Ramcharitmanas · अध्याय 1
Bala Kanda
बालकाण्ड
The childhood of Rama — invocations, the birth of the four princes, breaking of Shiva's bow, wedding of Sita.
- RCM 1.1001Open verse →
वर्णानामर्थसङ्घानां रसानां छन्दसामपि। मङ्गलानां च कर्त्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ॥
Meaning · English
I bow to Vani (Saraswati) and Vinayaka (Ganesha), the originators of sounds and their meanings, of rasas, of metres, and of all auspicious things.
- RCM 1.1.2Open verse →
अमिय मूरिमय चूरन चारू। समन सकल भव रुज परिवारू।।
अर्थ · Hindi
अमिय मूरिमय चूरन चारू। समन सकल भव रुज परिवारू।।
- RCM 1.1.3Open verse →
सुकृति संभु तन बिमल बिभूती। मंजुल मंगल मोद प्रसूती।।
अर्थ · Hindi
सुकृति संभु तन बिमल बिभूती। मंजुल मंगल मोद प्रसूती।।
- RCM 1.1.4Open verse →
जन मन मंजु मुकुर मल हरनी। किएँ तिलक गुन गन बस करनी।।
अर्थ · Hindi
जन मन मंजु मुकुर मल हरनी। किएँ तिलक गुन गन बस करनी।।
- RCM 1.1.5Open verse →
श्रीगुर पद नख मनि गन जोती। सुमिरत दिब्य द्रृष्टि हियँ होती।।
अर्थ · Hindi
श्रीगुर पद नख मनि गन जोती। सुमिरत दिब्य द्रृष्टि हियँ होती।।
- RCM 1.1.6Open verse →
दलन मोह तम सो सप्रकासू। बड़े भाग उर आवइ जासू।।
अर्थ · Hindi
दलन मोह तम सो सप्रकासू। बड़े भाग उर आवइ जासू।।
- RCM 1.1.7Open verse →
उघरहिं बिमल बिलोचन ही के। मिटहिं दोष दुख भव रजनी के।।
अर्थ · Hindi
उघरहिं बिमल बिलोचन ही के। मिटहिं दोष दुख भव रजनी के।।
- RCM 1.1.8Open verse →
सूझहिं राम चरित मनि मानिक। गुपुत प्रगट जहँ जो जेहि खानिक।।
अर्थ · Hindi
सूझहिं राम चरित मनि मानिक। गुपुत प्रगट जहँ जो जेहि खानिक।।
- RCM 1.1.9Open verse →
जथा सुअंजन अंजि दृग साधक सिद्ध सुजान।
अर्थ · Hindi
जथा सुअंजन अंजि दृग साधक सिद्ध सुजान।
- RCM 1.1.10Open verse →
कौतुक देखत सैल बन भूतल भूरि निधान।।1।।
अर्थ · Hindi
कौतुक देखत सैल बन भूतल भूरि निधान।।1।।
- RCM 1.2.1Open verse →
गुरु पद रज मृदु मंजुल अंजन। नयन अमिअ दृग दोष बिभंजन।।
अर्थ · Hindi
गुरु पद रज मृदु मंजुल अंजन। नयन अमिअ दृग दोष बिभंजन।।
- RCM 1.2.2Open verse →
तेहिं करि बिमल बिबेक बिलोचन। बरनउँ राम चरित भव मोचन।।
अर्थ · Hindi
तेहिं करि बिमल बिबेक बिलोचन। बरनउँ राम चरित भव मोचन।।
- RCM 1.2.3Open verse →
बंदउँ प्रथम महीसुर चरना। मोह जनित संसय सब हरना।।
अर्थ · Hindi
बंदउँ प्रथम महीसुर चरना। मोह जनित संसय सब हरना।।
- RCM 1.2.4Open verse →
सुजन समाज सकल गुन खानी। करउँ प्रनाम सप्रेम सुबानी।।
अर्थ · Hindi
सुजन समाज सकल गुन खानी। करउँ प्रनाम सप्रेम सुबानी।।
- RCM 1.2.5Open verse →
साधु चरित सुभ चरित कपासू। निरस बिसद गुनमय फल जासू।।
अर्थ · Hindi
साधु चरित सुभ चरित कपासू। निरस बिसद गुनमय फल जासू।।
- RCM 1.2.6Open verse →
जो सहि दुख परछिद्र दुरावा। बंदनीय जेहिं जग जस पावा।।
अर्थ · Hindi
जो सहि दुख परछिद्र दुरावा। बंदनीय जेहिं जग जस पावा।।
- RCM 1.2.7Open verse →
मुद मंगलमय संत समाजू। जो जग जंगम तीरथराजू।।
अर्थ · Hindi
मुद मंगलमय संत समाजू। जो जग जंगम तीरथराजू।।
- RCM 1.2.8Open verse →
राम भक्ति जहँ सुरसरि धारा। सरसइ ब्रह्म बिचार प्रचारा।।
अर्थ · Hindi
राम भक्ति जहँ सुरसरि धारा। सरसइ ब्रह्म बिचार प्रचारा।।
- RCM 1.2.9Open verse →
बिधि निषेधमय कलि मल हरनी। करम कथा रबिनंदनि बरनी।।
अर्थ · Hindi
बिधि निषेधमय कलि मल हरनी। करम कथा रबिनंदनि बरनी।।
- RCM 1.2.10Open verse →
हरि हर कथा बिराजति बेनी। सुनत सकल मुद मंगल देनी।।
अर्थ · Hindi
हरि हर कथा बिराजति बेनी। सुनत सकल मुद मंगल देनी।।
- RCM 1.2.11Open verse →
बटु बिस्वास अचल निज धरमा। तीरथराज समाज सुकरमा।।
अर्थ · Hindi
बटु बिस्वास अचल निज धरमा। तीरथराज समाज सुकरमा।।
- RCM 1.2.12Open verse →
सबहिं सुलभ सब दिन सब देसा। सेवत सादर समन कलेसा।।
अर्थ · Hindi
सबहिं सुलभ सब दिन सब देसा। सेवत सादर समन कलेसा।।
- RCM 1.2.13Open verse →
अकथ अलौकिक तीरथराऊ। देइ सद्य फल प्रगट प्रभाऊ।।
अर्थ · Hindi
अकथ अलौकिक तीरथराऊ। देइ सद्य फल प्रगट प्रभाऊ।।
- RCM 1.2.14Open verse →
सुनि समुझहिं जन मुदित मन मज्जहिं अति अनुराग।
अर्थ · Hindi
सुनि समुझहिं जन मुदित मन मज्जहिं अति अनुराग।
- RCM 1.2.15Open verse →
लहहिं चारि फल अछत तनु साधु समाज प्रयाग।।2।।
अर्थ · Hindi
लहहिं चारि फल अछत तनु साधु समाज प्रयाग।।2।।
- RCM 1.3.1Open verse →
मज्जन फल पेखिअ ततकाला। काक होहिं पिक बकउ मराला।।
अर्थ · Hindi
मज्जन फल पेखिअ ततकाला। काक होहिं पिक बकउ मराला।।
- RCM 1.3.2Open verse →
सुनि आचरज करै जनि कोई। सतसंगति महिमा नहिं गोई।।
अर्थ · Hindi
सुनि आचरज करै जनि कोई। सतसंगति महिमा नहिं गोई।।
- RCM 1.3.3Open verse →
बालमीक नारद घटजोनी। निज निज मुखनि कही निज होनी।।
अर्थ · Hindi
बालमीक नारद घटजोनी। निज निज मुखनि कही निज होनी।।
- RCM 1.3.4Open verse →
जलचर थलचर नभचर नाना। जे जड़ चेतन जीव जहाना।।
अर्थ · Hindi
जलचर थलचर नभचर नाना। जे जड़ चेतन जीव जहाना।।
- RCM 1.3.5Open verse →
मति कीरति गति भूति भलाई। जब जेहिं जतन जहाँ जेहिं पाई।।
अर्थ · Hindi
मति कीरति गति भूति भलाई। जब जेहिं जतन जहाँ जेहिं पाई।।
- RCM 1.3.6Open verse →
सो जानब सतसंग प्रभाऊ। लोकहुँ बेद न आन उपाऊ।।
अर्थ · Hindi
सो जानब सतसंग प्रभाऊ। लोकहुँ बेद न आन उपाऊ।।
- RCM 1.3.7Open verse →
बिनु सतसंग बिबेक न होई। राम कृपा बिनु सुलभ न सोई।।
अर्थ · Hindi
बिनु सतसंग बिबेक न होई। राम कृपा बिनु सुलभ न सोई।।
- RCM 1.3.8Open verse →
सतसंगत मुद मंगल मूला। सोइ फल सिधि सब साधन फूला।।
अर्थ · Hindi
सतसंगत मुद मंगल मूला। सोइ फल सिधि सब साधन फूला।।
- RCM 1.3.9Open verse →
सठ सुधरहिं सतसंगति पाई। पारस परस कुधात सुहाई।।
अर्थ · Hindi
सठ सुधरहिं सतसंगति पाई। पारस परस कुधात सुहाई।।
- RCM 1.3.10Open verse →
बिधि बस सुजन कुसंगत परहीं। फनि मनि सम निज गुन अनुसरहीं।।
अर्थ · Hindi
बिधि बस सुजन कुसंगत परहीं। फनि मनि सम निज गुन अनुसरहीं।।
- RCM 1.3.11Open verse →
बिधि हरि हर कबि कोबिद बानी। कहत साधु महिमा सकुचानी।।
अर्थ · Hindi
बिधि हरि हर कबि कोबिद बानी। कहत साधु महिमा सकुचानी।।
- RCM 1.3.12Open verse →
सो मो सन कहि जात न कैसें। साक बनिक मनि गुन गन जैसें।।
अर्थ · Hindi
सो मो सन कहि जात न कैसें। साक बनिक मनि गुन गन जैसें।।
- RCM 1.3.13Open verse →
बंदउँ संत समान चित हित अनहित नहिं कोइ।
अर्थ · Hindi
बंदउँ संत समान चित हित अनहित नहिं कोइ।
- RCM 1.3.14Open verse →
अंजलि गत सुभ सुमन जिमि सम सुगंध कर दोइ।।3(क)।।
अर्थ · Hindi
अंजलि गत सुभ सुमन जिमि सम सुगंध कर दोइ।।3(क)।।
- RCM 1.3.15Open verse →
संत सरल चित जगत हित जानि सुभाउ सनेहु।
अर्थ · Hindi
संत सरल चित जगत हित जानि सुभाउ सनेहु।
- RCM 1.3.16Open verse →
बालबिनय सुनि करि कृपा राम चरन रति देहु।।3(ख)।।
अर्थ · Hindi
बालबिनय सुनि करि कृपा राम चरन रति देहु।।3(ख)।।
- RCM 1.4.1Open verse →
बहुरि बंदि खल गन सतिभाएँ। जे बिनु काज दाहिनेहु बाएँ।।
अर्थ · Hindi
बहुरि बंदि खल गन सतिभाएँ। जे बिनु काज दाहिनेहु बाएँ।।
- RCM 1.4.2Open verse →
पर हित हानि लाभ जिन्ह केरें। उजरें हरष बिषाद बसेरें।।
अर्थ · Hindi
पर हित हानि लाभ जिन्ह केरें। उजरें हरष बिषाद बसेरें।।
- RCM 1.4.3Open verse →
हरि हर जस राकेस राहु से। पर अकाज भट सहसबाहु से।।
अर्थ · Hindi
हरि हर जस राकेस राहु से। पर अकाज भट सहसबाहु से।।
- RCM 1.4.4Open verse →
जे पर दोष लखहिं सहसाखी। पर हित घृत जिन्ह के मन माखी।।
अर्थ · Hindi
जे पर दोष लखहिं सहसाखी। पर हित घृत जिन्ह के मन माखी।।
- RCM 1.4.5Open verse →
तेज कृसानु रोष महिषेसा। अघ अवगुन धन धनी धनेसा।।
अर्थ · Hindi
तेज कृसानु रोष महिषेसा। अघ अवगुन धन धनी धनेसा।।
- RCM 1.4.6Open verse →
उदय केत सम हित सबही के। कुंभकरन सम सोवत नीके।।
अर्थ · Hindi
उदय केत सम हित सबही के। कुंभकरन सम सोवत नीके।।
- RCM 1.4.7Open verse →
पर अकाजु लगि तनु परिहरहीं। जिमि हिम उपल कृषी दलि गरहीं।।
अर्थ · Hindi
पर अकाजु लगि तनु परिहरहीं। जिमि हिम उपल कृषी दलि गरहीं।।
- RCM 1.4.8Open verse →
बंदउँ खल जस सेष सरोषा। सहस बदन बरनइ पर दोषा।।
अर्थ · Hindi
बंदउँ खल जस सेष सरोषा। सहस बदन बरनइ पर दोषा।।
- RCM 1.4.9Open verse →
पुनि प्रनवउँ पृथुराज समाना। पर अघ सुनइ सहस दस काना।।
अर्थ · Hindi
पुनि प्रनवउँ पृथुराज समाना। पर अघ सुनइ सहस दस काना।।
- RCM 1.4.10Open verse →
बहुरि सक्र सम बिनवउँ तेही। संतत सुरानीक हित जेही।।
अर्थ · Hindi
बहुरि सक्र सम बिनवउँ तेही। संतत सुरानीक हित जेही।।
- RCM 1.4.11Open verse →
बचन बज्र जेहि सदा पिआरा। सहस नयन पर दोष निहारा।।
अर्थ · Hindi
बचन बज्र जेहि सदा पिआरा। सहस नयन पर दोष निहारा।।
- RCM 1.4.12Open verse →
उदासीन अरि मीत हित सुनत जरहिं खल रीति।
अर्थ · Hindi
उदासीन अरि मीत हित सुनत जरहिं खल रीति।
- RCM 1.4.13Open verse →
जानि पानि जुग जोरि जन बिनती करइ सप्रीति।।4।।
अर्थ · Hindi
जानि पानि जुग जोरि जन बिनती करइ सप्रीति।।4।।
- RCM 1.5.1Open verse →
मैं अपनी दिसि कीन्ह निहोरा। तिन्ह निज ओर न लाउब भोरा।।
अर्थ · Hindi
मैं अपनी दिसि कीन्ह निहोरा। तिन्ह निज ओर न लाउब भोरा।।
- RCM 1.5.2Open verse →
बायस पलिअहिं अति अनुरागा। होहिं निरामिष कबहुँ कि कागा।।
अर्थ · Hindi
बायस पलिअहिं अति अनुरागा। होहिं निरामिष कबहुँ कि कागा।।
- RCM 1.5.3Open verse →
बंदउँ संत असज्जन चरना। दुखप्रद उभय बीच कछु बरना।।
अर्थ · Hindi
बंदउँ संत असज्जन चरना। दुखप्रद उभय बीच कछु बरना।।
- RCM 1.5.4Open verse →
बिछुरत एक प्रान हरि लेहीं। मिलत एक दुख दारुन देहीं।।
अर्थ · Hindi
बिछुरत एक प्रान हरि लेहीं। मिलत एक दुख दारुन देहीं।।
- RCM 1.5.5Open verse →
उपजहिं एक संग जग माहीं। जलज जोंक जिमि गुन बिलगाहीं।।
अर्थ · Hindi
उपजहिं एक संग जग माहीं। जलज जोंक जिमि गुन बिलगाहीं।।
- RCM 1.5.6Open verse →
सुधा सुरा सम साधू असाधू। जनक एक जग जलधि अगाधू।।
अर्थ · Hindi
सुधा सुरा सम साधू असाधू। जनक एक जग जलधि अगाधू।।
- RCM 1.5.7Open verse →
भल अनभल निज निज करतूती। लहत सुजस अपलोक बिभूती।।
अर्थ · Hindi
भल अनभल निज निज करतूती। लहत सुजस अपलोक बिभूती।।
- RCM 1.5.8Open verse →
सुधा सुधाकर सुरसरि साधू। गरल अनल कलिमल सरि ब्याधू।।
अर्थ · Hindi
सुधा सुधाकर सुरसरि साधू। गरल अनल कलिमल सरि ब्याधू।।
- RCM 1.5.9Open verse →
गुन अवगुन जानत सब कोई। जो जेहि भाव नीक तेहि सोई।।
अर्थ · Hindi
गुन अवगुन जानत सब कोई। जो जेहि भाव नीक तेहि सोई।।
- RCM 1.5.10Open verse →
भलो भलाइहि पै लहइ लहइ निचाइहि नीचु।
अर्थ · Hindi
भलो भलाइहि पै लहइ लहइ निचाइहि नीचु।
- RCM 1.5.11Open verse →
सुधा सराहिअ अमरताँ गरल सराहिअ मीचु।।5।।
अर्थ · Hindi
सुधा सराहिअ अमरताँ गरल सराहिअ मीचु।।5।।
- RCM 1.6.1Open verse →
खल अघ अगुन साधू गुन गाहा। उभय अपार उदधि अवगाहा।।
अर्थ · Hindi
खल अघ अगुन साधू गुन गाहा। उभय अपार उदधि अवगाहा।।
- RCM 1.6.2Open verse →
तेहि तें कछु गुन दोष बखाने। संग्रह त्याग न बिनु पहिचाने।।
अर्थ · Hindi
तेहि तें कछु गुन दोष बखाने। संग्रह त्याग न बिनु पहिचाने।।
- RCM 1.6.3Open verse →
भलेउ पोच सब बिधि उपजाए। गनि गुन दोष बेद बिलगाए।।
अर्थ · Hindi
भलेउ पोच सब बिधि उपजाए। गनि गुन दोष बेद बिलगाए।।
- RCM 1.6.4Open verse →
कहहिं बेद इतिहास पुराना। बिधि प्रपंचु गुन अवगुन साना।।
अर्थ · Hindi
कहहिं बेद इतिहास पुराना। बिधि प्रपंचु गुन अवगुन साना।।
- RCM 1.6.5Open verse →
दुख सुख पाप पुन्य दिन राती। साधु असाधु सुजाति कुजाती।।
अर्थ · Hindi
दुख सुख पाप पुन्य दिन राती। साधु असाधु सुजाति कुजाती।।
- RCM 1.6.6Open verse →
दानव देव ऊँच अरु नीचू। अमिअ सुजीवनु माहुरु मीचू।।
अर्थ · Hindi
दानव देव ऊँच अरु नीचू। अमिअ सुजीवनु माहुरु मीचू।।
- RCM 1.6.7Open verse →
माया ब्रह्म जीव जगदीसा। लच्छि अलच्छि रंक अवनीसा।।
अर्थ · Hindi
माया ब्रह्म जीव जगदीसा। लच्छि अलच्छि रंक अवनीसा।।
- RCM 1.6.8Open verse →
कासी मग सुरसरि क्रमनासा। मरु मारव महिदेव गवासा।।
अर्थ · Hindi
कासी मग सुरसरि क्रमनासा। मरु मारव महिदेव गवासा।।
- RCM 1.6.9Open verse →
सरग नरक अनुराग बिरागा। निगमागम गुन दोष बिभागा।।
अर्थ · Hindi
सरग नरक अनुराग बिरागा। निगमागम गुन दोष बिभागा।।
- RCM 1.6.10Open verse →
जड़ चेतन गुन दोषमय बिस्व कीन्ह करतार।
अर्थ · Hindi
जड़ चेतन गुन दोषमय बिस्व कीन्ह करतार।
- RCM 1.6.11Open verse →
संत हंस गुन गहहिं पय परिहरि बारि बिकार।।6।।
अर्थ · Hindi
संत हंस गुन गहहिं पय परिहरि बारि बिकार।।6।।
- RCM 1.7001Open verse →
श्रीगुरु चरन सरोज रज निज मनु मुकुरु सुधारि। बरनउँ रघुबर बिमल जसु जो दायकु फल चारि॥
Meaning · English
Cleansing the mirror of my mind with the dust of my Guru's lotus feet, I sing the pure glory of the best of the Raghu line, who bestows the four fruits of life.
- RCM 1.7.2Open verse →
काल सुभाउ करम बरिआई। भलेउ प्रकृति बस चुकइ भलाई।।
अर्थ · Hindi
काल सुभाउ करम बरिआई। भलेउ प्रकृति बस चुकइ भलाई।।
- RCM 1.7.3Open verse →
सो सुधारि हरिजन जिमि लेहीं। दलि दुख दोष बिमल जसु देहीं।।
अर्थ · Hindi
सो सुधारि हरिजन जिमि लेहीं। दलि दुख दोष बिमल जसु देहीं।।
- RCM 1.7.4Open verse →
खलउ करहिं भल पाइ सुसंगू। मिटइ न मलिन सुभाउ अभंगू।।
अर्थ · Hindi
खलउ करहिं भल पाइ सुसंगू। मिटइ न मलिन सुभाउ अभंगू।।
- RCM 1.7.5Open verse →
लखि सुबेष जग बंचक जेऊ। बेष प्रताप पूजिअहिं तेऊ।।
अर्थ · Hindi
लखि सुबेष जग बंचक जेऊ। बेष प्रताप पूजिअहिं तेऊ।।
- RCM 1.7.6Open verse →
उधरहिं अंत न होइ निबाहू। कालनेमि जिमि रावन राहू।।
अर्थ · Hindi
उधरहिं अंत न होइ निबाहू। कालनेमि जिमि रावन राहू।।
- RCM 1.7.7Open verse →
किएहुँ कुबेष साधु सनमानू। जिमि जग जामवंत हनुमानू।।
अर्थ · Hindi
किएहुँ कुबेष साधु सनमानू। जिमि जग जामवंत हनुमानू।।
- RCM 1.7.8Open verse →
हानि कुसंग सुसंगति लाहू। लोकहुँ बेद बिदित सब काहू।।
अर्थ · Hindi
हानि कुसंग सुसंगति लाहू। लोकहुँ बेद बिदित सब काहू।।
- RCM 1.7.9Open verse →
गगन चढ़इ रज पवन प्रसंगा। कीचहिं मिलइ नीच जल संगा।।
अर्थ · Hindi
गगन चढ़इ रज पवन प्रसंगा। कीचहिं मिलइ नीच जल संगा।।
- RCM 1.7.10Open verse →
साधु असाधु सदन सुक सारीं। सुमिरहिं राम देहिं गनि गारी।।
अर्थ · Hindi
साधु असाधु सदन सुक सारीं। सुमिरहिं राम देहिं गनि गारी।।
- RCM 1.7.11Open verse →
धूम कुसंगति कारिख होई। लिखिअ पुरान मंजु मसि सोई।।
अर्थ · Hindi
धूम कुसंगति कारिख होई। लिखिअ पुरान मंजु मसि सोई।।
- RCM 1.7.12Open verse →
सोइ जल अनल अनिल संघाता। होइ जलद जग जीवन दाता।।
अर्थ · Hindi
सोइ जल अनल अनिल संघाता। होइ जलद जग जीवन दाता।।
- RCM 1.7.13Open verse →
ग्रह भेषज जल पवन पट पाइ कुजोग सुजोग।
अर्थ · Hindi
ग्रह भेषज जल पवन पट पाइ कुजोग सुजोग।
- RCM 1.7.14Open verse →
होहि कुबस्तु सुबस्तु जग लखहिं सुलच्छन लोग।।7(क)।।
अर्थ · Hindi
होहि कुबस्तु सुबस्तु जग लखहिं सुलच्छन लोग।।7(क)।।
- RCM 1.7.15Open verse →
सम प्रकास तम पाख दुहुँ नाम भेद बिधि कीन्ह।
अर्थ · Hindi
सम प्रकास तम पाख दुहुँ नाम भेद बिधि कीन्ह।
- RCM 1.7.16Open verse →
ससि सोषक पोषक समुझि जग जस अपजस दीन्ह।।7(ख)।।
अर्थ · Hindi
ससि सोषक पोषक समुझि जग जस अपजस दीन्ह।।7(ख)।।
- RCM 1.7.17Open verse →
जड़ चेतन जग जीव जत सकल राममय जानि।
अर्थ · Hindi
जड़ चेतन जग जीव जत सकल राममय जानि।
- RCM 1.7.18Open verse →
बंदउँ सब के पद कमल सदा जोरि जुग पानि।।7(ग)।।
अर्थ · Hindi
बंदउँ सब के पद कमल सदा जोरि जुग पानि।।7(ग)।।
- RCM 1.7.19Open verse →
देव दनुज नर नाग खग प्रेत पितर गंधर्ब।
अर्थ · Hindi
देव दनुज नर नाग खग प्रेत पितर गंधर्ब।
- RCM 1.7.20Open verse →
बंदउँ किंनर रजनिचर कृपा करहु अब सर्ब।।7(घ)।।
अर्थ · Hindi
बंदउँ किंनर रजनिचर कृपा करहु अब सर्ब।।7(घ)।।
- RCM 1.8.1Open verse →
आकर चारि लाख चौरासी। जाति जीव जल थल नभ बासी।।
अर्थ · Hindi
आकर चारि लाख चौरासी। जाति जीव जल थल नभ बासी।।
- RCM 1.8.2Open verse →
सीय राममय सब जग जानी। करउँ प्रनाम जोरि जुग पानी।।
अर्थ · Hindi
सीय राममय सब जग जानी। करउँ प्रनाम जोरि जुग पानी।।
- RCM 1.8.3Open verse →
जानि कृपाकर किंकर मोहू। सब मिलि करहु छाड़ि छल छोहू।।
अर्थ · Hindi
जानि कृपाकर किंकर मोहू। सब मिलि करहु छाड़ि छल छोहू।।
- RCM 1.8.4Open verse →
निज बुधि बल भरोस मोहि नाहीं। तातें बिनय करउँ सब पाही।।
अर्थ · Hindi
निज बुधि बल भरोस मोहि नाहीं। तातें बिनय करउँ सब पाही।।
- RCM 1.8.5Open verse →
करन चहउँ रघुपति गुन गाहा। लघु मति मोरि चरित अवगाहा।।
अर्थ · Hindi
करन चहउँ रघुपति गुन गाहा। लघु मति मोरि चरित अवगाहा।।
- RCM 1.8.6Open verse →
सूझ न एकउ अंग उपाऊ। मन मति रंक मनोरथ राऊ।।
अर्थ · Hindi
सूझ न एकउ अंग उपाऊ। मन मति रंक मनोरथ राऊ।।
- RCM 1.8.7Open verse →
मति अति नीच ऊँचि रुचि आछी। चहिअ अमिअ जग जुरइ न छाछी।।
अर्थ · Hindi
मति अति नीच ऊँचि रुचि आछी। चहिअ अमिअ जग जुरइ न छाछी।।
- RCM 1.8.8Open verse →
छमिहहिं सज्जन मोरि ढिठाई। सुनिहहिं बालबचन मन लाई।।
अर्थ · Hindi
छमिहहिं सज्जन मोरि ढिठाई। सुनिहहिं बालबचन मन लाई।।
- RCM 1.8.9Open verse →
जौ बालक कह तोतरि बाता। सुनहिं मुदित मन पितु अरु माता।।
अर्थ · Hindi
जौ बालक कह तोतरि बाता। सुनहिं मुदित मन पितु अरु माता।।
- RCM 1.8.10Open verse →
हँसिहहि कूर कुटिल कुबिचारी। जे पर दूषन भूषनधारी।।
अर्थ · Hindi
हँसिहहि कूर कुटिल कुबिचारी। जे पर दूषन भूषनधारी।।
- RCM 1.8.11Open verse →
निज कवित केहि लाग न नीका। सरस होउ अथवा अति फीका।।
अर्थ · Hindi
निज कवित केहि लाग न नीका। सरस होउ अथवा अति फीका।।
- RCM 1.8.12Open verse →
जे पर भनिति सुनत हरषाही। ते बर पुरुष बहुत जग नाहीं।।
अर्थ · Hindi
जे पर भनिति सुनत हरषाही। ते बर पुरुष बहुत जग नाहीं।।
- RCM 1.8.13Open verse →
जग बहु नर सर सरि सम भाई। जे निज बाढ़ि बढ़हिं जल पाई।।
अर्थ · Hindi
जग बहु नर सर सरि सम भाई। जे निज बाढ़ि बढ़हिं जल पाई।।
- RCM 1.8.14Open verse →
सज्जन सकृत सिंधु सम कोई। देखि पूर बिधु बाढ़इ जोई।।
अर्थ · Hindi
सज्जन सकृत सिंधु सम कोई। देखि पूर बिधु बाढ़इ जोई।।
- RCM 1.8.15Open verse →
भाग छोट अभिलाषु बड़ करउँ एक बिस्वास।
अर्थ · Hindi
भाग छोट अभिलाषु बड़ करउँ एक बिस्वास।
- RCM 1.8.16Open verse →
पैहहिं सुख सुनि सुजन सब खल करहहिं उपहास।।8।।
अर्थ · Hindi
पैहहिं सुख सुनि सुजन सब खल करहहिं उपहास।।8।।
- RCM 1.9.1Open verse →
खल परिहास होइ हित मोरा। काक कहहिं कलकंठ कठोरा।।
अर्थ · Hindi
खल परिहास होइ हित मोरा। काक कहहिं कलकंठ कठोरा।।
- RCM 1.9.2Open verse →
हंसहि बक दादुर चातकही। हँसहिं मलिन खल बिमल बतकही।।
अर्थ · Hindi
हंसहि बक दादुर चातकही। हँसहिं मलिन खल बिमल बतकही।।
- RCM 1.9.3Open verse →
कबित रसिक न राम पद नेहू। तिन्ह कहँ सुखद हास रस एहू।।
अर्थ · Hindi
कबित रसिक न राम पद नेहू। तिन्ह कहँ सुखद हास रस एहू।।
- RCM 1.9.4Open verse →
भाषा भनिति भोरि मति मोरी। हँसिबे जोग हँसें नहिं खोरी।।
अर्थ · Hindi
भाषा भनिति भोरि मति मोरी। हँसिबे जोग हँसें नहिं खोरी।।
- RCM 1.9.5Open verse →
प्रभु पद प्रीति न सामुझि नीकी। तिन्हहि कथा सुनि लागहि फीकी।।
अर्थ · Hindi
प्रभु पद प्रीति न सामुझि नीकी। तिन्हहि कथा सुनि लागहि फीकी।।
- RCM 1.9.6Open verse →
हरि हर पद रति मति न कुतरकी। तिन्ह कहुँ मधुर कथा रघुवर की।।
अर्थ · Hindi
हरि हर पद रति मति न कुतरकी। तिन्ह कहुँ मधुर कथा रघुवर की।।
- RCM 1.9.7Open verse →
राम भगति भूषित जियँ जानी। सुनिहहिं सुजन सराहि सुबानी।।
अर्थ · Hindi
राम भगति भूषित जियँ जानी। सुनिहहिं सुजन सराहि सुबानी।।
- RCM 1.9.8Open verse →
कबि न होउँ नहिं बचन प्रबीनू। सकल कला सब बिद्या हीनू।।
अर्थ · Hindi
कबि न होउँ नहिं बचन प्रबीनू। सकल कला सब बिद्या हीनू।।
- RCM 1.9.9Open verse →
आखर अरथ अलंकृति नाना। छंद प्रबंध अनेक बिधाना।।
अर्थ · Hindi
आखर अरथ अलंकृति नाना। छंद प्रबंध अनेक बिधाना।।
- RCM 1.9.10Open verse →
भाव भेद रस भेद अपारा। कबित दोष गुन बिबिध प्रकारा।।
अर्थ · Hindi
भाव भेद रस भेद अपारा। कबित दोष गुन बिबिध प्रकारा।।
- RCM 1.9.11Open verse →
कबित बिबेक एक नहिं मोरें। सत्य कहउँ लिखि कागद कोरे।।
अर्थ · Hindi
कबित बिबेक एक नहिं मोरें। सत्य कहउँ लिखि कागद कोरे।।
- RCM 1.9.12Open verse →
भनिति मोरि सब गुन रहित बिस्व बिदित गुन एक।
अर्थ · Hindi
भनिति मोरि सब गुन रहित बिस्व बिदित गुन एक।
- RCM 1.9.13Open verse →
सो बिचारि सुनिहहिं सुमति जिन्ह कें बिमल बिवेक।।9।।
अर्थ · Hindi
सो बिचारि सुनिहहिं सुमति जिन्ह कें बिमल बिवेक।।9।।
- RCM 1.10.1Open verse →
एहि महँ रघुपति नाम उदारा। अति पावन पुरान श्रुति सारा।।
अर्थ · Hindi
एहि महँ रघुपति नाम उदारा। अति पावन पुरान श्रुति सारा।।
- RCM 1.10.2Open verse →
मंगल भवन अमंगल हारी। उमा सहित जेहि जपत पुरारी।।
अर्थ · Hindi
मंगल भवन अमंगल हारी। उमा सहित जेहि जपत पुरारी।।
- RCM 1.10.3Open verse →
भनिति बिचित्र सुकबि कृत जोऊ। राम नाम बिनु सोह न सोऊ।।
अर्थ · Hindi
भनिति बिचित्र सुकबि कृत जोऊ। राम नाम बिनु सोह न सोऊ।।
- RCM 1.10.4Open verse →
बिधुबदनी सब भाँति सँवारी। सोन न बसन बिना बर नारी।।
अर्थ · Hindi
बिधुबदनी सब भाँति सँवारी। सोन न बसन बिना बर नारी।।
- RCM 1.10.5Open verse →
सब गुन रहित कुकबि कृत बानी। राम नाम जस अंकित जानी।।
अर्थ · Hindi
सब गुन रहित कुकबि कृत बानी। राम नाम जस अंकित जानी।।
- RCM 1.10.6Open verse →
सादर कहहिं सुनहिं बुध ताही। मधुकर सरिस संत गुनग्राही।।
अर्थ · Hindi
सादर कहहिं सुनहिं बुध ताही। मधुकर सरिस संत गुनग्राही।।
- RCM 1.10.7Open verse →
जदपि कबित रस एकउ नाही। राम प्रताप प्रकट एहि माहीं।।
अर्थ · Hindi
जदपि कबित रस एकउ नाही। राम प्रताप प्रकट एहि माहीं।।
- RCM 1.10.8Open verse →
सोइ भरोस मोरें मन आवा। केहिं न सुसंग बडप्पनु पावा।।
अर्थ · Hindi
सोइ भरोस मोरें मन आवा। केहिं न सुसंग बडप्पनु पावा।।
- RCM 1.10.9Open verse →
धूमउ तजइ सहज करुआई। अगरु प्रसंग सुगंध बसाई।।
अर्थ · Hindi
धूमउ तजइ सहज करुआई। अगरु प्रसंग सुगंध बसाई।।
- RCM 1.10.10Open verse →
भनिति भदेस बस्तु भलि बरनी। राम कथा जग मंगल करनी।।
अर्थ · Hindi
भनिति भदेस बस्तु भलि बरनी। राम कथा जग मंगल करनी।।
- RCM 1.11.1Open verse →
मनि मानिक मुकुता छबि जैसी। अहि गिरि गज सिर सोह न तैसी।।
अर्थ · Hindi
मनि मानिक मुकुता छबि जैसी। अहि गिरि गज सिर सोह न तैसी।।
- RCM 1.11.2Open verse →
नृप किरीट तरुनी तनु पाई। लहहिं सकल सोभा अधिकाई।।
अर्थ · Hindi
नृप किरीट तरुनी तनु पाई। लहहिं सकल सोभा अधिकाई।।
- RCM 1.11.3Open verse →
तैसेहिं सुकबि कबित बुध कहहीं। उपजहिं अनत अनत छबि लहहीं।।
अर्थ · Hindi
तैसेहिं सुकबि कबित बुध कहहीं। उपजहिं अनत अनत छबि लहहीं।।
- RCM 1.11.4Open verse →
भगति हेतु बिधि भवन बिहाई। सुमिरत सारद आवति धाई।।
अर्थ · Hindi
भगति हेतु बिधि भवन बिहाई। सुमिरत सारद आवति धाई।।
- RCM 1.11.5Open verse →
राम चरित सर बिनु अन्हवाएँ। सो श्रम जाइ न कोटि उपाएँ।।
अर्थ · Hindi
राम चरित सर बिनु अन्हवाएँ। सो श्रम जाइ न कोटि उपाएँ।।
- RCM 1.11.6Open verse →
कबि कोबिद अस हृदयँ बिचारी। गावहिं हरि जस कलि मल हारी।।
अर्थ · Hindi
कबि कोबिद अस हृदयँ बिचारी। गावहिं हरि जस कलि मल हारी।।
- RCM 1.11.7Open verse →
कीन्हें प्राकृत जन गुन गाना। सिर धुनि गिरा लगत पछिताना।।
अर्थ · Hindi
कीन्हें प्राकृत जन गुन गाना। सिर धुनि गिरा लगत पछिताना।।
- RCM 1.11.8Open verse →
हृदय सिंधु मति सीप समाना। स्वाति सारदा कहहिं सुजाना।।
अर्थ · Hindi
हृदय सिंधु मति सीप समाना। स्वाति सारदा कहहिं सुजाना।।
- RCM 1.11.9Open verse →
जौं बरषइ बर बारि बिचारू। होहिं कबित मुकुतामनि चारू।।
अर्थ · Hindi
जौं बरषइ बर बारि बिचारू। होहिं कबित मुकुतामनि चारू।।
- RCM 1.11.10Open verse →
जुगुति बेधि पुनि पोहिअहिं रामचरित बर ताग।
अर्थ · Hindi
जुगुति बेधि पुनि पोहिअहिं रामचरित बर ताग।
- RCM 1.11.11Open verse →
पहिरहिं सज्जन बिमल उर सोभा अति अनुराग।।11।।
अर्थ · Hindi
पहिरहिं सज्जन बिमल उर सोभा अति अनुराग।।11।।
- RCM 1.12.1Open verse →
जे जनमे कलिकाल कराला। करतब बायस बेष मराला।।
अर्थ · Hindi
जे जनमे कलिकाल कराला। करतब बायस बेष मराला।।
- RCM 1.12.2Open verse →
चलत कुपंथ बेद मग छाँड़े। कपट कलेवर कलि मल भाँड़ें।।
अर्थ · Hindi
चलत कुपंथ बेद मग छाँड़े। कपट कलेवर कलि मल भाँड़ें।।
- RCM 1.12.3Open verse →
बंचक भगत कहाइ राम के। किंकर कंचन कोह काम के।।
अर्थ · Hindi
बंचक भगत कहाइ राम के। किंकर कंचन कोह काम के।।
- RCM 1.12.4Open verse →
तिन्ह महँ प्रथम रेख जग मोरी। धींग धरमध्वज धंधक धोरी।।
अर्थ · Hindi
तिन्ह महँ प्रथम रेख जग मोरी। धींग धरमध्वज धंधक धोरी।।
- RCM 1.12.5Open verse →
जौं अपने अवगुन सब कहऊँ। बाढ़इ कथा पार नहिं लहऊँ।।
अर्थ · Hindi
जौं अपने अवगुन सब कहऊँ। बाढ़इ कथा पार नहिं लहऊँ।।
- RCM 1.12.6Open verse →
ताते मैं अति अलप बखाने। थोरे महुँ जानिहहिं सयाने।।
अर्थ · Hindi
ताते मैं अति अलप बखाने। थोरे महुँ जानिहहिं सयाने।।
- RCM 1.12.7Open verse →
समुझि बिबिधि बिधि बिनती मोरी। कोउ न कथा सुनि देइहि खोरी।।
अर्थ · Hindi
समुझि बिबिधि बिधि बिनती मोरी। कोउ न कथा सुनि देइहि खोरी।।
- RCM 1.12.8Open verse →
एतेहु पर करिहहिं जे असंका। मोहि ते अधिक ते जड़ मति रंका।।
अर्थ · Hindi
एतेहु पर करिहहिं जे असंका। मोहि ते अधिक ते जड़ मति रंका।।
- RCM 1.12.9Open verse →
कबि न होउँ नहिं चतुर कहावउँ। मति अनुरूप राम गुन गावउँ।।
अर्थ · Hindi
कबि न होउँ नहिं चतुर कहावउँ। मति अनुरूप राम गुन गावउँ।।
- RCM 1.12.10Open verse →
कहँ रघुपति के चरित अपारा। कहँ मति मोरि निरत संसारा।।
अर्थ · Hindi
कहँ रघुपति के चरित अपारा। कहँ मति मोरि निरत संसारा।।
- RCM 1.12.11Open verse →
जेहिं मारुत गिरि मेरु उड़ाहीं। कहहु तूल केहि लेखे माहीं।।
अर्थ · Hindi
जेहिं मारुत गिरि मेरु उड़ाहीं। कहहु तूल केहि लेखे माहीं।।
- RCM 1.12.12Open verse →
समुझत अमित राम प्रभुताई। करत कथा मन अति कदराई।।
अर्थ · Hindi
समुझत अमित राम प्रभुताई। करत कथा मन अति कदराई।।
- RCM 1.12.13Open verse →
सारद सेस महेस बिधि आगम निगम पुरान।
अर्थ · Hindi
सारद सेस महेस बिधि आगम निगम पुरान।
- RCM 1.12.14Open verse →
नेति नेति कहि जासु गुन करहिं निरंतर गान।।12।।
अर्थ · Hindi
नेति नेति कहि जासु गुन करहिं निरंतर गान।।12।।
- RCM 1.13.1Open verse →
सब जानत प्रभु प्रभुता सोई। तदपि कहें बिनु रहा न कोई।।
अर्थ · Hindi
सब जानत प्रभु प्रभुता सोई। तदपि कहें बिनु रहा न कोई।।
- RCM 1.13.2Open verse →
तहाँ बेद अस कारन राखा। भजन प्रभाउ भाँति बहु भाषा।।
अर्थ · Hindi
तहाँ बेद अस कारन राखा। भजन प्रभाउ भाँति बहु भाषा।।
- RCM 1.13.3Open verse →
एक अनीह अरूप अनामा। अज सच्चिदानंद पर धामा।।
अर्थ · Hindi
एक अनीह अरूप अनामा। अज सच्चिदानंद पर धामा।।
- RCM 1.13.4Open verse →
ब्यापक बिस्वरूप भगवाना। तेहिं धरि देह चरित कृत नाना।।
अर्थ · Hindi
ब्यापक बिस्वरूप भगवाना। तेहिं धरि देह चरित कृत नाना।।
- RCM 1.13.5Open verse →
सो केवल भगतन हित लागी। परम कृपाल प्रनत अनुरागी।।
अर्थ · Hindi
सो केवल भगतन हित लागी। परम कृपाल प्रनत अनुरागी।।
- RCM 1.13.6Open verse →
जेहि जन पर ममता अति छोहू। जेहिं करुना करि कीन्ह न कोहू।।
अर्थ · Hindi
जेहि जन पर ममता अति छोहू। जेहिं करुना करि कीन्ह न कोहू।।
- RCM 1.13.7Open verse →
गई बहोर गरीब नेवाजू। सरल सबल साहिब रघुराजू।।
अर्थ · Hindi
गई बहोर गरीब नेवाजू। सरल सबल साहिब रघुराजू।।
- RCM 1.13.8Open verse →
बुध बरनहिं हरि जस अस जानी। करहि पुनीत सुफल निज बानी।।
अर्थ · Hindi
बुध बरनहिं हरि जस अस जानी। करहि पुनीत सुफल निज बानी।।
- RCM 1.13.9Open verse →
तेहिं बल मैं रघुपति गुन गाथा। कहिहउँ नाइ राम पद माथा।।
अर्थ · Hindi
तेहिं बल मैं रघुपति गुन गाथा। कहिहउँ नाइ राम पद माथा।।
- RCM 1.13.10Open verse →
मुनिन्ह प्रथम हरि कीरति गाई। तेहिं मग चलत सुगम मोहि भाई।।
अर्थ · Hindi
मुनिन्ह प्रथम हरि कीरति गाई। तेहिं मग चलत सुगम मोहि भाई।।
- RCM 1.13.11Open verse →
अति अपार जे सरित बर जौं नृप सेतु कराहिं।
अर्थ · Hindi
अति अपार जे सरित बर जौं नृप सेतु कराहिं।
- RCM 1.13.12Open verse →
चढि पिपीलिकउ परम लघु बिनु श्रम पारहि जाहिं।।13।।
अर्थ · Hindi
चढि पिपीलिकउ परम लघु बिनु श्रम पारहि जाहिं।।13।।
- RCM 1.14.1Open verse →
एहि प्रकार बल मनहि देखाई। करिहउँ रघुपति कथा सुहाई।।
अर्थ · Hindi
एहि प्रकार बल मनहि देखाई। करिहउँ रघुपति कथा सुहाई।।
- RCM 1.14.2Open verse →
ब्यास आदि कबि पुंगव नाना। जिन्ह सादर हरि सुजस बखाना।।
अर्थ · Hindi
ब्यास आदि कबि पुंगव नाना। जिन्ह सादर हरि सुजस बखाना।।
- RCM 1.14.3Open verse →
चरन कमल बंदउँ तिन्ह केरे। पुरवहुँ सकल मनोरथ मेरे।।
अर्थ · Hindi
चरन कमल बंदउँ तिन्ह केरे। पुरवहुँ सकल मनोरथ मेरे।।
- RCM 1.14.4Open verse →
कलि के कबिन्ह करउँ परनामा। जिन्ह बरने रघुपति गुन ग्रामा।।
अर्थ · Hindi
कलि के कबिन्ह करउँ परनामा। जिन्ह बरने रघुपति गुन ग्रामा।।
- RCM 1.14.5Open verse →
जे प्राकृत कबि परम सयाने। भाषाँ जिन्ह हरि चरित बखाने।।
अर्थ · Hindi
जे प्राकृत कबि परम सयाने। भाषाँ जिन्ह हरि चरित बखाने।।
- RCM 1.14.6Open verse →
भए जे अहहिं जे होइहहिं आगें। प्रनवउँ सबहिं कपट सब त्यागें।।
अर्थ · Hindi
भए जे अहहिं जे होइहहिं आगें। प्रनवउँ सबहिं कपट सब त्यागें।।
- RCM 1.14.7Open verse →
होहु प्रसन्न देहु बरदानू। साधु समाज भनिति सनमानू।।
अर्थ · Hindi
होहु प्रसन्न देहु बरदानू। साधु समाज भनिति सनमानू।।
- RCM 1.14.8Open verse →
जो प्रबंध बुध नहिं आदरहीं। सो श्रम बादि बाल कबि करहीं।।
अर्थ · Hindi
जो प्रबंध बुध नहिं आदरहीं। सो श्रम बादि बाल कबि करहीं।।
- RCM 1.14.9Open verse →
कीरति भनिति भूति भलि सोई। सुरसरि सम सब कहँ हित होई।।
अर्थ · Hindi
कीरति भनिति भूति भलि सोई। सुरसरि सम सब कहँ हित होई।।
- RCM 1.14.10Open verse →
राम सुकीरति भनिति भदेसा। असमंजस अस मोहि अँदेसा।।
अर्थ · Hindi
राम सुकीरति भनिति भदेसा। असमंजस अस मोहि अँदेसा।।
- RCM 1.14.11Open verse →
तुम्हरी कृपा सुलभ सोउ मोरे। सिअनि सुहावनि टाट पटोरे।।
अर्थ · Hindi
तुम्हरी कृपा सुलभ सोउ मोरे। सिअनि सुहावनि टाट पटोरे।।
- RCM 1.14.12Open verse →
सरल कबित कीरति बिमल सोइ आदरहिं सुजान।
अर्थ · Hindi
सरल कबित कीरति बिमल सोइ आदरहिं सुजान।
- RCM 1.14.13Open verse →
सहज बयर बिसराइ रिपु जो सुनि करहिं बखान।।14(क)।।
अर्थ · Hindi
सहज बयर बिसराइ रिपु जो सुनि करहिं बखान।।14(क)।।
- RCM 1.14.14Open verse →
सो न होइ बिनु बिमल मति मोहि मति बल अति थोर।
अर्थ · Hindi
सो न होइ बिनु बिमल मति मोहि मति बल अति थोर।
- RCM 1.14.15Open verse →
करहु कृपा हरि जस कहउँ पुनि पुनि करउँ निहोर।।14(ख)।।
अर्थ · Hindi
करहु कृपा हरि जस कहउँ पुनि पुनि करउँ निहोर।।14(ख)।।
- RCM 1.14.16Open verse →
कबि कोबिद रघुबर चरित मानस मंजु मराल।
अर्थ · Hindi
कबि कोबिद रघुबर चरित मानस मंजु मराल।
- RCM 1.14.17Open verse →
बाल बिनय सुनि सुरुचि लखि मोपर होहु कृपाल।।14(ग)।।
अर्थ · Hindi
बाल बिनय सुनि सुरुचि लखि मोपर होहु कृपाल।।14(ग)।।
- RCM 1.14.18Open verse →
बंदउँ मुनि पद कंजु रामायन जेहिं निरमयउ।
अर्थ · Hindi
बंदउँ मुनि पद कंजु रामायन जेहिं निरमयउ।
- RCM 1.14.19Open verse →
सखर सुकोमल मंजु दोष रहित दूषन सहित।।14(घ)।।
अर्थ · Hindi
सखर सुकोमल मंजु दोष रहित दूषन सहित।।14(घ)।।
- RCM 1.14.20Open verse →
बंदउँ चारिउ बेद भव बारिधि बोहित सरिस।
अर्थ · Hindi
बंदउँ चारिउ बेद भव बारिधि बोहित सरिस।
- RCM 1.14.21Open verse →
जिन्हहि न सपनेहुँ खेद बरनत रघुबर बिसद जसु।।14(ङ)।।
अर्थ · Hindi
जिन्हहि न सपनेहुँ खेद बरनत रघुबर बिसद जसु।।14(ङ)।।
- RCM 1.14.22Open verse →
बंदउँ बिधि पद रेनु भव सागर जेहि कीन्ह जहँ।
अर्थ · Hindi
बंदउँ बिधि पद रेनु भव सागर जेहि कीन्ह जहँ।
- RCM 1.14.23Open verse →
संत सुधा ससि धेनु प्रगटे खल बिष बारुनी।।14(च)।।
अर्थ · Hindi
संत सुधा ससि धेनु प्रगटे खल बिष बारुनी।।14(च)।।
- RCM 1.14.24Open verse →
बिबुध बिप्र बुध ग्रह चरन बंदि कहउँ कर जोरि।
अर्थ · Hindi
बिबुध बिप्र बुध ग्रह चरन बंदि कहउँ कर जोरि।
- RCM 1.14.25Open verse →
होइ प्रसन्न पुरवहु सकल मंजु मनोरथ मोरि।।14(छ)।।
अर्थ · Hindi
होइ प्रसन्न पुरवहु सकल मंजु मनोरथ मोरि।।14(छ)।।
- RCM 1.15.1Open verse →
पुनि बंदउँ सारद सुरसरिता। जुगल पुनीत मनोहर चरिता।।
अर्थ · Hindi
पुनि बंदउँ सारद सुरसरिता। जुगल पुनीत मनोहर चरिता।।
- RCM 1.15.2Open verse →
मज्जन पान पाप हर एका। कहत सुनत एक हर अबिबेका।।
अर्थ · Hindi
मज्जन पान पाप हर एका। कहत सुनत एक हर अबिबेका।।
- RCM 1.15.3Open verse →
गुर पितु मातु महेस भवानी। प्रनवउँ दीनबंधु दिन दानी।।
अर्थ · Hindi
गुर पितु मातु महेस भवानी। प्रनवउँ दीनबंधु दिन दानी।।
- RCM 1.15.4Open verse →
सेवक स्वामि सखा सिय पी के। हित निरुपधि सब बिधि तुलसीके।।
अर्थ · Hindi
सेवक स्वामि सखा सिय पी के। हित निरुपधि सब बिधि तुलसीके।।
- RCM 1.15.5Open verse →
कलि बिलोकि जग हित हर गिरिजा। साबर मंत्र जाल जिन्ह सिरिजा।।
अर्थ · Hindi
कलि बिलोकि जग हित हर गिरिजा। साबर मंत्र जाल जिन्ह सिरिजा।।
- RCM 1.15.6Open verse →
अनमिल आखर अरथ न जापू। प्रगट प्रभाउ महेस प्रतापू।।
अर्थ · Hindi
अनमिल आखर अरथ न जापू। प्रगट प्रभाउ महेस प्रतापू।।
- RCM 1.15.7Open verse →
सो उमेस मोहि पर अनुकूला। करिहिं कथा मुद मंगल मूला।।
अर्थ · Hindi
सो उमेस मोहि पर अनुकूला। करिहिं कथा मुद मंगल मूला।।
- RCM 1.15.8Open verse →
सुमिरि सिवा सिव पाइ पसाऊ। बरनउँ रामचरित चित चाऊ।।
अर्थ · Hindi
सुमिरि सिवा सिव पाइ पसाऊ। बरनउँ रामचरित चित चाऊ।।
- RCM 1.15.9Open verse →
भनिति मोरि सिव कृपाँ बिभाती। ससि समाज मिलि मनहुँ सुराती।।
अर्थ · Hindi
भनिति मोरि सिव कृपाँ बिभाती। ससि समाज मिलि मनहुँ सुराती।।
- RCM 1.15.10Open verse →
जे एहि कथहि सनेह समेता। कहिहहिं सुनिहहिं समुझि सचेता।।
अर्थ · Hindi
जे एहि कथहि सनेह समेता। कहिहहिं सुनिहहिं समुझि सचेता।।
- RCM 1.15.11Open verse →
होइहहिं राम चरन अनुरागी। कलि मल रहित सुमंगल भागी।।
अर्थ · Hindi
होइहहिं राम चरन अनुरागी। कलि मल रहित सुमंगल भागी।।
- RCM 1.15.12Open verse →
सपनेहुँ साचेहुँ मोहि पर जौं हर गौरि पसाउ।
अर्थ · Hindi
सपनेहुँ साचेहुँ मोहि पर जौं हर गौरि पसाउ।
- RCM 1.15.13Open verse →
तौ फुर होउ जो कहेउँ सब भाषा भनिति प्रभाउ।।15।।
अर्थ · Hindi
तौ फुर होउ जो कहेउँ सब भाषा भनिति प्रभाउ।।15।।
- RCM 1.16.1Open verse →
बंदउँ अवध पुरी अति पावनि। सरजू सरि कलि कलुष नसावनि।।
अर्थ · Hindi
बंदउँ अवध पुरी अति पावनि। सरजू सरि कलि कलुष नसावनि।।
- RCM 1.16.2Open verse →
प्रनवउँ पुर नर नारि बहोरी। ममता जिन्ह पर प्रभुहि न थोरी।।
अर्थ · Hindi
प्रनवउँ पुर नर नारि बहोरी। ममता जिन्ह पर प्रभुहि न थोरी।।
- RCM 1.16.3Open verse →
सिय निंदक अघ ओघ नसाए। लोक बिसोक बनाइ बसाए।।
अर्थ · Hindi
सिय निंदक अघ ओघ नसाए। लोक बिसोक बनाइ बसाए।।
- RCM 1.16.4Open verse →
बंदउँ कौसल्या दिसि प्राची। कीरति जासु सकल जग माची।।
अर्थ · Hindi
बंदउँ कौसल्या दिसि प्राची। कीरति जासु सकल जग माची।।
- RCM 1.16.5Open verse →
प्रगटेउ जहँ रघुपति ससि चारू। बिस्व सुखद खल कमल तुसारू।।
अर्थ · Hindi
प्रगटेउ जहँ रघुपति ससि चारू। बिस्व सुखद खल कमल तुसारू।।
- RCM 1.16.6Open verse →
दसरथ राउ सहित सब रानी। सुकृत सुमंगल मूरति मानी।।
अर्थ · Hindi
दसरथ राउ सहित सब रानी। सुकृत सुमंगल मूरति मानी।।
- RCM 1.16.7Open verse →
करउँ प्रनाम करम मन बानी। करहु कृपा सुत सेवक जानी।।
अर्थ · Hindi
करउँ प्रनाम करम मन बानी। करहु कृपा सुत सेवक जानी।।
- RCM 1.16.8Open verse →
जिन्हहि बिरचि बड़ भयउ बिधाता। महिमा अवधि राम पितु माता।।
अर्थ · Hindi
जिन्हहि बिरचि बड़ भयउ बिधाता। महिमा अवधि राम पितु माता।।
- RCM 1.16.9Open verse →
बंदउँ अवध भुआल सत्य प्रेम जेहि राम पद।
अर्थ · Hindi
बंदउँ अवध भुआल सत्य प्रेम जेहि राम पद।
- RCM 1.16.10Open verse →
बिछुरत दीनदयाल प्रिय तनु तृन इव परिहरेउ।।16।।
अर्थ · Hindi
बिछुरत दीनदयाल प्रिय तनु तृन इव परिहरेउ।।16।।
- RCM 1.17.1Open verse →
प्रनवउँ परिजन सहित बिदेहू। जाहि राम पद गूढ़ सनेहू।।
अर्थ · Hindi
प्रनवउँ परिजन सहित बिदेहू। जाहि राम पद गूढ़ सनेहू।।
- RCM 1.17.2Open verse →
जोग भोग महँ राखेउ गोई। राम बिलोकत प्रगटेउ सोई।।
अर्थ · Hindi
जोग भोग महँ राखेउ गोई। राम बिलोकत प्रगटेउ सोई।।
- RCM 1.17.3Open verse →
प्रनवउँ प्रथम भरत के चरना। जासु नेम ब्रत जाइ न बरना।।
अर्थ · Hindi
प्रनवउँ प्रथम भरत के चरना। जासु नेम ब्रत जाइ न बरना।।
- RCM 1.17.4Open verse →
राम चरन पंकज मन जासू। लुबुध मधुप इव तजइ न पासू।।
अर्थ · Hindi
राम चरन पंकज मन जासू। लुबुध मधुप इव तजइ न पासू।।
- RCM 1.17.5Open verse →
बंदउँ लछिमन पद जलजाता। सीतल सुभग भगत सुख दाता।।
अर्थ · Hindi
बंदउँ लछिमन पद जलजाता। सीतल सुभग भगत सुख दाता।।
- RCM 1.17.6Open verse →
रघुपति कीरति बिमल पताका। दंड समान भयउ जस जाका।।
अर्थ · Hindi
रघुपति कीरति बिमल पताका। दंड समान भयउ जस जाका।।
- RCM 1.17.7Open verse →
सेष सहस्त्रसीस जग कारन। जो अवतरेउ भूमि भय टारन।।
अर्थ · Hindi
सेष सहस्त्रसीस जग कारन। जो अवतरेउ भूमि भय टारन।।
- RCM 1.17.8Open verse →
सदा सो सानुकूल रह मो पर। कृपासिंधु सौमित्रि गुनाकर।।
अर्थ · Hindi
सदा सो सानुकूल रह मो पर। कृपासिंधु सौमित्रि गुनाकर।।
- RCM 1.17.9Open verse →
रिपुसूदन पद कमल नमामी। सूर सुसील भरत अनुगामी।।
अर्थ · Hindi
रिपुसूदन पद कमल नमामी। सूर सुसील भरत अनुगामी।।
- RCM 1.17.10Open verse →
महावीर बिनवउँ हनुमाना। राम जासु जस आप बखाना।।
अर्थ · Hindi
महावीर बिनवउँ हनुमाना। राम जासु जस आप बखाना।।
- RCM 1.17.11Open verse →
प्रनवउँ पवनकुमार खल बन पावक ग्यानधन।
अर्थ · Hindi
प्रनवउँ पवनकुमार खल बन पावक ग्यानधन।
- RCM 1.17.12Open verse →
जासु हृदय आगार बसहिं राम सर चाप धर।।17।।
अर्थ · Hindi
जासु हृदय आगार बसहिं राम सर चाप धर।।17।।
- RCM 1.18.1Open verse →
कपिपति रीछ निसाचर राजा। अंगदादि जे कीस समाजा।।
अर्थ · Hindi
कपिपति रीछ निसाचर राजा। अंगदादि जे कीस समाजा।।
- RCM 1.18.2Open verse →
बंदउँ सब के चरन सुहाए। अधम सरीर राम जिन्ह पाए।।
अर्थ · Hindi
बंदउँ सब के चरन सुहाए। अधम सरीर राम जिन्ह पाए।।
- RCM 1.18.3Open verse →
रघुपति चरन उपासक जेते। खग मृग सुर नर असुर समेते।।
अर्थ · Hindi
रघुपति चरन उपासक जेते। खग मृग सुर नर असुर समेते।।
- RCM 1.18.4Open verse →
बंदउँ पद सरोज सब केरे। जे बिनु काम राम के चेरे।।
अर्थ · Hindi
बंदउँ पद सरोज सब केरे। जे बिनु काम राम के चेरे।।
- RCM 1.18.5Open verse →
सुक सनकादि भगत मुनि नारद। जे मुनिबर बिग्यान बिसारद।।
अर्थ · Hindi
सुक सनकादि भगत मुनि नारद। जे मुनिबर बिग्यान बिसारद।।
- RCM 1.18.6Open verse →
प्रनवउँ सबहिं धरनि धरि सीसा। करहु कृपा जन जानि मुनीसा।।
अर्थ · Hindi
प्रनवउँ सबहिं धरनि धरि सीसा। करहु कृपा जन जानि मुनीसा।।
- RCM 1.18.7Open verse →
जनकसुता जग जननि जानकी। अतिसय प्रिय करुना निधान की।।
अर्थ · Hindi
जनकसुता जग जननि जानकी। अतिसय प्रिय करुना निधान की।।
- RCM 1.18.8Open verse →
ताके जुग पद कमल मनावउँ। जासु कृपाँ निरमल मति पावउँ।।
अर्थ · Hindi
ताके जुग पद कमल मनावउँ। जासु कृपाँ निरमल मति पावउँ।।
- RCM 1.18.9Open verse →
पुनि मन बचन कर्म रघुनायक। चरन कमल बंदउँ सब लायक।।
अर्थ · Hindi
पुनि मन बचन कर्म रघुनायक। चरन कमल बंदउँ सब लायक।।
- RCM 1.18.10Open verse →
राजिवनयन धरें धनु सायक। भगत बिपति भंजन सुख दायक।।
अर्थ · Hindi
राजिवनयन धरें धनु सायक। भगत बिपति भंजन सुख दायक।।
- RCM 1.18.11Open verse →
गिरा अरथ जल बीचि सम कहिअत भिन्न न भिन्न।
अर्थ · Hindi
गिरा अरथ जल बीचि सम कहिअत भिन्न न भिन्न।
- RCM 1.18.12Open verse →
बदउँ सीता राम पद जिन्हहि परम प्रिय खिन्न।।18।।
अर्थ · Hindi
बदउँ सीता राम पद जिन्हहि परम प्रिय खिन्न।।18।।
- RCM 1.19.1Open verse →
बंदउँ नाम राम रघुवर को। हेतु कृसानु भानु हिमकर को।।
अर्थ · Hindi
बंदउँ नाम राम रघुवर को। हेतु कृसानु भानु हिमकर को।।
- RCM 1.19.2Open verse →
बिधि हरि हरमय बेद प्रान सो। अगुन अनूपम गुन निधान सो।।
अर्थ · Hindi
बिधि हरि हरमय बेद प्रान सो। अगुन अनूपम गुन निधान सो।।
- RCM 1.19.3Open verse →
महामंत्र जोइ जपत महेसू। कासीं मुकुति हेतु उपदेसू।।
अर्थ · Hindi
महामंत्र जोइ जपत महेसू। कासीं मुकुति हेतु उपदेसू।।
- RCM 1.19.4Open verse →
महिमा जासु जान गनराउ। प्रथम पूजिअत नाम प्रभाऊ।।
अर्थ · Hindi
महिमा जासु जान गनराउ। प्रथम पूजिअत नाम प्रभाऊ।।
- RCM 1.19.5Open verse →
जान आदिकबि नाम प्रतापू। भयउ सुद्ध करि उलटा जापू।।
अर्थ · Hindi
जान आदिकबि नाम प्रतापू। भयउ सुद्ध करि उलटा जापू।।
- RCM 1.19.6Open verse →
सहस नाम सम सुनि सिव बानी। जपि जेई पिय संग भवानी।।
अर्थ · Hindi
सहस नाम सम सुनि सिव बानी। जपि जेई पिय संग भवानी।।
- RCM 1.19.7Open verse →
हरषे हेतु हेरि हर ही को। किय भूषन तिय भूषन ती को।।
अर्थ · Hindi
हरषे हेतु हेरि हर ही को। किय भूषन तिय भूषन ती को।।
- RCM 1.19.8Open verse →
नाम प्रभाउ जान सिव नीको। कालकूट फलु दीन्ह अमी को।।
अर्थ · Hindi
नाम प्रभाउ जान सिव नीको। कालकूट फलु दीन्ह अमी को।।
- RCM 1.19.9Open verse →
बरषा रितु रघुपति भगति तुलसी सालि सुदास।।
अर्थ · Hindi
बरषा रितु रघुपति भगति तुलसी सालि सुदास।।
- RCM 1.19.10Open verse →
राम नाम बर बरन जुग सावन भादव मास।।19।।
अर्थ · Hindi
राम नाम बर बरन जुग सावन भादव मास।।19।।
- RCM 1.20.1Open verse →
आखर मधुर मनोहर दोऊ। बरन बिलोचन जन जिय जोऊ।।
अर्थ · Hindi
आखर मधुर मनोहर दोऊ। बरन बिलोचन जन जिय जोऊ।।
- RCM 1.20.2Open verse →
सुमिरत सुलभ सुखद सब काहू। लोक लाहु परलोक निबाहू।।
अर्थ · Hindi
सुमिरत सुलभ सुखद सब काहू। लोक लाहु परलोक निबाहू।।
- RCM 1.20.3Open verse →
कहत सुनत सुमिरत सुठि नीके। राम लखन सम प्रिय तुलसी के।।
अर्थ · Hindi
कहत सुनत सुमिरत सुठि नीके। राम लखन सम प्रिय तुलसी के।।
- RCM 1.20.4Open verse →
बरनत बरन प्रीति बिलगाती। ब्रह्म जीव सम सहज सँघाती।।
अर्थ · Hindi
बरनत बरन प्रीति बिलगाती। ब्रह्म जीव सम सहज सँघाती।।
- RCM 1.20.5Open verse →
नर नारायन सरिस सुभ्राता। जग पालक बिसेषि जन त्राता।।
अर्थ · Hindi
नर नारायन सरिस सुभ्राता। जग पालक बिसेषि जन त्राता।।
- RCM 1.20.6Open verse →
भगति सुतिय कल करन बिभूषन। जग हित हेतु बिमल बिधु पूषन ।
अर्थ · Hindi
भगति सुतिय कल करन बिभूषन। जग हित हेतु बिमल बिधु पूषन ।
- RCM 1.20.7Open verse →
स्वाद तोष सम सुगति सुधा के। कमठ सेष सम धर बसुधा के।।
अर्थ · Hindi
स्वाद तोष सम सुगति सुधा के। कमठ सेष सम धर बसुधा के।।
- RCM 1.20.8Open verse →
जन मन मंजु कंज मधुकर से। जीह जसोमति हरि हलधर से।।
अर्थ · Hindi
जन मन मंजु कंज मधुकर से। जीह जसोमति हरि हलधर से।।
- RCM 1.20.9Open verse →
एकु छत्रु एकु मुकुटमनि सब बरननि पर जोउ।
अर्थ · Hindi
एकु छत्रु एकु मुकुटमनि सब बरननि पर जोउ।
- RCM 1.20.10Open verse →
तुलसी रघुबर नाम के बरन बिराजत दोउ।।20।।
अर्थ · Hindi
तुलसी रघुबर नाम के बरन बिराजत दोउ।।20।।
- RCM 1.21.1Open verse →
समुझत सरिस नाम अरु नामी। प्रीति परसपर प्रभु अनुगामी।।
अर्थ · Hindi
समुझत सरिस नाम अरु नामी। प्रीति परसपर प्रभु अनुगामी।।
- RCM 1.21.2Open verse →
नाम रूप दुइ ईस उपाधी। अकथ अनादि सुसामुझि साधी।।
अर्थ · Hindi
नाम रूप दुइ ईस उपाधी। अकथ अनादि सुसामुझि साधी।।
- RCM 1.21.3Open verse →
को बड़ छोट कहत अपराधू। सुनि गुन भेद समुझिहहिं साधू।।
अर्थ · Hindi
को बड़ छोट कहत अपराधू। सुनि गुन भेद समुझिहहिं साधू।।
- RCM 1.21.4Open verse →
देखिअहिं रूप नाम आधीना। रूप ग्यान नहिं नाम बिहीना।।
अर्थ · Hindi
देखिअहिं रूप नाम आधीना। रूप ग्यान नहिं नाम बिहीना।।
- RCM 1.21.5Open verse →
रूप बिसेष नाम बिनु जानें। करतल गत न परहिं पहिचानें।।
अर्थ · Hindi
रूप बिसेष नाम बिनु जानें। करतल गत न परहिं पहिचानें।।
- RCM 1.21.6Open verse →
सुमिरिअ नाम रूप बिनु देखें। आवत हृदयँ सनेह बिसेषें।।
अर्थ · Hindi
सुमिरिअ नाम रूप बिनु देखें। आवत हृदयँ सनेह बिसेषें।।
- RCM 1.21.7Open verse →
नाम रूप गति अकथ कहानी। समुझत सुखद न परति बखानी।।
अर्थ · Hindi
नाम रूप गति अकथ कहानी। समुझत सुखद न परति बखानी।।
- RCM 1.21.8Open verse →
अगुन सगुन बिच नाम सुसाखी। उभय प्रबोधक चतुर दुभाषी।।
अर्थ · Hindi
अगुन सगुन बिच नाम सुसाखी। उभय प्रबोधक चतुर दुभाषी।।
- RCM 1.21.9Open verse →
राम नाम मनिदीप धरु जीह देहरी द्वार।
अर्थ · Hindi
राम नाम मनिदीप धरु जीह देहरी द्वार।
- RCM 1.21.10Open verse →
तुलसी भीतर बाहेरहुँ जौं चाहसि उजिआर।।21।।
अर्थ · Hindi
तुलसी भीतर बाहेरहुँ जौं चाहसि उजिआर।।21।।
- RCM 1.22.1Open verse →
नाम जीहँ जपि जागहिं जोगी। बिरति बिरंचि प्रपंच बियोगी।।
अर्थ · Hindi
नाम जीहँ जपि जागहिं जोगी। बिरति बिरंचि प्रपंच बियोगी।।
- RCM 1.22.2Open verse →
ब्रह्मसुखहि अनुभवहिं अनूपा। अकथ अनामय नाम न रूपा।।
अर्थ · Hindi
ब्रह्मसुखहि अनुभवहिं अनूपा। अकथ अनामय नाम न रूपा।।
- RCM 1.22.3Open verse →
जाना चहहिं गूढ़ गति जेऊ। नाम जीहँ जपि जानहिं तेऊ।।
अर्थ · Hindi
जाना चहहिं गूढ़ गति जेऊ। नाम जीहँ जपि जानहिं तेऊ।।
- RCM 1.22.4Open verse →
साधक नाम जपहिं लय लाएँ। होहिं सिद्ध अनिमादिक पाएँ।।
अर्थ · Hindi
साधक नाम जपहिं लय लाएँ। होहिं सिद्ध अनिमादिक पाएँ।।
- RCM 1.22.5Open verse →
जपहिं नामु जन आरत भारी। मिटहिं कुसंकट होहिं सुखारी।।
अर्थ · Hindi
जपहिं नामु जन आरत भारी। मिटहिं कुसंकट होहिं सुखारी।।
- RCM 1.22.6Open verse →
राम भगत जग चारि प्रकारा। सुकृती चारिउ अनघ उदारा।।
अर्थ · Hindi
राम भगत जग चारि प्रकारा। सुकृती चारिउ अनघ उदारा।।
- RCM 1.22.7Open verse →
चहू चतुर कहुँ नाम अधारा। ग्यानी प्रभुहि बिसेषि पिआरा।।
अर्थ · Hindi
चहू चतुर कहुँ नाम अधारा। ग्यानी प्रभुहि बिसेषि पिआरा।।
- RCM 1.22.8Open verse →
चहुँ जुग चहुँ श्रुति ना प्रभाऊ। कलि बिसेषि नहिं आन उपाऊ।।
अर्थ · Hindi
चहुँ जुग चहुँ श्रुति ना प्रभाऊ। कलि बिसेषि नहिं आन उपाऊ।।
- RCM 1.22.9Open verse →
सकल कामना हीन जे राम भगति रस लीन।
अर्थ · Hindi
सकल कामना हीन जे राम भगति रस लीन।
- RCM 1.22.10Open verse →
नाम सुप्रेम पियूष हद तिन्हहुँ किए मन मीन।।22।।
अर्थ · Hindi
नाम सुप्रेम पियूष हद तिन्हहुँ किए मन मीन।।22।।
- RCM 1.23.1Open verse →
अगुन सगुन दुइ ब्रह्म सरूपा। अकथ अगाध अनादि अनूपा।।
अर्थ · Hindi
अगुन सगुन दुइ ब्रह्म सरूपा। अकथ अगाध अनादि अनूपा।।
- RCM 1.23.2Open verse →
मोरें मत बड़ नामु दुहू तें। किए जेहिं जुग निज बस निज बूतें।।
अर्थ · Hindi
मोरें मत बड़ नामु दुहू तें। किए जेहिं जुग निज बस निज बूतें।।
- RCM 1.23.3Open verse →
प्रोढ़ि सुजन जनि जानहिं जन की। कहउँ प्रतीति प्रीति रुचि मन की।।
अर्थ · Hindi
प्रोढ़ि सुजन जनि जानहिं जन की। कहउँ प्रतीति प्रीति रुचि मन की।।
- RCM 1.23.4Open verse →
एकु दारुगत देखिअ एकू। पावक सम जुग ब्रह्म बिबेकू।।
अर्थ · Hindi
एकु दारुगत देखिअ एकू। पावक सम जुग ब्रह्म बिबेकू।।
- RCM 1.23.5Open verse →
उभय अगम जुग सुगम नाम तें। कहेउँ नामु बड़ ब्रह्म राम तें।।
अर्थ · Hindi
उभय अगम जुग सुगम नाम तें। कहेउँ नामु बड़ ब्रह्म राम तें।।
- RCM 1.23.6Open verse →
ब्यापकु एकु ब्रह्म अबिनासी। सत चेतन धन आनँद रासी।।
अर्थ · Hindi
ब्यापकु एकु ब्रह्म अबिनासी। सत चेतन धन आनँद रासी।।
- RCM 1.23.7Open verse →
अस प्रभु हृदयँ अछत अबिकारी। सकल जीव जग दीन दुखारी।।
अर्थ · Hindi
अस प्रभु हृदयँ अछत अबिकारी। सकल जीव जग दीन दुखारी।।
- RCM 1.23.8Open verse →
नाम निरूपन नाम जतन तें। सोउ प्रगटत जिमि मोल रतन तें।।
अर्थ · Hindi
नाम निरूपन नाम जतन तें। सोउ प्रगटत जिमि मोल रतन तें।।
- RCM 1.23.9Open verse →
निरगुन तें एहि भाँति बड़ नाम प्रभाउ अपार।
अर्थ · Hindi
निरगुन तें एहि भाँति बड़ नाम प्रभाउ अपार।
- RCM 1.23.10Open verse →
कहउँ नामु बड़ राम तें निज बिचार अनुसार।।23।।
अर्थ · Hindi
कहउँ नामु बड़ राम तें निज बिचार अनुसार।।23।।
- RCM 1.24.1Open verse →
राम भगत हित नर तनु धारी। सहि संकट किए साधु सुखारी।।
अर्थ · Hindi
राम भगत हित नर तनु धारी। सहि संकट किए साधु सुखारी।।
- RCM 1.24.2Open verse →
नामु सप्रेम जपत अनयासा। भगत होहिं मुद मंगल बासा।।
अर्थ · Hindi
नामु सप्रेम जपत अनयासा। भगत होहिं मुद मंगल बासा।।
- RCM 1.24.3Open verse →
राम एक तापस तिय तारी। नाम कोटि खल कुमति सुधारी।।
अर्थ · Hindi
राम एक तापस तिय तारी। नाम कोटि खल कुमति सुधारी।।
- RCM 1.24.4Open verse →
रिषि हित राम सुकेतुसुता की। सहित सेन सुत कीन्ह बिबाकी।।
अर्थ · Hindi
रिषि हित राम सुकेतुसुता की। सहित सेन सुत कीन्ह बिबाकी।।
- RCM 1.24.5Open verse →
सहित दोष दुख दास दुरासा। दलइ नामु जिमि रबि निसि नासा।।
अर्थ · Hindi
सहित दोष दुख दास दुरासा। दलइ नामु जिमि रबि निसि नासा।।
- RCM 1.24.6Open verse →
भंजेउ राम आपु भव चापू। भव भय भंजन नाम प्रतापू।।
अर्थ · Hindi
भंजेउ राम आपु भव चापू। भव भय भंजन नाम प्रतापू।।
- RCM 1.24.7Open verse →
दंडक बनु प्रभु कीन्ह सुहावन। जन मन अमित नाम किए पावन।।।
अर्थ · Hindi
दंडक बनु प्रभु कीन्ह सुहावन। जन मन अमित नाम किए पावन।।।
- RCM 1.24.8Open verse →
निसिचर निकर दले रघुनंदन। नामु सकल कलि कलुष निकंदन।।
अर्थ · Hindi
निसिचर निकर दले रघुनंदन। नामु सकल कलि कलुष निकंदन।।
- RCM 1.24.9Open verse →
सबरी गीध सुसेवकनि सुगति दीन्हि रघुनाथ।
अर्थ · Hindi
सबरी गीध सुसेवकनि सुगति दीन्हि रघुनाथ।
- RCM 1.24.10Open verse →
नाम उधारे अमित खल बेद बिदित गुन गाथ।।24।।
अर्थ · Hindi
नाम उधारे अमित खल बेद बिदित गुन गाथ।।24।।
- RCM 1.25.1Open verse →
राम सुकंठ बिभीषन दोऊ। राखे सरन जान सबु कोऊ।।
अर्थ · Hindi
राम सुकंठ बिभीषन दोऊ। राखे सरन जान सबु कोऊ।।
- RCM 1.25.2Open verse →
नाम गरीब अनेक नेवाजे। लोक बेद बर बिरिद बिराजे।।
अर्थ · Hindi
नाम गरीब अनेक नेवाजे। लोक बेद बर बिरिद बिराजे।।
- RCM 1.25.3Open verse →
राम भालु कपि कटकु बटोरा। सेतु हेतु श्रमु कीन्ह न थोरा।।
अर्थ · Hindi
राम भालु कपि कटकु बटोरा। सेतु हेतु श्रमु कीन्ह न थोरा।।
- RCM 1.25.4Open verse →
नामु लेत भवसिंधु सुखाहीं। करहु बिचारु सुजन मन माहीं।।
अर्थ · Hindi
नामु लेत भवसिंधु सुखाहीं। करहु बिचारु सुजन मन माहीं।।
- RCM 1.25.5Open verse →
राम सकुल रन रावनु मारा। सीय सहित निज पुर पगु धारा।।
अर्थ · Hindi
राम सकुल रन रावनु मारा। सीय सहित निज पुर पगु धारा।।
- RCM 1.25.6Open verse →
राजा रामु अवध रजधानी। गावत गुन सुर मुनि बर बानी।।
अर्थ · Hindi
राजा रामु अवध रजधानी। गावत गुन सुर मुनि बर बानी।।
- RCM 1.25.7Open verse →
सेवक सुमिरत नामु सप्रीती। बिनु श्रम प्रबल मोह दलु जीती।।
अर्थ · Hindi
सेवक सुमिरत नामु सप्रीती। बिनु श्रम प्रबल मोह दलु जीती।।
- RCM 1.25.8Open verse →
फिरत सनेहँ मगन सुख अपनें। नाम प्रसाद सोच नहिं सपनें।।
अर्थ · Hindi
फिरत सनेहँ मगन सुख अपनें। नाम प्रसाद सोच नहिं सपनें।।
- RCM 1.25.9Open verse →
ब्रह्म राम तें नामु बड़ बर दायक बर दानि।
अर्थ · Hindi
ब्रह्म राम तें नामु बड़ बर दायक बर दानि।
- RCM 1.25.10Open verse →
रामचरित सत कोटि महँ लिय महेस जियँ जानि।।25।।
अर्थ · Hindi
रामचरित सत कोटि महँ लिय महेस जियँ जानि।।25।।
- RCM 1.26.1Open verse →
नाम प्रसाद संभु अबिनासी। साजु अमंगल मंगल रासी।।
अर्थ · Hindi
नाम प्रसाद संभु अबिनासी। साजु अमंगल मंगल रासी।।
- RCM 1.26.2Open verse →
सुक सनकादि सिद्ध मुनि जोगी। नाम प्रसाद ब्रह्मसुख भोगी।।
अर्थ · Hindi
सुक सनकादि सिद्ध मुनि जोगी। नाम प्रसाद ब्रह्मसुख भोगी।।
- RCM 1.26.3Open verse →
नारद जानेउ नाम प्रतापू। जग प्रिय हरि हरि हर प्रिय आपू।।
अर्थ · Hindi
नारद जानेउ नाम प्रतापू। जग प्रिय हरि हरि हर प्रिय आपू।।
- RCM 1.26.4Open verse →
नामु जपत प्रभु कीन्ह प्रसादू। भगत सिरोमनि भे प्रहलादू।।
अर्थ · Hindi
नामु जपत प्रभु कीन्ह प्रसादू। भगत सिरोमनि भे प्रहलादू।।
- RCM 1.26.5Open verse →
ध्रुवँ सगलानि जपेउ हरि नाऊँ। पायउ अचल अनूपम ठाऊँ।।
अर्थ · Hindi
ध्रुवँ सगलानि जपेउ हरि नाऊँ। पायउ अचल अनूपम ठाऊँ।।
- RCM 1.26.6Open verse →
सुमिरि पवनसुत पावन नामू। अपने बस करि राखे रामू।।
अर्थ · Hindi
सुमिरि पवनसुत पावन नामू। अपने बस करि राखे रामू।।
- RCM 1.26.7Open verse →
अपतु अजामिलु गजु गनिकाऊ। भए मुकुत हरि नाम प्रभाऊ।।
अर्थ · Hindi
अपतु अजामिलु गजु गनिकाऊ। भए मुकुत हरि नाम प्रभाऊ।।
- RCM 1.26.8Open verse →
कहौं कहाँ लगि नाम बड़ाई। रामु न सकहिं नाम गुन गाई।।
अर्थ · Hindi
कहौं कहाँ लगि नाम बड़ाई। रामु न सकहिं नाम गुन गाई।।
- RCM 1.26.9Open verse →
नामु राम को कलपतरु कलि कल्यान निवासु।
अर्थ · Hindi
नामु राम को कलपतरु कलि कल्यान निवासु।
- RCM 1.26.10Open verse →
जो सुमिरत भयो भाँग तें तुलसी तुलसीदासु।।26।।
अर्थ · Hindi
जो सुमिरत भयो भाँग तें तुलसी तुलसीदासु।।26।।
- RCM 1.27.1Open verse →
चहुँ जुग तीनि काल तिहुँ लोका। भए नाम जपि जीव बिसोका।।
अर्थ · Hindi
चहुँ जुग तीनि काल तिहुँ लोका। भए नाम जपि जीव बिसोका।।
- RCM 1.27.2Open verse →
बेद पुरान संत मत एहू। सकल सुकृत फल राम सनेहू।।
अर्थ · Hindi
बेद पुरान संत मत एहू। सकल सुकृत फल राम सनेहू।।
- RCM 1.27.3Open verse →
ध्यानु प्रथम जुग मखबिधि दूजें। द्वापर परितोषत प्रभु पूजें।।
अर्थ · Hindi
ध्यानु प्रथम जुग मखबिधि दूजें। द्वापर परितोषत प्रभु पूजें।।
- RCM 1.27.4Open verse →
कलि केवल मल मूल मलीना। पाप पयोनिधि जन मन मीना।।
अर्थ · Hindi
कलि केवल मल मूल मलीना। पाप पयोनिधि जन मन मीना।।
- RCM 1.27.5Open verse →
नाम कामतरु काल कराला। सुमिरत समन सकल जग जाला।।
अर्थ · Hindi
नाम कामतरु काल कराला। सुमिरत समन सकल जग जाला।।
- RCM 1.27.6Open verse →
राम नाम कलि अभिमत दाता। हित परलोक लोक पितु माता।।
अर्थ · Hindi
राम नाम कलि अभिमत दाता। हित परलोक लोक पितु माता।।
- RCM 1.27.7Open verse →
नहिं कलि करम न भगति बिबेकू। राम नाम अवलंबन एकू।।
अर्थ · Hindi
नहिं कलि करम न भगति बिबेकू। राम नाम अवलंबन एकू।।
- RCM 1.27.8Open verse →
कालनेमि कलि कपट निधानू। नाम सुमति समरथ हनुमानू।।
अर्थ · Hindi
कालनेमि कलि कपट निधानू। नाम सुमति समरथ हनुमानू।।
- RCM 1.27.9Open verse →
राम नाम नरकेसरी कनककसिपु कलिकाल।
अर्थ · Hindi
राम नाम नरकेसरी कनककसिपु कलिकाल।
- RCM 1.27.10Open verse →
जापक जन प्रहलाद जिमि पालिहि दलि सुरसाल।।27।।
अर्थ · Hindi
जापक जन प्रहलाद जिमि पालिहि दलि सुरसाल।।27।।
- RCM 1.28.1Open verse →
भायँ कुभायँ अनख आलसहूँ। नाम जपत मंगल दिसि दसहूँ।।
अर्थ · Hindi
भायँ कुभायँ अनख आलसहूँ। नाम जपत मंगल दिसि दसहूँ।।
- RCM 1.28.2Open verse →
सुमिरि सो नाम राम गुन गाथा। करउँ नाइ रघुनाथहि माथा।।
अर्थ · Hindi
सुमिरि सो नाम राम गुन गाथा। करउँ नाइ रघुनाथहि माथा।।
- RCM 1.28.3Open verse →
मोरि सुधारिहि सो सब भाँती। जासु कृपा नहिं कृपाँ अघाती।।
अर्थ · Hindi
मोरि सुधारिहि सो सब भाँती। जासु कृपा नहिं कृपाँ अघाती।।
- RCM 1.28.4Open verse →
राम सुस्वामि कुसेवकु मोसो। निज दिसि दैखि दयानिधि पोसो।।
अर्थ · Hindi
राम सुस्वामि कुसेवकु मोसो। निज दिसि दैखि दयानिधि पोसो।।
- RCM 1.28.5Open verse →
लोकहुँ बेद सुसाहिब रीतीं। बिनय सुनत पहिचानत प्रीती।।
अर्थ · Hindi
लोकहुँ बेद सुसाहिब रीतीं। बिनय सुनत पहिचानत प्रीती।।
- RCM 1.28.6Open verse →
गनी गरीब ग्रामनर नागर। पंडित मूढ़ मलीन उजागर।।
अर्थ · Hindi
गनी गरीब ग्रामनर नागर। पंडित मूढ़ मलीन उजागर।।
- RCM 1.28.7Open verse →
सुकबि कुकबि निज मति अनुहारी। नृपहि सराहत सब नर नारी।।
अर्थ · Hindi
सुकबि कुकबि निज मति अनुहारी। नृपहि सराहत सब नर नारी।।
- RCM 1.28.8Open verse →
साधु सुजान सुसील नृपाला। ईस अंस भव परम कृपाला।।
अर्थ · Hindi
साधु सुजान सुसील नृपाला। ईस अंस भव परम कृपाला।।
- RCM 1.28.9Open verse →
सुनि सनमानहिं सबहि सुबानी। भनिति भगति नति गति पहिचानी।।
अर्थ · Hindi
सुनि सनमानहिं सबहि सुबानी। भनिति भगति नति गति पहिचानी।।
- RCM 1.28.10Open verse →
यह प्राकृत महिपाल सुभाऊ। जान सिरोमनि कोसलराऊ।।
अर्थ · Hindi
यह प्राकृत महिपाल सुभाऊ। जान सिरोमनि कोसलराऊ।।
- RCM 1.28.11Open verse →
रीझत राम सनेह निसोतें। को जग मंद मलिनमति मोतें।।
अर्थ · Hindi
रीझत राम सनेह निसोतें। को जग मंद मलिनमति मोतें।।
- RCM 1.28.12Open verse →
सठ सेवक की प्रीति रुचि रखिहहिं राम कृपालु।
अर्थ · Hindi
सठ सेवक की प्रीति रुचि रखिहहिं राम कृपालु।
- RCM 1.28.13Open verse →
उपल किए जलजान जेहिं सचिव सुमति कपि भालु।।28(क)।।
अर्थ · Hindi
उपल किए जलजान जेहिं सचिव सुमति कपि भालु।।28(क)।।
- RCM 1.28.14Open verse →
हौहु कहावत सबु कहत राम सहत उपहास।
अर्थ · Hindi
हौहु कहावत सबु कहत राम सहत उपहास।
- RCM 1.28.15Open verse →
साहिब सीतानाथ सो सेवक तुलसीदास।।28(ख)।।
अर्थ · Hindi
साहिब सीतानाथ सो सेवक तुलसीदास।।28(ख)।।
- RCM 1.29.1Open verse →
अति बड़ि मोरि ढिठाई खोरी। सुनि अघ नरकहुँ नाक सकोरी।।
अर्थ · Hindi
अति बड़ि मोरि ढिठाई खोरी। सुनि अघ नरकहुँ नाक सकोरी।।
- RCM 1.29.2Open verse →
समुझि सहम मोहि अपडर अपनें। सो सुधि राम कीन्हि नहिं सपनें।।
अर्थ · Hindi
समुझि सहम मोहि अपडर अपनें। सो सुधि राम कीन्हि नहिं सपनें।।
- RCM 1.29.3Open verse →
सुनि अवलोकि सुचित चख चाही। भगति मोरि मति स्वामि सराही।।
अर्थ · Hindi
सुनि अवलोकि सुचित चख चाही। भगति मोरि मति स्वामि सराही।।
- RCM 1.29.4Open verse →
कहत नसाइ होइ हियँ नीकी। रीझत राम जानि जन जी की।।
अर्थ · Hindi
कहत नसाइ होइ हियँ नीकी। रीझत राम जानि जन जी की।।
- RCM 1.29.5Open verse →
रहति न प्रभु चित चूक किए की। करत सुरति सय बार हिए की।।
अर्थ · Hindi
रहति न प्रभु चित चूक किए की। करत सुरति सय बार हिए की।।
- RCM 1.29.6Open verse →
जेहिं अघ बधेउ ब्याध जिमि बाली। फिरि सुकंठ सोइ कीन्ह कुचाली।।
अर्थ · Hindi
जेहिं अघ बधेउ ब्याध जिमि बाली। फिरि सुकंठ सोइ कीन्ह कुचाली।।
- RCM 1.29.7Open verse →
सोइ करतूति बिभीषन केरी। सपनेहुँ सो न राम हियँ हेरी।।
अर्थ · Hindi
सोइ करतूति बिभीषन केरी। सपनेहुँ सो न राम हियँ हेरी।।
- RCM 1.29.8Open verse →
ते भरतहि भेंटत सनमाने। राजसभाँ रघुबीर बखाने।।
अर्थ · Hindi
ते भरतहि भेंटत सनमाने। राजसभाँ रघुबीर बखाने।।
- RCM 1.29.9Open verse →
प्रभु तरु तर कपि डार पर ते किए आपु समान।।
अर्थ · Hindi
प्रभु तरु तर कपि डार पर ते किए आपु समान।।
- RCM 1.29.10Open verse →
तुलसी कहूँ न राम से साहिब सीलनिधान।।29(क)।।
अर्थ · Hindi
तुलसी कहूँ न राम से साहिब सीलनिधान।।29(क)।।
- RCM 1.29.11Open verse →
राम निकाईं रावरी है सबही को नीक।
अर्थ · Hindi
राम निकाईं रावरी है सबही को नीक।
- RCM 1.29.12Open verse →
जों यह साँची है सदा तौ नीको तुलसीक।।29(ख)।।
अर्थ · Hindi
जों यह साँची है सदा तौ नीको तुलसीक।।29(ख)।।
- RCM 1.29.13Open verse →
एहि बिधि निज गुन दोष कहि सबहि बहुरि सिरु नाइ।
अर्थ · Hindi
एहि बिधि निज गुन दोष कहि सबहि बहुरि सिरु नाइ।
- RCM 1.29.14Open verse →
बरनउँ रघुबर बिसद जसु सुनि कलि कलुष नसाइ।।29(ग)।।
अर्थ · Hindi
बरनउँ रघुबर बिसद जसु सुनि कलि कलुष नसाइ।।29(ग)।।
- RCM 1.30.1Open verse →
जागबलिक जो कथा सुहाई। भरद्वाज मुनिबरहि सुनाई।।
अर्थ · Hindi
जागबलिक जो कथा सुहाई। भरद्वाज मुनिबरहि सुनाई।।
- RCM 1.30.2Open verse →
कहिहउँ सोइ संबाद बखानी। सुनहुँ सकल सज्जन सुखु मानी।।
अर्थ · Hindi
कहिहउँ सोइ संबाद बखानी। सुनहुँ सकल सज्जन सुखु मानी।।
- RCM 1.30.3Open verse →
संभु कीन्ह यह चरित सुहावा। बहुरि कृपा करि उमहि सुनावा।।
अर्थ · Hindi
संभु कीन्ह यह चरित सुहावा। बहुरि कृपा करि उमहि सुनावा।।
- RCM 1.30.4Open verse →
सोइ सिव कागभुसुंडिहि दीन्हा। राम भगत अधिकारी चीन्हा।।
अर्थ · Hindi
सोइ सिव कागभुसुंडिहि दीन्हा। राम भगत अधिकारी चीन्हा।।
- RCM 1.30.5Open verse →
तेहि सन जागबलिक पुनि पावा। तिन्ह पुनि भरद्वाज प्रति गावा।।
अर्थ · Hindi
तेहि सन जागबलिक पुनि पावा। तिन्ह पुनि भरद्वाज प्रति गावा।।
- RCM 1.30.6Open verse →
ते श्रोता बकता समसीला। सवँदरसी जानहिं हरिलीला।।
अर्थ · Hindi
ते श्रोता बकता समसीला। सवँदरसी जानहिं हरिलीला।।
- RCM 1.30.7Open verse →
जानहिं तीनि काल निज ग्याना। करतल गत आमलक समाना।।
अर्थ · Hindi
जानहिं तीनि काल निज ग्याना। करतल गत आमलक समाना।।
- RCM 1.30.8Open verse →
औरउ जे हरिभगत सुजाना। कहहिं सुनहिं समुझहिं बिधि नाना।।
अर्थ · Hindi
औरउ जे हरिभगत सुजाना। कहहिं सुनहिं समुझहिं बिधि नाना।।
- RCM 1.30.9Open verse →
मै पुनि निज गुर सन सुनी कथा सो सूकरखेत।
अर्थ · Hindi
मै पुनि निज गुर सन सुनी कथा सो सूकरखेत।
- RCM 1.30.10Open verse →
समुझी नहि तसि बालपन तब अति रहेउँ अचेत।।30(क)।।
अर्थ · Hindi
समुझी नहि तसि बालपन तब अति रहेउँ अचेत।।30(क)।।
- RCM 1.30.11Open verse →
श्रोता बकता ग्याननिधि कथा राम कै गूढ़।
अर्थ · Hindi
श्रोता बकता ग्याननिधि कथा राम कै गूढ़।
- RCM 1.30.12Open verse →
किमि समुझौं मै जीव जड़ कलि मल ग्रसित बिमूढ़।।30(ख)।।
अर्थ · Hindi
किमि समुझौं मै जीव जड़ कलि मल ग्रसित बिमूढ़।।30(ख)।।
- RCM 1.31.1Open verse →
तदपि कही गुर बारहिं बारा। समुझि परी कछु मति अनुसारा।।
अर्थ · Hindi
तदपि कही गुर बारहिं बारा। समुझि परी कछु मति अनुसारा।।
- RCM 1.31.2Open verse →
भाषाबद्ध करबि मैं सोई। मोरें मन प्रबोध जेहिं होई।।
अर्थ · Hindi
भाषाबद्ध करबि मैं सोई। मोरें मन प्रबोध जेहिं होई।।
- RCM 1.31.3Open verse →
जस कछु बुधि बिबेक बल मेरें। तस कहिहउँ हियँ हरि के प्रेरें।।
अर्थ · Hindi
जस कछु बुधि बिबेक बल मेरें। तस कहिहउँ हियँ हरि के प्रेरें।।
- RCM 1.31.4Open verse →
निज संदेह मोह भ्रम हरनी। करउँ कथा भव सरिता तरनी।।
अर्थ · Hindi
निज संदेह मोह भ्रम हरनी। करउँ कथा भव सरिता तरनी।।
- RCM 1.31.5Open verse →
बुध बिश्राम सकल जन रंजनि। रामकथा कलि कलुष बिभंजनि।।
अर्थ · Hindi
बुध बिश्राम सकल जन रंजनि। रामकथा कलि कलुष बिभंजनि।।
- RCM 1.31.6Open verse →
रामकथा कलि पंनग भरनी। पुनि बिबेक पावक कहुँ अरनी।।
अर्थ · Hindi
रामकथा कलि पंनग भरनी। पुनि बिबेक पावक कहुँ अरनी।।
- RCM 1.31.7Open verse →
रामकथा कलि कामद गाई। सुजन सजीवनि मूरि सुहाई।।
अर्थ · Hindi
रामकथा कलि कामद गाई। सुजन सजीवनि मूरि सुहाई।।
- RCM 1.31.8Open verse →
सोइ बसुधातल सुधा तरंगिनि। भय भंजनि भ्रम भेक भुअंगिनि।।
अर्थ · Hindi
सोइ बसुधातल सुधा तरंगिनि। भय भंजनि भ्रम भेक भुअंगिनि।।
- RCM 1.31.9Open verse →
असुर सेन सम नरक निकंदिनि। साधु बिबुध कुल हित गिरिनंदिनि।।
अर्थ · Hindi
असुर सेन सम नरक निकंदिनि। साधु बिबुध कुल हित गिरिनंदिनि।।
- RCM 1.31.10Open verse →
संत समाज पयोधि रमा सी। बिस्व भार भर अचल छमा सी।।
अर्थ · Hindi
संत समाज पयोधि रमा सी। बिस्व भार भर अचल छमा सी।।
- RCM 1.31.11Open verse →
जम गन मुहँ मसि जग जमुना सी। जीवन मुकुति हेतु जनु कासी।।
अर्थ · Hindi
जम गन मुहँ मसि जग जमुना सी। जीवन मुकुति हेतु जनु कासी।।
- RCM 1.31.12Open verse →
रामहि प्रिय पावनि तुलसी सी। तुलसिदास हित हियँ हुलसी सी।।
अर्थ · Hindi
रामहि प्रिय पावनि तुलसी सी। तुलसिदास हित हियँ हुलसी सी।।
- RCM 1.31.13Open verse →
सिवप्रय मेकल सैल सुता सी। सकल सिद्धि सुख संपति रासी।।
अर्थ · Hindi
सिवप्रय मेकल सैल सुता सी। सकल सिद्धि सुख संपति रासी।।
- RCM 1.31.14Open verse →
सदगुन सुरगन अंब अदिति सी। रघुबर भगति प्रेम परमिति सी।।
अर्थ · Hindi
सदगुन सुरगन अंब अदिति सी। रघुबर भगति प्रेम परमिति सी।।
- RCM 1.31.15Open verse →
राम कथा मंदाकिनी चित्रकूट चित चारु।
अर्थ · Hindi
राम कथा मंदाकिनी चित्रकूट चित चारु।
- RCM 1.31.16Open verse →
तुलसी सुभग सनेह बन सिय रघुबीर बिहारु।।31।।
अर्थ · Hindi
तुलसी सुभग सनेह बन सिय रघुबीर बिहारु।।31।।
- RCM 1.32.1Open verse →
राम चरित चिंतामनि चारू। संत सुमति तिय सुभग सिंगारू।।
अर्थ · Hindi
राम चरित चिंतामनि चारू। संत सुमति तिय सुभग सिंगारू।।
- RCM 1.32.2Open verse →
जग मंगल गुन ग्राम राम के। दानि मुकुति धन धरम धाम के।।
अर्थ · Hindi
जग मंगल गुन ग्राम राम के। दानि मुकुति धन धरम धाम के।।
- RCM 1.32.3Open verse →
सदगुर ग्यान बिराग जोग के। बिबुध बैद भव भीम रोग के।।
अर्थ · Hindi
सदगुर ग्यान बिराग जोग के। बिबुध बैद भव भीम रोग के।।
- RCM 1.32.4Open verse →
जननि जनक सिय राम प्रेम के। बीज सकल ब्रत धरम नेम के।।
अर्थ · Hindi
जननि जनक सिय राम प्रेम के। बीज सकल ब्रत धरम नेम के।।
- RCM 1.32.5Open verse →
समन पाप संताप सोक के। प्रिय पालक परलोक लोक के।।
अर्थ · Hindi
समन पाप संताप सोक के। प्रिय पालक परलोक लोक के।।
- RCM 1.32.6Open verse →
सचिव सुभट भूपति बिचार के। कुंभज लोभ उदधि अपार के।।
अर्थ · Hindi
सचिव सुभट भूपति बिचार के। कुंभज लोभ उदधि अपार के।।
- RCM 1.32.7Open verse →
काम कोह कलिमल करिगन के। केहरि सावक जन मन बन के।।
अर्थ · Hindi
काम कोह कलिमल करिगन के। केहरि सावक जन मन बन के।।
- RCM 1.32.8Open verse →
अतिथि पूज्य प्रियतम पुरारि के। कामद घन दारिद दवारि के।।
अर्थ · Hindi
अतिथि पूज्य प्रियतम पुरारि के। कामद घन दारिद दवारि के।।
- RCM 1.32.9Open verse →
मंत्र महामनि बिषय ब्याल के। मेटत कठिन कुअंक भाल के।।
अर्थ · Hindi
मंत्र महामनि बिषय ब्याल के। मेटत कठिन कुअंक भाल के।।
- RCM 1.32.10Open verse →
हरन मोह तम दिनकर कर से। सेवक सालि पाल जलधर से।।
अर्थ · Hindi
हरन मोह तम दिनकर कर से। सेवक सालि पाल जलधर से।।
- RCM 1.32.11Open verse →
अभिमत दानि देवतरु बर से। सेवत सुलभ सुखद हरि हर से।।
अर्थ · Hindi
अभिमत दानि देवतरु बर से। सेवत सुलभ सुखद हरि हर से।।
- RCM 1.32.12Open verse →
सुकबि सरद नभ मन उडगन से। रामभगत जन जीवन धन से।।
अर्थ · Hindi
सुकबि सरद नभ मन उडगन से। रामभगत जन जीवन धन से।।
- RCM 1.32.13Open verse →
सकल सुकृत फल भूरि भोग से। जग हित निरुपधि साधु लोग से।।
अर्थ · Hindi
सकल सुकृत फल भूरि भोग से। जग हित निरुपधि साधु लोग से।।
- RCM 1.32.14Open verse →
सेवक मन मानस मराल से। पावक गंग तंरग माल से।।
अर्थ · Hindi
सेवक मन मानस मराल से। पावक गंग तंरग माल से।।
- RCM 1.32.15Open verse →
कुपथ कुतरक कुचालि कलि कपट दंभ पाषंड।
अर्थ · Hindi
कुपथ कुतरक कुचालि कलि कपट दंभ पाषंड।
- RCM 1.32.16Open verse →
दहन राम गुन ग्राम जिमि इंधन अनल प्रचंड।।32(क)।।
अर्थ · Hindi
दहन राम गुन ग्राम जिमि इंधन अनल प्रचंड।।32(क)।।
- RCM 1.32.17Open verse →
रामचरित राकेस कर सरिस सुखद सब काहु।
अर्थ · Hindi
रामचरित राकेस कर सरिस सुखद सब काहु।
- RCM 1.32.18Open verse →
सज्जन कुमुद चकोर चित हित बिसेषि बड़ लाहु।।32(ख)।।
अर्थ · Hindi
सज्जन कुमुद चकोर चित हित बिसेषि बड़ लाहु।।32(ख)।।
- RCM 1.33.1Open verse →
कीन्हि प्रस्न जेहि भाँति भवानी। जेहि बिधि संकर कहा बखानी।।
अर्थ · Hindi
कीन्हि प्रस्न जेहि भाँति भवानी। जेहि बिधि संकर कहा बखानी।।
- RCM 1.33.2Open verse →
सो सब हेतु कहब मैं गाई। कथाप्रबंध बिचित्र बनाई।।
अर्थ · Hindi
सो सब हेतु कहब मैं गाई। कथाप्रबंध बिचित्र बनाई।।
- RCM 1.33.3Open verse →
जेहि यह कथा सुनी नहिं होई। जनि आचरजु करैं सुनि सोई।।
अर्थ · Hindi
जेहि यह कथा सुनी नहिं होई। जनि आचरजु करैं सुनि सोई।।
- RCM 1.33.4Open verse →
कथा अलौकिक सुनहिं जे ग्यानी। नहिं आचरजु करहिं अस जानी।।
अर्थ · Hindi
कथा अलौकिक सुनहिं जे ग्यानी। नहिं आचरजु करहिं अस जानी।।
- RCM 1.33.5Open verse →
रामकथा कै मिति जग नाहीं। असि प्रतीति तिन्ह के मन माहीं।।
अर्थ · Hindi
रामकथा कै मिति जग नाहीं। असि प्रतीति तिन्ह के मन माहीं।।
- RCM 1.33.6Open verse →
नाना भाँति राम अवतारा। रामायन सत कोटि अपारा।।
अर्थ · Hindi
नाना भाँति राम अवतारा। रामायन सत कोटि अपारा।।
- RCM 1.33.7Open verse →
कलपभेद हरिचरित सुहाए। भाँति अनेक मुनीसन्ह गाए।।
अर्थ · Hindi
कलपभेद हरिचरित सुहाए। भाँति अनेक मुनीसन्ह गाए।।
- RCM 1.33.8Open verse →
करिअ न संसय अस उर आनी। सुनिअ कथा सारद रति मानी।।
अर्थ · Hindi
करिअ न संसय अस उर आनी। सुनिअ कथा सारद रति मानी।।
- RCM 1.33.9Open verse →
राम अनंत अनंत गुन अमित कथा बिस्तार।
अर्थ · Hindi
राम अनंत अनंत गुन अमित कथा बिस्तार।
- RCM 1.33.10Open verse →
सुनि आचरजु न मानिहहिं जिन्ह कें बिमल बिचार।।33।।
अर्थ · Hindi
सुनि आचरजु न मानिहहिं जिन्ह कें बिमल बिचार।।33।।
- RCM 1.34.1Open verse →
एहि बिधि सब संसय करि दूरी। सिर धरि गुर पद पंकज धूरी।।
अर्थ · Hindi
एहि बिधि सब संसय करि दूरी। सिर धरि गुर पद पंकज धूरी।।
- RCM 1.34.2Open verse →
पुनि सबही बिनवउँ कर जोरी। करत कथा जेहिं लाग न खोरी।।
अर्थ · Hindi
पुनि सबही बिनवउँ कर जोरी। करत कथा जेहिं लाग न खोरी।।
- RCM 1.34.3Open verse →
सादर सिवहि नाइ अब माथा। बरनउँ बिसद राम गुन गाथा।।
अर्थ · Hindi
सादर सिवहि नाइ अब माथा। बरनउँ बिसद राम गुन गाथा।।
- RCM 1.34.4Open verse →
संबत सोरह सै एकतीसा। करउँ कथा हरि पद धरि सीसा।।
अर्थ · Hindi
संबत सोरह सै एकतीसा। करउँ कथा हरि पद धरि सीसा।।
- RCM 1.34.5Open verse →
नौमी भौम बार मधु मासा। अवधपुरीं यह चरित प्रकासा।।
अर्थ · Hindi
नौमी भौम बार मधु मासा। अवधपुरीं यह चरित प्रकासा।।
- RCM 1.34.6Open verse →
जेहि दिन राम जनम श्रुति गावहिं। तीरथ सकल तहाँ चलि आवहिं।।
अर्थ · Hindi
जेहि दिन राम जनम श्रुति गावहिं। तीरथ सकल तहाँ चलि आवहिं।।
- RCM 1.34.7Open verse →
असुर नाग खग नर मुनि देवा। आइ करहिं रघुनायक सेवा।।
अर्थ · Hindi
असुर नाग खग नर मुनि देवा। आइ करहिं रघुनायक सेवा।।
- RCM 1.34.8Open verse →
जन्म महोत्सव रचहिं सुजाना। करहिं राम कल कीरति गाना।।
अर्थ · Hindi
जन्म महोत्सव रचहिं सुजाना। करहिं राम कल कीरति गाना।।
- RCM 1.34.9Open verse →
मज्जहि सज्जन बृंद बहु पावन सरजू नीर।
अर्थ · Hindi
मज्जहि सज्जन बृंद बहु पावन सरजू नीर।
- RCM 1.34.10Open verse →
जपहिं राम धरि ध्यान उर सुंदर स्याम सरीर।।34।।
अर्थ · Hindi
जपहिं राम धरि ध्यान उर सुंदर स्याम सरीर।।34।।
- RCM 1.35.1Open verse →
दरस परस मज्जन अरु पाना। हरइ पाप कह बेद पुराना।।
अर्थ · Hindi
दरस परस मज्जन अरु पाना। हरइ पाप कह बेद पुराना।।
- RCM 1.35.2Open verse →
नदी पुनीत अमित महिमा अति। कहि न सकइ सारद बिमलमति।।
अर्थ · Hindi
नदी पुनीत अमित महिमा अति। कहि न सकइ सारद बिमलमति।।
- RCM 1.35.3Open verse →
राम धामदा पुरी सुहावनि। लोक समस्त बिदित अति पावनि।।
अर्थ · Hindi
राम धामदा पुरी सुहावनि। लोक समस्त बिदित अति पावनि।।
- RCM 1.35.4Open verse →
चारि खानि जग जीव अपारा। अवध तजे तनु नहि संसारा।।
अर्थ · Hindi
चारि खानि जग जीव अपारा। अवध तजे तनु नहि संसारा।।
- RCM 1.35.5Open verse →
सब बिधि पुरी मनोहर जानी। सकल सिद्धिप्रद मंगल खानी।।
अर्थ · Hindi
सब बिधि पुरी मनोहर जानी। सकल सिद्धिप्रद मंगल खानी।।
- RCM 1.35.6Open verse →
बिमल कथा कर कीन्ह अरंभा। सुनत नसाहिं काम मद दंभा।।
अर्थ · Hindi
बिमल कथा कर कीन्ह अरंभा। सुनत नसाहिं काम मद दंभा।।
- RCM 1.35.7Open verse →
रामचरितमानस एहि नामा। सुनत श्रवन पाइअ बिश्रामा।।
अर्थ · Hindi
रामचरितमानस एहि नामा। सुनत श्रवन पाइअ बिश्रामा।।
- RCM 1.35.8Open verse →
मन करि विषय अनल बन जरई। होइ सुखी जौ एहिं सर परई।।
अर्थ · Hindi
मन करि विषय अनल बन जरई। होइ सुखी जौ एहिं सर परई।।
- RCM 1.35.9Open verse →
रामचरितमानस मुनि भावन। बिरचेउ संभु सुहावन पावन।।
अर्थ · Hindi
रामचरितमानस मुनि भावन। बिरचेउ संभु सुहावन पावन।।
- RCM 1.35.10Open verse →
त्रिबिध दोष दुख दारिद दावन। कलि कुचालि कुलि कलुष नसावन।।
अर्थ · Hindi
त्रिबिध दोष दुख दारिद दावन। कलि कुचालि कुलि कलुष नसावन।।
- RCM 1.35.11Open verse →
रचि महेस निज मानस राखा। पाइ सुसमउ सिवा सन भाषा।।
अर्थ · Hindi
रचि महेस निज मानस राखा। पाइ सुसमउ सिवा सन भाषा।।
- RCM 1.35.12Open verse →
तातें रामचरितमानस बर। धरेउ नाम हियँ हेरि हरषि हर।।
अर्थ · Hindi
तातें रामचरितमानस बर। धरेउ नाम हियँ हेरि हरषि हर।।
- RCM 1.35.13Open verse →
कहउँ कथा सोइ सुखद सुहाई। सादर सुनहु सुजन मन लाई।।
अर्थ · Hindi
कहउँ कथा सोइ सुखद सुहाई। सादर सुनहु सुजन मन लाई।।
- RCM 1.35.14Open verse →
जस मानस जेहि बिधि भयउ जग प्रचार जेहि हेतु।
अर्थ · Hindi
जस मानस जेहि बिधि भयउ जग प्रचार जेहि हेतु।
- RCM 1.35.15Open verse →
अब सोइ कहउँ प्रसंग सब सुमिरि उमा बृषकेतु।।35।।
अर्थ · Hindi
अब सोइ कहउँ प्रसंग सब सुमिरि उमा बृषकेतु।।35।।
- RCM 1.36.1Open verse →
संभु प्रसाद सुमति हियँ हुलसी। रामचरितमानस कबि तुलसी।।
अर्थ · Hindi
संभु प्रसाद सुमति हियँ हुलसी। रामचरितमानस कबि तुलसी।।
- RCM 1.36.2Open verse →
करइ मनोहर मति अनुहारी। सुजन सुचित सुनि लेहु सुधारी।।
अर्थ · Hindi
करइ मनोहर मति अनुहारी। सुजन सुचित सुनि लेहु सुधारी।।
- RCM 1.36.3Open verse →
सुमति भूमि थल हृदय अगाधू। बेद पुरान उदधि घन साधू।।
अर्थ · Hindi
सुमति भूमि थल हृदय अगाधू। बेद पुरान उदधि घन साधू।।
- RCM 1.36.4Open verse →
बरषहिं राम सुजस बर बारी। मधुर मनोहर मंगलकारी।।
अर्थ · Hindi
बरषहिं राम सुजस बर बारी। मधुर मनोहर मंगलकारी।।
- RCM 1.36.5Open verse →
लीला सगुन जो कहहिं बखानी। सोइ स्वच्छता करइ मल हानी।।
अर्थ · Hindi
लीला सगुन जो कहहिं बखानी। सोइ स्वच्छता करइ मल हानी।।
- RCM 1.36.6Open verse →
प्रेम भगति जो बरनि न जाई। सोइ मधुरता सुसीतलताई।।
अर्थ · Hindi
प्रेम भगति जो बरनि न जाई। सोइ मधुरता सुसीतलताई।।
- RCM 1.36.7Open verse →
सो जल सुकृत सालि हित होई। राम भगत जन जीवन सोई।।
अर्थ · Hindi
सो जल सुकृत सालि हित होई। राम भगत जन जीवन सोई।।
- RCM 1.36.8Open verse →
मेधा महि गत सो जल पावन। सकिलि श्रवन मग चलेउ सुहावन।।
अर्थ · Hindi
मेधा महि गत सो जल पावन। सकिलि श्रवन मग चलेउ सुहावन।।
- RCM 1.36.9Open verse →
भरेउ सुमानस सुथल थिराना। सुखद सीत रुचि चारु चिराना।।
अर्थ · Hindi
भरेउ सुमानस सुथल थिराना। सुखद सीत रुचि चारु चिराना।।
- RCM 1.36.10Open verse →
सुठि सुंदर संबाद बर बिरचे बुद्धि बिचारि।
अर्थ · Hindi
सुठि सुंदर संबाद बर बिरचे बुद्धि बिचारि।
- RCM 1.36.11Open verse →
तेइ एहि पावन सुभग सर घाट मनोहर चारि।।36।।
अर्थ · Hindi
तेइ एहि पावन सुभग सर घाट मनोहर चारि।।36।।
- RCM 1.37.1Open verse →
सप्त प्रबन्ध सुभग सोपाना। ग्यान नयन निरखत मन माना।।
अर्थ · Hindi
सप्त प्रबन्ध सुभग सोपाना। ग्यान नयन निरखत मन माना।।
- RCM 1.37.2Open verse →
रघुपति महिमा अगुन अबाधा। बरनब सोइ बर बारि अगाधा।।
अर्थ · Hindi
रघुपति महिमा अगुन अबाधा। बरनब सोइ बर बारि अगाधा।।
- RCM 1.37.3Open verse →
राम सीय जस सलिल सुधासम। उपमा बीचि बिलास मनोरम।।
अर्थ · Hindi
राम सीय जस सलिल सुधासम। उपमा बीचि बिलास मनोरम।।
- RCM 1.37.4Open verse →
पुरइनि सघन चारु चौपाई। जुगुति मंजु मनि सीप सुहाई।।
अर्थ · Hindi
पुरइनि सघन चारु चौपाई। जुगुति मंजु मनि सीप सुहाई।।
- RCM 1.37.5Open verse →
छंद सोरठा सुंदर दोहा। सोइ बहुरंग कमल कुल सोहा।।
अर्थ · Hindi
छंद सोरठा सुंदर दोहा। सोइ बहुरंग कमल कुल सोहा।।
- RCM 1.37.6Open verse →
अरथ अनूप सुमाव सुभासा। सोइ पराग मकरंद सुबासा।।
अर्थ · Hindi
अरथ अनूप सुमाव सुभासा। सोइ पराग मकरंद सुबासा।।
- RCM 1.37.7Open verse →
सुकृत पुंज मंजुल अलि माला। ग्यान बिराग बिचार मराला।।
अर्थ · Hindi
सुकृत पुंज मंजुल अलि माला। ग्यान बिराग बिचार मराला।।
- RCM 1.37.8Open verse →
धुनि अवरेब कबित गुन जाती। मीन मनोहर ते बहुभाँती।।
अर्थ · Hindi
धुनि अवरेब कबित गुन जाती। मीन मनोहर ते बहुभाँती।।
- RCM 1.37.9Open verse →
अरथ धरम कामादिक चारी। कहब ग्यान बिग्यान बिचारी।।
अर्थ · Hindi
अरथ धरम कामादिक चारी। कहब ग्यान बिग्यान बिचारी।।
- RCM 1.37.10Open verse →
नव रस जप तप जोग बिरागा। ते सब जलचर चारु तड़ागा।।
अर्थ · Hindi
नव रस जप तप जोग बिरागा। ते सब जलचर चारु तड़ागा।।
- RCM 1.37.11Open verse →
सुकृती साधु नाम गुन गाना। ते बिचित्र जल बिहग समाना।।
अर्थ · Hindi
सुकृती साधु नाम गुन गाना। ते बिचित्र जल बिहग समाना।।
- RCM 1.37.12Open verse →
संतसभा चहुँ दिसि अवँराई। श्रद्धा रितु बसंत सम गाई।।
अर्थ · Hindi
संतसभा चहुँ दिसि अवँराई। श्रद्धा रितु बसंत सम गाई।।
- RCM 1.37.13Open verse →
भगति निरुपन बिबिध बिधाना। छमा दया दम लता बिताना।।
अर्थ · Hindi
भगति निरुपन बिबिध बिधाना। छमा दया दम लता बिताना।।
- RCM 1.37.14Open verse →
सम जम नियम फूल फल ग्याना। हरि पत रति रस बेद बखाना।।
अर्थ · Hindi
सम जम नियम फूल फल ग्याना। हरि पत रति रस बेद बखाना।।
- RCM 1.37.15Open verse →
औरउ कथा अनेक प्रसंगा। तेइ सुक पिक बहुबरन बिहंगा।।
अर्थ · Hindi
औरउ कथा अनेक प्रसंगा। तेइ सुक पिक बहुबरन बिहंगा।।
- RCM 1.37.16Open verse →
पुलक बाटिका बाग बन सुख सुबिहंग बिहारु।
अर्थ · Hindi
पुलक बाटिका बाग बन सुख सुबिहंग बिहारु।
- RCM 1.37.17Open verse →
माली सुमन सनेह जल सींचत लोचन चारु।।37।।
अर्थ · Hindi
माली सुमन सनेह जल सींचत लोचन चारु।।37।।
- RCM 1.38.1Open verse →
जे गावहिं यह चरित सँभारे। तेइ एहि ताल चतुर रखवारे।।
अर्थ · Hindi
जे गावहिं यह चरित सँभारे। तेइ एहि ताल चतुर रखवारे।।
- RCM 1.38.2Open verse →
सदा सुनहिं सादर नर नारी। तेइ सुरबर मानस अधिकारी।।
अर्थ · Hindi
सदा सुनहिं सादर नर नारी। तेइ सुरबर मानस अधिकारी।।
- RCM 1.38.3Open verse →
अति खल जे बिषई बग कागा। एहिं सर निकट न जाहिं अभागा।।
अर्थ · Hindi
अति खल जे बिषई बग कागा। एहिं सर निकट न जाहिं अभागा।।
- RCM 1.38.4Open verse →
संबुक भेक सेवार समाना। इहाँ न बिषय कथा रस नाना।।
अर्थ · Hindi
संबुक भेक सेवार समाना। इहाँ न बिषय कथा रस नाना।।
- RCM 1.38.5Open verse →
तेहि कारन आवत हियँ हारे। कामी काक बलाक बिचारे।।
अर्थ · Hindi
तेहि कारन आवत हियँ हारे। कामी काक बलाक बिचारे।।
- RCM 1.38.6Open verse →
आवत एहिं सर अति कठिनाई। राम कृपा बिनु आइ न जाई।।
अर्थ · Hindi
आवत एहिं सर अति कठिनाई। राम कृपा बिनु आइ न जाई।।
- RCM 1.38.7Open verse →
कठिन कुसंग कुपंथ कराला। तिन्ह के बचन बाघ हरि ब्याला।।
अर्थ · Hindi
कठिन कुसंग कुपंथ कराला। तिन्ह के बचन बाघ हरि ब्याला।।
- RCM 1.38.8Open verse →
गृह कारज नाना जंजाला। ते अति दुर्गम सैल बिसाला।।
अर्थ · Hindi
गृह कारज नाना जंजाला। ते अति दुर्गम सैल बिसाला।।
- RCM 1.38.9Open verse →
बन बहु बिषम मोह मद माना। नदीं कुतर्क भयंकर नाना।।
अर्थ · Hindi
बन बहु बिषम मोह मद माना। नदीं कुतर्क भयंकर नाना।।
- RCM 1.38.10Open verse →
जे श्रद्धा संबल रहित नहि संतन्ह कर साथ।
अर्थ · Hindi
जे श्रद्धा संबल रहित नहि संतन्ह कर साथ।
- RCM 1.38.11Open verse →
तिन्ह कहुँ मानस अगम अति जिन्हहि न प्रिय रघुनाथ।।38।।
अर्थ · Hindi
तिन्ह कहुँ मानस अगम अति जिन्हहि न प्रिय रघुनाथ।।38।।
- RCM 1.39.1Open verse →
जौं करि कष्ट जाइ पुनि कोई। जातहिं नींद जुड़ाई होई।।
अर्थ · Hindi
जौं करि कष्ट जाइ पुनि कोई। जातहिं नींद जुड़ाई होई।।
- RCM 1.39.2Open verse →
जड़ता जाड़ बिषम उर लागा। गएहुँ न मज्जन पाव अभागा।।
अर्थ · Hindi
जड़ता जाड़ बिषम उर लागा। गएहुँ न मज्जन पाव अभागा।।
- RCM 1.39.3Open verse →
करि न जाइ सर मज्जन पाना। फिरि आवइ समेत अभिमाना।।
अर्थ · Hindi
करि न जाइ सर मज्जन पाना। फिरि आवइ समेत अभिमाना।।
- RCM 1.39.4Open verse →
जौं बहोरि कोउ पूछन आवा। सर निंदा करि ताहि बुझावा।।
अर्थ · Hindi
जौं बहोरि कोउ पूछन आवा। सर निंदा करि ताहि बुझावा।।
- RCM 1.39.5Open verse →
सकल बिघ्न ब्यापहि नहिं तेही। राम सुकृपाँ बिलोकहिं जेही।।
अर्थ · Hindi
सकल बिघ्न ब्यापहि नहिं तेही। राम सुकृपाँ बिलोकहिं जेही।।
- RCM 1.39.6Open verse →
सोइ सादर सर मज्जनु करई। महा घोर त्रयताप न जरई।।
अर्थ · Hindi
सोइ सादर सर मज्जनु करई। महा घोर त्रयताप न जरई।।
- RCM 1.39.7Open verse →
ते नर यह सर तजहिं न काऊ। जिन्ह के राम चरन भल भाऊ।।
अर्थ · Hindi
ते नर यह सर तजहिं न काऊ। जिन्ह के राम चरन भल भाऊ।।
- RCM 1.39.8Open verse →
जो नहाइ चह एहिं सर भाई। सो सतसंग करउ मन लाई।।
अर्थ · Hindi
जो नहाइ चह एहिं सर भाई। सो सतसंग करउ मन लाई।।
- RCM 1.39.9Open verse →
अस मानस मानस चख चाही। भइ कबि बुद्धि बिमल अवगाही।।
अर्थ · Hindi
अस मानस मानस चख चाही। भइ कबि बुद्धि बिमल अवगाही।।
- RCM 1.39.10Open verse →
भयउ हृदयँ आनंद उछाहू। उमगेउ प्रेम प्रमोद प्रबाहू।।
अर्थ · Hindi
भयउ हृदयँ आनंद उछाहू। उमगेउ प्रेम प्रमोद प्रबाहू।।
- RCM 1.39.11Open verse →
चली सुभग कबिता सरिता सो। राम बिमल जस जल भरिता सो।।
अर्थ · Hindi
चली सुभग कबिता सरिता सो। राम बिमल जस जल भरिता सो।।
- RCM 1.39.12Open verse →
सरजू नाम सुमंगल मूला। लोक बेद मत मंजुल कूला।।
अर्थ · Hindi
सरजू नाम सुमंगल मूला। लोक बेद मत मंजुल कूला।।
- RCM 1.39.13Open verse →
नदी पुनीत सुमानस नंदिनि। कलिमल तृन तरु मूल निकंदिनि।।
अर्थ · Hindi
नदी पुनीत सुमानस नंदिनि। कलिमल तृन तरु मूल निकंदिनि।।
- RCM 1.39.14Open verse →
श्रोता त्रिबिध समाज पुर ग्राम नगर दुहुँ कूल।
अर्थ · Hindi
श्रोता त्रिबिध समाज पुर ग्राम नगर दुहुँ कूल।
- RCM 1.39.15Open verse →
संतसभा अनुपम अवध सकल सुमंगल मूल।।39।।
अर्थ · Hindi
संतसभा अनुपम अवध सकल सुमंगल मूल।।39।।
- RCM 1.40.1Open verse →
रामभगति सुरसरितहि जाई। मिली सुकीरति सरजु सुहाई।।
अर्थ · Hindi
रामभगति सुरसरितहि जाई। मिली सुकीरति सरजु सुहाई।।
- RCM 1.40.2Open verse →
सानुज राम समर जसु पावन। मिलेउ महानदु सोन सुहावन।।
अर्थ · Hindi
सानुज राम समर जसु पावन। मिलेउ महानदु सोन सुहावन।।
- RCM 1.40.3Open verse →
जुग बिच भगति देवधुनि धारा। सोहति सहित सुबिरति बिचारा।।
अर्थ · Hindi
जुग बिच भगति देवधुनि धारा। सोहति सहित सुबिरति बिचारा।।
- RCM 1.40.4Open verse →
त्रिबिध ताप त्रासक तिमुहानी। राम सरुप सिंधु समुहानी।।
अर्थ · Hindi
त्रिबिध ताप त्रासक तिमुहानी। राम सरुप सिंधु समुहानी।।
- RCM 1.40.5Open verse →
मानस मूल मिली सुरसरिही। सुनत सुजन मन पावन करिही।।
अर्थ · Hindi
मानस मूल मिली सुरसरिही। सुनत सुजन मन पावन करिही।।
- RCM 1.40.6Open verse →
बिच बिच कथा बिचित्र बिभागा। जनु सरि तीर तीर बन बागा।।
अर्थ · Hindi
बिच बिच कथा बिचित्र बिभागा। जनु सरि तीर तीर बन बागा।।
- RCM 1.40.7Open verse →
उमा महेस बिबाह बराती। ते जलचर अगनित बहुभाँती।।
अर्थ · Hindi
उमा महेस बिबाह बराती। ते जलचर अगनित बहुभाँती।।
- RCM 1.40.8Open verse →
रघुबर जनम अनंद बधाई। भवँर तरंग मनोहरताई।।
अर्थ · Hindi
रघुबर जनम अनंद बधाई। भवँर तरंग मनोहरताई।।
- RCM 1.40.9Open verse →
बालचरित चहु बंधु के बनज बिपुल बहुरंग।
अर्थ · Hindi
बालचरित चहु बंधु के बनज बिपुल बहुरंग।
- RCM 1.40.10Open verse →
नृप रानी परिजन सुकृत मधुकर बारिबिहंग।।40।।
अर्थ · Hindi
नृप रानी परिजन सुकृत मधुकर बारिबिहंग।।40।।
- RCM 1.41.1Open verse →
सीय स्वयंबर कथा सुहाई। सरित सुहावनि सो छबि छाई।।
अर्थ · Hindi
सीय स्वयंबर कथा सुहाई। सरित सुहावनि सो छबि छाई।।
- RCM 1.41.2Open verse →
नदी नाव पटु प्रस्न अनेका। केवट कुसल उतर सबिबेका।।
अर्थ · Hindi
नदी नाव पटु प्रस्न अनेका। केवट कुसल उतर सबिबेका।।
- RCM 1.41.3Open verse →
सुनि अनुकथन परस्पर होई। पथिक समाज सोह सरि सोई।।
अर्थ · Hindi
सुनि अनुकथन परस्पर होई। पथिक समाज सोह सरि सोई।।
- RCM 1.41.4Open verse →
घोर धार भृगुनाथ रिसानी। घाट सुबद्ध राम बर बानी।।
अर्थ · Hindi
घोर धार भृगुनाथ रिसानी। घाट सुबद्ध राम बर बानी।।
- RCM 1.41.5Open verse →
सानुज राम बिबाह उछाहू। सो सुभ उमग सुखद सब काहू।।
अर्थ · Hindi
सानुज राम बिबाह उछाहू। सो सुभ उमग सुखद सब काहू।।
- RCM 1.41.6Open verse →
कहत सुनत हरषहिं पुलकाहीं। ते सुकृती मन मुदित नहाहीं।।
अर्थ · Hindi
कहत सुनत हरषहिं पुलकाहीं। ते सुकृती मन मुदित नहाहीं।।
- RCM 1.41.7Open verse →
राम तिलक हित मंगल साजा। परब जोग जनु जुरे समाजा।।
अर्थ · Hindi
राम तिलक हित मंगल साजा। परब जोग जनु जुरे समाजा।।
- RCM 1.41.8Open verse →
काई कुमति केकई केरी। परी जासु फल बिपति घनेरी।।
अर्थ · Hindi
काई कुमति केकई केरी। परी जासु फल बिपति घनेरी।।
- RCM 1.41.9Open verse →
समन अमित उतपात सब भरतचरित जपजाग।
अर्थ · Hindi
समन अमित उतपात सब भरतचरित जपजाग।
- RCM 1.41.10Open verse →
कलि अघ खल अवगुन कथन ते जलमल बग काग।।41।।
अर्थ · Hindi
कलि अघ खल अवगुन कथन ते जलमल बग काग।।41।।
- RCM 1.42.1Open verse →
कीरति सरित छहूँ रितु रूरी। समय सुहावनि पावनि भूरी।।
अर्थ · Hindi
कीरति सरित छहूँ रितु रूरी। समय सुहावनि पावनि भूरी।।
- RCM 1.42.2Open verse →
हिम हिमसैलसुता सिव ब्याहू। सिसिर सुखद प्रभु जनम उछाहू।।
अर्थ · Hindi
हिम हिमसैलसुता सिव ब्याहू। सिसिर सुखद प्रभु जनम उछाहू।।
- RCM 1.42.3Open verse →
बरनब राम बिबाह समाजू। सो मुद मंगलमय रितुराजू।।
अर्थ · Hindi
बरनब राम बिबाह समाजू। सो मुद मंगलमय रितुराजू।।
- RCM 1.42.4Open verse →
ग्रीषम दुसह राम बनगवनू। पंथकथा खर आतप पवनू।।
अर्थ · Hindi
ग्रीषम दुसह राम बनगवनू। पंथकथा खर आतप पवनू।।
- RCM 1.42.5Open verse →
बरषा घोर निसाचर रारी। सुरकुल सालि सुमंगलकारी।।
अर्थ · Hindi
बरषा घोर निसाचर रारी। सुरकुल सालि सुमंगलकारी।।
- RCM 1.42.6Open verse →
राम राज सुख बिनय बड़ाई। बिसद सुखद सोइ सरद सुहाई।।
अर्थ · Hindi
राम राज सुख बिनय बड़ाई। बिसद सुखद सोइ सरद सुहाई।।
- RCM 1.42.7Open verse →
सती सिरोमनि सिय गुनगाथा। सोइ गुन अमल अनूपम पाथा।।
अर्थ · Hindi
सती सिरोमनि सिय गुनगाथा। सोइ गुन अमल अनूपम पाथा।।
- RCM 1.42.8Open verse →
भरत सुभाउ सुसीतलताई। सदा एकरस बरनि न जाई।।
अर्थ · Hindi
भरत सुभाउ सुसीतलताई। सदा एकरस बरनि न जाई।।
- RCM 1.42.9Open verse →
अवलोकनि बोलनि मिलनि प्रीति परसपर हास।
अर्थ · Hindi
अवलोकनि बोलनि मिलनि प्रीति परसपर हास।
- RCM 1.42.10Open verse →
भायप भलि चहु बंधु की जल माधुरी सुबास।।42।।
अर्थ · Hindi
भायप भलि चहु बंधु की जल माधुरी सुबास।।42।।
- RCM 1.43.1Open verse →
आरति बिनय दीनता मोरी। लघुता ललित सुबारि न थोरी।।
अर्थ · Hindi
आरति बिनय दीनता मोरी। लघुता ललित सुबारि न थोरी।।
- RCM 1.43.2Open verse →
अदभुत सलिल सुनत गुनकारी। आस पिआस मनोमल हारी।।
अर्थ · Hindi
अदभुत सलिल सुनत गुनकारी। आस पिआस मनोमल हारी।।
- RCM 1.43.3Open verse →
राम सुप्रेमहि पोषत पानी। हरत सकल कलि कलुष गलानी।।
अर्थ · Hindi
राम सुप्रेमहि पोषत पानी। हरत सकल कलि कलुष गलानी।।
- RCM 1.43.4Open verse →
भव श्रम सोषक तोषक तोषा। समन दुरित दुख दारिद दोषा।।
अर्थ · Hindi
भव श्रम सोषक तोषक तोषा। समन दुरित दुख दारिद दोषा।।
- RCM 1.43.5Open verse →
काम कोह मद मोह नसावन। बिमल बिबेक बिराग बढ़ावन।।
अर्थ · Hindi
काम कोह मद मोह नसावन। बिमल बिबेक बिराग बढ़ावन।।
- RCM 1.43.6Open verse →
सादर मज्जन पान किए तें। मिटहिं पाप परिताप हिए तें।।
अर्थ · Hindi
सादर मज्जन पान किए तें। मिटहिं पाप परिताप हिए तें।।
- RCM 1.43.7Open verse →
जिन्ह एहि बारि न मानस धोए। ते कायर कलिकाल बिगोए।।
अर्थ · Hindi
जिन्ह एहि बारि न मानस धोए। ते कायर कलिकाल बिगोए।।
- RCM 1.43.8Open verse →
तृषित निरखि रबि कर भव बारी। फिरिहहि मृग जिमि जीव दुखारी।।
अर्थ · Hindi
तृषित निरखि रबि कर भव बारी। फिरिहहि मृग जिमि जीव दुखारी।।
- RCM 1.43.9Open verse →
मति अनुहारि सुबारि गुन गनि मन अन्हवाइ।
अर्थ · Hindi
मति अनुहारि सुबारि गुन गनि मन अन्हवाइ।
- RCM 1.43.10Open verse →
सुमिरि भवानी संकरहि कह कबि कथा सुहाइ।।43(क)।।
अर्थ · Hindi
सुमिरि भवानी संकरहि कह कबि कथा सुहाइ।।43(क)।।
- RCM 1.43.11Open verse →
अब रघुपति पद पंकरुह हियँ धरि पाइ प्रसाद ।
अर्थ · Hindi
अब रघुपति पद पंकरुह हियँ धरि पाइ प्रसाद ।
- RCM 1.43.12Open verse →
कहउँ जुगल मुनिबर्ज कर मिलन सुभग संबाद।।43(ख)।।
अर्थ · Hindi
कहउँ जुगल मुनिबर्ज कर मिलन सुभग संबाद।।43(ख)।।
- RCM 1.44.1Open verse →
भरद्वाज मुनि बसहिं प्रयागा। तिन्हहि राम पद अति अनुरागा।।
अर्थ · Hindi
भरद्वाज मुनि बसहिं प्रयागा। तिन्हहि राम पद अति अनुरागा।।
- RCM 1.44.2Open verse →
तापस सम दम दया निधाना। परमारथ पथ परम सुजाना।।
अर्थ · Hindi
तापस सम दम दया निधाना। परमारथ पथ परम सुजाना।।
- RCM 1.44.3Open verse →
माघ मकरगत रबि जब होई। तीरथपतिहिं आव सब कोई।।
अर्थ · Hindi
माघ मकरगत रबि जब होई। तीरथपतिहिं आव सब कोई।।
- RCM 1.44.4Open verse →
देव दनुज किंनर नर श्रेनी। सादर मज्जहिं सकल त्रिबेनीं।।
अर्थ · Hindi
देव दनुज किंनर नर श्रेनी। सादर मज्जहिं सकल त्रिबेनीं।।
- RCM 1.44.5Open verse →
पूजहि माधव पद जलजाता। परसि अखय बटु हरषहिं गाता।।
अर्थ · Hindi
पूजहि माधव पद जलजाता। परसि अखय बटु हरषहिं गाता।।
- RCM 1.44.6Open verse →
भरद्वाज आश्रम अति पावन। परम रम्य मुनिबर मन भावन।।
अर्थ · Hindi
भरद्वाज आश्रम अति पावन। परम रम्य मुनिबर मन भावन।।
- RCM 1.44.7Open verse →
तहाँ होइ मुनि रिषय समाजा। जाहिं जे मज्जन तीरथराजा।।
अर्थ · Hindi
तहाँ होइ मुनि रिषय समाजा। जाहिं जे मज्जन तीरथराजा।।
- RCM 1.44.8Open verse →
मज्जहिं प्रात समेत उछाहा। कहहिं परसपर हरि गुन गाहा।।
अर्थ · Hindi
मज्जहिं प्रात समेत उछाहा। कहहिं परसपर हरि गुन गाहा।।
- RCM 1.44.9Open verse →
ब्रह्म निरूपम धरम बिधि बरनहिं तत्त्व बिभाग।
अर्थ · Hindi
ब्रह्म निरूपम धरम बिधि बरनहिं तत्त्व बिभाग।
- RCM 1.44.10Open verse →
कहहिं भगति भगवंत कै संजुत ग्यान बिराग।।44।।
अर्थ · Hindi
कहहिं भगति भगवंत कै संजुत ग्यान बिराग।।44।।
- RCM 1.45.1Open verse →
एहि प्रकार भरि माघ नहाहीं। पुनि सब निज निज आश्रम जाहीं।।
अर्थ · Hindi
एहि प्रकार भरि माघ नहाहीं। पुनि सब निज निज आश्रम जाहीं।।
- RCM 1.45.2Open verse →
प्रति संबत अति होइ अनंदा। मकर मज्जि गवनहिं मुनिबृंदा।।
अर्थ · Hindi
प्रति संबत अति होइ अनंदा। मकर मज्जि गवनहिं मुनिबृंदा।।
- RCM 1.45.3Open verse →
एक बार भरि मकर नहाए। सब मुनीस आश्रमन्ह सिधाए।।
अर्थ · Hindi
एक बार भरि मकर नहाए। सब मुनीस आश्रमन्ह सिधाए।।
- RCM 1.45.4Open verse →
जगबालिक मुनि परम बिबेकी। भरव्दाज राखे पद टेकी।।
अर्थ · Hindi
जगबालिक मुनि परम बिबेकी। भरव्दाज राखे पद टेकी।।
- RCM 1.45.5Open verse →
सादर चरन सरोज पखारे। अति पुनीत आसन बैठारे।।
अर्थ · Hindi
सादर चरन सरोज पखारे। अति पुनीत आसन बैठारे।।
- RCM 1.45.6Open verse →
करि पूजा मुनि सुजस बखानी। बोले अति पुनीत मृदु बानी।।
अर्थ · Hindi
करि पूजा मुनि सुजस बखानी। बोले अति पुनीत मृदु बानी।।
- RCM 1.45.7Open verse →
नाथ एक संसउ बड़ मोरें। करगत बेदतत्व सबु तोरें।।
अर्थ · Hindi
नाथ एक संसउ बड़ मोरें। करगत बेदतत्व सबु तोरें।।
- RCM 1.45.8Open verse →
कहत सो मोहि लागत भय लाजा। जौ न कहउँ बड़ होइ अकाजा।।
अर्थ · Hindi
कहत सो मोहि लागत भय लाजा। जौ न कहउँ बड़ होइ अकाजा।।
- RCM 1.45.9Open verse →
संत कहहि असि नीति प्रभु श्रुति पुरान मुनि गाव।
अर्थ · Hindi
संत कहहि असि नीति प्रभु श्रुति पुरान मुनि गाव।
- RCM 1.45.10Open verse →
होइ न बिमल बिबेक उर गुर सन किएँ दुराव।।45।।
अर्थ · Hindi
होइ न बिमल बिबेक उर गुर सन किएँ दुराव।।45।।
- RCM 1.46.1Open verse →
अस बिचारि प्रगटउँ निज मोहू। हरहु नाथ करि जन पर छोहू।।
अर्थ · Hindi
अस बिचारि प्रगटउँ निज मोहू। हरहु नाथ करि जन पर छोहू।।
- RCM 1.46.2Open verse →
राम नाम कर अमित प्रभावा। संत पुरान उपनिषद गावा।।
अर्थ · Hindi
राम नाम कर अमित प्रभावा। संत पुरान उपनिषद गावा।।
- RCM 1.46.3Open verse →
संतत जपत संभु अबिनासी। सिव भगवान ग्यान गुन रासी।।
अर्थ · Hindi
संतत जपत संभु अबिनासी। सिव भगवान ग्यान गुन रासी।।
- RCM 1.46.4Open verse →
आकर चारि जीव जग अहहीं। कासीं मरत परम पद लहहीं।।
अर्थ · Hindi
आकर चारि जीव जग अहहीं। कासीं मरत परम पद लहहीं।।
- RCM 1.46.5Open verse →
सोपि राम महिमा मुनिराया। सिव उपदेसु करत करि दाया।।
अर्थ · Hindi
सोपि राम महिमा मुनिराया। सिव उपदेसु करत करि दाया।।
- RCM 1.46.6Open verse →
रामु कवन प्रभु पूछउँ तोही। कहिअ बुझाइ कृपानिधि मोही।।
अर्थ · Hindi
रामु कवन प्रभु पूछउँ तोही। कहिअ बुझाइ कृपानिधि मोही।।
- RCM 1.46.7Open verse →
एक राम अवधेस कुमारा। तिन्ह कर चरित बिदित संसारा।।
अर्थ · Hindi
एक राम अवधेस कुमारा। तिन्ह कर चरित बिदित संसारा।।
- RCM 1.46.8Open verse →
नारि बिरहँ दुखु लहेउ अपारा। भयहु रोषु रन रावनु मारा।।
अर्थ · Hindi
नारि बिरहँ दुखु लहेउ अपारा। भयहु रोषु रन रावनु मारा।।
- RCM 1.46.9Open verse →
प्रभु सोइ राम कि अपर कोउ जाहि जपत त्रिपुरारि।
अर्थ · Hindi
प्रभु सोइ राम कि अपर कोउ जाहि जपत त्रिपुरारि।
- RCM 1.46.10Open verse →
सत्यधाम सर्बग्य तुम्ह कहहु बिबेकु बिचारि।।46।।
अर्थ · Hindi
सत्यधाम सर्बग्य तुम्ह कहहु बिबेकु बिचारि।।46।।
- RCM 1.47.1Open verse →
जैसे मिटै मोर भ्रम भारी। कहहु सो कथा नाथ बिस्तारी।।
अर्थ · Hindi
जैसे मिटै मोर भ्रम भारी। कहहु सो कथा नाथ बिस्तारी।।
- RCM 1.47.2Open verse →
जागबलिक बोले मुसुकाई। तुम्हहि बिदित रघुपति प्रभुताई।।
अर्थ · Hindi
जागबलिक बोले मुसुकाई। तुम्हहि बिदित रघुपति प्रभुताई।।
- RCM 1.47.3Open verse →
राममगत तुम्ह मन क्रम बानी। चतुराई तुम्हारी मैं जानी।।
अर्थ · Hindi
राममगत तुम्ह मन क्रम बानी। चतुराई तुम्हारी मैं जानी।।
- RCM 1.47.4Open verse →
चाहहु सुनै राम गुन गूढ़ा। कीन्हिहु प्रस्न मनहुँ अति मूढ़ा।।
अर्थ · Hindi
चाहहु सुनै राम गुन गूढ़ा। कीन्हिहु प्रस्न मनहुँ अति मूढ़ा।।
- RCM 1.47.5Open verse →
तात सुनहु सादर मनु लाई। कहउँ राम कै कथा सुहाई।।
अर्थ · Hindi
तात सुनहु सादर मनु लाई। कहउँ राम कै कथा सुहाई।।
- RCM 1.47.6Open verse →
महामोहु महिषेसु बिसाला। रामकथा कालिका कराला।।
अर्थ · Hindi
महामोहु महिषेसु बिसाला। रामकथा कालिका कराला।।
- RCM 1.47.7Open verse →
रामकथा ससि किरन समाना। संत चकोर करहिं जेहि पाना।।
अर्थ · Hindi
रामकथा ससि किरन समाना। संत चकोर करहिं जेहि पाना।।
- RCM 1.47.8Open verse →
ऐसेइ संसय कीन्ह भवानी। महादेव तब कहा बखानी।।
अर्थ · Hindi
ऐसेइ संसय कीन्ह भवानी। महादेव तब कहा बखानी।।
- RCM 1.47.9Open verse →
कहउँ सो मति अनुहारि अब उमा संभु संबाद।
अर्थ · Hindi
कहउँ सो मति अनुहारि अब उमा संभु संबाद।
- RCM 1.47.10Open verse →
भयउ समय जेहि हेतु जेहि सुनु मुनि मिटिहि बिषाद।।47।।
अर्थ · Hindi
भयउ समय जेहि हेतु जेहि सुनु मुनि मिटिहि बिषाद।।47।।
- RCM 1.48.1Open verse →
एक बार त्रेता जुग माहीं। संभु गए कुंभज रिषि पाहीं।।
अर्थ · Hindi
एक बार त्रेता जुग माहीं। संभु गए कुंभज रिषि पाहीं।।
- RCM 1.48.2Open verse →
संग सती जगजननि भवानी। पूजे रिषि अखिलेस्वर जानी।।
अर्थ · Hindi
संग सती जगजननि भवानी। पूजे रिषि अखिलेस्वर जानी।।
- RCM 1.48.3Open verse →
रामकथा मुनीबर्ज बखानी। सुनी महेस परम सुखु मानी।।
अर्थ · Hindi
रामकथा मुनीबर्ज बखानी। सुनी महेस परम सुखु मानी।।
- RCM 1.48.4Open verse →
रिषि पूछी हरिभगति सुहाई। कही संभु अधिकारी पाई।।
अर्थ · Hindi
रिषि पूछी हरिभगति सुहाई। कही संभु अधिकारी पाई।।
- RCM 1.48.5Open verse →
कहत सुनत रघुपति गुन गाथा। कछु दिन तहाँ रहे गिरिनाथा।।
अर्थ · Hindi
कहत सुनत रघुपति गुन गाथा। कछु दिन तहाँ रहे गिरिनाथा।।
- RCM 1.48.6Open verse →
मुनि सन बिदा मागि त्रिपुरारी। चले भवन सँग दच्छकुमारी।।
अर्थ · Hindi
मुनि सन बिदा मागि त्रिपुरारी। चले भवन सँग दच्छकुमारी।।
- RCM 1.48.7Open verse →
तेहि अवसर भंजन महिभारा। हरि रघुबंस लीन्ह अवतारा।।
अर्थ · Hindi
तेहि अवसर भंजन महिभारा। हरि रघुबंस लीन्ह अवतारा।।
- RCM 1.48.8Open verse →
पिता बचन तजि राजु उदासी। दंडक बन बिचरत अबिनासी।।
अर्थ · Hindi
पिता बचन तजि राजु उदासी। दंडक बन बिचरत अबिनासी।।
- RCM 1.48.9Open verse →
ह्दयँ बिचारत जात हर केहि बिधि दरसनु होइ।
अर्थ · Hindi
ह्दयँ बिचारत जात हर केहि बिधि दरसनु होइ।
- RCM 1.48.10Open verse →
गुप्त रुप अवतरेउ प्रभु गएँ जान सबु कोइ।।48(क)।।
अर्थ · Hindi
गुप्त रुप अवतरेउ प्रभु गएँ जान सबु कोइ।।48(क)।।
- RCM 1.48.11Open verse →
संकर उर अति छोभु सती न जानहिं मरमु सोइ।।
अर्थ · Hindi
संकर उर अति छोभु सती न जानहिं मरमु सोइ।।
- RCM 1.48.12Open verse →
तुलसी दरसन लोभु मन डरु लोचन लालची।।48(ख)।।
अर्थ · Hindi
तुलसी दरसन लोभु मन डरु लोचन लालची।।48(ख)।।
- RCM 1.49.1Open verse →
रावन मरन मनुज कर जाचा। प्रभु बिधि बचनु कीन्ह चह साचा।।
अर्थ · Hindi
रावन मरन मनुज कर जाचा। प्रभु बिधि बचनु कीन्ह चह साचा।।
- RCM 1.49.2Open verse →
जौं नहिं जाउँ रहइ पछितावा। करत बिचारु न बनत बनावा।।
अर्थ · Hindi
जौं नहिं जाउँ रहइ पछितावा। करत बिचारु न बनत बनावा।।
- RCM 1.49.3Open verse →
एहि बिधि भए सोचबस ईसा। तेहि समय जाइ दससीसा।।
अर्थ · Hindi
एहि बिधि भए सोचबस ईसा। तेहि समय जाइ दससीसा।।
- RCM 1.49.4Open verse →
लीन्ह नीच मारीचहि संगा। भयउ तुरत सोइ कपट कुरंगा।।
अर्थ · Hindi
लीन्ह नीच मारीचहि संगा। भयउ तुरत सोइ कपट कुरंगा।।
- RCM 1.49.5Open verse →
करि छलु मूढ़ हरी बैदेही। प्रभु प्रभाउ तस बिदित न तेही।।
अर्थ · Hindi
करि छलु मूढ़ हरी बैदेही। प्रभु प्रभाउ तस बिदित न तेही।।
- RCM 1.49.6Open verse →
मृग बधि बन्धु सहित हरि आए। आश्रमु देखि नयन जल छाए।।
अर्थ · Hindi
मृग बधि बन्धु सहित हरि आए। आश्रमु देखि नयन जल छाए।।
- RCM 1.49.7Open verse →
बिरह बिकल नर इव रघुराई। खोजत बिपिन फिरत दोउ भाई।।
अर्थ · Hindi
बिरह बिकल नर इव रघुराई। खोजत बिपिन फिरत दोउ भाई।।
- RCM 1.49.8Open verse →
कबहूँ जोग बियोग न जाकें। देखा प्रगट बिरह दुख ताकें।।
अर्थ · Hindi
कबहूँ जोग बियोग न जाकें। देखा प्रगट बिरह दुख ताकें।।
- RCM 1.49.9Open verse →
अति विचित्र रघुपति चरित जानहिं परम सुजान।
अर्थ · Hindi
अति विचित्र रघुपति चरित जानहिं परम सुजान।
- RCM 1.49.10Open verse →
जे मतिमंद बिमोह बस हृदयँ धरहिं कछु आन।।49।।
अर्थ · Hindi
जे मतिमंद बिमोह बस हृदयँ धरहिं कछु आन।।49।।
- RCM 1.50.1Open verse →
संभु समय तेहि रामहि देखा। उपजा हियँ अति हरपु बिसेषा।।
अर्थ · Hindi
संभु समय तेहि रामहि देखा। उपजा हियँ अति हरपु बिसेषा।।
- RCM 1.50.2Open verse →
भरि लोचन छबिसिंधु निहारी। कुसमय जानिन कीन्हि चिन्हारी।।
अर्थ · Hindi
भरि लोचन छबिसिंधु निहारी। कुसमय जानिन कीन्हि चिन्हारी।।
- RCM 1.50.3Open verse →
जय सच्चिदानंद जग पावन। अस कहि चलेउ मनोज नसावन।।
अर्थ · Hindi
जय सच्चिदानंद जग पावन। अस कहि चलेउ मनोज नसावन।।
- RCM 1.50.4Open verse →
चले जात सिव सती समेता। पुनि पुनि पुलकत कृपानिकेता।।
अर्थ · Hindi
चले जात सिव सती समेता। पुनि पुनि पुलकत कृपानिकेता।।
- RCM 1.50.5Open verse →
सतीं सो दसा संभु कै देखी। उर उपजा संदेहु बिसेषी।।
अर्थ · Hindi
सतीं सो दसा संभु कै देखी। उर उपजा संदेहु बिसेषी।।
- RCM 1.50.6Open verse →
संकरु जगतबंद्य जगदीसा। सुर नर मुनि सब नावत सीसा।।
अर्थ · Hindi
संकरु जगतबंद्य जगदीसा। सुर नर मुनि सब नावत सीसा।।
- RCM 1.50.7Open verse →
तिन्ह नृपसुतहि नह परनामा। कहि सच्चिदानंद परधमा।।
अर्थ · Hindi
तिन्ह नृपसुतहि नह परनामा। कहि सच्चिदानंद परधमा।।
- RCM 1.50.8Open verse →
भए मगन छबि तासु बिलोकी। अजहुँ प्रीति उर रहति न रोकी।।
अर्थ · Hindi
भए मगन छबि तासु बिलोकी। अजहुँ प्रीति उर रहति न रोकी।।
- RCM 1.50.9Open verse →
ब्रह्म जो व्यापक बिरज अज अकल अनीह अभेद।
अर्थ · Hindi
ब्रह्म जो व्यापक बिरज अज अकल अनीह अभेद।
- RCM 1.50.10Open verse →
सो कि देह धरि होइ नर जाहि न जानत वेद।। 50।।
अर्थ · Hindi
सो कि देह धरि होइ नर जाहि न जानत वेद।। 50।।
- RCM 1.51.1Open verse →
बिष्नु जो सुर हित नरतनु धारी। सोउ सर्बग्य जथा त्रिपुरारी।।
अर्थ · Hindi
बिष्नु जो सुर हित नरतनु धारी। सोउ सर्बग्य जथा त्रिपुरारी।।
- RCM 1.51.2Open verse →
खोजइ सो कि अग्य इव नारी। ग्यानधाम श्रीपति असुरारी।।
अर्थ · Hindi
खोजइ सो कि अग्य इव नारी। ग्यानधाम श्रीपति असुरारी।।
- RCM 1.51.3Open verse →
संभुगिरा पुनि मृषा न होई। सिव सर्बग्य जान सबु कोई।।
अर्थ · Hindi
संभुगिरा पुनि मृषा न होई। सिव सर्बग्य जान सबु कोई।।
- RCM 1.51.4Open verse →
अस संसय मन भयउ अपारा। होई न हृदयँ प्रबोध प्रचारा।।
अर्थ · Hindi
अस संसय मन भयउ अपारा। होई न हृदयँ प्रबोध प्रचारा।।
- RCM 1.51.5Open verse →
जद्यपि प्रगट न कहेउ भवानी। हर अंतरजामी सब जानी।।
अर्थ · Hindi
जद्यपि प्रगट न कहेउ भवानी। हर अंतरजामी सब जानी।।
- RCM 1.51.6Open verse →
सुनहि सती तव नारि सुभाऊ। संसय अस न धरिअ उर काऊ।।
अर्थ · Hindi
सुनहि सती तव नारि सुभाऊ। संसय अस न धरिअ उर काऊ।।
- RCM 1.51.7Open verse →
जासु कथा कुभंज रिषि गाई। भगति जासु मैं मुनिहि सुनाई।।
अर्थ · Hindi
जासु कथा कुभंज रिषि गाई। भगति जासु मैं मुनिहि सुनाई।।
- RCM 1.51.8Open verse →
सोउ मम इष्टदेव रघुबीरा। सेवत जाहि सदा मुनि धीरा।।
अर्थ · Hindi
सोउ मम इष्टदेव रघुबीरा। सेवत जाहि सदा मुनि धीरा।।
- RCM 1.52.1Open verse →
जौं तुम्हरें मन अति संदेहू। तौ किन जाइ परीछा लेहू।।
अर्थ · Hindi
जौं तुम्हरें मन अति संदेहू। तौ किन जाइ परीछा लेहू।।
- RCM 1.52.2Open verse →
तब लगि बैठ अहउँ बटछाहिं। जब लगि तुम्ह ऐहहु मोहि पाही।।
अर्थ · Hindi
तब लगि बैठ अहउँ बटछाहिं। जब लगि तुम्ह ऐहहु मोहि पाही।।
- RCM 1.52.3Open verse →
जैसें जाइ मोह भ्रम भारी। करेहु सो जतनु बिबेक बिचारी।।
अर्थ · Hindi
जैसें जाइ मोह भ्रम भारी। करेहु सो जतनु बिबेक बिचारी।।
- RCM 1.52.4Open verse →
चलीं सती सिव आयसु पाई। करहिं बिचारु करौं का भाई।।
अर्थ · Hindi
चलीं सती सिव आयसु पाई। करहिं बिचारु करौं का भाई।।
- RCM 1.52.5Open verse →
इहाँ संभु अस मन अनुमाना। दच्छसुता कहुँ नहिं कल्याना।।
अर्थ · Hindi
इहाँ संभु अस मन अनुमाना। दच्छसुता कहुँ नहिं कल्याना।।
- RCM 1.52.6Open verse →
मोरेहु कहें न संसय जाहीं। बिधी बिपरीत भलाई नाहीं।।
अर्थ · Hindi
मोरेहु कहें न संसय जाहीं। बिधी बिपरीत भलाई नाहीं।।
- RCM 1.52.7Open verse →
होइहि सोइ जो राम रचि राखा। को करि तर्क बढ़ावै साखा।।
अर्थ · Hindi
होइहि सोइ जो राम रचि राखा। को करि तर्क बढ़ावै साखा।।
- RCM 1.52.8Open verse →
अस कहि लगे जपन हरिनामा। गई सती जहँ प्रभु सुखधामा।।
अर्थ · Hindi
अस कहि लगे जपन हरिनामा। गई सती जहँ प्रभु सुखधामा।।
- RCM 1.52.9Open verse →
पुनि पुनि हृदयँ विचारु करि धरि सीता कर रुप।
अर्थ · Hindi
पुनि पुनि हृदयँ विचारु करि धरि सीता कर रुप।
- RCM 1.52.10Open verse →
आगें होइ चलि पंथ तेहि जेहिं आवत नरभूप।।52।।
अर्थ · Hindi
आगें होइ चलि पंथ तेहि जेहिं आवत नरभूप।।52।।
- RCM 1.53.1Open verse →
लछिमन दीख उमाकृत बेषा चकित भए भ्रम हृदयँ बिसेषा।।
अर्थ · Hindi
लछिमन दीख उमाकृत बेषा चकित भए भ्रम हृदयँ बिसेषा।।
- RCM 1.53.2Open verse →
कहि न सकत कछु अति गंभीरा। प्रभु प्रभाउ जानत मतिधीरा।।
अर्थ · Hindi
कहि न सकत कछु अति गंभीरा। प्रभु प्रभाउ जानत मतिधीरा।।
- RCM 1.53.3Open verse →
सती कपटु जानेउ सुरस्वामी। सबदरसी सब अंतरजामी।।
अर्थ · Hindi
सती कपटु जानेउ सुरस्वामी। सबदरसी सब अंतरजामी।।
- RCM 1.53.4Open verse →
सुमिरत जाहि मिटइ अग्याना। सोइ सरबग्य रामु भगवाना।।
अर्थ · Hindi
सुमिरत जाहि मिटइ अग्याना। सोइ सरबग्य रामु भगवाना।।
- RCM 1.53.5Open verse →
सती कीन्ह चह तहँहुँ दुराऊ। देखहु नारि सुभाव प्रभाऊ।।
अर्थ · Hindi
सती कीन्ह चह तहँहुँ दुराऊ। देखहु नारि सुभाव प्रभाऊ।।
- RCM 1.53.6Open verse →
निज माया बलु हृदयँ बखानी। बोले बिहसि रामु मृदु बानी।।
अर्थ · Hindi
निज माया बलु हृदयँ बखानी। बोले बिहसि रामु मृदु बानी।।
- RCM 1.53.7Open verse →
जोरि पानि प्रभु कीन्ह प्रनामू। पिता समेत लीन्ह निज नामू।।
अर्थ · Hindi
जोरि पानि प्रभु कीन्ह प्रनामू। पिता समेत लीन्ह निज नामू।।
- RCM 1.53.8Open verse →
कहेउ बहोरि कहाँ बृषकेतू। बिपिन अकेलि फिरहु केहि हेतू।।
अर्थ · Hindi
कहेउ बहोरि कहाँ बृषकेतू। बिपिन अकेलि फिरहु केहि हेतू।।
- RCM 1.53.9Open verse →
राम बचन मृदु गूढ़ सुनि उपजा अति संकोचु।
अर्थ · Hindi
राम बचन मृदु गूढ़ सुनि उपजा अति संकोचु।
- RCM 1.53.10Open verse →
सती सभीत महेस पहिं चलीं हृदयँ बड़ सोचु।।53।।
अर्थ · Hindi
सती सभीत महेस पहिं चलीं हृदयँ बड़ सोचु।।53।।
- RCM 1.54.1Open verse →
मैं संकर कर कहा न माना। निज अग्यानु राम पर आना।।
अर्थ · Hindi
मैं संकर कर कहा न माना। निज अग्यानु राम पर आना।।
- RCM 1.54.2Open verse →
जाइ उतरु अब देहउँ काहा। उर उपजा अति दारुन दाहा।।
अर्थ · Hindi
जाइ उतरु अब देहउँ काहा। उर उपजा अति दारुन दाहा।।
- RCM 1.54.3Open verse →
जाना राम सतीं दुखु पावा। निज प्रभाउ कछु प्रगटि जनावा।।
अर्थ · Hindi
जाना राम सतीं दुखु पावा। निज प्रभाउ कछु प्रगटि जनावा।।
- RCM 1.54.4Open verse →
सतीं दीख कौतुकु मग जाता। आगें रामु सहित श्री भ्राता।।
अर्थ · Hindi
सतीं दीख कौतुकु मग जाता। आगें रामु सहित श्री भ्राता।।
- RCM 1.54.5Open verse →
फिरि चितवा पाछें प्रभु देखा। सहित बंधु सिय सुंदर वेषा।।
अर्थ · Hindi
फिरि चितवा पाछें प्रभु देखा। सहित बंधु सिय सुंदर वेषा।।
- RCM 1.54.6Open verse →
जहँ चितवहिं तहँ प्रभु आसीना। सेवहिं सिद्ध मुनीस प्रबीना।।
अर्थ · Hindi
जहँ चितवहिं तहँ प्रभु आसीना। सेवहिं सिद्ध मुनीस प्रबीना।।
- RCM 1.54.7Open verse →
देखे सिव बिधि बिष्नु अनेका। अमित प्रभाउ एक तें एका।।
अर्थ · Hindi
देखे सिव बिधि बिष्नु अनेका। अमित प्रभाउ एक तें एका।।
- RCM 1.54.8Open verse →
बंदत चरन करत प्रभु सेवा। बिबिध बेष देखे सब देवा।।
अर्थ · Hindi
बंदत चरन करत प्रभु सेवा। बिबिध बेष देखे सब देवा।।
- RCM 1.54.9Open verse →
सती बिधात्री इंदिरा देखीं अमित अनूप।
अर्थ · Hindi
सती बिधात्री इंदिरा देखीं अमित अनूप।
- RCM 1.54.10Open verse →
जेहिं जेहिं बेष अजादि सुर तेहि तेहि तन अनुरूप।।54।।
अर्थ · Hindi
जेहिं जेहिं बेष अजादि सुर तेहि तेहि तन अनुरूप।।54।।
- RCM 1.55.1Open verse →
देखे जहँ तहँ रघुपति जेते। सक्तिन्ह सहित सकल सुर तेते।।
अर्थ · Hindi
देखे जहँ तहँ रघुपति जेते। सक्तिन्ह सहित सकल सुर तेते।।
- RCM 1.55.2Open verse →
जीव चराचर जो संसारा। देखे सकल अनेक प्रकारा।।
अर्थ · Hindi
जीव चराचर जो संसारा। देखे सकल अनेक प्रकारा।।
- RCM 1.55.3Open verse →
पूजहिं प्रभुहि देव बहु बेषा। राम रूप दूसर नहिं देखा।।
अर्थ · Hindi
पूजहिं प्रभुहि देव बहु बेषा। राम रूप दूसर नहिं देखा।।
- RCM 1.55.4Open verse →
अवलोके रघुपति बहुतेरे। सीता सहित न बेष घनेरे।।
अर्थ · Hindi
अवलोके रघुपति बहुतेरे। सीता सहित न बेष घनेरे।।
- RCM 1.55.5Open verse →
सोइ रघुबर सोइ लछिमनु सीता। देखि सती अति भई सभीता।।
अर्थ · Hindi
सोइ रघुबर सोइ लछिमनु सीता। देखि सती अति भई सभीता।।
- RCM 1.55.6Open verse →
हृदय कंप तन सुधि कछु नाहीं। नयन मूदि बैठीं मग माहीं।।
अर्थ · Hindi
हृदय कंप तन सुधि कछु नाहीं। नयन मूदि बैठीं मग माहीं।।
- RCM 1.55.7Open verse →
बहुरि बिलोकेउ नयन उघारी। कछु न दीख तहँ दच्छकुमारी।।
अर्थ · Hindi
बहुरि बिलोकेउ नयन उघारी। कछु न दीख तहँ दच्छकुमारी।।
- RCM 1.55.8Open verse →
पुनि पुनि नाइ राम पद सीसा। चलीं तहाँ जहँ रहे गिरीसा।।
अर्थ · Hindi
पुनि पुनि नाइ राम पद सीसा। चलीं तहाँ जहँ रहे गिरीसा।।
- RCM 1.55.9Open verse →
गई समीप महेस तब हँसि पूछी कुसलात।
अर्थ · Hindi
गई समीप महेस तब हँसि पूछी कुसलात।
- RCM 1.55.10Open verse →
लीन्ही परीछा कवन बिधि कहहु सत्य सब बात।।55।।
अर्थ · Hindi
लीन्ही परीछा कवन बिधि कहहु सत्य सब बात।।55।।
- RCM 1.56.1Open verse →
सतीं समुझि रघुबीर प्रभाऊ। भय बस सिव सन कीन्ह दुराऊ।।
अर्थ · Hindi
सतीं समुझि रघुबीर प्रभाऊ। भय बस सिव सन कीन्ह दुराऊ।।
- RCM 1.56.2Open verse →
कछु न परीछा लीन्हि गोसाई। कीन्ह प्रनामु तुम्हारिहि नाई।।
अर्थ · Hindi
कछु न परीछा लीन्हि गोसाई। कीन्ह प्रनामु तुम्हारिहि नाई।।
- RCM 1.56.3Open verse →
जो तुम्ह कहा सो मृषा न होई। मोरें मन प्रतीति अति सोई।।
अर्थ · Hindi
जो तुम्ह कहा सो मृषा न होई। मोरें मन प्रतीति अति सोई।।
- RCM 1.56.4Open verse →
तब संकर देखेउ धरि ध्याना। सतीं जो कीन्ह चरित सब जाना।।
अर्थ · Hindi
तब संकर देखेउ धरि ध्याना। सतीं जो कीन्ह चरित सब जाना।।
- RCM 1.56.5Open verse →
बहुरि राममायहि सिरु नावा। प्रेरि सतिहि जेहिं झूँठ कहावा।।
अर्थ · Hindi
बहुरि राममायहि सिरु नावा। प्रेरि सतिहि जेहिं झूँठ कहावा।।
- RCM 1.56.6Open verse →
हरि इच्छा भावी बलवाना। हृदयँ बिचारत संभु सुजाना।।
अर्थ · Hindi
हरि इच्छा भावी बलवाना। हृदयँ बिचारत संभु सुजाना।।
- RCM 1.56.7Open verse →
सतीं कीन्ह सीता कर बेषा। सिव उर भयउ बिषाद बिसेषा।।
अर्थ · Hindi
सतीं कीन्ह सीता कर बेषा। सिव उर भयउ बिषाद बिसेषा।।
- RCM 1.56.8Open verse →
जौं अब करउँ सती सन प्रीती। मिटइ भगति पथु होइ अनीती।।
अर्थ · Hindi
जौं अब करउँ सती सन प्रीती। मिटइ भगति पथु होइ अनीती।।
- RCM 1.56.9Open verse →
परम पुनीत न जाइ तजि किएँ प्रेम बड़ पापु।
अर्थ · Hindi
परम पुनीत न जाइ तजि किएँ प्रेम बड़ पापु।
- RCM 1.56.10Open verse →
प्रगटि न कहत महेसु कछु हृदयँ अधिक संतापु।।56।।
अर्थ · Hindi
प्रगटि न कहत महेसु कछु हृदयँ अधिक संतापु।।56।।
- RCM 1.57.1Open verse →
तब संकर प्रभु पद सिरु नावा। सुमिरत रामु हृदयँ अस आवा।।
अर्थ · Hindi
तब संकर प्रभु पद सिरु नावा। सुमिरत रामु हृदयँ अस आवा।।
- RCM 1.57.2Open verse →
एहिं तन सतिहि भेट मोहि नाहीं। सिव संकल्पु कीन्ह मन माहीं।।
अर्थ · Hindi
एहिं तन सतिहि भेट मोहि नाहीं। सिव संकल्पु कीन्ह मन माहीं।।
- RCM 1.57.3Open verse →
अस बिचारि संकरु मतिधीरा। चले भवन सुमिरत रघुबीरा।।
अर्थ · Hindi
अस बिचारि संकरु मतिधीरा। चले भवन सुमिरत रघुबीरा।।
- RCM 1.57.4Open verse →
चलत गगन भै गिरा सुहाई। जय महेस भलि भगति दृढ़ाई।।
अर्थ · Hindi
चलत गगन भै गिरा सुहाई। जय महेस भलि भगति दृढ़ाई।।
- RCM 1.57.5Open verse →
अस पन तुम्ह बिनु करइ को आना। रामभगत समरथ भगवाना।।
अर्थ · Hindi
अस पन तुम्ह बिनु करइ को आना। रामभगत समरथ भगवाना।।
- RCM 1.57.6Open verse →
सुनि नभगिरा सती उर सोचा। पूछा सिवहि समेत सकोचा।।
अर्थ · Hindi
सुनि नभगिरा सती उर सोचा। पूछा सिवहि समेत सकोचा।।
- RCM 1.57.7Open verse →
कीन्ह कवन पन कहहु कृपाला। सत्यधाम प्रभु दीनदयाला।।
अर्थ · Hindi
कीन्ह कवन पन कहहु कृपाला। सत्यधाम प्रभु दीनदयाला।।
- RCM 1.57.8Open verse →
जदपि सतीं पूछा बहु भाँती। तदपि न कहेउ त्रिपुर आराती।।
अर्थ · Hindi
जदपि सतीं पूछा बहु भाँती। तदपि न कहेउ त्रिपुर आराती।।
- RCM 1.57.9Open verse →
सतीं हृदय अनुमान किय सबु जानेउ सर्बग्य।
अर्थ · Hindi
सतीं हृदय अनुमान किय सबु जानेउ सर्बग्य।
- RCM 1.57.10Open verse →
कीन्ह कपटु मैं संभु सन नारि सहज जड़ अग्य।।57क।।
अर्थ · Hindi
कीन्ह कपटु मैं संभु सन नारि सहज जड़ अग्य।।57क।।
- RCM 1.57.11Open verse →
जलु पय सरिस बिकाइ देखहु प्रीति कि रीति भलि।
अर्थ · Hindi
जलु पय सरिस बिकाइ देखहु प्रीति कि रीति भलि।
- RCM 1.57.12Open verse →
बिलग होइ रसु जाइ कपट खटाई परत पुनि।।57ख।।
अर्थ · Hindi
बिलग होइ रसु जाइ कपट खटाई परत पुनि।।57ख।।
- RCM 1.58.1Open verse →
हृदयँ सोचु समुझत निज करनी। चिंता अमित जाइ नहि बरनी।।
अर्थ · Hindi
हृदयँ सोचु समुझत निज करनी। चिंता अमित जाइ नहि बरनी।।
- RCM 1.58.2Open verse →
कृपासिंधु सिव परम अगाधा। प्रगट न कहेउ मोर अपराधा।।
अर्थ · Hindi
कृपासिंधु सिव परम अगाधा। प्रगट न कहेउ मोर अपराधा।।
- RCM 1.58.3Open verse →
संकर रुख अवलोकि भवानी। प्रभु मोहि तजेउ हृदयँ अकुलानी।।
अर्थ · Hindi
संकर रुख अवलोकि भवानी। प्रभु मोहि तजेउ हृदयँ अकुलानी।।
- RCM 1.58.4Open verse →
निज अघ समुझि न कछु कहि जाई। तपइ अवाँ इव उर अधिकाई।।
अर्थ · Hindi
निज अघ समुझि न कछु कहि जाई। तपइ अवाँ इव उर अधिकाई।।
- RCM 1.58.5Open verse →
सतिहि ससोच जानि बृषकेतू। कहीं कथा सुंदर सुख हेतू।।
अर्थ · Hindi
सतिहि ससोच जानि बृषकेतू। कहीं कथा सुंदर सुख हेतू।।
- RCM 1.58.6Open verse →
बरनत पंथ बिबिध इतिहासा। बिस्वनाथ पहुँचे कैलासा।।
अर्थ · Hindi
बरनत पंथ बिबिध इतिहासा। बिस्वनाथ पहुँचे कैलासा।।
- RCM 1.58.7Open verse →
तहँ पुनि संभु समुझि पन आपन। बैठे बट तर करि कमलासन।।
अर्थ · Hindi
तहँ पुनि संभु समुझि पन आपन। बैठे बट तर करि कमलासन।।
- RCM 1.58.8Open verse →
संकर सहज सरुप सम्हारा। लागि समाधि अखंड अपारा।।
अर्थ · Hindi
संकर सहज सरुप सम्हारा। लागि समाधि अखंड अपारा।।
- RCM 1.58.9Open verse →
सती बसहि कैलास तब अधिक सोचु मन माहिं।
अर्थ · Hindi
सती बसहि कैलास तब अधिक सोचु मन माहिं।
- RCM 1.58.10Open verse →
मरमु न कोऊ जान कछु जुग सम दिवस सिराहिं।।58।।
अर्थ · Hindi
मरमु न कोऊ जान कछु जुग सम दिवस सिराहिं।।58।।
- RCM 1.59.1Open verse →
नित नव सोचु सतीं उर भारा। कब जैहउँ दुख सागर पारा।।
अर्थ · Hindi
नित नव सोचु सतीं उर भारा। कब जैहउँ दुख सागर पारा।।
- RCM 1.59.2Open verse →
मैं जो कीन्ह रघुपति अपमाना। पुनिपति बचनु मृषा करि जाना।।
अर्थ · Hindi
मैं जो कीन्ह रघुपति अपमाना। पुनिपति बचनु मृषा करि जाना।।
- RCM 1.59.3Open verse →
सो फलु मोहि बिधाताँ दीन्हा। जो कछु उचित रहा सोइ कीन्हा।।
अर्थ · Hindi
सो फलु मोहि बिधाताँ दीन्हा। जो कछु उचित रहा सोइ कीन्हा।।
- RCM 1.59.4Open verse →
अब बिधि अस बूझिअ नहि तोही। संकर बिमुख जिआवसि मोही।।
अर्थ · Hindi
अब बिधि अस बूझिअ नहि तोही। संकर बिमुख जिआवसि मोही।।
- RCM 1.59.5Open verse →
कहि न जाई कछु हृदय गलानी। मन महुँ रामाहि सुमिर सयानी।।
अर्थ · Hindi
कहि न जाई कछु हृदय गलानी। मन महुँ रामाहि सुमिर सयानी।।
- RCM 1.59.6Open verse →
जौ प्रभु दीनदयालु कहावा। आरती हरन बेद जसु गावा।।
अर्थ · Hindi
जौ प्रभु दीनदयालु कहावा। आरती हरन बेद जसु गावा।।
- RCM 1.59.7Open verse →
तौ मैं बिनय करउँ कर जोरी। छूटउ बेगि देह यह मोरी।।
अर्थ · Hindi
तौ मैं बिनय करउँ कर जोरी। छूटउ बेगि देह यह मोरी।।
- RCM 1.59.8Open verse →
जौं मोरे सिव चरन सनेहू। मन क्रम बचन सत्य ब्रतु एहू।।
अर्थ · Hindi
जौं मोरे सिव चरन सनेहू। मन क्रम बचन सत्य ब्रतु एहू।।
- RCM 1.59.9Open verse →
तौ सबदरसी सुनिअ प्रभु करउ सो बेगि उपाइ।
अर्थ · Hindi
तौ सबदरसी सुनिअ प्रभु करउ सो बेगि उपाइ।
- RCM 1.59.10Open verse →
होइ मरनु जेही बिनहिं श्रम दुसह बिपत्ति बिहाइ।।59।।
अर्थ · Hindi
होइ मरनु जेही बिनहिं श्रम दुसह बिपत्ति बिहाइ।।59।।
- RCM 1.60.1Open verse →
एहि बिधि दुखित प्रजेसकुमारी। अकथनीय दारुन दुखु भारी।।
अर्थ · Hindi
एहि बिधि दुखित प्रजेसकुमारी। अकथनीय दारुन दुखु भारी।।
- RCM 1.60.2Open verse →
बीतें संबत सहस सतासी। तजी समाधि संभु अबिनासी।।
अर्थ · Hindi
बीतें संबत सहस सतासी। तजी समाधि संभु अबिनासी।।
- RCM 1.60.3Open verse →
राम नाम सिव सुमिरन लागे। जानेउ सतीं जगतपति जागे।।
अर्थ · Hindi
राम नाम सिव सुमिरन लागे। जानेउ सतीं जगतपति जागे।।
- RCM 1.60.4Open verse →
जाइ संभु पद बंदनु कीन्ही। सनमुख संकर आसनु दीन्हा।।
अर्थ · Hindi
जाइ संभु पद बंदनु कीन्ही। सनमुख संकर आसनु दीन्हा।।
- RCM 1.60.5Open verse →
लगे कहन हरिकथा रसाला। दच्छ प्रजेस भए तेहि काला।।
अर्थ · Hindi
लगे कहन हरिकथा रसाला। दच्छ प्रजेस भए तेहि काला।।
- RCM 1.60.6Open verse →
देखा बिधि बिचारि सब लायक। दच्छहि कीन्ह प्रजापति नायक।।
अर्थ · Hindi
देखा बिधि बिचारि सब लायक। दच्छहि कीन्ह प्रजापति नायक।।
- RCM 1.60.7Open verse →
बड़ अधिकार दच्छ जब पावा। अति अभिमानु हृदयँ तब आवा।।
अर्थ · Hindi
बड़ अधिकार दच्छ जब पावा। अति अभिमानु हृदयँ तब आवा।।
- RCM 1.60.8Open verse →
नहिं कोउ अस जनमा जग माहीं। प्रभुता पाइ जाहि मद नाहीं।।
अर्थ · Hindi
नहिं कोउ अस जनमा जग माहीं। प्रभुता पाइ जाहि मद नाहीं।।
- RCM 1.60.9Open verse →
दच्छ लिए मुनि बोलि सब करन लगे बड़ जाग।
अर्थ · Hindi
दच्छ लिए मुनि बोलि सब करन लगे बड़ जाग।
- RCM 1.60.10Open verse →
नेवते सादर सकल सुर जे पावत मख भाग।।60।।
अर्थ · Hindi
नेवते सादर सकल सुर जे पावत मख भाग।।60।।
- RCM 1.61.1Open verse →
किंनर नाग सिद्ध गंधर्बा। बधुन्ह समेत चले सुर सर्बा।।
अर्थ · Hindi
किंनर नाग सिद्ध गंधर्बा। बधुन्ह समेत चले सुर सर्बा।।
- RCM 1.61.2Open verse →
बिष्नु बिरंचि महेसु बिहाई। चले सकल सुर जान बनाई।।
अर्थ · Hindi
बिष्नु बिरंचि महेसु बिहाई। चले सकल सुर जान बनाई।।
- RCM 1.61.3Open verse →
सतीं बिलोके ब्योम बिमाना। जात चले सुंदर बिधि नाना।।
अर्थ · Hindi
सतीं बिलोके ब्योम बिमाना। जात चले सुंदर बिधि नाना।।
- RCM 1.61.4Open verse →
सुर सुंदरी करहिं कल गाना। सुनत श्रवन छूटहिं मुनि ध्याना।।
अर्थ · Hindi
सुर सुंदरी करहिं कल गाना। सुनत श्रवन छूटहिं मुनि ध्याना।।
- RCM 1.61.5Open verse →
पूछेउ तब सिवँ कहेउ बखानी। पिता जग्य सुनि कछु हरषानी।।
अर्थ · Hindi
पूछेउ तब सिवँ कहेउ बखानी। पिता जग्य सुनि कछु हरषानी।।
- RCM 1.61.6Open verse →
जौं महेसु मोहि आयसु देहीं। कुछ दिन जाइ रहौं मिस एहीं।।
अर्थ · Hindi
जौं महेसु मोहि आयसु देहीं। कुछ दिन जाइ रहौं मिस एहीं।।
- RCM 1.61.7Open verse →
पति परित्याग हृदय दुखु भारी। कहइ न निज अपराध बिचारी।।
अर्थ · Hindi
पति परित्याग हृदय दुखु भारी। कहइ न निज अपराध बिचारी।।
- RCM 1.61.8Open verse →
बोली सती मनोहर बानी। भय संकोच प्रेम रस सानी।।
अर्थ · Hindi
बोली सती मनोहर बानी। भय संकोच प्रेम रस सानी।।
- RCM 1.61.9Open verse →
पिता भवन उत्सव परम जौं प्रभु आयसु होइ।
अर्थ · Hindi
पिता भवन उत्सव परम जौं प्रभु आयसु होइ।
- RCM 1.61.10Open verse →
तौ मै जाउँ कृपायतन सादर देखन सोइ।।61।।
अर्थ · Hindi
तौ मै जाउँ कृपायतन सादर देखन सोइ।।61।।
- RCM 1.62.1Open verse →
कहेहु नीक मोरेहुँ मन भावा। यह अनुचित नहिं नेवत पठावा।।
अर्थ · Hindi
कहेहु नीक मोरेहुँ मन भावा। यह अनुचित नहिं नेवत पठावा।।
- RCM 1.62.2Open verse →
दच्छ सकल निज सुता बोलाई। हमरें बयर तुम्हउ बिसराई।।
अर्थ · Hindi
दच्छ सकल निज सुता बोलाई। हमरें बयर तुम्हउ बिसराई।।
- RCM 1.62.3Open verse →
ब्रह्मसभाँ हम सन दुखु माना। तेहि तें अजहुँ करहिं अपमाना।।
अर्थ · Hindi
ब्रह्मसभाँ हम सन दुखु माना। तेहि तें अजहुँ करहिं अपमाना।।
- RCM 1.62.4Open verse →
जौं बिनु बोलें जाहु भवानी। रहइ न सीलु सनेहु न कानी।।
अर्थ · Hindi
जौं बिनु बोलें जाहु भवानी। रहइ न सीलु सनेहु न कानी।।
- RCM 1.62.5Open verse →
जदपि मित्र प्रभु पितु गुर गेहा। जाइअ बिनु बोलेहुँ न सँदेहा।।
अर्थ · Hindi
जदपि मित्र प्रभु पितु गुर गेहा। जाइअ बिनु बोलेहुँ न सँदेहा।।
- RCM 1.62.6Open verse →
तदपि बिरोध मान जहँ कोई। तहाँ गएँ कल्यानु न होई।।
अर्थ · Hindi
तदपि बिरोध मान जहँ कोई। तहाँ गएँ कल्यानु न होई।।
- RCM 1.62.7Open verse →
भाँति अनेक संभु समुझावा। भावी बस न ग्यानु उर आवा।।
अर्थ · Hindi
भाँति अनेक संभु समुझावा। भावी बस न ग्यानु उर आवा।।
- RCM 1.62.8Open verse →
कह प्रभु जाहु जो बिनहिं बोलाएँ। नहिं भलि बात हमारे भाएँ।।
अर्थ · Hindi
कह प्रभु जाहु जो बिनहिं बोलाएँ। नहिं भलि बात हमारे भाएँ।।
- RCM 1.62.9Open verse →
कहि देखा हर जतन बहु रहइ न दच्छकुमारि।
अर्थ · Hindi
कहि देखा हर जतन बहु रहइ न दच्छकुमारि।
- RCM 1.62.10Open verse →
दिए मुख्य गन संग तब बिदा कीन्ह त्रिपुरारि।।62।।
अर्थ · Hindi
दिए मुख्य गन संग तब बिदा कीन्ह त्रिपुरारि।।62।।
- RCM 1.63.1Open verse →
पिता भवन जब गई भवानी। दच्छ त्रास काहुँ न सनमानी।।
अर्थ · Hindi
पिता भवन जब गई भवानी। दच्छ त्रास काहुँ न सनमानी।।
- RCM 1.63.2Open verse →
सादर भलेहिं मिली एक माता। भगिनीं मिलीं बहुत मुसुकाता।।
अर्थ · Hindi
सादर भलेहिं मिली एक माता। भगिनीं मिलीं बहुत मुसुकाता।।
- RCM 1.63.3Open verse →
दच्छ न कछु पूछी कुसलाता। सतिहि बिलोकि जरे सब गाता।।
अर्थ · Hindi
दच्छ न कछु पूछी कुसलाता। सतिहि बिलोकि जरे सब गाता।।
- RCM 1.63.4Open verse →
सतीं जाइ देखेउ तब जागा। कतहुँ न दीख संभु कर भागा।।
अर्थ · Hindi
सतीं जाइ देखेउ तब जागा। कतहुँ न दीख संभु कर भागा।।
- RCM 1.63.5Open verse →
तब चित चढ़ेउ जो संकर कहेऊ। प्रभु अपमानु समुझि उर दहेऊ।।
अर्थ · Hindi
तब चित चढ़ेउ जो संकर कहेऊ। प्रभु अपमानु समुझि उर दहेऊ।।
- RCM 1.63.6Open verse →
पाछिल दुखु न हृदयँ अस ब्यापा। जस यह भयउ महा परितापा।।
अर्थ · Hindi
पाछिल दुखु न हृदयँ अस ब्यापा। जस यह भयउ महा परितापा।।
- RCM 1.63.7Open verse →
जद्यपि जग दारुन दुख नाना। सब तें कठिन जाति अवमाना।।
अर्थ · Hindi
जद्यपि जग दारुन दुख नाना। सब तें कठिन जाति अवमाना।।
- RCM 1.63.8Open verse →
समुझि सो सतिहि भयउ अति क्रोधा। बहु बिधि जननीं कीन्ह प्रबोधा।।
अर्थ · Hindi
समुझि सो सतिहि भयउ अति क्रोधा। बहु बिधि जननीं कीन्ह प्रबोधा।।
- RCM 1.63.9Open verse →
सिव अपमानु न जाइ सहि हृदयँ न होइ प्रबोध।
अर्थ · Hindi
सिव अपमानु न जाइ सहि हृदयँ न होइ प्रबोध।
- RCM 1.63.10Open verse →
सकल सभहि हठि हटकि तब बोलीं बचन सक्रोध।।63।।
अर्थ · Hindi
सकल सभहि हठि हटकि तब बोलीं बचन सक्रोध।।63।।
- RCM 1.64.1Open verse →
सुनहु सभासद सकल मुनिंदा। कही सुनी जिन्ह संकर निंदा।।
अर्थ · Hindi
सुनहु सभासद सकल मुनिंदा। कही सुनी जिन्ह संकर निंदा।।
- RCM 1.64.2Open verse →
सो फलु तुरत लहब सब काहूँ। भली भाँति पछिताब पिताहूँ।।
अर्थ · Hindi
सो फलु तुरत लहब सब काहूँ। भली भाँति पछिताब पिताहूँ।।
- RCM 1.64.3Open verse →
संत संभु श्रीपति अपबादा। सुनिअ जहाँ तहँ असि मरजादा।।
अर्थ · Hindi
संत संभु श्रीपति अपबादा। सुनिअ जहाँ तहँ असि मरजादा।।
- RCM 1.64.4Open verse →
काटिअ तासु जीभ जो बसाई। श्रवन मूदि न त चलिअ पराई।।
अर्थ · Hindi
काटिअ तासु जीभ जो बसाई। श्रवन मूदि न त चलिअ पराई।।
- RCM 1.64.5Open verse →
जगदातमा महेसु पुरारी। जगत जनक सब के हितकारी।।
अर्थ · Hindi
जगदातमा महेसु पुरारी। जगत जनक सब के हितकारी।।
- RCM 1.64.6Open verse →
पिता मंदमति निंदत तेही। दच्छ सुक्र संभव यह देही।।
अर्थ · Hindi
पिता मंदमति निंदत तेही। दच्छ सुक्र संभव यह देही।।
- RCM 1.64.7Open verse →
तजिहउँ तुरत देह तेहि हेतू। उर धरि चंद्रमौलि बृषकेतू।।
अर्थ · Hindi
तजिहउँ तुरत देह तेहि हेतू। उर धरि चंद्रमौलि बृषकेतू।।
- RCM 1.64.8Open verse →
अस कहि जोग अगिनि तनु जारा। भयउ सकल मख हाहाकारा।।
अर्थ · Hindi
अस कहि जोग अगिनि तनु जारा। भयउ सकल मख हाहाकारा।।
- RCM 1.64.9Open verse →
सती मरनु सुनि संभु गन लगे करन मख खीस।
अर्थ · Hindi
सती मरनु सुनि संभु गन लगे करन मख खीस।
- RCM 1.64.10Open verse →
जग्य बिधंस बिलोकि भृगु रच्छा कीन्हि मुनीस।।64।।
अर्थ · Hindi
जग्य बिधंस बिलोकि भृगु रच्छा कीन्हि मुनीस।।64।।
- RCM 1.65.1Open verse →
समाचार सब संकर पाए। बीरभद्रु करि कोप पठाए।।
अर्थ · Hindi
समाचार सब संकर पाए। बीरभद्रु करि कोप पठाए।।
- RCM 1.65.2Open verse →
जग्य बिधंस जाइ तिन्ह कीन्हा। सकल सुरन्ह बिधिवत फलु दीन्हा।।
अर्थ · Hindi
जग्य बिधंस जाइ तिन्ह कीन्हा। सकल सुरन्ह बिधिवत फलु दीन्हा।।
- RCM 1.65.3Open verse →
भे जगबिदित दच्छ गति सोई। जसि कछु संभु बिमुख कै होई।।
अर्थ · Hindi
भे जगबिदित दच्छ गति सोई। जसि कछु संभु बिमुख कै होई।।
- RCM 1.65.4Open verse →
यह इतिहास सकल जग जानी। ताते मैं संछेप बखानी।।
अर्थ · Hindi
यह इतिहास सकल जग जानी। ताते मैं संछेप बखानी।।
- RCM 1.65.5Open verse →
सतीं मरत हरि सन बरु मागा। जनम जनम सिव पद अनुरागा।।
अर्थ · Hindi
सतीं मरत हरि सन बरु मागा। जनम जनम सिव पद अनुरागा।।
- RCM 1.65.6Open verse →
तेहि कारन हिमगिरि गृह जाई। जनमीं पारबती तनु पाई।।
अर्थ · Hindi
तेहि कारन हिमगिरि गृह जाई। जनमीं पारबती तनु पाई।।
- RCM 1.65.7Open verse →
जब तें उमा सैल गृह जाईं। सकल सिद्धि संपति तहँ छाई।।
अर्थ · Hindi
जब तें उमा सैल गृह जाईं। सकल सिद्धि संपति तहँ छाई।।
- RCM 1.65.8Open verse →
जहँ तहँ मुनिन्ह सुआश्रम कीन्हे। उचित बास हिम भूधर दीन्हे।।
अर्थ · Hindi
जहँ तहँ मुनिन्ह सुआश्रम कीन्हे। उचित बास हिम भूधर दीन्हे।।
- RCM 1.65.9Open verse →
सदा सुमन फल सहित सब द्रुम नव नाना जाति।
अर्थ · Hindi
सदा सुमन फल सहित सब द्रुम नव नाना जाति।
- RCM 1.65.10Open verse →
प्रगटीं सुंदर सैल पर मनि आकर बहु भाँति।।65।।
अर्थ · Hindi
प्रगटीं सुंदर सैल पर मनि आकर बहु भाँति।।65।।
- RCM 1.66.1Open verse →
सरिता सब पुनित जलु बहहीं। खग मृग मधुप सुखी सब रहहीं।।
अर्थ · Hindi
सरिता सब पुनित जलु बहहीं। खग मृग मधुप सुखी सब रहहीं।।
- RCM 1.66.2Open verse →
सहज बयरु सब जीवन्ह त्यागा। गिरि पर सकल करहिं अनुरागा।।
अर्थ · Hindi
सहज बयरु सब जीवन्ह त्यागा। गिरि पर सकल करहिं अनुरागा।।
- RCM 1.66.3Open verse →
सोह सैल गिरिजा गृह आएँ। जिमि जनु रामभगति के पाएँ।।
अर्थ · Hindi
सोह सैल गिरिजा गृह आएँ। जिमि जनु रामभगति के पाएँ।।
- RCM 1.66.4Open verse →
नित नूतन मंगल गृह तासू। ब्रह्मादिक गावहिं जसु जासू।।
अर्थ · Hindi
नित नूतन मंगल गृह तासू। ब्रह्मादिक गावहिं जसु जासू।।
- RCM 1.66.5Open verse →
नारद समाचार सब पाए। कौतुकहीं गिरि गेह सिधाए।।
अर्थ · Hindi
नारद समाचार सब पाए। कौतुकहीं गिरि गेह सिधाए।।
- RCM 1.66.6Open verse →
सैलराज बड़ आदर कीन्हा। पद पखारि बर आसनु दीन्हा।।
अर्थ · Hindi
सैलराज बड़ आदर कीन्हा। पद पखारि बर आसनु दीन्हा।।
- RCM 1.66.7Open verse →
नारि सहित मुनि पद सिरु नावा। चरन सलिल सबु भवनु सिंचावा।।
अर्थ · Hindi
नारि सहित मुनि पद सिरु नावा। चरन सलिल सबु भवनु सिंचावा।।
- RCM 1.66.8Open verse →
निज सौभाग्य बहुत गिरि बरना। सुता बोलि मेली मुनि चरना।।
अर्थ · Hindi
निज सौभाग्य बहुत गिरि बरना। सुता बोलि मेली मुनि चरना।।
- RCM 1.66.9Open verse →
त्रिकालग्य सर्बग्य तुम्ह गति सर्बत्र तुम्हारि।।
अर्थ · Hindi
त्रिकालग्य सर्बग्य तुम्ह गति सर्बत्र तुम्हारि।।
- RCM 1.66.10Open verse →
कहहु सुता के दोष गुन मुनिबर हृदयँ बिचारि।।66।।
अर्थ · Hindi
कहहु सुता के दोष गुन मुनिबर हृदयँ बिचारि।।66।।
- RCM 1.67.1Open verse →
कह मुनि बिहसि गूढ़ मृदु बानी। सुता तुम्हारि सकल गुन खानी।।
अर्थ · Hindi
कह मुनि बिहसि गूढ़ मृदु बानी। सुता तुम्हारि सकल गुन खानी।।
- RCM 1.67.2Open verse →
सुंदर सहज सुसील सयानी। नाम उमा अंबिका भवानी।।
अर्थ · Hindi
सुंदर सहज सुसील सयानी। नाम उमा अंबिका भवानी।।
- RCM 1.67.3Open verse →
सब लच्छन संपन्न कुमारी। होइहि संतत पियहि पिआरी।।
अर्थ · Hindi
सब लच्छन संपन्न कुमारी। होइहि संतत पियहि पिआरी।।
- RCM 1.67.4Open verse →
सदा अचल एहि कर अहिवाता। एहि तें जसु पैहहिं पितु माता।।
अर्थ · Hindi
सदा अचल एहि कर अहिवाता। एहि तें जसु पैहहिं पितु माता।।
- RCM 1.67.5Open verse →
होइहि पूज्य सकल जग माहीं। एहि सेवत कछु दुर्लभ नाहीं।।
अर्थ · Hindi
होइहि पूज्य सकल जग माहीं। एहि सेवत कछु दुर्लभ नाहीं।।
- RCM 1.67.6Open verse →
एहि कर नामु सुमिरि संसारा। त्रिय चढ़हहिं पतिब्रत असिधारा।।
अर्थ · Hindi
एहि कर नामु सुमिरि संसारा। त्रिय चढ़हहिं पतिब्रत असिधारा।।
- RCM 1.67.7Open verse →
सैल सुलच्छन सुता तुम्हारी। सुनहु जे अब अवगुन दुइ चारी।।
अर्थ · Hindi
सैल सुलच्छन सुता तुम्हारी। सुनहु जे अब अवगुन दुइ चारी।।
- RCM 1.67.8Open verse →
अगुन अमान मातु पितु हीना। उदासीन सब संसय छीना।।
अर्थ · Hindi
अगुन अमान मातु पितु हीना। उदासीन सब संसय छीना।।
- RCM 1.67.9Open verse →
जोगी जटिल अकाम मन नगन अमंगल बेष।।
अर्थ · Hindi
जोगी जटिल अकाम मन नगन अमंगल बेष।।
- RCM 1.67.10Open verse →
अस स्वामी एहि कहँ मिलिहि परी हस्त असि रेख।।67।।
अर्थ · Hindi
अस स्वामी एहि कहँ मिलिहि परी हस्त असि रेख।।67।।
- RCM 1.68.1Open verse →
सुनि मुनि गिरा सत्य जियँ जानी। दुख दंपतिहि उमा हरषानी।।
अर्थ · Hindi
सुनि मुनि गिरा सत्य जियँ जानी। दुख दंपतिहि उमा हरषानी।।
- RCM 1.68.2Open verse →
नारदहुँ यह भेदु न जाना। दसा एक समुझब बिलगाना।।
अर्थ · Hindi
नारदहुँ यह भेदु न जाना। दसा एक समुझब बिलगाना।।
- RCM 1.68.3Open verse →
सकल सखीं गिरिजा गिरि मैना। पुलक सरीर भरे जल नैना।।
अर्थ · Hindi
सकल सखीं गिरिजा गिरि मैना। पुलक सरीर भरे जल नैना।।
- RCM 1.68.4Open verse →
होइ न मृषा देवरिषि भाषा। उमा सो बचनु हृदयँ धरि राखा।।
अर्थ · Hindi
होइ न मृषा देवरिषि भाषा। उमा सो बचनु हृदयँ धरि राखा।।
- RCM 1.68.5Open verse →
उपजेउ सिव पद कमल सनेहू। मिलन कठिन मन भा संदेहू।।
अर्थ · Hindi
उपजेउ सिव पद कमल सनेहू। मिलन कठिन मन भा संदेहू।।
- RCM 1.68.6Open verse →
जानि कुअवसरु प्रीति दुराई। सखी उछँग बैठी पुनि जाई।।
अर्थ · Hindi
जानि कुअवसरु प्रीति दुराई। सखी उछँग बैठी पुनि जाई।।
- RCM 1.68.7Open verse →
झूठि न होइ देवरिषि बानी। सोचहि दंपति सखीं सयानी।।
अर्थ · Hindi
झूठि न होइ देवरिषि बानी। सोचहि दंपति सखीं सयानी।।
- RCM 1.68.8Open verse →
उर धरि धीर कहइ गिरिराऊ। कहहु नाथ का करिअ उपाऊ।।
अर्थ · Hindi
उर धरि धीर कहइ गिरिराऊ। कहहु नाथ का करिअ उपाऊ।।
- RCM 1.68.9Open verse →
कह मुनीस हिमवंत सुनु जो बिधि लिखा लिलार।
अर्थ · Hindi
कह मुनीस हिमवंत सुनु जो बिधि लिखा लिलार।
- RCM 1.68.10Open verse →
देव दनुज नर नाग मुनि कोउ न मेटनिहार।।68।।
अर्थ · Hindi
देव दनुज नर नाग मुनि कोउ न मेटनिहार।।68।।
- RCM 1.69.1Open verse →
तदपि एक मैं कहउँ उपाई। होइ करै जौं दैउ सहाई।।
अर्थ · Hindi
तदपि एक मैं कहउँ उपाई। होइ करै जौं दैउ सहाई।।
- RCM 1.69.2Open verse →
जस बरु मैं बरनेउँ तुम्ह पाहीं। मिलहि उमहि तस संसय नाहीं।।
अर्थ · Hindi
जस बरु मैं बरनेउँ तुम्ह पाहीं। मिलहि उमहि तस संसय नाहीं।।
- RCM 1.69.3Open verse →
जे जे बर के दोष बखाने। ते सब सिव पहि मैं अनुमाने।।
अर्थ · Hindi
जे जे बर के दोष बखाने। ते सब सिव पहि मैं अनुमाने।।
- RCM 1.69.4Open verse →
जौं बिबाहु संकर सन होई। दोषउ गुन सम कह सबु कोई।।
अर्थ · Hindi
जौं बिबाहु संकर सन होई। दोषउ गुन सम कह सबु कोई।।
- RCM 1.69.5Open verse →
जौं अहि सेज सयन हरि करहीं। बुध कछु तिन्ह कर दोषु न धरहीं।।
अर्थ · Hindi
जौं अहि सेज सयन हरि करहीं। बुध कछु तिन्ह कर दोषु न धरहीं।।
- RCM 1.69.6Open verse →
भानु कृसानु सर्ब रस खाहीं। तिन्ह कहँ मंद कहत कोउ नाहीं।।
अर्थ · Hindi
भानु कृसानु सर्ब रस खाहीं। तिन्ह कहँ मंद कहत कोउ नाहीं।।
- RCM 1.69.7Open verse →
सुभ अरु असुभ सलिल सब बहई। सुरसरि कोउ अपुनीत न कहई।।
अर्थ · Hindi
सुभ अरु असुभ सलिल सब बहई। सुरसरि कोउ अपुनीत न कहई।।
- RCM 1.69.8Open verse →
समरथ कहुँ नहिं दोषु गोसाई। रबि पावक सुरसरि की नाई।।
अर्थ · Hindi
समरथ कहुँ नहिं दोषु गोसाई। रबि पावक सुरसरि की नाई।।
- RCM 1.69.9Open verse →
जौं अस हिसिषा करहिं नर जड़ि बिबेक अभिमान।
अर्थ · Hindi
जौं अस हिसिषा करहिं नर जड़ि बिबेक अभिमान।
- RCM 1.69.10Open verse →
परहिं कलप भरि नरक महुँ जीव कि ईस समान।।69।।
अर्थ · Hindi
परहिं कलप भरि नरक महुँ जीव कि ईस समान।।69।।
- RCM 1.70.1Open verse →
सुरसरि जल कृत बारुनि जाना। कबहुँ न संत करहिं तेहि पाना।।
अर्थ · Hindi
सुरसरि जल कृत बारुनि जाना। कबहुँ न संत करहिं तेहि पाना।।
- RCM 1.70.2Open verse →
सुरसरि मिलें सो पावन जैसें। ईस अनीसहि अंतरु तैसें।।
अर्थ · Hindi
सुरसरि मिलें सो पावन जैसें। ईस अनीसहि अंतरु तैसें।।
- RCM 1.70.3Open verse →
संभु सहज समरथ भगवाना। एहि बिबाहँ सब बिधि कल्याना।।
अर्थ · Hindi
संभु सहज समरथ भगवाना। एहि बिबाहँ सब बिधि कल्याना।।
- RCM 1.70.4Open verse →
दुराराध्य पै अहहिं महेसू। आसुतोष पुनि किएँ कलेसू।।
अर्थ · Hindi
दुराराध्य पै अहहिं महेसू। आसुतोष पुनि किएँ कलेसू।।
- RCM 1.70.5Open verse →
जौं तपु करै कुमारि तुम्हारी। भाविउ मेटि सकहिं त्रिपुरारी।।
अर्थ · Hindi
जौं तपु करै कुमारि तुम्हारी। भाविउ मेटि सकहिं त्रिपुरारी।।
- RCM 1.70.6Open verse →
जद्यपि बर अनेक जग माहीं। एहि कहँ सिव तजि दूसर नाहीं।।
अर्थ · Hindi
जद्यपि बर अनेक जग माहीं। एहि कहँ सिव तजि दूसर नाहीं।।
- RCM 1.70.7Open verse →
बर दायक प्रनतारति भंजन। कृपासिंधु सेवक मन रंजन।।
अर्थ · Hindi
बर दायक प्रनतारति भंजन। कृपासिंधु सेवक मन रंजन।।
- RCM 1.70.8Open verse →
इच्छित फल बिनु सिव अवराधे। लहिअ न कोटि जोग जप साधें।।
अर्थ · Hindi
इच्छित फल बिनु सिव अवराधे। लहिअ न कोटि जोग जप साधें।।
- RCM 1.70.9Open verse →
अस कहि नारद सुमिरि हरि गिरिजहि दीन्हि असीस।
अर्थ · Hindi
अस कहि नारद सुमिरि हरि गिरिजहि दीन्हि असीस।
- RCM 1.70.10Open verse →
होइहि यह कल्यान अब संसय तजहु गिरीस।।70।।
अर्थ · Hindi
होइहि यह कल्यान अब संसय तजहु गिरीस।।70।।
- RCM 1.71.1Open verse →
कहि अस ब्रह्मभवन मुनि गयऊ। आगिल चरित सुनहु जस भयऊ।।
अर्थ · Hindi
कहि अस ब्रह्मभवन मुनि गयऊ। आगिल चरित सुनहु जस भयऊ।।
- RCM 1.71.2Open verse →
पतिहि एकांत पाइ कह मैना। नाथ न मैं समुझे मुनि बैना।।
अर्थ · Hindi
पतिहि एकांत पाइ कह मैना। नाथ न मैं समुझे मुनि बैना।।
- RCM 1.71.3Open verse →
जौं घरु बरु कुलु होइ अनूपा। करिअ बिबाहु सुता अनुरुपा।।
अर्थ · Hindi
जौं घरु बरु कुलु होइ अनूपा। करिअ बिबाहु सुता अनुरुपा।।
- RCM 1.71.4Open verse →
न त कन्या बरु रहउ कुआरी। कंत उमा मम प्रानपिआरी।।
अर्थ · Hindi
न त कन्या बरु रहउ कुआरी। कंत उमा मम प्रानपिआरी।।
- RCM 1.71.5Open verse →
जौं न मिलहि बरु गिरिजहि जोगू। गिरि जड़ सहज कहिहि सबु लोगू।।
अर्थ · Hindi
जौं न मिलहि बरु गिरिजहि जोगू। गिरि जड़ सहज कहिहि सबु लोगू।।
- RCM 1.71.6Open verse →
सोइ बिचारि पति करेहु बिबाहू। जेहिं न बहोरि होइ उर दाहू।।
अर्थ · Hindi
सोइ बिचारि पति करेहु बिबाहू। जेहिं न बहोरि होइ उर दाहू।।
- RCM 1.71.7Open verse →
अस कहि परि चरन धरि सीसा। बोले सहित सनेह गिरीसा।।
अर्थ · Hindi
अस कहि परि चरन धरि सीसा। बोले सहित सनेह गिरीसा।।
- RCM 1.71.8Open verse →
बरु पावक प्रगटै ससि माहीं। नारद बचनु अन्यथा नाहीं।।
अर्थ · Hindi
बरु पावक प्रगटै ससि माहीं। नारद बचनु अन्यथा नाहीं।।
- RCM 1.71.9Open verse →
प्रिया सोचु परिहरहु सबु सुमिरहु श्रीभगवान।
अर्थ · Hindi
प्रिया सोचु परिहरहु सबु सुमिरहु श्रीभगवान।
- RCM 1.71.10Open verse →
पारबतिहि निरमयउ जेहिं सोइ करिहि कल्यान।।71।।
अर्थ · Hindi
पारबतिहि निरमयउ जेहिं सोइ करिहि कल्यान।।71।।
- RCM 1.72.1Open verse →
अब जौ तुम्हहि सुता पर नेहू। तौ अस जाइ सिखावन देहू।।
अर्थ · Hindi
अब जौ तुम्हहि सुता पर नेहू। तौ अस जाइ सिखावन देहू।।
- RCM 1.72.2Open verse →
करै सो तपु जेहिं मिलहिं महेसू। आन उपायँ न मिटहि कलेसू।।
अर्थ · Hindi
करै सो तपु जेहिं मिलहिं महेसू। आन उपायँ न मिटहि कलेसू।।
- RCM 1.72.3Open verse →
नारद बचन सगर्भ सहेतू। सुंदर सब गुन निधि बृषकेतू।।
अर्थ · Hindi
नारद बचन सगर्भ सहेतू। सुंदर सब गुन निधि बृषकेतू।।
- RCM 1.72.4Open verse →
अस बिचारि तुम्ह तजहु असंका। सबहि भाँति संकरु अकलंका।।
अर्थ · Hindi
अस बिचारि तुम्ह तजहु असंका। सबहि भाँति संकरु अकलंका।।
- RCM 1.72.5Open verse →
सुनि पति बचन हरषि मन माहीं। गई तुरत उठि गिरिजा पाहीं।।
अर्थ · Hindi
सुनि पति बचन हरषि मन माहीं। गई तुरत उठि गिरिजा पाहीं।।
- RCM 1.72.6Open verse →
उमहि बिलोकि नयन भरे बारी। सहित सनेह गोद बैठारी।।
अर्थ · Hindi
उमहि बिलोकि नयन भरे बारी। सहित सनेह गोद बैठारी।।
- RCM 1.72.7Open verse →
बारहिं बार लेति उर लाई। गदगद कंठ न कछु कहि जाई।।
अर्थ · Hindi
बारहिं बार लेति उर लाई। गदगद कंठ न कछु कहि जाई।।
- RCM 1.72.8Open verse →
जगत मातु सर्बग्य भवानी। मातु सुखद बोलीं मृदु बानी।।
अर्थ · Hindi
जगत मातु सर्बग्य भवानी। मातु सुखद बोलीं मृदु बानी।।
- RCM 1.72.9Open verse →
सुनहि मातु मैं दीख अस सपन सुनावउँ तोहि।
अर्थ · Hindi
सुनहि मातु मैं दीख अस सपन सुनावउँ तोहि।
- RCM 1.72.10Open verse →
सुंदर गौर सुबिप्रबर अस उपदेसेउ मोहि।।72।।
अर्थ · Hindi
सुंदर गौर सुबिप्रबर अस उपदेसेउ मोहि।।72।।
- RCM 1.73.1Open verse →
करहि जाइ तपु सैलकुमारी। नारद कहा सो सत्य बिचारी।।
अर्थ · Hindi
करहि जाइ तपु सैलकुमारी। नारद कहा सो सत्य बिचारी।।
- RCM 1.73.2Open verse →
मातु पितहि पुनि यह मत भावा। तपु सुखप्रद दुख दोष नसावा।।
अर्थ · Hindi
मातु पितहि पुनि यह मत भावा। तपु सुखप्रद दुख दोष नसावा।।
- RCM 1.73.3Open verse →
तपबल रचइ प्रपंच बिधाता। तपबल बिष्नु सकल जग त्राता।।
अर्थ · Hindi
तपबल रचइ प्रपंच बिधाता। तपबल बिष्नु सकल जग त्राता।।
- RCM 1.73.4Open verse →
तपबल संभु करहिं संघारा। तपबल सेषु धरइ महिभारा।।
अर्थ · Hindi
तपबल संभु करहिं संघारा। तपबल सेषु धरइ महिभारा।।
- RCM 1.73.5Open verse →
तप अधार सब सृष्टि भवानी। करहि जाइ तपु अस जियँ जानी।।
अर्थ · Hindi
तप अधार सब सृष्टि भवानी। करहि जाइ तपु अस जियँ जानी।।
- RCM 1.73.6Open verse →
सुनत बचन बिसमित महतारी। सपन सुनायउ गिरिहि हँकारी।।
अर्थ · Hindi
सुनत बचन बिसमित महतारी। सपन सुनायउ गिरिहि हँकारी।।
- RCM 1.73.7Open verse →
मातु पितुहि बहुबिधि समुझाई। चलीं उमा तप हित हरषाई।।
अर्थ · Hindi
मातु पितुहि बहुबिधि समुझाई। चलीं उमा तप हित हरषाई।।
- RCM 1.73.8Open verse →
प्रिय परिवार पिता अरु माता। भए बिकल मुख आव न बाता।।
अर्थ · Hindi
प्रिय परिवार पिता अरु माता। भए बिकल मुख आव न बाता।।
- RCM 1.73.9Open verse →
बेदसिरा मुनि आइ तब सबहि कहा समुझाइ।।
अर्थ · Hindi
बेदसिरा मुनि आइ तब सबहि कहा समुझाइ।।
- RCM 1.73.10Open verse →
पारबती महिमा सुनत रहे प्रबोधहि पाइ।।73।।
अर्थ · Hindi
पारबती महिमा सुनत रहे प्रबोधहि पाइ।।73।।
- RCM 1.74.1Open verse →
उर धरि उमा प्रानपति चरना। जाइ बिपिन लागीं तपु करना।।
अर्थ · Hindi
उर धरि उमा प्रानपति चरना। जाइ बिपिन लागीं तपु करना।।
- RCM 1.74.2Open verse →
अति सुकुमार न तनु तप जोगू। पति पद सुमिरि तजेउ सबु भोगू।।
अर्थ · Hindi
अति सुकुमार न तनु तप जोगू। पति पद सुमिरि तजेउ सबु भोगू।।
- RCM 1.74.3Open verse →
नित नव चरन उपज अनुरागा। बिसरी देह तपहिं मनु लागा।।
अर्थ · Hindi
नित नव चरन उपज अनुरागा। बिसरी देह तपहिं मनु लागा।।
- RCM 1.74.4Open verse →
संबत सहस मूल फल खाए। सागु खाइ सत बरष गवाँए।।
अर्थ · Hindi
संबत सहस मूल फल खाए। सागु खाइ सत बरष गवाँए।।
- RCM 1.74.5Open verse →
कछु दिन भोजनु बारि बतासा। किए कठिन कछु दिन उपबासा।।
अर्थ · Hindi
कछु दिन भोजनु बारि बतासा। किए कठिन कछु दिन उपबासा।।
- RCM 1.74.6Open verse →
बेल पाती महि परइ सुखाई। तीनि सहस संबत सोई खाई।।
अर्थ · Hindi
बेल पाती महि परइ सुखाई। तीनि सहस संबत सोई खाई।।
- RCM 1.74.7Open verse →
पुनि परिहरे सुखानेउ परना। उमहि नाम तब भयउ अपरना।।
अर्थ · Hindi
पुनि परिहरे सुखानेउ परना। उमहि नाम तब भयउ अपरना।।
- RCM 1.74.8Open verse →
देखि उमहि तप खीन सरीरा। ब्रह्मगिरा भै गगन गभीरा।।
अर्थ · Hindi
देखि उमहि तप खीन सरीरा। ब्रह्मगिरा भै गगन गभीरा।।
- RCM 1.74.9Open verse →
भयउ मनोरथ सुफल तव सुनु गिरिजाकुमारि।
अर्थ · Hindi
भयउ मनोरथ सुफल तव सुनु गिरिजाकुमारि।
- RCM 1.74.10Open verse →
परिहरु दुसह कलेस सब अब मिलिहहिं त्रिपुरारि।।74।।
अर्थ · Hindi
परिहरु दुसह कलेस सब अब मिलिहहिं त्रिपुरारि।।74।।
- RCM 1.75.1Open verse →
अस तपु काहुँ न कीन्ह भवानी। भउ अनेक धीर मुनि ग्यानी।।
अर्थ · Hindi
अस तपु काहुँ न कीन्ह भवानी। भउ अनेक धीर मुनि ग्यानी।।
- RCM 1.75.2Open verse →
अब उर धरहु ब्रह्म बर बानी। सत्य सदा संतत सुचि जानी।।
अर्थ · Hindi
अब उर धरहु ब्रह्म बर बानी। सत्य सदा संतत सुचि जानी।।
- RCM 1.75.3Open verse →
आवै पिता बोलावन जबहीं। हठ परिहरि घर जाएहु तबहीं।।
अर्थ · Hindi
आवै पिता बोलावन जबहीं। हठ परिहरि घर जाएहु तबहीं।।
- RCM 1.75.4Open verse →
मिलहिं तुम्हहि जब सप्त रिषीसा। जानेहु तब प्रमान बागीसा।।
अर्थ · Hindi
मिलहिं तुम्हहि जब सप्त रिषीसा। जानेहु तब प्रमान बागीसा।।
- RCM 1.75.5Open verse →
सुनत गिरा बिधि गगन बखानी। पुलक गात गिरिजा हरषानी।।
अर्थ · Hindi
सुनत गिरा बिधि गगन बखानी। पुलक गात गिरिजा हरषानी।।
- RCM 1.75.6Open verse →
उमा चरित सुंदर मैं गावा। सुनहु संभु कर चरित सुहावा।।
अर्थ · Hindi
उमा चरित सुंदर मैं गावा। सुनहु संभु कर चरित सुहावा।।
- RCM 1.75.7Open verse →
जब तें सती जाइ तनु त्यागा। तब सें सिव मन भयउ बिरागा।।
अर्थ · Hindi
जब तें सती जाइ तनु त्यागा। तब सें सिव मन भयउ बिरागा।।
- RCM 1.75.8Open verse →
जपहिं सदा रघुनायक नामा। जहँ तहँ सुनहिं राम गुन ग्रामा।।
अर्थ · Hindi
जपहिं सदा रघुनायक नामा। जहँ तहँ सुनहिं राम गुन ग्रामा।।
- RCM 1.75.9Open verse →
चिदानन्द सुखधाम सिव बिगत मोह मद काम।
अर्थ · Hindi
चिदानन्द सुखधाम सिव बिगत मोह मद काम।
- RCM 1.75.10Open verse →
बिचरहिं महि धरि हृदयँ हरि सकल लोक अभिराम।।75।।
अर्थ · Hindi
बिचरहिं महि धरि हृदयँ हरि सकल लोक अभिराम।।75।।
- RCM 1.76.1Open verse →
कतहुँ मुनिन्ह उपदेसहिं ग्याना। कतहुँ राम गुन करहिं बखाना।।
अर्थ · Hindi
कतहुँ मुनिन्ह उपदेसहिं ग्याना। कतहुँ राम गुन करहिं बखाना।।
- RCM 1.76.2Open verse →
जदपि अकाम तदपि भगवाना। भगत बिरह दुख दुखित सुजाना।।
अर्थ · Hindi
जदपि अकाम तदपि भगवाना। भगत बिरह दुख दुखित सुजाना।।
- RCM 1.76.3Open verse →
एहि बिधि गयउ कालु बहु बीती। नित नै होइ राम पद प्रीती।।
अर्थ · Hindi
एहि बिधि गयउ कालु बहु बीती। नित नै होइ राम पद प्रीती।।
- RCM 1.76.4Open verse →
नैमु प्रेमु संकर कर देखा। अबिचल हृदयँ भगति कै रेखा।।
अर्थ · Hindi
नैमु प्रेमु संकर कर देखा। अबिचल हृदयँ भगति कै रेखा।।
- RCM 1.76.5Open verse →
प्रगटै रामु कृतग्य कृपाला। रूप सील निधि तेज बिसाला।।
अर्थ · Hindi
प्रगटै रामु कृतग्य कृपाला। रूप सील निधि तेज बिसाला।।
- RCM 1.76.6Open verse →
बहु प्रकार संकरहि सराहा। तुम्ह बिनु अस ब्रतु को निरबाहा।।
अर्थ · Hindi
बहु प्रकार संकरहि सराहा। तुम्ह बिनु अस ब्रतु को निरबाहा।।
- RCM 1.76.7Open verse →
बहुबिधि राम सिवहि समुझावा। पारबती कर जन्मु सुनावा।।
अर्थ · Hindi
बहुबिधि राम सिवहि समुझावा। पारबती कर जन्मु सुनावा।।
- RCM 1.76.8Open verse →
अति पुनीत गिरिजा कै करनी। बिस्तर सहित कृपानिधि बरनी।।
अर्थ · Hindi
अति पुनीत गिरिजा कै करनी। बिस्तर सहित कृपानिधि बरनी।।
- RCM 1.76.9Open verse →
अब बिनती मम सुनेहु सिव जौं मो पर निज नेहु।
अर्थ · Hindi
अब बिनती मम सुनेहु सिव जौं मो पर निज नेहु।
- RCM 1.76.10Open verse →
जाइ बिबाहहु सैलजहि यह मोहि मागें देहु।।76।।
अर्थ · Hindi
जाइ बिबाहहु सैलजहि यह मोहि मागें देहु।।76।।
- RCM 1.77.1Open verse →
कह सिव जदपि उचित अस नाहीं। नाथ बचन पुनि मेटि न जाहीं।।
अर्थ · Hindi
कह सिव जदपि उचित अस नाहीं। नाथ बचन पुनि मेटि न जाहीं।।
- RCM 1.77.2Open verse →
सिर धरि आयसु करिअ तुम्हारा। परम धरमु यह नाथ हमारा।।
अर्थ · Hindi
सिर धरि आयसु करिअ तुम्हारा। परम धरमु यह नाथ हमारा।।
- RCM 1.77.3Open verse →
मातु पिता गुर प्रभु कै बानी। बिनहिं बिचार करिअ सुभ जानी।।
अर्थ · Hindi
मातु पिता गुर प्रभु कै बानी। बिनहिं बिचार करिअ सुभ जानी।।
- RCM 1.77.4Open verse →
तुम्ह सब भाँति परम हितकारी। अग्या सिर पर नाथ तुम्हारी।।
अर्थ · Hindi
तुम्ह सब भाँति परम हितकारी। अग्या सिर पर नाथ तुम्हारी।।
- RCM 1.77.5Open verse →
प्रभु तोषेउ सुनि संकर बचना। भक्ति बिबेक धर्म जुत रचना।।
अर्थ · Hindi
प्रभु तोषेउ सुनि संकर बचना। भक्ति बिबेक धर्म जुत रचना।।
- RCM 1.77.6Open verse →
कह प्रभु हर तुम्हार पन रहेऊ। अब उर राखेहु जो हम कहेऊ।।
अर्थ · Hindi
कह प्रभु हर तुम्हार पन रहेऊ। अब उर राखेहु जो हम कहेऊ।।
- RCM 1.77.7Open verse →
अंतरधान भए अस भाषी। संकर सोइ मूरति उर राखी।।
अर्थ · Hindi
अंतरधान भए अस भाषी। संकर सोइ मूरति उर राखी।।
- RCM 1.77.8Open verse →
तबहिं सप्तरिषि सिव पहिं आए। बोले प्रभु अति बचन सुहाए।।
अर्थ · Hindi
तबहिं सप्तरिषि सिव पहिं आए। बोले प्रभु अति बचन सुहाए।।
- RCM 1.77.9Open verse →
पारबती पहिं जाइ तुम्ह प्रेम परिच्छा लेहु।
अर्थ · Hindi
पारबती पहिं जाइ तुम्ह प्रेम परिच्छा लेहु।
- RCM 1.77.10Open verse →
गिरिहि प्रेरि पठएहु भवन दूरि करेहु संदेहु।।77।।
अर्थ · Hindi
गिरिहि प्रेरि पठएहु भवन दूरि करेहु संदेहु।।77।।
- RCM 1.78.1Open verse →
रिषिन्ह गौरि देखी तहँ कैसी। मूरतिमंत तपस्या जैसी।।
अर्थ · Hindi
रिषिन्ह गौरि देखी तहँ कैसी। मूरतिमंत तपस्या जैसी।।
- RCM 1.78.2Open verse →
बोले मुनि सुनु सैलकुमारी। करहु कवन कारन तपु भारी।।
अर्थ · Hindi
बोले मुनि सुनु सैलकुमारी। करहु कवन कारन तपु भारी।।
- RCM 1.78.3Open verse →
केहि अवराधहु का तुम्ह चहहू। हम सन सत्य मरमु किन कहहू।।
अर्थ · Hindi
केहि अवराधहु का तुम्ह चहहू। हम सन सत्य मरमु किन कहहू।।
- RCM 1.78.4Open verse →
कहत बचत मनु अति सकुचाई। हँसिहहु सुनि हमारि जड़ताई।।
अर्थ · Hindi
कहत बचत मनु अति सकुचाई। हँसिहहु सुनि हमारि जड़ताई।।
- RCM 1.78.5Open verse →
मनु हठ परा न सुनइ सिखावा। चहत बारि पर भीति उठावा।।
अर्थ · Hindi
मनु हठ परा न सुनइ सिखावा। चहत बारि पर भीति उठावा।।
- RCM 1.78.6Open verse →
नारद कहा सत्य सोइ जाना। बिनु पंखन्ह हम चहहिं उड़ाना।।
अर्थ · Hindi
नारद कहा सत्य सोइ जाना। बिनु पंखन्ह हम चहहिं उड़ाना।।
- RCM 1.78.7Open verse →
देखहु मुनि अबिबेकु हमारा। चाहिअ सदा सिवहि भरतारा।।
अर्थ · Hindi
देखहु मुनि अबिबेकु हमारा। चाहिअ सदा सिवहि भरतारा।।
- RCM 1.79.1Open verse →
दच्छसुतन्ह उपदेसेन्हि जाई। तिन्ह फिरि भवनु न देखा आई।।
अर्थ · Hindi
दच्छसुतन्ह उपदेसेन्हि जाई। तिन्ह फिरि भवनु न देखा आई।।
- RCM 1.79.2Open verse →
चित्रकेतु कर घरु उन घाला। कनककसिपु कर पुनि अस हाला।।
अर्थ · Hindi
चित्रकेतु कर घरु उन घाला। कनककसिपु कर पुनि अस हाला।।
- RCM 1.79.3Open verse →
नारद सिख जे सुनहिं नर नारी। अवसि होहिं तजि भवनु भिखारी।।
अर्थ · Hindi
नारद सिख जे सुनहिं नर नारी। अवसि होहिं तजि भवनु भिखारी।।
- RCM 1.79.4Open verse →
मन कपटी तन सज्जन चीन्हा। आपु सरिस सबही चह कीन्हा।।
अर्थ · Hindi
मन कपटी तन सज्जन चीन्हा। आपु सरिस सबही चह कीन्हा।।
- RCM 1.79.5Open verse →
तेहि कें बचन मानि बिस्वासा। तुम्ह चाहहु पति सहज उदासा।।
अर्थ · Hindi
तेहि कें बचन मानि बिस्वासा। तुम्ह चाहहु पति सहज उदासा।।
- RCM 1.79.6Open verse →
निर्गुन निलज कुबेष कपाली। अकुल अगेह दिगंबर ब्याली।।
अर्थ · Hindi
निर्गुन निलज कुबेष कपाली। अकुल अगेह दिगंबर ब्याली।।
- RCM 1.79.7Open verse →
कहहु कवन सुखु अस बरु पाएँ। भल भूलिहु ठग के बौराएँ।।
अर्थ · Hindi
कहहु कवन सुखु अस बरु पाएँ। भल भूलिहु ठग के बौराएँ।।
- RCM 1.79.8Open verse →
पंच कहें सिवँ सती बिबाही। पुनि अवडेरि मराएन्हि ताही।।
अर्थ · Hindi
पंच कहें सिवँ सती बिबाही। पुनि अवडेरि मराएन्हि ताही।।
- RCM 1.79.9Open verse →
अब सुख सोवत सोचु नहि भीख मागि भव खाहिं।
अर्थ · Hindi
अब सुख सोवत सोचु नहि भीख मागि भव खाहिं।
- RCM 1.79.10Open verse →
सहज एकाकिन्ह के भवन कबहुँ कि नारि खटाहिं।।79।।
अर्थ · Hindi
सहज एकाकिन्ह के भवन कबहुँ कि नारि खटाहिं।।79।।
- RCM 1.80.1Open verse →
अजहूँ मानहु कहा हमारा। हम तुम्ह कहुँ बरु नीक बिचारा।।
अर्थ · Hindi
अजहूँ मानहु कहा हमारा। हम तुम्ह कहुँ बरु नीक बिचारा।।
- RCM 1.80.2Open verse →
अति सुंदर सुचि सुखद सुसीला। गावहिं बेद जासु जस लीला।।
अर्थ · Hindi
अति सुंदर सुचि सुखद सुसीला। गावहिं बेद जासु जस लीला।।
- RCM 1.80.3Open verse →
दूषन रहित सकल गुन रासी। श्रीपति पुर बैकुंठ निवासी।।
अर्थ · Hindi
दूषन रहित सकल गुन रासी। श्रीपति पुर बैकुंठ निवासी।।
- RCM 1.80.4Open verse →
अस बरु तुम्हहि मिलाउब आनी। सुनत बिहसि कह बचन भवानी।।
अर्थ · Hindi
अस बरु तुम्हहि मिलाउब आनी। सुनत बिहसि कह बचन भवानी।।
- RCM 1.80.5Open verse →
सत्य कहेहु गिरिभव तनु एहा। हठ न छूट छूटै बरु देहा।।
अर्थ · Hindi
सत्य कहेहु गिरिभव तनु एहा। हठ न छूट छूटै बरु देहा।।
- RCM 1.80.6Open verse →
कनकउ पुनि पषान तें होई। जारेहुँ सहजु न परिहर सोई।।
अर्थ · Hindi
कनकउ पुनि पषान तें होई। जारेहुँ सहजु न परिहर सोई।।
- RCM 1.80.7Open verse →
नारद बचन न मैं परिहरऊँ। बसउ भवनु उजरउ नहिं डरऊँ।।
अर्थ · Hindi
नारद बचन न मैं परिहरऊँ। बसउ भवनु उजरउ नहिं डरऊँ।।
- RCM 1.80.8Open verse →
गुर कें बचन प्रतीति न जेही। सपनेहुँ सुगम न सुख सिधि तेही।।
अर्थ · Hindi
गुर कें बचन प्रतीति न जेही। सपनेहुँ सुगम न सुख सिधि तेही।।
- RCM 1.80.9Open verse →
महादेव अवगुन भवन बिष्नु सकल गुन धाम।
अर्थ · Hindi
महादेव अवगुन भवन बिष्नु सकल गुन धाम।
- RCM 1.80.10Open verse →
जेहि कर मनु रम जाहि सन तेहि तेही सन काम।।80।।
अर्थ · Hindi
जेहि कर मनु रम जाहि सन तेहि तेही सन काम।।80।।
- RCM 1.81.1Open verse →
जौं तुम्ह मिलतेहु प्रथम मुनीसा। सुनतिउँ सिख तुम्हारि धरि सीसा।।
अर्थ · Hindi
जौं तुम्ह मिलतेहु प्रथम मुनीसा। सुनतिउँ सिख तुम्हारि धरि सीसा।।
- RCM 1.81.2Open verse →
अब मैं जन्मु संभु हित हारा। को गुन दूषन करै बिचारा।।
अर्थ · Hindi
अब मैं जन्मु संभु हित हारा। को गुन दूषन करै बिचारा।।
- RCM 1.81.3Open verse →
जौं तुम्हरे हठ हृदयँ बिसेषी। रहि न जाइ बिनु किएँ बरेषी।।
अर्थ · Hindi
जौं तुम्हरे हठ हृदयँ बिसेषी। रहि न जाइ बिनु किएँ बरेषी।।
- RCM 1.81.4Open verse →
तौ कौतुकिअन्ह आलसु नाहीं। बर कन्या अनेक जग माहीं।।
अर्थ · Hindi
तौ कौतुकिअन्ह आलसु नाहीं। बर कन्या अनेक जग माहीं।।
- RCM 1.81.5Open verse →
जन्म कोटि लगि रगर हमारी। बरउँ संभु न त रहउँ कुआरी।।
अर्थ · Hindi
जन्म कोटि लगि रगर हमारी। बरउँ संभु न त रहउँ कुआरी।।
- RCM 1.81.6Open verse →
तजउँ न नारद कर उपदेसू। आपु कहहि सत बार महेसू।।
अर्थ · Hindi
तजउँ न नारद कर उपदेसू। आपु कहहि सत बार महेसू।।
- RCM 1.81.7Open verse →
मैं पा परउँ कहइ जगदंबा। तुम्ह गृह गवनहु भयउ बिलंबा।।
अर्थ · Hindi
मैं पा परउँ कहइ जगदंबा। तुम्ह गृह गवनहु भयउ बिलंबा।।
- RCM 1.81.8Open verse →
देखि प्रेमु बोले मुनि ग्यानी। जय जय जगदंबिके भवानी।।
अर्थ · Hindi
देखि प्रेमु बोले मुनि ग्यानी। जय जय जगदंबिके भवानी।।
- RCM 1.81.9Open verse →
तुम्ह माया भगवान सिव सकल जगत पितु मातु।
अर्थ · Hindi
तुम्ह माया भगवान सिव सकल जगत पितु मातु।
- RCM 1.81.10Open verse →
नाइ चरन सिर मुनि चले पुनि पुनि हरषत गातु।।81।।
अर्थ · Hindi
नाइ चरन सिर मुनि चले पुनि पुनि हरषत गातु।।81।।
- RCM 1.82.1Open verse →
जाइ मुनिन्ह हिमवंतु पठाए। करि बिनती गिरजहिं गृह ल्याए।।
अर्थ · Hindi
जाइ मुनिन्ह हिमवंतु पठाए। करि बिनती गिरजहिं गृह ल्याए।।
- RCM 1.82.2Open verse →
बहुरि सप्तरिषि सिव पहिं जाई। कथा उमा कै सकल सुनाई।।
अर्थ · Hindi
बहुरि सप्तरिषि सिव पहिं जाई। कथा उमा कै सकल सुनाई।।
- RCM 1.82.3Open verse →
भए मगन सिव सुनत सनेहा। हरषि सप्तरिषि गवने गेहा।।
अर्थ · Hindi
भए मगन सिव सुनत सनेहा। हरषि सप्तरिषि गवने गेहा।।
- RCM 1.82.4Open verse →
मनु थिर करि तब संभु सुजाना। लगे करन रघुनायक ध्याना।।
अर्थ · Hindi
मनु थिर करि तब संभु सुजाना। लगे करन रघुनायक ध्याना।।
- RCM 1.82.5Open verse →
तारकु असुर भयउ तेहि काला। भुज प्रताप बल तेज बिसाला।।
अर्थ · Hindi
तारकु असुर भयउ तेहि काला। भुज प्रताप बल तेज बिसाला।।
- RCM 1.82.6Open verse →
तेंहि सब लोक लोकपति जीते। भए देव सुख संपति रीते।।
अर्थ · Hindi
तेंहि सब लोक लोकपति जीते। भए देव सुख संपति रीते।।
- RCM 1.82.7Open verse →
अजर अमर सो जीति न जाई। हारे सुर करि बिबिध लराई।।
अर्थ · Hindi
अजर अमर सो जीति न जाई। हारे सुर करि बिबिध लराई।।
- RCM 1.82.8Open verse →
तब बिरंचि सन जाइ पुकारे। देखे बिधि सब देव दुखारे।।
अर्थ · Hindi
तब बिरंचि सन जाइ पुकारे। देखे बिधि सब देव दुखारे।।
- RCM 1.82.9Open verse →
सब सन कहा बुझाइ बिधि दनुज निधन तब होइ।
अर्थ · Hindi
सब सन कहा बुझाइ बिधि दनुज निधन तब होइ।
- RCM 1.82.10Open verse →
संभु सुक्र संभूत सुत एहि जीतइ रन सोइ।।82।।
अर्थ · Hindi
संभु सुक्र संभूत सुत एहि जीतइ रन सोइ।।82।।
- RCM 1.83.1Open verse →
मोर कहा सुनि करहु उपाई। होइहि ईस्वर करिहि सहाई।।
अर्थ · Hindi
मोर कहा सुनि करहु उपाई। होइहि ईस्वर करिहि सहाई।।
- RCM 1.83.2Open verse →
सतीं जो तजी दच्छ मख देहा। जनमी जाइ हिमाचल गेहा।।
अर्थ · Hindi
सतीं जो तजी दच्छ मख देहा। जनमी जाइ हिमाचल गेहा।।
- RCM 1.83.3Open verse →
तेहिं तपु कीन्ह संभु पति लागी। सिव समाधि बैठे सबु त्यागी।।
अर्थ · Hindi
तेहिं तपु कीन्ह संभु पति लागी। सिव समाधि बैठे सबु त्यागी।।
- RCM 1.83.4Open verse →
जदपि अहइ असमंजस भारी। तदपि बात एक सुनहु हमारी।।
अर्थ · Hindi
जदपि अहइ असमंजस भारी। तदपि बात एक सुनहु हमारी।।
- RCM 1.83.5Open verse →
पठवहु कामु जाइ सिव पाहीं। करै छोभु संकर मन माहीं।।
अर्थ · Hindi
पठवहु कामु जाइ सिव पाहीं। करै छोभु संकर मन माहीं।।
- RCM 1.83.6Open verse →
तब हम जाइ सिवहि सिर नाई। करवाउब बिबाहु बरिआई।।
अर्थ · Hindi
तब हम जाइ सिवहि सिर नाई। करवाउब बिबाहु बरिआई।।
- RCM 1.83.7Open verse →
एहि बिधि भलेहि देवहित होई। मर अति नीक कहइ सबु कोई।।
अर्थ · Hindi
एहि बिधि भलेहि देवहित होई। मर अति नीक कहइ सबु कोई।।
- RCM 1.83.8Open verse →
अस्तुति सुरन्ह कीन्हि अति हेतू। प्रगटेउ बिषमबान झषकेतू।।
अर्थ · Hindi
अस्तुति सुरन्ह कीन्हि अति हेतू। प्रगटेउ बिषमबान झषकेतू।।
- RCM 1.83.9Open verse →
सुरन्ह कहीं निज बिपति सब सुनि मन कीन्ह बिचार।
अर्थ · Hindi
सुरन्ह कहीं निज बिपति सब सुनि मन कीन्ह बिचार।
- RCM 1.83.10Open verse →
संभु बिरोध न कुसल मोहि बिहसि कहेउ अस मार।।83।।
अर्थ · Hindi
संभु बिरोध न कुसल मोहि बिहसि कहेउ अस मार।।83।।
- RCM 1.84.1Open verse →
तदपि करब मैं काजु तुम्हारा। श्रुति कह परम धरम उपकारा।।
अर्थ · Hindi
तदपि करब मैं काजु तुम्हारा। श्रुति कह परम धरम उपकारा।।
- RCM 1.84.2Open verse →
पर हित लागि तजइ जो देही। संतत संत प्रसंसहिं तेही।।
अर्थ · Hindi
पर हित लागि तजइ जो देही। संतत संत प्रसंसहिं तेही।।
- RCM 1.84.3Open verse →
अस कहि चलेउ सबहि सिरु नाई। सुमन धनुष कर सहित सहाई।।
अर्थ · Hindi
अस कहि चलेउ सबहि सिरु नाई। सुमन धनुष कर सहित सहाई।।
- RCM 1.84.4Open verse →
चलत मार अस हृदयँ बिचारा। सिव बिरोध ध्रुव मरनु हमारा।।
अर्थ · Hindi
चलत मार अस हृदयँ बिचारा। सिव बिरोध ध्रुव मरनु हमारा।।
- RCM 1.84.5Open verse →
तब आपन प्रभाउ बिस्तारा। निज बस कीन्ह सकल संसारा।।
अर्थ · Hindi
तब आपन प्रभाउ बिस्तारा। निज बस कीन्ह सकल संसारा।।
- RCM 1.84.6Open verse →
कोपेउ जबहि बारिचरकेतू। छन महुँ मिटे सकल श्रुति सेतू।।
अर्थ · Hindi
कोपेउ जबहि बारिचरकेतू। छन महुँ मिटे सकल श्रुति सेतू।।
- RCM 1.84.7Open verse →
ब्रह्मचर्ज ब्रत संजम नाना। धीरज धरम ग्यान बिग्याना।।
अर्थ · Hindi
ब्रह्मचर्ज ब्रत संजम नाना। धीरज धरम ग्यान बिग्याना।।
- RCM 1.84.8Open verse →
सदाचार जप जोग बिरागा। सभय बिबेक कटकु सब भागा।।
अर्थ · Hindi
सदाचार जप जोग बिरागा। सभय बिबेक कटकु सब भागा।।
- RCM 1.85.1Open verse →
सब के हृदयँ मदन अभिलाषा। लता निहारि नवहिं तरु साखा।।
अर्थ · Hindi
सब के हृदयँ मदन अभिलाषा। लता निहारि नवहिं तरु साखा।।
- RCM 1.85.2Open verse →
नदीं उमगि अंबुधि कहुँ धाई। संगम करहिं तलाव तलाई।।
अर्थ · Hindi
नदीं उमगि अंबुधि कहुँ धाई। संगम करहिं तलाव तलाई।।
- RCM 1.85.3Open verse →
जहँ असि दसा जड़न्ह कै बरनी। को कहि सकइ सचेतन करनी।।
अर्थ · Hindi
जहँ असि दसा जड़न्ह कै बरनी। को कहि सकइ सचेतन करनी।।
- RCM 1.85.4Open verse →
पसु पच्छी नभ जल थलचारी। भए कामबस समय बिसारी।।
अर्थ · Hindi
पसु पच्छी नभ जल थलचारी। भए कामबस समय बिसारी।।
- RCM 1.85.5Open verse →
मदन अंध ब्याकुल सब लोका। निसि दिनु नहिं अवलोकहिं कोका।।
अर्थ · Hindi
मदन अंध ब्याकुल सब लोका। निसि दिनु नहिं अवलोकहिं कोका।।
- RCM 1.85.6Open verse →
देव दनुज नर किंनर ब्याला। प्रेत पिसाच भूत बेताला।।
अर्थ · Hindi
देव दनुज नर किंनर ब्याला। प्रेत पिसाच भूत बेताला।।
- RCM 1.85.7Open verse →
इन्ह कै दसा न कहेउँ बखानी। सदा काम के चेरे जानी।।
अर्थ · Hindi
इन्ह कै दसा न कहेउँ बखानी। सदा काम के चेरे जानी।।
- RCM 1.85.8Open verse →
सिद्ध बिरक्त महामुनि जोगी। तेपि कामबस भए बियोगी।।
अर्थ · Hindi
सिद्ध बिरक्त महामुनि जोगी। तेपि कामबस भए बियोगी।।
- RCM 1.86.1Open verse →
उभय घरी अस कौतुक भयऊ। जौ लगि कामु संभु पहिं गयऊ।।
अर्थ · Hindi
उभय घरी अस कौतुक भयऊ। जौ लगि कामु संभु पहिं गयऊ।।
- RCM 1.86.2Open verse →
सिवहि बिलोकि ससंकेउ मारू। भयउ जथाथिति सबु संसारू।।
अर्थ · Hindi
सिवहि बिलोकि ससंकेउ मारू। भयउ जथाथिति सबु संसारू।।
- RCM 1.86.3Open verse →
भए तुरत सब जीव सुखारे। जिमि मद उतरि गएँ मतवारे।।
अर्थ · Hindi
भए तुरत सब जीव सुखारे। जिमि मद उतरि गएँ मतवारे।।
- RCM 1.86.4Open verse →
रुद्रहि देखि मदन भय माना। दुराधरष दुर्गम भगवाना।।
अर्थ · Hindi
रुद्रहि देखि मदन भय माना। दुराधरष दुर्गम भगवाना।।
- RCM 1.86.5Open verse →
फिरत लाज कछु करि नहिं जाई। मरनु ठानि मन रचेसि उपाई।।
अर्थ · Hindi
फिरत लाज कछु करि नहिं जाई। मरनु ठानि मन रचेसि उपाई।।
- RCM 1.86.6Open verse →
प्रगटेसि तुरत रुचिर रितुराजा। कुसुमित नव तरु राजि बिराजा।।
अर्थ · Hindi
प्रगटेसि तुरत रुचिर रितुराजा। कुसुमित नव तरु राजि बिराजा।।
- RCM 1.86.7Open verse →
बन उपबन बापिका तड़ागा। परम सुभग सब दिसा बिभागा।।
अर्थ · Hindi
बन उपबन बापिका तड़ागा। परम सुभग सब दिसा बिभागा।।
- RCM 1.86.8Open verse →
जहँ तहँ जनु उमगत अनुरागा। देखि मुएहुँ मन मनसिज जागा।।
अर्थ · Hindi
जहँ तहँ जनु उमगत अनुरागा। देखि मुएहुँ मन मनसिज जागा।।
- RCM 1.87.1Open verse →
देखि रसाल बिटप बर साखा। तेहि पर चढ़ेउ मदनु मन माखा।।
अर्थ · Hindi
देखि रसाल बिटप बर साखा। तेहि पर चढ़ेउ मदनु मन माखा।।
- RCM 1.87.2Open verse →
सुमन चाप निज सर संधाने। अति रिस ताकि श्रवन लगि ताने।।
अर्थ · Hindi
सुमन चाप निज सर संधाने। अति रिस ताकि श्रवन लगि ताने।।
- RCM 1.87.3Open verse →
छाड़े बिषम बिसिख उर लागे। छुटि समाधि संभु तब जागे।।
अर्थ · Hindi
छाड़े बिषम बिसिख उर लागे। छुटि समाधि संभु तब जागे।।
- RCM 1.87.4Open verse →
भयउ ईस मन छोभु बिसेषी। नयन उघारि सकल दिसि देखी।।
अर्थ · Hindi
भयउ ईस मन छोभु बिसेषी। नयन उघारि सकल दिसि देखी।।
- RCM 1.87.5Open verse →
सौरभ पल्लव मदनु बिलोका। भयउ कोपु कंपेउ त्रैलोका।।
अर्थ · Hindi
सौरभ पल्लव मदनु बिलोका। भयउ कोपु कंपेउ त्रैलोका।।
- RCM 1.87.6Open verse →
तब सिवँ तीसर नयन उघारा। चितवत कामु भयउ जरि छारा।।
अर्थ · Hindi
तब सिवँ तीसर नयन उघारा। चितवत कामु भयउ जरि छारा।।
- RCM 1.87.7Open verse →
हाहाकार भयउ जग भारी। डरपे सुर भए असुर सुखारी।।
अर्थ · Hindi
हाहाकार भयउ जग भारी। डरपे सुर भए असुर सुखारी।।
- RCM 1.87.8Open verse →
समुझि कामसुखु सोचहिं भोगी। भए अकंटक साधक जोगी।।
अर्थ · Hindi
समुझि कामसुखु सोचहिं भोगी। भए अकंटक साधक जोगी।।
- RCM 1.88.1Open verse →
जब जदुबंस कृष्न अवतारा। होइहि हरन महा महिभारा।।
अर्थ · Hindi
जब जदुबंस कृष्न अवतारा। होइहि हरन महा महिभारा।।
- RCM 1.88.2Open verse →
कृष्न तनय होइहि पति तोरा। बचनु अन्यथा होइ न मोरा।।
अर्थ · Hindi
कृष्न तनय होइहि पति तोरा। बचनु अन्यथा होइ न मोरा।।
- RCM 1.88.3Open verse →
रति गवनी सुनि संकर बानी। कथा अपर अब कहउँ बखानी।।
अर्थ · Hindi
रति गवनी सुनि संकर बानी। कथा अपर अब कहउँ बखानी।।
- RCM 1.88.4Open verse →
देवन्ह समाचार सब पाए। ब्रह्मादिक बैकुंठ सिधाए।।
अर्थ · Hindi
देवन्ह समाचार सब पाए। ब्रह्मादिक बैकुंठ सिधाए।।
- RCM 1.88.5Open verse →
सब सुर बिष्नु बिरंचि समेता। गए जहाँ सिव कृपानिकेता।।
अर्थ · Hindi
सब सुर बिष्नु बिरंचि समेता। गए जहाँ सिव कृपानिकेता।।
- RCM 1.88.6Open verse →
पृथक पृथक तिन्ह कीन्हि प्रसंसा। भए प्रसन्न चंद्र अवतंसा।।
अर्थ · Hindi
पृथक पृथक तिन्ह कीन्हि प्रसंसा। भए प्रसन्न चंद्र अवतंसा।।
- RCM 1.88.7Open verse →
बोले कृपासिंधु बृषकेतू। कहहु अमर आए केहि हेतू।।
अर्थ · Hindi
बोले कृपासिंधु बृषकेतू। कहहु अमर आए केहि हेतू।।
- RCM 1.88.8Open verse →
कह बिधि तुम्ह प्रभु अंतरजामी। तदपि भगति बस बिनवउँ स्वामी।।
अर्थ · Hindi
कह बिधि तुम्ह प्रभु अंतरजामी। तदपि भगति बस बिनवउँ स्वामी।।
- RCM 1.88.9Open verse →
सकल सुरन्ह के हृदयँ अस संकर परम उछाहु।
अर्थ · Hindi
सकल सुरन्ह के हृदयँ अस संकर परम उछाहु।
- RCM 1.88.10Open verse →
निज नयनन्हि देखा चहहिं नाथ तुम्हार बिबाहु।।88।।
अर्थ · Hindi
निज नयनन्हि देखा चहहिं नाथ तुम्हार बिबाहु।।88।।
- RCM 1.89.1Open verse →
यह उत्सव देखिअ भरि लोचन। सोइ कछु करहु मदन मद मोचन।
अर्थ · Hindi
यह उत्सव देखिअ भरि लोचन। सोइ कछु करहु मदन मद मोचन।
- RCM 1.89.2Open verse →
कामु जारि रति कहुँ बरु दीन्हा। कृपासिंधु यह अति भल कीन्हा।।
अर्थ · Hindi
कामु जारि रति कहुँ बरु दीन्हा। कृपासिंधु यह अति भल कीन्हा।।
- RCM 1.89.3Open verse →
सासति करि पुनि करहिं पसाऊ। नाथ प्रभुन्ह कर सहज सुभाऊ।।
अर्थ · Hindi
सासति करि पुनि करहिं पसाऊ। नाथ प्रभुन्ह कर सहज सुभाऊ।।
- RCM 1.89.4Open verse →
पारबतीं तपु कीन्ह अपारा। करहु तासु अब अंगीकारा।।
अर्थ · Hindi
पारबतीं तपु कीन्ह अपारा। करहु तासु अब अंगीकारा।।
- RCM 1.89.5Open verse →
सुनि बिधि बिनय समुझि प्रभु बानी। ऐसेइ होउ कहा सुखु मानी।।
अर्थ · Hindi
सुनि बिधि बिनय समुझि प्रभु बानी। ऐसेइ होउ कहा सुखु मानी।।
- RCM 1.89.6Open verse →
तब देवन्ह दुंदुभीं बजाईं। बरषि सुमन जय जय सुर साई।।
अर्थ · Hindi
तब देवन्ह दुंदुभीं बजाईं। बरषि सुमन जय जय सुर साई।।
- RCM 1.89.7Open verse →
अवसरु जानि सप्तरिषि आए। तुरतहिं बिधि गिरिभवन पठाए।।
अर्थ · Hindi
अवसरु जानि सप्तरिषि आए। तुरतहिं बिधि गिरिभवन पठाए।।
- RCM 1.89.8Open verse →
प्रथम गए जहँ रही भवानी। बोले मधुर बचन छल सानी।।
अर्थ · Hindi
प्रथम गए जहँ रही भवानी। बोले मधुर बचन छल सानी।।
- RCM 1.89.9Open verse →
कहा हमार न सुनेहु तब नारद कें उपदेस।
अर्थ · Hindi
कहा हमार न सुनेहु तब नारद कें उपदेस।
- RCM 1.89.10Open verse →
अब भा झूठ तुम्हार पन जारेउ कामु महेस।।89।।
अर्थ · Hindi
अब भा झूठ तुम्हार पन जारेउ कामु महेस।।89।।
- RCM 1.90.1Open verse →
सुनि बोलीं मुसकाइ भवानी। उचित कहेहु मुनिबर बिग्यानी।।
अर्थ · Hindi
सुनि बोलीं मुसकाइ भवानी। उचित कहेहु मुनिबर बिग्यानी।।
- RCM 1.90.2Open verse →
तुम्हरें जान कामु अब जारा। अब लगि संभु रहे सबिकारा।।
अर्थ · Hindi
तुम्हरें जान कामु अब जारा। अब लगि संभु रहे सबिकारा।।
- RCM 1.90.3Open verse →
हमरें जान सदा सिव जोगी। अज अनवद्य अकाम अभोगी।।
अर्थ · Hindi
हमरें जान सदा सिव जोगी। अज अनवद्य अकाम अभोगी।।
- RCM 1.90.4Open verse →
जौं मैं सिव सेये अस जानी। प्रीति समेत कर्म मन बानी।।
अर्थ · Hindi
जौं मैं सिव सेये अस जानी। प्रीति समेत कर्म मन बानी।।
- RCM 1.90.5Open verse →
तौ हमार पन सुनहु मुनीसा। करिहहिं सत्य कृपानिधि ईसा।।
अर्थ · Hindi
तौ हमार पन सुनहु मुनीसा। करिहहिं सत्य कृपानिधि ईसा।।
- RCM 1.90.6Open verse →
तुम्ह जो कहा हर जारेउ मारा। सोइ अति बड़ अबिबेकु तुम्हारा।।
अर्थ · Hindi
तुम्ह जो कहा हर जारेउ मारा। सोइ अति बड़ अबिबेकु तुम्हारा।।
- RCM 1.90.7Open verse →
तात अनल कर सहज सुभाऊ। हिम तेहि निकट जाइ नहिं काऊ।।
अर्थ · Hindi
तात अनल कर सहज सुभाऊ। हिम तेहि निकट जाइ नहिं काऊ।।
- RCM 1.90.8Open verse →
गएँ समीप सो अवसि नसाई। असि मन्मथ महेस की नाई।।
अर्थ · Hindi
गएँ समीप सो अवसि नसाई। असि मन्मथ महेस की नाई।।
- RCM 1.90.9Open verse →
हियँ हरषे मुनि बचन सुनि देखि प्रीति बिस्वास।।
अर्थ · Hindi
हियँ हरषे मुनि बचन सुनि देखि प्रीति बिस्वास।।
- RCM 1.90.10Open verse →
चले भवानिहि नाइ सिर गए हिमाचल पास।।90।।
अर्थ · Hindi
चले भवानिहि नाइ सिर गए हिमाचल पास।।90।।
- RCM 1.91.1Open verse →
सबु प्रसंगु गिरिपतिहि सुनावा। मदन दहन सुनि अति दुखु पावा।।
अर्थ · Hindi
सबु प्रसंगु गिरिपतिहि सुनावा। मदन दहन सुनि अति दुखु पावा।।
- RCM 1.91.2Open verse →
बहुरि कहेउ रति कर बरदाना। सुनि हिमवंत बहुत सुखु माना।।
अर्थ · Hindi
बहुरि कहेउ रति कर बरदाना। सुनि हिमवंत बहुत सुखु माना।।
- RCM 1.91.3Open verse →
हृदयँ बिचारि संभु प्रभुताई। सादर मुनिबर लिए बोलाई।।
अर्थ · Hindi
हृदयँ बिचारि संभु प्रभुताई। सादर मुनिबर लिए बोलाई।।
- RCM 1.91.4Open verse →
सुदिनु सुनखतु सुघरी सोचाई। बेगि बेदबिधि लगन धराई।।
अर्थ · Hindi
सुदिनु सुनखतु सुघरी सोचाई। बेगि बेदबिधि लगन धराई।।
- RCM 1.91.5Open verse →
पत्री सप्तरिषिन्ह सोइ दीन्ही। गहि पद बिनय हिमाचल कीन्ही।।
अर्थ · Hindi
पत्री सप्तरिषिन्ह सोइ दीन्ही। गहि पद बिनय हिमाचल कीन्ही।।
- RCM 1.91.6Open verse →
जाइ बिधिहि दीन्हि सो पाती। बाचत प्रीति न हृदयँ समाती।।
अर्थ · Hindi
जाइ बिधिहि दीन्हि सो पाती। बाचत प्रीति न हृदयँ समाती।।
- RCM 1.91.7Open verse →
लगन बाचि अज सबहि सुनाई। हरषे मुनि सब सुर समुदाई।।
अर्थ · Hindi
लगन बाचि अज सबहि सुनाई। हरषे मुनि सब सुर समुदाई।।
- RCM 1.91.8Open verse →
सुमन बृष्टि नभ बाजन बाजे। मंगल कलस दसहुँ दिसि साजे।।
अर्थ · Hindi
सुमन बृष्टि नभ बाजन बाजे। मंगल कलस दसहुँ दिसि साजे।।
- RCM 1.91.9Open verse →
लगे सँवारन सकल सुर बाहन बिबिध बिमान।
अर्थ · Hindi
लगे सँवारन सकल सुर बाहन बिबिध बिमान।
- RCM 1.91.10Open verse →
होहि सगुन मंगल सुभद करहिं अपछरा गान।।91।।
अर्थ · Hindi
होहि सगुन मंगल सुभद करहिं अपछरा गान।।91।।
- RCM 1.92.1Open verse →
सिवहि संभु गन करहिं सिंगारा। जटा मुकुट अहि मौरु सँवारा।।
अर्थ · Hindi
सिवहि संभु गन करहिं सिंगारा। जटा मुकुट अहि मौरु सँवारा।।
- RCM 1.92.2Open verse →
कुंडल कंकन पहिरे ब्याला। तन बिभूति पट केहरि छाला।।
अर्थ · Hindi
कुंडल कंकन पहिरे ब्याला। तन बिभूति पट केहरि छाला।।
- RCM 1.92.3Open verse →
ससि ललाट सुंदर सिर गंगा। नयन तीनि उपबीत भुजंगा।।
अर्थ · Hindi
ससि ललाट सुंदर सिर गंगा। नयन तीनि उपबीत भुजंगा।।
- RCM 1.92.4Open verse →
गरल कंठ उर नर सिर माला। असिव बेष सिवधाम कृपाला।।
अर्थ · Hindi
गरल कंठ उर नर सिर माला। असिव बेष सिवधाम कृपाला।।
- RCM 1.92.5Open verse →
कर त्रिसूल अरु डमरु बिराजा। चले बसहँ चढ़ि बाजहिं बाजा।।
अर्थ · Hindi
कर त्रिसूल अरु डमरु बिराजा। चले बसहँ चढ़ि बाजहिं बाजा।।
- RCM 1.92.6Open verse →
देखि सिवहि सुरत्रिय मुसुकाहीं। बर लायक दुलहिनि जग नाहीं।।
अर्थ · Hindi
देखि सिवहि सुरत्रिय मुसुकाहीं। बर लायक दुलहिनि जग नाहीं।।
- RCM 1.92.7Open verse →
बिष्नु बिरंचि आदि सुरब्राता। चढ़ि चढ़ि बाहन चले बराता।।
अर्थ · Hindi
बिष्नु बिरंचि आदि सुरब्राता। चढ़ि चढ़ि बाहन चले बराता।।
- RCM 1.92.8Open verse →
सुर समाज सब भाँति अनूपा। नहिं बरात दूलह अनुरूपा।।
अर्थ · Hindi
सुर समाज सब भाँति अनूपा। नहिं बरात दूलह अनुरूपा।।
- RCM 1.92.9Open verse →
बिष्नु कहा अस बिहसि तब बोलि सकल दिसिराज।
अर्थ · Hindi
बिष्नु कहा अस बिहसि तब बोलि सकल दिसिराज।
- RCM 1.92.10Open verse →
बिलग बिलग होइ चलहु सब निज निज सहित समाज।।92।।
अर्थ · Hindi
बिलग बिलग होइ चलहु सब निज निज सहित समाज।।92।।
- RCM 1.93.1Open verse →
बर अनुहारि बरात न भाई। हँसी करैहहु पर पुर जाई।।
अर्थ · Hindi
बर अनुहारि बरात न भाई। हँसी करैहहु पर पुर जाई।।
- RCM 1.93.2Open verse →
बिष्नु बचन सुनि सुर मुसकाने। निज निज सेन सहित बिलगाने।।
अर्थ · Hindi
बिष्नु बचन सुनि सुर मुसकाने। निज निज सेन सहित बिलगाने।।
- RCM 1.93.3Open verse →
मनहीं मन महेसु मुसुकाहीं। हरि के बिंग्य बचन नहिं जाहीं।।
अर्थ · Hindi
मनहीं मन महेसु मुसुकाहीं। हरि के बिंग्य बचन नहिं जाहीं।।
- RCM 1.93.4Open verse →
अति प्रिय बचन सुनत प्रिय केरे। भृंगिहि प्रेरि सकल गन टेरे।।
अर्थ · Hindi
अति प्रिय बचन सुनत प्रिय केरे। भृंगिहि प्रेरि सकल गन टेरे।।
- RCM 1.93.5Open verse →
सिव अनुसासन सुनि सब आए। प्रभु पद जलज सीस तिन्ह नाए।।
अर्थ · Hindi
सिव अनुसासन सुनि सब आए। प्रभु पद जलज सीस तिन्ह नाए।।
- RCM 1.93.6Open verse →
नाना बाहन नाना बेषा। बिहसे सिव समाज निज देखा।।
अर्थ · Hindi
नाना बाहन नाना बेषा। बिहसे सिव समाज निज देखा।।
- RCM 1.93.7Open verse →
कोउ मुखहीन बिपुल मुख काहू। बिनु पद कर कोउ बहु पद बाहू।।
अर्थ · Hindi
कोउ मुखहीन बिपुल मुख काहू। बिनु पद कर कोउ बहु पद बाहू।।
- RCM 1.93.8Open verse →
बिपुल नयन कोउ नयन बिहीना। रिष्टपुष्ट कोउ अति तनखीना।।
अर्थ · Hindi
बिपुल नयन कोउ नयन बिहीना। रिष्टपुष्ट कोउ अति तनखीना।।
- RCM 1.94.1Open verse →
जस दूलहु तसि बनी बराता। कौतुक बिबिध होहिं मग जाता।।
अर्थ · Hindi
जस दूलहु तसि बनी बराता। कौतुक बिबिध होहिं मग जाता।।
- RCM 1.94.2Open verse →
इहाँ हिमाचल रचेउ बिताना। अति बिचित्र नहिं जाइ बखाना।।
अर्थ · Hindi
इहाँ हिमाचल रचेउ बिताना। अति बिचित्र नहिं जाइ बखाना।।
- RCM 1.94.3Open verse →
सैल सकल जहँ लगि जग माहीं। लघु बिसाल नहिं बरनि सिराहीं।।
अर्थ · Hindi
सैल सकल जहँ लगि जग माहीं। लघु बिसाल नहिं बरनि सिराहीं।।
- RCM 1.94.4Open verse →
बन सागर सब नदीं तलावा। हिमगिरि सब कहुँ नेवत पठावा।।
अर्थ · Hindi
बन सागर सब नदीं तलावा। हिमगिरि सब कहुँ नेवत पठावा।।
- RCM 1.94.5Open verse →
कामरूप सुंदर तन धारी। सहित समाज सहित बर नारी।।
अर्थ · Hindi
कामरूप सुंदर तन धारी। सहित समाज सहित बर नारी।।
- RCM 1.94.6Open verse →
गए सकल तुहिनाचल गेहा। गावहिं मंगल सहित सनेहा।।
अर्थ · Hindi
गए सकल तुहिनाचल गेहा। गावहिं मंगल सहित सनेहा।।
- RCM 1.94.7Open verse →
प्रथमहिं गिरि बहु गृह सँवराए। जथाजोगु तहँ तहँ सब छाए।।
अर्थ · Hindi
प्रथमहिं गिरि बहु गृह सँवराए। जथाजोगु तहँ तहँ सब छाए।।
- RCM 1.94.8Open verse →
पुर सोभा अवलोकि सुहाई। लागइ लघु बिरंचि निपुनाई।।
अर्थ · Hindi
पुर सोभा अवलोकि सुहाई। लागइ लघु बिरंचि निपुनाई।।
- RCM 1.95.1Open verse →
नगर निकट बरात सुनि आई। पुर खरभरु सोभा अधिकाई।।
अर्थ · Hindi
नगर निकट बरात सुनि आई। पुर खरभरु सोभा अधिकाई।।
- RCM 1.95.2Open verse →
करि बनाव सजि बाहन नाना। चले लेन सादर अगवाना।।
अर्थ · Hindi
करि बनाव सजि बाहन नाना। चले लेन सादर अगवाना।।
- RCM 1.95.3Open verse →
हियँ हरषे सुर सेन निहारी। हरिहि देखि अति भए सुखारी।।
अर्थ · Hindi
हियँ हरषे सुर सेन निहारी। हरिहि देखि अति भए सुखारी।।
- RCM 1.95.4Open verse →
सिव समाज जब देखन लागे। बिडरि चले बाहन सब भागे।।
अर्थ · Hindi
सिव समाज जब देखन लागे। बिडरि चले बाहन सब भागे।।
- RCM 1.95.5Open verse →
धरि धीरजु तहँ रहे सयाने। बालक सब लै जीव पराने।।
अर्थ · Hindi
धरि धीरजु तहँ रहे सयाने। बालक सब लै जीव पराने।।
- RCM 1.95.6Open verse →
गएँ भवन पूछहिं पितु माता। कहहिं बचन भय कंपित गाता।।
अर्थ · Hindi
गएँ भवन पूछहिं पितु माता। कहहिं बचन भय कंपित गाता।।
- RCM 1.95.7Open verse →
कहिअ काह कहि जाइ न बाता। जम कर धार किधौं बरिआता।।
अर्थ · Hindi
कहिअ काह कहि जाइ न बाता। जम कर धार किधौं बरिआता।।
- RCM 1.95.8Open verse →
बरु बौराह बसहँ असवारा। ब्याल कपाल बिभूषन छारा।।
अर्थ · Hindi
बरु बौराह बसहँ असवारा। ब्याल कपाल बिभूषन छारा।।
- RCM 1.96.1Open verse →
लै अगवान बरातहि आए। दिए सबहि जनवास सुहाए।।
अर्थ · Hindi
लै अगवान बरातहि आए। दिए सबहि जनवास सुहाए।।
- RCM 1.96.2Open verse →
मैनाँ सुभ आरती सँवारी। संग सुमंगल गावहिं नारी।।
अर्थ · Hindi
मैनाँ सुभ आरती सँवारी। संग सुमंगल गावहिं नारी।।
- RCM 1.96.3Open verse →
कंचन थार सोह बर पानी। परिछन चली हरहि हरषानी।।
अर्थ · Hindi
कंचन थार सोह बर पानी। परिछन चली हरहि हरषानी।।
- RCM 1.96.4Open verse →
बिकट बेष रुद्रहि जब देखा। अबलन्ह उर भय भयउ बिसेषा।।
अर्थ · Hindi
बिकट बेष रुद्रहि जब देखा। अबलन्ह उर भय भयउ बिसेषा।।
- RCM 1.96.5Open verse →
भागि भवन पैठीं अति त्रासा। गए महेसु जहाँ जनवासा।।
अर्थ · Hindi
भागि भवन पैठीं अति त्रासा। गए महेसु जहाँ जनवासा।।
- RCM 1.96.6Open verse →
मैना हृदयँ भयउ दुखु भारी। लीन्ही बोलि गिरीसकुमारी।।
अर्थ · Hindi
मैना हृदयँ भयउ दुखु भारी। लीन्ही बोलि गिरीसकुमारी।।
- RCM 1.96.7Open verse →
अधिक सनेहँ गोद बैठारी। स्याम सरोज नयन भरे बारी।।
अर्थ · Hindi
अधिक सनेहँ गोद बैठारी। स्याम सरोज नयन भरे बारी।।
- RCM 1.96.8Open verse →
जेहिं बिधि तुम्हहि रूपु अस दीन्हा। तेहिं जड़ बरु बाउर कस कीन्हा।।
अर्थ · Hindi
जेहिं बिधि तुम्हहि रूपु अस दीन्हा। तेहिं जड़ बरु बाउर कस कीन्हा।।
- RCM 1.96.9Open verse →
कस कीन्ह बरु बौराह बिधि जेहिं तुम्हहि सुंदरता दई।
अर्थ · Hindi
कस कीन्ह बरु बौराह बिधि जेहिं तुम्हहि सुंदरता दई।
- RCM 1.96.10Open verse →
जो फलु चहिअ सुरतरुहिं सो बरबस बबूरहिं लागई।।
अर्थ · Hindi
जो फलु चहिअ सुरतरुहिं सो बरबस बबूरहिं लागई।।
- RCM 1.96.11Open verse →
तुम्ह सहित गिरि तें गिरौं पावक जरौं जलनिधि महुँ परौं।।
अर्थ · Hindi
तुम्ह सहित गिरि तें गिरौं पावक जरौं जलनिधि महुँ परौं।।
- RCM 1.96.12Open verse →
घरु जाउ अपजसु होउ जग जीवत बिबाहु न हौं करौं।।
अर्थ · Hindi
घरु जाउ अपजसु होउ जग जीवत बिबाहु न हौं करौं।।
- RCM 1.96.13Open verse →
भई बिकल अबला सकल दुखित देखि गिरिनारि।
अर्थ · Hindi
भई बिकल अबला सकल दुखित देखि गिरिनारि।
- RCM 1.96.14Open verse →
करि बिलापु रोदति बदति सुता सनेहु सँभारि।।96।।
अर्थ · Hindi
करि बिलापु रोदति बदति सुता सनेहु सँभारि।।96।।
- RCM 1.97.1Open verse →
नारद कर मैं काह बिगारा। भवनु मोर जिन्ह बसत उजारा।।
अर्थ · Hindi
नारद कर मैं काह बिगारा। भवनु मोर जिन्ह बसत उजारा।।
- RCM 1.97.2Open verse →
अस उपदेसु उमहि जिन्ह दीन्हा। बौरे बरहि लगि तपु कीन्हा।।
अर्थ · Hindi
अस उपदेसु उमहि जिन्ह दीन्हा। बौरे बरहि लगि तपु कीन्हा।।
- RCM 1.97.3Open verse →
साचेहुँ उन्ह के मोह न माया। उदासीन धनु धामु न जाया।।
अर्थ · Hindi
साचेहुँ उन्ह के मोह न माया। उदासीन धनु धामु न जाया।।
- RCM 1.97.4Open verse →
पर घर घालक लाज न भीरा। बाझँ कि जान प्रसव कैं पीरा।।
अर्थ · Hindi
पर घर घालक लाज न भीरा। बाझँ कि जान प्रसव कैं पीरा।।
- RCM 1.97.5Open verse →
जननिहि बिकल बिलोकि भवानी। बोली जुत बिबेक मृदु बानी।।
अर्थ · Hindi
जननिहि बिकल बिलोकि भवानी। बोली जुत बिबेक मृदु बानी।।
- RCM 1.97.6Open verse →
अस बिचारि सोचहि मति माता। सो न टरइ जो रचइ बिधाता।।
अर्थ · Hindi
अस बिचारि सोचहि मति माता। सो न टरइ जो रचइ बिधाता।।
- RCM 1.97.7Open verse →
करम लिखा जौ बाउर नाहू। तौ कत दोसु लगाइअ काहू।।
अर्थ · Hindi
करम लिखा जौ बाउर नाहू। तौ कत दोसु लगाइअ काहू।।
- RCM 1.97.8Open verse →
तुम्ह सन मिटहिं कि बिधि के अंका। मातु ब्यर्थ जनि लेहु कलंका।।
अर्थ · Hindi
तुम्ह सन मिटहिं कि बिधि के अंका। मातु ब्यर्थ जनि लेहु कलंका।।
- RCM 1.98.1Open verse →
तब नारद सबहि समुझावा। पूरुब कथाप्रसंगु सुनावा।।
अर्थ · Hindi
तब नारद सबहि समुझावा। पूरुब कथाप्रसंगु सुनावा।।
- RCM 1.98.2Open verse →
मयना सत्य सुनहु मम बानी। जगदंबा तव सुता भवानी।।
अर्थ · Hindi
मयना सत्य सुनहु मम बानी। जगदंबा तव सुता भवानी।।
- RCM 1.98.3Open verse →
अजा अनादि सक्ति अबिनासिनि। सदा संभु अरधंग निवासिनि।।
अर्थ · Hindi
अजा अनादि सक्ति अबिनासिनि। सदा संभु अरधंग निवासिनि।।
- RCM 1.98.4Open verse →
जग संभव पालन लय कारिनि। निज इच्छा लीला बपु धारिनि।।
अर्थ · Hindi
जग संभव पालन लय कारिनि। निज इच्छा लीला बपु धारिनि।।
- RCM 1.98.5Open verse →
जनमीं प्रथम दच्छ गृह जाई। नामु सती सुंदर तनु पाई।।
अर्थ · Hindi
जनमीं प्रथम दच्छ गृह जाई। नामु सती सुंदर तनु पाई।।
- RCM 1.98.6Open verse →
तहँहुँ सती संकरहि बिबाहीं। कथा प्रसिद्ध सकल जग माहीं।।
अर्थ · Hindi
तहँहुँ सती संकरहि बिबाहीं। कथा प्रसिद्ध सकल जग माहीं।।
- RCM 1.98.7Open verse →
एक बार आवत सिव संगा। देखेउ रघुकुल कमल पतंगा।।
अर्थ · Hindi
एक बार आवत सिव संगा। देखेउ रघुकुल कमल पतंगा।।
- RCM 1.98.8Open verse →
भयउ मोहु सिव कहा न कीन्हा। भ्रम बस बेषु सीय कर लीन्हा।।
अर्थ · Hindi
भयउ मोहु सिव कहा न कीन्हा। भ्रम बस बेषु सीय कर लीन्हा।।
- RCM 1.99.1Open verse →
तब मयना हिमवंतु अनंदे। पुनि पुनि पारबती पद बंदे।।
अर्थ · Hindi
तब मयना हिमवंतु अनंदे। पुनि पुनि पारबती पद बंदे।।
- RCM 1.99.2Open verse →
नारि पुरुष सिसु जुबा सयाने। नगर लोग सब अति हरषाने।।
अर्थ · Hindi
नारि पुरुष सिसु जुबा सयाने। नगर लोग सब अति हरषाने।।
- RCM 1.99.3Open verse →
लगे होन पुर मंगलगाना। सजे सबहि हाटक घट नाना।।
अर्थ · Hindi
लगे होन पुर मंगलगाना। सजे सबहि हाटक घट नाना।।
- RCM 1.99.4Open verse →
भाँति अनेक भई जेवराना। सूपसास्त्र जस कछु ब्यवहारा।।
अर्थ · Hindi
भाँति अनेक भई जेवराना। सूपसास्त्र जस कछु ब्यवहारा।।
- RCM 1.99.5Open verse →
सो जेवनार कि जाइ बखानी। बसहिं भवन जेहिं मातु भवानी।।
अर्थ · Hindi
सो जेवनार कि जाइ बखानी। बसहिं भवन जेहिं मातु भवानी।।
- RCM 1.99.6Open verse →
सादर बोले सकल बराती। बिष्नु बिरंचि देव सब जाती।।
अर्थ · Hindi
सादर बोले सकल बराती। बिष्नु बिरंचि देव सब जाती।।
- RCM 1.99.7Open verse →
बिबिधि पाँति बैठी जेवनारा। लागे परुसन निपुन सुआरा।।
अर्थ · Hindi
बिबिधि पाँति बैठी जेवनारा। लागे परुसन निपुन सुआरा।।
- RCM 1.99.8Open verse →
नारिबृंद सुर जेवँत जानी। लगीं देन गारीं मृदु बानी।।
अर्थ · Hindi
नारिबृंद सुर जेवँत जानी। लगीं देन गारीं मृदु बानी।।
- RCM 1.100.1Open verse →
बोलि सकल सुर सादर लीन्हे। सबहि जथोचित आसन दीन्हे।।
अर्थ · Hindi
बोलि सकल सुर सादर लीन्हे। सबहि जथोचित आसन दीन्हे।।
- RCM 1.100.2Open verse →
बेदी बेद बिधान सँवारी। सुभग सुमंगल गावहिं नारी।।
अर्थ · Hindi
बेदी बेद बिधान सँवारी। सुभग सुमंगल गावहिं नारी।।
- RCM 1.100.3Open verse →
सिंघासनु अति दिब्य सुहावा। जाइ न बरनि बिरंचि बनावा।।
अर्थ · Hindi
सिंघासनु अति दिब्य सुहावा। जाइ न बरनि बिरंचि बनावा।।
- RCM 1.100.4Open verse →
बैठे सिव बिप्रन्ह सिरु नाई। हृदयँ सुमिरि निज प्रभु रघुराई।।
अर्थ · Hindi
बैठे सिव बिप्रन्ह सिरु नाई। हृदयँ सुमिरि निज प्रभु रघुराई।।
- RCM 1.100.5Open verse →
बहुरि मुनीसन्ह उमा बोलाई। करि सिंगारु सखीं लै आई।।
अर्थ · Hindi
बहुरि मुनीसन्ह उमा बोलाई। करि सिंगारु सखीं लै आई।।
- RCM 1.100.6Open verse →
देखत रूपु सकल सुर मोहे। बरनै छबि अस जग कबि को है।।
अर्थ · Hindi
देखत रूपु सकल सुर मोहे। बरनै छबि अस जग कबि को है।।
- RCM 1.100.7Open verse →
जगदंबिका जानि भव भामा। सुरन्ह मनहिं मन कीन्ह प्रनामा।।
अर्थ · Hindi
जगदंबिका जानि भव भामा। सुरन्ह मनहिं मन कीन्ह प्रनामा।।
- RCM 1.100.8Open verse →
सुंदरता मरजाद भवानी। जाइ न कोटिहुँ बदन बखानी।।
अर्थ · Hindi
सुंदरता मरजाद भवानी। जाइ न कोटिहुँ बदन बखानी।।
- RCM 1.101.1Open verse →
जसि बिबाह कै बिधि श्रुति गाई। महामुनिन्ह सो सब करवाई।।
अर्थ · Hindi
जसि बिबाह कै बिधि श्रुति गाई। महामुनिन्ह सो सब करवाई।।
- RCM 1.101.2Open verse →
गहि गिरीस कुस कन्या पानी। भवहि समरपीं जानि भवानी।।
अर्थ · Hindi
गहि गिरीस कुस कन्या पानी। भवहि समरपीं जानि भवानी।।
- RCM 1.101.3Open verse →
पानिग्रहन जब कीन्ह महेसा। हिंयँ हरषे तब सकल सुरेसा।।
अर्थ · Hindi
पानिग्रहन जब कीन्ह महेसा। हिंयँ हरषे तब सकल सुरेसा।।
- RCM 1.101.4Open verse →
बेद मंत्र मुनिबर उच्चरहीं। जय जय जय संकर सुर करहीं।।
अर्थ · Hindi
बेद मंत्र मुनिबर उच्चरहीं। जय जय जय संकर सुर करहीं।।
- RCM 1.101.5Open verse →
बाजहिं बाजन बिबिध बिधाना। सुमनबृष्टि नभ भै बिधि नाना।।
अर्थ · Hindi
बाजहिं बाजन बिबिध बिधाना। सुमनबृष्टि नभ भै बिधि नाना।।
- RCM 1.101.6Open verse →
हर गिरिजा कर भयउ बिबाहू। सकल भुवन भरि रहा उछाहू।।
अर्थ · Hindi
हर गिरिजा कर भयउ बिबाहू। सकल भुवन भरि रहा उछाहू।।
- RCM 1.101.7Open verse →
दासीं दास तुरग रथ नागा। धेनु बसन मनि बस्तु बिभागा।।
अर्थ · Hindi
दासीं दास तुरग रथ नागा। धेनु बसन मनि बस्तु बिभागा।।
- RCM 1.101.8Open verse →
अन्न कनकभाजन भरि जाना। दाइज दीन्ह न जाइ बखाना।।
अर्थ · Hindi
अन्न कनकभाजन भरि जाना। दाइज दीन्ह न जाइ बखाना।।
- RCM 1.102.1Open verse →
बहु बिधि संभु सास समुझाई। गवनी भवन चरन सिरु नाई।।
अर्थ · Hindi
बहु बिधि संभु सास समुझाई। गवनी भवन चरन सिरु नाई।।
- RCM 1.102.2Open verse →
जननीं उमा बोलि तब लीन्ही। लै उछंग सुंदर सिख दीन्ही।।
अर्थ · Hindi
जननीं उमा बोलि तब लीन्ही। लै उछंग सुंदर सिख दीन्ही।।
- RCM 1.102.3Open verse →
करेहु सदा संकर पद पूजा। नारिधरमु पति देउ न दूजा।।
अर्थ · Hindi
करेहु सदा संकर पद पूजा। नारिधरमु पति देउ न दूजा।।
- RCM 1.102.4Open verse →
बचन कहत भरे लोचन बारी। बहुरि लाइ उर लीन्हि कुमारी।।
अर्थ · Hindi
बचन कहत भरे लोचन बारी। बहुरि लाइ उर लीन्हि कुमारी।।
- RCM 1.102.5Open verse →
कत बिधि सृजीं नारि जग माहीं। पराधीन सपनेहुँ सुखु नाहीं।।
अर्थ · Hindi
कत बिधि सृजीं नारि जग माहीं। पराधीन सपनेहुँ सुखु नाहीं।।
- RCM 1.102.6Open verse →
भै अति प्रेम बिकल महतारी। धीरजु कीन्ह कुसमय बिचारी।।
अर्थ · Hindi
भै अति प्रेम बिकल महतारी। धीरजु कीन्ह कुसमय बिचारी।।
- RCM 1.102.7Open verse →
पुनि पुनि मिलति परति गहि चरना। परम प्रेम कछु जाइ न बरना।।
अर्थ · Hindi
पुनि पुनि मिलति परति गहि चरना। परम प्रेम कछु जाइ न बरना।।
- RCM 1.102.8Open verse →
सब नारिन्ह मिलि भेटि भवानी। जाइ जननि उर पुनि लपटानी।।
अर्थ · Hindi
सब नारिन्ह मिलि भेटि भवानी। जाइ जननि उर पुनि लपटानी।।
- RCM 1.103.1Open verse →
तुरत भवन आए गिरिराई। सकल सैल सर लिए बोलाई।।
अर्थ · Hindi
तुरत भवन आए गिरिराई। सकल सैल सर लिए बोलाई।।
- RCM 1.103.2Open verse →
आदर दान बिनय बहुमाना। सब कर बिदा कीन्ह हिमवाना।।
अर्थ · Hindi
आदर दान बिनय बहुमाना। सब कर बिदा कीन्ह हिमवाना।।
- RCM 1.103.3Open verse →
जबहिं संभु कैलासहिं आए। सुर सब निज निज लोक सिधाए।।
अर्थ · Hindi
जबहिं संभु कैलासहिं आए। सुर सब निज निज लोक सिधाए।।
- RCM 1.103.4Open verse →
जगत मातु पितु संभु भवानी। तेही सिंगारु न कहउँ बखानी।।
अर्थ · Hindi
जगत मातु पितु संभु भवानी। तेही सिंगारु न कहउँ बखानी।।
- RCM 1.103.5Open verse →
करहिं बिबिध बिधि भोग बिलासा। गनन्ह समेत बसहिं कैलासा।।
अर्थ · Hindi
करहिं बिबिध बिधि भोग बिलासा। गनन्ह समेत बसहिं कैलासा।।
- RCM 1.103.6Open verse →
हर गिरिजा बिहार नित नयऊ। एहि बिधि बिपुल काल चलि गयऊ।।
अर्थ · Hindi
हर गिरिजा बिहार नित नयऊ। एहि बिधि बिपुल काल चलि गयऊ।।
- RCM 1.103.7Open verse →
तब जनमेउ षटबदन कुमारा। तारकु असुर समर जेहिं मारा।।
अर्थ · Hindi
तब जनमेउ षटबदन कुमारा। तारकु असुर समर जेहिं मारा।।
- RCM 1.103.8Open verse →
आगम निगम प्रसिद्ध पुराना। षन्मुख जन्मु सकल जग जाना।।
अर्थ · Hindi
आगम निगम प्रसिद्ध पुराना। षन्मुख जन्मु सकल जग जाना।।
- RCM 1.104.1Open verse →
संभु चरित सुनि सरस सुहावा। भरद्वाज मुनि अति सुख पावा।।
अर्थ · Hindi
संभु चरित सुनि सरस सुहावा। भरद्वाज मुनि अति सुख पावा।।
- RCM 1.104.2Open verse →
बहु लालसा कथा पर बाढ़ी। नयनन्हि नीरु रोमावलि ठाढ़ी।।
अर्थ · Hindi
बहु लालसा कथा पर बाढ़ी। नयनन्हि नीरु रोमावलि ठाढ़ी।।
- RCM 1.104.3Open verse →
प्रेम बिबस मुख आव न बानी। दसा देखि हरषे मुनि ग्यानी।।
अर्थ · Hindi
प्रेम बिबस मुख आव न बानी। दसा देखि हरषे मुनि ग्यानी।।
- RCM 1.104.4Open verse →
अहो धन्य तव जन्मु मुनीसा। तुम्हहि प्रान सम प्रिय गौरीसा।।
अर्थ · Hindi
अहो धन्य तव जन्मु मुनीसा। तुम्हहि प्रान सम प्रिय गौरीसा।।
- RCM 1.104.5Open verse →
सिव पद कमल जिन्हहि रति नाहीं। रामहि ते सपनेहुँ न सोहाहीं।।
अर्थ · Hindi
सिव पद कमल जिन्हहि रति नाहीं। रामहि ते सपनेहुँ न सोहाहीं।।
- RCM 1.104.6Open verse →
बिनु छल बिस्वनाथ पद नेहू। राम भगत कर लच्छन एहू।।
अर्थ · Hindi
बिनु छल बिस्वनाथ पद नेहू। राम भगत कर लच्छन एहू।।
- RCM 1.104.7Open verse →
सिव सम को रघुपति ब्रतधारी। बिनु अघ तजी सती असि नारी।।
अर्थ · Hindi
सिव सम को रघुपति ब्रतधारी। बिनु अघ तजी सती असि नारी।।
- RCM 1.104.8Open verse →
पनु करि रघुपति भगति देखाई। को सिव सम रामहि प्रिय भाई।।
अर्थ · Hindi
पनु करि रघुपति भगति देखाई। को सिव सम रामहि प्रिय भाई।।
- RCM 1.104.9Open verse →
प्रथमहिं मै कहि सिव चरित बूझा मरमु तुम्हार।
अर्थ · Hindi
प्रथमहिं मै कहि सिव चरित बूझा मरमु तुम्हार।
- RCM 1.104.10Open verse →
सुचि सेवक तुम्ह राम के रहित समस्त बिकार।।104।।
अर्थ · Hindi
सुचि सेवक तुम्ह राम के रहित समस्त बिकार।।104।।
- RCM 1.105.1Open verse →
मैं जाना तुम्हार गुन सीला। कहउँ सुनहु अब रघुपति लीला।।
अर्थ · Hindi
मैं जाना तुम्हार गुन सीला। कहउँ सुनहु अब रघुपति लीला।।
- RCM 1.105.2Open verse →
सुनु मुनि आजु समागम तोरें। कहि न जाइ जस सुखु मन मोरें।।
अर्थ · Hindi
सुनु मुनि आजु समागम तोरें। कहि न जाइ जस सुखु मन मोरें।।
- RCM 1.105.3Open verse →
राम चरित अति अमित मुनिसा। कहि न सकहिं सत कोटि अहीसा।।
अर्थ · Hindi
राम चरित अति अमित मुनिसा। कहि न सकहिं सत कोटि अहीसा।।
- RCM 1.105.4Open verse →
तदपि जथाश्रुत कहउँ बखानी। सुमिरि गिरापति प्रभु धनुपानी।।
अर्थ · Hindi
तदपि जथाश्रुत कहउँ बखानी। सुमिरि गिरापति प्रभु धनुपानी।।
- RCM 1.105.5Open verse →
सारद दारुनारि सम स्वामी। रामु सूत्रधर अंतरजामी।।
अर्थ · Hindi
सारद दारुनारि सम स्वामी। रामु सूत्रधर अंतरजामी।।
- RCM 1.105.6Open verse →
जेहि पर कृपा करहिं जनु जानी। कबि उर अजिर नचावहिं बानी।।
अर्थ · Hindi
जेहि पर कृपा करहिं जनु जानी। कबि उर अजिर नचावहिं बानी।।
- RCM 1.105.7Open verse →
प्रनवउँ सोइ कृपाल रघुनाथा। बरनउँ बिसद तासु गुन गाथा।।
अर्थ · Hindi
प्रनवउँ सोइ कृपाल रघुनाथा। बरनउँ बिसद तासु गुन गाथा।।
- RCM 1.105.8Open verse →
परम रम्य गिरिबरु कैलासू। सदा जहाँ सिव उमा निवासू।।
अर्थ · Hindi
परम रम्य गिरिबरु कैलासू। सदा जहाँ सिव उमा निवासू।।
- RCM 1.105.9Open verse →
सिद्ध तपोधन जोगिजन सूर किंनर मुनिबृंद।
अर्थ · Hindi
सिद्ध तपोधन जोगिजन सूर किंनर मुनिबृंद।
- RCM 1.105.10Open verse →
बसहिं तहाँ सुकृती सकल सेवहिं सिब सुखकंद।।105।।
अर्थ · Hindi
बसहिं तहाँ सुकृती सकल सेवहिं सिब सुखकंद।।105।।
- RCM 1.106.1Open verse →
हरि हर बिमुख धर्म रति नाहीं। ते नर तहँ सपनेहुँ नहिं जाहीं।।
अर्थ · Hindi
हरि हर बिमुख धर्म रति नाहीं। ते नर तहँ सपनेहुँ नहिं जाहीं।।
- RCM 1.106.2Open verse →
तेहि गिरि पर बट बिटप बिसाला। नित नूतन सुंदर सब काला।।
अर्थ · Hindi
तेहि गिरि पर बट बिटप बिसाला। नित नूतन सुंदर सब काला।।
- RCM 1.106.3Open verse →
त्रिबिध समीर सुसीतलि छाया। सिव बिश्राम बिटप श्रुति गाया।।
अर्थ · Hindi
त्रिबिध समीर सुसीतलि छाया। सिव बिश्राम बिटप श्रुति गाया।।
- RCM 1.106.4Open verse →
एक बार तेहि तर प्रभु गयऊ। तरु बिलोकि उर अति सुखु भयऊ।।
अर्थ · Hindi
एक बार तेहि तर प्रभु गयऊ। तरु बिलोकि उर अति सुखु भयऊ।।
- RCM 1.106.5Open verse →
निज कर डासि नागरिपु छाला। बैठै सहजहिं संभु कृपाला।।
अर्थ · Hindi
निज कर डासि नागरिपु छाला। बैठै सहजहिं संभु कृपाला।।
- RCM 1.106.6Open verse →
कुंद इंदु दर गौर सरीरा। भुज प्रलंब परिधन मुनिचीरा।।
अर्थ · Hindi
कुंद इंदु दर गौर सरीरा। भुज प्रलंब परिधन मुनिचीरा।।
- RCM 1.106.7Open verse →
तरुन अरुन अंबुज सम चरना। नख दुति भगत हृदय तम हरना।।
अर्थ · Hindi
तरुन अरुन अंबुज सम चरना। नख दुति भगत हृदय तम हरना।।
- RCM 1.106.8Open verse →
भुजग भूति भूषन त्रिपुरारी। आननु सरद चंद छबि हारी।।
अर्थ · Hindi
भुजग भूति भूषन त्रिपुरारी। आननु सरद चंद छबि हारी।।
- RCM 1.106.9Open verse →
जटा मुकुट सुरसरित सिर लोचन नलिन बिसाल।
अर्थ · Hindi
जटा मुकुट सुरसरित सिर लोचन नलिन बिसाल।
- RCM 1.106.10Open verse →
नीलकंठ लावन्यनिधि सोह बालबिधु भाल।।106।।
अर्थ · Hindi
नीलकंठ लावन्यनिधि सोह बालबिधु भाल।।106।।
- RCM 1.107.1Open verse →
बैठे सोह कामरिपु कैसें। धरें सरीरु सांतरसु जैसें।।
अर्थ · Hindi
बैठे सोह कामरिपु कैसें। धरें सरीरु सांतरसु जैसें।।
- RCM 1.107.2Open verse →
पारबती भल अवसरु जानी। गई संभु पहिं मातु भवानी।।
अर्थ · Hindi
पारबती भल अवसरु जानी। गई संभु पहिं मातु भवानी।।
- RCM 1.107.3Open verse →
जानि प्रिया आदरु अति कीन्हा। बाम भाग आसनु हर दीन्हा।।
अर्थ · Hindi
जानि प्रिया आदरु अति कीन्हा। बाम भाग आसनु हर दीन्हा।।
- RCM 1.107.4Open verse →
बैठीं सिव समीप हरषाई। पूरुब जन्म कथा चित आई।।
अर्थ · Hindi
बैठीं सिव समीप हरषाई। पूरुब जन्म कथा चित आई।।
- RCM 1.107.5Open verse →
पति हियँ हेतु अधिक अनुमानी। बिहसि उमा बोलीं प्रिय बानी।।
अर्थ · Hindi
पति हियँ हेतु अधिक अनुमानी। बिहसि उमा बोलीं प्रिय बानी।।
- RCM 1.107.6Open verse →
कथा जो सकल लोक हितकारी। सोइ पूछन चह सैलकुमारी।।
अर्थ · Hindi
कथा जो सकल लोक हितकारी। सोइ पूछन चह सैलकुमारी।।
- RCM 1.107.7Open verse →
बिस्वनाथ मम नाथ पुरारी। त्रिभुवन महिमा बिदित तुम्हारी।।
अर्थ · Hindi
बिस्वनाथ मम नाथ पुरारी। त्रिभुवन महिमा बिदित तुम्हारी।।
- RCM 1.107.8Open verse →
चर अरु अचर नाग नर देवा। सकल करहिं पद पंकज सेवा।।
अर्थ · Hindi
चर अरु अचर नाग नर देवा। सकल करहिं पद पंकज सेवा।।
- RCM 1.107.9Open verse →
प्रभु समरथ सर्बग्य सिव सकल कला गुन धाम।।
अर्थ · Hindi
प्रभु समरथ सर्बग्य सिव सकल कला गुन धाम।।
- RCM 1.107.10Open verse →
जोग ग्यान बैराग्य निधि प्रनत कलपतरु नाम।।107।।
अर्थ · Hindi
जोग ग्यान बैराग्य निधि प्रनत कलपतरु नाम।।107।।
- RCM 1.108.1Open verse →
जौं मो पर प्रसन्न सुखरासी। जानिअ सत्य मोहि निज दासी।।
अर्थ · Hindi
जौं मो पर प्रसन्न सुखरासी। जानिअ सत्य मोहि निज दासी।।
- RCM 1.108.2Open verse →
तौं प्रभु हरहु मोर अग्याना। कहि रघुनाथ कथा बिधि नाना।।
अर्थ · Hindi
तौं प्रभु हरहु मोर अग्याना। कहि रघुनाथ कथा बिधि नाना।।
- RCM 1.108.3Open verse →
जासु भवनु सुरतरु तर होई। सहि कि दरिद्र जनित दुखु सोई।।
अर्थ · Hindi
जासु भवनु सुरतरु तर होई। सहि कि दरिद्र जनित दुखु सोई।।
- RCM 1.108.4Open verse →
ससिभूषन अस हृदयँ बिचारी। हरहु नाथ मम मति भ्रम भारी।।
अर्थ · Hindi
ससिभूषन अस हृदयँ बिचारी। हरहु नाथ मम मति भ्रम भारी।।
- RCM 1.108.5Open verse →
प्रभु जे मुनि परमारथबादी। कहहिं राम कहुँ ब्रह्म अनादी।।
अर्थ · Hindi
प्रभु जे मुनि परमारथबादी। कहहिं राम कहुँ ब्रह्म अनादी।।
- RCM 1.108.6Open verse →
सेस सारदा बेद पुराना। सकल करहिं रघुपति गुन गाना।।
अर्थ · Hindi
सेस सारदा बेद पुराना। सकल करहिं रघुपति गुन गाना।।
- RCM 1.108.7Open verse →
तुम्ह पुनि राम राम दिन राती। सादर जपहु अनँग आराती।।
अर्थ · Hindi
तुम्ह पुनि राम राम दिन राती। सादर जपहु अनँग आराती।।
- RCM 1.108.8Open verse →
रामु सो अवध नृपति सुत सोई। की अज अगुन अलखगति कोई।।
अर्थ · Hindi
रामु सो अवध नृपति सुत सोई। की अज अगुन अलखगति कोई।।
- RCM 1.108.9Open verse →
जौं नृप तनय त ब्रह्म किमि नारि बिरहँ मति भोरि।
अर्थ · Hindi
जौं नृप तनय त ब्रह्म किमि नारि बिरहँ मति भोरि।
- RCM 1.108.10Open verse →
देख चरित महिमा सुनत भ्रमति बुद्धि अति मोरि।।108।।
अर्थ · Hindi
देख चरित महिमा सुनत भ्रमति बुद्धि अति मोरि।।108।।
- RCM 1.109.1Open verse →
जौं अनीह ब्यापक बिभु कोऊ। कबहु बुझाइ नाथ मोहि सोऊ।।
अर्थ · Hindi
जौं अनीह ब्यापक बिभु कोऊ। कबहु बुझाइ नाथ मोहि सोऊ।।
- RCM 1.109.2Open verse →
अग्य जानि रिस उर जनि धरहू। जेहि बिधि मोह मिटै सोइ करहू।।
अर्थ · Hindi
अग्य जानि रिस उर जनि धरहू। जेहि बिधि मोह मिटै सोइ करहू।।
- RCM 1.109.3Open verse →
मै बन दीखि राम प्रभुताई। अति भय बिकल न तुम्हहि सुनाई।।
अर्थ · Hindi
मै बन दीखि राम प्रभुताई। अति भय बिकल न तुम्हहि सुनाई।।
- RCM 1.109.4Open verse →
तदपि मलिन मन बोधु न आवा। सो फलु भली भाँति हम पावा।।
अर्थ · Hindi
तदपि मलिन मन बोधु न आवा। सो फलु भली भाँति हम पावा।।
- RCM 1.109.5Open verse →
अजहूँ कछु संसउ मन मोरे। करहु कृपा बिनवउँ कर जोरें।।
अर्थ · Hindi
अजहूँ कछु संसउ मन मोरे। करहु कृपा बिनवउँ कर जोरें।।
- RCM 1.109.6Open verse →
प्रभु तब मोहि बहु भाँति प्रबोधा। नाथ सो समुझि करहु जनि क्रोधा।।
अर्थ · Hindi
प्रभु तब मोहि बहु भाँति प्रबोधा। नाथ सो समुझि करहु जनि क्रोधा।।
- RCM 1.109.7Open verse →
तब कर अस बिमोह अब नाहीं। रामकथा पर रुचि मन माहीं।।
अर्थ · Hindi
तब कर अस बिमोह अब नाहीं। रामकथा पर रुचि मन माहीं।।
- RCM 1.109.8Open verse →
कहहु पुनीत राम गुन गाथा। भुजगराज भूषन सुरनाथा।।
अर्थ · Hindi
कहहु पुनीत राम गुन गाथा। भुजगराज भूषन सुरनाथा।।
- RCM 1.109.9Open verse →
बंदउ पद धरि धरनि सिरु बिनय करउँ कर जोरि।
अर्थ · Hindi
बंदउ पद धरि धरनि सिरु बिनय करउँ कर जोरि।
- RCM 1.109.10Open verse →
बरनहु रघुबर बिसद जसु श्रुति सिद्धांत निचोरि।।109।।
अर्थ · Hindi
बरनहु रघुबर बिसद जसु श्रुति सिद्धांत निचोरि।।109।।
- RCM 1.110.1Open verse →
जदपि जोषिता नहिं अधिकारी। दासी मन क्रम बचन तुम्हारी।।
अर्थ · Hindi
जदपि जोषिता नहिं अधिकारी। दासी मन क्रम बचन तुम्हारी।।
- RCM 1.110.2Open verse →
गूढ़उ तत्व न साधु दुरावहिं। आरत अधिकारी जहँ पावहिं।।
अर्थ · Hindi
गूढ़उ तत्व न साधु दुरावहिं। आरत अधिकारी जहँ पावहिं।।
- RCM 1.110.3Open verse →
अति आरति पूछउँ सुरराया। रघुपति कथा कहहु करि दाया।।
अर्थ · Hindi
अति आरति पूछउँ सुरराया। रघुपति कथा कहहु करि दाया।।
- RCM 1.110.4Open verse →
प्रथम सो कारन कहहु बिचारी। निर्गुन ब्रह्म सगुन बपु धारी।।
अर्थ · Hindi
प्रथम सो कारन कहहु बिचारी। निर्गुन ब्रह्म सगुन बपु धारी।।
- RCM 1.110.5Open verse →
पुनि प्रभु कहहु राम अवतारा। बालचरित पुनि कहहु उदारा।।
अर्थ · Hindi
पुनि प्रभु कहहु राम अवतारा। बालचरित पुनि कहहु उदारा।।
- RCM 1.110.6Open verse →
कहहु जथा जानकी बिबाहीं। राज तजा सो दूषन काहीं।।
अर्थ · Hindi
कहहु जथा जानकी बिबाहीं। राज तजा सो दूषन काहीं।।
- RCM 1.110.7Open verse →
बन बसि कीन्हे चरित अपारा। कहहु नाथ जिमि रावन मारा।।
अर्थ · Hindi
बन बसि कीन्हे चरित अपारा। कहहु नाथ जिमि रावन मारा।।
- RCM 1.110.8Open verse →
राज बैठि कीन्हीं बहु लीला। सकल कहहु संकर सुखलीला।।
अर्थ · Hindi
राज बैठि कीन्हीं बहु लीला। सकल कहहु संकर सुखलीला।।
- RCM 1.110.9Open verse →
बहुरि कहहु करुनायतन कीन्ह जो अचरज राम।
अर्थ · Hindi
बहुरि कहहु करुनायतन कीन्ह जो अचरज राम।
- RCM 1.110.10Open verse →
प्रजा सहित रघुबंसमनि किमि गवने निज धाम।।110।।
अर्थ · Hindi
प्रजा सहित रघुबंसमनि किमि गवने निज धाम।।110।।
- RCM 1.111.1Open verse →
पुनि प्रभु कहहु सो तत्व बखानी। जेहिं बिग्यान मगन मुनि ग्यानी।।
अर्थ · Hindi
पुनि प्रभु कहहु सो तत्व बखानी। जेहिं बिग्यान मगन मुनि ग्यानी।।
- RCM 1.111.2Open verse →
भगति ग्यान बिग्यान बिरागा। पुनि सब बरनहु सहित बिभागा।।
अर्थ · Hindi
भगति ग्यान बिग्यान बिरागा। पुनि सब बरनहु सहित बिभागा।।
- RCM 1.111.3Open verse →
औरउ राम रहस्य अनेका। कहहु नाथ अति बिमल बिबेका।।
अर्थ · Hindi
औरउ राम रहस्य अनेका। कहहु नाथ अति बिमल बिबेका।।
- RCM 1.111.4Open verse →
जो प्रभु मैं पूछा नहि होई। सोउ दयाल राखहु जनि गोई।।
अर्थ · Hindi
जो प्रभु मैं पूछा नहि होई। सोउ दयाल राखहु जनि गोई।।
- RCM 1.111.5Open verse →
तुम्ह त्रिभुवन गुर बेद बखाना। आन जीव पाँवर का जाना।।
अर्थ · Hindi
तुम्ह त्रिभुवन गुर बेद बखाना। आन जीव पाँवर का जाना।।
- RCM 1.111.6Open verse →
प्रस्न उमा कै सहज सुहाई। छल बिहीन सुनि सिव मन भाई।।
अर्थ · Hindi
प्रस्न उमा कै सहज सुहाई। छल बिहीन सुनि सिव मन भाई।।
- RCM 1.111.7Open verse →
हर हियँ रामचरित सब आए। प्रेम पुलक लोचन जल छाए।।
अर्थ · Hindi
हर हियँ रामचरित सब आए। प्रेम पुलक लोचन जल छाए।।
- RCM 1.111.8Open verse →
श्रीरघुनाथ रूप उर आवा। परमानंद अमित सुख पावा।।
अर्थ · Hindi
श्रीरघुनाथ रूप उर आवा। परमानंद अमित सुख पावा।।
- RCM 1.111.9Open verse →
मगन ध्यानरस दंड जुग पुनि मन बाहेर कीन्ह।
अर्थ · Hindi
मगन ध्यानरस दंड जुग पुनि मन बाहेर कीन्ह।
- RCM 1.111.10Open verse →
रघुपति चरित महेस तब हरषित बरनै लीन्ह।।111।।
अर्थ · Hindi
रघुपति चरित महेस तब हरषित बरनै लीन्ह।।111।।
- RCM 1.112.1Open verse →
झूठेउ सत्य जाहि बिनु जानें। जिमि भुजंग बिनु रजु पहिचानें।।
अर्थ · Hindi
झूठेउ सत्य जाहि बिनु जानें। जिमि भुजंग बिनु रजु पहिचानें।।
- RCM 1.112.2Open verse →
जेहि जानें जग जाइ हेराई। जागें जथा सपन भ्रम जाई।।
अर्थ · Hindi
जेहि जानें जग जाइ हेराई। जागें जथा सपन भ्रम जाई।।
- RCM 1.112.3Open verse →
बंदउँ बालरूप सोई रामू। सब सिधि सुलभ जपत जिसु नामू।।
अर्थ · Hindi
बंदउँ बालरूप सोई रामू। सब सिधि सुलभ जपत जिसु नामू।।
- RCM 1.112.4Open verse →
मंगल भवन अमंगल हारी। द्रवउ सो दसरथ अजिर बिहारी।।
अर्थ · Hindi
मंगल भवन अमंगल हारी। द्रवउ सो दसरथ अजिर बिहारी।।
- RCM 1.112.5Open verse →
करि प्रनाम रामहि त्रिपुरारी। हरषि सुधा सम गिरा उचारी।।
अर्थ · Hindi
करि प्रनाम रामहि त्रिपुरारी। हरषि सुधा सम गिरा उचारी।।
- RCM 1.112.6Open verse →
धन्य धन्य गिरिराजकुमारी। तुम्ह समान नहिं कोउ उपकारी।।
अर्थ · Hindi
धन्य धन्य गिरिराजकुमारी। तुम्ह समान नहिं कोउ उपकारी।।
- RCM 1.112.7Open verse →
पूँछेहु रघुपति कथा प्रसंगा। सकल लोक जग पावनि गंगा।।
अर्थ · Hindi
पूँछेहु रघुपति कथा प्रसंगा। सकल लोक जग पावनि गंगा।।
- RCM 1.112.8Open verse →
तुम्ह रघुबीर चरन अनुरागी। कीन्हहु प्रस्न जगत हित लागी।।
अर्थ · Hindi
तुम्ह रघुबीर चरन अनुरागी। कीन्हहु प्रस्न जगत हित लागी।।
- RCM 1.112.9Open verse →
रामकृपा तें पारबति सपनेहुँ तव मन माहिं।
अर्थ · Hindi
रामकृपा तें पारबति सपनेहुँ तव मन माहिं।
- RCM 1.112.10Open verse →
सोक मोह संदेह भ्रम मम बिचार कछु नाहिं।।112।।
अर्थ · Hindi
सोक मोह संदेह भ्रम मम बिचार कछु नाहिं।।112।।
- RCM 1.113.1Open verse →
तदपि असंका कीन्हिहु सोई। कहत सुनत सब कर हित होई।।
अर्थ · Hindi
तदपि असंका कीन्हिहु सोई। कहत सुनत सब कर हित होई।।
- RCM 1.113.2Open verse →
जिन्ह हरि कथा सुनी नहिं काना। श्रवन रंध्र अहिभवन समाना।।
अर्थ · Hindi
जिन्ह हरि कथा सुनी नहिं काना। श्रवन रंध्र अहिभवन समाना।।
- RCM 1.113.3Open verse →
नयनन्हि संत दरस नहिं देखा। लोचन मोरपंख कर लेखा।।
अर्थ · Hindi
नयनन्हि संत दरस नहिं देखा। लोचन मोरपंख कर लेखा।।
- RCM 1.113.4Open verse →
ते सिर कटु तुंबरि समतूला। जे न नमत हरि गुर पद मूला।।
अर्थ · Hindi
ते सिर कटु तुंबरि समतूला। जे न नमत हरि गुर पद मूला।।
- RCM 1.113.5Open verse →
जिन्ह हरिभगति हृदयँ नहिं आनी। जीवत सव समान तेइ प्रानी।।
अर्थ · Hindi
जिन्ह हरिभगति हृदयँ नहिं आनी। जीवत सव समान तेइ प्रानी।।
- RCM 1.113.6Open verse →
जो नहिं करइ राम गुन गाना। जीह सो दादुर जीह समाना।।
अर्थ · Hindi
जो नहिं करइ राम गुन गाना। जीह सो दादुर जीह समाना।।
- RCM 1.113.7Open verse →
कुलिस कठोर निठुर सोइ छाती। सुनि हरिचरित न जो हरषाती।।
अर्थ · Hindi
कुलिस कठोर निठुर सोइ छाती। सुनि हरिचरित न जो हरषाती।।
- RCM 1.113.8Open verse →
गिरिजा सुनहु राम कै लीला। सुर हित दनुज बिमोहनसीला।।
अर्थ · Hindi
गिरिजा सुनहु राम कै लीला। सुर हित दनुज बिमोहनसीला।।
- RCM 1.113.9Open verse →
रामकथा सुरधेनु सम सेवत सब सुख दानि।
अर्थ · Hindi
रामकथा सुरधेनु सम सेवत सब सुख दानि।
- RCM 1.113.10Open verse →
सतसमाज सुरलोक सब को न सुनै अस जानि।।113।।
अर्थ · Hindi
सतसमाज सुरलोक सब को न सुनै अस जानि।।113।।
- RCM 1.114.1Open verse →
रामकथा सुंदर कर तारी। संसय बिहग उडावनिहारी।।
अर्थ · Hindi
रामकथा सुंदर कर तारी। संसय बिहग उडावनिहारी।।
- RCM 1.114.2Open verse →
रामकथा कलि बिटप कुठारी। सादर सुनु गिरिराजकुमारी।।
अर्थ · Hindi
रामकथा कलि बिटप कुठारी। सादर सुनु गिरिराजकुमारी।।
- RCM 1.114.3Open verse →
राम नाम गुन चरित सुहाए। जनम करम अगनित श्रुति गाए।।
अर्थ · Hindi
राम नाम गुन चरित सुहाए। जनम करम अगनित श्रुति गाए।।
- RCM 1.114.4Open verse →
जथा अनंत राम भगवाना। तथा कथा कीरति गुन नाना।।
अर्थ · Hindi
जथा अनंत राम भगवाना। तथा कथा कीरति गुन नाना।।
- RCM 1.114.5Open verse →
तदपि जथा श्रुत जसि मति मोरी। कहिहउँ देखि प्रीति अति तोरी।।
अर्थ · Hindi
तदपि जथा श्रुत जसि मति मोरी। कहिहउँ देखि प्रीति अति तोरी।।
- RCM 1.114.6Open verse →
उमा प्रस्न तव सहज सुहाई। सुखद संतसंमत मोहि भाई।।
अर्थ · Hindi
उमा प्रस्न तव सहज सुहाई। सुखद संतसंमत मोहि भाई।।
- RCM 1.114.7Open verse →
एक बात नहि मोहि सोहानी। जदपि मोह बस कहेहु भवानी।।
अर्थ · Hindi
एक बात नहि मोहि सोहानी। जदपि मोह बस कहेहु भवानी।।
- RCM 1.114.8Open verse →
तुम जो कहा राम कोउ आना। जेहि श्रुति गाव धरहिं मुनि ध्याना।।
अर्थ · Hindi
तुम जो कहा राम कोउ आना। जेहि श्रुति गाव धरहिं मुनि ध्याना।।
- RCM 1.114.9Open verse →
कहहि सुनहि अस अधम नर ग्रसे जे मोह पिसाच।
अर्थ · Hindi
कहहि सुनहि अस अधम नर ग्रसे जे मोह पिसाच।
- RCM 1.114.10Open verse →
पाषंडी हरि पद बिमुख जानहिं झूठ न साच।।114।।
अर्थ · Hindi
पाषंडी हरि पद बिमुख जानहिं झूठ न साच।।114।।
- RCM 1.115.1Open verse →
अग्य अकोबिद अंध अभागी। काई बिषय मुकर मन लागी।।
अर्थ · Hindi
अग्य अकोबिद अंध अभागी। काई बिषय मुकर मन लागी।।
- RCM 1.115.2Open verse →
लंपट कपटी कुटिल बिसेषी। सपनेहुँ संतसभा नहिं देखी।।
अर्थ · Hindi
लंपट कपटी कुटिल बिसेषी। सपनेहुँ संतसभा नहिं देखी।।
- RCM 1.115.3Open verse →
कहहिं ते बेद असंमत बानी। जिन्ह कें सूझ लाभु नहिं हानी।।
अर्थ · Hindi
कहहिं ते बेद असंमत बानी। जिन्ह कें सूझ लाभु नहिं हानी।।
- RCM 1.115.4Open verse →
मुकर मलिन अरु नयन बिहीना। राम रूप देखहिं किमि दीना।।
अर्थ · Hindi
मुकर मलिन अरु नयन बिहीना। राम रूप देखहिं किमि दीना।।
- RCM 1.115.5Open verse →
जिन्ह कें अगुन न सगुन बिबेका। जल्पहिं कल्पित बचन अनेका।।
अर्थ · Hindi
जिन्ह कें अगुन न सगुन बिबेका। जल्पहिं कल्पित बचन अनेका।।
- RCM 1.115.6Open verse →
हरिमाया बस जगत भ्रमाहीं। तिन्हहि कहत कछु अघटित नाहीं।।
अर्थ · Hindi
हरिमाया बस जगत भ्रमाहीं। तिन्हहि कहत कछु अघटित नाहीं।।
- RCM 1.115.7Open verse →
बातुल भूत बिबस मतवारे। ते नहिं बोलहिं बचन बिचारे।।
अर्थ · Hindi
बातुल भूत बिबस मतवारे। ते नहिं बोलहिं बचन बिचारे।।
- RCM 1.115.8Open verse →
जिन्ह कृत महामोह मद पाना। तिन् कर कहा करिअ नहिं काना।।
अर्थ · Hindi
जिन्ह कृत महामोह मद पाना। तिन् कर कहा करिअ नहिं काना।।
- RCM 1.115.9Open verse →
अस निज हृदयँ बिचारि तजु संसय भजु राम पद।
अर्थ · Hindi
अस निज हृदयँ बिचारि तजु संसय भजु राम पद।
- RCM 1.115.10Open verse →
सुनु गिरिराज कुमारि भ्रम तम रबि कर बचन मम।।115।।
अर्थ · Hindi
सुनु गिरिराज कुमारि भ्रम तम रबि कर बचन मम।।115।।
- RCM 1.116.1Open verse →
सगुनहि अगुनहि नहिं कछु भेदा। गावहिं मुनि पुरान बुध बेदा।।
अर्थ · Hindi
सगुनहि अगुनहि नहिं कछु भेदा। गावहिं मुनि पुरान बुध बेदा।।
- RCM 1.116.2Open verse →
अगुन अरुप अलख अज जोई। भगत प्रेम बस सगुन सो होई।।
अर्थ · Hindi
अगुन अरुप अलख अज जोई। भगत प्रेम बस सगुन सो होई।।
- RCM 1.116.3Open verse →
जो गुन रहित सगुन सोइ कैसें। जलु हिम उपल बिलग नहिं जैसें।।
अर्थ · Hindi
जो गुन रहित सगुन सोइ कैसें। जलु हिम उपल बिलग नहिं जैसें।।
- RCM 1.116.4Open verse →
जासु नाम भ्रम तिमिर पतंगा। तेहि किमि कहिअ बिमोह प्रसंगा।।
अर्थ · Hindi
जासु नाम भ्रम तिमिर पतंगा। तेहि किमि कहिअ बिमोह प्रसंगा।।
- RCM 1.116.5Open verse →
राम सच्चिदानंद दिनेसा। नहिं तहँ मोह निसा लवलेसा।।
अर्थ · Hindi
राम सच्चिदानंद दिनेसा। नहिं तहँ मोह निसा लवलेसा।।
- RCM 1.116.6Open verse →
सहज प्रकासरुप भगवाना। नहिं तहँ पुनि बिग्यान बिहाना।।
अर्थ · Hindi
सहज प्रकासरुप भगवाना। नहिं तहँ पुनि बिग्यान बिहाना।।
- RCM 1.116.7Open verse →
हरष बिषाद ग्यान अग्याना। जीव धर्म अहमिति अभिमाना।।
अर्थ · Hindi
हरष बिषाद ग्यान अग्याना। जीव धर्म अहमिति अभिमाना।।
- RCM 1.116.8Open verse →
राम ब्रह्म ब्यापक जग जाना। परमानन्द परेस पुराना।।
अर्थ · Hindi
राम ब्रह्म ब्यापक जग जाना। परमानन्द परेस पुराना।।
- RCM 1.116.9Open verse →
पुरुष प्रसिद्ध प्रकास निधि प्रगट परावर नाथ।।
अर्थ · Hindi
पुरुष प्रसिद्ध प्रकास निधि प्रगट परावर नाथ।।
- RCM 1.116.10Open verse →
रघुकुलमनि मम स्वामि सोइ कहि सिवँ नायउ माथ।।116।।
अर्थ · Hindi
रघुकुलमनि मम स्वामि सोइ कहि सिवँ नायउ माथ।।116।।
- RCM 1.117.1Open verse →
निज भ्रम नहिं समुझहिं अग्यानी। प्रभु पर मोह धरहिं जड़ प्रानी।।
अर्थ · Hindi
निज भ्रम नहिं समुझहिं अग्यानी। प्रभु पर मोह धरहिं जड़ प्रानी।।
- RCM 1.117.2Open verse →
जथा गगन घन पटल निहारी। झाँपेउ मानु कहहिं कुबिचारी।।
अर्थ · Hindi
जथा गगन घन पटल निहारी। झाँपेउ मानु कहहिं कुबिचारी।।
- RCM 1.117.3Open verse →
चितव जो लोचन अंगुलि लाएँ। प्रगट जुगल ससि तेहि के भाएँ।।
अर्थ · Hindi
चितव जो लोचन अंगुलि लाएँ। प्रगट जुगल ससि तेहि के भाएँ।।
- RCM 1.117.4Open verse →
उमा राम बिषइक अस मोहा। नभ तम धूम धूरि जिमि सोहा।।
अर्थ · Hindi
उमा राम बिषइक अस मोहा। नभ तम धूम धूरि जिमि सोहा।।
- RCM 1.117.5Open verse →
बिषय करन सुर जीव समेता। सकल एक तें एक सचेता।।
अर्थ · Hindi
बिषय करन सुर जीव समेता। सकल एक तें एक सचेता।।
- RCM 1.117.6Open verse →
सब कर परम प्रकासक जोई। राम अनादि अवधपति सोई।।
अर्थ · Hindi
सब कर परम प्रकासक जोई। राम अनादि अवधपति सोई।।
- RCM 1.117.7Open verse →
जगत प्रकास्य प्रकासक रामू। मायाधीस ग्यान गुन धामू।।
अर्थ · Hindi
जगत प्रकास्य प्रकासक रामू। मायाधीस ग्यान गुन धामू।।
- RCM 1.117.8Open verse →
जासु सत्यता तें जड माया। भास सत्य इव मोह सहाया।।
अर्थ · Hindi
जासु सत्यता तें जड माया। भास सत्य इव मोह सहाया।।
- RCM 1.117.9Open verse →
रजत सीप महुँ मास जिमि जथा भानु कर बारि।
अर्थ · Hindi
रजत सीप महुँ मास जिमि जथा भानु कर बारि।
- RCM 1.117.10Open verse →
जदपि मृषा तिहुँ काल सोइ भ्रम न सकइ कोउ टारि।।117।।
अर्थ · Hindi
जदपि मृषा तिहुँ काल सोइ भ्रम न सकइ कोउ टारि।।117।।
- RCM 1.118.1Open verse →
एहि बिधि जग हरि आश्रित रहई। जदपि असत्य देत दुख अहई।।
अर्थ · Hindi
एहि बिधि जग हरि आश्रित रहई। जदपि असत्य देत दुख अहई।।
- RCM 1.118.2Open verse →
जौं सपनें सिर काटै कोई। बिनु जागें न दूरि दुख होई।।
अर्थ · Hindi
जौं सपनें सिर काटै कोई। बिनु जागें न दूरि दुख होई।।
- RCM 1.118.3Open verse →
जासु कृपाँ अस भ्रम मिटि जाई। गिरिजा सोइ कृपाल रघुराई।।
अर्थ · Hindi
जासु कृपाँ अस भ्रम मिटि जाई। गिरिजा सोइ कृपाल रघुराई।।
- RCM 1.118.4Open verse →
आदि अंत कोउ जासु न पावा। मति अनुमानि निगम अस गावा।।
अर्थ · Hindi
आदि अंत कोउ जासु न पावा। मति अनुमानि निगम अस गावा।।
- RCM 1.118.5Open verse →
बिनु पद चलइ सुनइ बिनु काना। कर बिनु करम करइ बिधि नाना।।
अर्थ · Hindi
बिनु पद चलइ सुनइ बिनु काना। कर बिनु करम करइ बिधि नाना।।
- RCM 1.118.6Open verse →
आनन रहित सकल रस भोगी। बिनु बानी बकता बड़ जोगी।।
अर्थ · Hindi
आनन रहित सकल रस भोगी। बिनु बानी बकता बड़ जोगी।।
- RCM 1.118.7Open verse →
तनु बिनु परस नयन बिनु देखा। ग्रहइ घ्रान बिनु बास असेषा।।
अर्थ · Hindi
तनु बिनु परस नयन बिनु देखा। ग्रहइ घ्रान बिनु बास असेषा।।
- RCM 1.118.8Open verse →
असि सब भाँति अलौकिक करनी। महिमा जासु जाइ नहिं बरनी।।
अर्थ · Hindi
असि सब भाँति अलौकिक करनी। महिमा जासु जाइ नहिं बरनी।।
- RCM 1.118.9Open verse →
जेहि इमि गावहि बेद बुध जाहि धरहिं मुनि ध्यान।।
अर्थ · Hindi
जेहि इमि गावहि बेद बुध जाहि धरहिं मुनि ध्यान।।
- RCM 1.118.10Open verse →
सोइ दसरथ सुत भगत हित कोसलपति भगवान।।118।।
अर्थ · Hindi
सोइ दसरथ सुत भगत हित कोसलपति भगवान।।118।।
- RCM 1.119.1Open verse →
कासीं मरत जंतु अवलोकी। जासु नाम बल करउँ बिसोकी।।
अर्थ · Hindi
कासीं मरत जंतु अवलोकी। जासु नाम बल करउँ बिसोकी।।
- RCM 1.119.2Open verse →
सोइ प्रभु मोर चराचर स्वामी। रघुबर सब उर अंतरजामी।।
अर्थ · Hindi
सोइ प्रभु मोर चराचर स्वामी। रघुबर सब उर अंतरजामी।।
- RCM 1.119.3Open verse →
बिबसहुँ जासु नाम नर कहहीं। जनम अनेक रचित अघ दहहीं।।
अर्थ · Hindi
बिबसहुँ जासु नाम नर कहहीं। जनम अनेक रचित अघ दहहीं।।
- RCM 1.119.4Open verse →
सादर सुमिरन जे नर करहीं। भव बारिधि गोपद इव तरहीं।।
अर्थ · Hindi
सादर सुमिरन जे नर करहीं। भव बारिधि गोपद इव तरहीं।।
- RCM 1.119.5Open verse →
राम सो परमातमा भवानी। तहँ भ्रम अति अबिहित तव बानी।।
अर्थ · Hindi
राम सो परमातमा भवानी। तहँ भ्रम अति अबिहित तव बानी।।
- RCM 1.119.6Open verse →
अस संसय आनत उर माहीं। ग्यान बिराग सकल गुन जाहीं।।
अर्थ · Hindi
अस संसय आनत उर माहीं। ग्यान बिराग सकल गुन जाहीं।।
- RCM 1.119.7Open verse →
सुनि सिव के भ्रम भंजन बचना। मिटि गै सब कुतरक कै रचना।।
अर्थ · Hindi
सुनि सिव के भ्रम भंजन बचना। मिटि गै सब कुतरक कै रचना।।
- RCM 1.119.8Open verse →
भइ रघुपति पद प्रीति प्रतीती। दारुन असंभावना बीती।।
अर्थ · Hindi
भइ रघुपति पद प्रीति प्रतीती। दारुन असंभावना बीती।।
- RCM 1.119.9Open verse →
पुनि पुनि प्रभु पद कमल गहि जोरि पंकरुह पानि।
अर्थ · Hindi
पुनि पुनि प्रभु पद कमल गहि जोरि पंकरुह पानि।
- RCM 1.119.10Open verse →
बोली गिरिजा बचन बर मनहुँ प्रेम रस सानि।।119।।
अर्थ · Hindi
बोली गिरिजा बचन बर मनहुँ प्रेम रस सानि।।119।।
- RCM 1.120.1Open verse →
ससि कर सम सुनि गिरा तुम्हारी। मिटा मोह सरदातप भारी।।
अर्थ · Hindi
ससि कर सम सुनि गिरा तुम्हारी। मिटा मोह सरदातप भारी।।
- RCM 1.120.2Open verse →
तुम्ह कृपाल सबु संसउ हरेऊ। राम स्वरुप जानि मोहि परेऊ।।
अर्थ · Hindi
तुम्ह कृपाल सबु संसउ हरेऊ। राम स्वरुप जानि मोहि परेऊ।।
- RCM 1.120.3Open verse →
नाथ कृपाँ अब गयउ बिषादा। सुखी भयउँ प्रभु चरन प्रसादा।।
अर्थ · Hindi
नाथ कृपाँ अब गयउ बिषादा। सुखी भयउँ प्रभु चरन प्रसादा।।
- RCM 1.120.4Open verse →
अब मोहि आपनि किंकरि जानी। जदपि सहज जड नारि अयानी।।
अर्थ · Hindi
अब मोहि आपनि किंकरि जानी। जदपि सहज जड नारि अयानी।।
- RCM 1.120.5Open verse →
प्रथम जो मैं पूछा सोइ कहहू। जौं मो पर प्रसन्न प्रभु अहहू।।
अर्थ · Hindi
प्रथम जो मैं पूछा सोइ कहहू। जौं मो पर प्रसन्न प्रभु अहहू।।
- RCM 1.120.6Open verse →
राम ब्रह्म चिनमय अबिनासी। सर्ब रहित सब उर पुर बासी।।
अर्थ · Hindi
राम ब्रह्म चिनमय अबिनासी। सर्ब रहित सब उर पुर बासी।।
- RCM 1.120.7Open verse →
नाथ धरेउ नरतनु केहि हेतू। मोहि समुझाइ कहहु बृषकेतू।।
अर्थ · Hindi
नाथ धरेउ नरतनु केहि हेतू। मोहि समुझाइ कहहु बृषकेतू।।
- RCM 1.120.8Open verse →
उमा बचन सुनि परम बिनीता। रामकथा पर प्रीति पुनीता।।
अर्थ · Hindi
उमा बचन सुनि परम बिनीता। रामकथा पर प्रीति पुनीता।।
- RCM 1.120.9Open verse →
हिंयँ हरषे कामारि तब संकर सहज सुजान
अर्थ · Hindi
हिंयँ हरषे कामारि तब संकर सहज सुजान
- RCM 1.120.10Open verse →
बहु बिधि उमहि प्रसंसि पुनि बोले कृपानिधान।।120(क)।।
अर्थ · Hindi
बहु बिधि उमहि प्रसंसि पुनि बोले कृपानिधान।।120(क)।।
- RCM 1.120.11Open verse →
सुनु सुभ कथा भवानि रामचरितमानस बिमल।
अर्थ · Hindi
सुनु सुभ कथा भवानि रामचरितमानस बिमल।
- RCM 1.120.12Open verse →
कहा भुसुंडि बखानि सुना बिहग नायक गरुड।।120(ख)।।
अर्थ · Hindi
कहा भुसुंडि बखानि सुना बिहग नायक गरुड।।120(ख)।।
- RCM 1.120.13Open verse →
सो संबाद उदार जेहि बिधि भा आगें कहब।
अर्थ · Hindi
सो संबाद उदार जेहि बिधि भा आगें कहब।
- RCM 1.120.14Open verse →
सुनहु राम अवतार चरित परम सुंदर अनघ।।120(ग)।।
अर्थ · Hindi
सुनहु राम अवतार चरित परम सुंदर अनघ।।120(ग)।।
- RCM 1.120.15Open verse →
हरि गुन नाम अपार कथा रूप अगनित अमित।
अर्थ · Hindi
हरि गुन नाम अपार कथा रूप अगनित अमित।
- RCM 1.120.16Open verse →
मैं निज मति अनुसार कहउँ उमा सादर सुनहु।।120(घ।।
अर्थ · Hindi
मैं निज मति अनुसार कहउँ उमा सादर सुनहु।।120(घ।।
- RCM 1.121.1Open verse →
सुनु गिरिजा हरिचरित सुहाए। बिपुल बिसद निगमागम गाए।।
अर्थ · Hindi
सुनु गिरिजा हरिचरित सुहाए। बिपुल बिसद निगमागम गाए।।
- RCM 1.121.2Open verse →
हरि अवतार हेतु जेहि होई। इदमित्थं कहि जाइ न सोई।।
अर्थ · Hindi
हरि अवतार हेतु जेहि होई। इदमित्थं कहि जाइ न सोई।।
- RCM 1.121.3Open verse →
राम अर्तक्य बुद्धि मन बानी। मत हमार अस सुनहि सयानी।।
अर्थ · Hindi
राम अर्तक्य बुद्धि मन बानी। मत हमार अस सुनहि सयानी।।
- RCM 1.121.4Open verse →
तदपि संत मुनि बेद पुराना। जस कछु कहहिं स्वमति अनुमाना।।
अर्थ · Hindi
तदपि संत मुनि बेद पुराना। जस कछु कहहिं स्वमति अनुमाना।।
- RCM 1.121.5Open verse →
तस मैं सुमुखि सुनावउँ तोही। समुझि परइ जस कारन मोही।।
अर्थ · Hindi
तस मैं सुमुखि सुनावउँ तोही। समुझि परइ जस कारन मोही।।
- RCM 1.121.6Open verse →
जब जब होइ धरम कै हानी। बाढहिं असुर अधम अभिमानी।।
अर्थ · Hindi
जब जब होइ धरम कै हानी। बाढहिं असुर अधम अभिमानी।।
- RCM 1.121.7Open verse →
करहिं अनीति जाइ नहिं बरनी। सीदहिं बिप्र धेनु सुर धरनी।।
अर्थ · Hindi
करहिं अनीति जाइ नहिं बरनी। सीदहिं बिप्र धेनु सुर धरनी।।
- RCM 1.121.8Open verse →
तब तब प्रभु धरि बिबिध सरीरा। हरहि कृपानिधि सज्जन पीरा।।
अर्थ · Hindi
तब तब प्रभु धरि बिबिध सरीरा। हरहि कृपानिधि सज्जन पीरा।।
- RCM 1.121.9Open verse →
असुर मारि थापहिं सुरन्ह राखहिं निज श्रुति सेतु।
अर्थ · Hindi
असुर मारि थापहिं सुरन्ह राखहिं निज श्रुति सेतु।
- RCM 1.121.10Open verse →
जग बिस्तारहिं बिसद जस राम जन्म कर हेतु।।121।।
अर्थ · Hindi
जग बिस्तारहिं बिसद जस राम जन्म कर हेतु।।121।।
- RCM 1.122.1Open verse →
सोइ जस गाइ भगत भव तरहीं। कृपासिंधु जन हित तनु धरहीं।।
अर्थ · Hindi
सोइ जस गाइ भगत भव तरहीं। कृपासिंधु जन हित तनु धरहीं।।
- RCM 1.122.2Open verse →
राम जनम के हेतु अनेका। परम बिचित्र एक तें एका।।
अर्थ · Hindi
राम जनम के हेतु अनेका। परम बिचित्र एक तें एका।।
- RCM 1.122.3Open verse →
जनम एक दुइ कहउँ बखानी। सावधान सुनु सुमति भवानी।।
अर्थ · Hindi
जनम एक दुइ कहउँ बखानी। सावधान सुनु सुमति भवानी।।
- RCM 1.122.4Open verse →
द्वारपाल हरि के प्रिय दोऊ। जय अरु बिजय जान सब कोऊ।।
अर्थ · Hindi
द्वारपाल हरि के प्रिय दोऊ। जय अरु बिजय जान सब कोऊ।।
- RCM 1.122.5Open verse →
बिप्र श्राप तें दूनउ भाई। तामस असुर देह तिन्ह पाई।।
अर्थ · Hindi
बिप्र श्राप तें दूनउ भाई। तामस असुर देह तिन्ह पाई।।
- RCM 1.122.6Open verse →
कनककसिपु अरु हाटक लोचन। जगत बिदित सुरपति मद मोचन।।
अर्थ · Hindi
कनककसिपु अरु हाटक लोचन। जगत बिदित सुरपति मद मोचन।।
- RCM 1.122.7Open verse →
बिजई समर बीर बिख्याता। धरि बराह बपु एक निपाता।।
अर्थ · Hindi
बिजई समर बीर बिख्याता। धरि बराह बपु एक निपाता।।
- RCM 1.122.8Open verse →
होइ नरहरि दूसर पुनि मारा। जन प्रहलाद सुजस बिस्तारा।।
अर्थ · Hindi
होइ नरहरि दूसर पुनि मारा। जन प्रहलाद सुजस बिस्तारा।।
- RCM 1.122.9Open verse →
भए निसाचर जाइ तेइ महाबीर बलवान।
अर्थ · Hindi
भए निसाचर जाइ तेइ महाबीर बलवान।
- RCM 1.122.10Open verse →
कुंभकरन रावण सुभट सुर बिजई जग जान।।122 ।
अर्थ · Hindi
कुंभकरन रावण सुभट सुर बिजई जग जान।।122 ।
- RCM 1.123.1Open verse →
मुकुत न भए हते भगवाना। तीनि जनम द्विज बचन प्रवाना।।
अर्थ · Hindi
मुकुत न भए हते भगवाना। तीनि जनम द्विज बचन प्रवाना।।
- RCM 1.123.2Open verse →
एक बार तिन्ह के हित लागी। धरेउ सरीर भगत अनुरागी।।
अर्थ · Hindi
एक बार तिन्ह के हित लागी। धरेउ सरीर भगत अनुरागी।।
- RCM 1.123.3Open verse →
कस्यप अदिति तहाँ पितु माता। दसरथ कौसल्या बिख्याता।।
अर्थ · Hindi
कस्यप अदिति तहाँ पितु माता। दसरथ कौसल्या बिख्याता।।
- RCM 1.123.4Open verse →
एक कलप एहि बिधि अवतारा। चरित्र पवित्र किए संसारा।।
अर्थ · Hindi
एक कलप एहि बिधि अवतारा। चरित्र पवित्र किए संसारा।।
- RCM 1.123.5Open verse →
एक कलप सुर देखि दुखारे। समर जलंधर सन सब हारे।।
अर्थ · Hindi
एक कलप सुर देखि दुखारे। समर जलंधर सन सब हारे।।
- RCM 1.123.6Open verse →
संभु कीन्ह संग्राम अपारा। दनुज महाबल मरइ न मारा।।
अर्थ · Hindi
संभु कीन्ह संग्राम अपारा। दनुज महाबल मरइ न मारा।।
- RCM 1.123.7Open verse →
परम सती असुराधिप नारी। तेहि बल ताहि न जितहिं पुरारी।।
अर्थ · Hindi
परम सती असुराधिप नारी। तेहि बल ताहि न जितहिं पुरारी।।
- RCM 1.123.8Open verse →
छल करि टारेउ तासु ब्रत प्रभु सुर कारज कीन्ह।।
अर्थ · Hindi
छल करि टारेउ तासु ब्रत प्रभु सुर कारज कीन्ह।।
- RCM 1.123.9Open verse →
जब तेहि जानेउ मरम तब श्राप कोप करि दीन्ह।।123।।
अर्थ · Hindi
जब तेहि जानेउ मरम तब श्राप कोप करि दीन्ह।।123।।
- RCM 1.124.1Open verse →
तासु श्राप हरि दीन्ह प्रमाना। कौतुकनिधि कृपाल भगवाना।।
अर्थ · Hindi
तासु श्राप हरि दीन्ह प्रमाना। कौतुकनिधि कृपाल भगवाना।।
- RCM 1.124.2Open verse →
तहाँ जलंधर रावन भयऊ। रन हति राम परम पद दयऊ।।
अर्थ · Hindi
तहाँ जलंधर रावन भयऊ। रन हति राम परम पद दयऊ।।
- RCM 1.124.3Open verse →
एक जनम कर कारन एहा। जेहि लागि राम धरी नरदेहा।।
अर्थ · Hindi
एक जनम कर कारन एहा। जेहि लागि राम धरी नरदेहा।।
- RCM 1.124.4Open verse →
प्रति अवतार कथा प्रभु केरी। सुनु मुनि बरनी कबिन्ह घनेरी।।
अर्थ · Hindi
प्रति अवतार कथा प्रभु केरी। सुनु मुनि बरनी कबिन्ह घनेरी।।
- RCM 1.124.5Open verse →
नारद श्राप दीन्ह एक बारा। कलप एक तेहि लगि अवतारा।।
अर्थ · Hindi
नारद श्राप दीन्ह एक बारा। कलप एक तेहि लगि अवतारा।।
- RCM 1.124.6Open verse →
गिरिजा चकित भई सुनि बानी। नारद बिष्नुभगत पुनि ग्यानि।।
अर्थ · Hindi
गिरिजा चकित भई सुनि बानी। नारद बिष्नुभगत पुनि ग्यानि।।
- RCM 1.124.7Open verse →
कारन कवन श्राप मुनि दीन्हा। का अपराध रमापति कीन्हा।।
अर्थ · Hindi
कारन कवन श्राप मुनि दीन्हा। का अपराध रमापति कीन्हा।।
- RCM 1.124.8Open verse →
यह प्रसंग मोहि कहहु पुरारी। मुनि मन मोह आचरज भारी।।
अर्थ · Hindi
यह प्रसंग मोहि कहहु पुरारी। मुनि मन मोह आचरज भारी।।
- RCM 1.124.9Open verse →
बोले बिहसि महेस तब ग्यानी मूढ़ न कोइ।
अर्थ · Hindi
बोले बिहसि महेस तब ग्यानी मूढ़ न कोइ।
- RCM 1.124.10Open verse →
जेहि जस रघुपति करहिं जब सो तस तेहि छन होइ।।124(क)।।
अर्थ · Hindi
जेहि जस रघुपति करहिं जब सो तस तेहि छन होइ।।124(क)।।
- RCM 1.124.11Open verse →
कहउँ राम गुन गाथ भरद्वाज सादर सुनहु।
अर्थ · Hindi
कहउँ राम गुन गाथ भरद्वाज सादर सुनहु।
- RCM 1.124.12Open verse →
भव भंजन रघुनाथ भजु तुलसी तजि मान मद।।124(ख)।।
अर्थ · Hindi
भव भंजन रघुनाथ भजु तुलसी तजि मान मद।।124(ख)।।
- RCM 1.125.1Open verse →
हिमगिरि गुहा एक अति पावनि। बह समीप सुरसरी सुहावनि।।
अर्थ · Hindi
हिमगिरि गुहा एक अति पावनि। बह समीप सुरसरी सुहावनि।।
- RCM 1.125.2Open verse →
आश्रम परम पुनीत सुहावा। देखि देवरिषि मन अति भावा।।
अर्थ · Hindi
आश्रम परम पुनीत सुहावा। देखि देवरिषि मन अति भावा।।
- RCM 1.125.3Open verse →
निरखि सैल सरि बिपिन बिभागा। भयउ रमापति पद अनुरागा।।
अर्थ · Hindi
निरखि सैल सरि बिपिन बिभागा। भयउ रमापति पद अनुरागा।।
- RCM 1.125.4Open verse →
सुमिरत हरिहि श्राप गति बाधी। सहज बिमल मन लागि समाधी।।
अर्थ · Hindi
सुमिरत हरिहि श्राप गति बाधी। सहज बिमल मन लागि समाधी।।
- RCM 1.125.5Open verse →
मुनि गति देखि सुरेस डेराना। कामहि बोलि कीन्ह सनमाना।।
अर्थ · Hindi
मुनि गति देखि सुरेस डेराना। कामहि बोलि कीन्ह सनमाना।।
- RCM 1.125.6Open verse →
सहित सहाय जाहु मम हेतू। चकेउ हरषि हियँ जलचरकेतू।।
अर्थ · Hindi
सहित सहाय जाहु मम हेतू। चकेउ हरषि हियँ जलचरकेतू।।
- RCM 1.125.7Open verse →
सुनासीर मन महुँ असि त्रासा। चहत देवरिषि मम पुर बासा।।
अर्थ · Hindi
सुनासीर मन महुँ असि त्रासा। चहत देवरिषि मम पुर बासा।।
- RCM 1.125.8Open verse →
जे कामी लोलुप जग माहीं। कुटिल काक इव सबहि डेराहीं।।
अर्थ · Hindi
जे कामी लोलुप जग माहीं। कुटिल काक इव सबहि डेराहीं।।
- RCM 1.125.9Open verse →
सुख हाड़ लै भाग सठ स्वान निरखि मृगराज।
अर्थ · Hindi
सुख हाड़ लै भाग सठ स्वान निरखि मृगराज।
- RCM 1.125.10Open verse →
छीनि लेइ जनि जान जड़ तिमि सुरपतिहि न लाज।।125।।
अर्थ · Hindi
छीनि लेइ जनि जान जड़ तिमि सुरपतिहि न लाज।।125।।
- RCM 1.126.1Open verse →
तेहि आश्रमहिं मदन जब गयऊ। निज मायाँ बसंत निरमयऊ।।
अर्थ · Hindi
तेहि आश्रमहिं मदन जब गयऊ। निज मायाँ बसंत निरमयऊ।।
- RCM 1.126.2Open verse →
कुसुमित बिबिध बिटप बहुरंगा। कूजहिं कोकिल गुंजहि भृंगा।।
अर्थ · Hindi
कुसुमित बिबिध बिटप बहुरंगा। कूजहिं कोकिल गुंजहि भृंगा।।
- RCM 1.126.3Open verse →
चली सुहावनि त्रिबिध बयारी। काम कृसानु बढ़ावनिहारी।।
अर्थ · Hindi
चली सुहावनि त्रिबिध बयारी। काम कृसानु बढ़ावनिहारी।।
- RCM 1.126.4Open verse →
रंभादिक सुरनारि नबीना । सकल असमसर कला प्रबीना।।
अर्थ · Hindi
रंभादिक सुरनारि नबीना । सकल असमसर कला प्रबीना।।
- RCM 1.126.5Open verse →
करहिं गान बहु तान तरंगा। बहुबिधि क्रीड़हि पानि पतंगा।।
अर्थ · Hindi
करहिं गान बहु तान तरंगा। बहुबिधि क्रीड़हि पानि पतंगा।।
- RCM 1.126.6Open verse →
देखि सहाय मदन हरषाना। कीन्हेसि पुनि प्रपंच बिधि नाना।।
अर्थ · Hindi
देखि सहाय मदन हरषाना। कीन्हेसि पुनि प्रपंच बिधि नाना।।
- RCM 1.126.7Open verse →
काम कला कछु मुनिहि न ब्यापी। निज भयँ डरेउ मनोभव पापी।।
अर्थ · Hindi
काम कला कछु मुनिहि न ब्यापी। निज भयँ डरेउ मनोभव पापी।।
- RCM 1.126.8Open verse →
सीम कि चाँपि सकइ कोउ तासु। बड़ रखवार रमापति जासू।।
अर्थ · Hindi
सीम कि चाँपि सकइ कोउ तासु। बड़ रखवार रमापति जासू।।
- RCM 1.126.9Open verse →
सहित सहाय सभीत अति मानि हारि मन मैन।
अर्थ · Hindi
सहित सहाय सभीत अति मानि हारि मन मैन।
- RCM 1.126.10Open verse →
गहेसि जाइ मुनि चरन तब कहि सुठि आरत बैन।।126।।
अर्थ · Hindi
गहेसि जाइ मुनि चरन तब कहि सुठि आरत बैन।।126।।
- RCM 1.127.1Open verse →
भयउ न नारद मन कछु रोषा। कहि प्रिय बचन काम परितोषा।।
अर्थ · Hindi
भयउ न नारद मन कछु रोषा। कहि प्रिय बचन काम परितोषा।।
- RCM 1.127.2Open verse →
नाइ चरन सिरु आयसु पाई। गयउ मदन तब सहित सहाई।।
अर्थ · Hindi
नाइ चरन सिरु आयसु पाई। गयउ मदन तब सहित सहाई।।
- RCM 1.127.3Open verse →
मुनि सुसीलता आपनि करनी। सुरपति सभाँ जाइ सब बरनी।।
अर्थ · Hindi
मुनि सुसीलता आपनि करनी। सुरपति सभाँ जाइ सब बरनी।।
- RCM 1.127.4Open verse →
सुनि सब कें मन अचरजु आवा। मुनिहि प्रसंसि हरिहि सिरु नावा।।
अर्थ · Hindi
सुनि सब कें मन अचरजु आवा। मुनिहि प्रसंसि हरिहि सिरु नावा।।
- RCM 1.127.5Open verse →
तब नारद गवने सिव पाहीं। जिता काम अहमिति मन माहीं।।
अर्थ · Hindi
तब नारद गवने सिव पाहीं। जिता काम अहमिति मन माहीं।।
- RCM 1.127.6Open verse →
मार चरित संकरहिं सुनाए। अतिप्रिय जानि महेस सिखाए।।
अर्थ · Hindi
मार चरित संकरहिं सुनाए। अतिप्रिय जानि महेस सिखाए।।
- RCM 1.127.7Open verse →
बार बार बिनवउँ मुनि तोहीं। जिमि यह कथा सुनायहु मोहीं।।
अर्थ · Hindi
बार बार बिनवउँ मुनि तोहीं। जिमि यह कथा सुनायहु मोहीं।।
- RCM 1.127.8Open verse →
तिमि जनि हरिहि सुनावहु कबहूँ। चलेहुँ प्रसंग दुराएडु तबहूँ।।
अर्थ · Hindi
तिमि जनि हरिहि सुनावहु कबहूँ। चलेहुँ प्रसंग दुराएडु तबहूँ।।
- RCM 1.127.9Open verse →
संभु दीन्ह उपदेस हित नहिं नारदहि सोहान।
अर्थ · Hindi
संभु दीन्ह उपदेस हित नहिं नारदहि सोहान।
- RCM 1.127.10Open verse →
भारद्वाज कौतुक सुनहु हरि इच्छा बलवान।।127।।
अर्थ · Hindi
भारद्वाज कौतुक सुनहु हरि इच्छा बलवान।।127।।
- RCM 1.128.1Open verse →
राम कीन्ह चाहहिं सोइ होई। करै अन्यथा अस नहिं कोई।।
अर्थ · Hindi
राम कीन्ह चाहहिं सोइ होई। करै अन्यथा अस नहिं कोई।।
- RCM 1.128.2Open verse →
संभु बचन मुनि मन नहिं भाए। तब बिरंचि के लोक सिधाए।।
अर्थ · Hindi
संभु बचन मुनि मन नहिं भाए। तब बिरंचि के लोक सिधाए।।
- RCM 1.128.3Open verse →
एक बार करतल बर बीना। गावत हरि गुन गान प्रबीना।।
अर्थ · Hindi
एक बार करतल बर बीना। गावत हरि गुन गान प्रबीना।।
- RCM 1.128.4Open verse →
छीरसिंधु गवने मुनिनाथा। जहँ बस श्रीनिवास श्रुतिमाथा।।
अर्थ · Hindi
छीरसिंधु गवने मुनिनाथा। जहँ बस श्रीनिवास श्रुतिमाथा।।
- RCM 1.128.5Open verse →
हरषि मिले उठि रमानिकेता। बैठे आसन रिषिहि समेता।।
अर्थ · Hindi
हरषि मिले उठि रमानिकेता। बैठे आसन रिषिहि समेता।।
- RCM 1.128.6Open verse →
बोले बिहसि चराचर राया। बहुते दिनन कीन्हि मुनि दाया।।
अर्थ · Hindi
बोले बिहसि चराचर राया। बहुते दिनन कीन्हि मुनि दाया।।
- RCM 1.128.7Open verse →
काम चरित नारद सब भाषे। जद्यपि प्रथम बरजि सिवँ राखे।।
अर्थ · Hindi
काम चरित नारद सब भाषे। जद्यपि प्रथम बरजि सिवँ राखे।।
- RCM 1.128.8Open verse →
अति प्रचंड रघुपति कै माया। जेहि न मोह अस को जग जाया।।
अर्थ · Hindi
अति प्रचंड रघुपति कै माया। जेहि न मोह अस को जग जाया।।
- RCM 1.128.9Open verse →
रूख बदन करि बचन मृदु बोले श्रीभगवान ।
अर्थ · Hindi
रूख बदन करि बचन मृदु बोले श्रीभगवान ।
- RCM 1.128.10Open verse →
तुम्हरे सुमिरन तें मिटहिं मोह मार मद मान।।128।।
अर्थ · Hindi
तुम्हरे सुमिरन तें मिटहिं मोह मार मद मान।।128।।
- RCM 1.129.1Open verse →
सुनु मुनि मोह होइ मन ताकें। ग्यान बिराग हृदय नहिं जाके।।
अर्थ · Hindi
सुनु मुनि मोह होइ मन ताकें। ग्यान बिराग हृदय नहिं जाके।।
- RCM 1.129.2Open verse →
ब्रह्मचरज ब्रत रत मतिधीरा। तुम्हहि कि करइ मनोभव पीरा।।
अर्थ · Hindi
ब्रह्मचरज ब्रत रत मतिधीरा। तुम्हहि कि करइ मनोभव पीरा।।
- RCM 1.129.3Open verse →
नारद कहेउ सहित अभिमाना। कृपा तुम्हारि सकल भगवाना।।
अर्थ · Hindi
नारद कहेउ सहित अभिमाना। कृपा तुम्हारि सकल भगवाना।।
- RCM 1.129.4Open verse →
करुनानिधि मन दीख बिचारी। उर अंकुरेउ गरब तरु भारी।।
अर्थ · Hindi
करुनानिधि मन दीख बिचारी। उर अंकुरेउ गरब तरु भारी।।
- RCM 1.129.5Open verse →
बेगि सो मै डारिहउँ उखारी। पन हमार सेवक हितकारी।।
अर्थ · Hindi
बेगि सो मै डारिहउँ उखारी। पन हमार सेवक हितकारी।।
- RCM 1.129.6Open verse →
मुनि कर हित मम कौतुक होई। अवसि उपाय करबि मै सोई।।
अर्थ · Hindi
मुनि कर हित मम कौतुक होई। अवसि उपाय करबि मै सोई।।
- RCM 1.129.7Open verse →
तब नारद हरि पद सिर नाई। चले हृदयँ अहमिति अधिकाई।।
अर्थ · Hindi
तब नारद हरि पद सिर नाई। चले हृदयँ अहमिति अधिकाई।।
- RCM 1.129.8Open verse →
श्रीपति निज माया तब प्रेरी। सुनहु कठिन करनी तेहि केरी।।
अर्थ · Hindi
श्रीपति निज माया तब प्रेरी। सुनहु कठिन करनी तेहि केरी।।
- RCM 1.129.9Open verse →
बिरचेउ मग महुँ नगर तेहिं सत जोजन बिस्तार।
अर्थ · Hindi
बिरचेउ मग महुँ नगर तेहिं सत जोजन बिस्तार।
- RCM 1.129.10Open verse →
श्रीनिवासपुर तें अधिक रचना बिबिध प्रकार।।129।।
अर्थ · Hindi
श्रीनिवासपुर तें अधिक रचना बिबिध प्रकार।।129।।
- RCM 1.130.1Open verse →
बसहिं नगर सुंदर नर नारी। जनु बहु मनसिज रति तनुधारी।।
अर्थ · Hindi
बसहिं नगर सुंदर नर नारी। जनु बहु मनसिज रति तनुधारी।।
- RCM 1.130.2Open verse →
तेहिं पुर बसइ सीलनिधि राजा। अगनित हय गय सेन समाजा।।
अर्थ · Hindi
तेहिं पुर बसइ सीलनिधि राजा। अगनित हय गय सेन समाजा।।
- RCM 1.130.3Open verse →
सत सुरेस सम बिभव बिलासा। रूप तेज बल नीति निवासा।।
अर्थ · Hindi
सत सुरेस सम बिभव बिलासा। रूप तेज बल नीति निवासा।।
- RCM 1.130.4Open verse →
बिस्वमोहनी तासु कुमारी। श्री बिमोह जिसु रूपु निहारी।।
अर्थ · Hindi
बिस्वमोहनी तासु कुमारी। श्री बिमोह जिसु रूपु निहारी।।
- RCM 1.130.5Open verse →
सोइ हरिमाया सब गुन खानी। सोभा तासु कि जाइ बखानी।।
अर्थ · Hindi
सोइ हरिमाया सब गुन खानी। सोभा तासु कि जाइ बखानी।।
- RCM 1.130.6Open verse →
करइ स्वयंबर सो नृपबाला। आए तहँ अगनित महिपाला।।
अर्थ · Hindi
करइ स्वयंबर सो नृपबाला। आए तहँ अगनित महिपाला।।
- RCM 1.130.7Open verse →
मुनि कौतुकी नगर तेहिं गयऊ। पुरबासिन्ह सब पूछत भयऊ।।
अर्थ · Hindi
मुनि कौतुकी नगर तेहिं गयऊ। पुरबासिन्ह सब पूछत भयऊ।।
- RCM 1.130.8Open verse →
सुनि सब चरित भूपगृहँ आए। करि पूजा नृप मुनि बैठाए।।
अर्थ · Hindi
सुनि सब चरित भूपगृहँ आए। करि पूजा नृप मुनि बैठाए।।
- RCM 1.130.9Open verse →
आनि देखाई नारदहि भूपति राजकुमारि।
अर्थ · Hindi
आनि देखाई नारदहि भूपति राजकुमारि।
- RCM 1.130.10Open verse →
कहहु नाथ गुन दोष सब एहि के हृदयँ बिचारि।।130।।
अर्थ · Hindi
कहहु नाथ गुन दोष सब एहि के हृदयँ बिचारि।।130।।
- RCM 1.131.1Open verse →
देखि रूप मुनि बिरति बिसारी। बड़ी बार लगि रहे निहारी।।
अर्थ · Hindi
देखि रूप मुनि बिरति बिसारी। बड़ी बार लगि रहे निहारी।।
- RCM 1.131.2Open verse →
लच्छन तासु बिलोकि भुलाने। हृदयँ हरष नहिं प्रगट बखाने।।
अर्थ · Hindi
लच्छन तासु बिलोकि भुलाने। हृदयँ हरष नहिं प्रगट बखाने।।
- RCM 1.131.3Open verse →
जो एहि बरइ अमर सोइ होई। समरभूमि तेहि जीत न कोई।।
अर्थ · Hindi
जो एहि बरइ अमर सोइ होई। समरभूमि तेहि जीत न कोई।।
- RCM 1.131.4Open verse →
सेवहिं सकल चराचर ताही। बरइ सीलनिधि कन्या जाही।।
अर्थ · Hindi
सेवहिं सकल चराचर ताही। बरइ सीलनिधि कन्या जाही।।
- RCM 1.131.5Open verse →
लच्छन सब बिचारि उर राखे। कछुक बनाइ भूप सन भाषे।।
अर्थ · Hindi
लच्छन सब बिचारि उर राखे। कछुक बनाइ भूप सन भाषे।।
- RCM 1.131.6Open verse →
सुता सुलच्छन कहि नृप पाहीं। नारद चले सोच मन माहीं।।
अर्थ · Hindi
सुता सुलच्छन कहि नृप पाहीं। नारद चले सोच मन माहीं।।
- RCM 1.131.7Open verse →
करौं जाइ सोइ जतन बिचारी। जेहि प्रकार मोहि बरै कुमारी।।
अर्थ · Hindi
करौं जाइ सोइ जतन बिचारी। जेहि प्रकार मोहि बरै कुमारी।।
- RCM 1.131.8Open verse →
जप तप कछु न होइ तेहि काला। हे बिधि मिलइ कवन बिधि बाला।।
अर्थ · Hindi
जप तप कछु न होइ तेहि काला। हे बिधि मिलइ कवन बिधि बाला।।
- RCM 1.131.9Open verse →
एहि अवसर चाहिअ परम सोभा रूप बिसाल।
अर्थ · Hindi
एहि अवसर चाहिअ परम सोभा रूप बिसाल।
- RCM 1.131.10Open verse →
जो बिलोकि रीझै कुअँरि तब मेलै जयमाल।।131।।
अर्थ · Hindi
जो बिलोकि रीझै कुअँरि तब मेलै जयमाल।।131।।
- RCM 1.132.1Open verse →
हरि सन मागौं सुंदरताई। होइहि जात गहरु अति भाई।।
अर्थ · Hindi
हरि सन मागौं सुंदरताई। होइहि जात गहरु अति भाई।।
- RCM 1.132.2Open verse →
मोरें हित हरि सम नहिं कोऊ। एहि अवसर सहाय सोइ होऊ।।
अर्थ · Hindi
मोरें हित हरि सम नहिं कोऊ। एहि अवसर सहाय सोइ होऊ।।
- RCM 1.132.3Open verse →
बहुबिधि बिनय कीन्हि तेहि काला। प्रगटेउ प्रभु कौतुकी कृपाला।।
अर्थ · Hindi
बहुबिधि बिनय कीन्हि तेहि काला। प्रगटेउ प्रभु कौतुकी कृपाला।।
- RCM 1.132.4Open verse →
प्रभु बिलोकि मुनि नयन जुड़ाने। होइहि काजु हिएँ हरषाने।।
अर्थ · Hindi
प्रभु बिलोकि मुनि नयन जुड़ाने। होइहि काजु हिएँ हरषाने।।
- RCM 1.132.5Open verse →
अति आरति कहि कथा सुनाई। करहु कृपा करि होहु सहाई।।
अर्थ · Hindi
अति आरति कहि कथा सुनाई। करहु कृपा करि होहु सहाई।।
- RCM 1.132.6Open verse →
आपन रूप देहु प्रभु मोही। आन भाँति नहिं पावौं ओही।।
अर्थ · Hindi
आपन रूप देहु प्रभु मोही। आन भाँति नहिं पावौं ओही।।
- RCM 1.132.7Open verse →
जेहि बिधि नाथ होइ हित मोरा। करहु सो बेगि दास मैं तोरा।।
अर्थ · Hindi
जेहि बिधि नाथ होइ हित मोरा। करहु सो बेगि दास मैं तोरा।।
- RCM 1.132.8Open verse →
निज माया बल देखि बिसाला। हियँ हँसि बोले दीनदयाला।।
अर्थ · Hindi
निज माया बल देखि बिसाला। हियँ हँसि बोले दीनदयाला।।
- RCM 1.132.9Open verse →
जेहि बिधि होइहि परम हित नारद सुनहु तुम्हार।
अर्थ · Hindi
जेहि बिधि होइहि परम हित नारद सुनहु तुम्हार।
- RCM 1.132.10Open verse →
सोइ हम करब न आन कछु बचन न मृषा हमार।।132।।
अर्थ · Hindi
सोइ हम करब न आन कछु बचन न मृषा हमार।।132।।
- RCM 1.133.1Open verse →
कुपथ माग रुज ब्याकुल रोगी। बैद न देइ सुनहु मुनि जोगी।।
अर्थ · Hindi
कुपथ माग रुज ब्याकुल रोगी। बैद न देइ सुनहु मुनि जोगी।।
- RCM 1.133.2Open verse →
एहि बिधि हित तुम्हार मैं ठयऊ। कहि अस अंतरहित प्रभु भयऊ।।
अर्थ · Hindi
एहि बिधि हित तुम्हार मैं ठयऊ। कहि अस अंतरहित प्रभु भयऊ।।
- RCM 1.133.3Open verse →
माया बिबस भए मुनि मूढ़ा। समुझी नहिं हरि गिरा निगूढ़ा।।
अर्थ · Hindi
माया बिबस भए मुनि मूढ़ा। समुझी नहिं हरि गिरा निगूढ़ा।।
- RCM 1.133.4Open verse →
गवने तुरत तहाँ रिषिराई। जहाँ स्वयंबर भूमि बनाई।।
अर्थ · Hindi
गवने तुरत तहाँ रिषिराई। जहाँ स्वयंबर भूमि बनाई।।
- RCM 1.133.5Open verse →
निज निज आसन बैठे राजा। बहु बनाव करि सहित समाजा।।
अर्थ · Hindi
निज निज आसन बैठे राजा। बहु बनाव करि सहित समाजा।।
- RCM 1.133.6Open verse →
मुनि मन हरष रूप अति मोरें। मोहि तजि आनहि बारिहि न भोरें।।
अर्थ · Hindi
मुनि मन हरष रूप अति मोरें। मोहि तजि आनहि बारिहि न भोरें।।
- RCM 1.133.7Open verse →
मुनि हित कारन कृपानिधाना। दीन्ह कुरूप न जाइ बखाना।।
अर्थ · Hindi
मुनि हित कारन कृपानिधाना। दीन्ह कुरूप न जाइ बखाना।।
- RCM 1.133.8Open verse →
सो चरित्र लखि काहुँ न पावा। नारद जानि सबहिं सिर नावा।।
अर्थ · Hindi
सो चरित्र लखि काहुँ न पावा। नारद जानि सबहिं सिर नावा।।
- RCM 1.133.9Open verse →
रहे तहाँ दुइ रुद्र गन ते जानहिं सब भेउ।
अर्थ · Hindi
रहे तहाँ दुइ रुद्र गन ते जानहिं सब भेउ।
- RCM 1.133.10Open verse →
बिप्रबेष देखत फिरहिं परम कौतुकी तेउ।।133।।
अर्थ · Hindi
बिप्रबेष देखत फिरहिं परम कौतुकी तेउ।।133।।
- RCM 1.134.1Open verse →
जेंहि समाज बैंठे मुनि जाई। हृदयँ रूप अहमिति अधिकाई।।
अर्थ · Hindi
जेंहि समाज बैंठे मुनि जाई। हृदयँ रूप अहमिति अधिकाई।।
- RCM 1.134.2Open verse →
तहँ बैठ महेस गन दोऊ। बिप्रबेष गति लखइ न कोऊ।।
अर्थ · Hindi
तहँ बैठ महेस गन दोऊ। बिप्रबेष गति लखइ न कोऊ।।
- RCM 1.134.3Open verse →
करहिं कूटि नारदहि सुनाई। नीकि दीन्हि हरि सुंदरताई।।
अर्थ · Hindi
करहिं कूटि नारदहि सुनाई। नीकि दीन्हि हरि सुंदरताई।।
- RCM 1.134.4Open verse →
रीझहि राजकुअँरि छबि देखी। इन्हहि बरिहि हरि जानि बिसेषी।।
अर्थ · Hindi
रीझहि राजकुअँरि छबि देखी। इन्हहि बरिहि हरि जानि बिसेषी।।
- RCM 1.134.5Open verse →
मुनिहि मोह मन हाथ पराएँ। हँसहिं संभु गन अति सचु पाएँ।।
अर्थ · Hindi
मुनिहि मोह मन हाथ पराएँ। हँसहिं संभु गन अति सचु पाएँ।।
- RCM 1.134.6Open verse →
जदपि सुनहिं मुनि अटपटि बानी। समुझि न परइ बुद्धि भ्रम सानी।।
अर्थ · Hindi
जदपि सुनहिं मुनि अटपटि बानी। समुझि न परइ बुद्धि भ्रम सानी।।
- RCM 1.134.7Open verse →
काहुँ न लखा सो चरित बिसेषा। सो सरूप नृपकन्याँ देखा।।
अर्थ · Hindi
काहुँ न लखा सो चरित बिसेषा। सो सरूप नृपकन्याँ देखा।।
- RCM 1.134.8Open verse →
मर्कट बदन भयंकर देही। देखत हृदयँ क्रोध भा तेही।।
अर्थ · Hindi
मर्कट बदन भयंकर देही। देखत हृदयँ क्रोध भा तेही।।
- RCM 1.134.9Open verse →
सखीं संग लै कुअँरि तब चलि जनु राजमराल।
अर्थ · Hindi
सखीं संग लै कुअँरि तब चलि जनु राजमराल।
- RCM 1.134.10Open verse →
देखत फिरइ महीप सब कर सरोज जयमाल।।134।।
अर्थ · Hindi
देखत फिरइ महीप सब कर सरोज जयमाल।।134।।
- RCM 1.135.1Open verse →
जेहि दिसि बैठे नारद फूली। सो दिसि देहि न बिलोकी भूली।।
अर्थ · Hindi
जेहि दिसि बैठे नारद फूली। सो दिसि देहि न बिलोकी भूली।।
- RCM 1.135.2Open verse →
पुनि पुनि मुनि उकसहिं अकुलाहीं। देखि दसा हर गन मुसकाहीं।।
अर्थ · Hindi
पुनि पुनि मुनि उकसहिं अकुलाहीं। देखि दसा हर गन मुसकाहीं।।
- RCM 1.135.3Open verse →
धरि नृपतनु तहँ गयउ कृपाला। कुअँरि हरषि मेलेउ जयमाला।।
अर्थ · Hindi
धरि नृपतनु तहँ गयउ कृपाला। कुअँरि हरषि मेलेउ जयमाला।।
- RCM 1.135.4Open verse →
दुलहिनि लै गे लच्छिनिवासा। नृपसमाज सब भयउ निरासा।।
अर्थ · Hindi
दुलहिनि लै गे लच्छिनिवासा। नृपसमाज सब भयउ निरासा।।
- RCM 1.135.5Open verse →
मुनि अति बिकल मोंहँ मति नाठी। मनि गिरि गई छूटि जनु गाँठी।।
अर्थ · Hindi
मुनि अति बिकल मोंहँ मति नाठी। मनि गिरि गई छूटि जनु गाँठी।।
- RCM 1.135.6Open verse →
तब हर गन बोले मुसुकाई। निज मुख मुकुर बिलोकहु जाई।।
अर्थ · Hindi
तब हर गन बोले मुसुकाई। निज मुख मुकुर बिलोकहु जाई।।
- RCM 1.135.7Open verse →
अस कहि दोउ भागे भयँ भारी। बदन दीख मुनि बारि निहारी।।
अर्थ · Hindi
अस कहि दोउ भागे भयँ भारी। बदन दीख मुनि बारि निहारी।।
- RCM 1.135.8Open verse →
बेषु बिलोकि क्रोध अति बाढ़ा। तिन्हहि सराप दीन्ह अति गाढ़ा।।
अर्थ · Hindi
बेषु बिलोकि क्रोध अति बाढ़ा। तिन्हहि सराप दीन्ह अति गाढ़ा।।
- RCM 1.135.9Open verse →
होहु निसाचर जाइ तुम्ह कपटी पापी दोउ।
अर्थ · Hindi
होहु निसाचर जाइ तुम्ह कपटी पापी दोउ।
- RCM 1.135.10Open verse →
हँसेहु हमहि सो लेहु फल बहुरि हँसेहु मुनि कोउ।।135।।
अर्थ · Hindi
हँसेहु हमहि सो लेहु फल बहुरि हँसेहु मुनि कोउ।।135।।
- RCM 1.136.1Open verse →
पुनि जल दीख रूप निज पावा। तदपि हृदयँ संतोष न आवा।।
अर्थ · Hindi
पुनि जल दीख रूप निज पावा। तदपि हृदयँ संतोष न आवा।।
- RCM 1.136.2Open verse →
फरकत अधर कोप मन माहीं। सपदी चले कमलापति पाहीं।।
अर्थ · Hindi
फरकत अधर कोप मन माहीं। सपदी चले कमलापति पाहीं।।
- RCM 1.136.3Open verse →
देहउँ श्राप कि मरिहउँ जाई। जगत मोर उपहास कराई।।
अर्थ · Hindi
देहउँ श्राप कि मरिहउँ जाई। जगत मोर उपहास कराई।।
- RCM 1.136.4Open verse →
बीचहिं पंथ मिले दनुजारी। संग रमा सोइ राजकुमारी।।
अर्थ · Hindi
बीचहिं पंथ मिले दनुजारी। संग रमा सोइ राजकुमारी।।
- RCM 1.136.5Open verse →
बोले मधुर बचन सुरसाईं। मुनि कहँ चले बिकल की नाईं।।
अर्थ · Hindi
बोले मधुर बचन सुरसाईं। मुनि कहँ चले बिकल की नाईं।।
- RCM 1.136.6Open verse →
सुनत बचन उपजा अति क्रोधा। माया बस न रहा मन बोधा।।
अर्थ · Hindi
सुनत बचन उपजा अति क्रोधा। माया बस न रहा मन बोधा।।
- RCM 1.136.7Open verse →
पर संपदा सकहु नहिं देखी। तुम्हरें इरिषा कपट बिसेषी।।
अर्थ · Hindi
पर संपदा सकहु नहिं देखी। तुम्हरें इरिषा कपट बिसेषी।।
- RCM 1.136.8Open verse →
मथत सिंधु रुद्रहि बौरायहु। सुरन्ह प्रेरी बिष पान करायहु।।
अर्थ · Hindi
मथत सिंधु रुद्रहि बौरायहु। सुरन्ह प्रेरी बिष पान करायहु।।
- RCM 1.136.9Open verse →
असुर सुरा बिष संकरहि आपु रमा मनि चारु।
अर्थ · Hindi
असुर सुरा बिष संकरहि आपु रमा मनि चारु।
- RCM 1.136.10Open verse →
स्वारथ साधक कुटिल तुम्ह सदा कपट ब्यवहारु।।136।।
अर्थ · Hindi
स्वारथ साधक कुटिल तुम्ह सदा कपट ब्यवहारु।।136।।
- RCM 1.137.1Open verse →
परम स्वतंत्र न सिर पर कोई। भावइ मनहि करहु तुम्ह सोई।।
अर्थ · Hindi
परम स्वतंत्र न सिर पर कोई। भावइ मनहि करहु तुम्ह सोई।।
- RCM 1.137.2Open verse →
भलेहि मंद मंदेहि भल करहू। बिसमय हरष न हियँ कछु धरहू।।
अर्थ · Hindi
भलेहि मंद मंदेहि भल करहू। बिसमय हरष न हियँ कछु धरहू।।
- RCM 1.137.3Open verse →
डहकि डहकि परिचेहु सब काहू। अति असंक मन सदा उछाहू।।
अर्थ · Hindi
डहकि डहकि परिचेहु सब काहू। अति असंक मन सदा उछाहू।।
- RCM 1.137.4Open verse →
करम सुभासुभ तुम्हहि न बाधा। अब लगि तुम्हहि न काहूँ साधा।।
अर्थ · Hindi
करम सुभासुभ तुम्हहि न बाधा। अब लगि तुम्हहि न काहूँ साधा।।
- RCM 1.137.5Open verse →
भले भवन अब बायन दीन्हा। पावहुगे फल आपन कीन्हा।।
अर्थ · Hindi
भले भवन अब बायन दीन्हा। पावहुगे फल आपन कीन्हा।।
- RCM 1.137.6Open verse →
बंचेहु मोहि जवनि धरि देहा। सोइ तनु धरहु श्राप मम एहा।।
अर्थ · Hindi
बंचेहु मोहि जवनि धरि देहा। सोइ तनु धरहु श्राप मम एहा।।
- RCM 1.137.7Open verse →
कपि आकृति तुम्ह कीन्हि हमारी। करिहहिं कीस सहाय तुम्हारी।।
अर्थ · Hindi
कपि आकृति तुम्ह कीन्हि हमारी। करिहहिं कीस सहाय तुम्हारी।।
- RCM 1.137.8Open verse →
मम अपकार कीन्ही तुम्ह भारी। नारी बिरहँ तुम्ह होब दुखारी।।
अर्थ · Hindi
मम अपकार कीन्ही तुम्ह भारी। नारी बिरहँ तुम्ह होब दुखारी।।
- RCM 1.137.9Open verse →
श्राप सीस धरी हरषि हियँ प्रभु बहु बिनती कीन्हि।
अर्थ · Hindi
श्राप सीस धरी हरषि हियँ प्रभु बहु बिनती कीन्हि।
- RCM 1.137.10Open verse →
निज माया कै प्रबलता करषि कृपानिधि लीन्हि।।137।।
अर्थ · Hindi
निज माया कै प्रबलता करषि कृपानिधि लीन्हि।।137।।
- RCM 1.138.1Open verse →
जब हरि माया दूरि निवारी। नहिं तहँ रमा न राजकुमारी।।
अर्थ · Hindi
जब हरि माया दूरि निवारी। नहिं तहँ रमा न राजकुमारी।।
- RCM 1.138.2Open verse →
तब मुनि अति सभीत हरि चरना। गहे पाहि प्रनतारति हरना।।
अर्थ · Hindi
तब मुनि अति सभीत हरि चरना। गहे पाहि प्रनतारति हरना।।
- RCM 1.138.3Open verse →
मृषा होउ मम श्राप कृपाला। मम इच्छा कह दीनदयाला।।
अर्थ · Hindi
मृषा होउ मम श्राप कृपाला। मम इच्छा कह दीनदयाला।।
- RCM 1.138.4Open verse →
मैं दुर्बचन कहे बहुतेरे। कह मुनि पाप मिटिहिं किमि मेरे।।
अर्थ · Hindi
मैं दुर्बचन कहे बहुतेरे। कह मुनि पाप मिटिहिं किमि मेरे।।
- RCM 1.138.5Open verse →
जपहु जाइ संकर सत नामा। होइहि हृदयँ तुरंत बिश्रामा।।
अर्थ · Hindi
जपहु जाइ संकर सत नामा। होइहि हृदयँ तुरंत बिश्रामा।।
- RCM 1.138.6Open verse →
कोउ नहिं सिव समान प्रिय मोरें। असि परतीति तजहु जनि भोरें।।
अर्थ · Hindi
कोउ नहिं सिव समान प्रिय मोरें। असि परतीति तजहु जनि भोरें।।
- RCM 1.138.7Open verse →
जेहि पर कृपा न करहिं पुरारी। सो न पाव मुनि भगति हमारी।।
अर्थ · Hindi
जेहि पर कृपा न करहिं पुरारी। सो न पाव मुनि भगति हमारी।।
- RCM 1.138.8Open verse →
अस उर धरि महि बिचरहु जाई। अब न तुम्हहि माया निअराई।।
अर्थ · Hindi
अस उर धरि महि बिचरहु जाई। अब न तुम्हहि माया निअराई।।
- RCM 1.138.9Open verse →
बहुबिधि मुनिहि प्रबोधि प्रभु तब भए अंतरधान।।
अर्थ · Hindi
बहुबिधि मुनिहि प्रबोधि प्रभु तब भए अंतरधान।।
- RCM 1.138.10Open verse →
सत्यलोक नारद चले करत राम गुन गान।।138।।
अर्थ · Hindi
सत्यलोक नारद चले करत राम गुन गान।।138।।
- RCM 1.139.1Open verse →
हर गन मुनिहि जात पथ देखी। बिगतमोह मन हरष बिसेषी।।
अर्थ · Hindi
हर गन मुनिहि जात पथ देखी। बिगतमोह मन हरष बिसेषी।।
- RCM 1.139.2Open verse →
अति सभीत नारद पहिं आए। गहि पद आरत बचन सुनाए।।
अर्थ · Hindi
अति सभीत नारद पहिं आए। गहि पद आरत बचन सुनाए।।
- RCM 1.139.3Open verse →
हर गन हम न बिप्र मुनिराया। बड़ अपराध कीन्ह फल पाया।।
अर्थ · Hindi
हर गन हम न बिप्र मुनिराया। बड़ अपराध कीन्ह फल पाया।।
- RCM 1.139.4Open verse →
श्राप अनुग्रह करहु कृपाला। बोले नारद दीनदयाला।।
अर्थ · Hindi
श्राप अनुग्रह करहु कृपाला। बोले नारद दीनदयाला।।
- RCM 1.139.5Open verse →
निसिचर जाइ होहु तुम्ह दोऊ। बैभव बिपुल तेज बल होऊ।।
अर्थ · Hindi
निसिचर जाइ होहु तुम्ह दोऊ। बैभव बिपुल तेज बल होऊ।।
- RCM 1.139.6Open verse →
भुजबल बिस्व जितब तुम्ह जहिआ। धरिहहिं बिष्नु मनुज तनु तहिआ।
अर्थ · Hindi
भुजबल बिस्व जितब तुम्ह जहिआ। धरिहहिं बिष्नु मनुज तनु तहिआ।
- RCM 1.139.7Open verse →
समर मरन हरि हाथ तुम्हारा। होइहहु मुकुत न पुनि संसारा।।
अर्थ · Hindi
समर मरन हरि हाथ तुम्हारा। होइहहु मुकुत न पुनि संसारा।।
- RCM 1.139.8Open verse →
चले जुगल मुनि पद सिर नाई। भए निसाचर कालहि पाई।।
अर्थ · Hindi
चले जुगल मुनि पद सिर नाई। भए निसाचर कालहि पाई।।
- RCM 1.139.9Open verse →
एक कलप एहि हेतु प्रभु लीन्ह मनुज अवतार।
अर्थ · Hindi
एक कलप एहि हेतु प्रभु लीन्ह मनुज अवतार।
- RCM 1.139.10Open verse →
सुर रंजन सज्जन सुखद हरि भंजन भुबि भार।।139।।
अर्थ · Hindi
सुर रंजन सज्जन सुखद हरि भंजन भुबि भार।।139।।
- RCM 1.140.1Open verse →
एहि बिधि जनम करम हरि केरे। सुंदर सुखद बिचित्र घनेरे।।
अर्थ · Hindi
एहि बिधि जनम करम हरि केरे। सुंदर सुखद बिचित्र घनेरे।।
- RCM 1.140.2Open verse →
कलप कलप प्रति प्रभु अवतरहीं। चारु चरित नानाबिधि करहीं।।
अर्थ · Hindi
कलप कलप प्रति प्रभु अवतरहीं। चारु चरित नानाबिधि करहीं।।
- RCM 1.140.3Open verse →
तब तब कथा मुनीसन्ह गाई। परम पुनीत प्रबंध बनाई।।
अर्थ · Hindi
तब तब कथा मुनीसन्ह गाई। परम पुनीत प्रबंध बनाई।।
- RCM 1.140.4Open verse →
बिबिध प्रसंग अनूप बखाने। करहिं न सुनि आचरजु सयाने।।
अर्थ · Hindi
बिबिध प्रसंग अनूप बखाने। करहिं न सुनि आचरजु सयाने।।
- RCM 1.140.5Open verse →
हरि अनंत हरिकथा अनंता। कहहिं सुनहिं बहुबिधि सब संता।।
अर्थ · Hindi
हरि अनंत हरिकथा अनंता। कहहिं सुनहिं बहुबिधि सब संता।।
- RCM 1.140.6Open verse →
रामचंद्र के चरित सुहाए। कलप कोटि लगि जाहिं न गाए।।
अर्थ · Hindi
रामचंद्र के चरित सुहाए। कलप कोटि लगि जाहिं न गाए।।
- RCM 1.140.7Open verse →
यह प्रसंग मैं कहा भवानी। हरिमायाँ मोहहिं मुनि ग्यानी।।
अर्थ · Hindi
यह प्रसंग मैं कहा भवानी। हरिमायाँ मोहहिं मुनि ग्यानी।।
- RCM 1.140.8Open verse →
प्रभु कौतुकी प्रनत हितकारी।।सेवत सुलभ सकल दुख हारी।।
अर्थ · Hindi
प्रभु कौतुकी प्रनत हितकारी।।सेवत सुलभ सकल दुख हारी।।
- RCM 1.140.9Open verse →
सुर नर मुनि कोउ नाहिं जेहि न मोह माया प्रबल।।
अर्थ · Hindi
सुर नर मुनि कोउ नाहिं जेहि न मोह माया प्रबल।।
- RCM 1.140.10Open verse →
अस बिचारि मन माहिं भजिअ महामाया पतिहि।।140।।
अर्थ · Hindi
अस बिचारि मन माहिं भजिअ महामाया पतिहि।।140।।
- RCM 1.141.1Open verse →
अपर हेतु सुनु सैलकुमारी। कहउँ बिचित्र कथा बिस्तारी।।
अर्थ · Hindi
अपर हेतु सुनु सैलकुमारी। कहउँ बिचित्र कथा बिस्तारी।।
- RCM 1.141.2Open verse →
जेहि कारन अज अगुन अरूपा। ब्रह्म भयउ कोसलपुर भूपा।।
अर्थ · Hindi
जेहि कारन अज अगुन अरूपा। ब्रह्म भयउ कोसलपुर भूपा।।
- RCM 1.141.3Open verse →
जो प्रभु बिपिन फिरत तुम्ह देखा। बंधु समेत धरें मुनिबेषा।।
अर्थ · Hindi
जो प्रभु बिपिन फिरत तुम्ह देखा। बंधु समेत धरें मुनिबेषा।।
- RCM 1.141.4Open verse →
जासु चरित अवलोकि भवानी। सती सरीर रहिहु बौरानी।।
अर्थ · Hindi
जासु चरित अवलोकि भवानी। सती सरीर रहिहु बौरानी।।
- RCM 1.141.5Open verse →
अजहुँ न छाया मिटति तुम्हारी। तासु चरित सुनु भ्रम रुज हारी।।
अर्थ · Hindi
अजहुँ न छाया मिटति तुम्हारी। तासु चरित सुनु भ्रम रुज हारी।।
- RCM 1.141.6Open verse →
लीला कीन्हि जो तेहिं अवतारा। सो सब कहिहउँ मति अनुसारा।।
अर्थ · Hindi
लीला कीन्हि जो तेहिं अवतारा। सो सब कहिहउँ मति अनुसारा।।
- RCM 1.141.7Open verse →
भरद्वाज सुनि संकर बानी। सकुचि सप्रेम उमा मुसकानी।।
अर्थ · Hindi
भरद्वाज सुनि संकर बानी। सकुचि सप्रेम उमा मुसकानी।।
- RCM 1.141.8Open verse →
लगे बहुरि बरने बृषकेतू। सो अवतार भयउ जेहि हेतू।।
अर्थ · Hindi
लगे बहुरि बरने बृषकेतू। सो अवतार भयउ जेहि हेतू।।
- RCM 1.141.9Open verse →
सो मैं तुम्ह सन कहउँ सबु सुनु मुनीस मन लाई।।
अर्थ · Hindi
सो मैं तुम्ह सन कहउँ सबु सुनु मुनीस मन लाई।।
- RCM 1.141.10Open verse →
राम कथा कलि मल हरनि मंगल करनि सुहाइ।।141।।
अर्थ · Hindi
राम कथा कलि मल हरनि मंगल करनि सुहाइ।।141।।
- RCM 1.142.1Open verse →
स्वायंभू मनु अरु सतरूपा। जिन्ह तें भै नरसृष्टि अनूपा।।
अर्थ · Hindi
स्वायंभू मनु अरु सतरूपा। जिन्ह तें भै नरसृष्टि अनूपा।।
- RCM 1.142.2Open verse →
दंपति धरम आचरन नीका। अजहुँ गाव श्रुति जिन्ह कै लीका।।
अर्थ · Hindi
दंपति धरम आचरन नीका। अजहुँ गाव श्रुति जिन्ह कै लीका।।
- RCM 1.142.3Open verse →
नृप उत्तानपाद सुत तासू। ध्रुव हरि भगत भयउ सुत जासू।।
अर्थ · Hindi
नृप उत्तानपाद सुत तासू। ध्रुव हरि भगत भयउ सुत जासू।।
- RCM 1.142.4Open verse →
लघु सुत नाम प्रिय्रब्रत ताही। बेद पुरान प्रसंसहि जाही।।
अर्थ · Hindi
लघु सुत नाम प्रिय्रब्रत ताही। बेद पुरान प्रसंसहि जाही।।
- RCM 1.142.5Open verse →
देवहूति पुनि तासु कुमारी। जो मुनि कर्दम कै प्रिय नारी।।
अर्थ · Hindi
देवहूति पुनि तासु कुमारी। जो मुनि कर्दम कै प्रिय नारी।।
- RCM 1.142.6Open verse →
आदिदेव प्रभु दीनदयाला। जठर धरेउ जेहिं कपिल कृपाला।।
अर्थ · Hindi
आदिदेव प्रभु दीनदयाला। जठर धरेउ जेहिं कपिल कृपाला।।
- RCM 1.142.7Open verse →
सांख्य सास्त्र जिन्ह प्रगट बखाना। तत्व बिचार निपुन भगवाना।।
अर्थ · Hindi
सांख्य सास्त्र जिन्ह प्रगट बखाना। तत्व बिचार निपुन भगवाना।।
- RCM 1.142.8Open verse →
तेहिं मनु राज कीन्ह बहु काला। प्रभु आयसु सब बिधि प्रतिपाला।।
अर्थ · Hindi
तेहिं मनु राज कीन्ह बहु काला। प्रभु आयसु सब बिधि प्रतिपाला।।
- RCM 1.142.9Open verse →
होइ न बिषय बिराग भवन बसत भा चौथपन।
अर्थ · Hindi
होइ न बिषय बिराग भवन बसत भा चौथपन।
- RCM 1.142.10Open verse →
हृदयँ बहुत दुख लाग जनम गयउ हरिभगति बिनु।।142।।
अर्थ · Hindi
हृदयँ बहुत दुख लाग जनम गयउ हरिभगति बिनु।।142।।
- RCM 1.143.1Open verse →
बरबस राज सुतहि तब दीन्हा। नारि समेत गवन बन कीन्हा।।
अर्थ · Hindi
बरबस राज सुतहि तब दीन्हा। नारि समेत गवन बन कीन्हा।।
- RCM 1.143.2Open verse →
तीरथ बर नैमिष बिख्याता। अति पुनीत साधक सिधि दाता।।
अर्थ · Hindi
तीरथ बर नैमिष बिख्याता। अति पुनीत साधक सिधि दाता।।
- RCM 1.143.3Open verse →
बसहिं तहाँ मुनि सिद्ध समाजा। तहँ हियँ हरषि चलेउ मनु राजा।।
अर्थ · Hindi
बसहिं तहाँ मुनि सिद्ध समाजा। तहँ हियँ हरषि चलेउ मनु राजा।।
- RCM 1.143.4Open verse →
पंथ जात सोहहिं मतिधीरा। ग्यान भगति जनु धरें सरीरा।।
अर्थ · Hindi
पंथ जात सोहहिं मतिधीरा। ग्यान भगति जनु धरें सरीरा।।
- RCM 1.143.5Open verse →
पहुँचे जाइ धेनुमति तीरा। हरषि नहाने निरमल नीरा।।
अर्थ · Hindi
पहुँचे जाइ धेनुमति तीरा। हरषि नहाने निरमल नीरा।।
- RCM 1.143.6Open verse →
आए मिलन सिद्ध मुनि ग्यानी। धरम धुरंधर नृपरिषि जानी।।
अर्थ · Hindi
आए मिलन सिद्ध मुनि ग्यानी। धरम धुरंधर नृपरिषि जानी।।
- RCM 1.143.7Open verse →
जहँ जँह तीरथ रहे सुहाए। मुनिन्ह सकल सादर करवाए।।
अर्थ · Hindi
जहँ जँह तीरथ रहे सुहाए। मुनिन्ह सकल सादर करवाए।।
- RCM 1.143.8Open verse →
कृस सरीर मुनिपट परिधाना। सत समाज नित सुनहिं पुराना ।
अर्थ · Hindi
कृस सरीर मुनिपट परिधाना। सत समाज नित सुनहिं पुराना ।
- RCM 1.143.9Open verse →
द्वादस अच्छर मंत्र पुनि जपहिं सहित अनुराग।
अर्थ · Hindi
द्वादस अच्छर मंत्र पुनि जपहिं सहित अनुराग।
- RCM 1.143.10Open verse →
बासुदेव पद पंकरुह दंपति मन अति लाग।।143।।
अर्थ · Hindi
बासुदेव पद पंकरुह दंपति मन अति लाग।।143।।
- RCM 1.144.1Open verse →
करहिं अहार साक फल कंदा। सुमिरहिं ब्रह्म सच्चिदानंदा।।
अर्थ · Hindi
करहिं अहार साक फल कंदा। सुमिरहिं ब्रह्म सच्चिदानंदा।।
- RCM 1.144.2Open verse →
पुनि हरि हेतु करन तप लागे। बारि अधार मूल फल त्यागे।।
अर्थ · Hindi
पुनि हरि हेतु करन तप लागे। बारि अधार मूल फल त्यागे।।
- RCM 1.144.3Open verse →
उर अभिलाष निंरंतर होई। देखअ नयन परम प्रभु सोई।।
अर्थ · Hindi
उर अभिलाष निंरंतर होई। देखअ नयन परम प्रभु सोई।।
- RCM 1.144.4Open verse →
अगुन अखंड अनंत अनादी। जेहि चिंतहिं परमारथबादी।।
अर्थ · Hindi
अगुन अखंड अनंत अनादी। जेहि चिंतहिं परमारथबादी।।
- RCM 1.144.5Open verse →
नेति नेति जेहि बेद निरूपा। निजानंद निरुपाधि अनूपा।।
अर्थ · Hindi
नेति नेति जेहि बेद निरूपा। निजानंद निरुपाधि अनूपा।।
- RCM 1.144.6Open verse →
संभु बिरंचि बिष्नु भगवाना। उपजहिं जासु अंस तें नाना।।
अर्थ · Hindi
संभु बिरंचि बिष्नु भगवाना। उपजहिं जासु अंस तें नाना।।
- RCM 1.144.7Open verse →
ऐसेउ प्रभु सेवक बस अहई। भगत हेतु लीलातनु गहई।।
अर्थ · Hindi
ऐसेउ प्रभु सेवक बस अहई। भगत हेतु लीलातनु गहई।।
- RCM 1.144.8Open verse →
जौं यह बचन सत्य श्रुति भाषा। तौ हमार पूजहि अभिलाषा।।
अर्थ · Hindi
जौं यह बचन सत्य श्रुति भाषा। तौ हमार पूजहि अभिलाषा।।
- RCM 1.144.9Open verse →
एहि बिधि बीतें बरष षट सहस बारि आहार।
अर्थ · Hindi
एहि बिधि बीतें बरष षट सहस बारि आहार।
- RCM 1.144.10Open verse →
संबत सप्त सहस्त्र पुनि रहे समीर अधार।।144।।
अर्थ · Hindi
संबत सप्त सहस्त्र पुनि रहे समीर अधार।।144।।
- RCM 1.145.1Open verse →
बरष सहस दस त्यागेउ सोऊ। ठाढ़े रहे एक पद दोऊ।।
अर्थ · Hindi
बरष सहस दस त्यागेउ सोऊ। ठाढ़े रहे एक पद दोऊ।।
- RCM 1.145.2Open verse →
बिधि हरि तप देखि अपारा। मनु समीप आए बहु बारा।।
अर्थ · Hindi
बिधि हरि तप देखि अपारा। मनु समीप आए बहु बारा।।
- RCM 1.145.3Open verse →
मागहु बर बहु भाँति लोभाए। परम धीर नहिं चलहिं चलाए।।
अर्थ · Hindi
मागहु बर बहु भाँति लोभाए। परम धीर नहिं चलहिं चलाए।।
- RCM 1.145.4Open verse →
अस्थिमात्र होइ रहे सरीरा। तदपि मनाग मनहिं नहिं पीरा।।
अर्थ · Hindi
अस्थिमात्र होइ रहे सरीरा। तदपि मनाग मनहिं नहिं पीरा।।
- RCM 1.145.5Open verse →
प्रभु सर्बग्य दास निज जानी। गति अनन्य तापस नृप रानी।।
अर्थ · Hindi
प्रभु सर्बग्य दास निज जानी। गति अनन्य तापस नृप रानी।।
- RCM 1.145.6Open verse →
मागु मागु बरु भै नभ बानी। परम गभीर कृपामृत सानी।।
अर्थ · Hindi
मागु मागु बरु भै नभ बानी। परम गभीर कृपामृत सानी।।
- RCM 1.145.7Open verse →
मृतक जिआवनि गिरा सुहाई। श्रबन रंध्र होइ उर जब आई।।
अर्थ · Hindi
मृतक जिआवनि गिरा सुहाई। श्रबन रंध्र होइ उर जब आई।।
- RCM 1.145.8Open verse →
ह्रष्टपुष्ट तन भए सुहाए। मानहुँ अबहिं भवन ते आए।।
अर्थ · Hindi
ह्रष्टपुष्ट तन भए सुहाए। मानहुँ अबहिं भवन ते आए।।
- RCM 1.145.9Open verse →
श्रवन सुधा सम बचन सुनि पुलक प्रफुल्लित गात।
अर्थ · Hindi
श्रवन सुधा सम बचन सुनि पुलक प्रफुल्लित गात।
- RCM 1.145.10Open verse →
बोले मनु करि दंडवत प्रेम न हृदयँ समात।।145।।
अर्थ · Hindi
बोले मनु करि दंडवत प्रेम न हृदयँ समात।।145।।
- RCM 1.146.1Open verse →
सुनु सेवक सुरतरु सुरधेनु। बिधि हरि हर बंदित पद रेनू।।
अर्थ · Hindi
सुनु सेवक सुरतरु सुरधेनु। बिधि हरि हर बंदित पद रेनू।।
- RCM 1.146.2Open verse →
सेवत सुलभ सकल सुख दायक। प्रनतपाल सचराचर नायक।।
अर्थ · Hindi
सेवत सुलभ सकल सुख दायक। प्रनतपाल सचराचर नायक।।
- RCM 1.146.3Open verse →
जौं अनाथ हित हम पर नेहू। तौ प्रसन्न होइ यह बर देहू।।
अर्थ · Hindi
जौं अनाथ हित हम पर नेहू। तौ प्रसन्न होइ यह बर देहू।।
- RCM 1.146.4Open verse →
जो सरूप बस सिव मन माहीं। जेहि कारन मुनि जतन कराहीं।।
अर्थ · Hindi
जो सरूप बस सिव मन माहीं। जेहि कारन मुनि जतन कराहीं।।
- RCM 1.146.5Open verse →
जो भुसुंडि मन मानस हंसा। सगुन अगुन जेहि निगम प्रसंसा।।
अर्थ · Hindi
जो भुसुंडि मन मानस हंसा। सगुन अगुन जेहि निगम प्रसंसा।।
- RCM 1.146.6Open verse →
देखहिं हम सो रूप भरि लोचन। कृपा करहु प्रनतारति मोचन।।
अर्थ · Hindi
देखहिं हम सो रूप भरि लोचन। कृपा करहु प्रनतारति मोचन।।
- RCM 1.146.7Open verse →
दंपति बचन परम प्रिय लागे। मुदुल बिनीत प्रेम रस पागे।।
अर्थ · Hindi
दंपति बचन परम प्रिय लागे। मुदुल बिनीत प्रेम रस पागे।।
- RCM 1.146.8Open verse →
भगत बछल प्रभु कृपानिधाना। बिस्वबास प्रगटे भगवाना।।
अर्थ · Hindi
भगत बछल प्रभु कृपानिधाना। बिस्वबास प्रगटे भगवाना।।
- RCM 1.146.9Open verse →
नील सरोरुह नील मनि नील नीरधर स्याम।
अर्थ · Hindi
नील सरोरुह नील मनि नील नीरधर स्याम।
- RCM 1.146.10Open verse →
लाजहिं तन सोभा निरखि कोटि कोटि सत काम।।146।।
अर्थ · Hindi
लाजहिं तन सोभा निरखि कोटि कोटि सत काम।।146।।
- RCM 1.147.1Open verse →
सरद मयंक बदन छबि सींवा। चारु कपोल चिबुक दर ग्रीवा।।
अर्थ · Hindi
सरद मयंक बदन छबि सींवा। चारु कपोल चिबुक दर ग्रीवा।।
- RCM 1.147.2Open verse →
अधर अरुन रद सुंदर नासा। बिधु कर निकर बिनिंदक हासा।।
अर्थ · Hindi
अधर अरुन रद सुंदर नासा। बिधु कर निकर बिनिंदक हासा।।
- RCM 1.147.3Open verse →
नव अबुंज अंबक छबि नीकी। चितवनि ललित भावँती जी की।।
अर्थ · Hindi
नव अबुंज अंबक छबि नीकी। चितवनि ललित भावँती जी की।।
- RCM 1.147.4Open verse →
भुकुटि मनोज चाप छबि हारी। तिलक ललाट पटल दुतिकारी।।
अर्थ · Hindi
भुकुटि मनोज चाप छबि हारी। तिलक ललाट पटल दुतिकारी।।
- RCM 1.147.5Open verse →
कुंडल मकर मुकुट सिर भ्राजा। कुटिल केस जनु मधुप समाजा।।
अर्थ · Hindi
कुंडल मकर मुकुट सिर भ्राजा। कुटिल केस जनु मधुप समाजा।।
- RCM 1.147.6Open verse →
उर श्रीबत्स रुचिर बनमाला। पदिक हार भूषन मनिजाला।।
अर्थ · Hindi
उर श्रीबत्स रुचिर बनमाला। पदिक हार भूषन मनिजाला।।
- RCM 1.147.7Open verse →
केहरि कंधर चारु जनेउ। बाहु बिभूषन सुंदर तेऊ।।
अर्थ · Hindi
केहरि कंधर चारु जनेउ। बाहु बिभूषन सुंदर तेऊ।।
- RCM 1.147.8Open verse →
करि कर सरि सुभग भुजदंडा। कटि निषंग कर सर कोदंडा।।
अर्थ · Hindi
करि कर सरि सुभग भुजदंडा। कटि निषंग कर सर कोदंडा।।
- RCM 1.147.9Open verse →
तडित बिनिंदक पीत पट उदर रेख बर तीनि।।
अर्थ · Hindi
तडित बिनिंदक पीत पट उदर रेख बर तीनि।।
- RCM 1.147.10Open verse →
नाभि मनोहर लेति जनु जमुन भवँर छबि छीनि।।147।।
अर्थ · Hindi
नाभि मनोहर लेति जनु जमुन भवँर छबि छीनि।।147।।
- RCM 1.148.1Open verse →
पद राजीव बरनि नहि जाहीं। मुनि मन मधुप बसहिं जेन्ह माहीं।।
अर्थ · Hindi
पद राजीव बरनि नहि जाहीं। मुनि मन मधुप बसहिं जेन्ह माहीं।।
- RCM 1.148.2Open verse →
बाम भाग सोभति अनुकूला। आदिसक्ति छबिनिधि जगमूला।।
अर्थ · Hindi
बाम भाग सोभति अनुकूला। आदिसक्ति छबिनिधि जगमूला।।
- RCM 1.148.3Open verse →
जासु अंस उपजहिं गुनखानी। अगनित लच्छि उमा ब्रह्मानी।।
अर्थ · Hindi
जासु अंस उपजहिं गुनखानी। अगनित लच्छि उमा ब्रह्मानी।।
- RCM 1.148.4Open verse →
भृकुटि बिलास जासु जग होई। राम बाम दिसि सीता सोई।।
अर्थ · Hindi
भृकुटि बिलास जासु जग होई। राम बाम दिसि सीता सोई।।
- RCM 1.148.5Open verse →
छबिसमुद्र हरि रूप बिलोकी। एकटक रहे नयन पट रोकी।।
अर्थ · Hindi
छबिसमुद्र हरि रूप बिलोकी। एकटक रहे नयन पट रोकी।।
- RCM 1.148.6Open verse →
चितवहिं सादर रूप अनूपा। तृप्ति न मानहिं मनु सतरूपा।।
अर्थ · Hindi
चितवहिं सादर रूप अनूपा। तृप्ति न मानहिं मनु सतरूपा।।
- RCM 1.148.7Open verse →
हरष बिबस तन दसा भुलानी। परे दंड इव गहि पद पानी।।
अर्थ · Hindi
हरष बिबस तन दसा भुलानी। परे दंड इव गहि पद पानी।।
- RCM 1.148.8Open verse →
सिर परसे प्रभु निज कर कंजा। तुरत उठाए करुनापुंजा।।
अर्थ · Hindi
सिर परसे प्रभु निज कर कंजा। तुरत उठाए करुनापुंजा।।
- RCM 1.148.9Open verse →
बोले कृपानिधान पुनि अति प्रसन्न मोहि जानि।
अर्थ · Hindi
बोले कृपानिधान पुनि अति प्रसन्न मोहि जानि।
- RCM 1.148.10Open verse →
मागहु बर जोइ भाव मन महादानि अनुमानि।।148।।
अर्थ · Hindi
मागहु बर जोइ भाव मन महादानि अनुमानि।।148।।
- RCM 1.149.1Open verse →
सुनि प्रभु बचन जोरि जुग पानी। धरि धीरजु बोली मृदु बानी।।
अर्थ · Hindi
सुनि प्रभु बचन जोरि जुग पानी। धरि धीरजु बोली मृदु बानी।।
- RCM 1.149.2Open verse →
नाथ देखि पद कमल तुम्हारे। अब पूरे सब काम हमारे।।
अर्थ · Hindi
नाथ देखि पद कमल तुम्हारे। अब पूरे सब काम हमारे।।
- RCM 1.149.3Open verse →
एक लालसा बड़ि उर माही। सुगम अगम कहि जात सो नाहीं।।
अर्थ · Hindi
एक लालसा बड़ि उर माही। सुगम अगम कहि जात सो नाहीं।।
- RCM 1.149.4Open verse →
तुम्हहि देत अति सुगम गोसाईं। अगम लाग मोहि निज कृपनाईं।।
अर्थ · Hindi
तुम्हहि देत अति सुगम गोसाईं। अगम लाग मोहि निज कृपनाईं।।
- RCM 1.149.5Open verse →
जथा दरिद्र बिबुधतरु पाई। बहु संपति मागत सकुचाई।।
अर्थ · Hindi
जथा दरिद्र बिबुधतरु पाई। बहु संपति मागत सकुचाई।।
- RCM 1.149.6Open verse →
तासु प्रभा जान नहिं सोई। तथा हृदयँ मम संसय होई।।
अर्थ · Hindi
तासु प्रभा जान नहिं सोई। तथा हृदयँ मम संसय होई।।
- RCM 1.149.7Open verse →
सो तुम्ह जानहु अंतरजामी। पुरवहु मोर मनोरथ स्वामी।।
अर्थ · Hindi
सो तुम्ह जानहु अंतरजामी। पुरवहु मोर मनोरथ स्वामी।।
- RCM 1.149.8Open verse →
सकुच बिहाइ मागु नृप मोहि। मोरें नहिं अदेय कछु तोही।।
अर्थ · Hindi
सकुच बिहाइ मागु नृप मोहि। मोरें नहिं अदेय कछु तोही।।
- RCM 1.149.9Open verse →
दानि सिरोमनि कृपानिधि नाथ कहउँ सतिभाउ।।
अर्थ · Hindi
दानि सिरोमनि कृपानिधि नाथ कहउँ सतिभाउ।।
- RCM 1.149.10Open verse →
चाहउँ तुम्हहि समान सुत प्रभु सन कवन दुराउ।।149।।
अर्थ · Hindi
चाहउँ तुम्हहि समान सुत प्रभु सन कवन दुराउ।।149।।
- RCM 1.150.1Open verse →
देखि प्रीति सुनि बचन अमोले। एवमस्तु करुनानिधि बोले।।
अर्थ · Hindi
देखि प्रीति सुनि बचन अमोले। एवमस्तु करुनानिधि बोले।।
- RCM 1.150.2Open verse →
आपु सरिस खोजौं कहँ जाई। नृप तव तनय होब मैं आई।।
अर्थ · Hindi
आपु सरिस खोजौं कहँ जाई। नृप तव तनय होब मैं आई।।
- RCM 1.150.3Open verse →
सतरूपहि बिलोकि कर जोरें। देबि मागु बरु जो रुचि तोरे।।
अर्थ · Hindi
सतरूपहि बिलोकि कर जोरें। देबि मागु बरु जो रुचि तोरे।।
- RCM 1.150.4Open verse →
जो बरु नाथ चतुर नृप मागा। सोइ कृपाल मोहि अति प्रिय लागा।।
अर्थ · Hindi
जो बरु नाथ चतुर नृप मागा। सोइ कृपाल मोहि अति प्रिय लागा।।
- RCM 1.150.5Open verse →
प्रभु परंतु सुठि होति ढिठाई। जदपि भगत हित तुम्हहि सोहाई।।
अर्थ · Hindi
प्रभु परंतु सुठि होति ढिठाई। जदपि भगत हित तुम्हहि सोहाई।।
- RCM 1.150.6Open verse →
तुम्ह ब्रह्मादि जनक जग स्वामी। ब्रह्म सकल उर अंतरजामी।।
अर्थ · Hindi
तुम्ह ब्रह्मादि जनक जग स्वामी। ब्रह्म सकल उर अंतरजामी।।
- RCM 1.150.7Open verse →
अस समुझत मन संसय होई। कहा जो प्रभु प्रवान पुनि सोई।।
अर्थ · Hindi
अस समुझत मन संसय होई। कहा जो प्रभु प्रवान पुनि सोई।।
- RCM 1.150.8Open verse →
जे निज भगत नाथ तव अहहीं। जो सुख पावहिं जो गति लहहीं।।
अर्थ · Hindi
जे निज भगत नाथ तव अहहीं। जो सुख पावहिं जो गति लहहीं।।
- RCM 1.150.9Open verse →
सोइ सुख सोइ गति सोइ भगति सोइ निज चरन सनेहु।।
अर्थ · Hindi
सोइ सुख सोइ गति सोइ भगति सोइ निज चरन सनेहु।।
- RCM 1.150.10Open verse →
सोइ बिबेक सोइ रहनि प्रभु हमहि कृपा करि देहु।।150।।
अर्थ · Hindi
सोइ बिबेक सोइ रहनि प्रभु हमहि कृपा करि देहु।।150।।
- RCM 1.151.1Open verse →
सुनु मृदु गूढ़ रुचिर बर रचना। कृपासिंधु बोले मृदु बचना।।
अर्थ · Hindi
सुनु मृदु गूढ़ रुचिर बर रचना। कृपासिंधु बोले मृदु बचना।।
- RCM 1.151.2Open verse →
जो कछु रुचि तुम्हेर मन माहीं। मैं सो दीन्ह सब संसय नाहीं।।
अर्थ · Hindi
जो कछु रुचि तुम्हेर मन माहीं। मैं सो दीन्ह सब संसय नाहीं।।
- RCM 1.151.3Open verse →
मातु बिबेक अलोकिक तोरें। कबहुँ न मिटिहि अनुग्रह मोरें ।
अर्थ · Hindi
मातु बिबेक अलोकिक तोरें। कबहुँ न मिटिहि अनुग्रह मोरें ।
- RCM 1.151.4Open verse →
बंदि चरन मनु कहेउ बहोरी। अवर एक बिनति प्रभु मोरी।।
अर्थ · Hindi
बंदि चरन मनु कहेउ बहोरी। अवर एक बिनति प्रभु मोरी।।
- RCM 1.151.5Open verse →
सुत बिषइक तव पद रति होऊ। मोहि बड़ मूढ़ कहै किन कोऊ।।
अर्थ · Hindi
सुत बिषइक तव पद रति होऊ। मोहि बड़ मूढ़ कहै किन कोऊ।।
- RCM 1.151.6Open verse →
मनि बिनु फनि जिमि जल बिनु मीना। मम जीवन तिमि तुम्हहि अधीना।।
अर्थ · Hindi
मनि बिनु फनि जिमि जल बिनु मीना। मम जीवन तिमि तुम्हहि अधीना।।
- RCM 1.151.7Open verse →
अस बरु मागि चरन गहि रहेऊ। एवमस्तु करुनानिधि कहेऊ।।
अर्थ · Hindi
अस बरु मागि चरन गहि रहेऊ। एवमस्तु करुनानिधि कहेऊ।।
- RCM 1.151.8Open verse →
अब तुम्ह मम अनुसासन मानी। बसहु जाइ सुरपति रजधानी।।
अर्थ · Hindi
अब तुम्ह मम अनुसासन मानी। बसहु जाइ सुरपति रजधानी।।
- RCM 1.151.9Open verse →
तहँ करि भोग बिसाल तात गउँ कछु काल पुनि।
अर्थ · Hindi
तहँ करि भोग बिसाल तात गउँ कछु काल पुनि।
- RCM 1.151.10Open verse →
होइहहु अवध भुआल तब मैं होब तुम्हार सुत।।151।।
अर्थ · Hindi
होइहहु अवध भुआल तब मैं होब तुम्हार सुत।।151।।
- RCM 1.152.1Open verse →
इच्छामय नरबेष सँवारें। होइहउँ प्रगट निकेत तुम्हारे।।
अर्थ · Hindi
इच्छामय नरबेष सँवारें। होइहउँ प्रगट निकेत तुम्हारे।।
- RCM 1.152.2Open verse →
अंसन्ह सहित देह धरि ताता। करिहउँ चरित भगत सुखदाता।।
अर्थ · Hindi
अंसन्ह सहित देह धरि ताता। करिहउँ चरित भगत सुखदाता।।
- RCM 1.152.3Open verse →
जे सुनि सादर नर बड़भागी। भव तरिहहिं ममता मद त्यागी।।
अर्थ · Hindi
जे सुनि सादर नर बड़भागी। भव तरिहहिं ममता मद त्यागी।।
- RCM 1.152.4Open verse →
आदिसक्ति जेहिं जग उपजाया। सोउ अवतरिहि मोरि यह माया।।
अर्थ · Hindi
आदिसक्ति जेहिं जग उपजाया। सोउ अवतरिहि मोरि यह माया।।
- RCM 1.152.5Open verse →
पुरउब मैं अभिलाष तुम्हारा। सत्य सत्य पन सत्य हमारा।।
अर्थ · Hindi
पुरउब मैं अभिलाष तुम्हारा। सत्य सत्य पन सत्य हमारा।।
- RCM 1.152.6Open verse →
पुनि पुनि अस कहि कृपानिधाना। अंतरधान भए भगवाना।।
अर्थ · Hindi
पुनि पुनि अस कहि कृपानिधाना। अंतरधान भए भगवाना।।
- RCM 1.152.7Open verse →
दंपति उर धरि भगत कृपाला। तेहिं आश्रम निवसे कछु काला।।
अर्थ · Hindi
दंपति उर धरि भगत कृपाला। तेहिं आश्रम निवसे कछु काला।।
- RCM 1.152.8Open verse →
समय पाइ तनु तजि अनयासा। जाइ कीन्ह अमरावति बासा।।
अर्थ · Hindi
समय पाइ तनु तजि अनयासा। जाइ कीन्ह अमरावति बासा।।
- RCM 1.152.9Open verse →
यह इतिहास पुनीत अति उमहि कही बृषकेतु।
अर्थ · Hindi
यह इतिहास पुनीत अति उमहि कही बृषकेतु।
- RCM 1.152.10Open verse →
भरद्वाज सुनु अपर पुनि राम जनम कर हेतु।।152।।
अर्थ · Hindi
भरद्वाज सुनु अपर पुनि राम जनम कर हेतु।।152।।
- RCM 1.153.1Open verse →
सुनु मुनि कथा पुनीत पुरानी। जो गिरिजा प्रति संभु बखानी।।
अर्थ · Hindi
सुनु मुनि कथा पुनीत पुरानी। जो गिरिजा प्रति संभु बखानी।।
- RCM 1.153.2Open verse →
बिस्व बिदित एक कैकय देसू। सत्यकेतु तहँ बसइ नरेसू।।
अर्थ · Hindi
बिस्व बिदित एक कैकय देसू। सत्यकेतु तहँ बसइ नरेसू।।
- RCM 1.153.3Open verse →
धरम धुरंधर नीति निधाना। तेज प्रताप सील बलवाना।।
अर्थ · Hindi
धरम धुरंधर नीति निधाना। तेज प्रताप सील बलवाना।।
- RCM 1.153.4Open verse →
तेहि कें भए जुगल सुत बीरा। सब गुन धाम महा रनधीरा।।
अर्थ · Hindi
तेहि कें भए जुगल सुत बीरा। सब गुन धाम महा रनधीरा।।
- RCM 1.153.5Open verse →
राज धनी जो जेठ सुत आही। नाम प्रतापभानु अस ताही।।
अर्थ · Hindi
राज धनी जो जेठ सुत आही। नाम प्रतापभानु अस ताही।।
- RCM 1.153.6Open verse →
अपर सुतहि अरिमर्दन नामा। भुजबल अतुल अचल संग्रामा।।
अर्थ · Hindi
अपर सुतहि अरिमर्दन नामा। भुजबल अतुल अचल संग्रामा।।
- RCM 1.153.7Open verse →
भाइहि भाइहि परम समीती। सकल दोष छल बरजित प्रीती।।
अर्थ · Hindi
भाइहि भाइहि परम समीती। सकल दोष छल बरजित प्रीती।।
- RCM 1.153.8Open verse →
जेठे सुतहि राज नृप दीन्हा। हरि हित आपु गवन बन कीन्हा।।
अर्थ · Hindi
जेठे सुतहि राज नृप दीन्हा। हरि हित आपु गवन बन कीन्हा।।
- RCM 1.153.9Open verse →
जब प्रतापरबि भयउ नृप फिरी दोहाई देस।
अर्थ · Hindi
जब प्रतापरबि भयउ नृप फिरी दोहाई देस।
- RCM 1.153.10Open verse →
प्रजा पाल अति बेदबिधि कतहुँ नहीं अघ लेस।।153।।
अर्थ · Hindi
प्रजा पाल अति बेदबिधि कतहुँ नहीं अघ लेस।।153।।
- RCM 1.154.1Open verse →
नृप हितकारक सचिव सयाना। नाम धरमरुचि सुक्र समाना।।
अर्थ · Hindi
नृप हितकारक सचिव सयाना। नाम धरमरुचि सुक्र समाना।।
- RCM 1.154.2Open verse →
सचिव सयान बंधु बलबीरा। आपु प्रतापपुंज रनधीरा।।
अर्थ · Hindi
सचिव सयान बंधु बलबीरा। आपु प्रतापपुंज रनधीरा।।
- RCM 1.154.3Open verse →
सेन संग चतुरंग अपारा। अमित सुभट सब समर जुझारा।।
अर्थ · Hindi
सेन संग चतुरंग अपारा। अमित सुभट सब समर जुझारा।।
- RCM 1.154.4Open verse →
सेन बिलोकि राउ हरषाना। अरु बाजे गहगहे निसाना।।
अर्थ · Hindi
सेन बिलोकि राउ हरषाना। अरु बाजे गहगहे निसाना।।
- RCM 1.154.5Open verse →
बिजय हेतु कटकई बनाई। सुदिन साधि नृप चलेउ बजाई।।
अर्थ · Hindi
बिजय हेतु कटकई बनाई। सुदिन साधि नृप चलेउ बजाई।।
- RCM 1.154.6Open verse →
जँह तहँ परीं अनेक लराईं। जीते सकल भूप बरिआई।।
अर्थ · Hindi
जँह तहँ परीं अनेक लराईं। जीते सकल भूप बरिआई।।
- RCM 1.154.7Open verse →
सप्त दीप भुजबल बस कीन्हे। लै लै दंड छाड़ि नृप दीन्हें।।
अर्थ · Hindi
सप्त दीप भुजबल बस कीन्हे। लै लै दंड छाड़ि नृप दीन्हें।।
- RCM 1.154.8Open verse →
सकल अवनि मंडल तेहि काला। एक प्रतापभानु महिपाला।।
अर्थ · Hindi
सकल अवनि मंडल तेहि काला। एक प्रतापभानु महिपाला।।
- RCM 1.154.9Open verse →
स्वबस बिस्व करि बाहुबल निज पुर कीन्ह प्रबेसु।
अर्थ · Hindi
स्वबस बिस्व करि बाहुबल निज पुर कीन्ह प्रबेसु।
- RCM 1.154.10Open verse →
अरथ धरम कामादि सुख सेवइ समयँ नरेसु।।154।।
अर्थ · Hindi
अरथ धरम कामादि सुख सेवइ समयँ नरेसु।।154।।
- RCM 1.155.1Open verse →
भूप प्रतापभानु बल पाई। कामधेनु भै भूमि सुहाई।।
अर्थ · Hindi
भूप प्रतापभानु बल पाई। कामधेनु भै भूमि सुहाई।।
- RCM 1.155.2Open verse →
सब दुख बरजित प्रजा सुखारी। धरमसील सुंदर नर नारी।।
अर्थ · Hindi
सब दुख बरजित प्रजा सुखारी। धरमसील सुंदर नर नारी।।
- RCM 1.155.3Open verse →
सचिव धरमरुचि हरि पद प्रीती। नृप हित हेतु सिखव नित नीती।।
अर्थ · Hindi
सचिव धरमरुचि हरि पद प्रीती। नृप हित हेतु सिखव नित नीती।।
- RCM 1.155.4Open verse →
गुर सुर संत पितर महिदेवा। करइ सदा नृप सब कै सेवा।।
अर्थ · Hindi
गुर सुर संत पितर महिदेवा। करइ सदा नृप सब कै सेवा।।
- RCM 1.155.5Open verse →
भूप धरम जे बेद बखाने। सकल करइ सादर सुख माने।।
अर्थ · Hindi
भूप धरम जे बेद बखाने। सकल करइ सादर सुख माने।।
- RCM 1.155.6Open verse →
दिन प्रति देह बिबिध बिधि दाना। सुनहु सास्त्र बर बेद पुराना।।
अर्थ · Hindi
दिन प्रति देह बिबिध बिधि दाना। सुनहु सास्त्र बर बेद पुराना।।
- RCM 1.155.7Open verse →
नाना बापीं कूप तड़ागा। सुमन बाटिका सुंदर बागा।।
अर्थ · Hindi
नाना बापीं कूप तड़ागा। सुमन बाटिका सुंदर बागा।।
- RCM 1.155.8Open verse →
बिप्रभवन सुरभवन सुहाए। सब तीरथन्ह बिचित्र बनाए।।
अर्थ · Hindi
बिप्रभवन सुरभवन सुहाए। सब तीरथन्ह बिचित्र बनाए।।
- RCM 1.155.9Open verse →
जँह लगि कहे पुरान श्रुति एक एक सब जाग।
अर्थ · Hindi
जँह लगि कहे पुरान श्रुति एक एक सब जाग।
- RCM 1.155.10Open verse →
बार सहस्त्र सहस्त्र नृप किए सहित अनुराग।।155।।
अर्थ · Hindi
बार सहस्त्र सहस्त्र नृप किए सहित अनुराग।।155।।
- RCM 1.156.1Open verse →
हृदयँ न कछु फल अनुसंधाना। भूप बिबेकी परम सुजाना।।
अर्थ · Hindi
हृदयँ न कछु फल अनुसंधाना। भूप बिबेकी परम सुजाना।।
- RCM 1.156.2Open verse →
करइ जे धरम करम मन बानी। बासुदेव अर्पित नृप ग्यानी।।
अर्थ · Hindi
करइ जे धरम करम मन बानी। बासुदेव अर्पित नृप ग्यानी।।
- RCM 1.156.3Open verse →
चढ़ि बर बाजि बार एक राजा। मृगया कर सब साजि समाजा।।
अर्थ · Hindi
चढ़ि बर बाजि बार एक राजा। मृगया कर सब साजि समाजा।।
- RCM 1.156.4Open verse →
बिंध्याचल गभीर बन गयऊ। मृग पुनीत बहु मारत भयऊ।।
अर्थ · Hindi
बिंध्याचल गभीर बन गयऊ। मृग पुनीत बहु मारत भयऊ।।
- RCM 1.156.5Open verse →
फिरत बिपिन नृप दीख बराहू। जनु बन दुरेउ ससिहि ग्रसि राहू।।
अर्थ · Hindi
फिरत बिपिन नृप दीख बराहू। जनु बन दुरेउ ससिहि ग्रसि राहू।।
- RCM 1.156.6Open verse →
बड़ बिधु नहि समात मुख माहीं। मनहुँ क्रोधबस उगिलत नाहीं।।
अर्थ · Hindi
बड़ बिधु नहि समात मुख माहीं। मनहुँ क्रोधबस उगिलत नाहीं।।
- RCM 1.156.7Open verse →
कोल कराल दसन छबि गाई। तनु बिसाल पीवर अधिकाई।।
अर्थ · Hindi
कोल कराल दसन छबि गाई। तनु बिसाल पीवर अधिकाई।।
- RCM 1.156.8Open verse →
घुरुघुरात हय आरौ पाएँ। चकित बिलोकत कान उठाएँ।।
अर्थ · Hindi
घुरुघुरात हय आरौ पाएँ। चकित बिलोकत कान उठाएँ।।
- RCM 1.156.9Open verse →
नील महीधर सिखर सम देखि बिसाल बराहु।
अर्थ · Hindi
नील महीधर सिखर सम देखि बिसाल बराहु।
- RCM 1.156.10Open verse →
चपरि चलेउ हय सुटुकि नृप हाँकि न होइ निबाहु।।156।।
अर्थ · Hindi
चपरि चलेउ हय सुटुकि नृप हाँकि न होइ निबाहु।।156।।
- RCM 1.157.1Open verse →
आवत देखि अधिक रव बाजी। चलेउ बराह मरुत गति भाजी।।
अर्थ · Hindi
आवत देखि अधिक रव बाजी। चलेउ बराह मरुत गति भाजी।।
- RCM 1.157.2Open verse →
तुरत कीन्ह नृप सर संधाना। महि मिलि गयउ बिलोकत बाना।।
अर्थ · Hindi
तुरत कीन्ह नृप सर संधाना। महि मिलि गयउ बिलोकत बाना।।
- RCM 1.157.3Open verse →
तकि तकि तीर महीस चलावा। करि छल सुअर सरीर बचावा।।
अर्थ · Hindi
तकि तकि तीर महीस चलावा। करि छल सुअर सरीर बचावा।।
- RCM 1.157.4Open verse →
प्रगटत दुरत जाइ मृग भागा। रिस बस भूप चलेउ संग लागा।।
अर्थ · Hindi
प्रगटत दुरत जाइ मृग भागा। रिस बस भूप चलेउ संग लागा।।
- RCM 1.157.5Open verse →
गयउ दूरि घन गहन बराहू। जहँ नाहिन गज बाजि निबाहू।।
अर्थ · Hindi
गयउ दूरि घन गहन बराहू। जहँ नाहिन गज बाजि निबाहू।।
- RCM 1.157.6Open verse →
अति अकेल बन बिपुल कलेसू। तदपि न मृग मग तजइ नरेसू।।
अर्थ · Hindi
अति अकेल बन बिपुल कलेसू। तदपि न मृग मग तजइ नरेसू।।
- RCM 1.157.7Open verse →
कोल बिलोकि भूप बड़ धीरा। भागि पैठ गिरिगुहाँ गभीरा।।
अर्थ · Hindi
कोल बिलोकि भूप बड़ धीरा। भागि पैठ गिरिगुहाँ गभीरा।।
- RCM 1.157.8Open verse →
अगम देखि नृप अति पछिताई। फिरेउ महाबन परेउ भुलाई।।
अर्थ · Hindi
अगम देखि नृप अति पछिताई। फिरेउ महाबन परेउ भुलाई।।
- RCM 1.157.9Open verse →
खेद खिन्न छुद्धित तृषित राजा बाजि समेत।
अर्थ · Hindi
खेद खिन्न छुद्धित तृषित राजा बाजि समेत।
- RCM 1.157.10Open verse →
खोजत ब्याकुल सरित सर जल बिनु भयउ अचेत।।157।।
अर्थ · Hindi
खोजत ब्याकुल सरित सर जल बिनु भयउ अचेत।।157।।
- RCM 1.158.1Open verse →
फिरत बिपिन आश्रम एक देखा। तहँ बस नृपति कपट मुनिबेषा।।
अर्थ · Hindi
फिरत बिपिन आश्रम एक देखा। तहँ बस नृपति कपट मुनिबेषा।।
- RCM 1.158.2Open verse →
जासु देस नृप लीन्ह छड़ाई। समर सेन तजि गयउ पराई।।
अर्थ · Hindi
जासु देस नृप लीन्ह छड़ाई। समर सेन तजि गयउ पराई।।
- RCM 1.158.3Open verse →
समय प्रतापभानु कर जानी। आपन अति असमय अनुमानी।।
अर्थ · Hindi
समय प्रतापभानु कर जानी। आपन अति असमय अनुमानी।।
- RCM 1.158.4Open verse →
गयउ न गृह मन बहुत गलानी। मिला न राजहि नृप अभिमानी।।
अर्थ · Hindi
गयउ न गृह मन बहुत गलानी। मिला न राजहि नृप अभिमानी।।
- RCM 1.158.5Open verse →
रिस उर मारि रंक जिमि राजा। बिपिन बसइ तापस कें साजा।।
अर्थ · Hindi
रिस उर मारि रंक जिमि राजा। बिपिन बसइ तापस कें साजा।।
- RCM 1.158.6Open verse →
तासु समीप गवन नृप कीन्हा। यह प्रतापरबि तेहि तब चीन्हा।।
अर्थ · Hindi
तासु समीप गवन नृप कीन्हा। यह प्रतापरबि तेहि तब चीन्हा।।
- RCM 1.158.7Open verse →
राउ तृषित नहि सो पहिचाना। देखि सुबेष महामुनि जाना।।
अर्थ · Hindi
राउ तृषित नहि सो पहिचाना। देखि सुबेष महामुनि जाना।।
- RCM 1.158.8Open verse →
उतरि तुरग तें कीन्ह प्रनामा। परम चतुर न कहेउ निज नामा।।
अर्थ · Hindi
उतरि तुरग तें कीन्ह प्रनामा। परम चतुर न कहेउ निज नामा।।
- RCM 1.158.9Open verse →
भूपति तृषित बिलोकि तेहिं सरबरु दीन्ह देखाइ।
अर्थ · Hindi
भूपति तृषित बिलोकि तेहिं सरबरु दीन्ह देखाइ।
- RCM 1.158.10Open verse →
मज्जन पान समेत हय कीन्ह नृपति हरषाइ।।158।।
अर्थ · Hindi
मज्जन पान समेत हय कीन्ह नृपति हरषाइ।।158।।
- RCM 1.159.1Open verse →
गै श्रम सकल सुखी नृप भयऊ। निज आश्रम तापस लै गयऊ।।
अर्थ · Hindi
गै श्रम सकल सुखी नृप भयऊ। निज आश्रम तापस लै गयऊ।।
- RCM 1.159.2Open verse →
आसन दीन्ह अस्त रबि जानी। पुनि तापस बोलेउ मृदु बानी।।
अर्थ · Hindi
आसन दीन्ह अस्त रबि जानी। पुनि तापस बोलेउ मृदु बानी।।
- RCM 1.159.3Open verse →
को तुम्ह कस बन फिरहु अकेलें। सुंदर जुबा जीव परहेलें।।
अर्थ · Hindi
को तुम्ह कस बन फिरहु अकेलें। सुंदर जुबा जीव परहेलें।।
- RCM 1.159.4Open verse →
चक्रबर्ति के लच्छन तोरें। देखत दया लागि अति मोरें।।
अर्थ · Hindi
चक्रबर्ति के लच्छन तोरें। देखत दया लागि अति मोरें।।
- RCM 1.159.5Open verse →
नाम प्रतापभानु अवनीसा। तासु सचिव मैं सुनहु मुनीसा।।
अर्थ · Hindi
नाम प्रतापभानु अवनीसा। तासु सचिव मैं सुनहु मुनीसा।।
- RCM 1.159.6Open verse →
फिरत अहेरें परेउँ भुलाई। बडे भाग देखउँ पद आई।।
अर्थ · Hindi
फिरत अहेरें परेउँ भुलाई। बडे भाग देखउँ पद आई।।
- RCM 1.159.7Open verse →
हम कहँ दुर्लभ दरस तुम्हारा। जानत हौं कछु भल होनिहारा।।
अर्थ · Hindi
हम कहँ दुर्लभ दरस तुम्हारा। जानत हौं कछु भल होनिहारा।।
- RCM 1.159.8Open verse →
कह मुनि तात भयउ अँधियारा। जोजन सत्तरि नगरु तुम्हारा।।
अर्थ · Hindi
कह मुनि तात भयउ अँधियारा। जोजन सत्तरि नगरु तुम्हारा।।
- RCM 1.159.9Open verse →
निसा घोर गम्भीर बन पंथ न सुनहु सुजान।
अर्थ · Hindi
निसा घोर गम्भीर बन पंथ न सुनहु सुजान।
- RCM 1.159.10Open verse →
बसहु आजु अस जानि तुम्ह जाएहु होत बिहान।।159(क)।।
अर्थ · Hindi
बसहु आजु अस जानि तुम्ह जाएहु होत बिहान।।159(क)।।
- RCM 1.159.11Open verse →
तुलसी जसि भवतब्यता तैसी मिलइ सहाइ।
अर्थ · Hindi
तुलसी जसि भवतब्यता तैसी मिलइ सहाइ।
- RCM 1.159.12Open verse →
आपुनु आवइ ताहि पहिं ताहि तहाँ लै जाइ।।159(ख)।।
अर्थ · Hindi
आपुनु आवइ ताहि पहिं ताहि तहाँ लै जाइ।।159(ख)।।
- RCM 1.160.1Open verse →
भलेहिं नाथ आयसु धरि सीसा। बाँधि तुरग तरु बैठ महीसा।।
अर्थ · Hindi
भलेहिं नाथ आयसु धरि सीसा। बाँधि तुरग तरु बैठ महीसा।।
- RCM 1.160.2Open verse →
नृप बहु भाँती प्रसंसेउ ताही। चरन बंदी निज भाग्य सराही।।
अर्थ · Hindi
नृप बहु भाँती प्रसंसेउ ताही। चरन बंदी निज भाग्य सराही।।
- RCM 1.160.3Open verse →
पुनि बोले मृदु गिरा सुहाई। जानि पिता प्रभु करउँ ढिठाई।।
अर्थ · Hindi
पुनि बोले मृदु गिरा सुहाई। जानि पिता प्रभु करउँ ढिठाई।।
- RCM 1.160.4Open verse →
मोहि मुनीस सुत सेवक जानी। नाथ नाम निज कहहु बखानी।।
अर्थ · Hindi
मोहि मुनीस सुत सेवक जानी। नाथ नाम निज कहहु बखानी।।
- RCM 1.160.5Open verse →
तेहि न जान नृप नृपहि सो जाना। भूप सुह्रद सो कपट सयाना।।
अर्थ · Hindi
तेहि न जान नृप नृपहि सो जाना। भूप सुह्रद सो कपट सयाना।।
- RCM 1.160.6Open verse →
बैरी पुनि छत्री पुनि राजा। छल बल कीन्ह चहइ निज काजा।।
अर्थ · Hindi
बैरी पुनि छत्री पुनि राजा। छल बल कीन्ह चहइ निज काजा।।
- RCM 1.160.7Open verse →
समुझि राजसुख दुखित अराती। अवाँ अनल इव सुलगइ छाती।।
अर्थ · Hindi
समुझि राजसुख दुखित अराती। अवाँ अनल इव सुलगइ छाती।।
- RCM 1.160.8Open verse →
सरल बचन नृप के सुनि काना। बयर सँभारि हृदयँ हरषाना।।
अर्थ · Hindi
सरल बचन नृप के सुनि काना। बयर सँभारि हृदयँ हरषाना।।
- RCM 1.160.9Open verse →
कपट बोरि बानी मृदुल बोलेउ जुगुति समेत।
अर्थ · Hindi
कपट बोरि बानी मृदुल बोलेउ जुगुति समेत।
- RCM 1.160.10Open verse →
नाम हमार भिखारि अब निर्धन रहित निकेति।।160।।
अर्थ · Hindi
नाम हमार भिखारि अब निर्धन रहित निकेति।।160।।
- RCM 1.161.1Open verse →
कह नृप जे बिग्यान निधाना। तुम्ह सारिखे गलित अभिमाना।।
अर्थ · Hindi
कह नृप जे बिग्यान निधाना। तुम्ह सारिखे गलित अभिमाना।।
- RCM 1.161.2Open verse →
सदा रहहि अपनपौ दुराएँ। सब बिधि कुसल कुबेष बनाएँ।।
अर्थ · Hindi
सदा रहहि अपनपौ दुराएँ। सब बिधि कुसल कुबेष बनाएँ।।
- RCM 1.161.3Open verse →
तेहि तें कहहि संत श्रुति टेरें। परम अकिंचन प्रिय हरि केरें।।
अर्थ · Hindi
तेहि तें कहहि संत श्रुति टेरें। परम अकिंचन प्रिय हरि केरें।।
- RCM 1.161.4Open verse →
तुम्ह सम अधन भिखारि अगेहा। होत बिरंचि सिवहि संदेहा।।
अर्थ · Hindi
तुम्ह सम अधन भिखारि अगेहा। होत बिरंचि सिवहि संदेहा।।
- RCM 1.161.5Open verse →
जोसि सोसि तव चरन नमामी। मो पर कृपा करिअ अब स्वामी।।
अर्थ · Hindi
जोसि सोसि तव चरन नमामी। मो पर कृपा करिअ अब स्वामी।।
- RCM 1.161.6Open verse →
सहज प्रीति भूपति कै देखी। आपु बिषय बिस्वास बिसेषी।।
अर्थ · Hindi
सहज प्रीति भूपति कै देखी। आपु बिषय बिस्वास बिसेषी।।
- RCM 1.161.7Open verse →
सब प्रकार राजहि अपनाई। बोलेउ अधिक सनेह जनाई।।
अर्थ · Hindi
सब प्रकार राजहि अपनाई। बोलेउ अधिक सनेह जनाई।।
- RCM 1.161.8Open verse →
सुनु सतिभाउ कहउँ महिपाला। इहाँ बसत बीते बहु काला।।
अर्थ · Hindi
सुनु सतिभाउ कहउँ महिपाला। इहाँ बसत बीते बहु काला।।
- RCM 1.161.9Open verse →
अब लगि मोहि न मिलेउ कोउ मैं न जनावउँ काहु।
अर्थ · Hindi
अब लगि मोहि न मिलेउ कोउ मैं न जनावउँ काहु।
- RCM 1.161.10Open verse →
लोकमान्यता अनल सम कर तप कानन दाहु।।161(क)।।
अर्थ · Hindi
लोकमान्यता अनल सम कर तप कानन दाहु।।161(क)।।
- RCM 1.161.11Open verse →
तुलसी देखि सुबेषु भूलहिं मूढ़ न चतुर नर।
अर्थ · Hindi
तुलसी देखि सुबेषु भूलहिं मूढ़ न चतुर नर।
- RCM 1.161.12Open verse →
सुंदर केकिहि पेखु बचन सुधा सम असन अहि।।161(ख)।।
अर्थ · Hindi
सुंदर केकिहि पेखु बचन सुधा सम असन अहि।।161(ख)।।
- RCM 1.162.1Open verse →
तातें गुपुत रहउँ जग माहीं। हरि तजि किमपि प्रयोजन नाहीं।।
अर्थ · Hindi
तातें गुपुत रहउँ जग माहीं। हरि तजि किमपि प्रयोजन नाहीं।।
- RCM 1.162.2Open verse →
प्रभु जानत सब बिनहिं जनाएँ। कहहु कवनि सिधि लोक रिझाएँ।।
अर्थ · Hindi
प्रभु जानत सब बिनहिं जनाएँ। कहहु कवनि सिधि लोक रिझाएँ।।
- RCM 1.162.3Open verse →
तुम्ह सुचि सुमति परम प्रिय मोरें। प्रीति प्रतीति मोहि पर तोरें।।
अर्थ · Hindi
तुम्ह सुचि सुमति परम प्रिय मोरें। प्रीति प्रतीति मोहि पर तोरें।।
- RCM 1.162.4Open verse →
अब जौं तात दुरावउँ तोही। दारुन दोष घटइ अति मोही।।
अर्थ · Hindi
अब जौं तात दुरावउँ तोही। दारुन दोष घटइ अति मोही।।
- RCM 1.162.5Open verse →
जिमि जिमि तापसु कथइ उदासा। तिमि तिमि नृपहि उपज बिस्वासा।।
अर्थ · Hindi
जिमि जिमि तापसु कथइ उदासा। तिमि तिमि नृपहि उपज बिस्वासा।।
- RCM 1.162.6Open verse →
देखा स्वबस कर्म मन बानी। तब बोला तापस बगध्यानी।।
अर्थ · Hindi
देखा स्वबस कर्म मन बानी। तब बोला तापस बगध्यानी।।
- RCM 1.162.7Open verse →
नाम हमार एकतनु भाई। सुनि नृप बोले पुनि सिरु नाई।।
अर्थ · Hindi
नाम हमार एकतनु भाई। सुनि नृप बोले पुनि सिरु नाई।।
- RCM 1.162.8Open verse →
कहहु नाम कर अरथ बखानी। मोहि सेवक अति आपन जानी।।
अर्थ · Hindi
कहहु नाम कर अरथ बखानी। मोहि सेवक अति आपन जानी।।
- RCM 1.162.9Open verse →
आदिसृष्टि उपजी जबहिं तब उतपति भै मोरि।
अर्थ · Hindi
आदिसृष्टि उपजी जबहिं तब उतपति भै मोरि।
- RCM 1.162.10Open verse →
नाम एकतनु हेतु तेहि देह न धरी बहोरि।।162।।
अर्थ · Hindi
नाम एकतनु हेतु तेहि देह न धरी बहोरि।।162।।
- RCM 1.163.1Open verse →
जनि आचरुज करहु मन माहीं। सुत तप तें दुर्लभ कछु नाहीं।।
अर्थ · Hindi
जनि आचरुज करहु मन माहीं। सुत तप तें दुर्लभ कछु नाहीं।।
- RCM 1.163.2Open verse →
तपबल तें जग सृजइ बिधाता। तपबल बिष्नु भए परित्राता।।
अर्थ · Hindi
तपबल तें जग सृजइ बिधाता। तपबल बिष्नु भए परित्राता।।
- RCM 1.163.3Open verse →
तपबल संभु करहिं संघारा। तप तें अगम न कछु संसारा।।
अर्थ · Hindi
तपबल संभु करहिं संघारा। तप तें अगम न कछु संसारा।।
- RCM 1.163.4Open verse →
भयउ नृपहि सुनि अति अनुरागा। कथा पुरातन कहै सो लागा।।
अर्थ · Hindi
भयउ नृपहि सुनि अति अनुरागा। कथा पुरातन कहै सो लागा।।
- RCM 1.163.5Open verse →
करम धरम इतिहास अनेका। करइ निरूपन बिरति बिबेका।।
अर्थ · Hindi
करम धरम इतिहास अनेका। करइ निरूपन बिरति बिबेका।।
- RCM 1.163.6Open verse →
उदभव पालन प्रलय कहानी। कहेसि अमित आचरज बखानी।।
अर्थ · Hindi
उदभव पालन प्रलय कहानी। कहेसि अमित आचरज बखानी।।
- RCM 1.163.7Open verse →
सुनि महिप तापस बस भयऊ। आपन नाम कहत तब लयऊ।।
अर्थ · Hindi
सुनि महिप तापस बस भयऊ। आपन नाम कहत तब लयऊ।।
- RCM 1.163.8Open verse →
कह तापस नृप जानउँ तोही। कीन्हेहु कपट लाग भल मोही।।
अर्थ · Hindi
कह तापस नृप जानउँ तोही। कीन्हेहु कपट लाग भल मोही।।
- RCM 1.163.9Open verse →
सुनु महीस असि नीति जहँ तहँ नाम न कहहिं नृप।
अर्थ · Hindi
सुनु महीस असि नीति जहँ तहँ नाम न कहहिं नृप।
- RCM 1.163.10Open verse →
मोहि तोहि पर अति प्रीति सोइ चतुरता बिचारि तव।।163।।
अर्थ · Hindi
मोहि तोहि पर अति प्रीति सोइ चतुरता बिचारि तव।।163।।
- RCM 1.164.1Open verse →
नाम तुम्हार प्रताप दिनेसा। सत्यकेतु तव पिता नरेसा।।
अर्थ · Hindi
नाम तुम्हार प्रताप दिनेसा। सत्यकेतु तव पिता नरेसा।।
- RCM 1.164.2Open verse →
गुर प्रसाद सब जानिअ राजा। कहिअ न आपन जानि अकाजा।।
अर्थ · Hindi
गुर प्रसाद सब जानिअ राजा। कहिअ न आपन जानि अकाजा।।
- RCM 1.164.3Open verse →
देखि तात तव सहज सुधाई। प्रीति प्रतीति नीति निपुनाई।।
अर्थ · Hindi
देखि तात तव सहज सुधाई। प्रीति प्रतीति नीति निपुनाई।।
- RCM 1.164.4Open verse →
उपजि परि ममता मन मोरें। कहउँ कथा निज पूछे तोरें।।
अर्थ · Hindi
उपजि परि ममता मन मोरें। कहउँ कथा निज पूछे तोरें।।
- RCM 1.164.5Open verse →
अब प्रसन्न मैं संसय नाहीं। मागु जो भूप भाव मन माहीं।।
अर्थ · Hindi
अब प्रसन्न मैं संसय नाहीं। मागु जो भूप भाव मन माहीं।।
- RCM 1.164.6Open verse →
सुनि सुबचन भूपति हरषाना। गहि पद बिनय कीन्हि बिधि नाना।।
अर्थ · Hindi
सुनि सुबचन भूपति हरषाना। गहि पद बिनय कीन्हि बिधि नाना।।
- RCM 1.164.7Open verse →
कृपासिंधु मुनि दरसन तोरें। चारि पदारथ करतल मोरें।।
अर्थ · Hindi
कृपासिंधु मुनि दरसन तोरें। चारि पदारथ करतल मोरें।।
- RCM 1.164.8Open verse →
प्रभुहि तथापि प्रसन्न बिलोकी। मागि अगम बर होउँ असोकी।।
अर्थ · Hindi
प्रभुहि तथापि प्रसन्न बिलोकी। मागि अगम बर होउँ असोकी।।
- RCM 1.164.9Open verse →
जरा मरन दुख रहित तनु समर जितै जनि कोउ।
अर्थ · Hindi
जरा मरन दुख रहित तनु समर जितै जनि कोउ।
- RCM 1.164.10Open verse →
एकछत्र रिपुहीन महि राज कलप सत होउ।।164।।
अर्थ · Hindi
एकछत्र रिपुहीन महि राज कलप सत होउ।।164।।
- RCM 1.165.1Open verse →
कह तापस नृप ऐसेइ होऊ। कारन एक कठिन सुनु सोऊ।।
अर्थ · Hindi
कह तापस नृप ऐसेइ होऊ। कारन एक कठिन सुनु सोऊ।।
- RCM 1.165.2Open verse →
कालउ तुअ पद नाइहि सीसा। एक बिप्रकुल छाड़ि महीसा।।
अर्थ · Hindi
कालउ तुअ पद नाइहि सीसा। एक बिप्रकुल छाड़ि महीसा।।
- RCM 1.165.3Open verse →
तपबल बिप्र सदा बरिआरा। तिन्ह के कोप न कोउ रखवारा।।
अर्थ · Hindi
तपबल बिप्र सदा बरिआरा। तिन्ह के कोप न कोउ रखवारा।।
- RCM 1.165.4Open verse →
जौं बिप्रन्ह सब करहु नरेसा। तौ तुअ बस बिधि बिष्नु महेसा।।
अर्थ · Hindi
जौं बिप्रन्ह सब करहु नरेसा। तौ तुअ बस बिधि बिष्नु महेसा।।
- RCM 1.165.5Open verse →
चल न ब्रह्मकुल सन बरिआई। सत्य कहउँ दोउ भुजा उठाई।।
अर्थ · Hindi
चल न ब्रह्मकुल सन बरिआई। सत्य कहउँ दोउ भुजा उठाई।।
- RCM 1.165.6Open verse →
बिप्र श्राप बिनु सुनु महिपाला। तोर नास नहि कवनेहुँ काला।।
अर्थ · Hindi
बिप्र श्राप बिनु सुनु महिपाला। तोर नास नहि कवनेहुँ काला।।
- RCM 1.165.7Open verse →
हरषेउ राउ बचन सुनि तासू। नाथ न होइ मोर अब नासू।।
अर्थ · Hindi
हरषेउ राउ बचन सुनि तासू। नाथ न होइ मोर अब नासू।।
- RCM 1.165.8Open verse →
तव प्रसाद प्रभु कृपानिधाना। मो कहुँ सर्ब काल कल्याना।।
अर्थ · Hindi
तव प्रसाद प्रभु कृपानिधाना। मो कहुँ सर्ब काल कल्याना।।
- RCM 1.165.9Open verse →
एवमस्तु कहि कपटमुनि बोला कुटिल बहोरि।
अर्थ · Hindi
एवमस्तु कहि कपटमुनि बोला कुटिल बहोरि।
- RCM 1.165.10Open verse →
मिलब हमार भुलाब निज कहहु त हमहि न खोरि।।165।।
अर्थ · Hindi
मिलब हमार भुलाब निज कहहु त हमहि न खोरि।।165।।
- RCM 1.166.1Open verse →
तातें मै तोहि बरजउँ राजा। कहें कथा तव परम अकाजा।।
अर्थ · Hindi
तातें मै तोहि बरजउँ राजा। कहें कथा तव परम अकाजा।।
- RCM 1.166.2Open verse →
छठें श्रवन यह परत कहानी। नास तुम्हार सत्य मम बानी।।
अर्थ · Hindi
छठें श्रवन यह परत कहानी। नास तुम्हार सत्य मम बानी।।
- RCM 1.166.3Open verse →
यह प्रगटें अथवा द्विजश्रापा। नास तोर सुनु भानुप्रतापा।।
अर्थ · Hindi
यह प्रगटें अथवा द्विजश्रापा। नास तोर सुनु भानुप्रतापा।।
- RCM 1.166.4Open verse →
आन उपायँ निधन तव नाहीं। जौं हरि हर कोपहिं मन माहीं।।
अर्थ · Hindi
आन उपायँ निधन तव नाहीं। जौं हरि हर कोपहिं मन माहीं।।
- RCM 1.166.5Open verse →
सत्य नाथ पद गहि नृप भाषा। द्विज गुर कोप कहहु को राखा।।
अर्थ · Hindi
सत्य नाथ पद गहि नृप भाषा। द्विज गुर कोप कहहु को राखा।।
- RCM 1.166.6Open verse →
राखइ गुर जौं कोप बिधाता। गुर बिरोध नहिं कोउ जग त्राता।।
अर्थ · Hindi
राखइ गुर जौं कोप बिधाता। गुर बिरोध नहिं कोउ जग त्राता।।
- RCM 1.166.7Open verse →
जौं न चलब हम कहे तुम्हारें। होउ नास नहिं सोच हमारें।।
अर्थ · Hindi
जौं न चलब हम कहे तुम्हारें। होउ नास नहिं सोच हमारें।।
- RCM 1.166.8Open verse →
एकहिं डर डरपत मन मोरा। प्रभु महिदेव श्राप अति घोरा।।
अर्थ · Hindi
एकहिं डर डरपत मन मोरा। प्रभु महिदेव श्राप अति घोरा।।
- RCM 1.166.9Open verse →
होहिं बिप्र बस कवन बिधि कहहु कृपा करि सोउ।
अर्थ · Hindi
होहिं बिप्र बस कवन बिधि कहहु कृपा करि सोउ।
- RCM 1.166.10Open verse →
तुम्ह तजि दीनदयाल निज हितू न देखउँ कोउँ।।166।।
अर्थ · Hindi
तुम्ह तजि दीनदयाल निज हितू न देखउँ कोउँ।।166।।
- RCM 1.167.1Open verse →
सुनु नृप बिबिध जतन जग माहीं। कष्टसाध्य पुनि होहिं कि नाहीं।।
अर्थ · Hindi
सुनु नृप बिबिध जतन जग माहीं। कष्टसाध्य पुनि होहिं कि नाहीं।।
- RCM 1.167.2Open verse →
अहइ एक अति सुगम उपाई। तहाँ परंतु एक कठिनाई।।
अर्थ · Hindi
अहइ एक अति सुगम उपाई। तहाँ परंतु एक कठिनाई।।
- RCM 1.167.3Open verse →
मम आधीन जुगुति नृप सोई। मोर जाब तव नगर न होई।।
अर्थ · Hindi
मम आधीन जुगुति नृप सोई। मोर जाब तव नगर न होई।।
- RCM 1.167.4Open verse →
आजु लगें अरु जब तें भयऊँ। काहू के गृह ग्राम न गयऊँ।।
अर्थ · Hindi
आजु लगें अरु जब तें भयऊँ। काहू के गृह ग्राम न गयऊँ।।
- RCM 1.167.5Open verse →
जौं न जाउँ तव होइ अकाजू। बना आइ असमंजस आजू।।
अर्थ · Hindi
जौं न जाउँ तव होइ अकाजू। बना आइ असमंजस आजू।।
- RCM 1.167.6Open verse →
सुनि महीस बोलेउ मृदु बानी। नाथ निगम असि नीति बखानी।।
अर्थ · Hindi
सुनि महीस बोलेउ मृदु बानी। नाथ निगम असि नीति बखानी।।
- RCM 1.167.7Open verse →
बड़े सनेह लघुन्ह पर करहीं। गिरि निज सिरनि सदा तृन धरहीं।।
अर्थ · Hindi
बड़े सनेह लघुन्ह पर करहीं। गिरि निज सिरनि सदा तृन धरहीं।।
- RCM 1.167.8Open verse →
जलधि अगाध मौलि बह फेनू। संतत धरनि धरत सिर रेनू।।
अर्थ · Hindi
जलधि अगाध मौलि बह फेनू। संतत धरनि धरत सिर रेनू।।
- RCM 1.167.9Open verse →
अस कहि गहे नरेस पद स्वामी होहु कृपाल।
अर्थ · Hindi
अस कहि गहे नरेस पद स्वामी होहु कृपाल।
- RCM 1.167.10Open verse →
मोहि लागि दुख सहिअ प्रभु सज्जन दीनदयाल।।167।।
अर्थ · Hindi
मोहि लागि दुख सहिअ प्रभु सज्जन दीनदयाल।।167।।
- RCM 1.168.1Open verse →
जानि नृपहि आपन आधीना। बोला तापस कपट प्रबीना।।
अर्थ · Hindi
जानि नृपहि आपन आधीना। बोला तापस कपट प्रबीना।।
- RCM 1.168.2Open verse →
सत्य कहउँ भूपति सुनु तोही। जग नाहिन दुर्लभ कछु मोही।।
अर्थ · Hindi
सत्य कहउँ भूपति सुनु तोही। जग नाहिन दुर्लभ कछु मोही।।
- RCM 1.168.3Open verse →
अवसि काज मैं करिहउँ तोरा। मन तन बचन भगत तैं मोरा।।
अर्थ · Hindi
अवसि काज मैं करिहउँ तोरा। मन तन बचन भगत तैं मोरा।।
- RCM 1.168.4Open verse →
जोग जुगुति तप मंत्र प्रभाऊ। फलइ तबहिं जब करिअ दुराऊ।।
अर्थ · Hindi
जोग जुगुति तप मंत्र प्रभाऊ। फलइ तबहिं जब करिअ दुराऊ।।
- RCM 1.168.5Open verse →
जौं नरेस मैं करौं रसोई। तुम्ह परुसहु मोहि जान न कोई।।
अर्थ · Hindi
जौं नरेस मैं करौं रसोई। तुम्ह परुसहु मोहि जान न कोई।।
- RCM 1.168.6Open verse →
अन्न सो जोइ जोइ भोजन करई। सोइ सोइ तव आयसु अनुसरई।।
अर्थ · Hindi
अन्न सो जोइ जोइ भोजन करई। सोइ सोइ तव आयसु अनुसरई।।
- RCM 1.168.7Open verse →
पुनि तिन्ह के गृह जेवँइ जोऊ। तव बस होइ भूप सुनु सोऊ।।
अर्थ · Hindi
पुनि तिन्ह के गृह जेवँइ जोऊ। तव बस होइ भूप सुनु सोऊ।।
- RCM 1.168.8Open verse →
जाइ उपाय रचहु नृप एहू। संबत भरि संकलप करेहू।।
अर्थ · Hindi
जाइ उपाय रचहु नृप एहू। संबत भरि संकलप करेहू।।
- RCM 1.168.9Open verse →
नित नूतन द्विज सहस सत बरेहु सहित परिवार।
अर्थ · Hindi
नित नूतन द्विज सहस सत बरेहु सहित परिवार।
- RCM 1.168.10Open verse →
मैं तुम्हरे संकलप लगि दिनहिंकरिब जेवनार।।168।।
अर्थ · Hindi
मैं तुम्हरे संकलप लगि दिनहिंकरिब जेवनार।।168।।
- RCM 1.169.1Open verse →
एहि बिधि भूप कष्ट अति थोरें। होइहहिं सकल बिप्र बस तोरें।।
अर्थ · Hindi
एहि बिधि भूप कष्ट अति थोरें। होइहहिं सकल बिप्र बस तोरें।।
- RCM 1.169.2Open verse →
करिहहिं बिप्र होम मख सेवा। तेहिं प्रसंग सहजेहिं बस देवा।।
अर्थ · Hindi
करिहहिं बिप्र होम मख सेवा। तेहिं प्रसंग सहजेहिं बस देवा।।
- RCM 1.169.3Open verse →
और एक तोहि कहऊँ लखाऊ। मैं एहि बेष न आउब काऊ।।
अर्थ · Hindi
और एक तोहि कहऊँ लखाऊ। मैं एहि बेष न आउब काऊ।।
- RCM 1.169.4Open verse →
तुम्हरे उपरोहित कहुँ राया। हरि आनब मैं करि निज माया।।
अर्थ · Hindi
तुम्हरे उपरोहित कहुँ राया। हरि आनब मैं करि निज माया।।
- RCM 1.169.5Open verse →
तपबल तेहि करि आपु समाना। रखिहउँ इहाँ बरष परवाना।।
अर्थ · Hindi
तपबल तेहि करि आपु समाना। रखिहउँ इहाँ बरष परवाना।।
- RCM 1.169.6Open verse →
मैं धरि तासु बेषु सुनु राजा। सब बिधि तोर सँवारब काजा।।
अर्थ · Hindi
मैं धरि तासु बेषु सुनु राजा। सब बिधि तोर सँवारब काजा।।
- RCM 1.169.7Open verse →
गै निसि बहुत सयन अब कीजे। मोहि तोहि भूप भेंट दिन तीजे।।
अर्थ · Hindi
गै निसि बहुत सयन अब कीजे। मोहि तोहि भूप भेंट दिन तीजे।।
- RCM 1.169.8Open verse →
मैं तपबल तोहि तुरग समेता। पहुँचेहउँ सोवतहि निकेता।।
अर्थ · Hindi
मैं तपबल तोहि तुरग समेता। पहुँचेहउँ सोवतहि निकेता।।
- RCM 1.169.9Open verse →
मैं आउब सोइ बेषु धरि पहिचानेहु तब मोहि।
अर्थ · Hindi
मैं आउब सोइ बेषु धरि पहिचानेहु तब मोहि।
- RCM 1.169.10Open verse →
जब एकांत बोलाइ सब कथा सुनावौं तोहि।।169।।
अर्थ · Hindi
जब एकांत बोलाइ सब कथा सुनावौं तोहि।।169।।
- RCM 1.170.1Open verse →
सयन कीन्ह नृप आयसु मानी। आसन जाइ बैठ छलग्यानी।।
अर्थ · Hindi
सयन कीन्ह नृप आयसु मानी। आसन जाइ बैठ छलग्यानी।।
- RCM 1.170.2Open verse →
श्रमित भूप निद्रा अति आई। सो किमि सोव सोच अधिकाई।।
अर्थ · Hindi
श्रमित भूप निद्रा अति आई। सो किमि सोव सोच अधिकाई।।
- RCM 1.170.3Open verse →
कालकेतु निसिचर तहँ आवा। जेहिं सूकर होइ नृपहि भुलावा।।
अर्थ · Hindi
कालकेतु निसिचर तहँ आवा। जेहिं सूकर होइ नृपहि भुलावा।।
- RCM 1.170.4Open verse →
परम मित्र तापस नृप केरा। जानइ सो अति कपट घनेरा।।
अर्थ · Hindi
परम मित्र तापस नृप केरा। जानइ सो अति कपट घनेरा।।
- RCM 1.170.5Open verse →
तेहि के सत सुत अरु दस भाई। खल अति अजय देव दुखदाई।।
अर्थ · Hindi
तेहि के सत सुत अरु दस भाई। खल अति अजय देव दुखदाई।।
- RCM 1.170.6Open verse →
प्रथमहि भूप समर सब मारे। बिप्र संत सुर देखि दुखारे।।
अर्थ · Hindi
प्रथमहि भूप समर सब मारे। बिप्र संत सुर देखि दुखारे।।
- RCM 1.170.7Open verse →
तेहिं खल पाछिल बयरु सँभरा। तापस नृप मिलि मंत्र बिचारा।।
अर्थ · Hindi
तेहिं खल पाछिल बयरु सँभरा। तापस नृप मिलि मंत्र बिचारा।।
- RCM 1.170.8Open verse →
जेहि रिपु छय सोइ रचेन्हि उपाऊ। भावी बस न जान कछु राऊ।।
अर्थ · Hindi
जेहि रिपु छय सोइ रचेन्हि उपाऊ। भावी बस न जान कछु राऊ।।
- RCM 1.170.9Open verse →
रिपु तेजसी अकेल अपि लघु करि गनिअ न ताहु।
अर्थ · Hindi
रिपु तेजसी अकेल अपि लघु करि गनिअ न ताहु।
- RCM 1.170.10Open verse →
अजहुँ देत दुख रबि ससिहि सिर अवसेषित राहु।।170।।
अर्थ · Hindi
अजहुँ देत दुख रबि ससिहि सिर अवसेषित राहु।।170।।
- RCM 1.171.1Open verse →
तापस नृप निज सखहि निहारी। हरषि मिलेउ उठि भयउ सुखारी।।
अर्थ · Hindi
तापस नृप निज सखहि निहारी। हरषि मिलेउ उठि भयउ सुखारी।।
- RCM 1.171.2Open verse →
मित्रहि कहि सब कथा सुनाई। जातुधान बोला सुख पाई।।
अर्थ · Hindi
मित्रहि कहि सब कथा सुनाई। जातुधान बोला सुख पाई।।
- RCM 1.171.3Open verse →
अब साधेउँ रिपु सुनहु नरेसा। जौं तुम्ह कीन्ह मोर उपदेसा।।
अर्थ · Hindi
अब साधेउँ रिपु सुनहु नरेसा। जौं तुम्ह कीन्ह मोर उपदेसा।।
- RCM 1.171.4Open verse →
परिहरि सोच रहहु तुम्ह सोई। बिनु औषध बिआधि बिधि खोई।।
अर्थ · Hindi
परिहरि सोच रहहु तुम्ह सोई। बिनु औषध बिआधि बिधि खोई।।
- RCM 1.171.5Open verse →
कुल समेत रिपु मूल बहाई। चौथे दिवस मिलब मैं आई।।
अर्थ · Hindi
कुल समेत रिपु मूल बहाई। चौथे दिवस मिलब मैं आई।।
- RCM 1.171.6Open verse →
तापस नृपहि बहुत परितोषी। चला महाकपटी अतिरोषी।।
अर्थ · Hindi
तापस नृपहि बहुत परितोषी। चला महाकपटी अतिरोषी।।
- RCM 1.171.7Open verse →
भानुप्रतापहि बाजि समेता। पहुँचाएसि छन माझ निकेता।।
अर्थ · Hindi
भानुप्रतापहि बाजि समेता। पहुँचाएसि छन माझ निकेता।।
- RCM 1.171.8Open verse →
नृपहि नारि पहिं सयन कराई। हयगृहँ बाँधेसि बाजि बनाई।।
अर्थ · Hindi
नृपहि नारि पहिं सयन कराई। हयगृहँ बाँधेसि बाजि बनाई।।
- RCM 1.171.9Open verse →
राजा के उपरोहितहि हरि लै गयउ बहोरि।
अर्थ · Hindi
राजा के उपरोहितहि हरि लै गयउ बहोरि।
- RCM 1.171.10Open verse →
लै राखेसि गिरि खोह महुँ मायाँ करि मति भोरि।।171।।
अर्थ · Hindi
लै राखेसि गिरि खोह महुँ मायाँ करि मति भोरि।।171।।
- RCM 1.172.1Open verse →
आपु बिरचि उपरोहित रूपा। परेउ जाइ तेहि सेज अनूपा।।
अर्थ · Hindi
आपु बिरचि उपरोहित रूपा। परेउ जाइ तेहि सेज अनूपा।।
- RCM 1.172.2Open verse →
जागेउ नृप अनभएँ बिहाना। देखि भवन अति अचरजु माना।।
अर्थ · Hindi
जागेउ नृप अनभएँ बिहाना। देखि भवन अति अचरजु माना।।
- RCM 1.172.3Open verse →
मुनि महिमा मन महुँ अनुमानी। उठेउ गवँहि जेहि जान न रानी।।
अर्थ · Hindi
मुनि महिमा मन महुँ अनुमानी। उठेउ गवँहि जेहि जान न रानी।।
- RCM 1.172.4Open verse →
कानन गयउ बाजि चढ़ि तेहीं। पुर नर नारि न जानेउ केहीं।।
अर्थ · Hindi
कानन गयउ बाजि चढ़ि तेहीं। पुर नर नारि न जानेउ केहीं।।
- RCM 1.172.5Open verse →
गएँ जाम जुग भूपति आवा। घर घर उत्सव बाज बधावा।।
अर्थ · Hindi
गएँ जाम जुग भूपति आवा। घर घर उत्सव बाज बधावा।।
- RCM 1.172.6Open verse →
उपरोहितहि देख जब राजा। चकित बिलोकि सुमिरि सोइ काजा।।
अर्थ · Hindi
उपरोहितहि देख जब राजा। चकित बिलोकि सुमिरि सोइ काजा।।
- RCM 1.172.7Open verse →
जुग सम नृपहि गए दिन तीनी। कपटी मुनि पद रह मति लीनी।।
अर्थ · Hindi
जुग सम नृपहि गए दिन तीनी। कपटी मुनि पद रह मति लीनी।।
- RCM 1.172.8Open verse →
समय जानि उपरोहित आवा। नृपहि मते सब कहि समुझावा।।
अर्थ · Hindi
समय जानि उपरोहित आवा। नृपहि मते सब कहि समुझावा।।
- RCM 1.172.9Open verse →
नृप हरषेउ पहिचानि गुरु भ्रम बस रहा न चेत।
अर्थ · Hindi
नृप हरषेउ पहिचानि गुरु भ्रम बस रहा न चेत।
- RCM 1.172.10Open verse →
बरे तुरत सत सहस बर बिप्र कुटुंब समेत।।172।।
अर्थ · Hindi
बरे तुरत सत सहस बर बिप्र कुटुंब समेत।।172।।
- RCM 1.173.1Open verse →
उपरोहित जेवनार बनाई। छरस चारि बिधि जसि श्रुति गाई।।
अर्थ · Hindi
उपरोहित जेवनार बनाई। छरस चारि बिधि जसि श्रुति गाई।।
- RCM 1.173.2Open verse →
मायामय तेहिं कीन्ह रसोई। बिंजन बहु गनि सकइ न कोई।।
अर्थ · Hindi
मायामय तेहिं कीन्ह रसोई। बिंजन बहु गनि सकइ न कोई।।
- RCM 1.173.3Open verse →
बिबिध मृगन्ह कर आमिष राँधा। तेहि महुँ बिप्र माँसु खल साँधा।।
अर्थ · Hindi
बिबिध मृगन्ह कर आमिष राँधा। तेहि महुँ बिप्र माँसु खल साँधा।।
- RCM 1.173.4Open verse →
भोजन कहुँ सब बिप्र बोलाए। पद पखारि सादर बैठाए।।
अर्थ · Hindi
भोजन कहुँ सब बिप्र बोलाए। पद पखारि सादर बैठाए।।
- RCM 1.173.5Open verse →
परुसन जबहिं लाग महिपाला। भै अकासबानी तेहि काला।।
अर्थ · Hindi
परुसन जबहिं लाग महिपाला। भै अकासबानी तेहि काला।।
- RCM 1.173.6Open verse →
बिप्रबृंद उठि उठि गृह जाहू। है बड़ि हानि अन्न जनि खाहू।।
अर्थ · Hindi
बिप्रबृंद उठि उठि गृह जाहू। है बड़ि हानि अन्न जनि खाहू।।
- RCM 1.173.7Open verse →
भयउ रसोईं भूसुर माँसू। सब द्विज उठे मानि बिस्वासू।।
अर्थ · Hindi
भयउ रसोईं भूसुर माँसू। सब द्विज उठे मानि बिस्वासू।।
- RCM 1.173.8Open verse →
भूप बिकल मति मोहँ भुलानी। भावी बस आव मुख बानी।।
अर्थ · Hindi
भूप बिकल मति मोहँ भुलानी। भावी बस आव मुख बानी।।
- RCM 1.173.9Open verse →
बोले बिप्र सकोप तब नहिं कछु कीन्ह बिचार।
अर्थ · Hindi
बोले बिप्र सकोप तब नहिं कछु कीन्ह बिचार।
- RCM 1.173.10Open verse →
जाइ निसाचर होहु नृप मूढ़ सहित परिवार।।173।।
अर्थ · Hindi
जाइ निसाचर होहु नृप मूढ़ सहित परिवार।।173।।
- RCM 1.174.1Open verse →
छत्रबंधु तैं बिप्र बोलाई। घालै लिए सहित समुदाई।।
अर्थ · Hindi
छत्रबंधु तैं बिप्र बोलाई। घालै लिए सहित समुदाई।।
- RCM 1.174.2Open verse →
ईस्वर राखा धरम हमारा। जैहसि तैं समेत परिवारा।।
अर्थ · Hindi
ईस्वर राखा धरम हमारा। जैहसि तैं समेत परिवारा।।
- RCM 1.174.3Open verse →
संबत मध्य नास तव होऊ। जलदाता न रहिहि कुल कोऊ।।
अर्थ · Hindi
संबत मध्य नास तव होऊ। जलदाता न रहिहि कुल कोऊ।।
- RCM 1.174.4Open verse →
नृप सुनि श्राप बिकल अति त्रासा। भै बहोरि बर गिरा अकासा।।
अर्थ · Hindi
नृप सुनि श्राप बिकल अति त्रासा। भै बहोरि बर गिरा अकासा।।
- RCM 1.174.5Open verse →
बिप्रहु श्राप बिचारि न दीन्हा। नहिं अपराध भूप कछु कीन्हा।।
अर्थ · Hindi
बिप्रहु श्राप बिचारि न दीन्हा। नहिं अपराध भूप कछु कीन्हा।।
- RCM 1.174.6Open verse →
चकित बिप्र सब सुनि नभबानी। भूप गयउ जहँ भोजन खानी।।
अर्थ · Hindi
चकित बिप्र सब सुनि नभबानी। भूप गयउ जहँ भोजन खानी।।
- RCM 1.174.7Open verse →
तहँ न असन नहिं बिप्र सुआरा। फिरेउ राउ मन सोच अपारा।।
अर्थ · Hindi
तहँ न असन नहिं बिप्र सुआरा। फिरेउ राउ मन सोच अपारा।।
- RCM 1.174.8Open verse →
सब प्रसंग महिसुरन्ह सुनाई। त्रसित परेउ अवनीं अकुलाई।।
अर्थ · Hindi
सब प्रसंग महिसुरन्ह सुनाई। त्रसित परेउ अवनीं अकुलाई।।
- RCM 1.174.9Open verse →
भूपति भावी मिटइ नहिं जदपि न दूषन तोर।
अर्थ · Hindi
भूपति भावी मिटइ नहिं जदपि न दूषन तोर।
- RCM 1.174.10Open verse →
किएँ अन्यथा होइ नहिं बिप्रश्राप अति घोर।।174।।
अर्थ · Hindi
किएँ अन्यथा होइ नहिं बिप्रश्राप अति घोर।।174।।
- RCM 1.175.1Open verse →
अस कहि सब महिदेव सिधाए। समाचार पुरलोगन्ह पाए।।
अर्थ · Hindi
अस कहि सब महिदेव सिधाए। समाचार पुरलोगन्ह पाए।।
- RCM 1.175.2Open verse →
सोचहिं दूषन दैवहि देहीं। बिचरत हंस काग किय जेहीं।।
अर्थ · Hindi
सोचहिं दूषन दैवहि देहीं। बिचरत हंस काग किय जेहीं।।
- RCM 1.175.3Open verse →
उपरोहितहि भवन पहुँचाई। असुर तापसहि खबरि जनाई।।
अर्थ · Hindi
उपरोहितहि भवन पहुँचाई। असुर तापसहि खबरि जनाई।।
- RCM 1.175.4Open verse →
तेहिं खल जहँ तहँ पत्र पठाए। सजि सजि सेन भूप सब धाए।।
अर्थ · Hindi
तेहिं खल जहँ तहँ पत्र पठाए। सजि सजि सेन भूप सब धाए।।
- RCM 1.175.5Open verse →
घेरेन्हि नगर निसान बजाई। बिबिध भाँति नित होई लराई।।
अर्थ · Hindi
घेरेन्हि नगर निसान बजाई। बिबिध भाँति नित होई लराई।।
- RCM 1.175.6Open verse →
जूझे सकल सुभट करि करनी। बंधु समेत परेउ नृप धरनी।।
अर्थ · Hindi
जूझे सकल सुभट करि करनी। बंधु समेत परेउ नृप धरनी।।
- RCM 1.175.7Open verse →
सत्यकेतु कुल कोउ नहिं बाँचा। बिप्रश्राप किमि होइ असाँचा।।
अर्थ · Hindi
सत्यकेतु कुल कोउ नहिं बाँचा। बिप्रश्राप किमि होइ असाँचा।।
- RCM 1.175.8Open verse →
रिपु जिति सब नृप नगर बसाई। निज पुर गवने जय जसु पाई।।
अर्थ · Hindi
रिपु जिति सब नृप नगर बसाई। निज पुर गवने जय जसु पाई।।
- RCM 1.175.9Open verse →
भरद्वाज सुनु जाहि जब होइ बिधाता बाम।
अर्थ · Hindi
भरद्वाज सुनु जाहि जब होइ बिधाता बाम।
- RCM 1.175.10Open verse →
धूरि मेरुसम जनक जम ताहि ब्यालसम दाम।।।175।।
अर्थ · Hindi
धूरि मेरुसम जनक जम ताहि ब्यालसम दाम।।।175।।
- RCM 1.176.1Open verse →
काल पाइ मुनि सुनु सोइ राजा। भयउ निसाचर सहित समाजा।।
अर्थ · Hindi
काल पाइ मुनि सुनु सोइ राजा। भयउ निसाचर सहित समाजा।।
- RCM 1.176.2Open verse →
दस सिर ताहि बीस भुजदंडा। रावन नाम बीर बरिबंडा।।
अर्थ · Hindi
दस सिर ताहि बीस भुजदंडा। रावन नाम बीर बरिबंडा।।
- RCM 1.176.3Open verse →
भूप अनुज अरिमर्दन नामा। भयउ सो कुंभकरन बलधामा।।
अर्थ · Hindi
भूप अनुज अरिमर्दन नामा। भयउ सो कुंभकरन बलधामा।।
- RCM 1.176.4Open verse →
सचिव जो रहा धरमरुचि जासू। भयउ बिमात्र बंधु लघु तासू।।
अर्थ · Hindi
सचिव जो रहा धरमरुचि जासू। भयउ बिमात्र बंधु लघु तासू।।
- RCM 1.176.5Open verse →
नाम बिभीषन जेहि जग जाना। बिष्नुभगत बिग्यान निधाना।।
अर्थ · Hindi
नाम बिभीषन जेहि जग जाना। बिष्नुभगत बिग्यान निधाना।।
- RCM 1.176.6Open verse →
रहे जे सुत सेवक नृप केरे। भए निसाचर घोर घनेरे।।
अर्थ · Hindi
रहे जे सुत सेवक नृप केरे। भए निसाचर घोर घनेरे।।
- RCM 1.176.7Open verse →
कामरूप खल जिनस अनेका। कुटिल भयंकर बिगत बिबेका।।
अर्थ · Hindi
कामरूप खल जिनस अनेका। कुटिल भयंकर बिगत बिबेका।।
- RCM 1.176.8Open verse →
कृपा रहित हिंसक सब पापी। बरनि न जाहिं बिस्व परितापी।।
अर्थ · Hindi
कृपा रहित हिंसक सब पापी। बरनि न जाहिं बिस्व परितापी।।
- RCM 1.176.9Open verse →
उपजे जदपि पुलस्त्यकुल पावन अमल अनूप।
अर्थ · Hindi
उपजे जदपि पुलस्त्यकुल पावन अमल अनूप।
- RCM 1.176.10Open verse →
तदपि महीसुर श्राप बस भए सकल अघरूप।।176।।
अर्थ · Hindi
तदपि महीसुर श्राप बस भए सकल अघरूप।।176।।
- RCM 1.177.1Open verse →
कीन्ह बिबिध तप तीनिहुँ भाई। परम उग्र नहिं बरनि सो जाई।।
अर्थ · Hindi
कीन्ह बिबिध तप तीनिहुँ भाई। परम उग्र नहिं बरनि सो जाई।।
- RCM 1.177.2Open verse →
गयउ निकट तप देखि बिधाता। मागहु बर प्रसन्न मैं ताता।।
अर्थ · Hindi
गयउ निकट तप देखि बिधाता। मागहु बर प्रसन्न मैं ताता।।
- RCM 1.177.3Open verse →
करि बिनती पद गहि दससीसा। बोलेउ बचन सुनहु जगदीसा।।
अर्थ · Hindi
करि बिनती पद गहि दससीसा। बोलेउ बचन सुनहु जगदीसा।।
- RCM 1.177.4Open verse →
हम काहू के मरहिं न मारें। बानर मनुज जाति दुइ बारें।।
अर्थ · Hindi
हम काहू के मरहिं न मारें। बानर मनुज जाति दुइ बारें।।
- RCM 1.177.5Open verse →
एवमस्तु तुम्ह बड़ तप कीन्हा। मैं ब्रह्माँ मिलि तेहि बर दीन्हा।।
अर्थ · Hindi
एवमस्तु तुम्ह बड़ तप कीन्हा। मैं ब्रह्माँ मिलि तेहि बर दीन्हा।।
- RCM 1.177.6Open verse →
पुनि प्रभु कुंभकरन पहिं गयऊ। तेहि बिलोकि मन बिसमय भयऊ।।
अर्थ · Hindi
पुनि प्रभु कुंभकरन पहिं गयऊ। तेहि बिलोकि मन बिसमय भयऊ।।
- RCM 1.177.7Open verse →
जौं एहिं खल नित करब अहारू। होइहि सब उजारि संसारू।।
अर्थ · Hindi
जौं एहिं खल नित करब अहारू। होइहि सब उजारि संसारू।।
- RCM 1.177.8Open verse →
सारद प्रेरि तासु मति फेरी। मागेसि नीद मास षट केरी।।
अर्थ · Hindi
सारद प्रेरि तासु मति फेरी। मागेसि नीद मास षट केरी।।
- RCM 1.177.9Open verse →
गए बिभीषन पास पुनि कहेउ पुत्र बर मागु।
अर्थ · Hindi
गए बिभीषन पास पुनि कहेउ पुत्र बर मागु।
- RCM 1.177.10Open verse →
तेहिं मागेउ भगवंत पद कमल अमल अनुरागु।।177।।
अर्थ · Hindi
तेहिं मागेउ भगवंत पद कमल अमल अनुरागु।।177।।
- RCM 1.178.1Open verse →
तिन्हि देइ बर ब्रह्म सिधाए। हरषित ते अपने गृह आए।।
अर्थ · Hindi
तिन्हि देइ बर ब्रह्म सिधाए। हरषित ते अपने गृह आए।।
- RCM 1.178.2Open verse →
मय तनुजा मंदोदरि नामा। परम सुंदरी नारि ललामा।।
अर्थ · Hindi
मय तनुजा मंदोदरि नामा। परम सुंदरी नारि ललामा।।
- RCM 1.178.3Open verse →
सोइ मयँ दीन्हि रावनहि आनी। होइहि जातुधानपति जानी।।
अर्थ · Hindi
सोइ मयँ दीन्हि रावनहि आनी। होइहि जातुधानपति जानी।।
- RCM 1.178.4Open verse →
हरषित भयउ नारि भलि पाई। पुनि दोउ बंधु बिआहेसि जाई।।
अर्थ · Hindi
हरषित भयउ नारि भलि पाई। पुनि दोउ बंधु बिआहेसि जाई।।
- RCM 1.178.5Open verse →
गिरि त्रिकूट एक सिंधु मझारी। बिधि निर्मित दुर्गम अति भारी।।
अर्थ · Hindi
गिरि त्रिकूट एक सिंधु मझारी। बिधि निर्मित दुर्गम अति भारी।।
- RCM 1.178.6Open verse →
सोइ मय दानवँ बहुरि सँवारा। कनक रचित मनिभवन अपारा।।
अर्थ · Hindi
सोइ मय दानवँ बहुरि सँवारा। कनक रचित मनिभवन अपारा।।
- RCM 1.178.7Open verse →
भोगावति जसि अहिकुल बासा। अमरावति जसि सक्रनिवासा।।
अर्थ · Hindi
भोगावति जसि अहिकुल बासा। अमरावति जसि सक्रनिवासा।।
- RCM 1.178.8Open verse →
तिन्ह तें अधिक रम्य अति बंका। जग बिख्यात नाम तेहि लंका।।
अर्थ · Hindi
तिन्ह तें अधिक रम्य अति बंका। जग बिख्यात नाम तेहि लंका।।
- RCM 1.178.9Open verse →
खाईं सिंधु गभीर अति चारिहुँ दिसि फिरि आव।
अर्थ · Hindi
खाईं सिंधु गभीर अति चारिहुँ दिसि फिरि आव।
- RCM 1.178.10Open verse →
कनक कोट मनि खचित दृढ़ बरनि न जाइ बनाव।।178(क)।।
अर्थ · Hindi
कनक कोट मनि खचित दृढ़ बरनि न जाइ बनाव।।178(क)।।
- RCM 1.178.11Open verse →
हरिप्रेरित जेहिं कलप जोइ जातुधानपति होइ।
अर्थ · Hindi
हरिप्रेरित जेहिं कलप जोइ जातुधानपति होइ।
- RCM 1.178.12Open verse →
सूर प्रतापी अतुलबल दल समेत बस सोइ।।178(ख)।।
अर्थ · Hindi
सूर प्रतापी अतुलबल दल समेत बस सोइ।।178(ख)।।
- RCM 1.179.1Open verse →
रहे तहाँ निसिचर भट भारे। ते सब सुरन्ह समर संघारे।।
अर्थ · Hindi
रहे तहाँ निसिचर भट भारे। ते सब सुरन्ह समर संघारे।।
- RCM 1.179.2Open verse →
अब तहँ रहहिं सक्र के प्रेरे। रच्छक कोटि जच्छपति केरे।।
अर्थ · Hindi
अब तहँ रहहिं सक्र के प्रेरे। रच्छक कोटि जच्छपति केरे।।
- RCM 1.179.3Open verse →
दसमुख कतहुँ खबरि असि पाई। सेन साजि गढ़ घेरेसि जाई।।
अर्थ · Hindi
दसमुख कतहुँ खबरि असि पाई। सेन साजि गढ़ घेरेसि जाई।।
- RCM 1.179.4Open verse →
देखि बिकट भट बड़ि कटकाई। जच्छ जीव लै गए पराई।।
अर्थ · Hindi
देखि बिकट भट बड़ि कटकाई। जच्छ जीव लै गए पराई।।
- RCM 1.179.5Open verse →
फिरि सब नगर दसानन देखा। गयउ सोच सुख भयउ बिसेषा।।
अर्थ · Hindi
फिरि सब नगर दसानन देखा। गयउ सोच सुख भयउ बिसेषा।।
- RCM 1.179.6Open verse →
सुंदर सहज अगम अनुमानी। कीन्हि तहाँ रावन रजधानी।।
अर्थ · Hindi
सुंदर सहज अगम अनुमानी। कीन्हि तहाँ रावन रजधानी।।
- RCM 1.179.7Open verse →
जेहि जस जोग बाँटि गृह दीन्हे। सुखी सकल रजनीचर कीन्हे।।
अर्थ · Hindi
जेहि जस जोग बाँटि गृह दीन्हे। सुखी सकल रजनीचर कीन्हे।।
- RCM 1.179.8Open verse →
एक बार कुबेर पर धावा। पुष्पक जान जीति लै आवा।।
अर्थ · Hindi
एक बार कुबेर पर धावा। पुष्पक जान जीति लै आवा।।
- RCM 1.179.9Open verse →
कौतुकहीं कैलास पुनि लीन्हेसि जाइ उठाइ।
अर्थ · Hindi
कौतुकहीं कैलास पुनि लीन्हेसि जाइ उठाइ।
- RCM 1.179.10Open verse →
मनहुँ तौलि निज बाहुबल चला बहुत सुख पाइ।।179।।
अर्थ · Hindi
मनहुँ तौलि निज बाहुबल चला बहुत सुख पाइ।।179।।
- RCM 1.180.1Open verse →
सुख संपति सुत सेन सहाई। जय प्रताप बल बुद्धि बड़ाई।।
अर्थ · Hindi
सुख संपति सुत सेन सहाई। जय प्रताप बल बुद्धि बड़ाई।।
- RCM 1.180.2Open verse →
नित नूतन सब बाढ़त जाई। जिमि प्रतिलाभ लोभ अधिकाई।।
अर्थ · Hindi
नित नूतन सब बाढ़त जाई। जिमि प्रतिलाभ लोभ अधिकाई।।
- RCM 1.180.3Open verse →
अतिबल कुंभकरन अस भ्राता। जेहि कहुँ नहिं प्रतिभट जग जाता।।
अर्थ · Hindi
अतिबल कुंभकरन अस भ्राता। जेहि कहुँ नहिं प्रतिभट जग जाता।।
- RCM 1.180.4Open verse →
करइ पान सोवइ षट मासा। जागत होइ तिहुँ पुर त्रासा।।
अर्थ · Hindi
करइ पान सोवइ षट मासा। जागत होइ तिहुँ पुर त्रासा।।
- RCM 1.180.5Open verse →
जौं दिन प्रति अहार कर सोई। बिस्व बेगि सब चौपट होई।।
अर्थ · Hindi
जौं दिन प्रति अहार कर सोई। बिस्व बेगि सब चौपट होई।।
- RCM 1.180.6Open verse →
समर धीर नहिं जाइ बखाना। तेहि सम अमित बीर बलवाना।।
अर्थ · Hindi
समर धीर नहिं जाइ बखाना। तेहि सम अमित बीर बलवाना।।
- RCM 1.180.7Open verse →
बारिदनाद जेठ सुत तासू। भट महुँ प्रथम लीक जग जासू।।
अर्थ · Hindi
बारिदनाद जेठ सुत तासू। भट महुँ प्रथम लीक जग जासू।।
- RCM 1.180.8Open verse →
जेहि न होइ रन सनमुख कोई। सुरपुर नितहिं परावन होई।।
अर्थ · Hindi
जेहि न होइ रन सनमुख कोई। सुरपुर नितहिं परावन होई।।
- RCM 1.180.9Open verse →
कुमुख अकंपन कुलिसरद धूमकेतु अतिकाय।
अर्थ · Hindi
कुमुख अकंपन कुलिसरद धूमकेतु अतिकाय।
- RCM 1.180.10Open verse →
एक एक जग जीति सक ऐसे सुभट निकाय।।180।।
अर्थ · Hindi
एक एक जग जीति सक ऐसे सुभट निकाय।।180।।
- RCM 1.181.1Open verse →
कामरूप जानहिं सब माया। सपनेहुँ जिन्ह कें धरम न दाया।।
अर्थ · Hindi
कामरूप जानहिं सब माया। सपनेहुँ जिन्ह कें धरम न दाया।।
- RCM 1.181.2Open verse →
दसमुख बैठ सभाँ एक बारा। देखि अमित आपन परिवारा।।
अर्थ · Hindi
दसमुख बैठ सभाँ एक बारा। देखि अमित आपन परिवारा।।
- RCM 1.181.3Open verse →
सुत समूह जन परिजन नाती। गे को पार निसाचर जाती।।
अर्थ · Hindi
सुत समूह जन परिजन नाती। गे को पार निसाचर जाती।।
- RCM 1.181.4Open verse →
सेन बिलोकि सहज अभिमानी। बोला बचन क्रोध मद सानी।।
अर्थ · Hindi
सेन बिलोकि सहज अभिमानी। बोला बचन क्रोध मद सानी।।
- RCM 1.181.5Open verse →
सुनहु सकल रजनीचर जूथा। हमरे बैरी बिबुध बरूथा।।
अर्थ · Hindi
सुनहु सकल रजनीचर जूथा। हमरे बैरी बिबुध बरूथा।।
- RCM 1.181.6Open verse →
ते सनमुख नहिं करही लराई। देखि सबल रिपु जाहिं पराई।।
अर्थ · Hindi
ते सनमुख नहिं करही लराई। देखि सबल रिपु जाहिं पराई।।
- RCM 1.181.7Open verse →
तेन्ह कर मरन एक बिधि होई। कहउँ बुझाइ सुनहु अब सोई।।
अर्थ · Hindi
तेन्ह कर मरन एक बिधि होई। कहउँ बुझाइ सुनहु अब सोई।।
- RCM 1.181.8Open verse →
द्विजभोजन मख होम सराधा।।सब कै जाइ करहु तुम्ह बाधा।।
अर्थ · Hindi
द्विजभोजन मख होम सराधा।।सब कै जाइ करहु तुम्ह बाधा।।
- RCM 1.181.9Open verse →
छुधा छीन बलहीन सुर सहजेहिं मिलिहहिं आइ।
अर्थ · Hindi
छुधा छीन बलहीन सुर सहजेहिं मिलिहहिं आइ।
- RCM 1.181.10Open verse →
तब मारिहउँ कि छाड़िहउँ भली भाँति अपनाइ।।181।।
अर्थ · Hindi
तब मारिहउँ कि छाड़िहउँ भली भाँति अपनाइ।।181।।
- RCM 1.182.1Open verse →
मेघनाद कहुँ पुनि हँकरावा। दीन्ही सिख बलु बयरु बढ़ावा।।
अर्थ · Hindi
मेघनाद कहुँ पुनि हँकरावा। दीन्ही सिख बलु बयरु बढ़ावा।।
- RCM 1.182.2Open verse →
जे सुर समर धीर बलवाना। जिन्ह कें लरिबे कर अभिमाना।।
अर्थ · Hindi
जे सुर समर धीर बलवाना। जिन्ह कें लरिबे कर अभिमाना।।
- RCM 1.182.3Open verse →
तिन्हहि जीति रन आनेसु बाँधी। उठि सुत पितु अनुसासन काँधी।।
अर्थ · Hindi
तिन्हहि जीति रन आनेसु बाँधी। उठि सुत पितु अनुसासन काँधी।।
- RCM 1.182.4Open verse →
एहि बिधि सबही अग्या दीन्ही। आपुनु चलेउ गदा कर लीन्ही।।
अर्थ · Hindi
एहि बिधि सबही अग्या दीन्ही। आपुनु चलेउ गदा कर लीन्ही।।
- RCM 1.182.5Open verse →
चलत दसानन डोलति अवनी। गर्जत गर्भ स्त्रवहिं सुर रवनी।।
अर्थ · Hindi
चलत दसानन डोलति अवनी। गर्जत गर्भ स्त्रवहिं सुर रवनी।।
- RCM 1.182.6Open verse →
रावन आवत सुनेउ सकोहा। देवन्ह तके मेरु गिरि खोहा।।
अर्थ · Hindi
रावन आवत सुनेउ सकोहा। देवन्ह तके मेरु गिरि खोहा।।
- RCM 1.182.7Open verse →
दिगपालन्ह के लोक सुहाए। सूने सकल दसानन पाए।।
अर्थ · Hindi
दिगपालन्ह के लोक सुहाए। सूने सकल दसानन पाए।।
- RCM 1.182.8Open verse →
पुनि पुनि सिंघनाद करि भारी। देइ देवतन्ह गारि पचारी।।
अर्थ · Hindi
पुनि पुनि सिंघनाद करि भारी। देइ देवतन्ह गारि पचारी।।
- RCM 1.182.9Open verse →
रन मद मत्त फिरइ जग धावा। प्रतिभट खौजत कतहुँ न पावा।।
अर्थ · Hindi
रन मद मत्त फिरइ जग धावा। प्रतिभट खौजत कतहुँ न पावा।।
- RCM 1.182.10Open verse →
रबि ससि पवन बरुन धनधारी। अगिनि काल जम सब अधिकारी।।
अर्थ · Hindi
रबि ससि पवन बरुन धनधारी। अगिनि काल जम सब अधिकारी।।
- RCM 1.182.11Open verse →
किंनर सिद्ध मनुज सुर नागा। हठि सबही के पंथहिं लागा।।
अर्थ · Hindi
किंनर सिद्ध मनुज सुर नागा। हठि सबही के पंथहिं लागा।।
- RCM 1.182.12Open verse →
ब्रह्मसृष्टि जहँ लगि तनुधारी। दसमुख बसबर्ती नर नारी।।
अर्थ · Hindi
ब्रह्मसृष्टि जहँ लगि तनुधारी। दसमुख बसबर्ती नर नारी।।
- RCM 1.182.13Open verse →
आयसु करहिं सकल भयभीता। नवहिं आइ नित चरन बिनीता।।
अर्थ · Hindi
आयसु करहिं सकल भयभीता। नवहिं आइ नित चरन बिनीता।।
- RCM 1.182.14Open verse →
भुजबल बिस्व बस्य करि राखेसि कोउ न सुतंत्र।
अर्थ · Hindi
भुजबल बिस्व बस्य करि राखेसि कोउ न सुतंत्र।
- RCM 1.182.15Open verse →
मंडलीक मनि रावन राज करइ निज मंत्र।।182(क)।।
अर्थ · Hindi
मंडलीक मनि रावन राज करइ निज मंत्र।।182(क)।।
- RCM 1.182.16Open verse →
देव जच्छ गंधर्व नर किंनर नाग कुमारि।
अर्थ · Hindi
देव जच्छ गंधर्व नर किंनर नाग कुमारि।
- RCM 1.182.17Open verse →
जीति बरीं निज बाहुबल बहु सुंदर बर नारि।।182ख।।
अर्थ · Hindi
जीति बरीं निज बाहुबल बहु सुंदर बर नारि।।182ख।।
- RCM 1.183.1Open verse →
इंद्रजीत सन जो कछु कहेऊ। सो सब जनु पहिलेहिं करि रहेऊ।।
अर्थ · Hindi
इंद्रजीत सन जो कछु कहेऊ। सो सब जनु पहिलेहिं करि रहेऊ।।
- RCM 1.183.2Open verse →
प्रथमहिं जिन्ह कहुँ आयसु दीन्हा। तिन्ह कर चरित सुनहु जो कीन्हा।।
अर्थ · Hindi
प्रथमहिं जिन्ह कहुँ आयसु दीन्हा। तिन्ह कर चरित सुनहु जो कीन्हा।।
- RCM 1.183.3Open verse →
देखत भीमरूप सब पापी। निसिचर निकर देव परितापी।।
अर्थ · Hindi
देखत भीमरूप सब पापी। निसिचर निकर देव परितापी।।
- RCM 1.183.4Open verse →
करहि उपद्रव असुर निकाया। नाना रूप धरहिं करि माया।।
अर्थ · Hindi
करहि उपद्रव असुर निकाया। नाना रूप धरहिं करि माया।।
- RCM 1.183.5Open verse →
जेहि बिधि होइ धर्म निर्मूला। सो सब करहिं बेद प्रतिकूला।।
अर्थ · Hindi
जेहि बिधि होइ धर्म निर्मूला। सो सब करहिं बेद प्रतिकूला।।
- RCM 1.183.6Open verse →
जेहिं जेहिं देस धेनु द्विज पावहिं। नगर गाउँ पुर आगि लगावहिं।।
अर्थ · Hindi
जेहिं जेहिं देस धेनु द्विज पावहिं। नगर गाउँ पुर आगि लगावहिं।।
- RCM 1.183.7Open verse →
सुभ आचरन कतहुँ नहिं होई। देव बिप्र गुरू मान न कोई।।
अर्थ · Hindi
सुभ आचरन कतहुँ नहिं होई। देव बिप्र गुरू मान न कोई।।
- RCM 1.183.8Open verse →
नहिं हरिभगति जग्य तप ग्याना। सपनेहुँ सुनिअ न बेद पुराना।।
अर्थ · Hindi
नहिं हरिभगति जग्य तप ग्याना। सपनेहुँ सुनिअ न बेद पुराना।।
- RCM 1.184.1Open verse →
बाढ़े खल बहु चोर जुआरा। जे लंपट परधन परदारा।।
अर्थ · Hindi
बाढ़े खल बहु चोर जुआरा। जे लंपट परधन परदारा।।
- RCM 1.184.2Open verse →
मानहिं मातु पिता नहिं देवा। साधुन्ह सन करवावहिं सेवा।।
अर्थ · Hindi
मानहिं मातु पिता नहिं देवा। साधुन्ह सन करवावहिं सेवा।।
- RCM 1.184.3Open verse →
जिन्ह के यह आचरन भवानी। ते जानेहु निसिचर सब प्रानी।।
अर्थ · Hindi
जिन्ह के यह आचरन भवानी। ते जानेहु निसिचर सब प्रानी।।
- RCM 1.184.4Open verse →
अतिसय देखि धर्म कै ग्लानी। परम सभीत धरा अकुलानी।।
अर्थ · Hindi
अतिसय देखि धर्म कै ग्लानी। परम सभीत धरा अकुलानी।।
- RCM 1.184.5Open verse →
गिरि सरि सिंधु भार नहिं मोही। जस मोहि गरुअ एक परद्रोही।।
अर्थ · Hindi
गिरि सरि सिंधु भार नहिं मोही। जस मोहि गरुअ एक परद्रोही।।
- RCM 1.184.6Open verse →
सकल धर्म देखइ बिपरीता। कहि न सकइ रावन भय भीता।।
अर्थ · Hindi
सकल धर्म देखइ बिपरीता। कहि न सकइ रावन भय भीता।।
- RCM 1.184.7Open verse →
धेनु रूप धरि हृदयँ बिचारी। गई तहाँ जहँ सुर मुनि झारी।।
अर्थ · Hindi
धेनु रूप धरि हृदयँ बिचारी। गई तहाँ जहँ सुर मुनि झारी।।
- RCM 1.184.8Open verse →
निज संताप सुनाएसि रोई। काहू तें कछु काज न होई।।
अर्थ · Hindi
निज संताप सुनाएसि रोई। काहू तें कछु काज न होई।।
- RCM 1.185.1Open verse →
बैठे सुर सब करहिं बिचारा। कहँ पाइअ प्रभु करिअ पुकारा।।
अर्थ · Hindi
बैठे सुर सब करहिं बिचारा। कहँ पाइअ प्रभु करिअ पुकारा।।
- RCM 1.185.2Open verse →
पुर बैकुंठ जान कह कोई। कोउ कह पयनिधि बस प्रभु सोई।।
अर्थ · Hindi
पुर बैकुंठ जान कह कोई। कोउ कह पयनिधि बस प्रभु सोई।।
- RCM 1.185.3Open verse →
जाके हृदयँ भगति जसि प्रीति। प्रभु तहँ प्रगट सदा तेहिं रीती।।
अर्थ · Hindi
जाके हृदयँ भगति जसि प्रीति। प्रभु तहँ प्रगट सदा तेहिं रीती।।
- RCM 1.185.4Open verse →
तेहि समाज गिरिजा मैं रहेऊँ। अवसर पाइ बचन एक कहेऊँ।।
अर्थ · Hindi
तेहि समाज गिरिजा मैं रहेऊँ। अवसर पाइ बचन एक कहेऊँ।।
- RCM 1.185.5Open verse →
हरि ब्यापक सर्बत्र समाना। प्रेम तें प्रगट होहिं मैं जाना।।
अर्थ · Hindi
हरि ब्यापक सर्बत्र समाना। प्रेम तें प्रगट होहिं मैं जाना।।
- RCM 1.185.6Open verse →
देस काल दिसि बिदिसिहु माहीं। कहहु सो कहाँ जहाँ प्रभु नाहीं।।
अर्थ · Hindi
देस काल दिसि बिदिसिहु माहीं। कहहु सो कहाँ जहाँ प्रभु नाहीं।।
- RCM 1.185.7Open verse →
अग जगमय सब रहित बिरागी। प्रेम तें प्रभु प्रगटइ जिमि आगी।।
अर्थ · Hindi
अग जगमय सब रहित बिरागी। प्रेम तें प्रभु प्रगटइ जिमि आगी।।
- RCM 1.185.8Open verse →
मोर बचन सब के मन माना। साधु साधु करि ब्रह्म बखाना।।
अर्थ · Hindi
मोर बचन सब के मन माना। साधु साधु करि ब्रह्म बखाना।।
- RCM 1.185.9Open verse →
सुनि बिरंचि मन हरष तन पुलकि नयन बह नीर।
अर्थ · Hindi
सुनि बिरंचि मन हरष तन पुलकि नयन बह नीर।
- RCM 1.185.10Open verse →
अस्तुति करत जोरि कर सावधान मतिधीर।।185।।
अर्थ · Hindi
अस्तुति करत जोरि कर सावधान मतिधीर।।185।।
- RCM 1.186.1Open verse →
जय जय सुरनायक जन सुखदायक प्रनतपाल भगवंता।
अर्थ · Hindi
जय जय सुरनायक जन सुखदायक प्रनतपाल भगवंता।
- RCM 1.186.2Open verse →
गो द्विज हितकारी जय असुरारी सिधुंसुता प्रिय कंता।।
अर्थ · Hindi
गो द्विज हितकारी जय असुरारी सिधुंसुता प्रिय कंता।।
- RCM 1.186.3Open verse →
पालन सुर धरनी अद्भुत करनी मरम न जानइ कोई।
अर्थ · Hindi
पालन सुर धरनी अद्भुत करनी मरम न जानइ कोई।
- RCM 1.186.4Open verse →
जो सहज कृपाला दीनदयाला करउ अनुग्रह सोई।।
अर्थ · Hindi
जो सहज कृपाला दीनदयाला करउ अनुग्रह सोई।।
- RCM 1.186.5Open verse →
जय जय अबिनासी सब घट बासी ब्यापक परमानंदा।
अर्थ · Hindi
जय जय अबिनासी सब घट बासी ब्यापक परमानंदा।
- RCM 1.186.6Open verse →
अबिगत गोतीतं चरित पुनीतं मायारहित मुकुंदा।।
अर्थ · Hindi
अबिगत गोतीतं चरित पुनीतं मायारहित मुकुंदा।।
- RCM 1.186.7Open verse →
जेहि लागि बिरागी अति अनुरागी बिगतमोह मुनिबृंदा।
अर्थ · Hindi
जेहि लागि बिरागी अति अनुरागी बिगतमोह मुनिबृंदा।
- RCM 1.186.8Open verse →
निसि बासर ध्यावहिं गुन गन गावहिं जयति सच्चिदानंदा।।
अर्थ · Hindi
निसि बासर ध्यावहिं गुन गन गावहिं जयति सच्चिदानंदा।।
- RCM 1.186.9Open verse →
जेहिं सृष्टि उपाई त्रिबिध बनाई संग सहाय न दूजा।
अर्थ · Hindi
जेहिं सृष्टि उपाई त्रिबिध बनाई संग सहाय न दूजा।
- RCM 1.186.10Open verse →
सो करउ अघारी चिंत हमारी जानिअ भगति न पूजा।।
अर्थ · Hindi
सो करउ अघारी चिंत हमारी जानिअ भगति न पूजा।।
- RCM 1.186.11Open verse →
जो भव भय भंजन मुनि मन रंजन गंजन बिपति बरूथा।
अर्थ · Hindi
जो भव भय भंजन मुनि मन रंजन गंजन बिपति बरूथा।
- RCM 1.186.12Open verse →
मन बच क्रम बानी छाड़ि सयानी सरन सकल सुर जूथा।।
अर्थ · Hindi
मन बच क्रम बानी छाड़ि सयानी सरन सकल सुर जूथा।।
- RCM 1.186.13Open verse →
सारद श्रुति सेषा रिषय असेषा जा कहुँ कोउ नहि जाना।
अर्थ · Hindi
सारद श्रुति सेषा रिषय असेषा जा कहुँ कोउ नहि जाना।
- RCM 1.186.14Open verse →
जेहि दीन पिआरे बेद पुकारे द्रवउ सो श्रीभगवाना।।
अर्थ · Hindi
जेहि दीन पिआरे बेद पुकारे द्रवउ सो श्रीभगवाना।।
- RCM 1.186.15Open verse →
भव बारिधि मंदर सब बिधि सुंदर गुनमंदिर सुखपुंजा।
अर्थ · Hindi
भव बारिधि मंदर सब बिधि सुंदर गुनमंदिर सुखपुंजा।
- RCM 1.186.16Open verse →
मुनि सिद्ध सकल सुर परम भयातुर नमत नाथ पद कंजा।।
अर्थ · Hindi
मुनि सिद्ध सकल सुर परम भयातुर नमत नाथ पद कंजा।।
- RCM 1.187.1Open verse →
जनि डरपहु मुनि सिद्ध सुरेसा। तुम्हहि लागि धरिहउँ नर बेसा।।
अर्थ · Hindi
जनि डरपहु मुनि सिद्ध सुरेसा। तुम्हहि लागि धरिहउँ नर बेसा।।
- RCM 1.187.2Open verse →
अंसन्ह सहित मनुज अवतारा। लेहउँ दिनकर बंस उदारा।।
अर्थ · Hindi
अंसन्ह सहित मनुज अवतारा। लेहउँ दिनकर बंस उदारा।।
- RCM 1.187.3Open verse →
कस्यप अदिति महातप कीन्हा। तिन्ह कहुँ मैं पूरब बर दीन्हा।।
अर्थ · Hindi
कस्यप अदिति महातप कीन्हा। तिन्ह कहुँ मैं पूरब बर दीन्हा।।
- RCM 1.187.4Open verse →
ते दसरथ कौसल्या रूपा। कोसलपुरीं प्रगट नरभूपा।।
अर्थ · Hindi
ते दसरथ कौसल्या रूपा। कोसलपुरीं प्रगट नरभूपा।।
- RCM 1.187.5Open verse →
तिन्ह के गृह अवतरिहउँ जाई। रघुकुल तिलक सो चारिउ भाई।।
अर्थ · Hindi
तिन्ह के गृह अवतरिहउँ जाई। रघुकुल तिलक सो चारिउ भाई।।
- RCM 1.187.6Open verse →
नारद बचन सत्य सब करिहउँ। परम सक्ति समेत अवतरिहउँ।।
अर्थ · Hindi
नारद बचन सत्य सब करिहउँ। परम सक्ति समेत अवतरिहउँ।।
- RCM 1.187.7Open verse →
हरिहउँ सकल भूमि गरुआई। निर्भय होहु देव समुदाई।।
अर्थ · Hindi
हरिहउँ सकल भूमि गरुआई। निर्भय होहु देव समुदाई।।
- RCM 1.187.8Open verse →
गगन ब्रह्मबानी सुनी काना। तुरत फिरे सुर हृदय जुड़ाना।।
अर्थ · Hindi
गगन ब्रह्मबानी सुनी काना। तुरत फिरे सुर हृदय जुड़ाना।।
- RCM 1.187.9Open verse →
तब ब्रह्मा धरनिहि समुझावा। अभय भई भरोस जियँ आवा।।
अर्थ · Hindi
तब ब्रह्मा धरनिहि समुझावा। अभय भई भरोस जियँ आवा।।
- RCM 1.187.10Open verse →
निज लोकहि बिरंचि गे देवन्ह इहइ सिखाइ।
अर्थ · Hindi
निज लोकहि बिरंचि गे देवन्ह इहइ सिखाइ।
- RCM 1.187.11Open verse →
बानर तनु धरि धरि महि हरि पद सेवहु जाइ।।187।।
अर्थ · Hindi
बानर तनु धरि धरि महि हरि पद सेवहु जाइ।।187।।
- RCM 1.188.1Open verse →
गए देव सब निज निज धामा। भूमि सहित मन कहुँ बिश्रामा ।
अर्थ · Hindi
गए देव सब निज निज धामा। भूमि सहित मन कहुँ बिश्रामा ।
- RCM 1.188.2Open verse →
जो कछु आयसु ब्रह्माँ दीन्हा। हरषे देव बिलंब न कीन्हा।।
अर्थ · Hindi
जो कछु आयसु ब्रह्माँ दीन्हा। हरषे देव बिलंब न कीन्हा।।
- RCM 1.188.3Open verse →
बनचर देह धरि छिति माहीं। अतुलित बल प्रताप तिन्ह पाहीं।।
अर्थ · Hindi
बनचर देह धरि छिति माहीं। अतुलित बल प्रताप तिन्ह पाहीं।।
- RCM 1.188.4Open verse →
गिरि तरु नख आयुध सब बीरा। हरि मारग चितवहिं मतिधीरा।।
अर्थ · Hindi
गिरि तरु नख आयुध सब बीरा। हरि मारग चितवहिं मतिधीरा।।
- RCM 1.188.5Open verse →
गिरि कानन जहँ तहँ भरि पूरी। रहे निज निज अनीक रचि रूरी।।
अर्थ · Hindi
गिरि कानन जहँ तहँ भरि पूरी। रहे निज निज अनीक रचि रूरी।।
- RCM 1.188.6Open verse →
यह सब रुचिर चरित मैं भाषा। अब सो सुनहु जो बीचहिं राखा।।
अर्थ · Hindi
यह सब रुचिर चरित मैं भाषा। अब सो सुनहु जो बीचहिं राखा।।
- RCM 1.188.7Open verse →
अवधपुरीं रघुकुलमनि राऊ। बेद बिदित तेहि दसरथ नाऊँ।।
अर्थ · Hindi
अवधपुरीं रघुकुलमनि राऊ। बेद बिदित तेहि दसरथ नाऊँ।।
- RCM 1.188.8Open verse →
धरम धुरंधर गुननिधि ग्यानी। हृदयँ भगति मति सारँगपानी।।
अर्थ · Hindi
धरम धुरंधर गुननिधि ग्यानी। हृदयँ भगति मति सारँगपानी।।
- RCM 1.188.9Open verse →
कौसल्यादि नारि प्रिय सब आचरन पुनीत।
अर्थ · Hindi
कौसल्यादि नारि प्रिय सब आचरन पुनीत।
- RCM 1.188.10Open verse →
पति अनुकूल प्रेम दृढ़ हरि पद कमल बिनीत।।188।।
अर्थ · Hindi
पति अनुकूल प्रेम दृढ़ हरि पद कमल बिनीत।।188।।
- RCM 1.189.1Open verse →
एक बार भूपति मन माहीं। भै गलानि मोरें सुत नाहीं।।
अर्थ · Hindi
एक बार भूपति मन माहीं। भै गलानि मोरें सुत नाहीं।।
- RCM 1.189.2Open verse →
गुर गृह गयउ तुरत महिपाला। चरन लागि करि बिनय बिसाला।।
अर्थ · Hindi
गुर गृह गयउ तुरत महिपाला। चरन लागि करि बिनय बिसाला।।
- RCM 1.189.3Open verse →
निज दुख सुख सब गुरहि सुनायउ। कहि बसिष्ठ बहुबिधि समुझायउ।।
अर्थ · Hindi
निज दुख सुख सब गुरहि सुनायउ। कहि बसिष्ठ बहुबिधि समुझायउ।।
- RCM 1.189.4Open verse →
धरहु धीर होइहहिं सुत चारी। त्रिभुवन बिदित भगत भय हारी।।
अर्थ · Hindi
धरहु धीर होइहहिं सुत चारी। त्रिभुवन बिदित भगत भय हारी।।
- RCM 1.189.5Open verse →
सृंगी रिषहि बसिष्ठ बोलावा। पुत्रकाम सुभ जग्य करावा।।
अर्थ · Hindi
सृंगी रिषहि बसिष्ठ बोलावा। पुत्रकाम सुभ जग्य करावा।।
- RCM 1.189.6Open verse →
भगति सहित मुनि आहुति दीन्हें। प्रगटे अगिनि चरू कर लीन्हें।।
अर्थ · Hindi
भगति सहित मुनि आहुति दीन्हें। प्रगटे अगिनि चरू कर लीन्हें।।
- RCM 1.189.7Open verse →
जो बसिष्ठ कछु हृदयँ बिचारा। सकल काजु भा सिद्ध तुम्हारा।।
अर्थ · Hindi
जो बसिष्ठ कछु हृदयँ बिचारा। सकल काजु भा सिद्ध तुम्हारा।।
- RCM 1.189.8Open verse →
यह हबि बाँटि देहु नृप जाई। जथा जोग जेहि भाग बनाई।।
अर्थ · Hindi
यह हबि बाँटि देहु नृप जाई। जथा जोग जेहि भाग बनाई।।
- RCM 1.189.9Open verse →
तब अदृस्य भए पावक सकल सभहि समुझाइ।।
अर्थ · Hindi
तब अदृस्य भए पावक सकल सभहि समुझाइ।।
- RCM 1.189.10Open verse →
परमानंद मगन नृप हरष न हृदयँ समाइ।।189।।
अर्थ · Hindi
परमानंद मगन नृप हरष न हृदयँ समाइ।।189।।
- RCM 1.190.1Open verse →
तबहिं रायँ प्रिय नारि बोलाईं। कौसल्यादि तहाँ चलि आई।।
अर्थ · Hindi
तबहिं रायँ प्रिय नारि बोलाईं। कौसल्यादि तहाँ चलि आई।।
- RCM 1.190.2Open verse →
अर्ध भाग कौसल्याहि दीन्हा। उभय भाग आधे कर कीन्हा।।
अर्थ · Hindi
अर्ध भाग कौसल्याहि दीन्हा। उभय भाग आधे कर कीन्हा।।
- RCM 1.190.3Open verse →
कैकेई कहँ नृप सो दयऊ। रह्यो सो उभय भाग पुनि भयऊ।।
अर्थ · Hindi
कैकेई कहँ नृप सो दयऊ। रह्यो सो उभय भाग पुनि भयऊ।।
- RCM 1.190.4Open verse →
कौसल्या कैकेई हाथ धरि। दीन्ह सुमित्रहि मन प्रसन्न करि।।
अर्थ · Hindi
कौसल्या कैकेई हाथ धरि। दीन्ह सुमित्रहि मन प्रसन्न करि।।
- RCM 1.190.5Open verse →
एहि बिधि गर्भसहित सब नारी। भईं हृदयँ हरषित सुख भारी।।
अर्थ · Hindi
एहि बिधि गर्भसहित सब नारी। भईं हृदयँ हरषित सुख भारी।।
- RCM 1.190.6Open verse →
जा दिन तें हरि गर्भहिं आए। सकल लोक सुख संपति छाए।।
अर्थ · Hindi
जा दिन तें हरि गर्भहिं आए। सकल लोक सुख संपति छाए।।
- RCM 1.190.7Open verse →
मंदिर महँ सब राजहिं रानी। सोभा सील तेज की खानीं।।
अर्थ · Hindi
मंदिर महँ सब राजहिं रानी। सोभा सील तेज की खानीं।।
- RCM 1.190.8Open verse →
सुख जुत कछुक काल चलि गयऊ। जेहिं प्रभु प्रगट सो अवसर भयऊ।।
अर्थ · Hindi
सुख जुत कछुक काल चलि गयऊ। जेहिं प्रभु प्रगट सो अवसर भयऊ।।
- RCM 1.190.9Open verse →
जोग लगन ग्रह बार तिथि सकल भए अनुकूल।
अर्थ · Hindi
जोग लगन ग्रह बार तिथि सकल भए अनुकूल।
- RCM 1.190.10Open verse →
चर अरु अचर हर्षजुत राम जनम सुखमूल।।190।।
अर्थ · Hindi
चर अरु अचर हर्षजुत राम जनम सुखमूल।।190।।
- RCM 1.191.1Open verse →
नौमी तिथि मधु मास पुनीता। सुकल पच्छ अभिजित हरिप्रीता।।
अर्थ · Hindi
नौमी तिथि मधु मास पुनीता। सुकल पच्छ अभिजित हरिप्रीता।।
- RCM 1.191.2Open verse →
मध्यदिवस अति सीत न घामा। पावन काल लोक बिश्रामा।।
अर्थ · Hindi
मध्यदिवस अति सीत न घामा। पावन काल लोक बिश्रामा।।
- RCM 1.191.3Open verse →
सीतल मंद सुरभि बह बाऊ। हरषित सुर संतन मन चाऊ।।
अर्थ · Hindi
सीतल मंद सुरभि बह बाऊ। हरषित सुर संतन मन चाऊ।।
- RCM 1.191.4Open verse →
बन कुसुमित गिरिगन मनिआरा। स्त्रवहिं सकल सरिताऽमृतधारा।।
अर्थ · Hindi
बन कुसुमित गिरिगन मनिआरा। स्त्रवहिं सकल सरिताऽमृतधारा।।
- RCM 1.191.5Open verse →
सो अवसर बिरंचि जब जाना। चले सकल सुर साजि बिमाना।।
अर्थ · Hindi
सो अवसर बिरंचि जब जाना। चले सकल सुर साजि बिमाना।।
- RCM 1.191.6Open verse →
गगन बिमल सकुल सुर जूथा। गावहिं गुन गंधर्ब बरूथा।।
अर्थ · Hindi
गगन बिमल सकुल सुर जूथा। गावहिं गुन गंधर्ब बरूथा।।
- RCM 1.191.7Open verse →
बरषहिं सुमन सुअंजलि साजी। गहगहि गगन दुंदुभी बाजी।।
अर्थ · Hindi
बरषहिं सुमन सुअंजलि साजी। गहगहि गगन दुंदुभी बाजी।।
- RCM 1.191.8Open verse →
अस्तुति करहिं नाग मुनि देवा। बहुबिधि लावहिं निज निज सेवा।।
अर्थ · Hindi
अस्तुति करहिं नाग मुनि देवा। बहुबिधि लावहिं निज निज सेवा।।
- RCM 1.191.9Open verse →
सुर समूह बिनती करि पहुँचे निज निज धाम।
अर्थ · Hindi
सुर समूह बिनती करि पहुँचे निज निज धाम।
- RCM 1.191.10Open verse →
जगनिवास प्रभु प्रगटे अखिल लोक बिश्राम।।191।।
अर्थ · Hindi
जगनिवास प्रभु प्रगटे अखिल लोक बिश्राम।।191।।
- RCM 1.192.1Open verse →
भए प्रगट कृपाला दीनदयाला कौसल्या हितकारी।
अर्थ · Hindi
भए प्रगट कृपाला दीनदयाला कौसल्या हितकारी।
- RCM 1.192.2Open verse →
हरषित महतारी मुनि मन हारी अद्भुत रूप बिचारी।।
अर्थ · Hindi
हरषित महतारी मुनि मन हारी अद्भुत रूप बिचारी।।
- RCM 1.192.3Open verse →
लोचन अभिरामा तनु घनस्यामा निज आयुध भुज चारी।
अर्थ · Hindi
लोचन अभिरामा तनु घनस्यामा निज आयुध भुज चारी।
- RCM 1.192.4Open verse →
भूषन बनमाला नयन बिसाला सोभासिंधु खरारी।।
अर्थ · Hindi
भूषन बनमाला नयन बिसाला सोभासिंधु खरारी।।
- RCM 1.192.5Open verse →
कह दुइ कर जोरी अस्तुति तोरी केहि बिधि करौं अनंता।
अर्थ · Hindi
कह दुइ कर जोरी अस्तुति तोरी केहि बिधि करौं अनंता।
- RCM 1.192.6Open verse →
माया गुन ग्यानातीत अमाना बेद पुरान भनंता।।
अर्थ · Hindi
माया गुन ग्यानातीत अमाना बेद पुरान भनंता।।
- RCM 1.192.7Open verse →
करुना सुख सागर सब गुन आगर जेहि गावहिं श्रुति संता।
अर्थ · Hindi
करुना सुख सागर सब गुन आगर जेहि गावहिं श्रुति संता।
- RCM 1.192.8Open verse →
सो मम हित लागी जन अनुरागी भयउ प्रगट श्रीकंता।।
अर्थ · Hindi
सो मम हित लागी जन अनुरागी भयउ प्रगट श्रीकंता।।
- RCM 1.192.9Open verse →
ब्रह्मांड निकाया निर्मित माया रोम रोम प्रति बेद कहै।
अर्थ · Hindi
ब्रह्मांड निकाया निर्मित माया रोम रोम प्रति बेद कहै।
- RCM 1.192.10Open verse →
मम उर सो बासी यह उपहासी सुनत धीर पति थिर न रहै।।
अर्थ · Hindi
मम उर सो बासी यह उपहासी सुनत धीर पति थिर न रहै।।
- RCM 1.192.11Open verse →
उपजा जब ग्याना प्रभु मुसकाना चरित बहुत बिधि कीन्ह चहै।
अर्थ · Hindi
उपजा जब ग्याना प्रभु मुसकाना चरित बहुत बिधि कीन्ह चहै।
- RCM 1.192.12Open verse →
कहि कथा सुहाई मातु बुझाई जेहि प्रकार सुत प्रेम लहै।।
अर्थ · Hindi
कहि कथा सुहाई मातु बुझाई जेहि प्रकार सुत प्रेम लहै।।
- RCM 1.192.13Open verse →
माता पुनि बोली सो मति डौली तजहु तात यह रूपा।
अर्थ · Hindi
माता पुनि बोली सो मति डौली तजहु तात यह रूपा।
- RCM 1.192.14Open verse →
कीजै सिसुलीला अति प्रियसीला यह सुख परम अनूपा।।
अर्थ · Hindi
कीजै सिसुलीला अति प्रियसीला यह सुख परम अनूपा।।
- RCM 1.192.15Open verse →
सुनि बचन सुजाना रोदन ठाना होइ बालक सुरभूपा।
अर्थ · Hindi
सुनि बचन सुजाना रोदन ठाना होइ बालक सुरभूपा।
- RCM 1.192.16Open verse →
यह चरित जे गावहिं हरिपद पावहिं ते न परहिं भवकूपा।।
अर्थ · Hindi
यह चरित जे गावहिं हरिपद पावहिं ते न परहिं भवकूपा।।
- RCM 1.193.1Open verse →
सुनि सिसु रुदन परम प्रिय बानी। संभ्रम चलि आई सब रानी।।
अर्थ · Hindi
सुनि सिसु रुदन परम प्रिय बानी। संभ्रम चलि आई सब रानी।।
- RCM 1.193.2Open verse →
हरषित जहँ तहँ धाईं दासी। आनँद मगन सकल पुरबासी।।
अर्थ · Hindi
हरषित जहँ तहँ धाईं दासी। आनँद मगन सकल पुरबासी।।
- RCM 1.193.3Open verse →
दसरथ पुत्रजन्म सुनि काना। मानहुँ ब्रह्मानंद समाना।।
अर्थ · Hindi
दसरथ पुत्रजन्म सुनि काना। मानहुँ ब्रह्मानंद समाना।।
- RCM 1.193.4Open verse →
परम प्रेम मन पुलक सरीरा। चाहत उठत करत मति धीरा।।
अर्थ · Hindi
परम प्रेम मन पुलक सरीरा। चाहत उठत करत मति धीरा।।
- RCM 1.193.5Open verse →
जाकर नाम सुनत सुभ होई। मोरें गृह आवा प्रभु सोई।।
अर्थ · Hindi
जाकर नाम सुनत सुभ होई। मोरें गृह आवा प्रभु सोई।।
- RCM 1.193.6Open verse →
परमानंद पूरि मन राजा। कहा बोलाइ बजावहु बाजा।।
अर्थ · Hindi
परमानंद पूरि मन राजा। कहा बोलाइ बजावहु बाजा।।
- RCM 1.193.7Open verse →
गुर बसिष्ठ कहँ गयउ हँकारा। आए द्विजन सहित नृपद्वारा।।
अर्थ · Hindi
गुर बसिष्ठ कहँ गयउ हँकारा। आए द्विजन सहित नृपद्वारा।।
- RCM 1.193.8Open verse →
अनुपम बालक देखेन्हि जाई। रूप रासि गुन कहि न सिराई।।
अर्थ · Hindi
अनुपम बालक देखेन्हि जाई। रूप रासि गुन कहि न सिराई।।
- RCM 1.193.9Open verse →
नंदीमुख सराध करि जातकरम सब कीन्ह।
अर्थ · Hindi
नंदीमुख सराध करि जातकरम सब कीन्ह।
- RCM 1.193.10Open verse →
हाटक धेनु बसन मनि नृप बिप्रन्ह कहँ दीन्ह।।193।।
अर्थ · Hindi
हाटक धेनु बसन मनि नृप बिप्रन्ह कहँ दीन्ह।।193।।
- RCM 1.194.1Open verse →
ध्वज पताक तोरन पुर छावा। कहि न जाइ जेहि भाँति बनावा।।
अर्थ · Hindi
ध्वज पताक तोरन पुर छावा। कहि न जाइ जेहि भाँति बनावा।।
- RCM 1.194.2Open verse →
सुमनबृष्टि अकास तें होई। ब्रह्मानंद मगन सब लोई।।
अर्थ · Hindi
सुमनबृष्टि अकास तें होई। ब्रह्मानंद मगन सब लोई।।
- RCM 1.194.3Open verse →
बृंद बृंद मिलि चलीं लोगाई। सहज संगार किएँ उठि धाई।।
अर्थ · Hindi
बृंद बृंद मिलि चलीं लोगाई। सहज संगार किएँ उठि धाई।।
- RCM 1.194.4Open verse →
कनक कलस मंगल धरि थारा। गावत पैठहिं भूप दुआरा।।
अर्थ · Hindi
कनक कलस मंगल धरि थारा। गावत पैठहिं भूप दुआरा।।
- RCM 1.194.5Open verse →
करि आरति नेवछावरि करहीं। बार बार सिसु चरनन्हि परहीं।।
अर्थ · Hindi
करि आरति नेवछावरि करहीं। बार बार सिसु चरनन्हि परहीं।।
- RCM 1.194.6Open verse →
मागध सूत बंदिगन गायक। पावन गुन गावहिं रघुनायक।।
अर्थ · Hindi
मागध सूत बंदिगन गायक। पावन गुन गावहिं रघुनायक।।
- RCM 1.194.7Open verse →
सर्बस दान दीन्ह सब काहू। जेहिं पावा राखा नहिं ताहू।।
अर्थ · Hindi
सर्बस दान दीन्ह सब काहू। जेहिं पावा राखा नहिं ताहू।।
- RCM 1.194.8Open verse →
मृगमद चंदन कुंकुम कीचा। मची सकल बीथिन्ह बिच बीचा।।
अर्थ · Hindi
मृगमद चंदन कुंकुम कीचा। मची सकल बीथिन्ह बिच बीचा।।
- RCM 1.194.9Open verse →
गृह गृह बाज बधाव सुभ प्रगटे सुषमा कंद।
अर्थ · Hindi
गृह गृह बाज बधाव सुभ प्रगटे सुषमा कंद।
- RCM 1.194.10Open verse →
हरषवंत सब जहँ तहँ नगर नारि नर बृंद।।194।।
अर्थ · Hindi
हरषवंत सब जहँ तहँ नगर नारि नर बृंद।।194।।
- RCM 1.195.1Open verse →
कैकयसुता सुमित्रा दोऊ। सुंदर सुत जनमत भैं ओऊ।।
अर्थ · Hindi
कैकयसुता सुमित्रा दोऊ। सुंदर सुत जनमत भैं ओऊ।।
- RCM 1.195.2Open verse →
वह सुख संपति समय समाजा। कहि न सकइ सारद अहिराजा।।
अर्थ · Hindi
वह सुख संपति समय समाजा। कहि न सकइ सारद अहिराजा।।
- RCM 1.195.3Open verse →
अवधपुरी सोहइ एहि भाँती। प्रभुहि मिलन आई जनु राती।।
अर्थ · Hindi
अवधपुरी सोहइ एहि भाँती। प्रभुहि मिलन आई जनु राती।।
- RCM 1.195.4Open verse →
देखि भानू जनु मन सकुचानी। तदपि बनी संध्या अनुमानी।।
अर्थ · Hindi
देखि भानू जनु मन सकुचानी। तदपि बनी संध्या अनुमानी।।
- RCM 1.195.5Open verse →
अगर धूप बहु जनु अँधिआरी। उड़इ अभीर मनहुँ अरुनारी।।
अर्थ · Hindi
अगर धूप बहु जनु अँधिआरी। उड़इ अभीर मनहुँ अरुनारी।।
- RCM 1.195.6Open verse →
मंदिर मनि समूह जनु तारा। नृप गृह कलस सो इंदु उदारा।।
अर्थ · Hindi
मंदिर मनि समूह जनु तारा। नृप गृह कलस सो इंदु उदारा।।
- RCM 1.195.7Open verse →
भवन बेदधुनि अति मृदु बानी। जनु खग मूखर समयँ जनु सानी।।
अर्थ · Hindi
भवन बेदधुनि अति मृदु बानी। जनु खग मूखर समयँ जनु सानी।।
- RCM 1.195.8Open verse →
कौतुक देखि पतंग भुलाना। एक मास तेइँ जात न जाना।।
अर्थ · Hindi
कौतुक देखि पतंग भुलाना। एक मास तेइँ जात न जाना।।
- RCM 1.195.9Open verse →
मास दिवस कर दिवस भा मरम न जानइ कोइ।
अर्थ · Hindi
मास दिवस कर दिवस भा मरम न जानइ कोइ।
- RCM 1.195.10Open verse →
रथ समेत रबि थाकेउ निसा कवन बिधि होइ।।195।।
अर्थ · Hindi
रथ समेत रबि थाकेउ निसा कवन बिधि होइ।।195।।
- RCM 1.196.1Open verse →
यह रहस्य काहू नहिं जाना। दिन मनि चले करत गुनगाना।।
अर्थ · Hindi
यह रहस्य काहू नहिं जाना। दिन मनि चले करत गुनगाना।।
- RCM 1.196.2Open verse →
देखि महोत्सव सुर मुनि नागा। चले भवन बरनत निज भागा।।
अर्थ · Hindi
देखि महोत्सव सुर मुनि नागा। चले भवन बरनत निज भागा।।
- RCM 1.196.3Open verse →
औरउ एक कहउँ निज चोरी। सुनु गिरिजा अति दृढ़ मति तोरी।।
अर्थ · Hindi
औरउ एक कहउँ निज चोरी। सुनु गिरिजा अति दृढ़ मति तोरी।।
- RCM 1.196.4Open verse →
काक भुसुंडि संग हम दोऊ। मनुजरूप जानइ नहिं कोऊ।।
अर्थ · Hindi
काक भुसुंडि संग हम दोऊ। मनुजरूप जानइ नहिं कोऊ।।
- RCM 1.196.5Open verse →
परमानंद प्रेमसुख फूले। बीथिन्ह फिरहिं मगन मन भूले।।
अर्थ · Hindi
परमानंद प्रेमसुख फूले। बीथिन्ह फिरहिं मगन मन भूले।।
- RCM 1.196.6Open verse →
यह सुभ चरित जान पै सोई। कृपा राम कै जापर होई।।
अर्थ · Hindi
यह सुभ चरित जान पै सोई। कृपा राम कै जापर होई।।
- RCM 1.196.7Open verse →
तेहि अवसर जो जेहि बिधि आवा। दीन्ह भूप जो जेहि मन भावा।।
अर्थ · Hindi
तेहि अवसर जो जेहि बिधि आवा। दीन्ह भूप जो जेहि मन भावा।।
- RCM 1.196.8Open verse →
गज रथ तुरग हेम गो हीरा। दीन्हे नृप नानाबिधि चीरा।।
अर्थ · Hindi
गज रथ तुरग हेम गो हीरा। दीन्हे नृप नानाबिधि चीरा।।
- RCM 1.196.9Open verse →
मन संतोषे सबन्हि के जहँ तहँ देहि असीस।
अर्थ · Hindi
मन संतोषे सबन्हि के जहँ तहँ देहि असीस।
- RCM 1.196.10Open verse →
सकल तनय चिर जीवहुँ तुलसिदास के ईस।।196।।
अर्थ · Hindi
सकल तनय चिर जीवहुँ तुलसिदास के ईस।।196।।
- RCM 1.197.1Open verse →
कछुक दिवस बीते एहि भाँती। जात न जानिअ दिन अरु राती।।
अर्थ · Hindi
कछुक दिवस बीते एहि भाँती। जात न जानिअ दिन अरु राती।।
- RCM 1.197.2Open verse →
नामकरन कर अवसरु जानी। भूप बोलि पठए मुनि ग्यानी।।
अर्थ · Hindi
नामकरन कर अवसरु जानी। भूप बोलि पठए मुनि ग्यानी।।
- RCM 1.197.3Open verse →
करि पूजा भूपति अस भाषा। धरिअ नाम जो मुनि गुनि राखा।।
अर्थ · Hindi
करि पूजा भूपति अस भाषा। धरिअ नाम जो मुनि गुनि राखा।।
- RCM 1.197.4Open verse →
इन्ह के नाम अनेक अनूपा। मैं नृप कहब स्वमति अनुरूपा।।
अर्थ · Hindi
इन्ह के नाम अनेक अनूपा। मैं नृप कहब स्वमति अनुरूपा।।
- RCM 1.197.5Open verse →
जो आनंद सिंधु सुखरासी। सीकर तें त्रैलोक सुपासी।।
अर्थ · Hindi
जो आनंद सिंधु सुखरासी। सीकर तें त्रैलोक सुपासी।।
- RCM 1.197.6Open verse →
सो सुख धाम राम अस नामा। अखिल लोक दायक बिश्रामा।।
अर्थ · Hindi
सो सुख धाम राम अस नामा। अखिल लोक दायक बिश्रामा।।
- RCM 1.197.7Open verse →
बिस्व भरन पोषन कर जोई। ताकर नाम भरत अस होई।।
अर्थ · Hindi
बिस्व भरन पोषन कर जोई। ताकर नाम भरत अस होई।।
- RCM 1.197.8Open verse →
जाके सुमिरन तें रिपु नासा। नाम सत्रुहन बेद प्रकासा।।
अर्थ · Hindi
जाके सुमिरन तें रिपु नासा। नाम सत्रुहन बेद प्रकासा।।
- RCM 1.197.9Open verse →
लच्छन धाम राम प्रिय सकल जगत आधार।
अर्थ · Hindi
लच्छन धाम राम प्रिय सकल जगत आधार।
- RCM 1.197.10Open verse →
गुरु बसिष्ट तेहि राखा लछिमन नाम उदार।।197।।
अर्थ · Hindi
गुरु बसिष्ट तेहि राखा लछिमन नाम उदार।।197।।
- RCM 1.198.1Open verse →
धरे नाम गुर हृदयँ बिचारी। बेद तत्व नृप तव सुत चारी।।
अर्थ · Hindi
धरे नाम गुर हृदयँ बिचारी। बेद तत्व नृप तव सुत चारी।।
- RCM 1.198.2Open verse →
मुनि धन जन सरबस सिव प्राना। बाल केलि तेहिं सुख माना।।
अर्थ · Hindi
मुनि धन जन सरबस सिव प्राना। बाल केलि तेहिं सुख माना।।
- RCM 1.198.3Open verse →
बारेहि ते निज हित पति जानी। लछिमन राम चरन रति मानी।।
अर्थ · Hindi
बारेहि ते निज हित पति जानी। लछिमन राम चरन रति मानी।।
- RCM 1.198.4Open verse →
भरत सत्रुहन दूनउ भाई। प्रभु सेवक जसि प्रीति बड़ाई।।
अर्थ · Hindi
भरत सत्रुहन दूनउ भाई। प्रभु सेवक जसि प्रीति बड़ाई।।
- RCM 1.198.5Open verse →
स्याम गौर सुंदर दोउ जोरी। निरखहिं छबि जननीं तृन तोरी।।
अर्थ · Hindi
स्याम गौर सुंदर दोउ जोरी। निरखहिं छबि जननीं तृन तोरी।।
- RCM 1.198.6Open verse →
चारिउ सील रूप गुन धामा। तदपि अधिक सुखसागर रामा।।
अर्थ · Hindi
चारिउ सील रूप गुन धामा। तदपि अधिक सुखसागर रामा।।
- RCM 1.198.7Open verse →
हृदयँ अनुग्रह इंदु प्रकासा। सूचत किरन मनोहर हासा।।
अर्थ · Hindi
हृदयँ अनुग्रह इंदु प्रकासा। सूचत किरन मनोहर हासा।।
- RCM 1.198.8Open verse →
कबहुँ उछंग कबहुँ बर पलना। मातु दुलारइ कहि प्रिय ललना।।
अर्थ · Hindi
कबहुँ उछंग कबहुँ बर पलना। मातु दुलारइ कहि प्रिय ललना।।
- RCM 1.198.9Open verse →
ब्यापक ब्रह्म निरंजन निर्गुन बिगत बिनोद।
अर्थ · Hindi
ब्यापक ब्रह्म निरंजन निर्गुन बिगत बिनोद।
- RCM 1.198.10Open verse →
सो अज प्रेम भगति बस कौसल्या के गोद।।198।।
अर्थ · Hindi
सो अज प्रेम भगति बस कौसल्या के गोद।।198।।
- RCM 1.199.1Open verse →
काम कोटि छबि स्याम सरीरा। नील कंज बारिद गंभीरा।।
अर्थ · Hindi
काम कोटि छबि स्याम सरीरा। नील कंज बारिद गंभीरा।।
- RCM 1.199.2Open verse →
अरुन चरन पकंज नख जोती। कमल दलन्हि बैठे जनु मोती।।
अर्थ · Hindi
अरुन चरन पकंज नख जोती। कमल दलन्हि बैठे जनु मोती।।
- RCM 1.199.3Open verse →
रेख कुलिस धवज अंकुर सोहे। नूपुर धुनि सुनि मुनि मन मोहे।।
अर्थ · Hindi
रेख कुलिस धवज अंकुर सोहे। नूपुर धुनि सुनि मुनि मन मोहे।।
- RCM 1.199.4Open verse →
कटि किंकिनी उदर त्रय रेखा। नाभि गभीर जान जेहि देखा।।
अर्थ · Hindi
कटि किंकिनी उदर त्रय रेखा। नाभि गभीर जान जेहि देखा।।
- RCM 1.199.5Open verse →
भुज बिसाल भूषन जुत भूरी। हियँ हरि नख अति सोभा रूरी।।
अर्थ · Hindi
भुज बिसाल भूषन जुत भूरी। हियँ हरि नख अति सोभा रूरी।।
- RCM 1.199.6Open verse →
उर मनिहार पदिक की सोभा। बिप्र चरन देखत मन लोभा।।
अर्थ · Hindi
उर मनिहार पदिक की सोभा। बिप्र चरन देखत मन लोभा।।
- RCM 1.199.7Open verse →
कंबु कंठ अति चिबुक सुहाई। आनन अमित मदन छबि छाई।।
अर्थ · Hindi
कंबु कंठ अति चिबुक सुहाई। आनन अमित मदन छबि छाई।।
- RCM 1.199.8Open verse →
दुइ दुइ दसन अधर अरुनारे। नासा तिलक को बरनै पारे।।
अर्थ · Hindi
दुइ दुइ दसन अधर अरुनारे। नासा तिलक को बरनै पारे।।
- RCM 1.199.9Open verse →
सुंदर श्रवन सुचारु कपोला। अति प्रिय मधुर तोतरे बोला।।
अर्थ · Hindi
सुंदर श्रवन सुचारु कपोला। अति प्रिय मधुर तोतरे बोला।।
- RCM 1.199.10Open verse →
चिक्कन कच कुंचित गभुआरे। बहु प्रकार रचि मातु सँवारे।।
अर्थ · Hindi
चिक्कन कच कुंचित गभुआरे। बहु प्रकार रचि मातु सँवारे।।
- RCM 1.199.11Open verse →
पीत झगुलिआ तनु पहिराई। जानु पानि बिचरनि मोहि भाई।।
अर्थ · Hindi
पीत झगुलिआ तनु पहिराई। जानु पानि बिचरनि मोहि भाई।।
- RCM 1.199.12Open verse →
रूप सकहिं नहिं कहि श्रुति सेषा। सो जानइ सपनेहुँ जेहि देखा।।
अर्थ · Hindi
रूप सकहिं नहिं कहि श्रुति सेषा। सो जानइ सपनेहुँ जेहि देखा।।
- RCM 1.199.13Open verse →
सुख संदोह मोहपर ग्यान गिरा गोतीत।
अर्थ · Hindi
सुख संदोह मोहपर ग्यान गिरा गोतीत।
- RCM 1.199.14Open verse →
दंपति परम प्रेम बस कर सिसुचरित पुनीत।।199।।
अर्थ · Hindi
दंपति परम प्रेम बस कर सिसुचरित पुनीत।।199।।
- RCM 1.200.1Open verse →
एहि बिधि राम जगत पितु माता। कोसलपुर बासिन्ह सुखदाता।।
अर्थ · Hindi
एहि बिधि राम जगत पितु माता। कोसलपुर बासिन्ह सुखदाता।।
- RCM 1.200.2Open verse →
जिन्ह रघुनाथ चरन रति मानी। तिन्ह की यह गति प्रगट भवानी।।
अर्थ · Hindi
जिन्ह रघुनाथ चरन रति मानी। तिन्ह की यह गति प्रगट भवानी।।
- RCM 1.200.3Open verse →
रघुपति बिमुख जतन कर कोरी। कवन सकइ भव बंधन छोरी।।
अर्थ · Hindi
रघुपति बिमुख जतन कर कोरी। कवन सकइ भव बंधन छोरी।।
- RCM 1.200.4Open verse →
जीव चराचर बस कै राखे। सो माया प्रभु सों भय भाखे।।
अर्थ · Hindi
जीव चराचर बस कै राखे। सो माया प्रभु सों भय भाखे।।
- RCM 1.200.5Open verse →
भृकुटि बिलास नचावइ ताही। अस प्रभु छाड़ि भजिअ कहु काही।।
अर्थ · Hindi
भृकुटि बिलास नचावइ ताही। अस प्रभु छाड़ि भजिअ कहु काही।।
- RCM 1.200.6Open verse →
मन क्रम बचन छाड़ि चतुराई। भजत कृपा करिहहिं रघुराई।।
अर्थ · Hindi
मन क्रम बचन छाड़ि चतुराई। भजत कृपा करिहहिं रघुराई।।
- RCM 1.200.7Open verse →
एहि बिधि सिसुबिनोद प्रभु कीन्हा। सकल नगरबासिन्ह सुख दीन्हा।।
अर्थ · Hindi
एहि बिधि सिसुबिनोद प्रभु कीन्हा। सकल नगरबासिन्ह सुख दीन्हा।।
- RCM 1.200.8Open verse →
लै उछंग कबहुँक हलरावै। कबहुँ पालनें घालि झुलावै।।
अर्थ · Hindi
लै उछंग कबहुँक हलरावै। कबहुँ पालनें घालि झुलावै।।
- RCM 1.200.9Open verse →
प्रेम मगन कौसल्या निसि दिन जात न जान।
अर्थ · Hindi
प्रेम मगन कौसल्या निसि दिन जात न जान।
- RCM 1.200.10Open verse →
सुत सनेह बस माता बालचरित कर गान।।200।।
अर्थ · Hindi
सुत सनेह बस माता बालचरित कर गान।।200।।
- RCM 1.201.1Open verse →
एक बार जननीं अन्हवाए। करि सिंगार पलनाँ पौढ़ाए।।
अर्थ · Hindi
एक बार जननीं अन्हवाए। करि सिंगार पलनाँ पौढ़ाए।।
- RCM 1.201.2Open verse →
निज कुल इष्टदेव भगवाना। पूजा हेतु कीन्ह अस्नाना।।
अर्थ · Hindi
निज कुल इष्टदेव भगवाना। पूजा हेतु कीन्ह अस्नाना।।
- RCM 1.201.3Open verse →
करि पूजा नैबेद्य चढ़ावा। आपु गई जहँ पाक बनावा।।
अर्थ · Hindi
करि पूजा नैबेद्य चढ़ावा। आपु गई जहँ पाक बनावा।।
- RCM 1.201.4Open verse →
बहुरि मातु तहवाँ चलि आई। भोजन करत देख सुत जाई।।
अर्थ · Hindi
बहुरि मातु तहवाँ चलि आई। भोजन करत देख सुत जाई।।
- RCM 1.201.5Open verse →
गै जननी सिसु पहिं भयभीता। देखा बाल तहाँ पुनि सूता।।
अर्थ · Hindi
गै जननी सिसु पहिं भयभीता। देखा बाल तहाँ पुनि सूता।।
- RCM 1.201.6Open verse →
बहुरि आइ देखा सुत सोई। हृदयँ कंप मन धीर न होई।।
अर्थ · Hindi
बहुरि आइ देखा सुत सोई। हृदयँ कंप मन धीर न होई।।
- RCM 1.201.7Open verse →
इहाँ उहाँ दुइ बालक देखा। मतिभ्रम मोर कि आन बिसेषा।।
अर्थ · Hindi
इहाँ उहाँ दुइ बालक देखा। मतिभ्रम मोर कि आन बिसेषा।।
- RCM 1.201.8Open verse →
देखि राम जननी अकुलानी। प्रभु हँसि दीन्ह मधुर मुसुकानी।।
अर्थ · Hindi
देखि राम जननी अकुलानी। प्रभु हँसि दीन्ह मधुर मुसुकानी।।
- RCM 1.201.9Open verse →
देखरावा मातहि निज अदभुत रुप अखंड।
अर्थ · Hindi
देखरावा मातहि निज अदभुत रुप अखंड।
- RCM 1.201.10Open verse →
रोम रोम प्रति लागे कोटि कोटि ब्रह्मंड।। 201।।
अर्थ · Hindi
रोम रोम प्रति लागे कोटि कोटि ब्रह्मंड।। 201।।
- RCM 1.202.1Open verse →
अगनित रबि ससि सिव चतुरानन। बहु गिरि सरित सिंधु महि कानन।।
अर्थ · Hindi
अगनित रबि ससि सिव चतुरानन। बहु गिरि सरित सिंधु महि कानन।।
- RCM 1.202.2Open verse →
काल कर्म गुन ग्यान सुभाऊ। सोउ देखा जो सुना न काऊ।।
अर्थ · Hindi
काल कर्म गुन ग्यान सुभाऊ। सोउ देखा जो सुना न काऊ।।
- RCM 1.202.3Open verse →
देखी माया सब बिधि गाढ़ी। अति सभीत जोरें कर ठाढ़ी।।
अर्थ · Hindi
देखी माया सब बिधि गाढ़ी। अति सभीत जोरें कर ठाढ़ी।।
- RCM 1.202.4Open verse →
देखा जीव नचावइ जाही। देखी भगति जो छोरइ ताही।।
अर्थ · Hindi
देखा जीव नचावइ जाही। देखी भगति जो छोरइ ताही।।
- RCM 1.202.5Open verse →
तन पुलकित मुख बचन न आवा। नयन मूदि चरननि सिरु नावा।।
अर्थ · Hindi
तन पुलकित मुख बचन न आवा। नयन मूदि चरननि सिरु नावा।।
- RCM 1.202.6Open verse →
बिसमयवंत देखि महतारी। भए बहुरि सिसुरूप खरारी।।
अर्थ · Hindi
बिसमयवंत देखि महतारी। भए बहुरि सिसुरूप खरारी।।
- RCM 1.202.7Open verse →
अस्तुति करि न जाइ भय माना। जगत पिता मैं सुत करि जाना।।
अर्थ · Hindi
अस्तुति करि न जाइ भय माना। जगत पिता मैं सुत करि जाना।।
- RCM 1.202.8Open verse →
हरि जननि बहुबिधि समुझाई। यह जनि कतहुँ कहसि सुनु माई।।
अर्थ · Hindi
हरि जननि बहुबिधि समुझाई। यह जनि कतहुँ कहसि सुनु माई।।
- RCM 1.202.9Open verse →
बार बार कौसल्या बिनय करइ कर जोरि।।
अर्थ · Hindi
बार बार कौसल्या बिनय करइ कर जोरि।।
- RCM 1.202.10Open verse →
अब जनि कबहूँ ब्यापै प्रभु मोहि माया तोरि।। 202।।
अर्थ · Hindi
अब जनि कबहूँ ब्यापै प्रभु मोहि माया तोरि।। 202।।
- RCM 1.203.1Open verse →
बालचरित हरि बहुबिधि कीन्हा। अति अनंद दासन्ह कहँ दीन्हा।।
अर्थ · Hindi
बालचरित हरि बहुबिधि कीन्हा। अति अनंद दासन्ह कहँ दीन्हा।।
- RCM 1.203.2Open verse →
कछुक काल बीतें सब भाई। बड़े भए परिजन सुखदाई।।
अर्थ · Hindi
कछुक काल बीतें सब भाई। बड़े भए परिजन सुखदाई।।
- RCM 1.203.3Open verse →
चूड़ाकरन कीन्ह गुरु जाई। बिप्रन्ह पुनि दछिना बहु पाई।।
अर्थ · Hindi
चूड़ाकरन कीन्ह गुरु जाई। बिप्रन्ह पुनि दछिना बहु पाई।।
- RCM 1.203.4Open verse →
परम मनोहर चरित अपारा। करत फिरत चारिउ सुकुमारा।।
अर्थ · Hindi
परम मनोहर चरित अपारा। करत फिरत चारिउ सुकुमारा।।
- RCM 1.203.5Open verse →
मन क्रम बचन अगोचर जोई। दसरथ अजिर बिचर प्रभु सोई।।
अर्थ · Hindi
मन क्रम बचन अगोचर जोई। दसरथ अजिर बिचर प्रभु सोई।।
- RCM 1.203.6Open verse →
भोजन करत बोल जब राजा। नहिं आवत तजि बाल समाजा।।
अर्थ · Hindi
भोजन करत बोल जब राजा। नहिं आवत तजि बाल समाजा।।
- RCM 1.203.7Open verse →
कौसल्या जब बोलन जाई। ठुमकु ठुमकु प्रभु चलहिं पराई।।
अर्थ · Hindi
कौसल्या जब बोलन जाई। ठुमकु ठुमकु प्रभु चलहिं पराई।।
- RCM 1.203.8Open verse →
निगम नेति सिव अंत न पावा। ताहि धरै जननी हठि धावा।।
अर्थ · Hindi
निगम नेति सिव अंत न पावा। ताहि धरै जननी हठि धावा।।
- RCM 1.203.9Open verse →
धूरस धूरि भरें तनु आए। भूपति बिहसि गोद बैठाए।।
अर्थ · Hindi
धूरस धूरि भरें तनु आए। भूपति बिहसि गोद बैठाए।।
- RCM 1.203.10Open verse →
भोजन करत चपल चित इत उत अवसरु पाइ।
अर्थ · Hindi
भोजन करत चपल चित इत उत अवसरु पाइ।
- RCM 1.203.11Open verse →
भाजि चले किलकत मुख दधि ओदन लपटाइ।।203।।
अर्थ · Hindi
भाजि चले किलकत मुख दधि ओदन लपटाइ।।203।।
- RCM 1.204.1Open verse →
बालचरित अति सरल सुहाए। सारद सेष संभु श्रुति गाए।।
अर्थ · Hindi
बालचरित अति सरल सुहाए। सारद सेष संभु श्रुति गाए।।
- RCM 1.204.2Open verse →
जिन कर मन इन्ह सन नहिं राता। ते जन बंचित किए बिधाता।।
अर्थ · Hindi
जिन कर मन इन्ह सन नहिं राता। ते जन बंचित किए बिधाता।।
- RCM 1.204.3Open verse →
भए कुमार जबहिं सब भ्राता। दीन्ह जनेऊ गुरु पितु माता।।
अर्थ · Hindi
भए कुमार जबहिं सब भ्राता। दीन्ह जनेऊ गुरु पितु माता।।
- RCM 1.204.4Open verse →
गुरगृहँ गए पढ़न रघुराई। अलप काल बिद्या सब आई।।
अर्थ · Hindi
गुरगृहँ गए पढ़न रघुराई। अलप काल बिद्या सब आई।।
- RCM 1.204.5Open verse →
जाकी सहज स्वास श्रुति चारी। सो हरि पढ़ यह कौतुक भारी।।
अर्थ · Hindi
जाकी सहज स्वास श्रुति चारी। सो हरि पढ़ यह कौतुक भारी।।
- RCM 1.204.6Open verse →
बिद्या बिनय निपुन गुन सीला। खेलहिं खेल सकल नृपलीला।।
अर्थ · Hindi
बिद्या बिनय निपुन गुन सीला। खेलहिं खेल सकल नृपलीला।।
- RCM 1.204.7Open verse →
करतल बान धनुष अति सोहा। देखत रूप चराचर मोहा।।
अर्थ · Hindi
करतल बान धनुष अति सोहा। देखत रूप चराचर मोहा।।
- RCM 1.204.8Open verse →
जिन्ह बीथिन्ह बिहरहिं सब भाई। थकित होहिं सब लोग लुगाई।।
अर्थ · Hindi
जिन्ह बीथिन्ह बिहरहिं सब भाई। थकित होहिं सब लोग लुगाई।।
- RCM 1.204.9Open verse →
कोसलपुर बासी नर नारि बृद्ध अरु बाल।
अर्थ · Hindi
कोसलपुर बासी नर नारि बृद्ध अरु बाल।
- RCM 1.204.10Open verse →
प्रानहु ते प्रिय लागत सब कहुँ राम कृपाल।।204।।
अर्थ · Hindi
प्रानहु ते प्रिय लागत सब कहुँ राम कृपाल।।204।।
- RCM 1.205.1Open verse →
बंधु सखा संग लेहिं बोलाई। बन मृगया नित खेलहिं जाई।।
अर्थ · Hindi
बंधु सखा संग लेहिं बोलाई। बन मृगया नित खेलहिं जाई।।
- RCM 1.205.2Open verse →
पावन मृग मारहिं जियँ जानी। दिन प्रति नृपहि देखावहिं आनी।।
अर्थ · Hindi
पावन मृग मारहिं जियँ जानी। दिन प्रति नृपहि देखावहिं आनी।।
- RCM 1.205.3Open verse →
जे मृग राम बान के मारे। ते तनु तजि सुरलोक सिधारे।।
अर्थ · Hindi
जे मृग राम बान के मारे। ते तनु तजि सुरलोक सिधारे।।
- RCM 1.205.4Open verse →
अनुज सखा सँग भोजन करहीं। मातु पिता अग्या अनुसरहीं।।
अर्थ · Hindi
अनुज सखा सँग भोजन करहीं। मातु पिता अग्या अनुसरहीं।।
- RCM 1.205.5Open verse →
जेहि बिधि सुखी होहिं पुर लोगा। करहिं कृपानिधि सोइ संजोगा।।
अर्थ · Hindi
जेहि बिधि सुखी होहिं पुर लोगा। करहिं कृपानिधि सोइ संजोगा।।
- RCM 1.205.6Open verse →
बेद पुरान सुनहिं मन लाई। आपु कहहिं अनुजन्ह समुझाई।।
अर्थ · Hindi
बेद पुरान सुनहिं मन लाई। आपु कहहिं अनुजन्ह समुझाई।।
- RCM 1.205.7Open verse →
प्रातकाल उठि कै रघुनाथा। मातु पिता गुरु नावहिं माथा।।
अर्थ · Hindi
प्रातकाल उठि कै रघुनाथा। मातु पिता गुरु नावहिं माथा।।
- RCM 1.205.8Open verse →
आयसु मागि करहिं पुर काजा। देखि चरित हरषइ मन राजा।।
अर्थ · Hindi
आयसु मागि करहिं पुर काजा। देखि चरित हरषइ मन राजा।।
- RCM 1.205.9Open verse →
ब्यापक अकल अनीह अज निर्गुन नाम न रूप।
अर्थ · Hindi
ब्यापक अकल अनीह अज निर्गुन नाम न रूप।
- RCM 1.205.10Open verse →
भगत हेतु नाना बिधि करत चरित्र अनूप।।205।।
अर्थ · Hindi
भगत हेतु नाना बिधि करत चरित्र अनूप।।205।।
- RCM 1.206.1Open verse →
यह सब चरित कहा मैं गाई। आगिलि कथा सुनहु मन लाई।।
अर्थ · Hindi
यह सब चरित कहा मैं गाई। आगिलि कथा सुनहु मन लाई।।
- RCM 1.206.2Open verse →
बिस्वामित्र महामुनि ग्यानी। बसहि बिपिन सुभ आश्रम जानी।।
अर्थ · Hindi
बिस्वामित्र महामुनि ग्यानी। बसहि बिपिन सुभ आश्रम जानी।।
- RCM 1.206.3Open verse →
जहँ जप जग्य मुनि करही। अति मारीच सुबाहुहि डरहीं।।
अर्थ · Hindi
जहँ जप जग्य मुनि करही। अति मारीच सुबाहुहि डरहीं।।
- RCM 1.206.4Open verse →
देखत जग्य निसाचर धावहि। करहि उपद्रव मुनि दुख पावहिं।।
अर्थ · Hindi
देखत जग्य निसाचर धावहि। करहि उपद्रव मुनि दुख पावहिं।।
- RCM 1.206.5Open verse →
गाधितनय मन चिंता ब्यापी। हरि बिनु मरहि न निसिचर पापी।।
अर्थ · Hindi
गाधितनय मन चिंता ब्यापी। हरि बिनु मरहि न निसिचर पापी।।
- RCM 1.206.6Open verse →
तब मुनिवर मन कीन्ह बिचारा। प्रभु अवतरेउ हरन महि भारा।।
अर्थ · Hindi
तब मुनिवर मन कीन्ह बिचारा। प्रभु अवतरेउ हरन महि भारा।।
- RCM 1.206.7Open verse →
एहुँ मिस देखौं पद जाई। करि बिनती आनौ दोउ भाई।।
अर्थ · Hindi
एहुँ मिस देखौं पद जाई। करि बिनती आनौ दोउ भाई।।
- RCM 1.206.8Open verse →
ग्यान बिराग सकल गुन अयना। सो प्रभु मै देखब भरि नयना।।
अर्थ · Hindi
ग्यान बिराग सकल गुन अयना। सो प्रभु मै देखब भरि नयना।।
- RCM 1.206.9Open verse →
बहुबिधि करत मनोरथ जात लागि नहिं बार।
अर्थ · Hindi
बहुबिधि करत मनोरथ जात लागि नहिं बार।
- RCM 1.206.10Open verse →
करि मज्जन सरऊ जल गए भूप दरबार।।206।।
अर्थ · Hindi
करि मज्जन सरऊ जल गए भूप दरबार।।206।।
- RCM 1.207.1Open verse →
मुनि आगमन सुना जब राजा। मिलन गयऊ लै बिप्र समाजा।।
अर्थ · Hindi
मुनि आगमन सुना जब राजा। मिलन गयऊ लै बिप्र समाजा।।
- RCM 1.207.2Open verse →
करि दंडवत मुनिहि सनमानी। निज आसन बैठारेन्हि आनी।।
अर्थ · Hindi
करि दंडवत मुनिहि सनमानी। निज आसन बैठारेन्हि आनी।।
- RCM 1.207.3Open verse →
चरन पखारि कीन्हि अति पूजा। मो सम आजु धन्य नहिं दूजा।।
अर्थ · Hindi
चरन पखारि कीन्हि अति पूजा। मो सम आजु धन्य नहिं दूजा।।
- RCM 1.207.4Open verse →
बिबिध भाँति भोजन करवावा। मुनिवर हृदयँ हरष अति पावा।।
अर्थ · Hindi
बिबिध भाँति भोजन करवावा। मुनिवर हृदयँ हरष अति पावा।।
- RCM 1.207.5Open verse →
पुनि चरननि मेले सुत चारी। राम देखि मुनि देह बिसारी।।
अर्थ · Hindi
पुनि चरननि मेले सुत चारी। राम देखि मुनि देह बिसारी।।
- RCM 1.207.6Open verse →
भए मगन देखत मुख सोभा। जनु चकोर पूरन ससि लोभा।।
अर्थ · Hindi
भए मगन देखत मुख सोभा। जनु चकोर पूरन ससि लोभा।।
- RCM 1.207.7Open verse →
तब मन हरषि बचन कह राऊ। मुनि अस कृपा न कीन्हिहु काऊ।।
अर्थ · Hindi
तब मन हरषि बचन कह राऊ। मुनि अस कृपा न कीन्हिहु काऊ।।
- RCM 1.207.8Open verse →
केहि कारन आगमन तुम्हारा। कहहु सो करत न लावउँ बारा।।
अर्थ · Hindi
केहि कारन आगमन तुम्हारा। कहहु सो करत न लावउँ बारा।।
- RCM 1.207.9Open verse →
असुर समूह सतावहिं मोही। मै जाचन आयउँ नृप तोही।।
अर्थ · Hindi
असुर समूह सतावहिं मोही। मै जाचन आयउँ नृप तोही।।
- RCM 1.207.10Open verse →
अनुज समेत देहु रघुनाथा। निसिचर बध मैं होब सनाथा।।
अर्थ · Hindi
अनुज समेत देहु रघुनाथा। निसिचर बध मैं होब सनाथा।।
- RCM 1.207.11Open verse →
देहु भूप मन हरषित तजहु मोह अग्यान।
अर्थ · Hindi
देहु भूप मन हरषित तजहु मोह अग्यान।
- RCM 1.207.12Open verse →
धर्म सुजस प्रभु तुम्ह कौं इन्ह कहँ अति कल्यान।।207।।
अर्थ · Hindi
धर्म सुजस प्रभु तुम्ह कौं इन्ह कहँ अति कल्यान।।207।।
- RCM 1.208.1Open verse →
सुनि राजा अति अप्रिय बानी। हृदय कंप मुख दुति कुमुलानी।।
अर्थ · Hindi
सुनि राजा अति अप्रिय बानी। हृदय कंप मुख दुति कुमुलानी।।
- RCM 1.208.2Open verse →
चौथेंपन पायउँ सुत चारी। बिप्र बचन नहिं कहेहु बिचारी।।
अर्थ · Hindi
चौथेंपन पायउँ सुत चारी। बिप्र बचन नहिं कहेहु बिचारी।।
- RCM 1.208.3Open verse →
मागहु भूमि धेनु धन कोसा। सर्बस देउँ आजु सहरोसा।।
अर्थ · Hindi
मागहु भूमि धेनु धन कोसा। सर्बस देउँ आजु सहरोसा।।
- RCM 1.208.4Open verse →
देह प्रान तें प्रिय कछु नाही। सोउ मुनि देउँ निमिष एक माही।।
अर्थ · Hindi
देह प्रान तें प्रिय कछु नाही। सोउ मुनि देउँ निमिष एक माही।।
- RCM 1.208.5Open verse →
सब सुत प्रिय मोहि प्रान कि नाईं। राम देत नहिं बनइ गोसाई।।
अर्थ · Hindi
सब सुत प्रिय मोहि प्रान कि नाईं। राम देत नहिं बनइ गोसाई।।
- RCM 1.208.6Open verse →
कहँ निसिचर अति घोर कठोरा। कहँ सुंदर सुत परम किसोरा।।
अर्थ · Hindi
कहँ निसिचर अति घोर कठोरा। कहँ सुंदर सुत परम किसोरा।।
- RCM 1.208.7Open verse →
सुनि नृप गिरा प्रेम रस सानी। हृदयँ हरष माना मुनि ग्यानी।।
अर्थ · Hindi
सुनि नृप गिरा प्रेम रस सानी। हृदयँ हरष माना मुनि ग्यानी।।
- RCM 1.208.8Open verse →
तब बसिष्ट बहु निधि समुझावा। नृप संदेह नास कहँ पावा।।
अर्थ · Hindi
तब बसिष्ट बहु निधि समुझावा। नृप संदेह नास कहँ पावा।।
- RCM 1.208.9Open verse →
अति आदर दोउ तनय बोलाए। हृदयँ लाइ बहु भाँति सिखाए।।
अर्थ · Hindi
अति आदर दोउ तनय बोलाए। हृदयँ लाइ बहु भाँति सिखाए।।
- RCM 1.208.10Open verse →
मेरे प्रान नाथ सुत दोऊ। तुम्ह मुनि पिता आन नहिं कोऊ।।
अर्थ · Hindi
मेरे प्रान नाथ सुत दोऊ। तुम्ह मुनि पिता आन नहिं कोऊ।।
- RCM 1.208.11Open verse →
सौंपे भूप रिषिहि सुत बहु बिधि देइ असीस।
अर्थ · Hindi
सौंपे भूप रिषिहि सुत बहु बिधि देइ असीस।
- RCM 1.208.12Open verse →
जननी भवन गए प्रभु चले नाइ पद सीस।।208(क)।।
अर्थ · Hindi
जननी भवन गए प्रभु चले नाइ पद सीस।।208(क)।।
- RCM 1.208.13Open verse →
पुरुषसिंह दोउ बीर हरषि चले मुनि भय हरन।।
अर्थ · Hindi
पुरुषसिंह दोउ बीर हरषि चले मुनि भय हरन।।
- RCM 1.208.14Open verse →
कृपासिंधु मतिधीर अखिल बिस्व कारन करन।।208(ख)।।
अर्थ · Hindi
कृपासिंधु मतिधीर अखिल बिस्व कारन करन।।208(ख)।।
- RCM 1.209.1Open verse →
अरुन नयन उर बाहु बिसाला। नील जलज तनु स्याम तमाला।।
अर्थ · Hindi
अरुन नयन उर बाहु बिसाला। नील जलज तनु स्याम तमाला।।
- RCM 1.209.2Open verse →
कटि पट पीत कसें बर भाथा। रुचिर चाप सायक दुहुँ हाथा।।
अर्थ · Hindi
कटि पट पीत कसें बर भाथा। रुचिर चाप सायक दुहुँ हाथा।।
- RCM 1.209.3Open verse →
स्याम गौर सुंदर दोउ भाई। बिस्बामित्र महानिधि पाई।।
अर्थ · Hindi
स्याम गौर सुंदर दोउ भाई। बिस्बामित्र महानिधि पाई।।
- RCM 1.209.4Open verse →
प्रभु ब्रह्मन्यदेव मै जाना। मोहि निति पिता तजेहु भगवाना।।
अर्थ · Hindi
प्रभु ब्रह्मन्यदेव मै जाना। मोहि निति पिता तजेहु भगवाना।।
- RCM 1.209.5Open verse →
चले जात मुनि दीन्हि दिखाई। सुनि ताड़का क्रोध करि धाई।।
अर्थ · Hindi
चले जात मुनि दीन्हि दिखाई। सुनि ताड़का क्रोध करि धाई।।
- RCM 1.209.6Open verse →
एकहिं बान प्रान हरि लीन्हा। दीन जानि तेहि निज पद दीन्हा।।
अर्थ · Hindi
एकहिं बान प्रान हरि लीन्हा। दीन जानि तेहि निज पद दीन्हा।।
- RCM 1.209.7Open verse →
तब रिषि निज नाथहि जियँ चीन्ही। बिद्यानिधि कहुँ बिद्या दीन्ही।।
अर्थ · Hindi
तब रिषि निज नाथहि जियँ चीन्ही। बिद्यानिधि कहुँ बिद्या दीन्ही।।
- RCM 1.209.8Open verse →
जाते लाग न छुधा पिपासा। अतुलित बल तनु तेज प्रकासा।।
अर्थ · Hindi
जाते लाग न छुधा पिपासा। अतुलित बल तनु तेज प्रकासा।।
- RCM 1.209.9Open verse →
आयुष सब समर्पि कै प्रभु निज आश्रम आनि।
अर्थ · Hindi
आयुष सब समर्पि कै प्रभु निज आश्रम आनि।
- RCM 1.209.10Open verse →
कंद मूल फल भोजन दीन्ह भगति हित जानि।।209।।
अर्थ · Hindi
कंद मूल फल भोजन दीन्ह भगति हित जानि।।209।।
- RCM 1.210.1Open verse →
प्रात कहा मुनि सन रघुराई। निर्भय जग्य करहु तुम्ह जाई।।
अर्थ · Hindi
प्रात कहा मुनि सन रघुराई। निर्भय जग्य करहु तुम्ह जाई।।
- RCM 1.210.2Open verse →
होम करन लागे मुनि झारी। आपु रहे मख कीं रखवारी।।
अर्थ · Hindi
होम करन लागे मुनि झारी। आपु रहे मख कीं रखवारी।।
- RCM 1.210.3Open verse →
सुनि मारीच निसाचर क्रोही। लै सहाय धावा मुनिद्रोही।।
अर्थ · Hindi
सुनि मारीच निसाचर क्रोही। लै सहाय धावा मुनिद्रोही।।
- RCM 1.210.4Open verse →
बिनु फर बान राम तेहि मारा। सत जोजन गा सागर पारा।।
अर्थ · Hindi
बिनु फर बान राम तेहि मारा। सत जोजन गा सागर पारा।।
- RCM 1.210.5Open verse →
पावक सर सुबाहु पुनि मारा। अनुज निसाचर कटकु सँघारा।।
अर्थ · Hindi
पावक सर सुबाहु पुनि मारा। अनुज निसाचर कटकु सँघारा।।
- RCM 1.210.6Open verse →
मारि असुर द्विज निर्मयकारी। अस्तुति करहिं देव मुनि झारी।।
अर्थ · Hindi
मारि असुर द्विज निर्मयकारी। अस्तुति करहिं देव मुनि झारी।।
- RCM 1.210.7Open verse →
तहँ पुनि कछुक दिवस रघुराया। रहे कीन्हि बिप्रन्ह पर दाया।।
अर्थ · Hindi
तहँ पुनि कछुक दिवस रघुराया। रहे कीन्हि बिप्रन्ह पर दाया।।
- RCM 1.210.8Open verse →
भगति हेतु बहु कथा पुराना। कहे बिप्र जद्यपि प्रभु जाना।।
अर्थ · Hindi
भगति हेतु बहु कथा पुराना। कहे बिप्र जद्यपि प्रभु जाना।।
- RCM 1.210.9Open verse →
तब मुनि सादर कहा बुझाई। चरित एक प्रभु देखिअ जाई।।
अर्थ · Hindi
तब मुनि सादर कहा बुझाई। चरित एक प्रभु देखिअ जाई।।
- RCM 1.210.10Open verse →
धनुषजग्य मुनि रघुकुल नाथा। हरषि चले मुनिबर के साथा।।
अर्थ · Hindi
धनुषजग्य मुनि रघुकुल नाथा। हरषि चले मुनिबर के साथा।।
- RCM 1.210.11Open verse →
आश्रम एक दीख मग माहीं। खग मृग जीव जंतु तहँ नाहीं।।
अर्थ · Hindi
आश्रम एक दीख मग माहीं। खग मृग जीव जंतु तहँ नाहीं।।
- RCM 1.210.12Open verse →
पूछा मुनिहि सिला प्रभु देखी। सकल कथा मुनि कहा बिसेषी।।
अर्थ · Hindi
पूछा मुनिहि सिला प्रभु देखी। सकल कथा मुनि कहा बिसेषी।।
- RCM 1.210.13Open verse →
गौतम नारि श्राप बस उपल देह धरि धीर।
अर्थ · Hindi
गौतम नारि श्राप बस उपल देह धरि धीर।
- RCM 1.210.14Open verse →
चरन कमल रज चाहति कृपा करहु रघुबीर।।210।।
अर्थ · Hindi
चरन कमल रज चाहति कृपा करहु रघुबीर।।210।।
- RCM 1.211.1Open verse →
परसत पद पावन सोक नसावन प्रगट भई तपपुंज सही।
अर्थ · Hindi
परसत पद पावन सोक नसावन प्रगट भई तपपुंज सही।
- RCM 1.211.2Open verse →
देखत रघुनायक जन सुख दायक सनमुख होइ कर जोरि रही।।
अर्थ · Hindi
देखत रघुनायक जन सुख दायक सनमुख होइ कर जोरि रही।।
- RCM 1.211.3Open verse →
अति प्रेम अधीरा पुलक सरीरा मुख नहिं आवइ बचन कही।
अर्थ · Hindi
अति प्रेम अधीरा पुलक सरीरा मुख नहिं आवइ बचन कही।
- RCM 1.211.4Open verse →
अतिसय बड़भागी चरनन्हि लागी जुगल नयन जलधार बही।।
अर्थ · Hindi
अतिसय बड़भागी चरनन्हि लागी जुगल नयन जलधार बही।।
- RCM 1.211.5Open verse →
धीरजु मन कीन्हा प्रभु कहुँ चीन्हा रघुपति कृपाँ भगति पाई।
अर्थ · Hindi
धीरजु मन कीन्हा प्रभु कहुँ चीन्हा रघुपति कृपाँ भगति पाई।
- RCM 1.211.6Open verse →
अति निर्मल बानीं अस्तुति ठानी ग्यानगम्य जय रघुराई।।
अर्थ · Hindi
अति निर्मल बानीं अस्तुति ठानी ग्यानगम्य जय रघुराई।।
- RCM 1.211.7Open verse →
मै नारि अपावन प्रभु जग पावन रावन रिपु जन सुखदाई।
अर्थ · Hindi
मै नारि अपावन प्रभु जग पावन रावन रिपु जन सुखदाई।
- RCM 1.211.8Open verse →
राजीव बिलोचन भव भय मोचन पाहि पाहि सरनहिं आई।।
अर्थ · Hindi
राजीव बिलोचन भव भय मोचन पाहि पाहि सरनहिं आई।।
- RCM 1.211.9Open verse →
मुनि श्राप जो दीन्हा अति भल कीन्हा परम अनुग्रह मैं माना।
अर्थ · Hindi
मुनि श्राप जो दीन्हा अति भल कीन्हा परम अनुग्रह मैं माना।
- RCM 1.211.10Open verse →
देखेउँ भरि लोचन हरि भवमोचन इहइ लाभ संकर जाना।।
अर्थ · Hindi
देखेउँ भरि लोचन हरि भवमोचन इहइ लाभ संकर जाना।।
- RCM 1.211.11Open verse →
बिनती प्रभु मोरी मैं मति भोरी नाथ न मागउँ बर आना।
अर्थ · Hindi
बिनती प्रभु मोरी मैं मति भोरी नाथ न मागउँ बर आना।
- RCM 1.211.12Open verse →
पद कमल परागा रस अनुरागा मम मन मधुप करै पाना।।
अर्थ · Hindi
पद कमल परागा रस अनुरागा मम मन मधुप करै पाना।।
- RCM 1.211.13Open verse →
जेहिं पद सुरसरिता परम पुनीता प्रगट भई सिव सीस धरी।
अर्थ · Hindi
जेहिं पद सुरसरिता परम पुनीता प्रगट भई सिव सीस धरी।
- RCM 1.211.14Open verse →
सोइ पद पंकज जेहि पूजत अज मम सिर धरेउ कृपाल हरी।।
अर्थ · Hindi
सोइ पद पंकज जेहि पूजत अज मम सिर धरेउ कृपाल हरी।।
- RCM 1.211.15Open verse →
एहि भाँति सिधारी गौतम नारी बार बार हरि चरन परी।
अर्थ · Hindi
एहि भाँति सिधारी गौतम नारी बार बार हरि चरन परी।
- RCM 1.211.16Open verse →
जो अति मन भावा सो बरु पावा गै पतिलोक अनंद भरी।।
अर्थ · Hindi
जो अति मन भावा सो बरु पावा गै पतिलोक अनंद भरी।।
- RCM 1.212.1Open verse →
चले राम लछिमन मुनि संगा। गए जहाँ जग पावनि गंगा।।
अर्थ · Hindi
चले राम लछिमन मुनि संगा। गए जहाँ जग पावनि गंगा।।
- RCM 1.212.2Open verse →
गाधिसूनु सब कथा सुनाई। जेहि प्रकार सुरसरि महि आई।।
अर्थ · Hindi
गाधिसूनु सब कथा सुनाई। जेहि प्रकार सुरसरि महि आई।।
- RCM 1.212.3Open verse →
तब प्रभु रिषिन्ह समेत नहाए। बिबिध दान महिदेवन्हि पाए।।
अर्थ · Hindi
तब प्रभु रिषिन्ह समेत नहाए। बिबिध दान महिदेवन्हि पाए।।
- RCM 1.212.4Open verse →
हरषि चले मुनि बृंद सहाया। बेगि बिदेह नगर निअराया।।
अर्थ · Hindi
हरषि चले मुनि बृंद सहाया। बेगि बिदेह नगर निअराया।।
- RCM 1.212.5Open verse →
पुर रम्यता राम जब देखी। हरषे अनुज समेत बिसेषी।।
अर्थ · Hindi
पुर रम्यता राम जब देखी। हरषे अनुज समेत बिसेषी।।
- RCM 1.212.6Open verse →
बापीं कूप सरित सर नाना। सलिल सुधासम मनि सोपाना।।
अर्थ · Hindi
बापीं कूप सरित सर नाना। सलिल सुधासम मनि सोपाना।।
- RCM 1.212.7Open verse →
गुंजत मंजु मत्त रस भृंगा। कूजत कल बहुबरन बिहंगा।।
अर्थ · Hindi
गुंजत मंजु मत्त रस भृंगा। कूजत कल बहुबरन बिहंगा।।
- RCM 1.212.8Open verse →
बरन बरन बिकसे बन जाता। त्रिबिध समीर सदा सुखदाता।।
अर्थ · Hindi
बरन बरन बिकसे बन जाता। त्रिबिध समीर सदा सुखदाता।।
- RCM 1.212.9Open verse →
सुमन बाटिका बाग बन बिपुल बिहंग निवास।
अर्थ · Hindi
सुमन बाटिका बाग बन बिपुल बिहंग निवास।
- RCM 1.212.10Open verse →
फूलत फलत सुपल्लवत सोहत पुर चहुँ पास।।212।।
अर्थ · Hindi
फूलत फलत सुपल्लवत सोहत पुर चहुँ पास।।212।।
- RCM 1.213.1Open verse →
बनइ न बरनत नगर निकाई। जहाँ जाइ मन तहँइँ लोभाई।।
अर्थ · Hindi
बनइ न बरनत नगर निकाई। जहाँ जाइ मन तहँइँ लोभाई।।
- RCM 1.213.2Open verse →
चारु बजारु बिचित्र अँबारी। मनिमय बिधि जनु स्वकर सँवारी।।
अर्थ · Hindi
चारु बजारु बिचित्र अँबारी। मनिमय बिधि जनु स्वकर सँवारी।।
- RCM 1.213.3Open verse →
धनिक बनिक बर धनद समाना। बैठ सकल बस्तु लै नाना।।
अर्थ · Hindi
धनिक बनिक बर धनद समाना। बैठ सकल बस्तु लै नाना।।
- RCM 1.213.4Open verse →
चौहट सुंदर गलीं सुहाई। संतत रहहिं सुगंध सिंचाई।।
अर्थ · Hindi
चौहट सुंदर गलीं सुहाई। संतत रहहिं सुगंध सिंचाई।।
- RCM 1.213.5Open verse →
मंगलमय मंदिर सब केरें। चित्रित जनु रतिनाथ चितेरें।।
अर्थ · Hindi
मंगलमय मंदिर सब केरें। चित्रित जनु रतिनाथ चितेरें।।
- RCM 1.213.6Open verse →
पुर नर नारि सुभग सुचि संता। धरमसील ग्यानी गुनवंता।।
अर्थ · Hindi
पुर नर नारि सुभग सुचि संता। धरमसील ग्यानी गुनवंता।।
- RCM 1.213.7Open verse →
अति अनूप जहँ जनक निवासू। बिथकहिं बिबुध बिलोकि बिलासू।।
अर्थ · Hindi
अति अनूप जहँ जनक निवासू। बिथकहिं बिबुध बिलोकि बिलासू।।
- RCM 1.213.8Open verse →
होत चकित चित कोट बिलोकी। सकल भुवन सोभा जनु रोकी।।
अर्थ · Hindi
होत चकित चित कोट बिलोकी। सकल भुवन सोभा जनु रोकी।।
- RCM 1.213.9Open verse →
धवल धाम मनि पुरट पट सुघटित नाना भाँति।
अर्थ · Hindi
धवल धाम मनि पुरट पट सुघटित नाना भाँति।
- RCM 1.213.10Open verse →
सिय निवास सुंदर सदन सोभा किमि कहि जाति।।213।।
अर्थ · Hindi
सिय निवास सुंदर सदन सोभा किमि कहि जाति।।213।।
- RCM 1.214.1Open verse →
सुभग द्वार सब कुलिस कपाटा। भूप भीर नट मागध भाटा।।
अर्थ · Hindi
सुभग द्वार सब कुलिस कपाटा। भूप भीर नट मागध भाटा।।
- RCM 1.214.2Open verse →
बनी बिसाल बाजि गज साला। हय गय रथ संकुल सब काला।।
अर्थ · Hindi
बनी बिसाल बाजि गज साला। हय गय रथ संकुल सब काला।।
- RCM 1.214.3Open verse →
सूर सचिव सेनप बहुतेरे। नृपगृह सरिस सदन सब केरे।।
अर्थ · Hindi
सूर सचिव सेनप बहुतेरे। नृपगृह सरिस सदन सब केरे।।
- RCM 1.214.4Open verse →
पुर बाहेर सर सारित समीपा। उतरे जहँ तहँ बिपुल महीपा।।
अर्थ · Hindi
पुर बाहेर सर सारित समीपा। उतरे जहँ तहँ बिपुल महीपा।।
- RCM 1.214.5Open verse →
देखि अनूप एक अँवराई। सब सुपास सब भाँति सुहाई।।
अर्थ · Hindi
देखि अनूप एक अँवराई। सब सुपास सब भाँति सुहाई।।
- RCM 1.214.6Open verse →
कौसिक कहेउ मोर मनु माना। इहाँ रहिअ रघुबीर सुजाना।।
अर्थ · Hindi
कौसिक कहेउ मोर मनु माना। इहाँ रहिअ रघुबीर सुजाना।।
- RCM 1.214.7Open verse →
भलेहिं नाथ कहि कृपानिकेता। उतरे तहँ मुनिबृंद समेता।।
अर्थ · Hindi
भलेहिं नाथ कहि कृपानिकेता। उतरे तहँ मुनिबृंद समेता।।
- RCM 1.214.8Open verse →
बिस्वामित्र महामुनि आए। समाचार मिथिलापति पाए।।
अर्थ · Hindi
बिस्वामित्र महामुनि आए। समाचार मिथिलापति पाए।।
- RCM 1.214.9Open verse →
संग सचिव सुचि भूरि भट भूसुर बर गुर ग्याति।
अर्थ · Hindi
संग सचिव सुचि भूरि भट भूसुर बर गुर ग्याति।
- RCM 1.214.10Open verse →
चले मिलन मुनिनायकहि मुदित राउ एहि भाँति।।214।।
अर्थ · Hindi
चले मिलन मुनिनायकहि मुदित राउ एहि भाँति।।214।।
- RCM 1.215.1Open verse →
कीन्ह प्रनामु चरन धरि माथा। दीन्हि असीस मुदित मुनिनाथा।।
अर्थ · Hindi
कीन्ह प्रनामु चरन धरि माथा। दीन्हि असीस मुदित मुनिनाथा।।
- RCM 1.215.2Open verse →
बिप्रबृंद सब सादर बंदे। जानि भाग्य बड़ राउ अनंदे।।
अर्थ · Hindi
बिप्रबृंद सब सादर बंदे। जानि भाग्य बड़ राउ अनंदे।।
- RCM 1.215.3Open verse →
कुसल प्रस्न कहि बारहिं बारा। बिस्वामित्र नृपहि बैठारा।।
अर्थ · Hindi
कुसल प्रस्न कहि बारहिं बारा। बिस्वामित्र नृपहि बैठारा।।
- RCM 1.215.4Open verse →
तेहि अवसर आए दोउ भाई। गए रहे देखन फुलवाई।।
अर्थ · Hindi
तेहि अवसर आए दोउ भाई। गए रहे देखन फुलवाई।।
- RCM 1.215.5Open verse →
स्याम गौर मृदु बयस किसोरा। लोचन सुखद बिस्व चित चोरा।।
अर्थ · Hindi
स्याम गौर मृदु बयस किसोरा। लोचन सुखद बिस्व चित चोरा।।
- RCM 1.215.6Open verse →
उठे सकल जब रघुपति आए। बिस्वामित्र निकट बैठाए।।
अर्थ · Hindi
उठे सकल जब रघुपति आए। बिस्वामित्र निकट बैठाए।।
- RCM 1.215.7Open verse →
भए सब सुखी देखि दोउ भ्राता। बारि बिलोचन पुलकित गाता।।
अर्थ · Hindi
भए सब सुखी देखि दोउ भ्राता। बारि बिलोचन पुलकित गाता।।
- RCM 1.215.8Open verse →
मूरति मधुर मनोहर देखी। भयउ बिदेहु बिदेहु बिसेषी।।
अर्थ · Hindi
मूरति मधुर मनोहर देखी। भयउ बिदेहु बिदेहु बिसेषी।।
- RCM 1.215.9Open verse →
प्रेम मगन मनु जानि नृपु करि बिबेकु धरि धीर।
अर्थ · Hindi
प्रेम मगन मनु जानि नृपु करि बिबेकु धरि धीर।
- RCM 1.215.10Open verse →
बोलेउ मुनि पद नाइ सिरु गदगद गिरा गभीर।।215।।
अर्थ · Hindi
बोलेउ मुनि पद नाइ सिरु गदगद गिरा गभीर।।215।।
- RCM 1.216.1Open verse →
कहहु नाथ सुंदर दोउ बालक। मुनिकुल तिलक कि नृपकुल पालक।।
अर्थ · Hindi
कहहु नाथ सुंदर दोउ बालक। मुनिकुल तिलक कि नृपकुल पालक।।
- RCM 1.216.2Open verse →
ब्रह्म जो निगम नेति कहि गावा। उभय बेष धरि की सोइ आवा।।
अर्थ · Hindi
ब्रह्म जो निगम नेति कहि गावा। उभय बेष धरि की सोइ आवा।।
- RCM 1.216.3Open verse →
सहज बिरागरुप मनु मोरा। थकित होत जिमि चंद चकोरा।।
अर्थ · Hindi
सहज बिरागरुप मनु मोरा। थकित होत जिमि चंद चकोरा।।
- RCM 1.216.4Open verse →
ताते प्रभु पूछउँ सतिभाऊ। कहहु नाथ जनि करहु दुराऊ।।
अर्थ · Hindi
ताते प्रभु पूछउँ सतिभाऊ। कहहु नाथ जनि करहु दुराऊ।।
- RCM 1.216.5Open verse →
इन्हहि बिलोकत अति अनुरागा। बरबस ब्रह्मसुखहि मन त्यागा।।
अर्थ · Hindi
इन्हहि बिलोकत अति अनुरागा। बरबस ब्रह्मसुखहि मन त्यागा।।
- RCM 1.216.6Open verse →
कह मुनि बिहसि कहेहु नृप नीका। बचन तुम्हार न होइ अलीका।।
अर्थ · Hindi
कह मुनि बिहसि कहेहु नृप नीका। बचन तुम्हार न होइ अलीका।।
- RCM 1.216.7Open verse →
ए प्रिय सबहि जहाँ लगि प्रानी। मन मुसुकाहिं रामु सुनि बानी।।
अर्थ · Hindi
ए प्रिय सबहि जहाँ लगि प्रानी। मन मुसुकाहिं रामु सुनि बानी।।
- RCM 1.216.8Open verse →
रघुकुल मनि दसरथ के जाए। मम हित लागि नरेस पठाए।।
अर्थ · Hindi
रघुकुल मनि दसरथ के जाए। मम हित लागि नरेस पठाए।।
- RCM 1.216.9Open verse →
रामु लखनु दोउ बंधुबर रूप सील बल धाम।
अर्थ · Hindi
रामु लखनु दोउ बंधुबर रूप सील बल धाम।
- RCM 1.216.10Open verse →
मख राखेउ सबु साखि जगु जिते असुर संग्राम।।216।।
अर्थ · Hindi
मख राखेउ सबु साखि जगु जिते असुर संग्राम।।216।।
- RCM 1.217.1Open verse →
मुनि तव चरन देखि कह राऊ। कहि न सकउँ निज पुन्य प्राभाऊ।।
अर्थ · Hindi
मुनि तव चरन देखि कह राऊ। कहि न सकउँ निज पुन्य प्राभाऊ।।
- RCM 1.217.2Open verse →
सुंदर स्याम गौर दोउ भ्राता। आनँदहू के आनँद दाता।।
अर्थ · Hindi
सुंदर स्याम गौर दोउ भ्राता। आनँदहू के आनँद दाता।।
- RCM 1.217.3Open verse →
इन्ह कै प्रीति परसपर पावनि। कहि न जाइ मन भाव सुहावनि।।
अर्थ · Hindi
इन्ह कै प्रीति परसपर पावनि। कहि न जाइ मन भाव सुहावनि।।
- RCM 1.217.4Open verse →
सुनहु नाथ कह मुदित बिदेहू। ब्रह्म जीव इव सहज सनेहू।।
अर्थ · Hindi
सुनहु नाथ कह मुदित बिदेहू। ब्रह्म जीव इव सहज सनेहू।।
- RCM 1.217.5Open verse →
पुनि पुनि प्रभुहि चितव नरनाहू। पुलक गात उर अधिक उछाहू।।
अर्थ · Hindi
पुनि पुनि प्रभुहि चितव नरनाहू। पुलक गात उर अधिक उछाहू।।
- RCM 1.217.6Open verse →
म्रुनिहि प्रसंसि नाइ पद सीसू। चलेउ लवाइ नगर अवनीसू।।
अर्थ · Hindi
म्रुनिहि प्रसंसि नाइ पद सीसू। चलेउ लवाइ नगर अवनीसू।।
- RCM 1.217.7Open verse →
सुंदर सदनु सुखद सब काला। तहाँ बासु लै दीन्ह भुआला।।
अर्थ · Hindi
सुंदर सदनु सुखद सब काला। तहाँ बासु लै दीन्ह भुआला।।
- RCM 1.217.8Open verse →
करि पूजा सब बिधि सेवकाई। गयउ राउ गृह बिदा कराई।।
अर्थ · Hindi
करि पूजा सब बिधि सेवकाई। गयउ राउ गृह बिदा कराई।।
- RCM 1.217.9Open verse →
रिषय संग रघुबंस मनि करि भोजनु बिश्रामु।
अर्थ · Hindi
रिषय संग रघुबंस मनि करि भोजनु बिश्रामु।
- RCM 1.217.10Open verse →
बैठे प्रभु भ्राता सहित दिवसु रहा भरि जामु।।217।।
अर्थ · Hindi
बैठे प्रभु भ्राता सहित दिवसु रहा भरि जामु।।217।।
- RCM 1.218.1Open verse →
लखन हृदयँ लालसा बिसेषी। जाइ जनकपुर आइअ देखी।।
अर्थ · Hindi
लखन हृदयँ लालसा बिसेषी। जाइ जनकपुर आइअ देखी।।
- RCM 1.218.2Open verse →
प्रभु भय बहुरि मुनिहि सकुचाहीं। प्रगट न कहहिं मनहिं मुसुकाहीं।।
अर्थ · Hindi
प्रभु भय बहुरि मुनिहि सकुचाहीं। प्रगट न कहहिं मनहिं मुसुकाहीं।।
- RCM 1.218.3Open verse →
राम अनुज मन की गति जानी। भगत बछलता हिंयँ हुलसानी।।
अर्थ · Hindi
राम अनुज मन की गति जानी। भगत बछलता हिंयँ हुलसानी।।
- RCM 1.218.4Open verse →
परम बिनीत सकुचि मुसुकाई। बोले गुर अनुसासन पाई।।
अर्थ · Hindi
परम बिनीत सकुचि मुसुकाई। बोले गुर अनुसासन पाई।।
- RCM 1.218.5Open verse →
नाथ लखनु पुरु देखन चहहीं। प्रभु सकोच डर प्रगट न कहहीं।।
अर्थ · Hindi
नाथ लखनु पुरु देखन चहहीं। प्रभु सकोच डर प्रगट न कहहीं।।
- RCM 1.218.6Open verse →
जौं राउर आयसु मैं पावौं। नगर देखाइ तुरत लै आवौ।।
अर्थ · Hindi
जौं राउर आयसु मैं पावौं। नगर देखाइ तुरत लै आवौ।।
- RCM 1.218.7Open verse →
सुनि मुनीसु कह बचन सप्रीती। कस न राम तुम्ह राखहु नीती।।
अर्थ · Hindi
सुनि मुनीसु कह बचन सप्रीती। कस न राम तुम्ह राखहु नीती।।
- RCM 1.218.8Open verse →
धरम सेतु पालक तुम्ह ताता। प्रेम बिबस सेवक सुखदाता।।
अर्थ · Hindi
धरम सेतु पालक तुम्ह ताता। प्रेम बिबस सेवक सुखदाता।।
- RCM 1.218.9Open verse →
जाइ देखी आवहु नगरु सुख निधान दोउ भाइ।
अर्थ · Hindi
जाइ देखी आवहु नगरु सुख निधान दोउ भाइ।
- RCM 1.218.10Open verse →
करहु सुफल सब के नयन सुंदर बदन देखाइ।।218।।
अर्थ · Hindi
करहु सुफल सब के नयन सुंदर बदन देखाइ।।218।।
- RCM 1.219.1Open verse →
मुनि पद कमल बंदि दोउ भ्राता। चले लोक लोचन सुख दाता।।
अर्थ · Hindi
मुनि पद कमल बंदि दोउ भ्राता। चले लोक लोचन सुख दाता।।
- RCM 1.219.2Open verse →
बालक बृंदि देखि अति सोभा। लगे संग लोचन मनु लोभा।।
अर्थ · Hindi
बालक बृंदि देखि अति सोभा। लगे संग लोचन मनु लोभा।।
- RCM 1.219.3Open verse →
पीत बसन परिकर कटि भाथा। चारु चाप सर सोहत हाथा।।
अर्थ · Hindi
पीत बसन परिकर कटि भाथा। चारु चाप सर सोहत हाथा।।
- RCM 1.219.4Open verse →
तन अनुहरत सुचंदन खोरी। स्यामल गौर मनोहर जोरी।।
अर्थ · Hindi
तन अनुहरत सुचंदन खोरी। स्यामल गौर मनोहर जोरी।।
- RCM 1.219.5Open verse →
केहरि कंधर बाहु बिसाला। उर अति रुचिर नागमनि माला।।
अर्थ · Hindi
केहरि कंधर बाहु बिसाला। उर अति रुचिर नागमनि माला।।
- RCM 1.219.6Open verse →
सुभग सोन सरसीरुह लोचन। बदन मयंक तापत्रय मोचन।।
अर्थ · Hindi
सुभग सोन सरसीरुह लोचन। बदन मयंक तापत्रय मोचन।।
- RCM 1.219.7Open verse →
कानन्हि कनक फूल छबि देहीं। चितवत चितहि चोरि जनु लेहीं।।
अर्थ · Hindi
कानन्हि कनक फूल छबि देहीं। चितवत चितहि चोरि जनु लेहीं।।
- RCM 1.219.8Open verse →
चितवनि चारु भृकुटि बर बाँकी। तिलक रेखा सोभा जनु चाँकी।।
अर्थ · Hindi
चितवनि चारु भृकुटि बर बाँकी। तिलक रेखा सोभा जनु चाँकी।।
- RCM 1.219.9Open verse →
रुचिर चौतनीं सुभग सिर मेचक कुंचित केस।
अर्थ · Hindi
रुचिर चौतनीं सुभग सिर मेचक कुंचित केस।
- RCM 1.219.10Open verse →
नख सिख सुंदर बंधु दोउ सोभा सकल सुदेस।।219।।
अर्थ · Hindi
नख सिख सुंदर बंधु दोउ सोभा सकल सुदेस।।219।।
- RCM 1.220.1Open verse →
देखन नगरु भूपसुत आए। समाचार पुरबासिन्ह पाए।।
अर्थ · Hindi
देखन नगरु भूपसुत आए। समाचार पुरबासिन्ह पाए।।
- RCM 1.220.2Open verse →
धाए धाम काम सब त्यागी। मनहु रंक निधि लूटन लागी।।
अर्थ · Hindi
धाए धाम काम सब त्यागी। मनहु रंक निधि लूटन लागी।।
- RCM 1.220.3Open verse →
निरखि सहज सुंदर दोउ भाई। होहिं सुखी लोचन फल पाई।।
अर्थ · Hindi
निरखि सहज सुंदर दोउ भाई। होहिं सुखी लोचन फल पाई।।
- RCM 1.220.4Open verse →
जुबतीं भवन झरोखन्हि लागीं। निरखहिं राम रूप अनुरागीं।।
अर्थ · Hindi
जुबतीं भवन झरोखन्हि लागीं। निरखहिं राम रूप अनुरागीं।।
- RCM 1.220.5Open verse →
कहहिं परसपर बचन सप्रीती। सखि इन्ह कोटि काम छबि जीती।।
अर्थ · Hindi
कहहिं परसपर बचन सप्रीती। सखि इन्ह कोटि काम छबि जीती।।
- RCM 1.220.6Open verse →
सुर नर असुर नाग मुनि माहीं। सोभा असि कहुँ सुनिअति नाहीं।।
अर्थ · Hindi
सुर नर असुर नाग मुनि माहीं। सोभा असि कहुँ सुनिअति नाहीं।।
- RCM 1.220.7Open verse →
बिष्नु चारि भुज बिघि मुख चारी। बिकट बेष मुख पंच पुरारी।।
अर्थ · Hindi
बिष्नु चारि भुज बिघि मुख चारी। बिकट बेष मुख पंच पुरारी।।
- RCM 1.220.8Open verse →
अपर देउ अस कोउ न आही। यह छबि सखि पटतरिअ जाही।।
अर्थ · Hindi
अपर देउ अस कोउ न आही। यह छबि सखि पटतरिअ जाही।।
- RCM 1.220.9Open verse →
बय किसोर सुषमा सदन स्याम गौर सुख घाम।
अर्थ · Hindi
बय किसोर सुषमा सदन स्याम गौर सुख घाम।
- RCM 1.220.10Open verse →
अंग अंग पर वारिअहिं कोटि कोटि सत काम।।220।।
अर्थ · Hindi
अंग अंग पर वारिअहिं कोटि कोटि सत काम।।220।।
- RCM 1.221.1Open verse →
कहहु सखी अस को तनुधारी। जो न मोह यह रूप निहारी।।
अर्थ · Hindi
कहहु सखी अस को तनुधारी। जो न मोह यह रूप निहारी।।
- RCM 1.221.2Open verse →
कोउ सप्रेम बोली मृदु बानी। जो मैं सुना सो सुनहु सयानी।।
अर्थ · Hindi
कोउ सप्रेम बोली मृदु बानी। जो मैं सुना सो सुनहु सयानी।।
- RCM 1.221.3Open verse →
ए दोऊ दसरथ के ढोटा। बाल मरालन्हि के कल जोटा।।
अर्थ · Hindi
ए दोऊ दसरथ के ढोटा। बाल मरालन्हि के कल जोटा।।
- RCM 1.221.4Open verse →
मुनि कौसिक मख के रखवारे। जिन्ह रन अजिर निसाचर मारे।।
अर्थ · Hindi
मुनि कौसिक मख के रखवारे। जिन्ह रन अजिर निसाचर मारे।।
- RCM 1.221.5Open verse →
स्याम गात कल कंज बिलोचन। जो मारीच सुभुज मदु मोचन।।
अर्थ · Hindi
स्याम गात कल कंज बिलोचन। जो मारीच सुभुज मदु मोचन।।
- RCM 1.221.6Open verse →
कौसल्या सुत सो सुख खानी। नामु रामु धनु सायक पानी।।
अर्थ · Hindi
कौसल्या सुत सो सुख खानी। नामु रामु धनु सायक पानी।।
- RCM 1.221.7Open verse →
गौर किसोर बेषु बर काछें। कर सर चाप राम के पाछें।।
अर्थ · Hindi
गौर किसोर बेषु बर काछें। कर सर चाप राम के पाछें।।
- RCM 1.221.8Open verse →
लछिमनु नामु राम लघु भ्राता। सुनु सखि तासु सुमित्रा माता।।
अर्थ · Hindi
लछिमनु नामु राम लघु भ्राता। सुनु सखि तासु सुमित्रा माता।।
- RCM 1.221.9Open verse →
बिप्रकाजु करि बंधु दोउ मग मुनिबधू उधारि।
अर्थ · Hindi
बिप्रकाजु करि बंधु दोउ मग मुनिबधू उधारि।
- RCM 1.221.10Open verse →
आए देखन चापमख सुनि हरषीं सब नारि।।221।।
अर्थ · Hindi
आए देखन चापमख सुनि हरषीं सब नारि।।221।।
- RCM 1.222.1Open verse →
देखि राम छबि कोउ एक कहई। जोगु जानकिहि यह बरु अहई।।
अर्थ · Hindi
देखि राम छबि कोउ एक कहई। जोगु जानकिहि यह बरु अहई।।
- RCM 1.222.2Open verse →
जौ सखि इन्हहि देख नरनाहू। पन परिहरि हठि करइ बिबाहू।।
अर्थ · Hindi
जौ सखि इन्हहि देख नरनाहू। पन परिहरि हठि करइ बिबाहू।।
- RCM 1.222.3Open verse →
कोउ कह ए भूपति पहिचाने। मुनि समेत सादर सनमाने।।
अर्थ · Hindi
कोउ कह ए भूपति पहिचाने। मुनि समेत सादर सनमाने।।
- RCM 1.222.4Open verse →
सखि परंतु पनु राउ न तजई। बिधि बस हठि अबिबेकहि भजई।।
अर्थ · Hindi
सखि परंतु पनु राउ न तजई। बिधि बस हठि अबिबेकहि भजई।।
- RCM 1.222.5Open verse →
कोउ कह जौं भल अहइ बिधाता। सब कहँ सुनिअ उचित फलदाता।।
अर्थ · Hindi
कोउ कह जौं भल अहइ बिधाता। सब कहँ सुनिअ उचित फलदाता।।
- RCM 1.222.6Open verse →
तौ जानकिहि मिलिहि बरु एहू। नाहिन आलि इहाँ संदेहू।।
अर्थ · Hindi
तौ जानकिहि मिलिहि बरु एहू। नाहिन आलि इहाँ संदेहू।।
- RCM 1.222.7Open verse →
जौ बिधि बस अस बनै सँजोगू। तौ कृतकृत्य होइ सब लोगू।।
अर्थ · Hindi
जौ बिधि बस अस बनै सँजोगू। तौ कृतकृत्य होइ सब लोगू।।
- RCM 1.222.8Open verse →
सखि हमरें आरति अति तातें। कबहुँक ए आवहिं एहि नातें।।
अर्थ · Hindi
सखि हमरें आरति अति तातें। कबहुँक ए आवहिं एहि नातें।।
- RCM 1.222.9Open verse →
नाहिं त हम कहुँ सुनहु सखि इन्ह कर दरसनु दूरि।
अर्थ · Hindi
नाहिं त हम कहुँ सुनहु सखि इन्ह कर दरसनु दूरि।
- RCM 1.222.10Open verse →
यह संघटु तब होइ जब पुन्य पुराकृत भूरि।।222।।
अर्थ · Hindi
यह संघटु तब होइ जब पुन्य पुराकृत भूरि।।222।।
- RCM 1.223.1Open verse →
बोली अपर कहेहु सखि नीका। एहिं बिआह अति हित सबहीं का।।
अर्थ · Hindi
बोली अपर कहेहु सखि नीका। एहिं बिआह अति हित सबहीं का।।
- RCM 1.223.2Open verse →
कोउ कह संकर चाप कठोरा। ए स्यामल मृदुगात किसोरा।।
अर्थ · Hindi
कोउ कह संकर चाप कठोरा। ए स्यामल मृदुगात किसोरा।।
- RCM 1.223.3Open verse →
सबु असमंजस अहइ सयानी। यह सुनि अपर कहइ मृदु बानी।।
अर्थ · Hindi
सबु असमंजस अहइ सयानी। यह सुनि अपर कहइ मृदु बानी।।
- RCM 1.223.4Open verse →
सखि इन्ह कहँ कोउ कोउ अस कहहीं। बड़ प्रभाउ देखत लघु अहहीं।।
अर्थ · Hindi
सखि इन्ह कहँ कोउ कोउ अस कहहीं। बड़ प्रभाउ देखत लघु अहहीं।।
- RCM 1.223.5Open verse →
परसि जासु पद पंकज धूरी। तरी अहल्या कृत अघ भूरी।।
अर्थ · Hindi
परसि जासु पद पंकज धूरी। तरी अहल्या कृत अघ भूरी।।
- RCM 1.223.6Open verse →
सो कि रहिहि बिनु सिवधनु तोरें। यह प्रतीति परिहरिअ न भोरें।।
अर्थ · Hindi
सो कि रहिहि बिनु सिवधनु तोरें। यह प्रतीति परिहरिअ न भोरें।।
- RCM 1.223.7Open verse →
जेहिं बिरंचि रचि सीय सँवारी। तेहिं स्यामल बरु रचेउ बिचारी।।
अर्थ · Hindi
जेहिं बिरंचि रचि सीय सँवारी। तेहिं स्यामल बरु रचेउ बिचारी।।
- RCM 1.223.8Open verse →
तासु बचन सुनि सब हरषानीं। ऐसेइ होउ कहहिं मुदु बानी।।
अर्थ · Hindi
तासु बचन सुनि सब हरषानीं। ऐसेइ होउ कहहिं मुदु बानी।।
- RCM 1.223.9Open verse →
हियँ हरषहिं बरषहिं सुमन सुमुखि सुलोचनि बृंद।
अर्थ · Hindi
हियँ हरषहिं बरषहिं सुमन सुमुखि सुलोचनि बृंद।
- RCM 1.223.10Open verse →
जाहिं जहाँ जहँ बंधु दोउ तहँ तहँ परमानंद।।223।।
अर्थ · Hindi
जाहिं जहाँ जहँ बंधु दोउ तहँ तहँ परमानंद।।223।।
- RCM 1.224.1Open verse →
पुर पूरब दिसि गे दोउ भाई। जहँ धनुमख हित भूमि बनाई।।
अर्थ · Hindi
पुर पूरब दिसि गे दोउ भाई। जहँ धनुमख हित भूमि बनाई।।
- RCM 1.224.2Open verse →
अति बिस्तार चारु गच ढारी। बिमल बेदिका रुचिर सँवारी।।
अर्थ · Hindi
अति बिस्तार चारु गच ढारी। बिमल बेदिका रुचिर सँवारी।।
- RCM 1.224.3Open verse →
चहुँ दिसि कंचन मंच बिसाला। रचे जहाँ बेठहिं महिपाला।।
अर्थ · Hindi
चहुँ दिसि कंचन मंच बिसाला। रचे जहाँ बेठहिं महिपाला।।
- RCM 1.224.4Open verse →
तेहि पाछें समीप चहुँ पासा। अपर मंच मंडली बिलासा।।
अर्थ · Hindi
तेहि पाछें समीप चहुँ पासा। अपर मंच मंडली बिलासा।।
- RCM 1.224.5Open verse →
कछुक ऊँचि सब भाँति सुहाई। बैठहिं नगर लोग जहँ जाई।।
अर्थ · Hindi
कछुक ऊँचि सब भाँति सुहाई। बैठहिं नगर लोग जहँ जाई।।
- RCM 1.224.6Open verse →
तिन्ह के निकट बिसाल सुहाए। धवल धाम बहुबरन बनाए।।
अर्थ · Hindi
तिन्ह के निकट बिसाल सुहाए। धवल धाम बहुबरन बनाए।।
- RCM 1.224.7Open verse →
जहँ बैंठैं देखहिं सब नारी। जथा जोगु निज कुल अनुहारी।।
अर्थ · Hindi
जहँ बैंठैं देखहिं सब नारी। जथा जोगु निज कुल अनुहारी।।
- RCM 1.224.8Open verse →
पुर बालक कहि कहि मृदु बचना। सादर प्रभुहि देखावहिं रचना।।
अर्थ · Hindi
पुर बालक कहि कहि मृदु बचना। सादर प्रभुहि देखावहिं रचना।।
- RCM 1.224.9Open verse →
सब सिसु एहि मिस प्रेमबस परसि मनोहर गात।
अर्थ · Hindi
सब सिसु एहि मिस प्रेमबस परसि मनोहर गात।
- RCM 1.224.10Open verse →
तन पुलकहिं अति हरषु हियँ देखि देखि दोउ भ्रात।।224।।
अर्थ · Hindi
तन पुलकहिं अति हरषु हियँ देखि देखि दोउ भ्रात।।224।।
- RCM 1.225.1Open verse →
सिसु सब राम प्रेमबस जाने। प्रीति समेत निकेत बखाने।।
अर्थ · Hindi
सिसु सब राम प्रेमबस जाने। प्रीति समेत निकेत बखाने।।
- RCM 1.225.2Open verse →
निज निज रुचि सब लेंहिं बोलाई। सहित सनेह जाहिं दोउ भाई।।
अर्थ · Hindi
निज निज रुचि सब लेंहिं बोलाई। सहित सनेह जाहिं दोउ भाई।।
- RCM 1.225.3Open verse →
राम देखावहिं अनुजहि रचना। कहि मृदु मधुर मनोहर बचना।।
अर्थ · Hindi
राम देखावहिं अनुजहि रचना। कहि मृदु मधुर मनोहर बचना।।
- RCM 1.225.4Open verse →
लव निमेष महँ भुवन निकाया। रचइ जासु अनुसासन माया।।
अर्थ · Hindi
लव निमेष महँ भुवन निकाया। रचइ जासु अनुसासन माया।।
- RCM 1.225.5Open verse →
भगति हेतु सोइ दीनदयाला। चितवत चकित धनुष मखसाला।।
अर्थ · Hindi
भगति हेतु सोइ दीनदयाला। चितवत चकित धनुष मखसाला।।
- RCM 1.225.6Open verse →
कौतुक देखि चले गुरु पाहीं। जानि बिलंबु त्रास मन माहीं।।
अर्थ · Hindi
कौतुक देखि चले गुरु पाहीं। जानि बिलंबु त्रास मन माहीं।।
- RCM 1.225.7Open verse →
जासु त्रास डर कहुँ डर होई। भजन प्रभाउ देखावत सोई।।
अर्थ · Hindi
जासु त्रास डर कहुँ डर होई। भजन प्रभाउ देखावत सोई।।
- RCM 1.225.8Open verse →
कहि बातें मृदु मधुर सुहाईं। किए बिदा बालक बरिआई।।
अर्थ · Hindi
कहि बातें मृदु मधुर सुहाईं। किए बिदा बालक बरिआई।।
- RCM 1.225.9Open verse →
सभय सप्रेम बिनीत अति सकुच सहित दोउ भाइ।
अर्थ · Hindi
सभय सप्रेम बिनीत अति सकुच सहित दोउ भाइ।
- RCM 1.225.10Open verse →
गुर पद पंकज नाइ सिर बैठे आयसु पाइ।।225।।
अर्थ · Hindi
गुर पद पंकज नाइ सिर बैठे आयसु पाइ।।225।।
- RCM 1.226.1Open verse →
निसि प्रबेस मुनि आयसु दीन्हा। सबहीं संध्याबंदनु कीन्हा।।
अर्थ · Hindi
निसि प्रबेस मुनि आयसु दीन्हा। सबहीं संध्याबंदनु कीन्हा।।
- RCM 1.226.2Open verse →
कहत कथा इतिहास पुरानी। रुचिर रजनि जुग जाम सिरानी।।
अर्थ · Hindi
कहत कथा इतिहास पुरानी। रुचिर रजनि जुग जाम सिरानी।।
- RCM 1.226.3Open verse →
मुनिबर सयन कीन्हि तब जाई। लगे चरन चापन दोउ भाई।।
अर्थ · Hindi
मुनिबर सयन कीन्हि तब जाई। लगे चरन चापन दोउ भाई।।
- RCM 1.226.4Open verse →
जिन्ह के चरन सरोरुह लागी। करत बिबिध जप जोग बिरागी।।
अर्थ · Hindi
जिन्ह के चरन सरोरुह लागी। करत बिबिध जप जोग बिरागी।।
- RCM 1.226.5Open verse →
तेइ दोउ बंधु प्रेम जनु जीते। गुर पद कमल पलोटत प्रीते।।
अर्थ · Hindi
तेइ दोउ बंधु प्रेम जनु जीते। गुर पद कमल पलोटत प्रीते।।
- RCM 1.226.6Open verse →
बारबार मुनि अग्या दीन्ही। रघुबर जाइ सयन तब कीन्ही।।
अर्थ · Hindi
बारबार मुनि अग्या दीन्ही। रघुबर जाइ सयन तब कीन्ही।।
- RCM 1.226.7Open verse →
चापत चरन लखनु उर लाएँ। सभय सप्रेम परम सचु पाएँ।।
अर्थ · Hindi
चापत चरन लखनु उर लाएँ। सभय सप्रेम परम सचु पाएँ।।
- RCM 1.226.8Open verse →
पुनि पुनि प्रभु कह सोवहु ताता। पौढ़े धरि उर पद जलजाता।।
अर्थ · Hindi
पुनि पुनि प्रभु कह सोवहु ताता। पौढ़े धरि उर पद जलजाता।।
- RCM 1.226.9Open verse →
उठे लखन निसि बिगत सुनि अरुनसिखा धुनि कान।।
अर्थ · Hindi
उठे लखन निसि बिगत सुनि अरुनसिखा धुनि कान।।
- RCM 1.226.10Open verse →
गुर तें पहिलेहिं जगतपति जागे रामु सुजान।।226।।
अर्थ · Hindi
गुर तें पहिलेहिं जगतपति जागे रामु सुजान।।226।।
- RCM 1.227.1Open verse →
सकल सौच करि जाइ नहाए। नित्य निबाहि मुनिहि सिर नाए।।
अर्थ · Hindi
सकल सौच करि जाइ नहाए। नित्य निबाहि मुनिहि सिर नाए।।
- RCM 1.227.2Open verse →
समय जानि गुर आयसु पाई। लेन प्रसून चले दोउ भाई।।
अर्थ · Hindi
समय जानि गुर आयसु पाई। लेन प्रसून चले दोउ भाई।।
- RCM 1.227.3Open verse →
भूप बागु बर देखेउ जाई। जहँ बसंत रितु रही लोभाई।।
अर्थ · Hindi
भूप बागु बर देखेउ जाई। जहँ बसंत रितु रही लोभाई।।
- RCM 1.227.4Open verse →
लागे बिटप मनोहर नाना। बरन बरन बर बेलि बिताना।।
अर्थ · Hindi
लागे बिटप मनोहर नाना। बरन बरन बर बेलि बिताना।।
- RCM 1.227.5Open verse →
नव पल्लव फल सुमान सुहाए। निज संपति सुर रूख लजाए।।
अर्थ · Hindi
नव पल्लव फल सुमान सुहाए। निज संपति सुर रूख लजाए।।
- RCM 1.227.6Open verse →
चातक कोकिल कीर चकोरा। कूजत बिहग नटत कल मोरा।।
अर्थ · Hindi
चातक कोकिल कीर चकोरा। कूजत बिहग नटत कल मोरा।।
- RCM 1.227.7Open verse →
मध्य बाग सरु सोह सुहावा। मनि सोपान बिचित्र बनावा।।
अर्थ · Hindi
मध्य बाग सरु सोह सुहावा। मनि सोपान बिचित्र बनावा।।
- RCM 1.227.8Open verse →
बिमल सलिलु सरसिज बहुरंगा। जलखग कूजत गुंजत भृंगा।।
अर्थ · Hindi
बिमल सलिलु सरसिज बहुरंगा। जलखग कूजत गुंजत भृंगा।।
- RCM 1.227.9Open verse →
बागु तड़ागु बिलोकि प्रभु हरषे बंधु समेत।
अर्थ · Hindi
बागु तड़ागु बिलोकि प्रभु हरषे बंधु समेत।
- RCM 1.227.10Open verse →
परम रम्य आरामु यहु जो रामहि सुख देत।।227।।
अर्थ · Hindi
परम रम्य आरामु यहु जो रामहि सुख देत।।227।।
- RCM 1.228.1Open verse →
चहुँ दिसि चितइ पूँछि मालिगन। लगे लेन दल फूल मुदित मन।।
अर्थ · Hindi
चहुँ दिसि चितइ पूँछि मालिगन। लगे लेन दल फूल मुदित मन।।
- RCM 1.228.2Open verse →
तेहि अवसर सीता तहँ आई। गिरिजा पूजन जननि पठाई।।
अर्थ · Hindi
तेहि अवसर सीता तहँ आई। गिरिजा पूजन जननि पठाई।।
- RCM 1.228.3Open verse →
संग सखीं सब सुभग सयानी। गावहिं गीत मनोहर बानी।।
अर्थ · Hindi
संग सखीं सब सुभग सयानी। गावहिं गीत मनोहर बानी।।
- RCM 1.228.4Open verse →
सर समीप गिरिजा गृह सोहा। बरनि न जाइ देखि मनु मोहा।।
अर्थ · Hindi
सर समीप गिरिजा गृह सोहा। बरनि न जाइ देखि मनु मोहा।।
- RCM 1.228.5Open verse →
मज्जनु करि सर सखिन्ह समेता। गई मुदित मन गौरि निकेता।।
अर्थ · Hindi
मज्जनु करि सर सखिन्ह समेता। गई मुदित मन गौरि निकेता।।
- RCM 1.228.6Open verse →
पूजा कीन्हि अधिक अनुरागा। निज अनुरूप सुभग बरु मागा।।
अर्थ · Hindi
पूजा कीन्हि अधिक अनुरागा। निज अनुरूप सुभग बरु मागा।।
- RCM 1.228.7Open verse →
एक सखी सिय संगु बिहाई। गई रही देखन फुलवाई।।
अर्थ · Hindi
एक सखी सिय संगु बिहाई। गई रही देखन फुलवाई।।
- RCM 1.228.8Open verse →
तेहि दोउ बंधु बिलोके जाई। प्रेम बिबस सीता पहिं आई।।
अर्थ · Hindi
तेहि दोउ बंधु बिलोके जाई। प्रेम बिबस सीता पहिं आई।।
- RCM 1.228.9Open verse →
तासु दसा देखि सखिन्ह पुलक गात जलु नैन।
अर्थ · Hindi
तासु दसा देखि सखिन्ह पुलक गात जलु नैन।
- RCM 1.228.10Open verse →
कहु कारनु निज हरष कर पूछहि सब मृदु बैन।।228।।
अर्थ · Hindi
कहु कारनु निज हरष कर पूछहि सब मृदु बैन।।228।।
- RCM 1.229.1Open verse →
देखन बागु कुअँर दुइ आए। बय किसोर सब भाँति सुहाए।।
अर्थ · Hindi
देखन बागु कुअँर दुइ आए। बय किसोर सब भाँति सुहाए।।
- RCM 1.229.2Open verse →
स्याम गौर किमि कहौं बखानी। गिरा अनयन नयन बिनु बानी।।
अर्थ · Hindi
स्याम गौर किमि कहौं बखानी। गिरा अनयन नयन बिनु बानी।।
- RCM 1.229.3Open verse →
सुनि हरषीं सब सखीं सयानी। सिय हियँ अति उतकंठा जानी।।
अर्थ · Hindi
सुनि हरषीं सब सखीं सयानी। सिय हियँ अति उतकंठा जानी।।
- RCM 1.229.4Open verse →
एक कहइ नृपसुत तेइ आली। सुने जे मुनि सँग आए काली।।
अर्थ · Hindi
एक कहइ नृपसुत तेइ आली। सुने जे मुनि सँग आए काली।।
- RCM 1.229.5Open verse →
जिन्ह निज रूप मोहनी डारी। कीन्ह स्वबस नगर नर नारी।।
अर्थ · Hindi
जिन्ह निज रूप मोहनी डारी। कीन्ह स्वबस नगर नर नारी।।
- RCM 1.229.6Open verse →
बरनत छबि जहँ तहँ सब लोगू। अवसि देखिअहिं देखन जोगू।।
अर्थ · Hindi
बरनत छबि जहँ तहँ सब लोगू। अवसि देखिअहिं देखन जोगू।।
- RCM 1.229.7Open verse →
तासु वचन अति सियहि सुहाने। दरस लागि लोचन अकुलाने।।
अर्थ · Hindi
तासु वचन अति सियहि सुहाने। दरस लागि लोचन अकुलाने।।
- RCM 1.229.8Open verse →
चली अग्र करि प्रिय सखि सोई। प्रीति पुरातन लखइ न कोई।।
अर्थ · Hindi
चली अग्र करि प्रिय सखि सोई। प्रीति पुरातन लखइ न कोई।।
- RCM 1.229.9Open verse →
सुमिरि सीय नारद बचन उपजी प्रीति पुनीत।।
अर्थ · Hindi
सुमिरि सीय नारद बचन उपजी प्रीति पुनीत।।
- RCM 1.229.10Open verse →
चकित बिलोकति सकल दिसि जनु सिसु मृगी सभीत।।229।।
अर्थ · Hindi
चकित बिलोकति सकल दिसि जनु सिसु मृगी सभीत।।229।।
- RCM 1.230.1Open verse →
कंकन किंकिनि नूपुर धुनि सुनि। कहत लखन सन रामु हृदयँ गुनि।।
अर्थ · Hindi
कंकन किंकिनि नूपुर धुनि सुनि। कहत लखन सन रामु हृदयँ गुनि।।
- RCM 1.230.2Open verse →
मानहुँ मदन दुंदुभी दीन्ही।।मनसा बिस्व बिजय कहँ कीन्ही।।
अर्थ · Hindi
मानहुँ मदन दुंदुभी दीन्ही।।मनसा बिस्व बिजय कहँ कीन्ही।।
- RCM 1.230.3Open verse →
अस कहि फिरि चितए तेहि ओरा। सिय मुख ससि भए नयन चकोरा।।
अर्थ · Hindi
अस कहि फिरि चितए तेहि ओरा। सिय मुख ससि भए नयन चकोरा।।
- RCM 1.230.4Open verse →
भए बिलोचन चारु अचंचल। मनहुँ सकुचि निमि तजे दिगंचल।।
अर्थ · Hindi
भए बिलोचन चारु अचंचल। मनहुँ सकुचि निमि तजे दिगंचल।।
- RCM 1.230.5Open verse →
देखि सीय सोभा सुखु पावा। हृदयँ सराहत बचनु न आवा।।
अर्थ · Hindi
देखि सीय सोभा सुखु पावा। हृदयँ सराहत बचनु न आवा।।
- RCM 1.230.6Open verse →
जनु बिरंचि सब निज निपुनाई। बिरचि बिस्व कहँ प्रगटि देखाई।।
अर्थ · Hindi
जनु बिरंचि सब निज निपुनाई। बिरचि बिस्व कहँ प्रगटि देखाई।।
- RCM 1.230.7Open verse →
सुंदरता कहुँ सुंदर करई। छबिगृहँ दीपसिखा जनु बरई।।
अर्थ · Hindi
सुंदरता कहुँ सुंदर करई। छबिगृहँ दीपसिखा जनु बरई।।
- RCM 1.230.8Open verse →
सब उपमा कबि रहे जुठारी। केहिं पटतरौं बिदेहकुमारी।।
अर्थ · Hindi
सब उपमा कबि रहे जुठारी। केहिं पटतरौं बिदेहकुमारी।।
- RCM 1.230.9Open verse →
सिय सोभा हियँ बरनि प्रभु आपनि दसा बिचारि।
अर्थ · Hindi
सिय सोभा हियँ बरनि प्रभु आपनि दसा बिचारि।
- RCM 1.230.10Open verse →
बोले सुचि मन अनुज सन बचन समय अनुहारि।।230।।
अर्थ · Hindi
बोले सुचि मन अनुज सन बचन समय अनुहारि।।230।।
- RCM 1.231.1Open verse →
तात जनकतनया यह सोई। धनुषजग्य जेहि कारन होई।।
अर्थ · Hindi
तात जनकतनया यह सोई। धनुषजग्य जेहि कारन होई।।
- RCM 1.231.2Open verse →
पूजन गौरि सखीं लै आई। करत प्रकासु फिरइ फुलवाई।।
अर्थ · Hindi
पूजन गौरि सखीं लै आई। करत प्रकासु फिरइ फुलवाई।।
- RCM 1.231.3Open verse →
जासु बिलोकि अलोकिक सोभा। सहज पुनीत मोर मनु छोभा।।
अर्थ · Hindi
जासु बिलोकि अलोकिक सोभा। सहज पुनीत मोर मनु छोभा।।
- RCM 1.231.4Open verse →
सो सबु कारन जान बिधाता। फरकहिं सुभद अंग सुनु भ्राता।।
अर्थ · Hindi
सो सबु कारन जान बिधाता। फरकहिं सुभद अंग सुनु भ्राता।।
- RCM 1.231.5Open verse →
रघुबंसिन्ह कर सहज सुभाऊ। मनु कुपंथ पगु धरइ न काऊ।।
अर्थ · Hindi
रघुबंसिन्ह कर सहज सुभाऊ। मनु कुपंथ पगु धरइ न काऊ।।
- RCM 1.231.6Open verse →
मोहि अतिसय प्रतीति मन केरी। जेहिं सपनेहुँ परनारि न हेरी।।
अर्थ · Hindi
मोहि अतिसय प्रतीति मन केरी। जेहिं सपनेहुँ परनारि न हेरी।।
- RCM 1.231.7Open verse →
जिन्ह कै लहहिं न रिपु रन पीठी। नहिं पावहिं परतिय मनु डीठी।।
अर्थ · Hindi
जिन्ह कै लहहिं न रिपु रन पीठी। नहिं पावहिं परतिय मनु डीठी।।
- RCM 1.231.8Open verse →
मंगन लहहि न जिन्ह कै नाहीं। ते नरबर थोरे जग माहीं।।
अर्थ · Hindi
मंगन लहहि न जिन्ह कै नाहीं। ते नरबर थोरे जग माहीं।।
- RCM 1.231.9Open verse →
करत बतकहि अनुज सन मन सिय रूप लोभान।
अर्थ · Hindi
करत बतकहि अनुज सन मन सिय रूप लोभान।
- RCM 1.231.10Open verse →
मुख सरोज मकरंद छबि करइ मधुप इव पान।।231।।
अर्थ · Hindi
मुख सरोज मकरंद छबि करइ मधुप इव पान।।231।।
- RCM 1.232.1Open verse →
चितवहि चकित चहूँ दिसि सीता। कहँ गए नृपकिसोर मनु चिंता।।
अर्थ · Hindi
चितवहि चकित चहूँ दिसि सीता। कहँ गए नृपकिसोर मनु चिंता।।
- RCM 1.232.2Open verse →
जहँ बिलोक मृग सावक नैनी। जनु तहँ बरिस कमल सित श्रेनी।।
अर्थ · Hindi
जहँ बिलोक मृग सावक नैनी। जनु तहँ बरिस कमल सित श्रेनी।।
- RCM 1.232.3Open verse →
लता ओट तब सखिन्ह लखाए। स्यामल गौर किसोर सुहाए।।
अर्थ · Hindi
लता ओट तब सखिन्ह लखाए। स्यामल गौर किसोर सुहाए।।
- RCM 1.232.4Open verse →
देखि रूप लोचन ललचाने। हरषे जनु निज निधि पहिचाने।।
अर्थ · Hindi
देखि रूप लोचन ललचाने। हरषे जनु निज निधि पहिचाने।।
- RCM 1.232.5Open verse →
थके नयन रघुपति छबि देखें। पलकन्हिहूँ परिहरीं निमेषें।।
अर्थ · Hindi
थके नयन रघुपति छबि देखें। पलकन्हिहूँ परिहरीं निमेषें।।
- RCM 1.232.6Open verse →
अधिक सनेहँ देह भै भोरी। सरद ससिहि जनु चितव चकोरी।।
अर्थ · Hindi
अधिक सनेहँ देह भै भोरी। सरद ससिहि जनु चितव चकोरी।।
- RCM 1.232.7Open verse →
लोचन मग रामहि उर आनी। दीन्हे पलक कपाट सयानी।।
अर्थ · Hindi
लोचन मग रामहि उर आनी। दीन्हे पलक कपाट सयानी।।
- RCM 1.232.8Open verse →
जब सिय सखिन्ह प्रेमबस जानी। कहि न सकहिं कछु मन सकुचानी।।
अर्थ · Hindi
जब सिय सखिन्ह प्रेमबस जानी। कहि न सकहिं कछु मन सकुचानी।।
- RCM 1.232.9Open verse →
लताभवन तें प्रगट भे तेहि अवसर दोउ भाइ।
अर्थ · Hindi
लताभवन तें प्रगट भे तेहि अवसर दोउ भाइ।
- RCM 1.232.10Open verse →
निकसे जनु जुग बिमल बिधु जलद पटल बिलगाइ।।232।।
अर्थ · Hindi
निकसे जनु जुग बिमल बिधु जलद पटल बिलगाइ।।232।।
- RCM 1.233.1Open verse →
सोभा सीवँ सुभग दोउ बीरा। नील पीत जलजाभ सरीरा।।
अर्थ · Hindi
सोभा सीवँ सुभग दोउ बीरा। नील पीत जलजाभ सरीरा।।
- RCM 1.233.2Open verse →
मोरपंख सिर सोहत नीके। गुच्छ बीच बिच कुसुम कली के।।
अर्थ · Hindi
मोरपंख सिर सोहत नीके। गुच्छ बीच बिच कुसुम कली के।।
- RCM 1.233.3Open verse →
भाल तिलक श्रमबिंदु सुहाए। श्रवन सुभग भूषन छबि छाए।।
अर्थ · Hindi
भाल तिलक श्रमबिंदु सुहाए। श्रवन सुभग भूषन छबि छाए।।
- RCM 1.233.4Open verse →
बिकट भृकुटि कच घूघरवारे। नव सरोज लोचन रतनारे।।
अर्थ · Hindi
बिकट भृकुटि कच घूघरवारे। नव सरोज लोचन रतनारे।।
- RCM 1.233.5Open verse →
चारु चिबुक नासिका कपोला। हास बिलास लेत मनु मोला।।
अर्थ · Hindi
चारु चिबुक नासिका कपोला। हास बिलास लेत मनु मोला।।
- RCM 1.233.6Open verse →
मुखछबि कहि न जाइ मोहि पाहीं। जो बिलोकि बहु काम लजाहीं।।
अर्थ · Hindi
मुखछबि कहि न जाइ मोहि पाहीं। जो बिलोकि बहु काम लजाहीं।।
- RCM 1.233.7Open verse →
उर मनि माल कंबु कल गीवा। काम कलभ कर भुज बलसींवा।।
अर्थ · Hindi
उर मनि माल कंबु कल गीवा। काम कलभ कर भुज बलसींवा।।
- RCM 1.233.8Open verse →
सुमन समेत बाम कर दोना। सावँर कुअँर सखी सुठि लोना।।
अर्थ · Hindi
सुमन समेत बाम कर दोना। सावँर कुअँर सखी सुठि लोना।।
- RCM 1.233.9Open verse →
केहरि कटि पट पीत धर सुषमा सील निधान।
अर्थ · Hindi
केहरि कटि पट पीत धर सुषमा सील निधान।
- RCM 1.233.10Open verse →
देखि भानुकुलभूषनहि बिसरा सखिन्ह अपान।।233।।
अर्थ · Hindi
देखि भानुकुलभूषनहि बिसरा सखिन्ह अपान।।233।।
- RCM 1.234.1Open verse →
धरि धीरजु एक आलि सयानी। सीता सन बोली गहि पानी।।
अर्थ · Hindi
धरि धीरजु एक आलि सयानी। सीता सन बोली गहि पानी।।
- RCM 1.234.2Open verse →
बहुरि गौरि कर ध्यान करेहू। भूपकिसोर देखि किन लेहू।।
अर्थ · Hindi
बहुरि गौरि कर ध्यान करेहू। भूपकिसोर देखि किन लेहू।।
- RCM 1.234.3Open verse →
सकुचि सीयँ तब नयन उघारे। सनमुख दोउ रघुसिंघ निहारे।।
अर्थ · Hindi
सकुचि सीयँ तब नयन उघारे। सनमुख दोउ रघुसिंघ निहारे।।
- RCM 1.234.4Open verse →
नख सिख देखि राम कै सोभा। सुमिरि पिता पनु मनु अति छोभा।।
अर्थ · Hindi
नख सिख देखि राम कै सोभा। सुमिरि पिता पनु मनु अति छोभा।।
- RCM 1.234.5Open verse →
परबस सखिन्ह लखी जब सीता। भयउ गहरु सब कहहि सभीता।।
अर्थ · Hindi
परबस सखिन्ह लखी जब सीता। भयउ गहरु सब कहहि सभीता।।
- RCM 1.234.6Open verse →
पुनि आउब एहि बेरिआँ काली। अस कहि मन बिहसी एक आली।।
अर्थ · Hindi
पुनि आउब एहि बेरिआँ काली। अस कहि मन बिहसी एक आली।।
- RCM 1.234.7Open verse →
गूढ़ गिरा सुनि सिय सकुचानी। भयउ बिलंबु मातु भय मानी।।
अर्थ · Hindi
गूढ़ गिरा सुनि सिय सकुचानी। भयउ बिलंबु मातु भय मानी।।
- RCM 1.234.8Open verse →
धरि बड़ि धीर रामु उर आने। फिरि अपनपउ पितुबस जाने।।
अर्थ · Hindi
धरि बड़ि धीर रामु उर आने। फिरि अपनपउ पितुबस जाने।।
- RCM 1.234.9Open verse →
देखन मिस मृग बिहग तरु फिरइ बहोरि बहोरि।
अर्थ · Hindi
देखन मिस मृग बिहग तरु फिरइ बहोरि बहोरि।
- RCM 1.234.10Open verse →
निरखि निरखि रघुबीर छबि बाढ़इ प्रीति न थोरि।। 234।।
अर्थ · Hindi
निरखि निरखि रघुबीर छबि बाढ़इ प्रीति न थोरि।। 234।।
- RCM 1.235.1Open verse →
जानि कठिन सिवचाप बिसूरति। चली राखि उर स्यामल मूरति।।
अर्थ · Hindi
जानि कठिन सिवचाप बिसूरति। चली राखि उर स्यामल मूरति।।
- RCM 1.235.2Open verse →
प्रभु जब जात जानकी जानी। सुख सनेह सोभा गुन खानी।।
अर्थ · Hindi
प्रभु जब जात जानकी जानी। सुख सनेह सोभा गुन खानी।।
- RCM 1.235.3Open verse →
परम प्रेममय मृदु मसि कीन्ही। चारु चित भीतीं लिख लीन्ही।।
अर्थ · Hindi
परम प्रेममय मृदु मसि कीन्ही। चारु चित भीतीं लिख लीन्ही।।
- RCM 1.235.4Open verse →
गई भवानी भवन बहोरी। बंदि चरन बोली कर जोरी।।
अर्थ · Hindi
गई भवानी भवन बहोरी। बंदि चरन बोली कर जोरी।।
- RCM 1.235.5Open verse →
जय जय गिरिबरराज किसोरी। जय महेस मुख चंद चकोरी।।
अर्थ · Hindi
जय जय गिरिबरराज किसोरी। जय महेस मुख चंद चकोरी।।
- RCM 1.235.6Open verse →
जय गज बदन षड़ानन माता। जगत जननि दामिनि दुति गाता।।
अर्थ · Hindi
जय गज बदन षड़ानन माता। जगत जननि दामिनि दुति गाता।।
- RCM 1.235.7Open verse →
नहिं तव आदि मध्य अवसाना। अमित प्रभाउ बेदु नहिं जाना।।
अर्थ · Hindi
नहिं तव आदि मध्य अवसाना। अमित प्रभाउ बेदु नहिं जाना।।
- RCM 1.235.8Open verse →
भव भव बिभव पराभव कारिनि। बिस्व बिमोहनि स्वबस बिहारिनि।।
अर्थ · Hindi
भव भव बिभव पराभव कारिनि। बिस्व बिमोहनि स्वबस बिहारिनि।।
- RCM 1.235.9Open verse →
पतिदेवता सुतीय महुँ मातु प्रथम तव रेख।
अर्थ · Hindi
पतिदेवता सुतीय महुँ मातु प्रथम तव रेख।
- RCM 1.235.10Open verse →
महिमा अमित न सकहिं कहि सहस सारदा सेष।।235।।
अर्थ · Hindi
महिमा अमित न सकहिं कहि सहस सारदा सेष।।235।।
- RCM 1.236.1Open verse →
सेवत तोहि सुलभ फल चारी। बरदायनी पुरारि पिआरी।।
अर्थ · Hindi
सेवत तोहि सुलभ फल चारी। बरदायनी पुरारि पिआरी।।
- RCM 1.236.2Open verse →
देबि पूजि पद कमल तुम्हारे। सुर नर मुनि सब होहिं सुखारे।।
अर्थ · Hindi
देबि पूजि पद कमल तुम्हारे। सुर नर मुनि सब होहिं सुखारे।।
- RCM 1.236.3Open verse →
मोर मनोरथु जानहु नीकें। बसहु सदा उर पुर सबही कें।।
अर्थ · Hindi
मोर मनोरथु जानहु नीकें। बसहु सदा उर पुर सबही कें।।
- RCM 1.236.4Open verse →
कीन्हेउँ प्रगट न कारन तेहीं। अस कहि चरन गहे बैदेहीं।।
अर्थ · Hindi
कीन्हेउँ प्रगट न कारन तेहीं। अस कहि चरन गहे बैदेहीं।।
- RCM 1.236.5Open verse →
बिनय प्रेम बस भई भवानी। खसी माल मूरति मुसुकानी।।
अर्थ · Hindi
बिनय प्रेम बस भई भवानी। खसी माल मूरति मुसुकानी।।
- RCM 1.236.6Open verse →
सादर सियँ प्रसादु सिर धरेऊ। बोली गौरि हरषु हियँ भरेऊ।।
अर्थ · Hindi
सादर सियँ प्रसादु सिर धरेऊ। बोली गौरि हरषु हियँ भरेऊ।।
- RCM 1.236.7Open verse →
सुनु सिय सत्य असीस हमारी। पूजिहि मन कामना तुम्हारी।।
अर्थ · Hindi
सुनु सिय सत्य असीस हमारी। पूजिहि मन कामना तुम्हारी।।
- RCM 1.236.8Open verse →
नारद बचन सदा सुचि साचा। सो बरु मिलिहि जाहिं मनु राचा।।
अर्थ · Hindi
नारद बचन सदा सुचि साचा। सो बरु मिलिहि जाहिं मनु राचा।।
- RCM 1.237.1Open verse →
हृदयँ सराहत सीय लोनाई। गुर समीप गवने दोउ भाई।।
अर्थ · Hindi
हृदयँ सराहत सीय लोनाई। गुर समीप गवने दोउ भाई।।
- RCM 1.237.2Open verse →
राम कहा सबु कौसिक पाहीं। सरल सुभाउ छुअत छल नाहीं।।
अर्थ · Hindi
राम कहा सबु कौसिक पाहीं। सरल सुभाउ छुअत छल नाहीं।।
- RCM 1.237.3Open verse →
सुमन पाइ मुनि पूजा कीन्ही। पुनि असीस दुहु भाइन्ह दीन्ही।।
अर्थ · Hindi
सुमन पाइ मुनि पूजा कीन्ही। पुनि असीस दुहु भाइन्ह दीन्ही।।
- RCM 1.237.4Open verse →
सुफल मनोरथ होहुँ तुम्हारे। रामु लखनु सुनि भए सुखारे।।
अर्थ · Hindi
सुफल मनोरथ होहुँ तुम्हारे। रामु लखनु सुनि भए सुखारे।।
- RCM 1.237.5Open verse →
करि भोजनु मुनिबर बिग्यानी। लगे कहन कछु कथा पुरानी।।
अर्थ · Hindi
करि भोजनु मुनिबर बिग्यानी। लगे कहन कछु कथा पुरानी।।
- RCM 1.237.6Open verse →
बिगत दिवसु गुरु आयसु पाई। संध्या करन चले दोउ भाई।।
अर्थ · Hindi
बिगत दिवसु गुरु आयसु पाई। संध्या करन चले दोउ भाई।।
- RCM 1.237.7Open verse →
प्राची दिसि ससि उयउ सुहावा। सिय मुख सरिस देखि सुखु पावा।।
अर्थ · Hindi
प्राची दिसि ससि उयउ सुहावा। सिय मुख सरिस देखि सुखु पावा।।
- RCM 1.237.8Open verse →
बहुरि बिचारु कीन्ह मन माहीं। सीय बदन सम हिमकर नाहीं।।
अर्थ · Hindi
बहुरि बिचारु कीन्ह मन माहीं। सीय बदन सम हिमकर नाहीं।।
- RCM 1.237.9Open verse →
जनमु सिंधु पुनि बंधु बिषु दिन मलीन सकलंक।
अर्थ · Hindi
जनमु सिंधु पुनि बंधु बिषु दिन मलीन सकलंक।
- RCM 1.237.10Open verse →
सिय मुख समता पाव किमि चंदु बापुरो रंक।।237।।
अर्थ · Hindi
सिय मुख समता पाव किमि चंदु बापुरो रंक।।237।।
- RCM 1.238.1Open verse →
घटइ बढ़इ बिरहनि दुखदाई। ग्रसइ राहु निज संधिहिं पाई।।
अर्थ · Hindi
घटइ बढ़इ बिरहनि दुखदाई। ग्रसइ राहु निज संधिहिं पाई।।
- RCM 1.238.2Open verse →
कोक सिकप्रद पंकज द्रोही। अवगुन बहुत चंद्रमा तोही।।
अर्थ · Hindi
कोक सिकप्रद पंकज द्रोही। अवगुन बहुत चंद्रमा तोही।।
- RCM 1.238.3Open verse →
बैदेही मुख पटतर दीन्हे। होइ दोष बड़ अनुचित कीन्हे।।
अर्थ · Hindi
बैदेही मुख पटतर दीन्हे। होइ दोष बड़ अनुचित कीन्हे।।
- RCM 1.238.4Open verse →
सिय मुख छबि बिधु ब्याज बखानी। गुरु पहिं चले निसा बड़ि जानी।।
अर्थ · Hindi
सिय मुख छबि बिधु ब्याज बखानी। गुरु पहिं चले निसा बड़ि जानी।।
- RCM 1.238.5Open verse →
करि मुनि चरन सरोज प्रनामा। आयसु पाइ कीन्ह बिश्रामा।।
अर्थ · Hindi
करि मुनि चरन सरोज प्रनामा। आयसु पाइ कीन्ह बिश्रामा।।
- RCM 1.238.6Open verse →
बिगत निसा रघुनायक जागे। बंधु बिलोकि कहन अस लागे।।
अर्थ · Hindi
बिगत निसा रघुनायक जागे। बंधु बिलोकि कहन अस लागे।।
- RCM 1.238.7Open verse →
उदउ अरुन अवलोकहु ताता। पंकज कोक लोक सुखदाता।।
अर्थ · Hindi
उदउ अरुन अवलोकहु ताता। पंकज कोक लोक सुखदाता।।
- RCM 1.238.8Open verse →
बोले लखनु जोरि जुग पानी। प्रभु प्रभाउ सूचक मृदु बानी।।
अर्थ · Hindi
बोले लखनु जोरि जुग पानी। प्रभु प्रभाउ सूचक मृदु बानी।।
- RCM 1.238.9Open verse →
अरुनोदयँ सकुचे कुमुद उडगन जोति मलीन।
अर्थ · Hindi
अरुनोदयँ सकुचे कुमुद उडगन जोति मलीन।
- RCM 1.238.10Open verse →
जिमि तुम्हार आगमन सुनि भए नृपति बलहीन।।238।।
अर्थ · Hindi
जिमि तुम्हार आगमन सुनि भए नृपति बलहीन।।238।।
- RCM 1.239.1Open verse →
नृप सब नखत करहिं उजिआरी। टारि न सकहिं चाप तम भारी।।
अर्थ · Hindi
नृप सब नखत करहिं उजिआरी। टारि न सकहिं चाप तम भारी।।
- RCM 1.239.2Open verse →
कमल कोक मधुकर खग नाना। हरषे सकल निसा अवसाना।।
अर्थ · Hindi
कमल कोक मधुकर खग नाना। हरषे सकल निसा अवसाना।।
- RCM 1.239.3Open verse →
ऐसेहिं प्रभु सब भगत तुम्हारे। होइहहिं टूटें धनुष सुखारे।।
अर्थ · Hindi
ऐसेहिं प्रभु सब भगत तुम्हारे। होइहहिं टूटें धनुष सुखारे।।
- RCM 1.239.4Open verse →
उयउ भानु बिनु श्रम तम नासा। दुरे नखत जग तेजु प्रकासा।।
अर्थ · Hindi
उयउ भानु बिनु श्रम तम नासा। दुरे नखत जग तेजु प्रकासा।।
- RCM 1.239.5Open verse →
रबि निज उदय ब्याज रघुराया। प्रभु प्रतापु सब नृपन्ह दिखाया।।
अर्थ · Hindi
रबि निज उदय ब्याज रघुराया। प्रभु प्रतापु सब नृपन्ह दिखाया।।
- RCM 1.239.6Open verse →
तव भुज बल महिमा उदघाटी। प्रगटी धनु बिघटन परिपाटी।।
अर्थ · Hindi
तव भुज बल महिमा उदघाटी। प्रगटी धनु बिघटन परिपाटी।।
- RCM 1.239.7Open verse →
बंधु बचन सुनि प्रभु मुसुकाने। होइ सुचि सहज पुनीत नहाने।।
अर्थ · Hindi
बंधु बचन सुनि प्रभु मुसुकाने। होइ सुचि सहज पुनीत नहाने।।
- RCM 1.239.8Open verse →
नित्यक्रिया करि गुरु पहिं आए। चरन सरोज सुभग सिर नाए।।
अर्थ · Hindi
नित्यक्रिया करि गुरु पहिं आए। चरन सरोज सुभग सिर नाए।।
- RCM 1.239.9Open verse →
सतानंदु तब जनक बोलाए। कौसिक मुनि पहिं तुरत पठाए।।
अर्थ · Hindi
सतानंदु तब जनक बोलाए। कौसिक मुनि पहिं तुरत पठाए।।
- RCM 1.239.10Open verse →
जनक बिनय तिन्ह आइ सुनाई। हरषे बोलि लिए दोउ भाई।।
अर्थ · Hindi
जनक बिनय तिन्ह आइ सुनाई। हरषे बोलि लिए दोउ भाई।।
- RCM 1.239.11Open verse →
सतानंदपद बंदि प्रभु बैठे गुर पहिं जाइ।
अर्थ · Hindi
सतानंदपद बंदि प्रभु बैठे गुर पहिं जाइ।
- RCM 1.239.12Open verse →
चलहु तात मुनि कहेउ तब पठवा जनक बोलाइ।।239।।
अर्थ · Hindi
चलहु तात मुनि कहेउ तब पठवा जनक बोलाइ।।239।।
- RCM 1.240.1Open verse →
सीय स्वयंबरु देखिअ जाई। ईसु काहि धौं देइ बड़ाई।।
अर्थ · Hindi
सीय स्वयंबरु देखिअ जाई। ईसु काहि धौं देइ बड़ाई।।
- RCM 1.240.2Open verse →
लखन कहा जस भाजनु सोई। नाथ कृपा तव जापर होई।।
अर्थ · Hindi
लखन कहा जस भाजनु सोई। नाथ कृपा तव जापर होई।।
- RCM 1.240.3Open verse →
हरषे मुनि सब सुनि बर बानी। दीन्हि असीस सबहिं सुखु मानी।।
अर्थ · Hindi
हरषे मुनि सब सुनि बर बानी। दीन्हि असीस सबहिं सुखु मानी।।
- RCM 1.240.4Open verse →
पुनि मुनिबृंद समेत कृपाला। देखन चले धनुषमख साला।।
अर्थ · Hindi
पुनि मुनिबृंद समेत कृपाला। देखन चले धनुषमख साला।।
- RCM 1.240.5Open verse →
रंगभूमि आए दोउ भाई। असि सुधि सब पुरबासिन्ह पाई।।
अर्थ · Hindi
रंगभूमि आए दोउ भाई। असि सुधि सब पुरबासिन्ह पाई।।
- RCM 1.240.6Open verse →
चले सकल गृह काज बिसारी। बाल जुबान जरठ नर नारी।।
अर्थ · Hindi
चले सकल गृह काज बिसारी। बाल जुबान जरठ नर नारी।।
- RCM 1.240.7Open verse →
देखी जनक भीर भै भारी। सुचि सेवक सब लिए हँकारी।।
अर्थ · Hindi
देखी जनक भीर भै भारी। सुचि सेवक सब लिए हँकारी।।
- RCM 1.240.8Open verse →
तुरत सकल लोगन्ह पहिं जाहू। आसन उचित देहू सब काहू।।
अर्थ · Hindi
तुरत सकल लोगन्ह पहिं जाहू। आसन उचित देहू सब काहू।।
- RCM 1.240.9Open verse →
कहि मृदु बचन बिनीत तिन्ह बैठारे नर नारि।
अर्थ · Hindi
कहि मृदु बचन बिनीत तिन्ह बैठारे नर नारि।
- RCM 1.240.10Open verse →
उत्तम मध्यम नीच लघु निज निज थल अनुहारि।।240।।
अर्थ · Hindi
उत्तम मध्यम नीच लघु निज निज थल अनुहारि।।240।।
- RCM 1.241.1Open verse →
राजकुअँर तेहि अवसर आए। मनहुँ मनोहरता तन छाए।।
अर्थ · Hindi
राजकुअँर तेहि अवसर आए। मनहुँ मनोहरता तन छाए।।
- RCM 1.241.2Open verse →
गुन सागर नागर बर बीरा। सुंदर स्यामल गौर सरीरा।।
अर्थ · Hindi
गुन सागर नागर बर बीरा। सुंदर स्यामल गौर सरीरा।।
- RCM 1.241.3Open verse →
राज समाज बिराजत रूरे। उडगन महुँ जनु जुग बिधु पूरे।।
अर्थ · Hindi
राज समाज बिराजत रूरे। उडगन महुँ जनु जुग बिधु पूरे।।
- RCM 1.241.4Open verse →
जिन्ह कें रही भावना जैसी। प्रभु मूरति तिन्ह देखी तैसी।।
अर्थ · Hindi
जिन्ह कें रही भावना जैसी। प्रभु मूरति तिन्ह देखी तैसी।।
- RCM 1.241.5Open verse →
देखहिं रूप महा रनधीरा। मनहुँ बीर रसु धरें सरीरा।।
अर्थ · Hindi
देखहिं रूप महा रनधीरा। मनहुँ बीर रसु धरें सरीरा।।
- RCM 1.241.6Open verse →
डरे कुटिल नृप प्रभुहि निहारी। मनहुँ भयानक मूरति भारी।।
अर्थ · Hindi
डरे कुटिल नृप प्रभुहि निहारी। मनहुँ भयानक मूरति भारी।।
- RCM 1.241.7Open verse →
रहे असुर छल छोनिप बेषा। तिन्ह प्रभु प्रगट कालसम देखा।।
अर्थ · Hindi
रहे असुर छल छोनिप बेषा। तिन्ह प्रभु प्रगट कालसम देखा।।
- RCM 1.241.8Open verse →
पुरबासिन्ह देखे दोउ भाई। नरभूषन लोचन सुखदाई।।
अर्थ · Hindi
पुरबासिन्ह देखे दोउ भाई। नरभूषन लोचन सुखदाई।।
- RCM 1.241.9Open verse →
नारि बिलोकहिं हरषि हियँ निज निज रुचि अनुरूप।
अर्थ · Hindi
नारि बिलोकहिं हरषि हियँ निज निज रुचि अनुरूप।
- RCM 1.241.10Open verse →
जनु सोहत सिंगार धरि मूरति परम अनूप।।241।।
अर्थ · Hindi
जनु सोहत सिंगार धरि मूरति परम अनूप।।241।।
- RCM 1.242.1Open verse →
बिदुषन्ह प्रभु बिराटमय दीसा। बहु मुख कर पग लोचन सीसा।।
अर्थ · Hindi
बिदुषन्ह प्रभु बिराटमय दीसा। बहु मुख कर पग लोचन सीसा।।
- RCM 1.242.2Open verse →
जनक जाति अवलोकहिं कैसैं। सजन सगे प्रिय लागहिं जैसें।।
अर्थ · Hindi
जनक जाति अवलोकहिं कैसैं। सजन सगे प्रिय लागहिं जैसें।।
- RCM 1.242.3Open verse →
सहित बिदेह बिलोकहिं रानी। सिसु सम प्रीति न जाति बखानी।।
अर्थ · Hindi
सहित बिदेह बिलोकहिं रानी। सिसु सम प्रीति न जाति बखानी।।
- RCM 1.242.4Open verse →
जोगिन्ह परम तत्वमय भासा। सांत सुद्ध सम सहज प्रकासा।।
अर्थ · Hindi
जोगिन्ह परम तत्वमय भासा। सांत सुद्ध सम सहज प्रकासा।।
- RCM 1.242.5Open verse →
हरिभगतन्ह देखे दोउ भ्राता। इष्टदेव इव सब सुख दाता।।
अर्थ · Hindi
हरिभगतन्ह देखे दोउ भ्राता। इष्टदेव इव सब सुख दाता।।
- RCM 1.242.6Open verse →
रामहि चितव भायँ जेहि सीया। सो सनेहु सुखु नहिं कथनीया।।
अर्थ · Hindi
रामहि चितव भायँ जेहि सीया। सो सनेहु सुखु नहिं कथनीया।।
- RCM 1.242.7Open verse →
उर अनुभवति न कहि सक सोऊ। कवन प्रकार कहै कबि कोऊ।।
अर्थ · Hindi
उर अनुभवति न कहि सक सोऊ। कवन प्रकार कहै कबि कोऊ।।
- RCM 1.242.8Open verse →
एहि बिधि रहा जाहि जस भाऊ। तेहिं तस देखेउ कोसलराऊ।।
अर्थ · Hindi
एहि बिधि रहा जाहि जस भाऊ। तेहिं तस देखेउ कोसलराऊ।।
- RCM 1.242.9Open verse →
राजत राज समाज महुँ कोसलराज किसोर।
अर्थ · Hindi
राजत राज समाज महुँ कोसलराज किसोर।
- RCM 1.242.10Open verse →
सुंदर स्यामल गौर तन बिस्व बिलोचन चोर।।242।।
अर्थ · Hindi
सुंदर स्यामल गौर तन बिस्व बिलोचन चोर।।242।।
- RCM 1.243.1Open verse →
सहज मनोहर मूरति दोऊ। कोटि काम उपमा लघु सोऊ।।
अर्थ · Hindi
सहज मनोहर मूरति दोऊ। कोटि काम उपमा लघु सोऊ।।
- RCM 1.243.2Open verse →
सरद चंद निंदक मुख नीके। नीरज नयन भावते जी के।।
अर्थ · Hindi
सरद चंद निंदक मुख नीके। नीरज नयन भावते जी के।।
- RCM 1.243.3Open verse →
चितवत चारु मार मनु हरनी। भावति हृदय जाति नहीं बरनी।।
अर्थ · Hindi
चितवत चारु मार मनु हरनी। भावति हृदय जाति नहीं बरनी।।
- RCM 1.243.4Open verse →
कल कपोल श्रुति कुंडल लोला। चिबुक अधर सुंदर मृदु बोला।।
अर्थ · Hindi
कल कपोल श्रुति कुंडल लोला। चिबुक अधर सुंदर मृदु बोला।।
- RCM 1.243.5Open verse →
कुमुदबंधु कर निंदक हाँसा। भृकुटी बिकट मनोहर नासा।।
अर्थ · Hindi
कुमुदबंधु कर निंदक हाँसा। भृकुटी बिकट मनोहर नासा।।
- RCM 1.243.6Open verse →
भाल बिसाल तिलक झलकाहीं। कच बिलोकि अलि अवलि लजाहीं।।
अर्थ · Hindi
भाल बिसाल तिलक झलकाहीं। कच बिलोकि अलि अवलि लजाहीं।।
- RCM 1.243.7Open verse →
पीत चौतनीं सिरन्हि सुहाई। कुसुम कलीं बिच बीच बनाईं।।
अर्थ · Hindi
पीत चौतनीं सिरन्हि सुहाई। कुसुम कलीं बिच बीच बनाईं।।
- RCM 1.243.8Open verse →
रेखें रुचिर कंबु कल गीवाँ। जनु त्रिभुवन सुषमा की सीवाँ।।
अर्थ · Hindi
रेखें रुचिर कंबु कल गीवाँ। जनु त्रिभुवन सुषमा की सीवाँ।।
- RCM 1.243.9Open verse →
कुंजर मनि कंठा कलित उरन्हि तुलसिका माल।
अर्थ · Hindi
कुंजर मनि कंठा कलित उरन्हि तुलसिका माल।
- RCM 1.243.10Open verse →
बृषभ कंध केहरि ठवनि बल निधि बाहु बिसाल।।243।।
अर्थ · Hindi
बृषभ कंध केहरि ठवनि बल निधि बाहु बिसाल।।243।।
- RCM 1.244.1Open verse →
कटि तूनीर पीत पट बाँधे। कर सर धनुष बाम बर काँधे।।
अर्थ · Hindi
कटि तूनीर पीत पट बाँधे। कर सर धनुष बाम बर काँधे।।
- RCM 1.244.2Open verse →
पीत जग्य उपबीत सुहाए। नख सिख मंजु महाछबि छाए।।
अर्थ · Hindi
पीत जग्य उपबीत सुहाए। नख सिख मंजु महाछबि छाए।।
- RCM 1.244.3Open verse →
देखि लोग सब भए सुखारे। एकटक लोचन चलत न तारे।।
अर्थ · Hindi
देखि लोग सब भए सुखारे। एकटक लोचन चलत न तारे।।
- RCM 1.244.4Open verse →
हरषे जनकु देखि दोउ भाई। मुनि पद कमल गहे तब जाई।।
अर्थ · Hindi
हरषे जनकु देखि दोउ भाई। मुनि पद कमल गहे तब जाई।।
- RCM 1.244.5Open verse →
करि बिनती निज कथा सुनाई। रंग अवनि सब मुनिहि देखाई।।
अर्थ · Hindi
करि बिनती निज कथा सुनाई। रंग अवनि सब मुनिहि देखाई।।
- RCM 1.244.6Open verse →
जहँ जहँ जाहि कुअँर बर दोऊ। तहँ तहँ चकित चितव सबु कोऊ।।
अर्थ · Hindi
जहँ जहँ जाहि कुअँर बर दोऊ। तहँ तहँ चकित चितव सबु कोऊ।।
- RCM 1.244.7Open verse →
निज निज रुख रामहि सबु देखा। कोउ न जान कछु मरमु बिसेषा।।
अर्थ · Hindi
निज निज रुख रामहि सबु देखा। कोउ न जान कछु मरमु बिसेषा।।
- RCM 1.244.8Open verse →
भलि रचना मुनि नृप सन कहेऊ। राजाँ मुदित महासुख लहेऊ।।
अर्थ · Hindi
भलि रचना मुनि नृप सन कहेऊ। राजाँ मुदित महासुख लहेऊ।।
- RCM 1.244.9Open verse →
सब मंचन्ह ते मंचु एक सुंदर बिसद बिसाल।
अर्थ · Hindi
सब मंचन्ह ते मंचु एक सुंदर बिसद बिसाल।
- RCM 1.244.10Open verse →
मुनि समेत दोउ बंधु तहँ बैठारे महिपाल।।244।।
अर्थ · Hindi
मुनि समेत दोउ बंधु तहँ बैठारे महिपाल।।244।।
- RCM 1.245.1Open verse →
प्रभुहि देखि सब नृप हिंयँ हारे। जनु राकेस उदय भएँ तारे।।
अर्थ · Hindi
प्रभुहि देखि सब नृप हिंयँ हारे। जनु राकेस उदय भएँ तारे।।
- RCM 1.245.2Open verse →
असि प्रतीति सब के मन माहीं। राम चाप तोरब सक नाहीं।।
अर्थ · Hindi
असि प्रतीति सब के मन माहीं। राम चाप तोरब सक नाहीं।।
- RCM 1.245.3Open verse →
बिनु भंजेहुँ भव धनुषु बिसाला। मेलिहि सीय राम उर माला।।
अर्थ · Hindi
बिनु भंजेहुँ भव धनुषु बिसाला। मेलिहि सीय राम उर माला।।
- RCM 1.245.4Open verse →
अस बिचारि गवनहु घर भाई। जसु प्रतापु बलु तेजु गवाँई।।
अर्थ · Hindi
अस बिचारि गवनहु घर भाई। जसु प्रतापु बलु तेजु गवाँई।।
- RCM 1.245.5Open verse →
बिहसे अपर भूप सुनि बानी। जे अबिबेक अंध अभिमानी।।
अर्थ · Hindi
बिहसे अपर भूप सुनि बानी। जे अबिबेक अंध अभिमानी।।
- RCM 1.245.6Open verse →
तोरेहुँ धनुषु ब्याहु अवगाहा। बिनु तोरें को कुअँरि बिआहा।।
अर्थ · Hindi
तोरेहुँ धनुषु ब्याहु अवगाहा। बिनु तोरें को कुअँरि बिआहा।।
- RCM 1.245.7Open verse →
एक बार कालउ किन होऊ। सिय हित समर जितब हम सोऊ।।
अर्थ · Hindi
एक बार कालउ किन होऊ। सिय हित समर जितब हम सोऊ।।
- RCM 1.245.8Open verse →
यह सुनि अवर महिप मुसकाने। धरमसील हरिभगत सयाने।।
अर्थ · Hindi
यह सुनि अवर महिप मुसकाने। धरमसील हरिभगत सयाने।।
- RCM 1.245.9Open verse →
सीय बिआहबि राम गरब दूरि करि नृपन्ह के।।
अर्थ · Hindi
सीय बिआहबि राम गरब दूरि करि नृपन्ह के।।
- RCM 1.245.10Open verse →
जीति को सक संग्राम दसरथ के रन बाँकुरे।।245।।
अर्थ · Hindi
जीति को सक संग्राम दसरथ के रन बाँकुरे।।245।।
- RCM 1.246.1Open verse →
ब्यर्थ मरहु जनि गाल बजाई। मन मोदकन्हि कि भूख बुताई।।
अर्थ · Hindi
ब्यर्थ मरहु जनि गाल बजाई। मन मोदकन्हि कि भूख बुताई।।
- RCM 1.246.2Open verse →
सिख हमारि सुनि परम पुनीता। जगदंबा जानहु जियँ सीता।।
अर्थ · Hindi
सिख हमारि सुनि परम पुनीता। जगदंबा जानहु जियँ सीता।।
- RCM 1.246.3Open verse →
जगत पिता रघुपतिहि बिचारी। भरि लोचन छबि लेहु निहारी।।
अर्थ · Hindi
जगत पिता रघुपतिहि बिचारी। भरि लोचन छबि लेहु निहारी।।
- RCM 1.246.4Open verse →
सुंदर सुखद सकल गुन रासी। ए दोउ बंधु संभु उर बासी।।
अर्थ · Hindi
सुंदर सुखद सकल गुन रासी। ए दोउ बंधु संभु उर बासी।।
- RCM 1.246.5Open verse →
सुधा समुद्र समीप बिहाई। मृगजलु निरखि मरहु कत धाई।।
अर्थ · Hindi
सुधा समुद्र समीप बिहाई। मृगजलु निरखि मरहु कत धाई।।
- RCM 1.246.6Open verse →
करहु जाइ जा कहुँ जोई भावा। हम तौ आजु जनम फलु पावा।।
अर्थ · Hindi
करहु जाइ जा कहुँ जोई भावा। हम तौ आजु जनम फलु पावा।।
- RCM 1.246.7Open verse →
अस कहि भले भूप अनुरागे। रूप अनूप बिलोकन लागे।।
अर्थ · Hindi
अस कहि भले भूप अनुरागे। रूप अनूप बिलोकन लागे।।
- RCM 1.246.8Open verse →
देखहिं सुर नभ चढ़े बिमाना। बरषहिं सुमन करहिं कल गाना।।
अर्थ · Hindi
देखहिं सुर नभ चढ़े बिमाना। बरषहिं सुमन करहिं कल गाना।।
- RCM 1.246.9Open verse →
जानि सुअवसरु सीय तब पठई जनक बोलाई।
अर्थ · Hindi
जानि सुअवसरु सीय तब पठई जनक बोलाई।
- RCM 1.246.10Open verse →
चतुर सखीं सुंदर सकल सादर चलीं लवाईं।।246।।
अर्थ · Hindi
चतुर सखीं सुंदर सकल सादर चलीं लवाईं।।246।।
- RCM 1.247.1Open verse →
सिय सोभा नहिं जाइ बखानी। जगदंबिका रूप गुन खानी।।
अर्थ · Hindi
सिय सोभा नहिं जाइ बखानी। जगदंबिका रूप गुन खानी।।
- RCM 1.247.2Open verse →
उपमा सकल मोहि लघु लागीं। प्राकृत नारि अंग अनुरागीं।।
अर्थ · Hindi
उपमा सकल मोहि लघु लागीं। प्राकृत नारि अंग अनुरागीं।।
- RCM 1.247.3Open verse →
सिय बरनिअ तेइ उपमा देई। कुकबि कहाइ अजसु को लेई।।
अर्थ · Hindi
सिय बरनिअ तेइ उपमा देई। कुकबि कहाइ अजसु को लेई।।
- RCM 1.247.4Open verse →
जौ पटतरिअ तीय सम सीया। जग असि जुबति कहाँ कमनीया।।
अर्थ · Hindi
जौ पटतरिअ तीय सम सीया। जग असि जुबति कहाँ कमनीया।।
- RCM 1.247.5Open verse →
गिरा मुखर तन अरध भवानी। रति अति दुखित अतनु पति जानी।।
अर्थ · Hindi
गिरा मुखर तन अरध भवानी। रति अति दुखित अतनु पति जानी।।
- RCM 1.247.6Open verse →
बिष बारुनी बंधु प्रिय जेही। कहिअ रमासम किमि बैदेही।।
अर्थ · Hindi
बिष बारुनी बंधु प्रिय जेही। कहिअ रमासम किमि बैदेही।।
- RCM 1.247.7Open verse →
जौ छबि सुधा पयोनिधि होई। परम रूपमय कच्छप सोई।।
अर्थ · Hindi
जौ छबि सुधा पयोनिधि होई। परम रूपमय कच्छप सोई।।
- RCM 1.247.8Open verse →
सोभा रजु मंदरु सिंगारू। मथै पानि पंकज निज मारू।।
अर्थ · Hindi
सोभा रजु मंदरु सिंगारू। मथै पानि पंकज निज मारू।।
- RCM 1.247.9Open verse →
एहि बिधि उपजै लच्छि जब सुंदरता सुख मूल।
अर्थ · Hindi
एहि बिधि उपजै लच्छि जब सुंदरता सुख मूल।
- RCM 1.247.10Open verse →
तदपि सकोच समेत कबि कहहिं सीय समतूल।।247।।
अर्थ · Hindi
तदपि सकोच समेत कबि कहहिं सीय समतूल।।247।।
- RCM 1.248.1Open verse →
चलिं संग लै सखीं सयानी। गावत गीत मनोहर बानी।।
अर्थ · Hindi
चलिं संग लै सखीं सयानी। गावत गीत मनोहर बानी।।
- RCM 1.248.2Open verse →
सोह नवल तनु सुंदर सारी। जगत जननि अतुलित छबि भारी।।
अर्थ · Hindi
सोह नवल तनु सुंदर सारी। जगत जननि अतुलित छबि भारी।।
- RCM 1.248.3Open verse →
भूषन सकल सुदेस सुहाए। अंग अंग रचि सखिन्ह बनाए।।
अर्थ · Hindi
भूषन सकल सुदेस सुहाए। अंग अंग रचि सखिन्ह बनाए।।
- RCM 1.248.4Open verse →
रंगभूमि जब सिय पगु धारी। देखि रूप मोहे नर नारी।।
अर्थ · Hindi
रंगभूमि जब सिय पगु धारी। देखि रूप मोहे नर नारी।।
- RCM 1.248.5Open verse →
हरषि सुरन्ह दुंदुभीं बजाई। बरषि प्रसून अपछरा गाई।।
अर्थ · Hindi
हरषि सुरन्ह दुंदुभीं बजाई। बरषि प्रसून अपछरा गाई।।
- RCM 1.248.6Open verse →
पानि सरोज सोह जयमाला। अवचट चितए सकल भुआला।।
अर्थ · Hindi
पानि सरोज सोह जयमाला। अवचट चितए सकल भुआला।।
- RCM 1.248.7Open verse →
सीय चकित चित रामहि चाहा। भए मोहबस सब नरनाहा।।
अर्थ · Hindi
सीय चकित चित रामहि चाहा। भए मोहबस सब नरनाहा।।
- RCM 1.248.8Open verse →
मुनि समीप देखे दोउ भाई। लगे ललकि लोचन निधि पाई।।
अर्थ · Hindi
मुनि समीप देखे दोउ भाई। लगे ललकि लोचन निधि पाई।।
- RCM 1.248.9Open verse →
गुरजन लाज समाजु बड़ देखि सीय सकुचानि।।
अर्थ · Hindi
गुरजन लाज समाजु बड़ देखि सीय सकुचानि।।
- RCM 1.248.10Open verse →
लागि बिलोकन सखिन्ह तन रघुबीरहि उर आनि।।248।।
अर्थ · Hindi
लागि बिलोकन सखिन्ह तन रघुबीरहि उर आनि।।248।।
- RCM 1.249.1Open verse →
राम रूपु अरु सिय छबि देखें। नर नारिन्ह परिहरीं निमेषें।।
अर्थ · Hindi
राम रूपु अरु सिय छबि देखें। नर नारिन्ह परिहरीं निमेषें।।
- RCM 1.249.2Open verse →
सोचहिं सकल कहत सकुचाहीं। बिधि सन बिनय करहिं मन माहीं।।
अर्थ · Hindi
सोचहिं सकल कहत सकुचाहीं। बिधि सन बिनय करहिं मन माहीं।।
- RCM 1.249.3Open verse →
हरु बिधि बेगि जनक जड़ताई। मति हमारि असि देहि सुहाई।।
अर्थ · Hindi
हरु बिधि बेगि जनक जड़ताई। मति हमारि असि देहि सुहाई।।
- RCM 1.249.4Open verse →
बिनु बिचार पनु तजि नरनाहु। सीय राम कर करै बिबाहू।।
अर्थ · Hindi
बिनु बिचार पनु तजि नरनाहु। सीय राम कर करै बिबाहू।।
- RCM 1.249.5Open verse →
जग भल कहहि भाव सब काहू। हठ कीन्हे अंतहुँ उर दाहू।।
अर्थ · Hindi
जग भल कहहि भाव सब काहू। हठ कीन्हे अंतहुँ उर दाहू।।
- RCM 1.249.6Open verse →
एहिं लालसाँ मगन सब लोगू। बरु साँवरो जानकी जोगू।।
अर्थ · Hindi
एहिं लालसाँ मगन सब लोगू। बरु साँवरो जानकी जोगू।।
- RCM 1.249.7Open verse →
तब बंदीजन जनक बौलाए। बिरिदावली कहत चलि आए।।
अर्थ · Hindi
तब बंदीजन जनक बौलाए। बिरिदावली कहत चलि आए।।
- RCM 1.249.8Open verse →
कह नृप जाइ कहहु पन मोरा। चले भाट हियँ हरषु न थोरा।।
अर्थ · Hindi
कह नृप जाइ कहहु पन मोरा। चले भाट हियँ हरषु न थोरा।।
- RCM 1.249.9Open verse →
बोले बंदी बचन बर सुनहु सकल महिपाल।
अर्थ · Hindi
बोले बंदी बचन बर सुनहु सकल महिपाल।
- RCM 1.249.10Open verse →
पन बिदेह कर कहहिं हम भुजा उठाइ बिसाल।।249।।
अर्थ · Hindi
पन बिदेह कर कहहिं हम भुजा उठाइ बिसाल।।249।।
- RCM 1.250.1Open verse →
नृप भुजबल बिधु सिवधनु राहू। गरुअ कठोर बिदित सब काहू।।
अर्थ · Hindi
नृप भुजबल बिधु सिवधनु राहू। गरुअ कठोर बिदित सब काहू।।
- RCM 1.250.2Open verse →
रावनु बानु महाभट भारे। देखि सरासन गवँहिं सिधारे।।
अर्थ · Hindi
रावनु बानु महाभट भारे। देखि सरासन गवँहिं सिधारे।।
- RCM 1.250.3Open verse →
सोइ पुरारि कोदंडु कठोरा। राज समाज आजु जोइ तोरा।।
अर्थ · Hindi
सोइ पुरारि कोदंडु कठोरा। राज समाज आजु जोइ तोरा।।
- RCM 1.250.4Open verse →
त्रिभुवन जय समेत बैदेही।।बिनहिं बिचार बरइ हठि तेही।।
अर्थ · Hindi
त्रिभुवन जय समेत बैदेही।।बिनहिं बिचार बरइ हठि तेही।।
- RCM 1.250.5Open verse →
सुनि पन सकल भूप अभिलाषे। भटमानी अतिसय मन माखे।।
अर्थ · Hindi
सुनि पन सकल भूप अभिलाषे। भटमानी अतिसय मन माखे।।
- RCM 1.250.6Open verse →
परिकर बाँधि उठे अकुलाई। चले इष्टदेवन्ह सिर नाई।।
अर्थ · Hindi
परिकर बाँधि उठे अकुलाई। चले इष्टदेवन्ह सिर नाई।।
- RCM 1.250.7Open verse →
तमकि ताकि तकि सिवधनु धरहीं। उठइ न कोटि भाँति बलु करहीं।।
अर्थ · Hindi
तमकि ताकि तकि सिवधनु धरहीं। उठइ न कोटि भाँति बलु करहीं।।
- RCM 1.250.8Open verse →
जिन्ह के कछु बिचारु मन माहीं। चाप समीप महीप न जाहीं।।
अर्थ · Hindi
जिन्ह के कछु बिचारु मन माहीं। चाप समीप महीप न जाहीं।।
- RCM 1.250.9Open verse →
तमकि धरहिं धनु मूढ़ नृप उठइ न चलहिं लजाइ।
अर्थ · Hindi
तमकि धरहिं धनु मूढ़ नृप उठइ न चलहिं लजाइ।
- RCM 1.250.10Open verse →
मनहुँ पाइ भट बाहुबलु अधिकु अधिकु गरुआइ।।250।।
अर्थ · Hindi
मनहुँ पाइ भट बाहुबलु अधिकु अधिकु गरुआइ।।250।।
- RCM 1.251.1Open verse →
भूप सहस दस एकहि बारा। लगे उठावन टरइ न टारा।।
अर्थ · Hindi
भूप सहस दस एकहि बारा। लगे उठावन टरइ न टारा।।
- RCM 1.251.2Open verse →
डगइ न संभु सरासन कैसें। कामी बचन सती मनु जैसें।।
अर्थ · Hindi
डगइ न संभु सरासन कैसें। कामी बचन सती मनु जैसें।।
- RCM 1.251.3Open verse →
सब नृप भए जोगु उपहासी। जैसें बिनु बिराग संन्यासी।।
अर्थ · Hindi
सब नृप भए जोगु उपहासी। जैसें बिनु बिराग संन्यासी।।
- RCM 1.251.4Open verse →
कीरति बिजय बीरता भारी। चले चाप कर बरबस हारी।।
अर्थ · Hindi
कीरति बिजय बीरता भारी। चले चाप कर बरबस हारी।।
- RCM 1.251.5Open verse →
श्रीहत भए हारि हियँ राजा। बैठे निज निज जाइ समाजा।।
अर्थ · Hindi
श्रीहत भए हारि हियँ राजा। बैठे निज निज जाइ समाजा।।
- RCM 1.251.6Open verse →
नृपन्ह बिलोकि जनकु अकुलाने। बोले बचन रोष जनु साने।।
अर्थ · Hindi
नृपन्ह बिलोकि जनकु अकुलाने। बोले बचन रोष जनु साने।।
- RCM 1.251.7Open verse →
दीप दीप के भूपति नाना। आए सुनि हम जो पनु ठाना।।
अर्थ · Hindi
दीप दीप के भूपति नाना। आए सुनि हम जो पनु ठाना।।
- RCM 1.251.8Open verse →
देव दनुज धरि मनुज सरीरा। बिपुल बीर आए रनधीरा।।
अर्थ · Hindi
देव दनुज धरि मनुज सरीरा। बिपुल बीर आए रनधीरा।।
- RCM 1.251.9Open verse →
कुअँरि मनोहर बिजय बड़ि कीरति अति कमनीय।
अर्थ · Hindi
कुअँरि मनोहर बिजय बड़ि कीरति अति कमनीय।
- RCM 1.251.10Open verse →
पावनिहार बिरंचि जनु रचेउ न धनु दमनीय।।251।।
अर्थ · Hindi
पावनिहार बिरंचि जनु रचेउ न धनु दमनीय।।251।।
- RCM 1.252.1Open verse →
कहहु काहि यहु लाभु न भावा। काहुँ न संकर चाप चढ़ावा।।
अर्थ · Hindi
कहहु काहि यहु लाभु न भावा। काहुँ न संकर चाप चढ़ावा।।
- RCM 1.252.2Open verse →
रहउ चढ़ाउब तोरब भाई। तिलु भरि भूमि न सके छड़ाई।।
अर्थ · Hindi
रहउ चढ़ाउब तोरब भाई। तिलु भरि भूमि न सके छड़ाई।।
- RCM 1.252.3Open verse →
अब जनि कोउ माखै भट मानी। बीर बिहीन मही मैं जानी।।
अर्थ · Hindi
अब जनि कोउ माखै भट मानी। बीर बिहीन मही मैं जानी।।
- RCM 1.252.4Open verse →
तजहु आस निज निज गृह जाहू। लिखा न बिधि बैदेहि बिबाहू।।
अर्थ · Hindi
तजहु आस निज निज गृह जाहू। लिखा न बिधि बैदेहि बिबाहू।।
- RCM 1.252.5Open verse →
सुकृत जाइ जौं पनु परिहरऊँ। कुअँरि कुआरि रहउ का करऊँ।।
अर्थ · Hindi
सुकृत जाइ जौं पनु परिहरऊँ। कुअँरि कुआरि रहउ का करऊँ।।
- RCM 1.252.6Open verse →
जो जनतेउँ बिनु भट भुबि भाई। तौ पनु करि होतेउँ न हँसाई।।
अर्थ · Hindi
जो जनतेउँ बिनु भट भुबि भाई। तौ पनु करि होतेउँ न हँसाई।।
- RCM 1.252.7Open verse →
जनक बचन सुनि सब नर नारी। देखि जानकिहि भए दुखारी।।
अर्थ · Hindi
जनक बचन सुनि सब नर नारी। देखि जानकिहि भए दुखारी।।
- RCM 1.252.8Open verse →
माखे लखनु कुटिल भइँ भौंहें। रदपट फरकत नयन रिसौंहें।।
अर्थ · Hindi
माखे लखनु कुटिल भइँ भौंहें। रदपट फरकत नयन रिसौंहें।।
- RCM 1.252.9Open verse →
कहि न सकत रघुबीर डर लगे बचन जनु बान।
अर्थ · Hindi
कहि न सकत रघुबीर डर लगे बचन जनु बान।
- RCM 1.252.10Open verse →
नाइ राम पद कमल सिरु बोले गिरा प्रमान।।252।।
अर्थ · Hindi
नाइ राम पद कमल सिरु बोले गिरा प्रमान।।252।।
- RCM 1.253.1Open verse →
रघुबंसिन्ह महुँ जहँ कोउ होई। तेहिं समाज अस कहइ न कोई।।
अर्थ · Hindi
रघुबंसिन्ह महुँ जहँ कोउ होई। तेहिं समाज अस कहइ न कोई।।
- RCM 1.253.2Open verse →
कही जनक जसि अनुचित बानी। बिद्यमान रघुकुल मनि जानी।।
अर्थ · Hindi
कही जनक जसि अनुचित बानी। बिद्यमान रघुकुल मनि जानी।।
- RCM 1.253.3Open verse →
सुनहु भानुकुल पंकज भानू। कहउँ सुभाउ न कछु अभिमानू।।
अर्थ · Hindi
सुनहु भानुकुल पंकज भानू। कहउँ सुभाउ न कछु अभिमानू।।
- RCM 1.253.4Open verse →
जौ तुम्हारि अनुसासन पावौं। कंदुक इव ब्रह्मांड उठावौं।।
अर्थ · Hindi
जौ तुम्हारि अनुसासन पावौं। कंदुक इव ब्रह्मांड उठावौं।।
- RCM 1.253.5Open verse →
काचे घट जिमि डारौं फोरी। सकउँ मेरु मूलक जिमि तोरी।।
अर्थ · Hindi
काचे घट जिमि डारौं फोरी। सकउँ मेरु मूलक जिमि तोरी।।
- RCM 1.253.6Open verse →
तव प्रताप महिमा भगवाना। को बापुरो पिनाक पुराना।।
अर्थ · Hindi
तव प्रताप महिमा भगवाना। को बापुरो पिनाक पुराना।।
- RCM 1.253.7Open verse →
नाथ जानि अस आयसु होऊ। कौतुकु करौं बिलोकिअ सोऊ।।
अर्थ · Hindi
नाथ जानि अस आयसु होऊ। कौतुकु करौं बिलोकिअ सोऊ।।
- RCM 1.253.8Open verse →
कमल नाल जिमि चाफ चढ़ावौं। जोजन सत प्रमान लै धावौं।।
अर्थ · Hindi
कमल नाल जिमि चाफ चढ़ावौं। जोजन सत प्रमान लै धावौं।।
- RCM 1.253.9Open verse →
तोरौं छत्रक दंड जिमि तव प्रताप बल नाथ।
अर्थ · Hindi
तोरौं छत्रक दंड जिमि तव प्रताप बल नाथ।
- RCM 1.253.10Open verse →
जौं न करौं प्रभु पद सपथ कर न धरौं धनु भाथ।।253।।
अर्थ · Hindi
जौं न करौं प्रभु पद सपथ कर न धरौं धनु भाथ।।253।।
- RCM 1.254.1Open verse →
लखन सकोप बचन जे बोले। डगमगानि महि दिग्गज डोले।।
अर्थ · Hindi
लखन सकोप बचन जे बोले। डगमगानि महि दिग्गज डोले।।
- RCM 1.254.2Open verse →
सकल लोक सब भूप डेराने। सिय हियँ हरषु जनकु सकुचाने।।
अर्थ · Hindi
सकल लोक सब भूप डेराने। सिय हियँ हरषु जनकु सकुचाने।।
- RCM 1.254.3Open verse →
गुर रघुपति सब मुनि मन माहीं। मुदित भए पुनि पुनि पुलकाहीं।।
अर्थ · Hindi
गुर रघुपति सब मुनि मन माहीं। मुदित भए पुनि पुनि पुलकाहीं।।
- RCM 1.254.4Open verse →
सयनहिं रघुपति लखनु नेवारे। प्रेम समेत निकट बैठारे।।
अर्थ · Hindi
सयनहिं रघुपति लखनु नेवारे। प्रेम समेत निकट बैठारे।।
- RCM 1.254.5Open verse →
बिस्वामित्र समय सुभ जानी। बोले अति सनेहमय बानी।।
अर्थ · Hindi
बिस्वामित्र समय सुभ जानी। बोले अति सनेहमय बानी।।
- RCM 1.254.6Open verse →
उठहु राम भंजहु भवचापा। मेटहु तात जनक परितापा।।
अर्थ · Hindi
उठहु राम भंजहु भवचापा। मेटहु तात जनक परितापा।।
- RCM 1.254.7Open verse →
सुनि गुरु बचन चरन सिरु नावा। हरषु बिषादु न कछु उर आवा।।
अर्थ · Hindi
सुनि गुरु बचन चरन सिरु नावा। हरषु बिषादु न कछु उर आवा।।
- RCM 1.254.8Open verse →
ठाढ़े भए उठि सहज सुभाएँ। ठवनि जुबा मृगराजु लजाएँ।।
अर्थ · Hindi
ठाढ़े भए उठि सहज सुभाएँ। ठवनि जुबा मृगराजु लजाएँ।।
- RCM 1.254.9Open verse →
उदित उदयगिरि मंच पर रघुबर बालपतंग।
अर्थ · Hindi
उदित उदयगिरि मंच पर रघुबर बालपतंग।
- RCM 1.254.10Open verse →
बिकसे संत सरोज सब हरषे लोचन भृंग।।254।।
अर्थ · Hindi
बिकसे संत सरोज सब हरषे लोचन भृंग।।254।।
- RCM 1.255.1Open verse →
नृपन्ह केरि आसा निसि नासी। बचन नखत अवली न प्रकासी।।
अर्थ · Hindi
नृपन्ह केरि आसा निसि नासी। बचन नखत अवली न प्रकासी।।
- RCM 1.255.2Open verse →
मानी महिप कुमुद सकुचाने। कपटी भूप उलूक लुकाने।।
अर्थ · Hindi
मानी महिप कुमुद सकुचाने। कपटी भूप उलूक लुकाने।।
- RCM 1.255.3Open verse →
भए बिसोक कोक मुनि देवा। बरिसहिं सुमन जनावहिं सेवा।।
अर्थ · Hindi
भए बिसोक कोक मुनि देवा। बरिसहिं सुमन जनावहिं सेवा।।
- RCM 1.255.4Open verse →
गुर पद बंदि सहित अनुरागा। राम मुनिन्ह सन आयसु मागा।।
अर्थ · Hindi
गुर पद बंदि सहित अनुरागा। राम मुनिन्ह सन आयसु मागा।।
- RCM 1.255.5Open verse →
सहजहिं चले सकल जग स्वामी। मत्त मंजु बर कुंजर गामी।।
अर्थ · Hindi
सहजहिं चले सकल जग स्वामी। मत्त मंजु बर कुंजर गामी।।
- RCM 1.255.6Open verse →
चलत राम सब पुर नर नारी। पुलक पूरि तन भए सुखारी।।
अर्थ · Hindi
चलत राम सब पुर नर नारी। पुलक पूरि तन भए सुखारी।।
- RCM 1.255.7Open verse →
बंदि पितर सुर सुकृत सँभारे। जौं कछु पुन्य प्रभाउ हमारे।।
अर्थ · Hindi
बंदि पितर सुर सुकृत सँभारे। जौं कछु पुन्य प्रभाउ हमारे।।
- RCM 1.255.8Open verse →
तौ सिवधनु मृनाल की नाईं। तोरहुँ राम गनेस गोसाईं।।
अर्थ · Hindi
तौ सिवधनु मृनाल की नाईं। तोरहुँ राम गनेस गोसाईं।।
- RCM 1.255.9Open verse →
रामहि प्रेम समेत लखि सखिन्ह समीप बोलाइ।
अर्थ · Hindi
रामहि प्रेम समेत लखि सखिन्ह समीप बोलाइ।
- RCM 1.255.10Open verse →
सीता मातु सनेह बस बचन कहइ बिलखाइ।।255।।
अर्थ · Hindi
सीता मातु सनेह बस बचन कहइ बिलखाइ।।255।।
- RCM 1.256.1Open verse →
सखि सब कौतुक देखनिहारे। जेठ कहावत हितू हमारे।।
अर्थ · Hindi
सखि सब कौतुक देखनिहारे। जेठ कहावत हितू हमारे।।
- RCM 1.256.2Open verse →
कोउ न बुझाइ कहइ गुर पाहीं। ए बालक असि हठ भलि नाहीं।।
अर्थ · Hindi
कोउ न बुझाइ कहइ गुर पाहीं। ए बालक असि हठ भलि नाहीं।।
- RCM 1.256.3Open verse →
रावन बान छुआ नहिं चापा। हारे सकल भूप करि दापा।।
अर्थ · Hindi
रावन बान छुआ नहिं चापा। हारे सकल भूप करि दापा।।
- RCM 1.256.4Open verse →
सो धनु राजकुअँर कर देहीं। बाल मराल कि मंदर लेहीं।।
अर्थ · Hindi
सो धनु राजकुअँर कर देहीं। बाल मराल कि मंदर लेहीं।।
- RCM 1.256.5Open verse →
भूप सयानप सकल सिरानी। सखि बिधि गति कछु जाति न जानी।।
अर्थ · Hindi
भूप सयानप सकल सिरानी। सखि बिधि गति कछु जाति न जानी।।
- RCM 1.256.6Open verse →
बोली चतुर सखी मृदु बानी। तेजवंत लघु गनिअ न रानी।।
अर्थ · Hindi
बोली चतुर सखी मृदु बानी। तेजवंत लघु गनिअ न रानी।।
- RCM 1.256.7Open verse →
कहँ कुंभज कहँ सिंधु अपारा। सोषेउ सुजसु सकल संसारा।।
अर्थ · Hindi
कहँ कुंभज कहँ सिंधु अपारा। सोषेउ सुजसु सकल संसारा।।
- RCM 1.256.8Open verse →
रबि मंडल देखत लघु लागा। उदयँ तासु तिभुवन तम भागा।।
अर्थ · Hindi
रबि मंडल देखत लघु लागा। उदयँ तासु तिभुवन तम भागा।।
- RCM 1.256.9Open verse →
मंत्र परम लघु जासु बस बिधि हरि हर सुर सर्ब।
अर्थ · Hindi
मंत्र परम लघु जासु बस बिधि हरि हर सुर सर्ब।
- RCM 1.256.10Open verse →
महामत्त गजराज कहुँ बस कर अंकुस खर्ब।।256।।
अर्थ · Hindi
महामत्त गजराज कहुँ बस कर अंकुस खर्ब।।256।।
- RCM 1.257.1Open verse →
काम कुसुम धनु सायक लीन्हे। सकल भुवन अपने बस कीन्हे।।
अर्थ · Hindi
काम कुसुम धनु सायक लीन्हे। सकल भुवन अपने बस कीन्हे।।
- RCM 1.257.2Open verse →
देबि तजिअ संसउ अस जानी। भंजब धनुष रामु सुनु रानी।।
अर्थ · Hindi
देबि तजिअ संसउ अस जानी। भंजब धनुष रामु सुनु रानी।।
- RCM 1.257.3Open verse →
सखी बचन सुनि भै परतीती। मिटा बिषादु बढ़ी अति प्रीती।।
अर्थ · Hindi
सखी बचन सुनि भै परतीती। मिटा बिषादु बढ़ी अति प्रीती।।
- RCM 1.257.4Open verse →
तब रामहि बिलोकि बैदेही। सभय हृदयँ बिनवति जेहि तेही।।
अर्थ · Hindi
तब रामहि बिलोकि बैदेही। सभय हृदयँ बिनवति जेहि तेही।।
- RCM 1.257.5Open verse →
मनहीं मन मनाव अकुलानी। होहु प्रसन्न महेस भवानी।।
अर्थ · Hindi
मनहीं मन मनाव अकुलानी। होहु प्रसन्न महेस भवानी।।
- RCM 1.257.6Open verse →
करहु सफल आपनि सेवकाई। करि हितु हरहु चाप गरुआई।।
अर्थ · Hindi
करहु सफल आपनि सेवकाई। करि हितु हरहु चाप गरुआई।।
- RCM 1.257.7Open verse →
गननायक बरदायक देवा। आजु लगें कीन्हिउँ तुअ सेवा।।
अर्थ · Hindi
गननायक बरदायक देवा। आजु लगें कीन्हिउँ तुअ सेवा।।
- RCM 1.257.8Open verse →
बार बार बिनती सुनि मोरी। करहु चाप गुरुता अति थोरी।।
अर्थ · Hindi
बार बार बिनती सुनि मोरी। करहु चाप गुरुता अति थोरी।।
- RCM 1.257.9Open verse →
देखि देखि रघुबीर तन सुर मनाव धरि धीर।।
अर्थ · Hindi
देखि देखि रघुबीर तन सुर मनाव धरि धीर।।
- RCM 1.257.10Open verse →
भरे बिलोचन प्रेम जल पुलकावली सरीर।।257।।
अर्थ · Hindi
भरे बिलोचन प्रेम जल पुलकावली सरीर।।257।।
- RCM 1.258.1Open verse →
नीकें निरखि नयन भरि सोभा। पितु पनु सुमिरि बहुरि मनु छोभा।।
अर्थ · Hindi
नीकें निरखि नयन भरि सोभा। पितु पनु सुमिरि बहुरि मनु छोभा।।
- RCM 1.258.2Open verse →
अहह तात दारुनि हठ ठानी। समुझत नहिं कछु लाभु न हानी।।
अर्थ · Hindi
अहह तात दारुनि हठ ठानी। समुझत नहिं कछु लाभु न हानी।।
- RCM 1.258.3Open verse →
सचिव सभय सिख देइ न कोई। बुध समाज बड़ अनुचित होई।।
अर्थ · Hindi
सचिव सभय सिख देइ न कोई। बुध समाज बड़ अनुचित होई।।
- RCM 1.258.4Open verse →
कहँ धनु कुलिसहु चाहि कठोरा। कहँ स्यामल मृदुगात किसोरा।।
अर्थ · Hindi
कहँ धनु कुलिसहु चाहि कठोरा। कहँ स्यामल मृदुगात किसोरा।।
- RCM 1.258.5Open verse →
बिधि केहि भाँति धरौं उर धीरा। सिरस सुमन कन बेधिअ हीरा।।
अर्थ · Hindi
बिधि केहि भाँति धरौं उर धीरा। सिरस सुमन कन बेधिअ हीरा।।
- RCM 1.258.6Open verse →
सकल सभा कै मति भै भोरी। अब मोहि संभुचाप गति तोरी।।
अर्थ · Hindi
सकल सभा कै मति भै भोरी। अब मोहि संभुचाप गति तोरी।।
- RCM 1.258.7Open verse →
निज जड़ता लोगन्ह पर डारी। होहि हरुअ रघुपतिहि निहारी।।
अर्थ · Hindi
निज जड़ता लोगन्ह पर डारी। होहि हरुअ रघुपतिहि निहारी।।
- RCM 1.258.8Open verse →
अति परिताप सीय मन माही। लव निमेष जुग सब सय जाहीं।।
अर्थ · Hindi
अति परिताप सीय मन माही। लव निमेष जुग सब सय जाहीं।।
- RCM 1.258.9Open verse →
प्रभुहि चितइ पुनि चितव महि राजत लोचन लोल।
अर्थ · Hindi
प्रभुहि चितइ पुनि चितव महि राजत लोचन लोल।
- RCM 1.258.10Open verse →
खेलत मनसिज मीन जुग जनु बिधु मंडल डोल।।258।।
अर्थ · Hindi
खेलत मनसिज मीन जुग जनु बिधु मंडल डोल।।258।।
- RCM 1.259.1Open verse →
गिरा अलिनि मुख पंकज रोकी। प्रगट न लाज निसा अवलोकी।।
अर्थ · Hindi
गिरा अलिनि मुख पंकज रोकी। प्रगट न लाज निसा अवलोकी।।
- RCM 1.259.2Open verse →
लोचन जलु रह लोचन कोना। जैसे परम कृपन कर सोना।।
अर्थ · Hindi
लोचन जलु रह लोचन कोना। जैसे परम कृपन कर सोना।।
- RCM 1.259.3Open verse →
सकुची ब्याकुलता बड़ि जानी। धरि धीरजु प्रतीति उर आनी।।
अर्थ · Hindi
सकुची ब्याकुलता बड़ि जानी। धरि धीरजु प्रतीति उर आनी।।
- RCM 1.259.4Open verse →
तन मन बचन मोर पनु साचा। रघुपति पद सरोज चितु राचा।।
अर्थ · Hindi
तन मन बचन मोर पनु साचा। रघुपति पद सरोज चितु राचा।।
- RCM 1.259.5Open verse →
तौ भगवानु सकल उर बासी। करिहिं मोहि रघुबर कै दासी।।
अर्थ · Hindi
तौ भगवानु सकल उर बासी। करिहिं मोहि रघुबर कै दासी।।
- RCM 1.259.6Open verse →
जेहि कें जेहि पर सत्य सनेहू। सो तेहि मिलइ न कछु संहेहू।।
अर्थ · Hindi
जेहि कें जेहि पर सत्य सनेहू। सो तेहि मिलइ न कछु संहेहू।।
- RCM 1.259.7Open verse →
प्रभु तन चितइ प्रेम तन ठाना। कृपानिधान राम सबु जाना।।
अर्थ · Hindi
प्रभु तन चितइ प्रेम तन ठाना। कृपानिधान राम सबु जाना।।
- RCM 1.259.8Open verse →
सियहि बिलोकि तकेउ धनु कैसे। चितव गरुरु लघु ब्यालहि जैसे।।
अर्थ · Hindi
सियहि बिलोकि तकेउ धनु कैसे। चितव गरुरु लघु ब्यालहि जैसे।।
- RCM 1.259.9Open verse →
लखन लखेउ रघुबंसमनि ताकेउ हर कोदंडु।
अर्थ · Hindi
लखन लखेउ रघुबंसमनि ताकेउ हर कोदंडु।
- RCM 1.259.10Open verse →
पुलकि गात बोले बचन चरन चापि ब्रह्मांडु।।259।।
अर्थ · Hindi
पुलकि गात बोले बचन चरन चापि ब्रह्मांडु।।259।।
- RCM 1.260.1Open verse →
दिसकुंजरहु कमठ अहि कोला। धरहु धरनि धरि धीर न डोला।।
अर्थ · Hindi
दिसकुंजरहु कमठ अहि कोला। धरहु धरनि धरि धीर न डोला।।
- RCM 1.260.2Open verse →
रामु चहहिं संकर धनु तोरा। होहु सजग सुनि आयसु मोरा।।
अर्थ · Hindi
रामु चहहिं संकर धनु तोरा। होहु सजग सुनि आयसु मोरा।।
- RCM 1.260.3Open verse →
चाप सपीप रामु जब आए। नर नारिन्ह सुर सुकृत मनाए।।
अर्थ · Hindi
चाप सपीप रामु जब आए। नर नारिन्ह सुर सुकृत मनाए।।
- RCM 1.260.4Open verse →
सब कर संसउ अरु अग्यानू। मंद महीपन्ह कर अभिमानू।।
अर्थ · Hindi
सब कर संसउ अरु अग्यानू। मंद महीपन्ह कर अभिमानू।।
- RCM 1.260.5Open verse →
भृगुपति केरि गरब गरुआई। सुर मुनिबरन्ह केरि कदराई।।
अर्थ · Hindi
भृगुपति केरि गरब गरुआई। सुर मुनिबरन्ह केरि कदराई।।
- RCM 1.260.6Open verse →
सिय कर सोचु जनक पछितावा। रानिन्ह कर दारुन दुख दावा।।
अर्थ · Hindi
सिय कर सोचु जनक पछितावा। रानिन्ह कर दारुन दुख दावा।।
- RCM 1.260.7Open verse →
संभुचाप बड बोहितु पाई। चढे जाइ सब संगु बनाई।।
अर्थ · Hindi
संभुचाप बड बोहितु पाई। चढे जाइ सब संगु बनाई।।
- RCM 1.260.8Open verse →
राम बाहुबल सिंधु अपारू। चहत पारु नहि कोउ कड़हारू।।
अर्थ · Hindi
राम बाहुबल सिंधु अपारू। चहत पारु नहि कोउ कड़हारू।।
- RCM 1.260.9Open verse →
राम बिलोके लोग सब चित्र लिखे से देखि।
अर्थ · Hindi
राम बिलोके लोग सब चित्र लिखे से देखि।
- RCM 1.260.10Open verse →
चितई सीय कृपायतन जानी बिकल बिसेषि।।260।।
अर्थ · Hindi
चितई सीय कृपायतन जानी बिकल बिसेषि।।260।।
- RCM 1.261.1Open verse →
देखी बिपुल बिकल बैदेही। निमिष बिहात कलप सम तेही।।
अर्थ · Hindi
देखी बिपुल बिकल बैदेही। निमिष बिहात कलप सम तेही।।
- RCM 1.261.2Open verse →
तृषित बारि बिनु जो तनु त्यागा। मुएँ करइ का सुधा तड़ागा।।
अर्थ · Hindi
तृषित बारि बिनु जो तनु त्यागा। मुएँ करइ का सुधा तड़ागा।।
- RCM 1.261.3Open verse →
का बरषा सब कृषी सुखानें। समय चुकें पुनि का पछितानें।।
अर्थ · Hindi
का बरषा सब कृषी सुखानें। समय चुकें पुनि का पछितानें।।
- RCM 1.261.4Open verse →
अस जियँ जानि जानकी देखी। प्रभु पुलके लखि प्रीति बिसेषी।।
अर्थ · Hindi
अस जियँ जानि जानकी देखी। प्रभु पुलके लखि प्रीति बिसेषी।।
- RCM 1.261.5Open verse →
गुरहि प्रनामु मनहि मन कीन्हा। अति लाघवँ उठाइ धनु लीन्हा।।
अर्थ · Hindi
गुरहि प्रनामु मनहि मन कीन्हा। अति लाघवँ उठाइ धनु लीन्हा।।
- RCM 1.261.6Open verse →
दमकेउ दामिनि जिमि जब लयऊ। पुनि नभ धनु मंडल सम भयऊ।।
अर्थ · Hindi
दमकेउ दामिनि जिमि जब लयऊ। पुनि नभ धनु मंडल सम भयऊ।।
- RCM 1.261.7Open verse →
लेत चढ़ावत खैंचत गाढ़ें। काहुँ न लखा देख सबु ठाढ़ें।।
अर्थ · Hindi
लेत चढ़ावत खैंचत गाढ़ें। काहुँ न लखा देख सबु ठाढ़ें।।
- RCM 1.261.8Open verse →
तेहि छन राम मध्य धनु तोरा। भरे भुवन धुनि घोर कठोरा।।
अर्थ · Hindi
तेहि छन राम मध्य धनु तोरा। भरे भुवन धुनि घोर कठोरा।।
- RCM 1.262.1Open verse →
प्रभु दोउ चापखंड महि डारे। देखि लोग सब भए सुखारे।।
अर्थ · Hindi
प्रभु दोउ चापखंड महि डारे। देखि लोग सब भए सुखारे।।
- RCM 1.262.2Open verse →
कोसिकरुप पयोनिधि पावन। प्रेम बारि अवगाहु सुहावन।।
अर्थ · Hindi
कोसिकरुप पयोनिधि पावन। प्रेम बारि अवगाहु सुहावन।।
- RCM 1.262.3Open verse →
रामरूप राकेसु निहारी। बढ़त बीचि पुलकावलि भारी।।
अर्थ · Hindi
रामरूप राकेसु निहारी। बढ़त बीचि पुलकावलि भारी।।
- RCM 1.262.4Open verse →
बाजे नभ गहगहे निसाना। देवबधू नाचहिं करि गाना।।
अर्थ · Hindi
बाजे नभ गहगहे निसाना। देवबधू नाचहिं करि गाना।।
- RCM 1.262.5Open verse →
ब्रह्मादिक सुर सिद्ध मुनीसा। प्रभुहि प्रसंसहि देहिं असीसा।।
अर्थ · Hindi
ब्रह्मादिक सुर सिद्ध मुनीसा। प्रभुहि प्रसंसहि देहिं असीसा।।
- RCM 1.262.6Open verse →
बरिसहिं सुमन रंग बहु माला। गावहिं किंनर गीत रसाला।।
अर्थ · Hindi
बरिसहिं सुमन रंग बहु माला। गावहिं किंनर गीत रसाला।।
- RCM 1.262.7Open verse →
रही भुवन भरि जय जय बानी। धनुषभंग धुनि जात न जानी।।
अर्थ · Hindi
रही भुवन भरि जय जय बानी। धनुषभंग धुनि जात न जानी।।
- RCM 1.262.8Open verse →
मुदित कहहिं जहँ तहँ नर नारी। भंजेउ राम संभुधनु भारी।।
अर्थ · Hindi
मुदित कहहिं जहँ तहँ नर नारी। भंजेउ राम संभुधनु भारी।।
- RCM 1.262.9Open verse →
बंदी मागध सूतगन बिरुद बदहिं मतिधीर।
अर्थ · Hindi
बंदी मागध सूतगन बिरुद बदहिं मतिधीर।
- RCM 1.262.10Open verse →
करहिं निछावरि लोग सब हय गय धन मनि चीर।।262।।
अर्थ · Hindi
करहिं निछावरि लोग सब हय गय धन मनि चीर।।262।।
- RCM 1.263.1Open verse →
झाँझि मृदंग संख सहनाई। भेरि ढोल दुंदुभी सुहाई।।
अर्थ · Hindi
झाँझि मृदंग संख सहनाई। भेरि ढोल दुंदुभी सुहाई।।
- RCM 1.263.2Open verse →
बाजहिं बहु बाजने सुहाए। जहँ तहँ जुबतिन्ह मंगल गाए।।
अर्थ · Hindi
बाजहिं बहु बाजने सुहाए। जहँ तहँ जुबतिन्ह मंगल गाए।।
- RCM 1.263.3Open verse →
सखिन्ह सहित हरषी अति रानी। सूखत धान परा जनु पानी।।
अर्थ · Hindi
सखिन्ह सहित हरषी अति रानी। सूखत धान परा जनु पानी।।
- RCM 1.263.4Open verse →
जनक लहेउ सुखु सोचु बिहाई। पैरत थकें थाह जनु पाई।।
अर्थ · Hindi
जनक लहेउ सुखु सोचु बिहाई। पैरत थकें थाह जनु पाई।।
- RCM 1.263.5Open verse →
श्रीहत भए भूप धनु टूटे। जैसें दिवस दीप छबि छूटे।।
अर्थ · Hindi
श्रीहत भए भूप धनु टूटे। जैसें दिवस दीप छबि छूटे।।
- RCM 1.263.6Open verse →
सीय सुखहि बरनिअ केहि भाँती। जनु चातकी पाइ जलु स्वाती।।
अर्थ · Hindi
सीय सुखहि बरनिअ केहि भाँती। जनु चातकी पाइ जलु स्वाती।।
- RCM 1.263.7Open verse →
रामहि लखनु बिलोकत कैसें। ससिहि चकोर किसोरकु जैसें।।
अर्थ · Hindi
रामहि लखनु बिलोकत कैसें। ससिहि चकोर किसोरकु जैसें।।
- RCM 1.263.8Open verse →
सतानंद तब आयसु दीन्हा। सीताँ गमनु राम पहिं कीन्हा।।
अर्थ · Hindi
सतानंद तब आयसु दीन्हा। सीताँ गमनु राम पहिं कीन्हा।।
- RCM 1.263.9Open verse →
संग सखीं सुदंर चतुर गावहिं मंगलचार।
अर्थ · Hindi
संग सखीं सुदंर चतुर गावहिं मंगलचार।
- RCM 1.263.10Open verse →
गवनी बाल मराल गति सुषमा अंग अपार।।263।।
अर्थ · Hindi
गवनी बाल मराल गति सुषमा अंग अपार।।263।।
- RCM 1.264.1Open verse →
सखिन्ह मध्य सिय सोहति कैसे। छबिगन मध्य महाछबि जैसें।।
अर्थ · Hindi
सखिन्ह मध्य सिय सोहति कैसे। छबिगन मध्य महाछबि जैसें।।
- RCM 1.264.2Open verse →
कर सरोज जयमाल सुहाई। बिस्व बिजय सोभा जेहिं छाई।।
अर्थ · Hindi
कर सरोज जयमाल सुहाई। बिस्व बिजय सोभा जेहिं छाई।।
- RCM 1.264.3Open verse →
तन सकोचु मन परम उछाहू। गूढ़ प्रेमु लखि परइ न काहू।।
अर्थ · Hindi
तन सकोचु मन परम उछाहू। गूढ़ प्रेमु लखि परइ न काहू।।
- RCM 1.264.4Open verse →
जाइ समीप राम छबि देखी। रहि जनु कुँअरि चित्र अवरेखी।।
अर्थ · Hindi
जाइ समीप राम छबि देखी। रहि जनु कुँअरि चित्र अवरेखी।।
- RCM 1.264.5Open verse →
चतुर सखीं लखि कहा बुझाई। पहिरावहु जयमाल सुहाई।।
अर्थ · Hindi
चतुर सखीं लखि कहा बुझाई। पहिरावहु जयमाल सुहाई।।
- RCM 1.264.6Open verse →
सुनत जुगल कर माल उठाई। प्रेम बिबस पहिराइ न जाई।।
अर्थ · Hindi
सुनत जुगल कर माल उठाई। प्रेम बिबस पहिराइ न जाई।।
- RCM 1.264.7Open verse →
सोहत जनु जुग जलज सनाला। ससिहि सभीत देत जयमाला।।
अर्थ · Hindi
सोहत जनु जुग जलज सनाला। ससिहि सभीत देत जयमाला।।
- RCM 1.264.8Open verse →
गावहिं छबि अवलोकि सहेली। सियँ जयमाल राम उर मेली।।
अर्थ · Hindi
गावहिं छबि अवलोकि सहेली। सियँ जयमाल राम उर मेली।।
- RCM 1.264.9Open verse →
रघुबर उर जयमाल देखि देव बरिसहिं सुमन।
अर्थ · Hindi
रघुबर उर जयमाल देखि देव बरिसहिं सुमन।
- RCM 1.264.10Open verse →
सकुचे सकल भुआल जनु बिलोकि रबि कुमुदगन।।264।।
अर्थ · Hindi
सकुचे सकल भुआल जनु बिलोकि रबि कुमुदगन।।264।।
- RCM 1.265.1Open verse →
पुर अरु ब्योम बाजने बाजे। खल भए मलिन साधु सब राजे।।
अर्थ · Hindi
पुर अरु ब्योम बाजने बाजे। खल भए मलिन साधु सब राजे।।
- RCM 1.265.2Open verse →
सुर किंनर नर नाग मुनीसा। जय जय जय कहि देहिं असीसा।।
अर्थ · Hindi
सुर किंनर नर नाग मुनीसा। जय जय जय कहि देहिं असीसा।।
- RCM 1.265.3Open verse →
नाचहिं गावहिं बिबुध बधूटीं। बार बार कुसुमांजलि छूटीं।।
अर्थ · Hindi
नाचहिं गावहिं बिबुध बधूटीं। बार बार कुसुमांजलि छूटीं।।
- RCM 1.265.4Open verse →
जहँ तहँ बिप्र बेदधुनि करहीं। बंदी बिरदावलि उच्चरहीं।।
अर्थ · Hindi
जहँ तहँ बिप्र बेदधुनि करहीं। बंदी बिरदावलि उच्चरहीं।।
- RCM 1.265.5Open verse →
महि पाताल नाक जसु ब्यापा। राम बरी सिय भंजेउ चापा।।
अर्थ · Hindi
महि पाताल नाक जसु ब्यापा। राम बरी सिय भंजेउ चापा।।
- RCM 1.265.6Open verse →
करहिं आरती पुर नर नारी। देहिं निछावरि बित्त बिसारी।।
अर्थ · Hindi
करहिं आरती पुर नर नारी। देहिं निछावरि बित्त बिसारी।।
- RCM 1.265.7Open verse →
सोहति सीय राम कै जौरी। छबि सिंगारु मनहुँ एक ठोरी।।
अर्थ · Hindi
सोहति सीय राम कै जौरी। छबि सिंगारु मनहुँ एक ठोरी।।
- RCM 1.265.8Open verse →
सखीं कहहिं प्रभुपद गहु सीता। करति न चरन परस अति भीता।।
अर्थ · Hindi
सखीं कहहिं प्रभुपद गहु सीता। करति न चरन परस अति भीता।।
- RCM 1.265.9Open verse →
गौतम तिय गति सुरति करि नहिं परसति पग पानि।
अर्थ · Hindi
गौतम तिय गति सुरति करि नहिं परसति पग पानि।
- RCM 1.265.10Open verse →
मन बिहसे रघुबंसमनि प्रीति अलौकिक जानि।।265।।
अर्थ · Hindi
मन बिहसे रघुबंसमनि प्रीति अलौकिक जानि।।265।।
- RCM 1.266.1Open verse →
तब सिय देखि भूप अभिलाषे। कूर कपूत मूढ़ मन माखे।।
अर्थ · Hindi
तब सिय देखि भूप अभिलाषे। कूर कपूत मूढ़ मन माखे।।
- RCM 1.266.2Open verse →
उठि उठि पहिरि सनाह अभागे। जहँ तहँ गाल बजावन लागे।।
अर्थ · Hindi
उठि उठि पहिरि सनाह अभागे। जहँ तहँ गाल बजावन लागे।।
- RCM 1.266.3Open verse →
लेहु छड़ाइ सीय कह कोऊ। धरि बाँधहु नृप बालक दोऊ।।
अर्थ · Hindi
लेहु छड़ाइ सीय कह कोऊ। धरि बाँधहु नृप बालक दोऊ।।
- RCM 1.266.4Open verse →
तोरें धनुषु चाड़ नहिं सरई। जीवत हमहि कुअँरि को बरई।।
अर्थ · Hindi
तोरें धनुषु चाड़ नहिं सरई। जीवत हमहि कुअँरि को बरई।।
- RCM 1.266.5Open verse →
जौं बिदेहु कछु करै सहाई। जीतहु समर सहित दोउ भाई।।
अर्थ · Hindi
जौं बिदेहु कछु करै सहाई। जीतहु समर सहित दोउ भाई।।
- RCM 1.266.6Open verse →
साधु भूप बोले सुनि बानी। राजसमाजहि लाज लजानी।।
अर्थ · Hindi
साधु भूप बोले सुनि बानी। राजसमाजहि लाज लजानी।।
- RCM 1.266.7Open verse →
बलु प्रतापु बीरता बड़ाई। नाक पिनाकहि संग सिधाई।।
अर्थ · Hindi
बलु प्रतापु बीरता बड़ाई। नाक पिनाकहि संग सिधाई।।
- RCM 1.266.8Open verse →
सोइ सूरता कि अब कहुँ पाई। असि बुधि तौ बिधि मुहँ मसि लाई।।
अर्थ · Hindi
सोइ सूरता कि अब कहुँ पाई। असि बुधि तौ बिधि मुहँ मसि लाई।।
- RCM 1.266.9Open verse →
देखहु रामहि नयन भरि तजि इरिषा मदु कोहु।
अर्थ · Hindi
देखहु रामहि नयन भरि तजि इरिषा मदु कोहु।
- RCM 1.266.10Open verse →
लखन रोषु पावकु प्रबल जानि सलभ जनि होहु।।266।।
अर्थ · Hindi
लखन रोषु पावकु प्रबल जानि सलभ जनि होहु।।266।।
- RCM 1.267.1Open verse →
बैनतेय बलि जिमि चह कागू। जिमि ससु चहै नाग अरि भागू।।
अर्थ · Hindi
बैनतेय बलि जिमि चह कागू। जिमि ससु चहै नाग अरि भागू।।
- RCM 1.267.2Open verse →
जिमि चह कुसल अकारन कोही। सब संपदा चहै सिवद्रोही।।
अर्थ · Hindi
जिमि चह कुसल अकारन कोही। सब संपदा चहै सिवद्रोही।।
- RCM 1.267.3Open verse →
लोभी लोलुप कल कीरति चहई। अकलंकता कि कामी लहई।।
अर्थ · Hindi
लोभी लोलुप कल कीरति चहई। अकलंकता कि कामी लहई।।
- RCM 1.267.4Open verse →
हरि पद बिमुख परम गति चाहा। तस तुम्हार लालचु नरनाहा।।
अर्थ · Hindi
हरि पद बिमुख परम गति चाहा। तस तुम्हार लालचु नरनाहा।।
- RCM 1.267.5Open verse →
कोलाहलु सुनि सीय सकानी। सखीं लवाइ गईं जहँ रानी।।
अर्थ · Hindi
कोलाहलु सुनि सीय सकानी। सखीं लवाइ गईं जहँ रानी।।
- RCM 1.267.6Open verse →
रामु सुभायँ चले गुरु पाहीं। सिय सनेहु बरनत मन माहीं।।
अर्थ · Hindi
रामु सुभायँ चले गुरु पाहीं। सिय सनेहु बरनत मन माहीं।।
- RCM 1.267.7Open verse →
रानिन्ह सहित सोचबस सीया। अब धौं बिधिहि काह करनीया।।
अर्थ · Hindi
रानिन्ह सहित सोचबस सीया। अब धौं बिधिहि काह करनीया।।
- RCM 1.267.8Open verse →
भूप बचन सुनि इत उत तकहीं। लखनु राम डर बोलि न सकहीं।।
अर्थ · Hindi
भूप बचन सुनि इत उत तकहीं। लखनु राम डर बोलि न सकहीं।।
- RCM 1.267.9Open verse →
अरुन नयन भृकुटी कुटिल चितवत नृपन्ह सकोप।
अर्थ · Hindi
अरुन नयन भृकुटी कुटिल चितवत नृपन्ह सकोप।
- RCM 1.267.10Open verse →
मनहुँ मत्त गजगन निरखि सिंघकिसोरहि चोप।।267।।
अर्थ · Hindi
मनहुँ मत्त गजगन निरखि सिंघकिसोरहि चोप।।267।।
- RCM 1.268.1Open verse →
खरभरु देखि बिकल पुर नारीं। सब मिलि देहिं महीपन्ह गारीं।।
अर्थ · Hindi
खरभरु देखि बिकल पुर नारीं। सब मिलि देहिं महीपन्ह गारीं।।
- RCM 1.268.2Open verse →
तेहिं अवसर सुनि सिव धनु भंगा। आयसु भृगुकुल कमल पतंगा।।
अर्थ · Hindi
तेहिं अवसर सुनि सिव धनु भंगा। आयसु भृगुकुल कमल पतंगा।।
- RCM 1.268.3Open verse →
देखि महीप सकल सकुचाने। बाज झपट जनु लवा लुकाने।।
अर्थ · Hindi
देखि महीप सकल सकुचाने। बाज झपट जनु लवा लुकाने।।
- RCM 1.268.4Open verse →
गौरि सरीर भूति भल भ्राजा। भाल बिसाल त्रिपुंड बिराजा।।
अर्थ · Hindi
गौरि सरीर भूति भल भ्राजा। भाल बिसाल त्रिपुंड बिराजा।।
- RCM 1.268.5Open verse →
सीस जटा ससिबदनु सुहावा। रिसबस कछुक अरुन होइ आवा।।
अर्थ · Hindi
सीस जटा ससिबदनु सुहावा। रिसबस कछुक अरुन होइ आवा।।
- RCM 1.268.6Open verse →
भृकुटी कुटिल नयन रिस राते। सहजहुँ चितवत मनहुँ रिसाते।।
अर्थ · Hindi
भृकुटी कुटिल नयन रिस राते। सहजहुँ चितवत मनहुँ रिसाते।।
- RCM 1.268.7Open verse →
बृषभ कंध उर बाहु बिसाला। चारु जनेउ माल मृगछाला।।
अर्थ · Hindi
बृषभ कंध उर बाहु बिसाला। चारु जनेउ माल मृगछाला।।
- RCM 1.268.8Open verse →
कटि मुनि बसन तून दुइ बाँधें। धनु सर कर कुठारु कल काँधें।।
अर्थ · Hindi
कटि मुनि बसन तून दुइ बाँधें। धनु सर कर कुठारु कल काँधें।।
- RCM 1.268.9Open verse →
सांत बेषु करनी कठिन बरनि न जाइ सरुप।
अर्थ · Hindi
सांत बेषु करनी कठिन बरनि न जाइ सरुप।
- RCM 1.268.10Open verse →
धरि मुनितनु जनु बीर रसु आयउ जहँ सब भूप।।268।।
अर्थ · Hindi
धरि मुनितनु जनु बीर रसु आयउ जहँ सब भूप।।268।।
- RCM 1.269.1Open verse →
देखत भृगुपति बेषु कराला। उठे सकल भय बिकल भुआला।।
अर्थ · Hindi
देखत भृगुपति बेषु कराला। उठे सकल भय बिकल भुआला।।
- RCM 1.269.2Open verse →
पितु समेत कहि कहि निज नामा। लगे करन सब दंड प्रनामा।।
अर्थ · Hindi
पितु समेत कहि कहि निज नामा। लगे करन सब दंड प्रनामा।।
- RCM 1.269.3Open verse →
जेहि सुभायँ चितवहिं हितु जानी। सो जानइ जनु आइ खुटानी।।
अर्थ · Hindi
जेहि सुभायँ चितवहिं हितु जानी। सो जानइ जनु आइ खुटानी।।
- RCM 1.269.4Open verse →
जनक बहोरि आइ सिरु नावा। सीय बोलाइ प्रनामु करावा।।
अर्थ · Hindi
जनक बहोरि आइ सिरु नावा। सीय बोलाइ प्रनामु करावा।।
- RCM 1.269.5Open verse →
आसिष दीन्हि सखीं हरषानीं। निज समाज लै गई सयानीं।।
अर्थ · Hindi
आसिष दीन्हि सखीं हरषानीं। निज समाज लै गई सयानीं।।
- RCM 1.269.6Open verse →
बिस्वामित्रु मिले पुनि आई। पद सरोज मेले दोउ भाई।।
अर्थ · Hindi
बिस्वामित्रु मिले पुनि आई। पद सरोज मेले दोउ भाई।।
- RCM 1.269.7Open verse →
रामु लखनु दसरथ के ढोटा। दीन्हि असीस देखि भल जोटा।।
अर्थ · Hindi
रामु लखनु दसरथ के ढोटा। दीन्हि असीस देखि भल जोटा।।
- RCM 1.269.8Open verse →
रामहि चितइ रहे थकि लोचन। रूप अपार मार मद मोचन।।
अर्थ · Hindi
रामहि चितइ रहे थकि लोचन। रूप अपार मार मद मोचन।।
- RCM 1.269.9Open verse →
बहुरि बिलोकि बिदेह सन कहहु काह अति भीर।।
अर्थ · Hindi
बहुरि बिलोकि बिदेह सन कहहु काह अति भीर।।
- RCM 1.269.10Open verse →
पूछत जानि अजान जिमि ब्यापेउ कोपु सरीर।।269।।
अर्थ · Hindi
पूछत जानि अजान जिमि ब्यापेउ कोपु सरीर।।269।।
- RCM 1.270.1Open verse →
समाचार कहि जनक सुनाए। जेहि कारन महीप सब आए।।
अर्थ · Hindi
समाचार कहि जनक सुनाए। जेहि कारन महीप सब आए।।
- RCM 1.270.2Open verse →
सुनत बचन फिरि अनत निहारे। देखे चापखंड महि डारे।।
अर्थ · Hindi
सुनत बचन फिरि अनत निहारे। देखे चापखंड महि डारे।।
- RCM 1.270.3Open verse →
अति रिस बोले बचन कठोरा। कहु जड़ जनक धनुष कै तोरा।।
अर्थ · Hindi
अति रिस बोले बचन कठोरा। कहु जड़ जनक धनुष कै तोरा।।
- RCM 1.270.4Open verse →
बेगि देखाउ मूढ़ न त आजू। उलटउँ महि जहँ लहि तव राजू।।
अर्थ · Hindi
बेगि देखाउ मूढ़ न त आजू। उलटउँ महि जहँ लहि तव राजू।।
- RCM 1.270.5Open verse →
अति डरु उतरु देत नृपु नाहीं। कुटिल भूप हरषे मन माहीं।।
अर्थ · Hindi
अति डरु उतरु देत नृपु नाहीं। कुटिल भूप हरषे मन माहीं।।
- RCM 1.270.6Open verse →
सुर मुनि नाग नगर नर नारी।।सोचहिं सकल त्रास उर भारी।।
अर्थ · Hindi
सुर मुनि नाग नगर नर नारी।।सोचहिं सकल त्रास उर भारी।।
- RCM 1.270.7Open verse →
मन पछिताति सीय महतारी। बिधि अब सँवरी बात बिगारी।।
अर्थ · Hindi
मन पछिताति सीय महतारी। बिधि अब सँवरी बात बिगारी।।
- RCM 1.270.8Open verse →
भृगुपति कर सुभाउ सुनि सीता। अरध निमेष कलप सम बीता।।
अर्थ · Hindi
भृगुपति कर सुभाउ सुनि सीता। अरध निमेष कलप सम बीता।।
- RCM 1.270.9Open verse →
सभय बिलोके लोग सब जानि जानकी भीरु।
अर्थ · Hindi
सभय बिलोके लोग सब जानि जानकी भीरु।
- RCM 1.270.10Open verse →
हृदयँ न हरषु बिषादु कछु बोले श्रीरघुबीरु।।270।।
अर्थ · Hindi
हृदयँ न हरषु बिषादु कछु बोले श्रीरघुबीरु।।270।।
- RCM 1.271.1Open verse →
नाथ संभुधनु भंजनिहारा। होइहि केउ एक दास तुम्हारा।।
अर्थ · Hindi
नाथ संभुधनु भंजनिहारा। होइहि केउ एक दास तुम्हारा।।
- RCM 1.271.2Open verse →
आयसु काह कहिअ किन मोही। सुनि रिसाइ बोले मुनि कोही।।
अर्थ · Hindi
आयसु काह कहिअ किन मोही। सुनि रिसाइ बोले मुनि कोही।।
- RCM 1.271.3Open verse →
सेवकु सो जो करै सेवकाई। अरि करनी करि करिअ लराई।।
अर्थ · Hindi
सेवकु सो जो करै सेवकाई। अरि करनी करि करिअ लराई।।
- RCM 1.271.4Open verse →
सुनहु राम जेहिं सिवधनु तोरा। सहसबाहु सम सो रिपु मोरा।।
अर्थ · Hindi
सुनहु राम जेहिं सिवधनु तोरा। सहसबाहु सम सो रिपु मोरा।।
- RCM 1.271.5Open verse →
सो बिलगाउ बिहाइ समाजा। न त मारे जैहहिं सब राजा।।
अर्थ · Hindi
सो बिलगाउ बिहाइ समाजा। न त मारे जैहहिं सब राजा।।
- RCM 1.271.6Open verse →
सुनि मुनि बचन लखन मुसुकाने। बोले परसुधरहि अपमाने।।
अर्थ · Hindi
सुनि मुनि बचन लखन मुसुकाने। बोले परसुधरहि अपमाने।।
- RCM 1.271.7Open verse →
बहु धनुहीं तोरीं लरिकाईं। कबहुँ न असि रिस कीन्हि गोसाईं।।
अर्थ · Hindi
बहु धनुहीं तोरीं लरिकाईं। कबहुँ न असि रिस कीन्हि गोसाईं।।
- RCM 1.271.8Open verse →
एहि धनु पर ममता केहि हेतू। सुनि रिसाइ कह भृगुकुलकेतू।।
अर्थ · Hindi
एहि धनु पर ममता केहि हेतू। सुनि रिसाइ कह भृगुकुलकेतू।।
- RCM 1.271.9Open verse →
रे नृप बालक कालबस बोलत तोहि न सँमार।।
अर्थ · Hindi
रे नृप बालक कालबस बोलत तोहि न सँमार।।
- RCM 1.271.10Open verse →
धनुही सम तिपुरारि धनु बिदित सकल संसार।।271।।
अर्थ · Hindi
धनुही सम तिपुरारि धनु बिदित सकल संसार।।271।।
- RCM 1.272.1Open verse →
लखन कहा हँसि हमरें जाना। सुनहु देव सब धनुष समाना।।
अर्थ · Hindi
लखन कहा हँसि हमरें जाना। सुनहु देव सब धनुष समाना।।
- RCM 1.272.2Open verse →
का छति लाभु जून धनु तौरें। देखा राम नयन के भोरें।।
अर्थ · Hindi
का छति लाभु जून धनु तौरें। देखा राम नयन के भोरें।।
- RCM 1.272.3Open verse →
छुअत टूट रघुपतिहु न दोसू। मुनि बिनु काज करिअ कत रोसू ।
अर्थ · Hindi
छुअत टूट रघुपतिहु न दोसू। मुनि बिनु काज करिअ कत रोसू ।
- RCM 1.272.4Open verse →
बोले चितइ परसु की ओरा। रे सठ सुनेहि सुभाउ न मोरा।।
अर्थ · Hindi
बोले चितइ परसु की ओरा। रे सठ सुनेहि सुभाउ न मोरा।।
- RCM 1.272.5Open verse →
बालकु बोलि बधउँ नहिं तोही। केवल मुनि जड़ जानहि मोही।।
अर्थ · Hindi
बालकु बोलि बधउँ नहिं तोही। केवल मुनि जड़ जानहि मोही।।
- RCM 1.272.6Open verse →
बाल ब्रह्मचारी अति कोही। बिस्व बिदित छत्रियकुल द्रोही।।
अर्थ · Hindi
बाल ब्रह्मचारी अति कोही। बिस्व बिदित छत्रियकुल द्रोही।।
- RCM 1.272.7Open verse →
भुजबल भूमि भूप बिनु कीन्ही। बिपुल बार महिदेवन्ह दीन्ही।।
अर्थ · Hindi
भुजबल भूमि भूप बिनु कीन्ही। बिपुल बार महिदेवन्ह दीन्ही।।
- RCM 1.272.8Open verse →
सहसबाहु भुज छेदनिहारा। परसु बिलोकु महीपकुमारा।।
अर्थ · Hindi
सहसबाहु भुज छेदनिहारा। परसु बिलोकु महीपकुमारा।।
- RCM 1.272.9Open verse →
मातु पितहि जनि सोचबस करसि महीसकिसोर।
अर्थ · Hindi
मातु पितहि जनि सोचबस करसि महीसकिसोर।
- RCM 1.272.10Open verse →
गर्भन्ह के अर्भक दलन परसु मोर अति घोर।।272।।
अर्थ · Hindi
गर्भन्ह के अर्भक दलन परसु मोर अति घोर।।272।।
- RCM 1.273.1Open verse →
बिहसि लखनु बोले मृदु बानी। अहो मुनीसु महा भटमानी।।
अर्थ · Hindi
बिहसि लखनु बोले मृदु बानी। अहो मुनीसु महा भटमानी।।
- RCM 1.273.2Open verse →
पुनि पुनि मोहि देखाव कुठारू। चहत उड़ावन फूँकि पहारू।।
अर्थ · Hindi
पुनि पुनि मोहि देखाव कुठारू। चहत उड़ावन फूँकि पहारू।।
- RCM 1.273.3Open verse →
इहाँ कुम्हड़बतिया कोउ नाहीं। जे तरजनी देखि मरि जाहीं।।
अर्थ · Hindi
इहाँ कुम्हड़बतिया कोउ नाहीं। जे तरजनी देखि मरि जाहीं।।
- RCM 1.273.4Open verse →
देखि कुठारु सरासन बाना। मैं कछु कहा सहित अभिमाना।।
अर्थ · Hindi
देखि कुठारु सरासन बाना। मैं कछु कहा सहित अभिमाना।।
- RCM 1.273.5Open verse →
भृगुसुत समुझि जनेउ बिलोकी। जो कछु कहहु सहउँ रिस रोकी।।
अर्थ · Hindi
भृगुसुत समुझि जनेउ बिलोकी। जो कछु कहहु सहउँ रिस रोकी।।
- RCM 1.273.6Open verse →
सुर महिसुर हरिजन अरु गाई। हमरें कुल इन्ह पर न सुराई।।
अर्थ · Hindi
सुर महिसुर हरिजन अरु गाई। हमरें कुल इन्ह पर न सुराई।।
- RCM 1.273.7Open verse →
बधें पापु अपकीरति हारें। मारतहूँ पा परिअ तुम्हारें।।
अर्थ · Hindi
बधें पापु अपकीरति हारें। मारतहूँ पा परिअ तुम्हारें।।
- RCM 1.273.8Open verse →
कोटि कुलिस सम बचनु तुम्हारा। ब्यर्थ धरहु धनु बान कुठारा।।
अर्थ · Hindi
कोटि कुलिस सम बचनु तुम्हारा। ब्यर्थ धरहु धनु बान कुठारा।।
- RCM 1.273.9Open verse →
जो बिलोकि अनुचित कहेउँ छमहु महामुनि धीर।
अर्थ · Hindi
जो बिलोकि अनुचित कहेउँ छमहु महामुनि धीर।
- RCM 1.273.10Open verse →
सुनि सरोष भृगुबंसमनि बोले गिरा गभीर।।273।।
अर्थ · Hindi
सुनि सरोष भृगुबंसमनि बोले गिरा गभीर।।273।।
- RCM 1.274.1Open verse →
कौसिक सुनहु मंद यहु बालकु। कुटिल कालबस निज कुल घालकु।।
अर्थ · Hindi
कौसिक सुनहु मंद यहु बालकु। कुटिल कालबस निज कुल घालकु।।
- RCM 1.274.2Open verse →
भानु बंस राकेस कलंकू। निपट निरंकुस अबुध असंकू।।
अर्थ · Hindi
भानु बंस राकेस कलंकू। निपट निरंकुस अबुध असंकू।।
- RCM 1.274.3Open verse →
काल कवलु होइहि छन माहीं। कहउँ पुकारि खोरि मोहि नाहीं।।
अर्थ · Hindi
काल कवलु होइहि छन माहीं। कहउँ पुकारि खोरि मोहि नाहीं।।
- RCM 1.274.4Open verse →
तुम्ह हटकउ जौं चहहु उबारा। कहि प्रतापु बलु रोषु हमारा।।
अर्थ · Hindi
तुम्ह हटकउ जौं चहहु उबारा। कहि प्रतापु बलु रोषु हमारा।।
- RCM 1.274.5Open verse →
लखन कहेउ मुनि सुजस तुम्हारा। तुम्हहि अछत को बरनै पारा।।
अर्थ · Hindi
लखन कहेउ मुनि सुजस तुम्हारा। तुम्हहि अछत को बरनै पारा।।
- RCM 1.274.6Open verse →
अपने मुँह तुम्ह आपनि करनी। बार अनेक भाँति बहु बरनी।।
अर्थ · Hindi
अपने मुँह तुम्ह आपनि करनी। बार अनेक भाँति बहु बरनी।।
- RCM 1.274.7Open verse →
नहिं संतोषु त पुनि कछु कहहू। जनि रिस रोकि दुसह दुख सहहू।।
अर्थ · Hindi
नहिं संतोषु त पुनि कछु कहहू। जनि रिस रोकि दुसह दुख सहहू।।
- RCM 1.274.8Open verse →
बीरब्रती तुम्ह धीर अछोभा। गारी देत न पावहु सोभा।।
अर्थ · Hindi
बीरब्रती तुम्ह धीर अछोभा। गारी देत न पावहु सोभा।।
- RCM 1.274.9Open verse →
सूर समर करनी करहिं कहि न जनावहिं आपु।
अर्थ · Hindi
सूर समर करनी करहिं कहि न जनावहिं आपु।
- RCM 1.274.10Open verse →
बिद्यमान रन पाइ रिपु कायर कथहिं प्रतापु।।274।।
अर्थ · Hindi
बिद्यमान रन पाइ रिपु कायर कथहिं प्रतापु।।274।।
- RCM 1.275.1Open verse →
तुम्ह तौ कालु हाँक जनु लावा। बार बार मोहि लागि बोलावा।।
अर्थ · Hindi
तुम्ह तौ कालु हाँक जनु लावा। बार बार मोहि लागि बोलावा।।
- RCM 1.275.2Open verse →
सुनत लखन के बचन कठोरा। परसु सुधारि धरेउ कर घोरा।।
अर्थ · Hindi
सुनत लखन के बचन कठोरा। परसु सुधारि धरेउ कर घोरा।।
- RCM 1.275.3Open verse →
अब जनि देइ दोसु मोहि लोगू। कटुबादी बालकु बधजोगू।।
अर्थ · Hindi
अब जनि देइ दोसु मोहि लोगू। कटुबादी बालकु बधजोगू।।
- RCM 1.275.4Open verse →
बाल बिलोकि बहुत मैं बाँचा। अब यहु मरनिहार भा साँचा।।
अर्थ · Hindi
बाल बिलोकि बहुत मैं बाँचा। अब यहु मरनिहार भा साँचा।।
- RCM 1.275.5Open verse →
कौसिक कहा छमिअ अपराधू। बाल दोष गुन गनहिं न साधू।।
अर्थ · Hindi
कौसिक कहा छमिअ अपराधू। बाल दोष गुन गनहिं न साधू।।
- RCM 1.275.6Open verse →
खर कुठार मैं अकरुन कोही। आगें अपराधी गुरुद्रोही।।
अर्थ · Hindi
खर कुठार मैं अकरुन कोही। आगें अपराधी गुरुद्रोही।।
- RCM 1.275.7Open verse →
उतर देत छोड़उँ बिनु मारें। केवल कौसिक सील तुम्हारें।।
अर्थ · Hindi
उतर देत छोड़उँ बिनु मारें। केवल कौसिक सील तुम्हारें।।
- RCM 1.275.8Open verse →
न त एहि काटि कुठार कठोरें। गुरहि उरिन होतेउँ श्रम थोरें।।
अर्थ · Hindi
न त एहि काटि कुठार कठोरें। गुरहि उरिन होतेउँ श्रम थोरें।।
- RCM 1.275.9Open verse →
गाधिसूनु कह हृदयँ हँसि मुनिहि हरिअरइ सूझ।
अर्थ · Hindi
गाधिसूनु कह हृदयँ हँसि मुनिहि हरिअरइ सूझ।
- RCM 1.275.10Open verse →
अयमय खाँड न ऊखमय अजहुँ न बूझ अबूझ।।275।।
अर्थ · Hindi
अयमय खाँड न ऊखमय अजहुँ न बूझ अबूझ।।275।।
- RCM 1.276.1Open verse →
कहेउ लखन मुनि सीलु तुम्हारा। को नहि जान बिदित संसारा।।
अर्थ · Hindi
कहेउ लखन मुनि सीलु तुम्हारा। को नहि जान बिदित संसारा।।
- RCM 1.276.2Open verse →
माता पितहि उरिन भए नीकें। गुर रिनु रहा सोचु बड़ जीकें।।
अर्थ · Hindi
माता पितहि उरिन भए नीकें। गुर रिनु रहा सोचु बड़ जीकें।।
- RCM 1.276.3Open verse →
सो जनु हमरेहि माथे काढ़ा। दिन चलि गए ब्याज बड़ बाढ़ा।।
अर्थ · Hindi
सो जनु हमरेहि माथे काढ़ा। दिन चलि गए ब्याज बड़ बाढ़ा।।
- RCM 1.276.4Open verse →
अब आनिअ ब्यवहरिआ बोली। तुरत देउँ मैं थैली खोली।।
अर्थ · Hindi
अब आनिअ ब्यवहरिआ बोली। तुरत देउँ मैं थैली खोली।।
- RCM 1.276.5Open verse →
सुनि कटु बचन कुठार सुधारा। हाय हाय सब सभा पुकारा।।
अर्थ · Hindi
सुनि कटु बचन कुठार सुधारा। हाय हाय सब सभा पुकारा।।
- RCM 1.276.6Open verse →
भृगुबर परसु देखावहु मोही। बिप्र बिचारि बचउँ नृपद्रोही।।
अर्थ · Hindi
भृगुबर परसु देखावहु मोही। बिप्र बिचारि बचउँ नृपद्रोही।।
- RCM 1.276.7Open verse →
मिले न कबहुँ सुभट रन गाढ़े। द्विज देवता घरहि के बाढ़े।।
अर्थ · Hindi
मिले न कबहुँ सुभट रन गाढ़े। द्विज देवता घरहि के बाढ़े।।
- RCM 1.276.8Open verse →
अनुचित कहि सब लोग पुकारे। रघुपति सयनहिं लखनु नेवारे।।
अर्थ · Hindi
अनुचित कहि सब लोग पुकारे। रघुपति सयनहिं लखनु नेवारे।।
- RCM 1.276.9Open verse →
लखन उतर आहुति सरिस भृगुबर कोपु कृसानु।
अर्थ · Hindi
लखन उतर आहुति सरिस भृगुबर कोपु कृसानु।
- RCM 1.276.10Open verse →
बढ़त देखि जल सम बचन बोले रघुकुलभानु।।276।।
अर्थ · Hindi
बढ़त देखि जल सम बचन बोले रघुकुलभानु।।276।।
- RCM 1.277.1Open verse →
नाथ करहु बालक पर छोहू। सूध दूधमुख करिअ न कोहू।।
अर्थ · Hindi
नाथ करहु बालक पर छोहू। सूध दूधमुख करिअ न कोहू।।
- RCM 1.277.2Open verse →
जौं पै प्रभु प्रभाउ कछु जाना। तौ कि बराबरि करत अयाना।।
अर्थ · Hindi
जौं पै प्रभु प्रभाउ कछु जाना। तौ कि बराबरि करत अयाना।।
- RCM 1.277.3Open verse →
जौं लरिका कछु अचगरि करहीं। गुर पितु मातु मोद मन भरहीं।।
अर्थ · Hindi
जौं लरिका कछु अचगरि करहीं। गुर पितु मातु मोद मन भरहीं।।
- RCM 1.277.4Open verse →
करिअ कृपा सिसु सेवक जानी। तुम्ह सम सील धीर मुनि ग्यानी।।
अर्थ · Hindi
करिअ कृपा सिसु सेवक जानी। तुम्ह सम सील धीर मुनि ग्यानी।।
- RCM 1.277.5Open verse →
राम बचन सुनि कछुक जुड़ाने। कहि कछु लखनु बहुरि मुसकाने।।
अर्थ · Hindi
राम बचन सुनि कछुक जुड़ाने। कहि कछु लखनु बहुरि मुसकाने।।
- RCM 1.277.6Open verse →
हँसत देखि नख सिख रिस ब्यापी। राम तोर भ्राता बड़ पापी।।
अर्थ · Hindi
हँसत देखि नख सिख रिस ब्यापी। राम तोर भ्राता बड़ पापी।।
- RCM 1.277.7Open verse →
गौर सरीर स्याम मन माहीं। कालकूटमुख पयमुख नाहीं।।
अर्थ · Hindi
गौर सरीर स्याम मन माहीं। कालकूटमुख पयमुख नाहीं।।
- RCM 1.277.8Open verse →
सहज टेढ़ अनुहरइ न तोही। नीचु मीचु सम देख न मौहीं।।
अर्थ · Hindi
सहज टेढ़ अनुहरइ न तोही। नीचु मीचु सम देख न मौहीं।।
- RCM 1.277.9Open verse →
लखन कहेउ हँसि सुनहु मुनि क्रोधु पाप कर मूल।
अर्थ · Hindi
लखन कहेउ हँसि सुनहु मुनि क्रोधु पाप कर मूल।
- RCM 1.277.10Open verse →
जेहि बस जन अनुचित करहिं चरहिं बिस्व प्रतिकूल।।277।।
अर्थ · Hindi
जेहि बस जन अनुचित करहिं चरहिं बिस्व प्रतिकूल।।277।।
- RCM 1.278.1Open verse →
मैं तुम्हार अनुचर मुनिराया। परिहरि कोपु करिअ अब दाया।।
अर्थ · Hindi
मैं तुम्हार अनुचर मुनिराया। परिहरि कोपु करिअ अब दाया।।
- RCM 1.278.2Open verse →
टूट चाप नहिं जुरहि रिसाने। बैठिअ होइहिं पाय पिराने।।
अर्थ · Hindi
टूट चाप नहिं जुरहि रिसाने। बैठिअ होइहिं पाय पिराने।।
- RCM 1.278.3Open verse →
जौ अति प्रिय तौ करिअ उपाई। जोरिअ कोउ बड़ गुनी बोलाई।।
अर्थ · Hindi
जौ अति प्रिय तौ करिअ उपाई। जोरिअ कोउ बड़ गुनी बोलाई।।
- RCM 1.278.4Open verse →
बोलत लखनहिं जनकु डेराहीं। मष्ट करहु अनुचित भल नाहीं।।
अर्थ · Hindi
बोलत लखनहिं जनकु डेराहीं। मष्ट करहु अनुचित भल नाहीं।।
- RCM 1.278.5Open verse →
थर थर कापहिं पुर नर नारी। छोट कुमार खोट बड़ भारी।।
अर्थ · Hindi
थर थर कापहिं पुर नर नारी। छोट कुमार खोट बड़ भारी।।
- RCM 1.278.6Open verse →
भृगुपति सुनि सुनि निरभय बानी। रिस तन जरइ होइ बल हानी।।
अर्थ · Hindi
भृगुपति सुनि सुनि निरभय बानी। रिस तन जरइ होइ बल हानी।।
- RCM 1.278.7Open verse →
बोले रामहि देइ निहोरा। बचउँ बिचारि बंधु लघु तोरा।।
अर्थ · Hindi
बोले रामहि देइ निहोरा। बचउँ बिचारि बंधु लघु तोरा।।
- RCM 1.278.8Open verse →
मनु मलीन तनु सुंदर कैसें। बिष रस भरा कनक घटु जैसैं।।
अर्थ · Hindi
मनु मलीन तनु सुंदर कैसें। बिष रस भरा कनक घटु जैसैं।।
- RCM 1.278.9Open verse →
सुनि लछिमन बिहसे बहुरि नयन तरेरे राम।
अर्थ · Hindi
सुनि लछिमन बिहसे बहुरि नयन तरेरे राम।
- RCM 1.278.10Open verse →
गुर समीप गवने सकुचि परिहरि बानी बाम।।278।।
अर्थ · Hindi
गुर समीप गवने सकुचि परिहरि बानी बाम।।278।।
- RCM 1.279.1Open verse →
अति बिनीत मृदु सीतल बानी। बोले रामु जोरि जुग पानी।।
अर्थ · Hindi
अति बिनीत मृदु सीतल बानी। बोले रामु जोरि जुग पानी।।
- RCM 1.279.2Open verse →
सुनहु नाथ तुम्ह सहज सुजाना। बालक बचनु करिअ नहिं काना।।
अर्थ · Hindi
सुनहु नाथ तुम्ह सहज सुजाना। बालक बचनु करिअ नहिं काना।।
- RCM 1.279.3Open verse →
बररै बालक एकु सुभाऊ। इन्हहि न संत बिदूषहिं काऊ।।
अर्थ · Hindi
बररै बालक एकु सुभाऊ। इन्हहि न संत बिदूषहिं काऊ।।
- RCM 1.279.4Open verse →
तेहिं नाहीं कछु काज बिगारा। अपराधी में नाथ तुम्हारा।।
अर्थ · Hindi
तेहिं नाहीं कछु काज बिगारा। अपराधी में नाथ तुम्हारा।।
- RCM 1.279.5Open verse →
कृपा कोपु बधु बँधब गोसाईं। मो पर करिअ दास की नाई।।
अर्थ · Hindi
कृपा कोपु बधु बँधब गोसाईं। मो पर करिअ दास की नाई।।
- RCM 1.279.6Open verse →
कहिअ बेगि जेहि बिधि रिस जाई। मुनिनायक सोइ करौं उपाई।।
अर्थ · Hindi
कहिअ बेगि जेहि बिधि रिस जाई। मुनिनायक सोइ करौं उपाई।।
- RCM 1.279.7Open verse →
कह मुनि राम जाइ रिस कैसें। अजहुँ अनुज तव चितव अनैसें।।
अर्थ · Hindi
कह मुनि राम जाइ रिस कैसें। अजहुँ अनुज तव चितव अनैसें।।
- RCM 1.279.8Open verse →
एहि के कंठ कुठारु न दीन्हा। तौ मैं काह कोपु करि कीन्हा।।
अर्थ · Hindi
एहि के कंठ कुठारु न दीन्हा। तौ मैं काह कोपु करि कीन्हा।।
- RCM 1.279.9Open verse →
गर्भ स्त्रवहिं अवनिप रवनि सुनि कुठार गति घोर।
अर्थ · Hindi
गर्भ स्त्रवहिं अवनिप रवनि सुनि कुठार गति घोर।
- RCM 1.279.10Open verse →
परसु अछत देखउँ जिअत बैरी भूपकिसोर।।279।।
अर्थ · Hindi
परसु अछत देखउँ जिअत बैरी भूपकिसोर।।279।।
- RCM 1.280.1Open verse →
बहइ न हाथु दहइ रिस छाती। भा कुठारु कुंठित नृपघाती।।
अर्थ · Hindi
बहइ न हाथु दहइ रिस छाती। भा कुठारु कुंठित नृपघाती।।
- RCM 1.280.2Open verse →
भयउ बाम बिधि फिरेउ सुभाऊ। मोरे हृदयँ कृपा कसि काऊ।।
अर्थ · Hindi
भयउ बाम बिधि फिरेउ सुभाऊ। मोरे हृदयँ कृपा कसि काऊ।।
- RCM 1.280.3Open verse →
आजु दया दुखु दुसह सहावा। सुनि सौमित्र बिहसि सिरु नावा।।
अर्थ · Hindi
आजु दया दुखु दुसह सहावा। सुनि सौमित्र बिहसि सिरु नावा।।
- RCM 1.280.4Open verse →
बाउ कृपा मूरति अनुकूला। बोलत बचन झरत जनु फूला।।
अर्थ · Hindi
बाउ कृपा मूरति अनुकूला। बोलत बचन झरत जनु फूला।।
- RCM 1.280.5Open verse →
जौं पै कृपाँ जरिहिं मुनि गाता। क्रोध भएँ तनु राख बिधाता।।
अर्थ · Hindi
जौं पै कृपाँ जरिहिं मुनि गाता। क्रोध भएँ तनु राख बिधाता।।
- RCM 1.280.6Open verse →
देखु जनक हठि बालक एहू। कीन्ह चहत जड़ जमपुर गेहू।।
अर्थ · Hindi
देखु जनक हठि बालक एहू। कीन्ह चहत जड़ जमपुर गेहू।।
- RCM 1.280.7Open verse →
बेगि करहु किन आँखिन्ह ओटा। देखत छोट खोट नृप ढोटा।।
अर्थ · Hindi
बेगि करहु किन आँखिन्ह ओटा। देखत छोट खोट नृप ढोटा।।
- RCM 1.280.8Open verse →
बिहसे लखनु कहा मन माहीं। मूदें आँखि कतहुँ कोउ नाहीं।।
अर्थ · Hindi
बिहसे लखनु कहा मन माहीं। मूदें आँखि कतहुँ कोउ नाहीं।।
- RCM 1.280.9Open verse →
परसुरामु तब राम प्रति बोले उर अति क्रोधु।
अर्थ · Hindi
परसुरामु तब राम प्रति बोले उर अति क्रोधु।
- RCM 1.280.10Open verse →
संभु सरासनु तोरि सठ करसि हमार प्रबोधु।।280।।
अर्थ · Hindi
संभु सरासनु तोरि सठ करसि हमार प्रबोधु।।280।।
- RCM 1.281.1Open verse →
बंधु कहइ कटु संमत तोरें। तू छल बिनय करसि कर जोरें।।
अर्थ · Hindi
बंधु कहइ कटु संमत तोरें। तू छल बिनय करसि कर जोरें।।
- RCM 1.281.2Open verse →
करु परितोषु मोर संग्रामा। नाहिं त छाड़ कहाउब रामा।।
अर्थ · Hindi
करु परितोषु मोर संग्रामा। नाहिं त छाड़ कहाउब रामा।।
- RCM 1.281.3Open verse →
छलु तजि करहि समरु सिवद्रोही। बंधु सहित न त मारउँ तोही।।
अर्थ · Hindi
छलु तजि करहि समरु सिवद्रोही। बंधु सहित न त मारउँ तोही।।
- RCM 1.281.4Open verse →
भृगुपति बकहिं कुठार उठाएँ। मन मुसकाहिं रामु सिर नाएँ।।
अर्थ · Hindi
भृगुपति बकहिं कुठार उठाएँ। मन मुसकाहिं रामु सिर नाएँ।।
- RCM 1.281.5Open verse →
गुनह लखन कर हम पर रोषू। कतहुँ सुधाइहु ते बड़ दोषू।।
अर्थ · Hindi
गुनह लखन कर हम पर रोषू। कतहुँ सुधाइहु ते बड़ दोषू।।
- RCM 1.281.6Open verse →
टेढ़ जानि सब बंदइ काहू। बक्र चंद्रमहि ग्रसइ न राहू।।
अर्थ · Hindi
टेढ़ जानि सब बंदइ काहू। बक्र चंद्रमहि ग्रसइ न राहू।।
- RCM 1.281.7Open verse →
राम कहेउ रिस तजिअ मुनीसा। कर कुठारु आगें यह सीसा।।
अर्थ · Hindi
राम कहेउ रिस तजिअ मुनीसा। कर कुठारु आगें यह सीसा।।
- RCM 1.281.8Open verse →
जेंहिं रिस जाइ करिअ सोइ स्वामी। मोहि जानि आपन अनुगामी।।
अर्थ · Hindi
जेंहिं रिस जाइ करिअ सोइ स्वामी। मोहि जानि आपन अनुगामी।।
- RCM 1.281.9Open verse →
प्रभुहि सेवकहि समरु कस तजहु बिप्रबर रोसु।
अर्थ · Hindi
प्रभुहि सेवकहि समरु कस तजहु बिप्रबर रोसु।
- RCM 1.281.10Open verse →
बेषु बिलोकें कहेसि कछु बालकहू नहिं दोसु।।281।।
अर्थ · Hindi
बेषु बिलोकें कहेसि कछु बालकहू नहिं दोसु।।281।।
- RCM 1.282.1Open verse →
देखि कुठार बान धनु धारी। भै लरिकहि रिस बीरु बिचारी।।
अर्थ · Hindi
देखि कुठार बान धनु धारी। भै लरिकहि रिस बीरु बिचारी।।
- RCM 1.282.2Open verse →
नामु जान पै तुम्हहि न चीन्हा। बंस सुभायँ उतरु तेंहिं दीन्हा।।
अर्थ · Hindi
नामु जान पै तुम्हहि न चीन्हा। बंस सुभायँ उतरु तेंहिं दीन्हा।।
- RCM 1.282.3Open verse →
जौं तुम्ह औतेहु मुनि की नाईं। पद रज सिर सिसु धरत गोसाईं।।
अर्थ · Hindi
जौं तुम्ह औतेहु मुनि की नाईं। पद रज सिर सिसु धरत गोसाईं।।
- RCM 1.282.4Open verse →
छमहु चूक अनजानत केरी। चहिअ बिप्र उर कृपा घनेरी।।
अर्थ · Hindi
छमहु चूक अनजानत केरी। चहिअ बिप्र उर कृपा घनेरी।।
- RCM 1.282.5Open verse →
हमहि तुम्हहि सरिबरि कसि नाथा।।कहहु न कहाँ चरन कहँ माथा।।
अर्थ · Hindi
हमहि तुम्हहि सरिबरि कसि नाथा।।कहहु न कहाँ चरन कहँ माथा।।
- RCM 1.282.6Open verse →
राम मात्र लघु नाम हमारा। परसु सहित बड़ नाम तोहारा।।
अर्थ · Hindi
राम मात्र लघु नाम हमारा। परसु सहित बड़ नाम तोहारा।।
- RCM 1.282.7Open verse →
देव एकु गुनु धनुष हमारें। नव गुन परम पुनीत तुम्हारें।।
अर्थ · Hindi
देव एकु गुनु धनुष हमारें। नव गुन परम पुनीत तुम्हारें।।
- RCM 1.282.8Open verse →
सब प्रकार हम तुम्ह सन हारे। छमहु बिप्र अपराध हमारे।।
अर्थ · Hindi
सब प्रकार हम तुम्ह सन हारे। छमहु बिप्र अपराध हमारे।।
- RCM 1.282.9Open verse →
बार बार मुनि बिप्रबर कहा राम सन राम।
अर्थ · Hindi
बार बार मुनि बिप्रबर कहा राम सन राम।
- RCM 1.282.10Open verse →
बोले भृगुपति सरुष हसि तहूँ बंधु सम बाम।।282।।
अर्थ · Hindi
बोले भृगुपति सरुष हसि तहूँ बंधु सम बाम।।282।।
- RCM 1.283.1Open verse →
निपटहिं द्विज करि जानहि मोही। मैं जस बिप्र सुनावउँ तोही।।
अर्थ · Hindi
निपटहिं द्विज करि जानहि मोही। मैं जस बिप्र सुनावउँ तोही।।
- RCM 1.283.2Open verse →
चाप स्त्रुवा सर आहुति जानू। कोप मोर अति घोर कृसानु।।
अर्थ · Hindi
चाप स्त्रुवा सर आहुति जानू। कोप मोर अति घोर कृसानु।।
- RCM 1.283.3Open verse →
समिधि सेन चतुरंग सुहाई। महा महीप भए पसु आई।।
अर्थ · Hindi
समिधि सेन चतुरंग सुहाई। महा महीप भए पसु आई।।
- RCM 1.283.4Open verse →
मै एहि परसु काटि बलि दीन्हे। समर जग्य जप कोटिन्ह कीन्हे।।
अर्थ · Hindi
मै एहि परसु काटि बलि दीन्हे। समर जग्य जप कोटिन्ह कीन्हे।।
- RCM 1.283.5Open verse →
मोर प्रभाउ बिदित नहिं तोरें। बोलसि निदरि बिप्र के भोरें।।
अर्थ · Hindi
मोर प्रभाउ बिदित नहिं तोरें। बोलसि निदरि बिप्र के भोरें।।
- RCM 1.283.6Open verse →
भंजेउ चापु दापु बड़ बाढ़ा। अहमिति मनहुँ जीति जगु ठाढ़ा।।
अर्थ · Hindi
भंजेउ चापु दापु बड़ बाढ़ा। अहमिति मनहुँ जीति जगु ठाढ़ा।।
- RCM 1.283.7Open verse →
राम कहा मुनि कहहु बिचारी। रिस अति बड़ि लघु चूक हमारी।।
अर्थ · Hindi
राम कहा मुनि कहहु बिचारी। रिस अति बड़ि लघु चूक हमारी।।
- RCM 1.283.8Open verse →
छुअतहिं टूट पिनाक पुराना। मैं कहि हेतु करौं अभिमाना।।
अर्थ · Hindi
छुअतहिं टूट पिनाक पुराना। मैं कहि हेतु करौं अभिमाना।।
- RCM 1.283.9Open verse →
जौं हम निदरहिं बिप्र बदि सत्य सुनहु भृगुनाथ।
अर्थ · Hindi
जौं हम निदरहिं बिप्र बदि सत्य सुनहु भृगुनाथ।
- RCM 1.283.10Open verse →
तौ अस को जग सुभटु जेहि भय बस नावहिं माथ।।283।।
अर्थ · Hindi
तौ अस को जग सुभटु जेहि भय बस नावहिं माथ।।283।।
- RCM 1.284.1Open verse →
देव दनुज भूपति भट नाना। समबल अधिक होउ बलवाना।।
अर्थ · Hindi
देव दनुज भूपति भट नाना। समबल अधिक होउ बलवाना।।
- RCM 1.284.2Open verse →
जौं रन हमहि पचारै कोऊ। लरहिं सुखेन कालु किन होऊ।।
अर्थ · Hindi
जौं रन हमहि पचारै कोऊ। लरहिं सुखेन कालु किन होऊ।।
- RCM 1.284.3Open verse →
छत्रिय तनु धरि समर सकाना। कुल कलंकु तेहिं पावँर आना।।
अर्थ · Hindi
छत्रिय तनु धरि समर सकाना। कुल कलंकु तेहिं पावँर आना।।
- RCM 1.284.4Open verse →
कहउँ सुभाउ न कुलहि प्रसंसी। कालहु डरहिं न रन रघुबंसी।।
अर्थ · Hindi
कहउँ सुभाउ न कुलहि प्रसंसी। कालहु डरहिं न रन रघुबंसी।।
- RCM 1.284.5Open verse →
बिप्रबंस कै असि प्रभुताई। अभय होइ जो तुम्हहि डेराई।।
अर्थ · Hindi
बिप्रबंस कै असि प्रभुताई। अभय होइ जो तुम्हहि डेराई।।
- RCM 1.284.6Open verse →
सुनु मृदु गूढ़ बचन रघुपति के। उघरे पटल परसुधर मति के।।
अर्थ · Hindi
सुनु मृदु गूढ़ बचन रघुपति के। उघरे पटल परसुधर मति के।।
- RCM 1.284.7Open verse →
राम रमापति कर धनु लेहू। खैंचहु मिटै मोर संदेहू।।
अर्थ · Hindi
राम रमापति कर धनु लेहू। खैंचहु मिटै मोर संदेहू।।
- RCM 1.284.8Open verse →
देत चापु आपुहिं चलि गयऊ। परसुराम मन बिसमय भयऊ।।
अर्थ · Hindi
देत चापु आपुहिं चलि गयऊ। परसुराम मन बिसमय भयऊ।।
- RCM 1.284.9Open verse →
जाना राम प्रभाउ तब पुलक प्रफुल्लित गात।
अर्थ · Hindi
जाना राम प्रभाउ तब पुलक प्रफुल्लित गात।
- RCM 1.284.10Open verse →
जोरि पानि बोले बचन ह्दयँ न प्रेमु अमात।।284।।
अर्थ · Hindi
जोरि पानि बोले बचन ह्दयँ न प्रेमु अमात।।284।।
- RCM 1.285.1Open verse →
जय रघुबंस बनज बन भानू। गहन दनुज कुल दहन कृसानु।।
अर्थ · Hindi
जय रघुबंस बनज बन भानू। गहन दनुज कुल दहन कृसानु।।
- RCM 1.285.2Open verse →
जय सुर बिप्र धेनु हितकारी। जय मद मोह कोह भ्रम हारी।।
अर्थ · Hindi
जय सुर बिप्र धेनु हितकारी। जय मद मोह कोह भ्रम हारी।।
- RCM 1.285.3Open verse →
बिनय सील करुना गुन सागर। जयति बचन रचना अति नागर।।
अर्थ · Hindi
बिनय सील करुना गुन सागर। जयति बचन रचना अति नागर।।
- RCM 1.285.4Open verse →
सेवक सुखद सुभग सब अंगा। जय सरीर छबि कोटि अनंगा।।
अर्थ · Hindi
सेवक सुखद सुभग सब अंगा। जय सरीर छबि कोटि अनंगा।।
- RCM 1.285.5Open verse →
करौं काह मुख एक प्रसंसा। जय महेस मन मानस हंसा।।
अर्थ · Hindi
करौं काह मुख एक प्रसंसा। जय महेस मन मानस हंसा।।
- RCM 1.285.6Open verse →
अनुचित बहुत कहेउँ अग्याता। छमहु छमामंदिर दोउ भ्राता।।
अर्थ · Hindi
अनुचित बहुत कहेउँ अग्याता। छमहु छमामंदिर दोउ भ्राता।।
- RCM 1.285.7Open verse →
कहि जय जय जय रघुकुलकेतू। भृगुपति गए बनहि तप हेतू।।
अर्थ · Hindi
कहि जय जय जय रघुकुलकेतू। भृगुपति गए बनहि तप हेतू।।
- RCM 1.285.8Open verse →
अपभयँ कुटिल महीप डेराने। जहँ तहँ कायर गवँहिं पराने।।
अर्थ · Hindi
अपभयँ कुटिल महीप डेराने। जहँ तहँ कायर गवँहिं पराने।।
- RCM 1.285.9Open verse →
देवन्ह दीन्हीं दुंदुभीं प्रभु पर बरषहिं फूल।
अर्थ · Hindi
देवन्ह दीन्हीं दुंदुभीं प्रभु पर बरषहिं फूल।
- RCM 1.285.10Open verse →
हरषे पुर नर नारि सब मिटी मोहमय सूल।।285।।
अर्थ · Hindi
हरषे पुर नर नारि सब मिटी मोहमय सूल।।285।।
- RCM 1.286.1Open verse →
अति गहगहे बाजने बाजे। सबहिं मनोहर मंगल साजे।।
अर्थ · Hindi
अति गहगहे बाजने बाजे। सबहिं मनोहर मंगल साजे।।
- RCM 1.286.2Open verse →
जूथ जूथ मिलि सुमुख सुनयनीं। करहिं गान कल कोकिलबयनी।।
अर्थ · Hindi
जूथ जूथ मिलि सुमुख सुनयनीं। करहिं गान कल कोकिलबयनी।।
- RCM 1.286.3Open verse →
सुखु बिदेह कर बरनि न जाई। जन्मदरिद्र मनहुँ निधि पाई।।
अर्थ · Hindi
सुखु बिदेह कर बरनि न जाई। जन्मदरिद्र मनहुँ निधि पाई।।
- RCM 1.286.4Open verse →
गत त्रास भइ सीय सुखारी। जनु बिधु उदयँ चकोरकुमारी।।
अर्थ · Hindi
गत त्रास भइ सीय सुखारी। जनु बिधु उदयँ चकोरकुमारी।।
- RCM 1.286.5Open verse →
जनक कीन्ह कौसिकहि प्रनामा। प्रभु प्रसाद धनु भंजेउ रामा।।
अर्थ · Hindi
जनक कीन्ह कौसिकहि प्रनामा। प्रभु प्रसाद धनु भंजेउ रामा।।
- RCM 1.286.6Open verse →
मोहि कृतकृत्य कीन्ह दुहुँ भाईं। अब जो उचित सो कहिअ गोसाई।।
अर्थ · Hindi
मोहि कृतकृत्य कीन्ह दुहुँ भाईं। अब जो उचित सो कहिअ गोसाई।।
- RCM 1.286.7Open verse →
कह मुनि सुनु नरनाथ प्रबीना। रहा बिबाहु चाप आधीना।।
अर्थ · Hindi
कह मुनि सुनु नरनाथ प्रबीना। रहा बिबाहु चाप आधीना।।
- RCM 1.286.8Open verse →
टूटतहीं धनु भयउ बिबाहू। सुर नर नाग बिदित सब काहु।।
अर्थ · Hindi
टूटतहीं धनु भयउ बिबाहू। सुर नर नाग बिदित सब काहु।।
- RCM 1.286.9Open verse →
तदपि जाइ तुम्ह करहु अब जथा बंस ब्यवहारु।
अर्थ · Hindi
तदपि जाइ तुम्ह करहु अब जथा बंस ब्यवहारु।
- RCM 1.286.10Open verse →
बूझि बिप्र कुलबृद्ध गुर बेद बिदित आचारु।।286।।
अर्थ · Hindi
बूझि बिप्र कुलबृद्ध गुर बेद बिदित आचारु।।286।।
- RCM 1.287.1Open verse →
दूत अवधपुर पठवहु जाई। आनहिं नृप दसरथहि बोलाई।।
अर्थ · Hindi
दूत अवधपुर पठवहु जाई। आनहिं नृप दसरथहि बोलाई।।
- RCM 1.287.2Open verse →
मुदित राउ कहि भलेहिं कृपाला। पठए दूत बोलि तेहि काला।।
अर्थ · Hindi
मुदित राउ कहि भलेहिं कृपाला। पठए दूत बोलि तेहि काला।।
- RCM 1.287.3Open verse →
बहुरि महाजन सकल बोलाए। आइ सबन्हि सादर सिर नाए।।
अर्थ · Hindi
बहुरि महाजन सकल बोलाए। आइ सबन्हि सादर सिर नाए।।
- RCM 1.287.4Open verse →
हाट बाट मंदिर सुरबासा। नगरु सँवारहु चारिहुँ पासा।।
अर्थ · Hindi
हाट बाट मंदिर सुरबासा। नगरु सँवारहु चारिहुँ पासा।।
- RCM 1.287.5Open verse →
हरषि चले निज निज गृह आए। पुनि परिचारक बोलि पठाए।।
अर्थ · Hindi
हरषि चले निज निज गृह आए। पुनि परिचारक बोलि पठाए।।
- RCM 1.287.6Open verse →
रचहु बिचित्र बितान बनाई। सिर धरि बचन चले सचु पाई।।
अर्थ · Hindi
रचहु बिचित्र बितान बनाई। सिर धरि बचन चले सचु पाई।।
- RCM 1.287.7Open verse →
पठए बोलि गुनी तिन्ह नाना। जे बितान बिधि कुसल सुजाना।।
अर्थ · Hindi
पठए बोलि गुनी तिन्ह नाना। जे बितान बिधि कुसल सुजाना।।
- RCM 1.287.8Open verse →
बिधिहि बंदि तिन्ह कीन्ह अरंभा। बिरचे कनक कदलि के खंभा।।
अर्थ · Hindi
बिधिहि बंदि तिन्ह कीन्ह अरंभा। बिरचे कनक कदलि के खंभा।।
- RCM 1.287.9Open verse →
हरित मनिन्ह के पत्र फल पदुमराग के फूल।
अर्थ · Hindi
हरित मनिन्ह के पत्र फल पदुमराग के फूल।
- RCM 1.287.10Open verse →
रचना देखि बिचित्र अति मनु बिरंचि कर भूल।।287।।
अर्थ · Hindi
रचना देखि बिचित्र अति मनु बिरंचि कर भूल।।287।।
- RCM 1.288.1Open verse →
बेनि हरित मनिमय सब कीन्हे। सरल सपरब परहिं नहिं चीन्हे।।
अर्थ · Hindi
बेनि हरित मनिमय सब कीन्हे। सरल सपरब परहिं नहिं चीन्हे।।
- RCM 1.288.2Open verse →
कनक कलित अहिबेल बनाई। लखि नहि परइ सपरन सुहाई।।
अर्थ · Hindi
कनक कलित अहिबेल बनाई। लखि नहि परइ सपरन सुहाई।।
- RCM 1.288.3Open verse →
तेहि के रचि पचि बंध बनाए। बिच बिच मुकता दाम सुहाए।।
अर्थ · Hindi
तेहि के रचि पचि बंध बनाए। बिच बिच मुकता दाम सुहाए।।
- RCM 1.288.4Open verse →
मानिक मरकत कुलिस पिरोजा। चीरि कोरि पचि रचे सरोजा।।
अर्थ · Hindi
मानिक मरकत कुलिस पिरोजा। चीरि कोरि पचि रचे सरोजा।।
- RCM 1.288.5Open verse →
किए भृंग बहुरंग बिहंगा। गुंजहिं कूजहिं पवन प्रसंगा।।
अर्थ · Hindi
किए भृंग बहुरंग बिहंगा। गुंजहिं कूजहिं पवन प्रसंगा।।
- RCM 1.288.6Open verse →
सुर प्रतिमा खंभन गढ़ी काढ़ी। मंगल द्रब्य लिएँ सब ठाढ़ी।।
अर्थ · Hindi
सुर प्रतिमा खंभन गढ़ी काढ़ी। मंगल द्रब्य लिएँ सब ठाढ़ी।।
- RCM 1.288.7Open verse →
चौंकें भाँति अनेक पुराईं। सिंधुर मनिमय सहज सुहाई।।
अर्थ · Hindi
चौंकें भाँति अनेक पुराईं। सिंधुर मनिमय सहज सुहाई।।
- RCM 1.288.8Open verse →
सौरभ पल्लव सुभग सुठि किए नीलमनि कोरि।।
अर्थ · Hindi
सौरभ पल्लव सुभग सुठि किए नीलमनि कोरि।।
- RCM 1.288.9Open verse →
हेम बौर मरकत घवरि लसत पाटमय डोरि।।288।।
अर्थ · Hindi
हेम बौर मरकत घवरि लसत पाटमय डोरि।।288।।
- RCM 1.289.1Open verse →
रचे रुचिर बर बंदनिबारे। मनहुँ मनोभवँ फंद सँवारे।।
अर्थ · Hindi
रचे रुचिर बर बंदनिबारे। मनहुँ मनोभवँ फंद सँवारे।।
- RCM 1.289.2Open verse →
मंगल कलस अनेक बनाए। ध्वज पताक पट चमर सुहाए।।
अर्थ · Hindi
मंगल कलस अनेक बनाए। ध्वज पताक पट चमर सुहाए।।
- RCM 1.289.3Open verse →
दीप मनोहर मनिमय नाना। जाइ न बरनि बिचित्र बिताना।।
अर्थ · Hindi
दीप मनोहर मनिमय नाना। जाइ न बरनि बिचित्र बिताना।।
- RCM 1.289.4Open verse →
जेहिं मंडप दुलहिनि बैदेही। सो बरनै असि मति कबि केही।।
अर्थ · Hindi
जेहिं मंडप दुलहिनि बैदेही। सो बरनै असि मति कबि केही।।
- RCM 1.289.5Open verse →
दूलहु रामु रूप गुन सागर। सो बितानु तिहुँ लोक उजागर।।
अर्थ · Hindi
दूलहु रामु रूप गुन सागर। सो बितानु तिहुँ लोक उजागर।।
- RCM 1.289.6Open verse →
जनक भवन कै सौभा जैसी। गृह गृह प्रति पुर देखिअ तैसी।।
अर्थ · Hindi
जनक भवन कै सौभा जैसी। गृह गृह प्रति पुर देखिअ तैसी।।
- RCM 1.289.7Open verse →
जेहिं तेरहुति तेहि समय निहारी। तेहि लघु लगहिं भुवन दस चारी।।
अर्थ · Hindi
जेहिं तेरहुति तेहि समय निहारी। तेहि लघु लगहिं भुवन दस चारी।।
- RCM 1.289.8Open verse →
जो संपदा नीच गृह सोहा। सो बिलोकि सुरनायक मोहा।।
अर्थ · Hindi
जो संपदा नीच गृह सोहा। सो बिलोकि सुरनायक मोहा।।
- RCM 1.289.9Open verse →
बसइ नगर जेहि लच्छ करि कपट नारि बर बेषु।।
अर्थ · Hindi
बसइ नगर जेहि लच्छ करि कपट नारि बर बेषु।।
- RCM 1.289.10Open verse →
तेहि पुर कै सोभा कहत सकुचहिं सारद सेषु।।289।।
अर्थ · Hindi
तेहि पुर कै सोभा कहत सकुचहिं सारद सेषु।।289।।
- RCM 1.290.1Open verse →
पहुँचे दूत राम पुर पावन। हरषे नगर बिलोकि सुहावन।।
अर्थ · Hindi
पहुँचे दूत राम पुर पावन। हरषे नगर बिलोकि सुहावन।।
- RCM 1.290.2Open verse →
भूप द्वार तिन्ह खबरि जनाई। दसरथ नृप सुनि लिए बोलाई।।
अर्थ · Hindi
भूप द्वार तिन्ह खबरि जनाई। दसरथ नृप सुनि लिए बोलाई।।
- RCM 1.290.3Open verse →
करि प्रनामु तिन्ह पाती दीन्ही। मुदित महीप आपु उठि लीन्ही।।
अर्थ · Hindi
करि प्रनामु तिन्ह पाती दीन्ही। मुदित महीप आपु उठि लीन्ही।।
- RCM 1.290.4Open verse →
बारि बिलोचन बाचत पाँती। पुलक गात आई भरि छाती।।
अर्थ · Hindi
बारि बिलोचन बाचत पाँती। पुलक गात आई भरि छाती।।
- RCM 1.290.5Open verse →
रामु लखनु उर कर बर चीठी। रहि गए कहत न खाटी मीठी।।
अर्थ · Hindi
रामु लखनु उर कर बर चीठी। रहि गए कहत न खाटी मीठी।।
- RCM 1.290.6Open verse →
पुनि धरि धीर पत्रिका बाँची। हरषी सभा बात सुनि साँची।।
अर्थ · Hindi
पुनि धरि धीर पत्रिका बाँची। हरषी सभा बात सुनि साँची।।
- RCM 1.290.7Open verse →
खेलत रहे तहाँ सुधि पाई। आए भरतु सहित हित भाई।।
अर्थ · Hindi
खेलत रहे तहाँ सुधि पाई। आए भरतु सहित हित भाई।।
- RCM 1.290.8Open verse →
पूछत अति सनेहँ सकुचाई। तात कहाँ तें पाती आई।।
अर्थ · Hindi
पूछत अति सनेहँ सकुचाई। तात कहाँ तें पाती आई।।
- RCM 1.290.9Open verse →
कुसल प्रानप्रिय बंधु दोउ अहहिं कहहु केहिं देस।
अर्थ · Hindi
कुसल प्रानप्रिय बंधु दोउ अहहिं कहहु केहिं देस।
- RCM 1.290.10Open verse →
सुनि सनेह साने बचन बाची बहुरि नरेस।।290।।
अर्थ · Hindi
सुनि सनेह साने बचन बाची बहुरि नरेस।।290।।
- RCM 1.291.1Open verse →
सुनि पाती पुलके दोउ भ्राता। अधिक सनेहु समात न गाता।।
अर्थ · Hindi
सुनि पाती पुलके दोउ भ्राता। अधिक सनेहु समात न गाता।।
- RCM 1.291.2Open verse →
प्रीति पुनीत भरत कै देखी। सकल सभाँ सुखु लहेउ बिसेषी।।
अर्थ · Hindi
प्रीति पुनीत भरत कै देखी। सकल सभाँ सुखु लहेउ बिसेषी।।
- RCM 1.291.3Open verse →
तब नृप दूत निकट बैठारे। मधुर मनोहर बचन उचारे।।
अर्थ · Hindi
तब नृप दूत निकट बैठारे। मधुर मनोहर बचन उचारे।।
- RCM 1.291.4Open verse →
भैया कहहु कुसल दोउ बारे। तुम्ह नीकें निज नयन निहारे।।
अर्थ · Hindi
भैया कहहु कुसल दोउ बारे। तुम्ह नीकें निज नयन निहारे।।
- RCM 1.291.5Open verse →
स्यामल गौर धरें धनु भाथा। बय किसोर कौसिक मुनि साथा।।
अर्थ · Hindi
स्यामल गौर धरें धनु भाथा। बय किसोर कौसिक मुनि साथा।।
- RCM 1.291.6Open verse →
पहिचानहु तुम्ह कहहु सुभाऊ। प्रेम बिबस पुनि पुनि कह राऊ।।
अर्थ · Hindi
पहिचानहु तुम्ह कहहु सुभाऊ। प्रेम बिबस पुनि पुनि कह राऊ।।
- RCM 1.291.7Open verse →
जा दिन तें मुनि गए लवाई। तब तें आजु साँचि सुधि पाई।।
अर्थ · Hindi
जा दिन तें मुनि गए लवाई। तब तें आजु साँचि सुधि पाई।।
- RCM 1.291.8Open verse →
कहहु बिदेह कवन बिधि जाने। सुनि प्रिय बचन दूत मुसकाने।।
अर्थ · Hindi
कहहु बिदेह कवन बिधि जाने। सुनि प्रिय बचन दूत मुसकाने।।
- RCM 1.291.9Open verse →
सुनहु महीपति मुकुट मनि तुम्ह सम धन्य न कोउ।
अर्थ · Hindi
सुनहु महीपति मुकुट मनि तुम्ह सम धन्य न कोउ।
- RCM 1.291.10Open verse →
रामु लखनु जिन्ह के तनय बिस्व बिभूषन दोउ।।291।।
अर्थ · Hindi
रामु लखनु जिन्ह के तनय बिस्व बिभूषन दोउ।।291।।
- RCM 1.292.1Open verse →
पूछन जोगु न तनय तुम्हारे। पुरुषसिंघ तिहु पुर उजिआरे।।
अर्थ · Hindi
पूछन जोगु न तनय तुम्हारे। पुरुषसिंघ तिहु पुर उजिआरे।।
- RCM 1.292.2Open verse →
जिन्ह के जस प्रताप कें आगे। ससि मलीन रबि सीतल लागे।।
अर्थ · Hindi
जिन्ह के जस प्रताप कें आगे। ससि मलीन रबि सीतल लागे।।
- RCM 1.292.3Open verse →
तिन्ह कहँ कहिअ नाथ किमि चीन्हे। देखिअ रबि कि दीप कर लीन्हे।।
अर्थ · Hindi
तिन्ह कहँ कहिअ नाथ किमि चीन्हे। देखिअ रबि कि दीप कर लीन्हे।।
- RCM 1.292.4Open verse →
सीय स्वयंबर भूप अनेका। समिटे सुभट एक तें एका।।
अर्थ · Hindi
सीय स्वयंबर भूप अनेका। समिटे सुभट एक तें एका।।
- RCM 1.292.5Open verse →
संभु सरासनु काहुँ न टारा। हारे सकल बीर बरिआरा।।
अर्थ · Hindi
संभु सरासनु काहुँ न टारा। हारे सकल बीर बरिआरा।।
- RCM 1.292.6Open verse →
तीनि लोक महँ जे भटमानी। सभ कै सकति संभु धनु भानी।।
अर्थ · Hindi
तीनि लोक महँ जे भटमानी। सभ कै सकति संभु धनु भानी।।
- RCM 1.292.7Open verse →
सकइ उठाइ सरासुर मेरू। सोउ हियँ हारि गयउ करि फेरू।।
अर्थ · Hindi
सकइ उठाइ सरासुर मेरू। सोउ हियँ हारि गयउ करि फेरू।।
- RCM 1.292.8Open verse →
जेहि कौतुक सिवसैलु उठावा। सोउ तेहि सभाँ पराभउ पावा।।
अर्थ · Hindi
जेहि कौतुक सिवसैलु उठावा। सोउ तेहि सभाँ पराभउ पावा।।
- RCM 1.292.9Open verse →
तहाँ राम रघुबंस मनि सुनिअ महा महिपाल।
अर्थ · Hindi
तहाँ राम रघुबंस मनि सुनिअ महा महिपाल।
- RCM 1.292.10Open verse →
भंजेउ चाप प्रयास बिनु जिमि गज पंकज नाल।।292।।
अर्थ · Hindi
भंजेउ चाप प्रयास बिनु जिमि गज पंकज नाल।।292।।
- RCM 1.293.1Open verse →
सुनि सरोष भृगुनायकु आए। बहुत भाँति तिन्ह आँखि देखाए।।
अर्थ · Hindi
सुनि सरोष भृगुनायकु आए। बहुत भाँति तिन्ह आँखि देखाए।।
- RCM 1.293.2Open verse →
देखि राम बलु निज धनु दीन्हा। करि बहु बिनय गवनु बन कीन्हा।।
अर्थ · Hindi
देखि राम बलु निज धनु दीन्हा। करि बहु बिनय गवनु बन कीन्हा।।
- RCM 1.293.3Open verse →
राजन रामु अतुलबल जैसें। तेज निधान लखनु पुनि तैसें।।
अर्थ · Hindi
राजन रामु अतुलबल जैसें। तेज निधान लखनु पुनि तैसें।।
- RCM 1.293.4Open verse →
कंपहि भूप बिलोकत जाकें। जिमि गज हरि किसोर के ताकें।।
अर्थ · Hindi
कंपहि भूप बिलोकत जाकें। जिमि गज हरि किसोर के ताकें।।
- RCM 1.293.5Open verse →
देव देखि तव बालक दोऊ। अब न आँखि तर आवत कोऊ।।
अर्थ · Hindi
देव देखि तव बालक दोऊ। अब न आँखि तर आवत कोऊ।।
- RCM 1.293.6Open verse →
दूत बचन रचना प्रिय लागी। प्रेम प्रताप बीर रस पागी।।
अर्थ · Hindi
दूत बचन रचना प्रिय लागी। प्रेम प्रताप बीर रस पागी।।
- RCM 1.293.7Open verse →
सभा समेत राउ अनुरागे। दूतन्ह देन निछावरि लागे।।
अर्थ · Hindi
सभा समेत राउ अनुरागे। दूतन्ह देन निछावरि लागे।।
- RCM 1.293.8Open verse →
कहि अनीति ते मूदहिं काना। धरमु बिचारि सबहिं सुख माना।।
अर्थ · Hindi
कहि अनीति ते मूदहिं काना। धरमु बिचारि सबहिं सुख माना।।
- RCM 1.293.9Open verse →
तब उठि भूप बसिष्ठ कहुँ दीन्हि पत्रिका जाइ।
अर्थ · Hindi
तब उठि भूप बसिष्ठ कहुँ दीन्हि पत्रिका जाइ।
- RCM 1.293.10Open verse →
कथा सुनाई गुरहि सब सादर दूत बोलाइ।।293।।
अर्थ · Hindi
कथा सुनाई गुरहि सब सादर दूत बोलाइ।।293।।
- RCM 1.294.1Open verse →
सुनि बोले गुर अति सुखु पाई। पुन्य पुरुष कहुँ महि सुख छाई।।
अर्थ · Hindi
सुनि बोले गुर अति सुखु पाई। पुन्य पुरुष कहुँ महि सुख छाई।।
- RCM 1.294.2Open verse →
जिमि सरिता सागर महुँ जाहीं। जद्यपि ताहि कामना नाहीं।।
अर्थ · Hindi
जिमि सरिता सागर महुँ जाहीं। जद्यपि ताहि कामना नाहीं।।
- RCM 1.294.3Open verse →
तिमि सुख संपति बिनहिं बोलाएँ। धरमसील पहिं जाहिं सुभाएँ।।
अर्थ · Hindi
तिमि सुख संपति बिनहिं बोलाएँ। धरमसील पहिं जाहिं सुभाएँ।।
- RCM 1.294.4Open verse →
तुम्ह गुर बिप्र धेनु सुर सेबी। तसि पुनीत कौसल्या देबी।।
अर्थ · Hindi
तुम्ह गुर बिप्र धेनु सुर सेबी। तसि पुनीत कौसल्या देबी।।
- RCM 1.294.5Open verse →
सुकृती तुम्ह समान जग माहीं। भयउ न है कोउ होनेउ नाहीं।।
अर्थ · Hindi
सुकृती तुम्ह समान जग माहीं। भयउ न है कोउ होनेउ नाहीं।।
- RCM 1.294.6Open verse →
तुम्ह ते अधिक पुन्य बड़ काकें। राजन राम सरिस सुत जाकें।।
अर्थ · Hindi
तुम्ह ते अधिक पुन्य बड़ काकें। राजन राम सरिस सुत जाकें।।
- RCM 1.294.7Open verse →
बीर बिनीत धरम ब्रत धारी। गुन सागर बर बालक चारी।।
अर्थ · Hindi
बीर बिनीत धरम ब्रत धारी। गुन सागर बर बालक चारी।।
- RCM 1.294.8Open verse →
तुम्ह कहुँ सर्ब काल कल्याना। सजहु बरात बजाइ निसाना।।
अर्थ · Hindi
तुम्ह कहुँ सर्ब काल कल्याना। सजहु बरात बजाइ निसाना।।
- RCM 1.294.9Open verse →
चलहु बेगि सुनि गुर बचन भलेहिं नाथ सिरु नाइ।
अर्थ · Hindi
चलहु बेगि सुनि गुर बचन भलेहिं नाथ सिरु नाइ।
- RCM 1.294.10Open verse →
भूपति गवने भवन तब दूतन्ह बासु देवाइ।।294।।
अर्थ · Hindi
भूपति गवने भवन तब दूतन्ह बासु देवाइ।।294।।
- RCM 1.295.1Open verse →
राजा सबु रनिवास बोलाई। जनक पत्रिका बाचि सुनाई।।
अर्थ · Hindi
राजा सबु रनिवास बोलाई। जनक पत्रिका बाचि सुनाई।।
- RCM 1.295.2Open verse →
सुनि संदेसु सकल हरषानीं। अपर कथा सब भूप बखानीं।।
अर्थ · Hindi
सुनि संदेसु सकल हरषानीं। अपर कथा सब भूप बखानीं।।
- RCM 1.295.3Open verse →
प्रेम प्रफुल्लित राजहिं रानी। मनहुँ सिखिनि सुनि बारिद बनी।।
अर्थ · Hindi
प्रेम प्रफुल्लित राजहिं रानी। मनहुँ सिखिनि सुनि बारिद बनी।।
- RCM 1.295.4Open verse →
मुदित असीस देहिं गुरु नारीं। अति आनंद मगन महतारीं।।
अर्थ · Hindi
मुदित असीस देहिं गुरु नारीं। अति आनंद मगन महतारीं।।
- RCM 1.295.5Open verse →
लेहिं परस्पर अति प्रिय पाती। हृदयँ लगाइ जुड़ावहिं छाती।।
अर्थ · Hindi
लेहिं परस्पर अति प्रिय पाती। हृदयँ लगाइ जुड़ावहिं छाती।।
- RCM 1.295.6Open verse →
राम लखन कै कीरति करनी। बारहिं बार भूपबर बरनी।।
अर्थ · Hindi
राम लखन कै कीरति करनी। बारहिं बार भूपबर बरनी।।
- RCM 1.295.7Open verse →
मुनि प्रसादु कहि द्वार सिधाए। रानिन्ह तब महिदेव बोलाए।।
अर्थ · Hindi
मुनि प्रसादु कहि द्वार सिधाए। रानिन्ह तब महिदेव बोलाए।।
- RCM 1.295.8Open verse →
दिए दान आनंद समेता। चले बिप्रबर आसिष देता।।
अर्थ · Hindi
दिए दान आनंद समेता। चले बिप्रबर आसिष देता।।
- RCM 1.295.9Open verse →
जाचक लिए हँकारि दीन्हि निछावरि कोटि बिधि।
अर्थ · Hindi
जाचक लिए हँकारि दीन्हि निछावरि कोटि बिधि।
- RCM 1.295.10Open verse →
चिरु जीवहुँ सुत चारि चक्रबर्ति दसरत्थ के।।295।।
अर्थ · Hindi
चिरु जीवहुँ सुत चारि चक्रबर्ति दसरत्थ के।।295।।
- RCM 1.296.1Open verse →
कहत चले पहिरें पट नाना। हरषि हने गहगहे निसाना।।
अर्थ · Hindi
कहत चले पहिरें पट नाना। हरषि हने गहगहे निसाना।।
- RCM 1.296.2Open verse →
समाचार सब लोगन्ह पाए। लागे घर घर होने बधाए।।
अर्थ · Hindi
समाचार सब लोगन्ह पाए। लागे घर घर होने बधाए।।
- RCM 1.296.3Open verse →
भुवन चारि दस भरा उछाहू। जनकसुता रघुबीर बिआहू।।
अर्थ · Hindi
भुवन चारि दस भरा उछाहू। जनकसुता रघुबीर बिआहू।।
- RCM 1.296.4Open verse →
सुनि सुभ कथा लोग अनुरागे। मग गृह गलीं सँवारन लागे।।
अर्थ · Hindi
सुनि सुभ कथा लोग अनुरागे। मग गृह गलीं सँवारन लागे।।
- RCM 1.296.5Open verse →
जद्यपि अवध सदैव सुहावनि। राम पुरी मंगलमय पावनि।।
अर्थ · Hindi
जद्यपि अवध सदैव सुहावनि। राम पुरी मंगलमय पावनि।।
- RCM 1.296.6Open verse →
तदपि प्रीति कै प्रीति सुहाई। मंगल रचना रची बनाई।।
अर्थ · Hindi
तदपि प्रीति कै प्रीति सुहाई। मंगल रचना रची बनाई।।
- RCM 1.296.7Open verse →
ध्वज पताक पट चामर चारु। छावा परम बिचित्र बजारू।।
अर्थ · Hindi
ध्वज पताक पट चामर चारु। छावा परम बिचित्र बजारू।।
- RCM 1.296.8Open verse →
कनक कलस तोरन मनि जाला। हरद दूब दधि अच्छत माला।।
अर्थ · Hindi
कनक कलस तोरन मनि जाला। हरद दूब दधि अच्छत माला।।
- RCM 1.296.9Open verse →
मंगलमय निज निज भवन लोगन्ह रचे बनाइ।
अर्थ · Hindi
मंगलमय निज निज भवन लोगन्ह रचे बनाइ।
- RCM 1.296.10Open verse →
बीथीं सीचीं चतुरसम चौकें चारु पुराइ।।296।।
अर्थ · Hindi
बीथीं सीचीं चतुरसम चौकें चारु पुराइ।।296।।
- RCM 1.297.1Open verse →
जहँ तहँ जूथ जूथ मिलि भामिनि। सजि नव सप्त सकल दुति दामिनि।।
अर्थ · Hindi
जहँ तहँ जूथ जूथ मिलि भामिनि। सजि नव सप्त सकल दुति दामिनि।।
- RCM 1.297.2Open verse →
बिधुबदनीं मृग सावक लोचनि। निज सरुप रति मानु बिमोचनि।।
अर्थ · Hindi
बिधुबदनीं मृग सावक लोचनि। निज सरुप रति मानु बिमोचनि।।
- RCM 1.297.3Open verse →
गावहिं मंगल मंजुल बानीं। सुनिकल रव कलकंठि लजानीं।।
अर्थ · Hindi
गावहिं मंगल मंजुल बानीं। सुनिकल रव कलकंठि लजानीं।।
- RCM 1.297.4Open verse →
भूप भवन किमि जाइ बखाना। बिस्व बिमोहन रचेउ बिताना।।
अर्थ · Hindi
भूप भवन किमि जाइ बखाना। बिस्व बिमोहन रचेउ बिताना।।
- RCM 1.297.5Open verse →
मंगल द्रब्य मनोहर नाना। राजत बाजत बिपुल निसाना।।
अर्थ · Hindi
मंगल द्रब्य मनोहर नाना। राजत बाजत बिपुल निसाना।।
- RCM 1.297.6Open verse →
कतहुँ बिरिद बंदी उच्चरहीं। कतहुँ बेद धुनि भूसुर करहीं।।
अर्थ · Hindi
कतहुँ बिरिद बंदी उच्चरहीं। कतहुँ बेद धुनि भूसुर करहीं।।
- RCM 1.297.7Open verse →
गावहिं सुंदरि मंगल गीता। लै लै नामु रामु अरु सीता।।
अर्थ · Hindi
गावहिं सुंदरि मंगल गीता। लै लै नामु रामु अरु सीता।।
- RCM 1.297.8Open verse →
बहुत उछाहु भवनु अति थोरा। मानहुँ उमगि चला चहु ओरा।।
अर्थ · Hindi
बहुत उछाहु भवनु अति थोरा। मानहुँ उमगि चला चहु ओरा।।
- RCM 1.297.9Open verse →
सोभा दसरथ भवन कइ को कबि बरनै पार।
अर्थ · Hindi
सोभा दसरथ भवन कइ को कबि बरनै पार।
- RCM 1.297.10Open verse →
जहाँ सकल सुर सीस मनि राम लीन्ह अवतार।।297।।
अर्थ · Hindi
जहाँ सकल सुर सीस मनि राम लीन्ह अवतार।।297।।
- RCM 1.298.1Open verse →
भूप भरत पुनि लिए बोलाई। हय गय स्यंदन साजहु जाई।।
अर्थ · Hindi
भूप भरत पुनि लिए बोलाई। हय गय स्यंदन साजहु जाई।।
- RCM 1.298.2Open verse →
चलहु बेगि रघुबीर बराता। सुनत पुलक पूरे दोउ भ्राता।।
अर्थ · Hindi
चलहु बेगि रघुबीर बराता। सुनत पुलक पूरे दोउ भ्राता।।
- RCM 1.298.3Open verse →
भरत सकल साहनी बोलाए। आयसु दीन्ह मुदित उठि धाए।।
अर्थ · Hindi
भरत सकल साहनी बोलाए। आयसु दीन्ह मुदित उठि धाए।।
- RCM 1.298.4Open verse →
रचि रुचि जीन तुरग तिन्ह साजे। बरन बरन बर बाजि बिराजे।।
अर्थ · Hindi
रचि रुचि जीन तुरग तिन्ह साजे। बरन बरन बर बाजि बिराजे।।
- RCM 1.298.5Open verse →
सुभग सकल सुठि चंचल करनी। अय इव जरत धरत पग धरनी।।
अर्थ · Hindi
सुभग सकल सुठि चंचल करनी। अय इव जरत धरत पग धरनी।।
- RCM 1.298.6Open verse →
नाना जाति न जाहिं बखाने। निदरि पवनु जनु चहत उड़ाने।।
अर्थ · Hindi
नाना जाति न जाहिं बखाने। निदरि पवनु जनु चहत उड़ाने।।
- RCM 1.298.7Open verse →
तिन्ह सब छयल भए असवारा। भरत सरिस बय राजकुमारा।।
अर्थ · Hindi
तिन्ह सब छयल भए असवारा। भरत सरिस बय राजकुमारा।।
- RCM 1.298.8Open verse →
सब सुंदर सब भूषनधारी। कर सर चाप तून कटि भारी।।
अर्थ · Hindi
सब सुंदर सब भूषनधारी। कर सर चाप तून कटि भारी।।
- RCM 1.298.9Open verse →
छरे छबीले छयल सब सूर सुजान नबीन।
अर्थ · Hindi
छरे छबीले छयल सब सूर सुजान नबीन।
- RCM 1.298.10Open verse →
जुग पदचर असवार प्रति जे असिकला प्रबीन।।298।।
अर्थ · Hindi
जुग पदचर असवार प्रति जे असिकला प्रबीन।।298।।
- RCM 1.299.1Open verse →
बाँधे बिरद बीर रन गाढ़े। निकसि भए पुर बाहेर ठाढ़े।।
अर्थ · Hindi
बाँधे बिरद बीर रन गाढ़े। निकसि भए पुर बाहेर ठाढ़े।।
- RCM 1.299.2Open verse →
फेरहिं चतुर तुरग गति नाना। हरषहिं सुनि सुनि पवन निसाना।।
अर्थ · Hindi
फेरहिं चतुर तुरग गति नाना। हरषहिं सुनि सुनि पवन निसाना।।
- RCM 1.299.3Open verse →
रथ सारथिन्ह बिचित्र बनाए। ध्वज पताक मनि भूषन लाए।।
अर्थ · Hindi
रथ सारथिन्ह बिचित्र बनाए। ध्वज पताक मनि भूषन लाए।।
- RCM 1.299.4Open verse →
चवँर चारु किंकिन धुनि करही। भानु जान सोभा अपहरहीं।।
अर्थ · Hindi
चवँर चारु किंकिन धुनि करही। भानु जान सोभा अपहरहीं।।
- RCM 1.299.5Open verse →
सावँकरन अगनित हय होते। ते तिन्ह रथन्ह सारथिन्ह जोते।।
अर्थ · Hindi
सावँकरन अगनित हय होते। ते तिन्ह रथन्ह सारथिन्ह जोते।।
- RCM 1.299.6Open verse →
सुंदर सकल अलंकृत सोहे। जिन्हहि बिलोकत मुनि मन मोहे।।
अर्थ · Hindi
सुंदर सकल अलंकृत सोहे। जिन्हहि बिलोकत मुनि मन मोहे।।
- RCM 1.299.7Open verse →
जे जल चलहिं थलहि की नाई। टाप न बूड़ बेग अधिकाई।।
अर्थ · Hindi
जे जल चलहिं थलहि की नाई। टाप न बूड़ बेग अधिकाई।।
- RCM 1.299.8Open verse →
अस्त्र सस्त्र सबु साजु बनाई। रथी सारथिन्ह लिए बोलाई।।
अर्थ · Hindi
अस्त्र सस्त्र सबु साजु बनाई। रथी सारथिन्ह लिए बोलाई।।
- RCM 1.299.9Open verse →
चढ़ि चढ़ि रथ बाहेर नगर लागी जुरन बरात।
अर्थ · Hindi
चढ़ि चढ़ि रथ बाहेर नगर लागी जुरन बरात।
- RCM 1.299.10Open verse →
होत सगुन सुन्दर सबहि जो जेहि कारज जात।।299।।
अर्थ · Hindi
होत सगुन सुन्दर सबहि जो जेहि कारज जात।।299।।
- RCM 1.300.1Open verse →
कलित करिबरन्हि परीं अँबारीं। कहि न जाहिं जेहि भाँति सँवारीं।।
अर्थ · Hindi
कलित करिबरन्हि परीं अँबारीं। कहि न जाहिं जेहि भाँति सँवारीं।।
- RCM 1.300.2Open verse →
चले मत्तगज घंट बिराजी। मनहुँ सुभग सावन घन राजी।।
अर्थ · Hindi
चले मत्तगज घंट बिराजी। मनहुँ सुभग सावन घन राजी।।
- RCM 1.300.3Open verse →
बाहन अपर अनेक बिधाना। सिबिका सुभग सुखासन जाना।।
अर्थ · Hindi
बाहन अपर अनेक बिधाना। सिबिका सुभग सुखासन जाना।।
- RCM 1.300.4Open verse →
तिन्ह चढ़ि चले बिप्रबर बृन्दा। जनु तनु धरें सकल श्रुति छंदा।।
अर्थ · Hindi
तिन्ह चढ़ि चले बिप्रबर बृन्दा। जनु तनु धरें सकल श्रुति छंदा।।
- RCM 1.300.5Open verse →
मागध सूत बंदि गुनगायक। चले जान चढ़ि जो जेहि लायक।।
अर्थ · Hindi
मागध सूत बंदि गुनगायक। चले जान चढ़ि जो जेहि लायक।।
- RCM 1.300.6Open verse →
बेसर ऊँट बृषभ बहु जाती। चले बस्तु भरि अगनित भाँती।।
अर्थ · Hindi
बेसर ऊँट बृषभ बहु जाती। चले बस्तु भरि अगनित भाँती।।
- RCM 1.300.7Open verse →
कोटिन्ह काँवरि चले कहारा। बिबिध बस्तु को बरनै पारा।।
अर्थ · Hindi
कोटिन्ह काँवरि चले कहारा। बिबिध बस्तु को बरनै पारा।।
- RCM 1.300.8Open verse →
चले सकल सेवक समुदाई। निज निज साजु समाजु बनाई।।
अर्थ · Hindi
चले सकल सेवक समुदाई। निज निज साजु समाजु बनाई।।
- RCM 1.300.9Open verse →
सब कें उर निर्भर हरषु पूरित पुलक सरीर।
अर्थ · Hindi
सब कें उर निर्भर हरषु पूरित पुलक सरीर।
- RCM 1.300.10Open verse →
कबहिं देखिबे नयन भरि रामु लखनू दोउ बीर।।300।।
अर्थ · Hindi
कबहिं देखिबे नयन भरि रामु लखनू दोउ बीर।।300।।
- RCM 1.301.1Open verse →
गरजहिं गज घंटा धुनि घोरा। रथ रव बाजि हिंस चहु ओरा।।
अर्थ · Hindi
गरजहिं गज घंटा धुनि घोरा। रथ रव बाजि हिंस चहु ओरा।।
- RCM 1.301.2Open verse →
निदरि घनहि घुर्म्मरहिं निसाना। निज पराइ कछु सुनिअ न काना।।
अर्थ · Hindi
निदरि घनहि घुर्म्मरहिं निसाना। निज पराइ कछु सुनिअ न काना।।
- RCM 1.301.3Open verse →
महा भीर भूपति के द्वारें। रज होइ जाइ पषान पबारें।।
अर्थ · Hindi
महा भीर भूपति के द्वारें। रज होइ जाइ पषान पबारें।।
- RCM 1.301.4Open verse →
चढ़ी अटारिन्ह देखहिं नारीं। लिंएँ आरती मंगल थारी।।
अर्थ · Hindi
चढ़ी अटारिन्ह देखहिं नारीं। लिंएँ आरती मंगल थारी।।
- RCM 1.301.5Open verse →
गावहिं गीत मनोहर नाना। अति आनंदु न जाइ बखाना।।
अर्थ · Hindi
गावहिं गीत मनोहर नाना। अति आनंदु न जाइ बखाना।।
- RCM 1.301.6Open verse →
तब सुमंत्र दुइ स्पंदन साजी। जोते रबि हय निंदक बाजी।।
अर्थ · Hindi
तब सुमंत्र दुइ स्पंदन साजी। जोते रबि हय निंदक बाजी।।
- RCM 1.301.7Open verse →
दोउ रथ रुचिर भूप पहिं आने। नहिं सारद पहिं जाहिं बखाने।।
अर्थ · Hindi
दोउ रथ रुचिर भूप पहिं आने। नहिं सारद पहिं जाहिं बखाने।।
- RCM 1.301.8Open verse →
राज समाजु एक रथ साजा। दूसर तेज पुंज अति भ्राजा।।
अर्थ · Hindi
राज समाजु एक रथ साजा। दूसर तेज पुंज अति भ्राजा।।
- RCM 1.301.9Open verse →
तेहिं रथ रुचिर बसिष्ठ कहुँ हरषि चढ़ाइ नरेसु।
अर्थ · Hindi
तेहिं रथ रुचिर बसिष्ठ कहुँ हरषि चढ़ाइ नरेसु।
- RCM 1.301.10Open verse →
आपु चढ़ेउ स्पंदन सुमिरि हर गुर गौरि गनेसु।।301।।
अर्थ · Hindi
आपु चढ़ेउ स्पंदन सुमिरि हर गुर गौरि गनेसु।।301।।
- RCM 1.302.1Open verse →
सहित बसिष्ठ सोह नृप कैसें। सुर गुर संग पुरंदर जैसें।।
अर्थ · Hindi
सहित बसिष्ठ सोह नृप कैसें। सुर गुर संग पुरंदर जैसें।।
- RCM 1.302.2Open verse →
करि कुल रीति बेद बिधि राऊ। देखि सबहि सब भाँति बनाऊ।।
अर्थ · Hindi
करि कुल रीति बेद बिधि राऊ। देखि सबहि सब भाँति बनाऊ।।
- RCM 1.302.3Open verse →
सुमिरि रामु गुर आयसु पाई। चले महीपति संख बजाई।।
अर्थ · Hindi
सुमिरि रामु गुर आयसु पाई। चले महीपति संख बजाई।।
- RCM 1.302.4Open verse →
हरषे बिबुध बिलोकि बराता। बरषहिं सुमन सुमंगल दाता।।
अर्थ · Hindi
हरषे बिबुध बिलोकि बराता। बरषहिं सुमन सुमंगल दाता।।
- RCM 1.302.5Open verse →
भयउ कोलाहल हय गय गाजे। ब्योम बरात बाजने बाजे।।
अर्थ · Hindi
भयउ कोलाहल हय गय गाजे। ब्योम बरात बाजने बाजे।।
- RCM 1.302.6Open verse →
सुर नर नारि सुमंगल गाई। सरस राग बाजहिं सहनाई।।
अर्थ · Hindi
सुर नर नारि सुमंगल गाई। सरस राग बाजहिं सहनाई।।
- RCM 1.302.7Open verse →
घंट घंटि धुनि बरनि न जाहीं। सरव करहिं पाइक फहराहीं।।
अर्थ · Hindi
घंट घंटि धुनि बरनि न जाहीं। सरव करहिं पाइक फहराहीं।।
- RCM 1.302.8Open verse →
करहिं बिदूषक कौतुक नाना। हास कुसल कल गान सुजाना ।
अर्थ · Hindi
करहिं बिदूषक कौतुक नाना। हास कुसल कल गान सुजाना ।
- RCM 1.302.9Open verse →
तुरग नचावहिं कुँअर बर अकनि मृदंग निसान।।
अर्थ · Hindi
तुरग नचावहिं कुँअर बर अकनि मृदंग निसान।।
- RCM 1.302.10Open verse →
नागर नट चितवहिं चकित डगहिं न ताल बँधान।।302।।
अर्थ · Hindi
नागर नट चितवहिं चकित डगहिं न ताल बँधान।।302।।
- RCM 1.303.1Open verse →
बनइ न बरनत बनी बराता। होहिं सगुन सुंदर सुभदाता।।
अर्थ · Hindi
बनइ न बरनत बनी बराता। होहिं सगुन सुंदर सुभदाता।।
- RCM 1.303.2Open verse →
चारा चाषु बाम दिसि लेई। मनहुँ सकल मंगल कहि देई।।
अर्थ · Hindi
चारा चाषु बाम दिसि लेई। मनहुँ सकल मंगल कहि देई।।
- RCM 1.303.3Open verse →
दाहिन काग सुखेत सुहावा। नकुल दरसु सब काहूँ पावा।।
अर्थ · Hindi
दाहिन काग सुखेत सुहावा। नकुल दरसु सब काहूँ पावा।।
- RCM 1.303.4Open verse →
सानुकूल बह त्रिबिध बयारी। सघट सवाल आव बर नारी।।
अर्थ · Hindi
सानुकूल बह त्रिबिध बयारी। सघट सवाल आव बर नारी।।
- RCM 1.303.5Open verse →
लोवा फिरि फिरि दरसु देखावा। सुरभी सनमुख सिसुहि पिआवा।।
अर्थ · Hindi
लोवा फिरि फिरि दरसु देखावा। सुरभी सनमुख सिसुहि पिआवा।।
- RCM 1.303.6Open verse →
मृगमाला फिरि दाहिनि आई। मंगल गन जनु दीन्हि देखाई।।
अर्थ · Hindi
मृगमाला फिरि दाहिनि आई। मंगल गन जनु दीन्हि देखाई।।
- RCM 1.303.7Open verse →
छेमकरी कह छेम बिसेषी। स्यामा बाम सुतरु पर देखी।।
अर्थ · Hindi
छेमकरी कह छेम बिसेषी। स्यामा बाम सुतरु पर देखी।।
- RCM 1.303.8Open verse →
सनमुख आयउ दधि अरु मीना। कर पुस्तक दुइ बिप्र प्रबीना।।
अर्थ · Hindi
सनमुख आयउ दधि अरु मीना। कर पुस्तक दुइ बिप्र प्रबीना।।
- RCM 1.303.9Open verse →
मंगलमय कल्यानमय अभिमत फल दातार।
अर्थ · Hindi
मंगलमय कल्यानमय अभिमत फल दातार।
- RCM 1.303.10Open verse →
जनु सब साचे होन हित भए सगुन एक बार।।303।।
अर्थ · Hindi
जनु सब साचे होन हित भए सगुन एक बार।।303।।
- RCM 1.304.1Open verse →
मंगल सगुन सुगम सब ताकें। सगुन ब्रह्म सुंदर सुत जाकें।।
अर्थ · Hindi
मंगल सगुन सुगम सब ताकें। सगुन ब्रह्म सुंदर सुत जाकें।।
- RCM 1.304.2Open verse →
राम सरिस बरु दुलहिनि सीता। समधी दसरथु जनकु पुनीता।।
अर्थ · Hindi
राम सरिस बरु दुलहिनि सीता। समधी दसरथु जनकु पुनीता।।
- RCM 1.304.3Open verse →
सुनि अस ब्याहु सगुन सब नाचे। अब कीन्हे बिरंचि हम साँचे।।
अर्थ · Hindi
सुनि अस ब्याहु सगुन सब नाचे। अब कीन्हे बिरंचि हम साँचे।।
- RCM 1.304.4Open verse →
एहि बिधि कीन्ह बरात पयाना। हय गय गाजहिं हने निसाना।।
अर्थ · Hindi
एहि बिधि कीन्ह बरात पयाना। हय गय गाजहिं हने निसाना।।
- RCM 1.304.5Open verse →
आवत जानि भानुकुल केतू। सरितन्हि जनक बँधाए सेतू।।
अर्थ · Hindi
आवत जानि भानुकुल केतू। सरितन्हि जनक बँधाए सेतू।।
- RCM 1.304.6Open verse →
बीच बीच बर बास बनाए। सुरपुर सरिस संपदा छाए।।
अर्थ · Hindi
बीच बीच बर बास बनाए। सुरपुर सरिस संपदा छाए।।
- RCM 1.304.7Open verse →
असन सयन बर बसन सुहाए। पावहिं सब निज निज मन भाए।।
अर्थ · Hindi
असन सयन बर बसन सुहाए। पावहिं सब निज निज मन भाए।।
- RCM 1.304.8Open verse →
नित नूतन सुख लखि अनुकूले। सकल बरातिन्ह मंदिर भूले।।
अर्थ · Hindi
नित नूतन सुख लखि अनुकूले। सकल बरातिन्ह मंदिर भूले।।
- RCM 1.304.9Open verse →
आवत जानि बरात बर सुनि गहगहे निसान।
अर्थ · Hindi
आवत जानि बरात बर सुनि गहगहे निसान।
- RCM 1.304.10Open verse →
सजि गज रथ पदचर तुरग लेन चले अगवान।।304।।
अर्थ · Hindi
सजि गज रथ पदचर तुरग लेन चले अगवान।।304।।
- RCM 1.305.1Open verse →
कनक कलस भरि कोपर थारा। भाजन ललित अनेक प्रकारा।।
अर्थ · Hindi
कनक कलस भरि कोपर थारा। भाजन ललित अनेक प्रकारा।।
- RCM 1.305.2Open verse →
भरे सुधासम सब पकवाने। नाना भाँति न जाहिं बखाने।।
अर्थ · Hindi
भरे सुधासम सब पकवाने। नाना भाँति न जाहिं बखाने।।
- RCM 1.305.3Open verse →
फल अनेक बर बस्तु सुहाईं। हरषि भेंट हित भूप पठाईं।।
अर्थ · Hindi
फल अनेक बर बस्तु सुहाईं। हरषि भेंट हित भूप पठाईं।।
- RCM 1.305.4Open verse →
भूषन बसन महामनि नाना। खग मृग हय गय बहुबिधि जाना।।
अर्थ · Hindi
भूषन बसन महामनि नाना। खग मृग हय गय बहुबिधि जाना।।
- RCM 1.305.5Open verse →
मंगल सगुन सुगंध सुहाए। बहुत भाँति महिपाल पठाए।।
अर्थ · Hindi
मंगल सगुन सुगंध सुहाए। बहुत भाँति महिपाल पठाए।।
- RCM 1.305.6Open verse →
दधि चिउरा उपहार अपारा। भरि भरि काँवरि चले कहारा।।
अर्थ · Hindi
दधि चिउरा उपहार अपारा। भरि भरि काँवरि चले कहारा।।
- RCM 1.305.7Open verse →
अगवानन्ह जब दीखि बराता।उर आनंदु पुलक भर गाता।।
अर्थ · Hindi
अगवानन्ह जब दीखि बराता।उर आनंदु पुलक भर गाता।।
- RCM 1.305.8Open verse →
देखि बनाव सहित अगवाना। मुदित बरातिन्ह हने निसाना।।
अर्थ · Hindi
देखि बनाव सहित अगवाना। मुदित बरातिन्ह हने निसाना।।
- RCM 1.305.9Open verse →
हरषि परसपर मिलन हित कछुक चले बगमेल।
अर्थ · Hindi
हरषि परसपर मिलन हित कछुक चले बगमेल।
- RCM 1.305.10Open verse →
जनु आनंद समुद्र दुइ मिलत बिहाइ सुबेल।।305।।
अर्थ · Hindi
जनु आनंद समुद्र दुइ मिलत बिहाइ सुबेल।।305।।
- RCM 1.306.1Open verse →
बरषि सुमन सुर सुंदरि गावहिं। मुदित देव दुंदुभीं बजावहिं।।
अर्थ · Hindi
बरषि सुमन सुर सुंदरि गावहिं। मुदित देव दुंदुभीं बजावहिं।।
- RCM 1.306.2Open verse →
बस्तु सकल राखीं नृप आगें। बिनय कीन्ह तिन्ह अति अनुरागें।।
अर्थ · Hindi
बस्तु सकल राखीं नृप आगें। बिनय कीन्ह तिन्ह अति अनुरागें।।
- RCM 1.306.3Open verse →
प्रेम समेत रायँ सबु लीन्हा। भै बकसीस जाचकन्हि दीन्हा।।
अर्थ · Hindi
प्रेम समेत रायँ सबु लीन्हा। भै बकसीस जाचकन्हि दीन्हा।।
- RCM 1.306.4Open verse →
करि पूजा मान्यता बड़ाई। जनवासे कहुँ चले लवाई।।
अर्थ · Hindi
करि पूजा मान्यता बड़ाई। जनवासे कहुँ चले लवाई।।
- RCM 1.306.5Open verse →
बसन बिचित्र पाँवड़े परहीं। देखि धनहु धन मदु परिहरहीं।।
अर्थ · Hindi
बसन बिचित्र पाँवड़े परहीं। देखि धनहु धन मदु परिहरहीं।।
- RCM 1.306.6Open verse →
अति सुंदर दीन्हेउ जनवासा। जहँ सब कहुँ सब भाँति सुपासा।।
अर्थ · Hindi
अति सुंदर दीन्हेउ जनवासा। जहँ सब कहुँ सब भाँति सुपासा।।
- RCM 1.306.7Open verse →
जानी सियँ बरात पुर आई। कछु निज महिमा प्रगटि जनाई।।
अर्थ · Hindi
जानी सियँ बरात पुर आई। कछु निज महिमा प्रगटि जनाई।।
- RCM 1.306.8Open verse →
हृदयँ सुमिरि सब सिद्धि बोलाई। भूप पहुनई करन पठाई।।
अर्थ · Hindi
हृदयँ सुमिरि सब सिद्धि बोलाई। भूप पहुनई करन पठाई।।
- RCM 1.306.9Open verse →
सिधि सब सिय आयसु अकनि गईं जहाँ जनवास।
अर्थ · Hindi
सिधि सब सिय आयसु अकनि गईं जहाँ जनवास।
- RCM 1.306.10Open verse →
लिएँ संपदा सकल सुख सुरपुर भोग बिलास।।306।।
अर्थ · Hindi
लिएँ संपदा सकल सुख सुरपुर भोग बिलास।।306।।
- RCM 1.307.1Open verse →
निज निज बास बिलोकि बराती। सुर सुख सकल सुलभ सब भाँती।।
अर्थ · Hindi
निज निज बास बिलोकि बराती। सुर सुख सकल सुलभ सब भाँती।।
- RCM 1.307.2Open verse →
बिभव भेद कछु कोउ न जाना। सकल जनक कर करहिं बखाना।।
अर्थ · Hindi
बिभव भेद कछु कोउ न जाना। सकल जनक कर करहिं बखाना।।
- RCM 1.307.3Open verse →
सिय महिमा रघुनायक जानी। हरषे हृदयँ हेतु पहिचानी।।
अर्थ · Hindi
सिय महिमा रघुनायक जानी। हरषे हृदयँ हेतु पहिचानी।।
- RCM 1.307.4Open verse →
पितु आगमनु सुनत दोउ भाई। हृदयँ न अति आनंदु अमाई।।
अर्थ · Hindi
पितु आगमनु सुनत दोउ भाई। हृदयँ न अति आनंदु अमाई।।
- RCM 1.307.5Open verse →
सकुचन्ह कहि न सकत गुरु पाहीं। पितु दरसन लालचु मन माहीं।।
अर्थ · Hindi
सकुचन्ह कहि न सकत गुरु पाहीं। पितु दरसन लालचु मन माहीं।।
- RCM 1.307.6Open verse →
बिस्वामित्र बिनय बड़ि देखी। उपजा उर संतोषु बिसेषी।।
अर्थ · Hindi
बिस्वामित्र बिनय बड़ि देखी। उपजा उर संतोषु बिसेषी।।
- RCM 1.307.7Open verse →
हरषि बंधु दोउ हृदयँ लगाए। पुलक अंग अंबक जल छाए।।
अर्थ · Hindi
हरषि बंधु दोउ हृदयँ लगाए। पुलक अंग अंबक जल छाए।।
- RCM 1.307.8Open verse →
चले जहाँ दसरथु जनवासे। मनहुँ सरोबर तकेउ पिआसे।।
अर्थ · Hindi
चले जहाँ दसरथु जनवासे। मनहुँ सरोबर तकेउ पिआसे।।
- RCM 1.307.9Open verse →
भूप बिलोके जबहिं मुनि आवत सुतन्ह समेत।
अर्थ · Hindi
भूप बिलोके जबहिं मुनि आवत सुतन्ह समेत।
- RCM 1.307.10Open verse →
उठे हरषि सुखसिंधु महुँ चले थाह सी लेत।।307।।
अर्थ · Hindi
उठे हरषि सुखसिंधु महुँ चले थाह सी लेत।।307।।
- RCM 1.308.1Open verse →
मुनिहि दंडवत कीन्ह महीसा। बार बार पद रज धरि सीसा।।
अर्थ · Hindi
मुनिहि दंडवत कीन्ह महीसा। बार बार पद रज धरि सीसा।।
- RCM 1.308.2Open verse →
कौसिक राउ लिये उर लाई। कहि असीस पूछी कुसलाई।।
अर्थ · Hindi
कौसिक राउ लिये उर लाई। कहि असीस पूछी कुसलाई।।
- RCM 1.308.3Open verse →
पुनि दंडवत करत दोउ भाई। देखि नृपति उर सुखु न समाई।।
अर्थ · Hindi
पुनि दंडवत करत दोउ भाई। देखि नृपति उर सुखु न समाई।।
- RCM 1.308.4Open verse →
सुत हियँ लाइ दुसह दुख मेटे। मृतक सरीर प्रान जनु भेंटे।।
अर्थ · Hindi
सुत हियँ लाइ दुसह दुख मेटे। मृतक सरीर प्रान जनु भेंटे।।
- RCM 1.308.5Open verse →
पुनि बसिष्ठ पद सिर तिन्ह नाए। प्रेम मुदित मुनिबर उर लाए।।
अर्थ · Hindi
पुनि बसिष्ठ पद सिर तिन्ह नाए। प्रेम मुदित मुनिबर उर लाए।।
- RCM 1.308.6Open verse →
बिप्र बृंद बंदे दुहुँ भाईं। मन भावती असीसें पाईं।।
अर्थ · Hindi
बिप्र बृंद बंदे दुहुँ भाईं। मन भावती असीसें पाईं।।
- RCM 1.308.7Open verse →
भरत सहानुज कीन्ह प्रनामा। लिए उठाइ लाइ उर रामा।।
अर्थ · Hindi
भरत सहानुज कीन्ह प्रनामा। लिए उठाइ लाइ उर रामा।।
- RCM 1.308.8Open verse →
हरषे लखन देखि दोउ भ्राता। मिले प्रेम परिपूरित गाता।।
अर्थ · Hindi
हरषे लखन देखि दोउ भ्राता। मिले प्रेम परिपूरित गाता।।
- RCM 1.308.9Open verse →
पुरजन परिजन जातिजन जाचक मंत्री मीत।
अर्थ · Hindi
पुरजन परिजन जातिजन जाचक मंत्री मीत।
- RCM 1.308.10Open verse →
मिले जथाबिधि सबहि प्रभु परम कृपाल बिनीत।।308।।
अर्थ · Hindi
मिले जथाबिधि सबहि प्रभु परम कृपाल बिनीत।।308।।
- RCM 1.309.1Open verse →
रामहि देखि बरात जुड़ानी। प्रीति कि रीति न जाति बखानी।।
अर्थ · Hindi
रामहि देखि बरात जुड़ानी। प्रीति कि रीति न जाति बखानी।।
- RCM 1.309.2Open verse →
नृप समीप सोहहिं सुत चारी। जनु धन धरमादिक तनुधारी।।
अर्थ · Hindi
नृप समीप सोहहिं सुत चारी। जनु धन धरमादिक तनुधारी।।
- RCM 1.309.3Open verse →
सुतन्ह समेत दसरथहि देखी। मुदित नगर नर नारि बिसेषी।।
अर्थ · Hindi
सुतन्ह समेत दसरथहि देखी। मुदित नगर नर नारि बिसेषी।।
- RCM 1.309.4Open verse →
सुमन बरिसि सुर हनहिं निसाना। नाकनटीं नाचहिं करि गाना।।
अर्थ · Hindi
सुमन बरिसि सुर हनहिं निसाना। नाकनटीं नाचहिं करि गाना।।
- RCM 1.309.5Open verse →
सतानंद अरु बिप्र सचिव गन। मागध सूत बिदुष बंदीजन।।
अर्थ · Hindi
सतानंद अरु बिप्र सचिव गन। मागध सूत बिदुष बंदीजन।।
- RCM 1.309.6Open verse →
सहित बरात राउ सनमाना। आयसु मागि फिरे अगवाना।।
अर्थ · Hindi
सहित बरात राउ सनमाना। आयसु मागि फिरे अगवाना।।
- RCM 1.309.7Open verse →
प्रथम बरात लगन तें आई। तातें पुर प्रमोदु अधिकाई।।
अर्थ · Hindi
प्रथम बरात लगन तें आई। तातें पुर प्रमोदु अधिकाई।।
- RCM 1.309.8Open verse →
ब्रह्मानंदु लोग सब लहहीं। बढ़हुँ दिवस निसि बिधि सन कहहीं।।
अर्थ · Hindi
ब्रह्मानंदु लोग सब लहहीं। बढ़हुँ दिवस निसि बिधि सन कहहीं।।
- RCM 1.309.9Open verse →
रामु सीय सोभा अवधि सुकृत अवधि दोउ राज।
अर्थ · Hindi
रामु सीय सोभा अवधि सुकृत अवधि दोउ राज।
- RCM 1.309.10Open verse →
जहँ जहँ पुरजन कहहिं अस मिलि नर नारि समाज।।।309।।
अर्थ · Hindi
जहँ जहँ पुरजन कहहिं अस मिलि नर नारि समाज।।।309।।
- RCM 1.310.1Open verse →
जनक सुकृत मूरति बैदेही। दसरथ सुकृत रामु धरें देही।।
अर्थ · Hindi
जनक सुकृत मूरति बैदेही। दसरथ सुकृत रामु धरें देही।।
- RCM 1.310.2Open verse →
इन्ह सम काँहु न सिव अवराधे। काहिं न इन्ह समान फल लाधे।।
अर्थ · Hindi
इन्ह सम काँहु न सिव अवराधे। काहिं न इन्ह समान फल लाधे।।
- RCM 1.310.3Open verse →
इन्ह सम कोउ न भयउ जग माहीं। है नहिं कतहूँ होनेउ नाहीं।।
अर्थ · Hindi
इन्ह सम कोउ न भयउ जग माहीं। है नहिं कतहूँ होनेउ नाहीं।।
- RCM 1.310.4Open verse →
हम सब सकल सुकृत कै रासी। भए जग जनमि जनकपुर बासी।।
अर्थ · Hindi
हम सब सकल सुकृत कै रासी। भए जग जनमि जनकपुर बासी।।
- RCM 1.310.5Open verse →
जिन्ह जानकी राम छबि देखी। को सुकृती हम सरिस बिसेषी।।
अर्थ · Hindi
जिन्ह जानकी राम छबि देखी। को सुकृती हम सरिस बिसेषी।।
- RCM 1.310.6Open verse →
पुनि देखब रघुबीर बिआहू। लेब भली बिधि लोचन लाहू।।
अर्थ · Hindi
पुनि देखब रघुबीर बिआहू। लेब भली बिधि लोचन लाहू।।
- RCM 1.310.7Open verse →
कहहिं परसपर कोकिलबयनीं। एहि बिआहँ बड़ लाभु सुनयनीं।।
अर्थ · Hindi
कहहिं परसपर कोकिलबयनीं। एहि बिआहँ बड़ लाभु सुनयनीं।।
- RCM 1.310.8Open verse →
बड़ें भाग बिधि बात बनाई। नयन अतिथि होइहहिं दोउ भाई।।
अर्थ · Hindi
बड़ें भाग बिधि बात बनाई। नयन अतिथि होइहहिं दोउ भाई।।
- RCM 1.310.9Open verse →
बारहिं बार सनेह बस जनक बोलाउब सीय।
अर्थ · Hindi
बारहिं बार सनेह बस जनक बोलाउब सीय।
- RCM 1.310.10Open verse →
लेन आइहहिं बंधु दोउ कोटि काम कमनीय।।310।।
अर्थ · Hindi
लेन आइहहिं बंधु दोउ कोटि काम कमनीय।।310।।
- RCM 1.311.1Open verse →
बिबिध भाँति होइहि पहुनाई। प्रिय न काहि अस सासुर माई।।
अर्थ · Hindi
बिबिध भाँति होइहि पहुनाई। प्रिय न काहि अस सासुर माई।।
- RCM 1.311.2Open verse →
तब तब राम लखनहि निहारी। होइहहिं सब पुर लोग सुखारी।।
अर्थ · Hindi
तब तब राम लखनहि निहारी। होइहहिं सब पुर लोग सुखारी।।
- RCM 1.311.3Open verse →
सखि जस राम लखनकर जोटा। तैसेइ भूप संग दुइ ढोटा।।
अर्थ · Hindi
सखि जस राम लखनकर जोटा। तैसेइ भूप संग दुइ ढोटा।।
- RCM 1.311.4Open verse →
स्याम गौर सब अंग सुहाए। ते सब कहहिं देखि जे आए।।
अर्थ · Hindi
स्याम गौर सब अंग सुहाए। ते सब कहहिं देखि जे आए।।
- RCM 1.311.5Open verse →
कहा एक मैं आजु निहारे। जनु बिरंचि निज हाथ सँवारे।।
अर्थ · Hindi
कहा एक मैं आजु निहारे। जनु बिरंचि निज हाथ सँवारे।।
- RCM 1.311.6Open verse →
भरतु रामही की अनुहारी। सहसा लखि न सकहिं नर नारी।।
अर्थ · Hindi
भरतु रामही की अनुहारी। सहसा लखि न सकहिं नर नारी।।
- RCM 1.311.7Open verse →
लखनु सत्रुसूदनु एकरूपा। नख सिख ते सब अंग अनूपा।।
अर्थ · Hindi
लखनु सत्रुसूदनु एकरूपा। नख सिख ते सब अंग अनूपा।।
- RCM 1.311.8Open verse →
मन भावहिं मुख बरनि न जाहीं। उपमा कहुँ त्रिभुवन कोउ नाहीं।।
अर्थ · Hindi
मन भावहिं मुख बरनि न जाहीं। उपमा कहुँ त्रिभुवन कोउ नाहीं।।
- RCM 1.312.1Open verse →
एहि बिधि सकल मनोरथ करहीं। आनँद उमगि उमगि उर भरहीं।।
अर्थ · Hindi
एहि बिधि सकल मनोरथ करहीं। आनँद उमगि उमगि उर भरहीं।।
- RCM 1.312.2Open verse →
जे नृप सीय स्वयंबर आए। देखि बंधु सब तिन्ह सुख पाए।।
अर्थ · Hindi
जे नृप सीय स्वयंबर आए। देखि बंधु सब तिन्ह सुख पाए।।
- RCM 1.312.3Open verse →
कहत राम जसु बिसद बिसाला। निज निज भवन गए महिपाला।।
अर्थ · Hindi
कहत राम जसु बिसद बिसाला। निज निज भवन गए महिपाला।।
- RCM 1.312.4Open verse →
गए बीति कुछ दिन एहि भाँती। प्रमुदित पुरजन सकल बराती।।
अर्थ · Hindi
गए बीति कुछ दिन एहि भाँती। प्रमुदित पुरजन सकल बराती।।
- RCM 1.312.5Open verse →
मंगल मूल लगन दिनु आवा। हिम रितु अगहनु मासु सुहावा।।
अर्थ · Hindi
मंगल मूल लगन दिनु आवा। हिम रितु अगहनु मासु सुहावा।।
- RCM 1.312.6Open verse →
ग्रह तिथि नखतु जोगु बर बारू। लगन सोधि बिधि कीन्ह बिचारू।।
अर्थ · Hindi
ग्रह तिथि नखतु जोगु बर बारू। लगन सोधि बिधि कीन्ह बिचारू।।
- RCM 1.312.7Open verse →
पठै दीन्हि नारद सन सोई। गनी जनक के गनकन्ह जोई।।
अर्थ · Hindi
पठै दीन्हि नारद सन सोई। गनी जनक के गनकन्ह जोई।।
- RCM 1.312.8Open verse →
सुनी सकल लोगन्ह यह बाता। कहहिं जोतिषी आहिं बिधाता।।
अर्थ · Hindi
सुनी सकल लोगन्ह यह बाता। कहहिं जोतिषी आहिं बिधाता।।
- RCM 1.312.9Open verse →
धेनुधूरि बेला बिमल सकल सुमंगल मूल।
अर्थ · Hindi
धेनुधूरि बेला बिमल सकल सुमंगल मूल।
- RCM 1.312.10Open verse →
बिप्रन्ह कहेउ बिदेह सन जानि सगुन अनुकुल।।312।।
अर्थ · Hindi
बिप्रन्ह कहेउ बिदेह सन जानि सगुन अनुकुल।।312।।
- RCM 1.313.1Open verse →
उपरोहितहि कहेउ नरनाहा। अब बिलंब कर कारनु काहा।।
अर्थ · Hindi
उपरोहितहि कहेउ नरनाहा। अब बिलंब कर कारनु काहा।।
- RCM 1.313.2Open verse →
सतानंद तब सचिव बोलाए। मंगल सकल साजि सब ल्याए।।
अर्थ · Hindi
सतानंद तब सचिव बोलाए। मंगल सकल साजि सब ल्याए।।
- RCM 1.313.3Open verse →
संख निसान पनव बहु बाजे। मंगल कलस सगुन सुभ साजे।।
अर्थ · Hindi
संख निसान पनव बहु बाजे। मंगल कलस सगुन सुभ साजे।।
- RCM 1.313.4Open verse →
सुभग सुआसिनि गावहिं गीता। करहिं बेद धुनि बिप्र पुनीता।।
अर्थ · Hindi
सुभग सुआसिनि गावहिं गीता। करहिं बेद धुनि बिप्र पुनीता।।
- RCM 1.313.5Open verse →
लेन चले सादर एहि भाँती। गए जहाँ जनवास बराती।।
अर्थ · Hindi
लेन चले सादर एहि भाँती। गए जहाँ जनवास बराती।।
- RCM 1.313.6Open verse →
कोसलपति कर देखि समाजू। अति लघु लाग तिन्हहि सुरराजू।।
अर्थ · Hindi
कोसलपति कर देखि समाजू। अति लघु लाग तिन्हहि सुरराजू।।
- RCM 1.313.7Open verse →
भयउ समउ अब धारिअ पाऊ। यह सुनि परा निसानहिं घाऊ।।
अर्थ · Hindi
भयउ समउ अब धारिअ पाऊ। यह सुनि परा निसानहिं घाऊ।।
- RCM 1.313.8Open verse →
गुरहि पूछि करि कुल बिधि राजा। चले संग मुनि साधु समाजा।।
अर्थ · Hindi
गुरहि पूछि करि कुल बिधि राजा। चले संग मुनि साधु समाजा।।
- RCM 1.313.9Open verse →
भाग्य बिभव अवधेस कर देखि देव ब्रह्मादि।
अर्थ · Hindi
भाग्य बिभव अवधेस कर देखि देव ब्रह्मादि।
- RCM 1.313.10Open verse →
लगे सराहन सहस मुख जानि जनम निज बादि।।313।।
अर्थ · Hindi
लगे सराहन सहस मुख जानि जनम निज बादि।।313।।
- RCM 1.314.1Open verse →
सुरन्ह सुमंगल अवसरु जाना। बरषहिं सुमन बजाइ निसाना।।
अर्थ · Hindi
सुरन्ह सुमंगल अवसरु जाना। बरषहिं सुमन बजाइ निसाना।।
- RCM 1.314.2Open verse →
सिव ब्रह्मादिक बिबुध बरूथा। चढ़े बिमानन्हि नाना जूथा।।
अर्थ · Hindi
सिव ब्रह्मादिक बिबुध बरूथा। चढ़े बिमानन्हि नाना जूथा।।
- RCM 1.314.3Open verse →
प्रेम पुलक तन हृदयँ उछाहू। चले बिलोकन राम बिआहू।।
अर्थ · Hindi
प्रेम पुलक तन हृदयँ उछाहू। चले बिलोकन राम बिआहू।।
- RCM 1.314.4Open verse →
देखि जनकपुरु सुर अनुरागे। निज निज लोक सबहिं लघु लागे।।
अर्थ · Hindi
देखि जनकपुरु सुर अनुरागे। निज निज लोक सबहिं लघु लागे।।
- RCM 1.314.5Open verse →
चितवहिं चकित बिचित्र बिताना। रचना सकल अलौकिक नाना।।
अर्थ · Hindi
चितवहिं चकित बिचित्र बिताना। रचना सकल अलौकिक नाना।।
- RCM 1.314.6Open verse →
नगर नारि नर रूप निधाना। सुघर सुधरम सुसील सुजाना।।
अर्थ · Hindi
नगर नारि नर रूप निधाना। सुघर सुधरम सुसील सुजाना।।
- RCM 1.314.7Open verse →
तिन्हहि देखि सब सुर सुरनारीं। भए नखत जनु बिधु उजिआरीं।।
अर्थ · Hindi
तिन्हहि देखि सब सुर सुरनारीं। भए नखत जनु बिधु उजिआरीं।।
- RCM 1.314.8Open verse →
बिधिहि भयह आचरजु बिसेषी। निज करनी कछु कतहुँ न देखी।।
अर्थ · Hindi
बिधिहि भयह आचरजु बिसेषी। निज करनी कछु कतहुँ न देखी।।
- RCM 1.314.9Open verse →
सिवँ समुझाए देव सब जनि आचरज भुलाहु।
अर्थ · Hindi
सिवँ समुझाए देव सब जनि आचरज भुलाहु।
- RCM 1.314.10Open verse →
हृदयँ बिचारहु धीर धरि सिय रघुबीर बिआहु।।314।।
अर्थ · Hindi
हृदयँ बिचारहु धीर धरि सिय रघुबीर बिआहु।।314।।
- RCM 1.315.1Open verse →
जिन्ह कर नामु लेत जग माहीं। सकल अमंगल मूल नसाहीं।।
अर्थ · Hindi
जिन्ह कर नामु लेत जग माहीं। सकल अमंगल मूल नसाहीं।।
- RCM 1.315.2Open verse →
करतल होहिं पदारथ चारी। तेइ सिय रामु कहेउ कामारी।।
अर्थ · Hindi
करतल होहिं पदारथ चारी। तेइ सिय रामु कहेउ कामारी।।
- RCM 1.315.3Open verse →
एहि बिधि संभु सुरन्ह समुझावा। पुनि आगें बर बसह चलावा।।
अर्थ · Hindi
एहि बिधि संभु सुरन्ह समुझावा। पुनि आगें बर बसह चलावा।।
- RCM 1.315.4Open verse →
देवन्ह देखे दसरथु जाता। महामोद मन पुलकित गाता।।
अर्थ · Hindi
देवन्ह देखे दसरथु जाता। महामोद मन पुलकित गाता।।
- RCM 1.315.5Open verse →
साधु समाज संग महिदेवा। जनु तनु धरें करहिं सुख सेवा।।
अर्थ · Hindi
साधु समाज संग महिदेवा। जनु तनु धरें करहिं सुख सेवा।।
- RCM 1.315.6Open verse →
सोहत साथ सुभग सुत चारी। जनु अपबरग सकल तनुधारी।।
अर्थ · Hindi
सोहत साथ सुभग सुत चारी। जनु अपबरग सकल तनुधारी।।
- RCM 1.315.7Open verse →
मरकत कनक बरन बर जोरी। देखि सुरन्ह भै प्रीति न थोरी।।
अर्थ · Hindi
मरकत कनक बरन बर जोरी। देखि सुरन्ह भै प्रीति न थोरी।।
- RCM 1.315.8Open verse →
पुनि रामहि बिलोकि हियँ हरषे। नृपहि सराहि सुमन तिन्ह बरषे।।
अर्थ · Hindi
पुनि रामहि बिलोकि हियँ हरषे। नृपहि सराहि सुमन तिन्ह बरषे।।
- RCM 1.315.9Open verse →
राम रूपु नख सिख सुभग बारहिं बार निहारि।
अर्थ · Hindi
राम रूपु नख सिख सुभग बारहिं बार निहारि।
- RCM 1.315.10Open verse →
पुलक गात लोचन सजल उमा समेत पुरारि।।315।।
अर्थ · Hindi
पुलक गात लोचन सजल उमा समेत पुरारि।।315।।
- RCM 1.316.1Open verse →
केकि कंठ दुति स्यामल अंगा। तड़ित बिनिंदक बसन सुरंगा।।
अर्थ · Hindi
केकि कंठ दुति स्यामल अंगा। तड़ित बिनिंदक बसन सुरंगा।।
- RCM 1.316.2Open verse →
ब्याह बिभूषन बिबिध बनाए। मंगल सब सब भाँति सुहाए।।
अर्थ · Hindi
ब्याह बिभूषन बिबिध बनाए। मंगल सब सब भाँति सुहाए।।
- RCM 1.316.3Open verse →
सरद बिमल बिधु बदनु सुहावन। नयन नवल राजीव लजावन।।
अर्थ · Hindi
सरद बिमल बिधु बदनु सुहावन। नयन नवल राजीव लजावन।।
- RCM 1.316.4Open verse →
सकल अलौकिक सुंदरताई। कहि न जाइ मनहीं मन भाई।।
अर्थ · Hindi
सकल अलौकिक सुंदरताई। कहि न जाइ मनहीं मन भाई।।
- RCM 1.316.5Open verse →
बंधु मनोहर सोहहिं संगा। जात नचावत चपल तुरंगा।।
अर्थ · Hindi
बंधु मनोहर सोहहिं संगा। जात नचावत चपल तुरंगा।।
- RCM 1.316.6Open verse →
राजकुअँर बर बाजि देखावहिं। बंस प्रसंसक बिरिद सुनावहिं।।
अर्थ · Hindi
राजकुअँर बर बाजि देखावहिं। बंस प्रसंसक बिरिद सुनावहिं।।
- RCM 1.316.7Open verse →
जेहि तुरंग पर रामु बिराजे। गति बिलोकि खगनायकु लाजे।।
अर्थ · Hindi
जेहि तुरंग पर रामु बिराजे। गति बिलोकि खगनायकु लाजे।।
- RCM 1.316.8Open verse →
कहि न जाइ सब भाँति सुहावा। बाजि बेषु जनु काम बनावा।।
अर्थ · Hindi
कहि न जाइ सब भाँति सुहावा। बाजि बेषु जनु काम बनावा।।
- RCM 1.317.1Open verse →
जेहिं बर बाजि रामु असवारा। तेहि सारदउ न बरनै पारा।।
अर्थ · Hindi
जेहिं बर बाजि रामु असवारा। तेहि सारदउ न बरनै पारा।।
- RCM 1.317.2Open verse →
संकरु राम रूप अनुरागे। नयन पंचदस अति प्रिय लागे।।
अर्थ · Hindi
संकरु राम रूप अनुरागे। नयन पंचदस अति प्रिय लागे।।
- RCM 1.317.3Open verse →
हरि हित सहित रामु जब जोहे। रमा समेत रमापति मोहे।।
अर्थ · Hindi
हरि हित सहित रामु जब जोहे। रमा समेत रमापति मोहे।।
- RCM 1.317.4Open verse →
निरखि राम छबि बिधि हरषाने। आठइ नयन जानि पछिताने।।
अर्थ · Hindi
निरखि राम छबि बिधि हरषाने। आठइ नयन जानि पछिताने।।
- RCM 1.317.5Open verse →
सुर सेनप उर बहुत उछाहू। बिधि ते डेवढ़ लोचन लाहू।।
अर्थ · Hindi
सुर सेनप उर बहुत उछाहू। बिधि ते डेवढ़ लोचन लाहू।।
- RCM 1.317.6Open verse →
रामहि चितव सुरेस सुजाना। गौतम श्रापु परम हित माना।।
अर्थ · Hindi
रामहि चितव सुरेस सुजाना। गौतम श्रापु परम हित माना।।
- RCM 1.317.7Open verse →
देव सकल सुरपतिहि सिहाहीं। आजु पुरंदर सम कोउ नाहीं।।
अर्थ · Hindi
देव सकल सुरपतिहि सिहाहीं। आजु पुरंदर सम कोउ नाहीं।।
- RCM 1.317.8Open verse →
मुदित देवगन रामहि देखी। नृपसमाज दुहुँ हरषु बिसेषी।।
अर्थ · Hindi
मुदित देवगन रामहि देखी। नृपसमाज दुहुँ हरषु बिसेषी।।
- RCM 1.318.1Open verse →
बिधुबदनीं सब सब मृगलोचनि। सब निज तन छबि रति मदु मोचनि।।
अर्थ · Hindi
बिधुबदनीं सब सब मृगलोचनि। सब निज तन छबि रति मदु मोचनि।।
- RCM 1.318.2Open verse →
पहिरें बरन बरन बर चीरा। सकल बिभूषन सजें सरीरा।।
अर्थ · Hindi
पहिरें बरन बरन बर चीरा। सकल बिभूषन सजें सरीरा।।
- RCM 1.318.3Open verse →
सकल सुमंगल अंग बनाएँ। करहिं गान कलकंठि लजाएँ।।
अर्थ · Hindi
सकल सुमंगल अंग बनाएँ। करहिं गान कलकंठि लजाएँ।।
- RCM 1.318.4Open verse →
कंकन किंकिनि नूपुर बाजहिं। चालि बिलोकि काम गज लाजहिं।।
अर्थ · Hindi
कंकन किंकिनि नूपुर बाजहिं। चालि बिलोकि काम गज लाजहिं।।
- RCM 1.318.5Open verse →
बाजहिं बाजने बिबिध प्रकारा। नभ अरु नगर सुमंगलचारा।।
अर्थ · Hindi
बाजहिं बाजने बिबिध प्रकारा। नभ अरु नगर सुमंगलचारा।।
- RCM 1.318.6Open verse →
सची सारदा रमा भवानी। जे सुरतिय सुचि सहज सयानी।।
अर्थ · Hindi
सची सारदा रमा भवानी। जे सुरतिय सुचि सहज सयानी।।
- RCM 1.318.7Open verse →
कपट नारि बर बेष बनाई। मिलीं सकल रनिवासहिं जाई।।
अर्थ · Hindi
कपट नारि बर बेष बनाई। मिलीं सकल रनिवासहिं जाई।।
- RCM 1.318.8Open verse →
करहिं गान कल मंगल बानीं। हरष बिबस सब काहुँ न जानी।।
अर्थ · Hindi
करहिं गान कल मंगल बानीं। हरष बिबस सब काहुँ न जानी।।
- RCM 1.319.1Open verse →
नयन नीरु हटि मंगल जानी। परिछनि करहिं मुदित मन रानी।।
अर्थ · Hindi
नयन नीरु हटि मंगल जानी। परिछनि करहिं मुदित मन रानी।।
- RCM 1.319.2Open verse →
बेद बिहित अरु कुल आचारू। कीन्ह भली बिधि सब ब्यवहारू।।
अर्थ · Hindi
बेद बिहित अरु कुल आचारू। कीन्ह भली बिधि सब ब्यवहारू।।
- RCM 1.319.3Open verse →
पंच सबद धुनि मंगल गाना। पट पाँवड़े परहिं बिधि नाना।।
अर्थ · Hindi
पंच सबद धुनि मंगल गाना। पट पाँवड़े परहिं बिधि नाना।।
- RCM 1.319.4Open verse →
करि आरती अरघु तिन्ह दीन्हा। राम गमनु मंडप तब कीन्हा।।
अर्थ · Hindi
करि आरती अरघु तिन्ह दीन्हा। राम गमनु मंडप तब कीन्हा।।
- RCM 1.319.5Open verse →
दसरथु सहित समाज बिराजे। बिभव बिलोकि लोकपति लाजे।।
अर्थ · Hindi
दसरथु सहित समाज बिराजे। बिभव बिलोकि लोकपति लाजे।।
- RCM 1.319.6Open verse →
समयँ समयँ सुर बरषहिं फूला। सांति पढ़हिं महिसुर अनुकूला।।
अर्थ · Hindi
समयँ समयँ सुर बरषहिं फूला। सांति पढ़हिं महिसुर अनुकूला।।
- RCM 1.319.7Open verse →
नभ अरु नगर कोलाहल होई। आपनि पर कछु सुनइ न कोई।।
अर्थ · Hindi
नभ अरु नगर कोलाहल होई। आपनि पर कछु सुनइ न कोई।।
- RCM 1.319.8Open verse →
एहि बिधि रामु मंडपहिं आए। अरघु देइ आसन बैठाए।।
अर्थ · Hindi
एहि बिधि रामु मंडपहिं आए। अरघु देइ आसन बैठाए।।
- RCM 1.320.1Open verse →
मिले जनकु दसरथु अति प्रीतीं। करि बैदिक लौकिक सब रीतीं।।
अर्थ · Hindi
मिले जनकु दसरथु अति प्रीतीं। करि बैदिक लौकिक सब रीतीं।।
- RCM 1.320.2Open verse →
मिलत महा दोउ राज बिराजे। उपमा खोजि खोजि कबि लाजे।।
अर्थ · Hindi
मिलत महा दोउ राज बिराजे। उपमा खोजि खोजि कबि लाजे।।
- RCM 1.320.3Open verse →
लही न कतहुँ हारि हियँ मानी। इन्ह सम एइ उपमा उर आनी।।
अर्थ · Hindi
लही न कतहुँ हारि हियँ मानी। इन्ह सम एइ उपमा उर आनी।।
- RCM 1.320.4Open verse →
सामध देखि देव अनुरागे। सुमन बरषि जसु गावन लागे।।
अर्थ · Hindi
सामध देखि देव अनुरागे। सुमन बरषि जसु गावन लागे।।
- RCM 1.320.5Open verse →
जगु बिरंचि उपजावा जब तें। देखे सुने ब्याह बहु तब तें।।
अर्थ · Hindi
जगु बिरंचि उपजावा जब तें। देखे सुने ब्याह बहु तब तें।।
- RCM 1.320.6Open verse →
सकल भाँति सम साजु समाजू। सम समधी देखे हम आजू।।
अर्थ · Hindi
सकल भाँति सम साजु समाजू। सम समधी देखे हम आजू।।
- RCM 1.320.7Open verse →
देव गिरा सुनि सुंदर साँची। प्रीति अलौकिक दुहु दिसि माची।।
अर्थ · Hindi
देव गिरा सुनि सुंदर साँची। प्रीति अलौकिक दुहु दिसि माची।।
- RCM 1.320.8Open verse →
देत पाँवड़े अरघु सुहाए। सादर जनकु मंडपहिं ल्याए।।
अर्थ · Hindi
देत पाँवड़े अरघु सुहाए। सादर जनकु मंडपहिं ल्याए।।
- RCM 1.321.1Open verse →
बहुरि कीन्ह कोसलपति पूजा। जानि ईस सम भाउ न दूजा।।
अर्थ · Hindi
बहुरि कीन्ह कोसलपति पूजा। जानि ईस सम भाउ न दूजा।।
- RCM 1.321.2Open verse →
कीन्ह जोरि कर बिनय बड़ाई। कहि निज भाग्य बिभव बहुताई।।
अर्थ · Hindi
कीन्ह जोरि कर बिनय बड़ाई। कहि निज भाग्य बिभव बहुताई।।
- RCM 1.321.3Open verse →
पूजे भूपति सकल बराती। समधि सम सादर सब भाँती।।
अर्थ · Hindi
पूजे भूपति सकल बराती। समधि सम सादर सब भाँती।।
- RCM 1.321.4Open verse →
आसन उचित दिए सब काहू। कहौं काह मूख एक उछाहू।।
अर्थ · Hindi
आसन उचित दिए सब काहू। कहौं काह मूख एक उछाहू।।
- RCM 1.321.5Open verse →
सकल बरात जनक सनमानी। दान मान बिनती बर बानी।।
अर्थ · Hindi
सकल बरात जनक सनमानी। दान मान बिनती बर बानी।।
- RCM 1.321.6Open verse →
बिधि हरि हरु दिसिपति दिनराऊ। जे जानहिं रघुबीर प्रभाऊ।।
अर्थ · Hindi
बिधि हरि हरु दिसिपति दिनराऊ। जे जानहिं रघुबीर प्रभाऊ।।
- RCM 1.321.7Open verse →
कपट बिप्र बर बेष बनाएँ। कौतुक देखहिं अति सचु पाएँ।।
अर्थ · Hindi
कपट बिप्र बर बेष बनाएँ। कौतुक देखहिं अति सचु पाएँ।।
- RCM 1.321.8Open verse →
पूजे जनक देव सम जानें। दिए सुआसन बिनु पहिचानें।।
अर्थ · Hindi
पूजे जनक देव सम जानें। दिए सुआसन बिनु पहिचानें।।
- RCM 1.322.1Open verse →
समउ बिलोकि बसिष्ठ बोलाए। सादर सतानंदु सुनि आए।।
अर्थ · Hindi
समउ बिलोकि बसिष्ठ बोलाए। सादर सतानंदु सुनि आए।।
- RCM 1.322.2Open verse →
बेगि कुअँरि अब आनहु जाई। चले मुदित मुनि आयसु पाई।।
अर्थ · Hindi
बेगि कुअँरि अब आनहु जाई। चले मुदित मुनि आयसु पाई।।
- RCM 1.322.3Open verse →
रानी सुनि उपरोहित बानी। प्रमुदित सखिन्ह समेत सयानी।।
अर्थ · Hindi
रानी सुनि उपरोहित बानी। प्रमुदित सखिन्ह समेत सयानी।।
- RCM 1.322.4Open verse →
बिप्र बधू कुलबृद्ध बोलाईं। करि कुल रीति सुमंगल गाईं।।
अर्थ · Hindi
बिप्र बधू कुलबृद्ध बोलाईं। करि कुल रीति सुमंगल गाईं।।
- RCM 1.322.5Open verse →
नारि बेष जे सुर बर बामा। सकल सुभायँ सुंदरी स्यामा।।
अर्थ · Hindi
नारि बेष जे सुर बर बामा। सकल सुभायँ सुंदरी स्यामा।।
- RCM 1.322.6Open verse →
तिन्हहि देखि सुखु पावहिं नारीं। बिनु पहिचानि प्रानहु ते प्यारीं।।
अर्थ · Hindi
तिन्हहि देखि सुखु पावहिं नारीं। बिनु पहिचानि प्रानहु ते प्यारीं।।
- RCM 1.322.7Open verse →
बार बार सनमानहिं रानी। उमा रमा सारद सम जानी।।
अर्थ · Hindi
बार बार सनमानहिं रानी। उमा रमा सारद सम जानी।।
- RCM 1.322.8Open verse →
सीय सँवारि समाजु बनाई। मुदित मंडपहिं चलीं लवाई।।
अर्थ · Hindi
सीय सँवारि समाजु बनाई। मुदित मंडपहिं चलीं लवाई।।
- RCM 1.323.1Open verse →
सिय सुंदरता बरनि न जाई। लघु मति बहुत मनोहरताई।।
अर्थ · Hindi
सिय सुंदरता बरनि न जाई। लघु मति बहुत मनोहरताई।।
- RCM 1.323.2Open verse →
आवत दीखि बरातिन्ह सीता।।रूप रासि सब भाँति पुनीता।।
अर्थ · Hindi
आवत दीखि बरातिन्ह सीता।।रूप रासि सब भाँति पुनीता।।
- RCM 1.323.3Open verse →
सबहि मनहिं मन किए प्रनामा। देखि राम भए पूरनकामा।।
अर्थ · Hindi
सबहि मनहिं मन किए प्रनामा। देखि राम भए पूरनकामा।।
- RCM 1.323.4Open verse →
हरषे दसरथ सुतन्ह समेता। कहि न जाइ उर आनँदु जेता।।
अर्थ · Hindi
हरषे दसरथ सुतन्ह समेता। कहि न जाइ उर आनँदु जेता।।
- RCM 1.323.5Open verse →
सुर प्रनामु करि बरसहिं फूला। मुनि असीस धुनि मंगल मूला।।
अर्थ · Hindi
सुर प्रनामु करि बरसहिं फूला। मुनि असीस धुनि मंगल मूला।।
- RCM 1.323.6Open verse →
गान निसान कोलाहलु भारी। प्रेम प्रमोद मगन नर नारी।।
अर्थ · Hindi
गान निसान कोलाहलु भारी। प्रेम प्रमोद मगन नर नारी।।
- RCM 1.323.7Open verse →
एहि बिधि सीय मंडपहिं आई। प्रमुदित सांति पढ़हिं मुनिराई।।
अर्थ · Hindi
एहि बिधि सीय मंडपहिं आई। प्रमुदित सांति पढ़हिं मुनिराई।।
- RCM 1.323.8Open verse →
तेहि अवसर कर बिधि ब्यवहारू। दुहुँ कुलगुर सब कीन्ह अचारू।।
अर्थ · Hindi
तेहि अवसर कर बिधि ब्यवहारू। दुहुँ कुलगुर सब कीन्ह अचारू।।
- RCM 1.324.1Open verse →
जनक पाटमहिषी जग जानी। सीय मातु किमि जाइ बखानी।।
अर्थ · Hindi
जनक पाटमहिषी जग जानी। सीय मातु किमि जाइ बखानी।।
- RCM 1.324.2Open verse →
सुजसु सुकृत सुख सुदंरताई। सब समेटि बिधि रची बनाई।।
अर्थ · Hindi
सुजसु सुकृत सुख सुदंरताई। सब समेटि बिधि रची बनाई।।
- RCM 1.324.3Open verse →
समउ जानि मुनिबरन्ह बोलाई। सुनत सुआसिनि सादर ल्याई।।
अर्थ · Hindi
समउ जानि मुनिबरन्ह बोलाई। सुनत सुआसिनि सादर ल्याई।।
- RCM 1.324.4Open verse →
जनक बाम दिसि सोह सुनयना। हिमगिरि संग बनि जनु मयना।।
अर्थ · Hindi
जनक बाम दिसि सोह सुनयना। हिमगिरि संग बनि जनु मयना।।
- RCM 1.324.5Open verse →
कनक कलस मनि कोपर रूरे। सुचि सुंगध मंगल जल पूरे।।
अर्थ · Hindi
कनक कलस मनि कोपर रूरे। सुचि सुंगध मंगल जल पूरे।।
- RCM 1.324.6Open verse →
निज कर मुदित रायँ अरु रानी। धरे राम के आगें आनी।।
अर्थ · Hindi
निज कर मुदित रायँ अरु रानी। धरे राम के आगें आनी।।
- RCM 1.324.7Open verse →
पढ़हिं बेद मुनि मंगल बानी। गगन सुमन झरि अवसरु जानी।।
अर्थ · Hindi
पढ़हिं बेद मुनि मंगल बानी। गगन सुमन झरि अवसरु जानी।।
- RCM 1.324.8Open verse →
बरु बिलोकि दंपति अनुरागे। पाय पुनीत पखारन लागे।।
अर्थ · Hindi
बरु बिलोकि दंपति अनुरागे। पाय पुनीत पखारन लागे।।
- RCM 1.325.1Open verse →
कुअँरु कुअँरि कल भावँरि देहीं।।नयन लाभु सब सादर लेहीं।।
अर्थ · Hindi
कुअँरु कुअँरि कल भावँरि देहीं।।नयन लाभु सब सादर लेहीं।।
- RCM 1.325.2Open verse →
जाइ न बरनि मनोहर जोरी। जो उपमा कछु कहौं सो थोरी।।
अर्थ · Hindi
जाइ न बरनि मनोहर जोरी। जो उपमा कछु कहौं सो थोरी।।
- RCM 1.325.3Open verse →
राम सीय सुंदर प्रतिछाहीं। जगमगात मनि खंभन माहीं ।
अर्थ · Hindi
राम सीय सुंदर प्रतिछाहीं। जगमगात मनि खंभन माहीं ।
- RCM 1.325.4Open verse →
मनहुँ मदन रति धरि बहु रूपा। देखत राम बिआहु अनूपा।।
अर्थ · Hindi
मनहुँ मदन रति धरि बहु रूपा। देखत राम बिआहु अनूपा।।
- RCM 1.325.5Open verse →
दरस लालसा सकुच न थोरी। प्रगटत दुरत बहोरि बहोरी।।
अर्थ · Hindi
दरस लालसा सकुच न थोरी। प्रगटत दुरत बहोरि बहोरी।।
- RCM 1.325.6Open verse →
भए मगन सब देखनिहारे। जनक समान अपान बिसारे।।
अर्थ · Hindi
भए मगन सब देखनिहारे। जनक समान अपान बिसारे।।
- RCM 1.325.7Open verse →
प्रमुदित मुनिन्ह भावँरी फेरी। नेगसहित सब रीति निबेरीं।।
अर्थ · Hindi
प्रमुदित मुनिन्ह भावँरी फेरी। नेगसहित सब रीति निबेरीं।।
- RCM 1.325.8Open verse →
राम सीय सिर सेंदुर देहीं। सोभा कहि न जाति बिधि केहीं।।
अर्थ · Hindi
राम सीय सिर सेंदुर देहीं। सोभा कहि न जाति बिधि केहीं।।
- RCM 1.325.9Open verse →
अरुन पराग जलजु भरि नीकें। ससिहि भूष अहि लोभ अमी कें।।
अर्थ · Hindi
अरुन पराग जलजु भरि नीकें। ससिहि भूष अहि लोभ अमी कें।।
- RCM 1.325.10Open verse →
बहुरि बसिष्ठ दीन्ह अनुसासन। बरु दुलहिनि बैठे एक आसन।।
अर्थ · Hindi
बहुरि बसिष्ठ दीन्ह अनुसासन। बरु दुलहिनि बैठे एक आसन।।
- RCM 1.326.1Open verse →
जसि रघुबीर ब्याह बिधि बरनी। सकल कुअँर ब्याहे तेहिं करनी।।
अर्थ · Hindi
जसि रघुबीर ब्याह बिधि बरनी। सकल कुअँर ब्याहे तेहिं करनी।।
- RCM 1.326.2Open verse →
कहि न जाइ कछु दाइज भूरी। रहा कनक मनि मंडपु पूरी।।
अर्थ · Hindi
कहि न जाइ कछु दाइज भूरी। रहा कनक मनि मंडपु पूरी।।
- RCM 1.326.3Open verse →
कंबल बसन बिचित्र पटोरे। भाँति भाँति बहु मोल न थोरे।।
अर्थ · Hindi
कंबल बसन बिचित्र पटोरे। भाँति भाँति बहु मोल न थोरे।।
- RCM 1.326.4Open verse →
गज रथ तुरग दास अरु दासी। धेनु अलंकृत कामदुहा सी।।
अर्थ · Hindi
गज रथ तुरग दास अरु दासी। धेनु अलंकृत कामदुहा सी।।
- RCM 1.326.5Open verse →
बस्तु अनेक करिअ किमि लेखा। कहि न जाइ जानहिं जिन्ह देखा।।
अर्थ · Hindi
बस्तु अनेक करिअ किमि लेखा। कहि न जाइ जानहिं जिन्ह देखा।।
- RCM 1.326.6Open verse →
लोकपाल अवलोकि सिहाने। लीन्ह अवधपति सबु सुखु माने।।
अर्थ · Hindi
लोकपाल अवलोकि सिहाने। लीन्ह अवधपति सबु सुखु माने।।
- RCM 1.326.7Open verse →
दीन्ह जाचकन्हि जो जेहि भावा। उबरा सो जनवासेहिं आवा।।
अर्थ · Hindi
दीन्ह जाचकन्हि जो जेहि भावा। उबरा सो जनवासेहिं आवा।।
- RCM 1.326.8Open verse →
तब कर जोरि जनकु मृदु बानी। बोले सब बरात सनमानी।।
अर्थ · Hindi
तब कर जोरि जनकु मृदु बानी। बोले सब बरात सनमानी।।
- RCM 1.327.1Open verse →
स्याम सरीरु सुभायँ सुहावन। सोभा कोटि मनोज लजावन।।
अर्थ · Hindi
स्याम सरीरु सुभायँ सुहावन। सोभा कोटि मनोज लजावन।।
- RCM 1.327.2Open verse →
जावक जुत पद कमल सुहाए। मुनि मन मधुप रहत जिन्ह छाए।।
अर्थ · Hindi
जावक जुत पद कमल सुहाए। मुनि मन मधुप रहत जिन्ह छाए।।
- RCM 1.327.3Open verse →
पीत पुनीत मनोहर धोती। हरति बाल रबि दामिनि जोती।।
अर्थ · Hindi
पीत पुनीत मनोहर धोती। हरति बाल रबि दामिनि जोती।।
- RCM 1.327.4Open verse →
कल किंकिनि कटि सूत्र मनोहर। बाहु बिसाल बिभूषन सुंदर।।
अर्थ · Hindi
कल किंकिनि कटि सूत्र मनोहर। बाहु बिसाल बिभूषन सुंदर।।
- RCM 1.327.5Open verse →
पीत जनेउ महाछबि देई। कर मुद्रिका चोरि चितु लेई।।
अर्थ · Hindi
पीत जनेउ महाछबि देई। कर मुद्रिका चोरि चितु लेई।।
- RCM 1.327.6Open verse →
सोहत ब्याह साज सब साजे। उर आयत उरभूषन राजे।।
अर्थ · Hindi
सोहत ब्याह साज सब साजे। उर आयत उरभूषन राजे।।
- RCM 1.327.7Open verse →
पिअर उपरना काखासोती। दुहुँ आँचरन्हि लगे मनि मोती।।
अर्थ · Hindi
पिअर उपरना काखासोती। दुहुँ आँचरन्हि लगे मनि मोती।।
- RCM 1.327.8Open verse →
नयन कमल कल कुंडल काना। बदनु सकल सौंदर्ज निधाना।।
अर्थ · Hindi
नयन कमल कल कुंडल काना। बदनु सकल सौंदर्ज निधाना।।
- RCM 1.327.9Open verse →
सुंदर भृकुटि मनोहर नासा। भाल तिलकु रुचिरता निवासा।।
अर्थ · Hindi
सुंदर भृकुटि मनोहर नासा। भाल तिलकु रुचिरता निवासा।।
- RCM 1.327.10Open verse →
सोहत मौरु मनोहर माथे। मंगलमय मुकुता मनि गाथे।।
अर्थ · Hindi
सोहत मौरु मनोहर माथे। मंगलमय मुकुता मनि गाथे।।
- RCM 1.328.1Open verse →
पुनि जेवनार भई बहु भाँती। पठए जनक बोलाइ बराती।।
अर्थ · Hindi
पुनि जेवनार भई बहु भाँती। पठए जनक बोलाइ बराती।।
- RCM 1.328.2Open verse →
परत पाँवड़े बसन अनूपा। सुतन्ह समेत गवन कियो भूपा।।
अर्थ · Hindi
परत पाँवड़े बसन अनूपा। सुतन्ह समेत गवन कियो भूपा।।
- RCM 1.328.3Open verse →
सादर सबके पाय पखारे। जथाजोगु पीढ़न्ह बैठारे।।
अर्थ · Hindi
सादर सबके पाय पखारे। जथाजोगु पीढ़न्ह बैठारे।।
- RCM 1.328.4Open verse →
धोए जनक अवधपति चरना। सीलु सनेहु जाइ नहिं बरना।।
अर्थ · Hindi
धोए जनक अवधपति चरना। सीलु सनेहु जाइ नहिं बरना।।
- RCM 1.328.5Open verse →
बहुरि राम पद पंकज धोए। जे हर हृदय कमल महुँ गोए।।
अर्थ · Hindi
बहुरि राम पद पंकज धोए। जे हर हृदय कमल महुँ गोए।।
- RCM 1.328.6Open verse →
तीनिउ भाई राम सम जानी। धोए चरन जनक निज पानी।।
अर्थ · Hindi
तीनिउ भाई राम सम जानी। धोए चरन जनक निज पानी।।
- RCM 1.328.7Open verse →
आसन उचित सबहि नृप दीन्हे। बोलि सूपकारी सब लीन्हे।।
अर्थ · Hindi
आसन उचित सबहि नृप दीन्हे। बोलि सूपकारी सब लीन्हे।।
- RCM 1.328.8Open verse →
सादर लगे परन पनवारे। कनक कील मनि पान सँवारे।।
अर्थ · Hindi
सादर लगे परन पनवारे। कनक कील मनि पान सँवारे।।
- RCM 1.328.9Open verse →
सूपोदन सुरभी सरपि सुंदर स्वादु पुनीत।
अर्थ · Hindi
सूपोदन सुरभी सरपि सुंदर स्वादु पुनीत।
- RCM 1.328.10Open verse →
छन महुँ सब कें परुसि गे चतुर सुआर बिनीत।।328।।
अर्थ · Hindi
छन महुँ सब कें परुसि गे चतुर सुआर बिनीत।।328।।
- RCM 1.329.1Open verse →
पंच कवल करि जेवन लअगे। गारि गान सुनि अति अनुरागे।।
अर्थ · Hindi
पंच कवल करि जेवन लअगे। गारि गान सुनि अति अनुरागे।।
- RCM 1.329.2Open verse →
भाँति अनेक परे पकवाने। सुधा सरिस नहिं जाहिं बखाने।।
अर्थ · Hindi
भाँति अनेक परे पकवाने। सुधा सरिस नहिं जाहिं बखाने।।
- RCM 1.329.3Open verse →
परुसन लगे सुआर सुजाना। बिंजन बिबिध नाम को जाना।।
अर्थ · Hindi
परुसन लगे सुआर सुजाना। बिंजन बिबिध नाम को जाना।।
- RCM 1.329.4Open verse →
चारि भाँति भोजन बिधि गाई। एक एक बिधि बरनि न जाई।।
अर्थ · Hindi
चारि भाँति भोजन बिधि गाई। एक एक बिधि बरनि न जाई।।
- RCM 1.329.5Open verse →
छरस रुचिर बिंजन बहु जाती। एक एक रस अगनित भाँती।।
अर्थ · Hindi
छरस रुचिर बिंजन बहु जाती। एक एक रस अगनित भाँती।।
- RCM 1.329.6Open verse →
जेवँत देहिं मधुर धुनि गारी। लै लै नाम पुरुष अरु नारी।।
अर्थ · Hindi
जेवँत देहिं मधुर धुनि गारी। लै लै नाम पुरुष अरु नारी।।
- RCM 1.329.7Open verse →
समय सुहावनि गारि बिराजा। हँसत राउ सुनि सहित समाजा।।
अर्थ · Hindi
समय सुहावनि गारि बिराजा। हँसत राउ सुनि सहित समाजा।।
- RCM 1.329.8Open verse →
एहि बिधि सबहीं भौजनु कीन्हा। आदर सहित आचमनु दीन्हा।।
अर्थ · Hindi
एहि बिधि सबहीं भौजनु कीन्हा। आदर सहित आचमनु दीन्हा।।
- RCM 1.329.9Open verse →
देइ पान पूजे जनक दसरथु सहित समाज।
अर्थ · Hindi
देइ पान पूजे जनक दसरथु सहित समाज।
- RCM 1.329.10Open verse →
जनवासेहि गवने मुदित सकल भूप सिरताज।।329।।
अर्थ · Hindi
जनवासेहि गवने मुदित सकल भूप सिरताज।।329।।
- RCM 1.330.1Open verse →
नित नूतन मंगल पुर माहीं। निमिष सरिस दिन जामिनि जाहीं।।
अर्थ · Hindi
नित नूतन मंगल पुर माहीं। निमिष सरिस दिन जामिनि जाहीं।।
- RCM 1.330.2Open verse →
बड़े भोर भूपतिमनि जागे। जाचक गुन गन गावन लागे।।
अर्थ · Hindi
बड़े भोर भूपतिमनि जागे। जाचक गुन गन गावन लागे।।
- RCM 1.330.3Open verse →
देखि कुअँर बर बधुन्ह समेता। किमि कहि जात मोदु मन जेता।।
अर्थ · Hindi
देखि कुअँर बर बधुन्ह समेता। किमि कहि जात मोदु मन जेता।।
- RCM 1.330.4Open verse →
प्रातक्रिया करि गे गुरु पाहीं। महाप्रमोदु प्रेमु मन माहीं।।
अर्थ · Hindi
प्रातक्रिया करि गे गुरु पाहीं। महाप्रमोदु प्रेमु मन माहीं।।
- RCM 1.330.5Open verse →
करि प्रनाम पूजा कर जोरी। बोले गिरा अमिअँ जनु बोरी।।
अर्थ · Hindi
करि प्रनाम पूजा कर जोरी। बोले गिरा अमिअँ जनु बोरी।।
- RCM 1.330.6Open verse →
तुम्हरी कृपाँ सुनहु मुनिराजा। भयउँ आजु मैं पूरनकाजा।।
अर्थ · Hindi
तुम्हरी कृपाँ सुनहु मुनिराजा। भयउँ आजु मैं पूरनकाजा।।
- RCM 1.330.7Open verse →
अब सब बिप्र बोलाइ गोसाईं। देहु धेनु सब भाँति बनाई।।
अर्थ · Hindi
अब सब बिप्र बोलाइ गोसाईं। देहु धेनु सब भाँति बनाई।।
- RCM 1.330.8Open verse →
सुनि गुर करि महिपाल बड़ाई। पुनि पठए मुनि बृंद बोलाई।।
अर्थ · Hindi
सुनि गुर करि महिपाल बड़ाई। पुनि पठए मुनि बृंद बोलाई।।
- RCM 1.330.9Open verse →
बामदेउ अरु देवरिषि बालमीकि जाबालि।
अर्थ · Hindi
बामदेउ अरु देवरिषि बालमीकि जाबालि।
- RCM 1.330.10Open verse →
आए मुनिबर निकर तब कौसिकादि तपसालि।।330।।
अर्थ · Hindi
आए मुनिबर निकर तब कौसिकादि तपसालि।।330।।
- RCM 1.331.1Open verse →
दंड प्रनाम सबहि नृप कीन्हे। पूजि सप्रेम बरासन दीन्हे।।
अर्थ · Hindi
दंड प्रनाम सबहि नृप कीन्हे। पूजि सप्रेम बरासन दीन्हे।।
- RCM 1.331.2Open verse →
चारि लच्छ बर धेनु मगाई। कामसुरभि सम सील सुहाई।।
अर्थ · Hindi
चारि लच्छ बर धेनु मगाई। कामसुरभि सम सील सुहाई।।
- RCM 1.331.3Open verse →
सब बिधि सकल अलंकृत कीन्हीं। मुदित महिप महिदेवन्ह दीन्हीं।।
अर्थ · Hindi
सब बिधि सकल अलंकृत कीन्हीं। मुदित महिप महिदेवन्ह दीन्हीं।।
- RCM 1.331.4Open verse →
करत बिनय बहु बिधि नरनाहू। लहेउँ आजु जग जीवन लाहू।।
अर्थ · Hindi
करत बिनय बहु बिधि नरनाहू। लहेउँ आजु जग जीवन लाहू।।
- RCM 1.331.5Open verse →
पाइ असीस महीसु अनंदा। लिए बोलि पुनि जाचक बृंदा।।
अर्थ · Hindi
पाइ असीस महीसु अनंदा। लिए बोलि पुनि जाचक बृंदा।।
- RCM 1.331.6Open verse →
कनक बसन मनि हय गय स्यंदन। दिए बूझि रुचि रबिकुलनंदन।।
अर्थ · Hindi
कनक बसन मनि हय गय स्यंदन। दिए बूझि रुचि रबिकुलनंदन।।
- RCM 1.331.7Open verse →
चले पढ़त गावत गुन गाथा। जय जय जय दिनकर कुल नाथा।।
अर्थ · Hindi
चले पढ़त गावत गुन गाथा। जय जय जय दिनकर कुल नाथा।।
- RCM 1.331.8Open verse →
एहि बिधि राम बिआह उछाहू। सकइ न बरनि सहस मुख जाहू।।
अर्थ · Hindi
एहि बिधि राम बिआह उछाहू। सकइ न बरनि सहस मुख जाहू।।
- RCM 1.331.9Open verse →
बार बार कौसिक चरन सीसु नाइ कह राउ।
अर्थ · Hindi
बार बार कौसिक चरन सीसु नाइ कह राउ।
- RCM 1.331.10Open verse →
यह सबु सुखु मुनिराज तव कृपा कटाच्छ पसाउ।।331।।
अर्थ · Hindi
यह सबु सुखु मुनिराज तव कृपा कटाच्छ पसाउ।।331।।
- RCM 1.332.1Open verse →
जनक सनेहु सीलु करतूती। नृपु सब भाँति सराह बिभूती।।
अर्थ · Hindi
जनक सनेहु सीलु करतूती। नृपु सब भाँति सराह बिभूती।।
- RCM 1.332.2Open verse →
दिन उठि बिदा अवधपति मागा। राखहिं जनकु सहित अनुरागा।।
अर्थ · Hindi
दिन उठि बिदा अवधपति मागा। राखहिं जनकु सहित अनुरागा।।
- RCM 1.332.3Open verse →
नित नूतन आदरु अधिकाई। दिन प्रति सहस भाँति पहुनाई।।
अर्थ · Hindi
नित नूतन आदरु अधिकाई। दिन प्रति सहस भाँति पहुनाई।।
- RCM 1.332.4Open verse →
नित नव नगर अनंद उछाहू। दसरथ गवनु सोहाइ न काहू।।
अर्थ · Hindi
नित नव नगर अनंद उछाहू। दसरथ गवनु सोहाइ न काहू।।
- RCM 1.332.5Open verse →
बहुत दिवस बीते एहि भाँती। जनु सनेह रजु बँधे बराती।।
अर्थ · Hindi
बहुत दिवस बीते एहि भाँती। जनु सनेह रजु बँधे बराती।।
- RCM 1.332.6Open verse →
कौसिक सतानंद तब जाई। कहा बिदेह नृपहि समुझाई।।
अर्थ · Hindi
कौसिक सतानंद तब जाई। कहा बिदेह नृपहि समुझाई।।
- RCM 1.332.7Open verse →
अब दसरथ कहँ आयसु देहू। जद्यपि छाड़ि न सकहु सनेहू।।
अर्थ · Hindi
अब दसरथ कहँ आयसु देहू। जद्यपि छाड़ि न सकहु सनेहू।।
- RCM 1.332.8Open verse →
भलेहिं नाथ कहि सचिव बोलाए। कहि जय जीव सीस तिन्ह नाए।।
अर्थ · Hindi
भलेहिं नाथ कहि सचिव बोलाए। कहि जय जीव सीस तिन्ह नाए।।
- RCM 1.332.9Open verse →
अवधनाथु चाहत चलन भीतर करहु जनाउ।
अर्थ · Hindi
अवधनाथु चाहत चलन भीतर करहु जनाउ।
- RCM 1.332.10Open verse →
भए प्रेमबस सचिव सुनि बिप्र सभासद राउ।।332।।
अर्थ · Hindi
भए प्रेमबस सचिव सुनि बिप्र सभासद राउ।।332।।
- RCM 1.333.1Open verse →
पुरबासी सुनि चलिहि बराता। बूझत बिकल परस्पर बाता।।
अर्थ · Hindi
पुरबासी सुनि चलिहि बराता। बूझत बिकल परस्पर बाता।।
- RCM 1.333.2Open verse →
सत्य गवनु सुनि सब बिलखाने। मनहुँ साँझ सरसिज सकुचाने।।
अर्थ · Hindi
सत्य गवनु सुनि सब बिलखाने। मनहुँ साँझ सरसिज सकुचाने।।
- RCM 1.333.3Open verse →
जहँ जहँ आवत बसे बराती। तहँ तहँ सिद्ध चला बहु भाँती।।
अर्थ · Hindi
जहँ जहँ आवत बसे बराती। तहँ तहँ सिद्ध चला बहु भाँती।।
- RCM 1.333.4Open verse →
बिबिध भाँति मेवा पकवाना। भोजन साजु न जाइ बखाना।।
अर्थ · Hindi
बिबिध भाँति मेवा पकवाना। भोजन साजु न जाइ बखाना।।
- RCM 1.333.5Open verse →
भरि भरि बसहँ अपार कहारा। पठई जनक अनेक सुसारा।।
अर्थ · Hindi
भरि भरि बसहँ अपार कहारा। पठई जनक अनेक सुसारा।।
- RCM 1.333.6Open verse →
तुरग लाख रथ सहस पचीसा। सकल सँवारे नख अरु सीसा।।
अर्थ · Hindi
तुरग लाख रथ सहस पचीसा। सकल सँवारे नख अरु सीसा।।
- RCM 1.333.7Open verse →
मत्त सहस दस सिंधुर साजे। जिन्हहि देखि दिसिकुंजर लाजे।।
अर्थ · Hindi
मत्त सहस दस सिंधुर साजे। जिन्हहि देखि दिसिकुंजर लाजे।।
- RCM 1.333.8Open verse →
कनक बसन मनि भरि भरि जाना। महिषीं धेनु बस्तु बिधि नाना।।
अर्थ · Hindi
कनक बसन मनि भरि भरि जाना। महिषीं धेनु बस्तु बिधि नाना।।
- RCM 1.333.9Open verse →
दाइज अमित न सकिअ कहि दीन्ह बिदेहँ बहोरि।
अर्थ · Hindi
दाइज अमित न सकिअ कहि दीन्ह बिदेहँ बहोरि।
- RCM 1.333.10Open verse →
जो अवलोकत लोकपति लोक संपदा थोरि।।333।।
अर्थ · Hindi
जो अवलोकत लोकपति लोक संपदा थोरि।।333।।
- RCM 1.334.1Open verse →
सबु समाजु एहि भाँति बनाई। जनक अवधपुर दीन्ह पठाई।।
अर्थ · Hindi
सबु समाजु एहि भाँति बनाई। जनक अवधपुर दीन्ह पठाई।।
- RCM 1.334.2Open verse →
चलिहि बरात सुनत सब रानीं। बिकल मीनगन जनु लघु पानीं।।
अर्थ · Hindi
चलिहि बरात सुनत सब रानीं। बिकल मीनगन जनु लघु पानीं।।
- RCM 1.334.3Open verse →
पुनि पुनि सीय गोद करि लेहीं। देइ असीस सिखावनु देहीं।।
अर्थ · Hindi
पुनि पुनि सीय गोद करि लेहीं। देइ असीस सिखावनु देहीं।।
- RCM 1.334.4Open verse →
होएहु संतत पियहि पिआरी। चिरु अहिबात असीस हमारी।।
अर्थ · Hindi
होएहु संतत पियहि पिआरी। चिरु अहिबात असीस हमारी।।
- RCM 1.334.5Open verse →
सासु ससुर गुर सेवा करेहू। पति रुख लखि आयसु अनुसरेहू।।
अर्थ · Hindi
सासु ससुर गुर सेवा करेहू। पति रुख लखि आयसु अनुसरेहू।।
- RCM 1.334.6Open verse →
अति सनेह बस सखीं सयानी। नारि धरम सिखवहिं मृदु बानी।।
अर्थ · Hindi
अति सनेह बस सखीं सयानी। नारि धरम सिखवहिं मृदु बानी।।
- RCM 1.334.7Open verse →
सादर सकल कुअँरि समुझाई। रानिन्ह बार बार उर लाई।।
अर्थ · Hindi
सादर सकल कुअँरि समुझाई। रानिन्ह बार बार उर लाई।।
- RCM 1.334.8Open verse →
बहुरि बहुरि भेटहिं महतारीं। कहहिं बिरंचि रचीं कत नारीं।।
अर्थ · Hindi
बहुरि बहुरि भेटहिं महतारीं। कहहिं बिरंचि रचीं कत नारीं।।
- RCM 1.334.9Open verse →
तेहि अवसर भाइन्ह सहित रामु भानु कुल केतु।
अर्थ · Hindi
तेहि अवसर भाइन्ह सहित रामु भानु कुल केतु।
- RCM 1.334.10Open verse →
चले जनक मंदिर मुदित बिदा करावन हेतु।।334।।
अर्थ · Hindi
चले जनक मंदिर मुदित बिदा करावन हेतु।।334।।
- RCM 1.335.1Open verse →
चारिअ भाइ सुभायँ सुहाए। नगर नारि नर देखन धाए।।
अर्थ · Hindi
चारिअ भाइ सुभायँ सुहाए। नगर नारि नर देखन धाए।।
- RCM 1.335.2Open verse →
कोउ कह चलन चहत हहिं आजू। कीन्ह बिदेह बिदा कर साजू।।
अर्थ · Hindi
कोउ कह चलन चहत हहिं आजू। कीन्ह बिदेह बिदा कर साजू।।
- RCM 1.335.3Open verse →
लेहु नयन भरि रूप निहारी। प्रिय पाहुने भूप सुत चारी।।
अर्थ · Hindi
लेहु नयन भरि रूप निहारी। प्रिय पाहुने भूप सुत चारी।।
- RCM 1.335.4Open verse →
को जानै केहि सुकृत सयानी। नयन अतिथि कीन्हे बिधि आनी।।
अर्थ · Hindi
को जानै केहि सुकृत सयानी। नयन अतिथि कीन्हे बिधि आनी।।
- RCM 1.335.5Open verse →
मरनसीलु जिमि पाव पिऊषा। सुरतरु लहै जनम कर भूखा।।
अर्थ · Hindi
मरनसीलु जिमि पाव पिऊषा। सुरतरु लहै जनम कर भूखा।।
- RCM 1.335.6Open verse →
पाव नारकी हरिपदु जैसें। इन्ह कर दरसनु हम कहँ तैसे।।
अर्थ · Hindi
पाव नारकी हरिपदु जैसें। इन्ह कर दरसनु हम कहँ तैसे।।
- RCM 1.335.7Open verse →
निरखि राम सोभा उर धरहू। निज मन फनि मूरति मनि करहू।।
अर्थ · Hindi
निरखि राम सोभा उर धरहू। निज मन फनि मूरति मनि करहू।।
- RCM 1.335.8Open verse →
एहि बिधि सबहि नयन फलु देता। गए कुअँर सब राज निकेता।।
अर्थ · Hindi
एहि बिधि सबहि नयन फलु देता। गए कुअँर सब राज निकेता।।
- RCM 1.335.9Open verse →
रूप सिंधु सब बंधु लखि हरषि उठा रनिवासु।
अर्थ · Hindi
रूप सिंधु सब बंधु लखि हरषि उठा रनिवासु।
- RCM 1.335.10Open verse →
करहि निछावरि आरती महा मुदित मन सासु।।335।।
अर्थ · Hindi
करहि निछावरि आरती महा मुदित मन सासु।।335।।
- RCM 1.336.1Open verse →
देखि राम छबि अति अनुरागीं। प्रेमबिबस पुनि पुनि पद लागीं।।
अर्थ · Hindi
देखि राम छबि अति अनुरागीं। प्रेमबिबस पुनि पुनि पद लागीं।।
- RCM 1.336.2Open verse →
रही न लाज प्रीति उर छाई। सहज सनेहु बरनि किमि जाई।।
अर्थ · Hindi
रही न लाज प्रीति उर छाई। सहज सनेहु बरनि किमि जाई।।
- RCM 1.336.3Open verse →
भाइन्ह सहित उबटि अन्हवाए। छरस असन अति हेतु जेवाँए।।
अर्थ · Hindi
भाइन्ह सहित उबटि अन्हवाए। छरस असन अति हेतु जेवाँए।।
- RCM 1.336.4Open verse →
बोले रामु सुअवसरु जानी। सील सनेह सकुचमय बानी।।
अर्थ · Hindi
बोले रामु सुअवसरु जानी। सील सनेह सकुचमय बानी।।
- RCM 1.336.5Open verse →
राउ अवधपुर चहत सिधाए। बिदा होन हम इहाँ पठाए।।
अर्थ · Hindi
राउ अवधपुर चहत सिधाए। बिदा होन हम इहाँ पठाए।।
- RCM 1.336.6Open verse →
मातु मुदित मन आयसु देहू। बालक जानि करब नित नेहू।।
अर्थ · Hindi
मातु मुदित मन आयसु देहू। बालक जानि करब नित नेहू।।
- RCM 1.336.7Open verse →
सुनत बचन बिलखेउ रनिवासू। बोलि न सकहिं प्रेमबस सासू।।
अर्थ · Hindi
सुनत बचन बिलखेउ रनिवासू। बोलि न सकहिं प्रेमबस सासू।।
- RCM 1.336.8Open verse →
हृदयँ लगाइ कुअँरि सब लीन्ही। पतिन्ह सौंपि बिनती अति कीन्ही।।
अर्थ · Hindi
हृदयँ लगाइ कुअँरि सब लीन्ही। पतिन्ह सौंपि बिनती अति कीन्ही।।
- RCM 1.337.1Open verse →
अस कहि रही चरन गहि रानी। प्रेम पंक जनु गिरा समानी।।
अर्थ · Hindi
अस कहि रही चरन गहि रानी। प्रेम पंक जनु गिरा समानी।।
- RCM 1.337.2Open verse →
सुनि सनेहसानी बर बानी। बहुबिधि राम सासु सनमानी।।
अर्थ · Hindi
सुनि सनेहसानी बर बानी। बहुबिधि राम सासु सनमानी।।
- RCM 1.337.3Open verse →
राम बिदा मागत कर जोरी। कीन्ह प्रनामु बहोरि बहोरी।।
अर्थ · Hindi
राम बिदा मागत कर जोरी। कीन्ह प्रनामु बहोरि बहोरी।।
- RCM 1.337.4Open verse →
पाइ असीस बहुरि सिरु नाई। भाइन्ह सहित चले रघुराई।।
अर्थ · Hindi
पाइ असीस बहुरि सिरु नाई। भाइन्ह सहित चले रघुराई।।
- RCM 1.337.5Open verse →
मंजु मधुर मूरति उर आनी। भई सनेह सिथिल सब रानी।।
अर्थ · Hindi
मंजु मधुर मूरति उर आनी। भई सनेह सिथिल सब रानी।।
- RCM 1.337.6Open verse →
पुनि धीरजु धरि कुअँरि हँकारी। बार बार भेटहिं महतारीं।।
अर्थ · Hindi
पुनि धीरजु धरि कुअँरि हँकारी। बार बार भेटहिं महतारीं।।
- RCM 1.337.7Open verse →
पहुँचावहिं फिरि मिलहिं बहोरी। बढ़ी परस्पर प्रीति न थोरी।।
अर्थ · Hindi
पहुँचावहिं फिरि मिलहिं बहोरी। बढ़ी परस्पर प्रीति न थोरी।।
- RCM 1.337.8Open verse →
पुनि पुनि मिलत सखिन्ह बिलगाई। बाल बच्छ जिमि धेनु लवाई।।
अर्थ · Hindi
पुनि पुनि मिलत सखिन्ह बिलगाई। बाल बच्छ जिमि धेनु लवाई।।
- RCM 1.337.9Open verse →
प्रेमबिबस नर नारि सब सखिन्ह सहित रनिवासु।
अर्थ · Hindi
प्रेमबिबस नर नारि सब सखिन्ह सहित रनिवासु।
- RCM 1.337.10Open verse →
मानहुँ कीन्ह बिदेहपुर करुनाँ बिरहँ निवासु।।337।।
अर्थ · Hindi
मानहुँ कीन्ह बिदेहपुर करुनाँ बिरहँ निवासु।।337।।
- RCM 1.338.1Open verse →
सुक सारिका जानकी ज्याए। कनक पिंजरन्हि राखि पढ़ाए।।
अर्थ · Hindi
सुक सारिका जानकी ज्याए। कनक पिंजरन्हि राखि पढ़ाए।।
- RCM 1.338.2Open verse →
ब्याकुल कहहिं कहाँ बैदेही। सुनि धीरजु परिहरइ न केही।।
अर्थ · Hindi
ब्याकुल कहहिं कहाँ बैदेही। सुनि धीरजु परिहरइ न केही।।
- RCM 1.338.3Open verse →
भए बिकल खग मृग एहि भाँति। मनुज दसा कैसें कहि जाती।।
अर्थ · Hindi
भए बिकल खग मृग एहि भाँति। मनुज दसा कैसें कहि जाती।।
- RCM 1.338.4Open verse →
बंधु समेत जनकु तब आए। प्रेम उमगि लोचन जल छाए।।
अर्थ · Hindi
बंधु समेत जनकु तब आए। प्रेम उमगि लोचन जल छाए।।
- RCM 1.338.5Open verse →
सीय बिलोकि धीरता भागी। रहे कहावत परम बिरागी।।
अर्थ · Hindi
सीय बिलोकि धीरता भागी। रहे कहावत परम बिरागी।।
- RCM 1.338.6Open verse →
लीन्हि राँय उर लाइ जानकी। मिटी महामरजाद ग्यान की।।
अर्थ · Hindi
लीन्हि राँय उर लाइ जानकी। मिटी महामरजाद ग्यान की।।
- RCM 1.338.7Open verse →
समुझावत सब सचिव सयाने। कीन्ह बिचारु न अवसर जाने।।
अर्थ · Hindi
समुझावत सब सचिव सयाने। कीन्ह बिचारु न अवसर जाने।।
- RCM 1.338.8Open verse →
बारहिं बार सुता उर लाई। सजि सुंदर पालकीं मगाई।।
अर्थ · Hindi
बारहिं बार सुता उर लाई। सजि सुंदर पालकीं मगाई।।
- RCM 1.338.9Open verse →
प्रेमबिबस परिवारु सबु जानि सुलगन नरेस।
अर्थ · Hindi
प्रेमबिबस परिवारु सबु जानि सुलगन नरेस।
- RCM 1.338.10Open verse →
कुँअरि चढ़ाई पालकिन्ह सुमिरे सिद्धि गनेस।।338।।
अर्थ · Hindi
कुँअरि चढ़ाई पालकिन्ह सुमिरे सिद्धि गनेस।।338।।
- RCM 1.339.1Open verse →
बहुबिधि भूप सुता समुझाई। नारिधरमु कुलरीति सिखाई।।
अर्थ · Hindi
बहुबिधि भूप सुता समुझाई। नारिधरमु कुलरीति सिखाई।।
- RCM 1.339.2Open verse →
दासीं दास दिए बहुतेरे। सुचि सेवक जे प्रिय सिय केरे।।
अर्थ · Hindi
दासीं दास दिए बहुतेरे। सुचि सेवक जे प्रिय सिय केरे।।
- RCM 1.339.3Open verse →
सीय चलत ब्याकुल पुरबासी। होहिं सगुन सुभ मंगल रासी।।
अर्थ · Hindi
सीय चलत ब्याकुल पुरबासी। होहिं सगुन सुभ मंगल रासी।।
- RCM 1.339.4Open verse →
भूसुर सचिव समेत समाजा। संग चले पहुँचावन राजा।।
अर्थ · Hindi
भूसुर सचिव समेत समाजा। संग चले पहुँचावन राजा।।
- RCM 1.339.5Open verse →
समय बिलोकि बाजने बाजे। रथ गज बाजि बरातिन्ह साजे।।
अर्थ · Hindi
समय बिलोकि बाजने बाजे। रथ गज बाजि बरातिन्ह साजे।।
- RCM 1.339.6Open verse →
दसरथ बिप्र बोलि सब लीन्हे। दान मान परिपूरन कीन्हे।।
अर्थ · Hindi
दसरथ बिप्र बोलि सब लीन्हे। दान मान परिपूरन कीन्हे।।
- RCM 1.339.7Open verse →
चरन सरोज धूरि धरि सीसा। मुदित महीपति पाइ असीसा।।
अर्थ · Hindi
चरन सरोज धूरि धरि सीसा। मुदित महीपति पाइ असीसा।।
- RCM 1.339.8Open verse →
सुमिरि गजाननु कीन्ह पयाना। मंगलमूल सगुन भए नाना।।
अर्थ · Hindi
सुमिरि गजाननु कीन्ह पयाना। मंगलमूल सगुन भए नाना।।
- RCM 1.339.9Open verse →
सुर प्रसून बरषहि हरषि करहिं अपछरा गान।
अर्थ · Hindi
सुर प्रसून बरषहि हरषि करहिं अपछरा गान।
- RCM 1.339.10Open verse →
चले अवधपति अवधपुर मुदित बजाइ निसान।।339।।
अर्थ · Hindi
चले अवधपति अवधपुर मुदित बजाइ निसान।।339।।
- RCM 1.340.1Open verse →
नृप करि बिनय महाजन फेरे। सादर सकल मागने टेरे।।
अर्थ · Hindi
नृप करि बिनय महाजन फेरे। सादर सकल मागने टेरे।।
- RCM 1.340.2Open verse →
भूषन बसन बाजि गज दीन्हे। प्रेम पोषि ठाढ़े सब कीन्हे।।
अर्थ · Hindi
भूषन बसन बाजि गज दीन्हे। प्रेम पोषि ठाढ़े सब कीन्हे।।
- RCM 1.340.3Open verse →
बार बार बिरिदावलि भाषी। फिरे सकल रामहि उर राखी।।
अर्थ · Hindi
बार बार बिरिदावलि भाषी। फिरे सकल रामहि उर राखी।।
- RCM 1.340.4Open verse →
बहुरि बहुरि कोसलपति कहहीं। जनकु प्रेमबस फिरै न चहहीं।।
अर्थ · Hindi
बहुरि बहुरि कोसलपति कहहीं। जनकु प्रेमबस फिरै न चहहीं।।
- RCM 1.340.5Open verse →
पुनि कह भूपति बचन सुहाए। फिरिअ महीस दूरि बड़ि आए।।
अर्थ · Hindi
पुनि कह भूपति बचन सुहाए। फिरिअ महीस दूरि बड़ि आए।।
- RCM 1.340.6Open verse →
राउ बहोरि उतरि भए ठाढ़े। प्रेम प्रबाह बिलोचन बाढ़े।।
अर्थ · Hindi
राउ बहोरि उतरि भए ठाढ़े। प्रेम प्रबाह बिलोचन बाढ़े।।
- RCM 1.340.7Open verse →
तब बिदेह बोले कर जोरी। बचन सनेह सुधाँ जनु बोरी।।
अर्थ · Hindi
तब बिदेह बोले कर जोरी। बचन सनेह सुधाँ जनु बोरी।।
- RCM 1.340.8Open verse →
करौ कवन बिधि बिनय बनाई। महाराज मोहि दीन्हि बड़ाई।।
अर्थ · Hindi
करौ कवन बिधि बिनय बनाई। महाराज मोहि दीन्हि बड़ाई।।
- RCM 1.340.9Open verse →
कोसलपति समधी सजन सनमाने सब भाँति।
अर्थ · Hindi
कोसलपति समधी सजन सनमाने सब भाँति।
- RCM 1.340.10Open verse →
मिलनि परसपर बिनय अति प्रीति न हृदयँ समाति।।340।।
अर्थ · Hindi
मिलनि परसपर बिनय अति प्रीति न हृदयँ समाति।।340।।
- RCM 1.341.1Open verse →
मुनि मंडलिहि जनक सिरु नावा। आसिरबादु सबहि सन पावा।।
अर्थ · Hindi
मुनि मंडलिहि जनक सिरु नावा। आसिरबादु सबहि सन पावा।।
- RCM 1.341.2Open verse →
सादर पुनि भेंटे जामाता। रूप सील गुन निधि सब भ्राता।।
अर्थ · Hindi
सादर पुनि भेंटे जामाता। रूप सील गुन निधि सब भ्राता।।
- RCM 1.341.3Open verse →
जोरि पंकरुह पानि सुहाए। बोले बचन प्रेम जनु जाए।।
अर्थ · Hindi
जोरि पंकरुह पानि सुहाए। बोले बचन प्रेम जनु जाए।।
- RCM 1.341.4Open verse →
राम करौ केहि भाँति प्रसंसा। मुनि महेस मन मानस हंसा।।
अर्थ · Hindi
राम करौ केहि भाँति प्रसंसा। मुनि महेस मन मानस हंसा।।
- RCM 1.341.5Open verse →
करहिं जोग जोगी जेहि लागी। कोहु मोहु ममता मदु त्यागी।।
अर्थ · Hindi
करहिं जोग जोगी जेहि लागी। कोहु मोहु ममता मदु त्यागी।।
- RCM 1.341.6Open verse →
ब्यापकु ब्रह्मु अलखु अबिनासी। चिदानंदु निरगुन गुनरासी।।
अर्थ · Hindi
ब्यापकु ब्रह्मु अलखु अबिनासी। चिदानंदु निरगुन गुनरासी।।
- RCM 1.341.7Open verse →
मन समेत जेहि जान न बानी। तरकि न सकहिं सकल अनुमानी।।
अर्थ · Hindi
मन समेत जेहि जान न बानी। तरकि न सकहिं सकल अनुमानी।।
- RCM 1.341.8Open verse →
महिमा निगमु नेति कहि कहई। जो तिहुँ काल एकरस रहई।।
अर्थ · Hindi
महिमा निगमु नेति कहि कहई। जो तिहुँ काल एकरस रहई।।
- RCM 1.341.9Open verse →
नयन बिषय मो कहुँ भयउ सो समस्त सुख मूल।
अर्थ · Hindi
नयन बिषय मो कहुँ भयउ सो समस्त सुख मूल।
- RCM 1.341.10Open verse →
सबइ लाभु जग जीव कहँ भएँ ईसु अनुकुल।।341।।
अर्थ · Hindi
सबइ लाभु जग जीव कहँ भएँ ईसु अनुकुल।।341।।
- RCM 1.342.1Open verse →
सबहि भाँति मोहि दीन्हि बड़ाई। निज जन जानि लीन्ह अपनाई।।
अर्थ · Hindi
सबहि भाँति मोहि दीन्हि बड़ाई। निज जन जानि लीन्ह अपनाई।।
- RCM 1.342.2Open verse →
होहिं सहस दस सारद सेषा। करहिं कलप कोटिक भरि लेखा।।
अर्थ · Hindi
होहिं सहस दस सारद सेषा। करहिं कलप कोटिक भरि लेखा।।
- RCM 1.342.3Open verse →
मोर भाग्य राउर गुन गाथा। कहि न सिराहिं सुनहु रघुनाथा।।
अर्थ · Hindi
मोर भाग्य राउर गुन गाथा। कहि न सिराहिं सुनहु रघुनाथा।।
- RCM 1.342.4Open verse →
मै कछु कहउँ एक बल मोरें। तुम्ह रीझहु सनेह सुठि थोरें।।
अर्थ · Hindi
मै कछु कहउँ एक बल मोरें। तुम्ह रीझहु सनेह सुठि थोरें।।
- RCM 1.342.5Open verse →
बार बार मागउँ कर जोरें। मनु परिहरै चरन जनि भोरें।।
अर्थ · Hindi
बार बार मागउँ कर जोरें। मनु परिहरै चरन जनि भोरें।।
- RCM 1.342.6Open verse →
सुनि बर बचन प्रेम जनु पोषे। पूरनकाम रामु परितोषे।।
अर्थ · Hindi
सुनि बर बचन प्रेम जनु पोषे। पूरनकाम रामु परितोषे।।
- RCM 1.342.7Open verse →
करि बर बिनय ससुर सनमाने। पितु कौसिक बसिष्ठ सम जाने।।
अर्थ · Hindi
करि बर बिनय ससुर सनमाने। पितु कौसिक बसिष्ठ सम जाने।।
- RCM 1.342.8Open verse →
बिनती बहुरि भरत सन कीन्ही। मिलि सप्रेमु पुनि आसिष दीन्ही।।
अर्थ · Hindi
बिनती बहुरि भरत सन कीन्ही। मिलि सप्रेमु पुनि आसिष दीन्ही।।
- RCM 1.342.9Open verse →
मिले लखन रिपुसूदनहि दीन्हि असीस महीस।
अर्थ · Hindi
मिले लखन रिपुसूदनहि दीन्हि असीस महीस।
- RCM 1.342.10Open verse →
भए परस्पर प्रेमबस फिरि फिरि नावहिं सीस।।342।।
अर्थ · Hindi
भए परस्पर प्रेमबस फिरि फिरि नावहिं सीस।।342।।
- RCM 1.343.1Open verse →
बार बार करि बिनय बड़ाई। रघुपति चले संग सब भाई।।
अर्थ · Hindi
बार बार करि बिनय बड़ाई। रघुपति चले संग सब भाई।।
- RCM 1.343.2Open verse →
जनक गहे कौसिक पद जाई। चरन रेनु सिर नयनन्ह लाई।।
अर्थ · Hindi
जनक गहे कौसिक पद जाई। चरन रेनु सिर नयनन्ह लाई।।
- RCM 1.343.3Open verse →
सुनु मुनीस बर दरसन तोरें। अगमु न कछु प्रतीति मन मोरें।।
अर्थ · Hindi
सुनु मुनीस बर दरसन तोरें। अगमु न कछु प्रतीति मन मोरें।।
- RCM 1.343.4Open verse →
जो सुखु सुजसु लोकपति चहहीं। करत मनोरथ सकुचत अहहीं।।
अर्थ · Hindi
जो सुखु सुजसु लोकपति चहहीं। करत मनोरथ सकुचत अहहीं।।
- RCM 1.343.5Open verse →
सो सुखु सुजसु सुलभ मोहि स्वामी। सब सिधि तव दरसन अनुगामी।।
अर्थ · Hindi
सो सुखु सुजसु सुलभ मोहि स्वामी। सब सिधि तव दरसन अनुगामी।।
- RCM 1.343.6Open verse →
कीन्हि बिनय पुनि पुनि सिरु नाई। फिरे महीसु आसिषा पाई।।
अर्थ · Hindi
कीन्हि बिनय पुनि पुनि सिरु नाई। फिरे महीसु आसिषा पाई।।
- RCM 1.343.7Open verse →
चली बरात निसान बजाई। मुदित छोट बड़ सब समुदाई।।
अर्थ · Hindi
चली बरात निसान बजाई। मुदित छोट बड़ सब समुदाई।।
- RCM 1.343.8Open verse →
रामहि निरखि ग्राम नर नारी। पाइ नयन फलु होहिं सुखारी।।
अर्थ · Hindi
रामहि निरखि ग्राम नर नारी। पाइ नयन फलु होहिं सुखारी।।
- RCM 1.343.9Open verse →
बीच बीच बर बास करि मग लोगन्ह सुख देत।
अर्थ · Hindi
बीच बीच बर बास करि मग लोगन्ह सुख देत।
- RCM 1.343.10Open verse →
अवध समीप पुनीत दिन पहुँची आइ जनेत।।343।।
अर्थ · Hindi
अवध समीप पुनीत दिन पहुँची आइ जनेत।।343।।
- RCM 1.344.1Open verse →
हने निसान पनव बर बाजे। भेरि संख धुनि हय गय गाजे।।
अर्थ · Hindi
हने निसान पनव बर बाजे। भेरि संख धुनि हय गय गाजे।।
- RCM 1.344.2Open verse →
झाँझि बिरव डिंडमीं सुहाई। सरस राग बाजहिं सहनाई।।
अर्थ · Hindi
झाँझि बिरव डिंडमीं सुहाई। सरस राग बाजहिं सहनाई।।
- RCM 1.344.3Open verse →
पुर जन आवत अकनि बराता। मुदित सकल पुलकावलि गाता।।
अर्थ · Hindi
पुर जन आवत अकनि बराता। मुदित सकल पुलकावलि गाता।।
- RCM 1.344.4Open verse →
निज निज सुंदर सदन सँवारे। हाट बाट चौहट पुर द्वारे।।
अर्थ · Hindi
निज निज सुंदर सदन सँवारे। हाट बाट चौहट पुर द्वारे।।
- RCM 1.344.5Open verse →
गलीं सकल अरगजाँ सिंचाई। जहँ तहँ चौकें चारु पुराई।।
अर्थ · Hindi
गलीं सकल अरगजाँ सिंचाई। जहँ तहँ चौकें चारु पुराई।।
- RCM 1.344.6Open verse →
बना बजारु न जाइ बखाना। तोरन केतु पताक बिताना।।
अर्थ · Hindi
बना बजारु न जाइ बखाना। तोरन केतु पताक बिताना।।
- RCM 1.344.7Open verse →
सफल पूगफल कदलि रसाला। रोपे बकुल कदंब तमाला।।
अर्थ · Hindi
सफल पूगफल कदलि रसाला। रोपे बकुल कदंब तमाला।।
- RCM 1.344.8Open verse →
लगे सुभग तरु परसत धरनी। मनिमय आलबाल कल करनी।।
अर्थ · Hindi
लगे सुभग तरु परसत धरनी। मनिमय आलबाल कल करनी।।
- RCM 1.344.9Open verse →
बिबिध भाँति मंगल कलस गृह गृह रचे सँवारि।
अर्थ · Hindi
बिबिध भाँति मंगल कलस गृह गृह रचे सँवारि।
- RCM 1.344.10Open verse →
सुर ब्रह्मादि सिहाहिं सब रघुबर पुरी निहारि।।344।।
अर्थ · Hindi
सुर ब्रह्मादि सिहाहिं सब रघुबर पुरी निहारि।।344।।
- RCM 1.345.1Open verse →
भूप भवन तेहि अवसर सोहा। रचना देखि मदन मनु मोहा।।
अर्थ · Hindi
भूप भवन तेहि अवसर सोहा। रचना देखि मदन मनु मोहा।।
- RCM 1.345.2Open verse →
मंगल सगुन मनोहरताई। रिधि सिधि सुख संपदा सुहाई।।
अर्थ · Hindi
मंगल सगुन मनोहरताई। रिधि सिधि सुख संपदा सुहाई।।
- RCM 1.345.3Open verse →
जनु उछाह सब सहज सुहाए। तनु धरि धरि दसरथ दसरथ गृहँ छाए।।
अर्थ · Hindi
जनु उछाह सब सहज सुहाए। तनु धरि धरि दसरथ दसरथ गृहँ छाए।।
- RCM 1.345.4Open verse →
देखन हेतु राम बैदेही। कहहु लालसा होहि न केही।।
अर्थ · Hindi
देखन हेतु राम बैदेही। कहहु लालसा होहि न केही।।
- RCM 1.345.5Open verse →
जुथ जूथ मिलि चलीं सुआसिनि। निज छबि निदरहिं मदन बिलासनि।।
अर्थ · Hindi
जुथ जूथ मिलि चलीं सुआसिनि। निज छबि निदरहिं मदन बिलासनि।।
- RCM 1.345.6Open verse →
सकल सुमंगल सजें आरती। गावहिं जनु बहु बेष भारती।।
अर्थ · Hindi
सकल सुमंगल सजें आरती। गावहिं जनु बहु बेष भारती।।
- RCM 1.345.7Open verse →
भूपति भवन कोलाहलु होई। जाइ न बरनि समउ सुखु सोई।।
अर्थ · Hindi
भूपति भवन कोलाहलु होई। जाइ न बरनि समउ सुखु सोई।।
- RCM 1.345.8Open verse →
कौसल्यादि राम महतारीं। प्रेम बिबस तन दसा बिसारीं।।
अर्थ · Hindi
कौसल्यादि राम महतारीं। प्रेम बिबस तन दसा बिसारीं।।
- RCM 1.345.9Open verse →
दिए दान बिप्रन्ह बिपुल पूजि गनेस पुरारी।
अर्थ · Hindi
दिए दान बिप्रन्ह बिपुल पूजि गनेस पुरारी।
- RCM 1.345.10Open verse →
प्रमुदित परम दरिद्र जनु पाइ पदारथ चारि।।345।।
अर्थ · Hindi
प्रमुदित परम दरिद्र जनु पाइ पदारथ चारि।।345।।
- RCM 1.346.1Open verse →
मोद प्रमोद बिबस सब माता। चलहिं न चरन सिथिल भए गाता।।
अर्थ · Hindi
मोद प्रमोद बिबस सब माता। चलहिं न चरन सिथिल भए गाता।।
- RCM 1.346.2Open verse →
राम दरस हित अति अनुरागीं। परिछनि साजु सजन सब लागीं।।
अर्थ · Hindi
राम दरस हित अति अनुरागीं। परिछनि साजु सजन सब लागीं।।
- RCM 1.346.3Open verse →
बिबिध बिधान बाजने बाजे। मंगल मुदित सुमित्राँ साजे।।
अर्थ · Hindi
बिबिध बिधान बाजने बाजे। मंगल मुदित सुमित्राँ साजे।।
- RCM 1.346.4Open verse →
हरद दूब दधि पल्लव फूला। पान पूगफल मंगल मूला।।
अर्थ · Hindi
हरद दूब दधि पल्लव फूला। पान पूगफल मंगल मूला।।
- RCM 1.346.5Open verse →
अच्छत अंकुर लोचन लाजा। मंजुल मंजरि तुलसि बिराजा।।
अर्थ · Hindi
अच्छत अंकुर लोचन लाजा। मंजुल मंजरि तुलसि बिराजा।।
- RCM 1.346.6Open verse →
छुहे पुरट घट सहज सुहाए। मदन सकुन जनु नीड़ बनाए।।
अर्थ · Hindi
छुहे पुरट घट सहज सुहाए। मदन सकुन जनु नीड़ बनाए।।
- RCM 1.346.7Open verse →
सगुन सुंगध न जाहिं बखानी। मंगल सकल सजहिं सब रानी।।
अर्थ · Hindi
सगुन सुंगध न जाहिं बखानी। मंगल सकल सजहिं सब रानी।।
- RCM 1.346.8Open verse →
रचीं आरतीं बहुत बिधाना। मुदित करहिं कल मंगल गाना।।
अर्थ · Hindi
रचीं आरतीं बहुत बिधाना। मुदित करहिं कल मंगल गाना।।
- RCM 1.346.9Open verse →
कनक थार भरि मंगलन्हि कमल करन्हि लिएँ मात।
अर्थ · Hindi
कनक थार भरि मंगलन्हि कमल करन्हि लिएँ मात।
- RCM 1.346.10Open verse →
चलीं मुदित परिछनि करन पुलक पल्लवित गात।।346।।
अर्थ · Hindi
चलीं मुदित परिछनि करन पुलक पल्लवित गात।।346।।
- RCM 1.347.1Open verse →
धूप धूम नभु मेचक भयऊ। सावन घन घमंडु जनु ठयऊ।।
अर्थ · Hindi
धूप धूम नभु मेचक भयऊ। सावन घन घमंडु जनु ठयऊ।।
- RCM 1.347.2Open verse →
सुरतरु सुमन माल सुर बरषहिं। मनहुँ बलाक अवलि मनु करषहिं।।
अर्थ · Hindi
सुरतरु सुमन माल सुर बरषहिं। मनहुँ बलाक अवलि मनु करषहिं।।
- RCM 1.347.3Open verse →
मंजुल मनिमय बंदनिवारे। मनहुँ पाकरिपु चाप सँवारे।।
अर्थ · Hindi
मंजुल मनिमय बंदनिवारे। मनहुँ पाकरिपु चाप सँवारे।।
- RCM 1.347.4Open verse →
प्रगटहिं दुरहिं अटन्ह पर भामिनि। चारु चपल जनु दमकहिं दामिनि।।
अर्थ · Hindi
प्रगटहिं दुरहिं अटन्ह पर भामिनि। चारु चपल जनु दमकहिं दामिनि।।
- RCM 1.347.5Open verse →
दुंदुभि धुनि घन गरजनि घोरा। जाचक चातक दादुर मोरा।।
अर्थ · Hindi
दुंदुभि धुनि घन गरजनि घोरा। जाचक चातक दादुर मोरा।।
- RCM 1.347.6Open verse →
सुर सुगन्ध सुचि बरषहिं बारी। सुखी सकल ससि पुर नर नारी।।
अर्थ · Hindi
सुर सुगन्ध सुचि बरषहिं बारी। सुखी सकल ससि पुर नर नारी।।
- RCM 1.347.7Open verse →
समउ जानी गुर आयसु दीन्हा। पुर प्रबेसु रघुकुलमनि कीन्हा।।
अर्थ · Hindi
समउ जानी गुर आयसु दीन्हा। पुर प्रबेसु रघुकुलमनि कीन्हा।।
- RCM 1.347.8Open verse →
सुमिरि संभु गिरजा गनराजा। मुदित महीपति सहित समाजा।।
अर्थ · Hindi
सुमिरि संभु गिरजा गनराजा। मुदित महीपति सहित समाजा।।
- RCM 1.347.9Open verse →
होहिं सगुन बरषहिं सुमन सुर दुंदुभीं बजाइ।
अर्थ · Hindi
होहिं सगुन बरषहिं सुमन सुर दुंदुभीं बजाइ।
- RCM 1.347.10Open verse →
बिबुध बधू नाचहिं मुदित मंजुल मंगल गाइ।।347।।
अर्थ · Hindi
बिबुध बधू नाचहिं मुदित मंजुल मंगल गाइ।।347।।
- RCM 1.348.1Open verse →
मागध सूत बंदि नट नागर। गावहिं जसु तिहु लोक उजागर।।
अर्थ · Hindi
मागध सूत बंदि नट नागर। गावहिं जसु तिहु लोक उजागर।।
- RCM 1.348.2Open verse →
जय धुनि बिमल बेद बर बानी। दस दिसि सुनिअ सुमंगल सानी।।
अर्थ · Hindi
जय धुनि बिमल बेद बर बानी। दस दिसि सुनिअ सुमंगल सानी।।
- RCM 1.348.3Open verse →
बिपुल बाजने बाजन लागे। नभ सुर नगर लोग अनुरागे।।
अर्थ · Hindi
बिपुल बाजने बाजन लागे। नभ सुर नगर लोग अनुरागे।।
- RCM 1.348.4Open verse →
बने बराती बरनि न जाहीं। महा मुदित मन सुख न समाहीं।।
अर्थ · Hindi
बने बराती बरनि न जाहीं। महा मुदित मन सुख न समाहीं।।
- RCM 1.348.5Open verse →
पुरबासिन्ह तब राय जोहारे। देखत रामहि भए सुखारे।।
अर्थ · Hindi
पुरबासिन्ह तब राय जोहारे। देखत रामहि भए सुखारे।।
- RCM 1.348.6Open verse →
करहिं निछावरि मनिगन चीरा। बारि बिलोचन पुलक सरीरा।।
अर्थ · Hindi
करहिं निछावरि मनिगन चीरा। बारि बिलोचन पुलक सरीरा।।
- RCM 1.348.7Open verse →
आरति करहिं मुदित पुर नारी। हरषहिं निरखि कुँअर बर चारी।।
अर्थ · Hindi
आरति करहिं मुदित पुर नारी। हरषहिं निरखि कुँअर बर चारी।।
- RCM 1.348.8Open verse →
सिबिका सुभग ओहार उघारी। देखि दुलहिनिन्ह होहिं सुखारी।।
अर्थ · Hindi
सिबिका सुभग ओहार उघारी। देखि दुलहिनिन्ह होहिं सुखारी।।
- RCM 1.348.9Open verse →
एहि बिधि सबही देत सुखु आए राजदुआर।
अर्थ · Hindi
एहि बिधि सबही देत सुखु आए राजदुआर।
- RCM 1.348.10Open verse →
मुदित मातु परुछनि करहिं बधुन्ह समेत कुमार।।348।।
अर्थ · Hindi
मुदित मातु परुछनि करहिं बधुन्ह समेत कुमार।।348।।
- RCM 1.349.1Open verse →
करहिं आरती बारहिं बारा। प्रेमु प्रमोदु कहै को पारा।।
अर्थ · Hindi
करहिं आरती बारहिं बारा। प्रेमु प्रमोदु कहै को पारा।।
- RCM 1.349.2Open verse →
भूषन मनि पट नाना जाती।।करही निछावरि अगनित भाँती।।
अर्थ · Hindi
भूषन मनि पट नाना जाती।।करही निछावरि अगनित भाँती।।
- RCM 1.349.3Open verse →
बधुन्ह समेत देखि सुत चारी। परमानंद मगन महतारी।।
अर्थ · Hindi
बधुन्ह समेत देखि सुत चारी। परमानंद मगन महतारी।।
- RCM 1.349.4Open verse →
पुनि पुनि सीय राम छबि देखी।।मुदित सफल जग जीवन लेखी।।
अर्थ · Hindi
पुनि पुनि सीय राम छबि देखी।।मुदित सफल जग जीवन लेखी।।
- RCM 1.349.5Open verse →
सखीं सीय मुख पुनि पुनि चाही। गान करहिं निज सुकृत सराही।।
अर्थ · Hindi
सखीं सीय मुख पुनि पुनि चाही। गान करहिं निज सुकृत सराही।।
- RCM 1.349.6Open verse →
बरषहिं सुमन छनहिं छन देवा। नाचहिं गावहिं लावहिं सेवा।।
अर्थ · Hindi
बरषहिं सुमन छनहिं छन देवा। नाचहिं गावहिं लावहिं सेवा।।
- RCM 1.349.7Open verse →
देखि मनोहर चारिउ जोरीं। सारद उपमा सकल ढँढोरीं।।
अर्थ · Hindi
देखि मनोहर चारिउ जोरीं। सारद उपमा सकल ढँढोरीं।।
- RCM 1.349.8Open verse →
देत न बनहिं निपट लघु लागी। एकटक रहीं रूप अनुरागीं।।
अर्थ · Hindi
देत न बनहिं निपट लघु लागी। एकटक रहीं रूप अनुरागीं।।
- RCM 1.349.9Open verse →
निगम नीति कुल रीति करि अरघ पाँवड़े देत।
अर्थ · Hindi
निगम नीति कुल रीति करि अरघ पाँवड़े देत।
- RCM 1.349.10Open verse →
बधुन्ह सहित सुत परिछि सब चलीं लवाइ निकेत।।349।।
अर्थ · Hindi
बधुन्ह सहित सुत परिछि सब चलीं लवाइ निकेत।।349।।
- RCM 1.350.1Open verse →
चारि सिंघासन सहज सुहाए। जनु मनोज निज हाथ बनाए।।
अर्थ · Hindi
चारि सिंघासन सहज सुहाए। जनु मनोज निज हाथ बनाए।।
- RCM 1.350.2Open verse →
तिन्ह पर कुअँरि कुअँर बैठारे। सादर पाय पुनित पखारे।।
अर्थ · Hindi
तिन्ह पर कुअँरि कुअँर बैठारे। सादर पाय पुनित पखारे।।
- RCM 1.350.3Open verse →
धूप दीप नैबेद बेद बिधि। पूजे बर दुलहिनि मंगलनिधि।।
अर्थ · Hindi
धूप दीप नैबेद बेद बिधि। पूजे बर दुलहिनि मंगलनिधि।।
- RCM 1.350.4Open verse →
बारहिं बार आरती करहीं। ब्यजन चारु चामर सिर ढरहीं।।
अर्थ · Hindi
बारहिं बार आरती करहीं। ब्यजन चारु चामर सिर ढरहीं।।
- RCM 1.350.5Open verse →
बस्तु अनेक निछावर होहीं। भरीं प्रमोद मातु सब सोहीं।।
अर्थ · Hindi
बस्तु अनेक निछावर होहीं। भरीं प्रमोद मातु सब सोहीं।।
- RCM 1.350.6Open verse →
पावा परम तत्व जनु जोगीं। अमृत लहेउ जनु संतत रोगीं।।
अर्थ · Hindi
पावा परम तत्व जनु जोगीं। अमृत लहेउ जनु संतत रोगीं।।
- RCM 1.350.7Open verse →
जनम रंक जनु पारस पावा। अंधहि लोचन लाभु सुहावा।।
अर्थ · Hindi
जनम रंक जनु पारस पावा। अंधहि लोचन लाभु सुहावा।।
- RCM 1.350.8Open verse →
मूक बदन जनु सारद छाई। मानहुँ समर सूर जय पाई।।
अर्थ · Hindi
मूक बदन जनु सारद छाई। मानहुँ समर सूर जय पाई।।
- RCM 1.350.9Open verse →
एहि सुख ते सत कोटि गुन पावहिं मातु अनंदु।।
अर्थ · Hindi
एहि सुख ते सत कोटि गुन पावहिं मातु अनंदु।।
- RCM 1.350.10Open verse →
भाइन्ह सहित बिआहि घर आए रघुकुलचंदु।।350(क)।।
अर्थ · Hindi
भाइन्ह सहित बिआहि घर आए रघुकुलचंदु।।350(क)।।
- RCM 1.350.11Open verse →
लोक रीत जननी करहिं बर दुलहिनि सकुचाहिं।
अर्थ · Hindi
लोक रीत जननी करहिं बर दुलहिनि सकुचाहिं।
- RCM 1.350.12Open verse →
मोदु बिनोदु बिलोकि बड़ रामु मनहिं मुसकाहिं।।350(ख)।।
अर्थ · Hindi
मोदु बिनोदु बिलोकि बड़ रामु मनहिं मुसकाहिं।।350(ख)।।
- RCM 1.351.1Open verse →
देव पितर पूजे बिधि नीकी। पूजीं सकल बासना जी की।।
अर्थ · Hindi
देव पितर पूजे बिधि नीकी। पूजीं सकल बासना जी की।।
- RCM 1.351.2Open verse →
सबहिं बंदि मागहिं बरदाना। भाइन्ह सहित राम कल्याना।।
अर्थ · Hindi
सबहिं बंदि मागहिं बरदाना। भाइन्ह सहित राम कल्याना।।
- RCM 1.351.3Open verse →
अंतरहित सुर आसिष देहीं। मुदित मातु अंचल भरि लेंहीं।।
अर्थ · Hindi
अंतरहित सुर आसिष देहीं। मुदित मातु अंचल भरि लेंहीं।।
- RCM 1.351.4Open verse →
भूपति बोलि बराती लीन्हे। जान बसन मनि भूषन दीन्हे।।
अर्थ · Hindi
भूपति बोलि बराती लीन्हे। जान बसन मनि भूषन दीन्हे।।
- RCM 1.351.5Open verse →
आयसु पाइ राखि उर रामहि। मुदित गए सब निज निज धामहि।।
अर्थ · Hindi
आयसु पाइ राखि उर रामहि। मुदित गए सब निज निज धामहि।।
- RCM 1.351.6Open verse →
पुर नर नारि सकल पहिराए। घर घर बाजन लगे बधाए।।
अर्थ · Hindi
पुर नर नारि सकल पहिराए। घर घर बाजन लगे बधाए।।
- RCM 1.351.7Open verse →
जाचक जन जाचहि जोइ जोई। प्रमुदित राउ देहिं सोइ सोई।।
अर्थ · Hindi
जाचक जन जाचहि जोइ जोई। प्रमुदित राउ देहिं सोइ सोई।।
- RCM 1.351.8Open verse →
सेवक सकल बजनिआ नाना। पूरन किए दान सनमाना।।
अर्थ · Hindi
सेवक सकल बजनिआ नाना। पूरन किए दान सनमाना।।
- RCM 1.351.9Open verse →
देंहिं असीस जोहारि सब गावहिं गुन गन गाथ।
अर्थ · Hindi
देंहिं असीस जोहारि सब गावहिं गुन गन गाथ।
- RCM 1.351.10Open verse →
तब गुर भूसुर सहित गृहँ गवनु कीन्ह नरनाथ।।351।।
अर्थ · Hindi
तब गुर भूसुर सहित गृहँ गवनु कीन्ह नरनाथ।।351।।
- RCM 1.352.1Open verse →
जो बसिष्ठ अनुसासन दीन्ही। लोक बेद बिधि सादर कीन्ही।।
अर्थ · Hindi
जो बसिष्ठ अनुसासन दीन्ही। लोक बेद बिधि सादर कीन्ही।।
- RCM 1.352.2Open verse →
भूसुर भीर देखि सब रानी। सादर उठीं भाग्य बड़ जानी।।
अर्थ · Hindi
भूसुर भीर देखि सब रानी। सादर उठीं भाग्य बड़ जानी।।
- RCM 1.352.3Open verse →
पाय पखारि सकल अन्हवाए। पूजि भली बिधि भूप जेवाँए।।
अर्थ · Hindi
पाय पखारि सकल अन्हवाए। पूजि भली बिधि भूप जेवाँए।।
- RCM 1.352.4Open verse →
आदर दान प्रेम परिपोषे। देत असीस चले मन तोषे।।
अर्थ · Hindi
आदर दान प्रेम परिपोषे। देत असीस चले मन तोषे।।
- RCM 1.352.5Open verse →
बहु बिधि कीन्हि गाधिसुत पूजा। नाथ मोहि सम धन्य न दूजा।।
अर्थ · Hindi
बहु बिधि कीन्हि गाधिसुत पूजा। नाथ मोहि सम धन्य न दूजा।।
- RCM 1.352.6Open verse →
कीन्हि प्रसंसा भूपति भूरी। रानिन्ह सहित लीन्हि पग धूरी।।
अर्थ · Hindi
कीन्हि प्रसंसा भूपति भूरी। रानिन्ह सहित लीन्हि पग धूरी।।
- RCM 1.352.7Open verse →
भीतर भवन दीन्ह बर बासु। मन जोगवत रह नृप रनिवासू।।
अर्थ · Hindi
भीतर भवन दीन्ह बर बासु। मन जोगवत रह नृप रनिवासू।।
- RCM 1.352.8Open verse →
पूजे गुर पद कमल बहोरी। कीन्हि बिनय उर प्रीति न थोरी।।
अर्थ · Hindi
पूजे गुर पद कमल बहोरी। कीन्हि बिनय उर प्रीति न थोरी।।
- RCM 1.352.9Open verse →
बधुन्ह समेत कुमार सब रानिन्ह सहित महीसु।
अर्थ · Hindi
बधुन्ह समेत कुमार सब रानिन्ह सहित महीसु।
- RCM 1.352.10Open verse →
पुनि पुनि बंदत गुर चरन देत असीस मुनीसु।।352।।
अर्थ · Hindi
पुनि पुनि बंदत गुर चरन देत असीस मुनीसु।।352।।
- RCM 1.353.1Open verse →
बिनय कीन्हि उर अति अनुरागें। सुत संपदा राखि सब आगें।।
अर्थ · Hindi
बिनय कीन्हि उर अति अनुरागें। सुत संपदा राखि सब आगें।।
- RCM 1.353.2Open verse →
नेगु मागि मुनिनायक लीन्हा। आसिरबादु बहुत बिधि दीन्हा।।
अर्थ · Hindi
नेगु मागि मुनिनायक लीन्हा। आसिरबादु बहुत बिधि दीन्हा।।
- RCM 1.353.3Open verse →
उर धरि रामहि सीय समेता। हरषि कीन्ह गुर गवनु निकेता।।
अर्थ · Hindi
उर धरि रामहि सीय समेता। हरषि कीन्ह गुर गवनु निकेता।।
- RCM 1.353.4Open verse →
बिप्रबधू सब भूप बोलाई। चैल चारु भूषन पहिराई।।
अर्थ · Hindi
बिप्रबधू सब भूप बोलाई। चैल चारु भूषन पहिराई।।
- RCM 1.353.5Open verse →
बहुरि बोलाइ सुआसिनि लीन्हीं। रुचि बिचारि पहिरावनि दीन्हीं।।
अर्थ · Hindi
बहुरि बोलाइ सुआसिनि लीन्हीं। रुचि बिचारि पहिरावनि दीन्हीं।।
- RCM 1.353.6Open verse →
नेगी नेग जोग सब लेहीं। रुचि अनुरुप भूपमनि देहीं।।
अर्थ · Hindi
नेगी नेग जोग सब लेहीं। रुचि अनुरुप भूपमनि देहीं।।
- RCM 1.353.7Open verse →
प्रिय पाहुने पूज्य जे जाने। भूपति भली भाँति सनमाने।।
अर्थ · Hindi
प्रिय पाहुने पूज्य जे जाने। भूपति भली भाँति सनमाने।।
- RCM 1.353.8Open verse →
देव देखि रघुबीर बिबाहू। बरषि प्रसून प्रसंसि उछाहू।।
अर्थ · Hindi
देव देखि रघुबीर बिबाहू। बरषि प्रसून प्रसंसि उछाहू।।
- RCM 1.353.9Open verse →
चले निसान बजाइ सुर निज निज पुर सुख पाइ।
अर्थ · Hindi
चले निसान बजाइ सुर निज निज पुर सुख पाइ।
- RCM 1.353.10Open verse →
कहत परसपर राम जसु प्रेम न हृदयँ समाइ।।353।।
अर्थ · Hindi
कहत परसपर राम जसु प्रेम न हृदयँ समाइ।।353।।
- RCM 1.354.1Open verse →
सब बिधि सबहि समदि नरनाहू। रहा हृदयँ भरि पूरि उछाहू।।
अर्थ · Hindi
सब बिधि सबहि समदि नरनाहू। रहा हृदयँ भरि पूरि उछाहू।।
- RCM 1.354.2Open verse →
जहँ रनिवासु तहाँ पगु धारे। सहित बहूटिन्ह कुअँर निहारे।।
अर्थ · Hindi
जहँ रनिवासु तहाँ पगु धारे। सहित बहूटिन्ह कुअँर निहारे।।
- RCM 1.354.3Open verse →
लिए गोद करि मोद समेता। को कहि सकइ भयउ सुखु जेता।।
अर्थ · Hindi
लिए गोद करि मोद समेता। को कहि सकइ भयउ सुखु जेता।।
- RCM 1.354.4Open verse →
बधू सप्रेम गोद बैठारीं। बार बार हियँ हरषि दुलारीं।।
अर्थ · Hindi
बधू सप्रेम गोद बैठारीं। बार बार हियँ हरषि दुलारीं।।
- RCM 1.354.5Open verse →
देखि समाजु मुदित रनिवासू। सब कें उर अनंद कियो बासू।।
अर्थ · Hindi
देखि समाजु मुदित रनिवासू। सब कें उर अनंद कियो बासू।।
- RCM 1.354.6Open verse →
कहेउ भूप जिमि भयउ बिबाहू। सुनि हरषु होत सब काहू।।
अर्थ · Hindi
कहेउ भूप जिमि भयउ बिबाहू। सुनि हरषु होत सब काहू।।
- RCM 1.354.7Open verse →
जनक राज गुन सीलु बड़ाई। प्रीति रीति संपदा सुहाई।।
अर्थ · Hindi
जनक राज गुन सीलु बड़ाई। प्रीति रीति संपदा सुहाई।।
- RCM 1.354.8Open verse →
बहुबिधि भूप भाट जिमि बरनी। रानीं सब प्रमुदित सुनि करनी।।
अर्थ · Hindi
बहुबिधि भूप भाट जिमि बरनी। रानीं सब प्रमुदित सुनि करनी।।
- RCM 1.354.9Open verse →
सुतन्ह समेत नहाइ नृप बोलि बिप्र गुर ग्याति।
अर्थ · Hindi
सुतन्ह समेत नहाइ नृप बोलि बिप्र गुर ग्याति।
- RCM 1.354.10Open verse →
भोजन कीन्ह अनेक बिधि घरी पंच गइ राति।।354।।
अर्थ · Hindi
भोजन कीन्ह अनेक बिधि घरी पंच गइ राति।।354।।
- RCM 1.355.1Open verse →
मंगलगान करहिं बर भामिनि। भै सुखमूल मनोहर जामिनि।।
अर्थ · Hindi
मंगलगान करहिं बर भामिनि। भै सुखमूल मनोहर जामिनि।।
- RCM 1.355.2Open verse →
अँचइ पान सब काहूँ पाए। स्त्रग सुगंध भूषित छबि छाए।।
अर्थ · Hindi
अँचइ पान सब काहूँ पाए। स्त्रग सुगंध भूषित छबि छाए।।
- RCM 1.355.3Open verse →
रामहि देखि रजायसु पाई। निज निज भवन चले सिर नाई।।
अर्थ · Hindi
रामहि देखि रजायसु पाई। निज निज भवन चले सिर नाई।।
- RCM 1.355.4Open verse →
प्रेम प्रमोद बिनोदु बढ़ाई। समउ समाजु मनोहरताई।।
अर्थ · Hindi
प्रेम प्रमोद बिनोदु बढ़ाई। समउ समाजु मनोहरताई।।
- RCM 1.355.5Open verse →
कहि न सकहि सत सारद सेसू। बेद बिरंचि महेस गनेसू।।
अर्थ · Hindi
कहि न सकहि सत सारद सेसू। बेद बिरंचि महेस गनेसू।।
- RCM 1.355.6Open verse →
सो मै कहौं कवन बिधि बरनी। भूमिनागु सिर धरइ कि धरनी।।
अर्थ · Hindi
सो मै कहौं कवन बिधि बरनी। भूमिनागु सिर धरइ कि धरनी।।
- RCM 1.355.7Open verse →
नृप सब भाँति सबहि सनमानी। कहि मृदु बचन बोलाई रानी।।
अर्थ · Hindi
नृप सब भाँति सबहि सनमानी। कहि मृदु बचन बोलाई रानी।।
- RCM 1.355.8Open verse →
बधू लरिकनीं पर घर आईं। राखेहु नयन पलक की नाई।।
अर्थ · Hindi
बधू लरिकनीं पर घर आईं। राखेहु नयन पलक की नाई।।
- RCM 1.355.9Open verse →
लरिका श्रमित उनीद बस सयन करावहु जाइ।
अर्थ · Hindi
लरिका श्रमित उनीद बस सयन करावहु जाइ।
- RCM 1.355.10Open verse →
अस कहि गे बिश्रामगृहँ राम चरन चितु लाइ।।355।।
अर्थ · Hindi
अस कहि गे बिश्रामगृहँ राम चरन चितु लाइ।।355।।
- RCM 1.356.1Open verse →
भूप बचन सुनि सहज सुहाए। जरित कनक मनि पलँग डसाए।।
अर्थ · Hindi
भूप बचन सुनि सहज सुहाए। जरित कनक मनि पलँग डसाए।।
- RCM 1.356.2Open verse →
सुभग सुरभि पय फेन समाना। कोमल कलित सुपेतीं नाना।।
अर्थ · Hindi
सुभग सुरभि पय फेन समाना। कोमल कलित सुपेतीं नाना।।
- RCM 1.356.3Open verse →
उपबरहन बर बरनि न जाहीं। स्त्रग सुगंध मनिमंदिर माहीं।।
अर्थ · Hindi
उपबरहन बर बरनि न जाहीं। स्त्रग सुगंध मनिमंदिर माहीं।।
- RCM 1.356.4Open verse →
रतनदीप सुठि चारु चँदोवा। कहत न बनइ जान जेहिं जोवा।।
अर्थ · Hindi
रतनदीप सुठि चारु चँदोवा। कहत न बनइ जान जेहिं जोवा।।
- RCM 1.356.5Open verse →
सेज रुचिर रचि रामु उठाए। प्रेम समेत पलँग पौढ़ाए।।
अर्थ · Hindi
सेज रुचिर रचि रामु उठाए। प्रेम समेत पलँग पौढ़ाए।।
- RCM 1.356.6Open verse →
अग्या पुनि पुनि भाइन्ह दीन्ही। निज निज सेज सयन तिन्ह कीन्ही।।
अर्थ · Hindi
अग्या पुनि पुनि भाइन्ह दीन्ही। निज निज सेज सयन तिन्ह कीन्ही।।
- RCM 1.356.7Open verse →
देखि स्याम मृदु मंजुल गाता। कहहिं सप्रेम बचन सब माता।।
अर्थ · Hindi
देखि स्याम मृदु मंजुल गाता। कहहिं सप्रेम बचन सब माता।।
- RCM 1.356.8Open verse →
मारग जात भयावनि भारी। केहि बिधि तात ताड़का मारी।।
अर्थ · Hindi
मारग जात भयावनि भारी। केहि बिधि तात ताड़का मारी।।
- RCM 1.356.9Open verse →
घोर निसाचर बिकट भट समर गनहिं नहिं काहु।।
अर्थ · Hindi
घोर निसाचर बिकट भट समर गनहिं नहिं काहु।।
- RCM 1.356.10Open verse →
मारे सहित सहाय किमि खल मारीच सुबाहु।।356।।
अर्थ · Hindi
मारे सहित सहाय किमि खल मारीच सुबाहु।।356।।
- RCM 1.357.1Open verse →
मुनि प्रसाद बलि तात तुम्हारी। ईस अनेक करवरें टारी।।
अर्थ · Hindi
मुनि प्रसाद बलि तात तुम्हारी। ईस अनेक करवरें टारी।।
- RCM 1.357.2Open verse →
मख रखवारी करि दुहुँ भाई। गुरु प्रसाद सब बिद्या पाई।।
अर्थ · Hindi
मख रखवारी करि दुहुँ भाई। गुरु प्रसाद सब बिद्या पाई।।
- RCM 1.357.3Open verse →
मुनितय तरी लगत पग धूरी। कीरति रही भुवन भरि पूरी।।
अर्थ · Hindi
मुनितय तरी लगत पग धूरी। कीरति रही भुवन भरि पूरी।।
- RCM 1.357.4Open verse →
कमठ पीठि पबि कूट कठोरा। नृप समाज महुँ सिव धनु तोरा।।
अर्थ · Hindi
कमठ पीठि पबि कूट कठोरा। नृप समाज महुँ सिव धनु तोरा।।
- RCM 1.357.5Open verse →
बिस्व बिजय जसु जानकि पाई। आए भवन ब्याहि सब भाई।।
अर्थ · Hindi
बिस्व बिजय जसु जानकि पाई। आए भवन ब्याहि सब भाई।।
- RCM 1.357.6Open verse →
सकल अमानुष करम तुम्हारे। केवल कौसिक कृपाँ सुधारे।।
अर्थ · Hindi
सकल अमानुष करम तुम्हारे। केवल कौसिक कृपाँ सुधारे।।
- RCM 1.357.7Open verse →
आजु सुफल जग जनमु हमारा। देखि तात बिधुबदन तुम्हारा।।
अर्थ · Hindi
आजु सुफल जग जनमु हमारा। देखि तात बिधुबदन तुम्हारा।।
- RCM 1.357.8Open verse →
जे दिन गए तुम्हहि बिनु देखें। ते बिरंचि जनि पारहिं लेखें।।
अर्थ · Hindi
जे दिन गए तुम्हहि बिनु देखें। ते बिरंचि जनि पारहिं लेखें।।
- RCM 1.357.9Open verse →
राम प्रतोषीं मातु सब कहि बिनीत बर बैन।
अर्थ · Hindi
राम प्रतोषीं मातु सब कहि बिनीत बर बैन।
- RCM 1.357.10Open verse →
सुमिरि संभु गुर बिप्र पद किए नीदबस नैन।।357।।
अर्थ · Hindi
सुमिरि संभु गुर बिप्र पद किए नीदबस नैन।।357।।
- RCM 1.358.1Open verse →
नीदउँ बदन सोह सुठि लोना। मनहुँ साँझ सरसीरुह सोना।।
अर्थ · Hindi
नीदउँ बदन सोह सुठि लोना। मनहुँ साँझ सरसीरुह सोना।।
- RCM 1.358.2Open verse →
घर घर करहिं जागरन नारीं। देहिं परसपर मंगल गारीं।।
अर्थ · Hindi
घर घर करहिं जागरन नारीं। देहिं परसपर मंगल गारीं।।
- RCM 1.358.3Open verse →
पुरी बिराजति राजति रजनी। रानीं कहहिं बिलोकहु सजनी।।
अर्थ · Hindi
पुरी बिराजति राजति रजनी। रानीं कहहिं बिलोकहु सजनी।।
- RCM 1.358.4Open verse →
सुंदर बधुन्ह सासु लै सोई। फनिकन्ह जनु सिरमनि उर गोई।।
अर्थ · Hindi
सुंदर बधुन्ह सासु लै सोई। फनिकन्ह जनु सिरमनि उर गोई।।
- RCM 1.358.5Open verse →
प्रात पुनीत काल प्रभु जागे। अरुनचूड़ बर बोलन लागे।।
अर्थ · Hindi
प्रात पुनीत काल प्रभु जागे। अरुनचूड़ बर बोलन लागे।।
- RCM 1.358.6Open verse →
बंदि मागधन्हि गुनगन गाए। पुरजन द्वार जोहारन आए।।
अर्थ · Hindi
बंदि मागधन्हि गुनगन गाए। पुरजन द्वार जोहारन आए।।
- RCM 1.358.7Open verse →
बंदि बिप्र सुर गुर पितु माता। पाइ असीस मुदित सब भ्राता।।
अर्थ · Hindi
बंदि बिप्र सुर गुर पितु माता। पाइ असीस मुदित सब भ्राता।।
- RCM 1.358.8Open verse →
जननिन्ह सादर बदन निहारे। भूपति संग द्वार पगु धारे।।
अर्थ · Hindi
जननिन्ह सादर बदन निहारे। भूपति संग द्वार पगु धारे।।
- RCM 1.358.9Open verse →
कीन्ह सौच सब सहज सुचि सरित पुनीत नहाइ।
अर्थ · Hindi
कीन्ह सौच सब सहज सुचि सरित पुनीत नहाइ।
- RCM 1.358.10Open verse →
प्रातक्रिया करि तात पहिं आए चारिउ भाइ।।358।।
अर्थ · Hindi
प्रातक्रिया करि तात पहिं आए चारिउ भाइ।।358।।
- RCM 1.359.1Open verse →
भूप बिलोकि लिए उर लाई। बैठै हरषि रजायसु पाई।।
अर्थ · Hindi
भूप बिलोकि लिए उर लाई। बैठै हरषि रजायसु पाई।।
- RCM 1.359.2Open verse →
देखि रामु सब सभा जुड़ानी। लोचन लाभ अवधि अनुमानी।।
अर्थ · Hindi
देखि रामु सब सभा जुड़ानी। लोचन लाभ अवधि अनुमानी।।
- RCM 1.359.3Open verse →
पुनि बसिष्टु मुनि कौसिक आए। सुभग आसनन्हि मुनि बैठाए।।
अर्थ · Hindi
पुनि बसिष्टु मुनि कौसिक आए। सुभग आसनन्हि मुनि बैठाए।।
- RCM 1.359.4Open verse →
सुतन्ह समेत पूजि पद लागे। निरखि रामु दोउ गुर अनुरागे।।
अर्थ · Hindi
सुतन्ह समेत पूजि पद लागे। निरखि रामु दोउ गुर अनुरागे।।
- RCM 1.359.5Open verse →
कहहिं बसिष्टु धरम इतिहासा। सुनहिं महीसु सहित रनिवासा।।
अर्थ · Hindi
कहहिं बसिष्टु धरम इतिहासा। सुनहिं महीसु सहित रनिवासा।।
- RCM 1.359.6Open verse →
मुनि मन अगम गाधिसुत करनी। मुदित बसिष्ट बिपुल बिधि बरनी।।
अर्थ · Hindi
मुनि मन अगम गाधिसुत करनी। मुदित बसिष्ट बिपुल बिधि बरनी।।
- RCM 1.359.7Open verse →
बोले बामदेउ सब साँची। कीरति कलित लोक तिहुँ माची।।
अर्थ · Hindi
बोले बामदेउ सब साँची। कीरति कलित लोक तिहुँ माची।।
- RCM 1.359.8Open verse →
सुनि आनंदु भयउ सब काहू। राम लखन उर अधिक उछाहू।।
अर्थ · Hindi
सुनि आनंदु भयउ सब काहू। राम लखन उर अधिक उछाहू।।
- RCM 1.359.9Open verse →
मंगल मोद उछाह नित जाहिं दिवस एहि भाँति।
अर्थ · Hindi
मंगल मोद उछाह नित जाहिं दिवस एहि भाँति।
- RCM 1.359.10Open verse →
उमगी अवध अनंद भरि अधिक अधिक अधिकाति।।359।।
अर्थ · Hindi
उमगी अवध अनंद भरि अधिक अधिक अधिकाति।।359।।
- RCM 1.360.1Open verse →
सुदिन सोधि कल कंकन छौरे। मंगल मोद बिनोद न थोरे।।
अर्थ · Hindi
सुदिन सोधि कल कंकन छौरे। मंगल मोद बिनोद न थोरे।।
- RCM 1.360.2Open verse →
नित नव सुखु सुर देखि सिहाहीं। अवध जन्म जाचहिं बिधि पाहीं।।
अर्थ · Hindi
नित नव सुखु सुर देखि सिहाहीं। अवध जन्म जाचहिं बिधि पाहीं।।
- RCM 1.360.3Open verse →
बिस्वामित्रु चलन नित चहहीं। राम सप्रेम बिनय बस रहहीं।।
अर्थ · Hindi
बिस्वामित्रु चलन नित चहहीं। राम सप्रेम बिनय बस रहहीं।।
- RCM 1.360.4Open verse →
दिन दिन सयगुन भूपति भाऊ। देखि सराह महामुनिराऊ।।
अर्थ · Hindi
दिन दिन सयगुन भूपति भाऊ। देखि सराह महामुनिराऊ।।
- RCM 1.360.5Open verse →
मागत बिदा राउ अनुरागे। सुतन्ह समेत ठाढ़ भे आगे।।
अर्थ · Hindi
मागत बिदा राउ अनुरागे। सुतन्ह समेत ठाढ़ भे आगे।।
- RCM 1.360.6Open verse →
नाथ सकल संपदा तुम्हारी। मैं सेवकु समेत सुत नारी।।
अर्थ · Hindi
नाथ सकल संपदा तुम्हारी। मैं सेवकु समेत सुत नारी।।
- RCM 1.360.7Open verse →
करब सदा लरिकनः पर छोहू। दरसन देत रहब मुनि मोहू।।
अर्थ · Hindi
करब सदा लरिकनः पर छोहू। दरसन देत रहब मुनि मोहू।।
- RCM 1.360.8Open verse →
अस कहि राउ सहित सुत रानी। परेउ चरन मुख आव न बानी।।
अर्थ · Hindi
अस कहि राउ सहित सुत रानी। परेउ चरन मुख आव न बानी।।
- RCM 1.360.9Open verse →
दीन्ह असीस बिप्र बहु भाँती। चले न प्रीति रीति कहि जाती।।
अर्थ · Hindi
दीन्ह असीस बिप्र बहु भाँती। चले न प्रीति रीति कहि जाती।।
- RCM 1.360.10Open verse →
रामु सप्रेम संग सब भाई। आयसु पाइ फिरे पहुँचाई।।
अर्थ · Hindi
रामु सप्रेम संग सब भाई। आयसु पाइ फिरे पहुँचाई।।
- RCM 1.360.11Open verse →
राम रूपु भूपति भगति ब्याहु उछाहु अनंदु।
अर्थ · Hindi
राम रूपु भूपति भगति ब्याहु उछाहु अनंदु।
- RCM 1.360.12Open verse →
जात सराहत मनहिं मन मुदित गाधिकुलचंदु।।360।।
अर्थ · Hindi
जात सराहत मनहिं मन मुदित गाधिकुलचंदु।।360।।
- RCM 1.361.1Open verse →
बामदेव रघुकुल गुर ग्यानी। बहुरि गाधिसुत कथा बखानी।।
अर्थ · Hindi
बामदेव रघुकुल गुर ग्यानी। बहुरि गाधिसुत कथा बखानी।।
- RCM 1.361.2Open verse →
सुनि मुनि सुजसु मनहिं मन राऊ। बरनत आपन पुन्य प्रभाऊ।।
अर्थ · Hindi
सुनि मुनि सुजसु मनहिं मन राऊ। बरनत आपन पुन्य प्रभाऊ।।
- RCM 1.361.3Open verse →
बहुरे लोग रजायसु भयऊ। सुतन्ह समेत नृपति गृहँ गयऊ।।
अर्थ · Hindi
बहुरे लोग रजायसु भयऊ। सुतन्ह समेत नृपति गृहँ गयऊ।।
- RCM 1.361.4Open verse →
जहँ तहँ राम ब्याहु सबु गावा। सुजसु पुनीत लोक तिहुँ छावा।।
अर्थ · Hindi
जहँ तहँ राम ब्याहु सबु गावा। सुजसु पुनीत लोक तिहुँ छावा।।
- RCM 1.361.5Open verse →
आए ब्याहि रामु घर जब तें। बसइ अनंद अवध सब तब तें।।
अर्थ · Hindi
आए ब्याहि रामु घर जब तें। बसइ अनंद अवध सब तब तें।।
- RCM 1.361.6Open verse →
प्रभु बिबाहँ जस भयउ उछाहू। सकहिं न बरनि गिरा अहिनाहू।।
अर्थ · Hindi
प्रभु बिबाहँ जस भयउ उछाहू। सकहिं न बरनि गिरा अहिनाहू।।
- RCM 1.361.7Open verse →
कबिकुल जीवनु पावन जानी।।राम सीय जसु मंगल खानी।।
अर्थ · Hindi
कबिकुल जीवनु पावन जानी।।राम सीय जसु मंगल खानी।।
- RCM 1.361.8Open verse →
तेहि ते मैं कछु कहा बखानी। करन पुनीत हेतु निज बानी।।
अर्थ · Hindi
तेहि ते मैं कछु कहा बखानी। करन पुनीत हेतु निज बानी।।