सत्रु मित्र सुख दुख जग माहीं। माया कृत परमारथ नाहीं।।
Ramcharitmanas
श्रीरामचरितमानस
मूल श्लोकः
सत्रु मित्र सुख दुख जग माहीं। माया कृत परमारथ नाहीं।।
RCM 4.7.18
श्रीरामचरितमानस
मूल श्लोकः
सत्रु मित्र सुख दुख जग माहीं। माया कृत परमारथ नाहीं।।
RCM 4.7.18
सत्रु मित्र सुख दुख जग माहीं। माया कृत परमारथ नाहीं।।