अर्थ · Hindi
मंदाकिनि मज्जनु तिहु काला। राम दरसु मुद मंगल माला।।
- RCM 2.280.7Open verse →
अटनु राम गिरि बन तापस थल। असनु अमिअ सम कंद मूल फल।।
अर्थ · Hindi
अटनु राम गिरि बन तापस थल। असनु अमिअ सम कंद मूल फल।।
- RCM 2.280.8Open verse →
सुख समेत संबत दुइ साता। पल सम होहिं न जनिअहिं जाता।।
अर्थ · Hindi
सुख समेत संबत दुइ साता। पल सम होहिं न जनिअहिं जाता।।
- RCM 2.280.9Open verse →
एहि सुख जोग न लोग सब कहहिं कहाँ अस भागु।।
अर्थ · Hindi
एहि सुख जोग न लोग सब कहहिं कहाँ अस भागु।।
- RCM 2.280.10Open verse →
सहज सुभायँ समाज दुहु राम चरन अनुरागु।।280।।
अर्थ · Hindi
सहज सुभायँ समाज दुहु राम चरन अनुरागु।।280।।
- RCM 2.281.1Open verse →
एहि बिधि सकल मनोरथ करहीं। बचन सप्रेम सुनत मन हरहीं।।
अर्थ · Hindi
एहि बिधि सकल मनोरथ करहीं। बचन सप्रेम सुनत मन हरहीं।।
- RCM 2.281.2Open verse →
सीय मातु तेहि समय पठाईं। दासीं देखि सुअवसरु आईं।।
अर्थ · Hindi
सीय मातु तेहि समय पठाईं। दासीं देखि सुअवसरु आईं।।
- RCM 2.281.3Open verse →
सावकास सुनि सब सिय सासू। आयउ जनकराज रनिवासू।।
अर्थ · Hindi
सावकास सुनि सब सिय सासू। आयउ जनकराज रनिवासू।।
- RCM 2.281.4Open verse →
कौसल्याँ सादर सनमानी। आसन दिए समय सम आनी।।
अर्थ · Hindi
कौसल्याँ सादर सनमानी। आसन दिए समय सम आनी।।
- RCM 2.281.5Open verse →
सीलु सनेह सकल दुहु ओरा। द्रवहिं देखि सुनि कुलिस कठोरा।।
अर्थ · Hindi
सीलु सनेह सकल दुहु ओरा। द्रवहिं देखि सुनि कुलिस कठोरा।।
- RCM 2.281.6Open verse →
पुलक सिथिल तन बारि बिलोचन। महि नख लिखन लगीं सब सोचन।।
अर्थ · Hindi
पुलक सिथिल तन बारि बिलोचन। महि नख लिखन लगीं सब सोचन।।
- RCM 2.281.7Open verse →
सब सिय राम प्रीति कि सि मूरती। जनु करुना बहु बेष बिसूरति।।
अर्थ · Hindi
सब सिय राम प्रीति कि सि मूरती। जनु करुना बहु बेष बिसूरति।।
- RCM 2.281.8Open verse →
सीय मातु कह बिधि बुधि बाँकी। जो पय फेनु फोर पबि टाँकी।।
अर्थ · Hindi
सीय मातु कह बिधि बुधि बाँकी। जो पय फेनु फोर पबि टाँकी।।
- RCM 2.281.9Open verse →
सुनिअ सुधा देखिअहिं गरल सब करतूति कराल।
अर्थ · Hindi
सुनिअ सुधा देखिअहिं गरल सब करतूति कराल।
- RCM 2.281.10Open verse →
जहँ तहँ काक उलूक बक मानस सकृत मराल।।281।।
अर्थ · Hindi
जहँ तहँ काक उलूक बक मानस सकृत मराल।।281।।
- RCM 2.282.1Open verse →
सुनि ससोच कह देबि सुमित्रा। बिधि गति बड़ि बिपरीत बिचित्रा।।
अर्थ · Hindi
सुनि ससोच कह देबि सुमित्रा। बिधि गति बड़ि बिपरीत बिचित्रा।।
- RCM 2.282.2Open verse →
जो सृजि पालइ हरइ बहोरी। बाल केलि सम बिधि मति भोरी।।
अर्थ · Hindi
जो सृजि पालइ हरइ बहोरी। बाल केलि सम बिधि मति भोरी।।
- RCM 2.282.3Open verse →
कौसल्या कह दोसु न काहू। करम बिबस दुख सुख छति लाहू।।
अर्थ · Hindi
कौसल्या कह दोसु न काहू। करम बिबस दुख सुख छति लाहू।।
- RCM 2.282.4Open verse →
कठिन करम गति जान बिधाता। जो सुभ असुभ सकल फल दाता।।
अर्थ · Hindi
कठिन करम गति जान बिधाता। जो सुभ असुभ सकल फल दाता।।
- RCM 2.282.5Open verse →
ईस रजाइ सीस सबही कें। उतपति थिति लय बिषहु अमी कें।।
अर्थ · Hindi
ईस रजाइ सीस सबही कें। उतपति थिति लय बिषहु अमी कें।।
- RCM 2.282.6Open verse →
देबि मोह बस सोचिअ बादी। बिधि प्रपंचु अस अचल अनादी।।
अर्थ · Hindi
देबि मोह बस सोचिअ बादी। बिधि प्रपंचु अस अचल अनादी।।
- RCM 2.282.7Open verse →
भूपति जिअब मरब उर आनी। सोचिअ सखि लखि निज हित हानी।।
अर्थ · Hindi
भूपति जिअब मरब उर आनी। सोचिअ सखि लखि निज हित हानी।।
- RCM 2.282.8Open verse →
सीय मातु कह सत्य सुबानी। सुकृती अवधि अवधपति रानी।।
अर्थ · Hindi
सीय मातु कह सत्य सुबानी। सुकृती अवधि अवधपति रानी।।
- RCM 2.282.9Open verse →
लखनु राम सिय जाहुँ बन भल परिनाम न पोचु।
अर्थ · Hindi
लखनु राम सिय जाहुँ बन भल परिनाम न पोचु।
- RCM 2.282.10Open verse →
गहबरि हियँ कह कौसिला मोहि भरत कर सोचु।।282।।
अर्थ · Hindi
गहबरि हियँ कह कौसिला मोहि भरत कर सोचु।।282।।
- RCM 2.283.1Open verse →
ईस प्रसाद असीस तुम्हारी। सुत सुतबधू देवसरि बारी।।
अर्थ · Hindi
ईस प्रसाद असीस तुम्हारी। सुत सुतबधू देवसरि बारी।।
- RCM 2.283.2Open verse →
राम सपथ मैं कीन्ह न काऊ। सो करि कहउँ सखी सति भाऊ।।
अर्थ · Hindi
राम सपथ मैं कीन्ह न काऊ। सो करि कहउँ सखी सति भाऊ।।
- RCM 2.283.3Open verse →
भरत सील गुन बिनय बड़ाई। भायप भगति भरोस भलाई।।
अर्थ · Hindi
भरत सील गुन बिनय बड़ाई। भायप भगति भरोस भलाई।।
- RCM 2.283.4Open verse →
कहत सारदहु कर मति हीचे। सागर सीप कि जाहिं उलीचे।।
अर्थ · Hindi
कहत सारदहु कर मति हीचे। सागर सीप कि जाहिं उलीचे।।
- RCM 2.283.5Open verse →
जानउँ सदा भरत कुलदीपा। बार बार मोहि कहेउ महीपा।।
अर्थ · Hindi
जानउँ सदा भरत कुलदीपा। बार बार मोहि कहेउ महीपा।।
- RCM 2.283.6Open verse →
कसें कनकु मनि पारिखि पाएँ। पुरुष परिखिअहिं समयँ सुभाएँ।
अर्थ · Hindi
कसें कनकु मनि पारिखि पाएँ। पुरुष परिखिअहिं समयँ सुभाएँ।
- RCM 2.283.7Open verse →
अनुचित आजु कहब अस मोरा। सोक सनेहँ सयानप थोरा।।
अर्थ · Hindi
अनुचित आजु कहब अस मोरा। सोक सनेहँ सयानप थोरा।।
- RCM 2.283.8Open verse →
सुनि सुरसरि सम पावनि बानी। भईं सनेह बिकल सब रानी।।
अर्थ · Hindi
सुनि सुरसरि सम पावनि बानी। भईं सनेह बिकल सब रानी।।
- RCM 2.283.9Open verse →
कौसल्या कह धीर धरि सुनहु देबि मिथिलेसि।
अर्थ · Hindi
कौसल्या कह धीर धरि सुनहु देबि मिथिलेसि।
- RCM 2.283.10Open verse →
को बिबेकनिधि बल्लभहि तुम्हहि सकइ उपदेसि।।283।।
अर्थ · Hindi
को बिबेकनिधि बल्लभहि तुम्हहि सकइ उपदेसि।।283।।
- RCM 2.284.1Open verse →
रानि राय सन अवसरु पाई। अपनी भाँति कहब समुझाई।।
अर्थ · Hindi
रानि राय सन अवसरु पाई। अपनी भाँति कहब समुझाई।।
- RCM 2.284.2Open verse →
रखिअहिं लखनु भरतु गबनहिं बन। जौं यह मत मानै महीप मन।।
अर्थ · Hindi
रखिअहिं लखनु भरतु गबनहिं बन। जौं यह मत मानै महीप मन।।
- RCM 2.284.3Open verse →
तौ भल जतनु करब सुबिचारी। मोरें सौचु भरत कर भारी।।
अर्थ · Hindi
तौ भल जतनु करब सुबिचारी। मोरें सौचु भरत कर भारी।।
- RCM 2.284.4Open verse →
गूढ़ सनेह भरत मन माही। रहें नीक मोहि लागत नाहीं।।
अर्थ · Hindi
गूढ़ सनेह भरत मन माही। रहें नीक मोहि लागत नाहीं।।
- RCM 2.284.5Open verse →
लखि सुभाउ सुनि सरल सुबानी। सब भइ मगन करुन रस रानी।।
अर्थ · Hindi
लखि सुभाउ सुनि सरल सुबानी। सब भइ मगन करुन रस रानी।।
- RCM 2.284.6Open verse →
नभ प्रसून झरि धन्य धन्य धुनि। सिथिल सनेहँ सिद्ध जोगी मुनि।।
अर्थ · Hindi
नभ प्रसून झरि धन्य धन्य धुनि। सिथिल सनेहँ सिद्ध जोगी मुनि।।
- RCM 2.284.7Open verse →
सबु रनिवासु बिथकि लखि रहेऊ। तब धरि धीर सुमित्राँ कहेऊ।।
अर्थ · Hindi
सबु रनिवासु बिथकि लखि रहेऊ। तब धरि धीर सुमित्राँ कहेऊ।।
- RCM 2.284.8Open verse →
देबि दंड जुग जामिनि बीती। राम मातु सुनी उठी सप्रीती।।
अर्थ · Hindi
देबि दंड जुग जामिनि बीती। राम मातु सुनी उठी सप्रीती।।
- RCM 2.284.9Open verse →
बेगि पाउ धारिअ थलहि कह सनेहँ सतिभाय।
अर्थ · Hindi
बेगि पाउ धारिअ थलहि कह सनेहँ सतिभाय।
- RCM 2.284.10Open verse →
हमरें तौ अब ईस गति के मिथिलेस सहाय।।284।।
अर्थ · Hindi
हमरें तौ अब ईस गति के मिथिलेस सहाय।।284।।
- RCM 2.285.1Open verse →
लखि सनेह सुनि बचन बिनीता। जनकप्रिया गह पाय पुनीता।।
अर्थ · Hindi
लखि सनेह सुनि बचन बिनीता। जनकप्रिया गह पाय पुनीता।।
- RCM 2.285.2Open verse →
देबि उचित असि बिनय तुम्हारी। दसरथ घरिनि राम महतारी।।
अर्थ · Hindi
देबि उचित असि बिनय तुम्हारी। दसरथ घरिनि राम महतारी।।
- RCM 2.285.3Open verse →
प्रभु अपने नीचहु आदरहीं। अगिनि धूम गिरि सिर तिनु धरहीं।।
अर्थ · Hindi
प्रभु अपने नीचहु आदरहीं। अगिनि धूम गिरि सिर तिनु धरहीं।।
- RCM 2.285.4Open verse →
सेवकु राउ करम मन बानी। सदा सहाय महेसु भवानी।।
अर्थ · Hindi
सेवकु राउ करम मन बानी। सदा सहाय महेसु भवानी।।
- RCM 2.285.5Open verse →
रउरे अंग जोगु जग को है। दीप सहाय कि दिनकर सोहै।।
अर्थ · Hindi
रउरे अंग जोगु जग को है। दीप सहाय कि दिनकर सोहै।।
- RCM 2.285.6Open verse →
रामु जाइ बनु करि सुर काजू। अचल अवधपुर करिहहिं राजू।।
अर्थ · Hindi
रामु जाइ बनु करि सुर काजू। अचल अवधपुर करिहहिं राजू।।
- RCM 2.285.7Open verse →
अमर नाग नर राम बाहुबल। सुख बसिहहिं अपनें अपने थल।।
अर्थ · Hindi
अमर नाग नर राम बाहुबल। सुख बसिहहिं अपनें अपने थल।।
- RCM 2.285.8Open verse →
यह सब जागबलिक कहि राखा। देबि न होइ मुधा मुनि भाषा।।
अर्थ · Hindi
यह सब जागबलिक कहि राखा। देबि न होइ मुधा मुनि भाषा।।
- RCM 2.285.9Open verse →
अस कहि पग परि पेम अति सिय हित बिनय सुनाइ।।
अर्थ · Hindi
अस कहि पग परि पेम अति सिय हित बिनय सुनाइ।।
- RCM 2.285.10Open verse →
सिय समेत सियमातु तब चली सुआयसु पाइ।।285।।
अर्थ · Hindi
सिय समेत सियमातु तब चली सुआयसु पाइ।।285।।
- RCM 2.286.1Open verse →
प्रिय परिजनहि मिली बैदेही। जो जेहि जोगु भाँति तेहि तेही।।
अर्थ · Hindi
प्रिय परिजनहि मिली बैदेही। जो जेहि जोगु भाँति तेहि तेही।।
- RCM 2.286.2Open verse →
तापस बेष जानकी देखी। भा सबु बिकल बिषाद बिसेषी।।
अर्थ · Hindi
तापस बेष जानकी देखी। भा सबु बिकल बिषाद बिसेषी।।
- RCM 2.286.3Open verse →
जनक राम गुर आयसु पाई। चले थलहि सिय देखी आई।।
अर्थ · Hindi
जनक राम गुर आयसु पाई। चले थलहि सिय देखी आई।।
- RCM 2.286.4Open verse →
लीन्हि लाइ उर जनक जानकी। पाहुन पावन पेम प्रान की।।
अर्थ · Hindi
लीन्हि लाइ उर जनक जानकी। पाहुन पावन पेम प्रान की।।
- RCM 2.286.5Open verse →
उर उमगेउ अंबुधि अनुरागू। भयउ भूप मनु मनहुँ पयागू।।
अर्थ · Hindi
उर उमगेउ अंबुधि अनुरागू। भयउ भूप मनु मनहुँ पयागू।।
- RCM 2.286.6Open verse →
सिय सनेह बटु बाढ़त जोहा। ता पर राम पेम सिसु सोहा।।
अर्थ · Hindi
सिय सनेह बटु बाढ़त जोहा। ता पर राम पेम सिसु सोहा।।
- RCM 2.286.7Open verse →
चिरजीवी मुनि ग्यान बिकल जनु। बूड़त लहेउ बाल अवलंबनु।।
अर्थ · Hindi
चिरजीवी मुनि ग्यान बिकल जनु। बूड़त लहेउ बाल अवलंबनु।।
- RCM 2.286.8Open verse →
मोह मगन मति नहिं बिदेह की। महिमा सिय रघुबर सनेह की।।
अर्थ · Hindi
मोह मगन मति नहिं बिदेह की। महिमा सिय रघुबर सनेह की।।
- RCM 2.286.9Open verse →
सिय पितु मातु सनेह बस बिकल न सकी सँभारि।
अर्थ · Hindi
सिय पितु मातु सनेह बस बिकल न सकी सँभारि।
- RCM 2.286.10Open verse →
धरनिसुताँ धीरजु धरेउ समउ सुधरमु बिचारि।।286।।
अर्थ · Hindi
धरनिसुताँ धीरजु धरेउ समउ सुधरमु बिचारि।।286।।
- RCM 2.287.1Open verse →
तापस बेष जनक सिय देखी। भयउ पेमु परितोषु बिसेषी।।
अर्थ · Hindi
तापस बेष जनक सिय देखी। भयउ पेमु परितोषु बिसेषी।।
- RCM 2.287.2Open verse →
पुत्रि पवित्र किए कुल दोऊ। सुजस धवल जगु कह सबु कोऊ।।
अर्थ · Hindi
पुत्रि पवित्र किए कुल दोऊ। सुजस धवल जगु कह सबु कोऊ।।
- RCM 2.287.3Open verse →
जिति सुरसरि कीरति सरि तोरी। गवनु कीन्ह बिधि अंड करोरी।।
अर्थ · Hindi
जिति सुरसरि कीरति सरि तोरी। गवनु कीन्ह बिधि अंड करोरी।।
- RCM 2.287.4Open verse →
गंग अवनि थल तीनि बड़ेरे। एहिं किए साधु समाज घनेरे।।
अर्थ · Hindi
गंग अवनि थल तीनि बड़ेरे। एहिं किए साधु समाज घनेरे।।
- RCM 2.287.5Open verse →
पितु कह सत्य सनेहँ सुबानी। सीय सकुच महुँ मनहुँ समानी।।
अर्थ · Hindi
पितु कह सत्य सनेहँ सुबानी। सीय सकुच महुँ मनहुँ समानी।।
- RCM 2.287.6Open verse →
पुनि पितु मातु लीन्ह उर लाई। सिख आसिष हित दीन्हि सुहाई।।
अर्थ · Hindi
पुनि पितु मातु लीन्ह उर लाई। सिख आसिष हित दीन्हि सुहाई।।
- RCM 2.287.7Open verse →
कहति न सीय सकुचि मन माहीं। इहाँ बसब रजनीं भल नाहीं।।
अर्थ · Hindi
कहति न सीय सकुचि मन माहीं। इहाँ बसब रजनीं भल नाहीं।।
- RCM 2.287.8Open verse →
लखि रुख रानि जनायउ राऊ। हृदयँ सराहत सीलु सुभाऊ।।
अर्थ · Hindi
लखि रुख रानि जनायउ राऊ। हृदयँ सराहत सीलु सुभाऊ।।
- RCM 2.287.9Open verse →
बार बार मिलि भेंट सिय बिदा कीन्ह सनमानि।
अर्थ · Hindi
बार बार मिलि भेंट सिय बिदा कीन्ह सनमानि।
- RCM 2.287.10Open verse →
कही समय सिर भरत गति रानि सुबानि सयानि।।287।।
अर्थ · Hindi
कही समय सिर भरत गति रानि सुबानि सयानि।।287।।
- RCM 2.288.1Open verse →
सुनि भूपाल भरत ब्यवहारू। सोन सुगंध सुधा ससि सारू।।
अर्थ · Hindi
सुनि भूपाल भरत ब्यवहारू। सोन सुगंध सुधा ससि सारू।।
- RCM 2.288.2Open verse →
मूदे सजल नयन पुलके तन। सुजसु सराहन लगे मुदित मन।।
अर्थ · Hindi
मूदे सजल नयन पुलके तन। सुजसु सराहन लगे मुदित मन।।
- RCM 2.288.3Open verse →
सावधान सुनु सुमुखि सुलोचनि। भरत कथा भव बंध बिमोचनि।।
अर्थ · Hindi
सावधान सुनु सुमुखि सुलोचनि। भरत कथा भव बंध बिमोचनि।।
- RCM 2.288.4Open verse →
धरम राजनय ब्रह्मबिचारू। इहाँ जथामति मोर प्रचारू।।
अर्थ · Hindi
धरम राजनय ब्रह्मबिचारू। इहाँ जथामति मोर प्रचारू।।
- RCM 2.288.5Open verse →
सो मति मोरि भरत महिमाही। कहै काह छलि छुअति न छाँही।।
अर्थ · Hindi
सो मति मोरि भरत महिमाही। कहै काह छलि छुअति न छाँही।।
- RCM 2.288.6Open verse →
बिधि गनपति अहिपति सिव सारद। कबि कोबिद बुध बुद्धि बिसारद।।
अर्थ · Hindi
बिधि गनपति अहिपति सिव सारद। कबि कोबिद बुध बुद्धि बिसारद।।
- RCM 2.288.7Open verse →
भरत चरित कीरति करतूती। धरम सील गुन बिमल बिभूती।।
अर्थ · Hindi
भरत चरित कीरति करतूती। धरम सील गुन बिमल बिभूती।।
- RCM 2.288.8Open verse →
समुझत सुनत सुखद सब काहू। सुचि सुरसरि रुचि निदर सुधाहू।।
अर्थ · Hindi
समुझत सुनत सुखद सब काहू। सुचि सुरसरि रुचि निदर सुधाहू।।
- RCM 2.288.9Open verse →
निरवधि गुन निरुपम पुरुषु भरतु भरत सम जानि।
अर्थ · Hindi
निरवधि गुन निरुपम पुरुषु भरतु भरत सम जानि।
- RCM 2.288.10Open verse →
कहिअ सुमेरु कि सेर सम कबिकुल मति सकुचानि।।288।।
अर्थ · Hindi
कहिअ सुमेरु कि सेर सम कबिकुल मति सकुचानि।।288।।
- RCM 2.289.1Open verse →
अगम सबहि बरनत बरबरनी। जिमि जलहीन मीन गमु धरनी।।
अर्थ · Hindi
अगम सबहि बरनत बरबरनी। जिमि जलहीन मीन गमु धरनी।।
- RCM 2.289.2Open verse →
भरत अमित महिमा सुनु रानी। जानहिं रामु न सकहिं बखानी।।
अर्थ · Hindi
भरत अमित महिमा सुनु रानी। जानहिं रामु न सकहिं बखानी।।
- RCM 2.289.3Open verse →
बरनि सप्रेम भरत अनुभाऊ। तिय जिय की रुचि लखि कह राऊ।।
अर्थ · Hindi
बरनि सप्रेम भरत अनुभाऊ। तिय जिय की रुचि लखि कह राऊ।।
- RCM 2.289.4Open verse →
बहुरहिं लखनु भरतु बन जाहीं। सब कर भल सब के मन माहीं।।
अर्थ · Hindi
बहुरहिं लखनु भरतु बन जाहीं। सब कर भल सब के मन माहीं।।
- RCM 2.289.5Open verse →
देबि परंतु भरत रघुबर की। प्रीति प्रतीति जाइ नहिं तरकी।।
अर्थ · Hindi
देबि परंतु भरत रघुबर की। प्रीति प्रतीति जाइ नहिं तरकी।।
- RCM 2.289.6Open verse →
भरतु अवधि सनेह ममता की। जद्यपि रामु सीम समता की।।
अर्थ · Hindi
भरतु अवधि सनेह ममता की। जद्यपि रामु सीम समता की।।
- RCM 2.289.7Open verse →
परमारथ स्वारथ सुख सारे। भरत न सपनेहुँ मनहुँ निहारे।।
अर्थ · Hindi
परमारथ स्वारथ सुख सारे। भरत न सपनेहुँ मनहुँ निहारे।।
- RCM 2.289.8Open verse →
साधन सिद्ध राम पग नेहू।।मोहि लखि परत भरत मत एहू।।
अर्थ · Hindi
साधन सिद्ध राम पग नेहू।।मोहि लखि परत भरत मत एहू।।
- RCM 2.289.9Open verse →
भोरेहुँ भरत न पेलिहहिं मनसहुँ राम रजाइ।
अर्थ · Hindi
भोरेहुँ भरत न पेलिहहिं मनसहुँ राम रजाइ।
- RCM 2.289.10Open verse →
करिअ न सोचु सनेह बस कहेउ भूप बिलखाइ।।289।।
अर्थ · Hindi
करिअ न सोचु सनेह बस कहेउ भूप बिलखाइ।।289।।
- RCM 2.290.1Open verse →
राम भरत गुन गनत सप्रीती। निसि दंपतिहि पलक सम बीती।।
अर्थ · Hindi
राम भरत गुन गनत सप्रीती। निसि दंपतिहि पलक सम बीती।।
- RCM 2.290.2Open verse →
राज समाज प्रात जुग जागे। न्हाइ न्हाइ सुर पूजन लागे।।
अर्थ · Hindi
राज समाज प्रात जुग जागे। न्हाइ न्हाइ सुर पूजन लागे।।
- RCM 2.290.3Open verse →
गे नहाइ गुर पहीं रघुराई। बंदि चरन बोले रुख पाई।।
अर्थ · Hindi
गे नहाइ गुर पहीं रघुराई। बंदि चरन बोले रुख पाई।।
- RCM 2.290.4Open verse →
नाथ भरतु पुरजन महतारी। सोक बिकल बनबास दुखारी।।
अर्थ · Hindi
नाथ भरतु पुरजन महतारी। सोक बिकल बनबास दुखारी।।
- RCM 2.290.5Open verse →
सहित समाज राउ मिथिलेसू। बहुत दिवस भए सहत कलेसू।।
अर्थ · Hindi
सहित समाज राउ मिथिलेसू। बहुत दिवस भए सहत कलेसू।।
- RCM 2.290.6Open verse →
उचित होइ सोइ कीजिअ नाथा। हित सबही कर रौरें हाथा।।
अर्थ · Hindi
उचित होइ सोइ कीजिअ नाथा। हित सबही कर रौरें हाथा।।
- RCM 2.290.7Open verse →
अस कहि अति सकुचे रघुराऊ। मुनि पुलके लखि सीलु सुभाऊ।।
अर्थ · Hindi
अस कहि अति सकुचे रघुराऊ। मुनि पुलके लखि सीलु सुभाऊ।।
- RCM 2.290.8Open verse →
तुम्ह बिनु राम सकल सुख साजा। नरक सरिस दुहु राज समाजा।।
अर्थ · Hindi
तुम्ह बिनु राम सकल सुख साजा। नरक सरिस दुहु राज समाजा।।
- RCM 2.290.9Open verse →
प्रान प्रान के जीव के जिव सुख के सुख राम।
अर्थ · Hindi
प्रान प्रान के जीव के जिव सुख के सुख राम।
- RCM 2.290.10Open verse →
तुम्ह तजि तात सोहात गृह जिन्हहि तिन्हहिं बिधि बाम।।290।।
अर्थ · Hindi
तुम्ह तजि तात सोहात गृह जिन्हहि तिन्हहिं बिधि बाम।।290।।
- RCM 2.291.1Open verse →
सो सुखु करमु धरमु जरि जाऊ। जहँ न राम पद पंकज भाऊ।।
अर्थ · Hindi
सो सुखु करमु धरमु जरि जाऊ। जहँ न राम पद पंकज भाऊ।।
- RCM 2.291.2Open verse →
जोगु कुजोगु ग्यानु अग्यानू। जहँ नहिं राम पेम परधानू।।
अर्थ · Hindi
जोगु कुजोगु ग्यानु अग्यानू। जहँ नहिं राम पेम परधानू।।
- RCM 2.291.3Open verse →
तुम्ह बिनु दुखी सुखी तुम्ह तेहीं। तुम्ह जानहु जिय जो जेहि केहीं।।
अर्थ · Hindi
तुम्ह बिनु दुखी सुखी तुम्ह तेहीं। तुम्ह जानहु जिय जो जेहि केहीं।।
- RCM 2.291.4Open verse →
राउर आयसु सिर सबही कें। बिदित कृपालहि गति सब नीकें।।
अर्थ · Hindi
राउर आयसु सिर सबही कें। बिदित कृपालहि गति सब नीकें।।
- RCM 2.291.5Open verse →
आपु आश्रमहि धारिअ पाऊ। भयउ सनेह सिथिल मुनिराऊ।।
अर्थ · Hindi
आपु आश्रमहि धारिअ पाऊ। भयउ सनेह सिथिल मुनिराऊ।।
- RCM 2.291.6Open verse →
करि प्रनाम तब रामु सिधाए। रिषि धरि धीर जनक पहिं आए।।
अर्थ · Hindi
करि प्रनाम तब रामु सिधाए। रिषि धरि धीर जनक पहिं आए।।
- RCM 2.291.7Open verse →
राम बचन गुरु नृपहि सुनाए। सील सनेह सुभायँ सुहाए।।
अर्थ · Hindi
राम बचन गुरु नृपहि सुनाए। सील सनेह सुभायँ सुहाए।।
- RCM 2.291.8Open verse →
महाराज अब कीजिअ सोई। सब कर धरम सहित हित होई।।
अर्थ · Hindi
महाराज अब कीजिअ सोई। सब कर धरम सहित हित होई।।
- RCM 2.291.9Open verse →
ग्यान निधान सुजान सुचि धरम धीर नरपाल।
अर्थ · Hindi
ग्यान निधान सुजान सुचि धरम धीर नरपाल।
- RCM 2.291.10Open verse →
तुम्ह बिनु असमंजस समन को समरथ एहि काल।।291।।
अर्थ · Hindi
तुम्ह बिनु असमंजस समन को समरथ एहि काल।।291।।
- RCM 2.292.1Open verse →
सुनि मुनि बचन जनक अनुरागे। लखि गति ग्यानु बिरागु बिरागे।।
अर्थ · Hindi
सुनि मुनि बचन जनक अनुरागे। लखि गति ग्यानु बिरागु बिरागे।।
- RCM 2.292.2Open verse →
सिथिल सनेहँ गुनत मन माहीं। आए इहाँ कीन्ह भल नाही।।
अर्थ · Hindi
सिथिल सनेहँ गुनत मन माहीं। आए इहाँ कीन्ह भल नाही।।
- RCM 2.292.3Open verse →
रामहि रायँ कहेउ बन जाना। कीन्ह आपु प्रिय प्रेम प्रवाना।।
अर्थ · Hindi
रामहि रायँ कहेउ बन जाना। कीन्ह आपु प्रिय प्रेम प्रवाना।।
- RCM 2.292.4Open verse →
हम अब बन तें बनहि पठाई। प्रमुदित फिरब बिबेक बड़ाई।।
अर्थ · Hindi
हम अब बन तें बनहि पठाई। प्रमुदित फिरब बिबेक बड़ाई।।
- RCM 2.292.5Open verse →
तापस मुनि महिसुर सुनि देखी। भए प्रेम बस बिकल बिसेषी।।
अर्थ · Hindi
तापस मुनि महिसुर सुनि देखी। भए प्रेम बस बिकल बिसेषी।।
- RCM 2.292.6Open verse →
समउ समुझि धरि धीरजु राजा। चले भरत पहिं सहित समाजा।।
अर्थ · Hindi
समउ समुझि धरि धीरजु राजा। चले भरत पहिं सहित समाजा।।
- RCM 2.292.7Open verse →
भरत आइ आगें भइ लीन्हे। अवसर सरिस सुआसन दीन्हे।।
अर्थ · Hindi
भरत आइ आगें भइ लीन्हे। अवसर सरिस सुआसन दीन्हे।।
- RCM 2.292.8Open verse →
तात भरत कह तेरहुति राऊ। तुम्हहि बिदित रघुबीर सुभाऊ।।
अर्थ · Hindi
तात भरत कह तेरहुति राऊ। तुम्हहि बिदित रघुबीर सुभाऊ।।
- RCM 2.292.9Open verse →
राम सत्यब्रत धरम रत सब कर सीलु सनेहु।।
अर्थ · Hindi
राम सत्यब्रत धरम रत सब कर सीलु सनेहु।।
- RCM 2.292.10Open verse →
संकट सहत सकोच बस कहिअ जो आयसु देहु।।292।।
अर्थ · Hindi
संकट सहत सकोच बस कहिअ जो आयसु देहु।।292।।
- RCM 2.293.1Open verse →
सुनि तन पुलकि नयन भरि बारी। बोले भरतु धीर धरि भारी।।
अर्थ · Hindi
सुनि तन पुलकि नयन भरि बारी। बोले भरतु धीर धरि भारी।।
- RCM 2.293.2Open verse →
प्रभु प्रिय पूज्य पिता सम आपू। कुलगुरु सम हित माय न बापू।।
अर्थ · Hindi
प्रभु प्रिय पूज्य पिता सम आपू। कुलगुरु सम हित माय न बापू।।
- RCM 2.293.3Open verse →
कौसिकादि मुनि सचिव समाजू। ग्यान अंबुनिधि आपुनु आजू।।
अर्थ · Hindi
कौसिकादि मुनि सचिव समाजू। ग्यान अंबुनिधि आपुनु आजू।।
- RCM 2.293.4Open verse →
सिसु सेवक आयसु अनुगामी। जानि मोहि सिख देइअ स्वामी।।
अर्थ · Hindi
सिसु सेवक आयसु अनुगामी। जानि मोहि सिख देइअ स्वामी।।
- RCM 2.293.5Open verse →
एहिं समाज थल बूझब राउर। मौन मलिन मैं बोलब बाउर।।
अर्थ · Hindi
एहिं समाज थल बूझब राउर। मौन मलिन मैं बोलब बाउर।।
- RCM 2.293.6Open verse →
छोटे बदन कहउँ बड़ि बाता। छमब तात लखि बाम बिधाता।।
अर्थ · Hindi
छोटे बदन कहउँ बड़ि बाता। छमब तात लखि बाम बिधाता।।
- RCM 2.293.7Open verse →
आगम निगम प्रसिद्ध पुराना। सेवाधरमु कठिन जगु जाना।।
अर्थ · Hindi
आगम निगम प्रसिद्ध पुराना। सेवाधरमु कठिन जगु जाना।।
- RCM 2.293.8Open verse →
स्वामि धरम स्वारथहि बिरोधू। बैरु अंध प्रेमहि न प्रबोधू।।
अर्थ · Hindi
स्वामि धरम स्वारथहि बिरोधू। बैरु अंध प्रेमहि न प्रबोधू।।
- RCM 2.293.9Open verse →
राखि राम रुख धरमु ब्रतु पराधीन मोहि जानि।
अर्थ · Hindi
राखि राम रुख धरमु ब्रतु पराधीन मोहि जानि।
- RCM 2.293.10Open verse →
सब कें संमत सर्ब हित करिअ पेमु पहिचानि।।293।।
अर्थ · Hindi
सब कें संमत सर्ब हित करिअ पेमु पहिचानि।।293।।
- RCM 2.294.1Open verse →
भरत बचन सुनि देखि सुभाऊ। सहित समाज सराहत राऊ।।
अर्थ · Hindi
भरत बचन सुनि देखि सुभाऊ। सहित समाज सराहत राऊ।।
- RCM 2.294.2Open verse →
सुगम अगम मृदु मंजु कठोरे। अरथु अमित अति आखर थोरे।।
अर्थ · Hindi
सुगम अगम मृदु मंजु कठोरे। अरथु अमित अति आखर थोरे।।
- RCM 2.294.3Open verse →
ज्यौ मुख मुकुर मुकुरु निज पानी। गहि न जाइ अस अदभुत बानी।।
अर्थ · Hindi
ज्यौ मुख मुकुर मुकुरु निज पानी। गहि न जाइ अस अदभुत बानी।।
- RCM 2.294.4Open verse →
भूप भरत मुनि सहित समाजू। गे जहँ बिबुध कुमुद द्विजराजू।।
अर्थ · Hindi
भूप भरत मुनि सहित समाजू। गे जहँ बिबुध कुमुद द्विजराजू।।
- RCM 2.294.5Open verse →
सुनि सुधि सोच बिकल सब लोगा। मनहुँ मीनगन नव जल जोगा।।
अर्थ · Hindi
सुनि सुधि सोच बिकल सब लोगा। मनहुँ मीनगन नव जल जोगा।।
- RCM 2.294.6Open verse →
देवँ प्रथम कुलगुर गति देखी। निरखि बिदेह सनेह बिसेषी।।
अर्थ · Hindi
देवँ प्रथम कुलगुर गति देखी। निरखि बिदेह सनेह बिसेषी।।
- RCM 2.294.7Open verse →
राम भगतिमय भरतु निहारे। सुर स्वारथी हहरि हियँ हारे।।
अर्थ · Hindi
राम भगतिमय भरतु निहारे। सुर स्वारथी हहरि हियँ हारे।।
- RCM 2.294.8Open verse →
सब कोउ राम पेममय पेखा। भउ अलेख सोच बस लेखा।।
अर्थ · Hindi
सब कोउ राम पेममय पेखा। भउ अलेख सोच बस लेखा।।
- RCM 2.294.9Open verse →
रामु सनेह सकोच बस कह ससोच सुरराज।
अर्थ · Hindi
रामु सनेह सकोच बस कह ससोच सुरराज।
- RCM 2.294.10Open verse →
रचहु प्रपंचहि पंच मिलि नाहिं त भयउ अकाजु।।294।।
अर्थ · Hindi
रचहु प्रपंचहि पंच मिलि नाहिं त भयउ अकाजु।।294।।
- RCM 2.295.1Open verse →
सुरन्ह सुमिरि सारदा सराही। देबि देव सरनागत पाही।।
अर्थ · Hindi
सुरन्ह सुमिरि सारदा सराही। देबि देव सरनागत पाही।।
- RCM 2.295.2Open verse →
फेरि भरत मति करि निज माया। पालु बिबुध कुल करि छल छाया।।
अर्थ · Hindi
फेरि भरत मति करि निज माया। पालु बिबुध कुल करि छल छाया।।
- RCM 2.295.3Open verse →
बिबुध बिनय सुनि देबि सयानी। बोली सुर स्वारथ जड़ जानी।।
अर्थ · Hindi
बिबुध बिनय सुनि देबि सयानी। बोली सुर स्वारथ जड़ जानी।।
- RCM 2.295.4Open verse →
मो सन कहहु भरत मति फेरू। लोचन सहस न सूझ सुमेरू।।
अर्थ · Hindi
मो सन कहहु भरत मति फेरू। लोचन सहस न सूझ सुमेरू।।
- RCM 2.295.5Open verse →
बिधि हरि हर माया बड़ि भारी। सोउ न भरत मति सकइ निहारी।।
अर्थ · Hindi
बिधि हरि हर माया बड़ि भारी। सोउ न भरत मति सकइ निहारी।।
- RCM 2.295.6Open verse →
सो मति मोहि कहत करु भोरी। चंदिनि कर कि चंडकर चोरी।।
अर्थ · Hindi
सो मति मोहि कहत करु भोरी। चंदिनि कर कि चंडकर चोरी।।
- RCM 2.295.7Open verse →
भरत हृदयँ सिय राम निवासू। तहँ कि तिमिर जहँ तरनि प्रकासू।।
अर्थ · Hindi
भरत हृदयँ सिय राम निवासू। तहँ कि तिमिर जहँ तरनि प्रकासू।।
- RCM 2.295.8Open verse →
अस कहि सारद गइ बिधि लोका। बिबुध बिकल निसि मानहुँ कोका।।
अर्थ · Hindi
अस कहि सारद गइ बिधि लोका। बिबुध बिकल निसि मानहुँ कोका।।
- RCM 2.295.9Open verse →
सुर स्वारथी मलीन मन कीन्ह कुमंत्र कुठाटु।।
अर्थ · Hindi
सुर स्वारथी मलीन मन कीन्ह कुमंत्र कुठाटु।।
- RCM 2.295.10Open verse →
रचि प्रपंच माया प्रबल भय भ्रम अरति उचाटु।।295।।
अर्थ · Hindi
रचि प्रपंच माया प्रबल भय भ्रम अरति उचाटु।।295।।
- RCM 2.296.1Open verse →
करि कुचालि सोचत सुरराजू। भरत हाथ सबु काजु अकाजू।।
अर्थ · Hindi
करि कुचालि सोचत सुरराजू। भरत हाथ सबु काजु अकाजू।।
- RCM 2.296.2Open verse →
गए जनकु रघुनाथ समीपा। सनमाने सब रबिकुल दीपा।।
अर्थ · Hindi
गए जनकु रघुनाथ समीपा। सनमाने सब रबिकुल दीपा।।
- RCM 2.296.3Open verse →
समय समाज धरम अबिरोधा। बोले तब रघुबंस पुरोधा।।
अर्थ · Hindi
समय समाज धरम अबिरोधा। बोले तब रघुबंस पुरोधा।।
- RCM 2.296.4Open verse →
जनक भरत संबादु सुनाई। भरत कहाउति कही सुहाई।।
अर्थ · Hindi
जनक भरत संबादु सुनाई। भरत कहाउति कही सुहाई।।
- RCM 2.296.5Open verse →
तात राम जस आयसु देहू। सो सबु करै मोर मत एहू।।
अर्थ · Hindi
तात राम जस आयसु देहू। सो सबु करै मोर मत एहू।।
- RCM 2.296.6Open verse →
सुनि रघुनाथ जोरि जुग पानी। बोले सत्य सरल मृदु बानी।।
अर्थ · Hindi
सुनि रघुनाथ जोरि जुग पानी। बोले सत्य सरल मृदु बानी।।
- RCM 2.296.7Open verse →
बिद्यमान आपुनि मिथिलेसू। मोर कहब सब भाँति भदेसू।।
अर्थ · Hindi
बिद्यमान आपुनि मिथिलेसू। मोर कहब सब भाँति भदेसू।।
- RCM 2.296.8Open verse →
राउर राय रजायसु होई। राउरि सपथ सही सिर सोई।।
अर्थ · Hindi
राउर राय रजायसु होई। राउरि सपथ सही सिर सोई।।
- RCM 2.296.9Open verse →
राम सपथ सुनि मुनि जनकु सकुचे सभा समेत।
अर्थ · Hindi
राम सपथ सुनि मुनि जनकु सकुचे सभा समेत।
- RCM 2.296.10Open verse →
सकल बिलोकत भरत मुखु बनइ न उतरु देत।।296।।
अर्थ · Hindi
सकल बिलोकत भरत मुखु बनइ न उतरु देत।।296।।
- RCM 2.297.1Open verse →
सभा सकुच बस भरत निहारी। रामबंधु धरि धीरजु भारी।।
अर्थ · Hindi
सभा सकुच बस भरत निहारी। रामबंधु धरि धीरजु भारी।।
- RCM 2.297.2Open verse →
कुसमउ देखि सनेहु सँभारा। बढ़त बिंधि जिमि घटज निवारा।।
अर्थ · Hindi
कुसमउ देखि सनेहु सँभारा। बढ़त बिंधि जिमि घटज निवारा।।
- RCM 2.297.3Open verse →
सोक कनकलोचन मति छोनी। हरी बिमल गुन गन जगजोनी।।
अर्थ · Hindi
सोक कनकलोचन मति छोनी। हरी बिमल गुन गन जगजोनी।।
- RCM 2.297.4Open verse →
भरत बिबेक बराहँ बिसाला। अनायास उधरी तेहि काला।।
अर्थ · Hindi
भरत बिबेक बराहँ बिसाला। अनायास उधरी तेहि काला।।
- RCM 2.297.5Open verse →
करि प्रनामु सब कहँ कर जोरे। रामु राउ गुर साधु निहोरे।।
अर्थ · Hindi
करि प्रनामु सब कहँ कर जोरे। रामु राउ गुर साधु निहोरे।।
- RCM 2.297.6Open verse →
छमब आजु अति अनुचित मोरा। कहउँ बदन मृदु बचन कठोरा।।
अर्थ · Hindi
छमब आजु अति अनुचित मोरा। कहउँ बदन मृदु बचन कठोरा।।
- RCM 2.297.7Open verse →
हियँ सुमिरी सारदा सुहाई। मानस तें मुख पंकज आई।।
अर्थ · Hindi
हियँ सुमिरी सारदा सुहाई। मानस तें मुख पंकज आई।।
- RCM 2.297.8Open verse →
बिमल बिबेक धरम नय साली। भरत भारती मंजु मराली।।
अर्थ · Hindi
बिमल बिबेक धरम नय साली। भरत भारती मंजु मराली।।
- RCM 2.297.9Open verse →
निरखि बिबेक बिलोचनन्हि सिथिल सनेहँ समाजु।
अर्थ · Hindi
निरखि बिबेक बिलोचनन्हि सिथिल सनेहँ समाजु।
- RCM 2.297.10Open verse →
करि प्रनामु बोले भरतु सुमिरि सीय रघुराजु।।297।।
अर्थ · Hindi
करि प्रनामु बोले भरतु सुमिरि सीय रघुराजु।।297।।
- RCM 2.298.1Open verse →
प्रभु पितु मातु सुह्रद गुर स्वामी। पूज्य परम हित अतंरजामी।।
अर्थ · Hindi
प्रभु पितु मातु सुह्रद गुर स्वामी। पूज्य परम हित अतंरजामी।।
- RCM 2.298.2Open verse →
सरल सुसाहिबु सील निधानू। प्रनतपाल सर्बग्य सुजानू।।
अर्थ · Hindi
सरल सुसाहिबु सील निधानू। प्रनतपाल सर्बग्य सुजानू।।
- RCM 2.298.3Open verse →
समरथ सरनागत हितकारी। गुनगाहकु अवगुन अघ हारी।।
अर्थ · Hindi
समरथ सरनागत हितकारी। गुनगाहकु अवगुन अघ हारी।।
- RCM 2.298.4Open verse →
स्वामि गोसाँइहि सरिस गोसाई। मोहि समान मैं साइँ दोहाई।।
अर्थ · Hindi
स्वामि गोसाँइहि सरिस गोसाई। मोहि समान मैं साइँ दोहाई।।
- RCM 2.298.5Open verse →
प्रभु पितु बचन मोह बस पेली। आयउँ इहाँ समाजु सकेली।।
अर्थ · Hindi
प्रभु पितु बचन मोह बस पेली। आयउँ इहाँ समाजु सकेली।।
- RCM 2.298.6Open verse →
जग भल पोच ऊँच अरु नीचू। अमिअ अमरपद माहुरु मीचू।।
अर्थ · Hindi
जग भल पोच ऊँच अरु नीचू। अमिअ अमरपद माहुरु मीचू।।
- RCM 2.298.7Open verse →
राम रजाइ मेट मन माहीं। देखा सुना कतहुँ कोउ नाहीं।।
अर्थ · Hindi
राम रजाइ मेट मन माहीं। देखा सुना कतहुँ कोउ नाहीं।।
- RCM 2.298.8Open verse →
सो मैं सब बिधि कीन्हि ढिठाई। प्रभु मानी सनेह सेवकाई।।
अर्थ · Hindi
सो मैं सब बिधि कीन्हि ढिठाई। प्रभु मानी सनेह सेवकाई।।
- RCM 2.298.9Open verse →
कृपाँ भलाई आपनी नाथ कीन्ह भल मोर।
अर्थ · Hindi
कृपाँ भलाई आपनी नाथ कीन्ह भल मोर।
- RCM 2.298.10Open verse →
दूषन भे भूषन सरिस सुजसु चारु चहु ओर।।298।।
अर्थ · Hindi
दूषन भे भूषन सरिस सुजसु चारु चहु ओर।।298।।
- RCM 2.299.1Open verse →
राउरि रीति सुबानि बड़ाई। जगत बिदित निगमागम गाई।।
अर्थ · Hindi
राउरि रीति सुबानि बड़ाई। जगत बिदित निगमागम गाई।।
- RCM 2.299.2Open verse →
कूर कुटिल खल कुमति कलंकी। नीच निसील निरीस निसंकी।।
अर्थ · Hindi
कूर कुटिल खल कुमति कलंकी। नीच निसील निरीस निसंकी।।
- RCM 2.299.3Open verse →
तेउ सुनि सरन सामुहें आए। सकृत प्रनामु किहें अपनाए।।
अर्थ · Hindi
तेउ सुनि सरन सामुहें आए। सकृत प्रनामु किहें अपनाए।।
- RCM 2.299.4Open verse →
देखि दोष कबहुँ न उर आने। सुनि गुन साधु समाज बखाने।।
अर्थ · Hindi
देखि दोष कबहुँ न उर आने। सुनि गुन साधु समाज बखाने।।
- RCM 2.299.5Open verse →
को साहिब सेवकहि नेवाजी। आपु समाज साज सब साजी।।
अर्थ · Hindi
को साहिब सेवकहि नेवाजी। आपु समाज साज सब साजी।।
- RCM 2.299.6Open verse →
निज करतूति न समुझिअ सपनें। सेवक सकुच सोचु उर अपनें।।
अर्थ · Hindi
निज करतूति न समुझिअ सपनें। सेवक सकुच सोचु उर अपनें।।
- RCM 2.299.7Open verse →
सो गोसाइँ नहि दूसर कोपी। भुजा उठाइ कहउँ पन रोपी।।
अर्थ · Hindi
सो गोसाइँ नहि दूसर कोपी। भुजा उठाइ कहउँ पन रोपी।।
- RCM 2.299.8Open verse →
पसु नाचत सुक पाठ प्रबीना। गुन गति नट पाठक आधीना।।
अर्थ · Hindi
पसु नाचत सुक पाठ प्रबीना। गुन गति नट पाठक आधीना।।
- RCM 2.299.9Open verse →
यों सुधारि सनमानि जन किए साधु सिरमोर।
अर्थ · Hindi
यों सुधारि सनमानि जन किए साधु सिरमोर।
- RCM 2.299.10Open verse →
को कृपाल बिनु पालिहै बिरिदावलि बरजोर।।299।।
अर्थ · Hindi
को कृपाल बिनु पालिहै बिरिदावलि बरजोर।।299।।
- RCM 2.300.1Open verse →
सोक सनेहँ कि बाल सुभाएँ। आयउँ लाइ रजायसु बाएँ।।
अर्थ · Hindi
सोक सनेहँ कि बाल सुभाएँ। आयउँ लाइ रजायसु बाएँ।।
- RCM 2.300.2Open verse →
तबहुँ कृपाल हेरि निज ओरा। सबहि भाँति भल मानेउ मोरा।।
अर्थ · Hindi
तबहुँ कृपाल हेरि निज ओरा। सबहि भाँति भल मानेउ मोरा।।
- RCM 2.300.3Open verse →
देखेउँ पाय सुमंगल मूला। जानेउँ स्वामि सहज अनुकूला।।
अर्थ · Hindi
देखेउँ पाय सुमंगल मूला। जानेउँ स्वामि सहज अनुकूला।।
- RCM 2.300.4Open verse →
बड़ें समाज बिलोकेउँ भागू। बड़ीं चूक साहिब अनुरागू।।
अर्थ · Hindi
बड़ें समाज बिलोकेउँ भागू। बड़ीं चूक साहिब अनुरागू।।
- RCM 2.300.5Open verse →
कृपा अनुग्रह अंगु अघाई। कीन्हि कृपानिधि सब अधिकाई।।
अर्थ · Hindi
कृपा अनुग्रह अंगु अघाई। कीन्हि कृपानिधि सब अधिकाई।।
- RCM 2.300.6Open verse →
राखा मोर दुलार गोसाईं। अपनें सील सुभायँ भलाईं।।
अर्थ · Hindi
राखा मोर दुलार गोसाईं। अपनें सील सुभायँ भलाईं।।
- RCM 2.300.7Open verse →
नाथ निपट मैं कीन्हि ढिठाई। स्वामि समाज सकोच बिहाई।।
अर्थ · Hindi
नाथ निपट मैं कीन्हि ढिठाई। स्वामि समाज सकोच बिहाई।।
- RCM 2.300.8Open verse →
अबिनय बिनय जथारुचि बानी। छमिहि देउ अति आरति जानी।।
अर्थ · Hindi
अबिनय बिनय जथारुचि बानी। छमिहि देउ अति आरति जानी।।
- RCM 2.300.9Open verse →
सुह्रद सुजान सुसाहिबहि बहुत कहब बड़ि खोरि।
अर्थ · Hindi
सुह्रद सुजान सुसाहिबहि बहुत कहब बड़ि खोरि।
- RCM 2.300.10Open verse →
आयसु देइअ देव अब सबइ सुधारी मोरि।।300।।
अर्थ · Hindi
आयसु देइअ देव अब सबइ सुधारी मोरि।।300।।
- RCM 2.301.1Open verse →
प्रभु पद पदुम पराग दोहाई। सत्य सुकृत सुख सीवँ सुहाई।।
अर्थ · Hindi
प्रभु पद पदुम पराग दोहाई। सत्य सुकृत सुख सीवँ सुहाई।।
- RCM 2.301.2Open verse →
सो करि कहउँ हिए अपने की। रुचि जागत सोवत सपने की।।
अर्थ · Hindi
सो करि कहउँ हिए अपने की। रुचि जागत सोवत सपने की।।
- RCM 2.301.3Open verse →
सहज सनेहँ स्वामि सेवकाई। स्वारथ छल फल चारि बिहाई।।
अर्थ · Hindi
सहज सनेहँ स्वामि सेवकाई। स्वारथ छल फल चारि बिहाई।।
- RCM 2.301.4Open verse →
अग्या सम न सुसाहिब सेवा। सो प्रसादु जन पावै देवा।।
अर्थ · Hindi
अग्या सम न सुसाहिब सेवा। सो प्रसादु जन पावै देवा।।
- RCM 2.301.5Open verse →
अस कहि प्रेम बिबस भए भारी। पुलक सरीर बिलोचन बारी।।
अर्थ · Hindi
अस कहि प्रेम बिबस भए भारी। पुलक सरीर बिलोचन बारी।।
- RCM 2.301.6Open verse →
प्रभु पद कमल गहे अकुलाई। समउ सनेहु न सो कहि जाई।।
अर्थ · Hindi
प्रभु पद कमल गहे अकुलाई। समउ सनेहु न सो कहि जाई।।
- RCM 2.301.7Open verse →
कृपासिंधु सनमानि सुबानी। बैठाए समीप गहि पानी।।
अर्थ · Hindi
कृपासिंधु सनमानि सुबानी। बैठाए समीप गहि पानी।।
- RCM 2.301.8Open verse →
भरत बिनय सुनि देखि सुभाऊ। सिथिल सनेहँ सभा रघुराऊ।।
अर्थ · Hindi
भरत बिनय सुनि देखि सुभाऊ। सिथिल सनेहँ सभा रघुराऊ।।
- RCM 2.302.1Open verse →
कपट कुचालि सीवँ सुरराजू। पर अकाज प्रिय आपन काजू।।
अर्थ · Hindi
कपट कुचालि सीवँ सुरराजू। पर अकाज प्रिय आपन काजू।।
- RCM 2.302.2Open verse →
काक समान पाकरिपु रीती। छली मलीन कतहुँ न प्रतीती।।
अर्थ · Hindi
काक समान पाकरिपु रीती। छली मलीन कतहुँ न प्रतीती।।
- RCM 2.302.3Open verse →
प्रथम कुमत करि कपटु सँकेला। सो उचाटु सब कें सिर मेला।।
अर्थ · Hindi
प्रथम कुमत करि कपटु सँकेला। सो उचाटु सब कें सिर मेला।।
- RCM 2.302.4Open verse →
सुरमायाँ सब लोग बिमोहे। राम प्रेम अतिसय न बिछोहे।।
अर्थ · Hindi
सुरमायाँ सब लोग बिमोहे। राम प्रेम अतिसय न बिछोहे।।
- RCM 2.302.5Open verse →
भय उचाट बस मन थिर नाहीं। छन बन रुचि छन सदन सोहाहीं।।
अर्थ · Hindi
भय उचाट बस मन थिर नाहीं। छन बन रुचि छन सदन सोहाहीं।।
- RCM 2.302.6Open verse →
दुबिध मनोगति प्रजा दुखारी। सरित सिंधु संगम जनु बारी।।
अर्थ · Hindi
दुबिध मनोगति प्रजा दुखारी। सरित सिंधु संगम जनु बारी।।
- RCM 2.302.7Open verse →
दुचित कतहुँ परितोषु न लहहीं। एक एक सन मरमु न कहहीं।।
अर्थ · Hindi
दुचित कतहुँ परितोषु न लहहीं। एक एक सन मरमु न कहहीं।।
- RCM 2.302.8Open verse →
लखि हियँ हँसि कह कृपानिधानू। सरिस स्वान मघवान जुबानू।।
अर्थ · Hindi
लखि हियँ हँसि कह कृपानिधानू। सरिस स्वान मघवान जुबानू।।
- RCM 2.302.9Open verse →
भरतु जनकु मुनिजन सचिव साधु सचेत बिहाइ।
अर्थ · Hindi
भरतु जनकु मुनिजन सचिव साधु सचेत बिहाइ।
- RCM 2.302.10Open verse →
लागि देवमाया सबहि जथाजोगु जनु पाइ।।302।।
अर्थ · Hindi
लागि देवमाया सबहि जथाजोगु जनु पाइ।।302।।
- RCM 2.303.1Open verse →
कृपासिंधु लखि लोग दुखारे। निज सनेहँ सुरपति छल भारे।।
अर्थ · Hindi
कृपासिंधु लखि लोग दुखारे। निज सनेहँ सुरपति छल भारे।।
- RCM 2.303.2Open verse →
सभा राउ गुर महिसुर मंत्री। भरत भगति सब कै मति जंत्री।।
अर्थ · Hindi
सभा राउ गुर महिसुर मंत्री। भरत भगति सब कै मति जंत्री।।
- RCM 2.303.3Open verse →
रामहि चितवत चित्र लिखे से। सकुचत बोलत बचन सिखे से।।
अर्थ · Hindi
रामहि चितवत चित्र लिखे से। सकुचत बोलत बचन सिखे से।।
- RCM 2.303.4Open verse →
भरत प्रीति नति बिनय बड़ाई। सुनत सुखद बरनत कठिनाई।।
अर्थ · Hindi
भरत प्रीति नति बिनय बड़ाई। सुनत सुखद बरनत कठिनाई।।
- RCM 2.303.5Open verse →
जासु बिलोकि भगति लवलेसू। प्रेम मगन मुनिगन मिथिलेसू।।
अर्थ · Hindi
जासु बिलोकि भगति लवलेसू। प्रेम मगन मुनिगन मिथिलेसू।।
- RCM 2.303.6Open verse →
महिमा तासु कहै किमि तुलसी। भगति सुभायँ सुमति हियँ हुलसी।।
अर्थ · Hindi
महिमा तासु कहै किमि तुलसी। भगति सुभायँ सुमति हियँ हुलसी।।
- RCM 2.303.7Open verse →
आपु छोटि महिमा बड़ि जानी। कबिकुल कानि मानि सकुचानी।।
अर्थ · Hindi
आपु छोटि महिमा बड़ि जानी। कबिकुल कानि मानि सकुचानी।।
- RCM 2.303.8Open verse →
कहि न सकति गुन रुचि अधिकाई। मति गति बाल बचन की नाई।।
अर्थ · Hindi
कहि न सकति गुन रुचि अधिकाई। मति गति बाल बचन की नाई।।
- RCM 2.303.9Open verse →
भरत बिमल जसु बिमल बिधु सुमति चकोरकुमारि।
अर्थ · Hindi
भरत बिमल जसु बिमल बिधु सुमति चकोरकुमारि।
- RCM 2.303.10Open verse →
उदित बिमल जन हृदय नभ एकटक रही निहारि।।303।।
अर्थ · Hindi
उदित बिमल जन हृदय नभ एकटक रही निहारि।।303।।
- RCM 2.304.1Open verse →
भरत सुभाउ न सुगम निगमहूँ। लघु मति चापलता कबि छमहूँ।।
अर्थ · Hindi
भरत सुभाउ न सुगम निगमहूँ। लघु मति चापलता कबि छमहूँ।।
- RCM 2.304.2Open verse →
कहत सुनत सति भाउ भरत को। सीय राम पद होइ न रत को।।
अर्थ · Hindi
कहत सुनत सति भाउ भरत को। सीय राम पद होइ न रत को।।
- RCM 2.304.3Open verse →
सुमिरत भरतहि प्रेमु राम को। जेहि न सुलभ तेहि सरिस बाम को।।
अर्थ · Hindi
सुमिरत भरतहि प्रेमु राम को। जेहि न सुलभ तेहि सरिस बाम को।।
- RCM 2.304.4Open verse →
देखि दयाल दसा सबही की। राम सुजान जानि जन जी की।।
अर्थ · Hindi
देखि दयाल दसा सबही की। राम सुजान जानि जन जी की।।
- RCM 2.304.5Open verse →
धरम धुरीन धीर नय नागर। सत्य सनेह सील सुख सागर।।
अर्थ · Hindi
धरम धुरीन धीर नय नागर। सत्य सनेह सील सुख सागर।।
- RCM 2.304.6Open verse →
देसु काल लखि समउ समाजू। नीति प्रीति पालक रघुराजू।।
अर्थ · Hindi
देसु काल लखि समउ समाजू। नीति प्रीति पालक रघुराजू।।
- RCM 2.304.7Open verse →
बोले बचन बानि सरबसु से। हित परिनाम सुनत ससि रसु से।।
अर्थ · Hindi
बोले बचन बानि सरबसु से। हित परिनाम सुनत ससि रसु से।।
- RCM 2.304.8Open verse →
तात भरत तुम्ह धरम धुरीना। लोक बेद बिद प्रेम प्रबीना।।
अर्थ · Hindi
तात भरत तुम्ह धरम धुरीना। लोक बेद बिद प्रेम प्रबीना।।
- RCM 2.304.9Open verse →
करम बचन मानस बिमल तुम्ह समान तुम्ह तात।
अर्थ · Hindi
करम बचन मानस बिमल तुम्ह समान तुम्ह तात।
- RCM 2.304.10Open verse →
गुर समाज लघु बंधु गुन कुसमयँ किमि कहि जात।।304।।
अर्थ · Hindi
गुर समाज लघु बंधु गुन कुसमयँ किमि कहि जात।।304।।
- RCM 2.305.1Open verse →
जानहु तात तरनि कुल रीती। सत्यसंध पितु कीरति प्रीती।।
अर्थ · Hindi
जानहु तात तरनि कुल रीती। सत्यसंध पितु कीरति प्रीती।।
- RCM 2.305.2Open verse →
समउ समाजु लाज गुरुजन की। उदासीन हित अनहित मन की।।
अर्थ · Hindi
समउ समाजु लाज गुरुजन की। उदासीन हित अनहित मन की।।
- RCM 2.305.3Open verse →
तुम्हहि बिदित सबही कर करमू। आपन मोर परम हित धरमू।।
अर्थ · Hindi
तुम्हहि बिदित सबही कर करमू। आपन मोर परम हित धरमू।।
- RCM 2.305.4Open verse →
मोहि सब भाँति भरोस तुम्हारा। तदपि कहउँ अवसर अनुसारा।।
अर्थ · Hindi
मोहि सब भाँति भरोस तुम्हारा। तदपि कहउँ अवसर अनुसारा।।
- RCM 2.305.5Open verse →
तात तात बिनु बात हमारी। केवल गुरुकुल कृपाँ सँभारी।।
अर्थ · Hindi
तात तात बिनु बात हमारी। केवल गुरुकुल कृपाँ सँभारी।।
- RCM 2.305.6Open verse →
नतरु प्रजा परिजन परिवारू। हमहि सहित सबु होत खुआरू।।
अर्थ · Hindi
नतरु प्रजा परिजन परिवारू। हमहि सहित सबु होत खुआरू।।
- RCM 2.305.7Open verse →
जौं बिनु अवसर अथवँ दिनेसू। जग केहि कहहु न होइ कलेसू।।
अर्थ · Hindi
जौं बिनु अवसर अथवँ दिनेसू। जग केहि कहहु न होइ कलेसू।।
- RCM 2.305.8Open verse →
तस उतपातु तात बिधि कीन्हा। मुनि मिथिलेस राखि सबु लीन्हा।।
अर्थ · Hindi
तस उतपातु तात बिधि कीन्हा। मुनि मिथिलेस राखि सबु लीन्हा।।
- RCM 2.305.9Open verse →
राज काज सब लाज पति धरम धरनि धन धाम।
अर्थ · Hindi
राज काज सब लाज पति धरम धरनि धन धाम।
- RCM 2.305.10Open verse →
गुर प्रभाउ पालिहि सबहि भल होइहि परिनाम।।305।।
अर्थ · Hindi
गुर प्रभाउ पालिहि सबहि भल होइहि परिनाम।।305।।
- RCM 2.306.1Open verse →
सहित समाज तुम्हार हमारा। घर बन गुर प्रसाद रखवारा।।
अर्थ · Hindi
सहित समाज तुम्हार हमारा। घर बन गुर प्रसाद रखवारा।।
- RCM 2.306.2Open verse →
मातु पिता गुर स्वामि निदेसू। सकल धरम धरनीधर सेसू।।
अर्थ · Hindi
मातु पिता गुर स्वामि निदेसू। सकल धरम धरनीधर सेसू।।
- RCM 2.306.3Open verse →
सो तुम्ह करहु करावहु मोहू। तात तरनिकुल पालक होहू।।
अर्थ · Hindi
सो तुम्ह करहु करावहु मोहू। तात तरनिकुल पालक होहू।।
- RCM 2.306.4Open verse →
साधक एक सकल सिधि देनी। कीरति सुगति भूतिमय बेनी।।
अर्थ · Hindi
साधक एक सकल सिधि देनी। कीरति सुगति भूतिमय बेनी।।
- RCM 2.306.5Open verse →
सो बिचारि सहि संकटु भारी। करहु प्रजा परिवारु सुखारी।।
अर्थ · Hindi
सो बिचारि सहि संकटु भारी। करहु प्रजा परिवारु सुखारी।।
- RCM 2.306.6Open verse →
बाँटी बिपति सबहिं मोहि भाई। तुम्हहि अवधि भरि बड़ि कठिनाई।।
अर्थ · Hindi
बाँटी बिपति सबहिं मोहि भाई। तुम्हहि अवधि भरि बड़ि कठिनाई।।
- RCM 2.306.7Open verse →
जानि तुम्हहि मृदु कहउँ कठोरा। कुसमयँ तात न अनुचित मोरा।।
अर्थ · Hindi
जानि तुम्हहि मृदु कहउँ कठोरा। कुसमयँ तात न अनुचित मोरा।।
- RCM 2.306.8Open verse →
होहिं कुठायँ सुबंधु सुहाए। ओड़िअहिं हाथ असनिहु के घाए।।
अर्थ · Hindi
होहिं कुठायँ सुबंधु सुहाए। ओड़िअहिं हाथ असनिहु के घाए।।
- RCM 2.306.9Open verse →
सेवक कर पद नयन से मुख सो साहिबु होइ।
अर्थ · Hindi
सेवक कर पद नयन से मुख सो साहिबु होइ।
- RCM 2.306.10Open verse →
तुलसी प्रीति कि रीति सुनि सुकबि सराहहिं सोइ।।306।।
अर्थ · Hindi
तुलसी प्रीति कि रीति सुनि सुकबि सराहहिं सोइ।।306।।
- RCM 2.307.1Open verse →
सभा सकल सुनि रघुबर बानी। प्रेम पयोधि अमिअ जनु सानी।।
अर्थ · Hindi
सभा सकल सुनि रघुबर बानी। प्रेम पयोधि अमिअ जनु सानी।।
- RCM 2.307.2Open verse →
सिथिल समाज सनेह समाधी। देखि दसा चुप सारद साधी।।
अर्थ · Hindi
सिथिल समाज सनेह समाधी। देखि दसा चुप सारद साधी।।
- RCM 2.307.3Open verse →
भरतहि भयउ परम संतोषू। सनमुख स्वामि बिमुख दुख दोषू।।
अर्थ · Hindi
भरतहि भयउ परम संतोषू। सनमुख स्वामि बिमुख दुख दोषू।।
- RCM 2.307.4Open verse →
मुख प्रसन्न मन मिटा बिषादू। भा जनु गूँगेहि गिरा प्रसादू।।
अर्थ · Hindi
मुख प्रसन्न मन मिटा बिषादू। भा जनु गूँगेहि गिरा प्रसादू।।
- RCM 2.307.5Open verse →
कीन्ह सप्रेम प्रनामु बहोरी। बोले पानि पंकरुह जोरी।।
अर्थ · Hindi
कीन्ह सप्रेम प्रनामु बहोरी। बोले पानि पंकरुह जोरी।।
- RCM 2.307.6Open verse →
नाथ भयउ सुखु साथ गए को। लहेउँ लाहु जग जनमु भए को।।
अर्थ · Hindi
नाथ भयउ सुखु साथ गए को। लहेउँ लाहु जग जनमु भए को।।
- RCM 2.307.7Open verse →
अब कृपाल जस आयसु होई। करौं सीस धरि सादर सोई।।
अर्थ · Hindi
अब कृपाल जस आयसु होई। करौं सीस धरि सादर सोई।।
- RCM 2.307.8Open verse →
सो अवलंब देव मोहि देई। अवधि पारु पावौं जेहि सेई।।
अर्थ · Hindi
सो अवलंब देव मोहि देई। अवधि पारु पावौं जेहि सेई।।
- RCM 2.307.9Open verse →
देव देव अभिषेक हित गुर अनुसासनु पाइ।
अर्थ · Hindi
देव देव अभिषेक हित गुर अनुसासनु पाइ।
- RCM 2.307.10Open verse →
आनेउँ सब तीरथ सलिलु तेहि कहँ काह रजाइ।।307।।
अर्थ · Hindi
आनेउँ सब तीरथ सलिलु तेहि कहँ काह रजाइ।।307।।
- RCM 2.308.1Open verse →
एकु मनोरथु बड़ मन माहीं। सभयँ सकोच जात कहि नाहीं।।
अर्थ · Hindi
एकु मनोरथु बड़ मन माहीं। सभयँ सकोच जात कहि नाहीं।।
- RCM 2.308.2Open verse →
कहहु तात प्रभु आयसु पाई। बोले बानि सनेह सुहाई।।
अर्थ · Hindi
कहहु तात प्रभु आयसु पाई। बोले बानि सनेह सुहाई।।
- RCM 2.308.3Open verse →
चित्रकूट सुचि थल तीरथ बन। खग मृग सर सरि निर्झर गिरिगन।।
अर्थ · Hindi
चित्रकूट सुचि थल तीरथ बन। खग मृग सर सरि निर्झर गिरिगन।।
- RCM 2.308.4Open verse →
प्रभु पद अंकित अवनि बिसेषी। आयसु होइ त आवौं देखी।।
अर्थ · Hindi
प्रभु पद अंकित अवनि बिसेषी। आयसु होइ त आवौं देखी।।
- RCM 2.308.5Open verse →
अवसि अत्रि आयसु सिर धरहू। तात बिगतभय कानन चरहू।।
अर्थ · Hindi
अवसि अत्रि आयसु सिर धरहू। तात बिगतभय कानन चरहू।।
- RCM 2.308.6Open verse →
मुनि प्रसाद बनु मंगल दाता। पावन परम सुहावन भ्राता।।
अर्थ · Hindi
मुनि प्रसाद बनु मंगल दाता। पावन परम सुहावन भ्राता।।
- RCM 2.308.7Open verse →
रिषिनायकु जहँ आयसु देहीं। राखेहु तीरथ जलु थल तेहीं।।
अर्थ · Hindi
रिषिनायकु जहँ आयसु देहीं। राखेहु तीरथ जलु थल तेहीं।।
- RCM 2.308.8Open verse →
सुनि प्रभु बचन भरत सुख पावा। मुनि पद कमल मुदित सिरु नावा।।
अर्थ · Hindi
सुनि प्रभु बचन भरत सुख पावा। मुनि पद कमल मुदित सिरु नावा।।
- RCM 2.308.9Open verse →
भरत राम संबादु सुनि सकल सुमंगल मूल।
अर्थ · Hindi
भरत राम संबादु सुनि सकल सुमंगल मूल।
- RCM 2.308.10Open verse →
सुर स्वारथी सराहि कुल बरषत सुरतरु फूल।।308।।
अर्थ · Hindi
सुर स्वारथी सराहि कुल बरषत सुरतरु फूल।।308।।
- RCM 2.309.1Open verse →
धन्य भरत जय राम गोसाईं। कहत देव हरषत बरिआई।
अर्थ · Hindi
धन्य भरत जय राम गोसाईं। कहत देव हरषत बरिआई।
- RCM 2.309.2Open verse →
मुनि मिथिलेस सभाँ सब काहू। भरत बचन सुनि भयउ उछाहू।।
अर्थ · Hindi
मुनि मिथिलेस सभाँ सब काहू। भरत बचन सुनि भयउ उछाहू।।
- RCM 2.309.3Open verse →
भरत राम गुन ग्राम सनेहू। पुलकि प्रसंसत राउ बिदेहू।।
अर्थ · Hindi
भरत राम गुन ग्राम सनेहू। पुलकि प्रसंसत राउ बिदेहू।।
- RCM 2.309.4Open verse →
सेवक स्वामि सुभाउ सुहावन। नेमु पेमु अति पावन पावन।।
अर्थ · Hindi
सेवक स्वामि सुभाउ सुहावन। नेमु पेमु अति पावन पावन।।
- RCM 2.309.5Open verse →
मति अनुसार सराहन लागे। सचिव सभासद सब अनुरागे।।
अर्थ · Hindi
मति अनुसार सराहन लागे। सचिव सभासद सब अनुरागे।।
- RCM 2.309.6Open verse →
सुनि सुनि राम भरत संबादू। दुहु समाज हियँ हरषु बिषादू।।
अर्थ · Hindi
सुनि सुनि राम भरत संबादू। दुहु समाज हियँ हरषु बिषादू।।
- RCM 2.309.7Open verse →
राम मातु दुखु सुखु सम जानी। कहि गुन राम प्रबोधीं रानी।।
अर्थ · Hindi
राम मातु दुखु सुखु सम जानी। कहि गुन राम प्रबोधीं रानी।।
- RCM 2.309.8Open verse →
एक कहहिं रघुबीर बड़ाई। एक सराहत भरत भलाई।।
अर्थ · Hindi
एक कहहिं रघुबीर बड़ाई। एक सराहत भरत भलाई।।
- RCM 2.309.9Open verse →
अत्रि कहेउ तब भरत सन सैल समीप सुकूप।
अर्थ · Hindi
अत्रि कहेउ तब भरत सन सैल समीप सुकूप।
- RCM 2.309.10Open verse →
राखिअ तीरथ तोय तहँ पावन अमिअ अनूप।।309।।
अर्थ · Hindi
राखिअ तीरथ तोय तहँ पावन अमिअ अनूप।।309।।
- RCM 2.310.1Open verse →
भरत अत्रि अनुसासन पाई। जल भाजन सब दिए चलाई।।
अर्थ · Hindi
भरत अत्रि अनुसासन पाई। जल भाजन सब दिए चलाई।।
- RCM 2.310.2Open verse →
सानुज आपु अत्रि मुनि साधू। सहित गए जहँ कूप अगाधू।।
अर्थ · Hindi
सानुज आपु अत्रि मुनि साधू। सहित गए जहँ कूप अगाधू।।
- RCM 2.310.3Open verse →
पावन पाथ पुन्यथल राखा। प्रमुदित प्रेम अत्रि अस भाषा।।
अर्थ · Hindi
पावन पाथ पुन्यथल राखा। प्रमुदित प्रेम अत्रि अस भाषा।।
- RCM 2.310.4Open verse →
तात अनादि सिद्ध थल एहू। लोपेउ काल बिदित नहिं केहू।।
अर्थ · Hindi
तात अनादि सिद्ध थल एहू। लोपेउ काल बिदित नहिं केहू।।
- RCM 2.310.5Open verse →
तब सेवकन्ह सरस थलु देखा। किन्ह सुजल हित कूप बिसेषा।।
अर्थ · Hindi
तब सेवकन्ह सरस थलु देखा। किन्ह सुजल हित कूप बिसेषा।।
- RCM 2.310.6Open verse →
बिधि बस भयउ बिस्व उपकारू। सुगम अगम अति धरम बिचारू।।
अर्थ · Hindi
बिधि बस भयउ बिस्व उपकारू। सुगम अगम अति धरम बिचारू।।
- RCM 2.310.7Open verse →
भरतकूप अब कहिहहिं लोगा। अति पावन तीरथ जल जोगा।।
अर्थ · Hindi
भरतकूप अब कहिहहिं लोगा। अति पावन तीरथ जल जोगा।।
- RCM 2.310.8Open verse →
प्रेम सनेम निमज्जत प्रानी। होइहहिं बिमल करम मन बानी।।
अर्थ · Hindi
प्रेम सनेम निमज्जत प्रानी। होइहहिं बिमल करम मन बानी।।
- RCM 2.310.9Open verse →
कहत कूप महिमा सकल गए जहाँ रघुराउ।
अर्थ · Hindi
कहत कूप महिमा सकल गए जहाँ रघुराउ।
- RCM 2.310.10Open verse →
अत्रि सुनायउ रघुबरहि तीरथ पुन्य प्रभाउ।।310।।
अर्थ · Hindi
अत्रि सुनायउ रघुबरहि तीरथ पुन्य प्रभाउ।।310।।
- RCM 2.311.1Open verse →
कहत धरम इतिहास सप्रीती। भयउ भोरु निसि सो सुख बीती।।
अर्थ · Hindi
कहत धरम इतिहास सप्रीती। भयउ भोरु निसि सो सुख बीती।।
- RCM 2.311.2Open verse →
नित्य निबाहि भरत दोउ भाई। राम अत्रि गुर आयसु पाई।।
अर्थ · Hindi
नित्य निबाहि भरत दोउ भाई। राम अत्रि गुर आयसु पाई।।
- RCM 2.311.3Open verse →
सहित समाज साज सब सादें। चले राम बन अटन पयादें।।
अर्थ · Hindi
सहित समाज साज सब सादें। चले राम बन अटन पयादें।।
- RCM 2.311.4Open verse →
कोमल चरन चलत बिनु पनहीं। भइ मृदु भूमि सकुचि मन मनहीं।।
अर्थ · Hindi
कोमल चरन चलत बिनु पनहीं। भइ मृदु भूमि सकुचि मन मनहीं।।
- RCM 2.311.5Open verse →
कुस कंटक काँकरीं कुराईं। कटुक कठोर कुबस्तु दुराईं।।
अर्थ · Hindi
कुस कंटक काँकरीं कुराईं। कटुक कठोर कुबस्तु दुराईं।।
- RCM 2.311.6Open verse →
महि मंजुल मृदु मारग कीन्हे। बहत समीर त्रिबिध सुख लीन्हे।।
अर्थ · Hindi
महि मंजुल मृदु मारग कीन्हे। बहत समीर त्रिबिध सुख लीन्हे।।
- RCM 2.311.7Open verse →
सुमन बरषि सुर घन करि छाहीं। बिटप फूलि फलि तृन मृदुताहीं।।
अर्थ · Hindi
सुमन बरषि सुर घन करि छाहीं। बिटप फूलि फलि तृन मृदुताहीं।।
- RCM 2.311.8Open verse →
मृग बिलोकि खग बोलि सुबानी। सेवहिं सकल राम प्रिय जानी।।
अर्थ · Hindi
मृग बिलोकि खग बोलि सुबानी। सेवहिं सकल राम प्रिय जानी।।
- RCM 2.311.9Open verse →
सुलभ सिद्धि सब प्राकृतहु राम कहत जमुहात।
अर्थ · Hindi
सुलभ सिद्धि सब प्राकृतहु राम कहत जमुहात।
- RCM 2.311.10Open verse →
राम प्रान प्रिय भरत कहुँ यह न होइ बड़ि बात।।311।।
अर्थ · Hindi
राम प्रान प्रिय भरत कहुँ यह न होइ बड़ि बात।।311।।
- RCM 2.312.1Open verse →
एहि बिधि भरतु फिरत बन माहीं। नेमु प्रेमु लखि मुनि सकुचाहीं।।
अर्थ · Hindi
एहि बिधि भरतु फिरत बन माहीं। नेमु प्रेमु लखि मुनि सकुचाहीं।।
- RCM 2.312.2Open verse →
पुन्य जलाश्रय भूमि बिभागा। खग मृग तरु तृन गिरि बन बागा।।
अर्थ · Hindi
पुन्य जलाश्रय भूमि बिभागा। खग मृग तरु तृन गिरि बन बागा।।
- RCM 2.312.3Open verse →
चारु बिचित्र पबित्र बिसेषी। बूझत भरतु दिब्य सब देखी।।
अर्थ · Hindi
चारु बिचित्र पबित्र बिसेषी। बूझत भरतु दिब्य सब देखी।।
- RCM 2.312.4Open verse →
सुनि मन मुदित कहत रिषिराऊ। हेतु नाम गुन पुन्य प्रभाऊ।।
अर्थ · Hindi
सुनि मन मुदित कहत रिषिराऊ। हेतु नाम गुन पुन्य प्रभाऊ।।
- RCM 2.312.5Open verse →
कतहुँ निमज्जन कतहुँ प्रनामा। कतहुँ बिलोकत मन अभिरामा।।
अर्थ · Hindi
कतहुँ निमज्जन कतहुँ प्रनामा। कतहुँ बिलोकत मन अभिरामा।।
- RCM 2.312.6Open verse →
कतहुँ बैठि मुनि आयसु पाई। सुमिरत सीय सहित दोउ भाई।।
अर्थ · Hindi
कतहुँ बैठि मुनि आयसु पाई। सुमिरत सीय सहित दोउ भाई।।
- RCM 2.312.7Open verse →
देखि सुभाउ सनेहु सुसेवा। देहिं असीस मुदित बनदेवा।।
अर्थ · Hindi
देखि सुभाउ सनेहु सुसेवा। देहिं असीस मुदित बनदेवा।।
- RCM 2.312.8Open verse →
फिरहिं गएँ दिनु पहर अढ़ाई। प्रभु पद कमल बिलोकहिं आई।।
अर्थ · Hindi
फिरहिं गएँ दिनु पहर अढ़ाई। प्रभु पद कमल बिलोकहिं आई।।
- RCM 2.312.9Open verse →
देखे थल तीरथ सकल भरत पाँच दिन माझ।
अर्थ · Hindi
देखे थल तीरथ सकल भरत पाँच दिन माझ।
- RCM 2.312.10Open verse →
कहत सुनत हरि हर सुजसु गयउ दिवसु भइ साँझ।।312।।
अर्थ · Hindi
कहत सुनत हरि हर सुजसु गयउ दिवसु भइ साँझ।।312।।
- RCM 2.313.1Open verse →
भोर न्हाइ सबु जुरा समाजू। भरत भूमिसुर तेरहुति राजू।।
अर्थ · Hindi
भोर न्हाइ सबु जुरा समाजू। भरत भूमिसुर तेरहुति राजू।।
- RCM 2.313.2Open verse →
भल दिन आजु जानि मन माहीं। रामु कृपाल कहत सकुचाहीं।।
अर्थ · Hindi
भल दिन आजु जानि मन माहीं। रामु कृपाल कहत सकुचाहीं।।
- RCM 2.313.3Open verse →
गुर नृप भरत सभा अवलोकी। सकुचि राम फिरि अवनि बिलोकी।।
अर्थ · Hindi
गुर नृप भरत सभा अवलोकी। सकुचि राम फिरि अवनि बिलोकी।।
- RCM 2.313.4Open verse →
सील सराहि सभा सब सोची। कहुँ न राम सम स्वामि सँकोची।।
अर्थ · Hindi
सील सराहि सभा सब सोची। कहुँ न राम सम स्वामि सँकोची।।
- RCM 2.313.5Open verse →
भरत सुजान राम रुख देखी। उठि सप्रेम धरि धीर बिसेषी।।
अर्थ · Hindi
भरत सुजान राम रुख देखी। उठि सप्रेम धरि धीर बिसेषी।।
- RCM 2.313.6Open verse →
करि दंडवत कहत कर जोरी। राखीं नाथ सकल रुचि मोरी।।
अर्थ · Hindi
करि दंडवत कहत कर जोरी। राखीं नाथ सकल रुचि मोरी।।
- RCM 2.313.7Open verse →
मोहि लगि सहेउ सबहिं संतापू। बहुत भाँति दुखु पावा आपू।।
अर्थ · Hindi
मोहि लगि सहेउ सबहिं संतापू। बहुत भाँति दुखु पावा आपू।।
- RCM 2.313.8Open verse →
अब गोसाइँ मोहि देउ रजाई। सेवौं अवध अवधि भरि जाई।।
अर्थ · Hindi
अब गोसाइँ मोहि देउ रजाई। सेवौं अवध अवधि भरि जाई।।
- RCM 2.313.9Open verse →
जेहिं उपाय पुनि पाय जनु देखै दीनदयाल।
अर्थ · Hindi
जेहिं उपाय पुनि पाय जनु देखै दीनदयाल।
- RCM 2.313.10Open verse →
सो सिख देइअ अवधि लगि कोसलपाल कृपाल।।313।।
अर्थ · Hindi
सो सिख देइअ अवधि लगि कोसलपाल कृपाल।।313।।
- RCM 2.314.1Open verse →
पुरजन परिजन प्रजा गोसाई। सब सुचि सरस सनेहँ सगाई।।
अर्थ · Hindi
पुरजन परिजन प्रजा गोसाई। सब सुचि सरस सनेहँ सगाई।।
- RCM 2.314.2Open verse →
राउर बदि भल भव दुख दाहू। प्रभु बिनु बादि परम पद लाहू।।
अर्थ · Hindi
राउर बदि भल भव दुख दाहू। प्रभु बिनु बादि परम पद लाहू।।
- RCM 2.314.3Open verse →
स्वामि सुजानु जानि सब ही की। रुचि लालसा रहनि जन जी की।।
अर्थ · Hindi
स्वामि सुजानु जानि सब ही की। रुचि लालसा रहनि जन जी की।।
- RCM 2.314.4Open verse →
प्रनतपालु पालिहि सब काहू। देउ दुहू दिसि ओर निबाहू।।
अर्थ · Hindi
प्रनतपालु पालिहि सब काहू। देउ दुहू दिसि ओर निबाहू।।
- RCM 2.314.5Open verse →
अस मोहि सब बिधि भूरि भरोसो। किएँ बिचारु न सोचु खरो सो।।
अर्थ · Hindi
अस मोहि सब बिधि भूरि भरोसो। किएँ बिचारु न सोचु खरो सो।।
- RCM 2.314.6Open verse →
आरति मोर नाथ कर छोहू। दुहुँ मिलि कीन्ह ढीठु हठि मोहू।।
अर्थ · Hindi
आरति मोर नाथ कर छोहू। दुहुँ मिलि कीन्ह ढीठु हठि मोहू।।
- RCM 2.314.7Open verse →
यह बड़ दोषु दूरि करि स्वामी। तजि सकोच सिखइअ अनुगामी।।
अर्थ · Hindi
यह बड़ दोषु दूरि करि स्वामी। तजि सकोच सिखइअ अनुगामी।।
- RCM 2.314.8Open verse →
भरत बिनय सुनि सबहिं प्रसंसी। खीर नीर बिबरन गति हंसी।।
अर्थ · Hindi
भरत बिनय सुनि सबहिं प्रसंसी। खीर नीर बिबरन गति हंसी।।
- RCM 2.314.9Open verse →
दीनबंधु सुनि बंधु के बचन दीन छलहीन।
अर्थ · Hindi
दीनबंधु सुनि बंधु के बचन दीन छलहीन।
- RCM 2.314.10Open verse →
देस काल अवसर सरिस बोले रामु प्रबीन।।314।।
अर्थ · Hindi
देस काल अवसर सरिस बोले रामु प्रबीन।।314।।
- RCM 2.315.1Open verse →
तात तुम्हारि मोरि परिजन की। चिंता गुरहि नृपहि घर बन की।।
अर्थ · Hindi
तात तुम्हारि मोरि परिजन की। चिंता गुरहि नृपहि घर बन की।।
- RCM 2.315.2Open verse →
माथे पर गुर मुनि मिथिलेसू। हमहि तुम्हहि सपनेहुँ न कलेसू।।
अर्थ · Hindi
माथे पर गुर मुनि मिथिलेसू। हमहि तुम्हहि सपनेहुँ न कलेसू।।
- RCM 2.315.3Open verse →
मोर तुम्हार परम पुरुषारथु। स्वारथु सुजसु धरमु परमारथु।।
अर्थ · Hindi
मोर तुम्हार परम पुरुषारथु। स्वारथु सुजसु धरमु परमारथु।।
- RCM 2.315.4Open verse →
पितु आयसु पालिहिं दुहु भाई। लोक बेद भल भूप भलाई।।
अर्थ · Hindi
पितु आयसु पालिहिं दुहु भाई। लोक बेद भल भूप भलाई।।
- RCM 2.315.5Open verse →
गुर पितु मातु स्वामि सिख पालें। चलेहुँ कुमग पग परहिं न खालें।।
अर्थ · Hindi
गुर पितु मातु स्वामि सिख पालें। चलेहुँ कुमग पग परहिं न खालें।।
- RCM 2.315.6Open verse →
अस बिचारि सब सोच बिहाई। पालहु अवध अवधि भरि जाई।।
अर्थ · Hindi
अस बिचारि सब सोच बिहाई। पालहु अवध अवधि भरि जाई।।
- RCM 2.315.7Open verse →
देसु कोसु परिजन परिवारू। गुर पद रजहिं लाग छरुभारू।।
अर्थ · Hindi
देसु कोसु परिजन परिवारू। गुर पद रजहिं लाग छरुभारू।।
- RCM 2.315.8Open verse →
तुम्ह मुनि मातु सचिव सिख मानी। पालेहु पुहुमि प्रजा रजधानी।।
अर्थ · Hindi
तुम्ह मुनि मातु सचिव सिख मानी। पालेहु पुहुमि प्रजा रजधानी।।
- RCM 2.315.9Open verse →
मुखिआ मुखु सो चाहिऐ खान पान कहुँ एक।
अर्थ · Hindi
मुखिआ मुखु सो चाहिऐ खान पान कहुँ एक।
- RCM 2.315.10Open verse →
पालइ पोषइ सकल अँग तुलसी सहित बिबेक।।315।।
अर्थ · Hindi
पालइ पोषइ सकल अँग तुलसी सहित बिबेक।।315।।
- RCM 2.316.1Open verse →
राजधरम सरबसु एतनोई। जिमि मन माहँ मनोरथ गोई।।
अर्थ · Hindi
राजधरम सरबसु एतनोई। जिमि मन माहँ मनोरथ गोई।।
- RCM 2.316.2Open verse →
बंधु प्रबोधु कीन्ह बहु भाँती। बिनु अधार मन तोषु न साँती।।
अर्थ · Hindi
बंधु प्रबोधु कीन्ह बहु भाँती। बिनु अधार मन तोषु न साँती।।
- RCM 2.316.3Open verse →
भरत सील गुर सचिव समाजू। सकुच सनेह बिबस रघुराजू।।
अर्थ · Hindi
भरत सील गुर सचिव समाजू। सकुच सनेह बिबस रघुराजू।।
- RCM 2.316.4Open verse →
प्रभु करि कृपा पाँवरीं दीन्हीं। सादर भरत सीस धरि लीन्हीं।।
अर्थ · Hindi
प्रभु करि कृपा पाँवरीं दीन्हीं। सादर भरत सीस धरि लीन्हीं।।
- RCM 2.316.5Open verse →
चरनपीठ करुनानिधान के। जनु जुग जामिक प्रजा प्रान के।।
अर्थ · Hindi
चरनपीठ करुनानिधान के। जनु जुग जामिक प्रजा प्रान के।।
- RCM 2.316.6Open verse →
संपुट भरत सनेह रतन के। आखर जुग जुन जीव जतन के।।
अर्थ · Hindi
संपुट भरत सनेह रतन के। आखर जुग जुन जीव जतन के।।
- RCM 2.316.7Open verse →
कुल कपाट कर कुसल करम के। बिमल नयन सेवा सुधरम के।।
अर्थ · Hindi
कुल कपाट कर कुसल करम के। बिमल नयन सेवा सुधरम के।।
- RCM 2.316.8Open verse →
भरत मुदित अवलंब लहे तें। अस सुख जस सिय रामु रहे तें।।
अर्थ · Hindi
भरत मुदित अवलंब लहे तें। अस सुख जस सिय रामु रहे तें।।
- RCM 2.316.9Open verse →
मागेउ बिदा प्रनामु करि राम लिए उर लाइ।
अर्थ · Hindi
मागेउ बिदा प्रनामु करि राम लिए उर लाइ।
- RCM 2.316.10Open verse →
लोग उचाटे अमरपति कुटिल कुअवसरु पाइ।।316।।
अर्थ · Hindi
लोग उचाटे अमरपति कुटिल कुअवसरु पाइ।।316।।
- RCM 2.317.1Open verse →
सो कुचालि सब कहँ भइ नीकी। अवधि आस सम जीवनि जी की।।
अर्थ · Hindi
सो कुचालि सब कहँ भइ नीकी। अवधि आस सम जीवनि जी की।।
- RCM 2.317.2Open verse →
नतरु लखन सिय सम बियोगा। हहरि मरत सब लोग कुरोगा।।
अर्थ · Hindi
नतरु लखन सिय सम बियोगा। हहरि मरत सब लोग कुरोगा।।
- RCM 2.317.3Open verse →
रामकृपाँ अवरेब सुधारी। बिबुध धारि भइ गुनद गोहारी।।
अर्थ · Hindi
रामकृपाँ अवरेब सुधारी। बिबुध धारि भइ गुनद गोहारी।।
- RCM 2.317.4Open verse →
भेंटत भुज भरि भाइ भरत सो। राम प्रेम रसु कहि न परत सो।।
अर्थ · Hindi
भेंटत भुज भरि भाइ भरत सो। राम प्रेम रसु कहि न परत सो।।
- RCM 2.317.5Open verse →
तन मन बचन उमग अनुरागा। धीर धुरंधर धीरजु त्यागा।।
अर्थ · Hindi
तन मन बचन उमग अनुरागा। धीर धुरंधर धीरजु त्यागा।।
- RCM 2.317.6Open verse →
बारिज लोचन मोचत बारी। देखि दसा सुर सभा दुखारी।।
अर्थ · Hindi
बारिज लोचन मोचत बारी। देखि दसा सुर सभा दुखारी।।
- RCM 2.317.7Open verse →
मुनिगन गुर धुर धीर जनक से। ग्यान अनल मन कसें कनक से।।
अर्थ · Hindi
मुनिगन गुर धुर धीर जनक से। ग्यान अनल मन कसें कनक से।।
- RCM 2.317.8Open verse →
जे बिरंचि निरलेप उपाए। पदुम पत्र जिमि जग जल जाए।।
अर्थ · Hindi
जे बिरंचि निरलेप उपाए। पदुम पत्र जिमि जग जल जाए।।
- RCM 2.317.9Open verse →
तेउ बिलोकि रघुबर भरत प्रीति अनूप अपार।
अर्थ · Hindi
तेउ बिलोकि रघुबर भरत प्रीति अनूप अपार।
- RCM 2.317.10Open verse →
भए मगन मन तन बचन सहित बिराग बिचार।।317।।
अर्थ · Hindi
भए मगन मन तन बचन सहित बिराग बिचार।।317।।
- RCM 2.318.1Open verse →
जहाँ जनक गुर मति भोरी। प्राकृत प्रीति कहत बड़ि खोरी।।
अर्थ · Hindi
जहाँ जनक गुर मति भोरी। प्राकृत प्रीति कहत बड़ि खोरी।।
- RCM 2.318.2Open verse →
बरनत रघुबर भरत बियोगू। सुनि कठोर कबि जानिहि लोगू।।
अर्थ · Hindi
बरनत रघुबर भरत बियोगू। सुनि कठोर कबि जानिहि लोगू।।
- RCM 2.318.3Open verse →
सो सकोच रसु अकथ सुबानी। समउ सनेहु सुमिरि सकुचानी।।
अर्थ · Hindi
सो सकोच रसु अकथ सुबानी। समउ सनेहु सुमिरि सकुचानी।।
- RCM 2.318.4Open verse →
भेंटि भरत रघुबर समुझाए। पुनि रिपुदवनु हरषि हियँ लाए।।
अर्थ · Hindi
भेंटि भरत रघुबर समुझाए। पुनि रिपुदवनु हरषि हियँ लाए।।
- RCM 2.318.5Open verse →
सेवक सचिव भरत रुख पाई। निज निज काज लगे सब जाई।।
अर्थ · Hindi
सेवक सचिव भरत रुख पाई। निज निज काज लगे सब जाई।।
- RCM 2.318.6Open verse →
सुनि दारुन दुखु दुहूँ समाजा। लगे चलन के साजन साजा।।
अर्थ · Hindi
सुनि दारुन दुखु दुहूँ समाजा। लगे चलन के साजन साजा।।
- RCM 2.318.7Open verse →
प्रभु पद पदुम बंदि दोउ भाई। चले सीस धरि राम रजाई।।
अर्थ · Hindi
प्रभु पद पदुम बंदि दोउ भाई। चले सीस धरि राम रजाई।।
- RCM 2.318.8Open verse →
मुनि तापस बनदेव निहोरी। सब सनमानि बहोरि बहोरी।।
अर्थ · Hindi
मुनि तापस बनदेव निहोरी। सब सनमानि बहोरि बहोरी।।
- RCM 2.318.9Open verse →
लखनहि भेंटि प्रनामु करि सिर धरि सिय पद धूरि।
अर्थ · Hindi
लखनहि भेंटि प्रनामु करि सिर धरि सिय पद धूरि।
- RCM 2.318.10Open verse →
चले सप्रेम असीस सुनि सकल सुमंगल मूरि।।318।।
अर्थ · Hindi
चले सप्रेम असीस सुनि सकल सुमंगल मूरि।।318।।
- RCM 2.319.1Open verse →
सानुज राम नृपहि सिर नाई। कीन्हि बहुत बिधि बिनय बड़ाई।।
अर्थ · Hindi
सानुज राम नृपहि सिर नाई। कीन्हि बहुत बिधि बिनय बड़ाई।।
- RCM 2.319.2Open verse →
देव दया बस बड़ दुखु पायउ। सहित समाज काननहिं आयउ।।
अर्थ · Hindi
देव दया बस बड़ दुखु पायउ। सहित समाज काननहिं आयउ।।
- RCM 2.319.3Open verse →
पुर पगु धारिअ देइ असीसा। कीन्ह धीर धरि गवनु महीसा।।
अर्थ · Hindi
पुर पगु धारिअ देइ असीसा। कीन्ह धीर धरि गवनु महीसा।।
- RCM 2.319.4Open verse →
मुनि महिदेव साधु सनमाने। बिदा किए हरि हर सम जाने।।
अर्थ · Hindi
मुनि महिदेव साधु सनमाने। बिदा किए हरि हर सम जाने।।
- RCM 2.319.5Open verse →
सासु समीप गए दोउ भाई। फिरे बंदि पग आसिष पाई।।
अर्थ · Hindi
सासु समीप गए दोउ भाई। फिरे बंदि पग आसिष पाई।।
- RCM 2.319.6Open verse →
कौसिक बामदेव जाबाली। पुरजन परिजन सचिव सुचाली।।
अर्थ · Hindi
कौसिक बामदेव जाबाली। पुरजन परिजन सचिव सुचाली।।
- RCM 2.319.7Open verse →
जथा जोगु करि बिनय प्रनामा। बिदा किए सब सानुज रामा।।
अर्थ · Hindi
जथा जोगु करि बिनय प्रनामा। बिदा किए सब सानुज रामा।।
- RCM 2.319.8Open verse →
नारि पुरुष लघु मध्य बड़ेरे। सब सनमानि कृपानिधि फेरे।।
अर्थ · Hindi
नारि पुरुष लघु मध्य बड़ेरे। सब सनमानि कृपानिधि फेरे।।
- RCM 2.319.9Open verse →
भरत मातु पद बंदि प्रभु सुचि सनेहँ मिलि भेंटि।
अर्थ · Hindi
भरत मातु पद बंदि प्रभु सुचि सनेहँ मिलि भेंटि।
- RCM 2.319.10Open verse →
बिदा कीन्ह सजि पालकी सकुच सोच सब मेटि।।319।।
अर्थ · Hindi
बिदा कीन्ह सजि पालकी सकुच सोच सब मेटि।।319।।
- RCM 2.320.1Open verse →
परिजन मातु पितहि मिलि सीता। फिरी प्रानप्रिय प्रेम पुनीता।।
अर्थ · Hindi
परिजन मातु पितहि मिलि सीता। फिरी प्रानप्रिय प्रेम पुनीता।।
- RCM 2.320.2Open verse →
करि प्रनामु भेंटी सब सासू। प्रीति कहत कबि हियँ न हुलासू।।
अर्थ · Hindi
करि प्रनामु भेंटी सब सासू। प्रीति कहत कबि हियँ न हुलासू।।
- RCM 2.320.3Open verse →
सुनि सिख अभिमत आसिष पाई। रही सीय दुहु प्रीति समाई।।
अर्थ · Hindi
सुनि सिख अभिमत आसिष पाई। रही सीय दुहु प्रीति समाई।।
- RCM 2.320.4Open verse →
रघुपति पटु पालकीं मगाईं। करि प्रबोधु सब मातु चढ़ाई।।
अर्थ · Hindi
रघुपति पटु पालकीं मगाईं। करि प्रबोधु सब मातु चढ़ाई।।
- RCM 2.320.5Open verse →
बार बार हिलि मिलि दुहु भाई। सम सनेहँ जननी पहुँचाई।।
अर्थ · Hindi
बार बार हिलि मिलि दुहु भाई। सम सनेहँ जननी पहुँचाई।।
- RCM 2.320.6Open verse →
साजि बाजि गज बाहन नाना। भरत भूप दल कीन्ह पयाना।।
अर्थ · Hindi
साजि बाजि गज बाहन नाना। भरत भूप दल कीन्ह पयाना।।
- RCM 2.320.7Open verse →
हृदयँ रामु सिय लखन समेता। चले जाहिं सब लोग अचेता।।
अर्थ · Hindi
हृदयँ रामु सिय लखन समेता। चले जाहिं सब लोग अचेता।।
- RCM 2.320.8Open verse →
बसह बाजि गज पसु हियँ हारें। चले जाहिं परबस मन मारें।।
अर्थ · Hindi
बसह बाजि गज पसु हियँ हारें। चले जाहिं परबस मन मारें।।
- RCM 2.320.9Open verse →
गुर गुरतिय पद बंदि प्रभु सीता लखन समेत।
अर्थ · Hindi
गुर गुरतिय पद बंदि प्रभु सीता लखन समेत।
- RCM 2.320.10Open verse →
फिरे हरष बिसमय सहित आए परन निकेत।।320।।
अर्थ · Hindi
फिरे हरष बिसमय सहित आए परन निकेत।।320।।
- RCM 2.321.1Open verse →
बिदा कीन्ह सनमानि निषादू। चलेउ हृदयँ बड़ बिरह बिषादू।।
अर्थ · Hindi
बिदा कीन्ह सनमानि निषादू। चलेउ हृदयँ बड़ बिरह बिषादू।।
- RCM 2.321.2Open verse →
कोल किरात भिल्ल बनचारी। फेरे फिरे जोहारि जोहारी।।
अर्थ · Hindi
कोल किरात भिल्ल बनचारी। फेरे फिरे जोहारि जोहारी।।
- RCM 2.321.3Open verse →
प्रभु सिय लखन बैठि बट छाहीं। प्रिय परिजन बियोग बिलखाहीं।।
अर्थ · Hindi
प्रभु सिय लखन बैठि बट छाहीं। प्रिय परिजन बियोग बिलखाहीं।।
- RCM 2.321.4Open verse →
भरत सनेह सुभाउ सुबानी। प्रिया अनुज सन कहत बखानी।।
अर्थ · Hindi
भरत सनेह सुभाउ सुबानी। प्रिया अनुज सन कहत बखानी।।
- RCM 2.321.5Open verse →
प्रीति प्रतीति बचन मन करनी। श्रीमुख राम प्रेम बस बरनी।।
अर्थ · Hindi
प्रीति प्रतीति बचन मन करनी। श्रीमुख राम प्रेम बस बरनी।।
- RCM 2.321.6Open verse →
तेहि अवसर खग मृग जल मीना। चित्रकूट चर अचर मलीना।।
अर्थ · Hindi
तेहि अवसर खग मृग जल मीना। चित्रकूट चर अचर मलीना।।
- RCM 2.321.7Open verse →
बिबुध बिलोकि दसा रघुबर की। बरषि सुमन कहि गति घर घर की।।
अर्थ · Hindi
बिबुध बिलोकि दसा रघुबर की। बरषि सुमन कहि गति घर घर की।।
- RCM 2.321.8Open verse →
प्रभु प्रनामु करि दीन्ह भरोसो। चले मुदित मन डर न खरो सो।।
अर्थ · Hindi
प्रभु प्रनामु करि दीन्ह भरोसो। चले मुदित मन डर न खरो सो।।
- RCM 2.321.9Open verse →
सानुज सीय समेत प्रभु राजत परन कुटीर।
अर्थ · Hindi
सानुज सीय समेत प्रभु राजत परन कुटीर।
- RCM 2.321.10Open verse →
भगति ग्यानु बैराग्य जनु सोहत धरें सरीर।।321।।
अर्थ · Hindi
भगति ग्यानु बैराग्य जनु सोहत धरें सरीर।।321।।
- RCM 2.322.1Open verse →
मुनि महिसुर गुर भरत भुआलू। राम बिरहँ सबु साजु बिहालू।।
अर्थ · Hindi
मुनि महिसुर गुर भरत भुआलू। राम बिरहँ सबु साजु बिहालू।।
- RCM 2.322.2Open verse →
प्रभु गुन ग्राम गनत मन माहीं। सब चुपचाप चले मग जाहीं।।
अर्थ · Hindi
प्रभु गुन ग्राम गनत मन माहीं। सब चुपचाप चले मग जाहीं।।
- RCM 2.322.3Open verse →
जमुना उतरि पार सबु भयऊ। सो बासरु बिनु भोजन गयऊ।।
अर्थ · Hindi
जमुना उतरि पार सबु भयऊ। सो बासरु बिनु भोजन गयऊ।।
- RCM 2.322.4Open verse →
उतरि देवसरि दूसर बासू। रामसखाँ सब कीन्ह सुपासू।।
अर्थ · Hindi
उतरि देवसरि दूसर बासू। रामसखाँ सब कीन्ह सुपासू।।
- RCM 2.322.5Open verse →
सई उतरि गोमतीं नहाए। चौथें दिवस अवधपुर आए।
अर्थ · Hindi
सई उतरि गोमतीं नहाए। चौथें दिवस अवधपुर आए।
- RCM 2.322.6Open verse →
जनकु रहे पुर बासर चारी। राज काज सब साज सँभारी।।
अर्थ · Hindi
जनकु रहे पुर बासर चारी। राज काज सब साज सँभारी।।
- RCM 2.322.7Open verse →
सौंपि सचिव गुर भरतहि राजू। तेरहुति चले साजि सबु साजू।।
अर्थ · Hindi
सौंपि सचिव गुर भरतहि राजू। तेरहुति चले साजि सबु साजू।।
- RCM 2.322.8Open verse →
नगर नारि नर गुर सिख मानी। बसे सुखेन राम रजधानी।।
अर्थ · Hindi
नगर नारि नर गुर सिख मानी। बसे सुखेन राम रजधानी।।
- RCM 2.322.9Open verse →
राम दरस लगि लोग सब करत नेम उपबास।
अर्थ · Hindi
राम दरस लगि लोग सब करत नेम उपबास।
- RCM 2.322.10Open verse →
तजि तजि भूषन भोग सुख जिअत अवधि कीं आस।।322।।
अर्थ · Hindi
तजि तजि भूषन भोग सुख जिअत अवधि कीं आस।।322।।
- RCM 2.323.1Open verse →
सचिव सुसेवक भरत प्रबोधे। निज निज काज पाइ पाइ सिख ओधे।।
अर्थ · Hindi
सचिव सुसेवक भरत प्रबोधे। निज निज काज पाइ पाइ सिख ओधे।।
- RCM 2.323.2Open verse →
पुनि सिख दीन्ह बोलि लघु भाई। सौंपी सकल मातु सेवकाई।।
अर्थ · Hindi
पुनि सिख दीन्ह बोलि लघु भाई। सौंपी सकल मातु सेवकाई।।
- RCM 2.323.3Open verse →
भूसुर बोलि भरत कर जोरे। करि प्रनाम बय बिनय निहोरे।।
अर्थ · Hindi
भूसुर बोलि भरत कर जोरे। करि प्रनाम बय बिनय निहोरे।।
- RCM 2.323.4Open verse →
ऊँच नीच कारजु भल पोचू। आयसु देब न करब सँकोचू।।
अर्थ · Hindi
ऊँच नीच कारजु भल पोचू। आयसु देब न करब सँकोचू।।
- RCM 2.323.5Open verse →
परिजन पुरजन प्रजा बोलाए। समाधानु करि सुबस बसाए।।
अर्थ · Hindi
परिजन पुरजन प्रजा बोलाए। समाधानु करि सुबस बसाए।।
- RCM 2.323.6Open verse →
सानुज गे गुर गेहँ बहोरी। करि दंडवत कहत कर जोरी।।
अर्थ · Hindi
सानुज गे गुर गेहँ बहोरी। करि दंडवत कहत कर जोरी।।
- RCM 2.323.7Open verse →
आयसु होइ त रहौं सनेमा। बोले मुनि तन पुलकि सपेमा।।
अर्थ · Hindi
आयसु होइ त रहौं सनेमा। बोले मुनि तन पुलकि सपेमा।।
- RCM 2.323.8Open verse →
समुझव कहब करब तुम्ह जोई। धरम सारु जग होइहि सोई।।
अर्थ · Hindi
समुझव कहब करब तुम्ह जोई। धरम सारु जग होइहि सोई।।
- RCM 2.323.9Open verse →
सुनि सिख पाइ असीस बड़ि गनक बोलि दिनु साधि।
अर्थ · Hindi
सुनि सिख पाइ असीस बड़ि गनक बोलि दिनु साधि।
- RCM 2.323.10Open verse →
सिंघासन प्रभु पादुका बैठारे निरुपाधि।।323।।
अर्थ · Hindi
सिंघासन प्रभु पादुका बैठारे निरुपाधि।।323।।
- RCM 2.324.1Open verse →
राम मातु गुर पद सिरु नाई। प्रभु पद पीठ रजायसु पाई।।
अर्थ · Hindi
राम मातु गुर पद सिरु नाई। प्रभु पद पीठ रजायसु पाई।।
- RCM 2.324.2Open verse →
नंदिगावँ करि परन कुटीरा। कीन्ह निवासु धरम धुर धीरा।।
अर्थ · Hindi
नंदिगावँ करि परन कुटीरा। कीन्ह निवासु धरम धुर धीरा।।
- RCM 2.324.3Open verse →
जटाजूट सिर मुनिपट धारी। महि खनि कुस साँथरी सँवारी।।
अर्थ · Hindi
जटाजूट सिर मुनिपट धारी। महि खनि कुस साँथरी सँवारी।।
- RCM 2.324.4Open verse →
असन बसन बासन ब्रत नेमा। करत कठिन रिषिधरम सप्रेमा।।
अर्थ · Hindi
असन बसन बासन ब्रत नेमा। करत कठिन रिषिधरम सप्रेमा।।
- RCM 2.324.5Open verse →
भूषन बसन भोग सुख भूरी। मन तन बचन तजे तिन तूरी।।
अर्थ · Hindi
भूषन बसन भोग सुख भूरी। मन तन बचन तजे तिन तूरी।।
- RCM 2.324.6Open verse →
अवध राजु सुर राजु सिहाई। दसरथ धनु सुनि धनदु लजाई।।
अर्थ · Hindi
अवध राजु सुर राजु सिहाई। दसरथ धनु सुनि धनदु लजाई।।
- RCM 2.324.7Open verse →
तेहिं पुर बसत भरत बिनु रागा। चंचरीक जिमि चंपक बागा।।
अर्थ · Hindi
तेहिं पुर बसत भरत बिनु रागा। चंचरीक जिमि चंपक बागा।।
- RCM 2.324.8Open verse →
रमा बिलासु राम अनुरागी। तजत बमन जिमि जन बड़भागी।।
अर्थ · Hindi
रमा बिलासु राम अनुरागी। तजत बमन जिमि जन बड़भागी।।
- RCM 2.324.9Open verse →
राम पेम भाजन भरतु बड़े न एहिं करतूति।
अर्थ · Hindi
राम पेम भाजन भरतु बड़े न एहिं करतूति।
- RCM 2.324.10Open verse →
चातक हंस सराहिअत टेंक बिबेक बिभूति।।324।।
अर्थ · Hindi
चातक हंस सराहिअत टेंक बिबेक बिभूति।।324।।
- RCM 2.325.1Open verse →
देह दिनहुँ दिन दूबरि होई। घटइ तेजु बलु मुखछबि सोई।।
अर्थ · Hindi
देह दिनहुँ दिन दूबरि होई। घटइ तेजु बलु मुखछबि सोई।।
- RCM 2.325.2Open verse →
नित नव राम प्रेम पनु पीना। बढ़त धरम दलु मनु न मलीना।।
अर्थ · Hindi
नित नव राम प्रेम पनु पीना। बढ़त धरम दलु मनु न मलीना।।
- RCM 2.325.3Open verse →
जिमि जलु निघटत सरद प्रकासे। बिलसत बेतस बनज बिकासे।।
अर्थ · Hindi
जिमि जलु निघटत सरद प्रकासे। बिलसत बेतस बनज बिकासे।।
- RCM 2.325.4Open verse →
सम दम संजम नियम उपासा। नखत भरत हिय बिमल अकासा।।
अर्थ · Hindi
सम दम संजम नियम उपासा। नखत भरत हिय बिमल अकासा।।
- RCM 2.325.5Open verse →
ध्रुव बिस्वास अवधि राका सी। स्वामि सुरति सुरबीथि बिकासी।।
अर्थ · Hindi
ध्रुव बिस्वास अवधि राका सी। स्वामि सुरति सुरबीथि बिकासी।।
- RCM 2.325.6Open verse →
राम पेम बिधु अचल अदोषा। सहित समाज सोह नित चोखा।।
अर्थ · Hindi
राम पेम बिधु अचल अदोषा। सहित समाज सोह नित चोखा।।
- RCM 2.325.7Open verse →
भरत रहनि समुझनि करतूती। भगति बिरति गुन बिमल बिभूती।।
अर्थ · Hindi
भरत रहनि समुझनि करतूती। भगति बिरति गुन बिमल बिभूती।।
- RCM 2.325.8Open verse →
बरनत सकल सुकचि सकुचाहीं। सेस गनेस गिरा गमु नाहीं।।
अर्थ · Hindi
बरनत सकल सुकचि सकुचाहीं। सेस गनेस गिरा गमु नाहीं।।
- RCM 2.325.9Open verse →
नित पूजत प्रभु पाँवरी प्रीति न हृदयँ समाति।।
अर्थ · Hindi
नित पूजत प्रभु पाँवरी प्रीति न हृदयँ समाति।।
- RCM 2.325.10Open verse →
मागि मागि आयसु करत राज काज बहु भाँति।।325।।
अर्थ · Hindi
मागि मागि आयसु करत राज काज बहु भाँति।।325।।
- RCM 2.326.1Open verse →
पुलक गात हियँ सिय रघुबीरू। जीह नामु जप लोचन नीरू।।
अर्थ · Hindi
पुलक गात हियँ सिय रघुबीरू। जीह नामु जप लोचन नीरू।।
- RCM 2.326.2Open verse →
लखन राम सिय कानन बसहीं। भरतु भवन बसि तप तनु कसहीं।।
अर्थ · Hindi
लखन राम सिय कानन बसहीं। भरतु भवन बसि तप तनु कसहीं।।
- RCM 2.326.3Open verse →
दोउ दिसि समुझि कहत सबु लोगू। सब बिधि भरत सराहन जोगू।।
अर्थ · Hindi
दोउ दिसि समुझि कहत सबु लोगू। सब बिधि भरत सराहन जोगू।।
- RCM 2.326.4Open verse →
सुनि ब्रत नेम साधु सकुचाहीं। देखि दसा मुनिराज लजाहीं।।
अर्थ · Hindi
सुनि ब्रत नेम साधु सकुचाहीं। देखि दसा मुनिराज लजाहीं।।
- RCM 2.326.5Open verse →
परम पुनीत भरत आचरनू। मधुर मंजु मुद मंगल करनू।।
अर्थ · Hindi
परम पुनीत भरत आचरनू। मधुर मंजु मुद मंगल करनू।।
- RCM 2.326.6Open verse →
हरन कठिन कलि कलुष कलेसू। महामोह निसि दलन दिनेसू।।
अर्थ · Hindi
हरन कठिन कलि कलुष कलेसू। महामोह निसि दलन दिनेसू।।
- RCM 2.326.7Open verse →
पाप पुंज कुंजर मृगराजू। समन सकल संताप समाजू।
अर्थ · Hindi
पाप पुंज कुंजर मृगराजू। समन सकल संताप समाजू।
- RCM 2.326.8Open verse →
जन रंजन भंजन भव भारू। राम सनेह सुधाकर सारू।।
अर्थ · Hindi
जन रंजन भंजन भव भारू। राम सनेह सुधाकर सारू।।