Sant Seva ParishadSant Seva ParishadSSP · sant seva

Ramcharitmanas · Chapter 2

Ayodhya Kanda

अयोध्याकाण्ड

Kaikeyi's boon, Rama's exile, Bharata's pilgrimage to Chitrakoot.

3231 verses

📖 Book View
  1. RCM 2.1.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जब तें रामु ब्याहि घर आए। नित नव मंगल मोद बधाए।।

    अर्थ (Hindi)

    जब तें रामु ब्याहि घर आए। नित नव मंगल मोद बधाए।।

  2. RCM 2.1.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भुवन चारिदस भूधर भारी। सुकृत मेघ बरषहि सुख बारी।।

    अर्थ (Hindi)

    भुवन चारिदस भूधर भारी। सुकृत मेघ बरषहि सुख बारी।।

  3. RCM 2.1.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    रिधि सिधि संपति नदीं सुहाई। उमगि अवध अंबुधि कहुँ आई।।

    अर्थ (Hindi)

    रिधि सिधि संपति नदीं सुहाई। उमगि अवध अंबुधि कहुँ आई।।

  4. RCM 2.1.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मनिगन पुर नर नारि सुजाती। सुचि अमोल सुंदर सब भाँती।।

    अर्थ (Hindi)

    मनिगन पुर नर नारि सुजाती। सुचि अमोल सुंदर सब भाँती।।

  5. RCM 2.1.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कहि न जाइ कछु नगर बिभूती। जनु एतनिअ बिरंचि करतूती।।

    अर्थ (Hindi)

    कहि न जाइ कछु नगर बिभूती। जनु एतनिअ बिरंचि करतूती।।

  6. RCM 2.1.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सब बिधि सब पुर लोग सुखारी। रामचंद मुख चंदु निहारी।।

    अर्थ (Hindi)

    सब बिधि सब पुर लोग सुखारी। रामचंद मुख चंदु निहारी।।

  7. RCM 2.1.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मुदित मातु सब सखीं सहेली। फलित बिलोकि मनोरथ बेली।।

    अर्थ (Hindi)

    मुदित मातु सब सखीं सहेली। फलित बिलोकि मनोरथ बेली।।

  8. RCM 2.1.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राम रूपु गुनसीलु सुभाऊ। प्रमुदित होइ देखि सुनि राऊ।।

    अर्थ (Hindi)

    राम रूपु गुनसीलु सुभाऊ। प्रमुदित होइ देखि सुनि राऊ।।

  9. RCM 2.1.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सब कें उर अभिलाषु अस कहहिं मनाइ महेसु।

    अर्थ (Hindi)

    सब कें उर अभिलाषु अस कहहिं मनाइ महेसु।

  10. RCM 2.1.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    आप अछत जुबराज पद रामहि देउ नरेसु।।1।।

    अर्थ (Hindi)

    आप अछत जुबराज पद रामहि देउ नरेसु।।1।।

  11. RCM 2.2.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    एक समय सब सहित समाजा। राजसभाँ रघुराजु बिराजा।।

    अर्थ (Hindi)

    एक समय सब सहित समाजा। राजसभाँ रघुराजु बिराजा।।

  12. RCM 2.2.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सकल सुकृत मूरति नरनाहू। राम सुजसु सुनि अतिहि उछाहू।।

    अर्थ (Hindi)

    सकल सुकृत मूरति नरनाहू। राम सुजसु सुनि अतिहि उछाहू।।

  13. RCM 2.2.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नृप सब रहहिं कृपा अभिलाषें। लोकप करहिं प्रीति रुख राखें।।

    अर्थ (Hindi)

    नृप सब रहहिं कृपा अभिलाषें। लोकप करहिं प्रीति रुख राखें।।

  14. RCM 2.2.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तिभुवन तीनि काल जग माहीं। भूरि भाग दसरथ सम नाहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    तिभुवन तीनि काल जग माहीं। भूरि भाग दसरथ सम नाहीं।।

  15. RCM 2.2.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मंगलमूल रामु सुत जासू। जो कछु कहिज थोर सबु तासू।।

    अर्थ (Hindi)

    मंगलमूल रामु सुत जासू। जो कछु कहिज थोर सबु तासू।।

  16. RCM 2.2.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    रायँ सुभायँ मुकुरु कर लीन्हा। बदनु बिलोकि मुकुट सम कीन्हा।।

    अर्थ (Hindi)

    रायँ सुभायँ मुकुरु कर लीन्हा। बदनु बिलोकि मुकुट सम कीन्हा।।

  17. RCM 2.2.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    श्रवन समीप भए सित केसा। मनहुँ जरठपनु अस उपदेसा।।

    अर्थ (Hindi)

    श्रवन समीप भए सित केसा। मनहुँ जरठपनु अस उपदेसा।।

  18. RCM 2.2.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नृप जुबराज राम कहुँ देहू। जीवन जनम लाहु किन लेहू।।

    अर्थ (Hindi)

    नृप जुबराज राम कहुँ देहू। जीवन जनम लाहु किन लेहू।।

  19. RCM 2.2.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    यह बिचारु उर आनि नृप सुदिनु सुअवसरु पाइ।

    अर्थ (Hindi)

    यह बिचारु उर आनि नृप सुदिनु सुअवसरु पाइ।

  20. RCM 2.2.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    प्रेम पुलकि तन मुदित मन गुरहि सुनायउ जाइ।।2।।

    अर्थ (Hindi)

    प्रेम पुलकि तन मुदित मन गुरहि सुनायउ जाइ।।2।।

  21. RCM 2.3.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कहइ भुआलु सुनिअ मुनिनायक। भए राम सब बिधि सब लायक।।

    अर्थ (Hindi)

    कहइ भुआलु सुनिअ मुनिनायक। भए राम सब बिधि सब लायक।।

  22. RCM 2.3.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सेवक सचिव सकल पुरबासी। जे हमारे अरि मित्र उदासी।।

    अर्थ (Hindi)

    सेवक सचिव सकल पुरबासी। जे हमारे अरि मित्र उदासी।।

  23. RCM 2.3.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सबहि रामु प्रिय जेहि बिधि मोही। प्रभु असीस जनु तनु धरि सोही।।

    अर्थ (Hindi)

    सबहि रामु प्रिय जेहि बिधि मोही। प्रभु असीस जनु तनु धरि सोही।।

  24. RCM 2.3.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बिप्र सहित परिवार गोसाईं। करहिं छोहु सब रौरिहि नाई।।

    अर्थ (Hindi)

    बिप्र सहित परिवार गोसाईं। करहिं छोहु सब रौरिहि नाई।।

  25. RCM 2.3.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जे गुर चरन रेनु सिर धरहीं। ते जनु सकल बिभव बस करहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    जे गुर चरन रेनु सिर धरहीं। ते जनु सकल बिभव बस करहीं।।

  26. RCM 2.3.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मोहि सम यहु अनुभयउ न दूजें। सबु पायउँ रज पावनि पूजें।।

    अर्थ (Hindi)

    मोहि सम यहु अनुभयउ न दूजें। सबु पायउँ रज पावनि पूजें।।

  27. RCM 2.3.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अब अभिलाषु एकु मन मोरें। पूजहि नाथ अनुग्रह तोरें।।

    अर्थ (Hindi)

    अब अभिलाषु एकु मन मोरें। पूजहि नाथ अनुग्रह तोरें।।

  28. RCM 2.3.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मुनि प्रसन्न लखि सहज सनेहू। कहेउ नरेस रजायसु देहू।।

    अर्थ (Hindi)

    मुनि प्रसन्न लखि सहज सनेहू। कहेउ नरेस रजायसु देहू।।

  29. RCM 2.3.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राजन राउर नामु जसु सब अभिमत दातार।

    अर्थ (Hindi)

    राजन राउर नामु जसु सब अभिमत दातार।

  30. RCM 2.3.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    फल अनुगामी महिप मनि मन अभिलाषु तुम्हार।।3।।

    अर्थ (Hindi)

    फल अनुगामी महिप मनि मन अभिलाषु तुम्हार।।3।।

  31. RCM 2.4.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सब बिधि गुरु प्रसन्न जियँ जानी। बोलेउ राउ रहँसि मृदु बानी।।

    अर्थ (Hindi)

    सब बिधि गुरु प्रसन्न जियँ जानी। बोलेउ राउ रहँसि मृदु बानी।।

  32. RCM 2.4.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नाथ रामु करिअहिं जुबराजू। कहिअ कृपा करि करिअ समाजू।।

    अर्थ (Hindi)

    नाथ रामु करिअहिं जुबराजू। कहिअ कृपा करि करिअ समाजू।।

  33. RCM 2.4.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मोहि अछत यहु होइ उछाहू। लहहिं लोग सब लोचन लाहू।।

    अर्थ (Hindi)

    मोहि अछत यहु होइ उछाहू। लहहिं लोग सब लोचन लाहू।।

  34. RCM 2.4.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    प्रभु प्रसाद सिव सबइ निबाहीं। यह लालसा एक मन माहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    प्रभु प्रसाद सिव सबइ निबाहीं। यह लालसा एक मन माहीं।।

  35. RCM 2.4.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पुनि न सोच तनु रहउ कि जाऊ। जेहिं न होइ पाछें पछिताऊ।।

    अर्थ (Hindi)

    पुनि न सोच तनु रहउ कि जाऊ। जेहिं न होइ पाछें पछिताऊ।।

  36. RCM 2.4.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनि मुनि दसरथ बचन सुहाए। मंगल मोद मूल मन भाए।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनि मुनि दसरथ बचन सुहाए। मंगल मोद मूल मन भाए।।

  37. RCM 2.4.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनु नृप जासु बिमुख पछिताहीं। जासु भजन बिनु जरनि न जाहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनु नृप जासु बिमुख पछिताहीं। जासु भजन बिनु जरनि न जाहीं।।

  38. RCM 2.4.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भयउ तुम्हार तनय सोइ स्वामी। रामु पुनीत प्रेम अनुगामी।।

    अर्थ (Hindi)

    भयउ तुम्हार तनय सोइ स्वामी। रामु पुनीत प्रेम अनुगामी।।

  39. RCM 2.4.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बेगि बिलंबु न करिअ नृप साजिअ सबुइ समाजु।

    अर्थ (Hindi)

    बेगि बिलंबु न करिअ नृप साजिअ सबुइ समाजु।

  40. RCM 2.4.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुदिन सुमंगलु तबहिं जब रामु होहिं जुबराजु।।4।।

    अर्थ (Hindi)

    सुदिन सुमंगलु तबहिं जब रामु होहिं जुबराजु।।4।।

  41. RCM 2.5.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मुदित महिपति मंदिर आए। सेवक सचिव सुमंत्रु बोलाए।।

    अर्थ (Hindi)

    मुदित महिपति मंदिर आए। सेवक सचिव सुमंत्रु बोलाए।।

  42. RCM 2.5.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कहि जयजीव सीस तिन्ह नाए। भूप सुमंगल बचन सुनाए।।

    अर्थ (Hindi)

    कहि जयजीव सीस तिन्ह नाए। भूप सुमंगल बचन सुनाए।।

  43. RCM 2.5.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जौं पाँचहि मत लागै नीका। करहु हरषि हियँ रामहि टीका।।

    अर्थ (Hindi)

    जौं पाँचहि मत लागै नीका। करहु हरषि हियँ रामहि टीका।।

  44. RCM 2.5.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मंत्री मुदित सुनत प्रिय बानी। अभिमत बिरवँ परेउ जनु पानी।।

    अर्थ (Hindi)

    मंत्री मुदित सुनत प्रिय बानी। अभिमत बिरवँ परेउ जनु पानी।।

  45. RCM 2.5.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बिनती सचिव करहि कर जोरी। जिअहु जगतपति बरिस करोरी।।

    अर्थ (Hindi)

    बिनती सचिव करहि कर जोरी। जिअहु जगतपति बरिस करोरी।।

  46. RCM 2.5.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जग मंगल भल काजु बिचारा। बेगिअ नाथ न लाइअ बारा।।

    अर्थ (Hindi)

    जग मंगल भल काजु बिचारा। बेगिअ नाथ न लाइअ बारा।।

  47. RCM 2.5.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नृपहि मोदु सुनि सचिव सुभाषा। बढ़त बौंड़ जनु लही सुसाखा।।

    अर्थ (Hindi)

    नृपहि मोदु सुनि सचिव सुभाषा। बढ़त बौंड़ जनु लही सुसाखा।।

  48. RCM 2.5.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कहेउ भूप मुनिराज कर जोइ जोइ आयसु होइ।

    अर्थ (Hindi)

    कहेउ भूप मुनिराज कर जोइ जोइ आयसु होइ।

  49. RCM 2.5.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राम राज अभिषेक हित बेगि करहु सोइ सोइ।।5।।

    अर्थ (Hindi)

    राम राज अभिषेक हित बेगि करहु सोइ सोइ।।5।।

  50. RCM 2.6.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    हरषि मुनीस कहेउ मृदु बानी। आनहु सकल सुतीरथ पानी।।

    अर्थ (Hindi)

    हरषि मुनीस कहेउ मृदु बानी। आनहु सकल सुतीरथ पानी।।

  51. RCM 2.6.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    औषध मूल फूल फल पाना। कहे नाम गनि मंगल नाना।।

    अर्थ (Hindi)

    औषध मूल फूल फल पाना। कहे नाम गनि मंगल नाना।।

  52. RCM 2.6.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    चामर चरम बसन बहु भाँती। रोम पाट पट अगनित जाती।।

    अर्थ (Hindi)

    चामर चरम बसन बहु भाँती। रोम पाट पट अगनित जाती।।

  53. RCM 2.6.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मनिगन मंगल बस्तु अनेका। जो जग जोगु भूप अभिषेका।।

    अर्थ (Hindi)

    मनिगन मंगल बस्तु अनेका। जो जग जोगु भूप अभिषेका।।

  54. RCM 2.6.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बेद बिदित कहि सकल बिधाना। कहेउ रचहु पुर बिबिध बिताना।।

    अर्थ (Hindi)

    बेद बिदित कहि सकल बिधाना। कहेउ रचहु पुर बिबिध बिताना।।

  55. RCM 2.6.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सफल रसाल पूगफल केरा। रोपहु बीथिन्ह पुर चहुँ फेरा।।

    अर्थ (Hindi)

    सफल रसाल पूगफल केरा। रोपहु बीथिन्ह पुर चहुँ फेरा।।

  56. RCM 2.6.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    रचहु मंजु मनि चौकें चारू। कहहु बनावन बेगि बजारू।।

    अर्थ (Hindi)

    रचहु मंजु मनि चौकें चारू। कहहु बनावन बेगि बजारू।।

  57. RCM 2.6.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पूजहु गनपति गुर कुलदेवा। सब बिधि करहु भूमिसुर सेवा।।

    अर्थ (Hindi)

    पूजहु गनपति गुर कुलदेवा। सब बिधि करहु भूमिसुर सेवा।।

  58. RCM 2.6.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    ध्वज पताक तोरन कलस सजहु तुरग रथ नाग।

    अर्थ (Hindi)

    ध्वज पताक तोरन कलस सजहु तुरग रथ नाग।

  59. RCM 2.6.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सिर धरि मुनिबर बचन सबु निज निज काजहिं लाग।।6।।

    अर्थ (Hindi)

    सिर धरि मुनिबर बचन सबु निज निज काजहिं लाग।।6।।

  60. RCM 2.7.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जो मुनीस जेहि आयसु दीन्हा। सो तेहिं काजु प्रथम जनु कीन्हा।।

    अर्थ (Hindi)

    जो मुनीस जेहि आयसु दीन्हा। सो तेहिं काजु प्रथम जनु कीन्हा।।

  61. RCM 2.7.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बिप्र साधु सुर पूजत राजा। करत राम हित मंगल काजा।।

    अर्थ (Hindi)

    बिप्र साधु सुर पूजत राजा। करत राम हित मंगल काजा।।

  62. RCM 2.7.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनत राम अभिषेक सुहावा। बाज गहागह अवध बधावा।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनत राम अभिषेक सुहावा। बाज गहागह अवध बधावा।।

  63. RCM 2.7.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राम सीय तन सगुन जनाए। फरकहिं मंगल अंग सुहाए।।

    अर्थ (Hindi)

    राम सीय तन सगुन जनाए। फरकहिं मंगल अंग सुहाए।।

  64. RCM 2.7.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पुलकि सप्रेम परसपर कहहीं। भरत आगमनु सूचक अहहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    पुलकि सप्रेम परसपर कहहीं। भरत आगमनु सूचक अहहीं।।

  65. RCM 2.7.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भए बहुत दिन अति अवसेरी। सगुन प्रतीति भेंट प्रिय केरी।।

    अर्थ (Hindi)

    भए बहुत दिन अति अवसेरी। सगुन प्रतीति भेंट प्रिय केरी।।

  66. RCM 2.7.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भरत सरिस प्रिय को जग माहीं। इहइ सगुन फलु दूसर नाहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    भरत सरिस प्रिय को जग माहीं। इहइ सगुन फलु दूसर नाहीं।।

  67. RCM 2.7.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    रामहि बंधु सोच दिन राती। अंडन्हि कमठ ह्रदउ जेहि भाँती।।

    अर्थ (Hindi)

    रामहि बंधु सोच दिन राती। अंडन्हि कमठ ह्रदउ जेहि भाँती।।

  68. RCM 2.7.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    एहि अवसर मंगलु परम सुनि रहँसेउ रनिवासु।

    अर्थ (Hindi)

    एहि अवसर मंगलु परम सुनि रहँसेउ रनिवासु।

  69. RCM 2.7.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सोभत लखि बिधु बढ़त जनु बारिधि बीचि बिलासु।।7।।

    अर्थ (Hindi)

    सोभत लखि बिधु बढ़त जनु बारिधि बीचि बिलासु।।7।।

  70. RCM 2.8.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    प्रथम जाइ जिन्ह बचन सुनाए। भूषन बसन भूरि तिन्ह पाए।।

    अर्थ (Hindi)

    प्रथम जाइ जिन्ह बचन सुनाए। भूषन बसन भूरि तिन्ह पाए।।

  71. RCM 2.8.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    प्रेम पुलकि तन मन अनुरागीं। मंगल कलस सजन सब लागीं।।

    अर्थ (Hindi)

    प्रेम पुलकि तन मन अनुरागीं। मंगल कलस सजन सब लागीं।।

  72. RCM 2.8.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    चौकें चारु सुमित्राँ पुरी। मनिमय बिबिध भाँति अति रुरी।।

    अर्थ (Hindi)

    चौकें चारु सुमित्राँ पुरी। मनिमय बिबिध भाँति अति रुरी।।

  73. RCM 2.8.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    आनँद मगन राम महतारी। दिए दान बहु बिप्र हँकारी।।

    अर्थ (Hindi)

    आनँद मगन राम महतारी। दिए दान बहु बिप्र हँकारी।।

  74. RCM 2.8.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पूजीं ग्रामदेबि सुर नागा। कहेउ बहोरि देन बलिभागा।।

    अर्थ (Hindi)

    पूजीं ग्रामदेबि सुर नागा। कहेउ बहोरि देन बलिभागा।।

  75. RCM 2.8.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जेहि बिधि होइ राम कल्यानू। देहु दया करि सो बरदानू।।

    अर्थ (Hindi)

    जेहि बिधि होइ राम कल्यानू। देहु दया करि सो बरदानू।।

  76. RCM 2.8.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    गावहिं मंगल कोकिलबयनीं। बिधुबदनीं मृगसावकनयनीं।।

    अर्थ (Hindi)

    गावहिं मंगल कोकिलबयनीं। बिधुबदनीं मृगसावकनयनीं।।

  77. RCM 2.8.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राम राज अभिषेकु सुनि हियँ हरषे नर नारि।

    अर्थ (Hindi)

    राम राज अभिषेकु सुनि हियँ हरषे नर नारि।

  78. RCM 2.8.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    लगे सुमंगल सजन सब बिधि अनुकूल बिचारि।।8।।

    अर्थ (Hindi)

    लगे सुमंगल सजन सब बिधि अनुकूल बिचारि।।8।।

  79. RCM 2.9.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तब नरनाहँ बसिष्ठु बोलाए। रामधाम सिख देन पठाए।।

    अर्थ (Hindi)

    तब नरनाहँ बसिष्ठु बोलाए। रामधाम सिख देन पठाए।।

  80. RCM 2.9.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    गुर आगमनु सुनत रघुनाथा। द्वार आइ पद नायउ माथा।।

    अर्थ (Hindi)

    गुर आगमनु सुनत रघुनाथा। द्वार आइ पद नायउ माथा।।

  81. RCM 2.9.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सादर अरघ देइ घर आने। सोरह भाँति पूजि सनमाने।।

    अर्थ (Hindi)

    सादर अरघ देइ घर आने। सोरह भाँति पूजि सनमाने।।

  82. RCM 2.9.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    गहे चरन सिय सहित बहोरी। बोले रामु कमल कर जोरी।।

    अर्थ (Hindi)

    गहे चरन सिय सहित बहोरी। बोले रामु कमल कर जोरी।।

  83. RCM 2.9.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सेवक सदन स्वामि आगमनू। मंगल मूल अमंगल दमनू।।

    अर्थ (Hindi)

    सेवक सदन स्वामि आगमनू। मंगल मूल अमंगल दमनू।।

  84. RCM 2.9.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तदपि उचित जनु बोलि सप्रीती। पठइअ काज नाथ असि नीती।।

    अर्थ (Hindi)

    तदपि उचित जनु बोलि सप्रीती। पठइअ काज नाथ असि नीती।।

  85. RCM 2.9.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    प्रभुता तजि प्रभु कीन्ह सनेहू। भयउ पुनीत आजु यहु गेहू।।

    अर्थ (Hindi)

    प्रभुता तजि प्रभु कीन्ह सनेहू। भयउ पुनीत आजु यहु गेहू।।

  86. RCM 2.9.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    आयसु होइ सो करौं गोसाई। सेवक लहइ स्वामि सेवकाई।।

    अर्थ (Hindi)

    आयसु होइ सो करौं गोसाई। सेवक लहइ स्वामि सेवकाई।।

  87. RCM 2.9.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनि सनेह साने बचन मुनि रघुबरहि प्रसंस।

    अर्थ (Hindi)

    सुनि सनेह साने बचन मुनि रघुबरहि प्रसंस।

  88. RCM 2.9.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राम कस न तुम्ह कहहु अस हंस बंस अवतंस।।9।।

    अर्थ (Hindi)

    राम कस न तुम्ह कहहु अस हंस बंस अवतंस।।9।।

  89. RCM 2.10.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बरनि राम गुन सीलु सुभाऊ। बोले प्रेम पुलकि मुनिराऊ।।

    अर्थ (Hindi)

    बरनि राम गुन सीलु सुभाऊ। बोले प्रेम पुलकि मुनिराऊ।।

  90. RCM 2.10.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भूप सजेउ अभिषेक समाजू। चाहत देन तुम्हहि जुबराजू।।

    अर्थ (Hindi)

    भूप सजेउ अभिषेक समाजू। चाहत देन तुम्हहि जुबराजू।।

  91. RCM 2.10.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राम करहु सब संजम आजू। जौं बिधि कुसल निबाहै काजू।।

    अर्थ (Hindi)

    राम करहु सब संजम आजू। जौं बिधि कुसल निबाहै काजू।।

  92. RCM 2.10.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    गुरु सिख देइ राय पहिं गयउ। राम हृदयँ अस बिसमउ भयऊ।।

    अर्थ (Hindi)

    गुरु सिख देइ राय पहिं गयउ। राम हृदयँ अस बिसमउ भयऊ।।

  93. RCM 2.10.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जनमे एक संग सब भाई। भोजन सयन केलि लरिकाई।।

    अर्थ (Hindi)

    जनमे एक संग सब भाई। भोजन सयन केलि लरिकाई।।

  94. RCM 2.10.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    करनबेध उपबीत बिआहा। संग संग सब भए उछाहा।।

    अर्थ (Hindi)

    करनबेध उपबीत बिआहा। संग संग सब भए उछाहा।।

  95. RCM 2.10.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बिमल बंस यहु अनुचित एकू। बंधु बिहाइ बड़ेहि अभिषेकू।।

    अर्थ (Hindi)

    बिमल बंस यहु अनुचित एकू। बंधु बिहाइ बड़ेहि अभिषेकू।।

  96. RCM 2.10.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    प्रभु सप्रेम पछितानि सुहाई। हरउ भगत मन कै कुटिलाई।।

    अर्थ (Hindi)

    प्रभु सप्रेम पछितानि सुहाई। हरउ भगत मन कै कुटिलाई।।

  97. RCM 2.10.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तेहि अवसर आए लखन मगन प्रेम आनंद।

    अर्थ (Hindi)

    तेहि अवसर आए लखन मगन प्रेम आनंद।

  98. RCM 2.10.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सनमाने प्रिय बचन कहि रघुकुल कैरव चंद।।10।।

    अर्थ (Hindi)

    सनमाने प्रिय बचन कहि रघुकुल कैरव चंद।।10।।

  99. RCM 2.11.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बाजहिं बाजने बिबिध बिधाना। पुर प्रमोदु नहिं जाइ बखाना।।

    अर्थ (Hindi)

    बाजहिं बाजने बिबिध बिधाना। पुर प्रमोदु नहिं जाइ बखाना।।

  100. RCM 2.11.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भरत आगमनु सकल मनावहिं। आवहुँ बेगि नयन फलु पावहिं।।

    अर्थ (Hindi)

    भरत आगमनु सकल मनावहिं। आवहुँ बेगि नयन फलु पावहिं।।

  101. RCM 2.11.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    हाट बाट घर गलीं अथाई। कहहिं परसपर लोग लोगाई।।

    अर्थ (Hindi)

    हाट बाट घर गलीं अथाई। कहहिं परसपर लोग लोगाई।।

  102. RCM 2.11.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कालि लगन भलि केतिक बारा। पूजिहि बिधि अभिलाषु हमारा।।

    अर्थ (Hindi)

    कालि लगन भलि केतिक बारा। पूजिहि बिधि अभिलाषु हमारा।।

  103. RCM 2.11.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कनक सिंघासन सीय समेता। बैठहिं रामु होइ चित चेता।।

    अर्थ (Hindi)

    कनक सिंघासन सीय समेता। बैठहिं रामु होइ चित चेता।।

  104. RCM 2.11.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सकल कहहिं कब होइहि काली। बिघन मनावहिं देव कुचाली।।

    अर्थ (Hindi)

    सकल कहहिं कब होइहि काली। बिघन मनावहिं देव कुचाली।।

  105. RCM 2.11.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तिन्हहि सोहाइ न अवध बधावा। चोरहि चंदिनि राति न भावा।।

    अर्थ (Hindi)

    तिन्हहि सोहाइ न अवध बधावा। चोरहि चंदिनि राति न भावा।।

  106. RCM 2.11.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सारद बोलि बिनय सुर करहीं। बारहिं बार पाय लै परहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    सारद बोलि बिनय सुर करहीं। बारहिं बार पाय लै परहीं।।

  107. RCM 2.11.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बिपति हमारि बिलोकि बड़ि मातु करिअ सोइ आजु।

    अर्थ (Hindi)

    बिपति हमारि बिलोकि बड़ि मातु करिअ सोइ आजु।

  108. RCM 2.11.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    रामु जाहिं बन राजु तजि होइ सकल सुरकाजु।।11।।

    अर्थ (Hindi)

    रामु जाहिं बन राजु तजि होइ सकल सुरकाजु।।11।।

  109. RCM 2.12.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनि सुर बिनय ठाढ़ि पछिताती। भइउँ सरोज बिपिन हिमराती।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनि सुर बिनय ठाढ़ि पछिताती। भइउँ सरोज बिपिन हिमराती।।

  110. RCM 2.12.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    देखि देव पुनि कहहिं निहोरी। मातु तोहि नहिं थोरिउ खोरी।।

    अर्थ (Hindi)

    देखि देव पुनि कहहिं निहोरी। मातु तोहि नहिं थोरिउ खोरी।।

  111. RCM 2.12.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बिसमय हरष रहित रघुराऊ। तुम्ह जानहु सब राम प्रभाऊ।।

    अर्थ (Hindi)

    बिसमय हरष रहित रघुराऊ। तुम्ह जानहु सब राम प्रभाऊ।।

  112. RCM 2.12.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जीव करम बस सुख दुख भागी। जाइअ अवध देव हित लागी।।

    अर्थ (Hindi)

    जीव करम बस सुख दुख भागी। जाइअ अवध देव हित लागी।।

  113. RCM 2.12.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बार बार गहि चरन सँकोचौ। चली बिचारि बिबुध मति पोची।।

    अर्थ (Hindi)

    बार बार गहि चरन सँकोचौ। चली बिचारि बिबुध मति पोची।।

  114. RCM 2.12.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    ऊँच निवासु नीचि करतूती। देखि न सकहिं पराइ बिभूती।।

    अर्थ (Hindi)

    ऊँच निवासु नीचि करतूती। देखि न सकहिं पराइ बिभूती।।

  115. RCM 2.12.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    आगिल काजु बिचारि बहोरी। करहहिं चाह कुसल कबि मोरी।।

    अर्थ (Hindi)

    आगिल काजु बिचारि बहोरी। करहहिं चाह कुसल कबि मोरी।।

  116. RCM 2.12.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    हरषि हृदयँ दसरथ पुर आई। जनु ग्रह दसा दुसह दुखदाई।।

    अर्थ (Hindi)

    हरषि हृदयँ दसरथ पुर आई। जनु ग्रह दसा दुसह दुखदाई।।

  117. RCM 2.12.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नामु मंथरा मंदमति चेरी कैकेइ केरि।

    अर्थ (Hindi)

    नामु मंथरा मंदमति चेरी कैकेइ केरि।

  118. RCM 2.12.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अजस पेटारी ताहि करि गई गिरा मति फेरि।।12।।

    अर्थ (Hindi)

    अजस पेटारी ताहि करि गई गिरा मति फेरि।।12।।

  119. RCM 2.13.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    दीख मंथरा नगरु बनावा। मंजुल मंगल बाज बधावा।।

    अर्थ (Hindi)

    दीख मंथरा नगरु बनावा। मंजुल मंगल बाज बधावा।।

  120. RCM 2.13.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पूछेसि लोगन्ह काह उछाहू। राम तिलकु सुनि भा उर दाहू।।

    अर्थ (Hindi)

    पूछेसि लोगन्ह काह उछाहू। राम तिलकु सुनि भा उर दाहू।।

  121. RCM 2.13.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    करइ बिचारु कुबुद्धि कुजाती। होइ अकाजु कवनि बिधि राती।।

    अर्थ (Hindi)

    करइ बिचारु कुबुद्धि कुजाती। होइ अकाजु कवनि बिधि राती।।

  122. RCM 2.13.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    देखि लागि मधु कुटिल किराती। जिमि गवँ तकइ लेउँ केहि भाँती।।

    अर्थ (Hindi)

    देखि लागि मधु कुटिल किराती। जिमि गवँ तकइ लेउँ केहि भाँती।।

  123. RCM 2.13.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भरत मातु पहिं गइ बिलखानी। का अनमनि हसि कह हँसि रानी।।

    अर्थ (Hindi)

    भरत मातु पहिं गइ बिलखानी। का अनमनि हसि कह हँसि रानी।।

  124. RCM 2.13.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    ऊतरु देइ न लेइ उसासू। नारि चरित करि ढारइ आँसू।।

    अर्थ (Hindi)

    ऊतरु देइ न लेइ उसासू। नारि चरित करि ढारइ आँसू।।

  125. RCM 2.13.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    हँसि कह रानि गालु बड़ तोरें। दीन्ह लखन सिख अस मन मोरें।।

    अर्थ (Hindi)

    हँसि कह रानि गालु बड़ तोरें। दीन्ह लखन सिख अस मन मोरें।।

  126. RCM 2.13.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तबहुँ न बोल चेरि बड़ि पापिनि। छाड़इ स्वास कारि जनु साँपिनि।।

    अर्थ (Hindi)

    तबहुँ न बोल चेरि बड़ि पापिनि। छाड़इ स्वास कारि जनु साँपिनि।।

  127. RCM 2.13.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सभय रानि कह कहसि किन कुसल रामु महिपालु।

    अर्थ (Hindi)

    सभय रानि कह कहसि किन कुसल रामु महिपालु।

  128. RCM 2.13.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    लखनु भरतु रिपुदमनु सुनि भा कुबरी उर सालु।।13।।

    अर्थ (Hindi)

    लखनु भरतु रिपुदमनु सुनि भा कुबरी उर सालु।।13।।

  129. RCM 2.14.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कत सिख देइ हमहि कोउ माई। गालु करब केहि कर बलु पाई।।

    अर्थ (Hindi)

    कत सिख देइ हमहि कोउ माई। गालु करब केहि कर बलु पाई।।

  130. RCM 2.14.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    रामहि छाड़ि कुसल केहि आजू। जेहि जनेसु देइ जुबराजू।।

    अर्थ (Hindi)

    रामहि छाड़ि कुसल केहि आजू। जेहि जनेसु देइ जुबराजू।।

  131. RCM 2.14.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भयउ कौसिलहि बिधि अति दाहिन। देखत गरब रहत उर नाहिन।।

    अर्थ (Hindi)

    भयउ कौसिलहि बिधि अति दाहिन। देखत गरब रहत उर नाहिन।।

  132. RCM 2.14.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    देखेहु कस न जाइ सब सोभा। जो अवलोकि मोर मनु छोभा।।

    अर्थ (Hindi)

    देखेहु कस न जाइ सब सोभा। जो अवलोकि मोर मनु छोभा।।

  133. RCM 2.14.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पूतु बिदेस न सोचु तुम्हारें। जानति हहु बस नाहु हमारें।।

    अर्थ (Hindi)

    पूतु बिदेस न सोचु तुम्हारें। जानति हहु बस नाहु हमारें।।

  134. RCM 2.14.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नीद बहुत प्रिय सेज तुराई। लखहु न भूप कपट चतुराई।।

    अर्थ (Hindi)

    नीद बहुत प्रिय सेज तुराई। लखहु न भूप कपट चतुराई।।

  135. RCM 2.14.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनि प्रिय बचन मलिन मनु जानी। झुकी रानि अब रहु अरगानी।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनि प्रिय बचन मलिन मनु जानी। झुकी रानि अब रहु अरगानी।।

  136. RCM 2.14.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पुनि अस कबहुँ कहसि घरफोरी। तब धरि जीभ कढ़ावउँ तोरी।।

    अर्थ (Hindi)

    पुनि अस कबहुँ कहसि घरफोरी। तब धरि जीभ कढ़ावउँ तोरी।।

  137. RCM 2.14.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    काने खोरे कूबरे कुटिल कुचाली जानि।

    अर्थ (Hindi)

    काने खोरे कूबरे कुटिल कुचाली जानि।

  138. RCM 2.14.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तिय बिसेषि पुनि चेरि कहि भरतमातु मुसुकानि।।14।।

    अर्थ (Hindi)

    तिय बिसेषि पुनि चेरि कहि भरतमातु मुसुकानि।।14।।

  139. RCM 2.15.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    प्रियबादिनि सिख दीन्हिउँ तोही। सपनेहुँ तो पर कोपु न मोही।।

    अर्थ (Hindi)

    प्रियबादिनि सिख दीन्हिउँ तोही। सपनेहुँ तो पर कोपु न मोही।।

  140. RCM 2.15.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुदिनु सुमंगल दायकु सोई। तोर कहा फुर जेहि दिन होई।।

    अर्थ (Hindi)

    सुदिनु सुमंगल दायकु सोई। तोर कहा फुर जेहि दिन होई।।

  141. RCM 2.15.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जेठ स्वामि सेवक लघु भाई। यह दिनकर कुल रीति सुहाई।।

    अर्थ (Hindi)

    जेठ स्वामि सेवक लघु भाई। यह दिनकर कुल रीति सुहाई।।

  142. RCM 2.15.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राम तिलकु जौं साँचेहुँ काली। देउँ मागु मन भावत आली।।

    अर्थ (Hindi)

    राम तिलकु जौं साँचेहुँ काली। देउँ मागु मन भावत आली।।

  143. RCM 2.15.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कौसल्या सम सब महतारी। रामहि सहज सुभायँ पिआरी।।

    अर्थ (Hindi)

    कौसल्या सम सब महतारी। रामहि सहज सुभायँ पिआरी।।

  144. RCM 2.15.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मो पर करहिं सनेहु बिसेषी। मैं करि प्रीति परीछा देखी।।

    अर्थ (Hindi)

    मो पर करहिं सनेहु बिसेषी। मैं करि प्रीति परीछा देखी।।

  145. RCM 2.15.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जौं बिधि जनमु देइ करि छोहू। होहुँ राम सिय पूत पुतोहू।।

    अर्थ (Hindi)

    जौं बिधि जनमु देइ करि छोहू। होहुँ राम सिय पूत पुतोहू।।

  146. RCM 2.15.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    प्रान तें अधिक रामु प्रिय मोरें। तिन्ह कें तिलक छोभु कस तोरें।।

    अर्थ (Hindi)

    प्रान तें अधिक रामु प्रिय मोरें। तिन्ह कें तिलक छोभु कस तोरें।।

  147. RCM 2.15.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भरत सपथ तोहि सत्य कहु परिहरि कपट दुराउ।

    अर्थ (Hindi)

    भरत सपथ तोहि सत्य कहु परिहरि कपट दुराउ।

  148. RCM 2.15.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    हरष समय बिसमउ करसि कारन मोहि सुनाउ।।15।।

    अर्थ (Hindi)

    हरष समय बिसमउ करसि कारन मोहि सुनाउ।।15।।

  149. RCM 2.16.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    एकहिं बार आस सब पूजी। अब कछु कहब जीभ करि दूजी।।

    अर्थ (Hindi)

    एकहिं बार आस सब पूजी। अब कछु कहब जीभ करि दूजी।।

  150. RCM 2.16.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    फोरै जोगु कपारु अभागा। भलेउ कहत दुख रउरेहि लागा।।

    अर्थ (Hindi)

    फोरै जोगु कपारु अभागा। भलेउ कहत दुख रउरेहि लागा।।

  151. RCM 2.16.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कहहिं झूठि फुरि बात बनाई। ते प्रिय तुम्हहि करुइ मैं माई।।

    अर्थ (Hindi)

    कहहिं झूठि फुरि बात बनाई। ते प्रिय तुम्हहि करुइ मैं माई।।

  152. RCM 2.16.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    हमहुँ कहबि अब ठकुरसोहाती। नाहिं त मौन रहब दिनु राती।।

    अर्थ (Hindi)

    हमहुँ कहबि अब ठकुरसोहाती। नाहिं त मौन रहब दिनु राती।।

  153. RCM 2.16.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    करि कुरूप बिधि परबस कीन्हा। बवा सो लुनिअ लहिअ जो दीन्हा।।

    अर्थ (Hindi)

    करि कुरूप बिधि परबस कीन्हा। बवा सो लुनिअ लहिअ जो दीन्हा।।

  154. RCM 2.16.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कोउ नृप होउ हमहि का हानी। चेरि छाड़ि अब होब कि रानी।।

    अर्थ (Hindi)

    कोउ नृप होउ हमहि का हानी। चेरि छाड़ि अब होब कि रानी।।

  155. RCM 2.16.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जारै जोगु सुभाउ हमारा। अनभल देखि न जाइ तुम्हारा।।

    अर्थ (Hindi)

    जारै जोगु सुभाउ हमारा। अनभल देखि न जाइ तुम्हारा।।

  156. RCM 2.16.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तातें कछुक बात अनुसारी। छमिअ देबि बड़ि चूक हमारी।।

    अर्थ (Hindi)

    तातें कछुक बात अनुसारी। छमिअ देबि बड़ि चूक हमारी।।

  157. RCM 2.16.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    गूढ़ कपट प्रिय बचन सुनि तीय अधरबुधि रानि।

    अर्थ (Hindi)

    गूढ़ कपट प्रिय बचन सुनि तीय अधरबुधि रानि।

  158. RCM 2.16.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुरमाया बस बैरिनिहि सुह्द जानि पतिआनि।।16।।

    अर्थ (Hindi)

    सुरमाया बस बैरिनिहि सुह्द जानि पतिआनि।।16।।

  159. RCM 2.17.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सादर पुनि पुनि पूँछति ओही। सबरी गान मृगी जनु मोही।।

    अर्थ (Hindi)

    सादर पुनि पुनि पूँछति ओही। सबरी गान मृगी जनु मोही।।

  160. RCM 2.17.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तसि मति फिरी अहइ जसि भाबी। रहसी चेरि घात जनु फाबी।।

    अर्थ (Hindi)

    तसि मति फिरी अहइ जसि भाबी। रहसी चेरि घात जनु फाबी।।

  161. RCM 2.17.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तुम्ह पूँछहु मैं कहत डेराऊँ। धरेउ मोर घरफोरी नाऊँ।।

    अर्थ (Hindi)

    तुम्ह पूँछहु मैं कहत डेराऊँ। धरेउ मोर घरफोरी नाऊँ।।

  162. RCM 2.17.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सजि प्रतीति बहुबिधि गढ़ि छोली। अवध साढ़साती तब बोली।।

    अर्थ (Hindi)

    सजि प्रतीति बहुबिधि गढ़ि छोली। अवध साढ़साती तब बोली।।

  163. RCM 2.17.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    प्रिय सिय रामु कहा तुम्ह रानी। रामहि तुम्ह प्रिय सो फुरि बानी।।

    अर्थ (Hindi)

    प्रिय सिय रामु कहा तुम्ह रानी। रामहि तुम्ह प्रिय सो फुरि बानी।।

  164. RCM 2.17.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    रहा प्रथम अब ते दिन बीते। समउ फिरें रिपु होहिं पिंरीते।।

    अर्थ (Hindi)

    रहा प्रथम अब ते दिन बीते। समउ फिरें रिपु होहिं पिंरीते।।

  165. RCM 2.17.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भानु कमल कुल पोषनिहारा। बिनु जल जारि करइ सोइ छारा।।

    अर्थ (Hindi)

    भानु कमल कुल पोषनिहारा। बिनु जल जारि करइ सोइ छारा।।

  166. RCM 2.17.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जरि तुम्हारि चह सवति उखारी। रूँधहु करि उपाउ बर बारी।।

    अर्थ (Hindi)

    जरि तुम्हारि चह सवति उखारी। रूँधहु करि उपाउ बर बारी।।

  167. RCM 2.17.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तुम्हहि न सोचु सोहाग बल निज बस जानहु राउ।

    अर्थ (Hindi)

    तुम्हहि न सोचु सोहाग बल निज बस जानहु राउ।

  168. RCM 2.17.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मन मलीन मुह मीठ नृप राउर सरल सुभाउ।।17।।

    अर्थ (Hindi)

    मन मलीन मुह मीठ नृप राउर सरल सुभाउ।।17।।

  169. RCM 2.18.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    चतुर गँभीर राम महतारी। बीचु पाइ निज बात सँवारी।।

    अर्थ (Hindi)

    चतुर गँभीर राम महतारी। बीचु पाइ निज बात सँवारी।।

  170. RCM 2.18.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पठए भरतु भूप ननिअउरें। राम मातु मत जानव रउरें।।

    अर्थ (Hindi)

    पठए भरतु भूप ननिअउरें। राम मातु मत जानव रउरें।।

  171. RCM 2.18.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सेवहिं सकल सवति मोहि नीकें। गरबित भरत मातु बल पी कें।।

    अर्थ (Hindi)

    सेवहिं सकल सवति मोहि नीकें। गरबित भरत मातु बल पी कें।।

  172. RCM 2.18.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सालु तुम्हार कौसिलहि माई। कपट चतुर नहिं होइ जनाई।।

    अर्थ (Hindi)

    सालु तुम्हार कौसिलहि माई। कपट चतुर नहिं होइ जनाई।।

  173. RCM 2.18.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राजहि तुम्ह पर प्रेमु बिसेषी। सवति सुभाउ सकइ नहिं देखी।।

    अर्थ (Hindi)

    राजहि तुम्ह पर प्रेमु बिसेषी। सवति सुभाउ सकइ नहिं देखी।।

  174. RCM 2.18.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    रची प्रंपचु भूपहि अपनाई। राम तिलक हित लगन धराई।।

    अर्थ (Hindi)

    रची प्रंपचु भूपहि अपनाई। राम तिलक हित लगन धराई।।

  175. RCM 2.18.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    यह कुल उचित राम कहुँ टीका। सबहि सोहाइ मोहि सुठि नीका।।

    अर्थ (Hindi)

    यह कुल उचित राम कहुँ टीका। सबहि सोहाइ मोहि सुठि नीका।।

  176. RCM 2.18.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    आगिलि बात समुझि डरु मोही। देउ दैउ फिरि सो फलु ओही।।

    अर्थ (Hindi)

    आगिलि बात समुझि डरु मोही। देउ दैउ फिरि सो फलु ओही।।

  177. RCM 2.18.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    रचि पचि कोटिक कुटिलपन कीन्हेसि कपट प्रबोधु।।

    अर्थ (Hindi)

    रचि पचि कोटिक कुटिलपन कीन्हेसि कपट प्रबोधु।।

  178. RCM 2.18.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कहिसि कथा सत सवति कै जेहि बिधि बाढ़ बिरोधु।।18।।

    अर्थ (Hindi)

    कहिसि कथा सत सवति कै जेहि बिधि बाढ़ बिरोधु।।18।।

  179. RCM 2.19.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भावी बस प्रतीति उर आई। पूँछ रानि पुनि सपथ देवाई।।

    अर्थ (Hindi)

    भावी बस प्रतीति उर आई। पूँछ रानि पुनि सपथ देवाई।।

  180. RCM 2.19.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    का पूछहुँ तुम्ह अबहुँ न जाना। निज हित अनहित पसु पहिचाना।।

    अर्थ (Hindi)

    का पूछहुँ तुम्ह अबहुँ न जाना। निज हित अनहित पसु पहिचाना।।

  181. RCM 2.19.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भयउ पाखु दिन सजत समाजू। तुम्ह पाई सुधि मोहि सन आजू।।

    अर्थ (Hindi)

    भयउ पाखु दिन सजत समाजू। तुम्ह पाई सुधि मोहि सन आजू।।

  182. RCM 2.19.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    खाइअ पहिरिअ राज तुम्हारें। सत्य कहें नहिं दोषु हमारें।।

    अर्थ (Hindi)

    खाइअ पहिरिअ राज तुम्हारें। सत्य कहें नहिं दोषु हमारें।।

  183. RCM 2.19.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जौं असत्य कछु कहब बनाई। तौ बिधि देइहि हमहि सजाई।।

    अर्थ (Hindi)

    जौं असत्य कछु कहब बनाई। तौ बिधि देइहि हमहि सजाई।।

  184. RCM 2.19.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    रामहि तिलक कालि जौं भयऊ। तुम्ह कहुँ बिपति बीजु बिधि बयऊ।।

    अर्थ (Hindi)

    रामहि तिलक कालि जौं भयऊ। तुम्ह कहुँ बिपति बीजु बिधि बयऊ।।

  185. RCM 2.19.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    रेख खँचाइ कहउँ बलु भाषी। भामिनि भइहु दूध कइ माखी।।

    अर्थ (Hindi)

    रेख खँचाइ कहउँ बलु भाषी। भामिनि भइहु दूध कइ माखी।।

  186. RCM 2.19.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जौं सुत सहित करहु सेवकाई। तौ घर रहहु न आन उपाई।।

    अर्थ (Hindi)

    जौं सुत सहित करहु सेवकाई। तौ घर रहहु न आन उपाई।।

  187. RCM 2.19.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कद्रूँ बिनतहि दीन्ह दुखु तुम्हहि कौसिलाँ देब।

    अर्थ (Hindi)

    कद्रूँ बिनतहि दीन्ह दुखु तुम्हहि कौसिलाँ देब।

  188. RCM 2.19.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भरतु बंदिगृह सेइहहिं लखनु राम के नेब।।19।।

    अर्थ (Hindi)

    भरतु बंदिगृह सेइहहिं लखनु राम के नेब।।19।।

  189. RCM 2.20.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कैकयसुता सुनत कटु बानी। कहि न सकइ कछु सहमि सुखानी।।

    अर्थ (Hindi)

    कैकयसुता सुनत कटु बानी। कहि न सकइ कछु सहमि सुखानी।।

  190. RCM 2.20.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तन पसेउ कदली जिमि काँपी। कुबरीं दसन जीभ तब चाँपी।।

    अर्थ (Hindi)

    तन पसेउ कदली जिमि काँपी। कुबरीं दसन जीभ तब चाँपी।।

  191. RCM 2.20.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कहि कहि कोटिक कपट कहानी। धीरजु धरहु प्रबोधिसि रानी।।

    अर्थ (Hindi)

    कहि कहि कोटिक कपट कहानी। धीरजु धरहु प्रबोधिसि रानी।।

  192. RCM 2.20.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    फिरा करमु प्रिय लागि कुचाली। बकिहि सराहइ मानि मराली।।

    अर्थ (Hindi)

    फिरा करमु प्रिय लागि कुचाली। बकिहि सराहइ मानि मराली।।

  193. RCM 2.20.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनु मंथरा बात फुरि तोरी। दहिनि आँखि नित फरकइ मोरी।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनु मंथरा बात फुरि तोरी। दहिनि आँखि नित फरकइ मोरी।।

  194. RCM 2.20.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    दिन प्रति देखउँ राति कुसपने। कहउँ न तोहि मोह बस अपने।।

    अर्थ (Hindi)

    दिन प्रति देखउँ राति कुसपने। कहउँ न तोहि मोह बस अपने।।

  195. RCM 2.20.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    काह करौ सखि सूध सुभाऊ। दाहिन बाम न जानउँ काऊ।।

    अर्थ (Hindi)

    काह करौ सखि सूध सुभाऊ। दाहिन बाम न जानउँ काऊ।।

  196. RCM 2.20.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अपने चलत न आजु लगि अनभल काहुक कीन्ह।

    अर्थ (Hindi)

    अपने चलत न आजु लगि अनभल काहुक कीन्ह।

  197. RCM 2.20.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    केहिं अघ एकहि बार मोहि दैअँ दुसह दुखु दीन्ह।।20।।

    अर्थ (Hindi)

    केहिं अघ एकहि बार मोहि दैअँ दुसह दुखु दीन्ह।।20।।

  198. RCM 2.21.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नैहर जनमु भरब बरु जाइ। जिअत न करबि सवति सेवकाई।।

    अर्थ (Hindi)

    नैहर जनमु भरब बरु जाइ। जिअत न करबि सवति सेवकाई।।

  199. RCM 2.21.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अरि बस दैउ जिआवत जाही। मरनु नीक तेहि जीवन चाही।।

    अर्थ (Hindi)

    अरि बस दैउ जिआवत जाही। मरनु नीक तेहि जीवन चाही।।

  200. RCM 2.21.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    दीन बचन कह बहुबिधि रानी। सुनि कुबरीं तियमाया ठानी।।

    अर्थ (Hindi)

    दीन बचन कह बहुबिधि रानी। सुनि कुबरीं तियमाया ठानी।।

  201. RCM 2.21.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अस कस कहहु मानि मन ऊना। सुखु सोहागु तुम्ह कहुँ दिन दूना।।

    अर्थ (Hindi)

    अस कस कहहु मानि मन ऊना। सुखु सोहागु तुम्ह कहुँ दिन दूना।।

  202. RCM 2.21.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जेहिं राउर अति अनभल ताका। सोइ पाइहि यहु फलु परिपाका।।

    अर्थ (Hindi)

    जेहिं राउर अति अनभल ताका। सोइ पाइहि यहु फलु परिपाका।।

  203. RCM 2.21.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जब तें कुमत सुना मैं स्वामिनि। भूख न बासर नींद न जामिनि।।

    अर्थ (Hindi)

    जब तें कुमत सुना मैं स्वामिनि। भूख न बासर नींद न जामिनि।।

  204. RCM 2.21.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पूँछेउ गुनिन्ह रेख तिन्ह खाँची। भरत भुआल होहिं यह साँची।।

    अर्थ (Hindi)

    पूँछेउ गुनिन्ह रेख तिन्ह खाँची। भरत भुआल होहिं यह साँची।।

  205. RCM 2.21.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भामिनि करहु त कहौं उपाऊ। है तुम्हरीं सेवा बस राऊ।।

    अर्थ (Hindi)

    भामिनि करहु त कहौं उपाऊ। है तुम्हरीं सेवा बस राऊ।।

  206. RCM 2.21.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    परउँ कूप तुअ बचन पर सकउँ पूत पति त्यागि।

    अर्थ (Hindi)

    परउँ कूप तुअ बचन पर सकउँ पूत पति त्यागि।

  207. RCM 2.21.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कहसि मोर दुखु देखि बड़ कस न करब हित लागि।।21।।

    अर्थ (Hindi)

    कहसि मोर दुखु देखि बड़ कस न करब हित लागि।।21।।

  208. RCM 2.22.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कुबरीं करि कबुली कैकेई। कपट छुरी उर पाहन टेई।।

    अर्थ (Hindi)

    कुबरीं करि कबुली कैकेई। कपट छुरी उर पाहन टेई।।

  209. RCM 2.22.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    लखइ न रानि निकट दुखु कैंसे। चरइ हरित तिन बलिपसु जैसें।।

    अर्थ (Hindi)

    लखइ न रानि निकट दुखु कैंसे। चरइ हरित तिन बलिपसु जैसें।।

  210. RCM 2.22.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनत बात मृदु अंत कठोरी। देति मनहुँ मधु माहुर घोरी।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनत बात मृदु अंत कठोरी। देति मनहुँ मधु माहुर घोरी।।

  211. RCM 2.22.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कहइ चेरि सुधि अहइ कि नाही। स्वामिनि कहिहु कथा मोहि पाहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    कहइ चेरि सुधि अहइ कि नाही। स्वामिनि कहिहु कथा मोहि पाहीं।।

  212. RCM 2.22.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    दुइ बरदान भूप सन थाती। मागहु आजु जुड़ावहु छाती।।

    अर्थ (Hindi)

    दुइ बरदान भूप सन थाती। मागहु आजु जुड़ावहु छाती।।

  213. RCM 2.22.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुतहि राजु रामहि बनवासू। देहु लेहु सब सवति हुलासु।।

    अर्थ (Hindi)

    सुतहि राजु रामहि बनवासू। देहु लेहु सब सवति हुलासु।।

  214. RCM 2.22.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भूपति राम सपथ जब करई। तब मागेहु जेहिं बचनु न टरई।।

    अर्थ (Hindi)

    भूपति राम सपथ जब करई। तब मागेहु जेहिं बचनु न टरई।।

  215. RCM 2.22.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    होइ अकाजु आजु निसि बीतें। बचनु मोर प्रिय मानेहु जी तें।।

    अर्थ (Hindi)

    होइ अकाजु आजु निसि बीतें। बचनु मोर प्रिय मानेहु जी तें।।

  216. RCM 2.22.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बड़ कुघातु करि पातकिनि कहेसि कोपगृहँ जाहु।

    अर्थ (Hindi)

    बड़ कुघातु करि पातकिनि कहेसि कोपगृहँ जाहु।

  217. RCM 2.22.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    काजु सँवारेहु सजग सबु सहसा जनि पतिआहु।।22।।

    अर्थ (Hindi)

    काजु सँवारेहु सजग सबु सहसा जनि पतिआहु।।22।।

  218. RCM 2.23.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कुबरिहि रानि प्रानप्रिय जानी। बार बार बड़ि बुद्धि बखानी।।

    अर्थ (Hindi)

    कुबरिहि रानि प्रानप्रिय जानी। बार बार बड़ि बुद्धि बखानी।।

  219. RCM 2.23.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तोहि सम हित न मोर संसारा। बहे जात कइ भइसि अधारा।।

    अर्थ (Hindi)

    तोहि सम हित न मोर संसारा। बहे जात कइ भइसि अधारा।।

  220. RCM 2.23.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जौं बिधि पुरब मनोरथु काली। करौं तोहि चख पूतरि आली।।

    अर्थ (Hindi)

    जौं बिधि पुरब मनोरथु काली। करौं तोहि चख पूतरि आली।।

  221. RCM 2.23.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बहुबिधि चेरिहि आदरु देई। कोपभवन गवनि कैकेई।।

    अर्थ (Hindi)

    बहुबिधि चेरिहि आदरु देई। कोपभवन गवनि कैकेई।।

  222. RCM 2.23.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बिपति बीजु बरषा रितु चेरी। भुइँ भइ कुमति कैकेई केरी।।

    अर्थ (Hindi)

    बिपति बीजु बरषा रितु चेरी। भुइँ भइ कुमति कैकेई केरी।।

  223. RCM 2.23.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पाइ कपट जलु अंकुर जामा। बर दोउ दल दुख फल परिनामा।।

    अर्थ (Hindi)

    पाइ कपट जलु अंकुर जामा। बर दोउ दल दुख फल परिनामा।।

  224. RCM 2.23.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कोप समाजु साजि सबु सोई। राजु करत निज कुमति बिगोई।।

    अर्थ (Hindi)

    कोप समाजु साजि सबु सोई। राजु करत निज कुमति बिगोई।।

  225. RCM 2.23.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राउर नगर कोलाहलु होई। यह कुचालि कछु जान न कोई।।

    अर्थ (Hindi)

    राउर नगर कोलाहलु होई। यह कुचालि कछु जान न कोई।।

  226. RCM 2.23.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    प्रमुदित पुर नर नारि। सब सजहिं सुमंगलचार।

    अर्थ (Hindi)

    प्रमुदित पुर नर नारि। सब सजहिं सुमंगलचार।

  227. RCM 2.23.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    एक प्रबिसहिं एक निर्गमहिं भीर भूप दरबार।।23।।

    अर्थ (Hindi)

    एक प्रबिसहिं एक निर्गमहिं भीर भूप दरबार।।23।।

  228. RCM 2.24.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बाल सखा सुन हियँ हरषाहीं। मिलि दस पाँच राम पहिं जाहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    बाल सखा सुन हियँ हरषाहीं। मिलि दस पाँच राम पहिं जाहीं।।

  229. RCM 2.24.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    प्रभु आदरहिं प्रेमु पहिचानी। पूँछहिं कुसल खेम मृदु बानी।।

    अर्थ (Hindi)

    प्रभु आदरहिं प्रेमु पहिचानी। पूँछहिं कुसल खेम मृदु बानी।।

  230. RCM 2.24.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    फिरहिं भवन प्रिय आयसु पाई। करत परसपर राम बड़ाई।।

    अर्थ (Hindi)

    फिरहिं भवन प्रिय आयसु पाई। करत परसपर राम बड़ाई।।

  231. RCM 2.24.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    को रघुबीर सरिस संसारा। सीलु सनेह निबाहनिहारा।

    अर्थ (Hindi)

    को रघुबीर सरिस संसारा। सीलु सनेह निबाहनिहारा।

  232. RCM 2.24.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जेंहि जेंहि जोनि करम बस भ्रमहीं। तहँ तहँ ईसु देउ यह हमहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    जेंहि जेंहि जोनि करम बस भ्रमहीं। तहँ तहँ ईसु देउ यह हमहीं।।

  233. RCM 2.24.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सेवक हम स्वामी सियनाहू। होउ नात यह ओर निबाहू।।

    अर्थ (Hindi)

    सेवक हम स्वामी सियनाहू। होउ नात यह ओर निबाहू।।

  234. RCM 2.24.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अस अभिलाषु नगर सब काहू। कैकयसुता ह्दयँ अति दाहू।।

    अर्थ (Hindi)

    अस अभिलाषु नगर सब काहू। कैकयसुता ह्दयँ अति दाहू।।

  235. RCM 2.24.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    को न कुसंगति पाइ नसाई। रहइ न नीच मतें चतुराई।।

    अर्थ (Hindi)

    को न कुसंगति पाइ नसाई। रहइ न नीच मतें चतुराई।।

  236. RCM 2.24.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    साँस समय सानंद नृपु गयउ कैकेई गेहँ।

    अर्थ (Hindi)

    साँस समय सानंद नृपु गयउ कैकेई गेहँ।

  237. RCM 2.24.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    गवनु निठुरता निकट किय जनु धरि देह सनेहँ।।24।।

    अर्थ (Hindi)

    गवनु निठुरता निकट किय जनु धरि देह सनेहँ।।24।।

  238. RCM 2.25.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कोपभवन सुनि सकुचेउ राउ। भय बस अगहुड़ परइ न पाऊ।।

    अर्थ (Hindi)

    कोपभवन सुनि सकुचेउ राउ। भय बस अगहुड़ परइ न पाऊ।।

  239. RCM 2.25.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुरपति बसइ बाहँबल जाके। नरपति सकल रहहिं रुख ताकें।।

    अर्थ (Hindi)

    सुरपति बसइ बाहँबल जाके। नरपति सकल रहहिं रुख ताकें।।

  240. RCM 2.25.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सो सुनि तिय रिस गयउ सुखाई। देखहु काम प्रताप बड़ाई।।

    अर्थ (Hindi)

    सो सुनि तिय रिस गयउ सुखाई। देखहु काम प्रताप बड़ाई।।

  241. RCM 2.25.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सूल कुलिस असि अँगवनिहारे। ते रतिनाथ सुमन सर मारे।।

    अर्थ (Hindi)

    सूल कुलिस असि अँगवनिहारे। ते रतिनाथ सुमन सर मारे।।

  242. RCM 2.25.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सभय नरेसु प्रिया पहिं गयऊ। देखि दसा दुखु दारुन भयऊ।।

    अर्थ (Hindi)

    सभय नरेसु प्रिया पहिं गयऊ। देखि दसा दुखु दारुन भयऊ।।

  243. RCM 2.25.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भूमि सयन पटु मोट पुराना। दिए डारि तन भूषण नाना।।

    अर्थ (Hindi)

    भूमि सयन पटु मोट पुराना। दिए डारि तन भूषण नाना।।

  244. RCM 2.25.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कुमतिहि कसि कुबेषता फाबी। अन अहिवातु सूच जनु भाबी।।

    अर्थ (Hindi)

    कुमतिहि कसि कुबेषता फाबी। अन अहिवातु सूच जनु भाबी।।

  245. RCM 2.25.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जाइ निकट नृपु कह मृदु बानी। प्रानप्रिया केहि हेतु रिसानी।।

    अर्थ (Hindi)

    जाइ निकट नृपु कह मृदु बानी। प्रानप्रिया केहि हेतु रिसानी।।

  246. RCM 2.26.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अनहित तोर प्रिया केइँ कीन्हा। केहि दुइ सिर केहि जमु चह लीन्हा।।

    अर्थ (Hindi)

    अनहित तोर प्रिया केइँ कीन्हा। केहि दुइ सिर केहि जमु चह लीन्हा।।

  247. RCM 2.26.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कहु केहि रंकहि करौ नरेसू। कहु केहि नृपहि निकासौं देसू।।

    अर्थ (Hindi)

    कहु केहि रंकहि करौ नरेसू। कहु केहि नृपहि निकासौं देसू।।

  248. RCM 2.26.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सकउँ तोर अरि अमरउ मारी। काह कीट बपुरे नर नारी।।

    अर्थ (Hindi)

    सकउँ तोर अरि अमरउ मारी। काह कीट बपुरे नर नारी।।

  249. RCM 2.26.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जानसि मोर सुभाउ बरोरू। मनु तव आनन चंद चकोरू।।

    अर्थ (Hindi)

    जानसि मोर सुभाउ बरोरू। मनु तव आनन चंद चकोरू।।

  250. RCM 2.26.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    प्रिया प्रान सुत सरबसु मोरें। परिजन प्रजा सकल बस तोरें।।

    अर्थ (Hindi)

    प्रिया प्रान सुत सरबसु मोरें। परिजन प्रजा सकल बस तोरें।।

  251. RCM 2.26.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जौं कछु कहौ कपटु करि तोही। भामिनि राम सपथ सत मोही।।

    अर्थ (Hindi)

    जौं कछु कहौ कपटु करि तोही। भामिनि राम सपथ सत मोही।।

  252. RCM 2.26.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बिहसि मागु मनभावति बाता। भूषन सजहि मनोहर गाता।।

    अर्थ (Hindi)

    बिहसि मागु मनभावति बाता। भूषन सजहि मनोहर गाता।।

  253. RCM 2.26.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    घरी कुघरी समुझि जियँ देखू। बेगि प्रिया परिहरहि कुबेषू।।

    अर्थ (Hindi)

    घरी कुघरी समुझि जियँ देखू। बेगि प्रिया परिहरहि कुबेषू।।

  254. RCM 2.26.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    यह सुनि मन गुनि सपथ बड़ि बिहसि उठी मतिमंद।

    अर्थ (Hindi)

    यह सुनि मन गुनि सपथ बड़ि बिहसि उठी मतिमंद।

  255. RCM 2.26.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भूषन सजति बिलोकि मृगु मनहुँ किरातिनि फंद।।26।।

    अर्थ (Hindi)

    भूषन सजति बिलोकि मृगु मनहुँ किरातिनि फंद।।26।।

  256. RCM 2.27.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पुनि कह राउ सुह्रद जियँ जानी। प्रेम पुलकि मृदु मंजुल बानी।।

    अर्थ (Hindi)

    पुनि कह राउ सुह्रद जियँ जानी। प्रेम पुलकि मृदु मंजुल बानी।।

  257. RCM 2.27.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भामिनि भयउ तोर मनभावा। घर घर नगर अनंद बधावा।।

    अर्थ (Hindi)

    भामिनि भयउ तोर मनभावा। घर घर नगर अनंद बधावा।।

  258. RCM 2.27.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    रामहि देउँ कालि जुबराजू। सजहि सुलोचनि मंगल साजू।।

    अर्थ (Hindi)

    रामहि देउँ कालि जुबराजू। सजहि सुलोचनि मंगल साजू।।

  259. RCM 2.27.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    दलकि उठेउ सुनि ह्रदउ कठोरू। जनु छुइ गयउ पाक बरतोरू।।

    अर्थ (Hindi)

    दलकि उठेउ सुनि ह्रदउ कठोरू। जनु छुइ गयउ पाक बरतोरू।।

  260. RCM 2.27.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    ऐसिउ पीर बिहसि तेहि गोई। चोर नारि जिमि प्रगटि न रोई।।

    अर्थ (Hindi)

    ऐसिउ पीर बिहसि तेहि गोई। चोर नारि जिमि प्रगटि न रोई।।

  261. RCM 2.27.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    लखहिं न भूप कपट चतुराई। कोटि कुटिल मनि गुरू पढ़ाई।।

    अर्थ (Hindi)

    लखहिं न भूप कपट चतुराई। कोटि कुटिल मनि गुरू पढ़ाई।।

  262. RCM 2.27.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जद्यपि नीति निपुन नरनाहू। नारिचरित जलनिधि अवगाहू।।

    अर्थ (Hindi)

    जद्यपि नीति निपुन नरनाहू। नारिचरित जलनिधि अवगाहू।।

  263. RCM 2.27.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कपट सनेहु बढ़ाइ बहोरी। बोली बिहसि नयन मुहु मोरी।।

    अर्थ (Hindi)

    कपट सनेहु बढ़ाइ बहोरी। बोली बिहसि नयन मुहु मोरी।।

  264. RCM 2.27.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मागु मागु पै कहहु पिय कबहुँ न देहु न लेहु।

    अर्थ (Hindi)

    मागु मागु पै कहहु पिय कबहुँ न देहु न लेहु।

  265. RCM 2.27.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    देन कहेहु बरदान दुइ तेउ पावत संदेहु।।27।।

    अर्थ (Hindi)

    देन कहेहु बरदान दुइ तेउ पावत संदेहु।।27।।

  266. RCM 2.28.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जानेउँ मरमु राउ हँसि कहई। तुम्हहि कोहाब परम प्रिय अहई।।

    अर्थ (Hindi)

    जानेउँ मरमु राउ हँसि कहई। तुम्हहि कोहाब परम प्रिय अहई।।

  267. RCM 2.28.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    थाति राखि न मागिहु काऊ। बिसरि गयउ मोहि भोर सुभाऊ।।

    अर्थ (Hindi)

    थाति राखि न मागिहु काऊ। बिसरि गयउ मोहि भोर सुभाऊ।।

  268. RCM 2.28.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    झूठेहुँ हमहि दोषु जनि देहू। दुइ कै चारि मागि मकु लेहू।।

    अर्थ (Hindi)

    झूठेहुँ हमहि दोषु जनि देहू। दुइ कै चारि मागि मकु लेहू।।

  269. RCM 2.28.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    रघुकुल रीति सदा चलि आई। प्रान जाहुँ बरु बचनु न जाई।।

    अर्थ (Hindi)

    रघुकुल रीति सदा चलि आई। प्रान जाहुँ बरु बचनु न जाई।।

  270. RCM 2.28.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नहिं असत्य सम पातक पुंजा। गिरि सम होहिं कि कोटिक गुंजा।।

    अर्थ (Hindi)

    नहिं असत्य सम पातक पुंजा। गिरि सम होहिं कि कोटिक गुंजा।।

  271. RCM 2.28.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सत्यमूल सब सुकृत सुहाए। बेद पुरान बिदित मनु गाए।।

    अर्थ (Hindi)

    सत्यमूल सब सुकृत सुहाए। बेद पुरान बिदित मनु गाए।।

  272. RCM 2.28.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तेहि पर राम सपथ करि आई। सुकृत सनेह अवधि रघुराई।।

    अर्थ (Hindi)

    तेहि पर राम सपथ करि आई। सुकृत सनेह अवधि रघुराई।।

  273. RCM 2.28.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बात दृढ़ाइ कुमति हँसि बोली। कुमत कुबिहग कुलह जनु खोली।।

    अर्थ (Hindi)

    बात दृढ़ाइ कुमति हँसि बोली। कुमत कुबिहग कुलह जनु खोली।।

  274. RCM 2.28.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भूप मनोरथ सुभग बनु सुख सुबिहंग समाजु।

    अर्थ (Hindi)

    भूप मनोरथ सुभग बनु सुख सुबिहंग समाजु।

  275. RCM 2.28.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भिल्लनि जिमि छाड़न चहति बचनु भयंकरु बाजु।।28।।

    अर्थ (Hindi)

    भिल्लनि जिमि छाड़न चहति बचनु भयंकरु बाजु।।28।।

  276. RCM 2.29.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनहु प्रानप्रिय भावत जी का। देहु एक बर भरतहि टीका।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनहु प्रानप्रिय भावत जी का। देहु एक बर भरतहि टीका।।

  277. RCM 2.29.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मागउँ दूसर बर कर जोरी। पुरवहु नाथ मनोरथ मोरी।।

    अर्थ (Hindi)

    मागउँ दूसर बर कर जोरी। पुरवहु नाथ मनोरथ मोरी।।

  278. RCM 2.29.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तापस बेष बिसेषि उदासी। चौदह बरिस रामु बनबासी।।

    अर्थ (Hindi)

    तापस बेष बिसेषि उदासी। चौदह बरिस रामु बनबासी।।

  279. RCM 2.29.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनि मृदु बचन भूप हियँ सोकू। ससि कर छुअत बिकल जिमि कोकू।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनि मृदु बचन भूप हियँ सोकू। ससि कर छुअत बिकल जिमि कोकू।।

  280. RCM 2.29.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    गयउ सहमि नहिं कछु कहि आवा। जनु सचान बन झपटेउ लावा।।

    अर्थ (Hindi)

    गयउ सहमि नहिं कछु कहि आवा। जनु सचान बन झपटेउ लावा।।

  281. RCM 2.29.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बिबरन भयउ निपट नरपालू। दामिनि हनेउ मनहुँ तरु तालू।।

    अर्थ (Hindi)

    बिबरन भयउ निपट नरपालू। दामिनि हनेउ मनहुँ तरु तालू।।

  282. RCM 2.29.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    माथे हाथ मूदि दोउ लोचन। तनु धरि सोचु लाग जनु सोचन।।

    अर्थ (Hindi)

    माथे हाथ मूदि दोउ लोचन। तनु धरि सोचु लाग जनु सोचन।।

  283. RCM 2.29.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मोर मनोरथु सुरतरु फूला। फरत करिनि जिमि हतेउ समूला।।

    अर्थ (Hindi)

    मोर मनोरथु सुरतरु फूला। फरत करिनि जिमि हतेउ समूला।।

  284. RCM 2.29.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अवध उजारि कीन्हि कैकेईं। दीन्हसि अचल बिपति कै नेईं।।

    अर्थ (Hindi)

    अवध उजारि कीन्हि कैकेईं। दीन्हसि अचल बिपति कै नेईं।।

  285. RCM 2.29.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कवनें अवसर का भयउ गयउँ नारि बिस्वास।

    अर्थ (Hindi)

    कवनें अवसर का भयउ गयउँ नारि बिस्वास।

  286. RCM 2.29.11
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जोग सिद्धि फल समय जिमि जतिहि अबिद्या नास।।29।।

    अर्थ (Hindi)

    जोग सिद्धि फल समय जिमि जतिहि अबिद्या नास।।29।।

  287. RCM 2.30.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    एहि बिधि राउ मनहिं मन झाँखा। देखि कुभाँति कुमति मन माखा।।

    अर्थ (Hindi)

    एहि बिधि राउ मनहिं मन झाँखा। देखि कुभाँति कुमति मन माखा।।

  288. RCM 2.30.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भरतु कि राउर पूत न होहीं। आनेहु मोल बेसाहि कि मोही।।

    अर्थ (Hindi)

    भरतु कि राउर पूत न होहीं। आनेहु मोल बेसाहि कि मोही।।

  289. RCM 2.30.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जो सुनि सरु अस लाग तुम्हारें। काहे न बोलहु बचनु सँभारे।।

    अर्थ (Hindi)

    जो सुनि सरु अस लाग तुम्हारें। काहे न बोलहु बचनु सँभारे।।

  290. RCM 2.30.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    देहु उतरु अनु करहु कि नाहीं। सत्यसंध तुम्ह रघुकुल माहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    देहु उतरु अनु करहु कि नाहीं। सत्यसंध तुम्ह रघुकुल माहीं।।

  291. RCM 2.30.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    देन कहेहु अब जनि बरु देहू। तजहुँ सत्य जग अपजसु लेहू।।

    अर्थ (Hindi)

    देन कहेहु अब जनि बरु देहू। तजहुँ सत्य जग अपजसु लेहू।।

  292. RCM 2.30.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सत्य सराहि कहेहु बरु देना। जानेहु लेइहि मागि चबेना।।

    अर्थ (Hindi)

    सत्य सराहि कहेहु बरु देना। जानेहु लेइहि मागि चबेना।।

  293. RCM 2.30.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सिबि दधीचि बलि जो कछु भाषा। तनु धनु तजेउ बचन पनु राखा।।

    अर्थ (Hindi)

    सिबि दधीचि बलि जो कछु भाषा। तनु धनु तजेउ बचन पनु राखा।।

  294. RCM 2.30.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अति कटु बचन कहति कैकेई। मानहुँ लोन जरे पर देई।।

    अर्थ (Hindi)

    अति कटु बचन कहति कैकेई। मानहुँ लोन जरे पर देई।।

  295. RCM 2.30.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    धरम धुरंधर धीर धरि नयन उघारे रायँ।

    अर्थ (Hindi)

    धरम धुरंधर धीर धरि नयन उघारे रायँ।

  296. RCM 2.30.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सिरु धुनि लीन्हि उसास असि मारेसि मोहि कुठायँ।।30।।

    अर्थ (Hindi)

    सिरु धुनि लीन्हि उसास असि मारेसि मोहि कुठायँ।।30।।

  297. RCM 2.31.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    आगें दीखि जरत रिस भारी। मनहुँ रोष तरवारि उघारी।।

    अर्थ (Hindi)

    आगें दीखि जरत रिस भारी। मनहुँ रोष तरवारि उघारी।।

  298. RCM 2.31.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मूठि कुबुद्धि धार निठुराई। धरी कूबरीं सान बनाई।।

    अर्थ (Hindi)

    मूठि कुबुद्धि धार निठुराई। धरी कूबरीं सान बनाई।।

  299. RCM 2.31.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    लखी महीप कराल कठोरा। सत्य कि जीवनु लेइहि मोरा।।

    अर्थ (Hindi)

    लखी महीप कराल कठोरा। सत्य कि जीवनु लेइहि मोरा।।

  300. RCM 2.31.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बोले राउ कठिन करि छाती। बानी सबिनय तासु सोहाती।।

    अर्थ (Hindi)

    बोले राउ कठिन करि छाती। बानी सबिनय तासु सोहाती।।

  301. RCM 2.31.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    प्रिया बचन कस कहसि कुभाँती। भीर प्रतीति प्रीति करि हाँती।।

    अर्थ (Hindi)

    प्रिया बचन कस कहसि कुभाँती। भीर प्रतीति प्रीति करि हाँती।।

  302. RCM 2.31.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मोरें भरतु रामु दुइ आँखी। सत्य कहउँ करि संकरू साखी।।

    अर्थ (Hindi)

    मोरें भरतु रामु दुइ आँखी। सत्य कहउँ करि संकरू साखी।।

  303. RCM 2.31.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अवसि दूतु मैं पठइब प्राता। ऐहहिं बेगि सुनत दोउ भ्राता।।

    अर्थ (Hindi)

    अवसि दूतु मैं पठइब प्राता। ऐहहिं बेगि सुनत दोउ भ्राता।।

  304. RCM 2.31.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुदिन सोधि सबु साजु सजाई। देउँ भरत कहुँ राजु बजाई।।

    अर्थ (Hindi)

    सुदिन सोधि सबु साजु सजाई। देउँ भरत कहुँ राजु बजाई।।

  305. RCM 2.31.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    लोभु न रामहि राजु कर बहुत भरत पर प्रीति।

    अर्थ (Hindi)

    लोभु न रामहि राजु कर बहुत भरत पर प्रीति।

  306. RCM 2.31.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मैं बड़ छोट बिचारि जियँ करत रहेउँ नृपनीति।।31।।

    अर्थ (Hindi)

    मैं बड़ छोट बिचारि जियँ करत रहेउँ नृपनीति।।31।।

  307. RCM 2.32.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राम सपथ सत कहुउँ सुभाऊ। राममातु कछु कहेउ न काऊ।।

    अर्थ (Hindi)

    राम सपथ सत कहुउँ सुभाऊ। राममातु कछु कहेउ न काऊ।।

  308. RCM 2.32.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मैं सबु कीन्ह तोहि बिनु पूँछें। तेहि तें परेउ मनोरथु छूछें।।

    अर्थ (Hindi)

    मैं सबु कीन्ह तोहि बिनु पूँछें। तेहि तें परेउ मनोरथु छूछें।।

  309. RCM 2.32.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    रिस परिहरू अब मंगल साजू। कछु दिन गएँ भरत जुबराजू।।

    अर्थ (Hindi)

    रिस परिहरू अब मंगल साजू। कछु दिन गएँ भरत जुबराजू।।

  310. RCM 2.32.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    एकहि बात मोहि दुखु लागा। बर दूसर असमंजस मागा।।

    अर्थ (Hindi)

    एकहि बात मोहि दुखु लागा। बर दूसर असमंजस मागा।।

  311. RCM 2.32.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अजहुँ हृदय जरत तेहि आँचा। रिस परिहास कि साँचेहुँ साँचा।।

    अर्थ (Hindi)

    अजहुँ हृदय जरत तेहि आँचा। रिस परिहास कि साँचेहुँ साँचा।।

  312. RCM 2.32.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कहु तजि रोषु राम अपराधू। सबु कोउ कहइ रामु सुठि साधू।।

    अर्थ (Hindi)

    कहु तजि रोषु राम अपराधू। सबु कोउ कहइ रामु सुठि साधू।।

  313. RCM 2.32.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तुहूँ सराहसि करसि सनेहू। अब सुनि मोहि भयउ संदेहू।।

    अर्थ (Hindi)

    तुहूँ सराहसि करसि सनेहू। अब सुनि मोहि भयउ संदेहू।।

  314. RCM 2.32.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जासु सुभाउ अरिहि अनुकूला। सो किमि करिहि मातु प्रतिकूला।।

    अर्थ (Hindi)

    जासु सुभाउ अरिहि अनुकूला। सो किमि करिहि मातु प्रतिकूला।।

  315. RCM 2.32.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    प्रिया हास रिस परिहरहि मागु बिचारि बिबेकु।

    अर्थ (Hindi)

    प्रिया हास रिस परिहरहि मागु बिचारि बिबेकु।

  316. RCM 2.32.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जेहिं देखाँ अब नयन भरि भरत राज अभिषेकु।।32।।

    अर्थ (Hindi)

    जेहिं देखाँ अब नयन भरि भरत राज अभिषेकु।।32।।

  317. RCM 2.33.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जिऐ मीन बरू बारि बिहीना। मनि बिनु फनिकु जिऐ दुख दीना।।

    अर्थ (Hindi)

    जिऐ मीन बरू बारि बिहीना। मनि बिनु फनिकु जिऐ दुख दीना।।

  318. RCM 2.33.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कहउँ सुभाउ न छलु मन माहीं। जीवनु मोर राम बिनु नाहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    कहउँ सुभाउ न छलु मन माहीं। जीवनु मोर राम बिनु नाहीं।।

  319. RCM 2.33.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    समुझि देखु जियँ प्रिया प्रबीना। जीवनु राम दरस आधीना।।

    अर्थ (Hindi)

    समुझि देखु जियँ प्रिया प्रबीना। जीवनु राम दरस आधीना।।

  320. RCM 2.33.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनि म्रदु बचन कुमति अति जरई। मनहुँ अनल आहुति घृत परई।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनि म्रदु बचन कुमति अति जरई। मनहुँ अनल आहुति घृत परई।।

  321. RCM 2.33.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कहइ करहु किन कोटि उपाया। इहाँ न लागिहि राउरि माया।।

    अर्थ (Hindi)

    कहइ करहु किन कोटि उपाया। इहाँ न लागिहि राउरि माया।।

  322. RCM 2.33.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    देहु कि लेहु अजसु करि नाहीं। मोहि न बहुत प्रपंच सोहाहीं।

    अर्थ (Hindi)

    देहु कि लेहु अजसु करि नाहीं। मोहि न बहुत प्रपंच सोहाहीं।

  323. RCM 2.33.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    रामु साधु तुम्ह साधु सयाने। राममातु भलि सब पहिचाने।।

    अर्थ (Hindi)

    रामु साधु तुम्ह साधु सयाने। राममातु भलि सब पहिचाने।।

  324. RCM 2.33.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जस कौसिलाँ मोर भल ताका। तस फलु उन्हहि देउँ करि साका।।

    अर्थ (Hindi)

    जस कौसिलाँ मोर भल ताका। तस फलु उन्हहि देउँ करि साका।।

  325. RCM 2.33.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    होत प्रात मुनिबेष धरि जौं न रामु बन जाहिं।

    अर्थ (Hindi)

    होत प्रात मुनिबेष धरि जौं न रामु बन जाहिं।

  326. RCM 2.33.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मोर मरनु राउर अजस नृप समुझिअ मन माहिं।।33।।

    अर्थ (Hindi)

    मोर मरनु राउर अजस नृप समुझिअ मन माहिं।।33।।

  327. RCM 2.34.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अस कहि कुटिल भई उठि ठाढ़ी। मानहुँ रोष तरंगिनि बाढ़ी।।

    अर्थ (Hindi)

    अस कहि कुटिल भई उठि ठाढ़ी। मानहुँ रोष तरंगिनि बाढ़ी।।

  328. RCM 2.34.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पाप पहार प्रगट भइ सोई। भरी क्रोध जल जाइ न जोई।।

    अर्थ (Hindi)

    पाप पहार प्रगट भइ सोई। भरी क्रोध जल जाइ न जोई।।

  329. RCM 2.34.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    दोउ बर कूल कठिन हठ धारा। भवँर कूबरी बचन प्रचारा।।

    अर्थ (Hindi)

    दोउ बर कूल कठिन हठ धारा। भवँर कूबरी बचन प्रचारा।।

  330. RCM 2.34.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    ढाहत भूपरूप तरु मूला। चली बिपति बारिधि अनुकूला।।

    अर्थ (Hindi)

    ढाहत भूपरूप तरु मूला। चली बिपति बारिधि अनुकूला।।

  331. RCM 2.34.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    लखी नरेस बात फुरि साँची। तिय मिस मीचु सीस पर नाची।।

    अर्थ (Hindi)

    लखी नरेस बात फुरि साँची। तिय मिस मीचु सीस पर नाची।।

  332. RCM 2.34.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    गहि पद बिनय कीन्ह बैठारी। जनि दिनकर कुल होसि कुठारी।।

    अर्थ (Hindi)

    गहि पद बिनय कीन्ह बैठारी। जनि दिनकर कुल होसि कुठारी।।

  333. RCM 2.34.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मागु माथ अबहीं देउँ तोही। राम बिरहँ जनि मारसि मोही।।

    अर्थ (Hindi)

    मागु माथ अबहीं देउँ तोही। राम बिरहँ जनि मारसि मोही।।

  334. RCM 2.34.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राखु राम कहुँ जेहि तेहि भाँती। नाहिं त जरिहि जनम भरि छाती।।

    अर्थ (Hindi)

    राखु राम कहुँ जेहि तेहि भाँती। नाहिं त जरिहि जनम भरि छाती।।

  335. RCM 2.34.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    देखी ब्याधि असाध नृपु परेउ धरनि धुनि माथ।

    अर्थ (Hindi)

    देखी ब्याधि असाध नृपु परेउ धरनि धुनि माथ।

  336. RCM 2.34.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कहत परम आरत बचन राम राम रघुनाथ।।34।।

    अर्थ (Hindi)

    कहत परम आरत बचन राम राम रघुनाथ।।34।।

  337. RCM 2.35.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    ब्याकुल राउ सिथिल सब गाता। करिनि कलपतरु मनहुँ निपाता।।

    अर्थ (Hindi)

    ब्याकुल राउ सिथिल सब गाता। करिनि कलपतरु मनहुँ निपाता।।

  338. RCM 2.35.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कंठु सूख मुख आव न बानी। जनु पाठीनु दीन बिनु पानी।।

    अर्थ (Hindi)

    कंठु सूख मुख आव न बानी। जनु पाठीनु दीन बिनु पानी।।

  339. RCM 2.35.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पुनि कह कटु कठोर कैकेई। मनहुँ घाय महुँ माहुर देई।।

    अर्थ (Hindi)

    पुनि कह कटु कठोर कैकेई। मनहुँ घाय महुँ माहुर देई।।

  340. RCM 2.35.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जौं अंतहुँ अस करतबु रहेऊ। मागु मागु तुम्ह केहिं बल कहेऊ।।

    अर्थ (Hindi)

    जौं अंतहुँ अस करतबु रहेऊ। मागु मागु तुम्ह केहिं बल कहेऊ।।

  341. RCM 2.35.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    दुइ कि होइ एक समय भुआला। हँसब ठठाइ फुलाउब गाला।।

    अर्थ (Hindi)

    दुइ कि होइ एक समय भुआला। हँसब ठठाइ फुलाउब गाला।।

  342. RCM 2.35.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    दानि कहाउब अरु कृपनाई। होइ कि खेम कुसल रौताई।।

    अर्थ (Hindi)

    दानि कहाउब अरु कृपनाई। होइ कि खेम कुसल रौताई।।

  343. RCM 2.35.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    छाड़हु बचनु कि धीरजु धरहू। जनि अबला जिमि करुना करहू।।

    अर्थ (Hindi)

    छाड़हु बचनु कि धीरजु धरहू। जनि अबला जिमि करुना करहू।।

  344. RCM 2.35.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तनु तिय तनय धामु धनु धरनी। सत्यसंध कहुँ तृन सम बरनी।।

    अर्थ (Hindi)

    तनु तिय तनय धामु धनु धरनी। सत्यसंध कहुँ तृन सम बरनी।।

  345. RCM 2.35.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मरम बचन सुनि राउ कह कहु कछु दोषु न तोर।

    अर्थ (Hindi)

    मरम बचन सुनि राउ कह कहु कछु दोषु न तोर।

  346. RCM 2.35.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    लागेउ तोहि पिसाच जिमि कालु कहावत मोर।।35।।

    अर्थ (Hindi)

    लागेउ तोहि पिसाच जिमि कालु कहावत मोर।।35।।

  347. RCM 2.36.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    चहत न भरत भूपतहि भोरें। बिधि बस कुमति बसी जिय तोरें।।

    अर्थ (Hindi)

    चहत न भरत भूपतहि भोरें। बिधि बस कुमति बसी जिय तोरें।।

  348. RCM 2.36.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सो सबु मोर पाप परिनामू। भयउ कुठाहर जेहिं बिधि बामू।।

    अर्थ (Hindi)

    सो सबु मोर पाप परिनामू। भयउ कुठाहर जेहिं बिधि बामू।।

  349. RCM 2.36.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुबस बसिहि फिरि अवध सुहाई। सब गुन धाम राम प्रभुताई।।

    अर्थ (Hindi)

    सुबस बसिहि फिरि अवध सुहाई। सब गुन धाम राम प्रभुताई।।

  350. RCM 2.36.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    करिहहिं भाइ सकल सेवकाई। होइहि तिहुँ पुर राम बड़ाई।।

    अर्थ (Hindi)

    करिहहिं भाइ सकल सेवकाई। होइहि तिहुँ पुर राम बड़ाई।।

  351. RCM 2.36.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तोर कलंकु मोर पछिताऊ। मुएहुँ न मिटहि न जाइहि काऊ।।

    अर्थ (Hindi)

    तोर कलंकु मोर पछिताऊ। मुएहुँ न मिटहि न जाइहि काऊ।।

  352. RCM 2.36.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अब तोहि नीक लाग करु सोई। लोचन ओट बैठु मुहु गोई।।

    अर्थ (Hindi)

    अब तोहि नीक लाग करु सोई। लोचन ओट बैठु मुहु गोई।।

  353. RCM 2.36.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जब लगि जिऔं कहउँ कर जोरी। तब लगि जनि कछु कहसि बहोरी।।

    अर्थ (Hindi)

    जब लगि जिऔं कहउँ कर जोरी। तब लगि जनि कछु कहसि बहोरी।।

  354. RCM 2.36.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    फिरि पछितैहसि अंत अभागी। मारसि गाइ नहारु लागी।।

    अर्थ (Hindi)

    फिरि पछितैहसि अंत अभागी। मारसि गाइ नहारु लागी।।

  355. RCM 2.36.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    परेउ राउ कहि कोटि बिधि काहे करसि निदानु।

    अर्थ (Hindi)

    परेउ राउ कहि कोटि बिधि काहे करसि निदानु।

  356. RCM 2.36.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कपट सयानि न कहति कछु जागति मनहुँ मसानु।।36।।

    अर्थ (Hindi)

    कपट सयानि न कहति कछु जागति मनहुँ मसानु।।36।।

  357. RCM 2.37.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राम राम रट बिकल भुआलू। जनु बिनु पंख बिहंग बेहालू।।

    अर्थ (Hindi)

    राम राम रट बिकल भुआलू। जनु बिनु पंख बिहंग बेहालू।।

  358. RCM 2.37.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    हृदयँ मनाव भोरु जनि होई। रामहि जाइ कहै जनि कोई।।

    अर्थ (Hindi)

    हृदयँ मनाव भोरु जनि होई। रामहि जाइ कहै जनि कोई।।

  359. RCM 2.37.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    उदउ करहु जनि रबि रघुकुल गुर। अवध बिलोकि सूल होइहि उर।।

    अर्थ (Hindi)

    उदउ करहु जनि रबि रघुकुल गुर। अवध बिलोकि सूल होइहि उर।।

  360. RCM 2.37.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भूप प्रीति कैकइ कठिनाई। उभय अवधि बिधि रची बनाई।।

    अर्थ (Hindi)

    भूप प्रीति कैकइ कठिनाई। उभय अवधि बिधि रची बनाई।।

  361. RCM 2.37.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बिलपत नृपहि भयउ भिनुसारा। बीना बेनु संख धुनि द्वारा।।

    अर्थ (Hindi)

    बिलपत नृपहि भयउ भिनुसारा। बीना बेनु संख धुनि द्वारा।।

  362. RCM 2.37.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पढ़हिं भाट गुन गावहिं गायक। सुनत नृपहि जनु लागहिं सायक।।

    अर्थ (Hindi)

    पढ़हिं भाट गुन गावहिं गायक। सुनत नृपहि जनु लागहिं सायक।।

  363. RCM 2.37.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मंगल सकल सोहाहिं न कैसें। सहगामिनिहि बिभूषन जैसें।।

    अर्थ (Hindi)

    मंगल सकल सोहाहिं न कैसें। सहगामिनिहि बिभूषन जैसें।।

  364. RCM 2.37.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तेहिं निसि नीद परी नहि काहू। राम दरस लालसा उछाहू।।

    अर्थ (Hindi)

    तेहिं निसि नीद परी नहि काहू। राम दरस लालसा उछाहू।।

  365. RCM 2.37.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    द्वार भीर सेवक सचिव कहहिं उदित रबि देखि।

    अर्थ (Hindi)

    द्वार भीर सेवक सचिव कहहिं उदित रबि देखि।

  366. RCM 2.37.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जागेउ अजहुँ न अवधपति कारनु कवनु बिसेषि।।37।।

    अर्थ (Hindi)

    जागेउ अजहुँ न अवधपति कारनु कवनु बिसेषि।।37।।

  367. RCM 2.38.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पछिले पहर भूपु नित जागा। आजु हमहि बड़ अचरजु लागा।।

    अर्थ (Hindi)

    पछिले पहर भूपु नित जागा। आजु हमहि बड़ अचरजु लागा।।

  368. RCM 2.38.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जाहु सुमंत्र जगावहु जाई। कीजिअ काजु रजायसु पाई।।

    अर्थ (Hindi)

    जाहु सुमंत्र जगावहु जाई। कीजिअ काजु रजायसु पाई।।

  369. RCM 2.38.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    गए सुमंत्रु तब राउर माही। देखि भयावन जात डेराहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    गए सुमंत्रु तब राउर माही। देखि भयावन जात डेराहीं।।

  370. RCM 2.38.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    धाइ खाइ जनु जाइ न हेरा। मानहुँ बिपति बिषाद बसेरा।।

    अर्थ (Hindi)

    धाइ खाइ जनु जाइ न हेरा। मानहुँ बिपति बिषाद बसेरा।।

  371. RCM 2.38.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पूछें कोउ न ऊतरु देई। गए जेंहिं भवन भूप कैकैई।।

    अर्थ (Hindi)

    पूछें कोउ न ऊतरु देई। गए जेंहिं भवन भूप कैकैई।।

  372. RCM 2.38.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कहि जयजीव बैठ सिरु नाई। दैखि भूप गति गयउ सुखाई।।

    अर्थ (Hindi)

    कहि जयजीव बैठ सिरु नाई। दैखि भूप गति गयउ सुखाई।।

  373. RCM 2.38.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सोच बिकल बिबरन महि परेऊ। मानहुँ कमल मूलु परिहरेऊ।।

    अर्थ (Hindi)

    सोच बिकल बिबरन महि परेऊ। मानहुँ कमल मूलु परिहरेऊ।।

  374. RCM 2.38.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सचिउ सभीत सकइ नहिं पूँछी। बोली असुभ भरी सुभ छूछी।।

    अर्थ (Hindi)

    सचिउ सभीत सकइ नहिं पूँछी। बोली असुभ भरी सुभ छूछी।।

  375. RCM 2.38.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    परी न राजहि नीद निसि हेतु जान जगदीसु।

    अर्थ (Hindi)

    परी न राजहि नीद निसि हेतु जान जगदीसु।

  376. RCM 2.38.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    रामु रामु रटि भोरु किय कहइ न मरमु महीसु।।38।।

    अर्थ (Hindi)

    रामु रामु रटि भोरु किय कहइ न मरमु महीसु।।38।।

  377. RCM 2.39.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    आनहु रामहि बेगि बोलाई। समाचार तब पूँछेहु आई।।

    अर्थ (Hindi)

    आनहु रामहि बेगि बोलाई। समाचार तब पूँछेहु आई।।

  378. RCM 2.39.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    चलेउ सुमंत्र राय रूख जानी। लखी कुचालि कीन्हि कछु रानी।।

    अर्थ (Hindi)

    चलेउ सुमंत्र राय रूख जानी। लखी कुचालि कीन्हि कछु रानी।।

  379. RCM 2.39.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सोच बिकल मग परइ न पाऊ। रामहि बोलि कहिहि का राऊ।।

    अर्थ (Hindi)

    सोच बिकल मग परइ न पाऊ। रामहि बोलि कहिहि का राऊ।।

  380. RCM 2.39.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    उर धरि धीरजु गयउ दुआरें। पूछँहिं सकल देखि मनु मारें।।

    अर्थ (Hindi)

    उर धरि धीरजु गयउ दुआरें। पूछँहिं सकल देखि मनु मारें।।

  381. RCM 2.39.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    समाधानु करि सो सबही का। गयउ जहाँ दिनकर कुल टीका।।

    अर्थ (Hindi)

    समाधानु करि सो सबही का। गयउ जहाँ दिनकर कुल टीका।।

  382. RCM 2.39.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    रामु सुमंत्रहि आवत देखा। आदरु कीन्ह पिता सम लेखा।।

    अर्थ (Hindi)

    रामु सुमंत्रहि आवत देखा। आदरु कीन्ह पिता सम लेखा।।

  383. RCM 2.39.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    निरखि बदनु कहि भूप रजाई। रघुकुलदीपहि चलेउ लेवाई।।

    अर्थ (Hindi)

    निरखि बदनु कहि भूप रजाई। रघुकुलदीपहि चलेउ लेवाई।।

  384. RCM 2.39.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    रामु कुभाँति सचिव सँग जाहीं। देखि लोग जहँ तहँ बिलखाहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    रामु कुभाँति सचिव सँग जाहीं। देखि लोग जहँ तहँ बिलखाहीं।।

  385. RCM 2.39.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जाइ दीख रघुबंसमनि नरपति निपट कुसाजु।।

    अर्थ (Hindi)

    जाइ दीख रघुबंसमनि नरपति निपट कुसाजु।।

  386. RCM 2.39.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सहमि परेउ लखि सिंघिनिहि मनहुँ बृद्ध गजराजु।।39।।

    अर्थ (Hindi)

    सहमि परेउ लखि सिंघिनिहि मनहुँ बृद्ध गजराजु।।39।।

  387. RCM 2.40.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सूखहिं अधर जरइ सबु अंगू। मनहुँ दीन मनिहीन भुअंगू।।

    अर्थ (Hindi)

    सूखहिं अधर जरइ सबु अंगू। मनहुँ दीन मनिहीन भुअंगू।।

  388. RCM 2.40.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सरुष समीप दीखि कैकेई। मानहुँ मीचु घरी गनि लेई।।

    अर्थ (Hindi)

    सरुष समीप दीखि कैकेई। मानहुँ मीचु घरी गनि लेई।।

  389. RCM 2.40.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    करुनामय मृदु राम सुभाऊ। प्रथम दीख दुखु सुना न काऊ।।

    अर्थ (Hindi)

    करुनामय मृदु राम सुभाऊ। प्रथम दीख दुखु सुना न काऊ।।

  390. RCM 2.40.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तदपि धीर धरि समउ बिचारी। पूँछी मधुर बचन महतारी।।

    अर्थ (Hindi)

    तदपि धीर धरि समउ बिचारी। पूँछी मधुर बचन महतारी।।

  391. RCM 2.40.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मोहि कहु मातु तात दुख कारन। करिअ जतन जेहिं होइ निवारन।।

    अर्थ (Hindi)

    मोहि कहु मातु तात दुख कारन। करिअ जतन जेहिं होइ निवारन।।

  392. RCM 2.40.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनहु राम सबु कारन एहू। राजहि तुम पर बहुत सनेहू।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनहु राम सबु कारन एहू। राजहि तुम पर बहुत सनेहू।।

  393. RCM 2.40.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    देन कहेन्हि मोहि दुइ बरदाना। मागेउँ जो कछु मोहि सोहाना।

    अर्थ (Hindi)

    देन कहेन्हि मोहि दुइ बरदाना। मागेउँ जो कछु मोहि सोहाना।

  394. RCM 2.40.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सो सुनि भयउ भूप उर सोचू। छाड़ि न सकहिं तुम्हार सँकोचू।।

    अर्थ (Hindi)

    सो सुनि भयउ भूप उर सोचू। छाड़ि न सकहिं तुम्हार सँकोचू।।

  395. RCM 2.40.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुत सनेह इत बचनु उत संकट परेउ नरेसु।

    अर्थ (Hindi)

    सुत सनेह इत बचनु उत संकट परेउ नरेसु।

  396. RCM 2.40.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सकहु न आयसु धरहु सिर मेटहु कठिन कलेसु।।40।।

    अर्थ (Hindi)

    सकहु न आयसु धरहु सिर मेटहु कठिन कलेसु।।40।।

  397. RCM 2.41.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    निधरक बैठि कहइ कटु बानी। सुनत कठिनता अति अकुलानी।।

    अर्थ (Hindi)

    निधरक बैठि कहइ कटु बानी। सुनत कठिनता अति अकुलानी।।

  398. RCM 2.41.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जीभ कमान बचन सर नाना। मनहुँ महिप मृदु लच्छ समाना।।

    अर्थ (Hindi)

    जीभ कमान बचन सर नाना। मनहुँ महिप मृदु लच्छ समाना।।

  399. RCM 2.41.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जनु कठोरपनु धरें सरीरू। सिखइ धनुषबिद्या बर बीरू।।

    अर्थ (Hindi)

    जनु कठोरपनु धरें सरीरू। सिखइ धनुषबिद्या बर बीरू।।

  400. RCM 2.41.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सब प्रसंगु रघुपतिहि सुनाई। बैठि मनहुँ तनु धरि निठुराई।।

    अर्थ (Hindi)

    सब प्रसंगु रघुपतिहि सुनाई। बैठि मनहुँ तनु धरि निठुराई।।

  401. RCM 2.41.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मन मुसकाइ भानुकुल भानु। रामु सहज आनंद निधानू।।

    अर्थ (Hindi)

    मन मुसकाइ भानुकुल भानु। रामु सहज आनंद निधानू।।

  402. RCM 2.41.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बोले बचन बिगत सब दूषन। मृदु मंजुल जनु बाग बिभूषन।।

    अर्थ (Hindi)

    बोले बचन बिगत सब दूषन। मृदु मंजुल जनु बाग बिभूषन।।

  403. RCM 2.41.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनु जननी सोइ सुतु बड़भागी। जो पितु मातु बचन अनुरागी।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनु जननी सोइ सुतु बड़भागी। जो पितु मातु बचन अनुरागी।।

  404. RCM 2.41.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तनय मातु पितु तोषनिहारा। दुर्लभ जननि सकल संसारा।।

    अर्थ (Hindi)

    तनय मातु पितु तोषनिहारा। दुर्लभ जननि सकल संसारा।।

  405. RCM 2.41.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मुनिगन मिलनु बिसेषि बन सबहि भाँति हित मोर।

    अर्थ (Hindi)

    मुनिगन मिलनु बिसेषि बन सबहि भाँति हित मोर।

  406. RCM 2.41.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तेहि महँ पितु आयसु बहुरि संमत जननी तोर।।41।।

    अर्थ (Hindi)

    तेहि महँ पितु आयसु बहुरि संमत जननी तोर।।41।।

  407. RCM 2.42.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भरत प्रानप्रिय पावहिं राजू। बिधि सब बिधि मोहि सनमुख आजु।

    अर्थ (Hindi)

    भरत प्रानप्रिय पावहिं राजू। बिधि सब बिधि मोहि सनमुख आजु।

  408. RCM 2.42.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जों न जाउँ बन ऐसेहु काजा। प्रथम गनिअ मोहि मूढ़ समाजा।।

    अर्थ (Hindi)

    जों न जाउँ बन ऐसेहु काजा। प्रथम गनिअ मोहि मूढ़ समाजा।।

  409. RCM 2.42.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सेवहिं अरँडु कलपतरु त्यागी। परिहरि अमृत लेहिं बिषु मागी।।

    अर्थ (Hindi)

    सेवहिं अरँडु कलपतरु त्यागी। परिहरि अमृत लेहिं बिषु मागी।।

  410. RCM 2.42.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तेउ न पाइ अस समउ चुकाहीं। देखु बिचारि मातु मन माहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    तेउ न पाइ अस समउ चुकाहीं। देखु बिचारि मातु मन माहीं।।

  411. RCM 2.42.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अंब एक दुखु मोहि बिसेषी। निपट बिकल नरनायकु देखी।।

    अर्थ (Hindi)

    अंब एक दुखु मोहि बिसेषी। निपट बिकल नरनायकु देखी।।

  412. RCM 2.42.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    थोरिहिं बात पितहि दुख भारी। होति प्रतीति न मोहि महतारी।।

    अर्थ (Hindi)

    थोरिहिं बात पितहि दुख भारी। होति प्रतीति न मोहि महतारी।।

  413. RCM 2.42.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राउ धीर गुन उदधि अगाधू। भा मोहि ते कछु बड़ अपराधू।।

    अर्थ (Hindi)

    राउ धीर गुन उदधि अगाधू। भा मोहि ते कछु बड़ अपराधू।।

  414. RCM 2.42.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जातें मोहि न कहत कछु राऊ। मोरि सपथ तोहि कहु सतिभाऊ।।

    अर्थ (Hindi)

    जातें मोहि न कहत कछु राऊ। मोरि सपथ तोहि कहु सतिभाऊ।।

  415. RCM 2.42.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सहज सरल रघुबर बचन कुमति कुटिल करि जान।

    अर्थ (Hindi)

    सहज सरल रघुबर बचन कुमति कुटिल करि जान।

  416. RCM 2.42.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    चलइ जोंक जल बक्रगति जद्यपि सलिलु समान।।42।।

    अर्थ (Hindi)

    चलइ जोंक जल बक्रगति जद्यपि सलिलु समान।।42।।

  417. RCM 2.43.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    रहसी रानि राम रुख पाई। बोली कपट सनेहु जनाई।।

    अर्थ (Hindi)

    रहसी रानि राम रुख पाई। बोली कपट सनेहु जनाई।।

  418. RCM 2.43.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सपथ तुम्हार भरत कै आना। हेतु न दूसर मै कछु जाना।।

    अर्थ (Hindi)

    सपथ तुम्हार भरत कै आना। हेतु न दूसर मै कछु जाना।।

  419. RCM 2.43.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तुम्ह अपराध जोगु नहिं ताता। जननी जनक बंधु सुखदाता।।

    अर्थ (Hindi)

    तुम्ह अपराध जोगु नहिं ताता। जननी जनक बंधु सुखदाता।।

  420. RCM 2.43.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राम सत्य सबु जो कछु कहहू। तुम्ह पितु मातु बचन रत अहहू।।

    अर्थ (Hindi)

    राम सत्य सबु जो कछु कहहू। तुम्ह पितु मातु बचन रत अहहू।।

  421. RCM 2.43.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पितहि बुझाइ कहहु बलि सोई। चौथेंपन जेहिं अजसु न होई।।

    अर्थ (Hindi)

    पितहि बुझाइ कहहु बलि सोई। चौथेंपन जेहिं अजसु न होई।।

  422. RCM 2.43.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तुम्ह सम सुअन सुकृत जेहिं दीन्हे। उचित न तासु निरादरु कीन्हे।।

    अर्थ (Hindi)

    तुम्ह सम सुअन सुकृत जेहिं दीन्हे। उचित न तासु निरादरु कीन्हे।।

  423. RCM 2.43.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    लागहिं कुमुख बचन सुभ कैसे। मगहँ गयादिक तीरथ जैसे।।

    अर्थ (Hindi)

    लागहिं कुमुख बचन सुभ कैसे। मगहँ गयादिक तीरथ जैसे।।

  424. RCM 2.43.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    रामहि मातु बचन सब भाए। जिमि सुरसरि गत सलिल सुहाए।।

    अर्थ (Hindi)

    रामहि मातु बचन सब भाए। जिमि सुरसरि गत सलिल सुहाए।।

  425. RCM 2.43.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    गइ मुरुछा रामहि सुमिरि नृप फिरि करवट लीन्ह।

    अर्थ (Hindi)

    गइ मुरुछा रामहि सुमिरि नृप फिरि करवट लीन्ह।

  426. RCM 2.43.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सचिव राम आगमन कहि बिनय समय सम कीन्ह।।43।।

    अर्थ (Hindi)

    सचिव राम आगमन कहि बिनय समय सम कीन्ह।।43।।

  427. RCM 2.44.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अवनिप अकनि रामु पगु धारे। धरि धीरजु तब नयन उघारे।।

    अर्थ (Hindi)

    अवनिप अकनि रामु पगु धारे। धरि धीरजु तब नयन उघारे।।

  428. RCM 2.44.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सचिवँ सँभारि राउ बैठारे। चरन परत नृप रामु निहारे।।

    अर्थ (Hindi)

    सचिवँ सँभारि राउ बैठारे। चरन परत नृप रामु निहारे।।

  429. RCM 2.44.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    लिए सनेह बिकल उर लाई। गै मनि मनहुँ फनिक फिरि पाई।।

    अर्थ (Hindi)

    लिए सनेह बिकल उर लाई। गै मनि मनहुँ फनिक फिरि पाई।।

  430. RCM 2.44.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    रामहि चितइ रहेउ नरनाहू। चला बिलोचन बारि प्रबाहू।।

    अर्थ (Hindi)

    रामहि चितइ रहेउ नरनाहू। चला बिलोचन बारि प्रबाहू।।

  431. RCM 2.44.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सोक बिबस कछु कहै न पारा। हृदयँ लगावत बारहिं बारा।।

    अर्थ (Hindi)

    सोक बिबस कछु कहै न पारा। हृदयँ लगावत बारहिं बारा।।

  432. RCM 2.44.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बिधिहि मनाव राउ मन माहीं। जेहिं रघुनाथ न कानन जाहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    बिधिहि मनाव राउ मन माहीं। जेहिं रघुनाथ न कानन जाहीं।।

  433. RCM 2.44.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुमिरि महेसहि कहइ निहोरी। बिनती सुनहु सदासिव मोरी।।

    अर्थ (Hindi)

    सुमिरि महेसहि कहइ निहोरी। बिनती सुनहु सदासिव मोरी।।

  434. RCM 2.44.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    आसुतोष तुम्ह अवढर दानी। आरति हरहु दीन जनु जानी।।

    अर्थ (Hindi)

    आसुतोष तुम्ह अवढर दानी। आरति हरहु दीन जनु जानी।।

  435. RCM 2.44.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तुम्ह प्रेरक सब के हृदयँ सो मति रामहि देहु।

    अर्थ (Hindi)

    तुम्ह प्रेरक सब के हृदयँ सो मति रामहि देहु।

  436. RCM 2.44.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बचनु मोर तजि रहहि घर परिहरि सीलु सनेहु।।44।।

    अर्थ (Hindi)

    बचनु मोर तजि रहहि घर परिहरि सीलु सनेहु।।44।।

  437. RCM 2.45.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अजसु होउ जग सुजसु नसाऊ। नरक परौ बरु सुरपुरु जाऊ।।

    अर्थ (Hindi)

    अजसु होउ जग सुजसु नसाऊ। नरक परौ बरु सुरपुरु जाऊ।।

  438. RCM 2.45.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सब दुख दुसह सहावहु मोही। लोचन ओट रामु जनि होंही।।

    अर्थ (Hindi)

    सब दुख दुसह सहावहु मोही। लोचन ओट रामु जनि होंही।।

  439. RCM 2.45.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अस मन गुनइ राउ नहिं बोला। पीपर पात सरिस मनु डोला।।

    अर्थ (Hindi)

    अस मन गुनइ राउ नहिं बोला। पीपर पात सरिस मनु डोला।।

  440. RCM 2.45.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    रघुपति पितहि प्रेमबस जानी। पुनि कछु कहिहि मातु अनुमानी।।

    अर्थ (Hindi)

    रघुपति पितहि प्रेमबस जानी। पुनि कछु कहिहि मातु अनुमानी।।

  441. RCM 2.45.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    देस काल अवसर अनुसारी। बोले बचन बिनीत बिचारी।।

    अर्थ (Hindi)

    देस काल अवसर अनुसारी। बोले बचन बिनीत बिचारी।।

  442. RCM 2.45.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तात कहउँ कछु करउँ ढिठाई। अनुचितु छमब जानि लरिकाई।।

    अर्थ (Hindi)

    तात कहउँ कछु करउँ ढिठाई। अनुचितु छमब जानि लरिकाई।।

  443. RCM 2.45.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अति लघु बात लागि दुखु पावा। काहुँ न मोहि कहि प्रथम जनावा।।

    अर्थ (Hindi)

    अति लघु बात लागि दुखु पावा। काहुँ न मोहि कहि प्रथम जनावा।।

  444. RCM 2.45.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    देखि गोसाइँहि पूँछिउँ माता। सुनि प्रसंगु भए सीतल गाता।।

    अर्थ (Hindi)

    देखि गोसाइँहि पूँछिउँ माता। सुनि प्रसंगु भए सीतल गाता।।

  445. RCM 2.45.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मंगल समय सनेह बस सोच परिहरिअ तात।

    अर्थ (Hindi)

    मंगल समय सनेह बस सोच परिहरिअ तात।

  446. RCM 2.45.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    आयसु देइअ हरषि हियँ कहि पुलके प्रभु गात।।45।।

    अर्थ (Hindi)

    आयसु देइअ हरषि हियँ कहि पुलके प्रभु गात।।45।।

  447. RCM 2.46.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    धन्य जनमु जगतीतल तासू। पितहि प्रमोदु चरित सुनि जासू।।

    अर्थ (Hindi)

    धन्य जनमु जगतीतल तासू। पितहि प्रमोदु चरित सुनि जासू।।

  448. RCM 2.46.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    चारि पदारथ करतल ताकें। प्रिय पितु मातु प्रान सम जाकें।।

    अर्थ (Hindi)

    चारि पदारथ करतल ताकें। प्रिय पितु मातु प्रान सम जाकें।।

  449. RCM 2.46.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    आयसु पालि जनम फलु पाई। ऐहउँ बेगिहिं होउ रजाई।।

    अर्थ (Hindi)

    आयसु पालि जनम फलु पाई। ऐहउँ बेगिहिं होउ रजाई।।

  450. RCM 2.46.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बिदा मातु सन आवउँ मागी। चलिहउँ बनहि बहुरि पग लागी।।

    अर्थ (Hindi)

    बिदा मातु सन आवउँ मागी। चलिहउँ बनहि बहुरि पग लागी।।

  451. RCM 2.46.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अस कहि राम गवनु तब कीन्हा। भूप सोक बसु उतरु न दीन्हा।।

    अर्थ (Hindi)

    अस कहि राम गवनु तब कीन्हा। भूप सोक बसु उतरु न दीन्हा।।

  452. RCM 2.46.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नगर ब्यापि गइ बात सुतीछी। छुअत चढ़ी जनु सब तन बीछी।।

    अर्थ (Hindi)

    नगर ब्यापि गइ बात सुतीछी। छुअत चढ़ी जनु सब तन बीछी।।

  453. RCM 2.46.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनि भए बिकल सकल नर नारी। बेलि बिटप जिमि देखि दवारी।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनि भए बिकल सकल नर नारी। बेलि बिटप जिमि देखि दवारी।।

  454. RCM 2.46.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जो जहँ सुनइ धुनइ सिरु सोई। बड़ बिषादु नहिं धीरजु होई।।

    अर्थ (Hindi)

    जो जहँ सुनइ धुनइ सिरु सोई। बड़ बिषादु नहिं धीरजु होई।।

  455. RCM 2.46.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मुख सुखाहिं लोचन स्त्रवहि सोकु न हृदयँ समाइ।

    अर्थ (Hindi)

    मुख सुखाहिं लोचन स्त्रवहि सोकु न हृदयँ समाइ।

  456. RCM 2.46.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मनहुँ करुन रस कटकई उतरी अवध बजाइ।।46।।

    अर्थ (Hindi)

    मनहुँ करुन रस कटकई उतरी अवध बजाइ।।46।।

  457. RCM 2.47.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मिलेहि माझ बिधि बात बेगारी। जहँ तहँ देहिं कैकेइहि गारी।।

    अर्थ (Hindi)

    मिलेहि माझ बिधि बात बेगारी। जहँ तहँ देहिं कैकेइहि गारी।।

  458. RCM 2.47.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    एहि पापिनिहि बूझि का परेऊ। छाइ भवन पर पावकु धरेऊ।।

    अर्थ (Hindi)

    एहि पापिनिहि बूझि का परेऊ। छाइ भवन पर पावकु धरेऊ।।

  459. RCM 2.47.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    निज कर नयन काढ़ि चह दीखा। डारि सुधा बिषु चाहत चीखा।।

    अर्थ (Hindi)

    निज कर नयन काढ़ि चह दीखा। डारि सुधा बिषु चाहत चीखा।।

  460. RCM 2.47.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कुटिल कठोर कुबुद्धि अभागी। भइ रघुबंस बेनु बन आगी।।

    अर्थ (Hindi)

    कुटिल कठोर कुबुद्धि अभागी। भइ रघुबंस बेनु बन आगी।।

  461. RCM 2.47.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पालव बैठि पेड़ु एहिं काटा। सुख महुँ सोक ठाटु धरि ठाटा।।

    अर्थ (Hindi)

    पालव बैठि पेड़ु एहिं काटा। सुख महुँ सोक ठाटु धरि ठाटा।।

  462. RCM 2.47.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सदा रामु एहि प्रान समाना। कारन कवन कुटिलपनु ठाना।।

    अर्थ (Hindi)

    सदा रामु एहि प्रान समाना। कारन कवन कुटिलपनु ठाना।।

  463. RCM 2.47.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सत्य कहहिं कबि नारि सुभाऊ। सब बिधि अगहु अगाध दुराऊ।।

    अर्थ (Hindi)

    सत्य कहहिं कबि नारि सुभाऊ। सब बिधि अगहु अगाध दुराऊ।।

  464. RCM 2.47.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    निज प्रतिबिंबु बरुकु गहि जाई। जानि न जाइ नारि गति भाई।।

    अर्थ (Hindi)

    निज प्रतिबिंबु बरुकु गहि जाई। जानि न जाइ नारि गति भाई।।

  465. RCM 2.47.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    काह न पावकु जारि सक का न समुद्र समाइ।

    अर्थ (Hindi)

    काह न पावकु जारि सक का न समुद्र समाइ।

  466. RCM 2.47.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    का न करै अबला प्रबल केहि जग कालु न खाइ।।47।।

    अर्थ (Hindi)

    का न करै अबला प्रबल केहि जग कालु न खाइ।।47।।

  467. RCM 2.48.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    का सुनाइ बिधि काह सुनावा। का देखाइ चह काह देखावा।।

    अर्थ (Hindi)

    का सुनाइ बिधि काह सुनावा। का देखाइ चह काह देखावा।।

  468. RCM 2.48.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    एक कहहिं भल भूप न कीन्हा। बरु बिचारि नहिं कुमतिहि दीन्हा।।

    अर्थ (Hindi)

    एक कहहिं भल भूप न कीन्हा। बरु बिचारि नहिं कुमतिहि दीन्हा।।

  469. RCM 2.48.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जो हठि भयउ सकल दुख भाजनु। अबला बिबस ग्यानु गुनु गा जनु।।

    अर्थ (Hindi)

    जो हठि भयउ सकल दुख भाजनु। अबला बिबस ग्यानु गुनु गा जनु।।

  470. RCM 2.48.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    एक धरम परमिति पहिचाने। नृपहि दोसु नहिं देहिं सयाने।।

    अर्थ (Hindi)

    एक धरम परमिति पहिचाने। नृपहि दोसु नहिं देहिं सयाने।।

  471. RCM 2.48.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सिबि दधीचि हरिचंद कहानी। एक एक सन कहहिं बखानी।।

    अर्थ (Hindi)

    सिबि दधीचि हरिचंद कहानी। एक एक सन कहहिं बखानी।।

  472. RCM 2.48.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    एक भरत कर संमत कहहीं। एक उदास भायँ सुनि रहहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    एक भरत कर संमत कहहीं। एक उदास भायँ सुनि रहहीं।।

  473. RCM 2.48.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कान मूदि कर रद गहि जीहा। एक कहहिं यह बात अलीहा।।

    अर्थ (Hindi)

    कान मूदि कर रद गहि जीहा। एक कहहिं यह बात अलीहा।।

  474. RCM 2.48.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुकृत जाहिं अस कहत तुम्हारे। रामु भरत कहुँ प्रानपिआरे।।

    अर्थ (Hindi)

    सुकृत जाहिं अस कहत तुम्हारे। रामु भरत कहुँ प्रानपिआरे।।

  475. RCM 2.48.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    चंदु चवै बरु अनल कन सुधा होइ बिषतूल।

    अर्थ (Hindi)

    चंदु चवै बरु अनल कन सुधा होइ बिषतूल।

  476. RCM 2.48.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सपनेहुँ कबहुँ न करहिं किछु भरतु राम प्रतिकूल।।48।।

    अर्थ (Hindi)

    सपनेहुँ कबहुँ न करहिं किछु भरतु राम प्रतिकूल।।48।।

  477. RCM 2.49.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    एक बिधातहिं दूषनु देंहीं। सुधा देखाइ दीन्ह बिषु जेहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    एक बिधातहिं दूषनु देंहीं। सुधा देखाइ दीन्ह बिषु जेहीं।।

  478. RCM 2.49.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    खरभरु नगर सोचु सब काहू। दुसह दाहु उर मिटा उछाहू।।

    अर्थ (Hindi)

    खरभरु नगर सोचु सब काहू। दुसह दाहु उर मिटा उछाहू।।

  479. RCM 2.49.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बिप्रबधू कुलमान्य जठेरी। जे प्रिय परम कैकेई केरी।।

    अर्थ (Hindi)

    बिप्रबधू कुलमान्य जठेरी। जे प्रिय परम कैकेई केरी।।

  480. RCM 2.49.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    लगीं देन सिख सीलु सराही। बचन बानसम लागहिं ताही।।

    अर्थ (Hindi)

    लगीं देन सिख सीलु सराही। बचन बानसम लागहिं ताही।।

  481. RCM 2.49.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भरतु न मोहि प्रिय राम समाना। सदा कहहु यहु सबु जगु जाना।।

    अर्थ (Hindi)

    भरतु न मोहि प्रिय राम समाना। सदा कहहु यहु सबु जगु जाना।।

  482. RCM 2.49.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    करहु राम पर सहज सनेहू। केहिं अपराध आजु बनु देहू।।

    अर्थ (Hindi)

    करहु राम पर सहज सनेहू। केहिं अपराध आजु बनु देहू।।

  483. RCM 2.49.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कबहुँ न कियहु सवति आरेसू। प्रीति प्रतीति जान सबु देसू।।

    अर्थ (Hindi)

    कबहुँ न कियहु सवति आरेसू। प्रीति प्रतीति जान सबु देसू।।

  484. RCM 2.49.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कौसल्याँ अब काह बिगारा। तुम्ह जेहि लागि बज्र पुर पारा।।

    अर्थ (Hindi)

    कौसल्याँ अब काह बिगारा। तुम्ह जेहि लागि बज्र पुर पारा।।

  485. RCM 2.49.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सीय कि पिय सँगु परिहरिहि लखनु कि रहिहहिं धाम।

    अर्थ (Hindi)

    सीय कि पिय सँगु परिहरिहि लखनु कि रहिहहिं धाम।

  486. RCM 2.49.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राजु कि भूँजब भरत पुर नृपु कि जिइहि बिनु राम।।49।।

    अर्थ (Hindi)

    राजु कि भूँजब भरत पुर नृपु कि जिइहि बिनु राम।।49।।

  487. RCM 2.50.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अस बिचारि उर छाड़हु कोहू। सोक कलंक कोठि जनि होहू।।

    अर्थ (Hindi)

    अस बिचारि उर छाड़हु कोहू। सोक कलंक कोठि जनि होहू।।

  488. RCM 2.50.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भरतहि अवसि देहु जुबराजू। कानन काह राम कर काजू।।

    अर्थ (Hindi)

    भरतहि अवसि देहु जुबराजू। कानन काह राम कर काजू।।

  489. RCM 2.50.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नाहिन रामु राज के भूखे। धरम धुरीन बिषय रस रूखे।।

    अर्थ (Hindi)

    नाहिन रामु राज के भूखे। धरम धुरीन बिषय रस रूखे।।

  490. RCM 2.50.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    गुर गृह बसहुँ रामु तजि गेहू। नृप सन अस बरु दूसर लेहू।।

    अर्थ (Hindi)

    गुर गृह बसहुँ रामु तजि गेहू। नृप सन अस बरु दूसर लेहू।।

  491. RCM 2.50.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जौं नहिं लगिहहु कहें हमारे। नहिं लागिहि कछु हाथ तुम्हारे।।

    अर्थ (Hindi)

    जौं नहिं लगिहहु कहें हमारे। नहिं लागिहि कछु हाथ तुम्हारे।।

  492. RCM 2.50.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जौं परिहास कीन्हि कछु होई। तौ कहि प्रगट जनावहु सोई।।

    अर्थ (Hindi)

    जौं परिहास कीन्हि कछु होई। तौ कहि प्रगट जनावहु सोई।।

  493. RCM 2.50.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राम सरिस सुत कानन जोगू। काह कहिहि सुनि तुम्ह कहुँ लोगू।।

    अर्थ (Hindi)

    राम सरिस सुत कानन जोगू। काह कहिहि सुनि तुम्ह कहुँ लोगू।।

  494. RCM 2.50.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    उठहु बेगि सोइ करहु उपाई। जेहि बिधि सोकु कलंकु नसाई।।

    अर्थ (Hindi)

    उठहु बेगि सोइ करहु उपाई। जेहि बिधि सोकु कलंकु नसाई।।

  495. RCM 2.51.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    उतरु न देइ दुसह रिस रूखी। मृगिन्ह चितव जनु बाघिनि भूखी।।

    अर्थ (Hindi)

    उतरु न देइ दुसह रिस रूखी। मृगिन्ह चितव जनु बाघिनि भूखी।।

  496. RCM 2.51.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    ब्याधि असाधि जानि तिन्ह त्यागी। चलीं कहत मतिमंद अभागी।।

    अर्थ (Hindi)

    ब्याधि असाधि जानि तिन्ह त्यागी। चलीं कहत मतिमंद अभागी।।

  497. RCM 2.51.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राजु करत यह दैअँ बिगोई। कीन्हेसि अस जस करइ न कोई।।

    अर्थ (Hindi)

    राजु करत यह दैअँ बिगोई। कीन्हेसि अस जस करइ न कोई।।

  498. RCM 2.51.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    एहि बिधि बिलपहिं पुर नर नारीं। देहिं कुचालिहि कोटिक गारीं।।

    अर्थ (Hindi)

    एहि बिधि बिलपहिं पुर नर नारीं। देहिं कुचालिहि कोटिक गारीं।।

  499. RCM 2.51.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जरहिं बिषम जर लेहिं उसासा। कवनि राम बिनु जीवन आसा।।

    अर्थ (Hindi)

    जरहिं बिषम जर लेहिं उसासा। कवनि राम बिनु जीवन आसा।।

  500. RCM 2.51.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बिपुल बियोग प्रजा अकुलानी। जनु जलचर गन सूखत पानी।।

    अर्थ (Hindi)

    बिपुल बियोग प्रजा अकुलानी। जनु जलचर गन सूखत पानी।।

  501. RCM 2.51.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अति बिषाद बस लोग लोगाई। गए मातु पहिं रामु गोसाई।।

    अर्थ (Hindi)

    अति बिषाद बस लोग लोगाई। गए मातु पहिं रामु गोसाई।।

  502. RCM 2.51.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मुख प्रसन्न चित चौगुन चाऊ। मिटा सोचु जनि राखै राऊ।।

    अर्थ (Hindi)

    मुख प्रसन्न चित चौगुन चाऊ। मिटा सोचु जनि राखै राऊ।।

  503. RCM 2.51.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नव गयंदु रघुबीर मनु राजु अलान समान।

    अर्थ (Hindi)

    नव गयंदु रघुबीर मनु राजु अलान समान।

  504. RCM 2.51.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    छूट जानि बन गवनु सुनि उर अनंदु अधिकान।।51।।

    अर्थ (Hindi)

    छूट जानि बन गवनु सुनि उर अनंदु अधिकान।।51।।

  505. RCM 2.52.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    रघुकुलतिलक जोरि दोउ हाथा। मुदित मातु पद नायउ माथा।।

    अर्थ (Hindi)

    रघुकुलतिलक जोरि दोउ हाथा। मुदित मातु पद नायउ माथा।।

  506. RCM 2.52.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    दीन्हि असीस लाइ उर लीन्हे। भूषन बसन निछावरि कीन्हे।।

    अर्थ (Hindi)

    दीन्हि असीस लाइ उर लीन्हे। भूषन बसन निछावरि कीन्हे।।

  507. RCM 2.52.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बार बार मुख चुंबति माता। नयन नेह जलु पुलकित गाता।।

    अर्थ (Hindi)

    बार बार मुख चुंबति माता। नयन नेह जलु पुलकित गाता।।

  508. RCM 2.52.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    गोद राखि पुनि हृदयँ लगाए। स्त्रवत प्रेनरस पयद सुहाए।।

    अर्थ (Hindi)

    गोद राखि पुनि हृदयँ लगाए। स्त्रवत प्रेनरस पयद सुहाए।।

  509. RCM 2.52.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    प्रेमु प्रमोदु न कछु कहि जाई। रंक धनद पदबी जनु पाई।।

    अर्थ (Hindi)

    प्रेमु प्रमोदु न कछु कहि जाई। रंक धनद पदबी जनु पाई।।

  510. RCM 2.52.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सादर सुंदर बदनु निहारी। बोली मधुर बचन महतारी।।

    अर्थ (Hindi)

    सादर सुंदर बदनु निहारी। बोली मधुर बचन महतारी।।

  511. RCM 2.52.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कहहु तात जननी बलिहारी। कबहिं लगन मुद मंगलकारी।।

    अर्थ (Hindi)

    कहहु तात जननी बलिहारी। कबहिं लगन मुद मंगलकारी।।

  512. RCM 2.52.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुकृत सील सुख सीवँ सुहाई। जनम लाभ कइ अवधि अघाई।।

    अर्थ (Hindi)

    सुकृत सील सुख सीवँ सुहाई। जनम लाभ कइ अवधि अघाई।।

  513. RCM 2.52.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जेहि चाहत नर नारि सब अति आरत एहि भाँति।

    अर्थ (Hindi)

    जेहि चाहत नर नारि सब अति आरत एहि भाँति।

  514. RCM 2.52.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जिमि चातक चातकि तृषित बृष्टि सरद रितु स्वाति।।52।।

    अर्थ (Hindi)

    जिमि चातक चातकि तृषित बृष्टि सरद रितु स्वाति।।52।।

  515. RCM 2.53.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तात जाउँ बलि बेगि नहाहू। जो मन भाव मधुर कछु खाहू।।

    अर्थ (Hindi)

    तात जाउँ बलि बेगि नहाहू। जो मन भाव मधुर कछु खाहू।।

  516. RCM 2.53.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पितु समीप तब जाएहु भैआ। भइ बड़ि बार जाइ बलि मैआ।।

    अर्थ (Hindi)

    पितु समीप तब जाएहु भैआ। भइ बड़ि बार जाइ बलि मैआ।।

  517. RCM 2.53.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मातु बचन सुनि अति अनुकूला। जनु सनेह सुरतरु के फूला।।

    अर्थ (Hindi)

    मातु बचन सुनि अति अनुकूला। जनु सनेह सुरतरु के फूला।।

  518. RCM 2.53.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुख मकरंद भरे श्रियमूला। निरखि राम मनु भवरुँ न भूला।।

    अर्थ (Hindi)

    सुख मकरंद भरे श्रियमूला। निरखि राम मनु भवरुँ न भूला।।

  519. RCM 2.53.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    धरम धुरीन धरम गति जानी। कहेउ मातु सन अति मृदु बानी।।

    अर्थ (Hindi)

    धरम धुरीन धरम गति जानी। कहेउ मातु सन अति मृदु बानी।।

  520. RCM 2.53.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पिताँ दीन्ह मोहि कानन राजू। जहँ सब भाँति मोर बड़ काजू।।

    अर्थ (Hindi)

    पिताँ दीन्ह मोहि कानन राजू। जहँ सब भाँति मोर बड़ काजू।।

  521. RCM 2.53.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    आयसु देहि मुदित मन माता। जेहिं मुद मंगल कानन जाता।।

    अर्थ (Hindi)

    आयसु देहि मुदित मन माता। जेहिं मुद मंगल कानन जाता।।

  522. RCM 2.53.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जनि सनेह बस डरपसि भोरें। आनँदु अंब अनुग्रह तोरें।।

    अर्थ (Hindi)

    जनि सनेह बस डरपसि भोरें। आनँदु अंब अनुग्रह तोरें।।

  523. RCM 2.53.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बरष चारिदस बिपिन बसि करि पितु बचन प्रमान।

    अर्थ (Hindi)

    बरष चारिदस बिपिन बसि करि पितु बचन प्रमान।

  524. RCM 2.53.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    आइ पाय पुनि देखिहउँ मनु जनि करसि मलान।।53।।

    अर्थ (Hindi)

    आइ पाय पुनि देखिहउँ मनु जनि करसि मलान।।53।।

  525. RCM 2.54.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बचन बिनीत मधुर रघुबर के। सर सम लगे मातु उर करके।।

    अर्थ (Hindi)

    बचन बिनीत मधुर रघुबर के। सर सम लगे मातु उर करके।।

  526. RCM 2.54.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सहमि सूखि सुनि सीतलि बानी। जिमि जवास परें पावस पानी।।

    अर्थ (Hindi)

    सहमि सूखि सुनि सीतलि बानी। जिमि जवास परें पावस पानी।।

  527. RCM 2.54.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कहि न जाइ कछु हृदय बिषादू। मनहुँ मृगी सुनि केहरि नादू।।

    अर्थ (Hindi)

    कहि न जाइ कछु हृदय बिषादू। मनहुँ मृगी सुनि केहरि नादू।।

  528. RCM 2.54.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नयन सजल तन थर थर काँपी। माजहि खाइ मीन जनु मापी।।

    अर्थ (Hindi)

    नयन सजल तन थर थर काँपी। माजहि खाइ मीन जनु मापी।।

  529. RCM 2.54.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    धरि धीरजु सुत बदनु निहारी। गदगद बचन कहति महतारी।।

    अर्थ (Hindi)

    धरि धीरजु सुत बदनु निहारी। गदगद बचन कहति महतारी।।

  530. RCM 2.54.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तात पितहि तुम्ह प्रानपिआरे। देखि मुदित नित चरित तुम्हारे।।

    अर्थ (Hindi)

    तात पितहि तुम्ह प्रानपिआरे। देखि मुदित नित चरित तुम्हारे।।

  531. RCM 2.54.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राजु देन कहुँ सुभ दिन साधा। कहेउ जान बन केहिं अपराधा।।

    अर्थ (Hindi)

    राजु देन कहुँ सुभ दिन साधा। कहेउ जान बन केहिं अपराधा।।

  532. RCM 2.54.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तात सुनावहु मोहि निदानू। को दिनकर कुल भयउ कृसानू।।

    अर्थ (Hindi)

    तात सुनावहु मोहि निदानू। को दिनकर कुल भयउ कृसानू।।

  533. RCM 2.54.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    निरखि राम रुख सचिवसुत कारनु कहेउ बुझाइ।

    अर्थ (Hindi)

    निरखि राम रुख सचिवसुत कारनु कहेउ बुझाइ।

  534. RCM 2.54.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनि प्रसंगु रहि मूक जिमि दसा बरनि नहिं जाइ।।54।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनि प्रसंगु रहि मूक जिमि दसा बरनि नहिं जाइ।।54।।

  535. RCM 2.55.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राखि न सकइ न कहि सक जाहू। दुहूँ भाँति उर दारुन दाहू।।

    अर्थ (Hindi)

    राखि न सकइ न कहि सक जाहू। दुहूँ भाँति उर दारुन दाहू।।

  536. RCM 2.55.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    लिखत सुधाकर गा लिखि राहू। बिधि गति बाम सदा सब काहू।।

    अर्थ (Hindi)

    लिखत सुधाकर गा लिखि राहू। बिधि गति बाम सदा सब काहू।।

  537. RCM 2.55.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    धरम सनेह उभयँ मति घेरी। भइ गति साँप छुछुंदरि केरी।।

    अर्थ (Hindi)

    धरम सनेह उभयँ मति घेरी। भइ गति साँप छुछुंदरि केरी।।

  538. RCM 2.55.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राखउँ सुतहि करउँ अनुरोधू। धरमु जाइ अरु बंधु बिरोधू।।

    अर्थ (Hindi)

    राखउँ सुतहि करउँ अनुरोधू। धरमु जाइ अरु बंधु बिरोधू।।

  539. RCM 2.55.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कहउँ जान बन तौ बड़ि हानी। संकट सोच बिबस भइ रानी।।

    अर्थ (Hindi)

    कहउँ जान बन तौ बड़ि हानी। संकट सोच बिबस भइ रानी।।

  540. RCM 2.55.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बहुरि समुझि तिय धरमु सयानी। रामु भरतु दोउ सुत सम जानी।।

    अर्थ (Hindi)

    बहुरि समुझि तिय धरमु सयानी। रामु भरतु दोउ सुत सम जानी।।

  541. RCM 2.55.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सरल सुभाउ राम महतारी। बोली बचन धीर धरि भारी।।

    अर्थ (Hindi)

    सरल सुभाउ राम महतारी। बोली बचन धीर धरि भारी।।

  542. RCM 2.55.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तात जाउँ बलि कीन्हेहु नीका। पितु आयसु सब धरमक टीका।।

    अर्थ (Hindi)

    तात जाउँ बलि कीन्हेहु नीका। पितु आयसु सब धरमक टीका।।

  543. RCM 2.55.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राजु देन कहि दीन्ह बनु मोहि न सो दुख लेसु।

    अर्थ (Hindi)

    राजु देन कहि दीन्ह बनु मोहि न सो दुख लेसु।

  544. RCM 2.55.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तुम्ह बिनु भरतहि भूपतिहि प्रजहि प्रचंड कलेसु।।55।।

    अर्थ (Hindi)

    तुम्ह बिनु भरतहि भूपतिहि प्रजहि प्रचंड कलेसु।।55।।

  545. RCM 2.56.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जौं केवल पितु आयसु ताता। तौ जनि जाहु जानि बड़ि माता।।

    अर्थ (Hindi)

    जौं केवल पितु आयसु ताता। तौ जनि जाहु जानि बड़ि माता।।

  546. RCM 2.56.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जौं पितु मातु कहेउ बन जाना। तौं कानन सत अवध समाना।।

    अर्थ (Hindi)

    जौं पितु मातु कहेउ बन जाना। तौं कानन सत अवध समाना।।

  547. RCM 2.56.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पितु बनदेव मातु बनदेवी। खग मृग चरन सरोरुह सेवी।।

    अर्थ (Hindi)

    पितु बनदेव मातु बनदेवी। खग मृग चरन सरोरुह सेवी।।

  548. RCM 2.56.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अंतहुँ उचित नृपहि बनबासू। बय बिलोकि हियँ होइ हराँसू।।

    अर्थ (Hindi)

    अंतहुँ उचित नृपहि बनबासू। बय बिलोकि हियँ होइ हराँसू।।

  549. RCM 2.56.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बड़भागी बनु अवध अभागी। जो रघुबंसतिलक तुम्ह त्यागी।।

    अर्थ (Hindi)

    बड़भागी बनु अवध अभागी। जो रघुबंसतिलक तुम्ह त्यागी।।

  550. RCM 2.56.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जौं सुत कहौ संग मोहि लेहू। तुम्हरे हृदयँ होइ संदेहू।।

    अर्थ (Hindi)

    जौं सुत कहौ संग मोहि लेहू। तुम्हरे हृदयँ होइ संदेहू।।

  551. RCM 2.56.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पूत परम प्रिय तुम्ह सबही के। प्रान प्रान के जीवन जी के।।

    अर्थ (Hindi)

    पूत परम प्रिय तुम्ह सबही के। प्रान प्रान के जीवन जी के।।

  552. RCM 2.56.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    ते तुम्ह कहहु मातु बन जाऊँ। मैं सुनि बचन बैठि पछिताऊँ।।

    अर्थ (Hindi)

    ते तुम्ह कहहु मातु बन जाऊँ। मैं सुनि बचन बैठि पछिताऊँ।।

  553. RCM 2.56.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    यह बिचारि नहिं करउँ हठ झूठ सनेहु बढ़ाइ।

    अर्थ (Hindi)

    यह बिचारि नहिं करउँ हठ झूठ सनेहु बढ़ाइ।

  554. RCM 2.56.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मानि मातु कर नात बलि सुरति बिसरि जनि जाइ।।56।।

    अर्थ (Hindi)

    मानि मातु कर नात बलि सुरति बिसरि जनि जाइ।।56।।

  555. RCM 2.57.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    देव पितर सब तुन्हहि गोसाई। राखहुँ पलक नयन की नाई।।

    अर्थ (Hindi)

    देव पितर सब तुन्हहि गोसाई। राखहुँ पलक नयन की नाई।।

  556. RCM 2.57.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अवधि अंबु प्रिय परिजन मीना। तुम्ह करुनाकर धरम धुरीना।।

    अर्थ (Hindi)

    अवधि अंबु प्रिय परिजन मीना। तुम्ह करुनाकर धरम धुरीना।।

  557. RCM 2.57.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अस बिचारि सोइ करहु उपाई। सबहि जिअत जेहिं भेंटेहु आई।।

    अर्थ (Hindi)

    अस बिचारि सोइ करहु उपाई। सबहि जिअत जेहिं भेंटेहु आई।।

  558. RCM 2.57.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जाहु सुखेन बनहि बलि जाऊँ। करि अनाथ जन परिजन गाऊँ।।

    अर्थ (Hindi)

    जाहु सुखेन बनहि बलि जाऊँ। करि अनाथ जन परिजन गाऊँ।।

  559. RCM 2.57.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सब कर आजु सुकृत फल बीता। भयउ कराल कालु बिपरीता।।

    अर्थ (Hindi)

    सब कर आजु सुकृत फल बीता। भयउ कराल कालु बिपरीता।।

  560. RCM 2.57.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बहुबिधि बिलपि चरन लपटानी। परम अभागिनि आपुहि जानी।।

    अर्थ (Hindi)

    बहुबिधि बिलपि चरन लपटानी। परम अभागिनि आपुहि जानी।।

  561. RCM 2.57.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    दारुन दुसह दाहु उर ब्यापा। बरनि न जाहिं बिलाप कलापा।।

    अर्थ (Hindi)

    दारुन दुसह दाहु उर ब्यापा। बरनि न जाहिं बिलाप कलापा।।

  562. RCM 2.57.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राम उठाइ मातु उर लाई। कहि मृदु बचन बहुरि समुझाई।।

    अर्थ (Hindi)

    राम उठाइ मातु उर लाई। कहि मृदु बचन बहुरि समुझाई।।

  563. RCM 2.57.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    समाचार तेहि समय सुनि सीय उठी अकुलाइ।

    अर्थ (Hindi)

    समाचार तेहि समय सुनि सीय उठी अकुलाइ।

  564. RCM 2.57.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जाइ सासु पद कमल जुग बंदि बैठि सिरु नाइ।।57।।

    अर्थ (Hindi)

    जाइ सासु पद कमल जुग बंदि बैठि सिरु नाइ।।57।।

  565. RCM 2.58.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    दीन्हि असीस सासु मृदु बानी। अति सुकुमारि देखि अकुलानी।।

    अर्थ (Hindi)

    दीन्हि असीस सासु मृदु बानी। अति सुकुमारि देखि अकुलानी।।

  566. RCM 2.58.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बैठि नमितमुख सोचति सीता। रूप रासि पति प्रेम पुनीता।।

    अर्थ (Hindi)

    बैठि नमितमुख सोचति सीता। रूप रासि पति प्रेम पुनीता।।

  567. RCM 2.58.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    चलन चहत बन जीवननाथू। केहि सुकृती सन होइहि साथू।।

    अर्थ (Hindi)

    चलन चहत बन जीवननाथू। केहि सुकृती सन होइहि साथू।।

  568. RCM 2.58.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    की तनु प्रान कि केवल प्राना। बिधि करतबु कछु जाइ न जाना।।

    अर्थ (Hindi)

    की तनु प्रान कि केवल प्राना। बिधि करतबु कछु जाइ न जाना।।

  569. RCM 2.58.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    चारु चरन नख लेखति धरनी। नूपुर मुखर मधुर कबि बरनी।।

    अर्थ (Hindi)

    चारु चरन नख लेखति धरनी। नूपुर मुखर मधुर कबि बरनी।।

  570. RCM 2.58.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मनहुँ प्रेम बस बिनती करहीं। हमहि सीय पद जनि परिहरहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    मनहुँ प्रेम बस बिनती करहीं। हमहि सीय पद जनि परिहरहीं।।

  571. RCM 2.58.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मंजु बिलोचन मोचति बारी। बोली देखि राम महतारी।।

    अर्थ (Hindi)

    मंजु बिलोचन मोचति बारी। बोली देखि राम महतारी।।

  572. RCM 2.58.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तात सुनहु सिय अति सुकुमारी। सासु ससुर परिजनहि पिआरी।।

    अर्थ (Hindi)

    तात सुनहु सिय अति सुकुमारी। सासु ससुर परिजनहि पिआरी।।

  573. RCM 2.58.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पिता जनक भूपाल मनि ससुर भानुकुल भानु।

    अर्थ (Hindi)

    पिता जनक भूपाल मनि ससुर भानुकुल भानु।

  574. RCM 2.58.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पति रबिकुल कैरव बिपिन बिधु गुन रूप निधानु।।58।।

    अर्थ (Hindi)

    पति रबिकुल कैरव बिपिन बिधु गुन रूप निधानु।।58।।

  575. RCM 2.59.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मैं पुनि पुत्रबधू प्रिय पाई। रूप रासि गुन सील सुहाई।।

    अर्थ (Hindi)

    मैं पुनि पुत्रबधू प्रिय पाई। रूप रासि गुन सील सुहाई।।

  576. RCM 2.59.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नयन पुतरि करि प्रीति बढ़ाई। राखेउँ प्रान जानिकिहिं लाई।।

    अर्थ (Hindi)

    नयन पुतरि करि प्रीति बढ़ाई। राखेउँ प्रान जानिकिहिं लाई।।

  577. RCM 2.59.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कलपबेलि जिमि बहुबिधि लाली। सींचि सनेह सलिल प्रतिपाली।।

    अर्थ (Hindi)

    कलपबेलि जिमि बहुबिधि लाली। सींचि सनेह सलिल प्रतिपाली।।

  578. RCM 2.59.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    फूलत फलत भयउ बिधि बामा। जानि न जाइ काह परिनामा।।

    अर्थ (Hindi)

    फूलत फलत भयउ बिधि बामा। जानि न जाइ काह परिनामा।।

  579. RCM 2.59.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पलँग पीठ तजि गोद हिंड़ोरा। सियँ न दीन्ह पगु अवनि कठोरा।।

    अर्थ (Hindi)

    पलँग पीठ तजि गोद हिंड़ोरा। सियँ न दीन्ह पगु अवनि कठोरा।।

  580. RCM 2.59.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जिअनमूरि जिमि जोगवत रहऊँ। दीप बाति नहिं टारन कहऊँ।।

    अर्थ (Hindi)

    जिअनमूरि जिमि जोगवत रहऊँ। दीप बाति नहिं टारन कहऊँ।।

  581. RCM 2.59.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सोइ सिय चलन चहति बन साथा। आयसु काह होइ रघुनाथा।

    अर्थ (Hindi)

    सोइ सिय चलन चहति बन साथा। आयसु काह होइ रघुनाथा।

  582. RCM 2.59.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    चंद किरन रस रसिक चकोरी। रबि रुख नयन सकइ किमि जोरी।।

    अर्थ (Hindi)

    चंद किरन रस रसिक चकोरी। रबि रुख नयन सकइ किमि जोरी।।

  583. RCM 2.59.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    करि केहरि निसिचर चरहिं दुष्ट जंतु बन भूरि।

    अर्थ (Hindi)

    करि केहरि निसिचर चरहिं दुष्ट जंतु बन भूरि।

  584. RCM 2.59.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बिष बाटिकाँ कि सोह सुत सुभग सजीवनि मूरि।।59।।

    अर्थ (Hindi)

    बिष बाटिकाँ कि सोह सुत सुभग सजीवनि मूरि।।59।।

  585. RCM 2.60.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बन हित कोल किरात किसोरी। रचीं बिरंचि बिषय सुख भोरी।।

    अर्थ (Hindi)

    बन हित कोल किरात किसोरी। रचीं बिरंचि बिषय सुख भोरी।।

  586. RCM 2.60.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पाइन कृमि जिमि कठिन सुभाऊ। तिन्हहि कलेसु न कानन काऊ।।

    अर्थ (Hindi)

    पाइन कृमि जिमि कठिन सुभाऊ। तिन्हहि कलेसु न कानन काऊ।।

  587. RCM 2.60.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कै तापस तिय कानन जोगू। जिन्ह तप हेतु तजा सब भोगू।।

    अर्थ (Hindi)

    कै तापस तिय कानन जोगू। जिन्ह तप हेतु तजा सब भोगू।।

  588. RCM 2.60.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सिय बन बसिहि तात केहि भाँती। चित्रलिखित कपि देखि डेराती।।

    अर्थ (Hindi)

    सिय बन बसिहि तात केहि भाँती। चित्रलिखित कपि देखि डेराती।।

  589. RCM 2.60.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुरसर सुभग बनज बन चारी। डाबर जोगु कि हंसकुमारी।।

    अर्थ (Hindi)

    सुरसर सुभग बनज बन चारी। डाबर जोगु कि हंसकुमारी।।

  590. RCM 2.60.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अस बिचारि जस आयसु होई। मैं सिख देउँ जानकिहि सोई।।

    अर्थ (Hindi)

    अस बिचारि जस आयसु होई। मैं सिख देउँ जानकिहि सोई।।

  591. RCM 2.60.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जौं सिय भवन रहै कह अंबा। मोहि कहँ होइ बहुत अवलंबा।।

    अर्थ (Hindi)

    जौं सिय भवन रहै कह अंबा। मोहि कहँ होइ बहुत अवलंबा।।

  592. RCM 2.60.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनि रघुबीर मातु प्रिय बानी। सील सनेह सुधाँ जनु सानी।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनि रघुबीर मातु प्रिय बानी। सील सनेह सुधाँ जनु सानी।।

  593. RCM 2.60.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कहि प्रिय बचन बिबेकमय कीन्हि मातु परितोष।

    अर्थ (Hindi)

    कहि प्रिय बचन बिबेकमय कीन्हि मातु परितोष।

  594. RCM 2.60.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    लगे प्रबोधन जानकिहि प्रगटि बिपिन गुन दोष।।60।।

    अर्थ (Hindi)

    लगे प्रबोधन जानकिहि प्रगटि बिपिन गुन दोष।।60।।

  595. RCM 2.61.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मातु समीप कहत सकुचाहीं। बोले समउ समुझि मन माहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    मातु समीप कहत सकुचाहीं। बोले समउ समुझि मन माहीं।।

  596. RCM 2.61.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राजकुमारि सिखावन सुनहू। आन भाँति जियँ जनि कछु गुनहू।।

    अर्थ (Hindi)

    राजकुमारि सिखावन सुनहू। आन भाँति जियँ जनि कछु गुनहू।।

  597. RCM 2.61.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    आपन मोर नीक जौं चहहू। बचनु हमार मानि गृह रहहू।।

    अर्थ (Hindi)

    आपन मोर नीक जौं चहहू। बचनु हमार मानि गृह रहहू।।

  598. RCM 2.61.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    आयसु मोर सासु सेवकाई। सब बिधि भामिनि भवन भलाई।।

    अर्थ (Hindi)

    आयसु मोर सासु सेवकाई। सब बिधि भामिनि भवन भलाई।।

  599. RCM 2.61.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    एहि ते अधिक धरमु नहिं दूजा। सादर सासु ससुर पद पूजा।।

    अर्थ (Hindi)

    एहि ते अधिक धरमु नहिं दूजा। सादर सासु ससुर पद पूजा।।

  600. RCM 2.61.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जब जब मातु करिहि सुधि मोरी। होइहि प्रेम बिकल मति भोरी।।

    अर्थ (Hindi)

    जब जब मातु करिहि सुधि मोरी। होइहि प्रेम बिकल मति भोरी।।

  601. RCM 2.61.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तब तब तुम्ह कहि कथा पुरानी। सुंदरि समुझाएहु मृदु बानी।।

    अर्थ (Hindi)

    तब तब तुम्ह कहि कथा पुरानी। सुंदरि समुझाएहु मृदु बानी।।

  602. RCM 2.61.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कहउँ सुभायँ सपथ सत मोही। सुमुखि मातु हित राखउँ तोही।।

    अर्थ (Hindi)

    कहउँ सुभायँ सपथ सत मोही। सुमुखि मातु हित राखउँ तोही।।

  603. RCM 2.61.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    गुर श्रुति संमत धरम फलु पाइअ बिनहिं कलेस।

    अर्थ (Hindi)

    गुर श्रुति संमत धरम फलु पाइअ बिनहिं कलेस।

  604. RCM 2.61.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    हठ बस सब संकट सहे गालव नहुष नरेस।।61।।

    अर्थ (Hindi)

    हठ बस सब संकट सहे गालव नहुष नरेस।।61।।

  605. RCM 2.62.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मैं पुनि करि प्रवान पितु बानी। बेगि फिरब सुनु सुमुखि सयानी।।

    अर्थ (Hindi)

    मैं पुनि करि प्रवान पितु बानी। बेगि फिरब सुनु सुमुखि सयानी।।

  606. RCM 2.62.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    दिवस जात नहिं लागिहि बारा। सुंदरि सिखवनु सुनहु हमारा।।

    अर्थ (Hindi)

    दिवस जात नहिं लागिहि बारा। सुंदरि सिखवनु सुनहु हमारा।।

  607. RCM 2.62.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जौ हठ करहु प्रेम बस बामा। तौ तुम्ह दुखु पाउब परिनामा।।

    अर्थ (Hindi)

    जौ हठ करहु प्रेम बस बामा। तौ तुम्ह दुखु पाउब परिनामा।।

  608. RCM 2.62.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    काननु कठिन भयंकरु भारी। घोर घामु हिम बारि बयारी।।

    अर्थ (Hindi)

    काननु कठिन भयंकरु भारी। घोर घामु हिम बारि बयारी।।

  609. RCM 2.62.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कुस कंटक मग काँकर नाना। चलब पयादेहिं बिनु पदत्राना।।

    अर्थ (Hindi)

    कुस कंटक मग काँकर नाना। चलब पयादेहिं बिनु पदत्राना।।

  610. RCM 2.62.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    चरन कमल मुदु मंजु तुम्हारे। मारग अगम भूमिधर भारे।।

    अर्थ (Hindi)

    चरन कमल मुदु मंजु तुम्हारे। मारग अगम भूमिधर भारे।।

  611. RCM 2.62.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कंदर खोह नदीं नद नारे। अगम अगाध न जाहिं निहारे।।

    अर्थ (Hindi)

    कंदर खोह नदीं नद नारे। अगम अगाध न जाहिं निहारे।।

  612. RCM 2.62.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भालु बाघ बृक केहरि नागा। करहिं नाद सुनि धीरजु भागा।।

    अर्थ (Hindi)

    भालु बाघ बृक केहरि नागा। करहिं नाद सुनि धीरजु भागा।।

  613. RCM 2.62.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भूमि सयन बलकल बसन असनु कंद फल मूल।

    अर्थ (Hindi)

    भूमि सयन बलकल बसन असनु कंद फल मूल।

  614. RCM 2.62.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    ते कि सदा सब दिन मिलिहिं सबुइ समय अनुकूल।।62।।

    अर्थ (Hindi)

    ते कि सदा सब दिन मिलिहिं सबुइ समय अनुकूल।।62।।

  615. RCM 2.63.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नर अहार रजनीचर चरहीं। कपट बेष बिधि कोटिक करहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    नर अहार रजनीचर चरहीं। कपट बेष बिधि कोटिक करहीं।।

  616. RCM 2.63.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    लागइ अति पहार कर पानी। बिपिन बिपति नहिं जाइ बखानी।।

    अर्थ (Hindi)

    लागइ अति पहार कर पानी। बिपिन बिपति नहिं जाइ बखानी।।

  617. RCM 2.63.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    ब्याल कराल बिहग बन घोरा। निसिचर निकर नारि नर चोरा।।

    अर्थ (Hindi)

    ब्याल कराल बिहग बन घोरा। निसिचर निकर नारि नर चोरा।।

  618. RCM 2.63.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    डरपहिं धीर गहन सुधि आएँ। मृगलोचनि तुम्ह भीरु सुभाएँ।।

    अर्थ (Hindi)

    डरपहिं धीर गहन सुधि आएँ। मृगलोचनि तुम्ह भीरु सुभाएँ।।

  619. RCM 2.63.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    हंसगवनि तुम्ह नहिं बन जोगू। सुनि अपजसु मोहि देइहि लोगू।।

    अर्थ (Hindi)

    हंसगवनि तुम्ह नहिं बन जोगू। सुनि अपजसु मोहि देइहि लोगू।।

  620. RCM 2.63.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मानस सलिल सुधाँ प्रतिपाली। जिअइ कि लवन पयोधि मराली।।

    अर्थ (Hindi)

    मानस सलिल सुधाँ प्रतिपाली। जिअइ कि लवन पयोधि मराली।।

  621. RCM 2.63.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नव रसाल बन बिहरनसीला। सोह कि कोकिल बिपिन करीला।।

    अर्थ (Hindi)

    नव रसाल बन बिहरनसीला। सोह कि कोकिल बिपिन करीला।।

  622. RCM 2.63.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    रहहु भवन अस हृदयँ बिचारी। चंदबदनि दुखु कानन भारी।।

    अर्थ (Hindi)

    रहहु भवन अस हृदयँ बिचारी। चंदबदनि दुखु कानन भारी।।

  623. RCM 2.63.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सहज सुह्द गुर स्वामि सिख जो न करइ सिर मानि।।

    अर्थ (Hindi)

    सहज सुह्द गुर स्वामि सिख जो न करइ सिर मानि।।

  624. RCM 2.63.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सो पछिताइ अघाइ उर अवसि होइ हित हानि।।63।।

    अर्थ (Hindi)

    सो पछिताइ अघाइ उर अवसि होइ हित हानि।।63।।

  625. RCM 2.64.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनि मृदु बचन मनोहर पिय के। लोचन ललित भरे जल सिय के।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनि मृदु बचन मनोहर पिय के। लोचन ललित भरे जल सिय के।।

  626. RCM 2.64.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सीतल सिख दाहक भइ कैंसें। चकइहि सरद चंद निसि जैंसें।।

    अर्थ (Hindi)

    सीतल सिख दाहक भइ कैंसें। चकइहि सरद चंद निसि जैंसें।।

  627. RCM 2.64.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    उतरु न आव बिकल बैदेही। तजन चहत सुचि स्वामि सनेही।।

    अर्थ (Hindi)

    उतरु न आव बिकल बैदेही। तजन चहत सुचि स्वामि सनेही।।

  628. RCM 2.64.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बरबस रोकि बिलोचन बारी। धरि धीरजु उर अवनिकुमारी।।

    अर्थ (Hindi)

    बरबस रोकि बिलोचन बारी। धरि धीरजु उर अवनिकुमारी।।

  629. RCM 2.64.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    लागि सासु पग कह कर जोरी। छमबि देबि बड़ि अबिनय मोरी।।

    अर्थ (Hindi)

    लागि सासु पग कह कर जोरी। छमबि देबि बड़ि अबिनय मोरी।।

  630. RCM 2.64.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    दीन्हि प्रानपति मोहि सिख सोई। जेहि बिधि मोर परम हित होई।।

    अर्थ (Hindi)

    दीन्हि प्रानपति मोहि सिख सोई। जेहि बिधि मोर परम हित होई।।

  631. RCM 2.64.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मैं पुनि समुझि दीखि मन माहीं। पिय बियोग सम दुखु जग नाहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    मैं पुनि समुझि दीखि मन माहीं। पिय बियोग सम दुखु जग नाहीं।।

  632. RCM 2.64.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    प्राननाथ करुनायतन सुंदर सुखद सुजान।

    अर्थ (Hindi)

    प्राननाथ करुनायतन सुंदर सुखद सुजान।

  633. RCM 2.64.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तुम्ह बिनु रघुकुल कुमुद बिधु सुरपुर नरक समान।।64।।

    अर्थ (Hindi)

    तुम्ह बिनु रघुकुल कुमुद बिधु सुरपुर नरक समान।।64।।

  634. RCM 2.65.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मातु पिता भगिनी प्रिय भाई। प्रिय परिवारु सुह्रद समुदाई।।

    अर्थ (Hindi)

    मातु पिता भगिनी प्रिय भाई। प्रिय परिवारु सुह्रद समुदाई।।

  635. RCM 2.65.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सासु ससुर गुर सजन सहाई। सुत सुंदर सुसील सुखदाई।।

    अर्थ (Hindi)

    सासु ससुर गुर सजन सहाई। सुत सुंदर सुसील सुखदाई।।

  636. RCM 2.65.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जहँ लगि नाथ नेह अरु नाते। पिय बिनु तियहि तरनिहु ते ताते।।

    अर्थ (Hindi)

    जहँ लगि नाथ नेह अरु नाते। पिय बिनु तियहि तरनिहु ते ताते।।

  637. RCM 2.65.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तनु धनु धामु धरनि पुर राजू। पति बिहीन सबु सोक समाजू।।

    अर्थ (Hindi)

    तनु धनु धामु धरनि पुर राजू। पति बिहीन सबु सोक समाजू।।

  638. RCM 2.65.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भोग रोगसम भूषन भारू। जम जातना सरिस संसारू।।

    अर्थ (Hindi)

    भोग रोगसम भूषन भारू। जम जातना सरिस संसारू।।

  639. RCM 2.65.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    प्राननाथ तुम्ह बिनु जग माहीं। मो कहुँ सुखद कतहुँ कछु नाहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    प्राननाथ तुम्ह बिनु जग माहीं। मो कहुँ सुखद कतहुँ कछु नाहीं।।

  640. RCM 2.65.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जिय बिनु देह नदी बिनु बारी। तैसिअ नाथ पुरुष बिनु नारी।।

    अर्थ (Hindi)

    जिय बिनु देह नदी बिनु बारी। तैसिअ नाथ पुरुष बिनु नारी।।

  641. RCM 2.65.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नाथ सकल सुख साथ तुम्हारें। सरद बिमल बिधु बदनु निहारें।।

    अर्थ (Hindi)

    नाथ सकल सुख साथ तुम्हारें। सरद बिमल बिधु बदनु निहारें।।

  642. RCM 2.65.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    खग मृग परिजन नगरु बनु बलकल बिमल दुकूल।

    अर्थ (Hindi)

    खग मृग परिजन नगरु बनु बलकल बिमल दुकूल।

  643. RCM 2.65.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नाथ साथ सुरसदन सम परनसाल सुख मूल।।65।।

    अर्थ (Hindi)

    नाथ साथ सुरसदन सम परनसाल सुख मूल।।65।।

  644. RCM 2.66.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बनदेवीं बनदेव उदारा। करिहहिं सासु ससुर सम सारा।।

    अर्थ (Hindi)

    बनदेवीं बनदेव उदारा। करिहहिं सासु ससुर सम सारा।।

  645. RCM 2.66.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कुस किसलय साथरी सुहाई। प्रभु सँग मंजु मनोज तुराई।।

    अर्थ (Hindi)

    कुस किसलय साथरी सुहाई। प्रभु सँग मंजु मनोज तुराई।।

  646. RCM 2.66.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कंद मूल फल अमिअ अहारू। अवध सौध सत सरिस पहारू।।

    अर्थ (Hindi)

    कंद मूल फल अमिअ अहारू। अवध सौध सत सरिस पहारू।।

  647. RCM 2.66.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    छिनु छिनु प्रभु पद कमल बिलोकि। रहिहउँ मुदित दिवस जिमि कोकी।।

    अर्थ (Hindi)

    छिनु छिनु प्रभु पद कमल बिलोकि। रहिहउँ मुदित दिवस जिमि कोकी।।

  648. RCM 2.66.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बन दुख नाथ कहे बहुतेरे। भय बिषाद परिताप घनेरे।।

    अर्थ (Hindi)

    बन दुख नाथ कहे बहुतेरे। भय बिषाद परिताप घनेरे।।

  649. RCM 2.66.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    प्रभु बियोग लवलेस समाना। सब मिलि होहिं न कृपानिधाना।।

    अर्थ (Hindi)

    प्रभु बियोग लवलेस समाना। सब मिलि होहिं न कृपानिधाना।।

  650. RCM 2.66.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अस जियँ जानि सुजान सिरोमनि। लेइअ संग मोहि छाड़िअ जनि।।

    अर्थ (Hindi)

    अस जियँ जानि सुजान सिरोमनि। लेइअ संग मोहि छाड़िअ जनि।।

  651. RCM 2.66.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बिनती बहुत करौं का स्वामी। करुनामय उर अंतरजामी।।

    अर्थ (Hindi)

    बिनती बहुत करौं का स्वामी। करुनामय उर अंतरजामी।।

  652. RCM 2.66.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राखिअ अवध जो अवधि लगि रहत न जनिअहिं प्रान।

    अर्थ (Hindi)

    राखिअ अवध जो अवधि लगि रहत न जनिअहिं प्रान।

  653. RCM 2.66.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    दीनबंधु संदर सुखद सील सनेह निधान।।66।।

    अर्थ (Hindi)

    दीनबंधु संदर सुखद सील सनेह निधान।।66।।

  654. RCM 2.67.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मोहि मग चलत न होइहि हारी। छिनु छिनु चरन सरोज निहारी।।

    अर्थ (Hindi)

    मोहि मग चलत न होइहि हारी। छिनु छिनु चरन सरोज निहारी।।

  655. RCM 2.67.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सबहि भाँति पिय सेवा करिहौं। मारग जनित सकल श्रम हरिहौं।।

    अर्थ (Hindi)

    सबहि भाँति पिय सेवा करिहौं। मारग जनित सकल श्रम हरिहौं।।

  656. RCM 2.67.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पाय पखारी बैठि तरु छाहीं। करिहउँ बाउ मुदित मन माहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    पाय पखारी बैठि तरु छाहीं। करिहउँ बाउ मुदित मन माहीं।।

  657. RCM 2.67.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    श्रम कन सहित स्याम तनु देखें। कहँ दुख समउ प्रानपति पेखें।।

    अर्थ (Hindi)

    श्रम कन सहित स्याम तनु देखें। कहँ दुख समउ प्रानपति पेखें।।

  658. RCM 2.67.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सम महि तृन तरुपल्लव डासी। पाग पलोटिहि सब निसि दासी।।

    अर्थ (Hindi)

    सम महि तृन तरुपल्लव डासी। पाग पलोटिहि सब निसि दासी।।

  659. RCM 2.67.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बारबार मृदु मूरति जोही। लागहि तात बयारि न मोही।

    अर्थ (Hindi)

    बारबार मृदु मूरति जोही। लागहि तात बयारि न मोही।

  660. RCM 2.67.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    को प्रभु सँग मोहि चितवनिहारा। सिंघबधुहि जिमि ससक सिआरा।।

    अर्थ (Hindi)

    को प्रभु सँग मोहि चितवनिहारा। सिंघबधुहि जिमि ससक सिआरा।।

  661. RCM 2.67.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मैं सुकुमारि नाथ बन जोगू। तुम्हहि उचित तप मो कहुँ भोगू।।

    अर्थ (Hindi)

    मैं सुकुमारि नाथ बन जोगू। तुम्हहि उचित तप मो कहुँ भोगू।।

  662. RCM 2.67.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    ऐसेउ बचन कठोर सुनि जौं न ह्रदउ बिलगान।

    अर्थ (Hindi)

    ऐसेउ बचन कठोर सुनि जौं न ह्रदउ बिलगान।

  663. RCM 2.67.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तौ प्रभु बिषम बियोग दुख सहिहहिं पावँर प्रान।।67।।

    अर्थ (Hindi)

    तौ प्रभु बिषम बियोग दुख सहिहहिं पावँर प्रान।।67।।

  664. RCM 2.68.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अस कहि सीय बिकल भइ भारी। बचन बियोगु न सकी सँभारी।।

    अर्थ (Hindi)

    अस कहि सीय बिकल भइ भारी। बचन बियोगु न सकी सँभारी।।

  665. RCM 2.68.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    देखि दसा रघुपति जियँ जाना। हठि राखें नहिं राखिहि प्राना।।

    अर्थ (Hindi)

    देखि दसा रघुपति जियँ जाना। हठि राखें नहिं राखिहि प्राना।।

  666. RCM 2.68.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कहेउ कृपाल भानुकुलनाथा। परिहरि सोचु चलहु बन साथा।।

    अर्थ (Hindi)

    कहेउ कृपाल भानुकुलनाथा। परिहरि सोचु चलहु बन साथा।।

  667. RCM 2.68.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नहिं बिषाद कर अवसरु आजू। बेगि करहु बन गवन समाजू।।

    अर्थ (Hindi)

    नहिं बिषाद कर अवसरु आजू। बेगि करहु बन गवन समाजू।।

  668. RCM 2.68.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कहि प्रिय बचन प्रिया समुझाई। लगे मातु पद आसिष पाई।।

    अर्थ (Hindi)

    कहि प्रिय बचन प्रिया समुझाई। लगे मातु पद आसिष पाई।।

  669. RCM 2.68.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बेगि प्रजा दुख मेटब आई। जननी निठुर बिसरि जनि जाई।।

    अर्थ (Hindi)

    बेगि प्रजा दुख मेटब आई। जननी निठुर बिसरि जनि जाई।।

  670. RCM 2.68.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    फिरहि दसा बिधि बहुरि कि मोरी। देखिहउँ नयन मनोहर जोरी।।

    अर्थ (Hindi)

    फिरहि दसा बिधि बहुरि कि मोरी। देखिहउँ नयन मनोहर जोरी।।

  671. RCM 2.68.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुदिन सुघरी तात कब होइहि। जननी जिअत बदन बिधु जोइहि।।

    अर्थ (Hindi)

    सुदिन सुघरी तात कब होइहि। जननी जिअत बदन बिधु जोइहि।।

  672. RCM 2.68.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बहुरि बच्छ कहि लालु कहि रघुपति रघुबर तात।

    अर्थ (Hindi)

    बहुरि बच्छ कहि लालु कहि रघुपति रघुबर तात।

  673. RCM 2.68.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कबहिं बोलाइ लगाइ हियँ हरषि निरखिहउँ गात।।68।।

    अर्थ (Hindi)

    कबहिं बोलाइ लगाइ हियँ हरषि निरखिहउँ गात।।68।।

  674. RCM 2.69.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    लखि सनेह कातरि महतारी। बचनु न आव बिकल भइ भारी।।

    अर्थ (Hindi)

    लखि सनेह कातरि महतारी। बचनु न आव बिकल भइ भारी।।

  675. RCM 2.69.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राम प्रबोधु कीन्ह बिधि नाना। समउ सनेहु न जाइ बखाना।।

    अर्थ (Hindi)

    राम प्रबोधु कीन्ह बिधि नाना। समउ सनेहु न जाइ बखाना।।

  676. RCM 2.69.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तब जानकी सासु पग लागी। सुनिअ माय मैं परम अभागी।।

    अर्थ (Hindi)

    तब जानकी सासु पग लागी। सुनिअ माय मैं परम अभागी।।

  677. RCM 2.69.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सेवा समय दैअँ बनु दीन्हा। मोर मनोरथु सफल न कीन्हा।।

    अर्थ (Hindi)

    सेवा समय दैअँ बनु दीन्हा। मोर मनोरथु सफल न कीन्हा।।

  678. RCM 2.69.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तजब छोभु जनि छाड़िअ छोहू। करमु कठिन कछु दोसु न मोहू।।

    अर्थ (Hindi)

    तजब छोभु जनि छाड़िअ छोहू। करमु कठिन कछु दोसु न मोहू।।

  679. RCM 2.69.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनि सिय बचन सासु अकुलानी। दसा कवनि बिधि कहौं बखानी।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनि सिय बचन सासु अकुलानी। दसा कवनि बिधि कहौं बखानी।।

  680. RCM 2.69.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बारहि बार लाइ उर लीन्ही। धरि धीरजु सिख आसिष दीन्ही।।

    अर्थ (Hindi)

    बारहि बार लाइ उर लीन्ही। धरि धीरजु सिख आसिष दीन्ही।।

  681. RCM 2.69.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अचल होउ अहिवातु तुम्हारा। जब लगि गंग जमुन जल धारा।।

    अर्थ (Hindi)

    अचल होउ अहिवातु तुम्हारा। जब लगि गंग जमुन जल धारा।।

  682. RCM 2.69.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सीतहि सासु असीस सिख दीन्हि अनेक प्रकार।

    अर्थ (Hindi)

    सीतहि सासु असीस सिख दीन्हि अनेक प्रकार।

  683. RCM 2.69.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    चली नाइ पद पदुम सिरु अति हित बारहिं बार।।69।।

    अर्थ (Hindi)

    चली नाइ पद पदुम सिरु अति हित बारहिं बार।।69।।

  684. RCM 2.70.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    समाचार जब लछिमन पाए। ब्याकुल बिलख बदन उठि धाए।।

    अर्थ (Hindi)

    समाचार जब लछिमन पाए। ब्याकुल बिलख बदन उठि धाए।।

  685. RCM 2.70.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कंप पुलक तन नयन सनीरा। गहे चरन अति प्रेम अधीरा।।

    अर्थ (Hindi)

    कंप पुलक तन नयन सनीरा। गहे चरन अति प्रेम अधीरा।।

  686. RCM 2.70.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कहि न सकत कछु चितवत ठाढ़े। मीनु दीन जनु जल तें काढ़े।।

    अर्थ (Hindi)

    कहि न सकत कछु चितवत ठाढ़े। मीनु दीन जनु जल तें काढ़े।।

  687. RCM 2.70.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सोचु हृदयँ बिधि का होनिहारा। सबु सुखु सुकृत सिरान हमारा।।

    अर्थ (Hindi)

    सोचु हृदयँ बिधि का होनिहारा। सबु सुखु सुकृत सिरान हमारा।।

  688. RCM 2.70.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मो कहुँ काह कहब रघुनाथा। रखिहहिं भवन कि लेहहिं साथा।।

    अर्थ (Hindi)

    मो कहुँ काह कहब रघुनाथा। रखिहहिं भवन कि लेहहिं साथा।।

  689. RCM 2.70.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राम बिलोकि बंधु कर जोरें। देह गेह सब सन तृनु तोरें।।

    अर्थ (Hindi)

    राम बिलोकि बंधु कर जोरें। देह गेह सब सन तृनु तोरें।।

  690. RCM 2.70.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बोले बचनु राम नय नागर। सील सनेह सरल सुख सागर।।

    अर्थ (Hindi)

    बोले बचनु राम नय नागर। सील सनेह सरल सुख सागर।।

  691. RCM 2.70.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तात प्रेम बस जनि कदराहू। समुझि हृदयँ परिनाम उछाहू।।

    अर्थ (Hindi)

    तात प्रेम बस जनि कदराहू। समुझि हृदयँ परिनाम उछाहू।।

  692. RCM 2.70.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मातु पिता गुरु स्वामि सिख सिर धरि करहि सुभायँ।

    अर्थ (Hindi)

    मातु पिता गुरु स्वामि सिख सिर धरि करहि सुभायँ।

  693. RCM 2.70.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    लहेउ लाभु तिन्ह जनम कर नतरु जनमु जग जायँ।।70।।

    अर्थ (Hindi)

    लहेउ लाभु तिन्ह जनम कर नतरु जनमु जग जायँ।।70।।

  694. RCM 2.71.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अस जियँ जानि सुनहु सिख भाई। करहु मातु पितु पद सेवकाई।।

    अर्थ (Hindi)

    अस जियँ जानि सुनहु सिख भाई। करहु मातु पितु पद सेवकाई।।

  695. RCM 2.71.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भवन भरतु रिपुसूदन नाहीं। राउ बृद्ध मम दुखु मन माहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    भवन भरतु रिपुसूदन नाहीं। राउ बृद्ध मम दुखु मन माहीं।।

  696. RCM 2.71.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मैं बन जाउँ तुम्हहि लेइ साथा। होइ सबहि बिधि अवध अनाथा।।

    अर्थ (Hindi)

    मैं बन जाउँ तुम्हहि लेइ साथा। होइ सबहि बिधि अवध अनाथा।।

  697. RCM 2.71.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    गुरु पितु मातु प्रजा परिवारू। सब कहुँ परइ दुसह दुख भारू।।

    अर्थ (Hindi)

    गुरु पितु मातु प्रजा परिवारू। सब कहुँ परइ दुसह दुख भारू।।

  698. RCM 2.71.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    रहहु करहु सब कर परितोषू। नतरु तात होइहि बड़ दोषू।।

    अर्थ (Hindi)

    रहहु करहु सब कर परितोषू। नतरु तात होइहि बड़ दोषू।।

  699. RCM 2.71.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी। सो नृपु अवसि नरक अधिकारी।।

    अर्थ (Hindi)

    जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी। सो नृपु अवसि नरक अधिकारी।।

  700. RCM 2.71.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    रहहु तात असि नीति बिचारी। सुनत लखनु भए ब्याकुल भारी।।

    अर्थ (Hindi)

    रहहु तात असि नीति बिचारी। सुनत लखनु भए ब्याकुल भारी।।

  701. RCM 2.71.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सिअरें बचन सूखि गए कैंसें। परसत तुहिन तामरसु जैसें।।

    अर्थ (Hindi)

    सिअरें बचन सूखि गए कैंसें। परसत तुहिन तामरसु जैसें।।

  702. RCM 2.71.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    उतरु न आवत प्रेम बस गहे चरन अकुलाइ।

    अर्थ (Hindi)

    उतरु न आवत प्रेम बस गहे चरन अकुलाइ।

  703. RCM 2.71.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नाथ दासु मैं स्वामि तुम्ह तजहु त काह बसाइ।।71।।

    अर्थ (Hindi)

    नाथ दासु मैं स्वामि तुम्ह तजहु त काह बसाइ।।71।।

  704. RCM 2.72.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    दीन्हि मोहि सिख नीकि गोसाईं। लागि अगम अपनी कदराईं।।

    अर्थ (Hindi)

    दीन्हि मोहि सिख नीकि गोसाईं। लागि अगम अपनी कदराईं।।

  705. RCM 2.72.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नरबर धीर धरम धुर धारी। निगम नीति कहुँ ते अधिकारी।।

    अर्थ (Hindi)

    नरबर धीर धरम धुर धारी। निगम नीति कहुँ ते अधिकारी।।

  706. RCM 2.72.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मैं सिसु प्रभु सनेहँ प्रतिपाला। मंदरु मेरु कि लेहिं मराला।।

    अर्थ (Hindi)

    मैं सिसु प्रभु सनेहँ प्रतिपाला। मंदरु मेरु कि लेहिं मराला।।

  707. RCM 2.72.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    गुर पितु मातु न जानउँ काहू। कहउँ सुभाउ नाथ पतिआहू।।

    अर्थ (Hindi)

    गुर पितु मातु न जानउँ काहू। कहउँ सुभाउ नाथ पतिआहू।।

  708. RCM 2.72.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जहँ लगि जगत सनेह सगाई। प्रीति प्रतीति निगम निजु गाई।।

    अर्थ (Hindi)

    जहँ लगि जगत सनेह सगाई। प्रीति प्रतीति निगम निजु गाई।।

  709. RCM 2.72.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मोरें सबइ एक तुम्ह स्वामी। दीनबंधु उर अंतरजामी।।

    अर्थ (Hindi)

    मोरें सबइ एक तुम्ह स्वामी। दीनबंधु उर अंतरजामी।।

  710. RCM 2.72.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    धरम नीति उपदेसिअ ताही। कीरति भूति सुगति प्रिय जाही।।

    अर्थ (Hindi)

    धरम नीति उपदेसिअ ताही। कीरति भूति सुगति प्रिय जाही।।

  711. RCM 2.72.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मन क्रम बचन चरन रत होई। कृपासिंधु परिहरिअ कि सोई।।

    अर्थ (Hindi)

    मन क्रम बचन चरन रत होई। कृपासिंधु परिहरिअ कि सोई।।

  712. RCM 2.72.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    करुनासिंधु सुबंध के सुनि मृदु बचन बिनीत।

    अर्थ (Hindi)

    करुनासिंधु सुबंध के सुनि मृदु बचन बिनीत।

  713. RCM 2.72.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    समुझाए उर लाइ प्रभु जानि सनेहँ सभीत।।72।।

    अर्थ (Hindi)

    समुझाए उर लाइ प्रभु जानि सनेहँ सभीत।।72।।

  714. RCM 2.73.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मागहु बिदा मातु सन जाई। आवहु बेगि चलहु बन भाई।।

    अर्थ (Hindi)

    मागहु बिदा मातु सन जाई। आवहु बेगि चलहु बन भाई।।

  715. RCM 2.73.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मुदित भए सुनि रघुबर बानी। भयउ लाभ बड़ गइ बड़ि हानी।।

    अर्थ (Hindi)

    मुदित भए सुनि रघुबर बानी। भयउ लाभ बड़ गइ बड़ि हानी।।

  716. RCM 2.73.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    हरषित ह्दयँ मातु पहिं आए। मनहुँ अंध फिरि लोचन पाए।

    अर्थ (Hindi)

    हरषित ह्दयँ मातु पहिं आए। मनहुँ अंध फिरि लोचन पाए।

  717. RCM 2.73.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जाइ जननि पग नायउ माथा। मनु रघुनंदन जानकि साथा।।

    अर्थ (Hindi)

    जाइ जननि पग नायउ माथा। मनु रघुनंदन जानकि साथा।।

  718. RCM 2.73.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पूँछे मातु मलिन मन देखी। लखन कही सब कथा बिसेषी।।

    अर्थ (Hindi)

    पूँछे मातु मलिन मन देखी। लखन कही सब कथा बिसेषी।।

  719. RCM 2.73.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    गई सहमि सुनि बचन कठोरा। मृगी देखि दव जनु चहु ओरा।।

    अर्थ (Hindi)

    गई सहमि सुनि बचन कठोरा। मृगी देखि दव जनु चहु ओरा।।

  720. RCM 2.73.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    लखन लखेउ भा अनरथ आजू। एहिं सनेह बस करब अकाजू।।

    अर्थ (Hindi)

    लखन लखेउ भा अनरथ आजू। एहिं सनेह बस करब अकाजू।।

  721. RCM 2.73.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मागत बिदा सभय सकुचाहीं। जाइ संग बिधि कहिहि कि नाही।।

    अर्थ (Hindi)

    मागत बिदा सभय सकुचाहीं। जाइ संग बिधि कहिहि कि नाही।।

  722. RCM 2.73.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    समुझि सुमित्राँ राम सिय रूप सुसीलु सुभाउ।

    अर्थ (Hindi)

    समुझि सुमित्राँ राम सिय रूप सुसीलु सुभाउ।

  723. RCM 2.73.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नृप सनेहु लखि धुनेउ सिरु पापिनि दीन्ह कुदाउ।।73।।

    अर्थ (Hindi)

    नृप सनेहु लखि धुनेउ सिरु पापिनि दीन्ह कुदाउ।।73।।

  724. RCM 2.74.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    धीरजु धरेउ कुअवसर जानी। सहज सुह्द बोली मृदु बानी।।

    अर्थ (Hindi)

    धीरजु धरेउ कुअवसर जानी। सहज सुह्द बोली मृदु बानी।।

  725. RCM 2.74.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तात तुम्हारि मातु बैदेही। पिता रामु सब भाँति सनेही।।

    अर्थ (Hindi)

    तात तुम्हारि मातु बैदेही। पिता रामु सब भाँति सनेही।।

  726. RCM 2.74.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अवध तहाँ जहँ राम निवासू। तहँइँ दिवसु जहँ भानु प्रकासू।।

    अर्थ (Hindi)

    अवध तहाँ जहँ राम निवासू। तहँइँ दिवसु जहँ भानु प्रकासू।।

  727. RCM 2.74.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जौ पै सीय रामु बन जाहीं। अवध तुम्हार काजु कछु नाहिं।।

    अर्थ (Hindi)

    जौ पै सीय रामु बन जाहीं। अवध तुम्हार काजु कछु नाहिं।।

  728. RCM 2.74.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    गुर पितु मातु बंधु सुर साई। सेइअहिं सकल प्रान की नाईं।।

    अर्थ (Hindi)

    गुर पितु मातु बंधु सुर साई। सेइअहिं सकल प्रान की नाईं।।

  729. RCM 2.74.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    रामु प्रानप्रिय जीवन जी के। स्वारथ रहित सखा सबही कै।।

    अर्थ (Hindi)

    रामु प्रानप्रिय जीवन जी के। स्वारथ रहित सखा सबही कै।।

  730. RCM 2.74.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पूजनीय प्रिय परम जहाँ तें। सब मानिअहिं राम के नातें।।

    अर्थ (Hindi)

    पूजनीय प्रिय परम जहाँ तें। सब मानिअहिं राम के नातें।।

  731. RCM 2.74.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अस जियँ जानि संग बन जाहू। लेहु तात जग जीवन लाहू।।

    अर्थ (Hindi)

    अस जियँ जानि संग बन जाहू। लेहु तात जग जीवन लाहू।।

  732. RCM 2.74.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भूरि भाग भाजनु भयहु मोहि समेत बलि जाउँ।

    अर्थ (Hindi)

    भूरि भाग भाजनु भयहु मोहि समेत बलि जाउँ।

  733. RCM 2.74.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जौम तुम्हरें मन छाड़ि छलु कीन्ह राम पद ठाउँ।।74।।

    अर्थ (Hindi)

    जौम तुम्हरें मन छाड़ि छलु कीन्ह राम पद ठाउँ।।74।।

  734. RCM 2.75.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पुत्रवती जुबती जग सोई। रघुपति भगतु जासु सुतु होई।।

    अर्थ (Hindi)

    पुत्रवती जुबती जग सोई। रघुपति भगतु जासु सुतु होई।।

  735. RCM 2.75.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नतरु बाँझ भलि बादि बिआनी। राम बिमुख सुत तें हित जानी।।

    अर्थ (Hindi)

    नतरु बाँझ भलि बादि बिआनी। राम बिमुख सुत तें हित जानी।।

  736. RCM 2.75.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तुम्हरेहिं भाग रामु बन जाहीं। दूसर हेतु तात कछु नाहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    तुम्हरेहिं भाग रामु बन जाहीं। दूसर हेतु तात कछु नाहीं।।

  737. RCM 2.75.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सकल सुकृत कर बड़ फलु एहू। राम सीय पद सहज सनेहू।।

    अर्थ (Hindi)

    सकल सुकृत कर बड़ फलु एहू। राम सीय पद सहज सनेहू।।

  738. RCM 2.75.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राग रोषु इरिषा मदु मोहू। जनि सपनेहुँ इन्ह के बस होहू।।

    अर्थ (Hindi)

    राग रोषु इरिषा मदु मोहू। जनि सपनेहुँ इन्ह के बस होहू।।

  739. RCM 2.75.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सकल प्रकार बिकार बिहाई। मन क्रम बचन करेहु सेवकाई।।

    अर्थ (Hindi)

    सकल प्रकार बिकार बिहाई। मन क्रम बचन करेहु सेवकाई।।

  740. RCM 2.75.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तुम्ह कहुँ बन सब भाँति सुपासू। सँग पितु मातु रामु सिय जासू।।

    अर्थ (Hindi)

    तुम्ह कहुँ बन सब भाँति सुपासू। सँग पितु मातु रामु सिय जासू।।

  741. RCM 2.75.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जेहिं न रामु बन लहहिं कलेसू। सुत सोइ करेहु इहइ उपदेसू।।

    अर्थ (Hindi)

    जेहिं न रामु बन लहहिं कलेसू। सुत सोइ करेहु इहइ उपदेसू।।

  742. RCM 2.75.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    उपदेसु यहु जेहिं तात तुम्हरे राम सिय सुख पावहीं।

    अर्थ (Hindi)

    उपदेसु यहु जेहिं तात तुम्हरे राम सिय सुख पावहीं।

  743. RCM 2.75.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पितु मातु प्रिय परिवार पुर सुख सुरति बन बिसरावहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    पितु मातु प्रिय परिवार पुर सुख सुरति बन बिसरावहीं।।

  744. RCM 2.75.11
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तुलसी प्रभुहि सिख देइ आयसु दीन्ह पुनि आसिष दई।

    अर्थ (Hindi)

    तुलसी प्रभुहि सिख देइ आयसु दीन्ह पुनि आसिष दई।

  745. RCM 2.75.12
    📖 Open verse-by-verse reader#

    रति होउ अबिरल अमल सिय रघुबीर पद नित नित नई।।

    अर्थ (Hindi)

    रति होउ अबिरल अमल सिय रघुबीर पद नित नित नई।।

  746. RCM 2.75.13
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मातु चरन सिरु नाइ चले तुरत संकित हृदयँ।

    अर्थ (Hindi)

    मातु चरन सिरु नाइ चले तुरत संकित हृदयँ।

  747. RCM 2.75.14
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बागुर बिषम तोराइ मनहुँ भाग मृगु भाग बस।।75।।

    अर्थ (Hindi)

    बागुर बिषम तोराइ मनहुँ भाग मृगु भाग बस।।75।।

  748. RCM 2.76.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    गए लखनु जहँ जानकिनाथू। भे मन मुदित पाइ प्रिय साथू।।

    अर्थ (Hindi)

    गए लखनु जहँ जानकिनाथू। भे मन मुदित पाइ प्रिय साथू।।

  749. RCM 2.76.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बंदि राम सिय चरन सुहाए। चले संग नृपमंदिर आए।।

    अर्थ (Hindi)

    बंदि राम सिय चरन सुहाए। चले संग नृपमंदिर आए।।

  750. RCM 2.76.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कहहिं परसपर पुर नर नारी। भलि बनाइ बिधि बात बिगारी।।

    अर्थ (Hindi)

    कहहिं परसपर पुर नर नारी। भलि बनाइ बिधि बात बिगारी।।

  751. RCM 2.76.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तन कृस दुखु बदन मलीने। बिकल मनहुँ माखी मधु छीने।।

    अर्थ (Hindi)

    तन कृस दुखु बदन मलीने। बिकल मनहुँ माखी मधु छीने।।

  752. RCM 2.76.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कर मीजहिं सिरु धुनि पछिताहीं। जनु बिन पंख बिहग अकुलाहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    कर मीजहिं सिरु धुनि पछिताहीं। जनु बिन पंख बिहग अकुलाहीं।।

  753. RCM 2.76.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भइ बड़ि भीर भूप दरबारा। बरनि न जाइ बिषादु अपारा।।

    अर्थ (Hindi)

    भइ बड़ि भीर भूप दरबारा। बरनि न जाइ बिषादु अपारा।।

  754. RCM 2.76.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सचिवँ उठाइ राउ बैठारे। कहि प्रिय बचन रामु पगु धारे।।

    अर्थ (Hindi)

    सचिवँ उठाइ राउ बैठारे। कहि प्रिय बचन रामु पगु धारे।।

  755. RCM 2.76.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सिय समेत दोउ तनय निहारी। ब्याकुल भयउ भूमिपति भारी।।

    अर्थ (Hindi)

    सिय समेत दोउ तनय निहारी। ब्याकुल भयउ भूमिपति भारी।।

  756. RCM 2.76.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सीय सहित सुत सुभग दोउ देखि देखि अकुलाइ।

    अर्थ (Hindi)

    सीय सहित सुत सुभग दोउ देखि देखि अकुलाइ।

  757. RCM 2.76.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बारहिं बार सनेह बस राउ लेइ उर लाइ।।76।।

    अर्थ (Hindi)

    बारहिं बार सनेह बस राउ लेइ उर लाइ।।76।।

  758. RCM 2.77.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सकइ न बोलि बिकल नरनाहू। सोक जनित उर दारुन दाहू।।

    अर्थ (Hindi)

    सकइ न बोलि बिकल नरनाहू। सोक जनित उर दारुन दाहू।।

  759. RCM 2.77.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नाइ सीसु पद अति अनुरागा। उठि रघुबीर बिदा तब मागा।।

    अर्थ (Hindi)

    नाइ सीसु पद अति अनुरागा। उठि रघुबीर बिदा तब मागा।।

  760. RCM 2.77.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पितु असीस आयसु मोहि दीजै। हरष समय बिसमउ कत कीजै।।

    अर्थ (Hindi)

    पितु असीस आयसु मोहि दीजै। हरष समय बिसमउ कत कीजै।।

  761. RCM 2.77.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तात किएँ प्रिय प्रेम प्रमादू। जसु जग जाइ होइ अपबादू।।

    अर्थ (Hindi)

    तात किएँ प्रिय प्रेम प्रमादू। जसु जग जाइ होइ अपबादू।।

  762. RCM 2.77.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनि सनेह बस उठि नरनाहाँ। बैठारे रघुपति गहि बाहाँ।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनि सनेह बस उठि नरनाहाँ। बैठारे रघुपति गहि बाहाँ।।

  763. RCM 2.77.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनहु तात तुम्ह कहुँ मुनि कहहीं। रामु चराचर नायक अहहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनहु तात तुम्ह कहुँ मुनि कहहीं। रामु चराचर नायक अहहीं।।

  764. RCM 2.77.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुभ अरु असुभ करम अनुहारी। ईस देइ फलु ह्दयँ बिचारी।।

    अर्थ (Hindi)

    सुभ अरु असुभ करम अनुहारी। ईस देइ फलु ह्दयँ बिचारी।।

  765. RCM 2.77.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    करइ जो करम पाव फल सोई। निगम नीति असि कह सबु कोई।।

    अर्थ (Hindi)

    करइ जो करम पाव फल सोई। निगम नीति असि कह सबु कोई।।

  766. RCM 2.77.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    औरु करै अपराधु कोउ और पाव फल भोगु।

    अर्थ (Hindi)

    औरु करै अपराधु कोउ और पाव फल भोगु।

  767. RCM 2.77.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अति बिचित्र भगवंत गति को जग जानै जोगु।।77।।

    अर्थ (Hindi)

    अति बिचित्र भगवंत गति को जग जानै जोगु।।77।।

  768. RCM 2.78.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    रायँ राम राखन हित लागी। बहुत उपाय किए छलु त्यागी।।

    अर्थ (Hindi)

    रायँ राम राखन हित लागी। बहुत उपाय किए छलु त्यागी।।

  769. RCM 2.78.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    लखी राम रुख रहत न जाने। धरम धुरंधर धीर सयाने।।

    अर्थ (Hindi)

    लखी राम रुख रहत न जाने। धरम धुरंधर धीर सयाने।।

  770. RCM 2.78.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तब नृप सीय लाइ उर लीन्ही। अति हित बहुत भाँति सिख दीन्ही।।

    अर्थ (Hindi)

    तब नृप सीय लाइ उर लीन्ही। अति हित बहुत भाँति सिख दीन्ही।।

  771. RCM 2.78.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कहि बन के दुख दुसह सुनाए। सासु ससुर पितु सुख समुझाए।।

    अर्थ (Hindi)

    कहि बन के दुख दुसह सुनाए। सासु ससुर पितु सुख समुझाए।।

  772. RCM 2.78.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सिय मनु राम चरन अनुरागा। घरु न सुगमु बनु बिषमु न लागा।।

    अर्थ (Hindi)

    सिय मनु राम चरन अनुरागा। घरु न सुगमु बनु बिषमु न लागा।।

  773. RCM 2.78.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    औरउ सबहिं सीय समुझाई। कहि कहि बिपिन बिपति अधिकाई।।

    अर्थ (Hindi)

    औरउ सबहिं सीय समुझाई। कहि कहि बिपिन बिपति अधिकाई।।

  774. RCM 2.78.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सचिव नारि गुर नारि सयानी। सहित सनेह कहहिं मृदु बानी।।

    अर्थ (Hindi)

    सचिव नारि गुर नारि सयानी। सहित सनेह कहहिं मृदु बानी।।

  775. RCM 2.78.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तुम्ह कहुँ तौ न दीन्ह बनबासू। करहु जो कहहिं ससुर गुर सासू।।

    अर्थ (Hindi)

    तुम्ह कहुँ तौ न दीन्ह बनबासू। करहु जो कहहिं ससुर गुर सासू।।

  776. RCM 2.78.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    -सिख सीतलि हित मधुर मृदु सुनि सीतहि न सोहानि।

    अर्थ (Hindi)

    -सिख सीतलि हित मधुर मृदु सुनि सीतहि न सोहानि।

  777. RCM 2.78.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सरद चंद चंदनि लगत जनु चकई अकुलानि।।78।।

    अर्थ (Hindi)

    सरद चंद चंदनि लगत जनु चकई अकुलानि।।78।।

  778. RCM 2.79.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सीय सकुच बस उतरु न देई। सो सुनि तमकि उठी कैकेई।।

    अर्थ (Hindi)

    सीय सकुच बस उतरु न देई। सो सुनि तमकि उठी कैकेई।।

  779. RCM 2.79.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मुनि पट भूषन भाजन आनी। आगें धरि बोली मृदु बानी।।

    अर्थ (Hindi)

    मुनि पट भूषन भाजन आनी। आगें धरि बोली मृदु बानी।।

  780. RCM 2.79.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नृपहि प्रान प्रिय तुम्ह रघुबीरा। सील सनेह न छाड़िहि भीरा।।

    अर्थ (Hindi)

    नृपहि प्रान प्रिय तुम्ह रघुबीरा। सील सनेह न छाड़िहि भीरा।।

  781. RCM 2.79.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुकृत सुजसु परलोकु नसाऊ। तुम्हहि जान बन कहिहि न काऊ।।

    अर्थ (Hindi)

    सुकृत सुजसु परलोकु नसाऊ। तुम्हहि जान बन कहिहि न काऊ।।

  782. RCM 2.79.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अस बिचारि सोइ करहु जो भावा। राम जननि सिख सुनि सुखु पावा।।

    अर्थ (Hindi)

    अस बिचारि सोइ करहु जो भावा। राम जननि सिख सुनि सुखु पावा।।

  783. RCM 2.79.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भूपहि बचन बानसम लागे। करहिं न प्रान पयान अभागे।।

    अर्थ (Hindi)

    भूपहि बचन बानसम लागे। करहिं न प्रान पयान अभागे।।

  784. RCM 2.79.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    लोग बिकल मुरुछित नरनाहू। काह करिअ कछु सूझ न काहू।।

    अर्थ (Hindi)

    लोग बिकल मुरुछित नरनाहू। काह करिअ कछु सूझ न काहू।।

  785. RCM 2.79.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    रामु तुरत मुनि बेषु बनाई। चले जनक जननिहि सिरु नाई।।

    अर्थ (Hindi)

    रामु तुरत मुनि बेषु बनाई। चले जनक जननिहि सिरु नाई।।

  786. RCM 2.79.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सजि बन साजु समाजु सबु बनिता बंधु समेत।

    अर्थ (Hindi)

    सजि बन साजु समाजु सबु बनिता बंधु समेत।

  787. RCM 2.79.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बंदि बिप्र गुर चरन प्रभु चले करि सबहि अचेत।।79।।

    अर्थ (Hindi)

    बंदि बिप्र गुर चरन प्रभु चले करि सबहि अचेत।।79।।

  788. RCM 2.80.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    निकसि बसिष्ठ द्वार भए ठाढ़े। देखे लोग बिरह दव दाढ़े।।

    अर्थ (Hindi)

    निकसि बसिष्ठ द्वार भए ठाढ़े। देखे लोग बिरह दव दाढ़े।।

  789. RCM 2.80.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कहि प्रिय बचन सकल समुझाए। बिप्र बृंद रघुबीर बोलाए।।

    अर्थ (Hindi)

    कहि प्रिय बचन सकल समुझाए। बिप्र बृंद रघुबीर बोलाए।।

  790. RCM 2.80.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    गुर सन कहि बरषासन दीन्हे। आदर दान बिनय बस कीन्हे।।

    अर्थ (Hindi)

    गुर सन कहि बरषासन दीन्हे। आदर दान बिनय बस कीन्हे।।

  791. RCM 2.80.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जाचक दान मान संतोषे। मीत पुनीत प्रेम परितोषे।।

    अर्थ (Hindi)

    जाचक दान मान संतोषे। मीत पुनीत प्रेम परितोषे।।

  792. RCM 2.80.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    दासीं दास बोलाइ बहोरी। गुरहि सौंपि बोले कर जोरी।।

    अर्थ (Hindi)

    दासीं दास बोलाइ बहोरी। गुरहि सौंपि बोले कर जोरी।।

  793. RCM 2.80.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सब कै सार सँभार गोसाईं। करबि जनक जननी की नाई।।

    अर्थ (Hindi)

    सब कै सार सँभार गोसाईं। करबि जनक जननी की नाई।।

  794. RCM 2.80.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बारहिं बार जोरि जुग पानी। कहत रामु सब सन मृदु बानी।।

    अर्थ (Hindi)

    बारहिं बार जोरि जुग पानी। कहत रामु सब सन मृदु बानी।।

  795. RCM 2.80.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सोइ सब भाँति मोर हितकारी। जेहि तें रहै भुआल सुखारी।।

    अर्थ (Hindi)

    सोइ सब भाँति मोर हितकारी। जेहि तें रहै भुआल सुखारी।।

  796. RCM 2.80.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मातु सकल मोरे बिरहँ जेहिं न होहिं दुख दीन।

    अर्थ (Hindi)

    मातु सकल मोरे बिरहँ जेहिं न होहिं दुख दीन।

  797. RCM 2.80.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सोइ उपाउ तुम्ह करेहु सब पुर जन परम प्रबीन।।80।।

    अर्थ (Hindi)

    सोइ उपाउ तुम्ह करेहु सब पुर जन परम प्रबीन।।80।।

  798. RCM 2.81.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    एहि बिधि राम सबहि समुझावा। गुर पद पदुम हरषि सिरु नावा।

    अर्थ (Hindi)

    एहि बिधि राम सबहि समुझावा। गुर पद पदुम हरषि सिरु नावा।

  799. RCM 2.81.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    गनपती गौरि गिरीसु मनाई। चले असीस पाइ रघुराई।।

    अर्थ (Hindi)

    गनपती गौरि गिरीसु मनाई। चले असीस पाइ रघुराई।।

  800. RCM 2.81.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राम चलत अति भयउ बिषादू। सुनि न जाइ पुर आरत नादू।।

    अर्थ (Hindi)

    राम चलत अति भयउ बिषादू। सुनि न जाइ पुर आरत नादू।।

  801. RCM 2.81.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कुसगुन लंक अवध अति सोकू। हहरष बिषाद बिबस सुरलोकू।।

    अर्थ (Hindi)

    कुसगुन लंक अवध अति सोकू। हहरष बिषाद बिबस सुरलोकू।।

  802. RCM 2.81.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    गइ मुरुछा तब भूपति जागे। बोलि सुमंत्रु कहन अस लागे।।

    अर्थ (Hindi)

    गइ मुरुछा तब भूपति जागे। बोलि सुमंत्रु कहन अस लागे।।

  803. RCM 2.81.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    रामु चले बन प्रान न जाहीं। केहि सुख लागि रहत तन माहीं।

    अर्थ (Hindi)

    रामु चले बन प्रान न जाहीं। केहि सुख लागि रहत तन माहीं।

  804. RCM 2.81.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    एहि तें कवन ब्यथा बलवाना। जो दुखु पाइ तजहिं तनु प्राना।।

    अर्थ (Hindi)

    एहि तें कवन ब्यथा बलवाना। जो दुखु पाइ तजहिं तनु प्राना।।

  805. RCM 2.81.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पुनि धरि धीर कहइ नरनाहू। लै रथु संग सखा तुम्ह जाहू।।

    अर्थ (Hindi)

    पुनि धरि धीर कहइ नरनाहू। लै रथु संग सखा तुम्ह जाहू।।

  806. RCM 2.81.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    -सुठि सुकुमार कुमार दोउ जनकसुता सुकुमारि।

    अर्थ (Hindi)

    -सुठि सुकुमार कुमार दोउ जनकसुता सुकुमारि।

  807. RCM 2.81.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    रथ चढ़ाइ देखराइ बनु फिरेहु गएँ दिन चारि।।81।।

    अर्थ (Hindi)

    रथ चढ़ाइ देखराइ बनु फिरेहु गएँ दिन चारि।।81।।

  808. RCM 2.82.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जौ नहिं फिरहिं धीर दोउ भाई। सत्यसंध दृढ़ब्रत रघुराई।।

    अर्थ (Hindi)

    जौ नहिं फिरहिं धीर दोउ भाई। सत्यसंध दृढ़ब्रत रघुराई।।

  809. RCM 2.82.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तौ तुम्ह बिनय करेहु कर जोरी। फेरिअ प्रभु मिथिलेसकिसोरी।।

    अर्थ (Hindi)

    तौ तुम्ह बिनय करेहु कर जोरी। फेरिअ प्रभु मिथिलेसकिसोरी।।

  810. RCM 2.82.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जब सिय कानन देखि डेराई। कहेहु मोरि सिख अवसरु पाई।।

    अर्थ (Hindi)

    जब सिय कानन देखि डेराई। कहेहु मोरि सिख अवसरु पाई।।

  811. RCM 2.82.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सासु ससुर अस कहेउ सँदेसू। पुत्रि फिरिअ बन बहुत कलेसू।।

    अर्थ (Hindi)

    सासु ससुर अस कहेउ सँदेसू। पुत्रि फिरिअ बन बहुत कलेसू।।

  812. RCM 2.82.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पितृगृह कबहुँ कबहुँ ससुरारी। रहेहु जहाँ रुचि होइ तुम्हारी।।

    अर्थ (Hindi)

    पितृगृह कबहुँ कबहुँ ससुरारी। रहेहु जहाँ रुचि होइ तुम्हारी।।

  813. RCM 2.82.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    एहि बिधि करेहु उपाय कदंबा। फिरइ त होइ प्रान अवलंबा।।

    अर्थ (Hindi)

    एहि बिधि करेहु उपाय कदंबा। फिरइ त होइ प्रान अवलंबा।।

  814. RCM 2.82.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नाहिं त मोर मरनु परिनामा। कछु न बसाइ भएँ बिधि बामा।।

    अर्थ (Hindi)

    नाहिं त मोर मरनु परिनामा। कछु न बसाइ भएँ बिधि बामा।।

  815. RCM 2.82.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अस कहि मुरुछि परा महि राऊ। रामु लखनु सिय आनि देखाऊ।।

    अर्थ (Hindi)

    अस कहि मुरुछि परा महि राऊ। रामु लखनु सिय आनि देखाऊ।।

  816. RCM 2.82.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    -पाइ रजायसु नाइ सिरु रथु अति बेग बनाइ।

    अर्थ (Hindi)

    -पाइ रजायसु नाइ सिरु रथु अति बेग बनाइ।

  817. RCM 2.82.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    गयउ जहाँ बाहेर नगर सीय सहित दोउ भाइ।।82।।

    अर्थ (Hindi)

    गयउ जहाँ बाहेर नगर सीय सहित दोउ भाइ।।82।।

  818. RCM 2.83.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तब सुमंत्र नृप बचन सुनाए। करि बिनती रथ रामु चढ़ाए।।

    अर्थ (Hindi)

    तब सुमंत्र नृप बचन सुनाए। करि बिनती रथ रामु चढ़ाए।।

  819. RCM 2.83.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    चढ़ि रथ सीय सहित दोउ भाई। चले हृदयँ अवधहि सिरु नाई।।

    अर्थ (Hindi)

    चढ़ि रथ सीय सहित दोउ भाई। चले हृदयँ अवधहि सिरु नाई।।

  820. RCM 2.83.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    चलत रामु लखि अवध अनाथा। बिकल लोग सब लागे साथा।।

    अर्थ (Hindi)

    चलत रामु लखि अवध अनाथा। बिकल लोग सब लागे साथा।।

  821. RCM 2.83.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कृपासिंधु बहुबिधि समुझावहिं। फिरहिं प्रेम बस पुनि फिरि आवहिं।।

    अर्थ (Hindi)

    कृपासिंधु बहुबिधि समुझावहिं। फिरहिं प्रेम बस पुनि फिरि आवहिं।।

  822. RCM 2.83.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    लागति अवध भयावनि भारी। मानहुँ कालराति अँधिआरी।।

    अर्थ (Hindi)

    लागति अवध भयावनि भारी। मानहुँ कालराति अँधिआरी।।

  823. RCM 2.83.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    घोर जंतु सम पुर नर नारी। डरपहिं एकहि एक निहारी।।

    अर्थ (Hindi)

    घोर जंतु सम पुर नर नारी। डरपहिं एकहि एक निहारी।।

  824. RCM 2.83.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    घर मसान परिजन जनु भूता। सुत हित मीत मनहुँ जमदूता।।

    अर्थ (Hindi)

    घर मसान परिजन जनु भूता। सुत हित मीत मनहुँ जमदूता।।

  825. RCM 2.83.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बागन्ह बिटप बेलि कुम्हिलाहीं। सरित सरोवर देखि न जाहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    बागन्ह बिटप बेलि कुम्हिलाहीं। सरित सरोवर देखि न जाहीं।।

  826. RCM 2.83.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    हय गय कोटिन्ह केलिमृग पुरपसु चातक मोर।

    अर्थ (Hindi)

    हय गय कोटिन्ह केलिमृग पुरपसु चातक मोर।

  827. RCM 2.83.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पिक रथांग सुक सारिका सारस हंस चकोर।।83।।

    अर्थ (Hindi)

    पिक रथांग सुक सारिका सारस हंस चकोर।।83।।

  828. RCM 2.84.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राम बियोग बिकल सब ठाढ़े। जहँ तहँ मनहुँ चित्र लिखि काढ़े।।

    अर्थ (Hindi)

    राम बियोग बिकल सब ठाढ़े। जहँ तहँ मनहुँ चित्र लिखि काढ़े।।

  829. RCM 2.84.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नगरु सफल बनु गहबर भारी। खग मृग बिपुल सकल नर नारी।।

    अर्थ (Hindi)

    नगरु सफल बनु गहबर भारी। खग मृग बिपुल सकल नर नारी।।

  830. RCM 2.84.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बिधि कैकेई किरातिनि कीन्ही। जेंहि दव दुसह दसहुँ दिसि दीन्ही।।

    अर्थ (Hindi)

    बिधि कैकेई किरातिनि कीन्ही। जेंहि दव दुसह दसहुँ दिसि दीन्ही।।

  831. RCM 2.84.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सहि न सके रघुबर बिरहागी। चले लोग सब ब्याकुल भागी।।

    अर्थ (Hindi)

    सहि न सके रघुबर बिरहागी। चले लोग सब ब्याकुल भागी।।

  832. RCM 2.84.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सबहिं बिचार कीन्ह मन माहीं। राम लखन सिय बिनु सुखु नाहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    सबहिं बिचार कीन्ह मन माहीं। राम लखन सिय बिनु सुखु नाहीं।।

  833. RCM 2.84.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जहाँ रामु तहँ सबुइ समाजू। बिनु रघुबीर अवध नहिं काजू।।

    अर्थ (Hindi)

    जहाँ रामु तहँ सबुइ समाजू। बिनु रघुबीर अवध नहिं काजू।।

  834. RCM 2.84.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    चले साथ अस मंत्रु दृढ़ाई। सुर दुर्लभ सुख सदन बिहाई।।

    अर्थ (Hindi)

    चले साथ अस मंत्रु दृढ़ाई। सुर दुर्लभ सुख सदन बिहाई।।

  835. RCM 2.84.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राम चरन पंकज प्रिय जिन्हही। बिषय भोग बस करहिं कि तिन्हही।।

    अर्थ (Hindi)

    राम चरन पंकज प्रिय जिन्हही। बिषय भोग बस करहिं कि तिन्हही।।

  836. RCM 2.84.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बालक बृद्ध बिहाइ गृँह लगे लोग सब साथ।

    अर्थ (Hindi)

    बालक बृद्ध बिहाइ गृँह लगे लोग सब साथ।

  837. RCM 2.84.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तमसा तीर निवासु किय प्रथम दिवस रघुनाथ।।84।।

    अर्थ (Hindi)

    तमसा तीर निवासु किय प्रथम दिवस रघुनाथ।।84।।

  838. RCM 2.85.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    रघुपति प्रजा प्रेमबस देखी। सदय हृदयँ दुखु भयउ बिसेषी।।

    अर्थ (Hindi)

    रघुपति प्रजा प्रेमबस देखी। सदय हृदयँ दुखु भयउ बिसेषी।।

  839. RCM 2.85.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    करुनामय रघुनाथ गोसाँई। बेगि पाइअहिं पीर पराई।।

    अर्थ (Hindi)

    करुनामय रघुनाथ गोसाँई। बेगि पाइअहिं पीर पराई।।

  840. RCM 2.85.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कहि सप्रेम मृदु बचन सुहाए। बहुबिधि राम लोग समुझाए।।

    अर्थ (Hindi)

    कहि सप्रेम मृदु बचन सुहाए। बहुबिधि राम लोग समुझाए।।

  841. RCM 2.85.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    किए धरम उपदेस घनेरे। लोग प्रेम बस फिरहिं न फेरे।।

    अर्थ (Hindi)

    किए धरम उपदेस घनेरे। लोग प्रेम बस फिरहिं न फेरे।।

  842. RCM 2.85.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सीलु सनेहु छाड़ि नहिं जाई। असमंजस बस भे रघुराई।।

    अर्थ (Hindi)

    सीलु सनेहु छाड़ि नहिं जाई। असमंजस बस भे रघुराई।।

  843. RCM 2.85.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    लोग सोग श्रम बस गए सोई। कछुक देवमायाँ मति मोई।।

    अर्थ (Hindi)

    लोग सोग श्रम बस गए सोई। कछुक देवमायाँ मति मोई।।

  844. RCM 2.85.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जबहिं जाम जुग जामिनि बीती। राम सचिव सन कहेउ सप्रीती।।

    अर्थ (Hindi)

    जबहिं जाम जुग जामिनि बीती। राम सचिव सन कहेउ सप्रीती।।

  845. RCM 2.85.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    खोज मारि रथु हाँकहु ताता। आन उपायँ बनिहि नहिं बाता।।

    अर्थ (Hindi)

    खोज मारि रथु हाँकहु ताता। आन उपायँ बनिहि नहिं बाता।।

  846. RCM 2.85.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राम लखन सुय जान चढ़ि संभु चरन सिरु नाइ।।

    अर्थ (Hindi)

    राम लखन सुय जान चढ़ि संभु चरन सिरु नाइ।।

  847. RCM 2.85.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सचिवँ चलायउ तुरत रथु इत उत खोज दुराइ।।85।।

    अर्थ (Hindi)

    सचिवँ चलायउ तुरत रथु इत उत खोज दुराइ।।85।।

  848. RCM 2.86.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जागे सकल लोग भएँ भोरू। गे रघुनाथ भयउ अति सोरू।।

    अर्थ (Hindi)

    जागे सकल लोग भएँ भोरू। गे रघुनाथ भयउ अति सोरू।।

  849. RCM 2.86.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    रथ कर खोज कतहहुँ नहिं पावहिं। राम राम कहि चहु दिसि धावहिं।।

    अर्थ (Hindi)

    रथ कर खोज कतहहुँ नहिं पावहिं। राम राम कहि चहु दिसि धावहिं।।

  850. RCM 2.86.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मनहुँ बारिनिधि बूड़ जहाजू। भयउ बिकल बड़ बनिक समाजू।।

    अर्थ (Hindi)

    मनहुँ बारिनिधि बूड़ जहाजू। भयउ बिकल बड़ बनिक समाजू।।

  851. RCM 2.86.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    एकहि एक देंहिं उपदेसू। तजे राम हम जानि कलेसू।।

    अर्थ (Hindi)

    एकहि एक देंहिं उपदेसू। तजे राम हम जानि कलेसू।।

  852. RCM 2.86.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    निंदहिं आपु सराहहिं मीना। धिग जीवनु रघुबीर बिहीना।।

    अर्थ (Hindi)

    निंदहिं आपु सराहहिं मीना। धिग जीवनु रघुबीर बिहीना।।

  853. RCM 2.86.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जौं पै प्रिय बियोगु बिधि कीन्हा। तौ कस मरनु न मागें दीन्हा।।

    अर्थ (Hindi)

    जौं पै प्रिय बियोगु बिधि कीन्हा। तौ कस मरनु न मागें दीन्हा।।

  854. RCM 2.86.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    एहि बिधि करत प्रलाप कलापा। आए अवध भरे परितापा।।

    अर्थ (Hindi)

    एहि बिधि करत प्रलाप कलापा। आए अवध भरे परितापा।।

  855. RCM 2.86.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बिषम बियोगु न जाइ बखाना। अवधि आस सब राखहिं प्राना।।

    अर्थ (Hindi)

    बिषम बियोगु न जाइ बखाना। अवधि आस सब राखहिं प्राना।।

  856. RCM 2.86.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राम दरस हित नेम ब्रत लगे करन नर नारि।

    अर्थ (Hindi)

    राम दरस हित नेम ब्रत लगे करन नर नारि।

  857. RCM 2.86.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मनहुँ कोक कोकी कमल दीन बिहीन तमारि।।86।।

    अर्थ (Hindi)

    मनहुँ कोक कोकी कमल दीन बिहीन तमारि।।86।।

  858. RCM 2.87.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सीता सचिव सहित दोउ भाई। सृंगबेरपुर पहुँचे जाई।।

    अर्थ (Hindi)

    सीता सचिव सहित दोउ भाई। सृंगबेरपुर पहुँचे जाई।।

  859. RCM 2.87.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    उतरे राम देवसरि देखी। कीन्ह दंडवत हरषु बिसेषी।।

    अर्थ (Hindi)

    उतरे राम देवसरि देखी। कीन्ह दंडवत हरषु बिसेषी।।

  860. RCM 2.87.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    लखन सचिवँ सियँ किए प्रनामा। सबहि सहित सुखु पायउ रामा।।

    अर्थ (Hindi)

    लखन सचिवँ सियँ किए प्रनामा। सबहि सहित सुखु पायउ रामा।।

  861. RCM 2.87.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    गंग सकल मुद मंगल मूला। सब सुख करनि हरनि सब सूला।।

    अर्थ (Hindi)

    गंग सकल मुद मंगल मूला। सब सुख करनि हरनि सब सूला।।

  862. RCM 2.87.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कहि कहि कोटिक कथा प्रसंगा। रामु बिलोकहिं गंग तरंगा।।

    अर्थ (Hindi)

    कहि कहि कोटिक कथा प्रसंगा। रामु बिलोकहिं गंग तरंगा।।

  863. RCM 2.87.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सचिवहि अनुजहि प्रियहि सुनाई। बिबुध नदी महिमा अधिकाई।।

    अर्थ (Hindi)

    सचिवहि अनुजहि प्रियहि सुनाई। बिबुध नदी महिमा अधिकाई।।

  864. RCM 2.87.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मज्जनु कीन्ह पंथ श्रम गयऊ। सुचि जलु पिअत मुदित मन भयऊ।।

    अर्थ (Hindi)

    मज्जनु कीन्ह पंथ श्रम गयऊ। सुचि जलु पिअत मुदित मन भयऊ।।

  865. RCM 2.87.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुमिरत जाहि मिटइ श्रम भारू। तेहि श्रम यह लौकिक ब्यवहारू।।

    अर्थ (Hindi)

    सुमिरत जाहि मिटइ श्रम भारू। तेहि श्रम यह लौकिक ब्यवहारू।।

  866. RCM 2.87.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुध्द सचिदानंदमय कंद भानुकुल केतु।

    अर्थ (Hindi)

    सुध्द सचिदानंदमय कंद भानुकुल केतु।

  867. RCM 2.87.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    चरित करत नर अनुहरत संसृति सागर सेतु।।87।।

    अर्थ (Hindi)

    चरित करत नर अनुहरत संसृति सागर सेतु।।87।।

  868. RCM 2.88.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    यह सुधि गुहँ निषाद जब पाई। मुदित लिए प्रिय बंधु बोलाई।।

    अर्थ (Hindi)

    यह सुधि गुहँ निषाद जब पाई। मुदित लिए प्रिय बंधु बोलाई।।

  869. RCM 2.88.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    लिए फल मूल भेंट भरि भारा। मिलन चलेउ हिंयँ हरषु अपारा।।

    अर्थ (Hindi)

    लिए फल मूल भेंट भरि भारा। मिलन चलेउ हिंयँ हरषु अपारा।।

  870. RCM 2.88.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    करि दंडवत भेंट धरि आगें। प्रभुहि बिलोकत अति अनुरागें।।

    अर्थ (Hindi)

    करि दंडवत भेंट धरि आगें। प्रभुहि बिलोकत अति अनुरागें।।

  871. RCM 2.88.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सहज सनेह बिबस रघुराई। पूँछी कुसल निकट बैठाई।।

    अर्थ (Hindi)

    सहज सनेह बिबस रघुराई। पूँछी कुसल निकट बैठाई।।

  872. RCM 2.88.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नाथ कुसल पद पंकज देखें। भयउँ भागभाजन जन लेखें।।

    अर्थ (Hindi)

    नाथ कुसल पद पंकज देखें। भयउँ भागभाजन जन लेखें।।

  873. RCM 2.88.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    देव धरनि धनु धामु तुम्हारा। मैं जनु नीचु सहित परिवारा।।

    अर्थ (Hindi)

    देव धरनि धनु धामु तुम्हारा। मैं जनु नीचु सहित परिवारा।।

  874. RCM 2.88.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कृपा करिअ पुर धारिअ पाऊ। थापिय जनु सबु लोगु सिहाऊ।।

    अर्थ (Hindi)

    कृपा करिअ पुर धारिअ पाऊ। थापिय जनु सबु लोगु सिहाऊ।।

  875. RCM 2.88.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कहेहु सत्य सबु सखा सुजाना। मोहि दीन्ह पितु आयसु आना।।

    अर्थ (Hindi)

    कहेहु सत्य सबु सखा सुजाना। मोहि दीन्ह पितु आयसु आना।।

  876. RCM 2.88.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बरष चारिदस बासु बन मुनि ब्रत बेषु अहारु।

    अर्थ (Hindi)

    बरष चारिदस बासु बन मुनि ब्रत बेषु अहारु।

  877. RCM 2.88.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    ग्राम बासु नहिं उचित सुनि गुहहि भयउ दुखु भारु।।88।।

    अर्थ (Hindi)

    ग्राम बासु नहिं उचित सुनि गुहहि भयउ दुखु भारु।।88।।

  878. RCM 2.89.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राम लखन सिय रूप निहारी। कहहिं सप्रेम ग्राम नर नारी।।

    अर्थ (Hindi)

    राम लखन सिय रूप निहारी। कहहिं सप्रेम ग्राम नर नारी।।

  879. RCM 2.89.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    ते पितु मातु कहहु सखि कैसे। जिन्ह पठए बन बालक ऐसे।।

    अर्थ (Hindi)

    ते पितु मातु कहहु सखि कैसे। जिन्ह पठए बन बालक ऐसे।।

  880. RCM 2.89.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    एक कहहिं भल भूपति कीन्हा। लोयन लाहु हमहि बिधि दीन्हा।।

    अर्थ (Hindi)

    एक कहहिं भल भूपति कीन्हा। लोयन लाहु हमहि बिधि दीन्हा।।

  881. RCM 2.89.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तब निषादपति उर अनुमाना। तरु सिंसुपा मनोहर जाना।।

    अर्थ (Hindi)

    तब निषादपति उर अनुमाना। तरु सिंसुपा मनोहर जाना।।

  882. RCM 2.89.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    लै रघुनाथहि ठाउँ देखावा। कहेउ राम सब भाँति सुहावा।।

    अर्थ (Hindi)

    लै रघुनाथहि ठाउँ देखावा। कहेउ राम सब भाँति सुहावा।।

  883. RCM 2.89.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पुरजन करि जोहारु घर आए। रघुबर संध्या करन सिधाए।।

    अर्थ (Hindi)

    पुरजन करि जोहारु घर आए। रघुबर संध्या करन सिधाए।।

  884. RCM 2.89.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    गुहँ सँवारि साँथरी डसाई। कुस किसलयमय मृदुल सुहाई।।

    अर्थ (Hindi)

    गुहँ सँवारि साँथरी डसाई। कुस किसलयमय मृदुल सुहाई।।

  885. RCM 2.89.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुचि फल मूल मधुर मृदु जानी। दोना भरि भरि राखेसि पानी।।

    अर्थ (Hindi)

    सुचि फल मूल मधुर मृदु जानी। दोना भरि भरि राखेसि पानी।।

  886. RCM 2.89.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सिय सुमंत्र भ्राता सहित कंद मूल फल खाइ।

    अर्थ (Hindi)

    सिय सुमंत्र भ्राता सहित कंद मूल फल खाइ।

  887. RCM 2.89.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सयन कीन्ह रघुबंसमनि पाय पलोटत भाइ।।89।।

    अर्थ (Hindi)

    सयन कीन्ह रघुबंसमनि पाय पलोटत भाइ।।89।।

  888. RCM 2.90.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    उठे लखनु प्रभु सोवत जानी। कहि सचिवहि सोवन मृदु बानी।।

    अर्थ (Hindi)

    उठे लखनु प्रभु सोवत जानी। कहि सचिवहि सोवन मृदु बानी।।

  889. RCM 2.90.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कछुक दूर सजि बान सरासन। जागन लगे बैठि बीरासन।।

    अर्थ (Hindi)

    कछुक दूर सजि बान सरासन। जागन लगे बैठि बीरासन।।

  890. RCM 2.90.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    गुँह बोलाइ पाहरू प्रतीती। ठावँ ठाँव राखे अति प्रीती।।

    अर्थ (Hindi)

    गुँह बोलाइ पाहरू प्रतीती। ठावँ ठाँव राखे अति प्रीती।।

  891. RCM 2.90.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    आपु लखन पहिं बैठेउ जाई। कटि भाथी सर चाप चढ़ाई।।

    अर्थ (Hindi)

    आपु लखन पहिं बैठेउ जाई। कटि भाथी सर चाप चढ़ाई।।

  892. RCM 2.90.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सोवत प्रभुहि निहारि निषादू। भयउ प्रेम बस ह्दयँ बिषादू।।

    अर्थ (Hindi)

    सोवत प्रभुहि निहारि निषादू। भयउ प्रेम बस ह्दयँ बिषादू।।

  893. RCM 2.90.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तनु पुलकित जलु लोचन बहई। बचन सप्रेम लखन सन कहई।।

    अर्थ (Hindi)

    तनु पुलकित जलु लोचन बहई। बचन सप्रेम लखन सन कहई।।

  894. RCM 2.90.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भूपति भवन सुभायँ सुहावा। सुरपति सदनु न पटतर पावा।।

    अर्थ (Hindi)

    भूपति भवन सुभायँ सुहावा। सुरपति सदनु न पटतर पावा।।

  895. RCM 2.90.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मनिमय रचित चारु चौबारे। जनु रतिपति निज हाथ सँवारे।।

    अर्थ (Hindi)

    मनिमय रचित चारु चौबारे। जनु रतिपति निज हाथ सँवारे।।

  896. RCM 2.90.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुचि सुबिचित्र सुभोगमय सुमन सुगंध सुबास।

    अर्थ (Hindi)

    सुचि सुबिचित्र सुभोगमय सुमन सुगंध सुबास।

  897. RCM 2.90.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पलँग मंजु मनिदीप जहँ सब बिधि सकल सुपास।।90।।

    अर्थ (Hindi)

    पलँग मंजु मनिदीप जहँ सब बिधि सकल सुपास।।90।।

  898. RCM 2.91.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बिबिध बसन उपधान तुराई। छीर फेन मृदु बिसद सुहाई।।

    अर्थ (Hindi)

    बिबिध बसन उपधान तुराई। छीर फेन मृदु बिसद सुहाई।।

  899. RCM 2.91.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तहँ सिय रामु सयन निसि करहीं। निज छबि रति मनोज मदु हरहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    तहँ सिय रामु सयन निसि करहीं। निज छबि रति मनोज मदु हरहीं।।

  900. RCM 2.91.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    ते सिय रामु साथरीं सोए। श्रमित बसन बिनु जाहिं न जोए।।

    अर्थ (Hindi)

    ते सिय रामु साथरीं सोए। श्रमित बसन बिनु जाहिं न जोए।।

  901. RCM 2.91.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मातु पिता परिजन पुरबासी। सखा सुसील दास अरु दासी।।

    अर्थ (Hindi)

    मातु पिता परिजन पुरबासी। सखा सुसील दास अरु दासी।।

  902. RCM 2.91.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जोगवहिं जिन्हहि प्रान की नाई। महि सोवत तेइ राम गोसाईं।।

    अर्थ (Hindi)

    जोगवहिं जिन्हहि प्रान की नाई। महि सोवत तेइ राम गोसाईं।।

  903. RCM 2.91.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पिता जनक जग बिदित प्रभाऊ। ससुर सुरेस सखा रघुराऊ।।

    अर्थ (Hindi)

    पिता जनक जग बिदित प्रभाऊ। ससुर सुरेस सखा रघुराऊ।।

  904. RCM 2.91.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    रामचंदु पति सो बैदेही। सोवत महि बिधि बाम न केही।।

    अर्थ (Hindi)

    रामचंदु पति सो बैदेही। सोवत महि बिधि बाम न केही।।

  905. RCM 2.91.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सिय रघुबीर कि कानन जोगू। करम प्रधान सत्य कह लोगू।।

    अर्थ (Hindi)

    सिय रघुबीर कि कानन जोगू। करम प्रधान सत्य कह लोगू।।

  906. RCM 2.91.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कैकयनंदिनि मंदमति कठिन कुटिलपनु कीन्ह।

    अर्थ (Hindi)

    कैकयनंदिनि मंदमति कठिन कुटिलपनु कीन्ह।

  907. RCM 2.91.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जेहीं रघुनंदन जानकिहि सुख अवसर दुखु दीन्ह।।91।।

    अर्थ (Hindi)

    जेहीं रघुनंदन जानकिहि सुख अवसर दुखु दीन्ह।।91।।

  908. RCM 2.92.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भइ दिनकर कुल बिटप कुठारी। कुमति कीन्ह सब बिस्व दुखारी।।

    अर्थ (Hindi)

    भइ दिनकर कुल बिटप कुठारी। कुमति कीन्ह सब बिस्व दुखारी।।

  909. RCM 2.92.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भयउ बिषादु निषादहि भारी। राम सीय महि सयन निहारी।।

    अर्थ (Hindi)

    भयउ बिषादु निषादहि भारी। राम सीय महि सयन निहारी।।

  910. RCM 2.92.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बोले लखन मधुर मृदु बानी। ग्यान बिराग भगति रस सानी।।

    अर्थ (Hindi)

    बोले लखन मधुर मृदु बानी। ग्यान बिराग भगति रस सानी।।

  911. RCM 2.92.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    काहु न कोउ सुख दुख कर दाता। निज कृत करम भोग सबु भ्राता।।

    अर्थ (Hindi)

    काहु न कोउ सुख दुख कर दाता। निज कृत करम भोग सबु भ्राता।।

  912. RCM 2.92.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जोग बियोग भोग भल मंदा। हित अनहित मध्यम भ्रम फंदा।।

    अर्थ (Hindi)

    जोग बियोग भोग भल मंदा। हित अनहित मध्यम भ्रम फंदा।।

  913. RCM 2.92.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जनमु मरनु जहँ लगि जग जालू। संपती बिपति करमु अरु कालू।।

    अर्थ (Hindi)

    जनमु मरनु जहँ लगि जग जालू। संपती बिपति करमु अरु कालू।।

  914. RCM 2.92.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    धरनि धामु धनु पुर परिवारू। सरगु नरकु जहँ लगि ब्यवहारू।।

    अर्थ (Hindi)

    धरनि धामु धनु पुर परिवारू। सरगु नरकु जहँ लगि ब्यवहारू।।

  915. RCM 2.92.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    देखिअ सुनिअ गुनिअ मन माहीं। मोह मूल परमारथु नाहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    देखिअ सुनिअ गुनिअ मन माहीं। मोह मूल परमारथु नाहीं।।

  916. RCM 2.92.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सपनें होइ भिखारि नृप रंकु नाकपति होइ।

    अर्थ (Hindi)

    सपनें होइ भिखारि नृप रंकु नाकपति होइ।

  917. RCM 2.92.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जागें लाभु न हानि कछु तिमि प्रपंच जियँ जोइ।।92।।

    अर्थ (Hindi)

    जागें लाभु न हानि कछु तिमि प्रपंच जियँ जोइ।।92।।

  918. RCM 2.93.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अस बिचारि नहिं कीजअ रोसू। काहुहि बादि न देइअ दोसू।।

    अर्थ (Hindi)

    अस बिचारि नहिं कीजअ रोसू। काहुहि बादि न देइअ दोसू।।

  919. RCM 2.93.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मोह निसाँ सबु सोवनिहारा। देखिअ सपन अनेक प्रकारा।।

    अर्थ (Hindi)

    मोह निसाँ सबु सोवनिहारा। देखिअ सपन अनेक प्रकारा।।

  920. RCM 2.93.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    एहिं जग जामिनि जागहिं जोगी। परमारथी प्रपंच बियोगी।।

    अर्थ (Hindi)

    एहिं जग जामिनि जागहिं जोगी। परमारथी प्रपंच बियोगी।।

  921. RCM 2.93.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जानिअ तबहिं जीव जग जागा। जब जब बिषय बिलास बिरागा।।

    अर्थ (Hindi)

    जानिअ तबहिं जीव जग जागा। जब जब बिषय बिलास बिरागा।।

  922. RCM 2.93.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    होइ बिबेकु मोह भ्रम भागा। तब रघुनाथ चरन अनुरागा।।

    अर्थ (Hindi)

    होइ बिबेकु मोह भ्रम भागा। तब रघुनाथ चरन अनुरागा।।

  923. RCM 2.93.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सखा परम परमारथु एहू। मन क्रम बचन राम पद नेहू।।

    अर्थ (Hindi)

    सखा परम परमारथु एहू। मन क्रम बचन राम पद नेहू।।

  924. RCM 2.93.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राम ब्रह्म परमारथ रूपा। अबिगत अलख अनादि अनूपा।।

    अर्थ (Hindi)

    राम ब्रह्म परमारथ रूपा। अबिगत अलख अनादि अनूपा।।

  925. RCM 2.93.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सकल बिकार रहित गतभेदा। कहि नित नेति निरूपहिं बेदा।

    अर्थ (Hindi)

    सकल बिकार रहित गतभेदा। कहि नित नेति निरूपहिं बेदा।

  926. RCM 2.93.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भगत भूमि भूसुर सुरभि सुर हित लागि कृपाल।

    अर्थ (Hindi)

    भगत भूमि भूसुर सुरभि सुर हित लागि कृपाल।

  927. RCM 2.93.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    करत चरित धरि मनुज तनु सुनत मिटहि जग जाल।।93।।

    अर्थ (Hindi)

    करत चरित धरि मनुज तनु सुनत मिटहि जग जाल।।93।।

  928. RCM 2.94.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सखा समुझि अस परिहरि मोहु। सिय रघुबीर चरन रत होहू।।

    अर्थ (Hindi)

    सखा समुझि अस परिहरि मोहु। सिय रघुबीर चरन रत होहू।।

  929. RCM 2.94.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कहत राम गुन भा भिनुसारा। जागे जग मंगल सुखदारा।।

    अर्थ (Hindi)

    कहत राम गुन भा भिनुसारा। जागे जग मंगल सुखदारा।।

  930. RCM 2.94.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सकल सोच करि राम नहावा। सुचि सुजान बट छीर मगावा।।

    अर्थ (Hindi)

    सकल सोच करि राम नहावा। सुचि सुजान बट छीर मगावा।।

  931. RCM 2.94.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अनुज सहित सिर जटा बनाए। देखि सुमंत्र नयन जल छाए।।

    अर्थ (Hindi)

    अनुज सहित सिर जटा बनाए। देखि सुमंत्र नयन जल छाए।।

  932. RCM 2.94.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    हृदयँ दाहु अति बदन मलीना। कह कर जोरि बचन अति दीना।।

    अर्थ (Hindi)

    हृदयँ दाहु अति बदन मलीना। कह कर जोरि बचन अति दीना।।

  933. RCM 2.94.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नाथ कहेउ अस कोसलनाथा। लै रथु जाहु राम कें साथा।।

    अर्थ (Hindi)

    नाथ कहेउ अस कोसलनाथा। लै रथु जाहु राम कें साथा।।

  934. RCM 2.94.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बनु देखाइ सुरसरि अन्हवाई। आनेहु फेरि बेगि दोउ भाई।।

    अर्थ (Hindi)

    बनु देखाइ सुरसरि अन्हवाई। आनेहु फेरि बेगि दोउ भाई।।

  935. RCM 2.94.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    लखनु रामु सिय आनेहु फेरी। संसय सकल सँकोच निबेरी।।

    अर्थ (Hindi)

    लखनु रामु सिय आनेहु फेरी। संसय सकल सँकोच निबेरी।।

  936. RCM 2.94.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नृप अस कहेउ गोसाईं जस कहइ करौं बलि सोइ।

    अर्थ (Hindi)

    नृप अस कहेउ गोसाईं जस कहइ करौं बलि सोइ।

  937. RCM 2.94.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    करि बिनती पायन्ह परेउ दीन्ह बाल जिमि रोइ।।94।।

    अर्थ (Hindi)

    करि बिनती पायन्ह परेउ दीन्ह बाल जिमि रोइ।।94।।

  938. RCM 2.95.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तात कृपा करि कीजिअ सोई। जातें अवध अनाथ न होई।।

    अर्थ (Hindi)

    तात कृपा करि कीजिअ सोई। जातें अवध अनाथ न होई।।

  939. RCM 2.95.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मंत्रहि राम उठाइ प्रबोधा। तात धरम मतु तुम्ह सबु सोधा।।

    अर्थ (Hindi)

    मंत्रहि राम उठाइ प्रबोधा। तात धरम मतु तुम्ह सबु सोधा।।

  940. RCM 2.95.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सिबि दधीचि हरिचंद नरेसा। सहे धरम हित कोटि कलेसा।।

    अर्थ (Hindi)

    सिबि दधीचि हरिचंद नरेसा। सहे धरम हित कोटि कलेसा।।

  941. RCM 2.95.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    रंतिदेव बलि भूप सुजाना। धरमु धरेउ सहि संकट नाना।।

    अर्थ (Hindi)

    रंतिदेव बलि भूप सुजाना। धरमु धरेउ सहि संकट नाना।।

  942. RCM 2.95.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    धरमु न दूसर सत्य समाना। आगम निगम पुरान बखाना।।

    अर्थ (Hindi)

    धरमु न दूसर सत्य समाना। आगम निगम पुरान बखाना।।

  943. RCM 2.95.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मैं सोइ धरमु सुलभ करि पावा। तजें तिहूँ पुर अपजसु छावा।।

    अर्थ (Hindi)

    मैं सोइ धरमु सुलभ करि पावा। तजें तिहूँ पुर अपजसु छावा।।

  944. RCM 2.95.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    संभावित कहुँ अपजस लाहू। मरन कोटि सम दारुन दाहू।।

    अर्थ (Hindi)

    संभावित कहुँ अपजस लाहू। मरन कोटि सम दारुन दाहू।।

  945. RCM 2.95.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तुम्ह सन तात बहुत का कहऊँ। दिएँ उतरु फिरि पातकु लहऊँ।।

    अर्थ (Hindi)

    तुम्ह सन तात बहुत का कहऊँ। दिएँ उतरु फिरि पातकु लहऊँ।।

  946. RCM 2.95.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पितु पद गहि कहि कोटि नति बिनय करब कर जोरि।

    अर्थ (Hindi)

    पितु पद गहि कहि कोटि नति बिनय करब कर जोरि।

  947. RCM 2.95.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    चिंता कवनिहु बात कै तात करिअ जनि मोरि।।95।।

    अर्थ (Hindi)

    चिंता कवनिहु बात कै तात करिअ जनि मोरि।।95।।

  948. RCM 2.96.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तुम्ह पुनि पितु सम अति हित मोरें। बिनती करउँ तात कर जोरें।।

    अर्थ (Hindi)

    तुम्ह पुनि पितु सम अति हित मोरें। बिनती करउँ तात कर जोरें।।

  949. RCM 2.96.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सब बिधि सोइ करतब्य तुम्हारें। दुख न पाव पितु सोच हमारें।।

    अर्थ (Hindi)

    सब बिधि सोइ करतब्य तुम्हारें। दुख न पाव पितु सोच हमारें।।

  950. RCM 2.96.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनि रघुनाथ सचिव संबादू। भयउ सपरिजन बिकल निषादू।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनि रघुनाथ सचिव संबादू। भयउ सपरिजन बिकल निषादू।।

  951. RCM 2.96.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पुनि कछु लखन कही कटु बानी। प्रभु बरजे बड़ अनुचित जानी।।

    अर्थ (Hindi)

    पुनि कछु लखन कही कटु बानी। प्रभु बरजे बड़ अनुचित जानी।।

  952. RCM 2.96.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सकुचि राम निज सपथ देवाई। लखन सँदेसु कहिअ जनि जाई।।

    अर्थ (Hindi)

    सकुचि राम निज सपथ देवाई। लखन सँदेसु कहिअ जनि जाई।।

  953. RCM 2.96.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कह सुमंत्रु पुनि भूप सँदेसू। सहि न सकिहि सिय बिपिन कलेसू।।

    अर्थ (Hindi)

    कह सुमंत्रु पुनि भूप सँदेसू। सहि न सकिहि सिय बिपिन कलेसू।।

  954. RCM 2.96.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जेहि बिधि अवध आव फिरि सीया। सोइ रघुबरहि तुम्हहि करनीया।।

    अर्थ (Hindi)

    जेहि बिधि अवध आव फिरि सीया। सोइ रघुबरहि तुम्हहि करनीया।।

  955. RCM 2.96.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नतरु निपट अवलंब बिहीना। मैं न जिअब जिमि जल बिनु मीना।।

    अर्थ (Hindi)

    नतरु निपट अवलंब बिहीना। मैं न जिअब जिमि जल बिनु मीना।।

  956. RCM 2.96.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मइकें ससरें सकल सुख जबहिं जहाँ मनु मान।।

    अर्थ (Hindi)

    मइकें ससरें सकल सुख जबहिं जहाँ मनु मान।।

  957. RCM 2.96.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तँह तब रहिहि सुखेन सिय जब लगि बिपति बिहान।।96।।

    अर्थ (Hindi)

    तँह तब रहिहि सुखेन सिय जब लगि बिपति बिहान।।96।।

  958. RCM 2.97.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बिनती भूप कीन्ह जेहि भाँती। आरति प्रीति न सो कहि जाती।।

    अर्थ (Hindi)

    बिनती भूप कीन्ह जेहि भाँती। आरति प्रीति न सो कहि जाती।।

  959. RCM 2.97.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पितु सँदेसु सुनि कृपानिधाना। सियहि दीन्ह सिख कोटि बिधाना।।

    अर्थ (Hindi)

    पितु सँदेसु सुनि कृपानिधाना। सियहि दीन्ह सिख कोटि बिधाना।।

  960. RCM 2.97.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सासु ससुर गुर प्रिय परिवारू। फिरतु त सब कर मिटै खभारू।।

    अर्थ (Hindi)

    सासु ससुर गुर प्रिय परिवारू। फिरतु त सब कर मिटै खभारू।।

  961. RCM 2.97.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनि पति बचन कहति बैदेही। सुनहु प्रानपति परम सनेही।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनि पति बचन कहति बैदेही। सुनहु प्रानपति परम सनेही।।

  962. RCM 2.97.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    प्रभु करुनामय परम बिबेकी। तनु तजि रहति छाँह किमि छेंकी।।

    अर्थ (Hindi)

    प्रभु करुनामय परम बिबेकी। तनु तजि रहति छाँह किमि छेंकी।।

  963. RCM 2.97.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    प्रभा जाइ कहँ भानु बिहाई। कहँ चंद्रिका चंदु तजि जाई।।

    अर्थ (Hindi)

    प्रभा जाइ कहँ भानु बिहाई। कहँ चंद्रिका चंदु तजि जाई।।

  964. RCM 2.97.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पतिहि प्रेममय बिनय सुनाई। कहति सचिव सन गिरा सुहाई।।

    अर्थ (Hindi)

    पतिहि प्रेममय बिनय सुनाई। कहति सचिव सन गिरा सुहाई।।

  965. RCM 2.97.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तुम्ह पितु ससुर सरिस हितकारी। उतरु देउँ फिरि अनुचित भारी।।

    अर्थ (Hindi)

    तुम्ह पितु ससुर सरिस हितकारी। उतरु देउँ फिरि अनुचित भारी।।

  966. RCM 2.97.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    आरति बस सनमुख भइउँ बिलगु न मानब तात।

    अर्थ (Hindi)

    आरति बस सनमुख भइउँ बिलगु न मानब तात।

  967. RCM 2.97.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    आरजसुत पद कमल बिनु बादि जहाँ लगि नात।।97।।

    अर्थ (Hindi)

    आरजसुत पद कमल बिनु बादि जहाँ लगि नात।।97।।

  968. RCM 2.98.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पितु बैभव बिलास मैं डीठा। नृप मनि मुकुट मिलित पद पीठा।।

    अर्थ (Hindi)

    पितु बैभव बिलास मैं डीठा। नृप मनि मुकुट मिलित पद पीठा।।

  969. RCM 2.98.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुखनिधान अस पितु गृह मोरें। पिय बिहीन मन भाव न भोरें।।

    अर्थ (Hindi)

    सुखनिधान अस पितु गृह मोरें। पिय बिहीन मन भाव न भोरें।।

  970. RCM 2.98.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    ससुर चक्कवइ कोसलराऊ। भुवन चारिदस प्रगट प्रभाऊ।।

    अर्थ (Hindi)

    ससुर चक्कवइ कोसलराऊ। भुवन चारिदस प्रगट प्रभाऊ।।

  971. RCM 2.98.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    आगें होइ जेहि सुरपति लेई। अरध सिंघासन आसनु देई।।

    अर्थ (Hindi)

    आगें होइ जेहि सुरपति लेई। अरध सिंघासन आसनु देई।।

  972. RCM 2.98.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    ससुरु एतादृस अवध निवासू। प्रिय परिवारु मातु सम सासू।।

    अर्थ (Hindi)

    ससुरु एतादृस अवध निवासू। प्रिय परिवारु मातु सम सासू।।

  973. RCM 2.98.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बिनु रघुपति पद पदुम परागा। मोहि केउ सपनेहुँ सुखद न लागा।।

    अर्थ (Hindi)

    बिनु रघुपति पद पदुम परागा। मोहि केउ सपनेहुँ सुखद न लागा।।

  974. RCM 2.98.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अगम पंथ बनभूमि पहारा। करि केहरि सर सरित अपारा।।

    अर्थ (Hindi)

    अगम पंथ बनभूमि पहारा। करि केहरि सर सरित अपारा।।

  975. RCM 2.98.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कोल किरात कुरंग बिहंगा। मोहि सब सुखद प्रानपति संगा।।

    अर्थ (Hindi)

    कोल किरात कुरंग बिहंगा। मोहि सब सुखद प्रानपति संगा।।

  976. RCM 2.98.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सासु ससुर सन मोरि हुँति बिनय करबि परि पायँ।।

    अर्थ (Hindi)

    सासु ससुर सन मोरि हुँति बिनय करबि परि पायँ।।

  977. RCM 2.98.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मोर सोचु जनि करिअ कछु मैं बन सुखी सुभायँ।।98।।

    अर्थ (Hindi)

    मोर सोचु जनि करिअ कछु मैं बन सुखी सुभायँ।।98।।

  978. RCM 2.99.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    प्राननाथ प्रिय देवर साथा। बीर धुरीन धरें धनु भाथा।।

    अर्थ (Hindi)

    प्राननाथ प्रिय देवर साथा। बीर धुरीन धरें धनु भाथा।।

  979. RCM 2.99.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नहिं मग श्रमु भ्रमु दुख मन मोरें। मोहि लगि सोचु करिअ जनि भोरें।।

    अर्थ (Hindi)

    नहिं मग श्रमु भ्रमु दुख मन मोरें। मोहि लगि सोचु करिअ जनि भोरें।।

  980. RCM 2.99.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनि सुमंत्रु सिय सीतलि बानी। भयउ बिकल जनु फनि मनि हानी।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनि सुमंत्रु सिय सीतलि बानी। भयउ बिकल जनु फनि मनि हानी।।

  981. RCM 2.99.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नयन सूझ नहिं सुनइ न काना। कहि न सकइ कछु अति अकुलाना।।

    अर्थ (Hindi)

    नयन सूझ नहिं सुनइ न काना। कहि न सकइ कछु अति अकुलाना।।

  982. RCM 2.99.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राम प्रबोधु कीन्ह बहु भाँति। तदपि होति नहिं सीतलि छाती।।

    अर्थ (Hindi)

    राम प्रबोधु कीन्ह बहु भाँति। तदपि होति नहिं सीतलि छाती।।

  983. RCM 2.99.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जतन अनेक साथ हित कीन्हे। उचित उतर रघुनंदन दीन्हे।।

    अर्थ (Hindi)

    जतन अनेक साथ हित कीन्हे। उचित उतर रघुनंदन दीन्हे।।

  984. RCM 2.99.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मेटि जाइ नहिं राम रजाई। कठिन करम गति कछु न बसाई।।

    अर्थ (Hindi)

    मेटि जाइ नहिं राम रजाई। कठिन करम गति कछु न बसाई।।

  985. RCM 2.99.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राम लखन सिय पद सिरु नाई। फिरेउ बनिक जिमि मूर गवाँई।।

    अर्थ (Hindi)

    राम लखन सिय पद सिरु नाई। फिरेउ बनिक जिमि मूर गवाँई।।

  986. RCM 2.99.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    -रथ हाँकेउ हय राम तन हेरि हेरि हिहिनाहिं।

    अर्थ (Hindi)

    -रथ हाँकेउ हय राम तन हेरि हेरि हिहिनाहिं।

  987. RCM 2.99.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    देखि निषाद बिषादबस धुनहिं सीस पछिताहिं।।99।।

    अर्थ (Hindi)

    देखि निषाद बिषादबस धुनहिं सीस पछिताहिं।।99।।

  988. RCM 2.100.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जासु बियोग बिकल पसु ऐसे। प्रजा मातु पितु जिइहहिं कैसें।।

    अर्थ (Hindi)

    जासु बियोग बिकल पसु ऐसे। प्रजा मातु पितु जिइहहिं कैसें।।

  989. RCM 2.100.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बरबस राम सुमंत्रु पठाए। सुरसरि तीर आपु तब आए।।

    अर्थ (Hindi)

    बरबस राम सुमंत्रु पठाए। सुरसरि तीर आपु तब आए।।

  990. RCM 2.100.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मागी नाव न केवटु आना। कहइ तुम्हार मरमु मैं जाना।।

    अर्थ (Hindi)

    मागी नाव न केवटु आना। कहइ तुम्हार मरमु मैं जाना।।

  991. RCM 2.100.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    चरन कमल रज कहुँ सबु कहई। मानुष करनि मूरि कछु अहई।।

    अर्थ (Hindi)

    चरन कमल रज कहुँ सबु कहई। मानुष करनि मूरि कछु अहई।।

  992. RCM 2.100.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    छुअत सिला भइ नारि सुहाई। पाहन तें न काठ कठिनाई।।

    अर्थ (Hindi)

    छुअत सिला भइ नारि सुहाई। पाहन तें न काठ कठिनाई।।

  993. RCM 2.100.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तरनिउ मुनि घरिनि होइ जाई। बाट परइ मोरि नाव उड़ाई।।

    अर्थ (Hindi)

    तरनिउ मुनि घरिनि होइ जाई। बाट परइ मोरि नाव उड़ाई।।

  994. RCM 2.100.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    एहिं प्रतिपालउँ सबु परिवारू। नहिं जानउँ कछु अउर कबारू।।

    अर्थ (Hindi)

    एहिं प्रतिपालउँ सबु परिवारू। नहिं जानउँ कछु अउर कबारू।।

  995. RCM 2.100.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जौ प्रभु पार अवसि गा चहहू। मोहि पद पदुम पखारन कहहू।।

    अर्थ (Hindi)

    जौ प्रभु पार अवसि गा चहहू। मोहि पद पदुम पखारन कहहू।।

  996. RCM 2.101.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कृपासिंधु बोले मुसुकाई। सोइ करु जेंहि तव नाव न जाई।।

    अर्थ (Hindi)

    कृपासिंधु बोले मुसुकाई। सोइ करु जेंहि तव नाव न जाई।।

  997. RCM 2.101.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    वेगि आनु जल पाय पखारू। होत बिलंबु उतारहि पारू।।

    अर्थ (Hindi)

    वेगि आनु जल पाय पखारू। होत बिलंबु उतारहि पारू।।

  998. RCM 2.101.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जासु नाम सुमरत एक बारा। उतरहिं नर भवसिंधु अपारा।।

    अर्थ (Hindi)

    जासु नाम सुमरत एक बारा। उतरहिं नर भवसिंधु अपारा।।

  999. RCM 2.101.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सोइ कृपालु केवटहि निहोरा। जेहिं जगु किय तिहु पगहु ते थोरा।।

    अर्थ (Hindi)

    सोइ कृपालु केवटहि निहोरा। जेहिं जगु किय तिहु पगहु ते थोरा।।

  1000. RCM 2.101.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पद नख निरखि देवसरि हरषी। सुनि प्रभु बचन मोहँ मति करषी।।

    अर्थ (Hindi)

    पद नख निरखि देवसरि हरषी। सुनि प्रभु बचन मोहँ मति करषी।।

  1001. RCM 2.101.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    केवट राम रजायसु पावा। पानि कठवता भरि लेइ आवा।।

    अर्थ (Hindi)

    केवट राम रजायसु पावा। पानि कठवता भरि लेइ आवा।।

  1002. RCM 2.101.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अति आनंद उमगि अनुरागा। चरन सरोज पखारन लागा।।

    अर्थ (Hindi)

    अति आनंद उमगि अनुरागा। चरन सरोज पखारन लागा।।

  1003. RCM 2.101.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बरषि सुमन सुर सकल सिहाहीं। एहि सम पुन्यपुंज कोउ नाहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    बरषि सुमन सुर सकल सिहाहीं। एहि सम पुन्यपुंज कोउ नाहीं।।

  1004. RCM 2.101.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पद पखारि जलु पान करि आपु सहित परिवार।

    अर्थ (Hindi)

    पद पखारि जलु पान करि आपु सहित परिवार।

  1005. RCM 2.101.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पितर पारु करि प्रभुहि पुनि मुदित गयउ लेइ पार।।101।।

    अर्थ (Hindi)

    पितर पारु करि प्रभुहि पुनि मुदित गयउ लेइ पार।।101।।

  1006. RCM 2.102.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    उतरि ठाड़ भए सुरसरि रेता। सीयराम गुह लखन समेता।।

    अर्थ (Hindi)

    उतरि ठाड़ भए सुरसरि रेता। सीयराम गुह लखन समेता।।

  1007. RCM 2.102.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    केवट उतरि दंडवत कीन्हा। प्रभुहि सकुच एहि नहिं कछु दीन्हा।।

    अर्थ (Hindi)

    केवट उतरि दंडवत कीन्हा। प्रभुहि सकुच एहि नहिं कछु दीन्हा।।

  1008. RCM 2.102.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पिय हिय की सिय जाननिहारी। मनि मुदरी मन मुदित उतारी।।

    अर्थ (Hindi)

    पिय हिय की सिय जाननिहारी। मनि मुदरी मन मुदित उतारी।।

  1009. RCM 2.102.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कहेउ कृपाल लेहि उतराई। केवट चरन गहे अकुलाई।।

    अर्थ (Hindi)

    कहेउ कृपाल लेहि उतराई। केवट चरन गहे अकुलाई।।

  1010. RCM 2.102.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नाथ आजु मैं काह न पावा। मिटे दोष दुख दारिद दावा।।

    अर्थ (Hindi)

    नाथ आजु मैं काह न पावा। मिटे दोष दुख दारिद दावा।।

  1011. RCM 2.102.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बहुत काल मैं कीन्हि मजूरी। आजु दीन्ह बिधि बनि भलि भूरी।।

    अर्थ (Hindi)

    बहुत काल मैं कीन्हि मजूरी। आजु दीन्ह बिधि बनि भलि भूरी।।

  1012. RCM 2.102.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अब कछु नाथ न चाहिअ मोरें। दीनदयाल अनुग्रह तोरें।।

    अर्थ (Hindi)

    अब कछु नाथ न चाहिअ मोरें। दीनदयाल अनुग्रह तोरें।।

  1013. RCM 2.102.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    फिरती बार मोहि जे देबा। सो प्रसादु मैं सिर धरि लेबा।।

    अर्थ (Hindi)

    फिरती बार मोहि जे देबा। सो प्रसादु मैं सिर धरि लेबा।।

  1014. RCM 2.102.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बहुत कीन्ह प्रभु लखन सियँ नहिं कछु केवटु लेइ।

    अर्थ (Hindi)

    बहुत कीन्ह प्रभु लखन सियँ नहिं कछु केवटु लेइ।

  1015. RCM 2.102.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बिदा कीन्ह करुनायतन भगति बिमल बरु देइ।।102।।

    अर्थ (Hindi)

    बिदा कीन्ह करुनायतन भगति बिमल बरु देइ।।102।।

  1016. RCM 2.103.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तब मज्जनु करि रघुकुलनाथा। पूजि पारथिव नायउ माथा।।

    अर्थ (Hindi)

    तब मज्जनु करि रघुकुलनाथा। पूजि पारथिव नायउ माथा।।

  1017. RCM 2.103.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सियँ सुरसरिहि कहेउ कर जोरी। मातु मनोरथ पुरउबि मोरी।।

    अर्थ (Hindi)

    सियँ सुरसरिहि कहेउ कर जोरी। मातु मनोरथ पुरउबि मोरी।।

  1018. RCM 2.103.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पति देवर संग कुसल बहोरी। आइ करौं जेहिं पूजा तोरी।।

    अर्थ (Hindi)

    पति देवर संग कुसल बहोरी। आइ करौं जेहिं पूजा तोरी।।

  1019. RCM 2.103.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनि सिय बिनय प्रेम रस सानी। भइ तब बिमल बारि बर बानी।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनि सिय बिनय प्रेम रस सानी। भइ तब बिमल बारि बर बानी।।

  1020. RCM 2.103.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनु रघुबीर प्रिया बैदेही। तव प्रभाउ जग बिदित न केही।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनु रघुबीर प्रिया बैदेही। तव प्रभाउ जग बिदित न केही।।

  1021. RCM 2.103.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    लोकप होहिं बिलोकत तोरें। तोहि सेवहिं सब सिधि कर जोरें।।

    अर्थ (Hindi)

    लोकप होहिं बिलोकत तोरें। तोहि सेवहिं सब सिधि कर जोरें।।

  1022. RCM 2.103.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तुम्ह जो हमहि बड़ि बिनय सुनाई। कृपा कीन्हि मोहि दीन्हि बड़ाई।।

    अर्थ (Hindi)

    तुम्ह जो हमहि बड़ि बिनय सुनाई। कृपा कीन्हि मोहि दीन्हि बड़ाई।।

  1023. RCM 2.103.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तदपि देबि मैं देबि असीसा। सफल होपन हित निज बागीसा।।

    अर्थ (Hindi)

    तदपि देबि मैं देबि असीसा। सफल होपन हित निज बागीसा।।

  1024. RCM 2.103.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    प्राननाथ देवर सहित कुसल कोसला आइ।

    अर्थ (Hindi)

    प्राननाथ देवर सहित कुसल कोसला आइ।

  1025. RCM 2.103.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पूजहि सब मनकामना सुजसु रहिहि जग छाइ।।103।।

    अर्थ (Hindi)

    पूजहि सब मनकामना सुजसु रहिहि जग छाइ।।103।।

  1026. RCM 2.104.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    गंग बचन सुनि मंगल मूला। मुदित सीय सुरसरि अनुकुला।।

    अर्थ (Hindi)

    गंग बचन सुनि मंगल मूला। मुदित सीय सुरसरि अनुकुला।।

  1027. RCM 2.104.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तब प्रभु गुहहि कहेउ घर जाहू। सुनत सूख मुखु भा उर दाहू।।

    अर्थ (Hindi)

    तब प्रभु गुहहि कहेउ घर जाहू। सुनत सूख मुखु भा उर दाहू।।

  1028. RCM 2.104.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    दीन बचन गुह कह कर जोरी। बिनय सुनहु रघुकुलमनि मोरी।।

    अर्थ (Hindi)

    दीन बचन गुह कह कर जोरी। बिनय सुनहु रघुकुलमनि मोरी।।

  1029. RCM 2.104.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नाथ साथ रहि पंथु देखाई। करि दिन चारि चरन सेवकाई।।

    अर्थ (Hindi)

    नाथ साथ रहि पंथु देखाई। करि दिन चारि चरन सेवकाई।।

  1030. RCM 2.104.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जेहिं बन जाइ रहब रघुराई। परनकुटी मैं करबि सुहाई।।

    अर्थ (Hindi)

    जेहिं बन जाइ रहब रघुराई। परनकुटी मैं करबि सुहाई।।

  1031. RCM 2.104.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तब मोहि कहँ जसि देब रजाई। सोइ करिहउँ रघुबीर दोहाई।।

    अर्थ (Hindi)

    तब मोहि कहँ जसि देब रजाई। सोइ करिहउँ रघुबीर दोहाई।।

  1032. RCM 2.104.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सहज सनेह राम लखि तासु। संग लीन्ह गुह हृदय हुलासू।।

    अर्थ (Hindi)

    सहज सनेह राम लखि तासु। संग लीन्ह गुह हृदय हुलासू।।

  1033. RCM 2.104.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पुनि गुहँ ग्याति बोलि सब लीन्हे। करि परितोषु बिदा तब कीन्हे।।

    अर्थ (Hindi)

    पुनि गुहँ ग्याति बोलि सब लीन्हे। करि परितोषु बिदा तब कीन्हे।।

  1034. RCM 2.104.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तब गनपति सिव सुमिरि प्रभु नाइ सुरसरिहि माथ।

    अर्थ (Hindi)

    तब गनपति सिव सुमिरि प्रभु नाइ सुरसरिहि माथ।

  1035. RCM 2.104.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सखा अनुज सिया सहित बन गवनु कीन्ह रधुनाथ।।104।।

    अर्थ (Hindi)

    सखा अनुज सिया सहित बन गवनु कीन्ह रधुनाथ।।104।।

  1036. RCM 2.105.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तेहि दिन भयउ बिटप तर बासू। लखन सखाँ सब कीन्ह सुपासू।।

    अर्थ (Hindi)

    तेहि दिन भयउ बिटप तर बासू। लखन सखाँ सब कीन्ह सुपासू।।

  1037. RCM 2.105.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    प्रात प्रातकृत करि रधुसाई। तीरथराजु दीख प्रभु जाई।।

    अर्थ (Hindi)

    प्रात प्रातकृत करि रधुसाई। तीरथराजु दीख प्रभु जाई।।

  1038. RCM 2.105.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सचिव सत्य श्रध्दा प्रिय नारी। माधव सरिस मीतु हितकारी।।

    अर्थ (Hindi)

    सचिव सत्य श्रध्दा प्रिय नारी। माधव सरिस मीतु हितकारी।।

  1039. RCM 2.105.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    चारि पदारथ भरा भँडारु। पुन्य प्रदेस देस अति चारु।।

    अर्थ (Hindi)

    चारि पदारथ भरा भँडारु। पुन्य प्रदेस देस अति चारु।।

  1040. RCM 2.105.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    छेत्र अगम गढ़ु गाढ़ सुहावा। सपनेहुँ नहिं प्रतिपच्छिन्ह पावा।।

    अर्थ (Hindi)

    छेत्र अगम गढ़ु गाढ़ सुहावा। सपनेहुँ नहिं प्रतिपच्छिन्ह पावा।।

  1041. RCM 2.105.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सेन सकल तीरथ बर बीरा। कलुष अनीक दलन रनधीरा।।

    अर्थ (Hindi)

    सेन सकल तीरथ बर बीरा। कलुष अनीक दलन रनधीरा।।

  1042. RCM 2.105.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    संगमु सिंहासनु सुठि सोहा। छत्रु अखयबटु मुनि मनु मोहा।।

    अर्थ (Hindi)

    संगमु सिंहासनु सुठि सोहा। छत्रु अखयबटु मुनि मनु मोहा।।

  1043. RCM 2.105.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    चवँर जमुन अरु गंग तरंगा। देखि होहिं दुख दारिद भंगा।।

    अर्थ (Hindi)

    चवँर जमुन अरु गंग तरंगा। देखि होहिं दुख दारिद भंगा।।

  1044. RCM 2.105.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सेवहिं सुकृति साधु सुचि पावहिं सब मनकाम।

    अर्थ (Hindi)

    सेवहिं सुकृति साधु सुचि पावहिं सब मनकाम।

  1045. RCM 2.105.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बंदी बेद पुरान गन कहहिं बिमल गुन ग्राम।।105।।

    अर्थ (Hindi)

    बंदी बेद पुरान गन कहहिं बिमल गुन ग्राम।।105।।

  1046. RCM 2.106.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    को कहि सकइ प्रयाग प्रभाऊ। कलुष पुंज कुंजर मृगराऊ।।

    अर्थ (Hindi)

    को कहि सकइ प्रयाग प्रभाऊ। कलुष पुंज कुंजर मृगराऊ।।

  1047. RCM 2.106.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अस तीरथपति देखि सुहावा। सुख सागर रघुबर सुखु पावा।।

    अर्थ (Hindi)

    अस तीरथपति देखि सुहावा। सुख सागर रघुबर सुखु पावा।।

  1048. RCM 2.106.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कहि सिय लखनहि सखहि सुनाई। श्रीमुख तीरथराज बड़ाई।।

    अर्थ (Hindi)

    कहि सिय लखनहि सखहि सुनाई। श्रीमुख तीरथराज बड़ाई।।

  1049. RCM 2.106.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    करि प्रनामु देखत बन बागा। कहत महातम अति अनुरागा।।

    अर्थ (Hindi)

    करि प्रनामु देखत बन बागा। कहत महातम अति अनुरागा।।

  1050. RCM 2.106.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    एहि बिधि आइ बिलोकी बेनी। सुमिरत सकल सुमंगल देनी।।

    अर्थ (Hindi)

    एहि बिधि आइ बिलोकी बेनी। सुमिरत सकल सुमंगल देनी।।

  1051. RCM 2.106.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मुदित नहाइ कीन्हि सिव सेवा। पुजि जथाबिधि तीरथ देवा।।

    अर्थ (Hindi)

    मुदित नहाइ कीन्हि सिव सेवा। पुजि जथाबिधि तीरथ देवा।।

  1052. RCM 2.106.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तब प्रभु भरद्वाज पहिं आए। करत दंडवत मुनि उर लाए।।

    अर्थ (Hindi)

    तब प्रभु भरद्वाज पहिं आए। करत दंडवत मुनि उर लाए।।

  1053. RCM 2.106.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मुनि मन मोद न कछु कहि जाइ। ब्रह्मानंद रासि जनु पाई।।

    अर्थ (Hindi)

    मुनि मन मोद न कछु कहि जाइ। ब्रह्मानंद रासि जनु पाई।।

  1054. RCM 2.106.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    दीन्हि असीस मुनीस उर अति अनंदु अस जानि।

    अर्थ (Hindi)

    दीन्हि असीस मुनीस उर अति अनंदु अस जानि।

  1055. RCM 2.106.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    लोचन गोचर सुकृत फल मनहुँ किए बिधि आनि।।106।।

    अर्थ (Hindi)

    लोचन गोचर सुकृत फल मनहुँ किए बिधि आनि।।106।।

  1056. RCM 2.107.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कुसल प्रस्न करि आसन दीन्हे। पूजि प्रेम परिपूरन कीन्हे।।

    अर्थ (Hindi)

    कुसल प्रस्न करि आसन दीन्हे। पूजि प्रेम परिपूरन कीन्हे।।

  1057. RCM 2.107.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कंद मूल फल अंकुर नीके। दिए आनि मुनि मनहुँ अमी के।।

    अर्थ (Hindi)

    कंद मूल फल अंकुर नीके। दिए आनि मुनि मनहुँ अमी के।।

  1058. RCM 2.107.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सीय लखन जन सहित सुहाए। अति रुचि राम मूल फल खाए।।

    अर्थ (Hindi)

    सीय लखन जन सहित सुहाए। अति रुचि राम मूल फल खाए।।

  1059. RCM 2.107.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भए बिगतश्रम रामु सुखारे। भरव्दाज मृदु बचन उचारे।।

    अर्थ (Hindi)

    भए बिगतश्रम रामु सुखारे। भरव्दाज मृदु बचन उचारे।।

  1060. RCM 2.107.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    आजु सुफल तपु तीरथ त्यागू। आजु सुफल जप जोग बिरागू।।

    अर्थ (Hindi)

    आजु सुफल तपु तीरथ त्यागू। आजु सुफल जप जोग बिरागू।।

  1061. RCM 2.107.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सफल सकल सुभ साधन साजू। राम तुम्हहि अवलोकत आजू।।

    अर्थ (Hindi)

    सफल सकल सुभ साधन साजू। राम तुम्हहि अवलोकत आजू।।

  1062. RCM 2.107.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    लाभ अवधि सुख अवधि न दूजी। तुम्हारें दरस आस सब पूजी।।

    अर्थ (Hindi)

    लाभ अवधि सुख अवधि न दूजी। तुम्हारें दरस आस सब पूजी।।

  1063. RCM 2.107.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अब करि कृपा देहु बर एहू। निज पद सरसिज सहज सनेहू।।

    अर्थ (Hindi)

    अब करि कृपा देहु बर एहू। निज पद सरसिज सहज सनेहू।।

  1064. RCM 2.107.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    करम बचन मन छाड़ि छलु जब लगि जनु न तुम्हार।

    अर्थ (Hindi)

    करम बचन मन छाड़ि छलु जब लगि जनु न तुम्हार।

  1065. RCM 2.107.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तब लगि सुखु सपनेहुँ नहीं किएँ कोटि उपचार।।

    अर्थ (Hindi)

    तब लगि सुखु सपनेहुँ नहीं किएँ कोटि उपचार।।

  1066. RCM 2.108.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनि मुनि बचन रामु सकुचाने। भाव भगति आनंद अघाने।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनि मुनि बचन रामु सकुचाने। भाव भगति आनंद अघाने।।

  1067. RCM 2.108.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तब रघुबर मुनि सुजसु सुहावा। कोटि भाँति कहि सबहि सुनावा।।

    अर्थ (Hindi)

    तब रघुबर मुनि सुजसु सुहावा। कोटि भाँति कहि सबहि सुनावा।।

  1068. RCM 2.108.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सो बड सो सब गुन गन गेहू। जेहि मुनीस तुम्ह आदर देहू।।

    अर्थ (Hindi)

    सो बड सो सब गुन गन गेहू। जेहि मुनीस तुम्ह आदर देहू।।

  1069. RCM 2.108.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मुनि रघुबीर परसपर नवहीं। बचन अगोचर सुखु अनुभवहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    मुनि रघुबीर परसपर नवहीं। बचन अगोचर सुखु अनुभवहीं।।

  1070. RCM 2.108.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    यह सुधि पाइ प्रयाग निवासी। बटु तापस मुनि सिद्ध उदासी।।

    अर्थ (Hindi)

    यह सुधि पाइ प्रयाग निवासी। बटु तापस मुनि सिद्ध उदासी।।

  1071. RCM 2.108.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भरद्वाज आश्रम सब आए। देखन दसरथ सुअन सुहाए।।

    अर्थ (Hindi)

    भरद्वाज आश्रम सब आए। देखन दसरथ सुअन सुहाए।।

  1072. RCM 2.108.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राम प्रनाम कीन्ह सब काहू। मुदित भए लहि लोयन लाहू।।

    अर्थ (Hindi)

    राम प्रनाम कीन्ह सब काहू। मुदित भए लहि लोयन लाहू।।

  1073. RCM 2.108.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    देहिं असीस परम सुखु पाई। फिरे सराहत सुंदरताई।।

    अर्थ (Hindi)

    देहिं असीस परम सुखु पाई। फिरे सराहत सुंदरताई।।

  1074. RCM 2.108.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राम कीन्ह बिश्राम निसि प्रात प्रयाग नहाइ।

    अर्थ (Hindi)

    राम कीन्ह बिश्राम निसि प्रात प्रयाग नहाइ।

  1075. RCM 2.108.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    चले सहित सिय लखन जन मुददित मुनिहि सिरु नाइ।।108।।

    अर्थ (Hindi)

    चले सहित सिय लखन जन मुददित मुनिहि सिरु नाइ।।108।।

  1076. RCM 2.109.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राम सप्रेम कहेउ मुनि पाहीं। नाथ कहिअ हम केहि मग जाहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    राम सप्रेम कहेउ मुनि पाहीं। नाथ कहिअ हम केहि मग जाहीं।।

  1077. RCM 2.109.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मुनि मन बिहसि राम सन कहहीं। सुगम सकल मग तुम्ह कहुँ अहहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    मुनि मन बिहसि राम सन कहहीं। सुगम सकल मग तुम्ह कहुँ अहहीं।।

  1078. RCM 2.109.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    साथ लागि मुनि सिष्य बोलाए। सुनि मन मुदित पचासक आए।।

    अर्थ (Hindi)

    साथ लागि मुनि सिष्य बोलाए। सुनि मन मुदित पचासक आए।।

  1079. RCM 2.109.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सबन्हि राम पर प्रेम अपारा। सकल कहहि मगु दीख हमारा।।

    अर्थ (Hindi)

    सबन्हि राम पर प्रेम अपारा। सकल कहहि मगु दीख हमारा।।

  1080. RCM 2.109.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मुनि बटु चारि संग तब दीन्हे। जिन्ह बहु जनम सुकृत सब कीन्हे।।

    अर्थ (Hindi)

    मुनि बटु चारि संग तब दीन्हे। जिन्ह बहु जनम सुकृत सब कीन्हे।।

  1081. RCM 2.109.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    करि प्रनामु रिषि आयसु पाई। प्रमुदित हृदयँ चले रघुराई।।

    अर्थ (Hindi)

    करि प्रनामु रिषि आयसु पाई। प्रमुदित हृदयँ चले रघुराई।।

  1082. RCM 2.109.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    ग्राम निकट जब निकसहि जाई। देखहि दरसु नारि नर धाई।।

    अर्थ (Hindi)

    ग्राम निकट जब निकसहि जाई। देखहि दरसु नारि नर धाई।।

  1083. RCM 2.109.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    होहि सनाथ जनम फलु पाई। फिरहि दुखित मनु संग पठाई।।

    अर्थ (Hindi)

    होहि सनाथ जनम फलु पाई। फिरहि दुखित मनु संग पठाई।।

  1084. RCM 2.109.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बिदा किए बटु बिनय करि फिरे पाइ मन काम।

    अर्थ (Hindi)

    बिदा किए बटु बिनय करि फिरे पाइ मन काम।

  1085. RCM 2.109.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    उतरि नहाए जमुन जल जो सरीर सम स्याम।।109।।

    अर्थ (Hindi)

    उतरि नहाए जमुन जल जो सरीर सम स्याम।।109।।

  1086. RCM 2.110.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनत तीरवासी नर नारी। धाए निज निज काज बिसारी।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनत तीरवासी नर नारी। धाए निज निज काज बिसारी।।

  1087. RCM 2.110.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    लखन राम सिय सुन्दरताई। देखि करहिं निज भाग्य बड़ाई।।

    अर्थ (Hindi)

    लखन राम सिय सुन्दरताई। देखि करहिं निज भाग्य बड़ाई।।

  1088. RCM 2.110.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अति लालसा बसहिं मन माहीं। नाउँ गाउँ बूझत सकुचाहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    अति लालसा बसहिं मन माहीं। नाउँ गाउँ बूझत सकुचाहीं।।

  1089. RCM 2.110.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जे तिन्ह महुँ बयबिरिध सयाने। तिन्ह करि जुगुति रामु पहिचाने।।

    अर्थ (Hindi)

    जे तिन्ह महुँ बयबिरिध सयाने। तिन्ह करि जुगुति रामु पहिचाने।।

  1090. RCM 2.110.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सकल कथा तिन्ह सबहि सुनाई। बनहि चले पितु आयसु पाई।।

    अर्थ (Hindi)

    सकल कथा तिन्ह सबहि सुनाई। बनहि चले पितु आयसु पाई।।

  1091. RCM 2.110.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनि सबिषाद सकल पछिताहीं। रानी रायँ कीन्ह भल नाहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनि सबिषाद सकल पछिताहीं। रानी रायँ कीन्ह भल नाहीं।।

  1092. RCM 2.110.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तेहि अवसर एक तापसु आवा। तेजपुंज लघुबयस सुहावा।।

    अर्थ (Hindi)

    तेहि अवसर एक तापसु आवा। तेजपुंज लघुबयस सुहावा।।

  1093. RCM 2.110.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कवि अलखित गति बेषु बिरागी। मन क्रम बचन राम अनुरागी।।

    अर्थ (Hindi)

    कवि अलखित गति बेषु बिरागी। मन क्रम बचन राम अनुरागी।।

  1094. RCM 2.110.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सजल नयन तन पुलकि निज इष्टदेउ पहिचानि।

    अर्थ (Hindi)

    सजल नयन तन पुलकि निज इष्टदेउ पहिचानि।

  1095. RCM 2.110.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    परेउ दंड जिमि धरनितल दसा न जाइ बखानि।।110।।

    अर्थ (Hindi)

    परेउ दंड जिमि धरनितल दसा न जाइ बखानि।।110।।

  1096. RCM 2.111.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राम सप्रेम पुलकि उर लावा। परम रंक जनु पारसु पावा।।

    अर्थ (Hindi)

    राम सप्रेम पुलकि उर लावा। परम रंक जनु पारसु पावा।।

  1097. RCM 2.111.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मनहुँ प्रेमु परमारथु दोऊ। मिलत धरे तन कह सबु कोऊ।।

    अर्थ (Hindi)

    मनहुँ प्रेमु परमारथु दोऊ। मिलत धरे तन कह सबु कोऊ।।

  1098. RCM 2.111.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बहुरि लखन पायन्ह सोइ लागा। लीन्ह उठाइ उमगि अनुरागा।।

    अर्थ (Hindi)

    बहुरि लखन पायन्ह सोइ लागा। लीन्ह उठाइ उमगि अनुरागा।।

  1099. RCM 2.111.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पुनि सिय चरन धूरि धरि सीसा। जननि जानि सिसु दीन्हि असीसा।।

    अर्थ (Hindi)

    पुनि सिय चरन धूरि धरि सीसा। जननि जानि सिसु दीन्हि असीसा।।

  1100. RCM 2.111.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कीन्ह निषाद दंडवत तेही। मिलेउ मुदित लखि राम सनेही।।

    अर्थ (Hindi)

    कीन्ह निषाद दंडवत तेही। मिलेउ मुदित लखि राम सनेही।।

  1101. RCM 2.111.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पिअत नयन पुट रूपु पियूषा। मुदित सुअसनु पाइ जिमि भूखा।।

    अर्थ (Hindi)

    पिअत नयन पुट रूपु पियूषा। मुदित सुअसनु पाइ जिमि भूखा।।

  1102. RCM 2.111.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    ते पितु मातु कहहु सखि कैसे। जिन्ह पठए बन बालक ऐसे।।

    अर्थ (Hindi)

    ते पितु मातु कहहु सखि कैसे। जिन्ह पठए बन बालक ऐसे।।

  1103. RCM 2.111.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राम लखन सिय रूपु निहारी। होहिं सनेह बिकल नर नारी।।

    अर्थ (Hindi)

    राम लखन सिय रूपु निहारी। होहिं सनेह बिकल नर नारी।।

  1104. RCM 2.111.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तब रघुबीर अनेक बिधि सखहि सिखावनु दीन्ह।

    अर्थ (Hindi)

    तब रघुबीर अनेक बिधि सखहि सिखावनु दीन्ह।

  1105. RCM 2.111.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राम रजायसु सीस धरि भवन गवनु तेंइँ कीन्ह।।111।।

    अर्थ (Hindi)

    राम रजायसु सीस धरि भवन गवनु तेंइँ कीन्ह।।111।।

  1106. RCM 2.112.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पुनि सियँ राम लखन कर जोरी। जमुनहि कीन्ह प्रनामु बहोरी।।

    अर्थ (Hindi)

    पुनि सियँ राम लखन कर जोरी। जमुनहि कीन्ह प्रनामु बहोरी।।

  1107. RCM 2.112.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    चले ससीय मुदित दोउ भाई। रबितनुजा कइ करत बड़ाई।।

    अर्थ (Hindi)

    चले ससीय मुदित दोउ भाई। रबितनुजा कइ करत बड़ाई।।

  1108. RCM 2.112.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पथिक अनेक मिलहिं मग जाता। कहहिं सप्रेम देखि दोउ भ्राता।।

    अर्थ (Hindi)

    पथिक अनेक मिलहिं मग जाता। कहहिं सप्रेम देखि दोउ भ्राता।।

  1109. RCM 2.112.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राज लखन सब अंग तुम्हारें। देखि सोचु अति हृदय हमारें।।

    अर्थ (Hindi)

    राज लखन सब अंग तुम्हारें। देखि सोचु अति हृदय हमारें।।

  1110. RCM 2.112.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मारग चलहु पयादेहि पाएँ। ज्योतिषु झूठ हमारें भाएँ।।

    अर्थ (Hindi)

    मारग चलहु पयादेहि पाएँ। ज्योतिषु झूठ हमारें भाएँ।।

  1111. RCM 2.112.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अगमु पंथ गिरि कानन भारी। तेहि महँ साथ नारि सुकुमारी।।

    अर्थ (Hindi)

    अगमु पंथ गिरि कानन भारी। तेहि महँ साथ नारि सुकुमारी।।

  1112. RCM 2.112.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    करि केहरि बन जाइ न जोई। हम सँग चलहि जो आयसु होई।।

    अर्थ (Hindi)

    करि केहरि बन जाइ न जोई। हम सँग चलहि जो आयसु होई।।

  1113. RCM 2.112.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जाब जहाँ लगि तहँ पहुँचाई। फिरब बहोरि तुम्हहि सिरु नाई।।

    अर्थ (Hindi)

    जाब जहाँ लगि तहँ पहुँचाई। फिरब बहोरि तुम्हहि सिरु नाई।।

  1114. RCM 2.112.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    एहि बिधि पूँछहिं प्रेम बस पुलक गात जलु नैन।

    अर्थ (Hindi)

    एहि बिधि पूँछहिं प्रेम बस पुलक गात जलु नैन।

  1115. RCM 2.112.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कृपासिंधु फेरहि तिन्हहि कहि बिनीत मृदु बैन।।112।।

    अर्थ (Hindi)

    कृपासिंधु फेरहि तिन्हहि कहि बिनीत मृदु बैन।।112।।

  1116. RCM 2.113.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जे पुर गाँव बसहिं मग माहीं। तिन्हहि नाग सुर नगर सिहाहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    जे पुर गाँव बसहिं मग माहीं। तिन्हहि नाग सुर नगर सिहाहीं।।

  1117. RCM 2.113.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    केहि सुकृतीं केहि घरीं बसाए। धन्य पुन्यमय परम सुहाए।।

    अर्थ (Hindi)

    केहि सुकृतीं केहि घरीं बसाए। धन्य पुन्यमय परम सुहाए।।

  1118. RCM 2.113.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जहँ जहँ राम चरन चलि जाहीं। तिन्ह समान अमरावति नाहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    जहँ जहँ राम चरन चलि जाहीं। तिन्ह समान अमरावति नाहीं।।

  1119. RCM 2.113.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पुन्यपुंज मग निकट निवासी। तिन्हहि सराहहिं सुरपुरबासी।।

    अर्थ (Hindi)

    पुन्यपुंज मग निकट निवासी। तिन्हहि सराहहिं सुरपुरबासी।।

  1120. RCM 2.113.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जे भरि नयन बिलोकहिं रामहि। सीता लखन सहित घनस्यामहि।।

    अर्थ (Hindi)

    जे भरि नयन बिलोकहिं रामहि। सीता लखन सहित घनस्यामहि।।

  1121. RCM 2.113.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जे सर सरित राम अवगाहहिं। तिन्हहि देव सर सरित सराहहिं।।

    अर्थ (Hindi)

    जे सर सरित राम अवगाहहिं। तिन्हहि देव सर सरित सराहहिं।।

  1122. RCM 2.113.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जेहि तरु तर प्रभु बैठहिं जाई। करहिं कलपतरु तासु बड़ाई।।

    अर्थ (Hindi)

    जेहि तरु तर प्रभु बैठहिं जाई। करहिं कलपतरु तासु बड़ाई।।

  1123. RCM 2.113.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    परसि राम पद पदुम परागा। मानति भूमि भूरि निज भागा।।

    अर्थ (Hindi)

    परसि राम पद पदुम परागा। मानति भूमि भूरि निज भागा।।

  1124. RCM 2.113.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    छाँह करहि घन बिबुधगन बरषहि सुमन सिहाहिं।

    अर्थ (Hindi)

    छाँह करहि घन बिबुधगन बरषहि सुमन सिहाहिं।

  1125. RCM 2.113.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    देखत गिरि बन बिहग मृग रामु चले मग जाहिं।।113।।

    अर्थ (Hindi)

    देखत गिरि बन बिहग मृग रामु चले मग जाहिं।।113।।

  1126. RCM 2.114.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सीता लखन सहित रघुराई। गाँव निकट जब निकसहिं जाई।।

    अर्थ (Hindi)

    सीता लखन सहित रघुराई। गाँव निकट जब निकसहिं जाई।।

  1127. RCM 2.114.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनि सब बाल बृद्ध नर नारी। चलहिं तुरत गृहकाजु बिसारी।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनि सब बाल बृद्ध नर नारी। चलहिं तुरत गृहकाजु बिसारी।।

  1128. RCM 2.114.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राम लखन सिय रूप निहारी। पाइ नयनफलु होहिं सुखारी।।

    अर्थ (Hindi)

    राम लखन सिय रूप निहारी। पाइ नयनफलु होहिं सुखारी।।

  1129. RCM 2.114.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सजल बिलोचन पुलक सरीरा। सब भए मगन देखि दोउ बीरा।।

    अर्थ (Hindi)

    सजल बिलोचन पुलक सरीरा। सब भए मगन देखि दोउ बीरा।।

  1130. RCM 2.114.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बरनि न जाइ दसा तिन्ह केरी। लहि जनु रंकन्ह सुरमनि ढेरी।।

    अर्थ (Hindi)

    बरनि न जाइ दसा तिन्ह केरी। लहि जनु रंकन्ह सुरमनि ढेरी।।

  1131. RCM 2.114.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    एकन्ह एक बोलि सिख देहीं। लोचन लाहु लेहु छन एहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    एकन्ह एक बोलि सिख देहीं। लोचन लाहु लेहु छन एहीं।।

  1132. RCM 2.114.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    रामहि देखि एक अनुरागे। चितवत चले जाहिं सँग लागे।।

    अर्थ (Hindi)

    रामहि देखि एक अनुरागे। चितवत चले जाहिं सँग लागे।।

  1133. RCM 2.114.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    एक नयन मग छबि उर आनी। होहिं सिथिल तन मन बर बानी।।

    अर्थ (Hindi)

    एक नयन मग छबि उर आनी। होहिं सिथिल तन मन बर बानी।।

  1134. RCM 2.114.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    एक देखिं बट छाँह भलि डासि मृदुल तृन पात।

    अर्थ (Hindi)

    एक देखिं बट छाँह भलि डासि मृदुल तृन पात।

  1135. RCM 2.114.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कहहिं गवाँइअ छिनुकु श्रमु गवनब अबहिं कि प्रात।।114।।

    अर्थ (Hindi)

    कहहिं गवाँइअ छिनुकु श्रमु गवनब अबहिं कि प्रात।।114।।

  1136. RCM 2.115.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    एक कलस भरि आनहिं पानी। अँचइअ नाथ कहहिं मृदु बानी।।

    अर्थ (Hindi)

    एक कलस भरि आनहिं पानी। अँचइअ नाथ कहहिं मृदु बानी।।

  1137. RCM 2.115.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनि प्रिय बचन प्रीति अति देखी। राम कृपाल सुसील बिसेषी।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनि प्रिय बचन प्रीति अति देखी। राम कृपाल सुसील बिसेषी।।

  1138. RCM 2.115.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जानी श्रमित सीय मन माहीं। घरिक बिलंबु कीन्ह बट छाहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    जानी श्रमित सीय मन माहीं। घरिक बिलंबु कीन्ह बट छाहीं।।

  1139. RCM 2.115.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मुदित नारि नर देखहिं सोभा। रूप अनूप नयन मनु लोभा।।

    अर्थ (Hindi)

    मुदित नारि नर देखहिं सोभा। रूप अनूप नयन मनु लोभा।।

  1140. RCM 2.115.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    एकटक सब सोहहिं चहुँ ओरा। रामचंद्र मुख चंद चकोरा।।

    अर्थ (Hindi)

    एकटक सब सोहहिं चहुँ ओरा। रामचंद्र मुख चंद चकोरा।।

  1141. RCM 2.115.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तरुन तमाल बरन तनु सोहा। देखत कोटि मदन मनु मोहा।।

    अर्थ (Hindi)

    तरुन तमाल बरन तनु सोहा। देखत कोटि मदन मनु मोहा।।

  1142. RCM 2.115.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    दामिनि बरन लखन सुठि नीके। नख सिख सुभग भावते जी के।।

    अर्थ (Hindi)

    दामिनि बरन लखन सुठि नीके। नख सिख सुभग भावते जी के।।

  1143. RCM 2.115.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मुनिपट कटिन्ह कसें तूनीरा। सोहहिं कर कमलिनि धनु तीरा।।

    अर्थ (Hindi)

    मुनिपट कटिन्ह कसें तूनीरा। सोहहिं कर कमलिनि धनु तीरा।।

  1144. RCM 2.115.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जटा मुकुट सीसनि सुभग उर भुज नयन बिसाल।

    अर्थ (Hindi)

    जटा मुकुट सीसनि सुभग उर भुज नयन बिसाल।

  1145. RCM 2.115.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सरद परब बिधु बदन बर लसत स्वेद कन जाल।।115।।

    अर्थ (Hindi)

    सरद परब बिधु बदन बर लसत स्वेद कन जाल।।115।।

  1146. RCM 2.116.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बरनि न जाइ मनोहर जोरी। सोभा बहुत थोरि मति मोरी।।

    अर्थ (Hindi)

    बरनि न जाइ मनोहर जोरी। सोभा बहुत थोरि मति मोरी।।

  1147. RCM 2.116.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राम लखन सिय सुंदरताई। सब चितवहिं चित मन मति लाई।।

    अर्थ (Hindi)

    राम लखन सिय सुंदरताई। सब चितवहिं चित मन मति लाई।।

  1148. RCM 2.116.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    थके नारि नर प्रेम पिआसे। मनहुँ मृगी मृग देखि दिआ से।।

    अर्थ (Hindi)

    थके नारि नर प्रेम पिआसे। मनहुँ मृगी मृग देखि दिआ से।।

  1149. RCM 2.116.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सीय समीप ग्रामतिय जाहीं। पूँछत अति सनेहँ सकुचाहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    सीय समीप ग्रामतिय जाहीं। पूँछत अति सनेहँ सकुचाहीं।।

  1150. RCM 2.116.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बार बार सब लागहिं पाएँ। कहहिं बचन मृदु सरल सुभाएँ।।

    अर्थ (Hindi)

    बार बार सब लागहिं पाएँ। कहहिं बचन मृदु सरल सुभाएँ।।

  1151. RCM 2.116.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राजकुमारि बिनय हम करहीं। तिय सुभायँ कछु पूँछत डरहीं।

    अर्थ (Hindi)

    राजकुमारि बिनय हम करहीं। तिय सुभायँ कछु पूँछत डरहीं।

  1152. RCM 2.116.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    स्वामिनि अबिनय छमबि हमारी। बिलगु न मानब जानि गवाँरी।।

    अर्थ (Hindi)

    स्वामिनि अबिनय छमबि हमारी। बिलगु न मानब जानि गवाँरी।।

  1153. RCM 2.116.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राजकुअँर दोउ सहज सलोने। इन्ह तें लही दुति मरकत सोने।।

    अर्थ (Hindi)

    राजकुअँर दोउ सहज सलोने। इन्ह तें लही दुति मरकत सोने।।

  1154. RCM 2.116.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    स्यामल गौर किसोर बर सुंदर सुषमा ऐन।

    अर्थ (Hindi)

    स्यामल गौर किसोर बर सुंदर सुषमा ऐन।

  1155. RCM 2.116.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सरद सर्बरीनाथ मुखु सरद सरोरुह नैन।।116।।

    अर्थ (Hindi)

    सरद सर्बरीनाथ मुखु सरद सरोरुह नैन।।116।।

  1156. RCM 2.117.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कोटि मनोज लजावनिहारे। सुमुखि कहहु को आहिं तुम्हारे।।

    अर्थ (Hindi)

    कोटि मनोज लजावनिहारे। सुमुखि कहहु को आहिं तुम्हारे।।

  1157. RCM 2.117.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनि सनेहमय मंजुल बानी। सकुची सिय मन महुँ मुसुकानी।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनि सनेहमय मंजुल बानी। सकुची सिय मन महुँ मुसुकानी।।

  1158. RCM 2.117.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तिन्हहि बिलोकि बिलोकति धरनी। दुहुँ सकोच सकुचित बरबरनी।।

    अर्थ (Hindi)

    तिन्हहि बिलोकि बिलोकति धरनी। दुहुँ सकोच सकुचित बरबरनी।।

  1159. RCM 2.117.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सकुचि सप्रेम बाल मृग नयनी। बोली मधुर बचन पिकबयनी।।

    अर्थ (Hindi)

    सकुचि सप्रेम बाल मृग नयनी। बोली मधुर बचन पिकबयनी।।

  1160. RCM 2.117.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सहज सुभाय सुभग तन गोरे। नामु लखनु लघु देवर मोरे।।

    अर्थ (Hindi)

    सहज सुभाय सुभग तन गोरे। नामु लखनु लघु देवर मोरे।।

  1161. RCM 2.117.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बहुरि बदनु बिधु अंचल ढाँकी। पिय तन चितइ भौंह करि बाँकी।।

    अर्थ (Hindi)

    बहुरि बदनु बिधु अंचल ढाँकी। पिय तन चितइ भौंह करि बाँकी।।

  1162. RCM 2.117.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    खंजन मंजु तिरीछे नयननि। निज पति कहेउ तिन्हहि सियँ सयननि।।

    अर्थ (Hindi)

    खंजन मंजु तिरीछे नयननि। निज पति कहेउ तिन्हहि सियँ सयननि।।

  1163. RCM 2.117.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भइ मुदित सब ग्रामबधूटीं। रंकन्ह राय रासि जनु लूटीं।।

    अर्थ (Hindi)

    भइ मुदित सब ग्रामबधूटीं। रंकन्ह राय रासि जनु लूटीं।।

  1164. RCM 2.117.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अति सप्रेम सिय पायँ परि बहुबिधि देहिं असीस।

    अर्थ (Hindi)

    अति सप्रेम सिय पायँ परि बहुबिधि देहिं असीस।

  1165. RCM 2.117.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सदा सोहागिनि होहु तुम्ह जब लगि महि अहि सीस।।117।।

    अर्थ (Hindi)

    सदा सोहागिनि होहु तुम्ह जब लगि महि अहि सीस।।117।।

  1166. RCM 2.118.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पारबती सम पतिप्रिय होहू। देबि न हम पर छाड़ब छोहू।।

    अर्थ (Hindi)

    पारबती सम पतिप्रिय होहू। देबि न हम पर छाड़ब छोहू।।

  1167. RCM 2.118.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पुनि पुनि बिनय करिअ कर जोरी। जौं एहि मारग फिरिअ बहोरी।।

    अर्थ (Hindi)

    पुनि पुनि बिनय करिअ कर जोरी। जौं एहि मारग फिरिअ बहोरी।।

  1168. RCM 2.118.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    दरसनु देब जानि निज दासी। लखीं सीयँ सब प्रेम पिआसी।।

    अर्थ (Hindi)

    दरसनु देब जानि निज दासी। लखीं सीयँ सब प्रेम पिआसी।।

  1169. RCM 2.118.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मधुर बचन कहि कहि परितोषीं। जनु कुमुदिनीं कौमुदीं पोषीं।।

    अर्थ (Hindi)

    मधुर बचन कहि कहि परितोषीं। जनु कुमुदिनीं कौमुदीं पोषीं।।

  1170. RCM 2.118.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तबहिं लखन रघुबर रुख जानी। पूँछेउ मगु लोगन्हि मृदु बानी।।

    अर्थ (Hindi)

    तबहिं लखन रघुबर रुख जानी। पूँछेउ मगु लोगन्हि मृदु बानी।।

  1171. RCM 2.118.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनत नारि नर भए दुखारी। पुलकित गात बिलोचन बारी।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनत नारि नर भए दुखारी। पुलकित गात बिलोचन बारी।।

  1172. RCM 2.118.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मिटा मोदु मन भए मलीने। बिधि निधि दीन्ह लेत जनु छीने।।

    अर्थ (Hindi)

    मिटा मोदु मन भए मलीने। बिधि निधि दीन्ह लेत जनु छीने।।

  1173. RCM 2.118.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    समुझि करम गति धीरजु कीन्हा। सोधि सुगम मगु तिन्ह कहि दीन्हा।।

    अर्थ (Hindi)

    समुझि करम गति धीरजु कीन्हा। सोधि सुगम मगु तिन्ह कहि दीन्हा।।

  1174. RCM 2.118.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    लखन जानकी सहित तब गवनु कीन्ह रघुनाथ।

    अर्थ (Hindi)

    लखन जानकी सहित तब गवनु कीन्ह रघुनाथ।

  1175. RCM 2.118.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    फेरे सब प्रिय बचन कहि लिए लाइ मन साथ।।118।।

    अर्थ (Hindi)

    फेरे सब प्रिय बचन कहि लिए लाइ मन साथ।।118।।

  1176. RCM 2.119.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    फिरत नारि नर अति पछिताहीं। देअहि दोषु देहिं मन माहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    फिरत नारि नर अति पछिताहीं। देअहि दोषु देहिं मन माहीं।।

  1177. RCM 2.119.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सहित बिषाद परसपर कहहीं। बिधि करतब उलटे सब अहहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    सहित बिषाद परसपर कहहीं। बिधि करतब उलटे सब अहहीं।।

  1178. RCM 2.119.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    निपट निरंकुस निठुर निसंकू। जेहिं ससि कीन्ह सरुज सकलंकू।।

    अर्थ (Hindi)

    निपट निरंकुस निठुर निसंकू। जेहिं ससि कीन्ह सरुज सकलंकू।।

  1179. RCM 2.119.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    रूख कलपतरु सागरु खारा। तेहिं पठए बन राजकुमारा।।

    अर्थ (Hindi)

    रूख कलपतरु सागरु खारा। तेहिं पठए बन राजकुमारा।।

  1180. RCM 2.119.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जौं पे इन्हहि दीन्ह बनबासू। कीन्ह बादि बिधि भोग बिलासू।।

    अर्थ (Hindi)

    जौं पे इन्हहि दीन्ह बनबासू। कीन्ह बादि बिधि भोग बिलासू।।

  1181. RCM 2.119.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    ए बिचरहिं मग बिनु पदत्राना। रचे बादि बिधि बाहन नाना।।

    अर्थ (Hindi)

    ए बिचरहिं मग बिनु पदत्राना। रचे बादि बिधि बाहन नाना।।

  1182. RCM 2.119.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    ए महि परहिं डासि कुस पाता। सुभग सेज कत सृजत बिधाता।।

    अर्थ (Hindi)

    ए महि परहिं डासि कुस पाता। सुभग सेज कत सृजत बिधाता।।

  1183. RCM 2.119.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तरुबर बास इन्हहि बिधि दीन्हा। धवल धाम रचि रचि श्रमु कीन्हा।।

    अर्थ (Hindi)

    तरुबर बास इन्हहि बिधि दीन्हा। धवल धाम रचि रचि श्रमु कीन्हा।।

  1184. RCM 2.120.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जौं ए कंद मूल फल खाहीं। बादि सुधादि असन जग माहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    जौं ए कंद मूल फल खाहीं। बादि सुधादि असन जग माहीं।।

  1185. RCM 2.120.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    एक कहहिं ए सहज सुहाए। आपु प्रगट भए बिधि न बनाए।।

    अर्थ (Hindi)

    एक कहहिं ए सहज सुहाए। आपु प्रगट भए बिधि न बनाए।।

  1186. RCM 2.120.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जहँ लगि बेद कही बिधि करनी। श्रवन नयन मन गोचर बरनी।।

    अर्थ (Hindi)

    जहँ लगि बेद कही बिधि करनी। श्रवन नयन मन गोचर बरनी।।

  1187. RCM 2.120.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    देखहु खोजि भुअन दस चारी। कहँ अस पुरुष कहाँ असि नारी।।

    अर्थ (Hindi)

    देखहु खोजि भुअन दस चारी। कहँ अस पुरुष कहाँ असि नारी।।

  1188. RCM 2.120.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    इन्हहि देखि बिधि मनु अनुरागा। पटतर जोग बनावै लागा।।

    अर्थ (Hindi)

    इन्हहि देखि बिधि मनु अनुरागा। पटतर जोग बनावै लागा।।

  1189. RCM 2.120.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कीन्ह बहुत श्रम ऐक न आए। तेहिं इरिषा बन आनि दुराए।।

    अर्थ (Hindi)

    कीन्ह बहुत श्रम ऐक न आए। तेहिं इरिषा बन आनि दुराए।।

  1190. RCM 2.120.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    एक कहहिं हम बहुत न जानहिं। आपुहि परम धन्य करि मानहिं।।

    अर्थ (Hindi)

    एक कहहिं हम बहुत न जानहिं। आपुहि परम धन्य करि मानहिं।।

  1191. RCM 2.120.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    ते पुनि पुन्यपुंज हम लेखे। जे देखहिं देखिहहिं जिन्ह देखे।।

    अर्थ (Hindi)

    ते पुनि पुन्यपुंज हम लेखे। जे देखहिं देखिहहिं जिन्ह देखे।।

  1192. RCM 2.120.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    एहि बिधि कहि कहि बचन प्रिय लेहिं नयन भरि नीर।

    अर्थ (Hindi)

    एहि बिधि कहि कहि बचन प्रिय लेहिं नयन भरि नीर।

  1193. RCM 2.120.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    किमि चलिहहि मारग अगम सुठि सुकुमार सरीर।।120।।

    अर्थ (Hindi)

    किमि चलिहहि मारग अगम सुठि सुकुमार सरीर।।120।।

  1194. RCM 2.121.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नारि सनेह बिकल बस होहीं। चकई साँझ समय जनु सोहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    नारि सनेह बिकल बस होहीं। चकई साँझ समय जनु सोहीं।।

  1195. RCM 2.121.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मृदु पद कमल कठिन मगु जानी। गहबरि हृदयँ कहहिं बर बानी।।

    अर्थ (Hindi)

    मृदु पद कमल कठिन मगु जानी। गहबरि हृदयँ कहहिं बर बानी।।

  1196. RCM 2.121.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    परसत मृदुल चरन अरुनारे। सकुचति महि जिमि हृदय हमारे।।

    अर्थ (Hindi)

    परसत मृदुल चरन अरुनारे। सकुचति महि जिमि हृदय हमारे।।

  1197. RCM 2.121.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जौं जगदीस इन्हहि बनु दीन्हा। कस न सुमनमय मारगु कीन्हा।।

    अर्थ (Hindi)

    जौं जगदीस इन्हहि बनु दीन्हा। कस न सुमनमय मारगु कीन्हा।।

  1198. RCM 2.121.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जौं मागा पाइअ बिधि पाहीं। ए रखिअहिं सखि आँखिन्ह माहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    जौं मागा पाइअ बिधि पाहीं। ए रखिअहिं सखि आँखिन्ह माहीं।।

  1199. RCM 2.121.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जे नर नारि न अवसर आए। तिन्ह सिय रामु न देखन पाए।।

    अर्थ (Hindi)

    जे नर नारि न अवसर आए। तिन्ह सिय रामु न देखन पाए।।

  1200. RCM 2.121.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनि सुरुप बूझहिं अकुलाई। अब लगि गए कहाँ लगि भाई।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनि सुरुप बूझहिं अकुलाई। अब लगि गए कहाँ लगि भाई।।

  1201. RCM 2.121.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    समरथ धाइ बिलोकहिं जाई। प्रमुदित फिरहिं जनमफलु पाई।।

    अर्थ (Hindi)

    समरथ धाइ बिलोकहिं जाई। प्रमुदित फिरहिं जनमफलु पाई।।

  1202. RCM 2.121.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अबला बालक बृद्ध जन कर मीजहिं पछिताहिं।।

    अर्थ (Hindi)

    अबला बालक बृद्ध जन कर मीजहिं पछिताहिं।।

  1203. RCM 2.121.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    होहिं प्रेमबस लोग इमि रामु जहाँ जहँ जाहिं।।121।।

    अर्थ (Hindi)

    होहिं प्रेमबस लोग इमि रामु जहाँ जहँ जाहिं।।121।।

  1204. RCM 2.122.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    गाँव गाँव अस होइ अनंदू। देखि भानुकुल कैरव चंदू।।

    अर्थ (Hindi)

    गाँव गाँव अस होइ अनंदू। देखि भानुकुल कैरव चंदू।।

  1205. RCM 2.122.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जे कछु समाचार सुनि पावहिं। ते नृप रानिहि दोसु लगावहिं।।

    अर्थ (Hindi)

    जे कछु समाचार सुनि पावहिं। ते नृप रानिहि दोसु लगावहिं।।

  1206. RCM 2.122.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कहहिं एक अति भल नरनाहू। दीन्ह हमहि जोइ लोचन लाहू।।

    अर्थ (Hindi)

    कहहिं एक अति भल नरनाहू। दीन्ह हमहि जोइ लोचन लाहू।।

  1207. RCM 2.122.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कहहिं परस्पर लोग लोगाईं। बातें सरल सनेह सुहाईं।।

    अर्थ (Hindi)

    कहहिं परस्पर लोग लोगाईं। बातें सरल सनेह सुहाईं।।

  1208. RCM 2.122.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    ते पितु मातु धन्य जिन्ह जाए। धन्य सो नगरु जहाँ तें आए।।

    अर्थ (Hindi)

    ते पितु मातु धन्य जिन्ह जाए। धन्य सो नगरु जहाँ तें आए।।

  1209. RCM 2.122.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    धन्य सो देसु सैलु बन गाऊँ। जहँ जहँ जाहिं धन्य सोइ ठाऊँ।।

    अर्थ (Hindi)

    धन्य सो देसु सैलु बन गाऊँ। जहँ जहँ जाहिं धन्य सोइ ठाऊँ।।

  1210. RCM 2.122.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुख पायउ बिरंचि रचि तेही। ए जेहि के सब भाँति सनेही।।

    अर्थ (Hindi)

    सुख पायउ बिरंचि रचि तेही। ए जेहि के सब भाँति सनेही।।

  1211. RCM 2.122.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राम लखन पथि कथा सुहाई। रही सकल मग कानन छाई।।

    अर्थ (Hindi)

    राम लखन पथि कथा सुहाई। रही सकल मग कानन छाई।।

  1212. RCM 2.122.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    एहि बिधि रघुकुल कमल रबि मग लोगन्ह सुख देत।

    अर्थ (Hindi)

    एहि बिधि रघुकुल कमल रबि मग लोगन्ह सुख देत।

  1213. RCM 2.122.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जाहिं चले देखत बिपिन सिय सौमित्रि समेत।।122।।

    अर्थ (Hindi)

    जाहिं चले देखत बिपिन सिय सौमित्रि समेत।।122।।

  1214. RCM 2.123.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    आगे रामु लखनु बने पाछें। तापस बेष बिराजत काछें।।

    अर्थ (Hindi)

    आगे रामु लखनु बने पाछें। तापस बेष बिराजत काछें।।

  1215. RCM 2.123.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    उभय बीच सिय सोहति कैसे। ब्रह्म जीव बिच माया जैसे।।

    अर्थ (Hindi)

    उभय बीच सिय सोहति कैसे। ब्रह्म जीव बिच माया जैसे।।

  1216. RCM 2.123.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बहुरि कहउँ छबि जसि मन बसई। जनु मधु मदन मध्य रति लसई।।

    अर्थ (Hindi)

    बहुरि कहउँ छबि जसि मन बसई। जनु मधु मदन मध्य रति लसई।।

  1217. RCM 2.123.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    उपमा बहुरि कहउँ जियँ जोही। जनु बुध बिधु बिच रोहिनि सोही।।

    अर्थ (Hindi)

    उपमा बहुरि कहउँ जियँ जोही। जनु बुध बिधु बिच रोहिनि सोही।।

  1218. RCM 2.123.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    प्रभु पद रेख बीच बिच सीता। धरति चरन मग चलति सभीता।।

    अर्थ (Hindi)

    प्रभु पद रेख बीच बिच सीता। धरति चरन मग चलति सभीता।।

  1219. RCM 2.123.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सीय राम पद अंक बराएँ। लखन चलहिं मगु दाहिन लाएँ।।

    अर्थ (Hindi)

    सीय राम पद अंक बराएँ। लखन चलहिं मगु दाहिन लाएँ।।

  1220. RCM 2.123.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राम लखन सिय प्रीति सुहाई। बचन अगोचर किमि कहि जाई।।

    अर्थ (Hindi)

    राम लखन सिय प्रीति सुहाई। बचन अगोचर किमि कहि जाई।।

  1221. RCM 2.123.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    खग मृग मगन देखि छबि होहीं। लिए चोरि चित राम बटोहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    खग मृग मगन देखि छबि होहीं। लिए चोरि चित राम बटोहीं।।

  1222. RCM 2.123.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जिन्ह जिन्ह देखे पथिक प्रिय सिय समेत दोउ भाइ।

    अर्थ (Hindi)

    जिन्ह जिन्ह देखे पथिक प्रिय सिय समेत दोउ भाइ।

  1223. RCM 2.123.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भव मगु अगमु अनंदु तेइ बिनु श्रम रहे सिराइ।।123।।

    अर्थ (Hindi)

    भव मगु अगमु अनंदु तेइ बिनु श्रम रहे सिराइ।।123।।

  1224. RCM 2.124.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अजहुँ जासु उर सपनेहुँ काऊ। बसहुँ लखनु सिय रामु बटाऊ।।

    अर्थ (Hindi)

    अजहुँ जासु उर सपनेहुँ काऊ। बसहुँ लखनु सिय रामु बटाऊ।।

  1225. RCM 2.124.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राम धाम पथ पाइहि सोई। जो पथ पाव कबहुँ मुनि कोई।।

    अर्थ (Hindi)

    राम धाम पथ पाइहि सोई। जो पथ पाव कबहुँ मुनि कोई।।

  1226. RCM 2.124.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तब रघुबीर श्रमित सिय जानी। देखि निकट बटु सीतल पानी।।

    अर्थ (Hindi)

    तब रघुबीर श्रमित सिय जानी। देखि निकट बटु सीतल पानी।।

  1227. RCM 2.124.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तहँ बसि कंद मूल फल खाई। प्रात नहाइ चले रघुराई।।

    अर्थ (Hindi)

    तहँ बसि कंद मूल फल खाई। प्रात नहाइ चले रघुराई।।

  1228. RCM 2.124.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    देखत बन सर सैल सुहाए। बालमीकि आश्रम प्रभु आए।।

    अर्थ (Hindi)

    देखत बन सर सैल सुहाए। बालमीकि आश्रम प्रभु आए।।

  1229. RCM 2.124.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राम दीख मुनि बासु सुहावन। सुंदर गिरि काननु जलु पावन।।

    अर्थ (Hindi)

    राम दीख मुनि बासु सुहावन। सुंदर गिरि काननु जलु पावन।।

  1230. RCM 2.124.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सरनि सरोज बिटप बन फूले। गुंजत मंजु मधुप रस भूले।।

    अर्थ (Hindi)

    सरनि सरोज बिटप बन फूले। गुंजत मंजु मधुप रस भूले।।

  1231. RCM 2.124.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    खग मृग बिपुल कोलाहल करहीं। बिरहित बैर मुदित मन चरहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    खग मृग बिपुल कोलाहल करहीं। बिरहित बैर मुदित मन चरहीं।।

  1232. RCM 2.124.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुचि सुंदर आश्रमु निरखि हरषे राजिवनेन।

    अर्थ (Hindi)

    सुचि सुंदर आश्रमु निरखि हरषे राजिवनेन।

  1233. RCM 2.124.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनि रघुबर आगमनु मुनि आगें आयउ लेन।।124।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनि रघुबर आगमनु मुनि आगें आयउ लेन।।124।।

  1234. RCM 2.125.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मुनि कहुँ राम दंडवत कीन्हा। आसिरबादु बिप्रबर दीन्हा।।

    अर्थ (Hindi)

    मुनि कहुँ राम दंडवत कीन्हा। आसिरबादु बिप्रबर दीन्हा।।

  1235. RCM 2.125.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    देखि राम छबि नयन जुड़ाने। करि सनमानु आश्रमहिं आने।।

    अर्थ (Hindi)

    देखि राम छबि नयन जुड़ाने। करि सनमानु आश्रमहिं आने।।

  1236. RCM 2.125.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मुनिबर अतिथि प्रानप्रिय पाए। कंद मूल फल मधुर मगाए।।

    अर्थ (Hindi)

    मुनिबर अतिथि प्रानप्रिय पाए। कंद मूल फल मधुर मगाए।।

  1237. RCM 2.125.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सिय सौमित्रि राम फल खाए। तब मुनि आश्रम दिए सुहाए।।

    अर्थ (Hindi)

    सिय सौमित्रि राम फल खाए। तब मुनि आश्रम दिए सुहाए।।

  1238. RCM 2.125.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बालमीकि मन आनँदु भारी। मंगल मूरति नयन निहारी।।

    अर्थ (Hindi)

    बालमीकि मन आनँदु भारी। मंगल मूरति नयन निहारी।।

  1239. RCM 2.125.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तब कर कमल जोरि रघुराई। बोले बचन श्रवन सुखदाई।।

    अर्थ (Hindi)

    तब कर कमल जोरि रघुराई। बोले बचन श्रवन सुखदाई।।

  1240. RCM 2.125.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तुम्ह त्रिकाल दरसी मुनिनाथा। बिस्व बदर जिमि तुम्हरें हाथा।।

    अर्थ (Hindi)

    तुम्ह त्रिकाल दरसी मुनिनाथा। बिस्व बदर जिमि तुम्हरें हाथा।।

  1241. RCM 2.125.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अस कहि प्रभु सब कथा बखानी। जेहि जेहि भाँति दीन्ह बनु रानी।।

    अर्थ (Hindi)

    अस कहि प्रभु सब कथा बखानी। जेहि जेहि भाँति दीन्ह बनु रानी।।

  1242. RCM 2.125.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तात बचन पुनि मातु हित भाइ भरत अस राउ।

    अर्थ (Hindi)

    तात बचन पुनि मातु हित भाइ भरत अस राउ।

  1243. RCM 2.125.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मो कहुँ दरस तुम्हार प्रभु सबु मम पुन्य प्रभाउ।।125।।

    अर्थ (Hindi)

    मो कहुँ दरस तुम्हार प्रभु सबु मम पुन्य प्रभाउ।।125।।

  1244. RCM 2.126.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    देखि पाय मुनिराय तुम्हारे। भए सुकृत सब सुफल हमारे।।

    अर्थ (Hindi)

    देखि पाय मुनिराय तुम्हारे। भए सुकृत सब सुफल हमारे।।

  1245. RCM 2.126.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अब जहँ राउर आयसु होई। मुनि उदबेगु न पावै कोई।।

    अर्थ (Hindi)

    अब जहँ राउर आयसु होई। मुनि उदबेगु न पावै कोई।।

  1246. RCM 2.126.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मुनि तापस जिन्ह तें दुखु लहहीं। ते नरेस बिनु पावक दहहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    मुनि तापस जिन्ह तें दुखु लहहीं। ते नरेस बिनु पावक दहहीं।।

  1247. RCM 2.126.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मंगल मूल बिप्र परितोषू। दहइ कोटि कुल भूसुर रोषू।।

    अर्थ (Hindi)

    मंगल मूल बिप्र परितोषू। दहइ कोटि कुल भूसुर रोषू।।

  1248. RCM 2.126.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अस जियँ जानि कहिअ सोइ ठाऊँ। सिय सौमित्रि सहित जहँ जाऊँ।।

    अर्थ (Hindi)

    अस जियँ जानि कहिअ सोइ ठाऊँ। सिय सौमित्रि सहित जहँ जाऊँ।।

  1249. RCM 2.126.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तहँ रचि रुचिर परन तृन साला। बासु करौ कछु काल कृपाला।।

    अर्थ (Hindi)

    तहँ रचि रुचिर परन तृन साला। बासु करौ कछु काल कृपाला।।

  1250. RCM 2.126.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सहज सरल सुनि रघुबर बानी। साधु साधु बोले मुनि ग्यानी।।

    अर्थ (Hindi)

    सहज सरल सुनि रघुबर बानी। साधु साधु बोले मुनि ग्यानी।।

  1251. RCM 2.126.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कस न कहहु अस रघुकुलकेतू। तुम्ह पालक संतत श्रुति सेतू।।

    अर्थ (Hindi)

    कस न कहहु अस रघुकुलकेतू। तुम्ह पालक संतत श्रुति सेतू।।

  1252. RCM 2.127.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जगु पेखन तुम्ह देखनिहारे। बिधि हरि संभु नचावनिहारे।।

    अर्थ (Hindi)

    जगु पेखन तुम्ह देखनिहारे। बिधि हरि संभु नचावनिहारे।।

  1253. RCM 2.127.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तेउ न जानहिं मरमु तुम्हारा। औरु तुम्हहि को जाननिहारा।।

    अर्थ (Hindi)

    तेउ न जानहिं मरमु तुम्हारा। औरु तुम्हहि को जाननिहारा।।

  1254. RCM 2.127.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सोइ जानइ जेहि देहु जनाई। जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई।।

    अर्थ (Hindi)

    सोइ जानइ जेहि देहु जनाई। जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई।।

  1255. RCM 2.127.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तुम्हरिहि कृपाँ तुम्हहि रघुनंदन। जानहिं भगत भगत उर चंदन।।

    अर्थ (Hindi)

    तुम्हरिहि कृपाँ तुम्हहि रघुनंदन। जानहिं भगत भगत उर चंदन।।

  1256. RCM 2.127.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    चिदानंदमय देह तुम्हारी। बिगत बिकार जान अधिकारी।।

    अर्थ (Hindi)

    चिदानंदमय देह तुम्हारी। बिगत बिकार जान अधिकारी।।

  1257. RCM 2.127.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नर तनु धरेहु संत सुर काजा। कहहु करहु जस प्राकृत राजा।।

    अर्थ (Hindi)

    नर तनु धरेहु संत सुर काजा। कहहु करहु जस प्राकृत राजा।।

  1258. RCM 2.127.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राम देखि सुनि चरित तुम्हारे। जड़ मोहहिं बुध होहिं सुखारे।।

    अर्थ (Hindi)

    राम देखि सुनि चरित तुम्हारे। जड़ मोहहिं बुध होहिं सुखारे।।

  1259. RCM 2.127.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तुम्ह जो कहहु करहु सबु साँचा। जस काछिअ तस चाहिअ नाचा।।

    अर्थ (Hindi)

    तुम्ह जो कहहु करहु सबु साँचा। जस काछिअ तस चाहिअ नाचा।।

  1260. RCM 2.127.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पूँछेहु मोहि कि रहौं कहँ मैं पूँछत सकुचाउँ।

    अर्थ (Hindi)

    पूँछेहु मोहि कि रहौं कहँ मैं पूँछत सकुचाउँ।

  1261. RCM 2.127.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जहँ न होहु तहँ देहु कहि तुम्हहि देखावौं ठाउँ।।127।।

    अर्थ (Hindi)

    जहँ न होहु तहँ देहु कहि तुम्हहि देखावौं ठाउँ।।127।।

  1262. RCM 2.128.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनि मुनि बचन प्रेम रस साने। सकुचि राम मन महुँ मुसुकाने।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनि मुनि बचन प्रेम रस साने। सकुचि राम मन महुँ मुसुकाने।।

  1263. RCM 2.128.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बालमीकि हँसि कहहिं बहोरी। बानी मधुर अमिअ रस बोरी।।

    अर्थ (Hindi)

    बालमीकि हँसि कहहिं बहोरी। बानी मधुर अमिअ रस बोरी।।

  1264. RCM 2.128.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनहु राम अब कहउँ निकेता। जहाँ बसहु सिय लखन समेता।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनहु राम अब कहउँ निकेता। जहाँ बसहु सिय लखन समेता।।

  1265. RCM 2.128.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जिन्ह के श्रवन समुद्र समाना। कथा तुम्हारि सुभग सरि नाना।।

    अर्थ (Hindi)

    जिन्ह के श्रवन समुद्र समाना। कथा तुम्हारि सुभग सरि नाना।।

  1266. RCM 2.128.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भरहिं निरंतर होहिं न पूरे। तिन्ह के हिय तुम्ह कहुँ गृह रूरे।।

    अर्थ (Hindi)

    भरहिं निरंतर होहिं न पूरे। तिन्ह के हिय तुम्ह कहुँ गृह रूरे।।

  1267. RCM 2.128.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    लोचन चातक जिन्ह करि राखे। रहहिं दरस जलधर अभिलाषे।।

    अर्थ (Hindi)

    लोचन चातक जिन्ह करि राखे। रहहिं दरस जलधर अभिलाषे।।

  1268. RCM 2.128.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    निदरहिं सरित सिंधु सर भारी। रूप बिंदु जल होहिं सुखारी।।

    अर्थ (Hindi)

    निदरहिं सरित सिंधु सर भारी। रूप बिंदु जल होहिं सुखारी।।

  1269. RCM 2.128.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तिन्ह के हृदय सदन सुखदायक। बसहु बंधु सिय सह रघुनायक।।

    अर्थ (Hindi)

    तिन्ह के हृदय सदन सुखदायक। बसहु बंधु सिय सह रघुनायक।।

  1270. RCM 2.128.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जसु तुम्हार मानस बिमल हंसिनि जीहा जासु।

    अर्थ (Hindi)

    जसु तुम्हार मानस बिमल हंसिनि जीहा जासु।

  1271. RCM 2.128.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मुकुताहल गुन गन चुनइ राम बसहु हियँ तासु।।128।।

    अर्थ (Hindi)

    मुकुताहल गुन गन चुनइ राम बसहु हियँ तासु।।128।।

  1272. RCM 2.129.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    प्रभु प्रसाद सुचि सुभग सुबासा। सादर जासु लहइ नित नासा।।

    अर्थ (Hindi)

    प्रभु प्रसाद सुचि सुभग सुबासा। सादर जासु लहइ नित नासा।।

  1273. RCM 2.129.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तुम्हहि निबेदित भोजन करहीं। प्रभु प्रसाद पट भूषन धरहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    तुम्हहि निबेदित भोजन करहीं। प्रभु प्रसाद पट भूषन धरहीं।।

  1274. RCM 2.129.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सीस नवहिं सुर गुरु द्विज देखी। प्रीति सहित करि बिनय बिसेषी।।

    अर्थ (Hindi)

    सीस नवहिं सुर गुरु द्विज देखी। प्रीति सहित करि बिनय बिसेषी।।

  1275. RCM 2.129.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कर नित करहिं राम पद पूजा। राम भरोस हृदयँ नहि दूजा।।

    अर्थ (Hindi)

    कर नित करहिं राम पद पूजा। राम भरोस हृदयँ नहि दूजा।।

  1276. RCM 2.129.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    चरन राम तीरथ चलि जाहीं। राम बसहु तिन्ह के मन माहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    चरन राम तीरथ चलि जाहीं। राम बसहु तिन्ह के मन माहीं।।

  1277. RCM 2.129.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मंत्रराजु नित जपहिं तुम्हारा। पूजहिं तुम्हहि सहित परिवारा।।

    अर्थ (Hindi)

    मंत्रराजु नित जपहिं तुम्हारा। पूजहिं तुम्हहि सहित परिवारा।।

  1278. RCM 2.129.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तरपन होम करहिं बिधि नाना। बिप्र जेवाँइ देहिं बहु दाना।।

    अर्थ (Hindi)

    तरपन होम करहिं बिधि नाना। बिप्र जेवाँइ देहिं बहु दाना।।

  1279. RCM 2.129.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तुम्ह तें अधिक गुरहि जियँ जानी। सकल भायँ सेवहिं सनमानी।।

    अर्थ (Hindi)

    तुम्ह तें अधिक गुरहि जियँ जानी। सकल भायँ सेवहिं सनमानी।।

  1280. RCM 2.130.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    काम कोह मद मान न मोहा। लोभ न छोभ न राग न द्रोहा।।

    अर्थ (Hindi)

    काम कोह मद मान न मोहा। लोभ न छोभ न राग न द्रोहा।।

  1281. RCM 2.130.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जिन्ह कें कपट दंभ नहिं माया। तिन्ह कें हृदय बसहु रघुराया।।

    अर्थ (Hindi)

    जिन्ह कें कपट दंभ नहिं माया। तिन्ह कें हृदय बसहु रघुराया।।

  1282. RCM 2.130.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सब के प्रिय सब के हितकारी। दुख सुख सरिस प्रसंसा गारी।।

    अर्थ (Hindi)

    सब के प्रिय सब के हितकारी। दुख सुख सरिस प्रसंसा गारी।।

  1283. RCM 2.130.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कहहिं सत्य प्रिय बचन बिचारी। जागत सोवत सरन तुम्हारी।।

    अर्थ (Hindi)

    कहहिं सत्य प्रिय बचन बिचारी। जागत सोवत सरन तुम्हारी।।

  1284. RCM 2.130.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तुम्हहि छाड़ि गति दूसरि नाहीं। राम बसहु तिन्ह के मन माहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    तुम्हहि छाड़ि गति दूसरि नाहीं। राम बसहु तिन्ह के मन माहीं।।

  1285. RCM 2.130.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जननी सम जानहिं परनारी। धनु पराव बिष तें बिष भारी।।

    अर्थ (Hindi)

    जननी सम जानहिं परनारी। धनु पराव बिष तें बिष भारी।।

  1286. RCM 2.130.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जे हरषहिं पर संपति देखी। दुखित होहिं पर बिपति बिसेषी।।

    अर्थ (Hindi)

    जे हरषहिं पर संपति देखी। दुखित होहिं पर बिपति बिसेषी।।

  1287. RCM 2.130.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जिन्हहि राम तुम्ह प्रानपिआरे। तिन्ह के मन सुभ सदन तुम्हारे।।

    अर्थ (Hindi)

    जिन्हहि राम तुम्ह प्रानपिआरे। तिन्ह के मन सुभ सदन तुम्हारे।।

  1288. RCM 2.130.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    स्वामि सखा पितु मातु गुर जिन्ह के सब तुम्ह तात।

    अर्थ (Hindi)

    स्वामि सखा पितु मातु गुर जिन्ह के सब तुम्ह तात।

  1289. RCM 2.130.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मन मंदिर तिन्ह कें बसहु सीय सहित दोउ भ्रात।।130।।

    अर्थ (Hindi)

    मन मंदिर तिन्ह कें बसहु सीय सहित दोउ भ्रात।।130।।

  1290. RCM 2.131.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अवगुन तजि सब के गुन गहहीं। बिप्र धेनु हित संकट सहहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    अवगुन तजि सब के गुन गहहीं। बिप्र धेनु हित संकट सहहीं।।

  1291. RCM 2.131.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नीति निपुन जिन्ह कइ जग लीका। घर तुम्हार तिन्ह कर मनु नीका।।

    अर्थ (Hindi)

    नीति निपुन जिन्ह कइ जग लीका। घर तुम्हार तिन्ह कर मनु नीका।।

  1292. RCM 2.131.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    गुन तुम्हार समुझइ निज दोसा। जेहि सब भाँति तुम्हार भरोसा।।

    अर्थ (Hindi)

    गुन तुम्हार समुझइ निज दोसा। जेहि सब भाँति तुम्हार भरोसा।।

  1293. RCM 2.131.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राम भगत प्रिय लागहिं जेही। तेहि उर बसहु सहित बैदेही।।

    अर्थ (Hindi)

    राम भगत प्रिय लागहिं जेही। तेहि उर बसहु सहित बैदेही।।

  1294. RCM 2.131.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जाति पाँति धनु धरम बड़ाई। प्रिय परिवार सदन सुखदाई।।

    अर्थ (Hindi)

    जाति पाँति धनु धरम बड़ाई। प्रिय परिवार सदन सुखदाई।।

  1295. RCM 2.131.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सब तजि तुम्हहि रहइ उर लाई। तेहि के हृदयँ रहहु रघुराई।।

    अर्थ (Hindi)

    सब तजि तुम्हहि रहइ उर लाई। तेहि के हृदयँ रहहु रघुराई।।

  1296. RCM 2.131.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सरगु नरकु अपबरगु समाना। जहँ तहँ देख धरें धनु बाना।।

    अर्थ (Hindi)

    सरगु नरकु अपबरगु समाना। जहँ तहँ देख धरें धनु बाना।।

  1297. RCM 2.131.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    करम बचन मन राउर चेरा। राम करहु तेहि कें उर डेरा।।

    अर्थ (Hindi)

    करम बचन मन राउर चेरा। राम करहु तेहि कें उर डेरा।।

  1298. RCM 2.131.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जाहि न चाहिअ कबहुँ कछु तुम्ह सन सहज सनेहु।

    अर्थ (Hindi)

    जाहि न चाहिअ कबहुँ कछु तुम्ह सन सहज सनेहु।

  1299. RCM 2.131.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बसहु निरंतर तासु मन सो राउर निज गेहु।।131।।

    अर्थ (Hindi)

    बसहु निरंतर तासु मन सो राउर निज गेहु।।131।।

  1300. RCM 2.132.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    एहि बिधि मुनिबर भवन देखाए। बचन सप्रेम राम मन भाए।।

    अर्थ (Hindi)

    एहि बिधि मुनिबर भवन देखाए। बचन सप्रेम राम मन भाए।।

  1301. RCM 2.132.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कह मुनि सुनहु भानुकुलनायक। आश्रम कहउँ समय सुखदायक।।

    अर्थ (Hindi)

    कह मुनि सुनहु भानुकुलनायक। आश्रम कहउँ समय सुखदायक।।

  1302. RCM 2.132.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    चित्रकूट गिरि करहु निवासू। तहँ तुम्हार सब भाँति सुपासू।।

    अर्थ (Hindi)

    चित्रकूट गिरि करहु निवासू। तहँ तुम्हार सब भाँति सुपासू।।

  1303. RCM 2.132.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सैलु सुहावन कानन चारू। करि केहरि मृग बिहग बिहारू।।

    अर्थ (Hindi)

    सैलु सुहावन कानन चारू। करि केहरि मृग बिहग बिहारू।।

  1304. RCM 2.132.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नदी पुनीत पुरान बखानी। अत्रिप्रिया निज तपबल आनी।।

    अर्थ (Hindi)

    नदी पुनीत पुरान बखानी। अत्रिप्रिया निज तपबल आनी।।

  1305. RCM 2.132.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुरसरि धार नाउँ मंदाकिनि। जो सब पातक पोतक डाकिनि।।

    अर्थ (Hindi)

    सुरसरि धार नाउँ मंदाकिनि। जो सब पातक पोतक डाकिनि।।

  1306. RCM 2.132.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अत्रि आदि मुनिबर बहु बसहीं। करहिं जोग जप तप तन कसहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    अत्रि आदि मुनिबर बहु बसहीं। करहिं जोग जप तप तन कसहीं।।

  1307. RCM 2.132.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    चलहु सफल श्रम सब कर करहू। राम देहु गौरव गिरिबरहू।।

    अर्थ (Hindi)

    चलहु सफल श्रम सब कर करहू। राम देहु गौरव गिरिबरहू।।

  1308. RCM 2.132.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    चित्रकूट महिमा अमित कहीं महामुनि गाइ।

    अर्थ (Hindi)

    चित्रकूट महिमा अमित कहीं महामुनि गाइ।

  1309. RCM 2.132.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    आए नहाए सरित बर सिय समेत दोउ भाइ।।132।।

    अर्थ (Hindi)

    आए नहाए सरित बर सिय समेत दोउ भाइ।।132।।

  1310. RCM 2.133.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    रघुबर कहेउ लखन भल घाटू। करहु कतहुँ अब ठाहर ठाटू।।

    अर्थ (Hindi)

    रघुबर कहेउ लखन भल घाटू। करहु कतहुँ अब ठाहर ठाटू।।

  1311. RCM 2.133.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    लखन दीख पय उतर करारा। चहुँ दिसि फिरेउ धनुष जिमि नारा।।

    अर्थ (Hindi)

    लखन दीख पय उतर करारा। चहुँ दिसि फिरेउ धनुष जिमि नारा।।

  1312. RCM 2.133.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नदी पनच सर सम दम दाना। सकल कलुष कलि साउज नाना।।

    अर्थ (Hindi)

    नदी पनच सर सम दम दाना। सकल कलुष कलि साउज नाना।।

  1313. RCM 2.133.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    चित्रकूट जनु अचल अहेरी। चुकइ न घात मार मुठभेरी।।

    अर्थ (Hindi)

    चित्रकूट जनु अचल अहेरी। चुकइ न घात मार मुठभेरी।।

  1314. RCM 2.133.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अस कहि लखन ठाउँ देखरावा। थलु बिलोकि रघुबर सुखु पावा।।

    अर्थ (Hindi)

    अस कहि लखन ठाउँ देखरावा। थलु बिलोकि रघुबर सुखु पावा।।

  1315. RCM 2.133.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    रमेउ राम मनु देवन्ह जाना। चले सहित सुर थपति प्रधाना।।

    अर्थ (Hindi)

    रमेउ राम मनु देवन्ह जाना। चले सहित सुर थपति प्रधाना।।

  1316. RCM 2.133.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कोल किरात बेष सब आए। रचे परन तृन सदन सुहाए।।

    अर्थ (Hindi)

    कोल किरात बेष सब आए। रचे परन तृन सदन सुहाए।।

  1317. RCM 2.133.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बरनि न जाहि मंजु दुइ साला। एक ललित लघु एक बिसाला।।

    अर्थ (Hindi)

    बरनि न जाहि मंजु दुइ साला। एक ललित लघु एक बिसाला।।

  1318. RCM 2.133.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    लखन जानकी सहित प्रभु राजत रुचिर निकेत।

    अर्थ (Hindi)

    लखन जानकी सहित प्रभु राजत रुचिर निकेत।

  1319. RCM 2.133.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सोह मदनु मुनि बेष जनु रति रितुराज समेत।।133।।

    अर्थ (Hindi)

    सोह मदनु मुनि बेष जनु रति रितुराज समेत।।133।।

  1320. RCM 2.134.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अमर नाग किंनर दिसिपाला। चित्रकूट आए तेहि काला।।

    अर्थ (Hindi)

    अमर नाग किंनर दिसिपाला। चित्रकूट आए तेहि काला।।

  1321. RCM 2.134.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राम प्रनामु कीन्ह सब काहू। मुदित देव लहि लोचन लाहू।।

    अर्थ (Hindi)

    राम प्रनामु कीन्ह सब काहू। मुदित देव लहि लोचन लाहू।।

  1322. RCM 2.134.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बरषि सुमन कह देव समाजू। नाथ सनाथ भए हम आजू।।

    अर्थ (Hindi)

    बरषि सुमन कह देव समाजू। नाथ सनाथ भए हम आजू।।

  1323. RCM 2.134.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    करि बिनती दुख दुसह सुनाए। हरषित निज निज सदन सिधाए।।

    अर्थ (Hindi)

    करि बिनती दुख दुसह सुनाए। हरषित निज निज सदन सिधाए।।

  1324. RCM 2.134.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    चित्रकूट रघुनंदनु छाए। समाचार सुनि सुनि मुनि आए।।

    अर्थ (Hindi)

    चित्रकूट रघुनंदनु छाए। समाचार सुनि सुनि मुनि आए।।

  1325. RCM 2.134.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    आवत देखि मुदित मुनिबृंदा। कीन्ह दंडवत रघुकुल चंदा।।

    अर्थ (Hindi)

    आवत देखि मुदित मुनिबृंदा। कीन्ह दंडवत रघुकुल चंदा।।

  1326. RCM 2.134.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मुनि रघुबरहि लाइ उर लेहीं। सुफल होन हित आसिष देहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    मुनि रघुबरहि लाइ उर लेहीं। सुफल होन हित आसिष देहीं।।

  1327. RCM 2.134.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सिय सौमित्र राम छबि देखहिं। साधन सकल सफल करि लेखहिं।।

    अर्थ (Hindi)

    सिय सौमित्र राम छबि देखहिं। साधन सकल सफल करि लेखहिं।।

  1328. RCM 2.134.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जथाजोग सनमानि प्रभु बिदा किए मुनिबृंद।

    अर्थ (Hindi)

    जथाजोग सनमानि प्रभु बिदा किए मुनिबृंद।

  1329. RCM 2.134.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    करहि जोग जप जाग तप निज आश्रमन्हि सुछंद।।134।।

    अर्थ (Hindi)

    करहि जोग जप जाग तप निज आश्रमन्हि सुछंद।।134।।

  1330. RCM 2.135.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    यह सुधि कोल किरातन्ह पाई। हरषे जनु नव निधि घर आई।।

    अर्थ (Hindi)

    यह सुधि कोल किरातन्ह पाई। हरषे जनु नव निधि घर आई।।

  1331. RCM 2.135.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कंद मूल फल भरि भरि दोना। चले रंक जनु लूटन सोना।।

    अर्थ (Hindi)

    कंद मूल फल भरि भरि दोना। चले रंक जनु लूटन सोना।।

  1332. RCM 2.135.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तिन्ह महँ जिन्ह देखे दोउ भ्राता। अपर तिन्हहि पूँछहि मगु जाता।।

    अर्थ (Hindi)

    तिन्ह महँ जिन्ह देखे दोउ भ्राता। अपर तिन्हहि पूँछहि मगु जाता।।

  1333. RCM 2.135.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कहत सुनत रघुबीर निकाई। आइ सबन्हि देखे रघुराई।।

    अर्थ (Hindi)

    कहत सुनत रघुबीर निकाई। आइ सबन्हि देखे रघुराई।।

  1334. RCM 2.135.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    करहिं जोहारु भेंट धरि आगे। प्रभुहि बिलोकहिं अति अनुरागे।।

    अर्थ (Hindi)

    करहिं जोहारु भेंट धरि आगे। प्रभुहि बिलोकहिं अति अनुरागे।।

  1335. RCM 2.135.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    चित्र लिखे जनु जहँ तहँ ठाढ़े। पुलक सरीर नयन जल बाढ़े।।

    अर्थ (Hindi)

    चित्र लिखे जनु जहँ तहँ ठाढ़े। पुलक सरीर नयन जल बाढ़े।।

  1336. RCM 2.135.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राम सनेह मगन सब जाने। कहि प्रिय बचन सकल सनमाने।।

    अर्थ (Hindi)

    राम सनेह मगन सब जाने। कहि प्रिय बचन सकल सनमाने।।

  1337. RCM 2.135.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    प्रभुहि जोहारि बहोरि बहोरी। बचन बिनीत कहहिं कर जोरी।।

    अर्थ (Hindi)

    प्रभुहि जोहारि बहोरि बहोरी। बचन बिनीत कहहिं कर जोरी।।

  1338. RCM 2.135.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अब हम नाथ सनाथ सब भए देखि प्रभु पाय।

    अर्थ (Hindi)

    अब हम नाथ सनाथ सब भए देखि प्रभु पाय।

  1339. RCM 2.135.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भाग हमारे आगमनु राउर कोसलराय।।135।।

    अर्थ (Hindi)

    भाग हमारे आगमनु राउर कोसलराय।।135।।

  1340. RCM 2.136.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    धन्य भूमि बन पंथ पहारा। जहँ जहँ नाथ पाउ तुम्ह धारा।।

    अर्थ (Hindi)

    धन्य भूमि बन पंथ पहारा। जहँ जहँ नाथ पाउ तुम्ह धारा।।

  1341. RCM 2.136.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    धन्य बिहग मृग काननचारी। सफल जनम भए तुम्हहि निहारी।।

    अर्थ (Hindi)

    धन्य बिहग मृग काननचारी। सफल जनम भए तुम्हहि निहारी।।

  1342. RCM 2.136.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    हम सब धन्य सहित परिवारा। दीख दरसु भरि नयन तुम्हारा।।

    अर्थ (Hindi)

    हम सब धन्य सहित परिवारा। दीख दरसु भरि नयन तुम्हारा।।

  1343. RCM 2.136.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कीन्ह बासु भल ठाउँ बिचारी। इहाँ सकल रितु रहब सुखारी।।

    अर्थ (Hindi)

    कीन्ह बासु भल ठाउँ बिचारी। इहाँ सकल रितु रहब सुखारी।।

  1344. RCM 2.136.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    हम सब भाँति करब सेवकाई। करि केहरि अहि बाघ बराई।।

    अर्थ (Hindi)

    हम सब भाँति करब सेवकाई। करि केहरि अहि बाघ बराई।।

  1345. RCM 2.136.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बन बेहड़ गिरि कंदर खोहा। सब हमार प्रभु पग पग जोहा।।

    अर्थ (Hindi)

    बन बेहड़ गिरि कंदर खोहा। सब हमार प्रभु पग पग जोहा।।

  1346. RCM 2.136.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तहँ तहँ तुम्हहि अहेर खेलाउब। सर निरझर जलठाउँ देखाउब।।

    अर्थ (Hindi)

    तहँ तहँ तुम्हहि अहेर खेलाउब। सर निरझर जलठाउँ देखाउब।।

  1347. RCM 2.136.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    हम सेवक परिवार समेता। नाथ न सकुचब आयसु देता।।

    अर्थ (Hindi)

    हम सेवक परिवार समेता। नाथ न सकुचब आयसु देता।।

  1348. RCM 2.136.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बेद बचन मुनि मन अगम ते प्रभु करुना ऐन।

    अर्थ (Hindi)

    बेद बचन मुनि मन अगम ते प्रभु करुना ऐन।

  1349. RCM 2.136.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बचन किरातन्ह के सुनत जिमि पितु बालक बैन।।136।।

    अर्थ (Hindi)

    बचन किरातन्ह के सुनत जिमि पितु बालक बैन।।136।।

  1350. RCM 2.137.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    रामहि केवल प्रेमु पिआरा। जानि लेउ जो जाननिहारा।।

    अर्थ (Hindi)

    रामहि केवल प्रेमु पिआरा। जानि लेउ जो जाननिहारा।।

  1351. RCM 2.137.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राम सकल बनचर तब तोषे। कहि मृदु बचन प्रेम परिपोषे।।

    अर्थ (Hindi)

    राम सकल बनचर तब तोषे। कहि मृदु बचन प्रेम परिपोषे।।

  1352. RCM 2.137.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बिदा किए सिर नाइ सिधाए। प्रभु गुन कहत सुनत घर आए।।

    अर्थ (Hindi)

    बिदा किए सिर नाइ सिधाए। प्रभु गुन कहत सुनत घर आए।।

  1353. RCM 2.137.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    एहि बिधि सिय समेत दोउ भाई। बसहिं बिपिन सुर मुनि सुखदाई।।

    अर्थ (Hindi)

    एहि बिधि सिय समेत दोउ भाई। बसहिं बिपिन सुर मुनि सुखदाई।।

  1354. RCM 2.137.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जब ते आइ रहे रघुनायकु। तब तें भयउ बनु मंगलदायकु।।

    अर्थ (Hindi)

    जब ते आइ रहे रघुनायकु। तब तें भयउ बनु मंगलदायकु।।

  1355. RCM 2.137.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    फूलहिं फलहिं बिटप बिधि नाना।।मंजु बलित बर बेलि बिताना।।

    अर्थ (Hindi)

    फूलहिं फलहिं बिटप बिधि नाना।।मंजु बलित बर बेलि बिताना।।

  1356. RCM 2.137.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुरतरु सरिस सुभायँ सुहाए। मनहुँ बिबुध बन परिहरि आए।।

    अर्थ (Hindi)

    सुरतरु सरिस सुभायँ सुहाए। मनहुँ बिबुध बन परिहरि आए।।

  1357. RCM 2.137.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    गंज मंजुतर मधुकर श्रेनी। त्रिबिध बयारि बहइ सुख देनी।।

    अर्थ (Hindi)

    गंज मंजुतर मधुकर श्रेनी। त्रिबिध बयारि बहइ सुख देनी।।

  1358. RCM 2.137.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नीलकंठ कलकंठ सुक चातक चक्क चकोर।

    अर्थ (Hindi)

    नीलकंठ कलकंठ सुक चातक चक्क चकोर।

  1359. RCM 2.137.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भाँति भाँति बोलहिं बिहग श्रवन सुखद चित चोर।।137।।

    अर्थ (Hindi)

    भाँति भाँति बोलहिं बिहग श्रवन सुखद चित चोर।।137।।

  1360. RCM 2.138.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    केरि केहरि कपि कोल कुरंगा। बिगतबैर बिचरहिं सब संगा।।

    अर्थ (Hindi)

    केरि केहरि कपि कोल कुरंगा। बिगतबैर बिचरहिं सब संगा।।

  1361. RCM 2.138.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    फिरत अहेर राम छबि देखी। होहिं मुदित मृगबंद बिसेषी।।

    अर्थ (Hindi)

    फिरत अहेर राम छबि देखी। होहिं मुदित मृगबंद बिसेषी।।

  1362. RCM 2.138.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बिबुध बिपिन जहँ लगि जग माहीं। देखि राम बनु सकल सिहाहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    बिबुध बिपिन जहँ लगि जग माहीं। देखि राम बनु सकल सिहाहीं।।

  1363. RCM 2.138.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुरसरि सरसइ दिनकर कन्या। मेकलसुता गोदावरि धन्या।।

    अर्थ (Hindi)

    सुरसरि सरसइ दिनकर कन्या। मेकलसुता गोदावरि धन्या।।

  1364. RCM 2.138.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सब सर सिंधु नदी नद नाना। मंदाकिनि कर करहिं बखाना।।

    अर्थ (Hindi)

    सब सर सिंधु नदी नद नाना। मंदाकिनि कर करहिं बखाना।।

  1365. RCM 2.138.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    उदय अस्त गिरि अरु कैलासू। मंदर मेरु सकल सुरबासू।।

    अर्थ (Hindi)

    उदय अस्त गिरि अरु कैलासू। मंदर मेरु सकल सुरबासू।।

  1366. RCM 2.138.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सैल हिमाचल आदिक जेते। चित्रकूट जसु गावहिं तेते।।

    अर्थ (Hindi)

    सैल हिमाचल आदिक जेते। चित्रकूट जसु गावहिं तेते।।

  1367. RCM 2.138.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बिंधि मुदित मन सुखु न समाई। श्रम बिनु बिपुल बड़ाई पाई।।

    अर्थ (Hindi)

    बिंधि मुदित मन सुखु न समाई। श्रम बिनु बिपुल बड़ाई पाई।।

  1368. RCM 2.138.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    चित्रकूट के बिहग मृग बेलि बिटप तृन जाति।

    अर्थ (Hindi)

    चित्रकूट के बिहग मृग बेलि बिटप तृन जाति।

  1369. RCM 2.138.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पुन्य पुंज सब धन्य अस कहहिं देव दिन राति।।138।।

    अर्थ (Hindi)

    पुन्य पुंज सब धन्य अस कहहिं देव दिन राति।।138।।

  1370. RCM 2.139.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नयनवंत रघुबरहि बिलोकी। पाइ जनम फल होहिं बिसोकी।।

    अर्थ (Hindi)

    नयनवंत रघुबरहि बिलोकी। पाइ जनम फल होहिं बिसोकी।।

  1371. RCM 2.139.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    परसि चरन रज अचर सुखारी। भए परम पद के अधिकारी।।

    अर्थ (Hindi)

    परसि चरन रज अचर सुखारी। भए परम पद के अधिकारी।।

  1372. RCM 2.139.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सो बनु सैलु सुभायँ सुहावन। मंगलमय अति पावन पावन।।

    अर्थ (Hindi)

    सो बनु सैलु सुभायँ सुहावन। मंगलमय अति पावन पावन।।

  1373. RCM 2.139.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    महिमा कहिअ कवनि बिधि तासू। सुखसागर जहँ कीन्ह निवासू।।

    अर्थ (Hindi)

    महिमा कहिअ कवनि बिधि तासू। सुखसागर जहँ कीन्ह निवासू।।

  1374. RCM 2.139.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पय पयोधि तजि अवध बिहाई। जहँ सिय लखनु रामु रहे आई।।

    अर्थ (Hindi)

    पय पयोधि तजि अवध बिहाई। जहँ सिय लखनु रामु रहे आई।।

  1375. RCM 2.139.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कहि न सकहिं सुषमा जसि कानन। जौं सत सहस होंहिं सहसानन।।

    अर्थ (Hindi)

    कहि न सकहिं सुषमा जसि कानन। जौं सत सहस होंहिं सहसानन।।

  1376. RCM 2.139.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सो मैं बरनि कहौं बिधि केहीं। डाबर कमठ कि मंदर लेहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    सो मैं बरनि कहौं बिधि केहीं। डाबर कमठ कि मंदर लेहीं।।

  1377. RCM 2.139.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सेवहिं लखनु करम मन बानी। जाइ न सीलु सनेहु बखानी।।

    अर्थ (Hindi)

    सेवहिं लखनु करम मन बानी। जाइ न सीलु सनेहु बखानी।।

  1378. RCM 2.139.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    -छिनु छिनु लखि सिय राम पद जानि आपु पर नेहु।

    अर्थ (Hindi)

    -छिनु छिनु लखि सिय राम पद जानि आपु पर नेहु।

  1379. RCM 2.139.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    करत न सपनेहुँ लखनु चितु बंधु मातु पितु गेहु।।139।।

    अर्थ (Hindi)

    करत न सपनेहुँ लखनु चितु बंधु मातु पितु गेहु।।139।।

  1380. RCM 2.140.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राम संग सिय रहति सुखारी। पुर परिजन गृह सुरति बिसारी।।

    अर्थ (Hindi)

    राम संग सिय रहति सुखारी। पुर परिजन गृह सुरति बिसारी।।

  1381. RCM 2.140.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    छिनु छिनु पिय बिधु बदनु निहारी। प्रमुदित मनहुँ चकोरकुमारी।।

    अर्थ (Hindi)

    छिनु छिनु पिय बिधु बदनु निहारी। प्रमुदित मनहुँ चकोरकुमारी।।

  1382. RCM 2.140.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नाह नेहु नित बढ़त बिलोकी। हरषित रहति दिवस जिमि कोकी।।

    अर्थ (Hindi)

    नाह नेहु नित बढ़त बिलोकी। हरषित रहति दिवस जिमि कोकी।।

  1383. RCM 2.140.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सिय मनु राम चरन अनुरागा। अवध सहस सम बनु प्रिय लागा।।

    अर्थ (Hindi)

    सिय मनु राम चरन अनुरागा। अवध सहस सम बनु प्रिय लागा।।

  1384. RCM 2.140.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    परनकुटी प्रिय प्रियतम संगा। प्रिय परिवारु कुरंग बिहंगा।।

    अर्थ (Hindi)

    परनकुटी प्रिय प्रियतम संगा। प्रिय परिवारु कुरंग बिहंगा।।

  1385. RCM 2.140.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सासु ससुर सम मुनितिय मुनिबर। असनु अमिअ सम कंद मूल फर।।

    अर्थ (Hindi)

    सासु ससुर सम मुनितिय मुनिबर। असनु अमिअ सम कंद मूल फर।।

  1386. RCM 2.140.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नाथ साथ साँथरी सुहाई। मयन सयन सय सम सुखदाई।।

    अर्थ (Hindi)

    नाथ साथ साँथरी सुहाई। मयन सयन सय सम सुखदाई।।

  1387. RCM 2.140.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    लोकप होहिं बिलोकत जासू। तेहि कि मोहि सक बिषय बिलासू।।

    अर्थ (Hindi)

    लोकप होहिं बिलोकत जासू। तेहि कि मोहि सक बिषय बिलासू।।

  1388. RCM 2.140.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    -सुमिरत रामहि तजहिं जन तृन सम बिषय बिलासु।

    अर्थ (Hindi)

    -सुमिरत रामहि तजहिं जन तृन सम बिषय बिलासु।

  1389. RCM 2.140.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    रामप्रिया जग जननि सिय कछु न आचरजु तासु।।140।।

    अर्थ (Hindi)

    रामप्रिया जग जननि सिय कछु न आचरजु तासु।।140।।

  1390. RCM 2.141.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सीय लखन जेहि बिधि सुखु लहहीं। सोइ रघुनाथ करहि सोइ कहहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    सीय लखन जेहि बिधि सुखु लहहीं। सोइ रघुनाथ करहि सोइ कहहीं।।

  1391. RCM 2.141.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कहहिं पुरातन कथा कहानी। सुनहिं लखनु सिय अति सुखु मानी।

    अर्थ (Hindi)

    कहहिं पुरातन कथा कहानी। सुनहिं लखनु सिय अति सुखु मानी।

  1392. RCM 2.141.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जब जब रामु अवध सुधि करहीं। तब तब बारि बिलोचन भरहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    जब जब रामु अवध सुधि करहीं। तब तब बारि बिलोचन भरहीं।।

  1393. RCM 2.141.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुमिरि मातु पितु परिजन भाई। भरत सनेहु सीलु सेवकाई।।

    अर्थ (Hindi)

    सुमिरि मातु पितु परिजन भाई। भरत सनेहु सीलु सेवकाई।।

  1394. RCM 2.141.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कृपासिंधु प्रभु होहिं दुखारी। धीरजु धरहिं कुसमउ बिचारी।।

    अर्थ (Hindi)

    कृपासिंधु प्रभु होहिं दुखारी। धीरजु धरहिं कुसमउ बिचारी।।

  1395. RCM 2.141.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    लखि सिय लखनु बिकल होइ जाहीं। जिमि पुरुषहि अनुसर परिछाहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    लखि सिय लखनु बिकल होइ जाहीं। जिमि पुरुषहि अनुसर परिछाहीं।।

  1396. RCM 2.141.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    प्रिया बंधु गति लखि रघुनंदनु। धीर कृपाल भगत उर चंदनु।।

    अर्थ (Hindi)

    प्रिया बंधु गति लखि रघुनंदनु। धीर कृपाल भगत उर चंदनु।।

  1397. RCM 2.141.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    लगे कहन कछु कथा पुनीता। सुनि सुखु लहहिं लखनु अरु सीता।।

    अर्थ (Hindi)

    लगे कहन कछु कथा पुनीता। सुनि सुखु लहहिं लखनु अरु सीता।।

  1398. RCM 2.141.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    रामु लखन सीता सहित सोहत परन निकेत।

    अर्थ (Hindi)

    रामु लखन सीता सहित सोहत परन निकेत।

  1399. RCM 2.141.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जिमि बासव बस अमरपुर सची जयंत समेत।।141।।

    अर्थ (Hindi)

    जिमि बासव बस अमरपुर सची जयंत समेत।।141।।

  1400. RCM 2.142.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जोगवहिं प्रभु सिय लखनहिं कैसें। पलक बिलोचन गोलक जैसें।।

    अर्थ (Hindi)

    जोगवहिं प्रभु सिय लखनहिं कैसें। पलक बिलोचन गोलक जैसें।।

  1401. RCM 2.142.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सेवहिं लखनु सीय रघुबीरहि। जिमि अबिबेकी पुरुष सरीरहि।।

    अर्थ (Hindi)

    सेवहिं लखनु सीय रघुबीरहि। जिमि अबिबेकी पुरुष सरीरहि।।

  1402. RCM 2.142.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    एहि बिधि प्रभु बन बसहिं सुखारी। खग मृग सुर तापस हितकारी।।

    अर्थ (Hindi)

    एहि बिधि प्रभु बन बसहिं सुखारी। खग मृग सुर तापस हितकारी।।

  1403. RCM 2.142.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कहेउँ राम बन गवनु सुहावा। सुनहु सुमंत्र अवध जिमि आवा।।

    अर्थ (Hindi)

    कहेउँ राम बन गवनु सुहावा। सुनहु सुमंत्र अवध जिमि आवा।।

  1404. RCM 2.142.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    फिरेउ निषादु प्रभुहि पहुँचाई। सचिव सहित रथ देखेसि आई।।

    अर्थ (Hindi)

    फिरेउ निषादु प्रभुहि पहुँचाई। सचिव सहित रथ देखेसि आई।।

  1405. RCM 2.142.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मंत्री बिकल बिलोकि निषादू। कहि न जाइ जस भयउ बिषादू।।

    अर्थ (Hindi)

    मंत्री बिकल बिलोकि निषादू। कहि न जाइ जस भयउ बिषादू।।

  1406. RCM 2.142.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राम राम सिय लखन पुकारी। परेउ धरनितल ब्याकुल भारी।।

    अर्थ (Hindi)

    राम राम सिय लखन पुकारी। परेउ धरनितल ब्याकुल भारी।।

  1407. RCM 2.142.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    देखि दखिन दिसि हय हिहिनाहीं। जनु बिनु पंख बिहग अकुलाहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    देखि दखिन दिसि हय हिहिनाहीं। जनु बिनु पंख बिहग अकुलाहीं।।

  1408. RCM 2.142.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नहिं तृन चरहिं पिअहिं जलु मोचहिं लोचन बारि।

    अर्थ (Hindi)

    नहिं तृन चरहिं पिअहिं जलु मोचहिं लोचन बारि।

  1409. RCM 2.142.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    ब्याकुल भए निषाद सब रघुबर बाजि निहारि।।142।।

    अर्थ (Hindi)

    ब्याकुल भए निषाद सब रघुबर बाजि निहारि।।142।।

  1410. RCM 2.143.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    धरि धीरज तब कहइ निषादू। अब सुमंत्र परिहरहु बिषादू।।

    अर्थ (Hindi)

    धरि धीरज तब कहइ निषादू। अब सुमंत्र परिहरहु बिषादू।।

  1411. RCM 2.143.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तुम्ह पंडित परमारथ ग्याता। धरहु धीर लखि बिमुख बिधाता

    अर्थ (Hindi)

    तुम्ह पंडित परमारथ ग्याता। धरहु धीर लखि बिमुख बिधाता

  1412. RCM 2.143.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बिबिध कथा कहि कहि मृदु बानी। रथ बैठारेउ बरबस आनी।।

    अर्थ (Hindi)

    बिबिध कथा कहि कहि मृदु बानी। रथ बैठारेउ बरबस आनी।।

  1413. RCM 2.143.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सोक सिथिल रथ सकइ न हाँकी। रघुबर बिरह पीर उर बाँकी।।

    अर्थ (Hindi)

    सोक सिथिल रथ सकइ न हाँकी। रघुबर बिरह पीर उर बाँकी।।

  1414. RCM 2.143.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    चरफराहिं मग चलहिं न घोरे। बन मृग मनहुँ आनि रथ जोरे।।

    अर्थ (Hindi)

    चरफराहिं मग चलहिं न घोरे। बन मृग मनहुँ आनि रथ जोरे।।

  1415. RCM 2.143.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अढ़ुकि परहिं फिरि हेरहिं पीछें। राम बियोगि बिकल दुख तीछें।।

    अर्थ (Hindi)

    अढ़ुकि परहिं फिरि हेरहिं पीछें। राम बियोगि बिकल दुख तीछें।।

  1416. RCM 2.143.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जो कह रामु लखनु बैदेही। हिंकरि हिंकरि हित हेरहिं तेही।।

    अर्थ (Hindi)

    जो कह रामु लखनु बैदेही। हिंकरि हिंकरि हित हेरहिं तेही।।

  1417. RCM 2.143.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बाजि बिरह गति कहि किमि जाती। बिनु मनि फनिक बिकल जेहि भाँती।।

    अर्थ (Hindi)

    बाजि बिरह गति कहि किमि जाती। बिनु मनि फनिक बिकल जेहि भाँती।।

  1418. RCM 2.143.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भयउ निषाद बिषादबस देखत सचिव तुरंग।

    अर्थ (Hindi)

    भयउ निषाद बिषादबस देखत सचिव तुरंग।

  1419. RCM 2.143.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बोलि सुसेवक चारि तब दिए सारथी संग।।143।।

    अर्थ (Hindi)

    बोलि सुसेवक चारि तब दिए सारथी संग।।143।।

  1420. RCM 2.144.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    गुह सारथिहि फिरेउ पहुँचाई। बिरहु बिषादु बरनि नहिं जाई।।

    अर्थ (Hindi)

    गुह सारथिहि फिरेउ पहुँचाई। बिरहु बिषादु बरनि नहिं जाई।।

  1421. RCM 2.144.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    चले अवध लेइ रथहि निषादा। होहि छनहिं छन मगन बिषादा।।

    अर्थ (Hindi)

    चले अवध लेइ रथहि निषादा। होहि छनहिं छन मगन बिषादा।।

  1422. RCM 2.144.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सोच सुमंत्र बिकल दुख दीना। धिग जीवन रघुबीर बिहीना।।

    अर्थ (Hindi)

    सोच सुमंत्र बिकल दुख दीना। धिग जीवन रघुबीर बिहीना।।

  1423. RCM 2.144.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    रहिहि न अंतहुँ अधम सरीरू। जसु न लहेउ बिछुरत रघुबीरू।।

    अर्थ (Hindi)

    रहिहि न अंतहुँ अधम सरीरू। जसु न लहेउ बिछुरत रघुबीरू।।

  1424. RCM 2.144.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भए अजस अघ भाजन प्राना। कवन हेतु नहिं करत पयाना।।

    अर्थ (Hindi)

    भए अजस अघ भाजन प्राना। कवन हेतु नहिं करत पयाना।।

  1425. RCM 2.144.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अहह मंद मनु अवसर चूका। अजहुँ न हृदय होत दुइ टूका।।

    अर्थ (Hindi)

    अहह मंद मनु अवसर चूका। अजहुँ न हृदय होत दुइ टूका।।

  1426. RCM 2.144.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मीजि हाथ सिरु धुनि पछिताई। मनहँ कृपन धन रासि गवाँई।।

    अर्थ (Hindi)

    मीजि हाथ सिरु धुनि पछिताई। मनहँ कृपन धन रासि गवाँई।।

  1427. RCM 2.144.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बिरिद बाँधि बर बीरु कहाई। चलेउ समर जनु सुभट पराई।।

    अर्थ (Hindi)

    बिरिद बाँधि बर बीरु कहाई। चलेउ समर जनु सुभट पराई।।

  1428. RCM 2.144.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बिप्र बिबेकी बेदबिद संमत साधु सुजाति।

    अर्थ (Hindi)

    बिप्र बिबेकी बेदबिद संमत साधु सुजाति।

  1429. RCM 2.144.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जिमि धोखें मदपान कर सचिव सोच तेहि भाँति।।144।।

    अर्थ (Hindi)

    जिमि धोखें मदपान कर सचिव सोच तेहि भाँति।।144।।

  1430. RCM 2.145.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जिमि कुलीन तिय साधु सयानी। पतिदेवता करम मन बानी।।

    अर्थ (Hindi)

    जिमि कुलीन तिय साधु सयानी। पतिदेवता करम मन बानी।।

  1431. RCM 2.145.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    रहै करम बस परिहरि नाहू। सचिव हृदयँ तिमि दारुन दाहु।।

    अर्थ (Hindi)

    रहै करम बस परिहरि नाहू। सचिव हृदयँ तिमि दारुन दाहु।।

  1432. RCM 2.145.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    लोचन सजल डीठि भइ थोरी। सुनइ न श्रवन बिकल मति भोरी।।

    अर्थ (Hindi)

    लोचन सजल डीठि भइ थोरी। सुनइ न श्रवन बिकल मति भोरी।।

  1433. RCM 2.145.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सूखहिं अधर लागि मुहँ लाटी। जिउ न जाइ उर अवधि कपाटी।।

    अर्थ (Hindi)

    सूखहिं अधर लागि मुहँ लाटी। जिउ न जाइ उर अवधि कपाटी।।

  1434. RCM 2.145.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बिबरन भयउ न जाइ निहारी। मारेसि मनहुँ पिता महतारी।।

    अर्थ (Hindi)

    बिबरन भयउ न जाइ निहारी। मारेसि मनहुँ पिता महतारी।।

  1435. RCM 2.145.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    हानि गलानि बिपुल मन ब्यापी। जमपुर पंथ सोच जिमि पापी।।

    अर्थ (Hindi)

    हानि गलानि बिपुल मन ब्यापी। जमपुर पंथ सोच जिमि पापी।।

  1436. RCM 2.145.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बचनु न आव हृदयँ पछिताई। अवध काह मैं देखब जाई।।

    अर्थ (Hindi)

    बचनु न आव हृदयँ पछिताई। अवध काह मैं देखब जाई।।

  1437. RCM 2.145.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राम रहित रथ देखिहि जोई। सकुचिहि मोहि बिलोकत सोई।।

    अर्थ (Hindi)

    राम रहित रथ देखिहि जोई। सकुचिहि मोहि बिलोकत सोई।।

  1438. RCM 2.145.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    -धाइ पूँछिहहिं मोहि जब बिकल नगर नर नारि।

    अर्थ (Hindi)

    -धाइ पूँछिहहिं मोहि जब बिकल नगर नर नारि।

  1439. RCM 2.145.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    उतरु देब मैं सबहि तब हृदयँ बज्रु बैठारि।।145।।

    अर्थ (Hindi)

    उतरु देब मैं सबहि तब हृदयँ बज्रु बैठारि।।145।।

  1440. RCM 2.146.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पुछिहहिं दीन दुखित सब माता। कहब काह मैं तिन्हहि बिधाता।।

    अर्थ (Hindi)

    पुछिहहिं दीन दुखित सब माता। कहब काह मैं तिन्हहि बिधाता।।

  1441. RCM 2.146.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पूछिहि जबहिं लखन महतारी। कहिहउँ कवन सँदेस सुखारी।।

    अर्थ (Hindi)

    पूछिहि जबहिं लखन महतारी। कहिहउँ कवन सँदेस सुखारी।।

  1442. RCM 2.146.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राम जननि जब आइहि धाई। सुमिरि बच्छु जिमि धेनु लवाई।।

    अर्थ (Hindi)

    राम जननि जब आइहि धाई। सुमिरि बच्छु जिमि धेनु लवाई।।

  1443. RCM 2.146.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पूँछत उतरु देब मैं तेही। गे बनु राम लखनु बैदेही।।

    अर्थ (Hindi)

    पूँछत उतरु देब मैं तेही। गे बनु राम लखनु बैदेही।।

  1444. RCM 2.146.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जोइ पूँछिहि तेहि ऊतरु देबा।जाइ अवध अब यहु सुखु लेबा।।

    अर्थ (Hindi)

    जोइ पूँछिहि तेहि ऊतरु देबा।जाइ अवध अब यहु सुखु लेबा।।

  1445. RCM 2.146.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पूँछिहि जबहिं राउ दुख दीना। जिवनु जासु रघुनाथ अधीना।।

    अर्थ (Hindi)

    पूँछिहि जबहिं राउ दुख दीना। जिवनु जासु रघुनाथ अधीना।।

  1446. RCM 2.146.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    देहउँ उतरु कौनु मुहु लाई। आयउँ कुसल कुअँर पहुँचाई।।

    अर्थ (Hindi)

    देहउँ उतरु कौनु मुहु लाई। आयउँ कुसल कुअँर पहुँचाई।।

  1447. RCM 2.146.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनत लखन सिय राम सँदेसू। तृन जिमि तनु परिहरिहि नरेसू।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनत लखन सिय राम सँदेसू। तृन जिमि तनु परिहरिहि नरेसू।।

  1448. RCM 2.146.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    -ह्रदउ न बिदरेउ पंक जिमि बिछुरत प्रीतमु नीरु।।

    अर्थ (Hindi)

    -ह्रदउ न बिदरेउ पंक जिमि बिछुरत प्रीतमु नीरु।।

  1449. RCM 2.146.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जानत हौं मोहि दीन्ह बिधि यहु जातना सरीरु।।146।।

    अर्थ (Hindi)

    जानत हौं मोहि दीन्ह बिधि यहु जातना सरीरु।।146।।

  1450. RCM 2.147.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    एहि बिधि करत पंथ पछितावा। तमसा तीर तुरत रथु आवा।।

    अर्थ (Hindi)

    एहि बिधि करत पंथ पछितावा। तमसा तीर तुरत रथु आवा।।

  1451. RCM 2.147.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बिदा किए करि बिनय निषादा। फिरे पायँ परि बिकल बिषादा।।

    अर्थ (Hindi)

    बिदा किए करि बिनय निषादा। फिरे पायँ परि बिकल बिषादा।।

  1452. RCM 2.147.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पैठत नगर सचिव सकुचाई। जनु मारेसि गुर बाँभन गाई।।

    अर्थ (Hindi)

    पैठत नगर सचिव सकुचाई। जनु मारेसि गुर बाँभन गाई।।

  1453. RCM 2.147.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बैठि बिटप तर दिवसु गवाँवा। साँझ समय तब अवसरु पावा।।

    अर्थ (Hindi)

    बैठि बिटप तर दिवसु गवाँवा। साँझ समय तब अवसरु पावा।।

  1454. RCM 2.147.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अवध प्रबेसु कीन्ह अँधिआरें। पैठ भवन रथु राखि दुआरें।।

    अर्थ (Hindi)

    अवध प्रबेसु कीन्ह अँधिआरें। पैठ भवन रथु राखि दुआरें।।

  1455. RCM 2.147.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जिन्ह जिन्ह समाचार सुनि पाए। भूप द्वार रथु देखन आए।।

    अर्थ (Hindi)

    जिन्ह जिन्ह समाचार सुनि पाए। भूप द्वार रथु देखन आए।।

  1456. RCM 2.147.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    रथु पहिचानि बिकल लखि घोरे। गरहिं गात जिमि आतप ओरे।।

    अर्थ (Hindi)

    रथु पहिचानि बिकल लखि घोरे। गरहिं गात जिमि आतप ओरे।।

  1457. RCM 2.147.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नगर नारि नर ब्याकुल कैंसें। निघटत नीर मीनगन जैंसें।।

    अर्थ (Hindi)

    नगर नारि नर ब्याकुल कैंसें। निघटत नीर मीनगन जैंसें।।

  1458. RCM 2.147.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    -सचिव आगमनु सुनत सबु बिकल भयउ रनिवासु।

    अर्थ (Hindi)

    -सचिव आगमनु सुनत सबु बिकल भयउ रनिवासु।

  1459. RCM 2.147.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भवन भयंकरु लाग तेहि मानहुँ प्रेत निवासु।।147।।

    अर्थ (Hindi)

    भवन भयंकरु लाग तेहि मानहुँ प्रेत निवासु।।147।।

  1460. RCM 2.148.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अति आरति सब पूँछहिं रानी। उतरु न आव बिकल भइ बानी।।

    अर्थ (Hindi)

    अति आरति सब पूँछहिं रानी। उतरु न आव बिकल भइ बानी।।

  1461. RCM 2.148.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनइ न श्रवन नयन नहिं सूझा। कहहु कहाँ नृप तेहि तेहि बूझा।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनइ न श्रवन नयन नहिं सूझा। कहहु कहाँ नृप तेहि तेहि बूझा।।

  1462. RCM 2.148.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    दासिन्ह दीख सचिव बिकलाई। कौसल्या गृहँ गईं लवाई।।

    अर्थ (Hindi)

    दासिन्ह दीख सचिव बिकलाई। कौसल्या गृहँ गईं लवाई।।

  1463. RCM 2.148.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जाइ सुमंत्र दीख कस राजा। अमिअ रहित जनु चंदु बिराजा।।

    अर्थ (Hindi)

    जाइ सुमंत्र दीख कस राजा। अमिअ रहित जनु चंदु बिराजा।।

  1464. RCM 2.148.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    आसन सयन बिभूषन हीना। परेउ भूमितल निपट मलीना।।

    अर्थ (Hindi)

    आसन सयन बिभूषन हीना। परेउ भूमितल निपट मलीना।।

  1465. RCM 2.148.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    लेइ उसासु सोच एहि भाँती। सुरपुर तें जनु खँसेउ जजाती।।

    अर्थ (Hindi)

    लेइ उसासु सोच एहि भाँती। सुरपुर तें जनु खँसेउ जजाती।।

  1466. RCM 2.148.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    लेत सोच भरि छिनु छिनु छाती। जनु जरि पंख परेउ संपाती।।

    अर्थ (Hindi)

    लेत सोच भरि छिनु छिनु छाती। जनु जरि पंख परेउ संपाती।।

  1467. RCM 2.148.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राम राम कह राम सनेही। पुनि कह राम लखन बैदेही।।

    अर्थ (Hindi)

    राम राम कह राम सनेही। पुनि कह राम लखन बैदेही।।

  1468. RCM 2.148.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    देखि सचिवँ जय जीव कहि कीन्हेउ दंड प्रनामु।

    अर्थ (Hindi)

    देखि सचिवँ जय जीव कहि कीन्हेउ दंड प्रनामु।

  1469. RCM 2.148.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनत उठेउ ब्याकुल नृपति कहु सुमंत्र कहँ रामु।।148।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनत उठेउ ब्याकुल नृपति कहु सुमंत्र कहँ रामु।।148।।

  1470. RCM 2.149.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भूप सुमंत्रु लीन्ह उर लाई। बूड़त कछु अधार जनु पाई।।

    अर्थ (Hindi)

    भूप सुमंत्रु लीन्ह उर लाई। बूड़त कछु अधार जनु पाई।।

  1471. RCM 2.149.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सहित सनेह निकट बैठारी। पूँछत राउ नयन भरि बारी।।

    अर्थ (Hindi)

    सहित सनेह निकट बैठारी। पूँछत राउ नयन भरि बारी।।

  1472. RCM 2.149.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राम कुसल कहु सखा सनेही। कहँ रघुनाथु लखनु बैदेही।।

    अर्थ (Hindi)

    राम कुसल कहु सखा सनेही। कहँ रघुनाथु लखनु बैदेही।।

  1473. RCM 2.149.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    आने फेरि कि बनहि सिधाए। सुनत सचिव लोचन जल छाए।।

    अर्थ (Hindi)

    आने फेरि कि बनहि सिधाए। सुनत सचिव लोचन जल छाए।।

  1474. RCM 2.149.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सोक बिकल पुनि पूँछ नरेसू। कहु सिय राम लखन संदेसू।।

    अर्थ (Hindi)

    सोक बिकल पुनि पूँछ नरेसू। कहु सिय राम लखन संदेसू।।

  1475. RCM 2.149.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राम रूप गुन सील सुभाऊ। सुमिरि सुमिरि उर सोचत राऊ।।

    अर्थ (Hindi)

    राम रूप गुन सील सुभाऊ। सुमिरि सुमिरि उर सोचत राऊ।।

  1476. RCM 2.149.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राउ सुनाइ दीन्ह बनबासू। सुनि मन भयउ न हरषु हराँसू।।

    अर्थ (Hindi)

    राउ सुनाइ दीन्ह बनबासू। सुनि मन भयउ न हरषु हराँसू।।

  1477. RCM 2.149.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सो सुत बिछुरत गए न प्राना। को पापी बड़ मोहि समाना।।

    अर्थ (Hindi)

    सो सुत बिछुरत गए न प्राना। को पापी बड़ मोहि समाना।।

  1478. RCM 2.149.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सखा रामु सिय लखनु जहँ तहाँ मोहि पहुँचाउ।

    अर्थ (Hindi)

    सखा रामु सिय लखनु जहँ तहाँ मोहि पहुँचाउ।

  1479. RCM 2.149.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नाहिं त चाहत चलन अब प्रान कहउँ सतिभाउ।।149।।

    अर्थ (Hindi)

    नाहिं त चाहत चलन अब प्रान कहउँ सतिभाउ।।149।।

  1480. RCM 2.150.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पुनि पुनि पूँछत मंत्रहि राऊ। प्रियतम सुअन सँदेस सुनाऊ।।

    अर्थ (Hindi)

    पुनि पुनि पूँछत मंत्रहि राऊ। प्रियतम सुअन सँदेस सुनाऊ।।

  1481. RCM 2.150.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    करहि सखा सोइ बेगि उपाऊ। रामु लखनु सिय नयन देखाऊ।।

    अर्थ (Hindi)

    करहि सखा सोइ बेगि उपाऊ। रामु लखनु सिय नयन देखाऊ।।

  1482. RCM 2.150.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सचिव धीर धरि कह मुदु बानी। महाराज तुम्ह पंडित ग्यानी।।

    अर्थ (Hindi)

    सचिव धीर धरि कह मुदु बानी। महाराज तुम्ह पंडित ग्यानी।।

  1483. RCM 2.150.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बीर सुधीर धुरंधर देवा। साधु समाजु सदा तुम्ह सेवा।।

    अर्थ (Hindi)

    बीर सुधीर धुरंधर देवा। साधु समाजु सदा तुम्ह सेवा।।

  1484. RCM 2.150.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जनम मरन सब दुख भोगा। हानि लाभ प्रिय मिलन बियोगा।।

    अर्थ (Hindi)

    जनम मरन सब दुख भोगा। हानि लाभ प्रिय मिलन बियोगा।।

  1485. RCM 2.150.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    काल करम बस हौहिं गोसाईं। बरबस राति दिवस की नाईं।।

    अर्थ (Hindi)

    काल करम बस हौहिं गोसाईं। बरबस राति दिवस की नाईं।।

  1486. RCM 2.150.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुख हरषहिं जड़ दुख बिलखाहीं। दोउ सम धीर धरहिं मन माहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    सुख हरषहिं जड़ दुख बिलखाहीं। दोउ सम धीर धरहिं मन माहीं।।

  1487. RCM 2.150.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    धीरज धरहु बिबेकु बिचारी। छाड़िअ सोच सकल हितकारी।।

    अर्थ (Hindi)

    धीरज धरहु बिबेकु बिचारी। छाड़िअ सोच सकल हितकारी।।

  1488. RCM 2.150.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    प्रथम बासु तमसा भयउ दूसर सुरसरि तीर।

    अर्थ (Hindi)

    प्रथम बासु तमसा भयउ दूसर सुरसरि तीर।

  1489. RCM 2.150.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    न्हाई रहे जलपानु करि सिय समेत दोउ बीर।।150।।

    अर्थ (Hindi)

    न्हाई रहे जलपानु करि सिय समेत दोउ बीर।।150।।

  1490. RCM 2.151.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    केवट कीन्हि बहुत सेवकाई। सो जामिनि सिंगरौर गवाँई।।

    अर्थ (Hindi)

    केवट कीन्हि बहुत सेवकाई। सो जामिनि सिंगरौर गवाँई।।

  1491. RCM 2.151.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    होत प्रात बट छीरु मगावा। जटा मुकुट निज सीस बनावा।।

    अर्थ (Hindi)

    होत प्रात बट छीरु मगावा। जटा मुकुट निज सीस बनावा।।

  1492. RCM 2.151.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राम सखाँ तब नाव मगाई। प्रिया चढ़ाइ चढ़े रघुराई।।

    अर्थ (Hindi)

    राम सखाँ तब नाव मगाई। प्रिया चढ़ाइ चढ़े रघुराई।।

  1493. RCM 2.151.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    लखन बान धनु धरे बनाई। आपु चढ़े प्रभु आयसु पाई।।

    अर्थ (Hindi)

    लखन बान धनु धरे बनाई। आपु चढ़े प्रभु आयसु पाई।।

  1494. RCM 2.151.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बिकल बिलोकि मोहि रघुबीरा। बोले मधुर बचन धरि धीरा।।

    अर्थ (Hindi)

    बिकल बिलोकि मोहि रघुबीरा। बोले मधुर बचन धरि धीरा।।

  1495. RCM 2.151.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तात प्रनामु तात सन कहेहु। बार बार पद पंकज गहेहू।।

    अर्थ (Hindi)

    तात प्रनामु तात सन कहेहु। बार बार पद पंकज गहेहू।।

  1496. RCM 2.151.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    करबि पायँ परि बिनय बहोरी। तात करिअ जनि चिंता मोरी।।

    अर्थ (Hindi)

    करबि पायँ परि बिनय बहोरी। तात करिअ जनि चिंता मोरी।।

  1497. RCM 2.151.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बन मग मंगल कुसल हमारें। कृपा अनुग्रह पुन्य तुम्हारें।।

    अर्थ (Hindi)

    बन मग मंगल कुसल हमारें। कृपा अनुग्रह पुन्य तुम्हारें।।

  1498. RCM 2.152.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पुरजन परिजन सकल निहोरी। तात सुनाएहु बिनती मोरी।।

    अर्थ (Hindi)

    पुरजन परिजन सकल निहोरी। तात सुनाएहु बिनती मोरी।।

  1499. RCM 2.152.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सोइ सब भाँति मोर हितकारी। जातें रह नरनाहु सुखारी।।

    अर्थ (Hindi)

    सोइ सब भाँति मोर हितकारी। जातें रह नरनाहु सुखारी।।

  1500. RCM 2.152.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कहब सँदेसु भरत के आएँ। नीति न तजिअ राजपदु पाएँ।।

    अर्थ (Hindi)

    कहब सँदेसु भरत के आएँ। नीति न तजिअ राजपदु पाएँ।।

  1501. RCM 2.152.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पालेहु प्रजहि करम मन बानी। सेएहु मातु सकल सम जानी।।

    अर्थ (Hindi)

    पालेहु प्रजहि करम मन बानी। सेएहु मातु सकल सम जानी।।

  1502. RCM 2.152.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    ओर निबाहेहु भायप भाई। करि पितु मातु सुजन सेवकाई।।

    अर्थ (Hindi)

    ओर निबाहेहु भायप भाई। करि पितु मातु सुजन सेवकाई।।

  1503. RCM 2.152.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तात भाँति तेहि राखब राऊ। सोच मोर जेहिं करै न काऊ।।

    अर्थ (Hindi)

    तात भाँति तेहि राखब राऊ। सोच मोर जेहिं करै न काऊ।।

  1504. RCM 2.152.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    लखन कहे कछु बचन कठोरा। बरजि राम पुनि मोहि निहोरा।।

    अर्थ (Hindi)

    लखन कहे कछु बचन कठोरा। बरजि राम पुनि मोहि निहोरा।।

  1505. RCM 2.152.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बार बार निज सपथ देवाई। कहबि न तात लखन लरिकाई।।

    अर्थ (Hindi)

    बार बार निज सपथ देवाई। कहबि न तात लखन लरिकाई।।

  1506. RCM 2.152.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कहि प्रनाम कछु कहन लिय सिय भइ सिथिल सनेह।

    अर्थ (Hindi)

    कहि प्रनाम कछु कहन लिय सिय भइ सिथिल सनेह।

  1507. RCM 2.152.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    थकित बचन लोचन सजल पुलक पल्लवित देह।।152।।

    अर्थ (Hindi)

    थकित बचन लोचन सजल पुलक पल्लवित देह।।152।।

  1508. RCM 2.153.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तेहि अवसर रघुबर रूख पाई। केवट पारहि नाव चलाई।।

    अर्थ (Hindi)

    तेहि अवसर रघुबर रूख पाई। केवट पारहि नाव चलाई।।

  1509. RCM 2.153.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    रघुकुलतिलक चले एहि भाँती। देखउँ ठाढ़ कुलिस धरि छाती।।

    अर्थ (Hindi)

    रघुकुलतिलक चले एहि भाँती। देखउँ ठाढ़ कुलिस धरि छाती।।

  1510. RCM 2.153.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मैं आपन किमि कहौं कलेसू। जिअत फिरेउँ लेइ राम सँदेसू।।

    अर्थ (Hindi)

    मैं आपन किमि कहौं कलेसू। जिअत फिरेउँ लेइ राम सँदेसू।।

  1511. RCM 2.153.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अस कहि सचिव बचन रहि गयऊ। हानि गलानि सोच बस भयऊ।।

    अर्थ (Hindi)

    अस कहि सचिव बचन रहि गयऊ। हानि गलानि सोच बस भयऊ।।

  1512. RCM 2.153.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुत बचन सुनतहिं नरनाहू। परेउ धरनि उर दारुन दाहू।।

    अर्थ (Hindi)

    सुत बचन सुनतहिं नरनाहू। परेउ धरनि उर दारुन दाहू।।

  1513. RCM 2.153.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तलफत बिषम मोह मन मापा। माजा मनहुँ मीन कहुँ ब्यापा।।

    अर्थ (Hindi)

    तलफत बिषम मोह मन मापा। माजा मनहुँ मीन कहुँ ब्यापा।।

  1514. RCM 2.153.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    करि बिलाप सब रोवहिं रानी। महा बिपति किमि जाइ बखानी।।

    अर्थ (Hindi)

    करि बिलाप सब रोवहिं रानी। महा बिपति किमि जाइ बखानी।।

  1515. RCM 2.153.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनि बिलाप दुखहू दुखु लागा। धीरजहू कर धीरजु भागा।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनि बिलाप दुखहू दुखु लागा। धीरजहू कर धीरजु भागा।।

  1516. RCM 2.153.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भयउ कोलाहलु अवध अति सुनि नृप राउर सोरु।

    अर्थ (Hindi)

    भयउ कोलाहलु अवध अति सुनि नृप राउर सोरु।

  1517. RCM 2.153.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बिपुल बिहग बन परेउ निसि मानहुँ कुलिस कठोरु।।153।।

    अर्थ (Hindi)

    बिपुल बिहग बन परेउ निसि मानहुँ कुलिस कठोरु।।153।।

  1518. RCM 2.154.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    प्रान कंठगत भयउ भुआलू। मनि बिहीन जनु ब्याकुल ब्यालू।।

    अर्थ (Hindi)

    प्रान कंठगत भयउ भुआलू। मनि बिहीन जनु ब्याकुल ब्यालू।।

  1519. RCM 2.154.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    इद्रीं सकल बिकल भइँ भारी। जनु सर सरसिज बनु बिनु बारी।।

    अर्थ (Hindi)

    इद्रीं सकल बिकल भइँ भारी। जनु सर सरसिज बनु बिनु बारी।।

  1520. RCM 2.154.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कौसल्याँ नृपु दीख मलाना। रबिकुल रबि अँथयउ जियँ जाना।

    अर्थ (Hindi)

    कौसल्याँ नृपु दीख मलाना। रबिकुल रबि अँथयउ जियँ जाना।

  1521. RCM 2.154.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    उर धरि धीर राम महतारी। बोली बचन समय अनुसारी।।

    अर्थ (Hindi)

    उर धरि धीर राम महतारी। बोली बचन समय अनुसारी।।

  1522. RCM 2.154.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नाथ समुझि मन करिअ बिचारू। राम बियोग पयोधि अपारू।।

    अर्थ (Hindi)

    नाथ समुझि मन करिअ बिचारू। राम बियोग पयोधि अपारू।।

  1523. RCM 2.154.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    करनधार तुम्ह अवध जहाजू। चढ़ेउ सकल प्रिय पथिक समाजू।।

    अर्थ (Hindi)

    करनधार तुम्ह अवध जहाजू। चढ़ेउ सकल प्रिय पथिक समाजू।।

  1524. RCM 2.154.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    धीरजु धरिअ त पाइअ पारू। नाहिं त बूड़िहि सबु परिवारू।।

    अर्थ (Hindi)

    धीरजु धरिअ त पाइअ पारू। नाहिं त बूड़िहि सबु परिवारू।।

  1525. RCM 2.154.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जौं जियँ धरिअ बिनय पिय मोरी। रामु लखनु सिय मिलहिं बहोरी।।

    अर्थ (Hindi)

    जौं जियँ धरिअ बिनय पिय मोरी। रामु लखनु सिय मिलहिं बहोरी।।

  1526. RCM 2.154.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    प्रिया बचन मृदु सुनत नृपु चितयउ आँखि उघारि।

    अर्थ (Hindi)

    प्रिया बचन मृदु सुनत नृपु चितयउ आँखि उघारि।

  1527. RCM 2.154.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तलफत मीन मलीन जनु सींचत सीतल बारि।।154।।

    अर्थ (Hindi)

    तलफत मीन मलीन जनु सींचत सीतल बारि।।154।।

  1528. RCM 2.155.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    धरि धीरजु उठी बैठ भुआलू। कहु सुमंत्र कहँ राम कृपालू।।

    अर्थ (Hindi)

    धरि धीरजु उठी बैठ भुआलू। कहु सुमंत्र कहँ राम कृपालू।।

  1529. RCM 2.155.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कहाँ लखनु कहँ रामु सनेही। कहँ प्रिय पुत्रबधू बैदेही।।

    अर्थ (Hindi)

    कहाँ लखनु कहँ रामु सनेही। कहँ प्रिय पुत्रबधू बैदेही।।

  1530. RCM 2.155.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बिलपत राउ बिकल बहु भाँती। भइ जुग सरिस सिराति न राती।।

    अर्थ (Hindi)

    बिलपत राउ बिकल बहु भाँती। भइ जुग सरिस सिराति न राती।।

  1531. RCM 2.155.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तापस अंध साप सुधि आई। कौसल्यहि सब कथा सुनाई।।

    अर्थ (Hindi)

    तापस अंध साप सुधि आई। कौसल्यहि सब कथा सुनाई।।

  1532. RCM 2.155.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भयउ बिकल बरनत इतिहासा। राम रहित धिग जीवन आसा।।

    अर्थ (Hindi)

    भयउ बिकल बरनत इतिहासा। राम रहित धिग जीवन आसा।।

  1533. RCM 2.155.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सो तनु राखि करब मैं काहा। जेंहि न प्रेम पनु मोर निबाहा।।

    अर्थ (Hindi)

    सो तनु राखि करब मैं काहा। जेंहि न प्रेम पनु मोर निबाहा।।

  1534. RCM 2.155.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    हा रघुनंदन प्रान पिरीते। तुम्ह बिनु जिअत बहुत दिन बीते।।

    अर्थ (Hindi)

    हा रघुनंदन प्रान पिरीते। तुम्ह बिनु जिअत बहुत दिन बीते।।

  1535. RCM 2.155.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    हा जानकी लखन हा रघुबर। हा पितु हित चित चातक जलधर।

    अर्थ (Hindi)

    हा जानकी लखन हा रघुबर। हा पितु हित चित चातक जलधर।

  1536. RCM 2.155.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राम राम कहि राम कहि राम राम कहि राम।

    अर्थ (Hindi)

    राम राम कहि राम कहि राम राम कहि राम।

  1537. RCM 2.155.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तनु परिहरि रघुबर बिरहँ राउ गयउ सुरधाम।।155।।

    अर्थ (Hindi)

    तनु परिहरि रघुबर बिरहँ राउ गयउ सुरधाम।।155।।

  1538. RCM 2.156.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जिअन मरन फलु दसरथ पावा। अंड अनेक अमल जसु छावा।।

    अर्थ (Hindi)

    जिअन मरन फलु दसरथ पावा। अंड अनेक अमल जसु छावा।।

  1539. RCM 2.156.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जिअत राम बिधु बदनु निहारा। राम बिरह करि मरनु सँवारा।।

    अर्थ (Hindi)

    जिअत राम बिधु बदनु निहारा। राम बिरह करि मरनु सँवारा।।

  1540. RCM 2.156.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सोक बिकल सब रोवहिं रानी। रूपु सील बलु तेजु बखानी।।

    अर्थ (Hindi)

    सोक बिकल सब रोवहिं रानी। रूपु सील बलु तेजु बखानी।।

  1541. RCM 2.156.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    करहिं बिलाप अनेक प्रकारा। परहीं भूमितल बारहिं बारा।।

    अर्थ (Hindi)

    करहिं बिलाप अनेक प्रकारा। परहीं भूमितल बारहिं बारा।।

  1542. RCM 2.156.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बिलपहिं बिकल दास अरु दासी। घर घर रुदनु करहिं पुरबासी।।

    अर्थ (Hindi)

    बिलपहिं बिकल दास अरु दासी। घर घर रुदनु करहिं पुरबासी।।

  1543. RCM 2.156.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अँथयउ आजु भानुकुल भानू। धरम अवधि गुन रूप निधानू।।

    अर्थ (Hindi)

    अँथयउ आजु भानुकुल भानू। धरम अवधि गुन रूप निधानू।।

  1544. RCM 2.156.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    गारीं सकल कैकइहि देहीं। नयन बिहीन कीन्ह जग जेहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    गारीं सकल कैकइहि देहीं। नयन बिहीन कीन्ह जग जेहीं।।

  1545. RCM 2.156.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    एहि बिधि बिलपत रैनि बिहानी। आए सकल महामुनि ग्यानी।।

    अर्थ (Hindi)

    एहि बिधि बिलपत रैनि बिहानी। आए सकल महामुनि ग्यानी।।

  1546. RCM 2.156.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तब बसिष्ठ मुनि समय सम कहि अनेक इतिहास।

    अर्थ (Hindi)

    तब बसिष्ठ मुनि समय सम कहि अनेक इतिहास।

  1547. RCM 2.156.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सोक नेवारेउ सबहि कर निज बिग्यान प्रकास।।156।।

    अर्थ (Hindi)

    सोक नेवारेउ सबहि कर निज बिग्यान प्रकास।।156।।

  1548. RCM 2.157.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तेल नाँव भरि नृप तनु राखा। दूत बोलाइ बहुरि अस भाषा।।

    अर्थ (Hindi)

    तेल नाँव भरि नृप तनु राखा। दूत बोलाइ बहुरि अस भाषा।।

  1549. RCM 2.157.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    धावहु बेगि भरत पहिं जाहू। नृप सुधि कतहुँ कहहु जनि काहू।।

    अर्थ (Hindi)

    धावहु बेगि भरत पहिं जाहू। नृप सुधि कतहुँ कहहु जनि काहू।।

  1550. RCM 2.157.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    एतनेइ कहेहु भरत सन जाई। गुर बोलाई पठयउ दोउ भाई।।

    अर्थ (Hindi)

    एतनेइ कहेहु भरत सन जाई। गुर बोलाई पठयउ दोउ भाई।।

  1551. RCM 2.157.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनि मुनि आयसु धावन धाए। चले बेग बर बाजि लजाए।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनि मुनि आयसु धावन धाए। चले बेग बर बाजि लजाए।।

  1552. RCM 2.157.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अनरथु अवध अरंभेउ जब तें। कुसगुन होहिं भरत कहुँ तब तें।।

    अर्थ (Hindi)

    अनरथु अवध अरंभेउ जब तें। कुसगुन होहिं भरत कहुँ तब तें।।

  1553. RCM 2.157.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    देखहिं राति भयानक सपना। जागि करहिं कटु कोटि कलपना।।

    अर्थ (Hindi)

    देखहिं राति भयानक सपना। जागि करहिं कटु कोटि कलपना।।

  1554. RCM 2.157.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बिप्र जेवाँइ देहिं दिन दाना। सिव अभिषेक करहिं बिधि नाना।।

    अर्थ (Hindi)

    बिप्र जेवाँइ देहिं दिन दाना। सिव अभिषेक करहिं बिधि नाना।।

  1555. RCM 2.157.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मागहिं हृदयँ महेस मनाई। कुसल मातु पितु परिजन भाई।।

    अर्थ (Hindi)

    मागहिं हृदयँ महेस मनाई। कुसल मातु पितु परिजन भाई।।

  1556. RCM 2.157.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    एहि बिधि सोचत भरत मन धावन पहुँचे आइ।

    अर्थ (Hindi)

    एहि बिधि सोचत भरत मन धावन पहुँचे आइ।

  1557. RCM 2.157.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    गुर अनुसासन श्रवन सुनि चले गनेसु मनाइ।।157।।

    अर्थ (Hindi)

    गुर अनुसासन श्रवन सुनि चले गनेसु मनाइ।।157।।

  1558. RCM 2.158.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    चले समीर बेग हय हाँके। नाघत सरित सैल बन बाँके।।

    अर्थ (Hindi)

    चले समीर बेग हय हाँके। नाघत सरित सैल बन बाँके।।

  1559. RCM 2.158.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    हृदयँ सोचु बड़ कछु न सोहाई। अस जानहिं जियँ जाउँ उड़ाई।।

    अर्थ (Hindi)

    हृदयँ सोचु बड़ कछु न सोहाई। अस जानहिं जियँ जाउँ उड़ाई।।

  1560. RCM 2.158.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    एक निमेष बरस सम जाई। एहि बिधि भरत नगर निअराई।।

    अर्थ (Hindi)

    एक निमेष बरस सम जाई। एहि बिधि भरत नगर निअराई।।

  1561. RCM 2.158.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    असगुन होहिं नगर पैठारा। रटहिं कुभाँति कुखेत करारा।।

    अर्थ (Hindi)

    असगुन होहिं नगर पैठारा। रटहिं कुभाँति कुखेत करारा।।

  1562. RCM 2.158.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    खर सिआर बोलहिं प्रतिकूला। सुनि सुनि होइ भरत मन सूला।।

    अर्थ (Hindi)

    खर सिआर बोलहिं प्रतिकूला। सुनि सुनि होइ भरत मन सूला।।

  1563. RCM 2.158.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    श्रीहत सर सरिता बन बागा। नगरु बिसेषि भयावनु लागा।।

    अर्थ (Hindi)

    श्रीहत सर सरिता बन बागा। नगरु बिसेषि भयावनु लागा।।

  1564. RCM 2.158.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    खग मृग हय गय जाहिं न जोए। राम बियोग कुरोग बिगोए।।

    अर्थ (Hindi)

    खग मृग हय गय जाहिं न जोए। राम बियोग कुरोग बिगोए।।

  1565. RCM 2.158.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नगर नारि नर निपट दुखारी। मनहुँ सबन्हि सब संपति हारी।।

    अर्थ (Hindi)

    नगर नारि नर निपट दुखारी। मनहुँ सबन्हि सब संपति हारी।।

  1566. RCM 2.158.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पुरजन मिलिहिं न कहहिं कछु गवँहिं जोहारहिं जाहिं।

    अर्थ (Hindi)

    पुरजन मिलिहिं न कहहिं कछु गवँहिं जोहारहिं जाहिं।

  1567. RCM 2.158.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भरत कुसल पूँछि न सकहिं भय बिषाद मन माहिं।।158।।

    अर्थ (Hindi)

    भरत कुसल पूँछि न सकहिं भय बिषाद मन माहिं।।158।।

  1568. RCM 2.159.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    हाट बाट नहिं जाइ निहारी। जनु पुर दहँ दिसि लागि दवारी।।

    अर्थ (Hindi)

    हाट बाट नहिं जाइ निहारी। जनु पुर दहँ दिसि लागि दवारी।।

  1569. RCM 2.159.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    आवत सुत सुनि कैकयनंदिनि। हरषी रबिकुल जलरुह चंदिनि।।

    अर्थ (Hindi)

    आवत सुत सुनि कैकयनंदिनि। हरषी रबिकुल जलरुह चंदिनि।।

  1570. RCM 2.159.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सजि आरती मुदित उठि धाई। द्वारेहिं भेंटि भवन लेइ आई।।

    अर्थ (Hindi)

    सजि आरती मुदित उठि धाई। द्वारेहिं भेंटि भवन लेइ आई।।

  1571. RCM 2.159.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भरत दुखित परिवारु निहारा। मानहुँ तुहिन बनज बनु मारा।।

    अर्थ (Hindi)

    भरत दुखित परिवारु निहारा। मानहुँ तुहिन बनज बनु मारा।।

  1572. RCM 2.159.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कैकेई हरषित एहि भाँति। मनहुँ मुदित दव लाइ किराती।।

    अर्थ (Hindi)

    कैकेई हरषित एहि भाँति। मनहुँ मुदित दव लाइ किराती।।

  1573. RCM 2.159.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुतहि ससोच देखि मनु मारें। पूँछति नैहर कुसल हमारें।।

    अर्थ (Hindi)

    सुतहि ससोच देखि मनु मारें। पूँछति नैहर कुसल हमारें।।

  1574. RCM 2.159.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सकल कुसल कहि भरत सुनाई। पूँछी निज कुल कुसल भलाई।।

    अर्थ (Hindi)

    सकल कुसल कहि भरत सुनाई। पूँछी निज कुल कुसल भलाई।।

  1575. RCM 2.159.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कहु कहँ तात कहाँ सब माता। कहँ सिय राम लखन प्रिय भ्राता।।

    अर्थ (Hindi)

    कहु कहँ तात कहाँ सब माता। कहँ सिय राम लखन प्रिय भ्राता।।

  1576. RCM 2.159.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनि सुत बचन सनेहमय कपट नीर भरि नैन।

    अर्थ (Hindi)

    सुनि सुत बचन सनेहमय कपट नीर भरि नैन।

  1577. RCM 2.159.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भरत श्रवन मन सूल सम पापिनि बोली बैन।।159।।

    अर्थ (Hindi)

    भरत श्रवन मन सूल सम पापिनि बोली बैन।।159।।

  1578. RCM 2.160.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तात बात मैं सकल सँवारी। भै मंथरा सहाय बिचारी।।

    अर्थ (Hindi)

    तात बात मैं सकल सँवारी। भै मंथरा सहाय बिचारी।।

  1579. RCM 2.160.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कछुक काज बिधि बीच बिगारेउ। भूपति सुरपति पुर पगु धारेउ।।

    अर्थ (Hindi)

    कछुक काज बिधि बीच बिगारेउ। भूपति सुरपति पुर पगु धारेउ।।

  1580. RCM 2.160.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनत भरतु भए बिबस बिषादा। जनु सहमेउ करि केहरि नादा।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनत भरतु भए बिबस बिषादा। जनु सहमेउ करि केहरि नादा।।

  1581. RCM 2.160.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तात तात हा तात पुकारी। परे भूमितल ब्याकुल भारी।।

    अर्थ (Hindi)

    तात तात हा तात पुकारी। परे भूमितल ब्याकुल भारी।।

  1582. RCM 2.160.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    चलत न देखन पायउँ तोही। तात न रामहि सौंपेहु मोही।।

    अर्थ (Hindi)

    चलत न देखन पायउँ तोही। तात न रामहि सौंपेहु मोही।।

  1583. RCM 2.160.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बहुरि धीर धरि उठे सँभारी। कहु पितु मरन हेतु महतारी।।

    अर्थ (Hindi)

    बहुरि धीर धरि उठे सँभारी। कहु पितु मरन हेतु महतारी।।

  1584. RCM 2.160.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनि सुत बचन कहति कैकेई। मरमु पाँछि जनु माहुर देई।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनि सुत बचन कहति कैकेई। मरमु पाँछि जनु माहुर देई।।

  1585. RCM 2.160.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    आदिहु तें सब आपनि करनी। कुटिल कठोर मुदित मन बरनी।।

    अर्थ (Hindi)

    आदिहु तें सब आपनि करनी। कुटिल कठोर मुदित मन बरनी।।

  1586. RCM 2.160.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भरतहि बिसरेउ पितु मरन सुनत राम बन गौनु।

    अर्थ (Hindi)

    भरतहि बिसरेउ पितु मरन सुनत राम बन गौनु।

  1587. RCM 2.160.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    हेतु अपनपउ जानि जियँ थकित रहे धरि मौनु।।160।।

    अर्थ (Hindi)

    हेतु अपनपउ जानि जियँ थकित रहे धरि मौनु।।160।।

  1588. RCM 2.161.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बिकल बिलोकि सुतहि समुझावति। मनहुँ जरे पर लोनु लगावति।।

    अर्थ (Hindi)

    बिकल बिलोकि सुतहि समुझावति। मनहुँ जरे पर लोनु लगावति।।

  1589. RCM 2.161.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तात राउ नहिं सोचे जोगू। बिढ़इ सुकृत जसु कीन्हेउ भोगू।।

    अर्थ (Hindi)

    तात राउ नहिं सोचे जोगू। बिढ़इ सुकृत जसु कीन्हेउ भोगू।।

  1590. RCM 2.161.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जीवत सकल जनम फल पाए। अंत अमरपति सदन सिधाए।।

    अर्थ (Hindi)

    जीवत सकल जनम फल पाए। अंत अमरपति सदन सिधाए।।

  1591. RCM 2.161.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अस अनुमानि सोच परिहरहू। सहित समाज राज पुर करहू।।

    अर्थ (Hindi)

    अस अनुमानि सोच परिहरहू। सहित समाज राज पुर करहू।।

  1592. RCM 2.161.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनि सुठि सहमेउ राजकुमारू। पाकें छत जनु लाग अँगारू।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनि सुठि सहमेउ राजकुमारू। पाकें छत जनु लाग अँगारू।।

  1593. RCM 2.161.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    धीरज धरि भरि लेहिं उसासा। पापनि सबहि भाँति कुल नासा।।

    अर्थ (Hindi)

    धीरज धरि भरि लेहिं उसासा। पापनि सबहि भाँति कुल नासा।।

  1594. RCM 2.161.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जौं पै कुरुचि रही अति तोही। जनमत काहे न मारे मोही।।

    अर्थ (Hindi)

    जौं पै कुरुचि रही अति तोही। जनमत काहे न मारे मोही।।

  1595. RCM 2.161.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पेड़ काटि तैं पालउ सींचा। मीन जिअन निति बारि उलीचा।।

    अर्थ (Hindi)

    पेड़ काटि तैं पालउ सींचा। मीन जिअन निति बारि उलीचा।।

  1596. RCM 2.161.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    हंसबंसु दसरथु जनकु राम लखन से भाइ।

    अर्थ (Hindi)

    हंसबंसु दसरथु जनकु राम लखन से भाइ।

  1597. RCM 2.161.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जननी तूँ जननी भई बिधि सन कछु न बसाइ।।161।।

    अर्थ (Hindi)

    जननी तूँ जननी भई बिधि सन कछु न बसाइ।।161।।

  1598. RCM 2.162.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जब तैं कुमति कुमत जियँ ठयऊ। खंड खंड होइ ह्रदउ न गयऊ।।

    अर्थ (Hindi)

    जब तैं कुमति कुमत जियँ ठयऊ। खंड खंड होइ ह्रदउ न गयऊ।।

  1599. RCM 2.162.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बर मागत मन भइ नहिं पीरा। गरि न जीह मुहँ परेउ न कीरा।।

    अर्थ (Hindi)

    बर मागत मन भइ नहिं पीरा। गरि न जीह मुहँ परेउ न कीरा।।

  1600. RCM 2.162.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भूपँ प्रतीत तोरि किमि कीन्ही। मरन काल बिधि मति हरि लीन्ही।।

    अर्थ (Hindi)

    भूपँ प्रतीत तोरि किमि कीन्ही। मरन काल बिधि मति हरि लीन्ही।।

  1601. RCM 2.162.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बिधिहुँ न नारि हृदय गति जानी। सकल कपट अघ अवगुन खानी।।

    अर्थ (Hindi)

    बिधिहुँ न नारि हृदय गति जानी। सकल कपट अघ अवगुन खानी।।

  1602. RCM 2.162.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सरल सुसील धरम रत राऊ। सो किमि जानै तीय सुभाऊ।।

    अर्थ (Hindi)

    सरल सुसील धरम रत राऊ। सो किमि जानै तीय सुभाऊ।।

  1603. RCM 2.162.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अस को जीव जंतु जग माहीं। जेहि रघुनाथ प्रानप्रिय नाहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    अस को जीव जंतु जग माहीं। जेहि रघुनाथ प्रानप्रिय नाहीं।।

  1604. RCM 2.162.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भे अति अहित रामु तेउ तोही। को तू अहसि सत्य कहु मोही।।

    अर्थ (Hindi)

    भे अति अहित रामु तेउ तोही। को तू अहसि सत्य कहु मोही।।

  1605. RCM 2.162.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जो हसि सो हसि मुहँ मसि लाई। आँखि ओट उठि बैठहिं जाई।।

    अर्थ (Hindi)

    जो हसि सो हसि मुहँ मसि लाई। आँखि ओट उठि बैठहिं जाई।।

  1606. RCM 2.162.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राम बिरोधी हृदय तें प्रगट कीन्ह बिधि मोहि।

    अर्थ (Hindi)

    राम बिरोधी हृदय तें प्रगट कीन्ह बिधि मोहि।

  1607. RCM 2.162.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मो समान को पातकी बादि कहउँ कछु तोहि।।162।।

    अर्थ (Hindi)

    मो समान को पातकी बादि कहउँ कछु तोहि।।162।।

  1608. RCM 2.163.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनि सत्रुघुन मातु कुटिलाई। जरहिं गात रिस कछु न बसाई।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनि सत्रुघुन मातु कुटिलाई। जरहिं गात रिस कछु न बसाई।।

  1609. RCM 2.163.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तेहि अवसर कुबरी तहँ आई। बसन बिभूषन बिबिध बनाई।।

    अर्थ (Hindi)

    तेहि अवसर कुबरी तहँ आई। बसन बिभूषन बिबिध बनाई।।

  1610. RCM 2.163.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    लखि रिस भरेउ लखन लघु भाई। बरत अनल घृत आहुति पाई।।

    अर्थ (Hindi)

    लखि रिस भरेउ लखन लघु भाई। बरत अनल घृत आहुति पाई।।

  1611. RCM 2.163.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    हुमगि लात तकि कूबर मारा। परि मुह भर महि करत पुकारा।।

    अर्थ (Hindi)

    हुमगि लात तकि कूबर मारा। परि मुह भर महि करत पुकारा।।

  1612. RCM 2.163.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कूबर टूटेउ फूट कपारू। दलित दसन मुख रुधिर प्रचारू।।

    अर्थ (Hindi)

    कूबर टूटेउ फूट कपारू। दलित दसन मुख रुधिर प्रचारू।।

  1613. RCM 2.163.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    आह दइअ मैं काह नसावा। करत नीक फलु अनइस पावा।।

    अर्थ (Hindi)

    आह दइअ मैं काह नसावा। करत नीक फलु अनइस पावा।।

  1614. RCM 2.163.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनि रिपुहन लखि नख सिख खोटी। लगे घसीटन धरि धरि झोंटी।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनि रिपुहन लखि नख सिख खोटी। लगे घसीटन धरि धरि झोंटी।।

  1615. RCM 2.163.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भरत दयानिधि दीन्हि छड़ाई। कौसल्या पहिं गे दोउ भाई।।

    अर्थ (Hindi)

    भरत दयानिधि दीन्हि छड़ाई। कौसल्या पहिं गे दोउ भाई।।

  1616. RCM 2.163.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मलिन बसन बिबरन बिकल कृस सरीर दुख भार।

    अर्थ (Hindi)

    मलिन बसन बिबरन बिकल कृस सरीर दुख भार।

  1617. RCM 2.163.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कनक कलप बर बेलि बन मानहुँ हनी तुसार।।163।।

    अर्थ (Hindi)

    कनक कलप बर बेलि बन मानहुँ हनी तुसार।।163।।

  1618. RCM 2.164.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भरतहि देखि मातु उठि धाई। मुरुछित अवनि परी झइँ आई।।

    अर्थ (Hindi)

    भरतहि देखि मातु उठि धाई। मुरुछित अवनि परी झइँ आई।।

  1619. RCM 2.164.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    देखत भरतु बिकल भए भारी। परे चरन तन दसा बिसारी।।

    अर्थ (Hindi)

    देखत भरतु बिकल भए भारी। परे चरन तन दसा बिसारी।।

  1620. RCM 2.164.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मातु तात कहँ देहि देखाई। कहँ सिय रामु लखनु दोउ भाई।।

    अर्थ (Hindi)

    मातु तात कहँ देहि देखाई। कहँ सिय रामु लखनु दोउ भाई।।

  1621. RCM 2.164.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कैकइ कत जनमी जग माझा। जौं जनमि त भइ काहे न बाँझा।।

    अर्थ (Hindi)

    कैकइ कत जनमी जग माझा। जौं जनमि त भइ काहे न बाँझा।।

  1622. RCM 2.164.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कुल कलंकु जेहिं जनमेउ मोही। अपजस भाजन प्रियजन द्रोही।।

    अर्थ (Hindi)

    कुल कलंकु जेहिं जनमेउ मोही। अपजस भाजन प्रियजन द्रोही।।

  1623. RCM 2.164.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    को तिभुवन मोहि सरिस अभागी। गति असि तोरि मातु जेहि लागी।।

    अर्थ (Hindi)

    को तिभुवन मोहि सरिस अभागी। गति असि तोरि मातु जेहि लागी।।

  1624. RCM 2.164.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पितु सुरपुर बन रघुबर केतू। मैं केवल सब अनरथ हेतु।।

    अर्थ (Hindi)

    पितु सुरपुर बन रघुबर केतू। मैं केवल सब अनरथ हेतु।।

  1625. RCM 2.164.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    धिग मोहि भयउँ बेनु बन आगी। दुसह दाह दुख दूषन भागी।।

    अर्थ (Hindi)

    धिग मोहि भयउँ बेनु बन आगी। दुसह दाह दुख दूषन भागी।।

  1626. RCM 2.164.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मातु भरत के बचन मृदु सुनि सुनि उठी सँभारि।।

    अर्थ (Hindi)

    मातु भरत के बचन मृदु सुनि सुनि उठी सँभारि।।

  1627. RCM 2.164.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    लिए उठाइ लगाइ उर लोचन मोचति बारि।।164।।

    अर्थ (Hindi)

    लिए उठाइ लगाइ उर लोचन मोचति बारि।।164।।

  1628. RCM 2.165.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सरल सुभाय मायँ हियँ लाए। अति हित मनहुँ राम फिरि आए।।

    अर्थ (Hindi)

    सरल सुभाय मायँ हियँ लाए। अति हित मनहुँ राम फिरि आए।।

  1629. RCM 2.165.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भेंटेउ बहुरि लखन लघु भाई। सोकु सनेहु न हृदयँ समाई।।

    अर्थ (Hindi)

    भेंटेउ बहुरि लखन लघु भाई। सोकु सनेहु न हृदयँ समाई।।

  1630. RCM 2.165.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    देखि सुभाउ कहत सबु कोई। राम मातु अस काहे न होई।।

    अर्थ (Hindi)

    देखि सुभाउ कहत सबु कोई। राम मातु अस काहे न होई।।

  1631. RCM 2.165.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    माताँ भरतु गोद बैठारे। आँसु पौंछि मृदु बचन उचारे।।

    अर्थ (Hindi)

    माताँ भरतु गोद बैठारे। आँसु पौंछि मृदु बचन उचारे।।

  1632. RCM 2.165.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अजहुँ बच्छ बलि धीरज धरहू। कुसमउ समुझि सोक परिहरहू।।

    अर्थ (Hindi)

    अजहुँ बच्छ बलि धीरज धरहू। कुसमउ समुझि सोक परिहरहू।।

  1633. RCM 2.165.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जनि मानहु हियँ हानि गलानी। काल करम गति अघटित जानि।।

    अर्थ (Hindi)

    जनि मानहु हियँ हानि गलानी। काल करम गति अघटित जानि।।

  1634. RCM 2.165.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    काहुहि दोसु देहु जनि ताता। भा मोहि सब बिधि बाम बिधाता।।

    अर्थ (Hindi)

    काहुहि दोसु देहु जनि ताता। भा मोहि सब बिधि बाम बिधाता।।

  1635. RCM 2.165.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जो एतेहुँ दुख मोहि जिआवा। अजहुँ को जानइ का तेहि भावा।।

    अर्थ (Hindi)

    जो एतेहुँ दुख मोहि जिआवा। अजहुँ को जानइ का तेहि भावा।।

  1636. RCM 2.165.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पितु आयस भूषन बसन तात तजे रघुबीर।

    अर्थ (Hindi)

    पितु आयस भूषन बसन तात तजे रघुबीर।

  1637. RCM 2.165.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बिसमउ हरषु न हृदयँ कछु पहिरे बलकल चीर। 165।।

    अर्थ (Hindi)

    बिसमउ हरषु न हृदयँ कछु पहिरे बलकल चीर। 165।।

  1638. RCM 2.166.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मुख प्रसन्न मन रंग न रोषू। सब कर सब बिधि करि परितोषू।।

    अर्थ (Hindi)

    मुख प्रसन्न मन रंग न रोषू। सब कर सब बिधि करि परितोषू।।

  1639. RCM 2.166.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    चले बिपिन सुनि सिय सँग लागी। रहइ न राम चरन अनुरागी।।

    अर्थ (Hindi)

    चले बिपिन सुनि सिय सँग लागी। रहइ न राम चरन अनुरागी।।

  1640. RCM 2.166.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनतहिं लखनु चले उठि साथा। रहहिं न जतन किए रघुनाथा।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनतहिं लखनु चले उठि साथा। रहहिं न जतन किए रघुनाथा।।

  1641. RCM 2.166.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तब रघुपति सबही सिरु नाई। चले संग सिय अरु लघु भाई।।

    अर्थ (Hindi)

    तब रघुपति सबही सिरु नाई। चले संग सिय अरु लघु भाई।।

  1642. RCM 2.166.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    रामु लखनु सिय बनहि सिधाए। गइउँ न संग न प्रान पठाए।।

    अर्थ (Hindi)

    रामु लखनु सिय बनहि सिधाए। गइउँ न संग न प्रान पठाए।।

  1643. RCM 2.166.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    यहु सबु भा इन्ह आँखिन्ह आगें। तउ न तजा तनु जीव अभागें।।

    अर्थ (Hindi)

    यहु सबु भा इन्ह आँखिन्ह आगें। तउ न तजा तनु जीव अभागें।।

  1644. RCM 2.166.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मोहि न लाज निज नेहु निहारी। राम सरिस सुत मैं महतारी।।

    अर्थ (Hindi)

    मोहि न लाज निज नेहु निहारी। राम सरिस सुत मैं महतारी।।

  1645. RCM 2.166.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जिऐ मरै भल भूपति जाना। मोर हृदय सत कुलिस समाना।।

    अर्थ (Hindi)

    जिऐ मरै भल भूपति जाना। मोर हृदय सत कुलिस समाना।।

  1646. RCM 2.166.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कौसल्या के बचन सुनि भरत सहित रनिवास।

    अर्थ (Hindi)

    कौसल्या के बचन सुनि भरत सहित रनिवास।

  1647. RCM 2.166.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    ब्याकुल बिलपत राजगृह मानहुँ सोक नेवासु।।166।।

    अर्थ (Hindi)

    ब्याकुल बिलपत राजगृह मानहुँ सोक नेवासु।।166।।

  1648. RCM 2.167.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बिलपहिं बिकल भरत दोउ भाई। कौसल्याँ लिए हृदयँ लगाई।।

    अर्थ (Hindi)

    बिलपहिं बिकल भरत दोउ भाई। कौसल्याँ लिए हृदयँ लगाई।।

  1649. RCM 2.167.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भाँति अनेक भरतु समुझाए। कहि बिबेकमय बचन सुनाए।।

    अर्थ (Hindi)

    भाँति अनेक भरतु समुझाए। कहि बिबेकमय बचन सुनाए।।

  1650. RCM 2.167.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भरतहुँ मातु सकल समुझाईं। कहि पुरान श्रुति कथा सुहाईं।।

    अर्थ (Hindi)

    भरतहुँ मातु सकल समुझाईं। कहि पुरान श्रुति कथा सुहाईं।।

  1651. RCM 2.167.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    छल बिहीन सुचि सरल सुबानी। बोले भरत जोरि जुग पानी।।

    अर्थ (Hindi)

    छल बिहीन सुचि सरल सुबानी। बोले भरत जोरि जुग पानी।।

  1652. RCM 2.167.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जे अघ मातु पिता सुत मारें। गाइ गोठ महिसुर पुर जारें।।

    अर्थ (Hindi)

    जे अघ मातु पिता सुत मारें। गाइ गोठ महिसुर पुर जारें।।

  1653. RCM 2.167.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जे अघ तिय बालक बध कीन्हें। मीत महीपति माहुर दीन्हें।।

    अर्थ (Hindi)

    जे अघ तिय बालक बध कीन्हें। मीत महीपति माहुर दीन्हें।।

  1654. RCM 2.167.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जे पातक उपपातक अहहीं। करम बचन मन भव कबि कहहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    जे पातक उपपातक अहहीं। करम बचन मन भव कबि कहहीं।।

  1655. RCM 2.167.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    ते पातक मोहि होहुँ बिधाता। जौं यहु होइ मोर मत माता।।

    अर्थ (Hindi)

    ते पातक मोहि होहुँ बिधाता। जौं यहु होइ मोर मत माता।।

  1656. RCM 2.167.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जे परिहरि हरि हर चरन भजहिं भूतगन घोर।

    अर्थ (Hindi)

    जे परिहरि हरि हर चरन भजहिं भूतगन घोर।

  1657. RCM 2.167.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तेहि कइ गति मोहि देउ बिधि जौं जननी मत मोर।।167।।

    अर्थ (Hindi)

    तेहि कइ गति मोहि देउ बिधि जौं जननी मत मोर।।167।।

  1658. RCM 2.168.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बेचहिं बेदु धरमु दुहि लेहीं। पिसुन पराय पाप कहि देहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    बेचहिं बेदु धरमु दुहि लेहीं। पिसुन पराय पाप कहि देहीं।।

  1659. RCM 2.168.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कपटी कुटिल कलहप्रिय क्रोधी। बेद बिदूषक बिस्व बिरोधी।।

    अर्थ (Hindi)

    कपटी कुटिल कलहप्रिय क्रोधी। बेद बिदूषक बिस्व बिरोधी।।

  1660. RCM 2.168.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    लोभी लंपट लोलुपचारा। जे ताकहिं परधनु परदारा।।

    अर्थ (Hindi)

    लोभी लंपट लोलुपचारा। जे ताकहिं परधनु परदारा।।

  1661. RCM 2.168.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पावौं मैं तिन्ह के गति घोरा। जौं जननी यहु संमत मोरा।।

    अर्थ (Hindi)

    पावौं मैं तिन्ह के गति घोरा। जौं जननी यहु संमत मोरा।।

  1662. RCM 2.168.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जे नहिं साधुसंग अनुरागे। परमारथ पथ बिमुख अभागे।।

    अर्थ (Hindi)

    जे नहिं साधुसंग अनुरागे। परमारथ पथ बिमुख अभागे।।

  1663. RCM 2.168.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जे न भजहिं हरि नरतनु पाई। जिन्हहि न हरि हर सुजसु सोहाई।।

    अर्थ (Hindi)

    जे न भजहिं हरि नरतनु पाई। जिन्हहि न हरि हर सुजसु सोहाई।।

  1664. RCM 2.168.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तजि श्रुतिपंथु बाम पथ चलहीं। बंचक बिरचि बेष जगु छलहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    तजि श्रुतिपंथु बाम पथ चलहीं। बंचक बिरचि बेष जगु छलहीं।।

  1665. RCM 2.168.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तिन्ह कै गति मोहि संकर देऊ। जननी जौं यहु जानौं भेऊ।।

    अर्थ (Hindi)

    तिन्ह कै गति मोहि संकर देऊ। जननी जौं यहु जानौं भेऊ।।

  1666. RCM 2.168.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मातु भरत के बचन सुनि साँचे सरल सुभायँ।

    अर्थ (Hindi)

    मातु भरत के बचन सुनि साँचे सरल सुभायँ।

  1667. RCM 2.168.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कहति राम प्रिय तात तुम्ह सदा बचन मन कायँ।।168।।

    अर्थ (Hindi)

    कहति राम प्रिय तात तुम्ह सदा बचन मन कायँ।।168।।

  1668. RCM 2.169.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राम प्रानहु तें प्रान तुम्हारे। तुम्ह रघुपतिहि प्रानहु तें प्यारे।।

    अर्थ (Hindi)

    राम प्रानहु तें प्रान तुम्हारे। तुम्ह रघुपतिहि प्रानहु तें प्यारे।।

  1669. RCM 2.169.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बिधु बिष चवै स्त्रवै हिमु आगी। होइ बारिचर बारि बिरागी।।

    अर्थ (Hindi)

    बिधु बिष चवै स्त्रवै हिमु आगी। होइ बारिचर बारि बिरागी।।

  1670. RCM 2.169.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भएँ ग्यानु बरु मिटै न मोहू। तुम्ह रामहि प्रतिकूल न होहू।।

    अर्थ (Hindi)

    भएँ ग्यानु बरु मिटै न मोहू। तुम्ह रामहि प्रतिकूल न होहू।।

  1671. RCM 2.169.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मत तुम्हार यहु जो जग कहहीं। सो सपनेहुँ सुख सुगति न लहहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    मत तुम्हार यहु जो जग कहहीं। सो सपनेहुँ सुख सुगति न लहहीं।।

  1672. RCM 2.169.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अस कहि मातु भरतु हियँ लाए। थन पय स्त्रवहिं नयन जल छाए।।

    अर्थ (Hindi)

    अस कहि मातु भरतु हियँ लाए। थन पय स्त्रवहिं नयन जल छाए।।

  1673. RCM 2.169.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    करत बिलाप बहुत यहि भाँती। बैठेहिं बीति गइ सब राती।।

    अर्थ (Hindi)

    करत बिलाप बहुत यहि भाँती। बैठेहिं बीति गइ सब राती।।

  1674. RCM 2.169.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बामदेउ बसिष्ठ तब आए। सचिव महाजन सकल बोलाए।।

    अर्थ (Hindi)

    बामदेउ बसिष्ठ तब आए। सचिव महाजन सकल बोलाए।।

  1675. RCM 2.169.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मुनि बहु भाँति भरत उपदेसे। कहि परमारथ बचन सुदेसे।।

    अर्थ (Hindi)

    मुनि बहु भाँति भरत उपदेसे। कहि परमारथ बचन सुदेसे।।

  1676. RCM 2.169.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तात हृदयँ धीरजु धरहु करहु जो अवसर आजु।

    अर्थ (Hindi)

    तात हृदयँ धीरजु धरहु करहु जो अवसर आजु।

  1677. RCM 2.169.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    उठे भरत गुर बचन सुनि करन कहेउ सबु साजु।।169।।

    अर्थ (Hindi)

    उठे भरत गुर बचन सुनि करन कहेउ सबु साजु।।169।।

  1678. RCM 2.170.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नृपतनु बेद बिदित अन्हवावा। परम बिचित्र बिमानु बनावा।।

    अर्थ (Hindi)

    नृपतनु बेद बिदित अन्हवावा। परम बिचित्र बिमानु बनावा।।

  1679. RCM 2.170.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    गहि पद भरत मातु सब राखी। रहीं रानि दरसन अभिलाषी।।

    अर्थ (Hindi)

    गहि पद भरत मातु सब राखी। रहीं रानि दरसन अभिलाषी।।

  1680. RCM 2.170.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    चंदन अगर भार बहु आए। अमित अनेक सुगंध सुहाए।।

    अर्थ (Hindi)

    चंदन अगर भार बहु आए। अमित अनेक सुगंध सुहाए।।

  1681. RCM 2.170.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सरजु तीर रचि चिता बनाई। जनु सुरपुर सोपान सुहाई।।

    अर्थ (Hindi)

    सरजु तीर रचि चिता बनाई। जनु सुरपुर सोपान सुहाई।।

  1682. RCM 2.170.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    एहि बिधि दाह क्रिया सब कीन्ही। बिधिवत न्हाइ तिलांजुलि दीन्ही।।

    अर्थ (Hindi)

    एहि बिधि दाह क्रिया सब कीन्ही। बिधिवत न्हाइ तिलांजुलि दीन्ही।।

  1683. RCM 2.170.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सोधि सुमृति सब बेद पुराना। कीन्ह भरत दसगात बिधाना।।

    अर्थ (Hindi)

    सोधि सुमृति सब बेद पुराना। कीन्ह भरत दसगात बिधाना।।

  1684. RCM 2.170.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जहँ जस मुनिबर आयसु दीन्हा। तहँ तस सहस भाँति सबु कीन्हा।।

    अर्थ (Hindi)

    जहँ जस मुनिबर आयसु दीन्हा। तहँ तस सहस भाँति सबु कीन्हा।।

  1685. RCM 2.170.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भए बिसुद्ध दिए सब दाना। धेनु बाजि गज बाहन नाना।।

    अर्थ (Hindi)

    भए बिसुद्ध दिए सब दाना। धेनु बाजि गज बाहन नाना।।

  1686. RCM 2.170.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सिंघासन भूषन बसन अन्न धरनि धन धाम।

    अर्थ (Hindi)

    सिंघासन भूषन बसन अन्न धरनि धन धाम।

  1687. RCM 2.170.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    दिए भरत लहि भूमिसुर भे परिपूरन काम।।170।।

    अर्थ (Hindi)

    दिए भरत लहि भूमिसुर भे परिपूरन काम।।170।।

  1688. RCM 2.171.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पितु हित भरत कीन्हि जसि करनी। सो मुख लाख जाइ नहिं बरनी।।

    अर्थ (Hindi)

    पितु हित भरत कीन्हि जसि करनी। सो मुख लाख जाइ नहिं बरनी।।

  1689. RCM 2.171.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुदिनु सोधि मुनिबर तब आए। सचिव महाजन सकल बोलाए।।

    अर्थ (Hindi)

    सुदिनु सोधि मुनिबर तब आए। सचिव महाजन सकल बोलाए।।

  1690. RCM 2.171.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बैठे राजसभाँ सब जाई। पठए बोलि भरत दोउ भाई।।

    अर्थ (Hindi)

    बैठे राजसभाँ सब जाई। पठए बोलि भरत दोउ भाई।।

  1691. RCM 2.171.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भरतु बसिष्ठ निकट बैठारे। नीति धरममय बचन उचारे।।

    अर्थ (Hindi)

    भरतु बसिष्ठ निकट बैठारे। नीति धरममय बचन उचारे।।

  1692. RCM 2.171.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    प्रथम कथा सब मुनिबर बरनी। कैकइ कुटिल कीन्हि जसि करनी।।

    अर्थ (Hindi)

    प्रथम कथा सब मुनिबर बरनी। कैकइ कुटिल कीन्हि जसि करनी।।

  1693. RCM 2.171.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भूप धरमब्रतु सत्य सराहा। जेहिं तनु परिहरि प्रेमु निबाहा।।

    अर्थ (Hindi)

    भूप धरमब्रतु सत्य सराहा। जेहिं तनु परिहरि प्रेमु निबाहा।।

  1694. RCM 2.171.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कहत राम गुन सील सुभाऊ। सजल नयन पुलकेउ मुनिराऊ।।

    अर्थ (Hindi)

    कहत राम गुन सील सुभाऊ। सजल नयन पुलकेउ मुनिराऊ।।

  1695. RCM 2.171.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बहुरि लखन सिय प्रीति बखानी। सोक सनेह मगन मुनि ग्यानी।।

    अर्थ (Hindi)

    बहुरि लखन सिय प्रीति बखानी। सोक सनेह मगन मुनि ग्यानी।।

  1696. RCM 2.171.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनहु भरत भावी प्रबल बिलखि कहेउ मुनिनाथ।

    अर्थ (Hindi)

    सुनहु भरत भावी प्रबल बिलखि कहेउ मुनिनाथ।

  1697. RCM 2.171.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    हानि लाभु जीवन मरनु जसु अपजसु बिधि हाथ।।171।।

    अर्थ (Hindi)

    हानि लाभु जीवन मरनु जसु अपजसु बिधि हाथ।।171।।

  1698. RCM 2.172.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अस बिचारि केहि देइअ दोसू। ब्यरथ काहि पर कीजिअ रोसू।।

    अर्थ (Hindi)

    अस बिचारि केहि देइअ दोसू। ब्यरथ काहि पर कीजिअ रोसू।।

  1699. RCM 2.172.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तात बिचारु केहि करहु मन माहीं। सोच जोगु दसरथु नृपु नाहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    तात बिचारु केहि करहु मन माहीं। सोच जोगु दसरथु नृपु नाहीं।।

  1700. RCM 2.172.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सोचिअ बिप्र जो बेद बिहीना। तजि निज धरमु बिषय लयलीना।।

    अर्थ (Hindi)

    सोचिअ बिप्र जो बेद बिहीना। तजि निज धरमु बिषय लयलीना।।

  1701. RCM 2.172.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सोचिअ नृपति जो नीति न जाना। जेहि न प्रजा प्रिय प्रान समाना।।

    अर्थ (Hindi)

    सोचिअ नृपति जो नीति न जाना। जेहि न प्रजा प्रिय प्रान समाना।।

  1702. RCM 2.172.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सोचिअ बयसु कृपन धनवानू। जो न अतिथि सिव भगति सुजानू।।

    अर्थ (Hindi)

    सोचिअ बयसु कृपन धनवानू। जो न अतिथि सिव भगति सुजानू।।

  1703. RCM 2.172.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सोचिअ सूद्रु बिप्र अवमानी। मुखर मानप्रिय ग्यान गुमानी।।

    अर्थ (Hindi)

    सोचिअ सूद्रु बिप्र अवमानी। मुखर मानप्रिय ग्यान गुमानी।।

  1704. RCM 2.172.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सोचिअ पुनि पति बंचक नारी। कुटिल कलहप्रिय इच्छाचारी।।

    अर्थ (Hindi)

    सोचिअ पुनि पति बंचक नारी। कुटिल कलहप्रिय इच्छाचारी।।

  1705. RCM 2.172.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सोचिअ बटु निज ब्रतु परिहरई। जो नहिं गुर आयसु अनुसरई।।

    अर्थ (Hindi)

    सोचिअ बटु निज ब्रतु परिहरई। जो नहिं गुर आयसु अनुसरई।।

  1706. RCM 2.172.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सोचिअ गृही जो मोह बस करइ करम पथ त्याग।

    अर्थ (Hindi)

    सोचिअ गृही जो मोह बस करइ करम पथ त्याग।

  1707. RCM 2.172.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सोचिअ जति प्रंपच रत बिगत बिबेक बिराग।।172।।

    अर्थ (Hindi)

    सोचिअ जति प्रंपच रत बिगत बिबेक बिराग।।172।।

  1708. RCM 2.173.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बैखानस सोइ सोचै जोगु। तपु बिहाइ जेहि भावइ भोगू।।

    अर्थ (Hindi)

    बैखानस सोइ सोचै जोगु। तपु बिहाइ जेहि भावइ भोगू।।

  1709. RCM 2.173.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सोचिअ पिसुन अकारन क्रोधी। जननि जनक गुर बंधु बिरोधी।।

    अर्थ (Hindi)

    सोचिअ पिसुन अकारन क्रोधी। जननि जनक गुर बंधु बिरोधी।।

  1710. RCM 2.173.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सब बिधि सोचिअ पर अपकारी। निज तनु पोषक निरदय भारी।।

    अर्थ (Hindi)

    सब बिधि सोचिअ पर अपकारी। निज तनु पोषक निरदय भारी।।

  1711. RCM 2.173.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सोचनीय सबहि बिधि सोई। जो न छाड़ि छलु हरि जन होई।।

    अर्थ (Hindi)

    सोचनीय सबहि बिधि सोई। जो न छाड़ि छलु हरि जन होई।।

  1712. RCM 2.173.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सोचनीय नहिं कोसलराऊ। भुवन चारिदस प्रगट प्रभाऊ।।

    अर्थ (Hindi)

    सोचनीय नहिं कोसलराऊ। भुवन चारिदस प्रगट प्रभाऊ।।

  1713. RCM 2.173.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भयउ न अहइ न अब होनिहारा। भूप भरत जस पिता तुम्हारा।।

    अर्थ (Hindi)

    भयउ न अहइ न अब होनिहारा। भूप भरत जस पिता तुम्हारा।।

  1714. RCM 2.173.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बिधि हरि हरु सुरपति दिसिनाथा। बरनहिं सब दसरथ गुन गाथा।।

    अर्थ (Hindi)

    बिधि हरि हरु सुरपति दिसिनाथा। बरनहिं सब दसरथ गुन गाथा।।

  1715. RCM 2.173.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कहहु तात केहि भाँति कोउ करिहि बड़ाई तासु।

    अर्थ (Hindi)

    कहहु तात केहि भाँति कोउ करिहि बड़ाई तासु।

  1716. RCM 2.173.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राम लखन तुम्ह सत्रुहन सरिस सुअन सुचि जासु।।173।।

    अर्थ (Hindi)

    राम लखन तुम्ह सत्रुहन सरिस सुअन सुचि जासु।।173।।

  1717. RCM 2.174.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सब प्रकार भूपति बड़भागी। बादि बिषादु करिअ तेहि लागी।।

    अर्थ (Hindi)

    सब प्रकार भूपति बड़भागी। बादि बिषादु करिअ तेहि लागी।।

  1718. RCM 2.174.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    यहु सुनि समुझि सोचु परिहरहू। सिर धरि राज रजायसु करहू।।

    अर्थ (Hindi)

    यहु सुनि समुझि सोचु परिहरहू। सिर धरि राज रजायसु करहू।।

  1719. RCM 2.174.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राँय राजपदु तुम्ह कहुँ दीन्हा। पिता बचनु फुर चाहिअ कीन्हा।।

    अर्थ (Hindi)

    राँय राजपदु तुम्ह कहुँ दीन्हा। पिता बचनु फुर चाहिअ कीन्हा।।

  1720. RCM 2.174.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तजे रामु जेहिं बचनहि लागी। तनु परिहरेउ राम बिरहागी।।

    अर्थ (Hindi)

    तजे रामु जेहिं बचनहि लागी। तनु परिहरेउ राम बिरहागी।।

  1721. RCM 2.174.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नृपहि बचन प्रिय नहिं प्रिय प्राना। करहु तात पितु बचन प्रवाना।।

    अर्थ (Hindi)

    नृपहि बचन प्रिय नहिं प्रिय प्राना। करहु तात पितु बचन प्रवाना।।

  1722. RCM 2.174.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    करहु सीस धरि भूप रजाई। हइ तुम्ह कहँ सब भाँति भलाई।।

    अर्थ (Hindi)

    करहु सीस धरि भूप रजाई। हइ तुम्ह कहँ सब भाँति भलाई।।

  1723. RCM 2.174.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    परसुराम पितु अग्या राखी। मारी मातु लोक सब साखी।।

    अर्थ (Hindi)

    परसुराम पितु अग्या राखी। मारी मातु लोक सब साखी।।

  1724. RCM 2.174.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तनय जजातिहि जौबनु दयऊ। पितु अग्याँ अघ अजसु न भयऊ।।

    अर्थ (Hindi)

    तनय जजातिहि जौबनु दयऊ। पितु अग्याँ अघ अजसु न भयऊ।।

  1725. RCM 2.174.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अनुचित उचित बिचारु तजि जे पालहिं पितु बैन।

    अर्थ (Hindi)

    अनुचित उचित बिचारु तजि जे पालहिं पितु बैन।

  1726. RCM 2.174.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    ते भाजन सुख सुजस के बसहिं अमरपति ऐन।।174।।

    अर्थ (Hindi)

    ते भाजन सुख सुजस के बसहिं अमरपति ऐन।।174।।

  1727. RCM 2.175.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अवसि नरेस बचन फुर करहू। पालहु प्रजा सोकु परिहरहू।।

    अर्थ (Hindi)

    अवसि नरेस बचन फुर करहू। पालहु प्रजा सोकु परिहरहू।।

  1728. RCM 2.175.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुरपुर नृप पाइहि परितोषू। तुम्ह कहुँ सुकृत सुजसु नहिं दोषू।।

    अर्थ (Hindi)

    सुरपुर नृप पाइहि परितोषू। तुम्ह कहुँ सुकृत सुजसु नहिं दोषू।।

  1729. RCM 2.175.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बेद बिदित संमत सबही का। जेहि पितु देइ सो पावइ टीका।।

    अर्थ (Hindi)

    बेद बिदित संमत सबही का। जेहि पितु देइ सो पावइ टीका।।

  1730. RCM 2.175.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    करहु राजु परिहरहु गलानी। मानहु मोर बचन हित जानी।।

    अर्थ (Hindi)

    करहु राजु परिहरहु गलानी। मानहु मोर बचन हित जानी।।

  1731. RCM 2.175.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनि सुखु लहब राम बैदेहीं। अनुचित कहब न पंडित केहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनि सुखु लहब राम बैदेहीं। अनुचित कहब न पंडित केहीं।।

  1732. RCM 2.175.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कौसल्यादि सकल महतारीं। तेउ प्रजा सुख होहिं सुखारीं।।

    अर्थ (Hindi)

    कौसल्यादि सकल महतारीं। तेउ प्रजा सुख होहिं सुखारीं।।

  1733. RCM 2.175.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    परम तुम्हार राम कर जानिहि। सो सब बिधि तुम्ह सन भल मानिहि।।

    अर्थ (Hindi)

    परम तुम्हार राम कर जानिहि। सो सब बिधि तुम्ह सन भल मानिहि।।

  1734. RCM 2.175.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सौंपेहु राजु राम कै आएँ। सेवा करेहु सनेह सुहाएँ।।

    अर्थ (Hindi)

    सौंपेहु राजु राम कै आएँ। सेवा करेहु सनेह सुहाएँ।।

  1735. RCM 2.175.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कीजिअ गुर आयसु अवसि कहहिं सचिव कर जोरि।

    अर्थ (Hindi)

    कीजिअ गुर आयसु अवसि कहहिं सचिव कर जोरि।

  1736. RCM 2.175.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    रघुपति आएँ उचित जस तस तब करब बहोरि।।175।।

    अर्थ (Hindi)

    रघुपति आएँ उचित जस तस तब करब बहोरि।।175।।

  1737. RCM 2.176.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कौसल्या धरि धीरजु कहई। पूत पथ्य गुर आयसु अहई।।

    अर्थ (Hindi)

    कौसल्या धरि धीरजु कहई। पूत पथ्य गुर आयसु अहई।।

  1738. RCM 2.176.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सो आदरिअ करिअ हित मानी। तजिअ बिषादु काल गति जानी।।

    अर्थ (Hindi)

    सो आदरिअ करिअ हित मानी। तजिअ बिषादु काल गति जानी।।

  1739. RCM 2.176.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बन रघुपति सुरपति नरनाहू। तुम्ह एहि भाँति तात कदराहू।।

    अर्थ (Hindi)

    बन रघुपति सुरपति नरनाहू। तुम्ह एहि भाँति तात कदराहू।।

  1740. RCM 2.176.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    परिजन प्रजा सचिव सब अंबा। तुम्हही सुत सब कहँ अवलंबा।।

    अर्थ (Hindi)

    परिजन प्रजा सचिव सब अंबा। तुम्हही सुत सब कहँ अवलंबा।।

  1741. RCM 2.176.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    लखि बिधि बाम कालु कठिनाई। धीरजु धरहु मातु बलि जाई।।

    अर्थ (Hindi)

    लखि बिधि बाम कालु कठिनाई। धीरजु धरहु मातु बलि जाई।।

  1742. RCM 2.176.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सिर धरि गुर आयसु अनुसरहू। प्रजा पालि परिजन दुखु हरहू।।

    अर्थ (Hindi)

    सिर धरि गुर आयसु अनुसरहू। प्रजा पालि परिजन दुखु हरहू।।

  1743. RCM 2.176.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    गुर के बचन सचिव अभिनंदनु। सुने भरत हिय हित जनु चंदनु।।

    अर्थ (Hindi)

    गुर के बचन सचिव अभिनंदनु। सुने भरत हिय हित जनु चंदनु।।

  1744. RCM 2.176.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनी बहोरि मातु मृदु बानी। सील सनेह सरल रस सानी।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनी बहोरि मातु मृदु बानी। सील सनेह सरल रस सानी।।

  1745. RCM 2.177.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मोहि उपदेसु दीन्ह गुर नीका। प्रजा सचिव संमत सबही का।।

    अर्थ (Hindi)

    मोहि उपदेसु दीन्ह गुर नीका। प्रजा सचिव संमत सबही का।।

  1746. RCM 2.177.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मातु उचित धरि आयसु दीन्हा। अवसि सीस धरि चाहउँ कीन्हा।।

    अर्थ (Hindi)

    मातु उचित धरि आयसु दीन्हा। अवसि सीस धरि चाहउँ कीन्हा।।

  1747. RCM 2.177.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    गुर पितु मातु स्वामि हित बानी। सुनि मन मुदित करिअ भलि जानी।।

    अर्थ (Hindi)

    गुर पितु मातु स्वामि हित बानी। सुनि मन मुदित करिअ भलि जानी।।

  1748. RCM 2.177.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    उचित कि अनुचित किएँ बिचारू। धरमु जाइ सिर पातक भारू।।

    अर्थ (Hindi)

    उचित कि अनुचित किएँ बिचारू। धरमु जाइ सिर पातक भारू।।

  1749. RCM 2.177.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तुम्ह तौ देहु सरल सिख सोई। जो आचरत मोर भल होई।।

    अर्थ (Hindi)

    तुम्ह तौ देहु सरल सिख सोई। जो आचरत मोर भल होई।।

  1750. RCM 2.177.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जद्यपि यह समुझत हउँ नीकें। तदपि होत परितोषु न जी कें।।

    अर्थ (Hindi)

    जद्यपि यह समुझत हउँ नीकें। तदपि होत परितोषु न जी कें।।

  1751. RCM 2.177.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अब तुम्ह बिनय मोरि सुनि लेहू। मोहि अनुहरत सिखावनु देहू।।

    अर्थ (Hindi)

    अब तुम्ह बिनय मोरि सुनि लेहू। मोहि अनुहरत सिखावनु देहू।।

  1752. RCM 2.177.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    ऊतरु देउँ छमब अपराधू। दुखित दोष गुन गनहिं न साधू।।

    अर्थ (Hindi)

    ऊतरु देउँ छमब अपराधू। दुखित दोष गुन गनहिं न साधू।।

  1753. RCM 2.177.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पितु सुरपुर सिय रामु बन करन कहहु मोहि राजु।

    अर्थ (Hindi)

    पितु सुरपुर सिय रामु बन करन कहहु मोहि राजु।

  1754. RCM 2.177.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    एहि तें जानहु मोर हित कै आपन बड़ काजु।।177।।

    अर्थ (Hindi)

    एहि तें जानहु मोर हित कै आपन बड़ काजु।।177।।

  1755. RCM 2.178.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    हित हमार सियपति सेवकाई। सो हरि लीन्ह मातु कुटिलाई।।

    अर्थ (Hindi)

    हित हमार सियपति सेवकाई। सो हरि लीन्ह मातु कुटिलाई।।

  1756. RCM 2.178.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मैं अनुमानि दीख मन माहीं। आन उपायँ मोर हित नाहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    मैं अनुमानि दीख मन माहीं। आन उपायँ मोर हित नाहीं।।

  1757. RCM 2.178.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सोक समाजु राजु केहि लेखें। लखन राम सिय बिनु पद देखें।।

    अर्थ (Hindi)

    सोक समाजु राजु केहि लेखें। लखन राम सिय बिनु पद देखें।।

  1758. RCM 2.178.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बादि बसन बिनु भूषन भारू। बादि बिरति बिनु ब्रह्म बिचारू।।

    अर्थ (Hindi)

    बादि बसन बिनु भूषन भारू। बादि बिरति बिनु ब्रह्म बिचारू।।

  1759. RCM 2.178.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सरुज सरीर बादि बहु भोगा। बिनु हरिभगति जायँ जप जोगा।।

    अर्थ (Hindi)

    सरुज सरीर बादि बहु भोगा। बिनु हरिभगति जायँ जप जोगा।।

  1760. RCM 2.178.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जायँ जीव बिनु देह सुहाई। बादि मोर सबु बिनु रघुराई।।

    अर्थ (Hindi)

    जायँ जीव बिनु देह सुहाई। बादि मोर सबु बिनु रघुराई।।

  1761. RCM 2.178.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जाउँ राम पहिं आयसु देहू। एकहिं आँक मोर हित एहू।।

    अर्थ (Hindi)

    जाउँ राम पहिं आयसु देहू। एकहिं आँक मोर हित एहू।।

  1762. RCM 2.178.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मोहि नृप करि भल आपन चहहू। सोउ सनेह जड़ता बस कहहू।।

    अर्थ (Hindi)

    मोहि नृप करि भल आपन चहहू। सोउ सनेह जड़ता बस कहहू।।

  1763. RCM 2.178.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कैकेई सुअ कुटिलमति राम बिमुख गतलाज।

    अर्थ (Hindi)

    कैकेई सुअ कुटिलमति राम बिमुख गतलाज।

  1764. RCM 2.178.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तुम्ह चाहत सुखु मोहबस मोहि से अधम कें राज।।178।।

    अर्थ (Hindi)

    तुम्ह चाहत सुखु मोहबस मोहि से अधम कें राज।।178।।

  1765. RCM 2.179.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कहउँ साँचु सब सुनि पतिआहू। चाहिअ धरमसील नरनाहू।।

    अर्थ (Hindi)

    कहउँ साँचु सब सुनि पतिआहू। चाहिअ धरमसील नरनाहू।।

  1766. RCM 2.179.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मोहि राजु हठि देइहहु जबहीं। रसा रसातल जाइहि तबहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    मोहि राजु हठि देइहहु जबहीं। रसा रसातल जाइहि तबहीं।।

  1767. RCM 2.179.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मोहि समान को पाप निवासू। जेहि लगि सीय राम बनबासू।।

    अर्थ (Hindi)

    मोहि समान को पाप निवासू। जेहि लगि सीय राम बनबासू।।

  1768. RCM 2.179.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    रायँ राम कहुँ काननु दीन्हा। बिछुरत गमनु अमरपुर कीन्हा।।

    अर्थ (Hindi)

    रायँ राम कहुँ काननु दीन्हा। बिछुरत गमनु अमरपुर कीन्हा।।

  1769. RCM 2.179.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मैं सठु सब अनरथ कर हेतू। बैठ बात सब सुनउँ सचेतू।।

    अर्थ (Hindi)

    मैं सठु सब अनरथ कर हेतू। बैठ बात सब सुनउँ सचेतू।।

  1770. RCM 2.179.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बिनु रघुबीर बिलोकि अबासू। रहे प्रान सहि जग उपहासू।।

    अर्थ (Hindi)

    बिनु रघुबीर बिलोकि अबासू। रहे प्रान सहि जग उपहासू।।

  1771. RCM 2.179.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राम पुनीत बिषय रस रूखे। लोलुप भूमि भोग के भूखे।।

    अर्थ (Hindi)

    राम पुनीत बिषय रस रूखे। लोलुप भूमि भोग के भूखे।।

  1772. RCM 2.179.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कहँ लगि कहौं हृदय कठिनाई। निदरि कुलिसु जेहिं लही बड़ाई।।

    अर्थ (Hindi)

    कहँ लगि कहौं हृदय कठिनाई। निदरि कुलिसु जेहिं लही बड़ाई।।

  1773. RCM 2.179.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कारन तें कारजु कठिन होइ दोसु नहि मोर।

    अर्थ (Hindi)

    कारन तें कारजु कठिन होइ दोसु नहि मोर।

  1774. RCM 2.179.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कुलिस अस्थि तें उपल तें लोह कराल कठोर।।179।।

    अर्थ (Hindi)

    कुलिस अस्थि तें उपल तें लोह कराल कठोर।।179।।

  1775. RCM 2.180.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कैकेई भव तनु अनुरागे। पाँवर प्रान अघाइ अभागे।।

    अर्थ (Hindi)

    कैकेई भव तनु अनुरागे। पाँवर प्रान अघाइ अभागे।।

  1776. RCM 2.180.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जौं प्रिय बिरहँ प्रान प्रिय लागे। देखब सुनब बहुत अब आगे।।

    अर्थ (Hindi)

    जौं प्रिय बिरहँ प्रान प्रिय लागे। देखब सुनब बहुत अब आगे।।

  1777. RCM 2.180.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    लखन राम सिय कहुँ बनु दीन्हा। पठइ अमरपुर पति हित कीन्हा।।

    अर्थ (Hindi)

    लखन राम सिय कहुँ बनु दीन्हा। पठइ अमरपुर पति हित कीन्हा।।

  1778. RCM 2.180.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    लीन्ह बिधवपन अपजसु आपू। दीन्हेउ प्रजहि सोकु संतापू।।

    अर्थ (Hindi)

    लीन्ह बिधवपन अपजसु आपू। दीन्हेउ प्रजहि सोकु संतापू।।

  1779. RCM 2.180.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मोहि दीन्ह सुखु सुजसु सुराजू। कीन्ह कैकेईं सब कर काजू।।

    अर्थ (Hindi)

    मोहि दीन्ह सुखु सुजसु सुराजू। कीन्ह कैकेईं सब कर काजू।।

  1780. RCM 2.180.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    एहि तें मोर काह अब नीका। तेहि पर देन कहहु तुम्ह टीका।।

    अर्थ (Hindi)

    एहि तें मोर काह अब नीका। तेहि पर देन कहहु तुम्ह टीका।।

  1781. RCM 2.180.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कैकई जठर जनमि जग माहीं। यह मोहि कहँ कछु अनुचित नाहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    कैकई जठर जनमि जग माहीं। यह मोहि कहँ कछु अनुचित नाहीं।।

  1782. RCM 2.180.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मोरि बात सब बिधिहिं बनाई। प्रजा पाँच कत करहु सहाई।।

    अर्थ (Hindi)

    मोरि बात सब बिधिहिं बनाई। प्रजा पाँच कत करहु सहाई।।

  1783. RCM 2.180.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    ग्रह ग्रहीत पुनि बात बस तेहि पुनि बीछी मार।

    अर्थ (Hindi)

    ग्रह ग्रहीत पुनि बात बस तेहि पुनि बीछी मार।

  1784. RCM 2.180.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तेहि पिआइअ बारुनी कहहु काह उपचार।।180।।

    अर्थ (Hindi)

    तेहि पिआइअ बारुनी कहहु काह उपचार।।180।।

  1785. RCM 2.181.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कैकइ सुअन जोगु जग जोई। चतुर बिरंचि दीन्ह मोहि सोई।।

    अर्थ (Hindi)

    कैकइ सुअन जोगु जग जोई। चतुर बिरंचि दीन्ह मोहि सोई।।

  1786. RCM 2.181.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    दसरथ तनय राम लघु भाई। दीन्हि मोहि बिधि बादि बड़ाई।।

    अर्थ (Hindi)

    दसरथ तनय राम लघु भाई। दीन्हि मोहि बिधि बादि बड़ाई।।

  1787. RCM 2.181.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तुम्ह सब कहहु कढ़ावन टीका। राय रजायसु सब कहँ नीका।।

    अर्थ (Hindi)

    तुम्ह सब कहहु कढ़ावन टीका। राय रजायसु सब कहँ नीका।।

  1788. RCM 2.181.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    उतरु देउँ केहि बिधि केहि केही। कहहु सुखेन जथा रुचि जेही।।

    अर्थ (Hindi)

    उतरु देउँ केहि बिधि केहि केही। कहहु सुखेन जथा रुचि जेही।।

  1789. RCM 2.181.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मोहि कुमातु समेत बिहाई। कहहु कहिहि के कीन्ह भलाई।।

    अर्थ (Hindi)

    मोहि कुमातु समेत बिहाई। कहहु कहिहि के कीन्ह भलाई।।

  1790. RCM 2.181.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मो बिनु को सचराचर माहीं। जेहि सिय रामु प्रानप्रिय नाहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    मो बिनु को सचराचर माहीं। जेहि सिय रामु प्रानप्रिय नाहीं।।

  1791. RCM 2.181.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    परम हानि सब कहँ बड़ लाहू। अदिनु मोर नहि दूषन काहू।।

    अर्थ (Hindi)

    परम हानि सब कहँ बड़ लाहू। अदिनु मोर नहि दूषन काहू।।

  1792. RCM 2.181.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    संसय सील प्रेम बस अहहू। सबुइ उचित सब जो कछु कहहू।।

    अर्थ (Hindi)

    संसय सील प्रेम बस अहहू। सबुइ उचित सब जो कछु कहहू।।

  1793. RCM 2.181.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राम मातु सुठि सरलचित मो पर प्रेमु बिसेषि।

    अर्थ (Hindi)

    राम मातु सुठि सरलचित मो पर प्रेमु बिसेषि।

  1794. RCM 2.181.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कहइ सुभाय सनेह बस मोरि दीनता देखि।।181।

    अर्थ (Hindi)

    कहइ सुभाय सनेह बस मोरि दीनता देखि।।181।

  1795. RCM 2.182.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    गुर बिबेक सागर जगु जाना। जिन्हहि बिस्व कर बदर समाना।।

    अर्थ (Hindi)

    गुर बिबेक सागर जगु जाना। जिन्हहि बिस्व कर बदर समाना।।

  1796. RCM 2.182.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मो कहँ तिलक साज सज सोऊ। भएँ बिधि बिमुख बिमुख सबु कोऊ।।

    अर्थ (Hindi)

    मो कहँ तिलक साज सज सोऊ। भएँ बिधि बिमुख बिमुख सबु कोऊ।।

  1797. RCM 2.182.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    परिहरि रामु सीय जग माहीं। कोउ न कहिहि मोर मत नाहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    परिहरि रामु सीय जग माहीं। कोउ न कहिहि मोर मत नाहीं।।

  1798. RCM 2.182.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सो मैं सुनब सहब सुखु मानी। अंतहुँ कीच तहाँ जहँ पानी।।

    अर्थ (Hindi)

    सो मैं सुनब सहब सुखु मानी। अंतहुँ कीच तहाँ जहँ पानी।।

  1799. RCM 2.182.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    डरु न मोहि जग कहिहि कि पोचू। परलोकहु कर नाहिन सोचू।।

    अर्थ (Hindi)

    डरु न मोहि जग कहिहि कि पोचू। परलोकहु कर नाहिन सोचू।।

  1800. RCM 2.182.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    एकइ उर बस दुसह दवारी। मोहि लगि भे सिय रामु दुखारी।।

    अर्थ (Hindi)

    एकइ उर बस दुसह दवारी। मोहि लगि भे सिय रामु दुखारी।।

  1801. RCM 2.182.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जीवन लाहु लखन भल पावा। सबु तजि राम चरन मनु लावा।।

    अर्थ (Hindi)

    जीवन लाहु लखन भल पावा। सबु तजि राम चरन मनु लावा।।

  1802. RCM 2.182.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मोर जनम रघुबर बन लागी। झूठ काह पछिताउँ अभागी।।

    अर्थ (Hindi)

    मोर जनम रघुबर बन लागी। झूठ काह पछिताउँ अभागी।।

  1803. RCM 2.182.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    आपनि दारुन दीनता कहउँ सबहि सिरु नाइ।

    अर्थ (Hindi)

    आपनि दारुन दीनता कहउँ सबहि सिरु नाइ।

  1804. RCM 2.182.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    देखें बिनु रघुनाथ पद जिय कै जरनि न जाइ।।182।।

    अर्थ (Hindi)

    देखें बिनु रघुनाथ पद जिय कै जरनि न जाइ।।182।।

  1805. RCM 2.183.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    आन उपाउ मोहि नहि सूझा। को जिय कै रघुबर बिनु बूझा।।

    अर्थ (Hindi)

    आन उपाउ मोहि नहि सूझा। को जिय कै रघुबर बिनु बूझा।।

  1806. RCM 2.183.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    एकहिं आँक इहइ मन माहीं। प्रातकाल चलिहउँ प्रभु पाहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    एकहिं आँक इहइ मन माहीं। प्रातकाल चलिहउँ प्रभु पाहीं।।

  1807. RCM 2.183.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जद्यपि मैं अनभल अपराधी। भै मोहि कारन सकल उपाधी।।

    अर्थ (Hindi)

    जद्यपि मैं अनभल अपराधी। भै मोहि कारन सकल उपाधी।।

  1808. RCM 2.183.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तदपि सरन सनमुख मोहि देखी। छमि सब करिहहिं कृपा बिसेषी।।

    अर्थ (Hindi)

    तदपि सरन सनमुख मोहि देखी। छमि सब करिहहिं कृपा बिसेषी।।

  1809. RCM 2.183.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सील सकुच सुठि सरल सुभाऊ। कृपा सनेह सदन रघुराऊ।।

    अर्थ (Hindi)

    सील सकुच सुठि सरल सुभाऊ। कृपा सनेह सदन रघुराऊ।।

  1810. RCM 2.183.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अरिहुक अनभल कीन्ह न रामा। मैं सिसु सेवक जद्यपि बामा।।

    अर्थ (Hindi)

    अरिहुक अनभल कीन्ह न रामा। मैं सिसु सेवक जद्यपि बामा।।

  1811. RCM 2.183.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तुम्ह पै पाँच मोर भल मानी। आयसु आसिष देहु सुबानी।।

    अर्थ (Hindi)

    तुम्ह पै पाँच मोर भल मानी। आयसु आसिष देहु सुबानी।।

  1812. RCM 2.183.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जेहिं सुनि बिनय मोहि जनु जानी। आवहिं बहुरि रामु रजधानी।।

    अर्थ (Hindi)

    जेहिं सुनि बिनय मोहि जनु जानी। आवहिं बहुरि रामु रजधानी।।

  1813. RCM 2.183.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जद्यपि जनमु कुमातु तें मैं सठु सदा सदोस।

    अर्थ (Hindi)

    जद्यपि जनमु कुमातु तें मैं सठु सदा सदोस।

  1814. RCM 2.183.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    आपन जानि न त्यागिहहिं मोहि रघुबीर भरोस।।183।।

    अर्थ (Hindi)

    आपन जानि न त्यागिहहिं मोहि रघुबीर भरोस।।183।।

  1815. RCM 2.184.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भरत बचन सब कहँ प्रिय लागे। राम सनेह सुधाँ जनु पागे।।

    अर्थ (Hindi)

    भरत बचन सब कहँ प्रिय लागे। राम सनेह सुधाँ जनु पागे।।

  1816. RCM 2.184.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    लोग बियोग बिषम बिष दागे। मंत्र सबीज सुनत जनु जागे।।

    अर्थ (Hindi)

    लोग बियोग बिषम बिष दागे। मंत्र सबीज सुनत जनु जागे।।

  1817. RCM 2.184.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मातु सचिव गुर पुर नर नारी। सकल सनेहँ बिकल भए भारी।।

    अर्थ (Hindi)

    मातु सचिव गुर पुर नर नारी। सकल सनेहँ बिकल भए भारी।।

  1818. RCM 2.184.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भरतहि कहहि सराहि सराही। राम प्रेम मूरति तनु आही।।

    अर्थ (Hindi)

    भरतहि कहहि सराहि सराही। राम प्रेम मूरति तनु आही।।

  1819. RCM 2.184.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तात भरत अस काहे न कहहू। प्रान समान राम प्रिय अहहू।।

    अर्थ (Hindi)

    तात भरत अस काहे न कहहू। प्रान समान राम प्रिय अहहू।।

  1820. RCM 2.184.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जो पावँरु अपनी जड़ताई। तुम्हहि सुगाइ मातु कुटिलाई।।

    अर्थ (Hindi)

    जो पावँरु अपनी जड़ताई। तुम्हहि सुगाइ मातु कुटिलाई।।

  1821. RCM 2.184.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सो सठु कोटिक पुरुष समेता। बसिहि कलप सत नरक निकेता।।

    अर्थ (Hindi)

    सो सठु कोटिक पुरुष समेता। बसिहि कलप सत नरक निकेता।।

  1822. RCM 2.184.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अहि अघ अवगुन नहि मनि गहई। हरइ गरल दुख दारिद दहई।।

    अर्थ (Hindi)

    अहि अघ अवगुन नहि मनि गहई। हरइ गरल दुख दारिद दहई।।

  1823. RCM 2.184.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अवसि चलिअ बन रामु जहँ भरत मंत्रु भल कीन्ह।

    अर्थ (Hindi)

    अवसि चलिअ बन रामु जहँ भरत मंत्रु भल कीन्ह।

  1824. RCM 2.184.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सोक सिंधु बूड़त सबहि तुम्ह अवलंबनु दीन्ह।।184।।

    अर्थ (Hindi)

    सोक सिंधु बूड़त सबहि तुम्ह अवलंबनु दीन्ह।।184।।

  1825. RCM 2.185.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भा सब कें मन मोदु न थोरा। जनु घन धुनि सुनि चातक मोरा।।

    अर्थ (Hindi)

    भा सब कें मन मोदु न थोरा। जनु घन धुनि सुनि चातक मोरा।।

  1826. RCM 2.185.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    चलत प्रात लखि निरनउ नीके। भरतु प्रानप्रिय भे सबही के।।

    अर्थ (Hindi)

    चलत प्रात लखि निरनउ नीके। भरतु प्रानप्रिय भे सबही के।।

  1827. RCM 2.185.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मुनिहि बंदि भरतहि सिरु नाई। चले सकल घर बिदा कराई।।

    अर्थ (Hindi)

    मुनिहि बंदि भरतहि सिरु नाई। चले सकल घर बिदा कराई।।

  1828. RCM 2.185.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    धन्य भरत जीवनु जग माहीं। सीलु सनेहु सराहत जाहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    धन्य भरत जीवनु जग माहीं। सीलु सनेहु सराहत जाहीं।।

  1829. RCM 2.185.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कहहि परसपर भा बड़ काजू। सकल चलै कर साजहिं साजू।।

    अर्थ (Hindi)

    कहहि परसपर भा बड़ काजू। सकल चलै कर साजहिं साजू।।

  1830. RCM 2.185.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जेहि राखहिं रहु घर रखवारी। सो जानइ जनु गरदनि मारी।।

    अर्थ (Hindi)

    जेहि राखहिं रहु घर रखवारी। सो जानइ जनु गरदनि मारी।।

  1831. RCM 2.185.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कोउ कह रहन कहिअ नहिं काहू। को न चहइ जग जीवन लाहू।।

    अर्थ (Hindi)

    कोउ कह रहन कहिअ नहिं काहू। को न चहइ जग जीवन लाहू।।

  1832. RCM 2.185.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जरउ सो संपति सदन सुखु सुहद मातु पितु भाइ।

    अर्थ (Hindi)

    जरउ सो संपति सदन सुखु सुहद मातु पितु भाइ।

  1833. RCM 2.185.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सनमुख होत जो राम पद करै न सहस सहाइ।।185।।

    अर्थ (Hindi)

    सनमुख होत जो राम पद करै न सहस सहाइ।।185।।

  1834. RCM 2.186.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    घर घर साजहिं बाहन नाना। हरषु हृदयँ परभात पयाना।।

    अर्थ (Hindi)

    घर घर साजहिं बाहन नाना। हरषु हृदयँ परभात पयाना।।

  1835. RCM 2.186.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भरत जाइ घर कीन्ह बिचारू। नगरु बाजि गज भवन भँडारू।।

    अर्थ (Hindi)

    भरत जाइ घर कीन्ह बिचारू। नगरु बाजि गज भवन भँडारू।।

  1836. RCM 2.186.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    संपति सब रघुपति कै आही। जौ बिनु जतन चलौं तजि ताही।।

    अर्थ (Hindi)

    संपति सब रघुपति कै आही। जौ बिनु जतन चलौं तजि ताही।।

  1837. RCM 2.186.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तौ परिनाम न मोरि भलाई। पाप सिरोमनि साइँ दोहाई।।

    अर्थ (Hindi)

    तौ परिनाम न मोरि भलाई। पाप सिरोमनि साइँ दोहाई।।

  1838. RCM 2.186.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    करइ स्वामि हित सेवकु सोई। दूषन कोटि देइ किन कोई।।

    अर्थ (Hindi)

    करइ स्वामि हित सेवकु सोई। दूषन कोटि देइ किन कोई।।

  1839. RCM 2.186.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अस बिचारि सुचि सेवक बोले। जे सपनेहुँ निज धरम न डोले।।

    अर्थ (Hindi)

    अस बिचारि सुचि सेवक बोले। जे सपनेहुँ निज धरम न डोले।।

  1840. RCM 2.186.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कहि सबु मरमु धरमु भल भाषा। जो जेहि लायक सो तेहिं राखा।।

    अर्थ (Hindi)

    कहि सबु मरमु धरमु भल भाषा। जो जेहि लायक सो तेहिं राखा।।

  1841. RCM 2.186.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    करि सबु जतनु राखि रखवारे। राम मातु पहिं भरतु सिधारे।।

    अर्थ (Hindi)

    करि सबु जतनु राखि रखवारे। राम मातु पहिं भरतु सिधारे।।

  1842. RCM 2.186.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    आरत जननी जानि सब भरत सनेह सुजान।

    अर्थ (Hindi)

    आरत जननी जानि सब भरत सनेह सुजान।

  1843. RCM 2.186.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कहेउ बनावन पालकीं सजन सुखासन जान।।186।।

    अर्थ (Hindi)

    कहेउ बनावन पालकीं सजन सुखासन जान।।186।।

  1844. RCM 2.187.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    चक्क चक्कि जिमि पुर नर नारी। चहत प्रात उर आरत भारी।।

    अर्थ (Hindi)

    चक्क चक्कि जिमि पुर नर नारी। चहत प्रात उर आरत भारी।।

  1845. RCM 2.187.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जागत सब निसि भयउ बिहाना। भरत बोलाए सचिव सुजाना।।

    अर्थ (Hindi)

    जागत सब निसि भयउ बिहाना। भरत बोलाए सचिव सुजाना।।

  1846. RCM 2.187.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कहेउ लेहु सबु तिलक समाजू। बनहिं देब मुनि रामहिं राजू।।

    अर्थ (Hindi)

    कहेउ लेहु सबु तिलक समाजू। बनहिं देब मुनि रामहिं राजू।।

  1847. RCM 2.187.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बेगि चलहु सुनि सचिव जोहारे। तुरत तुरग रथ नाग सँवारे।।

    अर्थ (Hindi)

    बेगि चलहु सुनि सचिव जोहारे। तुरत तुरग रथ नाग सँवारे।।

  1848. RCM 2.187.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अरुंधती अरु अगिनि समाऊ। रथ चढ़ि चले प्रथम मुनिराऊ।।

    अर्थ (Hindi)

    अरुंधती अरु अगिनि समाऊ। रथ चढ़ि चले प्रथम मुनिराऊ।।

  1849. RCM 2.187.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बिप्र बृंद चढ़ि बाहन नाना। चले सकल तप तेज निधाना।।

    अर्थ (Hindi)

    बिप्र बृंद चढ़ि बाहन नाना। चले सकल तप तेज निधाना।।

  1850. RCM 2.187.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नगर लोग सब सजि सजि जाना। चित्रकूट कहँ कीन्ह पयाना।।

    अर्थ (Hindi)

    नगर लोग सब सजि सजि जाना। चित्रकूट कहँ कीन्ह पयाना।।

  1851. RCM 2.187.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सिबिका सुभग न जाहिं बखानी। चढ़ि चढ़ि चलत भई सब रानी।।

    अर्थ (Hindi)

    सिबिका सुभग न जाहिं बखानी। चढ़ि चढ़ि चलत भई सब रानी।।

  1852. RCM 2.187.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सौंपि नगर सुचि सेवकनि सादर सकल चलाइ।

    अर्थ (Hindi)

    सौंपि नगर सुचि सेवकनि सादर सकल चलाइ।

  1853. RCM 2.187.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुमिरि राम सिय चरन तब चले भरत दोउ भाइ।।187।।

    अर्थ (Hindi)

    सुमिरि राम सिय चरन तब चले भरत दोउ भाइ।।187।।

  1854. RCM 2.188.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राम दरस बस सब नर नारी। जनु करि करिनि चले तकि बारी।।

    अर्थ (Hindi)

    राम दरस बस सब नर नारी। जनु करि करिनि चले तकि बारी।।

  1855. RCM 2.188.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बन सिय रामु समुझि मन माहीं। सानुज भरत पयादेहिं जाहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    बन सिय रामु समुझि मन माहीं। सानुज भरत पयादेहिं जाहीं।।

  1856. RCM 2.188.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    देखि सनेहु लोग अनुरागे। उतरि चले हय गय रथ त्यागे।।

    अर्थ (Hindi)

    देखि सनेहु लोग अनुरागे। उतरि चले हय गय रथ त्यागे।।

  1857. RCM 2.188.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जाइ समीप राखि निज डोली। राम मातु मृदु बानी बोली।।

    अर्थ (Hindi)

    जाइ समीप राखि निज डोली। राम मातु मृदु बानी बोली।।

  1858. RCM 2.188.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तात चढ़हु रथ बलि महतारी। होइहि प्रिय परिवारु दुखारी।।

    अर्थ (Hindi)

    तात चढ़हु रथ बलि महतारी। होइहि प्रिय परिवारु दुखारी।।

  1859. RCM 2.188.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तुम्हरें चलत चलिहि सबु लोगू। सकल सोक कृस नहिं मग जोगू।।

    अर्थ (Hindi)

    तुम्हरें चलत चलिहि सबु लोगू। सकल सोक कृस नहिं मग जोगू।।

  1860. RCM 2.188.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सिर धरि बचन चरन सिरु नाई। रथ चढ़ि चलत भए दोउ भाई।।

    अर्थ (Hindi)

    सिर धरि बचन चरन सिरु नाई। रथ चढ़ि चलत भए दोउ भाई।।

  1861. RCM 2.188.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तमसा प्रथम दिवस करि बासू। दूसर गोमति तीर निवासू।।

    अर्थ (Hindi)

    तमसा प्रथम दिवस करि बासू। दूसर गोमति तीर निवासू।।

  1862. RCM 2.188.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पय अहार फल असन एक निसि भोजन एक लोग।

    अर्थ (Hindi)

    पय अहार फल असन एक निसि भोजन एक लोग।

  1863. RCM 2.188.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    करत राम हित नेम ब्रत परिहरि भूषन भोग।।188।।

    अर्थ (Hindi)

    करत राम हित नेम ब्रत परिहरि भूषन भोग।।188।।

  1864. RCM 2.189.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सई तीर बसि चले बिहाने। सृंगबेरपुर सब निअराने।।

    अर्थ (Hindi)

    सई तीर बसि चले बिहाने। सृंगबेरपुर सब निअराने।।

  1865. RCM 2.189.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    समाचार सब सुने निषादा। हृदयँ बिचार करइ सबिषादा।।

    अर्थ (Hindi)

    समाचार सब सुने निषादा। हृदयँ बिचार करइ सबिषादा।।

  1866. RCM 2.189.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कारन कवन भरतु बन जाहीं। है कछु कपट भाउ मन माहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    कारन कवन भरतु बन जाहीं। है कछु कपट भाउ मन माहीं।।

  1867. RCM 2.189.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जौं पै जियँ न होति कुटिलाई। तौ कत लीन्ह संग कटकाई।।

    अर्थ (Hindi)

    जौं पै जियँ न होति कुटिलाई। तौ कत लीन्ह संग कटकाई।।

  1868. RCM 2.189.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जानहिं सानुज रामहि मारी। करउँ अकंटक राजु सुखारी।।

    अर्थ (Hindi)

    जानहिं सानुज रामहि मारी। करउँ अकंटक राजु सुखारी।।

  1869. RCM 2.189.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भरत न राजनीति उर आनी। तब कलंकु अब जीवन हानी।।

    अर्थ (Hindi)

    भरत न राजनीति उर आनी। तब कलंकु अब जीवन हानी।।

  1870. RCM 2.189.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सकल सुरासुर जुरहिं जुझारा। रामहि समर न जीतनिहारा।।

    अर्थ (Hindi)

    सकल सुरासुर जुरहिं जुझारा। रामहि समर न जीतनिहारा।।

  1871. RCM 2.189.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    का आचरजु भरतु अस करहीं। नहिं बिष बेलि अमिअ फल फरहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    का आचरजु भरतु अस करहीं। नहिं बिष बेलि अमिअ फल फरहीं।।

  1872. RCM 2.189.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अस बिचारि गुहँ ग्याति सन कहेउ सजग सब होहु।

    अर्थ (Hindi)

    अस बिचारि गुहँ ग्याति सन कहेउ सजग सब होहु।

  1873. RCM 2.189.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    हथवाँसहु बोरहु तरनि कीजिअ घाटारोहु।।189।।

    अर्थ (Hindi)

    हथवाँसहु बोरहु तरनि कीजिअ घाटारोहु।।189।।

  1874. RCM 2.190.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    होहु सँजोइल रोकहु घाटा। ठाटहु सकल मरै के ठाटा।।

    अर्थ (Hindi)

    होहु सँजोइल रोकहु घाटा। ठाटहु सकल मरै के ठाटा।।

  1875. RCM 2.190.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सनमुख लोह भरत सन लेऊँ। जिअत न सुरसरि उतरन देऊँ।।

    अर्थ (Hindi)

    सनमुख लोह भरत सन लेऊँ। जिअत न सुरसरि उतरन देऊँ।।

  1876. RCM 2.190.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    समर मरनु पुनि सुरसरि तीरा। राम काजु छनभंगु सरीरा।।

    अर्थ (Hindi)

    समर मरनु पुनि सुरसरि तीरा। राम काजु छनभंगु सरीरा।।

  1877. RCM 2.190.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भरत भाइ नृपु मै जन नीचू। बड़ें भाग असि पाइअ मीचू।।

    अर्थ (Hindi)

    भरत भाइ नृपु मै जन नीचू। बड़ें भाग असि पाइअ मीचू।।

  1878. RCM 2.190.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    स्वामि काज करिहउँ रन रारी। जस धवलिहउँ भुवन दस चारी।।

    अर्थ (Hindi)

    स्वामि काज करिहउँ रन रारी। जस धवलिहउँ भुवन दस चारी।।

  1879. RCM 2.190.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तजउँ प्रान रघुनाथ निहोरें। दुहूँ हाथ मुद मोदक मोरें।।

    अर्थ (Hindi)

    तजउँ प्रान रघुनाथ निहोरें। दुहूँ हाथ मुद मोदक मोरें।।

  1880. RCM 2.190.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    साधु समाज न जाकर लेखा। राम भगत महुँ जासु न रेखा।।

    अर्थ (Hindi)

    साधु समाज न जाकर लेखा। राम भगत महुँ जासु न रेखा।।

  1881. RCM 2.190.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जायँ जिअत जग सो महि भारू। जननी जौबन बिटप कुठारू।।

    अर्थ (Hindi)

    जायँ जिअत जग सो महि भारू। जननी जौबन बिटप कुठारू।।

  1882. RCM 2.190.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बिगत बिषाद निषादपति सबहि बढ़ाइ उछाहु।

    अर्थ (Hindi)

    बिगत बिषाद निषादपति सबहि बढ़ाइ उछाहु।

  1883. RCM 2.190.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुमिरि राम मागेउ तुरत तरकस धनुष सनाहु।।190।।

    अर्थ (Hindi)

    सुमिरि राम मागेउ तुरत तरकस धनुष सनाहु।।190।।

  1884. RCM 2.191.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बेगहु भाइहु सजहु सँजोऊ। सुनि रजाइ कदराइ न कोऊ।।

    अर्थ (Hindi)

    बेगहु भाइहु सजहु सँजोऊ। सुनि रजाइ कदराइ न कोऊ।।

  1885. RCM 2.191.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भलेहिं नाथ सब कहहिं सहरषा। एकहिं एक बढ़ावइ करषा।।

    अर्थ (Hindi)

    भलेहिं नाथ सब कहहिं सहरषा। एकहिं एक बढ़ावइ करषा।।

  1886. RCM 2.191.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    चले निषाद जोहारि जोहारी। सूर सकल रन रूचइ रारी।।

    अर्थ (Hindi)

    चले निषाद जोहारि जोहारी। सूर सकल रन रूचइ रारी।।

  1887. RCM 2.191.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुमिरि राम पद पंकज पनहीं। भाथीं बाँधि चढ़ाइन्हि धनहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    सुमिरि राम पद पंकज पनहीं। भाथीं बाँधि चढ़ाइन्हि धनहीं।।

  1888. RCM 2.191.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अँगरी पहिरि कूँड़ि सिर धरहीं। फरसा बाँस सेल सम करहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    अँगरी पहिरि कूँड़ि सिर धरहीं। फरसा बाँस सेल सम करहीं।।

  1889. RCM 2.191.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    एक कुसल अति ओड़न खाँड़े। कूदहि गगन मनहुँ छिति छाँड़े।।

    अर्थ (Hindi)

    एक कुसल अति ओड़न खाँड़े। कूदहि गगन मनहुँ छिति छाँड़े।।

  1890. RCM 2.191.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    निज निज साजु समाजु बनाई। गुह राउतहि जोहारे जाई।।

    अर्थ (Hindi)

    निज निज साजु समाजु बनाई। गुह राउतहि जोहारे जाई।।

  1891. RCM 2.191.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    देखि सुभट सब लायक जाने। लै लै नाम सकल सनमाने।।

    अर्थ (Hindi)

    देखि सुभट सब लायक जाने। लै लै नाम सकल सनमाने।।

  1892. RCM 2.191.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भाइहु लावहु धोख जनि आजु काज बड़ मोहि।

    अर्थ (Hindi)

    भाइहु लावहु धोख जनि आजु काज बड़ मोहि।

  1893. RCM 2.191.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनि सरोष बोले सुभट बीर अधीर न होहि।।191।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनि सरोष बोले सुभट बीर अधीर न होहि।।191।।

  1894. RCM 2.192.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राम प्रताप नाथ बल तोरे। करहिं कटकु बिनु भट बिनु घोरे।।

    अर्थ (Hindi)

    राम प्रताप नाथ बल तोरे। करहिं कटकु बिनु भट बिनु घोरे।।

  1895. RCM 2.192.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जीवत पाउ न पाछें धरहीं। रुंड मुंडमय मेदिनि करहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    जीवत पाउ न पाछें धरहीं। रुंड मुंडमय मेदिनि करहीं।।

  1896. RCM 2.192.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    दीख निषादनाथ भल टोलू। कहेउ बजाउ जुझाऊ ढोलू।।

    अर्थ (Hindi)

    दीख निषादनाथ भल टोलू। कहेउ बजाउ जुझाऊ ढोलू।।

  1897. RCM 2.192.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    एतना कहत छींक भइ बाँए। कहेउ सगुनिअन्ह खेत सुहाए।।

    अर्थ (Hindi)

    एतना कहत छींक भइ बाँए। कहेउ सगुनिअन्ह खेत सुहाए।।

  1898. RCM 2.192.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बूढ़ु एकु कह सगुन बिचारी। भरतहि मिलिअ न होइहि रारी।।

    अर्थ (Hindi)

    बूढ़ु एकु कह सगुन बिचारी। भरतहि मिलिअ न होइहि रारी।।

  1899. RCM 2.192.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    रामहि भरतु मनावन जाहीं। सगुन कहइ अस बिग्रहु नाहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    रामहि भरतु मनावन जाहीं। सगुन कहइ अस बिग्रहु नाहीं।।

  1900. RCM 2.192.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनि गुह कहइ नीक कह बूढ़ा। सहसा करि पछिताहिं बिमूढ़ा।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनि गुह कहइ नीक कह बूढ़ा। सहसा करि पछिताहिं बिमूढ़ा।।

  1901. RCM 2.192.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भरत सुभाउ सीलु बिनु बूझें। बड़ि हित हानि जानि बिनु जूझें।।

    अर्थ (Hindi)

    भरत सुभाउ सीलु बिनु बूझें। बड़ि हित हानि जानि बिनु जूझें।।

  1902. RCM 2.192.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    गहहु घाट भट समिटि सब लेउँ मरम मिलि जाइ।

    अर्थ (Hindi)

    गहहु घाट भट समिटि सब लेउँ मरम मिलि जाइ।

  1903. RCM 2.192.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बूझि मित्र अरि मध्य गति तस तब करिहउँ आइ।।192।।

    अर्थ (Hindi)

    बूझि मित्र अरि मध्य गति तस तब करिहउँ आइ।।192।।

  1904. RCM 2.193.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    लखन सनेहु सुभायँ सुहाएँ। बैरु प्रीति नहिं दुरइँ दुराएँ।।

    अर्थ (Hindi)

    लखन सनेहु सुभायँ सुहाएँ। बैरु प्रीति नहिं दुरइँ दुराएँ।।

  1905. RCM 2.193.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अस कहि भेंट सँजोवन लागे। कंद मूल फल खग मृग मागे।।

    अर्थ (Hindi)

    अस कहि भेंट सँजोवन लागे। कंद मूल फल खग मृग मागे।।

  1906. RCM 2.193.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मीन पीन पाठीन पुराने। भरि भरि भार कहारन्ह आने।।

    अर्थ (Hindi)

    मीन पीन पाठीन पुराने। भरि भरि भार कहारन्ह आने।।

  1907. RCM 2.193.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मिलन साजु सजि मिलन सिधाए। मंगल मूल सगुन सुभ पाए।।

    अर्थ (Hindi)

    मिलन साजु सजि मिलन सिधाए। मंगल मूल सगुन सुभ पाए।।

  1908. RCM 2.193.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    देखि दूरि तें कहि निज नामू। कीन्ह मुनीसहि दंड प्रनामू।।

    अर्थ (Hindi)

    देखि दूरि तें कहि निज नामू। कीन्ह मुनीसहि दंड प्रनामू।।

  1909. RCM 2.193.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जानि रामप्रिय दीन्हि असीसा। भरतहि कहेउ बुझाइ मुनीसा।।

    अर्थ (Hindi)

    जानि रामप्रिय दीन्हि असीसा। भरतहि कहेउ बुझाइ मुनीसा।।

  1910. RCM 2.193.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राम सखा सुनि संदनु त्यागा। चले उतरि उमगत अनुरागा।।

    अर्थ (Hindi)

    राम सखा सुनि संदनु त्यागा। चले उतरि उमगत अनुरागा।।

  1911. RCM 2.193.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    गाउँ जाति गुहँ नाउँ सुनाई। कीन्ह जोहारु माथ महि लाई।।

    अर्थ (Hindi)

    गाउँ जाति गुहँ नाउँ सुनाई। कीन्ह जोहारु माथ महि लाई।।

  1912. RCM 2.193.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    करत दंडवत देखि तेहि भरत लीन्ह उर लाइ।

    अर्थ (Hindi)

    करत दंडवत देखि तेहि भरत लीन्ह उर लाइ।

  1913. RCM 2.193.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मनहुँ लखन सन भेंट भइ प्रेम न हृदयँ समाइ।।193।।

    अर्थ (Hindi)

    मनहुँ लखन सन भेंट भइ प्रेम न हृदयँ समाइ।।193।।

  1914. RCM 2.194.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भेंटत भरतु ताहि अति प्रीती। लोग सिहाहिं प्रेम कै रीती।।

    अर्थ (Hindi)

    भेंटत भरतु ताहि अति प्रीती। लोग सिहाहिं प्रेम कै रीती।।

  1915. RCM 2.194.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    धन्य धन्य धुनि मंगल मूला। सुर सराहि तेहि बरिसहिं फूला।।

    अर्थ (Hindi)

    धन्य धन्य धुनि मंगल मूला। सुर सराहि तेहि बरिसहिं फूला।।

  1916. RCM 2.194.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    लोक बेद सब भाँतिहिं नीचा। जासु छाँह छुइ लेइअ सींचा।।

    अर्थ (Hindi)

    लोक बेद सब भाँतिहिं नीचा। जासु छाँह छुइ लेइअ सींचा।।

  1917. RCM 2.194.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तेहि भरि अंक राम लघु भ्राता। मिलत पुलक परिपूरित गाता।।

    अर्थ (Hindi)

    तेहि भरि अंक राम लघु भ्राता। मिलत पुलक परिपूरित गाता।।

  1918. RCM 2.194.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राम राम कहि जे जमुहाहीं। तिन्हहि न पाप पुंज समुहाहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    राम राम कहि जे जमुहाहीं। तिन्हहि न पाप पुंज समुहाहीं।।

  1919. RCM 2.194.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    यह तौ राम लाइ उर लीन्हा। कुल समेत जगु पावन कीन्हा।।

    अर्थ (Hindi)

    यह तौ राम लाइ उर लीन्हा। कुल समेत जगु पावन कीन्हा।।

  1920. RCM 2.194.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    करमनास जलु सुरसरि परई। तेहि को कहहु सीस नहिं धरई।।

    अर्थ (Hindi)

    करमनास जलु सुरसरि परई। तेहि को कहहु सीस नहिं धरई।।

  1921. RCM 2.194.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    उलटा नामु जपत जगु जाना। बालमीकि भए ब्रह्म समाना।।

    अर्थ (Hindi)

    उलटा नामु जपत जगु जाना। बालमीकि भए ब्रह्म समाना।।

  1922. RCM 2.194.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    स्वपच सबर खस जमन जड़ पावँर कोल किरात।

    अर्थ (Hindi)

    स्वपच सबर खस जमन जड़ पावँर कोल किरात।

  1923. RCM 2.194.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    रामु कहत पावन परम होत भुवन बिख्यात।।194।।

    अर्थ (Hindi)

    रामु कहत पावन परम होत भुवन बिख्यात।।194।।

  1924. RCM 2.195.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नहिं अचिरजु जुग जुग चलि आई। केहि न दीन्हि रघुबीर बड़ाई।।

    अर्थ (Hindi)

    नहिं अचिरजु जुग जुग चलि आई। केहि न दीन्हि रघुबीर बड़ाई।।

  1925. RCM 2.195.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राम नाम महिमा सुर कहहीं। सुनि सुनि अवधलोग सुखु लहहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    राम नाम महिमा सुर कहहीं। सुनि सुनि अवधलोग सुखु लहहीं।।

  1926. RCM 2.195.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    रामसखहि मिलि भरत सप्रेमा। पूँछी कुसल सुमंगल खेमा।।

    अर्थ (Hindi)

    रामसखहि मिलि भरत सप्रेमा। पूँछी कुसल सुमंगल खेमा।।

  1927. RCM 2.195.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    देखि भरत कर सील सनेहू। भा निषाद तेहि समय बिदेहू।।

    अर्थ (Hindi)

    देखि भरत कर सील सनेहू। भा निषाद तेहि समय बिदेहू।।

  1928. RCM 2.195.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सकुच सनेहु मोदु मन बाढ़ा। भरतहि चितवत एकटक ठाढ़ा।।

    अर्थ (Hindi)

    सकुच सनेहु मोदु मन बाढ़ा। भरतहि चितवत एकटक ठाढ़ा।।

  1929. RCM 2.195.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    धरि धीरजु पद बंदि बहोरी। बिनय सप्रेम करत कर जोरी।।

    अर्थ (Hindi)

    धरि धीरजु पद बंदि बहोरी। बिनय सप्रेम करत कर जोरी।।

  1930. RCM 2.195.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कुसल मूल पद पंकज पेखी। मैं तिहुँ काल कुसल निज लेखी।।

    अर्थ (Hindi)

    कुसल मूल पद पंकज पेखी। मैं तिहुँ काल कुसल निज लेखी।।

  1931. RCM 2.195.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अब प्रभु परम अनुग्रह तोरें। सहित कोटि कुल मंगल मोरें।।

    अर्थ (Hindi)

    अब प्रभु परम अनुग्रह तोरें। सहित कोटि कुल मंगल मोरें।।

  1932. RCM 2.195.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    समुझि मोरि करतूति कुलु प्रभु महिमा जियँ जोइ।

    अर्थ (Hindi)

    समुझि मोरि करतूति कुलु प्रभु महिमा जियँ जोइ।

  1933. RCM 2.195.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जो न भजइ रघुबीर पद जग बिधि बंचित सोइ।।195।।

    अर्थ (Hindi)

    जो न भजइ रघुबीर पद जग बिधि बंचित सोइ।।195।।

  1934. RCM 2.196.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कपटी कायर कुमति कुजाती। लोक बेद बाहेर सब भाँती।।

    अर्थ (Hindi)

    कपटी कायर कुमति कुजाती। लोक बेद बाहेर सब भाँती।।

  1935. RCM 2.196.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राम कीन्ह आपन जबही तें। भयउँ भुवन भूषन तबही तें।।

    अर्थ (Hindi)

    राम कीन्ह आपन जबही तें। भयउँ भुवन भूषन तबही तें।।

  1936. RCM 2.196.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    देखि प्रीति सुनि बिनय सुहाई। मिलेउ बहोरि भरत लघु भाई।।

    अर्थ (Hindi)

    देखि प्रीति सुनि बिनय सुहाई। मिलेउ बहोरि भरत लघु भाई।।

  1937. RCM 2.196.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कहि निषाद निज नाम सुबानीं। सादर सकल जोहारीं रानीं।।

    अर्थ (Hindi)

    कहि निषाद निज नाम सुबानीं। सादर सकल जोहारीं रानीं।।

  1938. RCM 2.196.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जानि लखन सम देहिं असीसा। जिअहु सुखी सय लाख बरीसा।।

    अर्थ (Hindi)

    जानि लखन सम देहिं असीसा। जिअहु सुखी सय लाख बरीसा।।

  1939. RCM 2.196.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    निरखि निषादु नगर नर नारी। भए सुखी जनु लखनु निहारी।।

    अर्थ (Hindi)

    निरखि निषादु नगर नर नारी। भए सुखी जनु लखनु निहारी।।

  1940. RCM 2.196.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कहहिं लहेउ एहिं जीवन लाहू। भेंटेउ रामभद्र भरि बाहू।।

    अर्थ (Hindi)

    कहहिं लहेउ एहिं जीवन लाहू। भेंटेउ रामभद्र भरि बाहू।।

  1941. RCM 2.196.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनि निषादु निज भाग बड़ाई। प्रमुदित मन लइ चलेउ लेवाई।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनि निषादु निज भाग बड़ाई। प्रमुदित मन लइ चलेउ लेवाई।।

  1942. RCM 2.196.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सनकारे सेवक सकल चले स्वामि रुख पाइ।

    अर्थ (Hindi)

    सनकारे सेवक सकल चले स्वामि रुख पाइ।

  1943. RCM 2.196.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    घर तरु तर सर बाग बन बास बनाएन्हि जाइ।।196।।

    अर्थ (Hindi)

    घर तरु तर सर बाग बन बास बनाएन्हि जाइ।।196।।

  1944. RCM 2.197.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सृंगबेरपुर भरत दीख जब। भे सनेहँ सब अंग सिथिल तब।।

    अर्थ (Hindi)

    सृंगबेरपुर भरत दीख जब। भे सनेहँ सब अंग सिथिल तब।।

  1945. RCM 2.197.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सोहत दिएँ निषादहि लागू। जनु तनु धरें बिनय अनुरागू।।

    अर्थ (Hindi)

    सोहत दिएँ निषादहि लागू। जनु तनु धरें बिनय अनुरागू।।

  1946. RCM 2.197.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    एहि बिधि भरत सेनु सबु संगा। दीखि जाइ जग पावनि गंगा।।

    अर्थ (Hindi)

    एहि बिधि भरत सेनु सबु संगा। दीखि जाइ जग पावनि गंगा।।

  1947. RCM 2.197.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    रामघाट कहँ कीन्ह प्रनामू। भा मनु मगनु मिले जनु रामू।।

    अर्थ (Hindi)

    रामघाट कहँ कीन्ह प्रनामू। भा मनु मगनु मिले जनु रामू।।

  1948. RCM 2.197.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    करहिं प्रनाम नगर नर नारी। मुदित ब्रह्ममय बारि निहारी।।

    अर्थ (Hindi)

    करहिं प्रनाम नगर नर नारी। मुदित ब्रह्ममय बारि निहारी।।

  1949. RCM 2.197.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    करि मज्जनु मागहिं कर जोरी। रामचंद्र पद प्रीति न थोरी।।

    अर्थ (Hindi)

    करि मज्जनु मागहिं कर जोरी। रामचंद्र पद प्रीति न थोरी।।

  1950. RCM 2.197.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भरत कहेउ सुरसरि तव रेनू। सकल सुखद सेवक सुरधेनू।।

    अर्थ (Hindi)

    भरत कहेउ सुरसरि तव रेनू। सकल सुखद सेवक सुरधेनू।।

  1951. RCM 2.197.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जोरि पानि बर मागउँ एहू। सीय राम पद सहज सनेहू।।

    अर्थ (Hindi)

    जोरि पानि बर मागउँ एहू। सीय राम पद सहज सनेहू।।

  1952. RCM 2.197.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    एहि बिधि मज्जनु भरतु करि गुर अनुसासन पाइ।

    अर्थ (Hindi)

    एहि बिधि मज्जनु भरतु करि गुर अनुसासन पाइ।

  1953. RCM 2.197.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मातु नहानीं जानि सब डेरा चले लवाइ।।197।।

    अर्थ (Hindi)

    मातु नहानीं जानि सब डेरा चले लवाइ।।197।।

  1954. RCM 2.198.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जहँ तहँ लोगन्ह डेरा कीन्हा। भरत सोधु सबही कर लीन्हा।।

    अर्थ (Hindi)

    जहँ तहँ लोगन्ह डेरा कीन्हा। भरत सोधु सबही कर लीन्हा।।

  1955. RCM 2.198.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुर सेवा करि आयसु पाई। राम मातु पहिं गे दोउ भाई।।

    अर्थ (Hindi)

    सुर सेवा करि आयसु पाई। राम मातु पहिं गे दोउ भाई।।

  1956. RCM 2.198.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    चरन चाँपि कहि कहि मृदु बानी। जननीं सकल भरत सनमानी।।

    अर्थ (Hindi)

    चरन चाँपि कहि कहि मृदु बानी। जननीं सकल भरत सनमानी।।

  1957. RCM 2.198.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भाइहि सौंपि मातु सेवकाई। आपु निषादहि लीन्ह बोलाई।।

    अर्थ (Hindi)

    भाइहि सौंपि मातु सेवकाई। आपु निषादहि लीन्ह बोलाई।।

  1958. RCM 2.198.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    चले सखा कर सों कर जोरें। सिथिल सरीर सनेह न थोरें।।

    अर्थ (Hindi)

    चले सखा कर सों कर जोरें। सिथिल सरीर सनेह न थोरें।।

  1959. RCM 2.198.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पूँछत सखहि सो ठाउँ देखाऊ। नेकु नयन मन जरनि जुड़ाऊ।।

    अर्थ (Hindi)

    पूँछत सखहि सो ठाउँ देखाऊ। नेकु नयन मन जरनि जुड़ाऊ।।

  1960. RCM 2.198.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जहँ सिय रामु लखनु निसि सोए। कहत भरे जल लोचन कोए।।

    अर्थ (Hindi)

    जहँ सिय रामु लखनु निसि सोए। कहत भरे जल लोचन कोए।।

  1961. RCM 2.198.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भरत बचन सुनि भयउ बिषादू। तुरत तहाँ लइ गयउ निषादू।।

    अर्थ (Hindi)

    भरत बचन सुनि भयउ बिषादू। तुरत तहाँ लइ गयउ निषादू।।

  1962. RCM 2.198.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जहँ सिंसुपा पुनीत तर रघुबर किय बिश्रामु।

    अर्थ (Hindi)

    जहँ सिंसुपा पुनीत तर रघुबर किय बिश्रामु।

  1963. RCM 2.198.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अति सनेहँ सादर भरत कीन्हेउ दंड प्रनामु।।198।।

    अर्थ (Hindi)

    अति सनेहँ सादर भरत कीन्हेउ दंड प्रनामु।।198।।

  1964. RCM 2.199.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कुस साँथरीनिहारि सुहाई। कीन्ह प्रनामु प्रदच्छिन जाई।।

    अर्थ (Hindi)

    कुस साँथरीनिहारि सुहाई। कीन्ह प्रनामु प्रदच्छिन जाई।।

  1965. RCM 2.199.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    चरन रेख रज आँखिन्ह लाई। बनइ न कहत प्रीति अधिकाई।।

    अर्थ (Hindi)

    चरन रेख रज आँखिन्ह लाई। बनइ न कहत प्रीति अधिकाई।।

  1966. RCM 2.199.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कनक बिंदु दुइ चारिक देखे। राखे सीस सीय सम लेखे।।

    अर्थ (Hindi)

    कनक बिंदु दुइ चारिक देखे। राखे सीस सीय सम लेखे।।

  1967. RCM 2.199.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सजल बिलोचन हृदयँ गलानी। कहत सखा सन बचन सुबानी।।

    अर्थ (Hindi)

    सजल बिलोचन हृदयँ गलानी। कहत सखा सन बचन सुबानी।।

  1968. RCM 2.199.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    श्रीहत सीय बिरहँ दुतिहीना। जथा अवध नर नारि बिलीना।।

    अर्थ (Hindi)

    श्रीहत सीय बिरहँ दुतिहीना। जथा अवध नर नारि बिलीना।।

  1969. RCM 2.199.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पिता जनक देउँ पटतर केही। करतल भोगु जोगु जग जेही।।

    अर्थ (Hindi)

    पिता जनक देउँ पटतर केही। करतल भोगु जोगु जग जेही।।

  1970. RCM 2.199.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    ससुर भानुकुल भानु भुआलू। जेहि सिहात अमरावतिपालू।।

    अर्थ (Hindi)

    ससुर भानुकुल भानु भुआलू। जेहि सिहात अमरावतिपालू।।

  1971. RCM 2.199.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    प्राननाथु रघुनाथ गोसाई। जो बड़ होत सो राम बड़ाई।।

    अर्थ (Hindi)

    प्राननाथु रघुनाथ गोसाई। जो बड़ होत सो राम बड़ाई।।

  1972. RCM 2.199.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पति देवता सुतीय मनि सीय साँथरी देखि।

    अर्थ (Hindi)

    पति देवता सुतीय मनि सीय साँथरी देखि।

  1973. RCM 2.199.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बिहरत ह्रदउ न हहरि हर पबि तें कठिन बिसेषि।।199।।

    अर्थ (Hindi)

    बिहरत ह्रदउ न हहरि हर पबि तें कठिन बिसेषि।।199।।

  1974. RCM 2.200.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    लालन जोगु लखन लघु लोने। भे न भाइ अस अहहिं न होने।।

    अर्थ (Hindi)

    लालन जोगु लखन लघु लोने। भे न भाइ अस अहहिं न होने।।

  1975. RCM 2.200.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पुरजन प्रिय पितु मातु दुलारे। सिय रघुबरहि प्रानपिआरे।।

    अर्थ (Hindi)

    पुरजन प्रिय पितु मातु दुलारे। सिय रघुबरहि प्रानपिआरे।।

  1976. RCM 2.200.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मृदु मूरति सुकुमार सुभाऊ। तात बाउ तन लाग न काऊ।।

    अर्थ (Hindi)

    मृदु मूरति सुकुमार सुभाऊ। तात बाउ तन लाग न काऊ।।

  1977. RCM 2.200.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    ते बन सहहिं बिपति सब भाँती। निदरे कोटि कुलिस एहिं छाती।।

    अर्थ (Hindi)

    ते बन सहहिं बिपति सब भाँती। निदरे कोटि कुलिस एहिं छाती।।

  1978. RCM 2.200.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राम जनमि जगु कीन्ह उजागर। रूप सील सुख सब गुन सागर।।

    अर्थ (Hindi)

    राम जनमि जगु कीन्ह उजागर। रूप सील सुख सब गुन सागर।।

  1979. RCM 2.200.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पुरजन परिजन गुर पितु माता। राम सुभाउ सबहि सुखदाता।।

    अर्थ (Hindi)

    पुरजन परिजन गुर पितु माता। राम सुभाउ सबहि सुखदाता।।

  1980. RCM 2.200.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बैरिउ राम बड़ाई करहीं। बोलनि मिलनि बिनय मन हरहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    बैरिउ राम बड़ाई करहीं। बोलनि मिलनि बिनय मन हरहीं।।

  1981. RCM 2.200.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सारद कोटि कोटि सत सेषा। करि न सकहिं प्रभु गुन गन लेखा।।

    अर्थ (Hindi)

    सारद कोटि कोटि सत सेषा। करि न सकहिं प्रभु गुन गन लेखा।।

  1982. RCM 2.200.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुखस्वरुप रघुबंसमनि मंगल मोद निधान।

    अर्थ (Hindi)

    सुखस्वरुप रघुबंसमनि मंगल मोद निधान।

  1983. RCM 2.200.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    ते सोवत कुस डासि महि बिधि गति अति बलवान।।200।।

    अर्थ (Hindi)

    ते सोवत कुस डासि महि बिधि गति अति बलवान।।200।।

  1984. RCM 2.201.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राम सुना दुखु कान न काऊ। जीवनतरु जिमि जोगवइ राऊ।।

    अर्थ (Hindi)

    राम सुना दुखु कान न काऊ। जीवनतरु जिमि जोगवइ राऊ।।

  1985. RCM 2.201.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पलक नयन फनि मनि जेहि भाँती। जोगवहिं जननि सकल दिन राती।।

    अर्थ (Hindi)

    पलक नयन फनि मनि जेहि भाँती। जोगवहिं जननि सकल दिन राती।।

  1986. RCM 2.201.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    ते अब फिरत बिपिन पदचारी। कंद मूल फल फूल अहारी।।

    अर्थ (Hindi)

    ते अब फिरत बिपिन पदचारी। कंद मूल फल फूल अहारी।।

  1987. RCM 2.201.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    धिग कैकेई अमंगल मूला। भइसि प्रान प्रियतम प्रतिकूला।।

    अर्थ (Hindi)

    धिग कैकेई अमंगल मूला। भइसि प्रान प्रियतम प्रतिकूला।।

  1988. RCM 2.201.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मैं धिग धिग अघ उदधि अभागी। सबु उतपातु भयउ जेहि लागी।।

    अर्थ (Hindi)

    मैं धिग धिग अघ उदधि अभागी। सबु उतपातु भयउ जेहि लागी।।

  1989. RCM 2.201.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कुल कलंकु करि सृजेउ बिधाताँ। साइँदोह मोहि कीन्ह कुमाताँ।।

    अर्थ (Hindi)

    कुल कलंकु करि सृजेउ बिधाताँ। साइँदोह मोहि कीन्ह कुमाताँ।।

  1990. RCM 2.201.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनि सप्रेम समुझाव निषादू। नाथ करिअ कत बादि बिषादू।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनि सप्रेम समुझाव निषादू। नाथ करिअ कत बादि बिषादू।।

  1991. RCM 2.201.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राम तुम्हहि प्रिय तुम्ह प्रिय रामहि। यह निरजोसु दोसु बिधि बामहि।।

    अर्थ (Hindi)

    राम तुम्हहि प्रिय तुम्ह प्रिय रामहि। यह निरजोसु दोसु बिधि बामहि।।

  1992. RCM 2.202.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सखा बचन सुनि उर धरि धीरा। बास चले सुमिरत रघुबीरा।।

    अर्थ (Hindi)

    सखा बचन सुनि उर धरि धीरा। बास चले सुमिरत रघुबीरा।।

  1993. RCM 2.202.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    यह सुधि पाइ नगर नर नारी। चले बिलोकन आरत भारी।।

    अर्थ (Hindi)

    यह सुधि पाइ नगर नर नारी। चले बिलोकन आरत भारी।।

  1994. RCM 2.202.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    परदखिना करि करहिं प्रनामा। देहिं कैकइहि खोरि निकामा।।

    अर्थ (Hindi)

    परदखिना करि करहिं प्रनामा। देहिं कैकइहि खोरि निकामा।।

  1995. RCM 2.202.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भरी भरि बारि बिलोचन लेंहीं। बाम बिधाताहि दूषन देहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    भरी भरि बारि बिलोचन लेंहीं। बाम बिधाताहि दूषन देहीं।।

  1996. RCM 2.202.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    एक सराहहिं भरत सनेहू। कोउ कह नृपति निबाहेउ नेहू।।

    अर्थ (Hindi)

    एक सराहहिं भरत सनेहू। कोउ कह नृपति निबाहेउ नेहू।।

  1997. RCM 2.202.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    निंदहिं आपु सराहि निषादहि। को कहि सकइ बिमोह बिषादहि।।

    अर्थ (Hindi)

    निंदहिं आपु सराहि निषादहि। को कहि सकइ बिमोह बिषादहि।।

  1998. RCM 2.202.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    एहि बिधि राति लोगु सबु जागा। भा भिनुसार गुदारा लागा।।

    अर्थ (Hindi)

    एहि बिधि राति लोगु सबु जागा। भा भिनुसार गुदारा लागा।।

  1999. RCM 2.202.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    गुरहि सुनावँ चढ़ाइ सुहाईं। नईं नाव सब मातु चढ़ाईं।।

    अर्थ (Hindi)

    गुरहि सुनावँ चढ़ाइ सुहाईं। नईं नाव सब मातु चढ़ाईं।।

  2000. RCM 2.202.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    दंड चारि महँ भा सबु पारा। उतरि भरत तब सबहि सँभारा।।

    अर्थ (Hindi)

    दंड चारि महँ भा सबु पारा। उतरि भरत तब सबहि सँभारा।।

  2001. RCM 2.202.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    प्रातक्रिया करि मातु पद बंदि गुरहि सिरु नाइ।

    अर्थ (Hindi)

    प्रातक्रिया करि मातु पद बंदि गुरहि सिरु नाइ।

  2002. RCM 2.202.11
    📖 Open verse-by-verse reader#

    आगें किए निषाद गन दीन्हेउ कटकु चलाइ।।202।।

    अर्थ (Hindi)

    आगें किए निषाद गन दीन्हेउ कटकु चलाइ।।202।।

  2003. RCM 2.203.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कियउ निषादनाथु अगुआईं। मातु पालकीं सकल चलाईं।।

    अर्थ (Hindi)

    कियउ निषादनाथु अगुआईं। मातु पालकीं सकल चलाईं।।

  2004. RCM 2.203.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    साथ बोलाइ भाइ लघु दीन्हा। बिप्रन्ह सहित गवनु गुर कीन्हा।।

    अर्थ (Hindi)

    साथ बोलाइ भाइ लघु दीन्हा। बिप्रन्ह सहित गवनु गुर कीन्हा।।

  2005. RCM 2.203.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    आपु सुरसरिहि कीन्ह प्रनामू। सुमिरे लखन सहित सिय रामू।।

    अर्थ (Hindi)

    आपु सुरसरिहि कीन्ह प्रनामू। सुमिरे लखन सहित सिय रामू।।

  2006. RCM 2.203.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    गवने भरत पयोदेहिं पाए। कोतल संग जाहिं डोरिआए।।

    अर्थ (Hindi)

    गवने भरत पयोदेहिं पाए। कोतल संग जाहिं डोरिआए।।

  2007. RCM 2.203.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कहहिं सुसेवक बारहिं बारा। होइअ नाथ अस्व असवारा।।

    अर्थ (Hindi)

    कहहिं सुसेवक बारहिं बारा। होइअ नाथ अस्व असवारा।।

  2008. RCM 2.203.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    रामु पयोदेहि पायँ सिधाए। हम कहँ रथ गज बाजि बनाए।।

    अर्थ (Hindi)

    रामु पयोदेहि पायँ सिधाए। हम कहँ रथ गज बाजि बनाए।।

  2009. RCM 2.203.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सिर भर जाउँ उचित अस मोरा। सब तें सेवक धरमु कठोरा।।

    अर्थ (Hindi)

    सिर भर जाउँ उचित अस मोरा। सब तें सेवक धरमु कठोरा।।

  2010. RCM 2.203.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    देखि भरत गति सुनि मृदु बानी। सब सेवक गन गरहिं गलानी।।

    अर्थ (Hindi)

    देखि भरत गति सुनि मृदु बानी। सब सेवक गन गरहिं गलानी।।

  2011. RCM 2.203.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भरत तीसरे पहर कहँ कीन्ह प्रबेसु प्रयाग।

    अर्थ (Hindi)

    भरत तीसरे पहर कहँ कीन्ह प्रबेसु प्रयाग।

  2012. RCM 2.203.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कहत राम सिय राम सिय उमगि उमगि अनुराग।।203।।

    अर्थ (Hindi)

    कहत राम सिय राम सिय उमगि उमगि अनुराग।।203।।

  2013. RCM 2.204.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    झलका झलकत पायन्ह कैंसें। पंकज कोस ओस कन जैसें।।

    अर्थ (Hindi)

    झलका झलकत पायन्ह कैंसें। पंकज कोस ओस कन जैसें।।

  2014. RCM 2.204.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भरत पयादेहिं आए आजू। भयउ दुखित सुनि सकल समाजू।।

    अर्थ (Hindi)

    भरत पयादेहिं आए आजू। भयउ दुखित सुनि सकल समाजू।।

  2015. RCM 2.204.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    खबरि लीन्ह सब लोग नहाए। कीन्ह प्रनामु त्रिबेनिहिं आए।।

    अर्थ (Hindi)

    खबरि लीन्ह सब लोग नहाए। कीन्ह प्रनामु त्रिबेनिहिं आए।।

  2016. RCM 2.204.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सबिधि सितासित नीर नहाने। दिए दान महिसुर सनमाने।।

    अर्थ (Hindi)

    सबिधि सितासित नीर नहाने। दिए दान महिसुर सनमाने।।

  2017. RCM 2.204.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    देखत स्यामल धवल हलोरे। पुलकि सरीर भरत कर जोरे।।

    अर्थ (Hindi)

    देखत स्यामल धवल हलोरे। पुलकि सरीर भरत कर जोरे।।

  2018. RCM 2.204.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सकल काम प्रद तीरथराऊ। बेद बिदित जग प्रगट प्रभाऊ।।

    अर्थ (Hindi)

    सकल काम प्रद तीरथराऊ। बेद बिदित जग प्रगट प्रभाऊ।।

  2019. RCM 2.204.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मागउँ भीख त्यागि निज धरमू। आरत काह न करइ कुकरमू।।

    अर्थ (Hindi)

    मागउँ भीख त्यागि निज धरमू। आरत काह न करइ कुकरमू।।

  2020. RCM 2.204.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अस जियँ जानि सुजान सुदानी। सफल करहिं जग जाचक बानी।।

    अर्थ (Hindi)

    अस जियँ जानि सुजान सुदानी। सफल करहिं जग जाचक बानी।।

  2021. RCM 2.204.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अरथ न धरम न काम रुचि गति न चहउँ निरबान।

    अर्थ (Hindi)

    अरथ न धरम न काम रुचि गति न चहउँ निरबान।

  2022. RCM 2.204.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जनम जनम रति राम पद यह बरदानु न आन।।204।।

    अर्थ (Hindi)

    जनम जनम रति राम पद यह बरदानु न आन।।204।।

  2023. RCM 2.205.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जानहुँ रामु कुटिल करि मोही। लोग कहउ गुर साहिब द्रोही।।

    अर्थ (Hindi)

    जानहुँ रामु कुटिल करि मोही। लोग कहउ गुर साहिब द्रोही।।

  2024. RCM 2.205.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सीता राम चरन रति मोरें। अनुदिन बढ़उ अनुग्रह तोरें।।

    अर्थ (Hindi)

    सीता राम चरन रति मोरें। अनुदिन बढ़उ अनुग्रह तोरें।।

  2025. RCM 2.205.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जलदु जनम भरि सुरति बिसारउ। जाचत जलु पबि पाहन डारउ।।

    अर्थ (Hindi)

    जलदु जनम भरि सुरति बिसारउ। जाचत जलु पबि पाहन डारउ।।

  2026. RCM 2.205.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    चातकु रटनि घटें घटि जाई। बढ़े प्रेमु सब भाँति भलाई।।

    अर्थ (Hindi)

    चातकु रटनि घटें घटि जाई। बढ़े प्रेमु सब भाँति भलाई।।

  2027. RCM 2.205.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कनकहिं बान चढ़इ जिमि दाहें। तिमि प्रियतम पद नेम निबाहें।।

    अर्थ (Hindi)

    कनकहिं बान चढ़इ जिमि दाहें। तिमि प्रियतम पद नेम निबाहें।।

  2028. RCM 2.205.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भरत बचन सुनि माझ त्रिबेनी। भइ मृदु बानि सुमंगल देनी।।

    अर्थ (Hindi)

    भरत बचन सुनि माझ त्रिबेनी। भइ मृदु बानि सुमंगल देनी।।

  2029. RCM 2.205.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तात भरत तुम्ह सब बिधि साधू। राम चरन अनुराग अगाधू।।

    अर्थ (Hindi)

    तात भरत तुम्ह सब बिधि साधू। राम चरन अनुराग अगाधू।।

  2030. RCM 2.205.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बाद गलानि करहु मन माहीं। तुम्ह सम रामहि कोउ प्रिय नाहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    बाद गलानि करहु मन माहीं। तुम्ह सम रामहि कोउ प्रिय नाहीं।।

  2031. RCM 2.205.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तनु पुलकेउ हियँ हरषु सुनि बेनि बचन अनुकूल।

    अर्थ (Hindi)

    तनु पुलकेउ हियँ हरषु सुनि बेनि बचन अनुकूल।

  2032. RCM 2.205.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भरत धन्य कहि धन्य सुर हरषित बरषहिं फूल।।205।।

    अर्थ (Hindi)

    भरत धन्य कहि धन्य सुर हरषित बरषहिं फूल।।205।।

  2033. RCM 2.206.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    प्रमुदित तीरथराज निवासी। बैखानस बटु गृही उदासी।।

    अर्थ (Hindi)

    प्रमुदित तीरथराज निवासी। बैखानस बटु गृही उदासी।।

  2034. RCM 2.206.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कहहिं परसपर मिलि दस पाँचा। भरत सनेह सीलु सुचि साँचा।।

    अर्थ (Hindi)

    कहहिं परसपर मिलि दस पाँचा। भरत सनेह सीलु सुचि साँचा।।

  2035. RCM 2.206.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनत राम गुन ग्राम सुहाए। भरद्वाज मुनिबर पहिं आए।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनत राम गुन ग्राम सुहाए। भरद्वाज मुनिबर पहिं आए।।

  2036. RCM 2.206.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    दंड प्रनामु करत मुनि देखे। मूरतिमंत भाग्य निज लेखे।।

    अर्थ (Hindi)

    दंड प्रनामु करत मुनि देखे। मूरतिमंत भाग्य निज लेखे।।

  2037. RCM 2.206.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    धाइ उठाइ लाइ उर लीन्हे। दीन्हि असीस कृतारथ कीन्हे।।

    अर्थ (Hindi)

    धाइ उठाइ लाइ उर लीन्हे। दीन्हि असीस कृतारथ कीन्हे।।

  2038. RCM 2.206.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    आसनु दीन्ह नाइ सिरु बैठे। चहत सकुच गृहँ जनु भजि पैठे।।

    अर्थ (Hindi)

    आसनु दीन्ह नाइ सिरु बैठे। चहत सकुच गृहँ जनु भजि पैठे।।

  2039. RCM 2.206.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मुनि पूँछब कछु यह बड़ सोचू। बोले रिषि लखि सीलु सँकोचू।।

    अर्थ (Hindi)

    मुनि पूँछब कछु यह बड़ सोचू। बोले रिषि लखि सीलु सँकोचू।।

  2040. RCM 2.206.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनहु भरत हम सब सुधि पाई। बिधि करतब पर किछु न बसाई।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनहु भरत हम सब सुधि पाई। बिधि करतब पर किछु न बसाई।।

  2041. RCM 2.206.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तुम्ह गलानि जियँ जनि करहु समुझी मातु करतूति।

    अर्थ (Hindi)

    तुम्ह गलानि जियँ जनि करहु समुझी मातु करतूति।

  2042. RCM 2.206.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तात कैकइहि दोसु नहिं गई गिरा मति धूति।।206।।

    अर्थ (Hindi)

    तात कैकइहि दोसु नहिं गई गिरा मति धूति।।206।।

  2043. RCM 2.207.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    यहउ कहत भल कहिहि न कोऊ। लोकु बेद बुध संमत दोऊ।।

    अर्थ (Hindi)

    यहउ कहत भल कहिहि न कोऊ। लोकु बेद बुध संमत दोऊ।।

  2044. RCM 2.207.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तात तुम्हार बिमल जसु गाई। पाइहि लोकउ बेदु बड़ाई।।

    अर्थ (Hindi)

    तात तुम्हार बिमल जसु गाई। पाइहि लोकउ बेदु बड़ाई।।

  2045. RCM 2.207.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    लोक बेद संमत सबु कहई। जेहि पितु देइ राजु सो लहई।।

    अर्थ (Hindi)

    लोक बेद संमत सबु कहई। जेहि पितु देइ राजु सो लहई।।

  2046. RCM 2.207.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राउ सत्यब्रत तुम्हहि बोलाई। देत राजु सुखु धरमु बड़ाई।।

    अर्थ (Hindi)

    राउ सत्यब्रत तुम्हहि बोलाई। देत राजु सुखु धरमु बड़ाई।।

  2047. RCM 2.207.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राम गवनु बन अनरथ मूला। जो सुनि सकल बिस्व भइ सूला।।

    अर्थ (Hindi)

    राम गवनु बन अनरथ मूला। जो सुनि सकल बिस्व भइ सूला।।

  2048. RCM 2.207.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सो भावी बस रानि अयानी। करि कुचालि अंतहुँ पछितानी।।

    अर्थ (Hindi)

    सो भावी बस रानि अयानी। करि कुचालि अंतहुँ पछितानी।।

  2049. RCM 2.207.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तहँउँ तुम्हार अलप अपराधू। कहै सो अधम अयान असाधू।।

    अर्थ (Hindi)

    तहँउँ तुम्हार अलप अपराधू। कहै सो अधम अयान असाधू।।

  2050. RCM 2.207.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    करतेहु राजु त तुम्हहि न दोषू। रामहि होत सुनत संतोषू।।

    अर्थ (Hindi)

    करतेहु राजु त तुम्हहि न दोषू। रामहि होत सुनत संतोषू।।

  2051. RCM 2.207.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अब अति कीन्हेहु भरत भल तुम्हहि उचित मत एहु।

    अर्थ (Hindi)

    अब अति कीन्हेहु भरत भल तुम्हहि उचित मत एहु।

  2052. RCM 2.207.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सकल सुमंगल मूल जग रघुबर चरन सनेहु।।207।।

    अर्थ (Hindi)

    सकल सुमंगल मूल जग रघुबर चरन सनेहु।।207।।

  2053. RCM 2.208.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सो तुम्हार धनु जीवनु प्राना। भूरिभाग को तुम्हहि समाना।।

    अर्थ (Hindi)

    सो तुम्हार धनु जीवनु प्राना। भूरिभाग को तुम्हहि समाना।।

  2054. RCM 2.208.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    यह तम्हार आचरजु न ताता। दसरथ सुअन राम प्रिय भ्राता।।

    अर्थ (Hindi)

    यह तम्हार आचरजु न ताता। दसरथ सुअन राम प्रिय भ्राता।।

  2055. RCM 2.208.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनहु भरत रघुबर मन माहीं। पेम पात्रु तुम्ह सम कोउ नाहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनहु भरत रघुबर मन माहीं। पेम पात्रु तुम्ह सम कोउ नाहीं।।

  2056. RCM 2.208.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    लखन राम सीतहि अति प्रीती। निसि सब तुम्हहि सराहत बीती।।

    अर्थ (Hindi)

    लखन राम सीतहि अति प्रीती। निसि सब तुम्हहि सराहत बीती।।

  2057. RCM 2.208.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जाना मरमु नहात प्रयागा। मगन होहिं तुम्हरें अनुरागा।।

    अर्थ (Hindi)

    जाना मरमु नहात प्रयागा। मगन होहिं तुम्हरें अनुरागा।।

  2058. RCM 2.208.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तुम्ह पर अस सनेहु रघुबर कें। सुख जीवन जग जस जड़ नर कें।।

    अर्थ (Hindi)

    तुम्ह पर अस सनेहु रघुबर कें। सुख जीवन जग जस जड़ नर कें।।

  2059. RCM 2.208.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    यह न अधिक रघुबीर बड़ाई। प्रनत कुटुंब पाल रघुराई।।

    अर्थ (Hindi)

    यह न अधिक रघुबीर बड़ाई। प्रनत कुटुंब पाल रघुराई।।

  2060. RCM 2.208.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तुम्ह तौ भरत मोर मत एहू। धरें देह जनु राम सनेहू।।

    अर्थ (Hindi)

    तुम्ह तौ भरत मोर मत एहू। धरें देह जनु राम सनेहू।।

  2061. RCM 2.208.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तुम्ह कहँ भरत कलंक यह हम सब कहँ उपदेसु।

    अर्थ (Hindi)

    तुम्ह कहँ भरत कलंक यह हम सब कहँ उपदेसु।

  2062. RCM 2.208.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राम भगति रस सिद्धि हित भा यह समउ गनेसु।।208।।

    अर्थ (Hindi)

    राम भगति रस सिद्धि हित भा यह समउ गनेसु।।208।।

  2063. RCM 2.209.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नव बिधु बिमल तात जसु तोरा। रघुबर किंकर कुमुद चकोरा।।

    अर्थ (Hindi)

    नव बिधु बिमल तात जसु तोरा। रघुबर किंकर कुमुद चकोरा।।

  2064. RCM 2.209.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    उदित सदा अँथइहि कबहूँ ना। घटिहि न जग नभ दिन दिन दूना।।

    अर्थ (Hindi)

    उदित सदा अँथइहि कबहूँ ना। घटिहि न जग नभ दिन दिन दूना।।

  2065. RCM 2.209.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कोक तिलोक प्रीति अति करिही। प्रभु प्रताप रबि छबिहि न हरिही।।

    अर्थ (Hindi)

    कोक तिलोक प्रीति अति करिही। प्रभु प्रताप रबि छबिहि न हरिही।।

  2066. RCM 2.209.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    निसि दिन सुखद सदा सब काहू। ग्रसिहि न कैकइ करतबु राहू।।

    अर्थ (Hindi)

    निसि दिन सुखद सदा सब काहू। ग्रसिहि न कैकइ करतबु राहू।।

  2067. RCM 2.209.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पूरन राम सुपेम पियूषा। गुर अवमान दोष नहिं दूषा।।

    अर्थ (Hindi)

    पूरन राम सुपेम पियूषा। गुर अवमान दोष नहिं दूषा।।

  2068. RCM 2.209.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राम भगत अब अमिअँ अघाहूँ। कीन्हेहु सुलभ सुधा बसुधाहूँ।।

    अर्थ (Hindi)

    राम भगत अब अमिअँ अघाहूँ। कीन्हेहु सुलभ सुधा बसुधाहूँ।।

  2069. RCM 2.209.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भूप भगीरथ सुरसरि आनी। सुमिरत सकल सुंमगल खानी।।

    अर्थ (Hindi)

    भूप भगीरथ सुरसरि आनी। सुमिरत सकल सुंमगल खानी।।

  2070. RCM 2.209.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    दसरथ गुन गन बरनि न जाहीं। अधिकु कहा जेहि सम जग नाहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    दसरथ गुन गन बरनि न जाहीं। अधिकु कहा जेहि सम जग नाहीं।।

  2071. RCM 2.209.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जासु सनेह सकोच बस राम प्रगट भए आइ।।

    अर्थ (Hindi)

    जासु सनेह सकोच बस राम प्रगट भए आइ।।

  2072. RCM 2.209.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जे हर हिय नयननि कबहुँ निरखे नहीं अघाइ।।209।।

    अर्थ (Hindi)

    जे हर हिय नयननि कबहुँ निरखे नहीं अघाइ।।209।।

  2073. RCM 2.210.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कीरति बिधु तुम्ह कीन्ह अनूपा। जहँ बस राम पेम मृगरूपा।।

    अर्थ (Hindi)

    कीरति बिधु तुम्ह कीन्ह अनूपा। जहँ बस राम पेम मृगरूपा।।

  2074. RCM 2.210.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तात गलानि करहु जियँ जाएँ। डरहु दरिद्रहि पारसु पाएँ।।।।

    अर्थ (Hindi)

    तात गलानि करहु जियँ जाएँ। डरहु दरिद्रहि पारसु पाएँ।।।।

  2075. RCM 2.210.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनहु भरत हम झूठ न कहहीं। उदासीन तापस बन रहहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनहु भरत हम झूठ न कहहीं। उदासीन तापस बन रहहीं।।

  2076. RCM 2.210.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सब साधन कर सुफल सुहावा। लखन राम सिय दरसनु पावा।।

    अर्थ (Hindi)

    सब साधन कर सुफल सुहावा। लखन राम सिय दरसनु पावा।।

  2077. RCM 2.210.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तेहि फल कर फलु दरस तुम्हारा। सहित पयाग सुभाग हमारा।।

    अर्थ (Hindi)

    तेहि फल कर फलु दरस तुम्हारा। सहित पयाग सुभाग हमारा।।

  2078. RCM 2.210.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भरत धन्य तुम्ह जसु जगु जयऊ। कहि अस पेम मगन पुनि भयऊ।।

    अर्थ (Hindi)

    भरत धन्य तुम्ह जसु जगु जयऊ। कहि अस पेम मगन पुनि भयऊ।।

  2079. RCM 2.210.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनि मुनि बचन सभासद हरषे। साधु सराहि सुमन सुर बरषे।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनि मुनि बचन सभासद हरषे। साधु सराहि सुमन सुर बरषे।।

  2080. RCM 2.210.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    धन्य धन्य धुनि गगन पयागा। सुनि सुनि भरतु मगन अनुरागा।।

    अर्थ (Hindi)

    धन्य धन्य धुनि गगन पयागा। सुनि सुनि भरतु मगन अनुरागा।।

  2081. RCM 2.210.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पुलक गात हियँ रामु सिय सजल सरोरुह नैन।

    अर्थ (Hindi)

    पुलक गात हियँ रामु सिय सजल सरोरुह नैन।

  2082. RCM 2.210.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    करि प्रनामु मुनि मंडलिहि बोले गदगद बैन।।210।।

    अर्थ (Hindi)

    करि प्रनामु मुनि मंडलिहि बोले गदगद बैन।।210।।

  2083. RCM 2.211.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मुनि समाजु अरु तीरथराजू। साँचिहुँ सपथ अघाइ अकाजू।।

    अर्थ (Hindi)

    मुनि समाजु अरु तीरथराजू। साँचिहुँ सपथ अघाइ अकाजू।।

  2084. RCM 2.211.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    एहिं थल जौं किछु कहिअ बनाई। एहि सम अधिक न अघ अधमाई।।

    अर्थ (Hindi)

    एहिं थल जौं किछु कहिअ बनाई। एहि सम अधिक न अघ अधमाई।।

  2085. RCM 2.211.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तुम्ह सर्बग्य कहउँ सतिभाऊ। उर अंतरजामी रघुराऊ।।

    अर्थ (Hindi)

    तुम्ह सर्बग्य कहउँ सतिभाऊ। उर अंतरजामी रघुराऊ।।

  2086. RCM 2.211.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मोहि न मातु करतब कर सोचू। नहिं दुखु जियँ जगु जानिहि पोचू।।

    अर्थ (Hindi)

    मोहि न मातु करतब कर सोचू। नहिं दुखु जियँ जगु जानिहि पोचू।।

  2087. RCM 2.211.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नाहिन डरु बिगरिहि परलोकू। पितहु मरन कर मोहि न सोकू।।

    अर्थ (Hindi)

    नाहिन डरु बिगरिहि परलोकू। पितहु मरन कर मोहि न सोकू।।

  2088. RCM 2.211.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुकृत सुजस भरि भुअन सुहाए। लछिमन राम सरिस सुत पाए।।

    अर्थ (Hindi)

    सुकृत सुजस भरि भुअन सुहाए। लछिमन राम सरिस सुत पाए।।

  2089. RCM 2.211.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राम बिरहँ तजि तनु छनभंगू। भूप सोच कर कवन प्रसंगू।।

    अर्थ (Hindi)

    राम बिरहँ तजि तनु छनभंगू। भूप सोच कर कवन प्रसंगू।।

  2090. RCM 2.211.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राम लखन सिय बिनु पग पनहीं। करि मुनि बेष फिरहिं बन बनही।।

    अर्थ (Hindi)

    राम लखन सिय बिनु पग पनहीं। करि मुनि बेष फिरहिं बन बनही।।

  2091. RCM 2.211.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अजिन बसन फल असन महि सयन डासि कुस पात।

    अर्थ (Hindi)

    अजिन बसन फल असन महि सयन डासि कुस पात।

  2092. RCM 2.211.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बसि तरु तर नित सहत हिम आतप बरषा बात।।211।।

    अर्थ (Hindi)

    बसि तरु तर नित सहत हिम आतप बरषा बात।।211।।

  2093. RCM 2.212.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    एहि दुख दाहँ दहइ दिन छाती। भूख न बासर नीद न राती।।

    अर्थ (Hindi)

    एहि दुख दाहँ दहइ दिन छाती। भूख न बासर नीद न राती।।

  2094. RCM 2.212.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    एहि कुरोग कर औषधु नाहीं। सोधेउँ सकल बिस्व मन माहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    एहि कुरोग कर औषधु नाहीं। सोधेउँ सकल बिस्व मन माहीं।।

  2095. RCM 2.212.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मातु कुमत बढ़ई अघ मूला। तेहिं हमार हित कीन्ह बँसूला।।

    अर्थ (Hindi)

    मातु कुमत बढ़ई अघ मूला। तेहिं हमार हित कीन्ह बँसूला।।

  2096. RCM 2.212.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कलि कुकाठ कर कीन्ह कुजंत्रू। गाड़ि अवधि पढ़ि कठिन कुमंत्रु।।

    अर्थ (Hindi)

    कलि कुकाठ कर कीन्ह कुजंत्रू। गाड़ि अवधि पढ़ि कठिन कुमंत्रु।।

  2097. RCM 2.212.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मोहि लगि यहु कुठाटु तेहिं ठाटा। घालेसि सब जगु बारहबाटा।।

    अर्थ (Hindi)

    मोहि लगि यहु कुठाटु तेहिं ठाटा। घालेसि सब जगु बारहबाटा।।

  2098. RCM 2.212.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मिटइ कुजोगु राम फिरि आएँ। बसइ अवध नहिं आन उपाएँ।।

    अर्थ (Hindi)

    मिटइ कुजोगु राम फिरि आएँ। बसइ अवध नहिं आन उपाएँ।।

  2099. RCM 2.212.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भरत बचन सुनि मुनि सुखु पाई। सबहिं कीन्ह बहु भाँति बड़ाई।।

    अर्थ (Hindi)

    भरत बचन सुनि मुनि सुखु पाई। सबहिं कीन्ह बहु भाँति बड़ाई।।

  2100. RCM 2.212.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तात करहु जनि सोचु बिसेषी। सब दुखु मिटहि राम पग देखी।।

    अर्थ (Hindi)

    तात करहु जनि सोचु बिसेषी। सब दुखु मिटहि राम पग देखी।।

  2101. RCM 2.212.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    करि प्रबोध मुनिबर कहेउ अतिथि पेमप्रिय होहु।

    अर्थ (Hindi)

    करि प्रबोध मुनिबर कहेउ अतिथि पेमप्रिय होहु।

  2102. RCM 2.212.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कंद मूल फल फूल हम देहिं लेहु करि छोहु।।212।।

    अर्थ (Hindi)

    कंद मूल फल फूल हम देहिं लेहु करि छोहु।।212।।

  2103. RCM 2.213.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनि मुनि बचन भरत हिंय सोचू। भयउ कुअवसर कठिन सँकोचू।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनि मुनि बचन भरत हिंय सोचू। भयउ कुअवसर कठिन सँकोचू।।

  2104. RCM 2.213.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जानि गरुइ गुर गिरा बहोरी। चरन बंदि बोले कर जोरी।।

    अर्थ (Hindi)

    जानि गरुइ गुर गिरा बहोरी। चरन बंदि बोले कर जोरी।।

  2105. RCM 2.213.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सिर धरि आयसु करिअ तुम्हारा। परम धरम यहु नाथ हमारा।।

    अर्थ (Hindi)

    सिर धरि आयसु करिअ तुम्हारा। परम धरम यहु नाथ हमारा।।

  2106. RCM 2.213.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भरत बचन मुनिबर मन भाए। सुचि सेवक सिष निकट बोलाए।।

    अर्थ (Hindi)

    भरत बचन मुनिबर मन भाए। सुचि सेवक सिष निकट बोलाए।।

  2107. RCM 2.213.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    चाहिए कीन्ह भरत पहुनाई। कंद मूल फल आनहु जाई।।

    अर्थ (Hindi)

    चाहिए कीन्ह भरत पहुनाई। कंद मूल फल आनहु जाई।।

  2108. RCM 2.213.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भलेहीं नाथ कहि तिन्ह सिर नाए। प्रमुदित निज निज काज सिधाए।।

    अर्थ (Hindi)

    भलेहीं नाथ कहि तिन्ह सिर नाए। प्रमुदित निज निज काज सिधाए।।

  2109. RCM 2.213.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मुनिहि सोच पाहुन बड़ नेवता। तसि पूजा चाहिअ जस देवता।।

    अर्थ (Hindi)

    मुनिहि सोच पाहुन बड़ नेवता। तसि पूजा चाहिअ जस देवता।।

  2110. RCM 2.213.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनि रिधि सिधि अनिमादिक आई। आयसु होइ सो करहिं गोसाई।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनि रिधि सिधि अनिमादिक आई। आयसु होइ सो करहिं गोसाई।।

  2111. RCM 2.213.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राम बिरह ब्याकुल भरतु सानुज सहित समाज।

    अर्थ (Hindi)

    राम बिरह ब्याकुल भरतु सानुज सहित समाज।

  2112. RCM 2.213.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पहुनाई करि हरहु श्रम कहा मुदित मुनिराज।।213।।

    अर्थ (Hindi)

    पहुनाई करि हरहु श्रम कहा मुदित मुनिराज।।213।।

  2113. RCM 2.214.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    रिधि सिधि सिर धरि मुनिबर बानी। बड़भागिनि आपुहि अनुमानी।।

    अर्थ (Hindi)

    रिधि सिधि सिर धरि मुनिबर बानी। बड़भागिनि आपुहि अनुमानी।।

  2114. RCM 2.214.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कहहिं परसपर सिधि समुदाई। अतुलित अतिथि राम लघु भाई।।

    अर्थ (Hindi)

    कहहिं परसपर सिधि समुदाई। अतुलित अतिथि राम लघु भाई।।

  2115. RCM 2.214.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मुनि पद बंदि करिअ सोइ आजू। होइ सुखी सब राज समाजू।।

    अर्थ (Hindi)

    मुनि पद बंदि करिअ सोइ आजू। होइ सुखी सब राज समाजू।।

  2116. RCM 2.214.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अस कहि रचेउ रुचिर गृह नाना। जेहि बिलोकि बिलखाहिं बिमाना।।

    अर्थ (Hindi)

    अस कहि रचेउ रुचिर गृह नाना। जेहि बिलोकि बिलखाहिं बिमाना।।

  2117. RCM 2.214.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भोग बिभूति भूरि भरि राखे। देखत जिन्हहि अमर अभिलाषे।।

    अर्थ (Hindi)

    भोग बिभूति भूरि भरि राखे। देखत जिन्हहि अमर अभिलाषे।।

  2118. RCM 2.214.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    दासीं दास साजु सब लीन्हें। जोगवत रहहिं मनहि मनु दीन्हें।।

    अर्थ (Hindi)

    दासीं दास साजु सब लीन्हें। जोगवत रहहिं मनहि मनु दीन्हें।।

  2119. RCM 2.214.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सब समाजु सजि सिधि पल माहीं। जे सुख सुरपुर सपनेहुँ नाहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    सब समाजु सजि सिधि पल माहीं। जे सुख सुरपुर सपनेहुँ नाहीं।।

  2120. RCM 2.214.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    प्रथमहिं बास दिए सब केही। सुंदर सुखद जथा रुचि जेही।।

    अर्थ (Hindi)

    प्रथमहिं बास दिए सब केही। सुंदर सुखद जथा रुचि जेही।।

  2121. RCM 2.214.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बहुरि सपरिजन भरत कहुँ रिषि अस आयसु दीन्ह।

    अर्थ (Hindi)

    बहुरि सपरिजन भरत कहुँ रिषि अस आयसु दीन्ह।

  2122. RCM 2.214.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बिधि बिसमय दायकु बिभव मुनिबर तपबल कीन्ह।।214।।

    अर्थ (Hindi)

    बिधि बिसमय दायकु बिभव मुनिबर तपबल कीन्ह।।214।।

  2123. RCM 2.215.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मुनि प्रभाउ जब भरत बिलोका। सब लघु लगे लोकपति लोका।।

    अर्थ (Hindi)

    मुनि प्रभाउ जब भरत बिलोका। सब लघु लगे लोकपति लोका।।

  2124. RCM 2.215.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुख समाजु नहिं जाइ बखानी। देखत बिरति बिसारहीं ग्यानी।।

    अर्थ (Hindi)

    सुख समाजु नहिं जाइ बखानी। देखत बिरति बिसारहीं ग्यानी।।

  2125. RCM 2.215.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    आसन सयन सुबसन बिताना। बन बाटिका बिहग मृग नाना।।

    अर्थ (Hindi)

    आसन सयन सुबसन बिताना। बन बाटिका बिहग मृग नाना।।

  2126. RCM 2.215.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुरभि फूल फल अमिअ समाना। बिमल जलासय बिबिध बिधाना।

    अर्थ (Hindi)

    सुरभि फूल फल अमिअ समाना। बिमल जलासय बिबिध बिधाना।

  2127. RCM 2.215.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    असन पान सुच अमिअ अमी से। देखि लोग सकुचात जमी से।।

    अर्थ (Hindi)

    असन पान सुच अमिअ अमी से। देखि लोग सकुचात जमी से।।

  2128. RCM 2.215.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुर सुरभी सुरतरु सबही कें। लखि अभिलाषु सुरेस सची कें।।

    अर्थ (Hindi)

    सुर सुरभी सुरतरु सबही कें। लखि अभिलाषु सुरेस सची कें।।

  2129. RCM 2.215.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    रितु बसंत बह त्रिबिध बयारी। सब कहँ सुलभ पदारथ चारी।।

    अर्थ (Hindi)

    रितु बसंत बह त्रिबिध बयारी। सब कहँ सुलभ पदारथ चारी।।

  2130. RCM 2.215.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    स्त्रक चंदन बनितादिक भोगा। देखि हरष बिसमय बस लोगा।।

    अर्थ (Hindi)

    स्त्रक चंदन बनितादिक भोगा। देखि हरष बिसमय बस लोगा।।

  2131. RCM 2.215.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    संपत चकई भरतु चक मुनि आयस खेलवार।।

    अर्थ (Hindi)

    संपत चकई भरतु चक मुनि आयस खेलवार।।

  2132. RCM 2.215.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तेहि निसि आश्रम पिंजराँ राखे भा भिनुसार।।215।।

    अर्थ (Hindi)

    तेहि निसि आश्रम पिंजराँ राखे भा भिनुसार।।215।।

  2133. RCM 2.216.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कीन्ह निमज्जनु तीरथराजा। नाइ मुनिहि सिरु सहित समाजा।।

    अर्थ (Hindi)

    कीन्ह निमज्जनु तीरथराजा। नाइ मुनिहि सिरु सहित समाजा।।

  2134. RCM 2.216.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    रिषि आयसु असीस सिर राखी। करि दंडवत बिनय बहु भाषी।।

    अर्थ (Hindi)

    रिषि आयसु असीस सिर राखी। करि दंडवत बिनय बहु भाषी।।

  2135. RCM 2.216.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पथ गति कुसल साथ सब लीन्हे। चले चित्रकूटहिं चितु दीन्हें।।

    अर्थ (Hindi)

    पथ गति कुसल साथ सब लीन्हे। चले चित्रकूटहिं चितु दीन्हें।।

  2136. RCM 2.216.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    रामसखा कर दीन्हें लागू। चलत देह धरि जनु अनुरागू।।

    अर्थ (Hindi)

    रामसखा कर दीन्हें लागू। चलत देह धरि जनु अनुरागू।।

  2137. RCM 2.216.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नहिं पद त्रान सीस नहिं छाया। पेमु नेमु ब्रतु धरमु अमाया।।

    अर्थ (Hindi)

    नहिं पद त्रान सीस नहिं छाया। पेमु नेमु ब्रतु धरमु अमाया।।

  2138. RCM 2.216.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    लखन राम सिय पंथ कहानी। पूँछत सखहि कहत मृदु बानी।।

    अर्थ (Hindi)

    लखन राम सिय पंथ कहानी। पूँछत सखहि कहत मृदु बानी।।

  2139. RCM 2.216.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राम बास थल बिटप बिलोकें। उर अनुराग रहत नहिं रोकैं।।

    अर्थ (Hindi)

    राम बास थल बिटप बिलोकें। उर अनुराग रहत नहिं रोकैं।।

  2140. RCM 2.216.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    दैखि दसा सुर बरिसहिं फूला। भइ मृदु महि मगु मंगल मूला।।

    अर्थ (Hindi)

    दैखि दसा सुर बरिसहिं फूला। भइ मृदु महि मगु मंगल मूला।।

  2141. RCM 2.216.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    किएँ जाहिं छाया जलद सुखद बहइ बर बात।

    अर्थ (Hindi)

    किएँ जाहिं छाया जलद सुखद बहइ बर बात।

  2142. RCM 2.216.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तस मगु भयउ न राम कहँ जस भा भरतहि जात।।216।।

    अर्थ (Hindi)

    तस मगु भयउ न राम कहँ जस भा भरतहि जात।।216।।

  2143. RCM 2.217.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जड़ चेतन मग जीव घनेरे। जे चितए प्रभु जिन्ह प्रभु हेरे।।

    अर्थ (Hindi)

    जड़ चेतन मग जीव घनेरे। जे चितए प्रभु जिन्ह प्रभु हेरे।।

  2144. RCM 2.217.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    ते सब भए परम पद जोगू। भरत दरस मेटा भव रोगू।।

    अर्थ (Hindi)

    ते सब भए परम पद जोगू। भरत दरस मेटा भव रोगू।।

  2145. RCM 2.217.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    यह बड़ि बात भरत कइ नाहीं। सुमिरत जिनहि रामु मन माहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    यह बड़ि बात भरत कइ नाहीं। सुमिरत जिनहि रामु मन माहीं।।

  2146. RCM 2.217.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बारक राम कहत जग जेऊ। होत तरन तारन नर तेऊ।।

    अर्थ (Hindi)

    बारक राम कहत जग जेऊ। होत तरन तारन नर तेऊ।।

  2147. RCM 2.217.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भरतु राम प्रिय पुनि लघु भ्राता। कस न होइ मगु मंगलदाता।।

    अर्थ (Hindi)

    भरतु राम प्रिय पुनि लघु भ्राता। कस न होइ मगु मंगलदाता।।

  2148. RCM 2.217.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सिद्ध साधु मुनिबर अस कहहीं। भरतहि निरखि हरषु हियँ लहहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    सिद्ध साधु मुनिबर अस कहहीं। भरतहि निरखि हरषु हियँ लहहीं।।

  2149. RCM 2.217.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    देखि प्रभाउ सुरेसहि सोचू। जगु भल भलेहि पोच कहुँ पोचू।।

    अर्थ (Hindi)

    देखि प्रभाउ सुरेसहि सोचू। जगु भल भलेहि पोच कहुँ पोचू।।

  2150. RCM 2.217.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    गुर सन कहेउ करिअ प्रभु सोई। रामहि भरतहि भेंट न होई।।

    अर्थ (Hindi)

    गुर सन कहेउ करिअ प्रभु सोई। रामहि भरतहि भेंट न होई।।

  2151. RCM 2.217.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    रामु सँकोची प्रेम बस भरत सपेम पयोधि।

    अर्थ (Hindi)

    रामु सँकोची प्रेम बस भरत सपेम पयोधि।

  2152. RCM 2.217.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बनी बात बेगरन चहति करिअ जतनु छलु सोधि।।217।।

    अर्थ (Hindi)

    बनी बात बेगरन चहति करिअ जतनु छलु सोधि।।217।।

  2153. RCM 2.218.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बचन सुनत सुरगुरु मुसकाने। सहसनयन बिनु लोचन जाने।।

    अर्थ (Hindi)

    बचन सुनत सुरगुरु मुसकाने। सहसनयन बिनु लोचन जाने।।

  2154. RCM 2.218.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मायापति सेवक सन माया। करइ त उलटि परइ सुरराया।।

    अर्थ (Hindi)

    मायापति सेवक सन माया। करइ त उलटि परइ सुरराया।।

  2155. RCM 2.218.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तब किछु कीन्ह राम रुख जानी। अब कुचालि करि होइहि हानी।।

    अर्थ (Hindi)

    तब किछु कीन्ह राम रुख जानी। अब कुचालि करि होइहि हानी।।

  2156. RCM 2.218.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनु सुरेस रघुनाथ सुभाऊ। निज अपराध रिसाहिं न काऊ।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनु सुरेस रघुनाथ सुभाऊ। निज अपराध रिसाहिं न काऊ।।

  2157. RCM 2.218.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जो अपराधु भगत कर करई। राम रोष पावक सो जरई।।

    अर्थ (Hindi)

    जो अपराधु भगत कर करई। राम रोष पावक सो जरई।।

  2158. RCM 2.218.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    लोकहुँ बेद बिदित इतिहासा। यह महिमा जानहिं दुरबासा।।

    अर्थ (Hindi)

    लोकहुँ बेद बिदित इतिहासा। यह महिमा जानहिं दुरबासा।।

  2159. RCM 2.218.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भरत सरिस को राम सनेही। जगु जप राम रामु जप जेही।।

    अर्थ (Hindi)

    भरत सरिस को राम सनेही। जगु जप राम रामु जप जेही।।

  2160. RCM 2.218.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मनहुँ न आनिअ अमरपति रघुबर भगत अकाजु।

    अर्थ (Hindi)

    मनहुँ न आनिअ अमरपति रघुबर भगत अकाजु।

  2161. RCM 2.218.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अजसु लोक परलोक दुख दिन दिन सोक समाजु।।218।।

    अर्थ (Hindi)

    अजसु लोक परलोक दुख दिन दिन सोक समाजु।।218।।

  2162. RCM 2.219.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनु सुरेस उपदेसु हमारा। रामहि सेवकु परम पिआरा।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनु सुरेस उपदेसु हमारा। रामहि सेवकु परम पिआरा।।

  2163. RCM 2.219.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मानत सुखु सेवक सेवकाई। सेवक बैर बैरु अधिकाई।।

    अर्थ (Hindi)

    मानत सुखु सेवक सेवकाई। सेवक बैर बैरु अधिकाई।।

  2164. RCM 2.219.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जद्यपि सम नहिं राग न रोषू। गहहिं न पाप पूनु गुन दोषू।।

    अर्थ (Hindi)

    जद्यपि सम नहिं राग न रोषू। गहहिं न पाप पूनु गुन दोषू।।

  2165. RCM 2.219.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    करम प्रधान बिस्व करि राखा। जो जस करइ सो तस फलु चाखा।।

    अर्थ (Hindi)

    करम प्रधान बिस्व करि राखा। जो जस करइ सो तस फलु चाखा।।

  2166. RCM 2.219.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तदपि करहिं सम बिषम बिहारा। भगत अभगत हृदय अनुसारा।।

    अर्थ (Hindi)

    तदपि करहिं सम बिषम बिहारा। भगत अभगत हृदय अनुसारा।।

  2167. RCM 2.219.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अगुन अलेप अमान एकरस। रामु सगुन भए भगत पेम बस।।

    अर्थ (Hindi)

    अगुन अलेप अमान एकरस। रामु सगुन भए भगत पेम बस।।

  2168. RCM 2.219.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राम सदा सेवक रुचि राखी। बेद पुरान साधु सुर साखी।।

    अर्थ (Hindi)

    राम सदा सेवक रुचि राखी। बेद पुरान साधु सुर साखी।।

  2169. RCM 2.219.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अस जियँ जानि तजहु कुटिलाई। करहु भरत पद प्रीति सुहाई।।

    अर्थ (Hindi)

    अस जियँ जानि तजहु कुटिलाई। करहु भरत पद प्रीति सुहाई।।

  2170. RCM 2.219.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राम भगत परहित निरत पर दुख दुखी दयाल।

    अर्थ (Hindi)

    राम भगत परहित निरत पर दुख दुखी दयाल।

  2171. RCM 2.219.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भगत सिरोमनि भरत तें जनि डरपहु सुरपाल।।219।।

    अर्थ (Hindi)

    भगत सिरोमनि भरत तें जनि डरपहु सुरपाल।।219।।

  2172. RCM 2.220.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सत्यसंध प्रभु सुर हितकारी। भरत राम आयस अनुसारी।।

    अर्थ (Hindi)

    सत्यसंध प्रभु सुर हितकारी। भरत राम आयस अनुसारी।।

  2173. RCM 2.220.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    स्वारथ बिबस बिकल तुम्ह होहू। भरत दोसु नहिं राउर मोहू।।

    अर्थ (Hindi)

    स्वारथ बिबस बिकल तुम्ह होहू। भरत दोसु नहिं राउर मोहू।।

  2174. RCM 2.220.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनि सुरबर सुरगुर बर बानी। भा प्रमोदु मन मिटी गलानी।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनि सुरबर सुरगुर बर बानी। भा प्रमोदु मन मिटी गलानी।।

  2175. RCM 2.220.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बरषि प्रसून हरषि सुरराऊ। लगे सराहन भरत सुभाऊ।।

    अर्थ (Hindi)

    बरषि प्रसून हरषि सुरराऊ। लगे सराहन भरत सुभाऊ।।

  2176. RCM 2.220.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    एहि बिधि भरत चले मग जाहीं। दसा देखि मुनि सिद्ध सिहाहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    एहि बिधि भरत चले मग जाहीं। दसा देखि मुनि सिद्ध सिहाहीं।।

  2177. RCM 2.220.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जबहिं रामु कहि लेहिं उसासा। उमगत पेमु मनहँ चहु पासा।।

    अर्थ (Hindi)

    जबहिं रामु कहि लेहिं उसासा। उमगत पेमु मनहँ चहु पासा।।

  2178. RCM 2.220.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    द्रवहिं बचन सुनि कुलिस पषाना। पुरजन पेमु न जाइ बखाना।।

    अर्थ (Hindi)

    द्रवहिं बचन सुनि कुलिस पषाना। पुरजन पेमु न जाइ बखाना।।

  2179. RCM 2.220.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बीच बास करि जमुनहिं आए। निरखि नीरु लोचन जल छाए।।

    अर्थ (Hindi)

    बीच बास करि जमुनहिं आए। निरखि नीरु लोचन जल छाए।।

  2180. RCM 2.220.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    रघुबर बरन बिलोकि बर बारि समेत समाज।

    अर्थ (Hindi)

    रघुबर बरन बिलोकि बर बारि समेत समाज।

  2181. RCM 2.220.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    होत मगन बारिधि बिरह चढ़े बिबेक जहाज।।220।।

    अर्थ (Hindi)

    होत मगन बारिधि बिरह चढ़े बिबेक जहाज।।220।।

  2182. RCM 2.221.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जमुन तीर तेहि दिन करि बासू। भयउ समय सम सबहि सुपासू।।

    अर्थ (Hindi)

    जमुन तीर तेहि दिन करि बासू। भयउ समय सम सबहि सुपासू।।

  2183. RCM 2.221.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    रातहिं घाट घाट की तरनी। आईं अगनित जाहिं न बरनी।।

    अर्थ (Hindi)

    रातहिं घाट घाट की तरनी। आईं अगनित जाहिं न बरनी।।

  2184. RCM 2.221.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    प्रात पार भए एकहि खेंवाँ। तोषे रामसखा की सेवाँ।।

    अर्थ (Hindi)

    प्रात पार भए एकहि खेंवाँ। तोषे रामसखा की सेवाँ।।

  2185. RCM 2.221.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    चले नहाइ नदिहि सिर नाई। साथ निषादनाथ दोउ भाई।।

    अर्थ (Hindi)

    चले नहाइ नदिहि सिर नाई। साथ निषादनाथ दोउ भाई।।

  2186. RCM 2.221.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    आगें मुनिबर बाहन आछें। राजसमाज जाइ सबु पाछें।।

    अर्थ (Hindi)

    आगें मुनिबर बाहन आछें। राजसमाज जाइ सबु पाछें।।

  2187. RCM 2.221.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तेहिं पाछें दोउ बंधु पयादें। भूषन बसन बेष सुठि सादें।।

    अर्थ (Hindi)

    तेहिं पाछें दोउ बंधु पयादें। भूषन बसन बेष सुठि सादें।।

  2188. RCM 2.221.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सेवक सुह्रद सचिवसुत साथा। सुमिरत लखनु सीय रघुनाथा।।

    अर्थ (Hindi)

    सेवक सुह्रद सचिवसुत साथा। सुमिरत लखनु सीय रघुनाथा।।

  2189. RCM 2.221.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जहँ जहँ राम बास बिश्रामा। तहँ तहँ करहिं सप्रेम प्रनामा।।

    अर्थ (Hindi)

    जहँ जहँ राम बास बिश्रामा। तहँ तहँ करहिं सप्रेम प्रनामा।।

  2190. RCM 2.221.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मगबासी नर नारि सुनि धाम काम तजि धाइ।

    अर्थ (Hindi)

    मगबासी नर नारि सुनि धाम काम तजि धाइ।

  2191. RCM 2.221.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    देखि सरूप सनेह सब मुदित जनम फलु पाइ।।221।।

    अर्थ (Hindi)

    देखि सरूप सनेह सब मुदित जनम फलु पाइ।।221।।

  2192. RCM 2.222.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कहहिं सपेम एक एक पाहीं। रामु लखनु सखि होहिं कि नाहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    कहहिं सपेम एक एक पाहीं। रामु लखनु सखि होहिं कि नाहीं।।

  2193. RCM 2.222.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बय बपु बरन रूप सोइ आली। सीलु सनेहु सरिस सम चाली।।

    अर्थ (Hindi)

    बय बपु बरन रूप सोइ आली। सीलु सनेहु सरिस सम चाली।।

  2194. RCM 2.222.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बेषु न सो सखि सीय न संगा। आगें अनी चली चतुरंगा।।

    अर्थ (Hindi)

    बेषु न सो सखि सीय न संगा। आगें अनी चली चतुरंगा।।

  2195. RCM 2.222.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नहिं प्रसन्न मुख मानस खेदा। सखि संदेहु होइ एहिं भेदा।।

    अर्थ (Hindi)

    नहिं प्रसन्न मुख मानस खेदा। सखि संदेहु होइ एहिं भेदा।।

  2196. RCM 2.222.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तासु तरक तियगन मन मानी। कहहिं सकल तेहि सम न सयानी।।

    अर्थ (Hindi)

    तासु तरक तियगन मन मानी। कहहिं सकल तेहि सम न सयानी।।

  2197. RCM 2.222.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तेहि सराहि बानी फुरि पूजी। बोली मधुर बचन तिय दूजी।।

    अर्थ (Hindi)

    तेहि सराहि बानी फुरि पूजी। बोली मधुर बचन तिय दूजी।।

  2198. RCM 2.222.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कहि सपेम सब कथाप्रसंगू। जेहि बिधि राम राज रस भंगू।।

    अर्थ (Hindi)

    कहि सपेम सब कथाप्रसंगू। जेहि बिधि राम राज रस भंगू।।

  2199. RCM 2.222.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भरतहि बहुरि सराहन लागी। सील सनेह सुभाय सुभागी।।

    अर्थ (Hindi)

    भरतहि बहुरि सराहन लागी। सील सनेह सुभाय सुभागी।।

  2200. RCM 2.222.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    चलत पयादें खात फल पिता दीन्ह तजि राजु।

    अर्थ (Hindi)

    चलत पयादें खात फल पिता दीन्ह तजि राजु।

  2201. RCM 2.222.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जात मनावन रघुबरहि भरत सरिस को आजु।।222।।

    अर्थ (Hindi)

    जात मनावन रघुबरहि भरत सरिस को आजु।।222।।

  2202. RCM 2.223.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भायप भगति भरत आचरनू। कहत सुनत दुख दूषन हरनू।।

    अर्थ (Hindi)

    भायप भगति भरत आचरनू। कहत सुनत दुख दूषन हरनू।।

  2203. RCM 2.223.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जो कछु कहब थोर सखि सोई। राम बंधु अस काहे न होई।।

    अर्थ (Hindi)

    जो कछु कहब थोर सखि सोई। राम बंधु अस काहे न होई।।

  2204. RCM 2.223.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    हम सब सानुज भरतहि देखें। भइन्ह धन्य जुबती जन लेखें।।

    अर्थ (Hindi)

    हम सब सानुज भरतहि देखें। भइन्ह धन्य जुबती जन लेखें।।

  2205. RCM 2.223.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनि गुन देखि दसा पछिताहीं। कैकइ जननि जोगु सुतु नाहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनि गुन देखि दसा पछिताहीं। कैकइ जननि जोगु सुतु नाहीं।।

  2206. RCM 2.223.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कोउ कह दूषनु रानिहि नाहिन। बिधि सबु कीन्ह हमहि जो दाहिन।।

    अर्थ (Hindi)

    कोउ कह दूषनु रानिहि नाहिन। बिधि सबु कीन्ह हमहि जो दाहिन।।

  2207. RCM 2.223.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कहँ हम लोक बेद बिधि हीनी। लघु तिय कुल करतूति मलीनी।।

    अर्थ (Hindi)

    कहँ हम लोक बेद बिधि हीनी। लघु तिय कुल करतूति मलीनी।।

  2208. RCM 2.223.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बसहिं कुदेस कुगाँव कुबामा। कहँ यह दरसु पुन्य परिनामा।।

    अर्थ (Hindi)

    बसहिं कुदेस कुगाँव कुबामा। कहँ यह दरसु पुन्य परिनामा।।

  2209. RCM 2.223.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अस अनंदु अचिरिजु प्रति ग्रामा। जनु मरुभूमि कलपतरु जामा।।

    अर्थ (Hindi)

    अस अनंदु अचिरिजु प्रति ग्रामा। जनु मरुभूमि कलपतरु जामा।।

  2210. RCM 2.223.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भरत दरसु देखत खुलेउ मग लोगन्ह कर भागु।

    अर्थ (Hindi)

    भरत दरसु देखत खुलेउ मग लोगन्ह कर भागु।

  2211. RCM 2.223.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जनु सिंघलबासिन्ह भयउ बिधि बस सुलभ प्रयागु।।223।।

    अर्थ (Hindi)

    जनु सिंघलबासिन्ह भयउ बिधि बस सुलभ प्रयागु।।223।।

  2212. RCM 2.224.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    निज गुन सहित राम गुन गाथा। सुनत जाहिं सुमिरत रघुनाथा।।

    अर्थ (Hindi)

    निज गुन सहित राम गुन गाथा। सुनत जाहिं सुमिरत रघुनाथा।।

  2213. RCM 2.224.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तीरथ मुनि आश्रम सुरधामा। निरखि निमज्जहिं करहिं प्रनामा।।

    अर्थ (Hindi)

    तीरथ मुनि आश्रम सुरधामा। निरखि निमज्जहिं करहिं प्रनामा।।

  2214. RCM 2.224.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मनहीं मन मागहिं बरु एहू। सीय राम पद पदुम सनेहू।।

    अर्थ (Hindi)

    मनहीं मन मागहिं बरु एहू। सीय राम पद पदुम सनेहू।।

  2215. RCM 2.224.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मिलहिं किरात कोल बनबासी। बैखानस बटु जती उदासी।।

    अर्थ (Hindi)

    मिलहिं किरात कोल बनबासी। बैखानस बटु जती उदासी।।

  2216. RCM 2.224.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    करि प्रनामु पूँछहिं जेहिं तेही। केहि बन लखनु रामु बैदेही।।

    अर्थ (Hindi)

    करि प्रनामु पूँछहिं जेहिं तेही। केहि बन लखनु रामु बैदेही।।

  2217. RCM 2.224.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    ते प्रभु समाचार सब कहहीं। भरतहि देखि जनम फलु लहहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    ते प्रभु समाचार सब कहहीं। भरतहि देखि जनम फलु लहहीं।।

  2218. RCM 2.224.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जे जन कहहिं कुसल हम देखे। ते प्रिय राम लखन सम लेखे।।

    अर्थ (Hindi)

    जे जन कहहिं कुसल हम देखे। ते प्रिय राम लखन सम लेखे।।

  2219. RCM 2.224.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    एहि बिधि बूझत सबहि सुबानी। सुनत राम बनबास कहानी।।

    अर्थ (Hindi)

    एहि बिधि बूझत सबहि सुबानी। सुनत राम बनबास कहानी।।

  2220. RCM 2.224.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तेहि बासर बसि प्रातहीं चले सुमिरि रघुनाथ।

    अर्थ (Hindi)

    तेहि बासर बसि प्रातहीं चले सुमिरि रघुनाथ।

  2221. RCM 2.224.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राम दरस की लालसा भरत सरिस सब साथ।।224।।

    अर्थ (Hindi)

    राम दरस की लालसा भरत सरिस सब साथ।।224।।

  2222. RCM 2.225.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मंगल सगुन होहिं सब काहू। फरकहिं सुखद बिलोचन बाहू।।

    अर्थ (Hindi)

    मंगल सगुन होहिं सब काहू। फरकहिं सुखद बिलोचन बाहू।।

  2223. RCM 2.225.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भरतहि सहित समाज उछाहू। मिलिहहिं रामु मिटहि दुख दाहू।।

    अर्थ (Hindi)

    भरतहि सहित समाज उछाहू। मिलिहहिं रामु मिटहि दुख दाहू।।

  2224. RCM 2.225.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    करत मनोरथ जस जियँ जाके। जाहिं सनेह सुराँ सब छाके।।

    अर्थ (Hindi)

    करत मनोरथ जस जियँ जाके। जाहिं सनेह सुराँ सब छाके।।

  2225. RCM 2.225.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सिथिल अंग पग मग डगि डोलहिं। बिहबल बचन पेम बस बोलहिं।।

    अर्थ (Hindi)

    सिथिल अंग पग मग डगि डोलहिं। बिहबल बचन पेम बस बोलहिं।।

  2226. RCM 2.225.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    रामसखाँ तेहि समय देखावा। सैल सिरोमनि सहज सुहावा।।

    अर्थ (Hindi)

    रामसखाँ तेहि समय देखावा। सैल सिरोमनि सहज सुहावा।।

  2227. RCM 2.225.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जासु समीप सरित पय तीरा। सीय समेत बसहिं दोउ बीरा।।

    अर्थ (Hindi)

    जासु समीप सरित पय तीरा। सीय समेत बसहिं दोउ बीरा।।

  2228. RCM 2.225.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    देखि करहिं सब दंड प्रनामा। कहि जय जानकि जीवन रामा।।

    अर्थ (Hindi)

    देखि करहिं सब दंड प्रनामा। कहि जय जानकि जीवन रामा।।

  2229. RCM 2.225.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    प्रेम मगन अस राज समाजू। जनु फिरि अवध चले रघुराजू।।

    अर्थ (Hindi)

    प्रेम मगन अस राज समाजू। जनु फिरि अवध चले रघुराजू।।

  2230. RCM 2.225.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भरत प्रेमु तेहि समय जस तस कहि सकइ न सेषु।

    अर्थ (Hindi)

    भरत प्रेमु तेहि समय जस तस कहि सकइ न सेषु।

  2231. RCM 2.225.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कबिहिं अगम जिमि ब्रह्मसुखु अह मम मलिन जनेषु।।225।

    अर्थ (Hindi)

    कबिहिं अगम जिमि ब्रह्मसुखु अह मम मलिन जनेषु।।225।

  2232. RCM 2.226.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सकल सनेह सिथिल रघुबर कें। गए कोस दुइ दिनकर ढरकें।।

    अर्थ (Hindi)

    सकल सनेह सिथिल रघुबर कें। गए कोस दुइ दिनकर ढरकें।।

  2233. RCM 2.226.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जलु थलु देखि बसे निसि बीतें। कीन्ह गवन रघुनाथ पिरीतें।।

    अर्थ (Hindi)

    जलु थलु देखि बसे निसि बीतें। कीन्ह गवन रघुनाथ पिरीतें।।

  2234. RCM 2.226.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    उहाँ रामु रजनी अवसेषा। जागे सीयँ सपन अस देखा।।

    अर्थ (Hindi)

    उहाँ रामु रजनी अवसेषा। जागे सीयँ सपन अस देखा।।

  2235. RCM 2.226.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सहित समाज भरत जनु आए। नाथ बियोग ताप तन ताए।।

    अर्थ (Hindi)

    सहित समाज भरत जनु आए। नाथ बियोग ताप तन ताए।।

  2236. RCM 2.226.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सकल मलिन मन दीन दुखारी। देखीं सासु आन अनुहारी।।

    अर्थ (Hindi)

    सकल मलिन मन दीन दुखारी। देखीं सासु आन अनुहारी।।

  2237. RCM 2.226.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनि सिय सपन भरे जल लोचन। भए सोचबस सोच बिमोचन।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनि सिय सपन भरे जल लोचन। भए सोचबस सोच बिमोचन।।

  2238. RCM 2.226.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    लखन सपन यह नीक न होई। कठिन कुचाह सुनाइहि कोई।।

    अर्थ (Hindi)

    लखन सपन यह नीक न होई। कठिन कुचाह सुनाइहि कोई।।

  2239. RCM 2.226.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अस कहि बंधु समेत नहाने। पूजि पुरारि साधु सनमाने।।

    अर्थ (Hindi)

    अस कहि बंधु समेत नहाने। पूजि पुरारि साधु सनमाने।।

  2240. RCM 2.227.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बहुरि सोचबस भे सियरवनू। कारन कवन भरत आगवनू।।

    अर्थ (Hindi)

    बहुरि सोचबस भे सियरवनू। कारन कवन भरत आगवनू।।

  2241. RCM 2.227.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    एक आइ अस कहा बहोरी। सेन संग चतुरंग न थोरी।।

    अर्थ (Hindi)

    एक आइ अस कहा बहोरी। सेन संग चतुरंग न थोरी।।

  2242. RCM 2.227.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सो सुनि रामहि भा अति सोचू। इत पितु बच इत बंधु सकोचू।।

    अर्थ (Hindi)

    सो सुनि रामहि भा अति सोचू। इत पितु बच इत बंधु सकोचू।।

  2243. RCM 2.227.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भरत सुभाउ समुझि मन माहीं। प्रभु चित हित थिति पावत नाही।।

    अर्थ (Hindi)

    भरत सुभाउ समुझि मन माहीं। प्रभु चित हित थिति पावत नाही।।

  2244. RCM 2.227.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    समाधान तब भा यह जाने। भरतु कहे महुँ साधु सयाने।।

    अर्थ (Hindi)

    समाधान तब भा यह जाने। भरतु कहे महुँ साधु सयाने।।

  2245. RCM 2.227.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    लखन लखेउ प्रभु हृदयँ खभारू। कहत समय सम नीति बिचारू।।

    अर्थ (Hindi)

    लखन लखेउ प्रभु हृदयँ खभारू। कहत समय सम नीति बिचारू।।

  2246. RCM 2.227.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बिनु पूँछ कछु कहउँ गोसाईं। सेवकु समयँ न ढीठ ढिठाई।।

    अर्थ (Hindi)

    बिनु पूँछ कछु कहउँ गोसाईं। सेवकु समयँ न ढीठ ढिठाई।।

  2247. RCM 2.227.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तुम्ह सर्बग्य सिरोमनि स्वामी। आपनि समुझि कहउँ अनुगामी।।

    अर्थ (Hindi)

    तुम्ह सर्बग्य सिरोमनि स्वामी। आपनि समुझि कहउँ अनुगामी।।

  2248. RCM 2.227.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नाथ सुह्रद सुठि सरल चित सील सनेह निधान।।

    अर्थ (Hindi)

    नाथ सुह्रद सुठि सरल चित सील सनेह निधान।।

  2249. RCM 2.227.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सब पर प्रीति प्रतीति जियँ जानिअ आपु समान।।227।।

    अर्थ (Hindi)

    सब पर प्रीति प्रतीति जियँ जानिअ आपु समान।।227।।

  2250. RCM 2.228.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बिषई जीव पाइ प्रभुताई। मूढ़ मोह बस होहिं जनाई।।

    अर्थ (Hindi)

    बिषई जीव पाइ प्रभुताई। मूढ़ मोह बस होहिं जनाई।।

  2251. RCM 2.228.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भरतु नीति रत साधु सुजाना। प्रभु पद प्रेम सकल जगु जाना।।

    अर्थ (Hindi)

    भरतु नीति रत साधु सुजाना। प्रभु पद प्रेम सकल जगु जाना।।

  2252. RCM 2.228.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तेऊ आजु राम पदु पाई। चले धरम मरजाद मेटाई।।

    अर्थ (Hindi)

    तेऊ आजु राम पदु पाई। चले धरम मरजाद मेटाई।।

  2253. RCM 2.228.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कुटिल कुबंध कुअवसरु ताकी। जानि राम बनवास एकाकी।।

    अर्थ (Hindi)

    कुटिल कुबंध कुअवसरु ताकी। जानि राम बनवास एकाकी।।

  2254. RCM 2.228.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    करि कुमंत्रु मन साजि समाजू। आए करै अकंटक राजू।।

    अर्थ (Hindi)

    करि कुमंत्रु मन साजि समाजू। आए करै अकंटक राजू।।

  2255. RCM 2.228.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कोटि प्रकार कलपि कुटलाई। आए दल बटोरि दोउ भाई।।

    अर्थ (Hindi)

    कोटि प्रकार कलपि कुटलाई। आए दल बटोरि दोउ भाई।।

  2256. RCM 2.228.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जौं जियँ होति न कपट कुचाली। केहि सोहाति रथ बाजि गजाली।।

    अर्थ (Hindi)

    जौं जियँ होति न कपट कुचाली। केहि सोहाति रथ बाजि गजाली।।

  2257. RCM 2.228.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भरतहि दोसु देइ को जाएँ। जग बौराइ राज पदु पाएँ।।

    अर्थ (Hindi)

    भरतहि दोसु देइ को जाएँ। जग बौराइ राज पदु पाएँ।।

  2258. RCM 2.228.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    ससि गुर तिय गामी नघुषु चढ़ेउ भूमिसुर जान।

    अर्थ (Hindi)

    ससि गुर तिय गामी नघुषु चढ़ेउ भूमिसुर जान।

  2259. RCM 2.228.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    लोक बेद तें बिमुख भा अधम न बेन समान।।228।।

    अर्थ (Hindi)

    लोक बेद तें बिमुख भा अधम न बेन समान।।228।।

  2260. RCM 2.229.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सहसबाहु सुरनाथु त्रिसंकू। केहि न राजमद दीन्ह कलंकू।।

    अर्थ (Hindi)

    सहसबाहु सुरनाथु त्रिसंकू। केहि न राजमद दीन्ह कलंकू।।

  2261. RCM 2.229.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भरत कीन्ह यह उचित उपाऊ। रिपु रिन रंच न राखब काऊ।।

    अर्थ (Hindi)

    भरत कीन्ह यह उचित उपाऊ। रिपु रिन रंच न राखब काऊ।।

  2262. RCM 2.229.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    एक कीन्हि नहिं भरत भलाई। निदरे रामु जानि असहाई।।

    अर्थ (Hindi)

    एक कीन्हि नहिं भरत भलाई। निदरे रामु जानि असहाई।।

  2263. RCM 2.229.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    समुझि परिहि सोउ आजु बिसेषी। समर सरोष राम मुखु पेखी।।

    अर्थ (Hindi)

    समुझि परिहि सोउ आजु बिसेषी। समर सरोष राम मुखु पेखी।।

  2264. RCM 2.229.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    एतना कहत नीति रस भूला। रन रस बिटपु पुलक मिस फूला।।

    अर्थ (Hindi)

    एतना कहत नीति रस भूला। रन रस बिटपु पुलक मिस फूला।।

  2265. RCM 2.229.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    प्रभु पद बंदि सीस रज राखी। बोले सत्य सहज बलु भाषी।।

    अर्थ (Hindi)

    प्रभु पद बंदि सीस रज राखी। बोले सत्य सहज बलु भाषी।।

  2266. RCM 2.229.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अनुचित नाथ न मानब मोरा। भरत हमहि उपचार न थोरा।।

    अर्थ (Hindi)

    अनुचित नाथ न मानब मोरा। भरत हमहि उपचार न थोरा।।

  2267. RCM 2.229.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कहँ लगि सहिअ रहिअ मनु मारें। नाथ साथ धनु हाथ हमारें।।

    अर्थ (Hindi)

    कहँ लगि सहिअ रहिअ मनु मारें। नाथ साथ धनु हाथ हमारें।।

  2268. RCM 2.229.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    छत्रि जाति रघुकुल जनमु राम अनुग जगु जान।

    अर्थ (Hindi)

    छत्रि जाति रघुकुल जनमु राम अनुग जगु जान।

  2269. RCM 2.229.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    लातहुँ मारें चढ़ति सिर नीच को धूरि समान।।229।।

    अर्थ (Hindi)

    लातहुँ मारें चढ़ति सिर नीच को धूरि समान।।229।।

  2270. RCM 2.230.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    उठि कर जोरि रजायसु मागा। मनहुँ बीर रस सोवत जागा।।

    अर्थ (Hindi)

    उठि कर जोरि रजायसु मागा। मनहुँ बीर रस सोवत जागा।।

  2271. RCM 2.230.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बाँधि जटा सिर कसि कटि भाथा। साजि सरासनु सायकु हाथा।।

    अर्थ (Hindi)

    बाँधि जटा सिर कसि कटि भाथा। साजि सरासनु सायकु हाथा।।

  2272. RCM 2.230.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    आजु राम सेवक जसु लेऊँ। भरतहि समर सिखावन देऊँ।।

    अर्थ (Hindi)

    आजु राम सेवक जसु लेऊँ। भरतहि समर सिखावन देऊँ।।

  2273. RCM 2.230.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राम निरादर कर फलु पाई। सोवहुँ समर सेज दोउ भाई।।

    अर्थ (Hindi)

    राम निरादर कर फलु पाई। सोवहुँ समर सेज दोउ भाई।।

  2274. RCM 2.230.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    आइ बना भल सकल समाजू। प्रगट करउँ रिस पाछिल आजू।।

    अर्थ (Hindi)

    आइ बना भल सकल समाजू। प्रगट करउँ रिस पाछिल आजू।।

  2275. RCM 2.230.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जिमि करि निकर दलइ मृगराजू। लेइ लपेटि लवा जिमि बाजू।।

    अर्थ (Hindi)

    जिमि करि निकर दलइ मृगराजू। लेइ लपेटि लवा जिमि बाजू।।

  2276. RCM 2.230.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तैसेहिं भरतहि सेन समेता। सानुज निदरि निपातउँ खेता।।

    अर्थ (Hindi)

    तैसेहिं भरतहि सेन समेता। सानुज निदरि निपातउँ खेता।।

  2277. RCM 2.230.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जौं सहाय कर संकरु आई। तौ मारउँ रन राम दोहाई।।

    अर्थ (Hindi)

    जौं सहाय कर संकरु आई। तौ मारउँ रन राम दोहाई।।

  2278. RCM 2.230.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अति सरोष माखे लखनु लखि सुनि सपथ प्रवान।

    अर्थ (Hindi)

    अति सरोष माखे लखनु लखि सुनि सपथ प्रवान।

  2279. RCM 2.230.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सभय लोक सब लोकपति चाहत भभरि भगान।।230।।

    अर्थ (Hindi)

    सभय लोक सब लोकपति चाहत भभरि भगान।।230।।

  2280. RCM 2.231.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जगु भय मगन गगन भइ बानी। लखन बाहुबलु बिपुल बखानी।।

    अर्थ (Hindi)

    जगु भय मगन गगन भइ बानी। लखन बाहुबलु बिपुल बखानी।।

  2281. RCM 2.231.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तात प्रताप प्रभाउ तुम्हारा। को कहि सकइ को जाननिहारा।।

    अर्थ (Hindi)

    तात प्रताप प्रभाउ तुम्हारा। को कहि सकइ को जाननिहारा।।

  2282. RCM 2.231.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अनुचित उचित काजु किछु होऊ। समुझि करिअ भल कह सबु कोऊ।।

    अर्थ (Hindi)

    अनुचित उचित काजु किछु होऊ। समुझि करिअ भल कह सबु कोऊ।।

  2283. RCM 2.231.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सहसा करि पाछैं पछिताहीं। कहहिं बेद बुध ते बुध नाहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    सहसा करि पाछैं पछिताहीं। कहहिं बेद बुध ते बुध नाहीं।।

  2284. RCM 2.231.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनि सुर बचन लखन सकुचाने। राम सीयँ सादर सनमाने।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनि सुर बचन लखन सकुचाने। राम सीयँ सादर सनमाने।।

  2285. RCM 2.231.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कही तात तुम्ह नीति सुहाई। सब तें कठिन राजमदु भाई।।

    अर्थ (Hindi)

    कही तात तुम्ह नीति सुहाई। सब तें कठिन राजमदु भाई।।

  2286. RCM 2.231.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जो अचवँत नृप मातहिं तेई। नाहिन साधुसभा जेहिं सेई।।

    अर्थ (Hindi)

    जो अचवँत नृप मातहिं तेई। नाहिन साधुसभा जेहिं सेई।।

  2287. RCM 2.231.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनहु लखन भल भरत सरीसा। बिधि प्रपंच महँ सुना न दीसा।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनहु लखन भल भरत सरीसा। बिधि प्रपंच महँ सुना न दीसा।।

  2288. RCM 2.231.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भरतहि होइ न राजमदु बिधि हरि हर पद पाइ।।

    अर्थ (Hindi)

    भरतहि होइ न राजमदु बिधि हरि हर पद पाइ।।

  2289. RCM 2.231.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कबहुँ कि काँजी सीकरनि छीरसिंधु बिनसाइ।।231।।

    अर्थ (Hindi)

    कबहुँ कि काँजी सीकरनि छीरसिंधु बिनसाइ।।231।।

  2290. RCM 2.232.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तिमिरु तरुन तरनिहि मकु गिलई। गगनु मगन मकु मेघहिं मिलई।।

    अर्थ (Hindi)

    तिमिरु तरुन तरनिहि मकु गिलई। गगनु मगन मकु मेघहिं मिलई।।

  2291. RCM 2.232.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    गोपद जल बूड़हिं घटजोनी। सहज छमा बरु छाड़ै छोनी।।

    अर्थ (Hindi)

    गोपद जल बूड़हिं घटजोनी। सहज छमा बरु छाड़ै छोनी।।

  2292. RCM 2.232.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मसक फूँक मकु मेरु उड़ाई। होइ न नृपमदु भरतहि भाई।।

    अर्थ (Hindi)

    मसक फूँक मकु मेरु उड़ाई। होइ न नृपमदु भरतहि भाई।।

  2293. RCM 2.232.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    लखन तुम्हार सपथ पितु आना। सुचि सुबंधु नहिं भरत समाना।।

    अर्थ (Hindi)

    लखन तुम्हार सपथ पितु आना। सुचि सुबंधु नहिं भरत समाना।।

  2294. RCM 2.232.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सगुन खीरु अवगुन जलु ताता। मिलइ रचइ परपंचु बिधाता।।

    अर्थ (Hindi)

    सगुन खीरु अवगुन जलु ताता। मिलइ रचइ परपंचु बिधाता।।

  2295. RCM 2.232.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भरतु हंस रबिबंस तड़ागा। जनमि कीन्ह गुन दोष बिभागा।।

    अर्थ (Hindi)

    भरतु हंस रबिबंस तड़ागा। जनमि कीन्ह गुन दोष बिभागा।।

  2296. RCM 2.232.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    गहि गुन पय तजि अवगुन बारी। निज जस जगत कीन्हि उजिआरी।।

    अर्थ (Hindi)

    गहि गुन पय तजि अवगुन बारी। निज जस जगत कीन्हि उजिआरी।।

  2297. RCM 2.232.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कहत भरत गुन सीलु सुभाऊ। पेम पयोधि मगन रघुराऊ।।

    अर्थ (Hindi)

    कहत भरत गुन सीलु सुभाऊ। पेम पयोधि मगन रघुराऊ।।

  2298. RCM 2.232.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनि रघुबर बानी बिबुध देखि भरत पर हेतु।

    अर्थ (Hindi)

    सुनि रघुबर बानी बिबुध देखि भरत पर हेतु।

  2299. RCM 2.232.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सकल सराहत राम सो प्रभु को कृपानिकेतु।।232।।

    अर्थ (Hindi)

    सकल सराहत राम सो प्रभु को कृपानिकेतु।।232।।

  2300. RCM 2.233.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जौं न होत जग जनम भरत को। सकल धरम धुर धरनि धरत को।।

    अर्थ (Hindi)

    जौं न होत जग जनम भरत को। सकल धरम धुर धरनि धरत को।।

  2301. RCM 2.233.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कबि कुल अगम भरत गुन गाथा। को जानइ तुम्ह बिनु रघुनाथा।।

    अर्थ (Hindi)

    कबि कुल अगम भरत गुन गाथा। को जानइ तुम्ह बिनु रघुनाथा।।

  2302. RCM 2.233.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    लखन राम सियँ सुनि सुर बानी। अति सुखु लहेउ न जाइ बखानी।।

    अर्थ (Hindi)

    लखन राम सियँ सुनि सुर बानी। अति सुखु लहेउ न जाइ बखानी।।

  2303. RCM 2.233.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    इहाँ भरतु सब सहित सहाए। मंदाकिनीं पुनीत नहाए।।

    अर्थ (Hindi)

    इहाँ भरतु सब सहित सहाए। मंदाकिनीं पुनीत नहाए।।

  2304. RCM 2.233.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सरित समीप राखि सब लोगा। मागि मातु गुर सचिव नियोगा।।

    अर्थ (Hindi)

    सरित समीप राखि सब लोगा। मागि मातु गुर सचिव नियोगा।।

  2305. RCM 2.233.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    चले भरतु जहँ सिय रघुराई। साथ निषादनाथु लघु भाई।।

    अर्थ (Hindi)

    चले भरतु जहँ सिय रघुराई। साथ निषादनाथु लघु भाई।।

  2306. RCM 2.233.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    समुझि मातु करतब सकुचाहीं। करत कुतरक कोटि मन माहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    समुझि मातु करतब सकुचाहीं। करत कुतरक कोटि मन माहीं।।

  2307. RCM 2.233.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    रामु लखनु सिय सुनि मम नाऊँ। उठि जनि अनत जाहिं तजि ठाऊँ।।

    अर्थ (Hindi)

    रामु लखनु सिय सुनि मम नाऊँ। उठि जनि अनत जाहिं तजि ठाऊँ।।

  2308. RCM 2.233.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मातु मते महुँ मानि मोहि जो कछु करहिं सो थोर।

    अर्थ (Hindi)

    मातु मते महुँ मानि मोहि जो कछु करहिं सो थोर।

  2309. RCM 2.233.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अघ अवगुन छमि आदरहिं समुझि आपनी ओर।।233।।

    अर्थ (Hindi)

    अघ अवगुन छमि आदरहिं समुझि आपनी ओर।।233।।

  2310. RCM 2.234.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जौं परिहरहिं मलिन मनु जानी। जौ सनमानहिं सेवकु मानी।।

    अर्थ (Hindi)

    जौं परिहरहिं मलिन मनु जानी। जौ सनमानहिं सेवकु मानी।।

  2311. RCM 2.234.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मोरें सरन रामहि की पनही। राम सुस्वामि दोसु सब जनही।।

    अर्थ (Hindi)

    मोरें सरन रामहि की पनही। राम सुस्वामि दोसु सब जनही।।

  2312. RCM 2.234.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जग जस भाजन चातक मीना। नेम पेम निज निपुन नबीना।।

    अर्थ (Hindi)

    जग जस भाजन चातक मीना। नेम पेम निज निपुन नबीना।।

  2313. RCM 2.234.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अस मन गुनत चले मग जाता। सकुच सनेहँ सिथिल सब गाता।।

    अर्थ (Hindi)

    अस मन गुनत चले मग जाता। सकुच सनेहँ सिथिल सब गाता।।

  2314. RCM 2.234.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    फेरत मनहुँ मातु कृत खोरी। चलत भगति बल धीरज धोरी।।

    अर्थ (Hindi)

    फेरत मनहुँ मातु कृत खोरी। चलत भगति बल धीरज धोरी।।

  2315. RCM 2.234.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जब समुझत रघुनाथ सुभाऊ। तब पथ परत उताइल पाऊ।।

    अर्थ (Hindi)

    जब समुझत रघुनाथ सुभाऊ। तब पथ परत उताइल पाऊ।।

  2316. RCM 2.234.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भरत दसा तेहि अवसर कैसी। जल प्रबाहँ जल अलि गति जैसी।।

    अर्थ (Hindi)

    भरत दसा तेहि अवसर कैसी। जल प्रबाहँ जल अलि गति जैसी।।

  2317. RCM 2.234.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    देखि भरत कर सोचु सनेहू। भा निषाद तेहि समयँ बिदेहू।।

    अर्थ (Hindi)

    देखि भरत कर सोचु सनेहू। भा निषाद तेहि समयँ बिदेहू।।

  2318. RCM 2.234.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    लगे होन मंगल सगुन सुनि गुनि कहत निषादु।

    अर्थ (Hindi)

    लगे होन मंगल सगुन सुनि गुनि कहत निषादु।

  2319. RCM 2.234.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मिटिहि सोचु होइहि हरषु पुनि परिनाम बिषादु।।234।।

    अर्थ (Hindi)

    मिटिहि सोचु होइहि हरषु पुनि परिनाम बिषादु।।234।।

  2320. RCM 2.235.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सेवक बचन सत्य सब जाने। आश्रम निकट जाइ निअराने।।

    अर्थ (Hindi)

    सेवक बचन सत्य सब जाने। आश्रम निकट जाइ निअराने।।

  2321. RCM 2.235.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भरत दीख बन सैल समाजू। मुदित छुधित जनु पाइ सुनाजू।।

    अर्थ (Hindi)

    भरत दीख बन सैल समाजू। मुदित छुधित जनु पाइ सुनाजू।।

  2322. RCM 2.235.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    ईति भीति जनु प्रजा दुखारी। त्रिबिध ताप पीड़ित ग्रह मारी।।

    अर्थ (Hindi)

    ईति भीति जनु प्रजा दुखारी। त्रिबिध ताप पीड़ित ग्रह मारी।।

  2323. RCM 2.235.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जाइ सुराज सुदेस सुखारी। होहिं भरत गति तेहि अनुहारी।।

    अर्थ (Hindi)

    जाइ सुराज सुदेस सुखारी। होहिं भरत गति तेहि अनुहारी।।

  2324. RCM 2.235.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राम बास बन संपति भ्राजा। सुखी प्रजा जनु पाइ सुराजा।।

    अर्थ (Hindi)

    राम बास बन संपति भ्राजा। सुखी प्रजा जनु पाइ सुराजा।।

  2325. RCM 2.235.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सचिव बिरागु बिबेकु नरेसू। बिपिन सुहावन पावन देसू।।

    अर्थ (Hindi)

    सचिव बिरागु बिबेकु नरेसू। बिपिन सुहावन पावन देसू।।

  2326. RCM 2.235.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भट जम नियम सैल रजधानी। सांति सुमति सुचि सुंदर रानी।।

    अर्थ (Hindi)

    भट जम नियम सैल रजधानी। सांति सुमति सुचि सुंदर रानी।।

  2327. RCM 2.235.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सकल अंग संपन्न सुराऊ। राम चरन आश्रित चित चाऊ।।

    अर्थ (Hindi)

    सकल अंग संपन्न सुराऊ। राम चरन आश्रित चित चाऊ।।

  2328. RCM 2.235.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जीति मोह महिपालु दल सहित बिबेक भुआलु।

    अर्थ (Hindi)

    जीति मोह महिपालु दल सहित बिबेक भुआलु।

  2329. RCM 2.235.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    करत अकंटक राजु पुरँ सुख संपदा सुकालु।।235।।

    अर्थ (Hindi)

    करत अकंटक राजु पुरँ सुख संपदा सुकालु।।235।।

  2330. RCM 2.236.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बन प्रदेस मुनि बास घनेरे। जनु पुर नगर गाउँ गन खेरे।।

    अर्थ (Hindi)

    बन प्रदेस मुनि बास घनेरे। जनु पुर नगर गाउँ गन खेरे।।

  2331. RCM 2.236.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बिपुल बिचित्र बिहग मृग नाना। प्रजा समाजु न जाइ बखाना।।

    अर्थ (Hindi)

    बिपुल बिचित्र बिहग मृग नाना। प्रजा समाजु न जाइ बखाना।।

  2332. RCM 2.236.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    खगहा करि हरि बाघ बराहा। देखि महिष बृष साजु सराहा।।

    अर्थ (Hindi)

    खगहा करि हरि बाघ बराहा। देखि महिष बृष साजु सराहा।।

  2333. RCM 2.236.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बयरु बिहाइ चरहिं एक संगा। जहँ तहँ मनहुँ सेन चतुरंगा।।

    अर्थ (Hindi)

    बयरु बिहाइ चरहिं एक संगा। जहँ तहँ मनहुँ सेन चतुरंगा।।

  2334. RCM 2.236.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    झरना झरहिं मत्त गज गाजहिं। मनहुँ निसान बिबिधि बिधि बाजहिं।।

    अर्थ (Hindi)

    झरना झरहिं मत्त गज गाजहिं। मनहुँ निसान बिबिधि बिधि बाजहिं।।

  2335. RCM 2.236.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    चक चकोर चातक सुक पिक गन। कूजत मंजु मराल मुदित मन।।

    अर्थ (Hindi)

    चक चकोर चातक सुक पिक गन। कूजत मंजु मराल मुदित मन।।

  2336. RCM 2.236.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अलिगन गावत नाचत मोरा। जनु सुराज मंगल चहु ओरा।।

    अर्थ (Hindi)

    अलिगन गावत नाचत मोरा। जनु सुराज मंगल चहु ओरा।।

  2337. RCM 2.236.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बेलि बिटप तृन सफल सफूला। सब समाजु मुद मंगल मूला।।

    अर्थ (Hindi)

    बेलि बिटप तृन सफल सफूला। सब समाजु मुद मंगल मूला।।

  2338. RCM 2.236.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राम सैल सोभा निरखि भरत हृदयँ अति पेमु।

    अर्थ (Hindi)

    राम सैल सोभा निरखि भरत हृदयँ अति पेमु।

  2339. RCM 2.236.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तापस तप फलु पाइ जिमि सुखी सिरानें नेमु।।236।।

    अर्थ (Hindi)

    तापस तप फलु पाइ जिमि सुखी सिरानें नेमु।।236।।

  2340. RCM 2.237.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तब केवट ऊँचें चढ़ि धाई। कहेउ भरत सन भुजा उठाई।।

    अर्थ (Hindi)

    तब केवट ऊँचें चढ़ि धाई। कहेउ भरत सन भुजा उठाई।।

  2341. RCM 2.237.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नाथ देखिअहिं बिटप बिसाला। पाकरि जंबु रसाल तमाला।।

    अर्थ (Hindi)

    नाथ देखिअहिं बिटप बिसाला। पाकरि जंबु रसाल तमाला।।

  2342. RCM 2.237.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जिन्ह तरुबरन्ह मध्य बटु सोहा। मंजु बिसाल देखि मनु मोहा।।

    अर्थ (Hindi)

    जिन्ह तरुबरन्ह मध्य बटु सोहा। मंजु बिसाल देखि मनु मोहा।।

  2343. RCM 2.237.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नील सघन पल्ल्व फल लाला। अबिरल छाहँ सुखद सब काला।।

    अर्थ (Hindi)

    नील सघन पल्ल्व फल लाला। अबिरल छाहँ सुखद सब काला।।

  2344. RCM 2.237.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मानहुँ तिमिर अरुनमय रासी। बिरची बिधि सँकेलि सुषमा सी।।

    अर्थ (Hindi)

    मानहुँ तिमिर अरुनमय रासी। बिरची बिधि सँकेलि सुषमा सी।।

  2345. RCM 2.237.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    ए तरु सरित समीप गोसाँई। रघुबर परनकुटी जहँ छाई।।

    अर्थ (Hindi)

    ए तरु सरित समीप गोसाँई। रघुबर परनकुटी जहँ छाई।।

  2346. RCM 2.237.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तुलसी तरुबर बिबिध सुहाए। कहुँ कहुँ सियँ कहुँ लखन लगाए।।

    अर्थ (Hindi)

    तुलसी तरुबर बिबिध सुहाए। कहुँ कहुँ सियँ कहुँ लखन लगाए।।

  2347. RCM 2.237.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बट छायाँ बेदिका बनाई। सियँ निज पानि सरोज सुहाई।।

    अर्थ (Hindi)

    बट छायाँ बेदिका बनाई। सियँ निज पानि सरोज सुहाई।।

  2348. RCM 2.237.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जहाँ बैठि मुनिगन सहित नित सिय रामु सुजान।

    अर्थ (Hindi)

    जहाँ बैठि मुनिगन सहित नित सिय रामु सुजान।

  2349. RCM 2.237.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनहिं कथा इतिहास सब आगम निगम पुरान।।237।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनहिं कथा इतिहास सब आगम निगम पुरान।।237।।

  2350. RCM 2.238.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सखा बचन सुनि बिटप निहारी। उमगे भरत बिलोचन बारी।।

    अर्थ (Hindi)

    सखा बचन सुनि बिटप निहारी। उमगे भरत बिलोचन बारी।।

  2351. RCM 2.238.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    करत प्रनाम चले दोउ भाई। कहत प्रीति सारद सकुचाई।।

    अर्थ (Hindi)

    करत प्रनाम चले दोउ भाई। कहत प्रीति सारद सकुचाई।।

  2352. RCM 2.238.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    हरषहिं निरखि राम पद अंका। मानहुँ पारसु पायउ रंका।।

    अर्थ (Hindi)

    हरषहिं निरखि राम पद अंका। मानहुँ पारसु पायउ रंका।।

  2353. RCM 2.238.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    रज सिर धरि हियँ नयनन्हि लावहिं। रघुबर मिलन सरिस सुख पावहिं।।

    अर्थ (Hindi)

    रज सिर धरि हियँ नयनन्हि लावहिं। रघुबर मिलन सरिस सुख पावहिं।।

  2354. RCM 2.238.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    देखि भरत गति अकथ अतीवा। प्रेम मगन मृग खग जड़ जीवा।।

    अर्थ (Hindi)

    देखि भरत गति अकथ अतीवा। प्रेम मगन मृग खग जड़ जीवा।।

  2355. RCM 2.238.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सखहि सनेह बिबस मग भूला। कहि सुपंथ सुर बरषहिं फूला।।

    अर्थ (Hindi)

    सखहि सनेह बिबस मग भूला। कहि सुपंथ सुर बरषहिं फूला।।

  2356. RCM 2.238.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    निरखि सिद्ध साधक अनुरागे। सहज सनेहु सराहन लागे।।

    अर्थ (Hindi)

    निरखि सिद्ध साधक अनुरागे। सहज सनेहु सराहन लागे।।

  2357. RCM 2.238.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    होत न भूतल भाउ भरत को। अचर सचर चर अचर करत को।।

    अर्थ (Hindi)

    होत न भूतल भाउ भरत को। अचर सचर चर अचर करत को।।

  2358. RCM 2.238.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पेम अमिअ मंदरु बिरहु भरतु पयोधि गँभीर।

    अर्थ (Hindi)

    पेम अमिअ मंदरु बिरहु भरतु पयोधि गँभीर।

  2359. RCM 2.238.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मथि प्रगटेउ सुर साधु हित कृपासिंधु रघुबीर।।238।।

    अर्थ (Hindi)

    मथि प्रगटेउ सुर साधु हित कृपासिंधु रघुबीर।।238।।

  2360. RCM 2.239.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सखा समेत मनोहर जोटा। लखेउ न लखन सघन बन ओटा।।

    अर्थ (Hindi)

    सखा समेत मनोहर जोटा। लखेउ न लखन सघन बन ओटा।।

  2361. RCM 2.239.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भरत दीख प्रभु आश्रमु पावन। सकल सुमंगल सदनु सुहावन।।

    अर्थ (Hindi)

    भरत दीख प्रभु आश्रमु पावन। सकल सुमंगल सदनु सुहावन।।

  2362. RCM 2.239.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    करत प्रबेस मिटे दुख दावा। जनु जोगीं परमारथु पावा।।

    अर्थ (Hindi)

    करत प्रबेस मिटे दुख दावा। जनु जोगीं परमारथु पावा।।

  2363. RCM 2.239.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    देखे भरत लखन प्रभु आगे। पूँछे बचन कहत अनुरागे।।

    अर्थ (Hindi)

    देखे भरत लखन प्रभु आगे। पूँछे बचन कहत अनुरागे।।

  2364. RCM 2.239.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सीस जटा कटि मुनि पट बाँधें। तून कसें कर सरु धनु काँधें।।

    अर्थ (Hindi)

    सीस जटा कटि मुनि पट बाँधें। तून कसें कर सरु धनु काँधें।।

  2365. RCM 2.239.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बेदी पर मुनि साधु समाजू। सीय सहित राजत रघुराजू।।

    अर्थ (Hindi)

    बेदी पर मुनि साधु समाजू। सीय सहित राजत रघुराजू।।

  2366. RCM 2.239.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बलकल बसन जटिल तनु स्यामा। जनु मुनि बेष कीन्ह रति कामा।।

    अर्थ (Hindi)

    बलकल बसन जटिल तनु स्यामा। जनु मुनि बेष कीन्ह रति कामा।।

  2367. RCM 2.239.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कर कमलनि धनु सायकु फेरत। जिय की जरनि हरत हँसि हेरत।।

    अर्थ (Hindi)

    कर कमलनि धनु सायकु फेरत। जिय की जरनि हरत हँसि हेरत।।

  2368. RCM 2.239.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    लसत मंजु मुनि मंडली मध्य सीय रघुचंदु।

    अर्थ (Hindi)

    लसत मंजु मुनि मंडली मध्य सीय रघुचंदु।

  2369. RCM 2.239.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    ग्यान सभाँ जनु तनु धरे भगति सच्चिदानंदु।।239।।

    अर्थ (Hindi)

    ग्यान सभाँ जनु तनु धरे भगति सच्चिदानंदु।।239।।

  2370. RCM 2.240.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सानुज सखा समेत मगन मन। बिसरे हरष सोक सुख दुख गन।।

    अर्थ (Hindi)

    सानुज सखा समेत मगन मन। बिसरे हरष सोक सुख दुख गन।।

  2371. RCM 2.240.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पाहि नाथ कहि पाहि गोसाई। भूतल परे लकुट की नाई।।

    अर्थ (Hindi)

    पाहि नाथ कहि पाहि गोसाई। भूतल परे लकुट की नाई।।

  2372. RCM 2.240.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बचन सपेम लखन पहिचाने। करत प्रनामु भरत जियँ जाने।।

    अर्थ (Hindi)

    बचन सपेम लखन पहिचाने। करत प्रनामु भरत जियँ जाने।।

  2373. RCM 2.240.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बंधु सनेह सरस एहि ओरा। उत साहिब सेवा बस जोरा।।

    अर्थ (Hindi)

    बंधु सनेह सरस एहि ओरा। उत साहिब सेवा बस जोरा।।

  2374. RCM 2.240.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मिलि न जाइ नहिं गुदरत बनई। सुकबि लखन मन की गति भनई।।

    अर्थ (Hindi)

    मिलि न जाइ नहिं गुदरत बनई। सुकबि लखन मन की गति भनई।।

  2375. RCM 2.240.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    रहे राखि सेवा पर भारू। चढ़ी चंग जनु खैंच खेलारू।।

    अर्थ (Hindi)

    रहे राखि सेवा पर भारू। चढ़ी चंग जनु खैंच खेलारू।।

  2376. RCM 2.240.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कहत सप्रेम नाइ महि माथा। भरत प्रनाम करत रघुनाथा।।

    अर्थ (Hindi)

    कहत सप्रेम नाइ महि माथा। भरत प्रनाम करत रघुनाथा।।

  2377. RCM 2.240.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    उठे रामु सुनि पेम अधीरा। कहुँ पट कहुँ निषंग धनु तीरा।।

    अर्थ (Hindi)

    उठे रामु सुनि पेम अधीरा। कहुँ पट कहुँ निषंग धनु तीरा।।

  2378. RCM 2.240.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बरबस लिए उठाइ उर लाए कृपानिधान।

    अर्थ (Hindi)

    बरबस लिए उठाइ उर लाए कृपानिधान।

  2379. RCM 2.240.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भरत राम की मिलनि लखि बिसरे सबहि अपान।।240।।

    अर्थ (Hindi)

    भरत राम की मिलनि लखि बिसरे सबहि अपान।।240।।

  2380. RCM 2.241.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मिलनि प्रीति किमि जाइ बखानी। कबिकुल अगम करम मन बानी।।

    अर्थ (Hindi)

    मिलनि प्रीति किमि जाइ बखानी। कबिकुल अगम करम मन बानी।।

  2381. RCM 2.241.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    परम पेम पूरन दोउ भाई। मन बुधि चित अहमिति बिसराई।।

    अर्थ (Hindi)

    परम पेम पूरन दोउ भाई। मन बुधि चित अहमिति बिसराई।।

  2382. RCM 2.241.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कहहु सुपेम प्रगट को करई। केहि छाया कबि मति अनुसरई।।

    अर्थ (Hindi)

    कहहु सुपेम प्रगट को करई। केहि छाया कबि मति अनुसरई।।

  2383. RCM 2.241.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कबिहि अरथ आखर बलु साँचा। अनुहरि ताल गतिहि नटु नाचा।।

    अर्थ (Hindi)

    कबिहि अरथ आखर बलु साँचा। अनुहरि ताल गतिहि नटु नाचा।।

  2384. RCM 2.241.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अगम सनेह भरत रघुबर को। जहँ न जाइ मनु बिधि हरि हर को।।

    अर्थ (Hindi)

    अगम सनेह भरत रघुबर को। जहँ न जाइ मनु बिधि हरि हर को।।

  2385. RCM 2.241.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सो मैं कुमति कहौं केहि भाँती। बाज सुराग कि गाँडर ताँती।।

    अर्थ (Hindi)

    सो मैं कुमति कहौं केहि भाँती। बाज सुराग कि गाँडर ताँती।।

  2386. RCM 2.241.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मिलनि बिलोकि भरत रघुबर की। सुरगन सभय धकधकी धरकी।।

    अर्थ (Hindi)

    मिलनि बिलोकि भरत रघुबर की। सुरगन सभय धकधकी धरकी।।

  2387. RCM 2.241.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    समुझाए सुरगुरु जड़ जागे। बरषि प्रसून प्रसंसन लागे।।

    अर्थ (Hindi)

    समुझाए सुरगुरु जड़ जागे। बरषि प्रसून प्रसंसन लागे।।

  2388. RCM 2.241.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मिलि सपेम रिपुसूदनहि केवटु भेंटेउ राम।

    अर्थ (Hindi)

    मिलि सपेम रिपुसूदनहि केवटु भेंटेउ राम।

  2389. RCM 2.241.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भूरि भायँ भेंटे भरत लछिमन करत प्रनाम।।241।।

    अर्थ (Hindi)

    भूरि भायँ भेंटे भरत लछिमन करत प्रनाम।।241।।

  2390. RCM 2.242.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भेंटेउ लखन ललकि लघु भाई। बहुरि निषादु लीन्ह उर लाई।।

    अर्थ (Hindi)

    भेंटेउ लखन ललकि लघु भाई। बहुरि निषादु लीन्ह उर लाई।।

  2391. RCM 2.242.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पुनि मुनिगन दुहुँ भाइन्ह बंदे। अभिमत आसिष पाइ अनंदे।।

    अर्थ (Hindi)

    पुनि मुनिगन दुहुँ भाइन्ह बंदे। अभिमत आसिष पाइ अनंदे।।

  2392. RCM 2.242.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सानुज भरत उमगि अनुरागा। धरि सिर सिय पद पदुम परागा।।

    अर्थ (Hindi)

    सानुज भरत उमगि अनुरागा। धरि सिर सिय पद पदुम परागा।।

  2393. RCM 2.242.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पुनि पुनि करत प्रनाम उठाए। सिर कर कमल परसि बैठाए।।

    अर्थ (Hindi)

    पुनि पुनि करत प्रनाम उठाए। सिर कर कमल परसि बैठाए।।

  2394. RCM 2.242.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सीयँ असीस दीन्हि मन माहीं। मगन सनेहँ देह सुधि नाहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    सीयँ असीस दीन्हि मन माहीं। मगन सनेहँ देह सुधि नाहीं।।

  2395. RCM 2.242.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सब बिधि सानुकूल लखि सीता। भे निसोच उर अपडर बीता।।

    अर्थ (Hindi)

    सब बिधि सानुकूल लखि सीता। भे निसोच उर अपडर बीता।।

  2396. RCM 2.242.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कोउ किछु कहइ न कोउ किछु पूँछा। प्रेम भरा मन निज गति छूँछा।।

    अर्थ (Hindi)

    कोउ किछु कहइ न कोउ किछु पूँछा। प्रेम भरा मन निज गति छूँछा।।

  2397. RCM 2.242.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तेहि अवसर केवटु धीरजु धरि। जोरि पानि बिनवत प्रनामु करि।।

    अर्थ (Hindi)

    तेहि अवसर केवटु धीरजु धरि। जोरि पानि बिनवत प्रनामु करि।।

  2398. RCM 2.242.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नाथ साथ मुनिनाथ के मातु सकल पुर लोग।

    अर्थ (Hindi)

    नाथ साथ मुनिनाथ के मातु सकल पुर लोग।

  2399. RCM 2.242.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सेवक सेनप सचिव सब आए बिकल बियोग।।242।।

    अर्थ (Hindi)

    सेवक सेनप सचिव सब आए बिकल बियोग।।242।।

  2400. RCM 2.243.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सीलसिंधु सुनि गुर आगवनू। सिय समीप राखे रिपुदवनू।।

    अर्थ (Hindi)

    सीलसिंधु सुनि गुर आगवनू। सिय समीप राखे रिपुदवनू।।

  2401. RCM 2.243.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    चले सबेग रामु तेहि काला। धीर धरम धुर दीनदयाला।।

    अर्थ (Hindi)

    चले सबेग रामु तेहि काला। धीर धरम धुर दीनदयाला।।

  2402. RCM 2.243.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    गुरहि देखि सानुज अनुरागे। दंड प्रनाम करन प्रभु लागे।।

    अर्थ (Hindi)

    गुरहि देखि सानुज अनुरागे। दंड प्रनाम करन प्रभु लागे।।

  2403. RCM 2.243.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मुनिबर धाइ लिए उर लाई। प्रेम उमगि भेंटे दोउ भाई।।

    अर्थ (Hindi)

    मुनिबर धाइ लिए उर लाई। प्रेम उमगि भेंटे दोउ भाई।।

  2404. RCM 2.243.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    प्रेम पुलकि केवट कहि नामू। कीन्ह दूरि तें दंड प्रनामू।।

    अर्थ (Hindi)

    प्रेम पुलकि केवट कहि नामू। कीन्ह दूरि तें दंड प्रनामू।।

  2405. RCM 2.243.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    रामसखा रिषि बरबस भेंटा। जनु महि लुठत सनेह समेटा।।

    अर्थ (Hindi)

    रामसखा रिषि बरबस भेंटा। जनु महि लुठत सनेह समेटा।।

  2406. RCM 2.243.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    रघुपति भगति सुमंगल मूला। नभ सराहि सुर बरिसहिं फूला।।

    अर्थ (Hindi)

    रघुपति भगति सुमंगल मूला। नभ सराहि सुर बरिसहिं फूला।।

  2407. RCM 2.243.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    एहि सम निपट नीच कोउ नाहीं। बड़ बसिष्ठ सम को जग माहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    एहि सम निपट नीच कोउ नाहीं। बड़ बसिष्ठ सम को जग माहीं।।

  2408. RCM 2.243.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जेहि लखि लखनहु तें अधिक मिले मुदित मुनिराउ।

    अर्थ (Hindi)

    जेहि लखि लखनहु तें अधिक मिले मुदित मुनिराउ।

  2409. RCM 2.243.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सो सीतापति भजन को प्रगट प्रताप प्रभाउ।।243।।

    अर्थ (Hindi)

    सो सीतापति भजन को प्रगट प्रताप प्रभाउ।।243।।

  2410. RCM 2.244.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    आरत लोग राम सबु जाना। करुनाकर सुजान भगवाना।।

    अर्थ (Hindi)

    आरत लोग राम सबु जाना। करुनाकर सुजान भगवाना।।

  2411. RCM 2.244.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जो जेहि भायँ रहा अभिलाषी। तेहि तेहि कै तसि तसि रुख राखी।।

    अर्थ (Hindi)

    जो जेहि भायँ रहा अभिलाषी। तेहि तेहि कै तसि तसि रुख राखी।।

  2412. RCM 2.244.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सानुज मिलि पल महु सब काहू। कीन्ह दूरि दुखु दारुन दाहू।।

    अर्थ (Hindi)

    सानुज मिलि पल महु सब काहू। कीन्ह दूरि दुखु दारुन दाहू।।

  2413. RCM 2.244.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    यह बड़ि बातँ राम कै नाहीं। जिमि घट कोटि एक रबि छाहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    यह बड़ि बातँ राम कै नाहीं। जिमि घट कोटि एक रबि छाहीं।।

  2414. RCM 2.244.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मिलि केवटिहि उमगि अनुरागा। पुरजन सकल सराहहिं भागा।।

    अर्थ (Hindi)

    मिलि केवटिहि उमगि अनुरागा। पुरजन सकल सराहहिं भागा।।

  2415. RCM 2.244.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    देखीं राम दुखित महतारीं। जनु सुबेलि अवलीं हिम मारीं।।

    अर्थ (Hindi)

    देखीं राम दुखित महतारीं। जनु सुबेलि अवलीं हिम मारीं।।

  2416. RCM 2.244.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    प्रथम राम भेंटी कैकेई। सरल सुभायँ भगति मति भेई।।

    अर्थ (Hindi)

    प्रथम राम भेंटी कैकेई। सरल सुभायँ भगति मति भेई।।

  2417. RCM 2.244.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पग परि कीन्ह प्रबोधु बहोरी। काल करम बिधि सिर धरि खोरी।।

    अर्थ (Hindi)

    पग परि कीन्ह प्रबोधु बहोरी। काल करम बिधि सिर धरि खोरी।।

  2418. RCM 2.244.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भेटीं रघुबर मातु सब करि प्रबोधु परितोषु।।

    अर्थ (Hindi)

    भेटीं रघुबर मातु सब करि प्रबोधु परितोषु।।

  2419. RCM 2.244.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अंब ईस आधीन जगु काहु न देइअ दोषु।।244।।

    अर्थ (Hindi)

    अंब ईस आधीन जगु काहु न देइअ दोषु।।244।।

  2420. RCM 2.245.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    गुरतिय पद बंदे दुहु भाई। सहित बिप्रतिय जे सँग आई।।

    अर्थ (Hindi)

    गुरतिय पद बंदे दुहु भाई। सहित बिप्रतिय जे सँग आई।।

  2421. RCM 2.245.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    गंग गौरि सम सब सनमानीं।।देहिं असीस मुदित मृदु बानी।।

    अर्थ (Hindi)

    गंग गौरि सम सब सनमानीं।।देहिं असीस मुदित मृदु बानी।।

  2422. RCM 2.245.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    गहि पद लगे सुमित्रा अंका। जनु भेटीं संपति अति रंका।।

    अर्थ (Hindi)

    गहि पद लगे सुमित्रा अंका। जनु भेटीं संपति अति रंका।।

  2423. RCM 2.245.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पुनि जननि चरननि दोउ भ्राता। परे पेम ब्याकुल सब गाता।।

    अर्थ (Hindi)

    पुनि जननि चरननि दोउ भ्राता। परे पेम ब्याकुल सब गाता।।

  2424. RCM 2.245.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अति अनुराग अंब उर लाए। नयन सनेह सलिल अन्हवाए।।

    अर्थ (Hindi)

    अति अनुराग अंब उर लाए। नयन सनेह सलिल अन्हवाए।।

  2425. RCM 2.245.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तेहि अवसर कर हरष बिषादू। किमि कबि कहै मूक जिमि स्वादू।।

    अर्थ (Hindi)

    तेहि अवसर कर हरष बिषादू। किमि कबि कहै मूक जिमि स्वादू।।

  2426. RCM 2.245.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मिलि जननहि सानुज रघुराऊ। गुर सन कहेउ कि धारिअ पाऊ।।

    अर्थ (Hindi)

    मिलि जननहि सानुज रघुराऊ। गुर सन कहेउ कि धारिअ पाऊ।।

  2427. RCM 2.245.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पुरजन पाइ मुनीस नियोगू। जल थल तकि तकि उतरेउ लोगू।।

    अर्थ (Hindi)

    पुरजन पाइ मुनीस नियोगू। जल थल तकि तकि उतरेउ लोगू।।

  2428. RCM 2.245.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    महिसुर मंत्री मातु गुर गने लोग लिए साथ।।

    अर्थ (Hindi)

    महिसुर मंत्री मातु गुर गने लोग लिए साथ।।

  2429. RCM 2.245.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पावन आश्रम गवनु किय भरत लखन रघुनाथ।।245।।

    अर्थ (Hindi)

    पावन आश्रम गवनु किय भरत लखन रघुनाथ।।245।।

  2430. RCM 2.246.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सीय आइ मुनिबर पग लागी। उचित असीस लही मन मागी।।

    अर्थ (Hindi)

    सीय आइ मुनिबर पग लागी। उचित असीस लही मन मागी।।

  2431. RCM 2.246.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    गुरपतिनिहि मुनितियन्ह समेता। मिली पेमु कहि जाइ न जेता।।

    अर्थ (Hindi)

    गुरपतिनिहि मुनितियन्ह समेता। मिली पेमु कहि जाइ न जेता।।

  2432. RCM 2.246.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बंदि बंदि पग सिय सबही के। आसिरबचन लहे प्रिय जी के।।

    अर्थ (Hindi)

    बंदि बंदि पग सिय सबही के। आसिरबचन लहे प्रिय जी के।।

  2433. RCM 2.246.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सासु सकल जब सीयँ निहारीं। मूदे नयन सहमि सुकुमारीं।।

    अर्थ (Hindi)

    सासु सकल जब सीयँ निहारीं। मूदे नयन सहमि सुकुमारीं।।

  2434. RCM 2.246.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    परीं बधिक बस मनहुँ मरालीं। काह कीन्ह करतार कुचालीं।।

    अर्थ (Hindi)

    परीं बधिक बस मनहुँ मरालीं। काह कीन्ह करतार कुचालीं।।

  2435. RCM 2.246.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तिन्ह सिय निरखि निपट दुखु पावा। सो सबु सहिअ जो दैउ सहावा।।

    अर्थ (Hindi)

    तिन्ह सिय निरखि निपट दुखु पावा। सो सबु सहिअ जो दैउ सहावा।।

  2436. RCM 2.246.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जनकसुता तब उर धरि धीरा। नील नलिन लोयन भरि नीरा।।

    अर्थ (Hindi)

    जनकसुता तब उर धरि धीरा। नील नलिन लोयन भरि नीरा।।

  2437. RCM 2.246.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मिली सकल सासुन्ह सिय जाई। तेहि अवसर करुना महि छाई।।

    अर्थ (Hindi)

    मिली सकल सासुन्ह सिय जाई। तेहि अवसर करुना महि छाई।।

  2438. RCM 2.246.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    लागि लागि पग सबनि सिय भेंटति अति अनुराग।।

    अर्थ (Hindi)

    लागि लागि पग सबनि सिय भेंटति अति अनुराग।।

  2439. RCM 2.246.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    हृदयँ असीसहिं पेम बस रहिअहु भरी सोहाग।।246।।

    अर्थ (Hindi)

    हृदयँ असीसहिं पेम बस रहिअहु भरी सोहाग।।246।।

  2440. RCM 2.247.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बिकल सनेहँ सीय सब रानीं। बैठन सबहि कहेउ गुर ग्यानीं।।

    अर्थ (Hindi)

    बिकल सनेहँ सीय सब रानीं। बैठन सबहि कहेउ गुर ग्यानीं।।

  2441. RCM 2.247.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कहि जग गति मायिक मुनिनाथा। कहे कछुक परमारथ गाथा।।

    अर्थ (Hindi)

    कहि जग गति मायिक मुनिनाथा। कहे कछुक परमारथ गाथा।।

  2442. RCM 2.247.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नृप कर सुरपुर गवनु सुनावा। सुनि रघुनाथ दुसह दुखु पावा।।

    अर्थ (Hindi)

    नृप कर सुरपुर गवनु सुनावा। सुनि रघुनाथ दुसह दुखु पावा।।

  2443. RCM 2.247.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मरन हेतु निज नेहु बिचारी। भे अति बिकल धीर धुर धारी।।

    अर्थ (Hindi)

    मरन हेतु निज नेहु बिचारी। भे अति बिकल धीर धुर धारी।।

  2444. RCM 2.247.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कुलिस कठोर सुनत कटु बानी। बिलपत लखन सीय सब रानी।।

    अर्थ (Hindi)

    कुलिस कठोर सुनत कटु बानी। बिलपत लखन सीय सब रानी।।

  2445. RCM 2.247.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सोक बिकल अति सकल समाजू। मानहुँ राजु अकाजेउ आजू।।

    अर्थ (Hindi)

    सोक बिकल अति सकल समाजू। मानहुँ राजु अकाजेउ आजू।।

  2446. RCM 2.247.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मुनिबर बहुरि राम समुझाए। सहित समाज सुसरित नहाए।।

    अर्थ (Hindi)

    मुनिबर बहुरि राम समुझाए। सहित समाज सुसरित नहाए।।

  2447. RCM 2.247.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    ब्रतु निरंबु तेहि दिन प्रभु कीन्हा। मुनिहु कहें जलु काहुँ न लीन्हा।।

    अर्थ (Hindi)

    ब्रतु निरंबु तेहि दिन प्रभु कीन्हा। मुनिहु कहें जलु काहुँ न लीन्हा।।

  2448. RCM 2.247.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भोरु भएँ रघुनंदनहि जो मुनि आयसु दीन्ह।।

    अर्थ (Hindi)

    भोरु भएँ रघुनंदनहि जो मुनि आयसु दीन्ह।।

  2449. RCM 2.247.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    श्रद्धा भगति समेत प्रभु सो सबु सादरु कीन्ह।।247।।

    अर्थ (Hindi)

    श्रद्धा भगति समेत प्रभु सो सबु सादरु कीन्ह।।247।।

  2450. RCM 2.248.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    करि पितु क्रिया बेद जसि बरनी। भे पुनीत पातक तम तरनी।।

    अर्थ (Hindi)

    करि पितु क्रिया बेद जसि बरनी। भे पुनीत पातक तम तरनी।।

  2451. RCM 2.248.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जासु नाम पावक अघ तूला। सुमिरत सकल सुमंगल मूला।।

    अर्थ (Hindi)

    जासु नाम पावक अघ तूला। सुमिरत सकल सुमंगल मूला।।

  2452. RCM 2.248.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुद्ध सो भयउ साधु संमत अस। तीरथ आवाहन सुरसरि जस।।

    अर्थ (Hindi)

    सुद्ध सो भयउ साधु संमत अस। तीरथ आवाहन सुरसरि जस।।

  2453. RCM 2.248.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुद्ध भएँ दुइ बासर बीते। बोले गुर सन राम पिरीते।।

    अर्थ (Hindi)

    सुद्ध भएँ दुइ बासर बीते। बोले गुर सन राम पिरीते।।

  2454. RCM 2.248.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नाथ लोग सब निपट दुखारी। कंद मूल फल अंबु अहारी।।

    अर्थ (Hindi)

    नाथ लोग सब निपट दुखारी। कंद मूल फल अंबु अहारी।।

  2455. RCM 2.248.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सानुज भरतु सचिव सब माता। देखि मोहि पल जिमि जुग जाता।।

    अर्थ (Hindi)

    सानुज भरतु सचिव सब माता। देखि मोहि पल जिमि जुग जाता।।

  2456. RCM 2.248.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सब समेत पुर धारिअ पाऊ। आपु इहाँ अमरावति राऊ।।

    अर्थ (Hindi)

    सब समेत पुर धारिअ पाऊ। आपु इहाँ अमरावति राऊ।।

  2457. RCM 2.248.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बहुत कहेउँ सब कियउँ ढिठाई। उचित होइ तस करिअ गोसाँई।।

    अर्थ (Hindi)

    बहुत कहेउँ सब कियउँ ढिठाई। उचित होइ तस करिअ गोसाँई।।

  2458. RCM 2.248.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    धर्म सेतु करुनायतन कस न कहहु अस राम।

    अर्थ (Hindi)

    धर्म सेतु करुनायतन कस न कहहु अस राम।

  2459. RCM 2.248.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    लोग दुखित दिन दुइ दरस देखि लहहुँ बिश्राम।।248।।

    अर्थ (Hindi)

    लोग दुखित दिन दुइ दरस देखि लहहुँ बिश्राम।।248।।

  2460. RCM 2.249.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राम बचन सुनि सभय समाजू। जनु जलनिधि महुँ बिकल जहाजू।।

    अर्थ (Hindi)

    राम बचन सुनि सभय समाजू। जनु जलनिधि महुँ बिकल जहाजू।।

  2461. RCM 2.249.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनि गुर गिरा सुमंगल मूला। भयउ मनहुँ मारुत अनुकुला।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनि गुर गिरा सुमंगल मूला। भयउ मनहुँ मारुत अनुकुला।।

  2462. RCM 2.249.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पावन पयँ तिहुँ काल नहाहीं। जो बिलोकि अंघ ओघ नसाहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    पावन पयँ तिहुँ काल नहाहीं। जो बिलोकि अंघ ओघ नसाहीं।।

  2463. RCM 2.249.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मंगलमूरति लोचन भरि भरि। निरखहिं हरषि दंडवत करि करि।।

    अर्थ (Hindi)

    मंगलमूरति लोचन भरि भरि। निरखहिं हरषि दंडवत करि करि।।

  2464. RCM 2.249.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राम सैल बन देखन जाहीं। जहँ सुख सकल सकल दुख नाहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    राम सैल बन देखन जाहीं। जहँ सुख सकल सकल दुख नाहीं।।

  2465. RCM 2.249.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    झरना झरिहिं सुधासम बारी। त्रिबिध तापहर त्रिबिध बयारी।।

    अर्थ (Hindi)

    झरना झरिहिं सुधासम बारी। त्रिबिध तापहर त्रिबिध बयारी।।

  2466. RCM 2.249.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बिटप बेलि तृन अगनित जाती। फल प्रसून पल्लव बहु भाँती।।

    अर्थ (Hindi)

    बिटप बेलि तृन अगनित जाती। फल प्रसून पल्लव बहु भाँती।।

  2467. RCM 2.249.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुंदर सिला सुखद तरु छाहीं। जाइ बरनि बन छबि केहि पाहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    सुंदर सिला सुखद तरु छाहीं। जाइ बरनि बन छबि केहि पाहीं।।

  2468. RCM 2.249.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सरनि सरोरुह जल बिहग कूजत गुंजत भृंग।

    अर्थ (Hindi)

    सरनि सरोरुह जल बिहग कूजत गुंजत भृंग।

  2469. RCM 2.249.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बैर बिगत बिहरत बिपिन मृग बिहंग बहुरंग।।249।।

    अर्थ (Hindi)

    बैर बिगत बिहरत बिपिन मृग बिहंग बहुरंग।।249।।

  2470. RCM 2.250.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कोल किरात भिल्ल बनबासी। मधु सुचि सुंदर स्वादु सुधा सी।।

    अर्थ (Hindi)

    कोल किरात भिल्ल बनबासी। मधु सुचि सुंदर स्वादु सुधा सी।।

  2471. RCM 2.250.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भरि भरि परन पुटीं रचि रुरी। कंद मूल फल अंकुर जूरी।।

    अर्थ (Hindi)

    भरि भरि परन पुटीं रचि रुरी। कंद मूल फल अंकुर जूरी।।

  2472. RCM 2.250.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सबहि देहिं करि बिनय प्रनामा। कहि कहि स्वाद भेद गुन नामा।।

    अर्थ (Hindi)

    सबहि देहिं करि बिनय प्रनामा। कहि कहि स्वाद भेद गुन नामा।।

  2473. RCM 2.250.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    देहिं लोग बहु मोल न लेहीं। फेरत राम दोहाई देहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    देहिं लोग बहु मोल न लेहीं। फेरत राम दोहाई देहीं।।

  2474. RCM 2.250.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कहहिं सनेह मगन मृदु बानी। मानत साधु पेम पहिचानी।।

    अर्थ (Hindi)

    कहहिं सनेह मगन मृदु बानी। मानत साधु पेम पहिचानी।।

  2475. RCM 2.250.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तुम्ह सुकृती हम नीच निषादा। पावा दरसनु राम प्रसादा।।

    अर्थ (Hindi)

    तुम्ह सुकृती हम नीच निषादा। पावा दरसनु राम प्रसादा।।

  2476. RCM 2.250.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    हमहि अगम अति दरसु तुम्हारा। जस मरु धरनि देवधुनि धारा।।

    अर्थ (Hindi)

    हमहि अगम अति दरसु तुम्हारा। जस मरु धरनि देवधुनि धारा।।

  2477. RCM 2.250.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राम कृपाल निषाद नेवाजा। परिजन प्रजउ चहिअ जस राजा।।

    अर्थ (Hindi)

    राम कृपाल निषाद नेवाजा। परिजन प्रजउ चहिअ जस राजा।।

  2478. RCM 2.250.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    यह जिंयँ जानि सँकोचु तजि करिअ छोहु लखि नेहु।

    अर्थ (Hindi)

    यह जिंयँ जानि सँकोचु तजि करिअ छोहु लखि नेहु।

  2479. RCM 2.250.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    हमहि कृतारथ करन लगि फल तृन अंकुर लेहु।।250।।

    अर्थ (Hindi)

    हमहि कृतारथ करन लगि फल तृन अंकुर लेहु।।250।।

  2480. RCM 2.251.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तुम्ह प्रिय पाहुने बन पगु धारे। सेवा जोगु न भाग हमारे।।

    अर्थ (Hindi)

    तुम्ह प्रिय पाहुने बन पगु धारे। सेवा जोगु न भाग हमारे।।

  2481. RCM 2.251.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    देब काह हम तुम्हहि गोसाँई। ईधनु पात किरात मिताई।।

    अर्थ (Hindi)

    देब काह हम तुम्हहि गोसाँई। ईधनु पात किरात मिताई।।

  2482. RCM 2.251.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    यह हमारि अति बड़ि सेवकाई। लेहि न बासन बसन चोराई।।

    अर्थ (Hindi)

    यह हमारि अति बड़ि सेवकाई। लेहि न बासन बसन चोराई।।

  2483. RCM 2.251.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    हम जड़ जीव जीव गन घाती। कुटिल कुचाली कुमति कुजाती।।

    अर्थ (Hindi)

    हम जड़ जीव जीव गन घाती। कुटिल कुचाली कुमति कुजाती।।

  2484. RCM 2.251.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पाप करत निसि बासर जाहीं। नहिं पट कटि नहि पेट अघाहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    पाप करत निसि बासर जाहीं। नहिं पट कटि नहि पेट अघाहीं।।

  2485. RCM 2.251.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सपोनेहुँ धरम बुद्धि कस काऊ। यह रघुनंदन दरस प्रभाऊ।।

    अर्थ (Hindi)

    सपोनेहुँ धरम बुद्धि कस काऊ। यह रघुनंदन दरस प्रभाऊ।।

  2486. RCM 2.251.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जब तें प्रभु पद पदुम निहारे। मिटे दुसह दुख दोष हमारे।।

    अर्थ (Hindi)

    जब तें प्रभु पद पदुम निहारे। मिटे दुसह दुख दोष हमारे।।

  2487. RCM 2.251.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बचन सुनत पुरजन अनुरागे। तिन्ह के भाग सराहन लागे।।

    अर्थ (Hindi)

    बचन सुनत पुरजन अनुरागे। तिन्ह के भाग सराहन लागे।।

  2488. RCM 2.252.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पुर जन नारि मगन अति प्रीती। बासर जाहिं पलक सम बीती।।

    अर्थ (Hindi)

    पुर जन नारि मगन अति प्रीती। बासर जाहिं पलक सम बीती।।

  2489. RCM 2.252.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सीय सासु प्रति बेष बनाई। सादर करइ सरिस सेवकाई।।

    अर्थ (Hindi)

    सीय सासु प्रति बेष बनाई। सादर करइ सरिस सेवकाई।।

  2490. RCM 2.252.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    लखा न मरमु राम बिनु काहूँ। माया सब सिय माया माहूँ।।

    अर्थ (Hindi)

    लखा न मरमु राम बिनु काहूँ। माया सब सिय माया माहूँ।।

  2491. RCM 2.252.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सीयँ सासु सेवा बस कीन्हीं। तिन्ह लहि सुख सिख आसिष दीन्हीं।।

    अर्थ (Hindi)

    सीयँ सासु सेवा बस कीन्हीं। तिन्ह लहि सुख सिख आसिष दीन्हीं।।

  2492. RCM 2.252.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    लखि सिय सहित सरल दोउ भाई। कुटिल रानि पछितानि अघाई।।

    अर्थ (Hindi)

    लखि सिय सहित सरल दोउ भाई। कुटिल रानि पछितानि अघाई।।

  2493. RCM 2.252.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अवनि जमहि जाचति कैकेई। महि न बीचु बिधि मीचु न देई।।

    अर्थ (Hindi)

    अवनि जमहि जाचति कैकेई। महि न बीचु बिधि मीचु न देई।।

  2494. RCM 2.252.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    लोकहुँ बेद बिदित कबि कहहीं। राम बिमुख थलु नरक न लहहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    लोकहुँ बेद बिदित कबि कहहीं। राम बिमुख थलु नरक न लहहीं।।

  2495. RCM 2.252.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    यहु संसउ सब के मन माहीं। राम गवनु बिधि अवध कि नाहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    यहु संसउ सब के मन माहीं। राम गवनु बिधि अवध कि नाहीं।।

  2496. RCM 2.252.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    निसि न नीद नहिं भूख दिन भरतु बिकल सुचि सोच।

    अर्थ (Hindi)

    निसि न नीद नहिं भूख दिन भरतु बिकल सुचि सोच।

  2497. RCM 2.252.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नीच कीच बिच मगन जस मीनहि सलिल सँकोच।।252।।

    अर्थ (Hindi)

    नीच कीच बिच मगन जस मीनहि सलिल सँकोच।।252।।

  2498. RCM 2.253.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कीन्ही मातु मिस काल कुचाली। ईति भीति जस पाकत साली।।

    अर्थ (Hindi)

    कीन्ही मातु मिस काल कुचाली। ईति भीति जस पाकत साली।।

  2499. RCM 2.253.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    केहि बिधि होइ राम अभिषेकू। मोहि अवकलत उपाउ न एकू।।

    अर्थ (Hindi)

    केहि बिधि होइ राम अभिषेकू। मोहि अवकलत उपाउ न एकू।।

  2500. RCM 2.253.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अवसि फिरहिं गुर आयसु मानी। मुनि पुनि कहब राम रुचि जानी।।

    अर्थ (Hindi)

    अवसि फिरहिं गुर आयसु मानी। मुनि पुनि कहब राम रुचि जानी।।

  2501. RCM 2.253.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मातु कहेहुँ बहुरहिं रघुराऊ। राम जननि हठ करबि कि काऊ।।

    अर्थ (Hindi)

    मातु कहेहुँ बहुरहिं रघुराऊ। राम जननि हठ करबि कि काऊ।।

  2502. RCM 2.253.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मोहि अनुचर कर केतिक बाता। तेहि महँ कुसमउ बाम बिधाता।।

    अर्थ (Hindi)

    मोहि अनुचर कर केतिक बाता। तेहि महँ कुसमउ बाम बिधाता।।

  2503. RCM 2.253.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जौं हठ करउँ त निपट कुकरमू। हरगिरि तें गुरु सेवक धरमू।।

    अर्थ (Hindi)

    जौं हठ करउँ त निपट कुकरमू। हरगिरि तें गुरु सेवक धरमू।।

  2504. RCM 2.253.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    एकउ जुगुति न मन ठहरानी। सोचत भरतहि रैनि बिहानी।।

    अर्थ (Hindi)

    एकउ जुगुति न मन ठहरानी। सोचत भरतहि रैनि बिहानी।।

  2505. RCM 2.253.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    प्रात नहाइ प्रभुहि सिर नाई। बैठत पठए रिषयँ बोलाई।।

    अर्थ (Hindi)

    प्रात नहाइ प्रभुहि सिर नाई। बैठत पठए रिषयँ बोलाई।।

  2506. RCM 2.253.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    गुर पद कमल प्रनामु करि बैठे आयसु पाइ।

    अर्थ (Hindi)

    गुर पद कमल प्रनामु करि बैठे आयसु पाइ।

  2507. RCM 2.253.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बिप्र महाजन सचिव सब जुरे सभासद आइ।।253।।

    अर्थ (Hindi)

    बिप्र महाजन सचिव सब जुरे सभासद आइ।।253।।

  2508. RCM 2.254.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बोले मुनिबरु समय समाना। सुनहु सभासद भरत सुजाना।।

    अर्थ (Hindi)

    बोले मुनिबरु समय समाना। सुनहु सभासद भरत सुजाना।।

  2509. RCM 2.254.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    धरम धुरीन भानुकुल भानू। राजा रामु स्वबस भगवानू।।

    अर्थ (Hindi)

    धरम धुरीन भानुकुल भानू। राजा रामु स्वबस भगवानू।।

  2510. RCM 2.254.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सत्यसंध पालक श्रुति सेतू। राम जनमु जग मंगल हेतू।।

    अर्थ (Hindi)

    सत्यसंध पालक श्रुति सेतू। राम जनमु जग मंगल हेतू।।

  2511. RCM 2.254.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    गुर पितु मातु बचन अनुसारी। खल दलु दलन देव हितकारी।।

    अर्थ (Hindi)

    गुर पितु मातु बचन अनुसारी। खल दलु दलन देव हितकारी।।

  2512. RCM 2.254.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नीति प्रीति परमारथ स्वारथु। कोउ न राम सम जान जथारथु।।

    अर्थ (Hindi)

    नीति प्रीति परमारथ स्वारथु। कोउ न राम सम जान जथारथु।।

  2513. RCM 2.254.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बिधि हरि हरु ससि रबि दिसिपाला। माया जीव करम कुलि काला।।

    अर्थ (Hindi)

    बिधि हरि हरु ससि रबि दिसिपाला। माया जीव करम कुलि काला।।

  2514. RCM 2.254.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अहिप महिप जहँ लगि प्रभुताई। जोग सिद्धि निगमागम गाई।।

    अर्थ (Hindi)

    अहिप महिप जहँ लगि प्रभुताई। जोग सिद्धि निगमागम गाई।।

  2515. RCM 2.254.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    करि बिचार जिंयँ देखहु नीकें। राम रजाइ सीस सबही कें।।

    अर्थ (Hindi)

    करि बिचार जिंयँ देखहु नीकें। राम रजाइ सीस सबही कें।।

  2516. RCM 2.254.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राखें राम रजाइ रुख हम सब कर हित होइ।

    अर्थ (Hindi)

    राखें राम रजाइ रुख हम सब कर हित होइ।

  2517. RCM 2.254.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    समुझि सयाने करहु अब सब मिलि संमत सोइ।।254।।

    अर्थ (Hindi)

    समुझि सयाने करहु अब सब मिलि संमत सोइ।।254।।

  2518. RCM 2.255.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सब कहुँ सुखद राम अभिषेकू। मंगल मोद मूल मग एकू।।

    अर्थ (Hindi)

    सब कहुँ सुखद राम अभिषेकू। मंगल मोद मूल मग एकू।।

  2519. RCM 2.255.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    केहि बिधि अवध चलहिं रघुराऊ। कहहु समुझि सोइ करिअ उपाऊ।।

    अर्थ (Hindi)

    केहि बिधि अवध चलहिं रघुराऊ। कहहु समुझि सोइ करिअ उपाऊ।।

  2520. RCM 2.255.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सब सादर सुनि मुनिबर बानी। नय परमारथ स्वारथ सानी।।

    अर्थ (Hindi)

    सब सादर सुनि मुनिबर बानी। नय परमारथ स्वारथ सानी।।

  2521. RCM 2.255.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    उतरु न आव लोग भए भोरे। तब सिरु नाइ भरत कर जोरे।।

    अर्थ (Hindi)

    उतरु न आव लोग भए भोरे। तब सिरु नाइ भरत कर जोरे।।

  2522. RCM 2.255.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भानुबंस भए भूप घनेरे। अधिक एक तें एक बड़ेरे।।

    अर्थ (Hindi)

    भानुबंस भए भूप घनेरे। अधिक एक तें एक बड़ेरे।।

  2523. RCM 2.255.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जनमु हेतु सब कहँ पितु माता। करम सुभासुभ देइ बिधाता।।

    अर्थ (Hindi)

    जनमु हेतु सब कहँ पितु माता। करम सुभासुभ देइ बिधाता।।

  2524. RCM 2.255.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    दलि दुख सजइ सकल कल्याना। अस असीस राउरि जगु जाना।।

    अर्थ (Hindi)

    दलि दुख सजइ सकल कल्याना। अस असीस राउरि जगु जाना।।

  2525. RCM 2.255.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सो गोसाइँ बिधि गति जेहिं छेंकी। सकइ को टारि टेक जो टेकी।।

    अर्थ (Hindi)

    सो गोसाइँ बिधि गति जेहिं छेंकी। सकइ को टारि टेक जो टेकी।।

  2526. RCM 2.255.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बूझिअ मोहि उपाउ अब सो सब मोर अभागु।

    अर्थ (Hindi)

    बूझिअ मोहि उपाउ अब सो सब मोर अभागु।

  2527. RCM 2.255.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनि सनेहमय बचन गुर उर उमगा अनुरागु।।255।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनि सनेहमय बचन गुर उर उमगा अनुरागु।।255।।

  2528. RCM 2.256.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तात बात फुरि राम कृपाहीं। राम बिमुख सिधि सपनेहुँ नाहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    तात बात फुरि राम कृपाहीं। राम बिमुख सिधि सपनेहुँ नाहीं।।

  2529. RCM 2.256.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सकुचउँ तात कहत एक बाता। अरध तजहिं बुध सरबस जाता।।

    अर्थ (Hindi)

    सकुचउँ तात कहत एक बाता। अरध तजहिं बुध सरबस जाता।।

  2530. RCM 2.256.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तुम्ह कानन गवनहु दोउ भाई। फेरिअहिं लखन सीय रघुराई।।

    अर्थ (Hindi)

    तुम्ह कानन गवनहु दोउ भाई। फेरिअहिं लखन सीय रघुराई।।

  2531. RCM 2.256.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनि सुबचन हरषे दोउ भ्राता। भे प्रमोद परिपूरन गाता।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनि सुबचन हरषे दोउ भ्राता। भे प्रमोद परिपूरन गाता।।

  2532. RCM 2.256.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मन प्रसन्न तन तेजु बिराजा। जनु जिय राउ रामु भए राजा।।

    अर्थ (Hindi)

    मन प्रसन्न तन तेजु बिराजा। जनु जिय राउ रामु भए राजा।।

  2533. RCM 2.256.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बहुत लाभ लोगन्ह लघु हानी। सम दुख सुख सब रोवहिं रानी।।

    अर्थ (Hindi)

    बहुत लाभ लोगन्ह लघु हानी। सम दुख सुख सब रोवहिं रानी।।

  2534. RCM 2.256.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कहहिं भरतु मुनि कहा सो कीन्हे। फलु जग जीवन्ह अभिमत दीन्हे।।

    अर्थ (Hindi)

    कहहिं भरतु मुनि कहा सो कीन्हे। फलु जग जीवन्ह अभिमत दीन्हे।।

  2535. RCM 2.256.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कानन करउँ जनम भरि बासू। एहिं तें अधिक न मोर सुपासू।।

    अर्थ (Hindi)

    कानन करउँ जनम भरि बासू। एहिं तें अधिक न मोर सुपासू।।

  2536. RCM 2.256.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अँतरजामी रामु सिय तुम्ह सरबग्य सुजान।

    अर्थ (Hindi)

    अँतरजामी रामु सिय तुम्ह सरबग्य सुजान।

  2537. RCM 2.256.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जो फुर कहहु त नाथ निज कीजिअ बचनु प्रवान।।256।।

    अर्थ (Hindi)

    जो फुर कहहु त नाथ निज कीजिअ बचनु प्रवान।।256।।

  2538. RCM 2.257.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भरत बचन सुनि देखि सनेहू। सभा सहित मुनि भए बिदेहू।।

    अर्थ (Hindi)

    भरत बचन सुनि देखि सनेहू। सभा सहित मुनि भए बिदेहू।।

  2539. RCM 2.257.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भरत महा महिमा जलरासी। मुनि मति ठाढ़ि तीर अबला सी।।

    अर्थ (Hindi)

    भरत महा महिमा जलरासी। मुनि मति ठाढ़ि तीर अबला सी।।

  2540. RCM 2.257.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    गा चह पार जतनु हियँ हेरा। पावति नाव न बोहितु बेरा।।

    अर्थ (Hindi)

    गा चह पार जतनु हियँ हेरा। पावति नाव न बोहितु बेरा।।

  2541. RCM 2.257.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    औरु करिहि को भरत बड़ाई। सरसी सीपि कि सिंधु समाई।।

    अर्थ (Hindi)

    औरु करिहि को भरत बड़ाई। सरसी सीपि कि सिंधु समाई।।

  2542. RCM 2.257.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भरतु मुनिहि मन भीतर भाए। सहित समाज राम पहिं आए।।

    अर्थ (Hindi)

    भरतु मुनिहि मन भीतर भाए। सहित समाज राम पहिं आए।।

  2543. RCM 2.257.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    प्रभु प्रनामु करि दीन्ह सुआसनु। बैठे सब सुनि मुनि अनुसासनु।।

    अर्थ (Hindi)

    प्रभु प्रनामु करि दीन्ह सुआसनु। बैठे सब सुनि मुनि अनुसासनु।।

  2544. RCM 2.257.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बोले मुनिबरु बचन बिचारी। देस काल अवसर अनुहारी।।

    अर्थ (Hindi)

    बोले मुनिबरु बचन बिचारी। देस काल अवसर अनुहारी।।

  2545. RCM 2.257.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनहु राम सरबग्य सुजाना। धरम नीति गुन ग्यान निधाना।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनहु राम सरबग्य सुजाना। धरम नीति गुन ग्यान निधाना।।

  2546. RCM 2.257.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सब के उर अंतर बसहु जानहु भाउ कुभाउ।

    अर्थ (Hindi)

    सब के उर अंतर बसहु जानहु भाउ कुभाउ।

  2547. RCM 2.257.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पुरजन जननी भरत हित होइ सो कहिअ उपाउ।।257।।

    अर्थ (Hindi)

    पुरजन जननी भरत हित होइ सो कहिअ उपाउ।।257।।

  2548. RCM 2.258.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    आरत कहहिं बिचारि न काऊ। सूझ जूआरिहि आपन दाऊ।।

    अर्थ (Hindi)

    आरत कहहिं बिचारि न काऊ। सूझ जूआरिहि आपन दाऊ।।

  2549. RCM 2.258.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनि मुनि बचन कहत रघुराऊ। नाथ तुम्हारेहि हाथ उपाऊ।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनि मुनि बचन कहत रघुराऊ। नाथ तुम्हारेहि हाथ उपाऊ।।

  2550. RCM 2.258.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सब कर हित रुख राउरि राखें। आयसु किएँ मुदित फुर भाषें।।

    अर्थ (Hindi)

    सब कर हित रुख राउरि राखें। आयसु किएँ मुदित फुर भाषें।।

  2551. RCM 2.258.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    प्रथम जो आयसु मो कहुँ होई। माथें मानि करौ सिख सोई।।

    अर्थ (Hindi)

    प्रथम जो आयसु मो कहुँ होई। माथें मानि करौ सिख सोई।।

  2552. RCM 2.258.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पुनि जेहि कहँ जस कहब गोसाईं। सो सब भाँति घटिहि सेवकाईं।।

    अर्थ (Hindi)

    पुनि जेहि कहँ जस कहब गोसाईं। सो सब भाँति घटिहि सेवकाईं।।

  2553. RCM 2.258.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कह मुनि राम सत्य तुम्ह भाषा। भरत सनेहँ बिचारु न राखा।।

    अर्थ (Hindi)

    कह मुनि राम सत्य तुम्ह भाषा। भरत सनेहँ बिचारु न राखा।।

  2554. RCM 2.258.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तेहि तें कहउँ बहोरि बहोरी। भरत भगति बस भइ मति मोरी।।

    अर्थ (Hindi)

    तेहि तें कहउँ बहोरि बहोरी। भरत भगति बस भइ मति मोरी।।

  2555. RCM 2.258.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मोरें जान भरत रुचि राखि। जो कीजिअ सो सुभ सिव साखी।।

    अर्थ (Hindi)

    मोरें जान भरत रुचि राखि। जो कीजिअ सो सुभ सिव साखी।।

  2556. RCM 2.258.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भरत बिनय सादर सुनिअ करिअ बिचारु बहोरि।

    अर्थ (Hindi)

    भरत बिनय सादर सुनिअ करिअ बिचारु बहोरि।

  2557. RCM 2.258.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    करब साधुमत लोकमत नृपनय निगम निचोरि।।258।।

    अर्थ (Hindi)

    करब साधुमत लोकमत नृपनय निगम निचोरि।।258।।

  2558. RCM 2.259.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    गुरु अनुराग भरत पर देखी। राम ह्दयँ आनंदु बिसेषी।।

    अर्थ (Hindi)

    गुरु अनुराग भरत पर देखी। राम ह्दयँ आनंदु बिसेषी।।

  2559. RCM 2.259.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भरतहि धरम धुरंधर जानी। निज सेवक तन मानस बानी।।

    अर्थ (Hindi)

    भरतहि धरम धुरंधर जानी। निज सेवक तन मानस बानी।।

  2560. RCM 2.259.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बोले गुर आयस अनुकूला। बचन मंजु मृदु मंगलमूला।।

    अर्थ (Hindi)

    बोले गुर आयस अनुकूला। बचन मंजु मृदु मंगलमूला।।

  2561. RCM 2.259.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नाथ सपथ पितु चरन दोहाई। भयउ न भुअन भरत सम भाई।।

    अर्थ (Hindi)

    नाथ सपथ पितु चरन दोहाई। भयउ न भुअन भरत सम भाई।।

  2562. RCM 2.259.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जे गुर पद अंबुज अनुरागी। ते लोकहुँ बेदहुँ बड़भागी।।

    अर्थ (Hindi)

    जे गुर पद अंबुज अनुरागी। ते लोकहुँ बेदहुँ बड़भागी।।

  2563. RCM 2.259.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राउर जा पर अस अनुरागू। को कहि सकइ भरत कर भागू।।

    अर्थ (Hindi)

    राउर जा पर अस अनुरागू। को कहि सकइ भरत कर भागू।।

  2564. RCM 2.259.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    लखि लघु बंधु बुद्धि सकुचाई। करत बदन पर भरत बड़ाई।।

    अर्थ (Hindi)

    लखि लघु बंधु बुद्धि सकुचाई। करत बदन पर भरत बड़ाई।।

  2565. RCM 2.259.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भरतु कहहीं सोइ किएँ भलाई। अस कहि राम रहे अरगाई।।

    अर्थ (Hindi)

    भरतु कहहीं सोइ किएँ भलाई। अस कहि राम रहे अरगाई।।

  2566. RCM 2.259.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तब मुनि बोले भरत सन सब सँकोचु तजि तात।

    अर्थ (Hindi)

    तब मुनि बोले भरत सन सब सँकोचु तजि तात।

  2567. RCM 2.259.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कृपासिंधु प्रिय बंधु सन कहहु हृदय कै बात।।259।।

    अर्थ (Hindi)

    कृपासिंधु प्रिय बंधु सन कहहु हृदय कै बात।।259।।

  2568. RCM 2.260.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनि मुनि बचन राम रुख पाई। गुरु साहिब अनुकूल अघाई।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनि मुनि बचन राम रुख पाई। गुरु साहिब अनुकूल अघाई।।

  2569. RCM 2.260.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    लखि अपने सिर सबु छरु भारू। कहि न सकहिं कछु करहिं बिचारू।।

    अर्थ (Hindi)

    लखि अपने सिर सबु छरु भारू। कहि न सकहिं कछु करहिं बिचारू।।

  2570. RCM 2.260.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पुलकि सरीर सभाँ भए ठाढें। नीरज नयन नेह जल बाढ़ें।।

    अर्थ (Hindi)

    पुलकि सरीर सभाँ भए ठाढें। नीरज नयन नेह जल बाढ़ें।।

  2571. RCM 2.260.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कहब मोर मुनिनाथ निबाहा। एहि तें अधिक कहौं मैं काहा।

    अर्थ (Hindi)

    कहब मोर मुनिनाथ निबाहा। एहि तें अधिक कहौं मैं काहा।

  2572. RCM 2.260.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मैं जानउँ निज नाथ सुभाऊ। अपराधिहु पर कोह न काऊ।।

    अर्थ (Hindi)

    मैं जानउँ निज नाथ सुभाऊ। अपराधिहु पर कोह न काऊ।।

  2573. RCM 2.260.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मो पर कृपा सनेह बिसेषी। खेलत खुनिस न कबहूँ देखी।।

    अर्थ (Hindi)

    मो पर कृपा सनेह बिसेषी। खेलत खुनिस न कबहूँ देखी।।

  2574. RCM 2.260.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सिसुपन तेम परिहरेउँ न संगू। कबहुँ न कीन्ह मोर मन भंगू।।

    अर्थ (Hindi)

    सिसुपन तेम परिहरेउँ न संगू। कबहुँ न कीन्ह मोर मन भंगू।।

  2575. RCM 2.260.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मैं प्रभु कृपा रीति जियँ जोही। हारेहुँ खेल जितावहिं मोही।।

    अर्थ (Hindi)

    मैं प्रभु कृपा रीति जियँ जोही। हारेहुँ खेल जितावहिं मोही।।

  2576. RCM 2.260.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    महूँ सनेह सकोच बस सनमुख कही न बैन।

    अर्थ (Hindi)

    महूँ सनेह सकोच बस सनमुख कही न बैन।

  2577. RCM 2.260.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    दरसन तृपित न आजु लगि पेम पिआसे नैन।।260।।

    अर्थ (Hindi)

    दरसन तृपित न आजु लगि पेम पिआसे नैन।।260।।

  2578. RCM 2.261.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बिधि न सकेउ सहि मोर दुलारा। नीच बीचु जननी मिस पारा।

    अर्थ (Hindi)

    बिधि न सकेउ सहि मोर दुलारा। नीच बीचु जननी मिस पारा।

  2579. RCM 2.261.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    यहउ कहत मोहि आजु न सोभा। अपनीं समुझि साधु सुचि को भा।।

    अर्थ (Hindi)

    यहउ कहत मोहि आजु न सोभा। अपनीं समुझि साधु सुचि को भा।।

  2580. RCM 2.261.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मातु मंदि मैं साधु सुचाली। उर अस आनत कोटि कुचाली।।

    अर्थ (Hindi)

    मातु मंदि मैं साधु सुचाली। उर अस आनत कोटि कुचाली।।

  2581. RCM 2.261.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    फरइ कि कोदव बालि सुसाली। मुकुता प्रसव कि संबुक काली।।

    अर्थ (Hindi)

    फरइ कि कोदव बालि सुसाली। मुकुता प्रसव कि संबुक काली।।

  2582. RCM 2.261.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सपनेहुँ दोसक लेसु न काहू। मोर अभाग उदधि अवगाहू।।

    अर्थ (Hindi)

    सपनेहुँ दोसक लेसु न काहू। मोर अभाग उदधि अवगाहू।।

  2583. RCM 2.261.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बिनु समुझें निज अघ परिपाकू। जारिउँ जायँ जननि कहि काकू।।

    अर्थ (Hindi)

    बिनु समुझें निज अघ परिपाकू। जारिउँ जायँ जननि कहि काकू।।

  2584. RCM 2.261.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    हृदयँ हेरि हारेउँ सब ओरा। एकहि भाँति भलेहिं भल मोरा।।

    अर्थ (Hindi)

    हृदयँ हेरि हारेउँ सब ओरा। एकहि भाँति भलेहिं भल मोरा।।

  2585. RCM 2.261.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    गुर गोसाइँ साहिब सिय रामू। लागत मोहि नीक परिनामू।।

    अर्थ (Hindi)

    गुर गोसाइँ साहिब सिय रामू। लागत मोहि नीक परिनामू।।

  2586. RCM 2.261.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    साधु सभा गुर प्रभु निकट कहउँ सुथल सति भाउ।

    अर्थ (Hindi)

    साधु सभा गुर प्रभु निकट कहउँ सुथल सति भाउ।

  2587. RCM 2.261.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    प्रेम प्रपंचु कि झूठ फुर जानहिं मुनि रघुराउ।।261।।

    अर्थ (Hindi)

    प्रेम प्रपंचु कि झूठ फुर जानहिं मुनि रघुराउ।।261।।

  2588. RCM 2.262.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भूपति मरन पेम पनु राखी। जननी कुमति जगतु सबु साखी।।

    अर्थ (Hindi)

    भूपति मरन पेम पनु राखी। जननी कुमति जगतु सबु साखी।।

  2589. RCM 2.262.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    देखि न जाहि बिकल महतारी। जरहिं दुसह जर पुर नर नारी।।

    अर्थ (Hindi)

    देखि न जाहि बिकल महतारी। जरहिं दुसह जर पुर नर नारी।।

  2590. RCM 2.262.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    महीं सकल अनरथ कर मूला। सो सुनि समुझि सहिउँ सब सूला।।

    अर्थ (Hindi)

    महीं सकल अनरथ कर मूला। सो सुनि समुझि सहिउँ सब सूला।।

  2591. RCM 2.262.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनि बन गवनु कीन्ह रघुनाथा। करि मुनि बेष लखन सिय साथा।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनि बन गवनु कीन्ह रघुनाथा। करि मुनि बेष लखन सिय साथा।।

  2592. RCM 2.262.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बिनु पानहिन्ह पयादेहि पाएँ। संकरु साखि रहेउँ एहि घाएँ।।

    अर्थ (Hindi)

    बिनु पानहिन्ह पयादेहि पाएँ। संकरु साखि रहेउँ एहि घाएँ।।

  2593. RCM 2.262.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बहुरि निहार निषाद सनेहू। कुलिस कठिन उर भयउ न बेहू।।

    अर्थ (Hindi)

    बहुरि निहार निषाद सनेहू। कुलिस कठिन उर भयउ न बेहू।।

  2594. RCM 2.262.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अब सबु आँखिन्ह देखेउँ आई। जिअत जीव जड़ सबइ सहाई।।

    अर्थ (Hindi)

    अब सबु आँखिन्ह देखेउँ आई। जिअत जीव जड़ सबइ सहाई।।

  2595. RCM 2.262.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जिन्हहि निरखि मग साँपिनि बीछी। तजहिं बिषम बिषु तामस तीछी।।

    अर्थ (Hindi)

    जिन्हहि निरखि मग साँपिनि बीछी। तजहिं बिषम बिषु तामस तीछी।।

  2596. RCM 2.262.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तेइ रघुनंदनु लखनु सिय अनहित लागे जाहि।

    अर्थ (Hindi)

    तेइ रघुनंदनु लखनु सिय अनहित लागे जाहि।

  2597. RCM 2.262.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तासु तनय तजि दुसह दुख दैउ सहावइ काहि।।262।।

    अर्थ (Hindi)

    तासु तनय तजि दुसह दुख दैउ सहावइ काहि।।262।।

  2598. RCM 2.263.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनि अति बिकल भरत बर बानी। आरति प्रीति बिनय नय सानी।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनि अति बिकल भरत बर बानी। आरति प्रीति बिनय नय सानी।।

  2599. RCM 2.263.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सोक मगन सब सभाँ खभारू। मनहुँ कमल बन परेउ तुसारू।।

    अर्थ (Hindi)

    सोक मगन सब सभाँ खभारू। मनहुँ कमल बन परेउ तुसारू।।

  2600. RCM 2.263.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कहि अनेक बिधि कथा पुरानी। भरत प्रबोधु कीन्ह मुनि ग्यानी।।

    अर्थ (Hindi)

    कहि अनेक बिधि कथा पुरानी। भरत प्रबोधु कीन्ह मुनि ग्यानी।।

  2601. RCM 2.263.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बोले उचित बचन रघुनंदू। दिनकर कुल कैरव बन चंदू।।

    अर्थ (Hindi)

    बोले उचित बचन रघुनंदू। दिनकर कुल कैरव बन चंदू।।

  2602. RCM 2.263.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तात जाँय जियँ करहु गलानी। ईस अधीन जीव गति जानी।।

    अर्थ (Hindi)

    तात जाँय जियँ करहु गलानी। ईस अधीन जीव गति जानी।।

  2603. RCM 2.263.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तीनि काल तिभुअन मत मोरें। पुन्यसिलोक तात तर तोरे।।

    अर्थ (Hindi)

    तीनि काल तिभुअन मत मोरें। पुन्यसिलोक तात तर तोरे।।

  2604. RCM 2.263.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    उर आनत तुम्ह पर कुटिलाई। जाइ लोकु परलोकु नसाई।।

    अर्थ (Hindi)

    उर आनत तुम्ह पर कुटिलाई। जाइ लोकु परलोकु नसाई।।

  2605. RCM 2.263.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    दोसु देहिं जननिहि जड़ तेई। जिन्ह गुर साधु सभा नहिं सेई।।

    अर्थ (Hindi)

    दोसु देहिं जननिहि जड़ तेई। जिन्ह गुर साधु सभा नहिं सेई।।

  2606. RCM 2.263.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मिटिहहिं पाप प्रपंच सब अखिल अमंगल भार।

    अर्थ (Hindi)

    मिटिहहिं पाप प्रपंच सब अखिल अमंगल भार।

  2607. RCM 2.263.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    लोक सुजसु परलोक सुखु सुमिरत नामु तुम्हार।।263।।

    अर्थ (Hindi)

    लोक सुजसु परलोक सुखु सुमिरत नामु तुम्हार।।263।।

  2608. RCM 2.264.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कहउँ सुभाउ सत्य सिव साखी। भरत भूमि रह राउरि राखी।।

    अर्थ (Hindi)

    कहउँ सुभाउ सत्य सिव साखी। भरत भूमि रह राउरि राखी।।

  2609. RCM 2.264.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तात कुतरक करहु जनि जाएँ। बैर पेम नहि दुरइ दुराएँ।।

    अर्थ (Hindi)

    तात कुतरक करहु जनि जाएँ। बैर पेम नहि दुरइ दुराएँ।।

  2610. RCM 2.264.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मुनि गन निकट बिहग मृग जाहीं। बाधक बधिक बिलोकि पराहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    मुनि गन निकट बिहग मृग जाहीं। बाधक बधिक बिलोकि पराहीं।।

  2611. RCM 2.264.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    हित अनहित पसु पच्छिउ जाना। मानुष तनु गुन ग्यान निधाना।।

    अर्थ (Hindi)

    हित अनहित पसु पच्छिउ जाना। मानुष तनु गुन ग्यान निधाना।।

  2612. RCM 2.264.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तात तुम्हहि मैं जानउँ नीकें। करौं काह असमंजस जीकें।।

    अर्थ (Hindi)

    तात तुम्हहि मैं जानउँ नीकें। करौं काह असमंजस जीकें।।

  2613. RCM 2.264.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राखेउ रायँ सत्य मोहि त्यागी। तनु परिहरेउ पेम पन लागी।।

    अर्थ (Hindi)

    राखेउ रायँ सत्य मोहि त्यागी। तनु परिहरेउ पेम पन लागी।।

  2614. RCM 2.264.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तासु बचन मेटत मन सोचू। तेहि तें अधिक तुम्हार सँकोचू।।

    अर्थ (Hindi)

    तासु बचन मेटत मन सोचू। तेहि तें अधिक तुम्हार सँकोचू।।

  2615. RCM 2.264.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    ता पर गुर मोहि आयसु दीन्हा। अवसि जो कहहु चहउँ सोइ कीन्हा।।

    अर्थ (Hindi)

    ता पर गुर मोहि आयसु दीन्हा। अवसि जो कहहु चहउँ सोइ कीन्हा।।

  2616. RCM 2.264.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मनु प्रसन्न करि सकुच तजि कहहु करौं सोइ आजु।

    अर्थ (Hindi)

    मनु प्रसन्न करि सकुच तजि कहहु करौं सोइ आजु।

  2617. RCM 2.264.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सत्यसंध रघुबर बचन सुनि भा सुखी समाजु।।264।।

    अर्थ (Hindi)

    सत्यसंध रघुबर बचन सुनि भा सुखी समाजु।।264।।

  2618. RCM 2.265.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुर गन सहित सभय सुरराजू। सोचहिं चाहत होन अकाजू।।

    अर्थ (Hindi)

    सुर गन सहित सभय सुरराजू। सोचहिं चाहत होन अकाजू।।

  2619. RCM 2.265.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बनत उपाउ करत कछु नाहीं। राम सरन सब गे मन माहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    बनत उपाउ करत कछु नाहीं। राम सरन सब गे मन माहीं।।

  2620. RCM 2.265.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बहुरि बिचारि परस्पर कहहीं। रघुपति भगत भगति बस अहहीं।

    अर्थ (Hindi)

    बहुरि बिचारि परस्पर कहहीं। रघुपति भगत भगति बस अहहीं।

  2621. RCM 2.265.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुधि करि अंबरीष दुरबासा। भे सुर सुरपति निपट निरासा।।

    अर्थ (Hindi)

    सुधि करि अंबरीष दुरबासा। भे सुर सुरपति निपट निरासा।।

  2622. RCM 2.265.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सहे सुरन्ह बहु काल बिषादा। नरहरि किए प्रगट प्रहलादा।।

    अर्थ (Hindi)

    सहे सुरन्ह बहु काल बिषादा। नरहरि किए प्रगट प्रहलादा।।

  2623. RCM 2.265.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    लगि लगि कान कहहिं धुनि माथा। अब सुर काज भरत के हाथा।।

    अर्थ (Hindi)

    लगि लगि कान कहहिं धुनि माथा। अब सुर काज भरत के हाथा।।

  2624. RCM 2.265.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    आन उपाउ न देखिअ देवा। मानत रामु सुसेवक सेवा।।

    अर्थ (Hindi)

    आन उपाउ न देखिअ देवा। मानत रामु सुसेवक सेवा।।

  2625. RCM 2.265.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    हियँ सपेम सुमिरहु सब भरतहि। निज गुन सील राम बस करतहि।।

    अर्थ (Hindi)

    हियँ सपेम सुमिरहु सब भरतहि। निज गुन सील राम बस करतहि।।

  2626. RCM 2.265.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनि सुर मत सुरगुर कहेउ भल तुम्हार बड़ भागु।

    अर्थ (Hindi)

    सुनि सुर मत सुरगुर कहेउ भल तुम्हार बड़ भागु।

  2627. RCM 2.265.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सकल सुमंगल मूल जग भरत चरन अनुरागु।।265।।

    अर्थ (Hindi)

    सकल सुमंगल मूल जग भरत चरन अनुरागु।।265।।

  2628. RCM 2.266.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सीतापति सेवक सेवकाई। कामधेनु सय सरिस सुहाई।।

    अर्थ (Hindi)

    सीतापति सेवक सेवकाई। कामधेनु सय सरिस सुहाई।।

  2629. RCM 2.266.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भरत भगति तुम्हरें मन आई। तजहु सोचु बिधि बात बनाई।।

    अर्थ (Hindi)

    भरत भगति तुम्हरें मन आई। तजहु सोचु बिधि बात बनाई।।

  2630. RCM 2.266.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    देखु देवपति भरत प्रभाऊ। सहज सुभायँ बिबस रघुराऊ।।

    अर्थ (Hindi)

    देखु देवपति भरत प्रभाऊ। सहज सुभायँ बिबस रघुराऊ।।

  2631. RCM 2.266.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मन थिर करहु देव डरु नाहीं। भरतहि जानि राम परिछाहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    मन थिर करहु देव डरु नाहीं। भरतहि जानि राम परिछाहीं।।

  2632. RCM 2.266.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनो सुरगुर सुर संमत सोचू। अंतरजामी प्रभुहि सकोचू।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनो सुरगुर सुर संमत सोचू। अंतरजामी प्रभुहि सकोचू।।

  2633. RCM 2.266.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    निज सिर भारु भरत जियँ जाना। करत कोटि बिधि उर अनुमाना।।

    अर्थ (Hindi)

    निज सिर भारु भरत जियँ जाना। करत कोटि बिधि उर अनुमाना।।

  2634. RCM 2.266.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    करि बिचारु मन दीन्ही ठीका। राम रजायस आपन नीका।।

    अर्थ (Hindi)

    करि बिचारु मन दीन्ही ठीका। राम रजायस आपन नीका।।

  2635. RCM 2.266.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    निज पन तजि राखेउ पनु मोरा। छोहु सनेहु कीन्ह नहिं थोरा।।

    अर्थ (Hindi)

    निज पन तजि राखेउ पनु मोरा। छोहु सनेहु कीन्ह नहिं थोरा।।

  2636. RCM 2.266.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कीन्ह अनुग्रह अमित अति सब बिधि सीतानाथ।

    अर्थ (Hindi)

    कीन्ह अनुग्रह अमित अति सब बिधि सीतानाथ।

  2637. RCM 2.266.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    करि प्रनामु बोले भरतु जोरि जलज जुग हाथ।।266।।

    अर्थ (Hindi)

    करि प्रनामु बोले भरतु जोरि जलज जुग हाथ।।266।।

  2638. RCM 2.267.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कहौं कहावौं का अब स्वामी। कृपा अंबुनिधि अंतरजामी।।

    अर्थ (Hindi)

    कहौं कहावौं का अब स्वामी। कृपा अंबुनिधि अंतरजामी।।

  2639. RCM 2.267.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    गुर प्रसन्न साहिब अनुकूला। मिटी मलिन मन कलपित सूला।।

    अर्थ (Hindi)

    गुर प्रसन्न साहिब अनुकूला। मिटी मलिन मन कलपित सूला।।

  2640. RCM 2.267.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अपडर डरेउँ न सोच समूलें। रबिहि न दोसु देव दिसि भूलें।।

    अर्थ (Hindi)

    अपडर डरेउँ न सोच समूलें। रबिहि न दोसु देव दिसि भूलें।।

  2641. RCM 2.267.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मोर अभागु मातु कुटिलाई। बिधि गति बिषम काल कठिनाई।।

    अर्थ (Hindi)

    मोर अभागु मातु कुटिलाई। बिधि गति बिषम काल कठिनाई।।

  2642. RCM 2.267.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पाउ रोपि सब मिलि मोहि घाला। प्रनतपाल पन आपन पाला।।

    अर्थ (Hindi)

    पाउ रोपि सब मिलि मोहि घाला। प्रनतपाल पन आपन पाला।।

  2643. RCM 2.267.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    यह नइ रीति न राउरि होई। लोकहुँ बेद बिदित नहिं गोई।।

    अर्थ (Hindi)

    यह नइ रीति न राउरि होई। लोकहुँ बेद बिदित नहिं गोई।।

  2644. RCM 2.267.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जगु अनभल भल एकु गोसाईं। कहिअ होइ भल कासु भलाईं।।

    अर्थ (Hindi)

    जगु अनभल भल एकु गोसाईं। कहिअ होइ भल कासु भलाईं।।

  2645. RCM 2.267.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    देउ देवतरु सरिस सुभाऊ। सनमुख बिमुख न काहुहि काऊ।।

    अर्थ (Hindi)

    देउ देवतरु सरिस सुभाऊ। सनमुख बिमुख न काहुहि काऊ।।

  2646. RCM 2.267.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जाइ निकट पहिचानि तरु छाहँ समनि सब सोच।

    अर्थ (Hindi)

    जाइ निकट पहिचानि तरु छाहँ समनि सब सोच।

  2647. RCM 2.267.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मागत अभिमत पाव जग राउ रंकु भल पोच।।267।।

    अर्थ (Hindi)

    मागत अभिमत पाव जग राउ रंकु भल पोच।।267।।

  2648. RCM 2.268.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    लखि सब बिधि गुर स्वामि सनेहू। मिटेउ छोभु नहिं मन संदेहू।।

    अर्थ (Hindi)

    लखि सब बिधि गुर स्वामि सनेहू। मिटेउ छोभु नहिं मन संदेहू।।

  2649. RCM 2.268.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अब करुनाकर कीजिअ सोई। जन हित प्रभु चित छोभु न होई।।

    अर्थ (Hindi)

    अब करुनाकर कीजिअ सोई। जन हित प्रभु चित छोभु न होई।।

  2650. RCM 2.268.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जो सेवकु साहिबहि सँकोची। निज हित चहइ तासु मति पोची।।

    अर्थ (Hindi)

    जो सेवकु साहिबहि सँकोची। निज हित चहइ तासु मति पोची।।

  2651. RCM 2.268.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सेवक हित साहिब सेवकाई। करै सकल सुख लोभ बिहाई।।

    अर्थ (Hindi)

    सेवक हित साहिब सेवकाई। करै सकल सुख लोभ बिहाई।।

  2652. RCM 2.268.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    स्वारथु नाथ फिरें सबही का। किएँ रजाइ कोटि बिधि नीका।।

    अर्थ (Hindi)

    स्वारथु नाथ फिरें सबही का। किएँ रजाइ कोटि बिधि नीका।।

  2653. RCM 2.268.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    यह स्वारथ परमारथ सारु। सकल सुकृत फल सुगति सिंगारु।।

    अर्थ (Hindi)

    यह स्वारथ परमारथ सारु। सकल सुकृत फल सुगति सिंगारु।।

  2654. RCM 2.268.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    देव एक बिनती सुनि मोरी। उचित होइ तस करब बहोरी।।

    अर्थ (Hindi)

    देव एक बिनती सुनि मोरी। उचित होइ तस करब बहोरी।।

  2655. RCM 2.268.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तिलक समाजु साजि सबु आना। करिअ सुफल प्रभु जौं मनु माना।।

    अर्थ (Hindi)

    तिलक समाजु साजि सबु आना। करिअ सुफल प्रभु जौं मनु माना।।

  2656. RCM 2.268.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सानुज पठइअ मोहि बन कीजिअ सबहि सनाथ।

    अर्थ (Hindi)

    सानुज पठइअ मोहि बन कीजिअ सबहि सनाथ।

  2657. RCM 2.268.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नतरु फेरिअहिं बंधु दोउ नाथ चलौं मैं साथ।।268।।

    अर्थ (Hindi)

    नतरु फेरिअहिं बंधु दोउ नाथ चलौं मैं साथ।।268।।

  2658. RCM 2.269.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नतरु जाहिं बन तीनिउ भाई। बहुरिअ सीय सहित रघुराई।।

    अर्थ (Hindi)

    नतरु जाहिं बन तीनिउ भाई। बहुरिअ सीय सहित रघुराई।।

  2659. RCM 2.269.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जेहि बिधि प्रभु प्रसन्न मन होई। करुना सागर कीजिअ सोई।।

    अर्थ (Hindi)

    जेहि बिधि प्रभु प्रसन्न मन होई। करुना सागर कीजिअ सोई।।

  2660. RCM 2.269.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    देवँ दीन्ह सबु मोहि अभारु। मोरें नीति न धरम बिचारु।।

    अर्थ (Hindi)

    देवँ दीन्ह सबु मोहि अभारु। मोरें नीति न धरम बिचारु।।

  2661. RCM 2.269.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कहउँ बचन सब स्वारथ हेतू। रहत न आरत कें चित चेतू।।

    अर्थ (Hindi)

    कहउँ बचन सब स्वारथ हेतू। रहत न आरत कें चित चेतू।।

  2662. RCM 2.269.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    उतरु देइ सुनि स्वामि रजाई। सो सेवकु लखि लाज लजाई।।

    अर्थ (Hindi)

    उतरु देइ सुनि स्वामि रजाई। सो सेवकु लखि लाज लजाई।।

  2663. RCM 2.269.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अस मैं अवगुन उदधि अगाधू। स्वामि सनेहँ सराहत साधू।।

    अर्थ (Hindi)

    अस मैं अवगुन उदधि अगाधू। स्वामि सनेहँ सराहत साधू।।

  2664. RCM 2.269.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अब कृपाल मोहि सो मत भावा। सकुच स्वामि मन जाइँ न पावा।।

    अर्थ (Hindi)

    अब कृपाल मोहि सो मत भावा। सकुच स्वामि मन जाइँ न पावा।।

  2665. RCM 2.269.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    प्रभु पद सपथ कहउँ सति भाऊ। जग मंगल हित एक उपाऊ।।

    अर्थ (Hindi)

    प्रभु पद सपथ कहउँ सति भाऊ। जग मंगल हित एक उपाऊ।।

  2666. RCM 2.269.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    प्रभु प्रसन्न मन सकुच तजि जो जेहि आयसु देब।

    अर्थ (Hindi)

    प्रभु प्रसन्न मन सकुच तजि जो जेहि आयसु देब।

  2667. RCM 2.269.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सो सिर धरि धरि करिहि सबु मिटिहि अनट अवरेब।।269।।

    अर्थ (Hindi)

    सो सिर धरि धरि करिहि सबु मिटिहि अनट अवरेब।।269।।

  2668. RCM 2.270.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भरत बचन सुचि सुनि सुर हरषे। साधु सराहि सुमन सुर बरषे।।

    अर्थ (Hindi)

    भरत बचन सुचि सुनि सुर हरषे। साधु सराहि सुमन सुर बरषे।।

  2669. RCM 2.270.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    असमंजस बस अवध नेवासी। प्रमुदित मन तापस बनबासी।।

    अर्थ (Hindi)

    असमंजस बस अवध नेवासी। प्रमुदित मन तापस बनबासी।।

  2670. RCM 2.270.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    चुपहिं रहे रघुनाथ सँकोची। प्रभु गति देखि सभा सब सोची।।

    अर्थ (Hindi)

    चुपहिं रहे रघुनाथ सँकोची। प्रभु गति देखि सभा सब सोची।।

  2671. RCM 2.270.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जनक दूत तेहि अवसर आए। मुनि बसिष्ठँ सुनि बेगि बोलाए।।

    अर्थ (Hindi)

    जनक दूत तेहि अवसर आए। मुनि बसिष्ठँ सुनि बेगि बोलाए।।

  2672. RCM 2.270.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    करि प्रनाम तिन्ह रामु निहारे। बेषु देखि भए निपट दुखारे।।

    अर्थ (Hindi)

    करि प्रनाम तिन्ह रामु निहारे। बेषु देखि भए निपट दुखारे।।

  2673. RCM 2.270.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    दूतन्ह मुनिबर बूझी बाता। कहहु बिदेह भूप कुसलाता।।

    अर्थ (Hindi)

    दूतन्ह मुनिबर बूझी बाता। कहहु बिदेह भूप कुसलाता।।

  2674. RCM 2.270.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनि सकुचाइ नाइ महि माथा। बोले चर बर जोरें हाथा।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनि सकुचाइ नाइ महि माथा। बोले चर बर जोरें हाथा।।

  2675. RCM 2.270.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बूझब राउर सादर साईं। कुसल हेतु सो भयउ गोसाईं।।

    अर्थ (Hindi)

    बूझब राउर सादर साईं। कुसल हेतु सो भयउ गोसाईं।।

  2676. RCM 2.270.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नाहि त कोसल नाथ कें साथ कुसल गइ नाथ।

    अर्थ (Hindi)

    नाहि त कोसल नाथ कें साथ कुसल गइ नाथ।

  2677. RCM 2.270.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मिथिला अवध बिसेष तें जगु सब भयउ अनाथ।।270।।

    अर्थ (Hindi)

    मिथिला अवध बिसेष तें जगु सब भयउ अनाथ।।270।।

  2678. RCM 2.271.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कोसलपति गति सुनि जनकौरा। भे सब लोक सोक बस बौरा।।

    अर्थ (Hindi)

    कोसलपति गति सुनि जनकौरा। भे सब लोक सोक बस बौरा।।

  2679. RCM 2.271.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जेहिं देखे तेहि समय बिदेहू। नामु सत्य अस लाग न केहू।।

    अर्थ (Hindi)

    जेहिं देखे तेहि समय बिदेहू। नामु सत्य अस लाग न केहू।।

  2680. RCM 2.271.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    रानि कुचालि सुनत नरपालहि। सूझ न कछु जस मनि बिनु ब्यालहि।।

    अर्थ (Hindi)

    रानि कुचालि सुनत नरपालहि। सूझ न कछु जस मनि बिनु ब्यालहि।।

  2681. RCM 2.271.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भरत राज रघुबर बनबासू। भा मिथिलेसहि हृदयँ हराँसू।।

    अर्थ (Hindi)

    भरत राज रघुबर बनबासू। भा मिथिलेसहि हृदयँ हराँसू।।

  2682. RCM 2.271.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नृप बूझे बुध सचिव समाजू। कहहु बिचारि उचित का आजू।।

    अर्थ (Hindi)

    नृप बूझे बुध सचिव समाजू। कहहु बिचारि उचित का आजू।।

  2683. RCM 2.271.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    समुझि अवध असमंजस दोऊ। चलिअ कि रहिअ न कह कछु कोऊ।।

    अर्थ (Hindi)

    समुझि अवध असमंजस दोऊ। चलिअ कि रहिअ न कह कछु कोऊ।।

  2684. RCM 2.271.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नृपहि धीर धरि हृदयँ बिचारी। पठए अवध चतुर चर चारी।।

    अर्थ (Hindi)

    नृपहि धीर धरि हृदयँ बिचारी। पठए अवध चतुर चर चारी।।

  2685. RCM 2.271.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बूझि भरत सति भाउ कुभाऊ। आएहु बेगि न होइ लखाऊ।।

    अर्थ (Hindi)

    बूझि भरत सति भाउ कुभाऊ। आएहु बेगि न होइ लखाऊ।।

  2686. RCM 2.271.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    गए अवध चर भरत गति बूझि देखि करतूति।

    अर्थ (Hindi)

    गए अवध चर भरत गति बूझि देखि करतूति।

  2687. RCM 2.271.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    चले चित्रकूटहि भरतु चार चले तेरहूति।।271।।

    अर्थ (Hindi)

    चले चित्रकूटहि भरतु चार चले तेरहूति।।271।।

  2688. RCM 2.272.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    दूतन्ह आइ भरत कइ करनी। जनक समाज जथामति बरनी।।

    अर्थ (Hindi)

    दूतन्ह आइ भरत कइ करनी। जनक समाज जथामति बरनी।।

  2689. RCM 2.272.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनि गुर परिजन सचिव महीपति। भे सब सोच सनेहँ बिकल अति।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनि गुर परिजन सचिव महीपति। भे सब सोच सनेहँ बिकल अति।।

  2690. RCM 2.272.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    धरि धीरजु करि भरत बड़ाई। लिए सुभट साहनी बोलाई।।

    अर्थ (Hindi)

    धरि धीरजु करि भरत बड़ाई। लिए सुभट साहनी बोलाई।।

  2691. RCM 2.272.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    घर पुर देस राखि रखवारे। हय गय रथ बहु जान सँवारे।।

    अर्थ (Hindi)

    घर पुर देस राखि रखवारे। हय गय रथ बहु जान सँवारे।।

  2692. RCM 2.272.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    दुघरी साधि चले ततकाला। किए बिश्रामु न मग महीपाला।।

    अर्थ (Hindi)

    दुघरी साधि चले ततकाला। किए बिश्रामु न मग महीपाला।।

  2693. RCM 2.272.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भोरहिं आजु नहाइ प्रयागा। चले जमुन उतरन सबु लागा।।

    अर्थ (Hindi)

    भोरहिं आजु नहाइ प्रयागा। चले जमुन उतरन सबु लागा।।

  2694. RCM 2.272.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    खबरि लेन हम पठए नाथा। तिन्ह कहि अस महि नायउ माथा।।

    अर्थ (Hindi)

    खबरि लेन हम पठए नाथा। तिन्ह कहि अस महि नायउ माथा।।

  2695. RCM 2.272.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    साथ किरात छ सातक दीन्हे। मुनिबर तुरत बिदा चर कीन्हे।।

    अर्थ (Hindi)

    साथ किरात छ सातक दीन्हे। मुनिबर तुरत बिदा चर कीन्हे।।

  2696. RCM 2.272.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनत जनक आगवनु सबु हरषेउ अवध समाजु।

    अर्थ (Hindi)

    सुनत जनक आगवनु सबु हरषेउ अवध समाजु।

  2697. RCM 2.272.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    रघुनंदनहि सकोचु बड़ सोच बिबस सुरराजु।।272।।

    अर्थ (Hindi)

    रघुनंदनहि सकोचु बड़ सोच बिबस सुरराजु।।272।।

  2698. RCM 2.273.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    गरइ गलानि कुटिल कैकेई। काहि कहै केहि दूषनु देई।।

    अर्थ (Hindi)

    गरइ गलानि कुटिल कैकेई। काहि कहै केहि दूषनु देई।।

  2699. RCM 2.273.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अस मन आनि मुदित नर नारी। भयउ बहोरि रहब दिन चारी।।

    अर्थ (Hindi)

    अस मन आनि मुदित नर नारी। भयउ बहोरि रहब दिन चारी।।

  2700. RCM 2.273.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    एहि प्रकार गत बासर सोऊ। प्रात नहान लाग सबु कोऊ।।

    अर्थ (Hindi)

    एहि प्रकार गत बासर सोऊ। प्रात नहान लाग सबु कोऊ।।

  2701. RCM 2.273.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    करि मज्जनु पूजहिं नर नारी। गनप गौरि तिपुरारि तमारी।।

    अर्थ (Hindi)

    करि मज्जनु पूजहिं नर नारी। गनप गौरि तिपुरारि तमारी।।

  2702. RCM 2.273.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    रमा रमन पद बंदि बहोरी। बिनवहिं अंजुलि अंचल जोरी।।

    अर्थ (Hindi)

    रमा रमन पद बंदि बहोरी। बिनवहिं अंजुलि अंचल जोरी।।

  2703. RCM 2.273.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राजा रामु जानकी रानी। आनँद अवधि अवध रजधानी।।

    अर्थ (Hindi)

    राजा रामु जानकी रानी। आनँद अवधि अवध रजधानी।।

  2704. RCM 2.273.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुबस बसउ फिरि सहित समाजा। भरतहि रामु करहुँ जुबराजा।।

    अर्थ (Hindi)

    सुबस बसउ फिरि सहित समाजा। भरतहि रामु करहुँ जुबराजा।।

  2705. RCM 2.273.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    एहि सुख सुधाँ सींची सब काहू। देव देहु जग जीवन लाहू।।

    अर्थ (Hindi)

    एहि सुख सुधाँ सींची सब काहू। देव देहु जग जीवन लाहू।।

  2706. RCM 2.273.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    गुर समाज भाइन्ह सहित राम राजु पुर होउ।

    अर्थ (Hindi)

    गुर समाज भाइन्ह सहित राम राजु पुर होउ।

  2707. RCM 2.273.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अछत राम राजा अवध मरिअ माग सबु कोउ।।273।।

    अर्थ (Hindi)

    अछत राम राजा अवध मरिअ माग सबु कोउ।।273।।

  2708. RCM 2.274.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनि सनेहमय पुरजन बानी। निंदहिं जोग बिरति मुनि ग्यानी।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनि सनेहमय पुरजन बानी। निंदहिं जोग बिरति मुनि ग्यानी।।

  2709. RCM 2.274.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    एहि बिधि नित्यकरम करि पुरजन। रामहि करहिं प्रनाम पुलकि तन।।

    अर्थ (Hindi)

    एहि बिधि नित्यकरम करि पुरजन। रामहि करहिं प्रनाम पुलकि तन।।

  2710. RCM 2.274.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    ऊँच नीच मध्यम नर नारी। लहहिं दरसु निज निज अनुहारी।।

    अर्थ (Hindi)

    ऊँच नीच मध्यम नर नारी। लहहिं दरसु निज निज अनुहारी।।

  2711. RCM 2.274.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सावधान सबही सनमानहिं। सकल सराहत कृपानिधानहिं।।

    अर्थ (Hindi)

    सावधान सबही सनमानहिं। सकल सराहत कृपानिधानहिं।।

  2712. RCM 2.274.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    लरिकाइहि ते रघुबर बानी। पालत नीति प्रीति पहिचानी।।

    अर्थ (Hindi)

    लरिकाइहि ते रघुबर बानी। पालत नीति प्रीति पहिचानी।।

  2713. RCM 2.274.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सील सकोच सिंधु रघुराऊ। सुमुख सुलोचन सरल सुभाऊ।।

    अर्थ (Hindi)

    सील सकोच सिंधु रघुराऊ। सुमुख सुलोचन सरल सुभाऊ।।

  2714. RCM 2.274.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कहत राम गुन गन अनुरागे। सब निज भाग सराहन लागे।।

    अर्थ (Hindi)

    कहत राम गुन गन अनुरागे। सब निज भाग सराहन लागे।।

  2715. RCM 2.274.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    हम सम पुन्य पुंज जग थोरे। जिन्हहि रामु जानत करि मोरे।।

    अर्थ (Hindi)

    हम सम पुन्य पुंज जग थोरे। जिन्हहि रामु जानत करि मोरे।।

  2716. RCM 2.274.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    प्रेम मगन तेहि समय सब सुनि आवत मिथिलेसु।

    अर्थ (Hindi)

    प्रेम मगन तेहि समय सब सुनि आवत मिथिलेसु।

  2717. RCM 2.274.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सहित सभा संभ्रम उठेउ रबिकुल कमल दिनेसु।।274।।

    अर्थ (Hindi)

    सहित सभा संभ्रम उठेउ रबिकुल कमल दिनेसु।।274।।

  2718. RCM 2.275.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भाइ सचिव गुर पुरजन साथा। आगें गवनु कीन्ह रघुनाथा।।

    अर्थ (Hindi)

    भाइ सचिव गुर पुरजन साथा। आगें गवनु कीन्ह रघुनाथा।।

  2719. RCM 2.275.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    गिरिबरु दीख जनकपति जबहीं। करि प्रनाम रथ त्यागेउ तबहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    गिरिबरु दीख जनकपति जबहीं। करि प्रनाम रथ त्यागेउ तबहीं।।

  2720. RCM 2.275.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राम दरस लालसा उछाहू। पथ श्रम लेसु कलेसु न काहू।।

    अर्थ (Hindi)

    राम दरस लालसा उछाहू। पथ श्रम लेसु कलेसु न काहू।।

  2721. RCM 2.275.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मन तहँ जहँ रघुबर बैदेही। बिनु मन तन दुख सुख सुधि केही।।

    अर्थ (Hindi)

    मन तहँ जहँ रघुबर बैदेही। बिनु मन तन दुख सुख सुधि केही।।

  2722. RCM 2.275.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    आवत जनकु चले एहि भाँती। सहित समाज प्रेम मति माती।।

    अर्थ (Hindi)

    आवत जनकु चले एहि भाँती। सहित समाज प्रेम मति माती।।

  2723. RCM 2.275.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    आए निकट देखि अनुरागे। सादर मिलन परसपर लागे।।

    अर्थ (Hindi)

    आए निकट देखि अनुरागे। सादर मिलन परसपर लागे।।

  2724. RCM 2.275.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    लगे जनक मुनिजन पद बंदन। रिषिन्ह प्रनामु कीन्ह रघुनंदन।।

    अर्थ (Hindi)

    लगे जनक मुनिजन पद बंदन। रिषिन्ह प्रनामु कीन्ह रघुनंदन।।

  2725. RCM 2.275.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भाइन्ह सहित रामु मिलि राजहि। चले लवाइ समेत समाजहि।।

    अर्थ (Hindi)

    भाइन्ह सहित रामु मिलि राजहि। चले लवाइ समेत समाजहि।।

  2726. RCM 2.275.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    आश्रम सागर सांत रस पूरन पावन पाथु।

    अर्थ (Hindi)

    आश्रम सागर सांत रस पूरन पावन पाथु।

  2727. RCM 2.275.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सेन मनहुँ करुना सरित लिएँ जाहिं रघुनाथु।।275।।

    अर्थ (Hindi)

    सेन मनहुँ करुना सरित लिएँ जाहिं रघुनाथु।।275।।

  2728. RCM 2.276.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बोरति ग्यान बिराग करारे। बचन ससोक मिलत नद नारे।।

    अर्थ (Hindi)

    बोरति ग्यान बिराग करारे। बचन ससोक मिलत नद नारे।।

  2729. RCM 2.276.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सोच उसास समीर तंरगा। धीरज तट तरुबर कर भंगा।।

    अर्थ (Hindi)

    सोच उसास समीर तंरगा। धीरज तट तरुबर कर भंगा।।

  2730. RCM 2.276.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बिषम बिषाद तोरावति धारा। भय भ्रम भवँर अबर्त अपारा।।

    अर्थ (Hindi)

    बिषम बिषाद तोरावति धारा। भय भ्रम भवँर अबर्त अपारा।।

  2731. RCM 2.276.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    केवट बुध बिद्या बड़ि नावा। सकहिं न खेइ ऐक नहिं आवा।।

    अर्थ (Hindi)

    केवट बुध बिद्या बड़ि नावा। सकहिं न खेइ ऐक नहिं आवा।।

  2732. RCM 2.276.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बनचर कोल किरात बिचारे। थके बिलोकि पथिक हियँ हारे।।

    अर्थ (Hindi)

    बनचर कोल किरात बिचारे। थके बिलोकि पथिक हियँ हारे।।

  2733. RCM 2.276.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    आश्रम उदधि मिली जब जाई। मनहुँ उठेउ अंबुधि अकुलाई।।

    अर्थ (Hindi)

    आश्रम उदधि मिली जब जाई। मनहुँ उठेउ अंबुधि अकुलाई।।

  2734. RCM 2.276.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सोक बिकल दोउ राज समाजा। रहा न ग्यानु न धीरजु लाजा।।

    अर्थ (Hindi)

    सोक बिकल दोउ राज समाजा। रहा न ग्यानु न धीरजु लाजा।।

  2735. RCM 2.276.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भूप रूप गुन सील सराही। रोवहिं सोक सिंधु अवगाही।।

    अर्थ (Hindi)

    भूप रूप गुन सील सराही। रोवहिं सोक सिंधु अवगाही।।

  2736. RCM 2.277.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जासु ग्यानु रबि भव निसि नासा। बचन किरन मुनि कमल बिकासा।।

    अर्थ (Hindi)

    जासु ग्यानु रबि भव निसि नासा। बचन किरन मुनि कमल बिकासा।।

  2737. RCM 2.277.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तेहि कि मोह ममता निअराई। यह सिय राम सनेह बड़ाई।।

    अर्थ (Hindi)

    तेहि कि मोह ममता निअराई। यह सिय राम सनेह बड़ाई।।

  2738. RCM 2.277.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बिषई साधक सिद्ध सयाने। त्रिबिध जीव जग बेद बखाने।।

    अर्थ (Hindi)

    बिषई साधक सिद्ध सयाने। त्रिबिध जीव जग बेद बखाने।।

  2739. RCM 2.277.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राम सनेह सरस मन जासू। साधु सभाँ बड़ आदर तासू।।

    अर्थ (Hindi)

    राम सनेह सरस मन जासू। साधु सभाँ बड़ आदर तासू।।

  2740. RCM 2.277.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सोह न राम पेम बिनु ग्यानू। करनधार बिनु जिमि जलजानू।।

    अर्थ (Hindi)

    सोह न राम पेम बिनु ग्यानू। करनधार बिनु जिमि जलजानू।।

  2741. RCM 2.277.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मुनि बहुबिधि बिदेहु समुझाए। रामघाट सब लोग नहाए।।

    अर्थ (Hindi)

    मुनि बहुबिधि बिदेहु समुझाए। रामघाट सब लोग नहाए।।

  2742. RCM 2.277.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सकल सोक संकुल नर नारी। सो बासरु बीतेउ बिनु बारी।।

    अर्थ (Hindi)

    सकल सोक संकुल नर नारी। सो बासरु बीतेउ बिनु बारी।।

  2743. RCM 2.277.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पसु खग मृगन्ह न कीन्ह अहारू। प्रिय परिजन कर कौन बिचारू।।

    अर्थ (Hindi)

    पसु खग मृगन्ह न कीन्ह अहारू। प्रिय परिजन कर कौन बिचारू।।

  2744. RCM 2.277.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    दोउ समाज निमिराजु रघुराजु नहाने प्रात।

    अर्थ (Hindi)

    दोउ समाज निमिराजु रघुराजु नहाने प्रात।

  2745. RCM 2.277.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बैठे सब बट बिटप तर मन मलीन कृस गात।।277।।

    अर्थ (Hindi)

    बैठे सब बट बिटप तर मन मलीन कृस गात।।277।।

  2746. RCM 2.278.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जे महिसुर दसरथ पुर बासी। जे मिथिलापति नगर निवासी।।

    अर्थ (Hindi)

    जे महिसुर दसरथ पुर बासी। जे मिथिलापति नगर निवासी।।

  2747. RCM 2.278.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    हंस बंस गुर जनक पुरोधा। जिन्ह जग मगु परमारथु सोधा।।

    अर्थ (Hindi)

    हंस बंस गुर जनक पुरोधा। जिन्ह जग मगु परमारथु सोधा।।

  2748. RCM 2.278.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    लगे कहन उपदेस अनेका। सहित धरम नय बिरति बिबेका।।

    अर्थ (Hindi)

    लगे कहन उपदेस अनेका। सहित धरम नय बिरति बिबेका।।

  2749. RCM 2.278.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कौसिक कहि कहि कथा पुरानीं। समुझाई सब सभा सुबानीं।।

    अर्थ (Hindi)

    कौसिक कहि कहि कथा पुरानीं। समुझाई सब सभा सुबानीं।।

  2750. RCM 2.278.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तब रघुनाथ कोसिकहि कहेऊ। नाथ कालि जल बिनु सबु रहेऊ।।

    अर्थ (Hindi)

    तब रघुनाथ कोसिकहि कहेऊ। नाथ कालि जल बिनु सबु रहेऊ।।

  2751. RCM 2.278.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मुनि कह उचित कहत रघुराई। गयउ बीति दिन पहर अढ़ाई।।

    अर्थ (Hindi)

    मुनि कह उचित कहत रघुराई। गयउ बीति दिन पहर अढ़ाई।।

  2752. RCM 2.278.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    रिषि रुख लखि कह तेरहुतिराजू। इहाँ उचित नहिं असन अनाजू।।

    अर्थ (Hindi)

    रिषि रुख लखि कह तेरहुतिराजू। इहाँ उचित नहिं असन अनाजू।।

  2753. RCM 2.278.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कहा भूप भल सबहि सोहाना। पाइ रजायसु चले नहाना।।

    अर्थ (Hindi)

    कहा भूप भल सबहि सोहाना। पाइ रजायसु चले नहाना।।

  2754. RCM 2.278.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तेहि अवसर फल फूल दल मूल अनेक प्रकार।

    अर्थ (Hindi)

    तेहि अवसर फल फूल दल मूल अनेक प्रकार।

  2755. RCM 2.278.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    लइ आए बनचर बिपुल भरि भरि काँवरि भार।।278।।

    अर्थ (Hindi)

    लइ आए बनचर बिपुल भरि भरि काँवरि भार।।278।।

  2756. RCM 2.279.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कामद मे गिरि राम प्रसादा। अवलोकत अपहरत बिषादा।।

    अर्थ (Hindi)

    कामद मे गिरि राम प्रसादा। अवलोकत अपहरत बिषादा।।

  2757. RCM 2.279.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सर सरिता बन भूमि बिभागा। जनु उमगत आनँद अनुरागा।।

    अर्थ (Hindi)

    सर सरिता बन भूमि बिभागा। जनु उमगत आनँद अनुरागा।।

  2758. RCM 2.279.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बेलि बिटप सब सफल सफूला। बोलत खग मृग अलि अनुकूला।।

    अर्थ (Hindi)

    बेलि बिटप सब सफल सफूला। बोलत खग मृग अलि अनुकूला।।

  2759. RCM 2.279.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तेहि अवसर बन अधिक उछाहू। त्रिबिध समीर सुखद सब काहू।।

    अर्थ (Hindi)

    तेहि अवसर बन अधिक उछाहू। त्रिबिध समीर सुखद सब काहू।।

  2760. RCM 2.279.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जाइ न बरनि मनोहरताई। जनु महि करति जनक पहुनाई।।

    अर्थ (Hindi)

    जाइ न बरनि मनोहरताई। जनु महि करति जनक पहुनाई।।

  2761. RCM 2.279.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तब सब लोग नहाइ नहाई। राम जनक मुनि आयसु पाई।।

    अर्थ (Hindi)

    तब सब लोग नहाइ नहाई। राम जनक मुनि आयसु पाई।।

  2762. RCM 2.279.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    देखि देखि तरुबर अनुरागे। जहँ तहँ पुरजन उतरन लागे।।

    अर्थ (Hindi)

    देखि देखि तरुबर अनुरागे। जहँ तहँ पुरजन उतरन लागे।।

  2763. RCM 2.279.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    दल फल मूल कंद बिधि नाना। पावन सुंदर सुधा समाना।।

    अर्थ (Hindi)

    दल फल मूल कंद बिधि नाना। पावन सुंदर सुधा समाना।।

  2764. RCM 2.279.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सादर सब कहँ रामगुर पठए भरि भरि भार।

    अर्थ (Hindi)

    सादर सब कहँ रामगुर पठए भरि भरि भार।

  2765. RCM 2.279.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पूजि पितर सुर अतिथि गुर लगे करन फरहार।।279।।

    अर्थ (Hindi)

    पूजि पितर सुर अतिथि गुर लगे करन फरहार।।279।।

  2766. RCM 2.280.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    एहि बिधि बासर बीते चारी। रामु निरखि नर नारि सुखारी।।

    अर्थ (Hindi)

    एहि बिधि बासर बीते चारी। रामु निरखि नर नारि सुखारी।।

  2767. RCM 2.280.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    दुहु समाज असि रुचि मन माहीं। बिनु सिय राम फिरब भल नाहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    दुहु समाज असि रुचि मन माहीं। बिनु सिय राम फिरब भल नाहीं।।

  2768. RCM 2.280.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सीता राम संग बनबासू। कोटि अमरपुर सरिस सुपासू।।

    अर्थ (Hindi)

    सीता राम संग बनबासू। कोटि अमरपुर सरिस सुपासू।।

  2769. RCM 2.280.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    परिहरि लखन रामु बैदेही। जेहि घरु भाव बाम बिधि तेही।।

    अर्थ (Hindi)

    परिहरि लखन रामु बैदेही। जेहि घरु भाव बाम बिधि तेही।।

  2770. RCM 2.280.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    दाहिन दइउ होइ जब सबही। राम समीप बसिअ बन तबही।।

    अर्थ (Hindi)

    दाहिन दइउ होइ जब सबही। राम समीप बसिअ बन तबही।।

  2771. RCM 2.280.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मंदाकिनि मज्जनु तिहु काला। राम दरसु मुद मंगल माला।।

    अर्थ (Hindi)

    मंदाकिनि मज्जनु तिहु काला। राम दरसु मुद मंगल माला।।

  2772. RCM 2.280.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अटनु राम गिरि बन तापस थल। असनु अमिअ सम कंद मूल फल।।

    अर्थ (Hindi)

    अटनु राम गिरि बन तापस थल। असनु अमिअ सम कंद मूल फल।।

  2773. RCM 2.280.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुख समेत संबत दुइ साता। पल सम होहिं न जनिअहिं जाता।।

    अर्थ (Hindi)

    सुख समेत संबत दुइ साता। पल सम होहिं न जनिअहिं जाता।।

  2774. RCM 2.280.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    एहि सुख जोग न लोग सब कहहिं कहाँ अस भागु।।

    अर्थ (Hindi)

    एहि सुख जोग न लोग सब कहहिं कहाँ अस भागु।।

  2775. RCM 2.280.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सहज सुभायँ समाज दुहु राम चरन अनुरागु।।280।।

    अर्थ (Hindi)

    सहज सुभायँ समाज दुहु राम चरन अनुरागु।।280।।

  2776. RCM 2.281.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    एहि बिधि सकल मनोरथ करहीं। बचन सप्रेम सुनत मन हरहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    एहि बिधि सकल मनोरथ करहीं। बचन सप्रेम सुनत मन हरहीं।।

  2777. RCM 2.281.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सीय मातु तेहि समय पठाईं। दासीं देखि सुअवसरु आईं।।

    अर्थ (Hindi)

    सीय मातु तेहि समय पठाईं। दासीं देखि सुअवसरु आईं।।

  2778. RCM 2.281.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सावकास सुनि सब सिय सासू। आयउ जनकराज रनिवासू।।

    अर्थ (Hindi)

    सावकास सुनि सब सिय सासू। आयउ जनकराज रनिवासू।।

  2779. RCM 2.281.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कौसल्याँ सादर सनमानी। आसन दिए समय सम आनी।।

    अर्थ (Hindi)

    कौसल्याँ सादर सनमानी। आसन दिए समय सम आनी।।

  2780. RCM 2.281.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सीलु सनेह सकल दुहु ओरा। द्रवहिं देखि सुनि कुलिस कठोरा।।

    अर्थ (Hindi)

    सीलु सनेह सकल दुहु ओरा। द्रवहिं देखि सुनि कुलिस कठोरा।।

  2781. RCM 2.281.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पुलक सिथिल तन बारि बिलोचन। महि नख लिखन लगीं सब सोचन।।

    अर्थ (Hindi)

    पुलक सिथिल तन बारि बिलोचन। महि नख लिखन लगीं सब सोचन।।

  2782. RCM 2.281.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सब सिय राम प्रीति कि सि मूरती। जनु करुना बहु बेष बिसूरति।।

    अर्थ (Hindi)

    सब सिय राम प्रीति कि सि मूरती। जनु करुना बहु बेष बिसूरति।।

  2783. RCM 2.281.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सीय मातु कह बिधि बुधि बाँकी। जो पय फेनु फोर पबि टाँकी।।

    अर्थ (Hindi)

    सीय मातु कह बिधि बुधि बाँकी। जो पय फेनु फोर पबि टाँकी।।

  2784. RCM 2.281.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनिअ सुधा देखिअहिं गरल सब करतूति कराल।

    अर्थ (Hindi)

    सुनिअ सुधा देखिअहिं गरल सब करतूति कराल।

  2785. RCM 2.281.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जहँ तहँ काक उलूक बक मानस सकृत मराल।।281।।

    अर्थ (Hindi)

    जहँ तहँ काक उलूक बक मानस सकृत मराल।।281।।

  2786. RCM 2.282.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनि ससोच कह देबि सुमित्रा। बिधि गति बड़ि बिपरीत बिचित्रा।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनि ससोच कह देबि सुमित्रा। बिधि गति बड़ि बिपरीत बिचित्रा।।

  2787. RCM 2.282.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जो सृजि पालइ हरइ बहोरी। बाल केलि सम बिधि मति भोरी।।

    अर्थ (Hindi)

    जो सृजि पालइ हरइ बहोरी। बाल केलि सम बिधि मति भोरी।।

  2788. RCM 2.282.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कौसल्या कह दोसु न काहू। करम बिबस दुख सुख छति लाहू।।

    अर्थ (Hindi)

    कौसल्या कह दोसु न काहू। करम बिबस दुख सुख छति लाहू।।

  2789. RCM 2.282.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कठिन करम गति जान बिधाता। जो सुभ असुभ सकल फल दाता।।

    अर्थ (Hindi)

    कठिन करम गति जान बिधाता। जो सुभ असुभ सकल फल दाता।।

  2790. RCM 2.282.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    ईस रजाइ सीस सबही कें। उतपति थिति लय बिषहु अमी कें।।

    अर्थ (Hindi)

    ईस रजाइ सीस सबही कें। उतपति थिति लय बिषहु अमी कें।।

  2791. RCM 2.282.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    देबि मोह बस सोचिअ बादी। बिधि प्रपंचु अस अचल अनादी।।

    अर्थ (Hindi)

    देबि मोह बस सोचिअ बादी। बिधि प्रपंचु अस अचल अनादी।।

  2792. RCM 2.282.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भूपति जिअब मरब उर आनी। सोचिअ सखि लखि निज हित हानी।।

    अर्थ (Hindi)

    भूपति जिअब मरब उर आनी। सोचिअ सखि लखि निज हित हानी।।

  2793. RCM 2.282.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सीय मातु कह सत्य सुबानी। सुकृती अवधि अवधपति रानी।।

    अर्थ (Hindi)

    सीय मातु कह सत्य सुबानी। सुकृती अवधि अवधपति रानी।।

  2794. RCM 2.282.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    लखनु राम सिय जाहुँ बन भल परिनाम न पोचु।

    अर्थ (Hindi)

    लखनु राम सिय जाहुँ बन भल परिनाम न पोचु।

  2795. RCM 2.282.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    गहबरि हियँ कह कौसिला मोहि भरत कर सोचु।।282।।

    अर्थ (Hindi)

    गहबरि हियँ कह कौसिला मोहि भरत कर सोचु।।282।।

  2796. RCM 2.283.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    ईस प्रसाद असीस तुम्हारी। सुत सुतबधू देवसरि बारी।।

    अर्थ (Hindi)

    ईस प्रसाद असीस तुम्हारी। सुत सुतबधू देवसरि बारी।।

  2797. RCM 2.283.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राम सपथ मैं कीन्ह न काऊ। सो करि कहउँ सखी सति भाऊ।।

    अर्थ (Hindi)

    राम सपथ मैं कीन्ह न काऊ। सो करि कहउँ सखी सति भाऊ।।

  2798. RCM 2.283.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भरत सील गुन बिनय बड़ाई। भायप भगति भरोस भलाई।।

    अर्थ (Hindi)

    भरत सील गुन बिनय बड़ाई। भायप भगति भरोस भलाई।।

  2799. RCM 2.283.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कहत सारदहु कर मति हीचे। सागर सीप कि जाहिं उलीचे।।

    अर्थ (Hindi)

    कहत सारदहु कर मति हीचे। सागर सीप कि जाहिं उलीचे।।

  2800. RCM 2.283.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जानउँ सदा भरत कुलदीपा। बार बार मोहि कहेउ महीपा।।

    अर्थ (Hindi)

    जानउँ सदा भरत कुलदीपा। बार बार मोहि कहेउ महीपा।।

  2801. RCM 2.283.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कसें कनकु मनि पारिखि पाएँ। पुरुष परिखिअहिं समयँ सुभाएँ।

    अर्थ (Hindi)

    कसें कनकु मनि पारिखि पाएँ। पुरुष परिखिअहिं समयँ सुभाएँ।

  2802. RCM 2.283.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अनुचित आजु कहब अस मोरा। सोक सनेहँ सयानप थोरा।।

    अर्थ (Hindi)

    अनुचित आजु कहब अस मोरा। सोक सनेहँ सयानप थोरा।।

  2803. RCM 2.283.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनि सुरसरि सम पावनि बानी। भईं सनेह बिकल सब रानी।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनि सुरसरि सम पावनि बानी। भईं सनेह बिकल सब रानी।।

  2804. RCM 2.283.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कौसल्या कह धीर धरि सुनहु देबि मिथिलेसि।

    अर्थ (Hindi)

    कौसल्या कह धीर धरि सुनहु देबि मिथिलेसि।

  2805. RCM 2.283.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    को बिबेकनिधि बल्लभहि तुम्हहि सकइ उपदेसि।।283।।

    अर्थ (Hindi)

    को बिबेकनिधि बल्लभहि तुम्हहि सकइ उपदेसि।।283।।

  2806. RCM 2.284.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    रानि राय सन अवसरु पाई। अपनी भाँति कहब समुझाई।।

    अर्थ (Hindi)

    रानि राय सन अवसरु पाई। अपनी भाँति कहब समुझाई।।

  2807. RCM 2.284.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    रखिअहिं लखनु भरतु गबनहिं बन। जौं यह मत मानै महीप मन।।

    अर्थ (Hindi)

    रखिअहिं लखनु भरतु गबनहिं बन। जौं यह मत मानै महीप मन।।

  2808. RCM 2.284.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तौ भल जतनु करब सुबिचारी। मोरें सौचु भरत कर भारी।।

    अर्थ (Hindi)

    तौ भल जतनु करब सुबिचारी। मोरें सौचु भरत कर भारी।।

  2809. RCM 2.284.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    गूढ़ सनेह भरत मन माही। रहें नीक मोहि लागत नाहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    गूढ़ सनेह भरत मन माही। रहें नीक मोहि लागत नाहीं।।

  2810. RCM 2.284.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    लखि सुभाउ सुनि सरल सुबानी। सब भइ मगन करुन रस रानी।।

    अर्थ (Hindi)

    लखि सुभाउ सुनि सरल सुबानी। सब भइ मगन करुन रस रानी।।

  2811. RCM 2.284.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नभ प्रसून झरि धन्य धन्य धुनि। सिथिल सनेहँ सिद्ध जोगी मुनि।।

    अर्थ (Hindi)

    नभ प्रसून झरि धन्य धन्य धुनि। सिथिल सनेहँ सिद्ध जोगी मुनि।।

  2812. RCM 2.284.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सबु रनिवासु बिथकि लखि रहेऊ। तब धरि धीर सुमित्राँ कहेऊ।।

    अर्थ (Hindi)

    सबु रनिवासु बिथकि लखि रहेऊ। तब धरि धीर सुमित्राँ कहेऊ।।

  2813. RCM 2.284.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    देबि दंड जुग जामिनि बीती। राम मातु सुनी उठी सप्रीती।।

    अर्थ (Hindi)

    देबि दंड जुग जामिनि बीती। राम मातु सुनी उठी सप्रीती।।

  2814. RCM 2.284.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बेगि पाउ धारिअ थलहि कह सनेहँ सतिभाय।

    अर्थ (Hindi)

    बेगि पाउ धारिअ थलहि कह सनेहँ सतिभाय।

  2815. RCM 2.284.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    हमरें तौ अब ईस गति के मिथिलेस सहाय।।284।।

    अर्थ (Hindi)

    हमरें तौ अब ईस गति के मिथिलेस सहाय।।284।।

  2816. RCM 2.285.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    लखि सनेह सुनि बचन बिनीता। जनकप्रिया गह पाय पुनीता।।

    अर्थ (Hindi)

    लखि सनेह सुनि बचन बिनीता। जनकप्रिया गह पाय पुनीता।।

  2817. RCM 2.285.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    देबि उचित असि बिनय तुम्हारी। दसरथ घरिनि राम महतारी।।

    अर्थ (Hindi)

    देबि उचित असि बिनय तुम्हारी। दसरथ घरिनि राम महतारी।।

  2818. RCM 2.285.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    प्रभु अपने नीचहु आदरहीं। अगिनि धूम गिरि सिर तिनु धरहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    प्रभु अपने नीचहु आदरहीं। अगिनि धूम गिरि सिर तिनु धरहीं।।

  2819. RCM 2.285.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सेवकु राउ करम मन बानी। सदा सहाय महेसु भवानी।।

    अर्थ (Hindi)

    सेवकु राउ करम मन बानी। सदा सहाय महेसु भवानी।।

  2820. RCM 2.285.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    रउरे अंग जोगु जग को है। दीप सहाय कि दिनकर सोहै।।

    अर्थ (Hindi)

    रउरे अंग जोगु जग को है। दीप सहाय कि दिनकर सोहै।।

  2821. RCM 2.285.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    रामु जाइ बनु करि सुर काजू। अचल अवधपुर करिहहिं राजू।।

    अर्थ (Hindi)

    रामु जाइ बनु करि सुर काजू। अचल अवधपुर करिहहिं राजू।।

  2822. RCM 2.285.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अमर नाग नर राम बाहुबल। सुख बसिहहिं अपनें अपने थल।।

    अर्थ (Hindi)

    अमर नाग नर राम बाहुबल। सुख बसिहहिं अपनें अपने थल।।

  2823. RCM 2.285.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    यह सब जागबलिक कहि राखा। देबि न होइ मुधा मुनि भाषा।।

    अर्थ (Hindi)

    यह सब जागबलिक कहि राखा। देबि न होइ मुधा मुनि भाषा।।

  2824. RCM 2.285.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अस कहि पग परि पेम अति सिय हित बिनय सुनाइ।।

    अर्थ (Hindi)

    अस कहि पग परि पेम अति सिय हित बिनय सुनाइ।।

  2825. RCM 2.285.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सिय समेत सियमातु तब चली सुआयसु पाइ।।285।।

    अर्थ (Hindi)

    सिय समेत सियमातु तब चली सुआयसु पाइ।।285।।

  2826. RCM 2.286.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    प्रिय परिजनहि मिली बैदेही। जो जेहि जोगु भाँति तेहि तेही।।

    अर्थ (Hindi)

    प्रिय परिजनहि मिली बैदेही। जो जेहि जोगु भाँति तेहि तेही।।

  2827. RCM 2.286.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तापस बेष जानकी देखी। भा सबु बिकल बिषाद बिसेषी।।

    अर्थ (Hindi)

    तापस बेष जानकी देखी। भा सबु बिकल बिषाद बिसेषी।।

  2828. RCM 2.286.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जनक राम गुर आयसु पाई। चले थलहि सिय देखी आई।।

    अर्थ (Hindi)

    जनक राम गुर आयसु पाई। चले थलहि सिय देखी आई।।

  2829. RCM 2.286.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    लीन्हि लाइ उर जनक जानकी। पाहुन पावन पेम प्रान की।।

    अर्थ (Hindi)

    लीन्हि लाइ उर जनक जानकी। पाहुन पावन पेम प्रान की।।

  2830. RCM 2.286.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    उर उमगेउ अंबुधि अनुरागू। भयउ भूप मनु मनहुँ पयागू।।

    अर्थ (Hindi)

    उर उमगेउ अंबुधि अनुरागू। भयउ भूप मनु मनहुँ पयागू।।

  2831. RCM 2.286.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सिय सनेह बटु बाढ़त जोहा। ता पर राम पेम सिसु सोहा।।

    अर्थ (Hindi)

    सिय सनेह बटु बाढ़त जोहा। ता पर राम पेम सिसु सोहा।।

  2832. RCM 2.286.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    चिरजीवी मुनि ग्यान बिकल जनु। बूड़त लहेउ बाल अवलंबनु।।

    अर्थ (Hindi)

    चिरजीवी मुनि ग्यान बिकल जनु। बूड़त लहेउ बाल अवलंबनु।।

  2833. RCM 2.286.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मोह मगन मति नहिं बिदेह की। महिमा सिय रघुबर सनेह की।।

    अर्थ (Hindi)

    मोह मगन मति नहिं बिदेह की। महिमा सिय रघुबर सनेह की।।

  2834. RCM 2.286.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सिय पितु मातु सनेह बस बिकल न सकी सँभारि।

    अर्थ (Hindi)

    सिय पितु मातु सनेह बस बिकल न सकी सँभारि।

  2835. RCM 2.286.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    धरनिसुताँ धीरजु धरेउ समउ सुधरमु बिचारि।।286।।

    अर्थ (Hindi)

    धरनिसुताँ धीरजु धरेउ समउ सुधरमु बिचारि।।286।।

  2836. RCM 2.287.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तापस बेष जनक सिय देखी। भयउ पेमु परितोषु बिसेषी।।

    अर्थ (Hindi)

    तापस बेष जनक सिय देखी। भयउ पेमु परितोषु बिसेषी।।

  2837. RCM 2.287.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पुत्रि पवित्र किए कुल दोऊ। सुजस धवल जगु कह सबु कोऊ।।

    अर्थ (Hindi)

    पुत्रि पवित्र किए कुल दोऊ। सुजस धवल जगु कह सबु कोऊ।।

  2838. RCM 2.287.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जिति सुरसरि कीरति सरि तोरी। गवनु कीन्ह बिधि अंड करोरी।।

    अर्थ (Hindi)

    जिति सुरसरि कीरति सरि तोरी। गवनु कीन्ह बिधि अंड करोरी।।

  2839. RCM 2.287.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    गंग अवनि थल तीनि बड़ेरे। एहिं किए साधु समाज घनेरे।।

    अर्थ (Hindi)

    गंग अवनि थल तीनि बड़ेरे। एहिं किए साधु समाज घनेरे।।

  2840. RCM 2.287.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पितु कह सत्य सनेहँ सुबानी। सीय सकुच महुँ मनहुँ समानी।।

    अर्थ (Hindi)

    पितु कह सत्य सनेहँ सुबानी। सीय सकुच महुँ मनहुँ समानी।।

  2841. RCM 2.287.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पुनि पितु मातु लीन्ह उर लाई। सिख आसिष हित दीन्हि सुहाई।।

    अर्थ (Hindi)

    पुनि पितु मातु लीन्ह उर लाई। सिख आसिष हित दीन्हि सुहाई।।

  2842. RCM 2.287.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कहति न सीय सकुचि मन माहीं। इहाँ बसब रजनीं भल नाहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    कहति न सीय सकुचि मन माहीं। इहाँ बसब रजनीं भल नाहीं।।

  2843. RCM 2.287.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    लखि रुख रानि जनायउ राऊ। हृदयँ सराहत सीलु सुभाऊ।।

    अर्थ (Hindi)

    लखि रुख रानि जनायउ राऊ। हृदयँ सराहत सीलु सुभाऊ।।

  2844. RCM 2.287.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बार बार मिलि भेंट सिय बिदा कीन्ह सनमानि।

    अर्थ (Hindi)

    बार बार मिलि भेंट सिय बिदा कीन्ह सनमानि।

  2845. RCM 2.287.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कही समय सिर भरत गति रानि सुबानि सयानि।।287।।

    अर्थ (Hindi)

    कही समय सिर भरत गति रानि सुबानि सयानि।।287।।

  2846. RCM 2.288.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनि भूपाल भरत ब्यवहारू। सोन सुगंध सुधा ससि सारू।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनि भूपाल भरत ब्यवहारू। सोन सुगंध सुधा ससि सारू।।

  2847. RCM 2.288.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मूदे सजल नयन पुलके तन। सुजसु सराहन लगे मुदित मन।।

    अर्थ (Hindi)

    मूदे सजल नयन पुलके तन। सुजसु सराहन लगे मुदित मन।।

  2848. RCM 2.288.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सावधान सुनु सुमुखि सुलोचनि। भरत कथा भव बंध बिमोचनि।।

    अर्थ (Hindi)

    सावधान सुनु सुमुखि सुलोचनि। भरत कथा भव बंध बिमोचनि।।

  2849. RCM 2.288.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    धरम राजनय ब्रह्मबिचारू। इहाँ जथामति मोर प्रचारू।।

    अर्थ (Hindi)

    धरम राजनय ब्रह्मबिचारू। इहाँ जथामति मोर प्रचारू।।

  2850. RCM 2.288.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सो मति मोरि भरत महिमाही। कहै काह छलि छुअति न छाँही।।

    अर्थ (Hindi)

    सो मति मोरि भरत महिमाही। कहै काह छलि छुअति न छाँही।।

  2851. RCM 2.288.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बिधि गनपति अहिपति सिव सारद। कबि कोबिद बुध बुद्धि बिसारद।।

    अर्थ (Hindi)

    बिधि गनपति अहिपति सिव सारद। कबि कोबिद बुध बुद्धि बिसारद।।

  2852. RCM 2.288.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भरत चरित कीरति करतूती। धरम सील गुन बिमल बिभूती।।

    अर्थ (Hindi)

    भरत चरित कीरति करतूती। धरम सील गुन बिमल बिभूती।।

  2853. RCM 2.288.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    समुझत सुनत सुखद सब काहू। सुचि सुरसरि रुचि निदर सुधाहू।।

    अर्थ (Hindi)

    समुझत सुनत सुखद सब काहू। सुचि सुरसरि रुचि निदर सुधाहू।।

  2854. RCM 2.288.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    निरवधि गुन निरुपम पुरुषु भरतु भरत सम जानि।

    अर्थ (Hindi)

    निरवधि गुन निरुपम पुरुषु भरतु भरत सम जानि।

  2855. RCM 2.288.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कहिअ सुमेरु कि सेर सम कबिकुल मति सकुचानि।।288।।

    अर्थ (Hindi)

    कहिअ सुमेरु कि सेर सम कबिकुल मति सकुचानि।।288।।

  2856. RCM 2.289.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अगम सबहि बरनत बरबरनी। जिमि जलहीन मीन गमु धरनी।।

    अर्थ (Hindi)

    अगम सबहि बरनत बरबरनी। जिमि जलहीन मीन गमु धरनी।।

  2857. RCM 2.289.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भरत अमित महिमा सुनु रानी। जानहिं रामु न सकहिं बखानी।।

    अर्थ (Hindi)

    भरत अमित महिमा सुनु रानी। जानहिं रामु न सकहिं बखानी।।

  2858. RCM 2.289.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बरनि सप्रेम भरत अनुभाऊ। तिय जिय की रुचि लखि कह राऊ।।

    अर्थ (Hindi)

    बरनि सप्रेम भरत अनुभाऊ। तिय जिय की रुचि लखि कह राऊ।।

  2859. RCM 2.289.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बहुरहिं लखनु भरतु बन जाहीं। सब कर भल सब के मन माहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    बहुरहिं लखनु भरतु बन जाहीं। सब कर भल सब के मन माहीं।।

  2860. RCM 2.289.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    देबि परंतु भरत रघुबर की। प्रीति प्रतीति जाइ नहिं तरकी।।

    अर्थ (Hindi)

    देबि परंतु भरत रघुबर की। प्रीति प्रतीति जाइ नहिं तरकी।।

  2861. RCM 2.289.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भरतु अवधि सनेह ममता की। जद्यपि रामु सीम समता की।।

    अर्थ (Hindi)

    भरतु अवधि सनेह ममता की। जद्यपि रामु सीम समता की।।

  2862. RCM 2.289.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    परमारथ स्वारथ सुख सारे। भरत न सपनेहुँ मनहुँ निहारे।।

    अर्थ (Hindi)

    परमारथ स्वारथ सुख सारे। भरत न सपनेहुँ मनहुँ निहारे।।

  2863. RCM 2.289.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    साधन सिद्ध राम पग नेहू।।मोहि लखि परत भरत मत एहू।।

    अर्थ (Hindi)

    साधन सिद्ध राम पग नेहू।।मोहि लखि परत भरत मत एहू।।

  2864. RCM 2.289.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भोरेहुँ भरत न पेलिहहिं मनसहुँ राम रजाइ।

    अर्थ (Hindi)

    भोरेहुँ भरत न पेलिहहिं मनसहुँ राम रजाइ।

  2865. RCM 2.289.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    करिअ न सोचु सनेह बस कहेउ भूप बिलखाइ।।289।।

    अर्थ (Hindi)

    करिअ न सोचु सनेह बस कहेउ भूप बिलखाइ।।289।।

  2866. RCM 2.290.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राम भरत गुन गनत सप्रीती। निसि दंपतिहि पलक सम बीती।।

    अर्थ (Hindi)

    राम भरत गुन गनत सप्रीती। निसि दंपतिहि पलक सम बीती।।

  2867. RCM 2.290.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राज समाज प्रात जुग जागे। न्हाइ न्हाइ सुर पूजन लागे।।

    अर्थ (Hindi)

    राज समाज प्रात जुग जागे। न्हाइ न्हाइ सुर पूजन लागे।।

  2868. RCM 2.290.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    गे नहाइ गुर पहीं रघुराई। बंदि चरन बोले रुख पाई।।

    अर्थ (Hindi)

    गे नहाइ गुर पहीं रघुराई। बंदि चरन बोले रुख पाई।।

  2869. RCM 2.290.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नाथ भरतु पुरजन महतारी। सोक बिकल बनबास दुखारी।।

    अर्थ (Hindi)

    नाथ भरतु पुरजन महतारी। सोक बिकल बनबास दुखारी।।

  2870. RCM 2.290.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सहित समाज राउ मिथिलेसू। बहुत दिवस भए सहत कलेसू।।

    अर्थ (Hindi)

    सहित समाज राउ मिथिलेसू। बहुत दिवस भए सहत कलेसू।।

  2871. RCM 2.290.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    उचित होइ सोइ कीजिअ नाथा। हित सबही कर रौरें हाथा।।

    अर्थ (Hindi)

    उचित होइ सोइ कीजिअ नाथा। हित सबही कर रौरें हाथा।।

  2872. RCM 2.290.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अस कहि अति सकुचे रघुराऊ। मुनि पुलके लखि सीलु सुभाऊ।।

    अर्थ (Hindi)

    अस कहि अति सकुचे रघुराऊ। मुनि पुलके लखि सीलु सुभाऊ।।

  2873. RCM 2.290.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तुम्ह बिनु राम सकल सुख साजा। नरक सरिस दुहु राज समाजा।।

    अर्थ (Hindi)

    तुम्ह बिनु राम सकल सुख साजा। नरक सरिस दुहु राज समाजा।।

  2874. RCM 2.290.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    प्रान प्रान के जीव के जिव सुख के सुख राम।

    अर्थ (Hindi)

    प्रान प्रान के जीव के जिव सुख के सुख राम।

  2875. RCM 2.290.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तुम्ह तजि तात सोहात गृह जिन्हहि तिन्हहिं बिधि बाम।।290।।

    अर्थ (Hindi)

    तुम्ह तजि तात सोहात गृह जिन्हहि तिन्हहिं बिधि बाम।।290।।

  2876. RCM 2.291.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सो सुखु करमु धरमु जरि जाऊ। जहँ न राम पद पंकज भाऊ।।

    अर्थ (Hindi)

    सो सुखु करमु धरमु जरि जाऊ। जहँ न राम पद पंकज भाऊ।।

  2877. RCM 2.291.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जोगु कुजोगु ग्यानु अग्यानू। जहँ नहिं राम पेम परधानू।।

    अर्थ (Hindi)

    जोगु कुजोगु ग्यानु अग्यानू। जहँ नहिं राम पेम परधानू।।

  2878. RCM 2.291.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तुम्ह बिनु दुखी सुखी तुम्ह तेहीं। तुम्ह जानहु जिय जो जेहि केहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    तुम्ह बिनु दुखी सुखी तुम्ह तेहीं। तुम्ह जानहु जिय जो जेहि केहीं।।

  2879. RCM 2.291.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राउर आयसु सिर सबही कें। बिदित कृपालहि गति सब नीकें।।

    अर्थ (Hindi)

    राउर आयसु सिर सबही कें। बिदित कृपालहि गति सब नीकें।।

  2880. RCM 2.291.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    आपु आश्रमहि धारिअ पाऊ। भयउ सनेह सिथिल मुनिराऊ।।

    अर्थ (Hindi)

    आपु आश्रमहि धारिअ पाऊ। भयउ सनेह सिथिल मुनिराऊ।।

  2881. RCM 2.291.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    करि प्रनाम तब रामु सिधाए। रिषि धरि धीर जनक पहिं आए।।

    अर्थ (Hindi)

    करि प्रनाम तब रामु सिधाए। रिषि धरि धीर जनक पहिं आए।।

  2882. RCM 2.291.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राम बचन गुरु नृपहि सुनाए। सील सनेह सुभायँ सुहाए।।

    अर्थ (Hindi)

    राम बचन गुरु नृपहि सुनाए। सील सनेह सुभायँ सुहाए।।

  2883. RCM 2.291.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    महाराज अब कीजिअ सोई। सब कर धरम सहित हित होई।।

    अर्थ (Hindi)

    महाराज अब कीजिअ सोई। सब कर धरम सहित हित होई।।

  2884. RCM 2.291.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    ग्यान निधान सुजान सुचि धरम धीर नरपाल।

    अर्थ (Hindi)

    ग्यान निधान सुजान सुचि धरम धीर नरपाल।

  2885. RCM 2.291.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तुम्ह बिनु असमंजस समन को समरथ एहि काल।।291।।

    अर्थ (Hindi)

    तुम्ह बिनु असमंजस समन को समरथ एहि काल।।291।।

  2886. RCM 2.292.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनि मुनि बचन जनक अनुरागे। लखि गति ग्यानु बिरागु बिरागे।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनि मुनि बचन जनक अनुरागे। लखि गति ग्यानु बिरागु बिरागे।।

  2887. RCM 2.292.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सिथिल सनेहँ गुनत मन माहीं। आए इहाँ कीन्ह भल नाही।।

    अर्थ (Hindi)

    सिथिल सनेहँ गुनत मन माहीं। आए इहाँ कीन्ह भल नाही।।

  2888. RCM 2.292.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    रामहि रायँ कहेउ बन जाना। कीन्ह आपु प्रिय प्रेम प्रवाना।।

    अर्थ (Hindi)

    रामहि रायँ कहेउ बन जाना। कीन्ह आपु प्रिय प्रेम प्रवाना।।

  2889. RCM 2.292.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    हम अब बन तें बनहि पठाई। प्रमुदित फिरब बिबेक बड़ाई।।

    अर्थ (Hindi)

    हम अब बन तें बनहि पठाई। प्रमुदित फिरब बिबेक बड़ाई।।

  2890. RCM 2.292.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तापस मुनि महिसुर सुनि देखी। भए प्रेम बस बिकल बिसेषी।।

    अर्थ (Hindi)

    तापस मुनि महिसुर सुनि देखी। भए प्रेम बस बिकल बिसेषी।।

  2891. RCM 2.292.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    समउ समुझि धरि धीरजु राजा। चले भरत पहिं सहित समाजा।।

    अर्थ (Hindi)

    समउ समुझि धरि धीरजु राजा। चले भरत पहिं सहित समाजा।।

  2892. RCM 2.292.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भरत आइ आगें भइ लीन्हे। अवसर सरिस सुआसन दीन्हे।।

    अर्थ (Hindi)

    भरत आइ आगें भइ लीन्हे। अवसर सरिस सुआसन दीन्हे।।

  2893. RCM 2.292.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तात भरत कह तेरहुति राऊ। तुम्हहि बिदित रघुबीर सुभाऊ।।

    अर्थ (Hindi)

    तात भरत कह तेरहुति राऊ। तुम्हहि बिदित रघुबीर सुभाऊ।।

  2894. RCM 2.292.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राम सत्यब्रत धरम रत सब कर सीलु सनेहु।।

    अर्थ (Hindi)

    राम सत्यब्रत धरम रत सब कर सीलु सनेहु।।

  2895. RCM 2.292.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    संकट सहत सकोच बस कहिअ जो आयसु देहु।।292।।

    अर्थ (Hindi)

    संकट सहत सकोच बस कहिअ जो आयसु देहु।।292।।

  2896. RCM 2.293.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनि तन पुलकि नयन भरि बारी। बोले भरतु धीर धरि भारी।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनि तन पुलकि नयन भरि बारी। बोले भरतु धीर धरि भारी।।

  2897. RCM 2.293.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    प्रभु प्रिय पूज्य पिता सम आपू। कुलगुरु सम हित माय न बापू।।

    अर्थ (Hindi)

    प्रभु प्रिय पूज्य पिता सम आपू। कुलगुरु सम हित माय न बापू।।

  2898. RCM 2.293.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कौसिकादि मुनि सचिव समाजू। ग्यान अंबुनिधि आपुनु आजू।।

    अर्थ (Hindi)

    कौसिकादि मुनि सचिव समाजू। ग्यान अंबुनिधि आपुनु आजू।।

  2899. RCM 2.293.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सिसु सेवक आयसु अनुगामी। जानि मोहि सिख देइअ स्वामी।।

    अर्थ (Hindi)

    सिसु सेवक आयसु अनुगामी। जानि मोहि सिख देइअ स्वामी।।

  2900. RCM 2.293.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    एहिं समाज थल बूझब राउर। मौन मलिन मैं बोलब बाउर।।

    अर्थ (Hindi)

    एहिं समाज थल बूझब राउर। मौन मलिन मैं बोलब बाउर।।

  2901. RCM 2.293.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    छोटे बदन कहउँ बड़ि बाता। छमब तात लखि बाम बिधाता।।

    अर्थ (Hindi)

    छोटे बदन कहउँ बड़ि बाता। छमब तात लखि बाम बिधाता।।

  2902. RCM 2.293.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    आगम निगम प्रसिद्ध पुराना। सेवाधरमु कठिन जगु जाना।।

    अर्थ (Hindi)

    आगम निगम प्रसिद्ध पुराना। सेवाधरमु कठिन जगु जाना।।

  2903. RCM 2.293.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    स्वामि धरम स्वारथहि बिरोधू। बैरु अंध प्रेमहि न प्रबोधू।।

    अर्थ (Hindi)

    स्वामि धरम स्वारथहि बिरोधू। बैरु अंध प्रेमहि न प्रबोधू।।

  2904. RCM 2.293.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राखि राम रुख धरमु ब्रतु पराधीन मोहि जानि।

    अर्थ (Hindi)

    राखि राम रुख धरमु ब्रतु पराधीन मोहि जानि।

  2905. RCM 2.293.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सब कें संमत सर्ब हित करिअ पेमु पहिचानि।।293।।

    अर्थ (Hindi)

    सब कें संमत सर्ब हित करिअ पेमु पहिचानि।।293।।

  2906. RCM 2.294.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भरत बचन सुनि देखि सुभाऊ। सहित समाज सराहत राऊ।।

    अर्थ (Hindi)

    भरत बचन सुनि देखि सुभाऊ। सहित समाज सराहत राऊ।।

  2907. RCM 2.294.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुगम अगम मृदु मंजु कठोरे। अरथु अमित अति आखर थोरे।।

    अर्थ (Hindi)

    सुगम अगम मृदु मंजु कठोरे। अरथु अमित अति आखर थोरे।।

  2908. RCM 2.294.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    ज्यौ मुख मुकुर मुकुरु निज पानी। गहि न जाइ अस अदभुत बानी।।

    अर्थ (Hindi)

    ज्यौ मुख मुकुर मुकुरु निज पानी। गहि न जाइ अस अदभुत बानी।।

  2909. RCM 2.294.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भूप भरत मुनि सहित समाजू। गे जहँ बिबुध कुमुद द्विजराजू।।

    अर्थ (Hindi)

    भूप भरत मुनि सहित समाजू। गे जहँ बिबुध कुमुद द्विजराजू।।

  2910. RCM 2.294.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनि सुधि सोच बिकल सब लोगा। मनहुँ मीनगन नव जल जोगा।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनि सुधि सोच बिकल सब लोगा। मनहुँ मीनगन नव जल जोगा।।

  2911. RCM 2.294.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    देवँ प्रथम कुलगुर गति देखी। निरखि बिदेह सनेह बिसेषी।।

    अर्थ (Hindi)

    देवँ प्रथम कुलगुर गति देखी। निरखि बिदेह सनेह बिसेषी।।

  2912. RCM 2.294.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राम भगतिमय भरतु निहारे। सुर स्वारथी हहरि हियँ हारे।।

    अर्थ (Hindi)

    राम भगतिमय भरतु निहारे। सुर स्वारथी हहरि हियँ हारे।।

  2913. RCM 2.294.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सब कोउ राम पेममय पेखा। भउ अलेख सोच बस लेखा।।

    अर्थ (Hindi)

    सब कोउ राम पेममय पेखा। भउ अलेख सोच बस लेखा।।

  2914. RCM 2.294.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    रामु सनेह सकोच बस कह ससोच सुरराज।

    अर्थ (Hindi)

    रामु सनेह सकोच बस कह ससोच सुरराज।

  2915. RCM 2.294.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    रचहु प्रपंचहि पंच मिलि नाहिं त भयउ अकाजु।।294।।

    अर्थ (Hindi)

    रचहु प्रपंचहि पंच मिलि नाहिं त भयउ अकाजु।।294।।

  2916. RCM 2.295.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुरन्ह सुमिरि सारदा सराही। देबि देव सरनागत पाही।।

    अर्थ (Hindi)

    सुरन्ह सुमिरि सारदा सराही। देबि देव सरनागत पाही।।

  2917. RCM 2.295.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    फेरि भरत मति करि निज माया। पालु बिबुध कुल करि छल छाया।।

    अर्थ (Hindi)

    फेरि भरत मति करि निज माया। पालु बिबुध कुल करि छल छाया।।

  2918. RCM 2.295.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बिबुध बिनय सुनि देबि सयानी। बोली सुर स्वारथ जड़ जानी।।

    अर्थ (Hindi)

    बिबुध बिनय सुनि देबि सयानी। बोली सुर स्वारथ जड़ जानी।।

  2919. RCM 2.295.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मो सन कहहु भरत मति फेरू। लोचन सहस न सूझ सुमेरू।।

    अर्थ (Hindi)

    मो सन कहहु भरत मति फेरू। लोचन सहस न सूझ सुमेरू।।

  2920. RCM 2.295.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बिधि हरि हर माया बड़ि भारी। सोउ न भरत मति सकइ निहारी।।

    अर्थ (Hindi)

    बिधि हरि हर माया बड़ि भारी। सोउ न भरत मति सकइ निहारी।।

  2921. RCM 2.295.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सो मति मोहि कहत करु भोरी। चंदिनि कर कि चंडकर चोरी।।

    अर्थ (Hindi)

    सो मति मोहि कहत करु भोरी। चंदिनि कर कि चंडकर चोरी।।

  2922. RCM 2.295.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भरत हृदयँ सिय राम निवासू। तहँ कि तिमिर जहँ तरनि प्रकासू।।

    अर्थ (Hindi)

    भरत हृदयँ सिय राम निवासू। तहँ कि तिमिर जहँ तरनि प्रकासू।।

  2923. RCM 2.295.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अस कहि सारद गइ बिधि लोका। बिबुध बिकल निसि मानहुँ कोका।।

    अर्थ (Hindi)

    अस कहि सारद गइ बिधि लोका। बिबुध बिकल निसि मानहुँ कोका।।

  2924. RCM 2.295.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुर स्वारथी मलीन मन कीन्ह कुमंत्र कुठाटु।।

    अर्थ (Hindi)

    सुर स्वारथी मलीन मन कीन्ह कुमंत्र कुठाटु।।

  2925. RCM 2.295.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    रचि प्रपंच माया प्रबल भय भ्रम अरति उचाटु।।295।।

    अर्थ (Hindi)

    रचि प्रपंच माया प्रबल भय भ्रम अरति उचाटु।।295।।

  2926. RCM 2.296.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    करि कुचालि सोचत सुरराजू। भरत हाथ सबु काजु अकाजू।।

    अर्थ (Hindi)

    करि कुचालि सोचत सुरराजू। भरत हाथ सबु काजु अकाजू।।

  2927. RCM 2.296.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    गए जनकु रघुनाथ समीपा। सनमाने सब रबिकुल दीपा।।

    अर्थ (Hindi)

    गए जनकु रघुनाथ समीपा। सनमाने सब रबिकुल दीपा।।

  2928. RCM 2.296.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    समय समाज धरम अबिरोधा। बोले तब रघुबंस पुरोधा।।

    अर्थ (Hindi)

    समय समाज धरम अबिरोधा। बोले तब रघुबंस पुरोधा।।

  2929. RCM 2.296.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जनक भरत संबादु सुनाई। भरत कहाउति कही सुहाई।।

    अर्थ (Hindi)

    जनक भरत संबादु सुनाई। भरत कहाउति कही सुहाई।।

  2930. RCM 2.296.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तात राम जस आयसु देहू। सो सबु करै मोर मत एहू।।

    अर्थ (Hindi)

    तात राम जस आयसु देहू। सो सबु करै मोर मत एहू।।

  2931. RCM 2.296.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनि रघुनाथ जोरि जुग पानी। बोले सत्य सरल मृदु बानी।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनि रघुनाथ जोरि जुग पानी। बोले सत्य सरल मृदु बानी।।

  2932. RCM 2.296.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बिद्यमान आपुनि मिथिलेसू। मोर कहब सब भाँति भदेसू।।

    अर्थ (Hindi)

    बिद्यमान आपुनि मिथिलेसू। मोर कहब सब भाँति भदेसू।।

  2933. RCM 2.296.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राउर राय रजायसु होई। राउरि सपथ सही सिर सोई।।

    अर्थ (Hindi)

    राउर राय रजायसु होई। राउरि सपथ सही सिर सोई।।

  2934. RCM 2.296.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राम सपथ सुनि मुनि जनकु सकुचे सभा समेत।

    अर्थ (Hindi)

    राम सपथ सुनि मुनि जनकु सकुचे सभा समेत।

  2935. RCM 2.296.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सकल बिलोकत भरत मुखु बनइ न उतरु देत।।296।।

    अर्थ (Hindi)

    सकल बिलोकत भरत मुखु बनइ न उतरु देत।।296।।

  2936. RCM 2.297.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सभा सकुच बस भरत निहारी। रामबंधु धरि धीरजु भारी।।

    अर्थ (Hindi)

    सभा सकुच बस भरत निहारी। रामबंधु धरि धीरजु भारी।।

  2937. RCM 2.297.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कुसमउ देखि सनेहु सँभारा। बढ़त बिंधि जिमि घटज निवारा।।

    अर्थ (Hindi)

    कुसमउ देखि सनेहु सँभारा। बढ़त बिंधि जिमि घटज निवारा।।

  2938. RCM 2.297.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सोक कनकलोचन मति छोनी। हरी बिमल गुन गन जगजोनी।।

    अर्थ (Hindi)

    सोक कनकलोचन मति छोनी। हरी बिमल गुन गन जगजोनी।।

  2939. RCM 2.297.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भरत बिबेक बराहँ बिसाला। अनायास उधरी तेहि काला।।

    अर्थ (Hindi)

    भरत बिबेक बराहँ बिसाला। अनायास उधरी तेहि काला।।

  2940. RCM 2.297.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    करि प्रनामु सब कहँ कर जोरे। रामु राउ गुर साधु निहोरे।।

    अर्थ (Hindi)

    करि प्रनामु सब कहँ कर जोरे। रामु राउ गुर साधु निहोरे।।

  2941. RCM 2.297.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    छमब आजु अति अनुचित मोरा। कहउँ बदन मृदु बचन कठोरा।।

    अर्थ (Hindi)

    छमब आजु अति अनुचित मोरा। कहउँ बदन मृदु बचन कठोरा।।

  2942. RCM 2.297.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    हियँ सुमिरी सारदा सुहाई। मानस तें मुख पंकज आई।।

    अर्थ (Hindi)

    हियँ सुमिरी सारदा सुहाई। मानस तें मुख पंकज आई।।

  2943. RCM 2.297.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बिमल बिबेक धरम नय साली। भरत भारती मंजु मराली।।

    अर्थ (Hindi)

    बिमल बिबेक धरम नय साली। भरत भारती मंजु मराली।।

  2944. RCM 2.297.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    निरखि बिबेक बिलोचनन्हि सिथिल सनेहँ समाजु।

    अर्थ (Hindi)

    निरखि बिबेक बिलोचनन्हि सिथिल सनेहँ समाजु।

  2945. RCM 2.297.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    करि प्रनामु बोले भरतु सुमिरि सीय रघुराजु।।297।।

    अर्थ (Hindi)

    करि प्रनामु बोले भरतु सुमिरि सीय रघुराजु।।297।।

  2946. RCM 2.298.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    प्रभु पितु मातु सुह्रद गुर स्वामी। पूज्य परम हित अतंरजामी।।

    अर्थ (Hindi)

    प्रभु पितु मातु सुह्रद गुर स्वामी। पूज्य परम हित अतंरजामी।।

  2947. RCM 2.298.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सरल सुसाहिबु सील निधानू। प्रनतपाल सर्बग्य सुजानू।।

    अर्थ (Hindi)

    सरल सुसाहिबु सील निधानू। प्रनतपाल सर्बग्य सुजानू।।

  2948. RCM 2.298.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    समरथ सरनागत हितकारी। गुनगाहकु अवगुन अघ हारी।।

    अर्थ (Hindi)

    समरथ सरनागत हितकारी। गुनगाहकु अवगुन अघ हारी।।

  2949. RCM 2.298.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    स्वामि गोसाँइहि सरिस गोसाई। मोहि समान मैं साइँ दोहाई।।

    अर्थ (Hindi)

    स्वामि गोसाँइहि सरिस गोसाई। मोहि समान मैं साइँ दोहाई।।

  2950. RCM 2.298.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    प्रभु पितु बचन मोह बस पेली। आयउँ इहाँ समाजु सकेली।।

    अर्थ (Hindi)

    प्रभु पितु बचन मोह बस पेली। आयउँ इहाँ समाजु सकेली।।

  2951. RCM 2.298.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जग भल पोच ऊँच अरु नीचू। अमिअ अमरपद माहुरु मीचू।।

    अर्थ (Hindi)

    जग भल पोच ऊँच अरु नीचू। अमिअ अमरपद माहुरु मीचू।।

  2952. RCM 2.298.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राम रजाइ मेट मन माहीं। देखा सुना कतहुँ कोउ नाहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    राम रजाइ मेट मन माहीं। देखा सुना कतहुँ कोउ नाहीं।।

  2953. RCM 2.298.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सो मैं सब बिधि कीन्हि ढिठाई। प्रभु मानी सनेह सेवकाई।।

    अर्थ (Hindi)

    सो मैं सब बिधि कीन्हि ढिठाई। प्रभु मानी सनेह सेवकाई।।

  2954. RCM 2.298.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कृपाँ भलाई आपनी नाथ कीन्ह भल मोर।

    अर्थ (Hindi)

    कृपाँ भलाई आपनी नाथ कीन्ह भल मोर।

  2955. RCM 2.298.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    दूषन भे भूषन सरिस सुजसु चारु चहु ओर।।298।।

    अर्थ (Hindi)

    दूषन भे भूषन सरिस सुजसु चारु चहु ओर।।298।।

  2956. RCM 2.299.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राउरि रीति सुबानि बड़ाई। जगत बिदित निगमागम गाई।।

    अर्थ (Hindi)

    राउरि रीति सुबानि बड़ाई। जगत बिदित निगमागम गाई।।

  2957. RCM 2.299.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कूर कुटिल खल कुमति कलंकी। नीच निसील निरीस निसंकी।।

    अर्थ (Hindi)

    कूर कुटिल खल कुमति कलंकी। नीच निसील निरीस निसंकी।।

  2958. RCM 2.299.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तेउ सुनि सरन सामुहें आए। सकृत प्रनामु किहें अपनाए।।

    अर्थ (Hindi)

    तेउ सुनि सरन सामुहें आए। सकृत प्रनामु किहें अपनाए।।

  2959. RCM 2.299.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    देखि दोष कबहुँ न उर आने। सुनि गुन साधु समाज बखाने।।

    अर्थ (Hindi)

    देखि दोष कबहुँ न उर आने। सुनि गुन साधु समाज बखाने।।

  2960. RCM 2.299.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    को साहिब सेवकहि नेवाजी। आपु समाज साज सब साजी।।

    अर्थ (Hindi)

    को साहिब सेवकहि नेवाजी। आपु समाज साज सब साजी।।

  2961. RCM 2.299.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    निज करतूति न समुझिअ सपनें। सेवक सकुच सोचु उर अपनें।।

    अर्थ (Hindi)

    निज करतूति न समुझिअ सपनें। सेवक सकुच सोचु उर अपनें।।

  2962. RCM 2.299.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सो गोसाइँ नहि दूसर कोपी। भुजा उठाइ कहउँ पन रोपी।।

    अर्थ (Hindi)

    सो गोसाइँ नहि दूसर कोपी। भुजा उठाइ कहउँ पन रोपी।।

  2963. RCM 2.299.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पसु नाचत सुक पाठ प्रबीना। गुन गति नट पाठक आधीना।।

    अर्थ (Hindi)

    पसु नाचत सुक पाठ प्रबीना। गुन गति नट पाठक आधीना।।

  2964. RCM 2.299.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    यों सुधारि सनमानि जन किए साधु सिरमोर।

    अर्थ (Hindi)

    यों सुधारि सनमानि जन किए साधु सिरमोर।

  2965. RCM 2.299.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    को कृपाल बिनु पालिहै बिरिदावलि बरजोर।।299।।

    अर्थ (Hindi)

    को कृपाल बिनु पालिहै बिरिदावलि बरजोर।।299।।

  2966. RCM 2.300.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सोक सनेहँ कि बाल सुभाएँ। आयउँ लाइ रजायसु बाएँ।।

    अर्थ (Hindi)

    सोक सनेहँ कि बाल सुभाएँ। आयउँ लाइ रजायसु बाएँ।।

  2967. RCM 2.300.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तबहुँ कृपाल हेरि निज ओरा। सबहि भाँति भल मानेउ मोरा।।

    अर्थ (Hindi)

    तबहुँ कृपाल हेरि निज ओरा। सबहि भाँति भल मानेउ मोरा।।

  2968. RCM 2.300.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    देखेउँ पाय सुमंगल मूला। जानेउँ स्वामि सहज अनुकूला।।

    अर्थ (Hindi)

    देखेउँ पाय सुमंगल मूला। जानेउँ स्वामि सहज अनुकूला।।

  2969. RCM 2.300.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बड़ें समाज बिलोकेउँ भागू। बड़ीं चूक साहिब अनुरागू।।

    अर्थ (Hindi)

    बड़ें समाज बिलोकेउँ भागू। बड़ीं चूक साहिब अनुरागू।।

  2970. RCM 2.300.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कृपा अनुग्रह अंगु अघाई। कीन्हि कृपानिधि सब अधिकाई।।

    अर्थ (Hindi)

    कृपा अनुग्रह अंगु अघाई। कीन्हि कृपानिधि सब अधिकाई।।

  2971. RCM 2.300.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राखा मोर दुलार गोसाईं। अपनें सील सुभायँ भलाईं।।

    अर्थ (Hindi)

    राखा मोर दुलार गोसाईं। अपनें सील सुभायँ भलाईं।।

  2972. RCM 2.300.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नाथ निपट मैं कीन्हि ढिठाई। स्वामि समाज सकोच बिहाई।।

    अर्थ (Hindi)

    नाथ निपट मैं कीन्हि ढिठाई। स्वामि समाज सकोच बिहाई।।

  2973. RCM 2.300.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अबिनय बिनय जथारुचि बानी। छमिहि देउ अति आरति जानी।।

    अर्थ (Hindi)

    अबिनय बिनय जथारुचि बानी। छमिहि देउ अति आरति जानी।।

  2974. RCM 2.300.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुह्रद सुजान सुसाहिबहि बहुत कहब बड़ि खोरि।

    अर्थ (Hindi)

    सुह्रद सुजान सुसाहिबहि बहुत कहब बड़ि खोरि।

  2975. RCM 2.300.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    आयसु देइअ देव अब सबइ सुधारी मोरि।।300।।

    अर्थ (Hindi)

    आयसु देइअ देव अब सबइ सुधारी मोरि।।300।।

  2976. RCM 2.301.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    प्रभु पद पदुम पराग दोहाई। सत्य सुकृत सुख सीवँ सुहाई।।

    अर्थ (Hindi)

    प्रभु पद पदुम पराग दोहाई। सत्य सुकृत सुख सीवँ सुहाई।।

  2977. RCM 2.301.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सो करि कहउँ हिए अपने की। रुचि जागत सोवत सपने की।।

    अर्थ (Hindi)

    सो करि कहउँ हिए अपने की। रुचि जागत सोवत सपने की।।

  2978. RCM 2.301.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सहज सनेहँ स्वामि सेवकाई। स्वारथ छल फल चारि बिहाई।।

    अर्थ (Hindi)

    सहज सनेहँ स्वामि सेवकाई। स्वारथ छल फल चारि बिहाई।।

  2979. RCM 2.301.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अग्या सम न सुसाहिब सेवा। सो प्रसादु जन पावै देवा।।

    अर्थ (Hindi)

    अग्या सम न सुसाहिब सेवा। सो प्रसादु जन पावै देवा।।

  2980. RCM 2.301.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अस कहि प्रेम बिबस भए भारी। पुलक सरीर बिलोचन बारी।।

    अर्थ (Hindi)

    अस कहि प्रेम बिबस भए भारी। पुलक सरीर बिलोचन बारी।।

  2981. RCM 2.301.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    प्रभु पद कमल गहे अकुलाई। समउ सनेहु न सो कहि जाई।।

    अर्थ (Hindi)

    प्रभु पद कमल गहे अकुलाई। समउ सनेहु न सो कहि जाई।।

  2982. RCM 2.301.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कृपासिंधु सनमानि सुबानी। बैठाए समीप गहि पानी।।

    अर्थ (Hindi)

    कृपासिंधु सनमानि सुबानी। बैठाए समीप गहि पानी।।

  2983. RCM 2.301.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भरत बिनय सुनि देखि सुभाऊ। सिथिल सनेहँ सभा रघुराऊ।।

    अर्थ (Hindi)

    भरत बिनय सुनि देखि सुभाऊ। सिथिल सनेहँ सभा रघुराऊ।।

  2984. RCM 2.302.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कपट कुचालि सीवँ सुरराजू। पर अकाज प्रिय आपन काजू।।

    अर्थ (Hindi)

    कपट कुचालि सीवँ सुरराजू। पर अकाज प्रिय आपन काजू।।

  2985. RCM 2.302.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    काक समान पाकरिपु रीती। छली मलीन कतहुँ न प्रतीती।।

    अर्थ (Hindi)

    काक समान पाकरिपु रीती। छली मलीन कतहुँ न प्रतीती।।

  2986. RCM 2.302.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    प्रथम कुमत करि कपटु सँकेला। सो उचाटु सब कें सिर मेला।।

    अर्थ (Hindi)

    प्रथम कुमत करि कपटु सँकेला। सो उचाटु सब कें सिर मेला।।

  2987. RCM 2.302.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुरमायाँ सब लोग बिमोहे। राम प्रेम अतिसय न बिछोहे।।

    अर्थ (Hindi)

    सुरमायाँ सब लोग बिमोहे। राम प्रेम अतिसय न बिछोहे।।

  2988. RCM 2.302.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भय उचाट बस मन थिर नाहीं। छन बन रुचि छन सदन सोहाहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    भय उचाट बस मन थिर नाहीं। छन बन रुचि छन सदन सोहाहीं।।

  2989. RCM 2.302.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    दुबिध मनोगति प्रजा दुखारी। सरित सिंधु संगम जनु बारी।।

    अर्थ (Hindi)

    दुबिध मनोगति प्रजा दुखारी। सरित सिंधु संगम जनु बारी।।

  2990. RCM 2.302.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    दुचित कतहुँ परितोषु न लहहीं। एक एक सन मरमु न कहहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    दुचित कतहुँ परितोषु न लहहीं। एक एक सन मरमु न कहहीं।।

  2991. RCM 2.302.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    लखि हियँ हँसि कह कृपानिधानू। सरिस स्वान मघवान जुबानू।।

    अर्थ (Hindi)

    लखि हियँ हँसि कह कृपानिधानू। सरिस स्वान मघवान जुबानू।।

  2992. RCM 2.302.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भरतु जनकु मुनिजन सचिव साधु सचेत बिहाइ।

    अर्थ (Hindi)

    भरतु जनकु मुनिजन सचिव साधु सचेत बिहाइ।

  2993. RCM 2.302.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    लागि देवमाया सबहि जथाजोगु जनु पाइ।।302।।

    अर्थ (Hindi)

    लागि देवमाया सबहि जथाजोगु जनु पाइ।।302।।

  2994. RCM 2.303.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कृपासिंधु लखि लोग दुखारे। निज सनेहँ सुरपति छल भारे।।

    अर्थ (Hindi)

    कृपासिंधु लखि लोग दुखारे। निज सनेहँ सुरपति छल भारे।।

  2995. RCM 2.303.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सभा राउ गुर महिसुर मंत्री। भरत भगति सब कै मति जंत्री।।

    अर्थ (Hindi)

    सभा राउ गुर महिसुर मंत्री। भरत भगति सब कै मति जंत्री।।

  2996. RCM 2.303.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    रामहि चितवत चित्र लिखे से। सकुचत बोलत बचन सिखे से।।

    अर्थ (Hindi)

    रामहि चितवत चित्र लिखे से। सकुचत बोलत बचन सिखे से।।

  2997. RCM 2.303.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भरत प्रीति नति बिनय बड़ाई। सुनत सुखद बरनत कठिनाई।।

    अर्थ (Hindi)

    भरत प्रीति नति बिनय बड़ाई। सुनत सुखद बरनत कठिनाई।।

  2998. RCM 2.303.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जासु बिलोकि भगति लवलेसू। प्रेम मगन मुनिगन मिथिलेसू।।

    अर्थ (Hindi)

    जासु बिलोकि भगति लवलेसू। प्रेम मगन मुनिगन मिथिलेसू।।

  2999. RCM 2.303.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    महिमा तासु कहै किमि तुलसी। भगति सुभायँ सुमति हियँ हुलसी।।

    अर्थ (Hindi)

    महिमा तासु कहै किमि तुलसी। भगति सुभायँ सुमति हियँ हुलसी।।

  3000. RCM 2.303.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    आपु छोटि महिमा बड़ि जानी। कबिकुल कानि मानि सकुचानी।।

    अर्थ (Hindi)

    आपु छोटि महिमा बड़ि जानी। कबिकुल कानि मानि सकुचानी।।

  3001. RCM 2.303.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कहि न सकति गुन रुचि अधिकाई। मति गति बाल बचन की नाई।।

    अर्थ (Hindi)

    कहि न सकति गुन रुचि अधिकाई। मति गति बाल बचन की नाई।।

  3002. RCM 2.303.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भरत बिमल जसु बिमल बिधु सुमति चकोरकुमारि।

    अर्थ (Hindi)

    भरत बिमल जसु बिमल बिधु सुमति चकोरकुमारि।

  3003. RCM 2.303.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    उदित बिमल जन हृदय नभ एकटक रही निहारि।।303।।

    अर्थ (Hindi)

    उदित बिमल जन हृदय नभ एकटक रही निहारि।।303।।

  3004. RCM 2.304.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भरत सुभाउ न सुगम निगमहूँ। लघु मति चापलता कबि छमहूँ।।

    अर्थ (Hindi)

    भरत सुभाउ न सुगम निगमहूँ। लघु मति चापलता कबि छमहूँ।।

  3005. RCM 2.304.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कहत सुनत सति भाउ भरत को। सीय राम पद होइ न रत को।।

    अर्थ (Hindi)

    कहत सुनत सति भाउ भरत को। सीय राम पद होइ न रत को।।

  3006. RCM 2.304.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुमिरत भरतहि प्रेमु राम को। जेहि न सुलभ तेहि सरिस बाम को।।

    अर्थ (Hindi)

    सुमिरत भरतहि प्रेमु राम को। जेहि न सुलभ तेहि सरिस बाम को।।

  3007. RCM 2.304.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    देखि दयाल दसा सबही की। राम सुजान जानि जन जी की।।

    अर्थ (Hindi)

    देखि दयाल दसा सबही की। राम सुजान जानि जन जी की।।

  3008. RCM 2.304.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    धरम धुरीन धीर नय नागर। सत्य सनेह सील सुख सागर।।

    अर्थ (Hindi)

    धरम धुरीन धीर नय नागर। सत्य सनेह सील सुख सागर।।

  3009. RCM 2.304.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    देसु काल लखि समउ समाजू। नीति प्रीति पालक रघुराजू।।

    अर्थ (Hindi)

    देसु काल लखि समउ समाजू। नीति प्रीति पालक रघुराजू।।

  3010. RCM 2.304.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बोले बचन बानि सरबसु से। हित परिनाम सुनत ससि रसु से।।

    अर्थ (Hindi)

    बोले बचन बानि सरबसु से। हित परिनाम सुनत ससि रसु से।।

  3011. RCM 2.304.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तात भरत तुम्ह धरम धुरीना। लोक बेद बिद प्रेम प्रबीना।।

    अर्थ (Hindi)

    तात भरत तुम्ह धरम धुरीना। लोक बेद बिद प्रेम प्रबीना।।

  3012. RCM 2.304.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    करम बचन मानस बिमल तुम्ह समान तुम्ह तात।

    अर्थ (Hindi)

    करम बचन मानस बिमल तुम्ह समान तुम्ह तात।

  3013. RCM 2.304.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    गुर समाज लघु बंधु गुन कुसमयँ किमि कहि जात।।304।।

    अर्थ (Hindi)

    गुर समाज लघु बंधु गुन कुसमयँ किमि कहि जात।।304।।

  3014. RCM 2.305.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जानहु तात तरनि कुल रीती। सत्यसंध पितु कीरति प्रीती।।

    अर्थ (Hindi)

    जानहु तात तरनि कुल रीती। सत्यसंध पितु कीरति प्रीती।।

  3015. RCM 2.305.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    समउ समाजु लाज गुरुजन की। उदासीन हित अनहित मन की।।

    अर्थ (Hindi)

    समउ समाजु लाज गुरुजन की। उदासीन हित अनहित मन की।।

  3016. RCM 2.305.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तुम्हहि बिदित सबही कर करमू। आपन मोर परम हित धरमू।।

    अर्थ (Hindi)

    तुम्हहि बिदित सबही कर करमू। आपन मोर परम हित धरमू।।

  3017. RCM 2.305.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मोहि सब भाँति भरोस तुम्हारा। तदपि कहउँ अवसर अनुसारा।।

    अर्थ (Hindi)

    मोहि सब भाँति भरोस तुम्हारा। तदपि कहउँ अवसर अनुसारा।।

  3018. RCM 2.305.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तात तात बिनु बात हमारी। केवल गुरुकुल कृपाँ सँभारी।।

    अर्थ (Hindi)

    तात तात बिनु बात हमारी। केवल गुरुकुल कृपाँ सँभारी।।

  3019. RCM 2.305.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नतरु प्रजा परिजन परिवारू। हमहि सहित सबु होत खुआरू।।

    अर्थ (Hindi)

    नतरु प्रजा परिजन परिवारू। हमहि सहित सबु होत खुआरू।।

  3020. RCM 2.305.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जौं बिनु अवसर अथवँ दिनेसू। जग केहि कहहु न होइ कलेसू।।

    अर्थ (Hindi)

    जौं बिनु अवसर अथवँ दिनेसू। जग केहि कहहु न होइ कलेसू।।

  3021. RCM 2.305.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तस उतपातु तात बिधि कीन्हा। मुनि मिथिलेस राखि सबु लीन्हा।।

    अर्थ (Hindi)

    तस उतपातु तात बिधि कीन्हा। मुनि मिथिलेस राखि सबु लीन्हा।।

  3022. RCM 2.305.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राज काज सब लाज पति धरम धरनि धन धाम।

    अर्थ (Hindi)

    राज काज सब लाज पति धरम धरनि धन धाम।

  3023. RCM 2.305.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    गुर प्रभाउ पालिहि सबहि भल होइहि परिनाम।।305।।

    अर्थ (Hindi)

    गुर प्रभाउ पालिहि सबहि भल होइहि परिनाम।।305।।

  3024. RCM 2.306.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सहित समाज तुम्हार हमारा। घर बन गुर प्रसाद रखवारा।।

    अर्थ (Hindi)

    सहित समाज तुम्हार हमारा। घर बन गुर प्रसाद रखवारा।।

  3025. RCM 2.306.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मातु पिता गुर स्वामि निदेसू। सकल धरम धरनीधर सेसू।।

    अर्थ (Hindi)

    मातु पिता गुर स्वामि निदेसू। सकल धरम धरनीधर सेसू।।

  3026. RCM 2.306.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सो तुम्ह करहु करावहु मोहू। तात तरनिकुल पालक होहू।।

    अर्थ (Hindi)

    सो तुम्ह करहु करावहु मोहू। तात तरनिकुल पालक होहू।।

  3027. RCM 2.306.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    साधक एक सकल सिधि देनी। कीरति सुगति भूतिमय बेनी।।

    अर्थ (Hindi)

    साधक एक सकल सिधि देनी। कीरति सुगति भूतिमय बेनी।।

  3028. RCM 2.306.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सो बिचारि सहि संकटु भारी। करहु प्रजा परिवारु सुखारी।।

    अर्थ (Hindi)

    सो बिचारि सहि संकटु भारी। करहु प्रजा परिवारु सुखारी।।

  3029. RCM 2.306.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बाँटी बिपति सबहिं मोहि भाई। तुम्हहि अवधि भरि बड़ि कठिनाई।।

    अर्थ (Hindi)

    बाँटी बिपति सबहिं मोहि भाई। तुम्हहि अवधि भरि बड़ि कठिनाई।।

  3030. RCM 2.306.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जानि तुम्हहि मृदु कहउँ कठोरा। कुसमयँ तात न अनुचित मोरा।।

    अर्थ (Hindi)

    जानि तुम्हहि मृदु कहउँ कठोरा। कुसमयँ तात न अनुचित मोरा।।

  3031. RCM 2.306.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    होहिं कुठायँ सुबंधु सुहाए। ओड़िअहिं हाथ असनिहु के घाए।।

    अर्थ (Hindi)

    होहिं कुठायँ सुबंधु सुहाए। ओड़िअहिं हाथ असनिहु के घाए।।

  3032. RCM 2.306.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सेवक कर पद नयन से मुख सो साहिबु होइ।

    अर्थ (Hindi)

    सेवक कर पद नयन से मुख सो साहिबु होइ।

  3033. RCM 2.306.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तुलसी प्रीति कि रीति सुनि सुकबि सराहहिं सोइ।।306।।

    अर्थ (Hindi)

    तुलसी प्रीति कि रीति सुनि सुकबि सराहहिं सोइ।।306।।

  3034. RCM 2.307.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सभा सकल सुनि रघुबर बानी। प्रेम पयोधि अमिअ जनु सानी।।

    अर्थ (Hindi)

    सभा सकल सुनि रघुबर बानी। प्रेम पयोधि अमिअ जनु सानी।।

  3035. RCM 2.307.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सिथिल समाज सनेह समाधी। देखि दसा चुप सारद साधी।।

    अर्थ (Hindi)

    सिथिल समाज सनेह समाधी। देखि दसा चुप सारद साधी।।

  3036. RCM 2.307.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भरतहि भयउ परम संतोषू। सनमुख स्वामि बिमुख दुख दोषू।।

    अर्थ (Hindi)

    भरतहि भयउ परम संतोषू। सनमुख स्वामि बिमुख दुख दोषू।।

  3037. RCM 2.307.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मुख प्रसन्न मन मिटा बिषादू। भा जनु गूँगेहि गिरा प्रसादू।।

    अर्थ (Hindi)

    मुख प्रसन्न मन मिटा बिषादू। भा जनु गूँगेहि गिरा प्रसादू।।

  3038. RCM 2.307.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कीन्ह सप्रेम प्रनामु बहोरी। बोले पानि पंकरुह जोरी।।

    अर्थ (Hindi)

    कीन्ह सप्रेम प्रनामु बहोरी। बोले पानि पंकरुह जोरी।।

  3039. RCM 2.307.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नाथ भयउ सुखु साथ गए को। लहेउँ लाहु जग जनमु भए को।।

    अर्थ (Hindi)

    नाथ भयउ सुखु साथ गए को। लहेउँ लाहु जग जनमु भए को।।

  3040. RCM 2.307.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अब कृपाल जस आयसु होई। करौं सीस धरि सादर सोई।।

    अर्थ (Hindi)

    अब कृपाल जस आयसु होई। करौं सीस धरि सादर सोई।।

  3041. RCM 2.307.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सो अवलंब देव मोहि देई। अवधि पारु पावौं जेहि सेई।।

    अर्थ (Hindi)

    सो अवलंब देव मोहि देई। अवधि पारु पावौं जेहि सेई।।

  3042. RCM 2.307.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    देव देव अभिषेक हित गुर अनुसासनु पाइ।

    अर्थ (Hindi)

    देव देव अभिषेक हित गुर अनुसासनु पाइ।

  3043. RCM 2.307.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    आनेउँ सब तीरथ सलिलु तेहि कहँ काह रजाइ।।307।।

    अर्थ (Hindi)

    आनेउँ सब तीरथ सलिलु तेहि कहँ काह रजाइ।।307।।

  3044. RCM 2.308.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    एकु मनोरथु बड़ मन माहीं। सभयँ सकोच जात कहि नाहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    एकु मनोरथु बड़ मन माहीं। सभयँ सकोच जात कहि नाहीं।।

  3045. RCM 2.308.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कहहु तात प्रभु आयसु पाई। बोले बानि सनेह सुहाई।।

    अर्थ (Hindi)

    कहहु तात प्रभु आयसु पाई। बोले बानि सनेह सुहाई।।

  3046. RCM 2.308.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    चित्रकूट सुचि थल तीरथ बन। खग मृग सर सरि निर्झर गिरिगन।।

    अर्थ (Hindi)

    चित्रकूट सुचि थल तीरथ बन। खग मृग सर सरि निर्झर गिरिगन।।

  3047. RCM 2.308.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    प्रभु पद अंकित अवनि बिसेषी। आयसु होइ त आवौं देखी।।

    अर्थ (Hindi)

    प्रभु पद अंकित अवनि बिसेषी। आयसु होइ त आवौं देखी।।

  3048. RCM 2.308.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अवसि अत्रि आयसु सिर धरहू। तात बिगतभय कानन चरहू।।

    अर्थ (Hindi)

    अवसि अत्रि आयसु सिर धरहू। तात बिगतभय कानन चरहू।।

  3049. RCM 2.308.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मुनि प्रसाद बनु मंगल दाता। पावन परम सुहावन भ्राता।।

    अर्थ (Hindi)

    मुनि प्रसाद बनु मंगल दाता। पावन परम सुहावन भ्राता।।

  3050. RCM 2.308.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    रिषिनायकु जहँ आयसु देहीं। राखेहु तीरथ जलु थल तेहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    रिषिनायकु जहँ आयसु देहीं। राखेहु तीरथ जलु थल तेहीं।।

  3051. RCM 2.308.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनि प्रभु बचन भरत सुख पावा। मुनि पद कमल मुदित सिरु नावा।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनि प्रभु बचन भरत सुख पावा। मुनि पद कमल मुदित सिरु नावा।।

  3052. RCM 2.308.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भरत राम संबादु सुनि सकल सुमंगल मूल।

    अर्थ (Hindi)

    भरत राम संबादु सुनि सकल सुमंगल मूल।

  3053. RCM 2.308.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुर स्वारथी सराहि कुल बरषत सुरतरु फूल।।308।।

    अर्थ (Hindi)

    सुर स्वारथी सराहि कुल बरषत सुरतरु फूल।।308।।

  3054. RCM 2.309.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    धन्य भरत जय राम गोसाईं। कहत देव हरषत बरिआई।

    अर्थ (Hindi)

    धन्य भरत जय राम गोसाईं। कहत देव हरषत बरिआई।

  3055. RCM 2.309.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मुनि मिथिलेस सभाँ सब काहू। भरत बचन सुनि भयउ उछाहू।।

    अर्थ (Hindi)

    मुनि मिथिलेस सभाँ सब काहू। भरत बचन सुनि भयउ उछाहू।।

  3056. RCM 2.309.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भरत राम गुन ग्राम सनेहू। पुलकि प्रसंसत राउ बिदेहू।।

    अर्थ (Hindi)

    भरत राम गुन ग्राम सनेहू। पुलकि प्रसंसत राउ बिदेहू।।

  3057. RCM 2.309.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सेवक स्वामि सुभाउ सुहावन। नेमु पेमु अति पावन पावन।।

    अर्थ (Hindi)

    सेवक स्वामि सुभाउ सुहावन। नेमु पेमु अति पावन पावन।।

  3058. RCM 2.309.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मति अनुसार सराहन लागे। सचिव सभासद सब अनुरागे।।

    अर्थ (Hindi)

    मति अनुसार सराहन लागे। सचिव सभासद सब अनुरागे।।

  3059. RCM 2.309.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनि सुनि राम भरत संबादू। दुहु समाज हियँ हरषु बिषादू।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनि सुनि राम भरत संबादू। दुहु समाज हियँ हरषु बिषादू।।

  3060. RCM 2.309.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राम मातु दुखु सुखु सम जानी। कहि गुन राम प्रबोधीं रानी।।

    अर्थ (Hindi)

    राम मातु दुखु सुखु सम जानी। कहि गुन राम प्रबोधीं रानी।।

  3061. RCM 2.309.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    एक कहहिं रघुबीर बड़ाई। एक सराहत भरत भलाई।।

    अर्थ (Hindi)

    एक कहहिं रघुबीर बड़ाई। एक सराहत भरत भलाई।।

  3062. RCM 2.309.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अत्रि कहेउ तब भरत सन सैल समीप सुकूप।

    अर्थ (Hindi)

    अत्रि कहेउ तब भरत सन सैल समीप सुकूप।

  3063. RCM 2.309.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राखिअ तीरथ तोय तहँ पावन अमिअ अनूप।।309।।

    अर्थ (Hindi)

    राखिअ तीरथ तोय तहँ पावन अमिअ अनूप।।309।।

  3064. RCM 2.310.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भरत अत्रि अनुसासन पाई। जल भाजन सब दिए चलाई।।

    अर्थ (Hindi)

    भरत अत्रि अनुसासन पाई। जल भाजन सब दिए चलाई।।

  3065. RCM 2.310.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सानुज आपु अत्रि मुनि साधू। सहित गए जहँ कूप अगाधू।।

    अर्थ (Hindi)

    सानुज आपु अत्रि मुनि साधू। सहित गए जहँ कूप अगाधू।।

  3066. RCM 2.310.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पावन पाथ पुन्यथल राखा। प्रमुदित प्रेम अत्रि अस भाषा।।

    अर्थ (Hindi)

    पावन पाथ पुन्यथल राखा। प्रमुदित प्रेम अत्रि अस भाषा।।

  3067. RCM 2.310.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तात अनादि सिद्ध थल एहू। लोपेउ काल बिदित नहिं केहू।।

    अर्थ (Hindi)

    तात अनादि सिद्ध थल एहू। लोपेउ काल बिदित नहिं केहू।।

  3068. RCM 2.310.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तब सेवकन्ह सरस थलु देखा। किन्ह सुजल हित कूप बिसेषा।।

    अर्थ (Hindi)

    तब सेवकन्ह सरस थलु देखा। किन्ह सुजल हित कूप बिसेषा।।

  3069. RCM 2.310.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बिधि बस भयउ बिस्व उपकारू। सुगम अगम अति धरम बिचारू।।

    अर्थ (Hindi)

    बिधि बस भयउ बिस्व उपकारू। सुगम अगम अति धरम बिचारू।।

  3070. RCM 2.310.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भरतकूप अब कहिहहिं लोगा। अति पावन तीरथ जल जोगा।।

    अर्थ (Hindi)

    भरतकूप अब कहिहहिं लोगा। अति पावन तीरथ जल जोगा।।

  3071. RCM 2.310.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    प्रेम सनेम निमज्जत प्रानी। होइहहिं बिमल करम मन बानी।।

    अर्थ (Hindi)

    प्रेम सनेम निमज्जत प्रानी। होइहहिं बिमल करम मन बानी।।

  3072. RCM 2.310.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कहत कूप महिमा सकल गए जहाँ रघुराउ।

    अर्थ (Hindi)

    कहत कूप महिमा सकल गए जहाँ रघुराउ।

  3073. RCM 2.310.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अत्रि सुनायउ रघुबरहि तीरथ पुन्य प्रभाउ।।310।।

    अर्थ (Hindi)

    अत्रि सुनायउ रघुबरहि तीरथ पुन्य प्रभाउ।।310।।

  3074. RCM 2.311.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कहत धरम इतिहास सप्रीती। भयउ भोरु निसि सो सुख बीती।।

    अर्थ (Hindi)

    कहत धरम इतिहास सप्रीती। भयउ भोरु निसि सो सुख बीती।।

  3075. RCM 2.311.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नित्य निबाहि भरत दोउ भाई। राम अत्रि गुर आयसु पाई।।

    अर्थ (Hindi)

    नित्य निबाहि भरत दोउ भाई। राम अत्रि गुर आयसु पाई।।

  3076. RCM 2.311.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सहित समाज साज सब सादें। चले राम बन अटन पयादें।।

    अर्थ (Hindi)

    सहित समाज साज सब सादें। चले राम बन अटन पयादें।।

  3077. RCM 2.311.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कोमल चरन चलत बिनु पनहीं। भइ मृदु भूमि सकुचि मन मनहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    कोमल चरन चलत बिनु पनहीं। भइ मृदु भूमि सकुचि मन मनहीं।।

  3078. RCM 2.311.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कुस कंटक काँकरीं कुराईं। कटुक कठोर कुबस्तु दुराईं।।

    अर्थ (Hindi)

    कुस कंटक काँकरीं कुराईं। कटुक कठोर कुबस्तु दुराईं।।

  3079. RCM 2.311.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    महि मंजुल मृदु मारग कीन्हे। बहत समीर त्रिबिध सुख लीन्हे।।

    अर्थ (Hindi)

    महि मंजुल मृदु मारग कीन्हे। बहत समीर त्रिबिध सुख लीन्हे।।

  3080. RCM 2.311.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुमन बरषि सुर घन करि छाहीं। बिटप फूलि फलि तृन मृदुताहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    सुमन बरषि सुर घन करि छाहीं। बिटप फूलि फलि तृन मृदुताहीं।।

  3081. RCM 2.311.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मृग बिलोकि खग बोलि सुबानी। सेवहिं सकल राम प्रिय जानी।।

    अर्थ (Hindi)

    मृग बिलोकि खग बोलि सुबानी। सेवहिं सकल राम प्रिय जानी।।

  3082. RCM 2.311.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुलभ सिद्धि सब प्राकृतहु राम कहत जमुहात।

    अर्थ (Hindi)

    सुलभ सिद्धि सब प्राकृतहु राम कहत जमुहात।

  3083. RCM 2.311.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राम प्रान प्रिय भरत कहुँ यह न होइ बड़ि बात।।311।।

    अर्थ (Hindi)

    राम प्रान प्रिय भरत कहुँ यह न होइ बड़ि बात।।311।।

  3084. RCM 2.312.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    एहि बिधि भरतु फिरत बन माहीं। नेमु प्रेमु लखि मुनि सकुचाहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    एहि बिधि भरतु फिरत बन माहीं। नेमु प्रेमु लखि मुनि सकुचाहीं।।

  3085. RCM 2.312.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पुन्य जलाश्रय भूमि बिभागा। खग मृग तरु तृन गिरि बन बागा।।

    अर्थ (Hindi)

    पुन्य जलाश्रय भूमि बिभागा। खग मृग तरु तृन गिरि बन बागा।।

  3086. RCM 2.312.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    चारु बिचित्र पबित्र बिसेषी। बूझत भरतु दिब्य सब देखी।।

    अर्थ (Hindi)

    चारु बिचित्र पबित्र बिसेषी। बूझत भरतु दिब्य सब देखी।।

  3087. RCM 2.312.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनि मन मुदित कहत रिषिराऊ। हेतु नाम गुन पुन्य प्रभाऊ।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनि मन मुदित कहत रिषिराऊ। हेतु नाम गुन पुन्य प्रभाऊ।।

  3088. RCM 2.312.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कतहुँ निमज्जन कतहुँ प्रनामा। कतहुँ बिलोकत मन अभिरामा।।

    अर्थ (Hindi)

    कतहुँ निमज्जन कतहुँ प्रनामा। कतहुँ बिलोकत मन अभिरामा।।

  3089. RCM 2.312.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कतहुँ बैठि मुनि आयसु पाई। सुमिरत सीय सहित दोउ भाई।।

    अर्थ (Hindi)

    कतहुँ बैठि मुनि आयसु पाई। सुमिरत सीय सहित दोउ भाई।।

  3090. RCM 2.312.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    देखि सुभाउ सनेहु सुसेवा। देहिं असीस मुदित बनदेवा।।

    अर्थ (Hindi)

    देखि सुभाउ सनेहु सुसेवा। देहिं असीस मुदित बनदेवा।।

  3091. RCM 2.312.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    फिरहिं गएँ दिनु पहर अढ़ाई। प्रभु पद कमल बिलोकहिं आई।।

    अर्थ (Hindi)

    फिरहिं गएँ दिनु पहर अढ़ाई। प्रभु पद कमल बिलोकहिं आई।।

  3092. RCM 2.312.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    देखे थल तीरथ सकल भरत पाँच दिन माझ।

    अर्थ (Hindi)

    देखे थल तीरथ सकल भरत पाँच दिन माझ।

  3093. RCM 2.312.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कहत सुनत हरि हर सुजसु गयउ दिवसु भइ साँझ।।312।।

    अर्थ (Hindi)

    कहत सुनत हरि हर सुजसु गयउ दिवसु भइ साँझ।।312।।

  3094. RCM 2.313.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भोर न्हाइ सबु जुरा समाजू। भरत भूमिसुर तेरहुति राजू।।

    अर्थ (Hindi)

    भोर न्हाइ सबु जुरा समाजू। भरत भूमिसुर तेरहुति राजू।।

  3095. RCM 2.313.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भल दिन आजु जानि मन माहीं। रामु कृपाल कहत सकुचाहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    भल दिन आजु जानि मन माहीं। रामु कृपाल कहत सकुचाहीं।।

  3096. RCM 2.313.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    गुर नृप भरत सभा अवलोकी। सकुचि राम फिरि अवनि बिलोकी।।

    अर्थ (Hindi)

    गुर नृप भरत सभा अवलोकी। सकुचि राम फिरि अवनि बिलोकी।।

  3097. RCM 2.313.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सील सराहि सभा सब सोची। कहुँ न राम सम स्वामि सँकोची।।

    अर्थ (Hindi)

    सील सराहि सभा सब सोची। कहुँ न राम सम स्वामि सँकोची।।

  3098. RCM 2.313.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भरत सुजान राम रुख देखी। उठि सप्रेम धरि धीर बिसेषी।।

    अर्थ (Hindi)

    भरत सुजान राम रुख देखी। उठि सप्रेम धरि धीर बिसेषी।।

  3099. RCM 2.313.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    करि दंडवत कहत कर जोरी। राखीं नाथ सकल रुचि मोरी।।

    अर्थ (Hindi)

    करि दंडवत कहत कर जोरी। राखीं नाथ सकल रुचि मोरी।।

  3100. RCM 2.313.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मोहि लगि सहेउ सबहिं संतापू। बहुत भाँति दुखु पावा आपू।।

    अर्थ (Hindi)

    मोहि लगि सहेउ सबहिं संतापू। बहुत भाँति दुखु पावा आपू।।

  3101. RCM 2.313.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अब गोसाइँ मोहि देउ रजाई। सेवौं अवध अवधि भरि जाई।।

    अर्थ (Hindi)

    अब गोसाइँ मोहि देउ रजाई। सेवौं अवध अवधि भरि जाई।।

  3102. RCM 2.313.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जेहिं उपाय पुनि पाय जनु देखै दीनदयाल।

    अर्थ (Hindi)

    जेहिं उपाय पुनि पाय जनु देखै दीनदयाल।

  3103. RCM 2.313.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सो सिख देइअ अवधि लगि कोसलपाल कृपाल।।313।।

    अर्थ (Hindi)

    सो सिख देइअ अवधि लगि कोसलपाल कृपाल।।313।।

  3104. RCM 2.314.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पुरजन परिजन प्रजा गोसाई। सब सुचि सरस सनेहँ सगाई।।

    अर्थ (Hindi)

    पुरजन परिजन प्रजा गोसाई। सब सुचि सरस सनेहँ सगाई।।

  3105. RCM 2.314.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राउर बदि भल भव दुख दाहू। प्रभु बिनु बादि परम पद लाहू।।

    अर्थ (Hindi)

    राउर बदि भल भव दुख दाहू। प्रभु बिनु बादि परम पद लाहू।।

  3106. RCM 2.314.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    स्वामि सुजानु जानि सब ही की। रुचि लालसा रहनि जन जी की।।

    अर्थ (Hindi)

    स्वामि सुजानु जानि सब ही की। रुचि लालसा रहनि जन जी की।।

  3107. RCM 2.314.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    प्रनतपालु पालिहि सब काहू। देउ दुहू दिसि ओर निबाहू।।

    अर्थ (Hindi)

    प्रनतपालु पालिहि सब काहू। देउ दुहू दिसि ओर निबाहू।।

  3108. RCM 2.314.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अस मोहि सब बिधि भूरि भरोसो। किएँ बिचारु न सोचु खरो सो।।

    अर्थ (Hindi)

    अस मोहि सब बिधि भूरि भरोसो। किएँ बिचारु न सोचु खरो सो।।

  3109. RCM 2.314.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    आरति मोर नाथ कर छोहू। दुहुँ मिलि कीन्ह ढीठु हठि मोहू।।

    अर्थ (Hindi)

    आरति मोर नाथ कर छोहू। दुहुँ मिलि कीन्ह ढीठु हठि मोहू।।

  3110. RCM 2.314.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    यह बड़ दोषु दूरि करि स्वामी। तजि सकोच सिखइअ अनुगामी।।

    अर्थ (Hindi)

    यह बड़ दोषु दूरि करि स्वामी। तजि सकोच सिखइअ अनुगामी।।

  3111. RCM 2.314.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भरत बिनय सुनि सबहिं प्रसंसी। खीर नीर बिबरन गति हंसी।।

    अर्थ (Hindi)

    भरत बिनय सुनि सबहिं प्रसंसी। खीर नीर बिबरन गति हंसी।।

  3112. RCM 2.314.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    दीनबंधु सुनि बंधु के बचन दीन छलहीन।

    अर्थ (Hindi)

    दीनबंधु सुनि बंधु के बचन दीन छलहीन।

  3113. RCM 2.314.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    देस काल अवसर सरिस बोले रामु प्रबीन।।314।।

    अर्थ (Hindi)

    देस काल अवसर सरिस बोले रामु प्रबीन।।314।।

  3114. RCM 2.315.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तात तुम्हारि मोरि परिजन की। चिंता गुरहि नृपहि घर बन की।।

    अर्थ (Hindi)

    तात तुम्हारि मोरि परिजन की। चिंता गुरहि नृपहि घर बन की।।

  3115. RCM 2.315.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    माथे पर गुर मुनि मिथिलेसू। हमहि तुम्हहि सपनेहुँ न कलेसू।।

    अर्थ (Hindi)

    माथे पर गुर मुनि मिथिलेसू। हमहि तुम्हहि सपनेहुँ न कलेसू।।

  3116. RCM 2.315.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मोर तुम्हार परम पुरुषारथु। स्वारथु सुजसु धरमु परमारथु।।

    अर्थ (Hindi)

    मोर तुम्हार परम पुरुषारथु। स्वारथु सुजसु धरमु परमारथु।।

  3117. RCM 2.315.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पितु आयसु पालिहिं दुहु भाई। लोक बेद भल भूप भलाई।।

    अर्थ (Hindi)

    पितु आयसु पालिहिं दुहु भाई। लोक बेद भल भूप भलाई।।

  3118. RCM 2.315.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    गुर पितु मातु स्वामि सिख पालें। चलेहुँ कुमग पग परहिं न खालें।।

    अर्थ (Hindi)

    गुर पितु मातु स्वामि सिख पालें। चलेहुँ कुमग पग परहिं न खालें।।

  3119. RCM 2.315.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अस बिचारि सब सोच बिहाई। पालहु अवध अवधि भरि जाई।।

    अर्थ (Hindi)

    अस बिचारि सब सोच बिहाई। पालहु अवध अवधि भरि जाई।।

  3120. RCM 2.315.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    देसु कोसु परिजन परिवारू। गुर पद रजहिं लाग छरुभारू।।

    अर्थ (Hindi)

    देसु कोसु परिजन परिवारू। गुर पद रजहिं लाग छरुभारू।।

  3121. RCM 2.315.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तुम्ह मुनि मातु सचिव सिख मानी। पालेहु पुहुमि प्रजा रजधानी।।

    अर्थ (Hindi)

    तुम्ह मुनि मातु सचिव सिख मानी। पालेहु पुहुमि प्रजा रजधानी।।

  3122. RCM 2.315.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मुखिआ मुखु सो चाहिऐ खान पान कहुँ एक।

    अर्थ (Hindi)

    मुखिआ मुखु सो चाहिऐ खान पान कहुँ एक।

  3123. RCM 2.315.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पालइ पोषइ सकल अँग तुलसी सहित बिबेक।।315।।

    अर्थ (Hindi)

    पालइ पोषइ सकल अँग तुलसी सहित बिबेक।।315।।

  3124. RCM 2.316.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राजधरम सरबसु एतनोई। जिमि मन माहँ मनोरथ गोई।।

    अर्थ (Hindi)

    राजधरम सरबसु एतनोई। जिमि मन माहँ मनोरथ गोई।।

  3125. RCM 2.316.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बंधु प्रबोधु कीन्ह बहु भाँती। बिनु अधार मन तोषु न साँती।।

    अर्थ (Hindi)

    बंधु प्रबोधु कीन्ह बहु भाँती। बिनु अधार मन तोषु न साँती।।

  3126. RCM 2.316.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भरत सील गुर सचिव समाजू। सकुच सनेह बिबस रघुराजू।।

    अर्थ (Hindi)

    भरत सील गुर सचिव समाजू। सकुच सनेह बिबस रघुराजू।।

  3127. RCM 2.316.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    प्रभु करि कृपा पाँवरीं दीन्हीं। सादर भरत सीस धरि लीन्हीं।।

    अर्थ (Hindi)

    प्रभु करि कृपा पाँवरीं दीन्हीं। सादर भरत सीस धरि लीन्हीं।।

  3128. RCM 2.316.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    चरनपीठ करुनानिधान के। जनु जुग जामिक प्रजा प्रान के।।

    अर्थ (Hindi)

    चरनपीठ करुनानिधान के। जनु जुग जामिक प्रजा प्रान के।।

  3129. RCM 2.316.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    संपुट भरत सनेह रतन के। आखर जुग जुन जीव जतन के।।

    अर्थ (Hindi)

    संपुट भरत सनेह रतन के। आखर जुग जुन जीव जतन के।।

  3130. RCM 2.316.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कुल कपाट कर कुसल करम के। बिमल नयन सेवा सुधरम के।।

    अर्थ (Hindi)

    कुल कपाट कर कुसल करम के। बिमल नयन सेवा सुधरम के।।

  3131. RCM 2.316.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भरत मुदित अवलंब लहे तें। अस सुख जस सिय रामु रहे तें।।

    अर्थ (Hindi)

    भरत मुदित अवलंब लहे तें। अस सुख जस सिय रामु रहे तें।।

  3132. RCM 2.316.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मागेउ बिदा प्रनामु करि राम लिए उर लाइ।

    अर्थ (Hindi)

    मागेउ बिदा प्रनामु करि राम लिए उर लाइ।

  3133. RCM 2.316.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    लोग उचाटे अमरपति कुटिल कुअवसरु पाइ।।316।।

    अर्थ (Hindi)

    लोग उचाटे अमरपति कुटिल कुअवसरु पाइ।।316।।

  3134. RCM 2.317.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सो कुचालि सब कहँ भइ नीकी। अवधि आस सम जीवनि जी की।।

    अर्थ (Hindi)

    सो कुचालि सब कहँ भइ नीकी। अवधि आस सम जीवनि जी की।।

  3135. RCM 2.317.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नतरु लखन सिय सम बियोगा। हहरि मरत सब लोग कुरोगा।।

    अर्थ (Hindi)

    नतरु लखन सिय सम बियोगा। हहरि मरत सब लोग कुरोगा।।

  3136. RCM 2.317.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    रामकृपाँ अवरेब सुधारी। बिबुध धारि भइ गुनद गोहारी।।

    अर्थ (Hindi)

    रामकृपाँ अवरेब सुधारी। बिबुध धारि भइ गुनद गोहारी।।

  3137. RCM 2.317.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भेंटत भुज भरि भाइ भरत सो। राम प्रेम रसु कहि न परत सो।।

    अर्थ (Hindi)

    भेंटत भुज भरि भाइ भरत सो। राम प्रेम रसु कहि न परत सो।।

  3138. RCM 2.317.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तन मन बचन उमग अनुरागा। धीर धुरंधर धीरजु त्यागा।।

    अर्थ (Hindi)

    तन मन बचन उमग अनुरागा। धीर धुरंधर धीरजु त्यागा।।

  3139. RCM 2.317.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बारिज लोचन मोचत बारी। देखि दसा सुर सभा दुखारी।।

    अर्थ (Hindi)

    बारिज लोचन मोचत बारी। देखि दसा सुर सभा दुखारी।।

  3140. RCM 2.317.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मुनिगन गुर धुर धीर जनक से। ग्यान अनल मन कसें कनक से।।

    अर्थ (Hindi)

    मुनिगन गुर धुर धीर जनक से। ग्यान अनल मन कसें कनक से।।

  3141. RCM 2.317.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जे बिरंचि निरलेप उपाए। पदुम पत्र जिमि जग जल जाए।।

    अर्थ (Hindi)

    जे बिरंचि निरलेप उपाए। पदुम पत्र जिमि जग जल जाए।।

  3142. RCM 2.317.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तेउ बिलोकि रघुबर भरत प्रीति अनूप अपार।

    अर्थ (Hindi)

    तेउ बिलोकि रघुबर भरत प्रीति अनूप अपार।

  3143. RCM 2.317.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भए मगन मन तन बचन सहित बिराग बिचार।।317।।

    अर्थ (Hindi)

    भए मगन मन तन बचन सहित बिराग बिचार।।317।।

  3144. RCM 2.318.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जहाँ जनक गुर मति भोरी। प्राकृत प्रीति कहत बड़ि खोरी।।

    अर्थ (Hindi)

    जहाँ जनक गुर मति भोरी। प्राकृत प्रीति कहत बड़ि खोरी।।

  3145. RCM 2.318.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बरनत रघुबर भरत बियोगू। सुनि कठोर कबि जानिहि लोगू।।

    अर्थ (Hindi)

    बरनत रघुबर भरत बियोगू। सुनि कठोर कबि जानिहि लोगू।।

  3146. RCM 2.318.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सो सकोच रसु अकथ सुबानी। समउ सनेहु सुमिरि सकुचानी।।

    अर्थ (Hindi)

    सो सकोच रसु अकथ सुबानी। समउ सनेहु सुमिरि सकुचानी।।

  3147. RCM 2.318.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भेंटि भरत रघुबर समुझाए। पुनि रिपुदवनु हरषि हियँ लाए।।

    अर्थ (Hindi)

    भेंटि भरत रघुबर समुझाए। पुनि रिपुदवनु हरषि हियँ लाए।।

  3148. RCM 2.318.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सेवक सचिव भरत रुख पाई। निज निज काज लगे सब जाई।।

    अर्थ (Hindi)

    सेवक सचिव भरत रुख पाई। निज निज काज लगे सब जाई।।

  3149. RCM 2.318.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनि दारुन दुखु दुहूँ समाजा। लगे चलन के साजन साजा।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनि दारुन दुखु दुहूँ समाजा। लगे चलन के साजन साजा।।

  3150. RCM 2.318.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    प्रभु पद पदुम बंदि दोउ भाई। चले सीस धरि राम रजाई।।

    अर्थ (Hindi)

    प्रभु पद पदुम बंदि दोउ भाई। चले सीस धरि राम रजाई।।

  3151. RCM 2.318.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मुनि तापस बनदेव निहोरी। सब सनमानि बहोरि बहोरी।।

    अर्थ (Hindi)

    मुनि तापस बनदेव निहोरी। सब सनमानि बहोरि बहोरी।।

  3152. RCM 2.318.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    लखनहि भेंटि प्रनामु करि सिर धरि सिय पद धूरि।

    अर्थ (Hindi)

    लखनहि भेंटि प्रनामु करि सिर धरि सिय पद धूरि।

  3153. RCM 2.318.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    चले सप्रेम असीस सुनि सकल सुमंगल मूरि।।318।।

    अर्थ (Hindi)

    चले सप्रेम असीस सुनि सकल सुमंगल मूरि।।318।।

  3154. RCM 2.319.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सानुज राम नृपहि सिर नाई। कीन्हि बहुत बिधि बिनय बड़ाई।।

    अर्थ (Hindi)

    सानुज राम नृपहि सिर नाई। कीन्हि बहुत बिधि बिनय बड़ाई।।

  3155. RCM 2.319.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    देव दया बस बड़ दुखु पायउ। सहित समाज काननहिं आयउ।।

    अर्थ (Hindi)

    देव दया बस बड़ दुखु पायउ। सहित समाज काननहिं आयउ।।

  3156. RCM 2.319.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पुर पगु धारिअ देइ असीसा। कीन्ह धीर धरि गवनु महीसा।।

    अर्थ (Hindi)

    पुर पगु धारिअ देइ असीसा। कीन्ह धीर धरि गवनु महीसा।।

  3157. RCM 2.319.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मुनि महिदेव साधु सनमाने। बिदा किए हरि हर सम जाने।।

    अर्थ (Hindi)

    मुनि महिदेव साधु सनमाने। बिदा किए हरि हर सम जाने।।

  3158. RCM 2.319.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सासु समीप गए दोउ भाई। फिरे बंदि पग आसिष पाई।।

    अर्थ (Hindi)

    सासु समीप गए दोउ भाई। फिरे बंदि पग आसिष पाई।।

  3159. RCM 2.319.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कौसिक बामदेव जाबाली। पुरजन परिजन सचिव सुचाली।।

    अर्थ (Hindi)

    कौसिक बामदेव जाबाली। पुरजन परिजन सचिव सुचाली।।

  3160. RCM 2.319.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जथा जोगु करि बिनय प्रनामा। बिदा किए सब सानुज रामा।।

    अर्थ (Hindi)

    जथा जोगु करि बिनय प्रनामा। बिदा किए सब सानुज रामा।।

  3161. RCM 2.319.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नारि पुरुष लघु मध्य बड़ेरे। सब सनमानि कृपानिधि फेरे।।

    अर्थ (Hindi)

    नारि पुरुष लघु मध्य बड़ेरे। सब सनमानि कृपानिधि फेरे।।

  3162. RCM 2.319.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भरत मातु पद बंदि प्रभु सुचि सनेहँ मिलि भेंटि।

    अर्थ (Hindi)

    भरत मातु पद बंदि प्रभु सुचि सनेहँ मिलि भेंटि।

  3163. RCM 2.319.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बिदा कीन्ह सजि पालकी सकुच सोच सब मेटि।।319।।

    अर्थ (Hindi)

    बिदा कीन्ह सजि पालकी सकुच सोच सब मेटि।।319।।

  3164. RCM 2.320.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    परिजन मातु पितहि मिलि सीता। फिरी प्रानप्रिय प्रेम पुनीता।।

    अर्थ (Hindi)

    परिजन मातु पितहि मिलि सीता। फिरी प्रानप्रिय प्रेम पुनीता।।

  3165. RCM 2.320.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    करि प्रनामु भेंटी सब सासू। प्रीति कहत कबि हियँ न हुलासू।।

    अर्थ (Hindi)

    करि प्रनामु भेंटी सब सासू। प्रीति कहत कबि हियँ न हुलासू।।

  3166. RCM 2.320.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनि सिख अभिमत आसिष पाई। रही सीय दुहु प्रीति समाई।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनि सिख अभिमत आसिष पाई। रही सीय दुहु प्रीति समाई।।

  3167. RCM 2.320.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    रघुपति पटु पालकीं मगाईं। करि प्रबोधु सब मातु चढ़ाई।।

    अर्थ (Hindi)

    रघुपति पटु पालकीं मगाईं। करि प्रबोधु सब मातु चढ़ाई।।

  3168. RCM 2.320.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बार बार हिलि मिलि दुहु भाई। सम सनेहँ जननी पहुँचाई।।

    अर्थ (Hindi)

    बार बार हिलि मिलि दुहु भाई। सम सनेहँ जननी पहुँचाई।।

  3169. RCM 2.320.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    साजि बाजि गज बाहन नाना। भरत भूप दल कीन्ह पयाना।।

    अर्थ (Hindi)

    साजि बाजि गज बाहन नाना। भरत भूप दल कीन्ह पयाना।।

  3170. RCM 2.320.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    हृदयँ रामु सिय लखन समेता। चले जाहिं सब लोग अचेता।।

    अर्थ (Hindi)

    हृदयँ रामु सिय लखन समेता। चले जाहिं सब लोग अचेता।।

  3171. RCM 2.320.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बसह बाजि गज पसु हियँ हारें। चले जाहिं परबस मन मारें।।

    अर्थ (Hindi)

    बसह बाजि गज पसु हियँ हारें। चले जाहिं परबस मन मारें।।

  3172. RCM 2.320.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    गुर गुरतिय पद बंदि प्रभु सीता लखन समेत।

    अर्थ (Hindi)

    गुर गुरतिय पद बंदि प्रभु सीता लखन समेत।

  3173. RCM 2.320.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    फिरे हरष बिसमय सहित आए परन निकेत।।320।।

    अर्थ (Hindi)

    फिरे हरष बिसमय सहित आए परन निकेत।।320।।

  3174. RCM 2.321.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बिदा कीन्ह सनमानि निषादू। चलेउ हृदयँ बड़ बिरह बिषादू।।

    अर्थ (Hindi)

    बिदा कीन्ह सनमानि निषादू। चलेउ हृदयँ बड़ बिरह बिषादू।।

  3175. RCM 2.321.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    कोल किरात भिल्ल बनचारी। फेरे फिरे जोहारि जोहारी।।

    अर्थ (Hindi)

    कोल किरात भिल्ल बनचारी। फेरे फिरे जोहारि जोहारी।।

  3176. RCM 2.321.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    प्रभु सिय लखन बैठि बट छाहीं। प्रिय परिजन बियोग बिलखाहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    प्रभु सिय लखन बैठि बट छाहीं। प्रिय परिजन बियोग बिलखाहीं।।

  3177. RCM 2.321.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भरत सनेह सुभाउ सुबानी। प्रिया अनुज सन कहत बखानी।।

    अर्थ (Hindi)

    भरत सनेह सुभाउ सुबानी। प्रिया अनुज सन कहत बखानी।।

  3178. RCM 2.321.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    प्रीति प्रतीति बचन मन करनी। श्रीमुख राम प्रेम बस बरनी।।

    अर्थ (Hindi)

    प्रीति प्रतीति बचन मन करनी। श्रीमुख राम प्रेम बस बरनी।।

  3179. RCM 2.321.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तेहि अवसर खग मृग जल मीना। चित्रकूट चर अचर मलीना।।

    अर्थ (Hindi)

    तेहि अवसर खग मृग जल मीना। चित्रकूट चर अचर मलीना।।

  3180. RCM 2.321.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बिबुध बिलोकि दसा रघुबर की। बरषि सुमन कहि गति घर घर की।।

    अर्थ (Hindi)

    बिबुध बिलोकि दसा रघुबर की। बरषि सुमन कहि गति घर घर की।।

  3181. RCM 2.321.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    प्रभु प्रनामु करि दीन्ह भरोसो। चले मुदित मन डर न खरो सो।।

    अर्थ (Hindi)

    प्रभु प्रनामु करि दीन्ह भरोसो। चले मुदित मन डर न खरो सो।।

  3182. RCM 2.321.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सानुज सीय समेत प्रभु राजत परन कुटीर।

    अर्थ (Hindi)

    सानुज सीय समेत प्रभु राजत परन कुटीर।

  3183. RCM 2.321.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भगति ग्यानु बैराग्य जनु सोहत धरें सरीर।।321।।

    अर्थ (Hindi)

    भगति ग्यानु बैराग्य जनु सोहत धरें सरीर।।321।।

  3184. RCM 2.322.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मुनि महिसुर गुर भरत भुआलू। राम बिरहँ सबु साजु बिहालू।।

    अर्थ (Hindi)

    मुनि महिसुर गुर भरत भुआलू। राम बिरहँ सबु साजु बिहालू।।

  3185. RCM 2.322.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    प्रभु गुन ग्राम गनत मन माहीं। सब चुपचाप चले मग जाहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    प्रभु गुन ग्राम गनत मन माहीं। सब चुपचाप चले मग जाहीं।।

  3186. RCM 2.322.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जमुना उतरि पार सबु भयऊ। सो बासरु बिनु भोजन गयऊ।।

    अर्थ (Hindi)

    जमुना उतरि पार सबु भयऊ। सो बासरु बिनु भोजन गयऊ।।

  3187. RCM 2.322.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    उतरि देवसरि दूसर बासू। रामसखाँ सब कीन्ह सुपासू।।

    अर्थ (Hindi)

    उतरि देवसरि दूसर बासू। रामसखाँ सब कीन्ह सुपासू।।

  3188. RCM 2.322.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सई उतरि गोमतीं नहाए। चौथें दिवस अवधपुर आए।

    अर्थ (Hindi)

    सई उतरि गोमतीं नहाए। चौथें दिवस अवधपुर आए।

  3189. RCM 2.322.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जनकु रहे पुर बासर चारी। राज काज सब साज सँभारी।।

    अर्थ (Hindi)

    जनकु रहे पुर बासर चारी। राज काज सब साज सँभारी।।

  3190. RCM 2.322.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सौंपि सचिव गुर भरतहि राजू। तेरहुति चले साजि सबु साजू।।

    अर्थ (Hindi)

    सौंपि सचिव गुर भरतहि राजू। तेरहुति चले साजि सबु साजू।।

  3191. RCM 2.322.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नगर नारि नर गुर सिख मानी। बसे सुखेन राम रजधानी।।

    अर्थ (Hindi)

    नगर नारि नर गुर सिख मानी। बसे सुखेन राम रजधानी।।

  3192. RCM 2.322.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राम दरस लगि लोग सब करत नेम उपबास।

    अर्थ (Hindi)

    राम दरस लगि लोग सब करत नेम उपबास।

  3193. RCM 2.322.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तजि तजि भूषन भोग सुख जिअत अवधि कीं आस।।322।।

    अर्थ (Hindi)

    तजि तजि भूषन भोग सुख जिअत अवधि कीं आस।।322।।

  3194. RCM 2.323.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सचिव सुसेवक भरत प्रबोधे। निज निज काज पाइ पाइ सिख ओधे।।

    अर्थ (Hindi)

    सचिव सुसेवक भरत प्रबोधे। निज निज काज पाइ पाइ सिख ओधे।।

  3195. RCM 2.323.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पुनि सिख दीन्ह बोलि लघु भाई। सौंपी सकल मातु सेवकाई।।

    अर्थ (Hindi)

    पुनि सिख दीन्ह बोलि लघु भाई। सौंपी सकल मातु सेवकाई।।

  3196. RCM 2.323.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भूसुर बोलि भरत कर जोरे। करि प्रनाम बय बिनय निहोरे।।

    अर्थ (Hindi)

    भूसुर बोलि भरत कर जोरे। करि प्रनाम बय बिनय निहोरे।।

  3197. RCM 2.323.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    ऊँच नीच कारजु भल पोचू। आयसु देब न करब सँकोचू।।

    अर्थ (Hindi)

    ऊँच नीच कारजु भल पोचू। आयसु देब न करब सँकोचू।।

  3198. RCM 2.323.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    परिजन पुरजन प्रजा बोलाए। समाधानु करि सुबस बसाए।।

    अर्थ (Hindi)

    परिजन पुरजन प्रजा बोलाए। समाधानु करि सुबस बसाए।।

  3199. RCM 2.323.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सानुज गे गुर गेहँ बहोरी। करि दंडवत कहत कर जोरी।।

    अर्थ (Hindi)

    सानुज गे गुर गेहँ बहोरी। करि दंडवत कहत कर जोरी।।

  3200. RCM 2.323.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    आयसु होइ त रहौं सनेमा। बोले मुनि तन पुलकि सपेमा।।

    अर्थ (Hindi)

    आयसु होइ त रहौं सनेमा। बोले मुनि तन पुलकि सपेमा।।

  3201. RCM 2.323.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    समुझव कहब करब तुम्ह जोई। धरम सारु जग होइहि सोई।।

    अर्थ (Hindi)

    समुझव कहब करब तुम्ह जोई। धरम सारु जग होइहि सोई।।

  3202. RCM 2.323.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनि सिख पाइ असीस बड़ि गनक बोलि दिनु साधि।

    अर्थ (Hindi)

    सुनि सिख पाइ असीस बड़ि गनक बोलि दिनु साधि।

  3203. RCM 2.323.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सिंघासन प्रभु पादुका बैठारे निरुपाधि।।323।।

    अर्थ (Hindi)

    सिंघासन प्रभु पादुका बैठारे निरुपाधि।।323।।

  3204. RCM 2.324.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राम मातु गुर पद सिरु नाई। प्रभु पद पीठ रजायसु पाई।।

    अर्थ (Hindi)

    राम मातु गुर पद सिरु नाई। प्रभु पद पीठ रजायसु पाई।।

  3205. RCM 2.324.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नंदिगावँ करि परन कुटीरा। कीन्ह निवासु धरम धुर धीरा।।

    अर्थ (Hindi)

    नंदिगावँ करि परन कुटीरा। कीन्ह निवासु धरम धुर धीरा।।

  3206. RCM 2.324.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जटाजूट सिर मुनिपट धारी। महि खनि कुस साँथरी सँवारी।।

    अर्थ (Hindi)

    जटाजूट सिर मुनिपट धारी। महि खनि कुस साँथरी सँवारी।।

  3207. RCM 2.324.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    असन बसन बासन ब्रत नेमा। करत कठिन रिषिधरम सप्रेमा।।

    अर्थ (Hindi)

    असन बसन बासन ब्रत नेमा। करत कठिन रिषिधरम सप्रेमा।।

  3208. RCM 2.324.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भूषन बसन भोग सुख भूरी। मन तन बचन तजे तिन तूरी।।

    अर्थ (Hindi)

    भूषन बसन भोग सुख भूरी। मन तन बचन तजे तिन तूरी।।

  3209. RCM 2.324.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    अवध राजु सुर राजु सिहाई। दसरथ धनु सुनि धनदु लजाई।।

    अर्थ (Hindi)

    अवध राजु सुर राजु सिहाई। दसरथ धनु सुनि धनदु लजाई।।

  3210. RCM 2.324.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    तेहिं पुर बसत भरत बिनु रागा। चंचरीक जिमि चंपक बागा।।

    अर्थ (Hindi)

    तेहिं पुर बसत भरत बिनु रागा। चंचरीक जिमि चंपक बागा।।

  3211. RCM 2.324.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    रमा बिलासु राम अनुरागी। तजत बमन जिमि जन बड़भागी।।

    अर्थ (Hindi)

    रमा बिलासु राम अनुरागी। तजत बमन जिमि जन बड़भागी।।

  3212. RCM 2.324.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राम पेम भाजन भरतु बड़े न एहिं करतूति।

    अर्थ (Hindi)

    राम पेम भाजन भरतु बड़े न एहिं करतूति।

  3213. RCM 2.324.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    चातक हंस सराहिअत टेंक बिबेक बिभूति।।324।।

    अर्थ (Hindi)

    चातक हंस सराहिअत टेंक बिबेक बिभूति।।324।।

  3214. RCM 2.325.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    देह दिनहुँ दिन दूबरि होई। घटइ तेजु बलु मुखछबि सोई।।

    अर्थ (Hindi)

    देह दिनहुँ दिन दूबरि होई। घटइ तेजु बलु मुखछबि सोई।।

  3215. RCM 2.325.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नित नव राम प्रेम पनु पीना। बढ़त धरम दलु मनु न मलीना।।

    अर्थ (Hindi)

    नित नव राम प्रेम पनु पीना। बढ़त धरम दलु मनु न मलीना।।

  3216. RCM 2.325.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जिमि जलु निघटत सरद प्रकासे। बिलसत बेतस बनज बिकासे।।

    अर्थ (Hindi)

    जिमि जलु निघटत सरद प्रकासे। बिलसत बेतस बनज बिकासे।।

  3217. RCM 2.325.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सम दम संजम नियम उपासा। नखत भरत हिय बिमल अकासा।।

    अर्थ (Hindi)

    सम दम संजम नियम उपासा। नखत भरत हिय बिमल अकासा।।

  3218. RCM 2.325.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    ध्रुव बिस्वास अवधि राका सी। स्वामि सुरति सुरबीथि बिकासी।।

    अर्थ (Hindi)

    ध्रुव बिस्वास अवधि राका सी। स्वामि सुरति सुरबीथि बिकासी।।

  3219. RCM 2.325.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    राम पेम बिधु अचल अदोषा। सहित समाज सोह नित चोखा।।

    अर्थ (Hindi)

    राम पेम बिधु अचल अदोषा। सहित समाज सोह नित चोखा।।

  3220. RCM 2.325.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    भरत रहनि समुझनि करतूती। भगति बिरति गुन बिमल बिभूती।।

    अर्थ (Hindi)

    भरत रहनि समुझनि करतूती। भगति बिरति गुन बिमल बिभूती।।

  3221. RCM 2.325.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    बरनत सकल सुकचि सकुचाहीं। सेस गनेस गिरा गमु नाहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    बरनत सकल सुकचि सकुचाहीं। सेस गनेस गिरा गमु नाहीं।।

  3222. RCM 2.325.9
    📖 Open verse-by-verse reader#

    नित पूजत प्रभु पाँवरी प्रीति न हृदयँ समाति।।

    अर्थ (Hindi)

    नित पूजत प्रभु पाँवरी प्रीति न हृदयँ समाति।।

  3223. RCM 2.325.10
    📖 Open verse-by-verse reader#

    मागि मागि आयसु करत राज काज बहु भाँति।।325।।

    अर्थ (Hindi)

    मागि मागि आयसु करत राज काज बहु भाँति।।325।।

  3224. RCM 2.326.1
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पुलक गात हियँ सिय रघुबीरू। जीह नामु जप लोचन नीरू।।

    अर्थ (Hindi)

    पुलक गात हियँ सिय रघुबीरू। जीह नामु जप लोचन नीरू।।

  3225. RCM 2.326.2
    📖 Open verse-by-verse reader#

    लखन राम सिय कानन बसहीं। भरतु भवन बसि तप तनु कसहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    लखन राम सिय कानन बसहीं। भरतु भवन बसि तप तनु कसहीं।।

  3226. RCM 2.326.3
    📖 Open verse-by-verse reader#

    दोउ दिसि समुझि कहत सबु लोगू। सब बिधि भरत सराहन जोगू।।

    अर्थ (Hindi)

    दोउ दिसि समुझि कहत सबु लोगू। सब बिधि भरत सराहन जोगू।।

  3227. RCM 2.326.4
    📖 Open verse-by-verse reader#

    सुनि ब्रत नेम साधु सकुचाहीं। देखि दसा मुनिराज लजाहीं।।

    अर्थ (Hindi)

    सुनि ब्रत नेम साधु सकुचाहीं। देखि दसा मुनिराज लजाहीं।।

  3228. RCM 2.326.5
    📖 Open verse-by-verse reader#

    परम पुनीत भरत आचरनू। मधुर मंजु मुद मंगल करनू।।

    अर्थ (Hindi)

    परम पुनीत भरत आचरनू। मधुर मंजु मुद मंगल करनू।।

  3229. RCM 2.326.6
    📖 Open verse-by-verse reader#

    हरन कठिन कलि कलुष कलेसू। महामोह निसि दलन दिनेसू।।

    अर्थ (Hindi)

    हरन कठिन कलि कलुष कलेसू। महामोह निसि दलन दिनेसू।।

  3230. RCM 2.326.7
    📖 Open verse-by-verse reader#

    पाप पुंज कुंजर मृगराजू। समन सकल संताप समाजू।

    अर्थ (Hindi)

    पाप पुंज कुंजर मृगराजू। समन सकल संताप समाजू।

  3231. RCM 2.326.8
    📖 Open verse-by-verse reader#

    जन रंजन भंजन भव भारू। राम सनेह सुधाकर सारू।।

    अर्थ (Hindi)

    जन रंजन भंजन भव भारू। राम सनेह सुधाकर सारू।।