पुर नर भरत प्रीति मैं गाई। मति अनुरूप अनूप सुहाई।।
Ramcharitmanas
श्रीरामचरितमानस
मूल श्लोकः
पुर नर भरत प्रीति मैं गाई। मति अनुरूप अनूप सुहाई।।
RCM 3.1.1
श्रीरामचरितमानस
मूल श्लोकः
पुर नर भरत प्रीति मैं गाई। मति अनुरूप अनूप सुहाई।।
RCM 3.1.1
पुर नर भरत प्रीति मैं गाई। मति अनुरूप अनूप सुहाई।।