Ramcharitmanas · अध्याय 7
Uttara Kanda
उत्तरकाण्ड
Rama Rajya, the dialogue of Kakbhushundi and Garuda, Tulsidas's final reflections on bhakti.
- RCM 7.1.1Open verse →
रहेउ एक दिन अवधि अधारा। समुझत मन दुख भयउ अपारा।।
अर्थ · Hindi
रहेउ एक दिन अवधि अधारा। समुझत मन दुख भयउ अपारा।।
- RCM 7.1.2Open verse →
कारन कवन नाथ नहिं आयउ। जानि कुटिल किधौं मोहि बिसरायउ।।
अर्थ · Hindi
कारन कवन नाथ नहिं आयउ। जानि कुटिल किधौं मोहि बिसरायउ।।
- RCM 7.1.3Open verse →
अहह धन्य लछिमन बड़भागी। राम पदारबिंदु अनुरागी।।
अर्थ · Hindi
अहह धन्य लछिमन बड़भागी। राम पदारबिंदु अनुरागी।।
- RCM 7.1.4Open verse →
कपटी कुटिल मोहि प्रभु चीन्हा। ताते नाथ संग नहिं लीन्हा।।
अर्थ · Hindi
कपटी कुटिल मोहि प्रभु चीन्हा। ताते नाथ संग नहिं लीन्हा।।
- RCM 7.1.5Open verse →
जौं करनी समुझै प्रभु मोरी। नहिं निस्तार कलप सत कोरी।।
अर्थ · Hindi
जौं करनी समुझै प्रभु मोरी। नहिं निस्तार कलप सत कोरी।।
- RCM 7.1.6Open verse →
जन अवगुन प्रभु मान न काऊ। दीन बंधु अति मृदुल सुभाऊ।।
अर्थ · Hindi
जन अवगुन प्रभु मान न काऊ। दीन बंधु अति मृदुल सुभाऊ।।
- RCM 7.1.7Open verse →
मोरि जियँ भरोस दृढ़ सोई। मिलिहहिं राम सगुन सुभ होई।।
अर्थ · Hindi
मोरि जियँ भरोस दृढ़ सोई। मिलिहहिं राम सगुन सुभ होई।।
- RCM 7.1.8Open verse →
बीतें अवधि रहहि जौं प्राना। अधम कवन जग मोहि समाना।।
अर्थ · Hindi
बीतें अवधि रहहि जौं प्राना। अधम कवन जग मोहि समाना।।
- RCM 7.2.1Open verse →
देखत हनूमान अति हरषेउ। पुलक गात लोचन जल बरषेउ।।
अर्थ · Hindi
देखत हनूमान अति हरषेउ। पुलक गात लोचन जल बरषेउ।।
- RCM 7.2.2Open verse →
मन महँ बहुत भाँति सुख मानी। बोलेउ श्रवन सुधा सम बानी।।
अर्थ · Hindi
मन महँ बहुत भाँति सुख मानी। बोलेउ श्रवन सुधा सम बानी।।
- RCM 7.2.3Open verse →
जासु बिरहँ सोचहु दिन राती। रटहु निरंतर गुन गन पाँती।।
अर्थ · Hindi
जासु बिरहँ सोचहु दिन राती। रटहु निरंतर गुन गन पाँती।।
- RCM 7.2.4Open verse →
रघुकुल तिलक सुजन सुखदाता। आयउ कुसल देव मुनि त्राता।।
अर्थ · Hindi
रघुकुल तिलक सुजन सुखदाता। आयउ कुसल देव मुनि त्राता।।
- RCM 7.2.5Open verse →
रिपु रन जीति सुजस सुर गावत। सीता सहित अनुज प्रभु आवत।।
अर्थ · Hindi
रिपु रन जीति सुजस सुर गावत। सीता सहित अनुज प्रभु आवत।।
- RCM 7.2.6Open verse →
सुनत बचन बिसरे सब दूखा। तृषावंत जिमि पाइ पियूषा।।
अर्थ · Hindi
सुनत बचन बिसरे सब दूखा। तृषावंत जिमि पाइ पियूषा।।
- RCM 7.2.7Open verse →
को तुम्ह तात कहाँ ते आए। मोहि परम प्रिय बचन सुनाए।।
अर्थ · Hindi
को तुम्ह तात कहाँ ते आए। मोहि परम प्रिय बचन सुनाए।।
- RCM 7.2.8Open verse →
मारुत सुत मैं कपि हनुमाना। नामु मोर सुनु कृपानिधाना।।
अर्थ · Hindi
मारुत सुत मैं कपि हनुमाना। नामु मोर सुनु कृपानिधाना।।
- RCM 7.2.9Open verse →
दीनबंधु रघुपति कर किंकर। सुनत भरत भेंटेउ उठि सादर।।
अर्थ · Hindi
दीनबंधु रघुपति कर किंकर। सुनत भरत भेंटेउ उठि सादर।।
- RCM 7.2.10Open verse →
मिलत प्रेम नहिं हृदयँ समाता। नयन स्त्रवत जल पुलकित गाता।।
अर्थ · Hindi
मिलत प्रेम नहिं हृदयँ समाता। नयन स्त्रवत जल पुलकित गाता।।
- RCM 7.2.11Open verse →
कपि तव दरस सकल दुख बीते। मिले आजु मोहि राम पिरीते।।
अर्थ · Hindi
कपि तव दरस सकल दुख बीते। मिले आजु मोहि राम पिरीते।।
- RCM 7.2.12Open verse →
बार बार बूझी कुसलाता। तो कहुँ देउँ काह सुनु भ्राता।।
अर्थ · Hindi
बार बार बूझी कुसलाता। तो कहुँ देउँ काह सुनु भ्राता।।
- RCM 7.2.13Open verse →
एहि संदेस सरिस जग माहीं। करि बिचार देखेउँ कछु नाहीं।।
अर्थ · Hindi
एहि संदेस सरिस जग माहीं। करि बिचार देखेउँ कछु नाहीं।।
- RCM 7.2.14Open verse →
नाहिन तात उरिन मैं तोही। अब प्रभु चरित सुनावहु मोही।।
अर्थ · Hindi
नाहिन तात उरिन मैं तोही। अब प्रभु चरित सुनावहु मोही।।
- RCM 7.2.15Open verse →
तब हनुमंत नाइ पद माथा। कहे सकल रघुपति गुन गाथा।।
अर्थ · Hindi
तब हनुमंत नाइ पद माथा। कहे सकल रघुपति गुन गाथा।।
- RCM 7.2.16Open verse →
कहु कपि कबहुँ कृपाल गोसाईं। सुमिरहिं मोहि दास की नाईं।।
अर्थ · Hindi
कहु कपि कबहुँ कृपाल गोसाईं। सुमिरहिं मोहि दास की नाईं।।
- RCM 7.3.1Open verse →
हरषि भरत कोसलपुर आए। समाचार सब गुरहि सुनाए।।
अर्थ · Hindi
हरषि भरत कोसलपुर आए। समाचार सब गुरहि सुनाए।।
- RCM 7.3.2Open verse →
पुनि मंदिर महँ बात जनाई। आवत नगर कुसल रघुराई।।
अर्थ · Hindi
पुनि मंदिर महँ बात जनाई। आवत नगर कुसल रघुराई।।
- RCM 7.3.3Open verse →
सुनत सकल जननीं उठि धाईं। कहि प्रभु कुसल भरत समुझाई।।
अर्थ · Hindi
सुनत सकल जननीं उठि धाईं। कहि प्रभु कुसल भरत समुझाई।।
- RCM 7.3.4Open verse →
समाचार पुरबासिन्ह पाए। नर अरु नारि हरषि सब धाए।।
अर्थ · Hindi
समाचार पुरबासिन्ह पाए। नर अरु नारि हरषि सब धाए।।
- RCM 7.3.5Open verse →
दधि दुर्बा रोचन फल फूला। नव तुलसी दल मंगल मूला।।
अर्थ · Hindi
दधि दुर्बा रोचन फल फूला। नव तुलसी दल मंगल मूला।।
- RCM 7.3.6Open verse →
भरि भरि हेम थार भामिनी। गावत चलिं सिंधु सिंधुरगामिनी।।
अर्थ · Hindi
भरि भरि हेम थार भामिनी। गावत चलिं सिंधु सिंधुरगामिनी।।
- RCM 7.3.7Open verse →
जे जैसेहिं तैसेहिं उटि धावहिं। बाल बृद्ध कहँ संग न लावहिं।।
अर्थ · Hindi
जे जैसेहिं तैसेहिं उटि धावहिं। बाल बृद्ध कहँ संग न लावहिं।।
- RCM 7.3.8Open verse →
एक एकन्ह कहँ बूझहिं भाई। तुम्ह देखे दयाल रघुराई।।
अर्थ · Hindi
एक एकन्ह कहँ बूझहिं भाई। तुम्ह देखे दयाल रघुराई।।
- RCM 7.3.9Open verse →
अवधपुरी प्रभु आवत जानी। भई सकल सोभा कै खानी।।
अर्थ · Hindi
अवधपुरी प्रभु आवत जानी। भई सकल सोभा कै खानी।।
- RCM 7.3.10Open verse →
बहइ सुहावन त्रिबिध समीरा। भइ सरजू अति निर्मल नीरा।।
अर्थ · Hindi
बहइ सुहावन त्रिबिध समीरा। भइ सरजू अति निर्मल नीरा।।
- RCM 7.4.1Open verse →
इहाँ भानुकुल कमल दिवाकर। कपिन्ह देखावत नगर मनोहर।।
अर्थ · Hindi
इहाँ भानुकुल कमल दिवाकर। कपिन्ह देखावत नगर मनोहर।।
- RCM 7.4.2Open verse →
सुनु कपीस अंगद लंकेसा। पावन पुरी रुचिर यह देसा।।
अर्थ · Hindi
सुनु कपीस अंगद लंकेसा। पावन पुरी रुचिर यह देसा।।
- RCM 7.4.3Open verse →
जद्यपि सब बैकुंठ बखाना। बेद पुरान बिदित जगु जाना।।
अर्थ · Hindi
जद्यपि सब बैकुंठ बखाना। बेद पुरान बिदित जगु जाना।।
- RCM 7.4.4Open verse →
अवधपुरी सम प्रिय नहिं सोऊ। यह प्रसंग जानइ कोउ कोऊ।।
अर्थ · Hindi
अवधपुरी सम प्रिय नहिं सोऊ। यह प्रसंग जानइ कोउ कोऊ।।
- RCM 7.4.5Open verse →
जन्मभूमि मम पुरी सुहावनि। उत्तर दिसि बह सरजू पावनि।।
अर्थ · Hindi
जन्मभूमि मम पुरी सुहावनि। उत्तर दिसि बह सरजू पावनि।।
- RCM 7.4.6Open verse →
जा मज्जन ते बिनहिं प्रयासा। मम समीप नर पावहिं बासा।।
अर्थ · Hindi
जा मज्जन ते बिनहिं प्रयासा। मम समीप नर पावहिं बासा।।
- RCM 7.4.7Open verse →
अति प्रिय मोहि इहाँ के बासी। मम धामदा पुरी सुख रासी।।
अर्थ · Hindi
अति प्रिय मोहि इहाँ के बासी। मम धामदा पुरी सुख रासी।।
- RCM 7.4.8Open verse →
हरषे सब कपि सुनि प्रभु बानी। धन्य अवध जो राम बखानी।।
अर्थ · Hindi
हरषे सब कपि सुनि प्रभु बानी। धन्य अवध जो राम बखानी।।
- RCM 7.5.1Open verse →
आए भरत संग सब लोगा। कृस तन श्रीरघुबीर बियोगा।।
अर्थ · Hindi
आए भरत संग सब लोगा। कृस तन श्रीरघुबीर बियोगा।।
- RCM 7.5.2Open verse →
बामदेव बसिष्ठ मुनिनायक। देखे प्रभु महि धरि धनु सायक।।
अर्थ · Hindi
बामदेव बसिष्ठ मुनिनायक। देखे प्रभु महि धरि धनु सायक।।
- RCM 7.5.3Open verse →
धाइ धरे गुर चरन सरोरुह। अनुज सहित अति पुलक तनोरुह।।
अर्थ · Hindi
धाइ धरे गुर चरन सरोरुह। अनुज सहित अति पुलक तनोरुह।।
- RCM 7.5.4Open verse →
भेंटि कुसल बूझी मुनिराया। हमरें कुसल तुम्हारिहिं दाया।।
अर्थ · Hindi
भेंटि कुसल बूझी मुनिराया। हमरें कुसल तुम्हारिहिं दाया।।
- RCM 7.5.5Open verse →
सकल द्विजन्ह मिलि नायउ माथा। धर्म धुरंधर रघुकुलनाथा।।
अर्थ · Hindi
सकल द्विजन्ह मिलि नायउ माथा। धर्म धुरंधर रघुकुलनाथा।।
- RCM 7.5.6Open verse →
गहे भरत पुनि प्रभु पद पंकज। नमत जिन्हहि सुर मुनि संकर अज।।
अर्थ · Hindi
गहे भरत पुनि प्रभु पद पंकज। नमत जिन्हहि सुर मुनि संकर अज।।
- RCM 7.5.7Open verse →
परे भूमि नहिं उठत उठाए। बर करि कृपासिंधु उर लाए।।
अर्थ · Hindi
परे भूमि नहिं उठत उठाए। बर करि कृपासिंधु उर लाए।।
- RCM 7.5.8Open verse →
स्यामल गात रोम भए ठाढ़े। नव राजीव नयन जल बाढ़े।।
अर्थ · Hindi
स्यामल गात रोम भए ठाढ़े। नव राजीव नयन जल बाढ़े।।
- RCM 7.6.1Open verse →
भरतानुज लछिमन पुनि भेंटे। दुसह बिरह संभव दुख मेटे।।
अर्थ · Hindi
भरतानुज लछिमन पुनि भेंटे। दुसह बिरह संभव दुख मेटे।।
- RCM 7.6.2Open verse →
सीता चरन भरत सिरु नावा। अनुज समेत परम सुख पावा।।
अर्थ · Hindi
सीता चरन भरत सिरु नावा। अनुज समेत परम सुख पावा।।
- RCM 7.6.3Open verse →
प्रभु बिलोकि हरषे पुरबासी। जनित बियोग बिपति सब नासी।।
अर्थ · Hindi
प्रभु बिलोकि हरषे पुरबासी। जनित बियोग बिपति सब नासी।।
- RCM 7.6.4Open verse →
प्रेमातुर सब लोग निहारी। कौतुक कीन्ह कृपाल खरारी।।
अर्थ · Hindi
प्रेमातुर सब लोग निहारी। कौतुक कीन्ह कृपाल खरारी।।
- RCM 7.6.5Open verse →
अमित रूप प्रगटे तेहि काला। जथाजोग मिले सबहि कृपाला।।
अर्थ · Hindi
अमित रूप प्रगटे तेहि काला। जथाजोग मिले सबहि कृपाला।।
- RCM 7.6.6Open verse →
कृपादृष्टि रघुबीर बिलोकी। किए सकल नर नारि बिसोकी।।
अर्थ · Hindi
कृपादृष्टि रघुबीर बिलोकी। किए सकल नर नारि बिसोकी।।
- RCM 7.6.7Open verse →
छन महिं सबहि मिले भगवाना। उमा मरम यह काहुँ न जाना।।
अर्थ · Hindi
छन महिं सबहि मिले भगवाना। उमा मरम यह काहुँ न जाना।।
- RCM 7.6.8Open verse →
एहि बिधि सबहि सुखी करि रामा। आगें चले सील गुन धामा।।
अर्थ · Hindi
एहि बिधि सबहि सुखी करि रामा। आगें चले सील गुन धामा।।
- RCM 7.6.9Open verse →
कौसल्यादि मातु सब धाई। निरखि बच्छ जनु धेनु लवाई।।
अर्थ · Hindi
कौसल्यादि मातु सब धाई। निरखि बच्छ जनु धेनु लवाई।।
- RCM 7.7.1Open verse →
सासुन्ह सबनि मिली बैदेही। चरनन्हि लागि हरषु अति तेही।।
अर्थ · Hindi
सासुन्ह सबनि मिली बैदेही। चरनन्हि लागि हरषु अति तेही।।
- RCM 7.7.2Open verse →
देहिं असीस बूझि कुसलाता। होइ अचल तुम्हार अहिवाता।।
अर्थ · Hindi
देहिं असीस बूझि कुसलाता। होइ अचल तुम्हार अहिवाता।।
- RCM 7.7.3Open verse →
सब रघुपति मुख कमल बिलोकहिं। मंगल जानि नयन जल रोकहिं।।
अर्थ · Hindi
सब रघुपति मुख कमल बिलोकहिं। मंगल जानि नयन जल रोकहिं।।
- RCM 7.7.4Open verse →
कनक थार आरति उतारहिं। बार बार प्रभु गात निहारहिं।।
अर्थ · Hindi
कनक थार आरति उतारहिं। बार बार प्रभु गात निहारहिं।।
- RCM 7.7.5Open verse →
नाना भाँति निछावरि करहीं। परमानंद हरष उर भरहीं।।
अर्थ · Hindi
नाना भाँति निछावरि करहीं। परमानंद हरष उर भरहीं।।
- RCM 7.7.6Open verse →
कौसल्या पुनि पुनि रघुबीरहि। चितवति कृपासिंधु रनधीरहि।।
अर्थ · Hindi
कौसल्या पुनि पुनि रघुबीरहि। चितवति कृपासिंधु रनधीरहि।।
- RCM 7.7.7Open verse →
हृदयँ बिचारति बारहिं बारा। कवन भाँति लंकापति मारा।।
अर्थ · Hindi
हृदयँ बिचारति बारहिं बारा। कवन भाँति लंकापति मारा।।
- RCM 7.7.8Open verse →
अति सुकुमार जुगल मेरे बारे। निसिचर सुभट महाबल भारे।।
अर्थ · Hindi
अति सुकुमार जुगल मेरे बारे। निसिचर सुभट महाबल भारे।।
- RCM 7.8.1Open verse →
लंकापति कपीस नल नीला। जामवंत अंगद सुभसीला।।
अर्थ · Hindi
लंकापति कपीस नल नीला। जामवंत अंगद सुभसीला।।
- RCM 7.8.2Open verse →
हनुमदादि सब बानर बीरा। धरे मनोहर मनुज सरीरा।।
अर्थ · Hindi
हनुमदादि सब बानर बीरा। धरे मनोहर मनुज सरीरा।।
- RCM 7.8.3Open verse →
भरत सनेह सील ब्रत नेमा। सादर सब बरनहिं अति प्रेमा।।
अर्थ · Hindi
भरत सनेह सील ब्रत नेमा। सादर सब बरनहिं अति प्रेमा।।
- RCM 7.8.4Open verse →
देखि नगरबासिन्ह कै रीती। सकल सराहहि प्रभु पद प्रीती।।
अर्थ · Hindi
देखि नगरबासिन्ह कै रीती। सकल सराहहि प्रभु पद प्रीती।।
- RCM 7.8.5Open verse →
पुनि रघुपति सब सखा बोलाए। मुनि पद लागहु सकल सिखाए।।
अर्थ · Hindi
पुनि रघुपति सब सखा बोलाए। मुनि पद लागहु सकल सिखाए।।
- RCM 7.8.6Open verse →
गुर बसिष्ट कुलपूज्य हमारे। इन्ह की कृपाँ दनुज रन मारे।।
अर्थ · Hindi
गुर बसिष्ट कुलपूज्य हमारे। इन्ह की कृपाँ दनुज रन मारे।।
- RCM 7.8.7Open verse →
ए सब सखा सुनहु मुनि मेरे। भए समर सागर कहँ बेरे।।
अर्थ · Hindi
ए सब सखा सुनहु मुनि मेरे। भए समर सागर कहँ बेरे।।
- RCM 7.8.8Open verse →
मम हित लागि जन्म इन्ह हारे। भरतहु ते मोहि अधिक पिआरे।।
अर्थ · Hindi
मम हित लागि जन्म इन्ह हारे। भरतहु ते मोहि अधिक पिआरे।।
- RCM 7.8.9Open verse →
सुनि प्रभु बचन मगन सब भए। निमिष निमिष उपजत सुख नए।।
अर्थ · Hindi
सुनि प्रभु बचन मगन सब भए। निमिष निमिष उपजत सुख नए।।
- RCM 7.9.1Open verse →
कंचन कलस बिचित्र सँवारे। सबहिं धरे सजि निज निज द्वारे।।
अर्थ · Hindi
कंचन कलस बिचित्र सँवारे। सबहिं धरे सजि निज निज द्वारे।।
- RCM 7.9.2Open verse →
बंदनवार पताका केतू। सबन्हि बनाए मंगल हेतू।।
अर्थ · Hindi
बंदनवार पताका केतू। सबन्हि बनाए मंगल हेतू।।
- RCM 7.9.3Open verse →
बीथीं सकल सुगंध सिंचाई। गजमनि रचि बहु चौक पुराई।।
अर्थ · Hindi
बीथीं सकल सुगंध सिंचाई। गजमनि रचि बहु चौक पुराई।।
- RCM 7.9.4Open verse →
नाना भाँति सुमंगल साजे। हरषि नगर निसान बहु बाजे।।
अर्थ · Hindi
नाना भाँति सुमंगल साजे। हरषि नगर निसान बहु बाजे।।
- RCM 7.9.5Open verse →
जहँ तहँ नारि निछावर करहीं। देहिं असीस हरष उर भरहीं।।
अर्थ · Hindi
जहँ तहँ नारि निछावर करहीं। देहिं असीस हरष उर भरहीं।।
- RCM 7.9.6Open verse →
कंचन थार आरती नाना। जुबती सजें करहिं सुभ गाना।।
अर्थ · Hindi
कंचन थार आरती नाना। जुबती सजें करहिं सुभ गाना।।
- RCM 7.9.7Open verse →
करहिं आरती आरतिहर कें। रघुकुल कमल बिपिन दिनकर कें।।
अर्थ · Hindi
करहिं आरती आरतिहर कें। रघुकुल कमल बिपिन दिनकर कें।।
- RCM 7.9.8Open verse →
पुर सोभा संपति कल्याना। निगम सेष सारदा बखाना।।
अर्थ · Hindi
पुर सोभा संपति कल्याना। निगम सेष सारदा बखाना।।
- RCM 7.9.9Open verse →
तेउ यह चरित देखि ठगि रहहीं। उमा तासु गुन नर किमि कहहीं।।
अर्थ · Hindi
तेउ यह चरित देखि ठगि रहहीं। उमा तासु गुन नर किमि कहहीं।।
- RCM 7.10.1Open verse →
प्रभु जानी कैकेई लजानी। प्रथम तासु गृह गए भवानी।।
अर्थ · Hindi
प्रभु जानी कैकेई लजानी। प्रथम तासु गृह गए भवानी।।
- RCM 7.10.2Open verse →
ताहि प्रबोधि बहुत सुख दीन्हा। पुनि निज भवन गवन हरि कीन्हा।।
अर्थ · Hindi
ताहि प्रबोधि बहुत सुख दीन्हा। पुनि निज भवन गवन हरि कीन्हा।।
- RCM 7.10.3Open verse →
कृपासिंधु जब मंदिर गए। पुर नर नारि सुखी सब भए।।
अर्थ · Hindi
कृपासिंधु जब मंदिर गए। पुर नर नारि सुखी सब भए।।
- RCM 7.10.4Open verse →
गुर बसिष्ट द्विज लिए बुलाई। आजु सुघरी सुदिन समुदाई।।
अर्थ · Hindi
गुर बसिष्ट द्विज लिए बुलाई। आजु सुघरी सुदिन समुदाई।।
- RCM 7.10.5Open verse →
सब द्विज देहु हरषि अनुसासन। रामचंद्र बैठहिं सिंघासन।।
अर्थ · Hindi
सब द्विज देहु हरषि अनुसासन। रामचंद्र बैठहिं सिंघासन।।
- RCM 7.10.6Open verse →
मुनि बसिष्ट के बचन सुहाए। सुनत सकल बिप्रन्ह अति भाए।।
अर्थ · Hindi
मुनि बसिष्ट के बचन सुहाए। सुनत सकल बिप्रन्ह अति भाए।।
- RCM 7.10.7Open verse →
कहहिं बचन मृदु बिप्र अनेका। जग अभिराम राम अभिषेका।।
अर्थ · Hindi
कहहिं बचन मृदु बिप्र अनेका। जग अभिराम राम अभिषेका।।
- RCM 7.10.8Open verse →
अब मुनिबर बिलंब नहिं कीजे। महाराज कहँ तिलक करीजै।।
अर्थ · Hindi
अब मुनिबर बिलंब नहिं कीजे। महाराज कहँ तिलक करीजै।।
- RCM 7.11.1Open verse →
अवधपुरी अति रुचिर बनाई। देवन्ह सुमन बृष्टि झरि लाई।।
अर्थ · Hindi
अवधपुरी अति रुचिर बनाई। देवन्ह सुमन बृष्टि झरि लाई।।
- RCM 7.11.2Open verse →
राम कहा सेवकन्ह बुलाई। प्रथम सखन्ह अन्हवावहु जाई।।
अर्थ · Hindi
राम कहा सेवकन्ह बुलाई। प्रथम सखन्ह अन्हवावहु जाई।।
- RCM 7.11.3Open verse →
सुनत बचन जहँ तहँ जन धाए। सुग्रीवादि तुरत अन्हवाए।।
अर्थ · Hindi
सुनत बचन जहँ तहँ जन धाए। सुग्रीवादि तुरत अन्हवाए।।
- RCM 7.11.4Open verse →
पुनि करुनानिधि भरतु हँकारे। निज कर राम जटा निरुआरे।।
अर्थ · Hindi
पुनि करुनानिधि भरतु हँकारे। निज कर राम जटा निरुआरे।।
- RCM 7.11.5Open verse →
अन्हवाए प्रभु तीनिउ भाई। भगत बछल कृपाल रघुराई।।
अर्थ · Hindi
अन्हवाए प्रभु तीनिउ भाई। भगत बछल कृपाल रघुराई।।
- RCM 7.11.6Open verse →
भरत भाग्य प्रभु कोमलताई। सेष कोटि सत सकहिं न गाई।।
अर्थ · Hindi
भरत भाग्य प्रभु कोमलताई। सेष कोटि सत सकहिं न गाई।।
- RCM 7.11.7Open verse →
पुनि निज जटा राम बिबराए। गुर अनुसासन मागि नहाए।।
अर्थ · Hindi
पुनि निज जटा राम बिबराए। गुर अनुसासन मागि नहाए।।
- RCM 7.11.8Open verse →
करि मज्जन प्रभु भूषन साजे। अंग अनंग देखि सत लाजे।।
अर्थ · Hindi
करि मज्जन प्रभु भूषन साजे। अंग अनंग देखि सत लाजे।।
- RCM 7.12.1Open verse →
प्रभु बिलोकि मुनि मन अनुरागा। तुरत दिब्य सिंघासन मागा।।
अर्थ · Hindi
प्रभु बिलोकि मुनि मन अनुरागा। तुरत दिब्य सिंघासन मागा।।
- RCM 7.12.2Open verse →
रबि सम तेज सो बरनि न जाई। बैठे राम द्विजन्ह सिरु नाई।।
अर्थ · Hindi
रबि सम तेज सो बरनि न जाई। बैठे राम द्विजन्ह सिरु नाई।।
- RCM 7.12.3Open verse →
जनकसुता समेत रघुराई। पेखि प्रहरषे मुनि समुदाई।।
अर्थ · Hindi
जनकसुता समेत रघुराई। पेखि प्रहरषे मुनि समुदाई।।
- RCM 7.12.4Open verse →
बेद मंत्र तब द्विजन्ह उचारे। नभ सुर मुनि जय जयति पुकारे।।
अर्थ · Hindi
बेद मंत्र तब द्विजन्ह उचारे। नभ सुर मुनि जय जयति पुकारे।।
- RCM 7.12.5Open verse →
प्रथम तिलक बसिष्ट मुनि कीन्हा। पुनि सब बिप्रन्ह आयसु दीन्हा।।
अर्थ · Hindi
प्रथम तिलक बसिष्ट मुनि कीन्हा। पुनि सब बिप्रन्ह आयसु दीन्हा।।
- RCM 7.12.6Open verse →
सुत बिलोकि हरषीं महतारी। बार बार आरती उतारी।।
अर्थ · Hindi
सुत बिलोकि हरषीं महतारी। बार बार आरती उतारी।।
- RCM 7.12.7Open verse →
बिप्रन्ह दान बिबिध बिधि दीन्हे। जाचक सकल अजाचक कीन्हे।।
अर्थ · Hindi
बिप्रन्ह दान बिबिध बिधि दीन्हे। जाचक सकल अजाचक कीन्हे।।
- RCM 7.12.8Open verse →
सिंघासन पर त्रिभुअन साई। देखि सुरन्ह दुंदुभीं बजाईं।।
अर्थ · Hindi
सिंघासन पर त्रिभुअन साई। देखि सुरन्ह दुंदुभीं बजाईं।।
- RCM 7.13.1Open verse →
जय सगुन निर्गुन रूप रूप अनूप भूप सिरोमने।
अर्थ · Hindi
जय सगुन निर्गुन रूप रूप अनूप भूप सिरोमने।
- RCM 7.13.2Open verse →
दसकंधरादि प्रचंड निसिचर प्रबल खल भुज बल हने।।
अर्थ · Hindi
दसकंधरादि प्रचंड निसिचर प्रबल खल भुज बल हने।।
- RCM 7.13.3Open verse →
अवतार नर संसार भार बिभंजि दारुन दुख दहे।
अर्थ · Hindi
अवतार नर संसार भार बिभंजि दारुन दुख दहे।
- RCM 7.13.4Open verse →
जय प्रनतपाल दयाल प्रभु संजुक्त सक्ति नमामहे।।1।।
अर्थ · Hindi
जय प्रनतपाल दयाल प्रभु संजुक्त सक्ति नमामहे।।1।।
- RCM 7.13.5Open verse →
तव बिषम माया बस सुरासुर नाग नर अग जग हरे।
अर्थ · Hindi
तव बिषम माया बस सुरासुर नाग नर अग जग हरे।
- RCM 7.13.6Open verse →
भव पंथ भ्रमत अमित दिवस निसि काल कर्म गुननि भरे।।
अर्थ · Hindi
भव पंथ भ्रमत अमित दिवस निसि काल कर्म गुननि भरे।।
- RCM 7.13.7Open verse →
जे नाथ करि करुना बिलोके त्रिबिधि दुख ते निर्बहे।
अर्थ · Hindi
जे नाथ करि करुना बिलोके त्रिबिधि दुख ते निर्बहे।
- RCM 7.13.8Open verse →
भव खेद छेदन दच्छ हम कहुँ रच्छ राम नमामहे।।2।।
अर्थ · Hindi
भव खेद छेदन दच्छ हम कहुँ रच्छ राम नमामहे।।2।।
- RCM 7.13.9Open verse →
जे ग्यान मान बिमत्त तव भव हरनि भक्ति न आदरी।
अर्थ · Hindi
जे ग्यान मान बिमत्त तव भव हरनि भक्ति न आदरी।
- RCM 7.13.10Open verse →
ते पाइ सुर दुर्लभ पदादपि परत हम देखत हरी।।
अर्थ · Hindi
ते पाइ सुर दुर्लभ पदादपि परत हम देखत हरी।।
- RCM 7.13.11Open verse →
बिस्वास करि सब आस परिहरि दास तव जे होइ रहे।
अर्थ · Hindi
बिस्वास करि सब आस परिहरि दास तव जे होइ रहे।
- RCM 7.13.12Open verse →
जपि नाम तव बिनु श्रम तरहिं भव नाथ सो समरामहे।।3।।
अर्थ · Hindi
जपि नाम तव बिनु श्रम तरहिं भव नाथ सो समरामहे।।3।।
- RCM 7.13.13Open verse →
जे चरन सिव अज पूज्य रज सुभ परसि मुनिपतिनी तरी।
अर्थ · Hindi
जे चरन सिव अज पूज्य रज सुभ परसि मुनिपतिनी तरी।
- RCM 7.13.14Open verse →
नख निर्गता मुनि बंदिता त्रेलोक पावनि सुरसरी।।
अर्थ · Hindi
नख निर्गता मुनि बंदिता त्रेलोक पावनि सुरसरी।।
- RCM 7.13.15Open verse →
ध्वज कुलिस अंकुस कंज जुत बन फिरत कंटक किन लहे।
अर्थ · Hindi
ध्वज कुलिस अंकुस कंज जुत बन फिरत कंटक किन लहे।
- RCM 7.13.16Open verse →
पद कंज द्वंद मुकुंद राम रमेस नित्य भजामहे।।4।।
अर्थ · Hindi
पद कंज द्वंद मुकुंद राम रमेस नित्य भजामहे।।4।।
- RCM 7.13.17Open verse →
अब्यक्तमूलमनादि तरु त्वच चारि निगमागम भने।
अर्थ · Hindi
अब्यक्तमूलमनादि तरु त्वच चारि निगमागम भने।
- RCM 7.13.18Open verse →
षट कंध साखा पंच बीस अनेक पर्न सुमन घने।।
अर्थ · Hindi
षट कंध साखा पंच बीस अनेक पर्न सुमन घने।।
- RCM 7.13.19Open verse →
फल जुगल बिधि कटु मधुर बेलि अकेलि जेहि आश्रित रहे।
अर्थ · Hindi
फल जुगल बिधि कटु मधुर बेलि अकेलि जेहि आश्रित रहे।
- RCM 7.13.20Open verse →
पल्लवत फूलत नवल नित संसार बिटप नमामहे।।5।।
अर्थ · Hindi
पल्लवत फूलत नवल नित संसार बिटप नमामहे।।5।।
- RCM 7.13.21Open verse →
जे ब्रह्म अजमद्वैतमनुभवगम्य मनपर ध्यावहीं।
अर्थ · Hindi
जे ब्रह्म अजमद्वैतमनुभवगम्य मनपर ध्यावहीं।
- RCM 7.13.22Open verse →
ते कहहुँ जानहुँ नाथ हम तव सगुन जस नित गावहीं।।
अर्थ · Hindi
ते कहहुँ जानहुँ नाथ हम तव सगुन जस नित गावहीं।।
- RCM 7.13.23Open verse →
करुनायतन प्रभु सदगुनाकर देव यह बर मागहीं।
अर्थ · Hindi
करुनायतन प्रभु सदगुनाकर देव यह बर मागहीं।
- RCM 7.13.24Open verse →
मन बचन कर्म बिकार तजि तव चरन हम अनुरागहीं।।6।।
अर्थ · Hindi
मन बचन कर्म बिकार तजि तव चरन हम अनुरागहीं।।6।।
- RCM 7.13.25Open verse →
सब के देखत बेदन्ह बिनती कीन्हि उदार।
अर्थ · Hindi
सब के देखत बेदन्ह बिनती कीन्हि उदार।
- RCM 7.13.26Open verse →
अंतर्धान भए पुनि गए ब्रह्म आगार।।13(क)।।
अर्थ · Hindi
अंतर्धान भए पुनि गए ब्रह्म आगार।।13(क)।।
- RCM 7.13.27Open verse →
बैनतेय सुनु संभु तब आए जहँ रघुबीर।
अर्थ · Hindi
बैनतेय सुनु संभु तब आए जहँ रघुबीर।
- RCM 7.13.28Open verse →
बिनय करत गदगद गिरा पूरित पुलक सरीर।।13(ख)।।
अर्थ · Hindi
बिनय करत गदगद गिरा पूरित पुलक सरीर।।13(ख)।।
- RCM 7.14.1Open verse →
जय राम रमारमनं समनं। भव ताप भयाकुल पाहि जनं।।
अर्थ · Hindi
जय राम रमारमनं समनं। भव ताप भयाकुल पाहि जनं।।
- RCM 7.14.2Open verse →
अवधेस सुरेस रमेस बिभो। सरनागत मागत पाहि प्रभो।।1।।
अर्थ · Hindi
अवधेस सुरेस रमेस बिभो। सरनागत मागत पाहि प्रभो।।1।।
- RCM 7.14.3Open verse →
दससीस बिनासन बीस भुजा। कृत दूरि महा महि भूरि रुजा।।
अर्थ · Hindi
दससीस बिनासन बीस भुजा। कृत दूरि महा महि भूरि रुजा।।
- RCM 7.14.4Open verse →
रजनीचर बृंद पतंग रहे। सर पावक तेज प्रचंड दहे।।2।।
अर्थ · Hindi
रजनीचर बृंद पतंग रहे। सर पावक तेज प्रचंड दहे।।2।।
- RCM 7.14.5Open verse →
महि मंडल मंडन चारुतरं। धृत सायक चाप निषंग बरं।।
अर्थ · Hindi
महि मंडल मंडन चारुतरं। धृत सायक चाप निषंग बरं।।
- RCM 7.14.6Open verse →
मद मोह महा ममता रजनी। तम पुंज दिवाकर तेज अनी।।3।।
अर्थ · Hindi
मद मोह महा ममता रजनी। तम पुंज दिवाकर तेज अनी।।3।।
- RCM 7.14.7Open verse →
मनजात किरात निपात किए। मृग लोग कुभोग सरेन हिए।।
अर्थ · Hindi
मनजात किरात निपात किए। मृग लोग कुभोग सरेन हिए।।
- RCM 7.14.8Open verse →
हति नाथ अनाथनि पाहि हरे। बिषया बन पावँर भूलि परे।।4।।
अर्थ · Hindi
हति नाथ अनाथनि पाहि हरे। बिषया बन पावँर भूलि परे।।4।।
- RCM 7.14.9Open verse →
बहु रोग बियोगन्हि लोग हए। भवदंघ्रि निरादर के फल ए।।
अर्थ · Hindi
बहु रोग बियोगन्हि लोग हए। भवदंघ्रि निरादर के फल ए।।
- RCM 7.14.10Open verse →
भव सिंधु अगाध परे नर ते। पद पंकज प्रेम न जे करते।।5।।
अर्थ · Hindi
भव सिंधु अगाध परे नर ते। पद पंकज प्रेम न जे करते।।5।।
- RCM 7.14.11Open verse →
अति दीन मलीन दुखी नितहीं। जिन्ह के पद पंकज प्रीति नहीं।।
अर्थ · Hindi
अति दीन मलीन दुखी नितहीं। जिन्ह के पद पंकज प्रीति नहीं।।
- RCM 7.14.12Open verse →
अवलंब भवंत कथा जिन्ह के।। प्रिय संत अनंत सदा तिन्ह कें।।6।।
अर्थ · Hindi
अवलंब भवंत कथा जिन्ह के।। प्रिय संत अनंत सदा तिन्ह कें।।6।।
- RCM 7.14.13Open verse →
नहिं राग न लोभ न मान मदा।।तिन्ह कें सम बैभव वा बिपदा।।
अर्थ · Hindi
नहिं राग न लोभ न मान मदा।।तिन्ह कें सम बैभव वा बिपदा।।
- RCM 7.14.14Open verse →
एहि ते तव सेवक होत मुदा। मुनि त्यागत जोग भरोस सदा।।7।।
अर्थ · Hindi
एहि ते तव सेवक होत मुदा। मुनि त्यागत जोग भरोस सदा।।7।।
- RCM 7.14.15Open verse →
करि प्रेम निरंतर नेम लिएँ। पद पंकज सेवत सुद्ध हिएँ।।
अर्थ · Hindi
करि प्रेम निरंतर नेम लिएँ। पद पंकज सेवत सुद्ध हिएँ।।
- RCM 7.14.16Open verse →
सम मानि निरादर आदरही। सब संत सुखी बिचरंति मही।।8।।
अर्थ · Hindi
सम मानि निरादर आदरही। सब संत सुखी बिचरंति मही।।8।।
- RCM 7.14.17Open verse →
मुनि मानस पंकज भृंग भजे। रघुबीर महा रनधीर अजे।।
अर्थ · Hindi
मुनि मानस पंकज भृंग भजे। रघुबीर महा रनधीर अजे।।
- RCM 7.14.18Open verse →
तव नाम जपामि नमामि हरी। भव रोग महागद मान अरी।।9।।
अर्थ · Hindi
तव नाम जपामि नमामि हरी। भव रोग महागद मान अरी।।9।।
- RCM 7.14.19Open verse →
गुन सील कृपा परमायतनं। प्रनमामि निरंतर श्रीरमनं।।
अर्थ · Hindi
गुन सील कृपा परमायतनं। प्रनमामि निरंतर श्रीरमनं।।
- RCM 7.14.20Open verse →
रघुनंद निकंदय द्वंद्वघनं। महिपाल बिलोकय दीन जनं।।10।।
अर्थ · Hindi
रघुनंद निकंदय द्वंद्वघनं। महिपाल बिलोकय दीन जनं।।10।।
- RCM 7.15.1Open verse →
सुनु खगपति यह कथा पावनी। त्रिबिध ताप भव भय दावनी।।
अर्थ · Hindi
सुनु खगपति यह कथा पावनी। त्रिबिध ताप भव भय दावनी।।
- RCM 7.15.2Open verse →
महाराज कर सुभ अभिषेका। सुनत लहहिं नर बिरति बिबेका।।
अर्थ · Hindi
महाराज कर सुभ अभिषेका। सुनत लहहिं नर बिरति बिबेका।।
- RCM 7.15.3Open verse →
जे सकाम नर सुनहिं जे गावहिं। सुख संपति नाना बिधि पावहिं।।
अर्थ · Hindi
जे सकाम नर सुनहिं जे गावहिं। सुख संपति नाना बिधि पावहिं।।
- RCM 7.15.4Open verse →
सुर दुर्लभ सुख करि जग माहीं। अंतकाल रघुपति पुर जाहीं।।
अर्थ · Hindi
सुर दुर्लभ सुख करि जग माहीं। अंतकाल रघुपति पुर जाहीं।।
- RCM 7.15.5Open verse →
सुनहिं बिमुक्त बिरत अरु बिषई। लहहिं भगति गति संपति नई।।
अर्थ · Hindi
सुनहिं बिमुक्त बिरत अरु बिषई। लहहिं भगति गति संपति नई।।
- RCM 7.15.6Open verse →
खगपति राम कथा मैं बरनी। स्वमति बिलास त्रास दुख हरनी।।
अर्थ · Hindi
खगपति राम कथा मैं बरनी। स्वमति बिलास त्रास दुख हरनी।।
- RCM 7.15.7Open verse →
बिरति बिबेक भगति दृढ़ करनी। मोह नदी कहँ सुंदर तरनी।।
अर्थ · Hindi
बिरति बिबेक भगति दृढ़ करनी। मोह नदी कहँ सुंदर तरनी।।
- RCM 7.15.8Open verse →
नित नव मंगल कौसलपुरी। हरषित रहहिं लोग सब कुरी।।
अर्थ · Hindi
नित नव मंगल कौसलपुरी। हरषित रहहिं लोग सब कुरी।।
- RCM 7.15.9Open verse →
नित नइ प्रीति राम पद पंकज। सबकें जिन्हहि नमत सिव मुनि अज।।
अर्थ · Hindi
नित नइ प्रीति राम पद पंकज। सबकें जिन्हहि नमत सिव मुनि अज।।
- RCM 7.15.10Open verse →
मंगन बहु प्रकार पहिराए। द्विजन्ह दान नाना बिधि पाए।।
अर्थ · Hindi
मंगन बहु प्रकार पहिराए। द्विजन्ह दान नाना बिधि पाए।।
- RCM 7.16.1Open verse →
बिसरे गृह सपनेहुँ सुधि नाहीं। जिमि परद्रोह संत मन माही।।
अर्थ · Hindi
बिसरे गृह सपनेहुँ सुधि नाहीं। जिमि परद्रोह संत मन माही।।
- RCM 7.16.2Open verse →
तब रघुपति सब सखा बोलाए। आइ सबन्हि सादर सिरु नाए।।
अर्थ · Hindi
तब रघुपति सब सखा बोलाए। आइ सबन्हि सादर सिरु नाए।।
- RCM 7.16.3Open verse →
परम प्रीति समीप बैठारे। भगत सुखद मृदु बचन उचारे।।
अर्थ · Hindi
परम प्रीति समीप बैठारे। भगत सुखद मृदु बचन उचारे।।
- RCM 7.16.4Open verse →
तुम्ह अति कीन्ह मोरि सेवकाई। मुख पर केहि बिधि करौं बड़ाई।।
अर्थ · Hindi
तुम्ह अति कीन्ह मोरि सेवकाई। मुख पर केहि बिधि करौं बड़ाई।।
- RCM 7.16.5Open verse →
ताते मोहि तुम्ह अति प्रिय लागे। मम हित लागि भवन सुख त्यागे।।
अर्थ · Hindi
ताते मोहि तुम्ह अति प्रिय लागे। मम हित लागि भवन सुख त्यागे।।
- RCM 7.16.6Open verse →
अनुज राज संपति बैदेही। देह गेह परिवार सनेही।।
अर्थ · Hindi
अनुज राज संपति बैदेही। देह गेह परिवार सनेही।।
- RCM 7.16.7Open verse →
सब मम प्रिय नहिं तुम्हहि समाना। मृषा न कहउँ मोर यह बाना।।
अर्थ · Hindi
सब मम प्रिय नहिं तुम्हहि समाना। मृषा न कहउँ मोर यह बाना।।
- RCM 7.16.8Open verse →
सब के प्रिय सेवक यह नीती। मोरें अधिक दास पर प्रीती।।
अर्थ · Hindi
सब के प्रिय सेवक यह नीती। मोरें अधिक दास पर प्रीती।।
- RCM 7.17.1Open verse →
सुनि प्रभु बचन मगन सब भए। को हम कहाँ बिसरि तन गए।।
अर्थ · Hindi
सुनि प्रभु बचन मगन सब भए। को हम कहाँ बिसरि तन गए।।
- RCM 7.17.2Open verse →
एकटक रहे जोरि कर आगे। सकहिं न कछु कहि अति अनुरागे।।
अर्थ · Hindi
एकटक रहे जोरि कर आगे। सकहिं न कछु कहि अति अनुरागे।।
- RCM 7.17.3Open verse →
परम प्रेम तिन्ह कर प्रभु देखा। कहा बिबिध बिधि ग्यान बिसेषा।।
अर्थ · Hindi
परम प्रेम तिन्ह कर प्रभु देखा। कहा बिबिध बिधि ग्यान बिसेषा।।
- RCM 7.17.4Open verse →
प्रभु सन्मुख कछु कहन न पारहिं। पुनि पुनि चरन सरोज निहारहिं।।
अर्थ · Hindi
प्रभु सन्मुख कछु कहन न पारहिं। पुनि पुनि चरन सरोज निहारहिं।।
- RCM 7.17.5Open verse →
तब प्रभु भूषन बसन मगाए। नाना रंग अनूप सुहाए।।
अर्थ · Hindi
तब प्रभु भूषन बसन मगाए। नाना रंग अनूप सुहाए।।
- RCM 7.17.6Open verse →
सुग्रीवहि प्रथमहिं पहिराए। बसन भरत निज हाथ बनाए।।
अर्थ · Hindi
सुग्रीवहि प्रथमहिं पहिराए। बसन भरत निज हाथ बनाए।।
- RCM 7.17.7Open verse →
प्रभु प्रेरित लछिमन पहिराए। लंकापति रघुपति मन भाए।।
अर्थ · Hindi
प्रभु प्रेरित लछिमन पहिराए। लंकापति रघुपति मन भाए।।
- RCM 7.17.8Open verse →
अंगद बैठ रहा नहिं डोला। प्रीति देखि प्रभु ताहि न बोला।।
अर्थ · Hindi
अंगद बैठ रहा नहिं डोला। प्रीति देखि प्रभु ताहि न बोला।।
- RCM 7.18.1Open verse →
सुनु सर्बग्य कृपा सुख सिंधो। दीन दयाकर आरत बंधो।।
अर्थ · Hindi
सुनु सर्बग्य कृपा सुख सिंधो। दीन दयाकर आरत बंधो।।
- RCM 7.18.2Open verse →
मरती बेर नाथ मोहि बाली। गयउ तुम्हारेहि कोंछें घाली।।
अर्थ · Hindi
मरती बेर नाथ मोहि बाली। गयउ तुम्हारेहि कोंछें घाली।।
- RCM 7.18.3Open verse →
असरन सरन बिरदु संभारी। मोहि जनि तजहु भगत हितकारी।।
अर्थ · Hindi
असरन सरन बिरदु संभारी। मोहि जनि तजहु भगत हितकारी।।
- RCM 7.18.4Open verse →
मोरें तुम्ह प्रभु गुर पितु माता। जाउँ कहाँ तजि पद जलजाता।।
अर्थ · Hindi
मोरें तुम्ह प्रभु गुर पितु माता। जाउँ कहाँ तजि पद जलजाता।।
- RCM 7.18.5Open verse →
तुम्हहि बिचारि कहहु नरनाहा। प्रभु तजि भवन काज मम काहा।।
अर्थ · Hindi
तुम्हहि बिचारि कहहु नरनाहा। प्रभु तजि भवन काज मम काहा।।
- RCM 7.18.6Open verse →
बालक ग्यान बुद्धि बल हीना। राखहु सरन नाथ जन दीना।।
अर्थ · Hindi
बालक ग्यान बुद्धि बल हीना। राखहु सरन नाथ जन दीना।।
- RCM 7.18.7Open verse →
नीचि टहल गृह कै सब करिहउँ। पद पंकज बिलोकि भव तरिहउँ।।
अर्थ · Hindi
नीचि टहल गृह कै सब करिहउँ। पद पंकज बिलोकि भव तरिहउँ।।
- RCM 7.18.8Open verse →
अस कहि चरन परेउ प्रभु पाही। अब जनि नाथ कहहु गृह जाही।।
अर्थ · Hindi
अस कहि चरन परेउ प्रभु पाही। अब जनि नाथ कहहु गृह जाही।।
- RCM 7.19.1Open verse →
भरत अनुज सौमित्र समेता। पठवन चले भगत कृत चेता।।
अर्थ · Hindi
भरत अनुज सौमित्र समेता। पठवन चले भगत कृत चेता।।
- RCM 7.19.2Open verse →
अंगद हृदयँ प्रेम नहिं थोरा। फिरि फिरि चितव राम कीं ओरा।।
अर्थ · Hindi
अंगद हृदयँ प्रेम नहिं थोरा। फिरि फिरि चितव राम कीं ओरा।।
- RCM 7.19.3Open verse →
बार बार कर दंड प्रनामा। मन अस रहन कहहिं मोहि रामा।।
अर्थ · Hindi
बार बार कर दंड प्रनामा। मन अस रहन कहहिं मोहि रामा।।
- RCM 7.19.4Open verse →
राम बिलोकनि बोलनि चलनी। सुमिरि सुमिरि सोचत हँसि मिलनी।।
अर्थ · Hindi
राम बिलोकनि बोलनि चलनी। सुमिरि सुमिरि सोचत हँसि मिलनी।।
- RCM 7.19.5Open verse →
प्रभु रुख देखि बिनय बहु भाषी। चलेउ हृदयँ पद पंकज राखी।।
अर्थ · Hindi
प्रभु रुख देखि बिनय बहु भाषी। चलेउ हृदयँ पद पंकज राखी।।
- RCM 7.19.6Open verse →
अति आदर सब कपि पहुँचाए। भाइन्ह सहित भरत पुनि आए।।
अर्थ · Hindi
अति आदर सब कपि पहुँचाए। भाइन्ह सहित भरत पुनि आए।।
- RCM 7.19.7Open verse →
तब सुग्रीव चरन गहि नाना। भाँति बिनय कीन्हे हनुमाना।।
अर्थ · Hindi
तब सुग्रीव चरन गहि नाना। भाँति बिनय कीन्हे हनुमाना।।
- RCM 7.19.8Open verse →
दिन दस करि रघुपति पद सेवा। पुनि तव चरन देखिहउँ देवा।।
अर्थ · Hindi
दिन दस करि रघुपति पद सेवा। पुनि तव चरन देखिहउँ देवा।।
- RCM 7.19.9Open verse →
पुन्य पुंज तुम्ह पवनकुमारा। सेवहु जाइ कृपा आगारा।।
अर्थ · Hindi
पुन्य पुंज तुम्ह पवनकुमारा। सेवहु जाइ कृपा आगारा।।
- RCM 7.19.10Open verse →
अस कहि कपि सब चले तुरंता। अंगद कहइ सुनहु हनुमंता।।
अर्थ · Hindi
अस कहि कपि सब चले तुरंता। अंगद कहइ सुनहु हनुमंता।।
- RCM 7.20.1Open verse →
पुनि कृपाल लियो बोलि निषादा। दीन्हे भूषन बसन प्रसादा।।
अर्थ · Hindi
पुनि कृपाल लियो बोलि निषादा। दीन्हे भूषन बसन प्रसादा।।
- RCM 7.20.2Open verse →
जाहु भवन मम सुमिरन करेहू। मन क्रम बचन धर्म अनुसरेहू।।
अर्थ · Hindi
जाहु भवन मम सुमिरन करेहू। मन क्रम बचन धर्म अनुसरेहू।।
- RCM 7.20.3Open verse →
तुम्ह मम सखा भरत सम भ्राता। सदा रहेहु पुर आवत जाता।।
अर्थ · Hindi
तुम्ह मम सखा भरत सम भ्राता। सदा रहेहु पुर आवत जाता।।
- RCM 7.20.4Open verse →
बचन सुनत उपजा सुख भारी। परेउ चरन भरि लोचन बारी।।
अर्थ · Hindi
बचन सुनत उपजा सुख भारी। परेउ चरन भरि लोचन बारी।।
- RCM 7.20.5Open verse →
चरन नलिन उर धरि गृह आवा। प्रभु सुभाउ परिजनन्हि सुनावा।।
अर्थ · Hindi
चरन नलिन उर धरि गृह आवा। प्रभु सुभाउ परिजनन्हि सुनावा।।
- RCM 7.20.6Open verse →
रघुपति चरित देखि पुरबासी। पुनि पुनि कहहिं धन्य सुखरासी।।
अर्थ · Hindi
रघुपति चरित देखि पुरबासी। पुनि पुनि कहहिं धन्य सुखरासी।।
- RCM 7.20.7Open verse →
राम राज बैंठें त्रेलोका। हरषित भए गए सब सोका।।
अर्थ · Hindi
राम राज बैंठें त्रेलोका। हरषित भए गए सब सोका।।
- RCM 7.20.8Open verse →
बयरु न कर काहू सन कोई। राम प्रताप बिषमता खोई।।
अर्थ · Hindi
बयरु न कर काहू सन कोई। राम प्रताप बिषमता खोई।।
- RCM 7.21.1Open verse →
दैहिक दैविक भौतिक तापा। राम राज नहिं काहुहि ब्यापा।।
अर्थ · Hindi
दैहिक दैविक भौतिक तापा। राम राज नहिं काहुहि ब्यापा।।
- RCM 7.21.2Open verse →
सब नर करहिं परस्पर प्रीती। चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती।।
अर्थ · Hindi
सब नर करहिं परस्पर प्रीती। चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती।।
- RCM 7.21.3Open verse →
चारिउ चरन धर्म जग माहीं। पूरि रहा सपनेहुँ अघ नाहीं।।
अर्थ · Hindi
चारिउ चरन धर्म जग माहीं। पूरि रहा सपनेहुँ अघ नाहीं।।
- RCM 7.21.4Open verse →
राम भगति रत नर अरु नारी। सकल परम गति के अधिकारी।।
अर्थ · Hindi
राम भगति रत नर अरु नारी। सकल परम गति के अधिकारी।।
- RCM 7.21.5Open verse →
अल्पमृत्यु नहिं कवनिउ पीरा। सब सुंदर सब बिरुज सरीरा।।
अर्थ · Hindi
अल्पमृत्यु नहिं कवनिउ पीरा। सब सुंदर सब बिरुज सरीरा।।
- RCM 7.21.6Open verse →
नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना। नहिं कोउ अबुध न लच्छन हीना।।
अर्थ · Hindi
नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना। नहिं कोउ अबुध न लच्छन हीना।।
- RCM 7.21.7Open verse →
सब निर्दंभ धर्मरत पुनी। नर अरु नारि चतुर सब गुनी।।
अर्थ · Hindi
सब निर्दंभ धर्मरत पुनी। नर अरु नारि चतुर सब गुनी।।
- RCM 7.21.8Open verse →
सब गुनग्य पंडित सब ग्यानी। सब कृतग्य नहिं कपट सयानी।।
अर्थ · Hindi
सब गुनग्य पंडित सब ग्यानी। सब कृतग्य नहिं कपट सयानी।।
- RCM 7.22.1Open verse →
भूमि सप्त सागर मेखला। एक भूप रघुपति कोसला।।
अर्थ · Hindi
भूमि सप्त सागर मेखला। एक भूप रघुपति कोसला।।
- RCM 7.22.2Open verse →
भुअन अनेक रोम प्रति जासू। यह प्रभुता कछु बहुत न तासू।।
अर्थ · Hindi
भुअन अनेक रोम प्रति जासू। यह प्रभुता कछु बहुत न तासू।।
- RCM 7.22.3Open verse →
सो महिमा समुझत प्रभु केरी। यह बरनत हीनता घनेरी।।
अर्थ · Hindi
सो महिमा समुझत प्रभु केरी। यह बरनत हीनता घनेरी।।
- RCM 7.22.4Open verse →
सोउ महिमा खगेस जिन्ह जानी। फिरी एहिं चरित तिन्हहुँ रति मानी।।
अर्थ · Hindi
सोउ महिमा खगेस जिन्ह जानी। फिरी एहिं चरित तिन्हहुँ रति मानी।।
- RCM 7.22.5Open verse →
सोउ जाने कर फल यह लीला। कहहिं महा मुनिबर दमसीला।।
अर्थ · Hindi
सोउ जाने कर फल यह लीला। कहहिं महा मुनिबर दमसीला।।
- RCM 7.22.6Open verse →
राम राज कर सुख संपदा। बरनि न सकइ फनीस सारदा।।
अर्थ · Hindi
राम राज कर सुख संपदा। बरनि न सकइ फनीस सारदा।।
- RCM 7.22.7Open verse →
सब उदार सब पर उपकारी। बिप्र चरन सेवक नर नारी।।
अर्थ · Hindi
सब उदार सब पर उपकारी। बिप्र चरन सेवक नर नारी।।
- RCM 7.22.8Open verse →
एकनारि ब्रत रत सब झारी। ते मन बच क्रम पति हितकारी।।
अर्थ · Hindi
एकनारि ब्रत रत सब झारी। ते मन बच क्रम पति हितकारी।।
- RCM 7.23.1Open verse →
फूलहिं फरहिं सदा तरु कानन। रहहि एक सँग गज पंचानन।।
अर्थ · Hindi
फूलहिं फरहिं सदा तरु कानन। रहहि एक सँग गज पंचानन।।
- RCM 7.23.2Open verse →
खग मृग सहज बयरु बिसराई। सबन्हि परस्पर प्रीति बढ़ाई।।
अर्थ · Hindi
खग मृग सहज बयरु बिसराई। सबन्हि परस्पर प्रीति बढ़ाई।।
- RCM 7.23.3Open verse →
कूजहिं खग मृग नाना बृंदा। अभय चरहिं बन करहिं अनंदा।।
अर्थ · Hindi
कूजहिं खग मृग नाना बृंदा। अभय चरहिं बन करहिं अनंदा।।
- RCM 7.23.4Open verse →
सीतल सुरभि पवन बह मंदा। गूंजत अलि लै चलि मकरंदा।।
अर्थ · Hindi
सीतल सुरभि पवन बह मंदा। गूंजत अलि लै चलि मकरंदा।।
- RCM 7.23.5Open verse →
लता बिटप मागें मधु चवहीं। मनभावतो धेनु पय स्त्रवहीं।।
अर्थ · Hindi
लता बिटप मागें मधु चवहीं। मनभावतो धेनु पय स्त्रवहीं।।
- RCM 7.23.6Open verse →
ससि संपन्न सदा रह धरनी। त्रेताँ भइ कृतजुग कै करनी।।
अर्थ · Hindi
ससि संपन्न सदा रह धरनी। त्रेताँ भइ कृतजुग कै करनी।।
- RCM 7.23.7Open verse →
प्रगटीं गिरिन्ह बिबिध मनि खानी। जगदातमा भूप जग जानी।।
अर्थ · Hindi
प्रगटीं गिरिन्ह बिबिध मनि खानी। जगदातमा भूप जग जानी।।
- RCM 7.23.8Open verse →
सरिता सकल बहहिं बर बारी। सीतल अमल स्वाद सुखकारी।।
अर्थ · Hindi
सरिता सकल बहहिं बर बारी। सीतल अमल स्वाद सुखकारी।।
- RCM 7.23.9Open verse →
सागर निज मरजादाँ रहहीं। डारहिं रत्न तटन्हि नर लहहीं।।
अर्थ · Hindi
सागर निज मरजादाँ रहहीं। डारहिं रत्न तटन्हि नर लहहीं।।
- RCM 7.23.10Open verse →
सरसिज संकुल सकल तड़ागा। अति प्रसन्न दस दिसा बिभागा।।
अर्थ · Hindi
सरसिज संकुल सकल तड़ागा। अति प्रसन्न दस दिसा बिभागा।।
- RCM 7.24.1Open verse →
कोटिन्ह बाजिमेध प्रभु कीन्हे। दान अनेक द्विजन्ह कहँ दीन्हे।।
अर्थ · Hindi
कोटिन्ह बाजिमेध प्रभु कीन्हे। दान अनेक द्विजन्ह कहँ दीन्हे।।
- RCM 7.24.2Open verse →
श्रुति पथ पालक धर्म धुरंधर। गुनातीत अरु भोग पुरंदर।।
अर्थ · Hindi
श्रुति पथ पालक धर्म धुरंधर। गुनातीत अरु भोग पुरंदर।।
- RCM 7.24.3Open verse →
पति अनुकूल सदा रह सीता। सोभा खानि सुसील बिनीता।।
अर्थ · Hindi
पति अनुकूल सदा रह सीता। सोभा खानि सुसील बिनीता।।
- RCM 7.24.4Open verse →
जानति कृपासिंधु प्रभुताई। सेवति चरन कमल मन लाई।।
अर्थ · Hindi
जानति कृपासिंधु प्रभुताई। सेवति चरन कमल मन लाई।।
- RCM 7.24.5Open verse →
जद्यपि गृहँ सेवक सेवकिनी। बिपुल सदा सेवा बिधि गुनी।।
अर्थ · Hindi
जद्यपि गृहँ सेवक सेवकिनी। बिपुल सदा सेवा बिधि गुनी।।
- RCM 7.24.6Open verse →
निज कर गृह परिचरजा करई। रामचंद्र आयसु अनुसरई।।
अर्थ · Hindi
निज कर गृह परिचरजा करई। रामचंद्र आयसु अनुसरई।।
- RCM 7.24.7Open verse →
जेहि बिधि कृपासिंधु सुख मानइ। सोइ कर श्री सेवा बिधि जानइ।।
अर्थ · Hindi
जेहि बिधि कृपासिंधु सुख मानइ। सोइ कर श्री सेवा बिधि जानइ।।
- RCM 7.24.8Open verse →
कौसल्यादि सासु गृह माहीं। सेवइ सबन्हि मान मद नाहीं।।
अर्थ · Hindi
कौसल्यादि सासु गृह माहीं। सेवइ सबन्हि मान मद नाहीं।।
- RCM 7.24.9Open verse →
उमा रमा ब्रह्मादि बंदिता। जगदंबा संततमनिंदिता।।
अर्थ · Hindi
उमा रमा ब्रह्मादि बंदिता। जगदंबा संततमनिंदिता।।
- RCM 7.25.1Open verse →
सेवहिं सानकूल सब भाई। राम चरन रति अति अधिकाई।।
अर्थ · Hindi
सेवहिं सानकूल सब भाई। राम चरन रति अति अधिकाई।।
- RCM 7.25.2Open verse →
प्रभु मुख कमल बिलोकत रहहीं। कबहुँ कृपाल हमहि कछु कहहीं।।
अर्थ · Hindi
प्रभु मुख कमल बिलोकत रहहीं। कबहुँ कृपाल हमहि कछु कहहीं।।
- RCM 7.25.3Open verse →
राम करहिं भ्रातन्ह पर प्रीती। नाना भाँति सिखावहिं नीती।।
अर्थ · Hindi
राम करहिं भ्रातन्ह पर प्रीती। नाना भाँति सिखावहिं नीती।।
- RCM 7.25.4Open verse →
हरषित रहहिं नगर के लोगा। करहिं सकल सुर दुर्लभ भोगा।।
अर्थ · Hindi
हरषित रहहिं नगर के लोगा। करहिं सकल सुर दुर्लभ भोगा।।
- RCM 7.25.5Open verse →
अहनिसि बिधिहि मनावत रहहीं। श्रीरघुबीर चरन रति चहहीं।।
अर्थ · Hindi
अहनिसि बिधिहि मनावत रहहीं। श्रीरघुबीर चरन रति चहहीं।।
- RCM 7.25.6Open verse →
दुइ सुत सुन्दर सीताँ जाए। लव कुस बेद पुरानन्ह गाए।।
अर्थ · Hindi
दुइ सुत सुन्दर सीताँ जाए। लव कुस बेद पुरानन्ह गाए।।
- RCM 7.25.7Open verse →
दोउ बिजई बिनई गुन मंदिर। हरि प्रतिबिंब मनहुँ अति सुंदर।।
अर्थ · Hindi
दोउ बिजई बिनई गुन मंदिर। हरि प्रतिबिंब मनहुँ अति सुंदर।।
- RCM 7.25.8Open verse →
दुइ दुइ सुत सब भ्रातन्ह केरे। भए रूप गुन सील घनेरे।।
अर्थ · Hindi
दुइ दुइ सुत सब भ्रातन्ह केरे। भए रूप गुन सील घनेरे।।
- RCM 7.26.1Open verse →
प्रातकाल सरऊ करि मज्जन। बैठहिं सभाँ संग द्विज सज्जन।।
अर्थ · Hindi
प्रातकाल सरऊ करि मज्जन। बैठहिं सभाँ संग द्विज सज्जन।।
- RCM 7.26.2Open verse →
बेद पुरान बसिष्ट बखानहिं। सुनहिं राम जद्यपि सब जानहिं।।
अर्थ · Hindi
बेद पुरान बसिष्ट बखानहिं। सुनहिं राम जद्यपि सब जानहिं।।
- RCM 7.26.3Open verse →
अनुजन्ह संजुत भोजन करहीं। देखि सकल जननीं सुख भरहीं।।
अर्थ · Hindi
अनुजन्ह संजुत भोजन करहीं। देखि सकल जननीं सुख भरहीं।।
- RCM 7.26.4Open verse →
भरत सत्रुहन दोनउ भाई। सहित पवनसुत उपबन जाई।।
अर्थ · Hindi
भरत सत्रुहन दोनउ भाई। सहित पवनसुत उपबन जाई।।
- RCM 7.26.5Open verse →
बूझहिं बैठि राम गुन गाहा। कह हनुमान सुमति अवगाहा।।
अर्थ · Hindi
बूझहिं बैठि राम गुन गाहा। कह हनुमान सुमति अवगाहा।।
- RCM 7.26.6Open verse →
सुनत बिमल गुन अति सुख पावहिं। बहुरि बहुरि करि बिनय कहावहिं।।
अर्थ · Hindi
सुनत बिमल गुन अति सुख पावहिं। बहुरि बहुरि करि बिनय कहावहिं।।
- RCM 7.26.7Open verse →
सब कें गृह गृह होहिं पुराना। रामचरित पावन बिधि नाना।।
अर्थ · Hindi
सब कें गृह गृह होहिं पुराना। रामचरित पावन बिधि नाना।।
- RCM 7.26.8Open verse →
नर अरु नारि राम गुन गानहिं। करहिं दिवस निसि जात न जानहिं।।
अर्थ · Hindi
नर अरु नारि राम गुन गानहिं। करहिं दिवस निसि जात न जानहिं।।
- RCM 7.27.1Open verse →
नारदादि सनकादि मुनीसा। दरसन लागि कोसलाधीसा।।
अर्थ · Hindi
नारदादि सनकादि मुनीसा। दरसन लागि कोसलाधीसा।।
- RCM 7.27.2Open verse →
दिन प्रति सकल अजोध्या आवहिं। देखि नगरु बिरागु बिसरावहिं।।
अर्थ · Hindi
दिन प्रति सकल अजोध्या आवहिं। देखि नगरु बिरागु बिसरावहिं।।
- RCM 7.27.3Open verse →
जातरूप मनि रचित अटारीं। नाना रंग रुचिर गच ढारीं।।
अर्थ · Hindi
जातरूप मनि रचित अटारीं। नाना रंग रुचिर गच ढारीं।।
- RCM 7.27.4Open verse →
पुर चहुँ पास कोट अति सुंदर। रचे कँगूरा रंग रंग बर।।
अर्थ · Hindi
पुर चहुँ पास कोट अति सुंदर। रचे कँगूरा रंग रंग बर।।
- RCM 7.27.5Open verse →
नव ग्रह निकर अनीक बनाई। जनु घेरी अमरावति आई।।
अर्थ · Hindi
नव ग्रह निकर अनीक बनाई। जनु घेरी अमरावति आई।।
- RCM 7.27.6Open verse →
महि बहु रंग रचित गच काँचा। जो बिलोकि मुनिबर मन नाचा।।
अर्थ · Hindi
महि बहु रंग रचित गच काँचा। जो बिलोकि मुनिबर मन नाचा।।
- RCM 7.27.7Open verse →
धवल धाम ऊपर नभ चुंबत। कलस मनहुँ रबि ससि दुति निंदत।।
अर्थ · Hindi
धवल धाम ऊपर नभ चुंबत। कलस मनहुँ रबि ससि दुति निंदत।।
- RCM 7.27.8Open verse →
बहु मनि रचित झरोखा भ्राजहिं। गृह गृह प्रति मनि दीप बिराजहिं।।
अर्थ · Hindi
बहु मनि रचित झरोखा भ्राजहिं। गृह गृह प्रति मनि दीप बिराजहिं।।
- RCM 7.28.1Open verse →
सुमन बाटिका सबहिं लगाई। बिबिध भाँति करि जतन बनाई।।
अर्थ · Hindi
सुमन बाटिका सबहिं लगाई। बिबिध भाँति करि जतन बनाई।।
- RCM 7.28.2Open verse →
लता ललित बहु जाति सुहाई। फूलहिं सदा बंसत कि नाई।।
अर्थ · Hindi
लता ललित बहु जाति सुहाई। फूलहिं सदा बंसत कि नाई।।
- RCM 7.28.3Open verse →
गुंजत मधुकर मुखर मनोहर। मारुत त्रिबिध सदा बह सुंदर।।
अर्थ · Hindi
गुंजत मधुकर मुखर मनोहर। मारुत त्रिबिध सदा बह सुंदर।।
- RCM 7.28.4Open verse →
नाना खग बालकन्हि जिआए। बोलत मधुर उड़ात सुहाए।।
अर्थ · Hindi
नाना खग बालकन्हि जिआए। बोलत मधुर उड़ात सुहाए।।
- RCM 7.28.5Open verse →
मोर हंस सारस पारावत। भवननि पर सोभा अति पावत।।
अर्थ · Hindi
मोर हंस सारस पारावत। भवननि पर सोभा अति पावत।।
- RCM 7.28.6Open verse →
जहँ तहँ देखहिं निज परिछाहीं। बहु बिधि कूजहिं नृत्य कराहीं।।
अर्थ · Hindi
जहँ तहँ देखहिं निज परिछाहीं। बहु बिधि कूजहिं नृत्य कराहीं।।
- RCM 7.28.7Open verse →
सुक सारिका पढ़ावहिं बालक। कहहु राम रघुपति जनपालक।।
अर्थ · Hindi
सुक सारिका पढ़ावहिं बालक। कहहु राम रघुपति जनपालक।।
- RCM 7.28.8Open verse →
राज दुआर सकल बिधि चारू। बीथीं चौहट रूचिर बजारू।।
अर्थ · Hindi
राज दुआर सकल बिधि चारू। बीथीं चौहट रूचिर बजारू।।
- RCM 7.29.1Open verse →
दूरि फराक रुचिर सो घाटा। जहँ जल पिअहिं बाजि गज ठाटा।।
अर्थ · Hindi
दूरि फराक रुचिर सो घाटा। जहँ जल पिअहिं बाजि गज ठाटा।।
- RCM 7.29.2Open verse →
पनिघट परम मनोहर नाना। तहाँ न पुरुष करहिं अस्नाना।।
अर्थ · Hindi
पनिघट परम मनोहर नाना। तहाँ न पुरुष करहिं अस्नाना।।
- RCM 7.29.3Open verse →
राजघाट सब बिधि सुंदर बर। मज्जहिं तहाँ बरन चारिउ नर।।
अर्थ · Hindi
राजघाट सब बिधि सुंदर बर। मज्जहिं तहाँ बरन चारिउ नर।।
- RCM 7.29.4Open verse →
तीर तीर देवन्ह के मंदिर। चहुँ दिसि तिन्ह के उपबन सुंदर।।
अर्थ · Hindi
तीर तीर देवन्ह के मंदिर। चहुँ दिसि तिन्ह के उपबन सुंदर।।
- RCM 7.29.5Open verse →
कहुँ कहुँ सरिता तीर उदासी। बसहिं ग्यान रत मुनि संन्यासी।।
अर्थ · Hindi
कहुँ कहुँ सरिता तीर उदासी। बसहिं ग्यान रत मुनि संन्यासी।।
- RCM 7.29.6Open verse →
तीर तीर तुलसिका सुहाई। बृंद बृंद बहु मुनिन्ह लगाई।।
अर्थ · Hindi
तीर तीर तुलसिका सुहाई। बृंद बृंद बहु मुनिन्ह लगाई।।
- RCM 7.29.7Open verse →
पुर सोभा कछु बरनि न जाई। बाहेर नगर परम रुचिराई।।
अर्थ · Hindi
पुर सोभा कछु बरनि न जाई। बाहेर नगर परम रुचिराई।।
- RCM 7.29.8Open verse →
देखत पुरी अखिल अघ भागा। बन उपबन बापिका तड़ागा।।
अर्थ · Hindi
देखत पुरी अखिल अघ भागा। बन उपबन बापिका तड़ागा।।
- RCM 7.30.1Open verse →
जहँ तहँ नर रघुपति गुन गावहिं। बैठि परसपर इहइ सिखावहिं।।
अर्थ · Hindi
जहँ तहँ नर रघुपति गुन गावहिं। बैठि परसपर इहइ सिखावहिं।।
- RCM 7.30.2Open verse →
भजहु प्रनत प्रतिपालक रामहि। सोभा सील रूप गुन धामहि।।
अर्थ · Hindi
भजहु प्रनत प्रतिपालक रामहि। सोभा सील रूप गुन धामहि।।
- RCM 7.30.3Open verse →
जलज बिलोचन स्यामल गातहि। पलक नयन इव सेवक त्रातहि।।
अर्थ · Hindi
जलज बिलोचन स्यामल गातहि। पलक नयन इव सेवक त्रातहि।।
- RCM 7.30.4Open verse →
धृत सर रुचिर चाप तूनीरहि। संत कंज बन रबि रनधीरहि।।
अर्थ · Hindi
धृत सर रुचिर चाप तूनीरहि। संत कंज बन रबि रनधीरहि।।
- RCM 7.30.5Open verse →
काल कराल ब्याल खगराजहि। नमत राम अकाम ममता जहि।।
अर्थ · Hindi
काल कराल ब्याल खगराजहि। नमत राम अकाम ममता जहि।।
- RCM 7.30.6Open verse →
लोभ मोह मृगजूथ किरातहि। मनसिज करि हरि जन सुखदातहि।।
अर्थ · Hindi
लोभ मोह मृगजूथ किरातहि। मनसिज करि हरि जन सुखदातहि।।
- RCM 7.30.7Open verse →
संसय सोक निबिड़ तम भानुहि। दनुज गहन घन दहन कृसानुहि।।
अर्थ · Hindi
संसय सोक निबिड़ तम भानुहि। दनुज गहन घन दहन कृसानुहि।।
- RCM 7.30.8Open verse →
जनकसुता समेत रघुबीरहि। कस न भजहु भंजन भव भीरहि।।
अर्थ · Hindi
जनकसुता समेत रघुबीरहि। कस न भजहु भंजन भव भीरहि।।
- RCM 7.30.9Open verse →
बहु बासना मसक हिम रासिहि। सदा एकरस अज अबिनासिहि।।
अर्थ · Hindi
बहु बासना मसक हिम रासिहि। सदा एकरस अज अबिनासिहि।।
- RCM 7.30.10Open verse →
मुनि रंजन भंजन महि भारहि। तुलसिदास के प्रभुहि उदारहि।।
अर्थ · Hindi
मुनि रंजन भंजन महि भारहि। तुलसिदास के प्रभुहि उदारहि।।
- RCM 7.31.1Open verse →
जब ते राम प्रताप खगेसा। उदित भयउ अति प्रबल दिनेसा।।
अर्थ · Hindi
जब ते राम प्रताप खगेसा। उदित भयउ अति प्रबल दिनेसा।।
- RCM 7.31.2Open verse →
पूरि प्रकास रहेउ तिहुँ लोका। बहुतेन्ह सुख बहुतन मन सोका।।
अर्थ · Hindi
पूरि प्रकास रहेउ तिहुँ लोका। बहुतेन्ह सुख बहुतन मन सोका।।
- RCM 7.31.3Open verse →
जिन्हहि सोक ते कहउँ बखानी। प्रथम अबिद्या निसा नसानी।।
अर्थ · Hindi
जिन्हहि सोक ते कहउँ बखानी। प्रथम अबिद्या निसा नसानी।।
- RCM 7.31.4Open verse →
अघ उलूक जहँ तहाँ लुकाने। काम क्रोध कैरव सकुचाने।।
अर्थ · Hindi
अघ उलूक जहँ तहाँ लुकाने। काम क्रोध कैरव सकुचाने।।
- RCM 7.31.5Open verse →
बिबिध कर्म गुन काल सुभाऊ। ए चकोर सुख लहहिं न काऊ।।
अर्थ · Hindi
बिबिध कर्म गुन काल सुभाऊ। ए चकोर सुख लहहिं न काऊ।।
- RCM 7.31.6Open verse →
मत्सर मान मोह मद चोरा। इन्ह कर हुनर न कवनिहुँ ओरा।।
अर्थ · Hindi
मत्सर मान मोह मद चोरा। इन्ह कर हुनर न कवनिहुँ ओरा।।
- RCM 7.31.7Open verse →
धरम तड़ाग ग्यान बिग्याना। ए पंकज बिकसे बिधि नाना।।
अर्थ · Hindi
धरम तड़ाग ग्यान बिग्याना। ए पंकज बिकसे बिधि नाना।।
- RCM 7.31.8Open verse →
सुख संतोष बिराग बिबेका। बिगत सोक ए कोक अनेका।।
अर्थ · Hindi
सुख संतोष बिराग बिबेका। बिगत सोक ए कोक अनेका।।
- RCM 7.32.1Open verse →
भ्रातन्ह सहित रामु एक बारा। संग परम प्रिय पवनकुमारा।।
अर्थ · Hindi
भ्रातन्ह सहित रामु एक बारा। संग परम प्रिय पवनकुमारा।।
- RCM 7.32.2Open verse →
सुंदर उपबन देखन गए। सब तरु कुसुमित पल्लव नए।।
अर्थ · Hindi
सुंदर उपबन देखन गए। सब तरु कुसुमित पल्लव नए।।
- RCM 7.32.3Open verse →
जानि समय सनकादिक आए। तेज पुंज गुन सील सुहाए।।
अर्थ · Hindi
जानि समय सनकादिक आए। तेज पुंज गुन सील सुहाए।।
- RCM 7.32.4Open verse →
ब्रह्मानंद सदा लयलीना। देखत बालक बहुकालीना।।
अर्थ · Hindi
ब्रह्मानंद सदा लयलीना। देखत बालक बहुकालीना।।
- RCM 7.32.5Open verse →
रूप धरें जनु चारिउ बेदा। समदरसी मुनि बिगत बिभेदा।।
अर्थ · Hindi
रूप धरें जनु चारिउ बेदा। समदरसी मुनि बिगत बिभेदा।।
- RCM 7.32.6Open verse →
आसा बसन ब्यसन यह तिन्हहीं। रघुपति चरित होइ तहँ सुनहीं।।
अर्थ · Hindi
आसा बसन ब्यसन यह तिन्हहीं। रघुपति चरित होइ तहँ सुनहीं।।
- RCM 7.32.7Open verse →
तहाँ रहे सनकादि भवानी। जहँ घटसंभव मुनिबर ग्यानी।।
अर्थ · Hindi
तहाँ रहे सनकादि भवानी। जहँ घटसंभव मुनिबर ग्यानी।।
- RCM 7.32.8Open verse →
राम कथा मुनिबर बहु बरनी। ग्यान जोनि पावक जिमि अरनी।।
अर्थ · Hindi
राम कथा मुनिबर बहु बरनी। ग्यान जोनि पावक जिमि अरनी।।
- RCM 7.33.1Open verse →
कीन्ह दंडवत तीनिउँ भाई। सहित पवनसुत सुख अधिकाई।।
अर्थ · Hindi
कीन्ह दंडवत तीनिउँ भाई। सहित पवनसुत सुख अधिकाई।।
- RCM 7.33.2Open verse →
मुनि रघुपति छबि अतुल बिलोकी। भए मगन मन सके न रोकी।।
अर्थ · Hindi
मुनि रघुपति छबि अतुल बिलोकी। भए मगन मन सके न रोकी।।
- RCM 7.33.3Open verse →
स्यामल गात सरोरुह लोचन। सुंदरता मंदिर भव मोचन।।
अर्थ · Hindi
स्यामल गात सरोरुह लोचन। सुंदरता मंदिर भव मोचन।।
- RCM 7.33.4Open verse →
एकटक रहे निमेष न लावहिं। प्रभु कर जोरें सीस नवावहिं।।
अर्थ · Hindi
एकटक रहे निमेष न लावहिं। प्रभु कर जोरें सीस नवावहिं।।
- RCM 7.33.5Open verse →
तिन्ह कै दसा देखि रघुबीरा। स्त्रवत नयन जल पुलक सरीरा।।
अर्थ · Hindi
तिन्ह कै दसा देखि रघुबीरा। स्त्रवत नयन जल पुलक सरीरा।।
- RCM 7.33.6Open verse →
कर गहि प्रभु मुनिबर बैठारे। परम मनोहर बचन उचारे।।
अर्थ · Hindi
कर गहि प्रभु मुनिबर बैठारे। परम मनोहर बचन उचारे।।
- RCM 7.33.7Open verse →
आजु धन्य मैं सुनहु मुनीसा। तुम्हरें दरस जाहिं अघ खीसा।।
अर्थ · Hindi
आजु धन्य मैं सुनहु मुनीसा। तुम्हरें दरस जाहिं अघ खीसा।।
- RCM 7.33.8Open verse →
बड़े भाग पाइब सतसंगा। बिनहिं प्रयास होहिं भव भंगा।।
अर्थ · Hindi
बड़े भाग पाइब सतसंगा। बिनहिं प्रयास होहिं भव भंगा।।
- RCM 7.34.1Open verse →
सुनि प्रभु बचन हरषि मुनि चारी। पुलकित तन अस्तुति अनुसारी।।
अर्थ · Hindi
सुनि प्रभु बचन हरषि मुनि चारी। पुलकित तन अस्तुति अनुसारी।।
- RCM 7.34.2Open verse →
जय भगवंत अनंत अनामय। अनघ अनेक एक करुनामय।।
अर्थ · Hindi
जय भगवंत अनंत अनामय। अनघ अनेक एक करुनामय।।
- RCM 7.34.3Open verse →
जय निर्गुन जय जय गुन सागर। सुख मंदिर सुंदर अति नागर।।
अर्थ · Hindi
जय निर्गुन जय जय गुन सागर। सुख मंदिर सुंदर अति नागर।।
- RCM 7.34.4Open verse →
जय इंदिरा रमन जय भूधर। अनुपम अज अनादि सोभाकर।।
अर्थ · Hindi
जय इंदिरा रमन जय भूधर। अनुपम अज अनादि सोभाकर।।
- RCM 7.34.5Open verse →
ग्यान निधान अमान मानप्रद। पावन सुजस पुरान बेद बद।।
अर्थ · Hindi
ग्यान निधान अमान मानप्रद। पावन सुजस पुरान बेद बद।।
- RCM 7.34.6Open verse →
तग्य कृतग्य अग्यता भंजन। नाम अनेक अनाम निरंजन।।
अर्थ · Hindi
तग्य कृतग्य अग्यता भंजन। नाम अनेक अनाम निरंजन।।
- RCM 7.34.7Open verse →
सर्ब सर्बगत सर्ब उरालय। बससि सदा हम कहुँ परिपालय।।
अर्थ · Hindi
सर्ब सर्बगत सर्ब उरालय। बससि सदा हम कहुँ परिपालय।।
- RCM 7.34.8Open verse →
द्वंद बिपति भव फंद बिभंजय। ह्रदि बसि राम काम मद गंजय।।
अर्थ · Hindi
द्वंद बिपति भव फंद बिभंजय। ह्रदि बसि राम काम मद गंजय।।
- RCM 7.35.1Open verse →
देहु भगति रघुपति अति पावनि। त्रिबिध ताप भव दाप नसावनि।।
अर्थ · Hindi
देहु भगति रघुपति अति पावनि। त्रिबिध ताप भव दाप नसावनि।।
- RCM 7.35.2Open verse →
प्रनत काम सुरधेनु कलपतरु। होइ प्रसन्न दीजै प्रभु यह बरु।।
अर्थ · Hindi
प्रनत काम सुरधेनु कलपतरु। होइ प्रसन्न दीजै प्रभु यह बरु।।
- RCM 7.35.3Open verse →
भव बारिधि कुंभज रघुनायक। सेवत सुलभ सकल सुख दायक।।
अर्थ · Hindi
भव बारिधि कुंभज रघुनायक। सेवत सुलभ सकल सुख दायक।।
- RCM 7.35.4Open verse →
मन संभव दारुन दुख दारय। दीनबंधु समता बिस्तारय।।
अर्थ · Hindi
मन संभव दारुन दुख दारय। दीनबंधु समता बिस्तारय।।
- RCM 7.35.5Open verse →
आस त्रास इरिषादि निवारक। बिनय बिबेक बिरति बिस्तारक।।
अर्थ · Hindi
आस त्रास इरिषादि निवारक। बिनय बिबेक बिरति बिस्तारक।।
- RCM 7.35.6Open verse →
भूप मौलि मन मंडन धरनी। देहि भगति संसृति सरि तरनी।।
अर्थ · Hindi
भूप मौलि मन मंडन धरनी। देहि भगति संसृति सरि तरनी।।
- RCM 7.35.7Open verse →
मुनि मन मानस हंस निरंतर। चरन कमल बंदित अज संकर।।
अर्थ · Hindi
मुनि मन मानस हंस निरंतर। चरन कमल बंदित अज संकर।।
- RCM 7.35.8Open verse →
रघुकुल केतु सेतु श्रुति रच्छक। काल करम सुभाउ गुन भच्छक।।
अर्थ · Hindi
रघुकुल केतु सेतु श्रुति रच्छक। काल करम सुभाउ गुन भच्छक।।
- RCM 7.35.9Open verse →
तारन तरन हरन सब दूषन। तुलसिदास प्रभु त्रिभुवन भूषन।।
अर्थ · Hindi
तारन तरन हरन सब दूषन। तुलसिदास प्रभु त्रिभुवन भूषन।।
- RCM 7.36.1Open verse →
सनकादिक बिधि लोक सिधाए। भ्रातन्ह राम चरन सिरु नाए।।
अर्थ · Hindi
सनकादिक बिधि लोक सिधाए। भ्रातन्ह राम चरन सिरु नाए।।
- RCM 7.36.2Open verse →
पूछत प्रभुहि सकल सकुचाहीं। चितवहिं सब मारुतसुत पाहीं।।
अर्थ · Hindi
पूछत प्रभुहि सकल सकुचाहीं। चितवहिं सब मारुतसुत पाहीं।।
- RCM 7.36.3Open verse →
सुनि चहहिं प्रभु मुख कै बानी। जो सुनि होइ सकल भ्रम हानी।।
अर्थ · Hindi
सुनि चहहिं प्रभु मुख कै बानी। जो सुनि होइ सकल भ्रम हानी।।
- RCM 7.36.4Open verse →
अंतरजामी प्रभु सभ जाना। बूझत कहहु काह हनुमाना।।
अर्थ · Hindi
अंतरजामी प्रभु सभ जाना। बूझत कहहु काह हनुमाना।।
- RCM 7.36.5Open verse →
जोरि पानि कह तब हनुमंता। सुनहु दीनदयाल भगवंता।।
अर्थ · Hindi
जोरि पानि कह तब हनुमंता। सुनहु दीनदयाल भगवंता।।
- RCM 7.36.6Open verse →
नाथ भरत कछु पूँछन चहहीं। प्रस्न करत मन सकुचत अहहीं।।
अर्थ · Hindi
नाथ भरत कछु पूँछन चहहीं। प्रस्न करत मन सकुचत अहहीं।।
- RCM 7.36.7Open verse →
तुम्ह जानहु कपि मोर सुभाऊ। भरतहि मोहि कछु अंतर काऊ।।
अर्थ · Hindi
तुम्ह जानहु कपि मोर सुभाऊ। भरतहि मोहि कछु अंतर काऊ।।
- RCM 7.36.8Open verse →
सुनि प्रभु बचन भरत गहे चरना। सुनहु नाथ प्रनतारति हरना।।
अर्थ · Hindi
सुनि प्रभु बचन भरत गहे चरना। सुनहु नाथ प्रनतारति हरना।।
- RCM 7.37.1Open verse →
करउँ कृपानिधि एक ढिठाई। मैं सेवक तुम्ह जन सुखदाई।।
अर्थ · Hindi
करउँ कृपानिधि एक ढिठाई। मैं सेवक तुम्ह जन सुखदाई।।
- RCM 7.37.2Open verse →
संतन्ह कै महिमा रघुराई। बहु बिधि बेद पुरानन्ह गाई।।
अर्थ · Hindi
संतन्ह कै महिमा रघुराई। बहु बिधि बेद पुरानन्ह गाई।।
- RCM 7.37.3Open verse →
श्रीमुख तुम्ह पुनि कीन्हि बड़ाई। तिन्ह पर प्रभुहि प्रीति अधिकाई।।
अर्थ · Hindi
श्रीमुख तुम्ह पुनि कीन्हि बड़ाई। तिन्ह पर प्रभुहि प्रीति अधिकाई।।
- RCM 7.37.4Open verse →
सुना चहउँ प्रभु तिन्ह कर लच्छन। कृपासिंधु गुन ग्यान बिचच्छन।।
अर्थ · Hindi
सुना चहउँ प्रभु तिन्ह कर लच्छन। कृपासिंधु गुन ग्यान बिचच्छन।।
- RCM 7.37.5Open verse →
संत असंत भेद बिलगाई। प्रनतपाल मोहि कहहु बुझाई।।
अर्थ · Hindi
संत असंत भेद बिलगाई। प्रनतपाल मोहि कहहु बुझाई।।
- RCM 7.37.6Open verse →
संतन्ह के लच्छन सुनु भ्राता। अगनित श्रुति पुरान बिख्याता।।
अर्थ · Hindi
संतन्ह के लच्छन सुनु भ्राता। अगनित श्रुति पुरान बिख्याता।।
- RCM 7.37.7Open verse →
संत असंतन्हि कै असि करनी। जिमि कुठार चंदन आचरनी।।
अर्थ · Hindi
संत असंतन्हि कै असि करनी। जिमि कुठार चंदन आचरनी।।
- RCM 7.37.8Open verse →
काटइ परसु मलय सुनु भाई। निज गुन देइ सुगंध बसाई।।
अर्थ · Hindi
काटइ परसु मलय सुनु भाई। निज गुन देइ सुगंध बसाई।।
- RCM 7.38.1Open verse →
बिषय अलंपट सील गुनाकर। पर दुख दुख सुख सुख देखे पर।।
अर्थ · Hindi
बिषय अलंपट सील गुनाकर। पर दुख दुख सुख सुख देखे पर।।
- RCM 7.38.2Open verse →
सम अभूतरिपु बिमद बिरागी। लोभामरष हरष भय त्यागी।।
अर्थ · Hindi
सम अभूतरिपु बिमद बिरागी। लोभामरष हरष भय त्यागी।।
- RCM 7.38.3Open verse →
कोमलचित दीनन्ह पर दाया। मन बच क्रम मम भगति अमाया।।
अर्थ · Hindi
कोमलचित दीनन्ह पर दाया। मन बच क्रम मम भगति अमाया।।
- RCM 7.38.4Open verse →
सबहि मानप्रद आपु अमानी। भरत प्रान सम मम ते प्रानी।।
अर्थ · Hindi
सबहि मानप्रद आपु अमानी। भरत प्रान सम मम ते प्रानी।।
- RCM 7.38.5Open verse →
बिगत काम मम नाम परायन। सांति बिरति बिनती मुदितायन।।
अर्थ · Hindi
बिगत काम मम नाम परायन। सांति बिरति बिनती मुदितायन।।
- RCM 7.38.6Open verse →
सीतलता सरलता मयत्री। द्विज पद प्रीति धर्म जनयत्री।।
अर्थ · Hindi
सीतलता सरलता मयत्री। द्विज पद प्रीति धर्म जनयत्री।।
- RCM 7.38.7Open verse →
ए सब लच्छन बसहिं जासु उर। जानेहु तात संत संतत फुर।।
अर्थ · Hindi
ए सब लच्छन बसहिं जासु उर। जानेहु तात संत संतत फुर।।
- RCM 7.38.8Open verse →
सम दम नियम नीति नहिं डोलहिं। परुष बचन कबहूँ नहिं बोलहिं।।
अर्थ · Hindi
सम दम नियम नीति नहिं डोलहिं। परुष बचन कबहूँ नहिं बोलहिं।।
- RCM 7.39.1Open verse →
सनहु असंतन्ह केर सुभाऊ। भूलेहुँ संगति करिअ न काऊ।।
अर्थ · Hindi
सनहु असंतन्ह केर सुभाऊ। भूलेहुँ संगति करिअ न काऊ।।
- RCM 7.39.2Open verse →
तिन्ह कर संग सदा दुखदाई। जिमि कलपहि घालइ हरहाई।।
अर्थ · Hindi
तिन्ह कर संग सदा दुखदाई। जिमि कलपहि घालइ हरहाई।।
- RCM 7.39.3Open verse →
खलन्ह हृदयँ अति ताप बिसेषी। जरहिं सदा पर संपति देखी।।
अर्थ · Hindi
खलन्ह हृदयँ अति ताप बिसेषी। जरहिं सदा पर संपति देखी।।
- RCM 7.39.4Open verse →
जहँ कहुँ निंदा सुनहिं पराई। हरषहिं मनहुँ परी निधि पाई।।
अर्थ · Hindi
जहँ कहुँ निंदा सुनहिं पराई। हरषहिं मनहुँ परी निधि पाई।।
- RCM 7.39.5Open verse →
काम क्रोध मद लोभ परायन। निर्दय कपटी कुटिल मलायन।।
अर्थ · Hindi
काम क्रोध मद लोभ परायन। निर्दय कपटी कुटिल मलायन।।
- RCM 7.39.6Open verse →
बयरु अकारन सब काहू सों। जो कर हित अनहित ताहू सों।।
अर्थ · Hindi
बयरु अकारन सब काहू सों। जो कर हित अनहित ताहू सों।।
- RCM 7.39.7Open verse →
झूठइ लेना झूठइ देना। झूठइ भोजन झूठ चबेना।।
अर्थ · Hindi
झूठइ लेना झूठइ देना। झूठइ भोजन झूठ चबेना।।
- RCM 7.39.8Open verse →
बोलहिं मधुर बचन जिमि मोरा। खाइ महा अति हृदय कठोरा।।
अर्थ · Hindi
बोलहिं मधुर बचन जिमि मोरा। खाइ महा अति हृदय कठोरा।।
- RCM 7.40.1Open verse →
लोभइ ओढ़न लोभइ डासन। सिस्त्रोदर पर जमपुर त्रास न।।
अर्थ · Hindi
लोभइ ओढ़न लोभइ डासन। सिस्त्रोदर पर जमपुर त्रास न।।
- RCM 7.40.2Open verse →
काहू की जौं सुनहिं बड़ाई। स्वास लेहिं जनु जूड़ी आई।।
अर्थ · Hindi
काहू की जौं सुनहिं बड़ाई। स्वास लेहिं जनु जूड़ी आई।।
- RCM 7.40.3Open verse →
जब काहू कै देखहिं बिपती। सुखी भए मानहुँ जग नृपती।।
अर्थ · Hindi
जब काहू कै देखहिं बिपती। सुखी भए मानहुँ जग नृपती।।
- RCM 7.40.4Open verse →
स्वारथ रत परिवार बिरोधी। लंपट काम लोभ अति क्रोधी।।
अर्थ · Hindi
स्वारथ रत परिवार बिरोधी। लंपट काम लोभ अति क्रोधी।।
- RCM 7.40.5Open verse →
मातु पिता गुर बिप्र न मानहिं। आपु गए अरु घालहिं आनहिं।।
अर्थ · Hindi
मातु पिता गुर बिप्र न मानहिं। आपु गए अरु घालहिं आनहिं।।
- RCM 7.40.6Open verse →
करहिं मोह बस द्रोह परावा। संत संग हरि कथा न भावा।।
अर्थ · Hindi
करहिं मोह बस द्रोह परावा। संत संग हरि कथा न भावा।।
- RCM 7.40.7Open verse →
अवगुन सिंधु मंदमति कामी। बेद बिदूषक परधन स्वामी।।
अर्थ · Hindi
अवगुन सिंधु मंदमति कामी। बेद बिदूषक परधन स्वामी।।
- RCM 7.40.8Open verse →
बिप्र द्रोह पर द्रोह बिसेषा। दंभ कपट जियँ धरें सुबेषा।।
अर्थ · Hindi
बिप्र द्रोह पर द्रोह बिसेषा। दंभ कपट जियँ धरें सुबेषा।।
- RCM 7.41.1Open verse →
पर हित सरिस धर्म नहिं भाई। पर पीड़ा सम नहिं अधमाई।।
अर्थ · Hindi
पर हित सरिस धर्म नहिं भाई। पर पीड़ा सम नहिं अधमाई।।
- RCM 7.41.2Open verse →
निर्नय सकल पुरान बेद कर। कहेउँ तात जानहिं कोबिद नर।।
अर्थ · Hindi
निर्नय सकल पुरान बेद कर। कहेउँ तात जानहिं कोबिद नर।।
- RCM 7.41.3Open verse →
नर सरीर धरि जे पर पीरा। करहिं ते सहहिं महा भव भीरा।।
अर्थ · Hindi
नर सरीर धरि जे पर पीरा। करहिं ते सहहिं महा भव भीरा।।
- RCM 7.41.4Open verse →
करहिं मोह बस नर अघ नाना। स्वारथ रत परलोक नसाना।।
अर्थ · Hindi
करहिं मोह बस नर अघ नाना। स्वारथ रत परलोक नसाना।।
- RCM 7.41.5Open verse →
कालरूप तिन्ह कहँ मैं भ्राता। सुभ अरु असुभ कर्म फल दाता।।
अर्थ · Hindi
कालरूप तिन्ह कहँ मैं भ्राता। सुभ अरु असुभ कर्म फल दाता।।
- RCM 7.41.6Open verse →
अस बिचारि जे परम सयाने। भजहिं मोहि संसृत दुख जाने।।
अर्थ · Hindi
अस बिचारि जे परम सयाने। भजहिं मोहि संसृत दुख जाने।।
- RCM 7.41.7Open verse →
त्यागहिं कर्म सुभासुभ दायक। भजहिं मोहि सुर नर मुनि नायक।।
अर्थ · Hindi
त्यागहिं कर्म सुभासुभ दायक। भजहिं मोहि सुर नर मुनि नायक।।
- RCM 7.41.8Open verse →
संत असंतन्ह के गुन भाषे। ते न परहिं भव जिन्ह लखि राखे।।
अर्थ · Hindi
संत असंतन्ह के गुन भाषे। ते न परहिं भव जिन्ह लखि राखे।।
- RCM 7.42.1Open verse →
श्रीमुख बचन सुनत सब भाई। हरषे प्रेम न हृदयँ समाई।।
अर्थ · Hindi
श्रीमुख बचन सुनत सब भाई। हरषे प्रेम न हृदयँ समाई।।
- RCM 7.42.2Open verse →
करहिं बिनय अति बारहिं बारा। हनूमान हियँ हरष अपारा।।
अर्थ · Hindi
करहिं बिनय अति बारहिं बारा। हनूमान हियँ हरष अपारा।।
- RCM 7.42.3Open verse →
पुनि रघुपति निज मंदिर गए। एहि बिधि चरित करत नित नए।।
अर्थ · Hindi
पुनि रघुपति निज मंदिर गए। एहि बिधि चरित करत नित नए।।
- RCM 7.42.4Open verse →
बार बार नारद मुनि आवहिं। चरित पुनीत राम के गावहिं।।
अर्थ · Hindi
बार बार नारद मुनि आवहिं। चरित पुनीत राम के गावहिं।।
- RCM 7.42.5Open verse →
नित नव चरन देखि मुनि जाहीं। ब्रह्मलोक सब कथा कहाहीं।।
अर्थ · Hindi
नित नव चरन देखि मुनि जाहीं। ब्रह्मलोक सब कथा कहाहीं।।
- RCM 7.42.6Open verse →
सुनि बिरंचि अतिसय सुख मानहिं। पुनि पुनि तात करहु गुन गानहिं।।
अर्थ · Hindi
सुनि बिरंचि अतिसय सुख मानहिं। पुनि पुनि तात करहु गुन गानहिं।।
- RCM 7.42.7Open verse →
सनकादिक नारदहि सराहहिं। जद्यपि ब्रह्म निरत मुनि आहहिं।।
अर्थ · Hindi
सनकादिक नारदहि सराहहिं। जद्यपि ब्रह्म निरत मुनि आहहिं।।
- RCM 7.42.8Open verse →
सुनि गुन गान समाधि बिसारी।। सादर सुनहिं परम अधिकारी।।
अर्थ · Hindi
सुनि गुन गान समाधि बिसारी।। सादर सुनहिं परम अधिकारी।।
- RCM 7.43.1Open verse →
एक बार रघुनाथ बोलाए। गुर द्विज पुरबासी सब आए।।
अर्थ · Hindi
एक बार रघुनाथ बोलाए। गुर द्विज पुरबासी सब आए।।
- RCM 7.43.2Open verse →
बैठे गुर मुनि अरु द्विज सज्जन। बोले बचन भगत भव भंजन।।
अर्थ · Hindi
बैठे गुर मुनि अरु द्विज सज्जन। बोले बचन भगत भव भंजन।।
- RCM 7.43.3Open verse →
सनहु सकल पुरजन मम बानी। कहउँ न कछु ममता उर आनी।।
अर्थ · Hindi
सनहु सकल पुरजन मम बानी। कहउँ न कछु ममता उर आनी।।
- RCM 7.43.4Open verse →
नहिं अनीति नहिं कछु प्रभुताई। सुनहु करहु जो तुम्हहि सोहाई।।
अर्थ · Hindi
नहिं अनीति नहिं कछु प्रभुताई। सुनहु करहु जो तुम्हहि सोहाई।।
- RCM 7.43.5Open verse →
सोइ सेवक प्रियतम मम सोई। मम अनुसासन मानै जोई।।
अर्थ · Hindi
सोइ सेवक प्रियतम मम सोई। मम अनुसासन मानै जोई।।
- RCM 7.43.6Open verse →
जौं अनीति कछु भाषौं भाई। तौं मोहि बरजहु भय बिसराई।।
अर्थ · Hindi
जौं अनीति कछु भाषौं भाई। तौं मोहि बरजहु भय बिसराई।।
- RCM 7.43.7Open verse →
बड़ें भाग मानुष तनु पावा। सुर दुर्लभ सब ग्रंथिन्ह गावा।।
अर्थ · Hindi
बड़ें भाग मानुष तनु पावा। सुर दुर्लभ सब ग्रंथिन्ह गावा।।
- RCM 7.43.8Open verse →
साधन धाम मोच्छ कर द्वारा। पाइ न जेहिं परलोक सँवारा।।
अर्थ · Hindi
साधन धाम मोच्छ कर द्वारा। पाइ न जेहिं परलोक सँवारा।।
- RCM 7.44.1Open verse →
एहि तन कर फल बिषय न भाई। स्वर्गउ स्वल्प अंत दुखदाई।।
अर्थ · Hindi
एहि तन कर फल बिषय न भाई। स्वर्गउ स्वल्प अंत दुखदाई।।
- RCM 7.44.2Open verse →
नर तनु पाइ बिषयँ मन देहीं। पलटि सुधा ते सठ बिष लेहीं।।
अर्थ · Hindi
नर तनु पाइ बिषयँ मन देहीं। पलटि सुधा ते सठ बिष लेहीं।।
- RCM 7.44.3Open verse →
ताहि कबहुँ भल कहइ न कोई। गुंजा ग्रहइ परस मनि खोई।।
अर्थ · Hindi
ताहि कबहुँ भल कहइ न कोई। गुंजा ग्रहइ परस मनि खोई।।
- RCM 7.44.4Open verse →
आकर चारि लच्छ चौरासी। जोनि भ्रमत यह जिव अबिनासी।।
अर्थ · Hindi
आकर चारि लच्छ चौरासी। जोनि भ्रमत यह जिव अबिनासी।।
- RCM 7.44.5Open verse →
फिरत सदा माया कर प्रेरा। काल कर्म सुभाव गुन घेरा।।
अर्थ · Hindi
फिरत सदा माया कर प्रेरा। काल कर्म सुभाव गुन घेरा।।
- RCM 7.44.6Open verse →
कबहुँक करि करुना नर देही। देत ईस बिनु हेतु सनेही।।
अर्थ · Hindi
कबहुँक करि करुना नर देही। देत ईस बिनु हेतु सनेही।।
- RCM 7.44.7Open verse →
नर तनु भव बारिधि कहुँ बेरो। सन्मुख मरुत अनुग्रह मेरो।।
अर्थ · Hindi
नर तनु भव बारिधि कहुँ बेरो। सन्मुख मरुत अनुग्रह मेरो।।
- RCM 7.44.8Open verse →
करनधार सदगुर दृढ़ नावा। दुर्लभ साज सुलभ करि पावा।।
अर्थ · Hindi
करनधार सदगुर दृढ़ नावा। दुर्लभ साज सुलभ करि पावा।।
- RCM 7.45.1Open verse →
जौं परलोक इहाँ सुख चहहू। सुनि मम बचन ह्रृदयँ दृढ़ गहहू।।
अर्थ · Hindi
जौं परलोक इहाँ सुख चहहू। सुनि मम बचन ह्रृदयँ दृढ़ गहहू।।
- RCM 7.45.2Open verse →
सुलभ सुखद मारग यह भाई। भगति मोरि पुरान श्रुति गाई।।
अर्थ · Hindi
सुलभ सुखद मारग यह भाई। भगति मोरि पुरान श्रुति गाई।।
- RCM 7.45.3Open verse →
ग्यान अगम प्रत्यूह अनेका। साधन कठिन न मन कहुँ टेका।।
अर्थ · Hindi
ग्यान अगम प्रत्यूह अनेका। साधन कठिन न मन कहुँ टेका।।
- RCM 7.45.4Open verse →
करत कष्ट बहु पावइ कोऊ। भक्ति हीन मोहि प्रिय नहिं सोऊ।।
अर्थ · Hindi
करत कष्ट बहु पावइ कोऊ। भक्ति हीन मोहि प्रिय नहिं सोऊ।।
- RCM 7.45.5Open verse →
भक्ति सुतंत्र सकल सुख खानी। बिनु सतसंग न पावहिं प्रानी।।
अर्थ · Hindi
भक्ति सुतंत्र सकल सुख खानी। बिनु सतसंग न पावहिं प्रानी।।
- RCM 7.45.6Open verse →
पुन्य पुंज बिनु मिलहिं न संता। सतसंगति संसृति कर अंता।।
अर्थ · Hindi
पुन्य पुंज बिनु मिलहिं न संता। सतसंगति संसृति कर अंता।।
- RCM 7.45.7Open verse →
पुन्य एक जग महुँ नहिं दूजा। मन क्रम बचन बिप्र पद पूजा।।
अर्थ · Hindi
पुन्य एक जग महुँ नहिं दूजा। मन क्रम बचन बिप्र पद पूजा।।
- RCM 7.45.8Open verse →
सानुकूल तेहि पर मुनि देवा। जो तजि कपटु करइ द्विज सेवा।।
अर्थ · Hindi
सानुकूल तेहि पर मुनि देवा। जो तजि कपटु करइ द्विज सेवा।।
- RCM 7.46.1Open verse →
कहहु भगति पथ कवन प्रयासा। जोग न मख जप तप उपवासा।।
अर्थ · Hindi
कहहु भगति पथ कवन प्रयासा। जोग न मख जप तप उपवासा।।
- RCM 7.46.2Open verse →
सरल सुभाव न मन कुटिलाई। जथा लाभ संतोष सदाई।।
अर्थ · Hindi
सरल सुभाव न मन कुटिलाई। जथा लाभ संतोष सदाई।।
- RCM 7.46.3Open verse →
मोर दास कहाइ नर आसा। करइ तौ कहहु कहा बिस्वासा।।
अर्थ · Hindi
मोर दास कहाइ नर आसा। करइ तौ कहहु कहा बिस्वासा।।
- RCM 7.46.4Open verse →
बहुत कहउँ का कथा बढ़ाई। एहि आचरन बस्य मैं भाई।।
अर्थ · Hindi
बहुत कहउँ का कथा बढ़ाई। एहि आचरन बस्य मैं भाई।।
- RCM 7.46.5Open verse →
बैर न बिग्रह आस न त्रासा। सुखमय ताहि सदा सब आसा।।
अर्थ · Hindi
बैर न बिग्रह आस न त्रासा। सुखमय ताहि सदा सब आसा।।
- RCM 7.46.6Open verse →
अनारंभ अनिकेत अमानी। अनघ अरोष दच्छ बिग्यानी।।
अर्थ · Hindi
अनारंभ अनिकेत अमानी। अनघ अरोष दच्छ बिग्यानी।।
- RCM 7.46.7Open verse →
प्रीति सदा सज्जन संसर्गा। तृन सम बिषय स्वर्ग अपबर्गा।।
अर्थ · Hindi
प्रीति सदा सज्जन संसर्गा। तृन सम बिषय स्वर्ग अपबर्गा।।
- RCM 7.46.8Open verse →
भगति पच्छ हठ नहिं सठताई। दुष्ट तर्क सब दूरि बहाई।।
अर्थ · Hindi
भगति पच्छ हठ नहिं सठताई। दुष्ट तर्क सब दूरि बहाई।।
- RCM 7.47.1Open verse →
सुनत सुधासम बचन राम के। गहे सबनि पद कृपाधाम के।।
अर्थ · Hindi
सुनत सुधासम बचन राम के। गहे सबनि पद कृपाधाम के।।
- RCM 7.47.2Open verse →
जननि जनक गुर बंधु हमारे। कृपा निधान प्रान ते प्यारे।।
अर्थ · Hindi
जननि जनक गुर बंधु हमारे। कृपा निधान प्रान ते प्यारे।।
- RCM 7.47.3Open verse →
तनु धनु धाम राम हितकारी। सब बिधि तुम्ह प्रनतारति हारी।।
अर्थ · Hindi
तनु धनु धाम राम हितकारी। सब बिधि तुम्ह प्रनतारति हारी।।
- RCM 7.47.4Open verse →
असि सिख तुम्ह बिनु देइ न कोऊ। मातु पिता स्वारथ रत ओऊ।।
अर्थ · Hindi
असि सिख तुम्ह बिनु देइ न कोऊ। मातु पिता स्वारथ रत ओऊ।।
- RCM 7.47.5Open verse →
हेतु रहित जग जुग उपकारी। तुम्ह तुम्हार सेवक असुरारी।।
अर्थ · Hindi
हेतु रहित जग जुग उपकारी। तुम्ह तुम्हार सेवक असुरारी।।
- RCM 7.47.6Open verse →
स्वारथ मीत सकल जग माहीं। सपनेहुँ प्रभु परमारथ नाहीं।।
अर्थ · Hindi
स्वारथ मीत सकल जग माहीं। सपनेहुँ प्रभु परमारथ नाहीं।।
- RCM 7.47.7Open verse →
सबके बचन प्रेम रस साने। सुनि रघुनाथ हृदयँ हरषाने।।
अर्थ · Hindi
सबके बचन प्रेम रस साने। सुनि रघुनाथ हृदयँ हरषाने।।
- RCM 7.47.8Open verse →
निज निज गृह गए आयसु पाई। बरनत प्रभु बतकही सुहाई।।
अर्थ · Hindi
निज निज गृह गए आयसु पाई। बरनत प्रभु बतकही सुहाई।।
- RCM 7.48.1Open verse →
एक बार बसिष्ट मुनि आए। जहाँ राम सुखधाम सुहाए।।
अर्थ · Hindi
एक बार बसिष्ट मुनि आए। जहाँ राम सुखधाम सुहाए।।
- RCM 7.48.2Open verse →
अति आदर रघुनायक कीन्हा। पद पखारि पादोदक लीन्हा।।
अर्थ · Hindi
अति आदर रघुनायक कीन्हा। पद पखारि पादोदक लीन्हा।।
- RCM 7.48.3Open verse →
राम सुनहु मुनि कह कर जोरी। कृपासिंधु बिनती कछु मोरी।।
अर्थ · Hindi
राम सुनहु मुनि कह कर जोरी। कृपासिंधु बिनती कछु मोरी।।
- RCM 7.48.4Open verse →
देखि देखि आचरन तुम्हारा। होत मोह मम हृदयँ अपारा।।
अर्थ · Hindi
देखि देखि आचरन तुम्हारा। होत मोह मम हृदयँ अपारा।।
- RCM 7.48.5Open verse →
महिमा अमित बेद नहिं जाना। मैं केहि भाँति कहउँ भगवाना।।
अर्थ · Hindi
महिमा अमित बेद नहिं जाना। मैं केहि भाँति कहउँ भगवाना।।
- RCM 7.48.6Open verse →
उपरोहित्य कर्म अति मंदा। बेद पुरान सुमृति कर निंदा।।
अर्थ · Hindi
उपरोहित्य कर्म अति मंदा। बेद पुरान सुमृति कर निंदा।।
- RCM 7.48.7Open verse →
जब न लेउँ मैं तब बिधि मोही। कहा लाभ आगें सुत तोही।।
अर्थ · Hindi
जब न लेउँ मैं तब बिधि मोही। कहा लाभ आगें सुत तोही।।
- RCM 7.48.8Open verse →
परमातमा ब्रह्म नर रूपा। होइहि रघुकुल भूषन भूपा।।
अर्थ · Hindi
परमातमा ब्रह्म नर रूपा। होइहि रघुकुल भूषन भूपा।।
- RCM 7.49.1Open verse →
जप तप नियम जोग निज धर्मा। श्रुति संभव नाना सुभ कर्मा।।
अर्थ · Hindi
जप तप नियम जोग निज धर्मा। श्रुति संभव नाना सुभ कर्मा।।
- RCM 7.49.2Open verse →
ग्यान दया दम तीरथ मज्जन। जहँ लगि धर्म कहत श्रुति सज्जन।।
अर्थ · Hindi
ग्यान दया दम तीरथ मज्जन। जहँ लगि धर्म कहत श्रुति सज्जन।।
- RCM 7.49.3Open verse →
आगम निगम पुरान अनेका। पढ़े सुने कर फल प्रभु एका।।
अर्थ · Hindi
आगम निगम पुरान अनेका। पढ़े सुने कर फल प्रभु एका।।
- RCM 7.49.4Open verse →
तब पद पंकज प्रीति निरंतर। सब साधन कर यह फल सुंदर।।
अर्थ · Hindi
तब पद पंकज प्रीति निरंतर। सब साधन कर यह फल सुंदर।।
- RCM 7.49.5Open verse →
छूटइ मल कि मलहि के धोएँ। घृत कि पाव कोइ बारि बिलोएँ।।
अर्थ · Hindi
छूटइ मल कि मलहि के धोएँ। घृत कि पाव कोइ बारि बिलोएँ।।
- RCM 7.49.6Open verse →
प्रेम भगति जल बिनु रघुराई। अभिअंतर मल कबहुँ न जाई।।
अर्थ · Hindi
प्रेम भगति जल बिनु रघुराई। अभिअंतर मल कबहुँ न जाई।।
- RCM 7.49.7Open verse →
सोइ सर्बग्य तग्य सोइ पंडित। सोइ गुन गृह बिग्यान अखंडित।।
अर्थ · Hindi
सोइ सर्बग्य तग्य सोइ पंडित। सोइ गुन गृह बिग्यान अखंडित।।
- RCM 7.49.8Open verse →
दच्छ सकल लच्छन जुत सोई। जाकें पद सरोज रति होई।।
अर्थ · Hindi
दच्छ सकल लच्छन जुत सोई। जाकें पद सरोज रति होई।।
- RCM 7.50.1Open verse →
अस कहि मुनि बसिष्ट गृह आए। कृपासिंधु के मन अति भाए।।
अर्थ · Hindi
अस कहि मुनि बसिष्ट गृह आए। कृपासिंधु के मन अति भाए।।
- RCM 7.50.2Open verse →
हनूमान भरतादिक भ्राता। संग लिए सेवक सुखदाता।।
अर्थ · Hindi
हनूमान भरतादिक भ्राता। संग लिए सेवक सुखदाता।।
- RCM 7.50.3Open verse →
पुनि कृपाल पुर बाहेर गए। गज रथ तुरग मगावत भए।।
अर्थ · Hindi
पुनि कृपाल पुर बाहेर गए। गज रथ तुरग मगावत भए।।
- RCM 7.50.4Open verse →
देखि कृपा करि सकल सराहे। दिए उचित जिन्ह जिन्ह तेइ चाहे।।
अर्थ · Hindi
देखि कृपा करि सकल सराहे। दिए उचित जिन्ह जिन्ह तेइ चाहे।।
- RCM 7.50.5Open verse →
हरन सकल श्रम प्रभु श्रम पाई। गए जहाँ सीतल अवँराई।।
अर्थ · Hindi
हरन सकल श्रम प्रभु श्रम पाई। गए जहाँ सीतल अवँराई।।
- RCM 7.50.6Open verse →
भरत दीन्ह निज बसन डसाई। बैठे प्रभु सेवहिं सब भाई।।
अर्थ · Hindi
भरत दीन्ह निज बसन डसाई। बैठे प्रभु सेवहिं सब भाई।।
- RCM 7.50.7Open verse →
मारुतसुत तब मारूत करई। पुलक बपुष लोचन जल भरई।।
अर्थ · Hindi
मारुतसुत तब मारूत करई। पुलक बपुष लोचन जल भरई।।
- RCM 7.50.8Open verse →
हनूमान सम नहिं बड़भागी। नहिं कोउ राम चरन अनुरागी।।
अर्थ · Hindi
हनूमान सम नहिं बड़भागी। नहिं कोउ राम चरन अनुरागी।।
- RCM 7.50.9Open verse →
गिरिजा जासु प्रीति सेवकाई। बार बार प्रभु निज मुख गाई।।
अर्थ · Hindi
गिरिजा जासु प्रीति सेवकाई। बार बार प्रभु निज मुख गाई।।
- RCM 7.51.1Open verse →
मामवलोकय पंकज लोचन। कृपा बिलोकनि सोच बिमोचन।।
अर्थ · Hindi
मामवलोकय पंकज लोचन। कृपा बिलोकनि सोच बिमोचन।।
- RCM 7.51.2Open verse →
नील तामरस स्याम काम अरि। हृदय कंज मकरंद मधुप हरि।।
अर्थ · Hindi
नील तामरस स्याम काम अरि। हृदय कंज मकरंद मधुप हरि।।
- RCM 7.51.3Open verse →
जातुधान बरूथ बल भंजन। मुनि सज्जन रंजन अघ गंजन।।
अर्थ · Hindi
जातुधान बरूथ बल भंजन। मुनि सज्जन रंजन अघ गंजन।।
- RCM 7.51.4Open verse →
भूसुर ससि नव बृंद बलाहक। असरन सरन दीन जन गाहक।।
अर्थ · Hindi
भूसुर ससि नव बृंद बलाहक। असरन सरन दीन जन गाहक।।
- RCM 7.51.5Open verse →
भुज बल बिपुल भार महि खंडित। खर दूषन बिराध बध पंडित।।
अर्थ · Hindi
भुज बल बिपुल भार महि खंडित। खर दूषन बिराध बध पंडित।।
- RCM 7.51.6Open verse →
रावनारि सुखरूप भूपबर। जय दसरथ कुल कुमुद सुधाकर।।
अर्थ · Hindi
रावनारि सुखरूप भूपबर। जय दसरथ कुल कुमुद सुधाकर।।
- RCM 7.51.7Open verse →
सुजस पुरान बिदित निगमागम। गावत सुर मुनि संत समागम।।
अर्थ · Hindi
सुजस पुरान बिदित निगमागम। गावत सुर मुनि संत समागम।।
- RCM 7.51.8Open verse →
कारुनीक ब्यलीक मद खंडन। सब बिधि कुसल कोसला मंडन।।
अर्थ · Hindi
कारुनीक ब्यलीक मद खंडन। सब बिधि कुसल कोसला मंडन।।
- RCM 7.51.9Open verse →
कलि मल मथन नाम ममताहन। तुलसीदास प्रभु पाहि प्रनत जन।।
अर्थ · Hindi
कलि मल मथन नाम ममताहन। तुलसीदास प्रभु पाहि प्रनत जन।।
- RCM 7.52.1Open verse →
गिरिजा सुनहु बिसद यह कथा। मैं सब कही मोरि मति जथा।।
अर्थ · Hindi
गिरिजा सुनहु बिसद यह कथा। मैं सब कही मोरि मति जथा।।
- RCM 7.52.2Open verse →
राम चरित सत कोटि अपारा। श्रुति सारदा न बरनै पारा।।
अर्थ · Hindi
राम चरित सत कोटि अपारा। श्रुति सारदा न बरनै पारा।।
- RCM 7.52.3Open verse →
राम अनंत अनंत गुनानी। जन्म कर्म अनंत नामानी।।
अर्थ · Hindi
राम अनंत अनंत गुनानी। जन्म कर्म अनंत नामानी।।
- RCM 7.52.4Open verse →
जल सीकर महि रज गनि जाहीं। रघुपति चरित न बरनि सिराहीं।।
अर्थ · Hindi
जल सीकर महि रज गनि जाहीं। रघुपति चरित न बरनि सिराहीं।।
- RCM 7.52.5Open verse →
बिमल कथा हरि पद दायनी। भगति होइ सुनि अनपायनी।।
अर्थ · Hindi
बिमल कथा हरि पद दायनी। भगति होइ सुनि अनपायनी।।
- RCM 7.52.6Open verse →
उमा कहिउँ सब कथा सुहाई। जो भुसुंडि खगपतिहि सुनाई।।
अर्थ · Hindi
उमा कहिउँ सब कथा सुहाई। जो भुसुंडि खगपतिहि सुनाई।।
- RCM 7.52.7Open verse →
कछुक राम गुन कहेउँ बखानी। अब का कहौं सो कहहु भवानी।।
अर्थ · Hindi
कछुक राम गुन कहेउँ बखानी। अब का कहौं सो कहहु भवानी।।
- RCM 7.52.8Open verse →
सुनि सुभ कथा उमा हरषानी। बोली अति बिनीत मृदु बानी।।
अर्थ · Hindi
सुनि सुभ कथा उमा हरषानी। बोली अति बिनीत मृदु बानी।।
- RCM 7.52.9Open verse →
धन्य धन्य मैं धन्य पुरारी। सुनेउँ राम गुन भव भय हारी।।
अर्थ · Hindi
धन्य धन्य मैं धन्य पुरारी। सुनेउँ राम गुन भव भय हारी।।
- RCM 7.53.1Open verse →
राम चरित जे सुनत अघाहीं। रस बिसेष जाना तिन्ह नाहीं।।
अर्थ · Hindi
राम चरित जे सुनत अघाहीं। रस बिसेष जाना तिन्ह नाहीं।।
- RCM 7.53.2Open verse →
जीवनमुक्त महामुनि जेऊ। हरि गुन सुनहीं निरंतर तेऊ।।
अर्थ · Hindi
जीवनमुक्त महामुनि जेऊ। हरि गुन सुनहीं निरंतर तेऊ।।
- RCM 7.53.3Open verse →
भव सागर चह पार जो पावा। राम कथा ता कहँ दृढ़ नावा।।
अर्थ · Hindi
भव सागर चह पार जो पावा। राम कथा ता कहँ दृढ़ नावा।।
- RCM 7.53.4Open verse →
बिषइन्ह कहँ पुनि हरि गुन ग्रामा। श्रवन सुखद अरु मन अभिरामा।।
अर्थ · Hindi
बिषइन्ह कहँ पुनि हरि गुन ग्रामा। श्रवन सुखद अरु मन अभिरामा।।
- RCM 7.53.5Open verse →
श्रवनवंत अस को जग माहीं। जाहि न रघुपति चरित सोहाहीं।।
अर्थ · Hindi
श्रवनवंत अस को जग माहीं। जाहि न रघुपति चरित सोहाहीं।।
- RCM 7.53.6Open verse →
ते जड़ जीव निजात्मक घाती। जिन्हहि न रघुपति कथा सोहाती।।
अर्थ · Hindi
ते जड़ जीव निजात्मक घाती। जिन्हहि न रघुपति कथा सोहाती।।
- RCM 7.53.7Open verse →
हरिचरित्र मानस तुम्ह गावा। सुनि मैं नाथ अमिति सुख पावा।।
अर्थ · Hindi
हरिचरित्र मानस तुम्ह गावा। सुनि मैं नाथ अमिति सुख पावा।।
- RCM 7.53.8Open verse →
तुम्ह जो कही यह कथा सुहाई। कागभसुंडि गरुड़ प्रति गाई।।
अर्थ · Hindi
तुम्ह जो कही यह कथा सुहाई। कागभसुंडि गरुड़ प्रति गाई।।
- RCM 7.54.1Open verse →
नर सहस्त्र महँ सुनहु पुरारी। कोउ एक होइ धर्म ब्रतधारी।।
अर्थ · Hindi
नर सहस्त्र महँ सुनहु पुरारी। कोउ एक होइ धर्म ब्रतधारी।।
- RCM 7.54.2Open verse →
धर्मसील कोटिक महँ कोई। बिषय बिमुख बिराग रत होई।।
अर्थ · Hindi
धर्मसील कोटिक महँ कोई। बिषय बिमुख बिराग रत होई।।
- RCM 7.54.3Open verse →
कोटि बिरक्त मध्य श्रुति कहई। सम्यक ग्यान सकृत कोउ लहई।।
अर्थ · Hindi
कोटि बिरक्त मध्य श्रुति कहई। सम्यक ग्यान सकृत कोउ लहई।।
- RCM 7.54.4Open verse →
ग्यानवंत कोटिक महँ कोऊ। जीवनमुक्त सकृत जग सोऊ।।
अर्थ · Hindi
ग्यानवंत कोटिक महँ कोऊ। जीवनमुक्त सकृत जग सोऊ।।
- RCM 7.54.5Open verse →
तिन्ह सहस्त्र महुँ सब सुख खानी। दुर्लभ ब्रह्मलीन बिग्यानी।।
अर्थ · Hindi
तिन्ह सहस्त्र महुँ सब सुख खानी। दुर्लभ ब्रह्मलीन बिग्यानी।।
- RCM 7.54.6Open verse →
धर्मसील बिरक्त अरु ग्यानी। जीवनमुक्त ब्रह्मपर प्रानी।।
अर्थ · Hindi
धर्मसील बिरक्त अरु ग्यानी। जीवनमुक्त ब्रह्मपर प्रानी।।
- RCM 7.54.7Open verse →
सब ते सो दुर्लभ सुरराया। राम भगति रत गत मद माया।।
अर्थ · Hindi
सब ते सो दुर्लभ सुरराया। राम भगति रत गत मद माया।।
- RCM 7.54.8Open verse →
सो हरिभगति काग किमि पाई। बिस्वनाथ मोहि कहहु बुझाई।।
अर्थ · Hindi
सो हरिभगति काग किमि पाई। बिस्वनाथ मोहि कहहु बुझाई।।
- RCM 7.55.1Open verse →
यह प्रभु चरित पवित्र सुहावा। कहहु कृपाल काग कहँ पावा।।
अर्थ · Hindi
यह प्रभु चरित पवित्र सुहावा। कहहु कृपाल काग कहँ पावा।।
- RCM 7.55.2Open verse →
तुम्ह केहि भाँति सुना मदनारी। कहहु मोहि अति कौतुक भारी।।
अर्थ · Hindi
तुम्ह केहि भाँति सुना मदनारी। कहहु मोहि अति कौतुक भारी।।
- RCM 7.55.3Open verse →
गरुड़ महाग्यानी गुन रासी। हरि सेवक अति निकट निवासी।।
अर्थ · Hindi
गरुड़ महाग्यानी गुन रासी। हरि सेवक अति निकट निवासी।।
- RCM 7.55.4Open verse →
तेहिं केहि हेतु काग सन जाई। सुनी कथा मुनि निकर बिहाई।।
अर्थ · Hindi
तेहिं केहि हेतु काग सन जाई। सुनी कथा मुनि निकर बिहाई।।
- RCM 7.55.5Open verse →
कहहु कवन बिधि भा संबादा। दोउ हरिभगत काग उरगादा।।
अर्थ · Hindi
कहहु कवन बिधि भा संबादा। दोउ हरिभगत काग उरगादा।।
- RCM 7.55.6Open verse →
गौरि गिरा सुनि सरल सुहाई। बोले सिव सादर सुख पाई।।
अर्थ · Hindi
गौरि गिरा सुनि सरल सुहाई। बोले सिव सादर सुख पाई।।
- RCM 7.55.7Open verse →
धन्य सती पावन मति तोरी। रघुपति चरन प्रीति नहिं थोरी।।
अर्थ · Hindi
धन्य सती पावन मति तोरी। रघुपति चरन प्रीति नहिं थोरी।।
- RCM 7.55.8Open verse →
सुनहु परम पुनीत इतिहासा। जो सुनि सकल लोक भ्रम नासा।।
अर्थ · Hindi
सुनहु परम पुनीत इतिहासा। जो सुनि सकल लोक भ्रम नासा।।
- RCM 7.55.9Open verse →
उपजइ राम चरन बिस्वासा। भव निधि तर नर बिनहिं प्रयासा।।
अर्थ · Hindi
उपजइ राम चरन बिस्वासा। भव निधि तर नर बिनहिं प्रयासा।।
- RCM 7.56.1Open verse →
मैं जिमि कथा सुनी भव मोचनि। सो प्रसंग सुनु सुमुखि सुलोचनि।।
अर्थ · Hindi
मैं जिमि कथा सुनी भव मोचनि। सो प्रसंग सुनु सुमुखि सुलोचनि।।
- RCM 7.56.2Open verse →
प्रथम दच्छ गृह तव अवतारा। सती नाम तब रहा तुम्हारा।।
अर्थ · Hindi
प्रथम दच्छ गृह तव अवतारा। सती नाम तब रहा तुम्हारा।।
- RCM 7.56.3Open verse →
दच्छ जग्य तब भा अपमाना। तुम्ह अति क्रोध तजे तब प्राना।।
अर्थ · Hindi
दच्छ जग्य तब भा अपमाना। तुम्ह अति क्रोध तजे तब प्राना।।
- RCM 7.56.4Open verse →
मम अनुचरन्ह कीन्ह मख भंगा। जानहु तुम्ह सो सकल प्रसंगा।।
अर्थ · Hindi
मम अनुचरन्ह कीन्ह मख भंगा। जानहु तुम्ह सो सकल प्रसंगा।।
- RCM 7.56.5Open verse →
तब अति सोच भयउ मन मोरें। दुखी भयउँ बियोग प्रिय तोरें।।
अर्थ · Hindi
तब अति सोच भयउ मन मोरें। दुखी भयउँ बियोग प्रिय तोरें।।
- RCM 7.56.6Open verse →
सुंदर बन गिरि सरित तड़ागा। कौतुक देखत फिरउँ बेरागा।।
अर्थ · Hindi
सुंदर बन गिरि सरित तड़ागा। कौतुक देखत फिरउँ बेरागा।।
- RCM 7.56.7Open verse →
गिरि सुमेर उत्तर दिसि दूरी। नील सैल एक सुन्दर भूरी।।
अर्थ · Hindi
गिरि सुमेर उत्तर दिसि दूरी। नील सैल एक सुन्दर भूरी।।
- RCM 7.56.8Open verse →
तासु कनकमय सिखर सुहाए। चारि चारु मोरे मन भाए।।
अर्थ · Hindi
तासु कनकमय सिखर सुहाए। चारि चारु मोरे मन भाए।।
- RCM 7.56.9Open verse →
तिन्ह पर एक एक बिटप बिसाला। बट पीपर पाकरी रसाला।।
अर्थ · Hindi
तिन्ह पर एक एक बिटप बिसाला। बट पीपर पाकरी रसाला।।
- RCM 7.56.10Open verse →
सैलोपरि सर सुंदर सोहा। मनि सोपान देखि मन मोहा।।
अर्थ · Hindi
सैलोपरि सर सुंदर सोहा। मनि सोपान देखि मन मोहा।।
- RCM 7.57.1Open verse →
तेहिं गिरि रुचिर बसइ खग सोई। तासु नास कल्पांत न होई।।
अर्थ · Hindi
तेहिं गिरि रुचिर बसइ खग सोई। तासु नास कल्पांत न होई।।
- RCM 7.57.2Open verse →
माया कृत गुन दोष अनेका। मोह मनोज आदि अबिबेका।।
अर्थ · Hindi
माया कृत गुन दोष अनेका। मोह मनोज आदि अबिबेका।।
- RCM 7.57.3Open verse →
रहे ब्यापि समस्त जग माहीं। तेहि गिरि निकट कबहुँ नहिं जाहीं।।
अर्थ · Hindi
रहे ब्यापि समस्त जग माहीं। तेहि गिरि निकट कबहुँ नहिं जाहीं।।
- RCM 7.57.4Open verse →
तहँ बसि हरिहि भजइ जिमि कागा। सो सुनु उमा सहित अनुरागा।।
अर्थ · Hindi
तहँ बसि हरिहि भजइ जिमि कागा। सो सुनु उमा सहित अनुरागा।।
- RCM 7.57.5Open verse →
पीपर तरु तर ध्यान सो धरई। जाप जग्य पाकरि तर करई।।
अर्थ · Hindi
पीपर तरु तर ध्यान सो धरई। जाप जग्य पाकरि तर करई।।
- RCM 7.57.6Open verse →
आँब छाहँ कर मानस पूजा। तजि हरि भजनु काजु नहिं दूजा।।
अर्थ · Hindi
आँब छाहँ कर मानस पूजा। तजि हरि भजनु काजु नहिं दूजा।।
- RCM 7.57.7Open verse →
बर तर कह हरि कथा प्रसंगा। आवहिं सुनहिं अनेक बिहंगा।।
अर्थ · Hindi
बर तर कह हरि कथा प्रसंगा। आवहिं सुनहिं अनेक बिहंगा।।
- RCM 7.57.8Open verse →
राम चरित बिचीत्र बिधि नाना। प्रेम सहित कर सादर गाना।।
अर्थ · Hindi
राम चरित बिचीत्र बिधि नाना। प्रेम सहित कर सादर गाना।।
- RCM 7.57.9Open verse →
सुनहिं सकल मति बिमल मराला। बसहिं निरंतर जे तेहिं ताला।।
अर्थ · Hindi
सुनहिं सकल मति बिमल मराला। बसहिं निरंतर जे तेहिं ताला।।
- RCM 7.57.10Open verse →
जब मैं जाइ सो कौतुक देखा। उर उपजा आनंद बिसेषा।।
अर्थ · Hindi
जब मैं जाइ सो कौतुक देखा। उर उपजा आनंद बिसेषा।।
- RCM 7.58.1Open verse →
गिरिजा कहेउँ सो सब इतिहासा। मैं जेहि समय गयउँ खग पासा।।
अर्थ · Hindi
गिरिजा कहेउँ सो सब इतिहासा। मैं जेहि समय गयउँ खग पासा।।
- RCM 7.58.2Open verse →
अब सो कथा सुनहु जेही हेतू। गयउ काग पहिं खग कुल केतू।।
अर्थ · Hindi
अब सो कथा सुनहु जेही हेतू। गयउ काग पहिं खग कुल केतू।।
- RCM 7.58.3Open verse →
जब रघुनाथ कीन्हि रन क्रीड़ा। समुझत चरित होति मोहि ब्रीड़ा।।
अर्थ · Hindi
जब रघुनाथ कीन्हि रन क्रीड़ा। समुझत चरित होति मोहि ब्रीड़ा।।
- RCM 7.58.4Open verse →
इंद्रजीत कर आपु बँधायो। तब नारद मुनि गरुड़ पठायो।।
अर्थ · Hindi
इंद्रजीत कर आपु बँधायो। तब नारद मुनि गरुड़ पठायो।।
- RCM 7.58.5Open verse →
बंधन काटि गयो उरगादा। उपजा हृदयँ प्रचंड बिषादा।।
अर्थ · Hindi
बंधन काटि गयो उरगादा। उपजा हृदयँ प्रचंड बिषादा।।
- RCM 7.58.6Open verse →
प्रभु बंधन समुझत बहु भाँती। करत बिचार उरग आराती।।
अर्थ · Hindi
प्रभु बंधन समुझत बहु भाँती। करत बिचार उरग आराती।।
- RCM 7.58.7Open verse →
ब्यापक ब्रह्म बिरज बागीसा। माया मोह पार परमीसा।।
अर्थ · Hindi
ब्यापक ब्रह्म बिरज बागीसा। माया मोह पार परमीसा।।
- RCM 7.58.8Open verse →
सो अवतार सुनेउँ जग माहीं। देखेउँ सो प्रभाव कछु नाहीं।।
अर्थ · Hindi
सो अवतार सुनेउँ जग माहीं। देखेउँ सो प्रभाव कछु नाहीं।।
- RCM 7.59.1Open verse →
नाना भाँति मनहि समुझावा। प्रगट न ग्यान हृदयँ भ्रम छावा।।
अर्थ · Hindi
नाना भाँति मनहि समुझावा। प्रगट न ग्यान हृदयँ भ्रम छावा।।
- RCM 7.59.2Open verse →
खेद खिन्न मन तर्क बढ़ाई। भयउ मोहबस तुम्हरिहिं नाई।।
अर्थ · Hindi
खेद खिन्न मन तर्क बढ़ाई। भयउ मोहबस तुम्हरिहिं नाई।।
- RCM 7.59.3Open verse →
ब्याकुल गयउ देवरिषि पाहीं। कहेसि जो संसय निज मन माहीं।।
अर्थ · Hindi
ब्याकुल गयउ देवरिषि पाहीं। कहेसि जो संसय निज मन माहीं।।
- RCM 7.59.4Open verse →
सुनि नारदहि लागि अति दाया। सुनु खग प्रबल राम कै माया।।
अर्थ · Hindi
सुनि नारदहि लागि अति दाया। सुनु खग प्रबल राम कै माया।।
- RCM 7.59.5Open verse →
जो ग्यानिन्ह कर चित अपहरई। बरिआई बिमोह मन करई।।
अर्थ · Hindi
जो ग्यानिन्ह कर चित अपहरई। बरिआई बिमोह मन करई।।
- RCM 7.59.6Open verse →
जेहिं बहु बार नचावा मोही। सोइ ब्यापी बिहंगपति तोही।।
अर्थ · Hindi
जेहिं बहु बार नचावा मोही। सोइ ब्यापी बिहंगपति तोही।।
- RCM 7.59.7Open verse →
महामोह उपजा उर तोरें। मिटिहि न बेगि कहें खग मोरें।।
अर्थ · Hindi
महामोह उपजा उर तोरें। मिटिहि न बेगि कहें खग मोरें।।
- RCM 7.59.8Open verse →
चतुरानन पहिं जाहु खगेसा। सोइ करेहु जेहि होइ निदेसा।।
अर्थ · Hindi
चतुरानन पहिं जाहु खगेसा। सोइ करेहु जेहि होइ निदेसा।।
- RCM 7.60.1Open verse →
तब खगपति बिरंचि पहिं गयऊ। निज संदेह सुनावत भयऊ।।
अर्थ · Hindi
तब खगपति बिरंचि पहिं गयऊ। निज संदेह सुनावत भयऊ।।
- RCM 7.60.2Open verse →
सुनि बिरंचि रामहि सिरु नावा। समुझि प्रताप प्रेम अति छावा।।
अर्थ · Hindi
सुनि बिरंचि रामहि सिरु नावा। समुझि प्रताप प्रेम अति छावा।।
- RCM 7.60.3Open verse →
मन महुँ करइ बिचार बिधाता। माया बस कबि कोबिद ग्याता।।
अर्थ · Hindi
मन महुँ करइ बिचार बिधाता। माया बस कबि कोबिद ग्याता।।
- RCM 7.60.4Open verse →
हरि माया कर अमिति प्रभावा। बिपुल बार जेहिं मोहि नचावा।।
अर्थ · Hindi
हरि माया कर अमिति प्रभावा। बिपुल बार जेहिं मोहि नचावा।।
- RCM 7.60.5Open verse →
अग जगमय जग मम उपराजा। नहिं आचरज मोह खगराजा।।
अर्थ · Hindi
अग जगमय जग मम उपराजा। नहिं आचरज मोह खगराजा।।
- RCM 7.60.6Open verse →
तब बोले बिधि गिरा सुहाई। जान महेस राम प्रभुताई।।
अर्थ · Hindi
तब बोले बिधि गिरा सुहाई। जान महेस राम प्रभुताई।।
- RCM 7.60.7Open verse →
बैनतेय संकर पहिं जाहू। तात अनत पूछहु जनि काहू।।
अर्थ · Hindi
बैनतेय संकर पहिं जाहू। तात अनत पूछहु जनि काहू।।
- RCM 7.60.8Open verse →
तहँ होइहि तव संसय हानी। चलेउ बिहंग सुनत बिधि बानी।।
अर्थ · Hindi
तहँ होइहि तव संसय हानी। चलेउ बिहंग सुनत बिधि बानी।।
- RCM 7.61.1Open verse →
तेहिं मम पद सादर सिरु नावा। पुनि आपन संदेह सुनावा।।
अर्थ · Hindi
तेहिं मम पद सादर सिरु नावा। पुनि आपन संदेह सुनावा।।
- RCM 7.61.2Open verse →
सुनि ता करि बिनती मृदु बानी। परेम सहित मैं कहेउँ भवानी।।
अर्थ · Hindi
सुनि ता करि बिनती मृदु बानी। परेम सहित मैं कहेउँ भवानी।।
- RCM 7.61.3Open verse →
मिलेहु गरुड़ मारग महँ मोही। कवन भाँति समुझावौं तोही।।
अर्थ · Hindi
मिलेहु गरुड़ मारग महँ मोही। कवन भाँति समुझावौं तोही।।
- RCM 7.61.4Open verse →
तबहि होइ सब संसय भंगा। जब बहु काल करिअ सतसंगा।।
अर्थ · Hindi
तबहि होइ सब संसय भंगा। जब बहु काल करिअ सतसंगा।।
- RCM 7.61.5Open verse →
सुनिअ तहाँ हरि कथा सुहाई। नाना भाँति मुनिन्ह जो गाई।।
अर्थ · Hindi
सुनिअ तहाँ हरि कथा सुहाई। नाना भाँति मुनिन्ह जो गाई।।
- RCM 7.61.6Open verse →
जेहि महुँ आदि मध्य अवसाना। प्रभु प्रतिपाद्य राम भगवाना।।
अर्थ · Hindi
जेहि महुँ आदि मध्य अवसाना। प्रभु प्रतिपाद्य राम भगवाना।।
- RCM 7.61.7Open verse →
नित हरि कथा होत जहँ भाई। पठवउँ तहाँ सुनहि तुम्ह जाई।।
अर्थ · Hindi
नित हरि कथा होत जहँ भाई। पठवउँ तहाँ सुनहि तुम्ह जाई।।
- RCM 7.61.8Open verse →
जाइहि सुनत सकल संदेहा। राम चरन होइहि अति नेहा।।
अर्थ · Hindi
जाइहि सुनत सकल संदेहा। राम चरन होइहि अति नेहा।।
- RCM 7.62.1Open verse →
मिलहिं न रघुपति बिनु अनुरागा। किएँ जोग तप ग्यान बिरागा।।
अर्थ · Hindi
मिलहिं न रघुपति बिनु अनुरागा। किएँ जोग तप ग्यान बिरागा।।
- RCM 7.62.2Open verse →
उत्तर दिसि सुंदर गिरि नीला। तहँ रह काकभुसुंडि सुसीला।।
अर्थ · Hindi
उत्तर दिसि सुंदर गिरि नीला। तहँ रह काकभुसुंडि सुसीला।।
- RCM 7.62.3Open verse →
राम भगति पथ परम प्रबीना। ग्यानी गुन गृह बहु कालीना।।
अर्थ · Hindi
राम भगति पथ परम प्रबीना। ग्यानी गुन गृह बहु कालीना।।
- RCM 7.62.4Open verse →
राम कथा सो कहइ निरंतर। सादर सुनहिं बिबिध बिहंगबर।।
अर्थ · Hindi
राम कथा सो कहइ निरंतर। सादर सुनहिं बिबिध बिहंगबर।।
- RCM 7.62.5Open verse →
जाइ सुनहु तहँ हरि गुन भूरी। होइहि मोह जनित दुख दूरी।।
अर्थ · Hindi
जाइ सुनहु तहँ हरि गुन भूरी। होइहि मोह जनित दुख दूरी।।
- RCM 7.62.6Open verse →
मैं जब तेहि सब कहा बुझाई। चलेउ हरषि मम पद सिरु नाई।।
अर्थ · Hindi
मैं जब तेहि सब कहा बुझाई। चलेउ हरषि मम पद सिरु नाई।।
- RCM 7.62.7Open verse →
ताते उमा न मैं समुझावा। रघुपति कृपाँ मरमु मैं पावा।।
अर्थ · Hindi
ताते उमा न मैं समुझावा। रघुपति कृपाँ मरमु मैं पावा।।
- RCM 7.62.8Open verse →
होइहि कीन्ह कबहुँ अभिमाना। सो खौवै चह कृपानिधाना।।
अर्थ · Hindi
होइहि कीन्ह कबहुँ अभिमाना। सो खौवै चह कृपानिधाना।।
- RCM 7.62.9Open verse →
कछु तेहि ते पुनि मैं नहिं राखा। समुझइ खग खगही कै भाषा।।
अर्थ · Hindi
कछु तेहि ते पुनि मैं नहिं राखा। समुझइ खग खगही कै भाषा।।
- RCM 7.62.10Open verse →
प्रभु माया बलवंत भवानी। जाहि न मोह कवन अस ग्यानी।।
अर्थ · Hindi
प्रभु माया बलवंत भवानी। जाहि न मोह कवन अस ग्यानी।।
- RCM 7.63.1Open verse →
गयउ गरुड़ जहँ बसइ भुसुंडा। मति अकुंठ हरि भगति अखंडा।।
अर्थ · Hindi
गयउ गरुड़ जहँ बसइ भुसुंडा। मति अकुंठ हरि भगति अखंडा।।
- RCM 7.63.2Open verse →
देखि सैल प्रसन्न मन भयऊ। माया मोह सोच सब गयऊ।।
अर्थ · Hindi
देखि सैल प्रसन्न मन भयऊ। माया मोह सोच सब गयऊ।।
- RCM 7.63.3Open verse →
करि तड़ाग मज्जन जलपाना। बट तर गयउ हृदयँ हरषाना।।
अर्थ · Hindi
करि तड़ाग मज्जन जलपाना। बट तर गयउ हृदयँ हरषाना।।
- RCM 7.63.4Open verse →
बृद्ध बृद्ध बिहंग तहँ आए। सुनै राम के चरित सुहाए।।
अर्थ · Hindi
बृद्ध बृद्ध बिहंग तहँ आए। सुनै राम के चरित सुहाए।।
- RCM 7.63.5Open verse →
कथा अरंभ करै सोइ चाहा। तेही समय गयउ खगनाहा।।
अर्थ · Hindi
कथा अरंभ करै सोइ चाहा। तेही समय गयउ खगनाहा।।
- RCM 7.63.6Open verse →
आवत देखि सकल खगराजा। हरषेउ बायस सहित समाजा।।
अर्थ · Hindi
आवत देखि सकल खगराजा। हरषेउ बायस सहित समाजा।।
- RCM 7.63.7Open verse →
अति आदर खगपति कर कीन्हा। स्वागत पूछि सुआसन दीन्हा।।
अर्थ · Hindi
अति आदर खगपति कर कीन्हा। स्वागत पूछि सुआसन दीन्हा।।
- RCM 7.63.8Open verse →
करि पूजा समेत अनुरागा। मधुर बचन तब बोलेउ कागा।।
अर्थ · Hindi
करि पूजा समेत अनुरागा। मधुर बचन तब बोलेउ कागा।।
- RCM 7.64.1Open verse →
सुनहु तात जेहि कारन आयउँ। सो सब भयउ दरस तव पायउँ।।
अर्थ · Hindi
सुनहु तात जेहि कारन आयउँ। सो सब भयउ दरस तव पायउँ।।
- RCM 7.64.2Open verse →
देखि परम पावन तव आश्रम। गयउ मोह संसय नाना भ्रम।।
अर्थ · Hindi
देखि परम पावन तव आश्रम। गयउ मोह संसय नाना भ्रम।।
- RCM 7.64.3Open verse →
अब श्रीराम कथा अति पावनि। सदा सुखद दुख पुंज नसावनि।।
अर्थ · Hindi
अब श्रीराम कथा अति पावनि। सदा सुखद दुख पुंज नसावनि।।
- RCM 7.64.4Open verse →
सादर तात सुनावहु मोही। बार बार बिनवउँ प्रभु तोही।।
अर्थ · Hindi
सादर तात सुनावहु मोही। बार बार बिनवउँ प्रभु तोही।।
- RCM 7.64.5Open verse →
सुनत गरुड़ कै गिरा बिनीता। सरल सुप्रेम सुखद सुपुनीता।।
अर्थ · Hindi
सुनत गरुड़ कै गिरा बिनीता। सरल सुप्रेम सुखद सुपुनीता।।
- RCM 7.64.6Open verse →
भयउ तासु मन परम उछाहा। लाग कहै रघुपति गुन गाहा।।
अर्थ · Hindi
भयउ तासु मन परम उछाहा। लाग कहै रघुपति गुन गाहा।।
- RCM 7.64.7Open verse →
प्रथमहिं अति अनुराग भवानी। रामचरित सर कहेसि बखानी।।
अर्थ · Hindi
प्रथमहिं अति अनुराग भवानी। रामचरित सर कहेसि बखानी।।
- RCM 7.64.8Open verse →
पुनि नारद कर मोह अपारा। कहेसि बहुरि रावन अवतारा।।
अर्थ · Hindi
पुनि नारद कर मोह अपारा। कहेसि बहुरि रावन अवतारा।।
- RCM 7.64.9Open verse →
प्रभु अवतार कथा पुनि गाई। तब सिसु चरित कहेसि मन लाई।।
अर्थ · Hindi
प्रभु अवतार कथा पुनि गाई। तब सिसु चरित कहेसि मन लाई।।
- RCM 7.65.1Open verse →
बहुरि राम अभिषेक प्रसंगा। पुनि नृप बचन राज रस भंगा।।
अर्थ · Hindi
बहुरि राम अभिषेक प्रसंगा। पुनि नृप बचन राज रस भंगा।।
- RCM 7.65.2Open verse →
पुरबासिन्ह कर बिरह बिषादा। कहेसि राम लछिमन संबादा।।
अर्थ · Hindi
पुरबासिन्ह कर बिरह बिषादा। कहेसि राम लछिमन संबादा।।
- RCM 7.65.3Open verse →
बिपिन गवन केवट अनुरागा। सुरसरि उतरि निवास प्रयागा।।
अर्थ · Hindi
बिपिन गवन केवट अनुरागा। सुरसरि उतरि निवास प्रयागा।।
- RCM 7.65.4Open verse →
बालमीक प्रभु मिलन बखाना। चित्रकूट जिमि बसे भगवाना।।
अर्थ · Hindi
बालमीक प्रभु मिलन बखाना। चित्रकूट जिमि बसे भगवाना।।
- RCM 7.65.5Open verse →
सचिवागवन नगर नृप मरना। भरतागवन प्रेम बहु बरना।।
अर्थ · Hindi
सचिवागवन नगर नृप मरना। भरतागवन प्रेम बहु बरना।।
- RCM 7.65.6Open verse →
करि नृप क्रिया संग पुरबासी। भरत गए जहँ प्रभु सुख रासी।।
अर्थ · Hindi
करि नृप क्रिया संग पुरबासी। भरत गए जहँ प्रभु सुख रासी।।
- RCM 7.65.7Open verse →
पुनि रघुपति बहु बिधि समुझाए। लै पादुका अवधपुर आए।।
अर्थ · Hindi
पुनि रघुपति बहु बिधि समुझाए। लै पादुका अवधपुर आए।।
- RCM 7.65.8Open verse →
भरत रहनि सुरपति सुत करनी। प्रभु अरु अत्रि भेंट पुनि बरनी।।
अर्थ · Hindi
भरत रहनि सुरपति सुत करनी। प्रभु अरु अत्रि भेंट पुनि बरनी।।
- RCM 7.66.1Open verse →
कहि दंडक बन पावनताई। गीध मइत्री पुनि तेहिं गाई।।
अर्थ · Hindi
कहि दंडक बन पावनताई। गीध मइत्री पुनि तेहिं गाई।।
- RCM 7.66.2Open verse →
पुनि प्रभु पंचवटीं कृत बासा। भंजी सकल मुनिन्ह की त्रासा।।
अर्थ · Hindi
पुनि प्रभु पंचवटीं कृत बासा। भंजी सकल मुनिन्ह की त्रासा।।
- RCM 7.66.3Open verse →
पुनि लछिमन उपदेस अनूपा। सूपनखा जिमि कीन्हि कुरूपा।।
अर्थ · Hindi
पुनि लछिमन उपदेस अनूपा। सूपनखा जिमि कीन्हि कुरूपा।।
- RCM 7.66.4Open verse →
खर दूषन बध बहुरि बखाना। जिमि सब मरमु दसानन जाना।।
अर्थ · Hindi
खर दूषन बध बहुरि बखाना। जिमि सब मरमु दसानन जाना।।
- RCM 7.66.5Open verse →
दसकंधर मारीच बतकहीं। जेहि बिधि भई सो सब तेहिं कही।।
अर्थ · Hindi
दसकंधर मारीच बतकहीं। जेहि बिधि भई सो सब तेहिं कही।।
- RCM 7.66.6Open verse →
पुनि माया सीता कर हरना। श्रीरघुबीर बिरह कछु बरना।।
अर्थ · Hindi
पुनि माया सीता कर हरना। श्रीरघुबीर बिरह कछु बरना।।
- RCM 7.66.7Open verse →
पुनि प्रभु गीध क्रिया जिमि कीन्ही। बधि कबंध सबरिहि गति दीन्ही।।
अर्थ · Hindi
पुनि प्रभु गीध क्रिया जिमि कीन्ही। बधि कबंध सबरिहि गति दीन्ही।।
- RCM 7.66.8Open verse →
बहुरि बिरह बरनत रघुबीरा। जेहि बिधि गए सरोबर तीरा।।
अर्थ · Hindi
बहुरि बिरह बरनत रघुबीरा। जेहि बिधि गए सरोबर तीरा।।
- RCM 7.67.1Open verse →
जेहि बिधि कपिपति कीस पठाए। सीता खोज सकल दिसि धाए।।
अर्थ · Hindi
जेहि बिधि कपिपति कीस पठाए। सीता खोज सकल दिसि धाए।।
- RCM 7.67.2Open verse →
बिबर प्रबेस कीन्ह जेहि भाँती। कपिन्ह बहोरि मिला संपाती।।
अर्थ · Hindi
बिबर प्रबेस कीन्ह जेहि भाँती। कपिन्ह बहोरि मिला संपाती।।
- RCM 7.67.3Open verse →
सुनि सब कथा समीरकुमारा। नाघत भयउ पयोधि अपारा।।
अर्थ · Hindi
सुनि सब कथा समीरकुमारा। नाघत भयउ पयोधि अपारा।।
- RCM 7.67.4Open verse →
लंकाँ कपि प्रबेस जिमि कीन्हा। पुनि सीतहि धीरजु जिमि दीन्हा।।
अर्थ · Hindi
लंकाँ कपि प्रबेस जिमि कीन्हा। पुनि सीतहि धीरजु जिमि दीन्हा।।
- RCM 7.67.5Open verse →
बन उजारि रावनहि प्रबोधी। पुर दहि नाघेउ बहुरि पयोधी।।
अर्थ · Hindi
बन उजारि रावनहि प्रबोधी। पुर दहि नाघेउ बहुरि पयोधी।।
- RCM 7.67.6Open verse →
आए कपि सब जहँ रघुराई। बैदेही कि कुसल सुनाई।।
अर्थ · Hindi
आए कपि सब जहँ रघुराई। बैदेही कि कुसल सुनाई।।
- RCM 7.67.7Open verse →
सेन समेति जथा रघुबीरा। उतरे जाइ बारिनिधि तीरा।।
अर्थ · Hindi
सेन समेति जथा रघुबीरा। उतरे जाइ बारिनिधि तीरा।।
- RCM 7.67.8Open verse →
मिला बिभीषन जेहि बिधि आई। सागर निग्रह कथा सुनाई।।
अर्थ · Hindi
मिला बिभीषन जेहि बिधि आई। सागर निग्रह कथा सुनाई।।
- RCM 7.68.1Open verse →
निसिचर निकर मरन बिधि नाना। रघुपति रावन समर बखाना।।
अर्थ · Hindi
निसिचर निकर मरन बिधि नाना। रघुपति रावन समर बखाना।।
- RCM 7.68.2Open verse →
रावन बध मंदोदरि सोका। राज बिभीषण देव असोका।।
अर्थ · Hindi
रावन बध मंदोदरि सोका। राज बिभीषण देव असोका।।
- RCM 7.68.3Open verse →
सीता रघुपति मिलन बहोरी। सुरन्ह कीन्ह अस्तुति कर जोरी।।
अर्थ · Hindi
सीता रघुपति मिलन बहोरी। सुरन्ह कीन्ह अस्तुति कर जोरी।।
- RCM 7.68.4Open verse →
पुनि पुष्पक चढ़ि कपिन्ह समेता। अवध चले प्रभु कृपा निकेता।।
अर्थ · Hindi
पुनि पुष्पक चढ़ि कपिन्ह समेता। अवध चले प्रभु कृपा निकेता।।
- RCM 7.68.5Open verse →
जेहि बिधि राम नगर निज आए। बायस बिसद चरित सब गाए।।
अर्थ · Hindi
जेहि बिधि राम नगर निज आए। बायस बिसद चरित सब गाए।।
- RCM 7.68.6Open verse →
कहेसि बहोरि राम अभिषैका। पुर बरनत नृपनीति अनेका।।
अर्थ · Hindi
कहेसि बहोरि राम अभिषैका। पुर बरनत नृपनीति अनेका।।
- RCM 7.68.7Open verse →
कथा समस्त भुसुंड बखानी। जो मैं तुम्ह सन कही भवानी।।
अर्थ · Hindi
कथा समस्त भुसुंड बखानी। जो मैं तुम्ह सन कही भवानी।।
- RCM 7.68.8Open verse →
सुनि सब राम कथा खगनाहा। कहत बचन मन परम उछाहा।।
अर्थ · Hindi
सुनि सब राम कथा खगनाहा। कहत बचन मन परम उछाहा।।
- RCM 7.69.1Open verse →
देखि चरित अति नर अनुसारी। भयउ हृदयँ मम संसय भारी।।
अर्थ · Hindi
देखि चरित अति नर अनुसारी। भयउ हृदयँ मम संसय भारी।।
- RCM 7.69.2Open verse →
सोइ भ्रम अब हित करि मैं माना। कीन्ह अनुग्रह कृपानिधाना।।
अर्थ · Hindi
सोइ भ्रम अब हित करि मैं माना। कीन्ह अनुग्रह कृपानिधाना।।
- RCM 7.69.3Open verse →
जो अति आतप ब्याकुल होई। तरु छाया सुख जानइ सोई।।
अर्थ · Hindi
जो अति आतप ब्याकुल होई। तरु छाया सुख जानइ सोई।।
- RCM 7.69.4Open verse →
जौं नहिं होत मोह अति मोही। मिलतेउँ तात कवन बिधि तोही।।
अर्थ · Hindi
जौं नहिं होत मोह अति मोही। मिलतेउँ तात कवन बिधि तोही।।
- RCM 7.69.5Open verse →
सुनतेउँ किमि हरि कथा सुहाई। अति बिचित्र बहु बिधि तुम्ह गाई।।
अर्थ · Hindi
सुनतेउँ किमि हरि कथा सुहाई। अति बिचित्र बहु बिधि तुम्ह गाई।।
- RCM 7.69.6Open verse →
निगमागम पुरान मत एहा। कहहिं सिद्ध मुनि नहिं संदेहा।।
अर्थ · Hindi
निगमागम पुरान मत एहा। कहहिं सिद्ध मुनि नहिं संदेहा।।
- RCM 7.69.7Open verse →
संत बिसुद्ध मिलहिं परि तेही। चितवहिं राम कृपा करि जेही।।
अर्थ · Hindi
संत बिसुद्ध मिलहिं परि तेही। चितवहिं राम कृपा करि जेही।।
- RCM 7.69.8Open verse →
राम कृपाँ तव दरसन भयऊ। तव प्रसाद सब संसय गयऊ।।
अर्थ · Hindi
राम कृपाँ तव दरसन भयऊ। तव प्रसाद सब संसय गयऊ।।
- RCM 7.70.1Open verse →
बोलेउ काकभसुंड बहोरी। नभग नाथ पर प्रीति न थोरी।।
अर्थ · Hindi
बोलेउ काकभसुंड बहोरी। नभग नाथ पर प्रीति न थोरी।।
- RCM 7.70.2Open verse →
सब बिधि नाथ पूज्य तुम्ह मेरे। कृपापात्र रघुनायक केरे।।
अर्थ · Hindi
सब बिधि नाथ पूज्य तुम्ह मेरे। कृपापात्र रघुनायक केरे।।
- RCM 7.70.3Open verse →
तुम्हहि न संसय मोह न माया। मो पर नाथ कीन्ह तुम्ह दाया।।
अर्थ · Hindi
तुम्हहि न संसय मोह न माया। मो पर नाथ कीन्ह तुम्ह दाया।।
- RCM 7.70.4Open verse →
पठइ मोह मिस खगपति तोही। रघुपति दीन्हि बड़ाई मोही।।
अर्थ · Hindi
पठइ मोह मिस खगपति तोही। रघुपति दीन्हि बड़ाई मोही।।
- RCM 7.70.5Open verse →
तुम्ह निज मोह कही खग साईं। सो नहिं कछु आचरज गोसाईं।।
अर्थ · Hindi
तुम्ह निज मोह कही खग साईं। सो नहिं कछु आचरज गोसाईं।।
- RCM 7.70.6Open verse →
नारद भव बिरंचि सनकादी। जे मुनिनायक आतमबादी।।
अर्थ · Hindi
नारद भव बिरंचि सनकादी। जे मुनिनायक आतमबादी।।
- RCM 7.70.7Open verse →
मोह न अंध कीन्ह केहि केही। को जग काम नचाव न जेही।।
अर्थ · Hindi
मोह न अंध कीन्ह केहि केही। को जग काम नचाव न जेही।।
- RCM 7.70.8Open verse →
तृस्नाँ केहि न कीन्ह बौराहा। केहि कर हृदय क्रोध नहिं दाहा।।
अर्थ · Hindi
तृस्नाँ केहि न कीन्ह बौराहा। केहि कर हृदय क्रोध नहिं दाहा।।
- RCM 7.71.1Open verse →
गुन कृत सन्यपात नहिं केही। कोउ न मान मद तजेउ निबेही।।
अर्थ · Hindi
गुन कृत सन्यपात नहिं केही। कोउ न मान मद तजेउ निबेही।।
- RCM 7.71.2Open verse →
जोबन ज्वर केहि नहिं बलकावा। ममता केहि कर जस न नसावा।।
अर्थ · Hindi
जोबन ज्वर केहि नहिं बलकावा। ममता केहि कर जस न नसावा।।
- RCM 7.71.3Open verse →
मच्छर काहि कलंक न लावा। काहि न सोक समीर डोलावा।।
अर्थ · Hindi
मच्छर काहि कलंक न लावा। काहि न सोक समीर डोलावा।।
- RCM 7.71.4Open verse →
चिंता साँपिनि को नहिं खाया। को जग जाहि न ब्यापी माया।।
अर्थ · Hindi
चिंता साँपिनि को नहिं खाया। को जग जाहि न ब्यापी माया।।
- RCM 7.71.5Open verse →
कीट मनोरथ दारु सरीरा। जेहि न लाग घुन को अस धीरा।।
अर्थ · Hindi
कीट मनोरथ दारु सरीरा। जेहि न लाग घुन को अस धीरा।।
- RCM 7.71.6Open verse →
सुत बित लोक ईषना तीनी। केहि के मति इन्ह कृत न मलीनी।।
अर्थ · Hindi
सुत बित लोक ईषना तीनी। केहि के मति इन्ह कृत न मलीनी।।
- RCM 7.71.7Open verse →
यह सब माया कर परिवारा। प्रबल अमिति को बरनै पारा।।
अर्थ · Hindi
यह सब माया कर परिवारा। प्रबल अमिति को बरनै पारा।।
- RCM 7.71.8Open verse →
सिव चतुरानन जाहि डेराहीं। अपर जीव केहि लेखे माहीं।।
अर्थ · Hindi
सिव चतुरानन जाहि डेराहीं। अपर जीव केहि लेखे माहीं।।
- RCM 7.72.1Open verse →
जो माया सब जगहि नचावा। जासु चरित लखि काहुँ न पावा।।
अर्थ · Hindi
जो माया सब जगहि नचावा। जासु चरित लखि काहुँ न पावा।।
- RCM 7.72.2Open verse →
सोइ प्रभु भ्रू बिलास खगराजा। नाच नटी इव सहित समाजा।।
अर्थ · Hindi
सोइ प्रभु भ्रू बिलास खगराजा। नाच नटी इव सहित समाजा।।
- RCM 7.72.3Open verse →
सोइ सच्चिदानंद घन रामा। अज बिग्यान रूपो बल धामा।।
अर्थ · Hindi
सोइ सच्चिदानंद घन रामा। अज बिग्यान रूपो बल धामा।।
- RCM 7.72.4Open verse →
ब्यापक ब्याप्य अखंड अनंता। अखिल अमोघसक्ति भगवंता।।
अर्थ · Hindi
ब्यापक ब्याप्य अखंड अनंता। अखिल अमोघसक्ति भगवंता।।
- RCM 7.72.5Open verse →
अगुन अदभ्र गिरा गोतीता। सबदरसी अनवद्य अजीता।।
अर्थ · Hindi
अगुन अदभ्र गिरा गोतीता। सबदरसी अनवद्य अजीता।।
- RCM 7.72.6Open verse →
निर्मम निराकार निरमोहा। नित्य निरंजन सुख संदोहा।।
अर्थ · Hindi
निर्मम निराकार निरमोहा। नित्य निरंजन सुख संदोहा।।
- RCM 7.72.7Open verse →
प्रकृति पार प्रभु सब उर बासी। ब्रह्म निरीह बिरज अबिनासी।।
अर्थ · Hindi
प्रकृति पार प्रभु सब उर बासी। ब्रह्म निरीह बिरज अबिनासी।।
- RCM 7.72.8Open verse →
इहाँ मोह कर कारन नाहीं। रबि सन्मुख तम कबहुँ कि जाहीं।।
अर्थ · Hindi
इहाँ मोह कर कारन नाहीं। रबि सन्मुख तम कबहुँ कि जाहीं।।
- RCM 7.73.1Open verse →
असि रघुपति लीला उरगारी। दनुज बिमोहनि जन सुखकारी।।
अर्थ · Hindi
असि रघुपति लीला उरगारी। दनुज बिमोहनि जन सुखकारी।।
- RCM 7.73.2Open verse →
जे मति मलिन बिषयबस कामी। प्रभु मोह धरहिं इमि स्वामी।।
अर्थ · Hindi
जे मति मलिन बिषयबस कामी। प्रभु मोह धरहिं इमि स्वामी।।
- RCM 7.73.3Open verse →
नयन दोष जा कहँ जब होई। पीत बरन ससि कहुँ कह सोई।।
अर्थ · Hindi
नयन दोष जा कहँ जब होई। पीत बरन ससि कहुँ कह सोई।।
- RCM 7.73.4Open verse →
जब जेहि दिसि भ्रम होइ खगेसा। सो कह पच्छिम उयउ दिनेसा।।
अर्थ · Hindi
जब जेहि दिसि भ्रम होइ खगेसा। सो कह पच्छिम उयउ दिनेसा।।
- RCM 7.73.5Open verse →
नौकारूढ़ चलत जग देखा। अचल मोह बस आपुहि लेखा।।
अर्थ · Hindi
नौकारूढ़ चलत जग देखा। अचल मोह बस आपुहि लेखा।।
- RCM 7.73.6Open verse →
बालक भ्रमहिं न भ्रमहिं गृहादीं। कहहिं परस्पर मिथ्याबादी।।
अर्थ · Hindi
बालक भ्रमहिं न भ्रमहिं गृहादीं। कहहिं परस्पर मिथ्याबादी।।
- RCM 7.73.7Open verse →
हरि बिषइक अस मोह बिहंगा। सपनेहुँ नहिं अग्यान प्रसंगा।।
अर्थ · Hindi
हरि बिषइक अस मोह बिहंगा। सपनेहुँ नहिं अग्यान प्रसंगा।।
- RCM 7.73.8Open verse →
मायाबस मतिमंद अभागी। हृदयँ जमनिका बहुबिधि लागी।।
अर्थ · Hindi
मायाबस मतिमंद अभागी। हृदयँ जमनिका बहुबिधि लागी।।
- RCM 7.73.9Open verse →
ते सठ हठ बस संसय करहीं। निज अग्यान राम पर धरहीं।।
अर्थ · Hindi
ते सठ हठ बस संसय करहीं। निज अग्यान राम पर धरहीं।।
- RCM 7.74.1Open verse →
सुनु खगेस रघुपति प्रभुताई। कहउँ जथामति कथा सुहाई।।
अर्थ · Hindi
सुनु खगेस रघुपति प्रभुताई। कहउँ जथामति कथा सुहाई।।
- RCM 7.74.2Open verse →
जेहि बिधि मोह भयउ प्रभु मोही। सोउ सब कथा सुनावउँ तोही।।
अर्थ · Hindi
जेहि बिधि मोह भयउ प्रभु मोही। सोउ सब कथा सुनावउँ तोही।।
- RCM 7.74.3Open verse →
राम कृपा भाजन तुम्ह ताता। हरि गुन प्रीति मोहि सुखदाता।।
अर्थ · Hindi
राम कृपा भाजन तुम्ह ताता। हरि गुन प्रीति मोहि सुखदाता।।
- RCM 7.74.4Open verse →
ताते नहिं कछु तुम्हहिं दुरावउँ। परम रहस्य मनोहर गावउँ।।
अर्थ · Hindi
ताते नहिं कछु तुम्हहिं दुरावउँ। परम रहस्य मनोहर गावउँ।।
- RCM 7.74.5Open verse →
सुनहु राम कर सहज सुभाऊ। जन अभिमान न राखहिं काऊ।।
अर्थ · Hindi
सुनहु राम कर सहज सुभाऊ। जन अभिमान न राखहिं काऊ।।
- RCM 7.74.6Open verse →
संसृत मूल सूलप्रद नाना। सकल सोक दायक अभिमाना।।
अर्थ · Hindi
संसृत मूल सूलप्रद नाना। सकल सोक दायक अभिमाना।।
- RCM 7.74.7Open verse →
ताते करहिं कृपानिधि दूरी। सेवक पर ममता अति भूरी।।
अर्थ · Hindi
ताते करहिं कृपानिधि दूरी। सेवक पर ममता अति भूरी।।
- RCM 7.74.8Open verse →
जिमि सिसु तन ब्रन होइ गोसाई। मातु चिराव कठिन की नाईं।।
अर्थ · Hindi
जिमि सिसु तन ब्रन होइ गोसाई। मातु चिराव कठिन की नाईं।।
- RCM 7.75.1Open verse →
राम कृपा आपनि जड़ताई। कहउँ खगेस सुनहु मन लाई।।
अर्थ · Hindi
राम कृपा आपनि जड़ताई। कहउँ खगेस सुनहु मन लाई।।
- RCM 7.75.2Open verse →
जब जब राम मनुज तनु धरहीं। भक्त हेतु लीला बहु करहीं।।
अर्थ · Hindi
जब जब राम मनुज तनु धरहीं। भक्त हेतु लीला बहु करहीं।।
- RCM 7.75.3Open verse →
तब तब अवधपुरी मैं ज़ाऊँ। बालचरित बिलोकि हरषाऊँ।।
अर्थ · Hindi
तब तब अवधपुरी मैं ज़ाऊँ। बालचरित बिलोकि हरषाऊँ।।
- RCM 7.75.4Open verse →
जन्म महोत्सव देखउँ जाई। बरष पाँच तहँ रहउँ लोभाई।।
अर्थ · Hindi
जन्म महोत्सव देखउँ जाई। बरष पाँच तहँ रहउँ लोभाई।।
- RCM 7.75.5Open verse →
इष्टदेव मम बालक रामा। सोभा बपुष कोटि सत कामा।।
अर्थ · Hindi
इष्टदेव मम बालक रामा। सोभा बपुष कोटि सत कामा।।
- RCM 7.75.6Open verse →
निज प्रभु बदन निहारि निहारी। लोचन सुफल करउँ उरगारी।।
अर्थ · Hindi
निज प्रभु बदन निहारि निहारी। लोचन सुफल करउँ उरगारी।।
- RCM 7.75.7Open verse →
लघु बायस बपु धरि हरि संगा। देखउँ बालचरित बहुरंगा।।
अर्थ · Hindi
लघु बायस बपु धरि हरि संगा। देखउँ बालचरित बहुरंगा।।
- RCM 7.75.8Open verse →
लरिकाईं जहँ जहँ फिरहिं तहँ तहँ संग उड़ाउँ।
अर्थ · Hindi
लरिकाईं जहँ जहँ फिरहिं तहँ तहँ संग उड़ाउँ।
- RCM 7.75.9Open verse →
जूठनि परइ अजिर महँ सो उठाइ करि खाउँ।।75(क)।।
अर्थ · Hindi
जूठनि परइ अजिर महँ सो उठाइ करि खाउँ।।75(क)।।
- RCM 7.75.10Open verse →
एक बार अतिसय सब चरित किए रघुबीर।
अर्थ · Hindi
एक बार अतिसय सब चरित किए रघुबीर।
- RCM 7.75.11Open verse →
सुमिरत प्रभु लीला सोइ पुलकित भयउ सरीर।।75(ख)।।
अर्थ · Hindi
सुमिरत प्रभु लीला सोइ पुलकित भयउ सरीर।।75(ख)।।
- RCM 7.76.1Open verse →
कहइ भसुंड सुनहु खगनायक। रामचरित सेवक सुखदायक।।
अर्थ · Hindi
कहइ भसुंड सुनहु खगनायक। रामचरित सेवक सुखदायक।।
- RCM 7.76.2Open verse →
नृपमंदिर सुंदर सब भाँती। खचित कनक मनि नाना जाती।।
अर्थ · Hindi
नृपमंदिर सुंदर सब भाँती। खचित कनक मनि नाना जाती।।
- RCM 7.76.3Open verse →
बरनि न जाइ रुचिर अँगनाई। जहँ खेलहिं नित चारिउ भाई।।
अर्थ · Hindi
बरनि न जाइ रुचिर अँगनाई। जहँ खेलहिं नित चारिउ भाई।।
- RCM 7.76.4Open verse →
बालबिनोद करत रघुराई। बिचरत अजिर जननि सुखदाई।।
अर्थ · Hindi
बालबिनोद करत रघुराई। बिचरत अजिर जननि सुखदाई।।
- RCM 7.76.5Open verse →
मरकत मृदुल कलेवर स्यामा। अंग अंग प्रति छबि बहु कामा।।
अर्थ · Hindi
मरकत मृदुल कलेवर स्यामा। अंग अंग प्रति छबि बहु कामा।।
- RCM 7.76.6Open verse →
नव राजीव अरुन मृदु चरना। पदज रुचिर नख ससि दुति हरना।।
अर्थ · Hindi
नव राजीव अरुन मृदु चरना। पदज रुचिर नख ससि दुति हरना।।
- RCM 7.76.7Open verse →
ललित अंक कुलिसादिक चारी। नूपुर चारू मधुर रवकारी।।
अर्थ · Hindi
ललित अंक कुलिसादिक चारी। नूपुर चारू मधुर रवकारी।।
- RCM 7.76.8Open verse →
चारु पुरट मनि रचित बनाई। कटि किंकिन कल मुखर सुहाई।।
अर्थ · Hindi
चारु पुरट मनि रचित बनाई। कटि किंकिन कल मुखर सुहाई।।
- RCM 7.77.1Open verse →
अरुन पानि नख करज मनोहर। बाहु बिसाल बिभूषन सुंदर।।
अर्थ · Hindi
अरुन पानि नख करज मनोहर। बाहु बिसाल बिभूषन सुंदर।।
- RCM 7.77.2Open verse →
कंध बाल केहरि दर ग्रीवा। चारु चिबुक आनन छबि सींवा।।
अर्थ · Hindi
कंध बाल केहरि दर ग्रीवा। चारु चिबुक आनन छबि सींवा।।
- RCM 7.77.3Open verse →
कलबल बचन अधर अरुनारे। दुइ दुइ दसन बिसद बर बारे।।
अर्थ · Hindi
कलबल बचन अधर अरुनारे। दुइ दुइ दसन बिसद बर बारे।।
- RCM 7.77.4Open verse →
ललित कपोल मनोहर नासा। सकल सुखद ससि कर सम हासा।।
अर्थ · Hindi
ललित कपोल मनोहर नासा। सकल सुखद ससि कर सम हासा।।
- RCM 7.77.5Open verse →
नील कंज लोचन भव मोचन। भ्राजत भाल तिलक गोरोचन।।
अर्थ · Hindi
नील कंज लोचन भव मोचन। भ्राजत भाल तिलक गोरोचन।।
- RCM 7.77.6Open verse →
बिकट भृकुटि सम श्रवन सुहाए। कुंचित कच मेचक छबि छाए।।
अर्थ · Hindi
बिकट भृकुटि सम श्रवन सुहाए। कुंचित कच मेचक छबि छाए।।
- RCM 7.77.7Open verse →
पीत झीनि झगुली तन सोही। किलकनि चितवनि भावति मोही।।
अर्थ · Hindi
पीत झीनि झगुली तन सोही। किलकनि चितवनि भावति मोही।।
- RCM 7.77.8Open verse →
रूप रासि नृप अजिर बिहारी। नाचहिं निज प्रतिबिंब निहारी।।
अर्थ · Hindi
रूप रासि नृप अजिर बिहारी। नाचहिं निज प्रतिबिंब निहारी।।
- RCM 7.77.9Open verse →
मोहि सन करहीं बिबिध बिधि क्रीड़ा। बरनत मोहि होति अति ब्रीड़ा।।
अर्थ · Hindi
मोहि सन करहीं बिबिध बिधि क्रीड़ा। बरनत मोहि होति अति ब्रीड़ा।।
- RCM 7.77.10Open verse →
किलकत मोहि धरन जब धावहिं। चलउँ भागि तब पूप देखावहिं।।
अर्थ · Hindi
किलकत मोहि धरन जब धावहिं। चलउँ भागि तब पूप देखावहिं।।
- RCM 7.78.1Open verse →
एतना मन आनत खगराया। रघुपति प्रेरित ब्यापी माया।।
अर्थ · Hindi
एतना मन आनत खगराया। रघुपति प्रेरित ब्यापी माया।।
- RCM 7.78.2Open verse →
सो माया न दुखद मोहि काहीं। आन जीव इव संसृत नाहीं।।
अर्थ · Hindi
सो माया न दुखद मोहि काहीं। आन जीव इव संसृत नाहीं।।
- RCM 7.78.3Open verse →
नाथ इहाँ कछु कारन आना। सुनहु सो सावधान हरिजाना।।
अर्थ · Hindi
नाथ इहाँ कछु कारन आना। सुनहु सो सावधान हरिजाना।।
- RCM 7.78.4Open verse →
ग्यान अखंड एक सीताबर। माया बस्य जीव सचराचर।।
अर्थ · Hindi
ग्यान अखंड एक सीताबर। माया बस्य जीव सचराचर।।
- RCM 7.78.5Open verse →
जौं सब कें रह ग्यान एकरस। ईस्वर जीवहि भेद कहहु कस।।
अर्थ · Hindi
जौं सब कें रह ग्यान एकरस। ईस्वर जीवहि भेद कहहु कस।।
- RCM 7.78.6Open verse →
माया बस्य जीव अभिमानी। ईस बस्य माया गुनखानी।।
अर्थ · Hindi
माया बस्य जीव अभिमानी। ईस बस्य माया गुनखानी।।
- RCM 7.78.7Open verse →
परबस जीव स्वबस भगवंता। जीव अनेक एक श्रीकंता।।
अर्थ · Hindi
परबस जीव स्वबस भगवंता। जीव अनेक एक श्रीकंता।।
- RCM 7.78.8Open verse →
मुधा भेद जद्यपि कृत माया। बिनु हरि जाइ न कोटि उपाया।।
अर्थ · Hindi
मुधा भेद जद्यपि कृत माया। बिनु हरि जाइ न कोटि उपाया।।
- RCM 7.79.1Open verse →
ऐसेहिं हरि बिनु भजन खगेसा। मिटइ न जीवन्ह केर कलेसा।।
अर्थ · Hindi
ऐसेहिं हरि बिनु भजन खगेसा। मिटइ न जीवन्ह केर कलेसा।।
- RCM 7.79.2Open verse →
हरि सेवकहि न ब्याप अबिद्या। प्रभु प्रेरित ब्यापइ तेहि बिद्या।।
अर्थ · Hindi
हरि सेवकहि न ब्याप अबिद्या। प्रभु प्रेरित ब्यापइ तेहि बिद्या।।
- RCM 7.79.3Open verse →
ताते नास न होइ दास कर। भेद भगति भाढ़इ बिहंगबर।।
अर्थ · Hindi
ताते नास न होइ दास कर। भेद भगति भाढ़इ बिहंगबर।।
- RCM 7.79.4Open verse →
भ्रम ते चकित राम मोहि देखा। बिहँसे सो सुनु चरित बिसेषा।।
अर्थ · Hindi
भ्रम ते चकित राम मोहि देखा। बिहँसे सो सुनु चरित बिसेषा।।
- RCM 7.79.5Open verse →
तेहि कौतुक कर मरमु न काहूँ। जाना अनुज न मातु पिताहूँ।।
अर्थ · Hindi
तेहि कौतुक कर मरमु न काहूँ। जाना अनुज न मातु पिताहूँ।।
- RCM 7.79.6Open verse →
जानु पानि धाए मोहि धरना। स्यामल गात अरुन कर चरना।।
अर्थ · Hindi
जानु पानि धाए मोहि धरना। स्यामल गात अरुन कर चरना।।
- RCM 7.79.7Open verse →
तब मैं भागि चलेउँ उरगामी। राम गहन कहँ भुजा पसारी।।
अर्थ · Hindi
तब मैं भागि चलेउँ उरगामी। राम गहन कहँ भुजा पसारी।।
- RCM 7.79.8Open verse →
जिमि जिमि दूरि उड़ाउँ अकासा। तहँ भुज हरि देखउँ निज पासा।।
अर्थ · Hindi
जिमि जिमि दूरि उड़ाउँ अकासा। तहँ भुज हरि देखउँ निज पासा।।
- RCM 7.80.1Open verse →
मूदेउँ नयन त्रसित जब भयउँ। पुनि चितवत कोसलपुर गयऊँ।।
अर्थ · Hindi
मूदेउँ नयन त्रसित जब भयउँ। पुनि चितवत कोसलपुर गयऊँ।।
- RCM 7.80.2Open verse →
मोहि बिलोकि राम मुसुकाहीं। बिहँसत तुरत गयउँ मुख माहीं।।
अर्थ · Hindi
मोहि बिलोकि राम मुसुकाहीं। बिहँसत तुरत गयउँ मुख माहीं।।
- RCM 7.80.3Open verse →
उदर माझ सुनु अंडज राया। देखेउँ बहु ब्रह्मांड निकाया।।
अर्थ · Hindi
उदर माझ सुनु अंडज राया। देखेउँ बहु ब्रह्मांड निकाया।।
- RCM 7.80.4Open verse →
अति बिचित्र तहँ लोक अनेका। रचना अधिक एक ते एका।।
अर्थ · Hindi
अति बिचित्र तहँ लोक अनेका। रचना अधिक एक ते एका।।
- RCM 7.80.5Open verse →
कोटिन्ह चतुरानन गौरीसा। अगनित उडगन रबि रजनीसा।।
अर्थ · Hindi
कोटिन्ह चतुरानन गौरीसा। अगनित उडगन रबि रजनीसा।।
- RCM 7.80.6Open verse →
अगनित लोकपाल जम काला। अगनित भूधर भूमि बिसाला।।
अर्थ · Hindi
अगनित लोकपाल जम काला। अगनित भूधर भूमि बिसाला।।
- RCM 7.80.7Open verse →
सागर सरि सर बिपिन अपारा। नाना भाँति सृष्टि बिस्तारा।।
अर्थ · Hindi
सागर सरि सर बिपिन अपारा। नाना भाँति सृष्टि बिस्तारा।।
- RCM 7.80.8Open verse →
सुर मुनि सिद्ध नाग नर किंनर। चारि प्रकार जीव सचराचर।।
अर्थ · Hindi
सुर मुनि सिद्ध नाग नर किंनर। चारि प्रकार जीव सचराचर।।
- RCM 7.81.1Open verse →
लोक लोक प्रति भिन्न बिधाता। भिन्न बिष्नु सिव मनु दिसित्राता।।
अर्थ · Hindi
लोक लोक प्रति भिन्न बिधाता। भिन्न बिष्नु सिव मनु दिसित्राता।।
- RCM 7.81.2Open verse →
नर गंधर्ब भूत बेताला। किंनर निसिचर पसु खग ब्याला।।
अर्थ · Hindi
नर गंधर्ब भूत बेताला। किंनर निसिचर पसु खग ब्याला।।
- RCM 7.81.3Open verse →
देव दनुज गन नाना जाती। सकल जीव तहँ आनहि भाँती।।
अर्थ · Hindi
देव दनुज गन नाना जाती। सकल जीव तहँ आनहि भाँती।।
- RCM 7.81.4Open verse →
महि सरि सागर सर गिरि नाना। सब प्रपंच तहँ आनइ आना।।
अर्थ · Hindi
महि सरि सागर सर गिरि नाना। सब प्रपंच तहँ आनइ आना।।
- RCM 7.81.5Open verse →
अंडकोस प्रति प्रति निज रुपा। देखेउँ जिनस अनेक अनूपा।।
अर्थ · Hindi
अंडकोस प्रति प्रति निज रुपा। देखेउँ जिनस अनेक अनूपा।।
- RCM 7.81.6Open verse →
अवधपुरी प्रति भुवन निनारी। सरजू भिन्न भिन्न नर नारी।।
अर्थ · Hindi
अवधपुरी प्रति भुवन निनारी। सरजू भिन्न भिन्न नर नारी।।
- RCM 7.81.7Open verse →
दसरथ कौसल्या सुनु ताता। बिबिध रूप भरतादिक भ्राता।।
अर्थ · Hindi
दसरथ कौसल्या सुनु ताता। बिबिध रूप भरतादिक भ्राता।।
- RCM 7.81.8Open verse →
प्रति ब्रह्मांड राम अवतारा। देखउँ बालबिनोद अपारा।।
अर्थ · Hindi
प्रति ब्रह्मांड राम अवतारा। देखउँ बालबिनोद अपारा।।
- RCM 7.82.1Open verse →
भ्रमत मोहि ब्रह्मांड अनेका। बीते मनहुँ कल्प सत एका।।
अर्थ · Hindi
भ्रमत मोहि ब्रह्मांड अनेका। बीते मनहुँ कल्प सत एका।।
- RCM 7.82.2Open verse →
फिरत फिरत निज आश्रम आयउँ। तहँ पुनि रहि कछु काल गवाँयउँ।।
अर्थ · Hindi
फिरत फिरत निज आश्रम आयउँ। तहँ पुनि रहि कछु काल गवाँयउँ।।
- RCM 7.82.3Open verse →
निज प्रभु जन्म अवध सुनि पायउँ। निर्भर प्रेम हरषि उठि धायउँ।।
अर्थ · Hindi
निज प्रभु जन्म अवध सुनि पायउँ। निर्भर प्रेम हरषि उठि धायउँ।।
- RCM 7.82.4Open verse →
देखउँ जन्म महोत्सव जाई। जेहि बिधि प्रथम कहा मैं गाई।।
अर्थ · Hindi
देखउँ जन्म महोत्सव जाई। जेहि बिधि प्रथम कहा मैं गाई।।
- RCM 7.82.5Open verse →
राम उदर देखेउँ जग नाना। देखत बनइ न जाइ बखाना।।
अर्थ · Hindi
राम उदर देखेउँ जग नाना। देखत बनइ न जाइ बखाना।।
- RCM 7.82.6Open verse →
तहँ पुनि देखेउँ राम सुजाना। माया पति कृपाल भगवाना।।
अर्थ · Hindi
तहँ पुनि देखेउँ राम सुजाना। माया पति कृपाल भगवाना।।
- RCM 7.82.7Open verse →
करउँ बिचार बहोरि बहोरी। मोह कलिल ब्यापित मति मोरी।।
अर्थ · Hindi
करउँ बिचार बहोरि बहोरी। मोह कलिल ब्यापित मति मोरी।।
- RCM 7.82.8Open verse →
उभय घरी महँ मैं सब देखा। भयउँ भ्रमित मन मोह बिसेषा।।
अर्थ · Hindi
उभय घरी महँ मैं सब देखा। भयउँ भ्रमित मन मोह बिसेषा।।
- RCM 7.83.1Open verse →
देखि चरित यह सो प्रभुताई। समुझत देह दसा बिसराई।।
अर्थ · Hindi
देखि चरित यह सो प्रभुताई। समुझत देह दसा बिसराई।।
- RCM 7.83.2Open verse →
धरनि परेउँ मुख आव न बाता। त्राहि त्राहि आरत जन त्राता।।
अर्थ · Hindi
धरनि परेउँ मुख आव न बाता। त्राहि त्राहि आरत जन त्राता।।
- RCM 7.83.3Open verse →
प्रेमाकुल प्रभु मोहि बिलोकी। निज माया प्रभुता तब रोकी।।
अर्थ · Hindi
प्रेमाकुल प्रभु मोहि बिलोकी। निज माया प्रभुता तब रोकी।।
- RCM 7.83.4Open verse →
कर सरोज प्रभु मम सिर धरेऊ। दीनदयाल सकल दुख हरेऊ।।
अर्थ · Hindi
कर सरोज प्रभु मम सिर धरेऊ। दीनदयाल सकल दुख हरेऊ।।
- RCM 7.83.5Open verse →
कीन्ह राम मोहि बिगत बिमोहा। सेवक सुखद कृपा संदोहा।।
अर्थ · Hindi
कीन्ह राम मोहि बिगत बिमोहा। सेवक सुखद कृपा संदोहा।।
- RCM 7.83.6Open verse →
प्रभुता प्रथम बिचारि बिचारी। मन महँ होइ हरष अति भारी।।
अर्थ · Hindi
प्रभुता प्रथम बिचारि बिचारी। मन महँ होइ हरष अति भारी।।
- RCM 7.83.7Open verse →
भगत बछलता प्रभु कै देखी। उपजी मम उर प्रीति बिसेषी।।
अर्थ · Hindi
भगत बछलता प्रभु कै देखी। उपजी मम उर प्रीति बिसेषी।।
- RCM 7.83.8Open verse →
सजल नयन पुलकित कर जोरी। कीन्हिउँ बहु बिधि बिनय बहोरी।।
अर्थ · Hindi
सजल नयन पुलकित कर जोरी। कीन्हिउँ बहु बिधि बिनय बहोरी।।
- RCM 7.84.1Open verse →
ग्यान बिबेक बिरति बिग्याना। मुनि दुर्लभ गुन जे जग नाना।।
अर्थ · Hindi
ग्यान बिबेक बिरति बिग्याना। मुनि दुर्लभ गुन जे जग नाना।।
- RCM 7.84.2Open verse →
आजु देउँ सब संसय नाहीं। मागु जो तोहि भाव मन माहीं।।
अर्थ · Hindi
आजु देउँ सब संसय नाहीं। मागु जो तोहि भाव मन माहीं।।
- RCM 7.84.3Open verse →
सुनि प्रभु बचन अधिक अनुरागेउँ। मन अनुमान करन तब लागेऊँ।।
अर्थ · Hindi
सुनि प्रभु बचन अधिक अनुरागेउँ। मन अनुमान करन तब लागेऊँ।।
- RCM 7.84.4Open verse →
प्रभु कह देन सकल सुख सही। भगति आपनी देन न कही।।
अर्थ · Hindi
प्रभु कह देन सकल सुख सही। भगति आपनी देन न कही।।
- RCM 7.84.5Open verse →
भगति हीन गुन सब सुख ऐसे। लवन बिना बहु बिंजन जैसे।।
अर्थ · Hindi
भगति हीन गुन सब सुख ऐसे। लवन बिना बहु बिंजन जैसे।।
- RCM 7.84.6Open verse →
भजन हीन सुख कवने काजा। अस बिचारि बोलेउँ खगराजा।।
अर्थ · Hindi
भजन हीन सुख कवने काजा। अस बिचारि बोलेउँ खगराजा।।
- RCM 7.84.7Open verse →
जौं प्रभु होइ प्रसन्न बर देहू। मो पर करहु कृपा अरु नेहू।।
अर्थ · Hindi
जौं प्रभु होइ प्रसन्न बर देहू। मो पर करहु कृपा अरु नेहू।।
- RCM 7.84.8Open verse →
मन भावत बर मागउँ स्वामी। तुम्ह उदार उर अंतरजामी।।
अर्थ · Hindi
मन भावत बर मागउँ स्वामी। तुम्ह उदार उर अंतरजामी।।
- RCM 7.85.1Open verse →
एवमस्तु कहि रघुकुलनायक। बोले बचन परम सुखदायक।।
अर्थ · Hindi
एवमस्तु कहि रघुकुलनायक। बोले बचन परम सुखदायक।।
- RCM 7.85.2Open verse →
सुनु बायस तैं सहज सयाना। काहे न मागसि अस बरदाना।।
अर्थ · Hindi
सुनु बायस तैं सहज सयाना। काहे न मागसि अस बरदाना।।
- RCM 7.85.3Open verse →
सब सुख खानि भगति तैं मागी। नहिं जग कोउ तोहि सम बड़भागी।।
अर्थ · Hindi
सब सुख खानि भगति तैं मागी। नहिं जग कोउ तोहि सम बड़भागी।।
- RCM 7.85.4Open verse →
जो मुनि कोटि जतन नहिं लहहीं। जे जप जोग अनल तन दहहीं।।
अर्थ · Hindi
जो मुनि कोटि जतन नहिं लहहीं। जे जप जोग अनल तन दहहीं।।
- RCM 7.85.5Open verse →
रीझेउँ देखि तोरि चतुराई। मागेहु भगति मोहि अति भाई।।
अर्थ · Hindi
रीझेउँ देखि तोरि चतुराई। मागेहु भगति मोहि अति भाई।।
- RCM 7.85.6Open verse →
सुनु बिहंग प्रसाद अब मोरें। सब सुभ गुन बसिहहिं उर तोरें।।
अर्थ · Hindi
सुनु बिहंग प्रसाद अब मोरें। सब सुभ गुन बसिहहिं उर तोरें।।
- RCM 7.85.7Open verse →
भगति ग्यान बिग्यान बिरागा। जोग चरित्र रहस्य बिभागा।।
अर्थ · Hindi
भगति ग्यान बिग्यान बिरागा। जोग चरित्र रहस्य बिभागा।।
- RCM 7.85.8Open verse →
जानब तैं सबही कर भेदा। मम प्रसाद नहिं साधन खेदा।।
अर्थ · Hindi
जानब तैं सबही कर भेदा। मम प्रसाद नहिं साधन खेदा।।
- RCM 7.86.1Open verse →
अब सुनु परम बिमल मम बानी। सत्य सुगम निगमादि बखानी।।
अर्थ · Hindi
अब सुनु परम बिमल मम बानी। सत्य सुगम निगमादि बखानी।।
- RCM 7.86.2Open verse →
निज सिद्धांत सुनावउँ तोही। सुनु मन धरु सब तजि भजु मोही।।
अर्थ · Hindi
निज सिद्धांत सुनावउँ तोही। सुनु मन धरु सब तजि भजु मोही।।
- RCM 7.86.3Open verse →
मम माया संभव संसारा। जीव चराचर बिबिधि प्रकारा।।
अर्थ · Hindi
मम माया संभव संसारा। जीव चराचर बिबिधि प्रकारा।।
- RCM 7.86.4Open verse →
सब मम प्रिय सब मम उपजाए। सब ते अधिक मनुज मोहि भाए।।
अर्थ · Hindi
सब मम प्रिय सब मम उपजाए। सब ते अधिक मनुज मोहि भाए।।
- RCM 7.86.5Open verse →
तिन्ह महँ द्विज द्विज महँ श्रुतिधारी। तिन्ह महुँ निगम धरम अनुसारी।।
अर्थ · Hindi
तिन्ह महँ द्विज द्विज महँ श्रुतिधारी। तिन्ह महुँ निगम धरम अनुसारी।।
- RCM 7.86.6Open verse →
तिन्ह महँ प्रिय बिरक्त पुनि ग्यानी। ग्यानिहु ते अति प्रिय बिग्यानी।।
अर्थ · Hindi
तिन्ह महँ प्रिय बिरक्त पुनि ग्यानी। ग्यानिहु ते अति प्रिय बिग्यानी।।
- RCM 7.86.7Open verse →
तिन्ह ते पुनि मोहि प्रिय निज दासा। जेहि गति मोरि न दूसरि आसा।।
अर्थ · Hindi
तिन्ह ते पुनि मोहि प्रिय निज दासा। जेहि गति मोरि न दूसरि आसा।।
- RCM 7.86.8Open verse →
पुनि पुनि सत्य कहउँ तोहि पाहीं। मोहि सेवक सम प्रिय कोउ नाहीं।।
अर्थ · Hindi
पुनि पुनि सत्य कहउँ तोहि पाहीं। मोहि सेवक सम प्रिय कोउ नाहीं।।
- RCM 7.86.9Open verse →
भगति हीन बिरंचि किन होई। सब जीवहु सम प्रिय मोहि सोई।।
अर्थ · Hindi
भगति हीन बिरंचि किन होई। सब जीवहु सम प्रिय मोहि सोई।।
- RCM 7.86.10Open verse →
भगतिवंत अति नीचउ प्रानी। मोहि प्रानप्रिय असि मम बानी।।
अर्थ · Hindi
भगतिवंत अति नीचउ प्रानी। मोहि प्रानप्रिय असि मम बानी।।
- RCM 7.87.1Open verse →
एक पिता के बिपुल कुमारा। होहिं पृथक गुन सील अचारा।।
अर्थ · Hindi
एक पिता के बिपुल कुमारा। होहिं पृथक गुन सील अचारा।।
- RCM 7.87.2Open verse →
कोउ पंडिंत कोउ तापस ग्याता। कोउ धनवंत सूर कोउ दाता।।
अर्थ · Hindi
कोउ पंडिंत कोउ तापस ग्याता। कोउ धनवंत सूर कोउ दाता।।
- RCM 7.87.3Open verse →
कोउ सर्बग्य धर्मरत कोई। सब पर पितहि प्रीति सम होई।।
अर्थ · Hindi
कोउ सर्बग्य धर्मरत कोई। सब पर पितहि प्रीति सम होई।।
- RCM 7.87.4Open verse →
कोउ पितु भगत बचन मन कर्मा। सपनेहुँ जान न दूसर धर्मा।।
अर्थ · Hindi
कोउ पितु भगत बचन मन कर्मा। सपनेहुँ जान न दूसर धर्मा।।
- RCM 7.87.5Open verse →
सो सुत प्रिय पितु प्रान समाना। जद्यपि सो सब भाँति अयाना।।
अर्थ · Hindi
सो सुत प्रिय पितु प्रान समाना। जद्यपि सो सब भाँति अयाना।।
- RCM 7.87.6Open verse →
एहि बिधि जीव चराचर जेते। त्रिजग देव नर असुर समेते।।
अर्थ · Hindi
एहि बिधि जीव चराचर जेते। त्रिजग देव नर असुर समेते।।
- RCM 7.87.7Open verse →
अखिल बिस्व यह मोर उपाया। सब पर मोहि बराबरि दाया।।
अर्थ · Hindi
अखिल बिस्व यह मोर उपाया। सब पर मोहि बराबरि दाया।।
- RCM 7.87.8Open verse →
तिन्ह महँ जो परिहरि मद माया। भजै मोहि मन बच अरू काया।।
अर्थ · Hindi
तिन्ह महँ जो परिहरि मद माया। भजै मोहि मन बच अरू काया।।
- RCM 7.88.1Open verse →
कबहूँ काल न ब्यापिहि तोही। सुमिरेसु भजेसु निरंतर मोही।।
अर्थ · Hindi
कबहूँ काल न ब्यापिहि तोही। सुमिरेसु भजेसु निरंतर मोही।।
- RCM 7.88.2Open verse →
प्रभु बचनामृत सुनि न अघाऊँ। तनु पुलकित मन अति हरषाऊँ।।
अर्थ · Hindi
प्रभु बचनामृत सुनि न अघाऊँ। तनु पुलकित मन अति हरषाऊँ।।
- RCM 7.88.3Open verse →
सो सुख जानइ मन अरु काना। नहिं रसना पहिं जाइ बखाना।।
अर्थ · Hindi
सो सुख जानइ मन अरु काना। नहिं रसना पहिं जाइ बखाना।।
- RCM 7.88.4Open verse →
प्रभु सोभा सुख जानहिं नयना। कहि किमि सकहिं तिन्हहि नहिं बयना।।
अर्थ · Hindi
प्रभु सोभा सुख जानहिं नयना। कहि किमि सकहिं तिन्हहि नहिं बयना।।
- RCM 7.88.5Open verse →
बहु बिधि मोहि प्रबोधि सुख देई। लगे करन सिसु कौतुक तेई।।
अर्थ · Hindi
बहु बिधि मोहि प्रबोधि सुख देई। लगे करन सिसु कौतुक तेई।।
- RCM 7.88.6Open verse →
सजल नयन कछु मुख करि रूखा। चितइ मातु लागी अति भूखा।।
अर्थ · Hindi
सजल नयन कछु मुख करि रूखा। चितइ मातु लागी अति भूखा।।
- RCM 7.88.7Open verse →
देखि मातु आतुर उठि धाई। कहि मृदु बचन लिए उर लाई।।
अर्थ · Hindi
देखि मातु आतुर उठि धाई। कहि मृदु बचन लिए उर लाई।।
- RCM 7.88.8Open verse →
गोद राखि कराव पय पाना। रघुपति चरित ललित कर गाना।।
अर्थ · Hindi
गोद राखि कराव पय पाना। रघुपति चरित ललित कर गाना।।
- RCM 7.89.1Open verse →
मैं पुनि अवध रहेउँ कछु काला। देखेउँ बालबिनोद रसाला।।
अर्थ · Hindi
मैं पुनि अवध रहेउँ कछु काला। देखेउँ बालबिनोद रसाला।।
- RCM 7.89.2Open verse →
राम प्रसाद भगति बर पायउँ। प्रभु पद बंदि निजाश्रम आयउँ।।
अर्थ · Hindi
राम प्रसाद भगति बर पायउँ। प्रभु पद बंदि निजाश्रम आयउँ।।
- RCM 7.89.3Open verse →
तब ते मोहि न ब्यापी माया। जब ते रघुनायक अपनाया।।
अर्थ · Hindi
तब ते मोहि न ब्यापी माया। जब ते रघुनायक अपनाया।।
- RCM 7.89.4Open verse →
यह सब गुप्त चरित मैं गावा। हरि मायाँ जिमि मोहि नचावा।।
अर्थ · Hindi
यह सब गुप्त चरित मैं गावा। हरि मायाँ जिमि मोहि नचावा।।
- RCM 7.89.5Open verse →
निज अनुभव अब कहउँ खगेसा। बिनु हरि भजन न जाहि कलेसा।।
अर्थ · Hindi
निज अनुभव अब कहउँ खगेसा। बिनु हरि भजन न जाहि कलेसा।।
- RCM 7.89.6Open verse →
राम कृपा बिनु सुनु खगराई। जानि न जाइ राम प्रभुताई।।
अर्थ · Hindi
राम कृपा बिनु सुनु खगराई। जानि न जाइ राम प्रभुताई।।
- RCM 7.89.7Open verse →
जानें बिनु न होइ परतीती। बिनु परतीति होइ नहिं प्रीती।।
अर्थ · Hindi
जानें बिनु न होइ परतीती। बिनु परतीति होइ नहिं प्रीती।।
- RCM 7.89.8Open verse →
प्रीति बिना नहिं भगति दिढ़ाई। जिमि खगपति जल कै चिकनाई।।
अर्थ · Hindi
प्रीति बिना नहिं भगति दिढ़ाई। जिमि खगपति जल कै चिकनाई।।
- RCM 7.89.9Open verse →
बिनु गुर होइ कि ग्यान ग्यान कि होइ बिराग बिनु।
अर्थ · Hindi
बिनु गुर होइ कि ग्यान ग्यान कि होइ बिराग बिनु।
- RCM 7.89.10Open verse →
गावहिं बेद पुरान सुख कि लहिअ हरि भगति बिनु।।89(क)।।
अर्थ · Hindi
गावहिं बेद पुरान सुख कि लहिअ हरि भगति बिनु।।89(क)।।
- RCM 7.89.11Open verse →
कोउ बिश्राम कि पाव तात सहज संतोष बिनु।
अर्थ · Hindi
कोउ बिश्राम कि पाव तात सहज संतोष बिनु।
- RCM 7.89.12Open verse →
चलै कि जल बिनु नाव कोटि जतन पचि पचि मरिअ।।89(ख)।।
अर्थ · Hindi
चलै कि जल बिनु नाव कोटि जतन पचि पचि मरिअ।।89(ख)।।
- RCM 7.90.1Open verse →
बिनु संतोष न काम नसाहीं। काम अछत सुख सपनेहुँ नाहीं।।
अर्थ · Hindi
बिनु संतोष न काम नसाहीं। काम अछत सुख सपनेहुँ नाहीं।।
- RCM 7.90.2Open verse →
राम भजन बिनु मिटहिं कि कामा। थल बिहीन तरु कबहुँ कि जामा।।
अर्थ · Hindi
राम भजन बिनु मिटहिं कि कामा। थल बिहीन तरु कबहुँ कि जामा।।
- RCM 7.90.3Open verse →
बिनु बिग्यान कि समता आवइ। कोउ अवकास कि नभ बिनु पावइ।।
अर्थ · Hindi
बिनु बिग्यान कि समता आवइ। कोउ अवकास कि नभ बिनु पावइ।।
- RCM 7.90.4Open verse →
श्रद्धा बिना धर्म नहिं होई। बिनु महि गंध कि पावइ कोई।।
अर्थ · Hindi
श्रद्धा बिना धर्म नहिं होई। बिनु महि गंध कि पावइ कोई।।
- RCM 7.90.5Open verse →
बिनु तप तेज कि कर बिस्तारा। जल बिनु रस कि होइ संसारा।।
अर्थ · Hindi
बिनु तप तेज कि कर बिस्तारा। जल बिनु रस कि होइ संसारा।।
- RCM 7.90.6Open verse →
सील कि मिल बिनु बुध सेवकाई। जिमि बिनु तेज न रूप गोसाई।।
अर्थ · Hindi
सील कि मिल बिनु बुध सेवकाई। जिमि बिनु तेज न रूप गोसाई।।
- RCM 7.90.7Open verse →
निज सुख बिनु मन होइ कि थीरा। परस कि होइ बिहीन समीरा।।
अर्थ · Hindi
निज सुख बिनु मन होइ कि थीरा। परस कि होइ बिहीन समीरा।।
- RCM 7.90.8Open verse →
कवनिउ सिद्धि कि बिनु बिस्वासा। बिनु हरि भजन न भव भय नासा।।
अर्थ · Hindi
कवनिउ सिद्धि कि बिनु बिस्वासा। बिनु हरि भजन न भव भय नासा।।
- RCM 7.90.9Open verse →
बिनु बिस्वास भगति नहिं तेहि बिनु द्रवहिं न रामु।
अर्थ · Hindi
बिनु बिस्वास भगति नहिं तेहि बिनु द्रवहिं न रामु।
- RCM 7.90.10Open verse →
राम कृपा बिनु सपनेहुँ जीव न लह बिश्रामु।।90(क)।।
अर्थ · Hindi
राम कृपा बिनु सपनेहुँ जीव न लह बिश्रामु।।90(क)।।
- RCM 7.90.11Open verse →
अस बिचारि मतिधीर तजि कुतर्क संसय सकल।
अर्थ · Hindi
अस बिचारि मतिधीर तजि कुतर्क संसय सकल।
- RCM 7.90.12Open verse →
भजहु राम रघुबीर करुनाकर सुंदर सुखद।।90(ख)।।
अर्थ · Hindi
भजहु राम रघुबीर करुनाकर सुंदर सुखद।।90(ख)।।
- RCM 7.91.1Open verse →
निज मति सरिस नाथ मैं गाई। प्रभु प्रताप महिमा खगराई।।
अर्थ · Hindi
निज मति सरिस नाथ मैं गाई। प्रभु प्रताप महिमा खगराई।।
- RCM 7.91.2Open verse →
कहेउँ न कछु करि जुगुति बिसेषी। यह सब मैं निज नयनन्हि देखी।।
अर्थ · Hindi
कहेउँ न कछु करि जुगुति बिसेषी। यह सब मैं निज नयनन्हि देखी।।
- RCM 7.91.3Open verse →
महिमा नाम रूप गुन गाथा। सकल अमित अनंत रघुनाथा।।
अर्थ · Hindi
महिमा नाम रूप गुन गाथा। सकल अमित अनंत रघुनाथा।।
- RCM 7.91.4Open verse →
निज निज मति मुनि हरि गुन गावहिं। निगम सेष सिव पार न पावहिं।।
अर्थ · Hindi
निज निज मति मुनि हरि गुन गावहिं। निगम सेष सिव पार न पावहिं।।
- RCM 7.91.5Open verse →
तुम्हहि आदि खग मसक प्रजंता। नभ उड़ाहिं नहिं पावहिं अंता।।
अर्थ · Hindi
तुम्हहि आदि खग मसक प्रजंता। नभ उड़ाहिं नहिं पावहिं अंता।।
- RCM 7.91.6Open verse →
तिमि रघुपति महिमा अवगाहा। तात कबहुँ कोउ पाव कि थाहा।।
अर्थ · Hindi
तिमि रघुपति महिमा अवगाहा। तात कबहुँ कोउ पाव कि थाहा।।
- RCM 7.91.7Open verse →
रामु काम सत कोटि सुभग तन। दुर्गा कोटि अमित अरि मर्दन।।
अर्थ · Hindi
रामु काम सत कोटि सुभग तन। दुर्गा कोटि अमित अरि मर्दन।।
- RCM 7.91.8Open verse →
सक्र कोटि सत सरिस बिलासा। नभ सत कोटि अमित अवकासा।।
अर्थ · Hindi
सक्र कोटि सत सरिस बिलासा। नभ सत कोटि अमित अवकासा।।
- RCM 7.92.1Open verse →
प्रभु अगाध सत कोटि पताला। समन कोटि सत सरिस कराला।।
अर्थ · Hindi
प्रभु अगाध सत कोटि पताला। समन कोटि सत सरिस कराला।।
- RCM 7.92.2Open verse →
तीरथ अमित कोटि सम पावन। नाम अखिल अघ पूग नसावन।।
अर्थ · Hindi
तीरथ अमित कोटि सम पावन। नाम अखिल अघ पूग नसावन।।
- RCM 7.92.3Open verse →
हिमगिरि कोटि अचल रघुबीरा। सिंधु कोटि सत सम गंभीरा।।
अर्थ · Hindi
हिमगिरि कोटि अचल रघुबीरा। सिंधु कोटि सत सम गंभीरा।।
- RCM 7.92.4Open verse →
कामधेनु सत कोटि समाना। सकल काम दायक भगवाना।।
अर्थ · Hindi
कामधेनु सत कोटि समाना। सकल काम दायक भगवाना।।
- RCM 7.92.5Open verse →
सारद कोटि अमित चतुराई। बिधि सत कोटि सृष्टि निपुनाई।।
अर्थ · Hindi
सारद कोटि अमित चतुराई। बिधि सत कोटि सृष्टि निपुनाई।।
- RCM 7.92.6Open verse →
बिष्नु कोटि सम पालन कर्ता। रुद्र कोटि सत सम संहर्ता।।
अर्थ · Hindi
बिष्नु कोटि सम पालन कर्ता। रुद्र कोटि सत सम संहर्ता।।
- RCM 7.92.7Open verse →
धनद कोटि सत सम धनवाना। माया कोटि प्रपंच निधाना।।
अर्थ · Hindi
धनद कोटि सत सम धनवाना। माया कोटि प्रपंच निधाना।।
- RCM 7.92.8Open verse →
भार धरन सत कोटि अहीसा। निरवधि निरुपम प्रभु जगदीसा।।
अर्थ · Hindi
भार धरन सत कोटि अहीसा। निरवधि निरुपम प्रभु जगदीसा।।
- RCM 7.93.1Open verse →
सुनि भुसुंडि के बचन सुहाए। हरषित खगपति पंख फुलाए।।
अर्थ · Hindi
सुनि भुसुंडि के बचन सुहाए। हरषित खगपति पंख फुलाए।।
- RCM 7.93.2Open verse →
नयन नीर मन अति हरषाना। श्रीरघुपति प्रताप उर आना।।
अर्थ · Hindi
नयन नीर मन अति हरषाना। श्रीरघुपति प्रताप उर आना।।
- RCM 7.93.3Open verse →
पाछिल मोह समुझि पछिताना। ब्रह्म अनादि मनुज करि माना।।
अर्थ · Hindi
पाछिल मोह समुझि पछिताना। ब्रह्म अनादि मनुज करि माना।।
- RCM 7.93.4Open verse →
पुनि पुनि काग चरन सिरु नावा। जानि राम सम प्रेम बढ़ावा।।
अर्थ · Hindi
पुनि पुनि काग चरन सिरु नावा। जानि राम सम प्रेम बढ़ावा।।
- RCM 7.93.5Open verse →
गुर बिनु भव निधि तरइ न कोई। जौं बिरंचि संकर सम होई।।
अर्थ · Hindi
गुर बिनु भव निधि तरइ न कोई। जौं बिरंचि संकर सम होई।।
- RCM 7.93.6Open verse →
संसय सर्प ग्रसेउ मोहि ताता। दुखद लहरि कुतर्क बहु ब्राता।।
अर्थ · Hindi
संसय सर्प ग्रसेउ मोहि ताता। दुखद लहरि कुतर्क बहु ब्राता।।
- RCM 7.93.7Open verse →
तव सरूप गारुड़ि रघुनायक। मोहि जिआयउ जन सुखदायक।।
अर्थ · Hindi
तव सरूप गारुड़ि रघुनायक। मोहि जिआयउ जन सुखदायक।।
- RCM 7.93.8Open verse →
तव प्रसाद मम मोह नसाना। राम रहस्य अनूपम जाना।।
अर्थ · Hindi
तव प्रसाद मम मोह नसाना। राम रहस्य अनूपम जाना।।
- RCM 7.94.1Open verse →
तुम्ह सर्बग्य तन्य तम पारा। सुमति सुसील सरल आचारा।।
अर्थ · Hindi
तुम्ह सर्बग्य तन्य तम पारा। सुमति सुसील सरल आचारा।।
- RCM 7.94.2Open verse →
ग्यान बिरति बिग्यान निवासा। रघुनायक के तुम्ह प्रिय दासा।।
अर्थ · Hindi
ग्यान बिरति बिग्यान निवासा। रघुनायक के तुम्ह प्रिय दासा।।
- RCM 7.94.3Open verse →
कारन कवन देह यह पाई। तात सकल मोहि कहहु बुझाई।।
अर्थ · Hindi
कारन कवन देह यह पाई। तात सकल मोहि कहहु बुझाई।।
- RCM 7.94.4Open verse →
राम चरित सर सुंदर स्वामी। पायहु कहाँ कहहु नभगामी।।
अर्थ · Hindi
राम चरित सर सुंदर स्वामी। पायहु कहाँ कहहु नभगामी।।
- RCM 7.94.5Open verse →
नाथ सुना मैं अस सिव पाहीं। महा प्रलयहुँ नास तव नाहीं।।
अर्थ · Hindi
नाथ सुना मैं अस सिव पाहीं। महा प्रलयहुँ नास तव नाहीं।।
- RCM 7.94.6Open verse →
मुधा बचन नहिं ईस्वर कहई। सोउ मोरें मन संसय अहई।।
अर्थ · Hindi
मुधा बचन नहिं ईस्वर कहई। सोउ मोरें मन संसय अहई।।
- RCM 7.94.7Open verse →
अग जग जीव नाग नर देवा। नाथ सकल जगु काल कलेवा।।
अर्थ · Hindi
अग जग जीव नाग नर देवा। नाथ सकल जगु काल कलेवा।।
- RCM 7.94.8Open verse →
अंड कटाह अमित लय कारी। कालु सदा दुरतिक्रम भारी।।
अर्थ · Hindi
अंड कटाह अमित लय कारी। कालु सदा दुरतिक्रम भारी।।
- RCM 7.95.1Open verse →
गरुड़ गिरा सुनि हरषेउ कागा। बोलेउ उमा परम अनुरागा।।
अर्थ · Hindi
गरुड़ गिरा सुनि हरषेउ कागा। बोलेउ उमा परम अनुरागा।।
- RCM 7.95.2Open verse →
धन्य धन्य तव मति उरगारी। प्रस्न तुम्हारि मोहि अति प्यारी।।
अर्थ · Hindi
धन्य धन्य तव मति उरगारी। प्रस्न तुम्हारि मोहि अति प्यारी।।
- RCM 7.95.3Open verse →
सुनि तव प्रस्न सप्रेम सुहाई। बहुत जनम कै सुधि मोहि आई।।
अर्थ · Hindi
सुनि तव प्रस्न सप्रेम सुहाई। बहुत जनम कै सुधि मोहि आई।।
- RCM 7.95.4Open verse →
सब निज कथा कहउँ मैं गाई। तात सुनहु सादर मन लाई।।
अर्थ · Hindi
सब निज कथा कहउँ मैं गाई। तात सुनहु सादर मन लाई।।
- RCM 7.95.5Open verse →
जप तप मख सम दम ब्रत दाना। बिरति बिबेक जोग बिग्याना।।
अर्थ · Hindi
जप तप मख सम दम ब्रत दाना। बिरति बिबेक जोग बिग्याना।।
- RCM 7.95.6Open verse →
सब कर फल रघुपति पद प्रेमा। तेहि बिनु कोउ न पावइ छेमा।।
अर्थ · Hindi
सब कर फल रघुपति पद प्रेमा। तेहि बिनु कोउ न पावइ छेमा।।
- RCM 7.95.7Open verse →
एहि तन राम भगति मैं पाई। ताते मोहि ममता अधिकाई।।
अर्थ · Hindi
एहि तन राम भगति मैं पाई। ताते मोहि ममता अधिकाई।।
- RCM 7.95.8Open verse →
जेहि तें कछु निज स्वारथ होई। तेहि पर ममता कर सब कोई।।
अर्थ · Hindi
जेहि तें कछु निज स्वारथ होई। तेहि पर ममता कर सब कोई।।
- RCM 7.96.1Open verse →
स्वारथ साँच जीव कहुँ एहा। मन क्रम बचन राम पद नेहा।।
अर्थ · Hindi
स्वारथ साँच जीव कहुँ एहा। मन क्रम बचन राम पद नेहा।।
- RCM 7.96.2Open verse →
सोइ पावन सोइ सुभग सरीरा। जो तनु पाइ भजिअ रघुबीरा।।
अर्थ · Hindi
सोइ पावन सोइ सुभग सरीरा। जो तनु पाइ भजिअ रघुबीरा।।
- RCM 7.96.3Open verse →
राम बिमुख लहि बिधि सम देही। कबि कोबिद न प्रसंसहिं तेही।।
अर्थ · Hindi
राम बिमुख लहि बिधि सम देही। कबि कोबिद न प्रसंसहिं तेही।।
- RCM 7.96.4Open verse →
राम भगति एहिं तन उर जामी। ताते मोहि परम प्रिय स्वामी।।
अर्थ · Hindi
राम भगति एहिं तन उर जामी। ताते मोहि परम प्रिय स्वामी।।
- RCM 7.96.5Open verse →
तजउँ न तन निज इच्छा मरना। तन बिनु बेद भजन नहिं बरना।।
अर्थ · Hindi
तजउँ न तन निज इच्छा मरना। तन बिनु बेद भजन नहिं बरना।।
- RCM 7.96.6Open verse →
प्रथम मोहँ मोहि बहुत बिगोवा। राम बिमुख सुख कबहुँ न सोवा।।
अर्थ · Hindi
प्रथम मोहँ मोहि बहुत बिगोवा। राम बिमुख सुख कबहुँ न सोवा।।
- RCM 7.96.7Open verse →
नाना जनम कर्म पुनि नाना। किए जोग जप तप मख दाना।।
अर्थ · Hindi
नाना जनम कर्म पुनि नाना। किए जोग जप तप मख दाना।।
- RCM 7.96.8Open verse →
कवन जोनि जनमेउँ जहँ नाहीं। मैं खगेस भ्रमि भ्रमि जग माहीं।।
अर्थ · Hindi
कवन जोनि जनमेउँ जहँ नाहीं। मैं खगेस भ्रमि भ्रमि जग माहीं।।
- RCM 7.96.9Open verse →
देखेउँ करि सब करम गोसाई। सुखी न भयउँ अबहिं की नाई।।
अर्थ · Hindi
देखेउँ करि सब करम गोसाई। सुखी न भयउँ अबहिं की नाई।।
- RCM 7.96.10Open verse →
सुधि मोहि नाथ जन्म बहु केरी। सिव प्रसाद मति मोहँ न घेरी।।
अर्थ · Hindi
सुधि मोहि नाथ जन्म बहु केरी। सिव प्रसाद मति मोहँ न घेरी।।
- RCM 7.97.1Open verse →
तेहि कलिजुग कोसलपुर जाई। जन्मत भयउँ सूद्र तनु पाई।।
अर्थ · Hindi
तेहि कलिजुग कोसलपुर जाई। जन्मत भयउँ सूद्र तनु पाई।।
- RCM 7.97.2Open verse →
सिव सेवक मन क्रम अरु बानी। आन देव निंदक अभिमानी।।
अर्थ · Hindi
सिव सेवक मन क्रम अरु बानी। आन देव निंदक अभिमानी।।
- RCM 7.97.3Open verse →
धन मद मत्त परम बाचाला। उग्रबुद्धि उर दंभ बिसाला।।
अर्थ · Hindi
धन मद मत्त परम बाचाला। उग्रबुद्धि उर दंभ बिसाला।।
- RCM 7.97.4Open verse →
जदपि रहेउँ रघुपति रजधानी। तदपि न कछु महिमा तब जानी।।
अर्थ · Hindi
जदपि रहेउँ रघुपति रजधानी। तदपि न कछु महिमा तब जानी।।
- RCM 7.97.5Open verse →
अब जाना मैं अवध प्रभावा। निगमागम पुरान अस गावा।।
अर्थ · Hindi
अब जाना मैं अवध प्रभावा। निगमागम पुरान अस गावा।।
- RCM 7.97.6Open verse →
कवनेहुँ जन्म अवध बस जोई। राम परायन सो परि होई।।
अर्थ · Hindi
कवनेहुँ जन्म अवध बस जोई। राम परायन सो परि होई।।
- RCM 7.97.7Open verse →
अवध प्रभाव जान तब प्रानी। जब उर बसहिं रामु धनुपानी।।
अर्थ · Hindi
अवध प्रभाव जान तब प्रानी। जब उर बसहिं रामु धनुपानी।।
- RCM 7.97.8Open verse →
सो कलिकाल कठिन उरगारी। पाप परायन सब नर नारी।।
अर्थ · Hindi
सो कलिकाल कठिन उरगारी। पाप परायन सब नर नारी।।
- RCM 7.98.1Open verse →
बरन धर्म नहिं आश्रम चारी। श्रुति बिरोध रत सब नर नारी।।
अर्थ · Hindi
बरन धर्म नहिं आश्रम चारी। श्रुति बिरोध रत सब नर नारी।।
- RCM 7.98.2Open verse →
द्विज श्रुति बेचक भूप प्रजासन। कोउ नहिं मान निगम अनुसासन।।
अर्थ · Hindi
द्विज श्रुति बेचक भूप प्रजासन। कोउ नहिं मान निगम अनुसासन।।
- RCM 7.98.3Open verse →
मारग सोइ जा कहुँ जोइ भावा। पंडित सोइ जो गाल बजावा।।
अर्थ · Hindi
मारग सोइ जा कहुँ जोइ भावा। पंडित सोइ जो गाल बजावा।।
- RCM 7.98.4Open verse →
मिथ्यारंभ दंभ रत जोई। ता कहुँ संत कहइ सब कोई।।
अर्थ · Hindi
मिथ्यारंभ दंभ रत जोई। ता कहुँ संत कहइ सब कोई।।
- RCM 7.98.5Open verse →
सोइ सयान जो परधन हारी। जो कर दंभ सो बड़ आचारी।।
अर्थ · Hindi
सोइ सयान जो परधन हारी। जो कर दंभ सो बड़ आचारी।।
- RCM 7.98.6Open verse →
जौ कह झूँठ मसखरी जाना। कलिजुग सोइ गुनवंत बखाना।।
अर्थ · Hindi
जौ कह झूँठ मसखरी जाना। कलिजुग सोइ गुनवंत बखाना।।
- RCM 7.98.7Open verse →
निराचार जो श्रुति पथ त्यागी। कलिजुग सोइ ग्यानी सो बिरागी।।
अर्थ · Hindi
निराचार जो श्रुति पथ त्यागी। कलिजुग सोइ ग्यानी सो बिरागी।।
- RCM 7.98.8Open verse →
जाकें नख अरु जटा बिसाला। सोइ तापस प्रसिद्ध कलिकाला।।
अर्थ · Hindi
जाकें नख अरु जटा बिसाला। सोइ तापस प्रसिद्ध कलिकाला।।
- RCM 7.99.1Open verse →
नारि बिबस नर सकल गोसाई। नाचहिं नट मर्कट की नाई।।
अर्थ · Hindi
नारि बिबस नर सकल गोसाई। नाचहिं नट मर्कट की नाई।।
- RCM 7.99.2Open verse →
सूद्र द्विजन्ह उपदेसहिं ग्याना। मेलि जनेऊ लेहिं कुदाना।।
अर्थ · Hindi
सूद्र द्विजन्ह उपदेसहिं ग्याना। मेलि जनेऊ लेहिं कुदाना।।
- RCM 7.99.3Open verse →
सब नर काम लोभ रत क्रोधी। देव बिप्र श्रुति संत बिरोधी।।
अर्थ · Hindi
सब नर काम लोभ रत क्रोधी। देव बिप्र श्रुति संत बिरोधी।।
- RCM 7.99.4Open verse →
गुन मंदिर सुंदर पति त्यागी। भजहिं नारि पर पुरुष अभागी।।
अर्थ · Hindi
गुन मंदिर सुंदर पति त्यागी। भजहिं नारि पर पुरुष अभागी।।
- RCM 7.99.5Open verse →
सौभागिनीं बिभूषन हीना। बिधवन्ह के सिंगार नबीना।।
अर्थ · Hindi
सौभागिनीं बिभूषन हीना। बिधवन्ह के सिंगार नबीना।।
- RCM 7.99.6Open verse →
गुर सिष बधिर अंध का लेखा। एक न सुनइ एक नहिं देखा।।
अर्थ · Hindi
गुर सिष बधिर अंध का लेखा। एक न सुनइ एक नहिं देखा।।
- RCM 7.99.7Open verse →
हरइ सिष्य धन सोक न हरई। सो गुर घोर नरक महुँ परई।।
अर्थ · Hindi
हरइ सिष्य धन सोक न हरई। सो गुर घोर नरक महुँ परई।।
- RCM 7.99.8Open verse →
मातु पिता बालकन्हि बोलाबहिं। उदर भरै सोइ धर्म सिखावहिं।।
अर्थ · Hindi
मातु पिता बालकन्हि बोलाबहिं। उदर भरै सोइ धर्म सिखावहिं।।
- RCM 7.100.1Open verse →
पर त्रिय लंपट कपट सयाने। मोह द्रोह ममता लपटाने।।
अर्थ · Hindi
पर त्रिय लंपट कपट सयाने। मोह द्रोह ममता लपटाने।।
- RCM 7.100.2Open verse →
तेइ अभेदबादी ग्यानी नर। देखा में चरित्र कलिजुग कर।।
अर्थ · Hindi
तेइ अभेदबादी ग्यानी नर। देखा में चरित्र कलिजुग कर।।
- RCM 7.100.3Open verse →
आपु गए अरु तिन्हहू घालहिं। जे कहुँ सत मारग प्रतिपालहिं।।
अर्थ · Hindi
आपु गए अरु तिन्हहू घालहिं। जे कहुँ सत मारग प्रतिपालहिं।।
- RCM 7.100.4Open verse →
कल्प कल्प भरि एक एक नरका। परहिं जे दूषहिं श्रुति करि तरका।।
अर्थ · Hindi
कल्प कल्प भरि एक एक नरका। परहिं जे दूषहिं श्रुति करि तरका।।
- RCM 7.100.5Open verse →
जे बरनाधम तेलि कुम्हारा। स्वपच किरात कोल कलवारा।।
अर्थ · Hindi
जे बरनाधम तेलि कुम्हारा। स्वपच किरात कोल कलवारा।।
- RCM 7.100.6Open verse →
नारि मुई गृह संपति नासी। मूड़ मुड़ाइ होहिं सन्यासी।।
अर्थ · Hindi
नारि मुई गृह संपति नासी। मूड़ मुड़ाइ होहिं सन्यासी।।
- RCM 7.100.7Open verse →
ते बिप्रन्ह सन आपु पुजावहिं। उभय लोक निज हाथ नसावहिं।।
अर्थ · Hindi
ते बिप्रन्ह सन आपु पुजावहिं। उभय लोक निज हाथ नसावहिं।।
- RCM 7.100.8Open verse →
बिप्र निरच्छर लोलुप कामी। निराचार सठ बृषली स्वामी।।
अर्थ · Hindi
बिप्र निरच्छर लोलुप कामी। निराचार सठ बृषली स्वामी।।
- RCM 7.100.9Open verse →
सूद्र करहिं जप तप ब्रत नाना। बैठि बरासन कहहिं पुराना।।
अर्थ · Hindi
सूद्र करहिं जप तप ब्रत नाना। बैठि बरासन कहहिं पुराना।।
- RCM 7.100.10Open verse →
सब नर कल्पित करहिं अचारा। जाइ न बरनि अनीति अपारा।।
अर्थ · Hindi
सब नर कल्पित करहिं अचारा। जाइ न बरनि अनीति अपारा।।
- RCM 7.101.1Open verse →
बहु दाम सँवारहिं धाम जती। बिषया हरि लीन्हि न रहि बिरती।।
अर्थ · Hindi
बहु दाम सँवारहिं धाम जती। बिषया हरि लीन्हि न रहि बिरती।।
- RCM 7.101.2Open verse →
तपसी धनवंत दरिद्र गृही। कलि कौतुक तात न जात कही।।
अर्थ · Hindi
तपसी धनवंत दरिद्र गृही। कलि कौतुक तात न जात कही।।
- RCM 7.101.3Open verse →
कुलवंति निकारहिं नारि सती। गृह आनिहिं चेरी निबेरि गती।।
अर्थ · Hindi
कुलवंति निकारहिं नारि सती। गृह आनिहिं चेरी निबेरि गती।।
- RCM 7.101.4Open verse →
सुत मानहिं मातु पिता तब लौं। अबलानन दीख नहीं जब लौं।।
अर्थ · Hindi
सुत मानहिं मातु पिता तब लौं। अबलानन दीख नहीं जब लौं।।
- RCM 7.101.5Open verse →
ससुरारि पिआरि लगी जब तें। रिपरूप कुटुंब भए तब तें।।
अर्थ · Hindi
ससुरारि पिआरि लगी जब तें। रिपरूप कुटुंब भए तब तें।।
- RCM 7.101.6Open verse →
नृप पाप परायन धर्म नहीं। करि दंड बिडंब प्रजा नितहीं।।
अर्थ · Hindi
नृप पाप परायन धर्म नहीं। करि दंड बिडंब प्रजा नितहीं।।
- RCM 7.101.7Open verse →
धनवंत कुलीन मलीन अपी। द्विज चिन्ह जनेउ उघार तपी।।
अर्थ · Hindi
धनवंत कुलीन मलीन अपी। द्विज चिन्ह जनेउ उघार तपी।।
- RCM 7.101.8Open verse →
नहिं मान पुरान न बेदहि जो। हरि सेवक संत सही कलि सो।।
अर्थ · Hindi
नहिं मान पुरान न बेदहि जो। हरि सेवक संत सही कलि सो।।
- RCM 7.101.9Open verse →
कबि बृंद उदार दुनी न सुनी। गुन दूषक ब्रात न कोपि गुनी।।
अर्थ · Hindi
कबि बृंद उदार दुनी न सुनी। गुन दूषक ब्रात न कोपि गुनी।।
- RCM 7.101.10Open verse →
कलि बारहिं बार दुकाल परै। बिनु अन्न दुखी सब लोग मरै।।
अर्थ · Hindi
कलि बारहिं बार दुकाल परै। बिनु अन्न दुखी सब लोग मरै।।
- RCM 7.102.1Open verse →
अबला कच भूषन भूरि छुधा। धनहीन दुखी ममता बहुधा।।
अर्थ · Hindi
अबला कच भूषन भूरि छुधा। धनहीन दुखी ममता बहुधा।।
- RCM 7.102.2Open verse →
सुख चाहहिं मूढ़ न धर्म रता। मति थोरि कठोरि न कोमलता।।1।।
अर्थ · Hindi
सुख चाहहिं मूढ़ न धर्म रता। मति थोरि कठोरि न कोमलता।।1।।
- RCM 7.102.3Open verse →
नर पीड़ित रोग न भोग कहीं। अभिमान बिरोध अकारनहीं।।
अर्थ · Hindi
नर पीड़ित रोग न भोग कहीं। अभिमान बिरोध अकारनहीं।।
- RCM 7.102.4Open verse →
लघु जीवन संबतु पंच दसा। कलपांत न नास गुमानु असा।।2।।
अर्थ · Hindi
लघु जीवन संबतु पंच दसा। कलपांत न नास गुमानु असा।।2।।
- RCM 7.102.5Open verse →
कलिकाल बिहाल किए मनुजा। नहिं मानत क्वौ अनुजा तनुजा।
अर्थ · Hindi
कलिकाल बिहाल किए मनुजा। नहिं मानत क्वौ अनुजा तनुजा।
- RCM 7.102.6Open verse →
नहिं तोष बिचार न सीतलता। सब जाति कुजाति भए मगता।।3।।
अर्थ · Hindi
नहिं तोष बिचार न सीतलता। सब जाति कुजाति भए मगता।।3।।
- RCM 7.102.7Open verse →
इरिषा परुषाच्छर लोलुपता। भरि पूरि रही समता बिगता।।
अर्थ · Hindi
इरिषा परुषाच्छर लोलुपता। भरि पूरि रही समता बिगता।।
- RCM 7.102.8Open verse →
सब लोग बियोग बिसोक हुए। बरनाश्रम धर्म अचार गए।।4।।
अर्थ · Hindi
सब लोग बियोग बिसोक हुए। बरनाश्रम धर्म अचार गए।।4।।
- RCM 7.102.9Open verse →
दम दान दया नहिं जानपनी। जड़ता परबंचनताति घनी।।
अर्थ · Hindi
दम दान दया नहिं जानपनी। जड़ता परबंचनताति घनी।।
- RCM 7.102.10Open verse →
तनु पोषक नारि नरा सगरे। परनिंदक जे जग मो बगरे।।5।।
अर्थ · Hindi
तनु पोषक नारि नरा सगरे। परनिंदक जे जग मो बगरे।।5।।
- RCM 7.103.1Open verse →
कृतजुग सब जोगी बिग्यानी। करि हरि ध्यान तरहिं भव प्रानी।।
अर्थ · Hindi
कृतजुग सब जोगी बिग्यानी। करि हरि ध्यान तरहिं भव प्रानी।।
- RCM 7.103.2Open verse →
त्रेताँ बिबिध जग्य नर करहीं। प्रभुहि समर्पि कर्म भव तरहीं।।
अर्थ · Hindi
त्रेताँ बिबिध जग्य नर करहीं। प्रभुहि समर्पि कर्म भव तरहीं।।
- RCM 7.103.3Open verse →
द्वापर करि रघुपति पद पूजा। नर भव तरहिं उपाय न दूजा।।
अर्थ · Hindi
द्वापर करि रघुपति पद पूजा। नर भव तरहिं उपाय न दूजा।।
- RCM 7.103.4Open verse →
कलिजुग केवल हरि गुन गाहा। गावत नर पावहिं भव थाहा।।
अर्थ · Hindi
कलिजुग केवल हरि गुन गाहा। गावत नर पावहिं भव थाहा।।
- RCM 7.103.5Open verse →
कलिजुग जोग न जग्य न ग्याना। एक अधार राम गुन गाना।।
अर्थ · Hindi
कलिजुग जोग न जग्य न ग्याना। एक अधार राम गुन गाना।।
- RCM 7.103.6Open verse →
सब भरोस तजि जो भज रामहि। प्रेम समेत गाव गुन ग्रामहि।।
अर्थ · Hindi
सब भरोस तजि जो भज रामहि। प्रेम समेत गाव गुन ग्रामहि।।
- RCM 7.103.7Open verse →
सोइ भव तर कछु संसय नाहीं। नाम प्रताप प्रगट कलि माहीं।।
अर्थ · Hindi
सोइ भव तर कछु संसय नाहीं। नाम प्रताप प्रगट कलि माहीं।।
- RCM 7.103.8Open verse →
कलि कर एक पुनीत प्रतापा। मानस पुन्य होहिं नहिं पापा।।
अर्थ · Hindi
कलि कर एक पुनीत प्रतापा। मानस पुन्य होहिं नहिं पापा।।
- RCM 7.104.1Open verse →
नित जुग धर्म होहिं सब केरे। हृदयँ राम माया के प्रेरे।।
अर्थ · Hindi
नित जुग धर्म होहिं सब केरे। हृदयँ राम माया के प्रेरे।।
- RCM 7.104.2Open verse →
सुद्ध सत्व समता बिग्याना। कृत प्रभाव प्रसन्न मन जाना।।
अर्थ · Hindi
सुद्ध सत्व समता बिग्याना। कृत प्रभाव प्रसन्न मन जाना।।
- RCM 7.104.3Open verse →
सत्व बहुत रज कछु रति कर्मा। सब बिधि सुख त्रेता कर धर्मा।।
अर्थ · Hindi
सत्व बहुत रज कछु रति कर्मा। सब बिधि सुख त्रेता कर धर्मा।।
- RCM 7.104.4Open verse →
बहु रज स्वल्प सत्व कछु तामस। द्वापर धर्म हरष भय मानस।।
अर्थ · Hindi
बहु रज स्वल्प सत्व कछु तामस। द्वापर धर्म हरष भय मानस।।
- RCM 7.104.5Open verse →
तामस बहुत रजोगुन थोरा। कलि प्रभाव बिरोध चहुँ ओरा।।
अर्थ · Hindi
तामस बहुत रजोगुन थोरा। कलि प्रभाव बिरोध चहुँ ओरा।।
- RCM 7.104.6Open verse →
बुध जुग धर्म जानि मन माहीं। तजि अधर्म रति धर्म कराहीं।।
अर्थ · Hindi
बुध जुग धर्म जानि मन माहीं। तजि अधर्म रति धर्म कराहीं।।
- RCM 7.104.7Open verse →
काल धर्म नहिं ब्यापहिं ताही। रघुपति चरन प्रीति अति जाही।।
अर्थ · Hindi
काल धर्म नहिं ब्यापहिं ताही। रघुपति चरन प्रीति अति जाही।।
- RCM 7.104.8Open verse →
नट कृत बिकट कपट खगराया। नट सेवकहि न ब्यापइ माया।।
अर्थ · Hindi
नट कृत बिकट कपट खगराया। नट सेवकहि न ब्यापइ माया।।
- RCM 7.105.1Open verse →
गयउँ उजेनी सुनु उरगारी। दीन मलीन दरिद्र दुखारी।।
अर्थ · Hindi
गयउँ उजेनी सुनु उरगारी। दीन मलीन दरिद्र दुखारी।।
- RCM 7.105.2Open verse →
गएँ काल कछु संपति पाई। तहँ पुनि करउँ संभु सेवकाई।।
अर्थ · Hindi
गएँ काल कछु संपति पाई। तहँ पुनि करउँ संभु सेवकाई।।
- RCM 7.105.3Open verse →
बिप्र एक बैदिक सिव पूजा। करइ सदा तेहि काजु न दूजा।।
अर्थ · Hindi
बिप्र एक बैदिक सिव पूजा। करइ सदा तेहि काजु न दूजा।।
- RCM 7.105.4Open verse →
परम साधु परमारथ बिंदक। संभु उपासक नहिं हरि निंदक।।
अर्थ · Hindi
परम साधु परमारथ बिंदक। संभु उपासक नहिं हरि निंदक।।
- RCM 7.105.5Open verse →
तेहि सेवउँ मैं कपट समेता। द्विज दयाल अति नीति निकेता।।
अर्थ · Hindi
तेहि सेवउँ मैं कपट समेता। द्विज दयाल अति नीति निकेता।।
- RCM 7.105.6Open verse →
बाहिज नम्र देखि मोहि साईं। बिप्र पढ़ाव पुत्र की नाईं।।
अर्थ · Hindi
बाहिज नम्र देखि मोहि साईं। बिप्र पढ़ाव पुत्र की नाईं।।
- RCM 7.105.7Open verse →
संभु मंत्र मोहि द्विजबर दीन्हा। सुभ उपदेस बिबिध बिधि कीन्हा।।
अर्थ · Hindi
संभु मंत्र मोहि द्विजबर दीन्हा। सुभ उपदेस बिबिध बिधि कीन्हा।।
- RCM 7.105.8Open verse →
जपउँ मंत्र सिव मंदिर जाई। हृदयँ दंभ अहमिति अधिकाई।।
अर्थ · Hindi
जपउँ मंत्र सिव मंदिर जाई। हृदयँ दंभ अहमिति अधिकाई।।
- RCM 7.106.1Open verse →
एक बार गुर लीन्ह बोलाई। मोहि नीति बहु भाँति सिखाई।।
अर्थ · Hindi
एक बार गुर लीन्ह बोलाई। मोहि नीति बहु भाँति सिखाई।।
- RCM 7.106.2Open verse →
सिव सेवा कर फल सुत सोई। अबिरल भगति राम पद होई।।
अर्थ · Hindi
सिव सेवा कर फल सुत सोई। अबिरल भगति राम पद होई।।
- RCM 7.106.3Open verse →
रामहि भजहिं तात सिव धाता। नर पावँर कै केतिक बाता।।
अर्थ · Hindi
रामहि भजहिं तात सिव धाता। नर पावँर कै केतिक बाता।।
- RCM 7.106.4Open verse →
जासु चरन अज सिव अनुरागी। तातु द्रोहँ सुख चहसि अभागी।।
अर्थ · Hindi
जासु चरन अज सिव अनुरागी। तातु द्रोहँ सुख चहसि अभागी।।
- RCM 7.106.5Open verse →
हर कहुँ हरि सेवक गुर कहेऊ। सुनि खगनाथ हृदय मम दहेऊ।।
अर्थ · Hindi
हर कहुँ हरि सेवक गुर कहेऊ। सुनि खगनाथ हृदय मम दहेऊ।।
- RCM 7.106.6Open verse →
अधम जाति मैं बिद्या पाएँ। भयउँ जथा अहि दूध पिआएँ।।
अर्थ · Hindi
अधम जाति मैं बिद्या पाएँ। भयउँ जथा अहि दूध पिआएँ।।
- RCM 7.106.7Open verse →
मानी कुटिल कुभाग्य कुजाती। गुर कर द्रोह करउँ दिनु राती।।
अर्थ · Hindi
मानी कुटिल कुभाग्य कुजाती। गुर कर द्रोह करउँ दिनु राती।।
- RCM 7.106.8Open verse →
अति दयाल गुर स्वल्प न क्रोधा। पुनि पुनि मोहि सिखाव सुबोधा।।
अर्थ · Hindi
अति दयाल गुर स्वल्प न क्रोधा। पुनि पुनि मोहि सिखाव सुबोधा।।
- RCM 7.106.9Open verse →
जेहि ते नीच बड़ाई पावा। सो प्रथमहिं हति ताहि नसावा।।
अर्थ · Hindi
जेहि ते नीच बड़ाई पावा। सो प्रथमहिं हति ताहि नसावा।।
- RCM 7.106.10Open verse →
धूम अनल संभव सुनु भाई। तेहि बुझाव घन पदवी पाई।।
अर्थ · Hindi
धूम अनल संभव सुनु भाई। तेहि बुझाव घन पदवी पाई।।
- RCM 7.106.11Open verse →
रज मग परी निरादर रहई। सब कर पद प्रहार नित सहई।।
अर्थ · Hindi
रज मग परी निरादर रहई। सब कर पद प्रहार नित सहई।।
- RCM 7.106.12Open verse →
मरुत उड़ाव प्रथम तेहि भरई। पुनि नृप नयन किरीटन्हि परई।।
अर्थ · Hindi
मरुत उड़ाव प्रथम तेहि भरई। पुनि नृप नयन किरीटन्हि परई।।
- RCM 7.106.13Open verse →
सुनु खगपति अस समुझि प्रसंगा। बुध नहिं करहिं अधम कर संगा।।
अर्थ · Hindi
सुनु खगपति अस समुझि प्रसंगा। बुध नहिं करहिं अधम कर संगा।।
- RCM 7.106.14Open verse →
कबि कोबिद गावहिं असि नीती। खल सन कलह न भल नहिं प्रीती।।
अर्थ · Hindi
कबि कोबिद गावहिं असि नीती। खल सन कलह न भल नहिं प्रीती।।
- RCM 7.106.15Open verse →
उदासीन नित रहिअ गोसाईं। खल परिहरिअ स्वान की नाईं।।
अर्थ · Hindi
उदासीन नित रहिअ गोसाईं। खल परिहरिअ स्वान की नाईं।।
- RCM 7.106.16Open verse →
मैं खल हृदयँ कपट कुटिलाई। गुर हित कहइ न मोहि सोहाई।।
अर्थ · Hindi
मैं खल हृदयँ कपट कुटिलाई। गुर हित कहइ न मोहि सोहाई।।
- RCM 7.107.1Open verse →
मंदिर माझ भई नभ बानी। रे हतभाग्य अग्य अभिमानी।।
अर्थ · Hindi
मंदिर माझ भई नभ बानी। रे हतभाग्य अग्य अभिमानी।।
- RCM 7.107.2Open verse →
जद्यपि तव गुर कें नहिं क्रोधा। अति कृपाल चित सम्यक बोधा।।
अर्थ · Hindi
जद्यपि तव गुर कें नहिं क्रोधा। अति कृपाल चित सम्यक बोधा।।
- RCM 7.107.3Open verse →
तदपि साप सठ दैहउँ तोही। नीति बिरोध सोहाइ न मोही।।
अर्थ · Hindi
तदपि साप सठ दैहउँ तोही। नीति बिरोध सोहाइ न मोही।।
- RCM 7.107.4Open verse →
जौं नहिं दंड करौं खल तोरा। भ्रष्ट होइ श्रुतिमारग मोरा।।
अर्थ · Hindi
जौं नहिं दंड करौं खल तोरा। भ्रष्ट होइ श्रुतिमारग मोरा।।
- RCM 7.107.5Open verse →
जे सठ गुर सन इरिषा करहीं। रौरव नरक कोटि जुग परहीं।।
अर्थ · Hindi
जे सठ गुर सन इरिषा करहीं। रौरव नरक कोटि जुग परहीं।।
- RCM 7.107.6Open verse →
त्रिजग जोनि पुनि धरहिं सरीरा। अयुत जन्म भरि पावहिं पीरा।।
अर्थ · Hindi
त्रिजग जोनि पुनि धरहिं सरीरा। अयुत जन्म भरि पावहिं पीरा।।
- RCM 7.107.7Open verse →
बैठ रहेसि अजगर इव पापी। सर्प होहि खल मल मति ब्यापी।।
अर्थ · Hindi
बैठ रहेसि अजगर इव पापी। सर्प होहि खल मल मति ब्यापी।।
- RCM 7.107.8Open verse →
महा बिटप कोटर महुँ जाई।।रहु अधमाधम अधगति पाई।।
अर्थ · Hindi
महा बिटप कोटर महुँ जाई।।रहु अधमाधम अधगति पाई।।
- RCM 7.108.1Open verse →
नमामीशमीशान निर्वाणरूपं। विंभुं ब्यापकं ब्रह्म वेदस्वरूपं।
अर्थ · Hindi
नमामीशमीशान निर्वाणरूपं। विंभुं ब्यापकं ब्रह्म वेदस्वरूपं।
- RCM 7.108.2Open verse →
निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरींह। चिदाकाशमाकाशवासं भजेऽहं।।
अर्थ · Hindi
निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरींह। चिदाकाशमाकाशवासं भजेऽहं।।
- RCM 7.108.3Open verse →
निराकारमोंकारमूलं तुरीयं। गिरा ग्यान गोतीतमीशं गिरीशं।।
अर्थ · Hindi
निराकारमोंकारमूलं तुरीयं। गिरा ग्यान गोतीतमीशं गिरीशं।।
- RCM 7.108.4Open verse →
करालं महाकाल कालं कृपालं। गुणागार संसारपारं नतोऽहं।।
अर्थ · Hindi
करालं महाकाल कालं कृपालं। गुणागार संसारपारं नतोऽहं।।
- RCM 7.108.5Open verse →
तुषाराद्रि संकाश गौरं गभीरं। मनोभूत कोटि प्रभा श्री शरीरं।।
अर्थ · Hindi
तुषाराद्रि संकाश गौरं गभीरं। मनोभूत कोटि प्रभा श्री शरीरं।।
- RCM 7.108.6Open verse →
स्फुरन्मौलि कल्लोलिनी चारु गंगा। लसद्भालबालेन्दु कंठे भुजंगा।।
अर्थ · Hindi
स्फुरन्मौलि कल्लोलिनी चारु गंगा। लसद्भालबालेन्दु कंठे भुजंगा।।
- RCM 7.108.7Open verse →
चलत्कुंडलं भ्रू सुनेत्रं विशालं। प्रसन्नाननं नीलकंठं दयालं।।
अर्थ · Hindi
चलत्कुंडलं भ्रू सुनेत्रं विशालं। प्रसन्नाननं नीलकंठं दयालं।।
- RCM 7.108.8Open verse →
मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं। प्रियं शंकरं सर्वनाथं भजामि।।
अर्थ · Hindi
मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं। प्रियं शंकरं सर्वनाथं भजामि।।
- RCM 7.108.9Open verse →
प्रचंडं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं। अखंडं अजं भानुकोटिप्रकाशं।।
अर्थ · Hindi
प्रचंडं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं। अखंडं अजं भानुकोटिप्रकाशं।।
- RCM 7.108.10Open verse →
त्रयःशूल निर्मूलनं शूलपाणिं। भजेऽहं भवानीपतिं भावगम्यं।।
अर्थ · Hindi
त्रयःशूल निर्मूलनं शूलपाणिं। भजेऽहं भवानीपतिं भावगम्यं।।
- RCM 7.108.11Open verse →
कलातीत कल्याण कल्पान्तकारी। सदा सज्जनान्ददाता पुरारी।।
अर्थ · Hindi
कलातीत कल्याण कल्पान्तकारी। सदा सज्जनान्ददाता पुरारी।।
- RCM 7.108.12Open verse →
चिदानंदसंदोह मोहापहारी। प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी।।
अर्थ · Hindi
चिदानंदसंदोह मोहापहारी। प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी।।
- RCM 7.108.13Open verse →
न यावद् उमानाथ पादारविन्दं। भजंतीह लोके परे वा नराणां।।
अर्थ · Hindi
न यावद् उमानाथ पादारविन्दं। भजंतीह लोके परे वा नराणां।।
- RCM 7.108.14Open verse →
न तावत्सुखं शान्ति सन्तापनाशं। प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासं।।
अर्थ · Hindi
न तावत्सुखं शान्ति सन्तापनाशं। प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासं।।
- RCM 7.108.15Open verse →
न जानामि योगं जपं नैव पूजां। नतोऽहं सदा सर्वदा शंभु तुभ्यं।।
अर्थ · Hindi
न जानामि योगं जपं नैव पूजां। नतोऽहं सदा सर्वदा शंभु तुभ्यं।।
- RCM 7.108.16Open verse →
जरा जन्म दुःखौघ तातप्यमानं। प्रभो पाहि आपन्नमामीश शंभो।।
अर्थ · Hindi
जरा जन्म दुःखौघ तातप्यमानं। प्रभो पाहि आपन्नमामीश शंभो।।
- RCM 7.108.17Open verse →
श्लोक
अर्थ · Hindi
श्लोक
- RCM 7.108.18Open verse →
रुद्राष्टकमिदं प्रोक्तं विप्रेण हरतोषये।
अर्थ · Hindi
रुद्राष्टकमिदं प्रोक्तं विप्रेण हरतोषये।
- RCM 7.108.19Open verse →
ये पठन्ति नरा भक्त्या तेषां शम्भुः प्रसीदति।।9।।
अर्थ · Hindi
ये पठन्ति नरा भक्त्या तेषां शम्भुः प्रसीदति।।9।।
- RCM 7.108.20Open verse →
सुनि बिनती सर्बग्य सिव देखि ब्रिप्र अनुरागु।
अर्थ · Hindi
सुनि बिनती सर्बग्य सिव देखि ब्रिप्र अनुरागु।
- RCM 7.108.21Open verse →
पुनि मंदिर नभबानी भइ द्विजबर बर मागु।।108(क)।।
अर्थ · Hindi
पुनि मंदिर नभबानी भइ द्विजबर बर मागु।।108(क)।।
- RCM 7.108.22Open verse →
जौं प्रसन्न प्रभु मो पर नाथ दीन पर नेहु।
अर्थ · Hindi
जौं प्रसन्न प्रभु मो पर नाथ दीन पर नेहु।
- RCM 7.108.23Open verse →
निज पद भगति देइ प्रभु पुनि दूसर बर देहु।।108(ख)।।
अर्थ · Hindi
निज पद भगति देइ प्रभु पुनि दूसर बर देहु।।108(ख)।।
- RCM 7.108.24Open verse →
तव माया बस जीव जड़ संतत फिरइ भुलान।
अर्थ · Hindi
तव माया बस जीव जड़ संतत फिरइ भुलान।
- RCM 7.108.25Open verse →
तेहि पर क्रोध न करिअ प्रभु कृपा सिंधु भगवान।।108(ग)।।
अर्थ · Hindi
तेहि पर क्रोध न करिअ प्रभु कृपा सिंधु भगवान।।108(ग)।।
- RCM 7.108.26Open verse →
संकर दीनदयाल अब एहि पर होहु कृपाल।
अर्थ · Hindi
संकर दीनदयाल अब एहि पर होहु कृपाल।
- RCM 7.108.27Open verse →
साप अनुग्रह होइ जेहिं नाथ थोरेहीं काल।।108(घ)।।
अर्थ · Hindi
साप अनुग्रह होइ जेहिं नाथ थोरेहीं काल।।108(घ)।।
- RCM 7.109.1Open verse →
एहि कर होइ परम कल्याना। सोइ करहु अब कृपानिधाना।।
अर्थ · Hindi
एहि कर होइ परम कल्याना। सोइ करहु अब कृपानिधाना।।
- RCM 7.109.2Open verse →
बिप्रगिरा सुनि परहित सानी। एवमस्तु इति भइ नभबानी।।
अर्थ · Hindi
बिप्रगिरा सुनि परहित सानी। एवमस्तु इति भइ नभबानी।।
- RCM 7.109.3Open verse →
जदपि कीन्ह एहिं दारुन पापा। मैं पुनि दीन्ह कोप करि सापा।।
अर्थ · Hindi
जदपि कीन्ह एहिं दारुन पापा। मैं पुनि दीन्ह कोप करि सापा।।
- RCM 7.109.4Open verse →
तदपि तुम्हार साधुता देखी। करिहउँ एहि पर कृपा बिसेषी।।
अर्थ · Hindi
तदपि तुम्हार साधुता देखी। करिहउँ एहि पर कृपा बिसेषी।।
- RCM 7.109.5Open verse →
छमासील जे पर उपकारी। ते द्विज मोहि प्रिय जथा खरारी।।
अर्थ · Hindi
छमासील जे पर उपकारी। ते द्विज मोहि प्रिय जथा खरारी।।
- RCM 7.109.6Open verse →
मोर श्राप द्विज ब्यर्थ न जाइहि। जन्म सहस अवस्य यह पाइहि।।
अर्थ · Hindi
मोर श्राप द्विज ब्यर्थ न जाइहि। जन्म सहस अवस्य यह पाइहि।।
- RCM 7.109.7Open verse →
जनमत मरत दुसह दुख होई। अहि स्वल्पउ नहिं ब्यापिहि सोई।।
अर्थ · Hindi
जनमत मरत दुसह दुख होई। अहि स्वल्पउ नहिं ब्यापिहि सोई।।
- RCM 7.109.8Open verse →
कवनेउँ जन्म मिटिहि नहिं ग्याना। सुनहि सूद्र मम बचन प्रवाना।।
अर्थ · Hindi
कवनेउँ जन्म मिटिहि नहिं ग्याना। सुनहि सूद्र मम बचन प्रवाना।।
- RCM 7.109.9Open verse →
रघुपति पुरीं जन्म तब भयऊ। पुनि तैं मम सेवाँ मन दयऊ।।
अर्थ · Hindi
रघुपति पुरीं जन्म तब भयऊ। पुनि तैं मम सेवाँ मन दयऊ।।
- RCM 7.109.10Open verse →
पुरी प्रभाव अनुग्रह मोरें। राम भगति उपजिहि उर तोरें।।
अर्थ · Hindi
पुरी प्रभाव अनुग्रह मोरें। राम भगति उपजिहि उर तोरें।।
- RCM 7.109.11Open verse →
सुनु मम बचन सत्य अब भाई। हरितोषन ब्रत द्विज सेवकाई।।
अर्थ · Hindi
सुनु मम बचन सत्य अब भाई। हरितोषन ब्रत द्विज सेवकाई।।
- RCM 7.109.12Open verse →
अब जनि करहि बिप्र अपमाना। जानेहु संत अनंत समाना।।
अर्थ · Hindi
अब जनि करहि बिप्र अपमाना। जानेहु संत अनंत समाना।।
- RCM 7.109.13Open verse →
इंद्र कुलिस मम सूल बिसाला। कालदंड हरि चक्र कराला।।
अर्थ · Hindi
इंद्र कुलिस मम सूल बिसाला। कालदंड हरि चक्र कराला।।
- RCM 7.109.14Open verse →
जो इन्ह कर मारा नहिं मरई। बिप्रद्रोह पावक सो जरई।।
अर्थ · Hindi
जो इन्ह कर मारा नहिं मरई। बिप्रद्रोह पावक सो जरई।।
- RCM 7.109.15Open verse →
अस बिबेक राखेहु मन माहीं। तुम्ह कहँ जग दुर्लभ कछु नाहीं।।
अर्थ · Hindi
अस बिबेक राखेहु मन माहीं। तुम्ह कहँ जग दुर्लभ कछु नाहीं।।
- RCM 7.109.16Open verse →
औरउ एक आसिषा मोरी। अप्रतिहत गति होइहि तोरी।।
अर्थ · Hindi
औरउ एक आसिषा मोरी। अप्रतिहत गति होइहि तोरी।।
- RCM 7.110.1Open verse →
त्रिजग देव नर जोइ तनु धरउँ। तहँ तहँ राम भजन अनुसरऊँ।।
अर्थ · Hindi
त्रिजग देव नर जोइ तनु धरउँ। तहँ तहँ राम भजन अनुसरऊँ।।
- RCM 7.110.2Open verse →
एक सूल मोहि बिसर न काऊ। गुर कर कोमल सील सुभाऊ।।
अर्थ · Hindi
एक सूल मोहि बिसर न काऊ। गुर कर कोमल सील सुभाऊ।।
- RCM 7.110.3Open verse →
चरम देह द्विज कै मैं पाई। सुर दुर्लभ पुरान श्रुति गाई।।
अर्थ · Hindi
चरम देह द्विज कै मैं पाई। सुर दुर्लभ पुरान श्रुति गाई।।
- RCM 7.110.4Open verse →
खेलउँ तहूँ बालकन्ह मीला। करउँ सकल रघुनायक लीला।।
अर्थ · Hindi
खेलउँ तहूँ बालकन्ह मीला। करउँ सकल रघुनायक लीला।।
- RCM 7.110.5Open verse →
प्रौढ़ भएँ मोहि पिता पढ़ावा। समझउँ सुनउँ गुनउँ नहिं भावा।।
अर्थ · Hindi
प्रौढ़ भएँ मोहि पिता पढ़ावा। समझउँ सुनउँ गुनउँ नहिं भावा।।
- RCM 7.110.6Open verse →
मन ते सकल बासना भागी। केवल राम चरन लय लागी।।
अर्थ · Hindi
मन ते सकल बासना भागी। केवल राम चरन लय लागी।।
- RCM 7.110.7Open verse →
कहु खगेस अस कवन अभागी। खरी सेव सुरधेनुहि त्यागी।।
अर्थ · Hindi
कहु खगेस अस कवन अभागी। खरी सेव सुरधेनुहि त्यागी।।
- RCM 7.110.8Open verse →
प्रेम मगन मोहि कछु न सोहाई। हारेउ पिता पढ़ाइ पढ़ाई।।
अर्थ · Hindi
प्रेम मगन मोहि कछु न सोहाई। हारेउ पिता पढ़ाइ पढ़ाई।।
- RCM 7.110.9Open verse →
भए कालबस जब पितु माता। मैं बन गयउँ भजन जनत्राता।।
अर्थ · Hindi
भए कालबस जब पितु माता। मैं बन गयउँ भजन जनत्राता।।
- RCM 7.110.10Open verse →
जहँ जहँ बिपिन मुनीस्वर पावउँ। आश्रम जाइ जाइ सिरु नावउँ।।
अर्थ · Hindi
जहँ जहँ बिपिन मुनीस्वर पावउँ। आश्रम जाइ जाइ सिरु नावउँ।।
- RCM 7.110.11Open verse →
बूझत तिन्हहि राम गुन गाहा। कहहिं सुनउँ हरषित खगनाहा।।
अर्थ · Hindi
बूझत तिन्हहि राम गुन गाहा। कहहिं सुनउँ हरषित खगनाहा।।
- RCM 7.110.12Open verse →
सुनत फिरउँ हरि गुन अनुबादा। अब्याहत गति संभु प्रसादा।।
अर्थ · Hindi
सुनत फिरउँ हरि गुन अनुबादा। अब्याहत गति संभु प्रसादा।।
- RCM 7.110.13Open verse →
छूटी त्रिबिध ईषना गाढ़ी। एक लालसा उर अति बाढ़ी।।
अर्थ · Hindi
छूटी त्रिबिध ईषना गाढ़ी। एक लालसा उर अति बाढ़ी।।
- RCM 7.110.14Open verse →
राम चरन बारिज जब देखौं। तब निज जन्म सफल करि लेखौं।।
अर्थ · Hindi
राम चरन बारिज जब देखौं। तब निज जन्म सफल करि लेखौं।।
- RCM 7.110.15Open verse →
जेहि पूँछउँ सोइ मुनि अस कहई। ईस्वर सर्ब भूतमय अहई।।
अर्थ · Hindi
जेहि पूँछउँ सोइ मुनि अस कहई। ईस्वर सर्ब भूतमय अहई।।
- RCM 7.110.16Open verse →
निर्गुन मत नहिं मोहि सोहाई। सगुन ब्रह्म रति उर अधिकाई।।
अर्थ · Hindi
निर्गुन मत नहिं मोहि सोहाई। सगुन ब्रह्म रति उर अधिकाई।।
- RCM 7.111.1Open verse →
तब मुनिष रघुपति गुन गाथा। कहे कछुक सादर खगनाथा।।
अर्थ · Hindi
तब मुनिष रघुपति गुन गाथा। कहे कछुक सादर खगनाथा।।
- RCM 7.111.2Open verse →
ब्रह्मग्यान रत मुनि बिग्यानि। मोहि परम अधिकारी जानी।।
अर्थ · Hindi
ब्रह्मग्यान रत मुनि बिग्यानि। मोहि परम अधिकारी जानी।।
- RCM 7.111.3Open verse →
लागे करन ब्रह्म उपदेसा। अज अद्वेत अगुन हृदयेसा।।
अर्थ · Hindi
लागे करन ब्रह्म उपदेसा। अज अद्वेत अगुन हृदयेसा।।
- RCM 7.111.4Open verse →
अकल अनीह अनाम अरुपा। अनुभव गम्य अखंड अनूपा।।
अर्थ · Hindi
अकल अनीह अनाम अरुपा। अनुभव गम्य अखंड अनूपा।।
- RCM 7.111.5Open verse →
मन गोतीत अमल अबिनासी। निर्बिकार निरवधि सुख रासी।।
अर्थ · Hindi
मन गोतीत अमल अबिनासी। निर्बिकार निरवधि सुख रासी।।
- RCM 7.111.6Open verse →
सो तैं ताहि तोहि नहिं भेदा। बारि बीचि इव गावहि बेदा।।
अर्थ · Hindi
सो तैं ताहि तोहि नहिं भेदा। बारि बीचि इव गावहि बेदा।।
- RCM 7.111.7Open verse →
बिबिध भाँति मोहि मुनि समुझावा। निर्गुन मत मम हृदयँ न आवा।।
अर्थ · Hindi
बिबिध भाँति मोहि मुनि समुझावा। निर्गुन मत मम हृदयँ न आवा।।
- RCM 7.111.8Open verse →
पुनि मैं कहेउँ नाइ पद सीसा। सगुन उपासन कहहु मुनीसा।।
अर्थ · Hindi
पुनि मैं कहेउँ नाइ पद सीसा। सगुन उपासन कहहु मुनीसा।।
- RCM 7.111.9Open verse →
राम भगति जल मम मन मीना। किमि बिलगाइ मुनीस प्रबीना।।
अर्थ · Hindi
राम भगति जल मम मन मीना। किमि बिलगाइ मुनीस प्रबीना।।
- RCM 7.111.10Open verse →
सोइ उपदेस कहहु करि दाया। निज नयनन्हि देखौं रघुराया।।
अर्थ · Hindi
सोइ उपदेस कहहु करि दाया। निज नयनन्हि देखौं रघुराया।।
- RCM 7.111.11Open verse →
भरि लोचन बिलोकि अवधेसा। तब सुनिहउँ निर्गुन उपदेसा।।
अर्थ · Hindi
भरि लोचन बिलोकि अवधेसा। तब सुनिहउँ निर्गुन उपदेसा।।
- RCM 7.111.12Open verse →
मुनि पुनि कहि हरिकथा अनूपा। खंडि सगुन मत अगुन निरूपा।।
अर्थ · Hindi
मुनि पुनि कहि हरिकथा अनूपा। खंडि सगुन मत अगुन निरूपा।।
- RCM 7.111.13Open verse →
तब मैं निर्गुन मत कर दूरी। सगुन निरूपउँ करि हठ भूरी।।
अर्थ · Hindi
तब मैं निर्गुन मत कर दूरी। सगुन निरूपउँ करि हठ भूरी।।
- RCM 7.111.14Open verse →
उत्तर प्रतिउत्तर मैं कीन्हा। मुनि तन भए क्रोध के चीन्हा।।
अर्थ · Hindi
उत्तर प्रतिउत्तर मैं कीन्हा। मुनि तन भए क्रोध के चीन्हा।।
- RCM 7.111.15Open verse →
सुनु प्रभु बहुत अवग्या किएँ। उपज क्रोध ग्यानिन्ह के हिएँ।।
अर्थ · Hindi
सुनु प्रभु बहुत अवग्या किएँ। उपज क्रोध ग्यानिन्ह के हिएँ।।
- RCM 7.111.16Open verse →
अति संघरषन जौं कर कोई। अनल प्रगट चंदन ते होई।।
अर्थ · Hindi
अति संघरषन जौं कर कोई। अनल प्रगट चंदन ते होई।।
- RCM 7.112.1Open verse →
कबहुँ कि दुख सब कर हित ताकें। तेहि कि दरिद्र परस मनि जाकें।।
अर्थ · Hindi
कबहुँ कि दुख सब कर हित ताकें। तेहि कि दरिद्र परस मनि जाकें।।
- RCM 7.112.2Open verse →
परद्रोही की होहिं निसंका। कामी पुनि कि रहहिं अकलंका।।
अर्थ · Hindi
परद्रोही की होहिं निसंका। कामी पुनि कि रहहिं अकलंका।।
- RCM 7.112.3Open verse →
बंस कि रह द्विज अनहित कीन्हें। कर्म कि होहिं स्वरूपहि चीन्हें।।
अर्थ · Hindi
बंस कि रह द्विज अनहित कीन्हें। कर्म कि होहिं स्वरूपहि चीन्हें।।
- RCM 7.112.4Open verse →
काहू सुमति कि खल सँग जामी। सुभ गति पाव कि परत्रिय गामी।।
अर्थ · Hindi
काहू सुमति कि खल सँग जामी। सुभ गति पाव कि परत्रिय गामी।।
- RCM 7.112.5Open verse →
भव कि परहिं परमात्मा बिंदक। सुखी कि होहिं कबहुँ हरिनिंदक।।
अर्थ · Hindi
भव कि परहिं परमात्मा बिंदक। सुखी कि होहिं कबहुँ हरिनिंदक।।
- RCM 7.112.6Open verse →
राजु कि रहइ नीति बिनु जानें। अघ कि रहहिं हरिचरित बखानें।।
अर्थ · Hindi
राजु कि रहइ नीति बिनु जानें। अघ कि रहहिं हरिचरित बखानें।।
- RCM 7.112.7Open verse →
पावन जस कि पुन्य बिनु होई। बिनु अघ अजस कि पावइ कोई।।
अर्थ · Hindi
पावन जस कि पुन्य बिनु होई। बिनु अघ अजस कि पावइ कोई।।
- RCM 7.112.8Open verse →
लाभु कि किछु हरि भगति समाना। जेहि गावहिं श्रुति संत पुराना।।
अर्थ · Hindi
लाभु कि किछु हरि भगति समाना। जेहि गावहिं श्रुति संत पुराना।।
- RCM 7.112.9Open verse →
हानि कि जग एहि सम किछु भाई। भजिअ न रामहि नर तनु पाई।।
अर्थ · Hindi
हानि कि जग एहि सम किछु भाई। भजिअ न रामहि नर तनु पाई।।
- RCM 7.112.10Open verse →
अघ कि पिसुनता सम कछु आना। धर्म कि दया सरिस हरिजाना।।
अर्थ · Hindi
अघ कि पिसुनता सम कछु आना। धर्म कि दया सरिस हरिजाना।।
- RCM 7.112.11Open verse →
एहि बिधि अमिति जुगुति मन गुनऊँ। मुनि उपदेस न सादर सुनऊँ।।
अर्थ · Hindi
एहि बिधि अमिति जुगुति मन गुनऊँ। मुनि उपदेस न सादर सुनऊँ।।
- RCM 7.112.12Open verse →
पुनि पुनि सगुन पच्छ मैं रोपा। तब मुनि बोलेउ बचन सकोपा।।
अर्थ · Hindi
पुनि पुनि सगुन पच्छ मैं रोपा। तब मुनि बोलेउ बचन सकोपा।।
- RCM 7.112.13Open verse →
मूढ़ परम सिख देउँ न मानसि। उत्तर प्रतिउत्तर बहु आनसि।।
अर्थ · Hindi
मूढ़ परम सिख देउँ न मानसि। उत्तर प्रतिउत्तर बहु आनसि।।
- RCM 7.112.14Open verse →
सत्य बचन बिस्वास न करही। बायस इव सबही ते डरही।।
अर्थ · Hindi
सत्य बचन बिस्वास न करही। बायस इव सबही ते डरही।।
- RCM 7.112.15Open verse →
सठ स्वपच्छ तब हृदयँ बिसाला। सपदि होहि पच्छी चंडाला।।
अर्थ · Hindi
सठ स्वपच्छ तब हृदयँ बिसाला। सपदि होहि पच्छी चंडाला।।
- RCM 7.112.16Open verse →
लीन्ह श्राप मैं सीस चढ़ाई। नहिं कछु भय न दीनता आई।।
अर्थ · Hindi
लीन्ह श्राप मैं सीस चढ़ाई। नहिं कछु भय न दीनता आई।।
- RCM 7.113.1Open verse →
सुनु खगेस नहिं कछु रिषि दूषन। उर प्रेरक रघुबंस बिभूषन।।
अर्थ · Hindi
सुनु खगेस नहिं कछु रिषि दूषन। उर प्रेरक रघुबंस बिभूषन।।
- RCM 7.113.2Open verse →
कृपासिंधु मुनि मति करि भोरी। लीन्हि प्रेम परिच्छा मोरी।।
अर्थ · Hindi
कृपासिंधु मुनि मति करि भोरी। लीन्हि प्रेम परिच्छा मोरी।।
- RCM 7.113.3Open verse →
मन बच क्रम मोहि निज जन जाना। मुनि मति पुनि फेरी भगवाना।।
अर्थ · Hindi
मन बच क्रम मोहि निज जन जाना। मुनि मति पुनि फेरी भगवाना।।
- RCM 7.113.4Open verse →
रिषि मम महत सीलता देखी। राम चरन बिस्वास बिसेषी।।
अर्थ · Hindi
रिषि मम महत सीलता देखी। राम चरन बिस्वास बिसेषी।।
- RCM 7.113.5Open verse →
अति बिसमय पुनि पुनि पछिताई। सादर मुनि मोहि लीन्ह बोलाई।।
अर्थ · Hindi
अति बिसमय पुनि पुनि पछिताई। सादर मुनि मोहि लीन्ह बोलाई।।
- RCM 7.113.6Open verse →
मम परितोष बिबिध बिधि कीन्हा। हरषित राममंत्र तब दीन्हा।।
अर्थ · Hindi
मम परितोष बिबिध बिधि कीन्हा। हरषित राममंत्र तब दीन्हा।।
- RCM 7.113.7Open verse →
बालकरूप राम कर ध्याना। कहेउ मोहि मुनि कृपानिधाना।।
अर्थ · Hindi
बालकरूप राम कर ध्याना। कहेउ मोहि मुनि कृपानिधाना।।
- RCM 7.113.8Open verse →
सुंदर सुखद मिहि अति भावा। सो प्रथमहिं मैं तुम्हहि सुनावा।।
अर्थ · Hindi
सुंदर सुखद मिहि अति भावा। सो प्रथमहिं मैं तुम्हहि सुनावा।।
- RCM 7.113.9Open verse →
मुनि मोहि कछुक काल तहँ राखा। रामचरितमानस तब भाषा।।
अर्थ · Hindi
मुनि मोहि कछुक काल तहँ राखा। रामचरितमानस तब भाषा।।
- RCM 7.113.10Open verse →
सादर मोहि यह कथा सुनाई। पुनि बोले मुनि गिरा सुहाई।।
अर्थ · Hindi
सादर मोहि यह कथा सुनाई। पुनि बोले मुनि गिरा सुहाई।।
- RCM 7.113.11Open verse →
रामचरित सर गुप्त सुहावा। संभु प्रसाद तात मैं पावा।।
अर्थ · Hindi
रामचरित सर गुप्त सुहावा। संभु प्रसाद तात मैं पावा।।
- RCM 7.113.12Open verse →
तोहि निज भगत राम कर जानी। ताते मैं सब कहेउँ बखानी।।
अर्थ · Hindi
तोहि निज भगत राम कर जानी। ताते मैं सब कहेउँ बखानी।।
- RCM 7.113.13Open verse →
राम भगति जिन्ह कें उर नाहीं। कबहुँ न तात कहिअ तिन्ह पाहीं।।
अर्थ · Hindi
राम भगति जिन्ह कें उर नाहीं। कबहुँ न तात कहिअ तिन्ह पाहीं।।
- RCM 7.113.14Open verse →
मुनि मोहि बिबिध भाँति समुझावा। मैं सप्रेम मुनि पद सिरु नावा।।
अर्थ · Hindi
मुनि मोहि बिबिध भाँति समुझावा। मैं सप्रेम मुनि पद सिरु नावा।।
- RCM 7.113.15Open verse →
निज कर कमल परसि मम सीसा। हरषित आसिष दीन्ह मुनीसा।।
अर्थ · Hindi
निज कर कमल परसि मम सीसा। हरषित आसिष दीन्ह मुनीसा।।
- RCM 7.113.16Open verse →
राम भगति अबिरल उर तोरें। बसिहि सदा प्रसाद अब मोरें।।
अर्थ · Hindi
राम भगति अबिरल उर तोरें। बसिहि सदा प्रसाद अब मोरें।।
- RCM 7.114.1Open verse →
काल कर्म गुन दोष सुभाऊ। कछु दुख तुम्हहि न ब्यापिहि काऊ।।
अर्थ · Hindi
काल कर्म गुन दोष सुभाऊ। कछु दुख तुम्हहि न ब्यापिहि काऊ।।
- RCM 7.114.2Open verse →
राम रहस्य ललित बिधि नाना। गुप्त प्रगट इतिहास पुराना।।
अर्थ · Hindi
राम रहस्य ललित बिधि नाना। गुप्त प्रगट इतिहास पुराना।।
- RCM 7.114.3Open verse →
बिनु श्रम तुम्ह जानब सब सोऊ। नित नव नेह राम पद होऊ।।
अर्थ · Hindi
बिनु श्रम तुम्ह जानब सब सोऊ। नित नव नेह राम पद होऊ।।
- RCM 7.114.4Open verse →
जो इच्छा करिहहु मन माहीं। हरि प्रसाद कछु दुर्लभ नाहीं।।
अर्थ · Hindi
जो इच्छा करिहहु मन माहीं। हरि प्रसाद कछु दुर्लभ नाहीं।।
- RCM 7.114.5Open verse →
सुनि मुनि आसिष सुनु मतिधीरा। ब्रह्मगिरा भइ गगन गँभीरा।।
अर्थ · Hindi
सुनि मुनि आसिष सुनु मतिधीरा। ब्रह्मगिरा भइ गगन गँभीरा।।
- RCM 7.114.6Open verse →
एवमस्तु तव बच मुनि ग्यानी। यह मम भगत कर्म मन बानी।।
अर्थ · Hindi
एवमस्तु तव बच मुनि ग्यानी। यह मम भगत कर्म मन बानी।।
- RCM 7.114.7Open verse →
सुनि नभगिरा हरष मोहि भयऊ। प्रेम मगन सब संसय गयऊ।।
अर्थ · Hindi
सुनि नभगिरा हरष मोहि भयऊ। प्रेम मगन सब संसय गयऊ।।
- RCM 7.114.8Open verse →
करि बिनती मुनि आयसु पाई। पद सरोज पुनि पुनि सिरु नाई।।
अर्थ · Hindi
करि बिनती मुनि आयसु पाई। पद सरोज पुनि पुनि सिरु नाई।।
- RCM 7.114.9Open verse →
हरष सहित एहिं आश्रम आयउँ। प्रभु प्रसाद दुर्लभ बर पायउँ।।
अर्थ · Hindi
हरष सहित एहिं आश्रम आयउँ। प्रभु प्रसाद दुर्लभ बर पायउँ।।
- RCM 7.114.10Open verse →
इहाँ बसत मोहि सुनु खग ईसा। बीते कलप सात अरु बीसा।।
अर्थ · Hindi
इहाँ बसत मोहि सुनु खग ईसा। बीते कलप सात अरु बीसा।।
- RCM 7.114.11Open verse →
करउँ सदा रघुपति गुन गाना। सादर सुनहिं बिहंग सुजाना।।
अर्थ · Hindi
करउँ सदा रघुपति गुन गाना। सादर सुनहिं बिहंग सुजाना।।
- RCM 7.114.12Open verse →
जब जब अवधपुरीं रघुबीरा। धरहिं भगत हित मनुज सरीरा।।
अर्थ · Hindi
जब जब अवधपुरीं रघुबीरा। धरहिं भगत हित मनुज सरीरा।।
- RCM 7.114.13Open verse →
तब तब जाइ राम पुर रहऊँ। सिसुलीला बिलोकि सुख लहऊँ।।
अर्थ · Hindi
तब तब जाइ राम पुर रहऊँ। सिसुलीला बिलोकि सुख लहऊँ।।
- RCM 7.114.14Open verse →
पुनि उर राखि राम सिसुरूपा। निज आश्रम आवउँ खगभूपा।।
अर्थ · Hindi
पुनि उर राखि राम सिसुरूपा। निज आश्रम आवउँ खगभूपा।।
- RCM 7.114.15Open verse →
कथा सकल मैं तुम्हहि सुनाई। काग देह जेहिं कारन पाई।।
अर्थ · Hindi
कथा सकल मैं तुम्हहि सुनाई। काग देह जेहिं कारन पाई।।
- RCM 7.114.16Open verse →
कहिउँ तात सब प्रस्न तुम्हारी। राम भगति महिमा अति भारी।।
अर्थ · Hindi
कहिउँ तात सब प्रस्न तुम्हारी। राम भगति महिमा अति भारी।।
- RCM 7.115.1Open verse →
जे असि भगति जानि परिहरहीं। केवल ग्यान हेतु श्रम करहीं।।
अर्थ · Hindi
जे असि भगति जानि परिहरहीं। केवल ग्यान हेतु श्रम करहीं।।
- RCM 7.115.2Open verse →
ते जड़ कामधेनु गृहँ त्यागी। खोजत आकु फिरहिं पय लागी।।
अर्थ · Hindi
ते जड़ कामधेनु गृहँ त्यागी। खोजत आकु फिरहिं पय लागी।।
- RCM 7.115.3Open verse →
सुनु खगेस हरि भगति बिहाई। जे सुख चाहहिं आन उपाई।।
अर्थ · Hindi
सुनु खगेस हरि भगति बिहाई। जे सुख चाहहिं आन उपाई।।
- RCM 7.115.4Open verse →
ते सठ महासिंधु बिनु तरनी। पैरि पार चाहहिं जड़ करनी।।
अर्थ · Hindi
ते सठ महासिंधु बिनु तरनी। पैरि पार चाहहिं जड़ करनी।।
- RCM 7.115.5Open verse →
सुनि भसुंडि के बचन भवानी। बोलेउ गरुड़ हरषि मृदु बानी।।
अर्थ · Hindi
सुनि भसुंडि के बचन भवानी। बोलेउ गरुड़ हरषि मृदु बानी।।
- RCM 7.115.6Open verse →
तव प्रसाद प्रभु मम उर माहीं। संसय सोक मोह भ्रम नाहीं।।
अर्थ · Hindi
तव प्रसाद प्रभु मम उर माहीं। संसय सोक मोह भ्रम नाहीं।।
- RCM 7.115.7Open verse →
सुनेउँ पुनीत राम गुन ग्रामा। तुम्हरी कृपाँ लहेउँ बिश्रामा।।
अर्थ · Hindi
सुनेउँ पुनीत राम गुन ग्रामा। तुम्हरी कृपाँ लहेउँ बिश्रामा।।
- RCM 7.115.8Open verse →
एक बात प्रभु पूँछउँ तोही। कहहु बुझाइ कृपानिधि मोही।।
अर्थ · Hindi
एक बात प्रभु पूँछउँ तोही। कहहु बुझाइ कृपानिधि मोही।।
- RCM 7.115.9Open verse →
कहहिं संत मुनि बेद पुराना। नहिं कछु दुर्लभ ग्यान समाना।।
अर्थ · Hindi
कहहिं संत मुनि बेद पुराना। नहिं कछु दुर्लभ ग्यान समाना।।
- RCM 7.115.10Open verse →
सोइ मुनि तुम्ह सन कहेउ गोसाईं। नहिं आदरेहु भगति की नाईं।।
अर्थ · Hindi
सोइ मुनि तुम्ह सन कहेउ गोसाईं। नहिं आदरेहु भगति की नाईं।।
- RCM 7.115.11Open verse →
ग्यानहि भगतिहि अंतर केता। सकल कहहु प्रभु कृपा निकेता।।
अर्थ · Hindi
ग्यानहि भगतिहि अंतर केता। सकल कहहु प्रभु कृपा निकेता।।
- RCM 7.115.12Open verse →
सुनि उरगारि बचन सुख माना। सादर बोलेउ काग सुजाना।।
अर्थ · Hindi
सुनि उरगारि बचन सुख माना। सादर बोलेउ काग सुजाना।।
- RCM 7.115.13Open verse →
भगतिहि ग्यानहि नहिं कछु भेदा। उभय हरहिं भव संभव खेदा।।
अर्थ · Hindi
भगतिहि ग्यानहि नहिं कछु भेदा। उभय हरहिं भव संभव खेदा।।
- RCM 7.115.14Open verse →
नाथ मुनीस कहहिं कछु अंतर। सावधान सोउ सुनु बिहंगबर।।
अर्थ · Hindi
नाथ मुनीस कहहिं कछु अंतर। सावधान सोउ सुनु बिहंगबर।।
- RCM 7.115.15Open verse →
ग्यान बिराग जोग बिग्याना। ए सब पुरुष सुनहु हरिजाना।।
अर्थ · Hindi
ग्यान बिराग जोग बिग्याना। ए सब पुरुष सुनहु हरिजाना।।
- RCM 7.115.16Open verse →
पुरुष प्रताप प्रबल सब भाँती। अबला अबल सहज जड़ जाती।।
अर्थ · Hindi
पुरुष प्रताप प्रबल सब भाँती। अबला अबल सहज जड़ जाती।।
- RCM 7.115.17Open verse →
-पुरुष त्यागि सक नारिहि जो बिरक्त मति धीर।।
अर्थ · Hindi
-पुरुष त्यागि सक नारिहि जो बिरक्त मति धीर।।
- RCM 7.115.18Open verse →
न तु कामी बिषयाबस बिमुख जो पद रघुबीर।।115(क)।।
अर्थ · Hindi
न तु कामी बिषयाबस बिमुख जो पद रघुबीर।।115(क)।।
- RCM 7.115.19Open verse →
सोउ मुनि ग्याननिधान मृगनयनी बिधु मुख निरखि।
अर्थ · Hindi
सोउ मुनि ग्याननिधान मृगनयनी बिधु मुख निरखि।
- RCM 7.115.20Open verse →
बिबस होइ हरिजान नारि बिष्नु माया प्रगट।।115(ख)।।
अर्थ · Hindi
बिबस होइ हरिजान नारि बिष्नु माया प्रगट।।115(ख)।।
- RCM 7.116.1Open verse →
इहाँ न पच्छपात कछु राखउँ। बेद पुरान संत मत भाषउँ।।
अर्थ · Hindi
इहाँ न पच्छपात कछु राखउँ। बेद पुरान संत मत भाषउँ।।
- RCM 7.116.2Open verse →
मोह न नारि नारि कें रूपा। पन्नगारि यह रीति अनूपा।।
अर्थ · Hindi
मोह न नारि नारि कें रूपा। पन्नगारि यह रीति अनूपा।।
- RCM 7.116.3Open verse →
माया भगति सुनहु तुम्ह दोऊ। नारि बर्ग जानइ सब कोऊ।।
अर्थ · Hindi
माया भगति सुनहु तुम्ह दोऊ। नारि बर्ग जानइ सब कोऊ।।
- RCM 7.116.4Open verse →
पुनि रघुबीरहि भगति पिआरी। माया खलु नर्तकी बिचारी।।
अर्थ · Hindi
पुनि रघुबीरहि भगति पिआरी। माया खलु नर्तकी बिचारी।।
- RCM 7.116.5Open verse →
भगतिहि सानुकूल रघुराया। ताते तेहि डरपति अति माया।।
अर्थ · Hindi
भगतिहि सानुकूल रघुराया। ताते तेहि डरपति अति माया।।
- RCM 7.116.6Open verse →
राम भगति निरुपम निरुपाधी। बसइ जासु उर सदा अबाधी।।
अर्थ · Hindi
राम भगति निरुपम निरुपाधी। बसइ जासु उर सदा अबाधी।।
- RCM 7.116.7Open verse →
तेहि बिलोकि माया सकुचाई। करि न सकइ कछु निज प्रभुताई।।
अर्थ · Hindi
तेहि बिलोकि माया सकुचाई। करि न सकइ कछु निज प्रभुताई।।
- RCM 7.116.8Open verse →
अस बिचारि जे मुनि बिग्यानी। जाचहीं भगति सकल सुख खानी।।
अर्थ · Hindi
अस बिचारि जे मुनि बिग्यानी। जाचहीं भगति सकल सुख खानी।।
- RCM 7.117.1Open verse →
सुनहु तात यह अकथ कहानी। समुझत बनइ न जाइ बखानी।।
अर्थ · Hindi
सुनहु तात यह अकथ कहानी। समुझत बनइ न जाइ बखानी।।
- RCM 7.117.2Open verse →
ईस्वर अंस जीव अबिनासी। चेतन अमल सहज सुख रासी।।
अर्थ · Hindi
ईस्वर अंस जीव अबिनासी। चेतन अमल सहज सुख रासी।।
- RCM 7.117.3Open verse →
सो मायाबस भयउ गोसाईं। बँध्यो कीर मरकट की नाई।।
अर्थ · Hindi
सो मायाबस भयउ गोसाईं। बँध्यो कीर मरकट की नाई।।
- RCM 7.117.4Open verse →
जड़ चेतनहि ग्रंथि परि गई। जदपि मृषा छूटत कठिनई।।
अर्थ · Hindi
जड़ चेतनहि ग्रंथि परि गई। जदपि मृषा छूटत कठिनई।।
- RCM 7.117.5Open verse →
तब ते जीव भयउ संसारी। छूट न ग्रंथि न होइ सुखारी।।
अर्थ · Hindi
तब ते जीव भयउ संसारी। छूट न ग्रंथि न होइ सुखारी।।
- RCM 7.117.6Open verse →
श्रुति पुरान बहु कहेउ उपाई। छूट न अधिक अधिक अरुझाई।।
अर्थ · Hindi
श्रुति पुरान बहु कहेउ उपाई। छूट न अधिक अधिक अरुझाई।।
- RCM 7.117.7Open verse →
जीव हृदयँ तम मोह बिसेषी। ग्रंथि छूट किमि परइ न देखी।।
अर्थ · Hindi
जीव हृदयँ तम मोह बिसेषी। ग्रंथि छूट किमि परइ न देखी।।
- RCM 7.117.8Open verse →
अस संजोग ईस जब करई। तबहुँ कदाचित सो निरुअरई।।
अर्थ · Hindi
अस संजोग ईस जब करई। तबहुँ कदाचित सो निरुअरई।।
- RCM 7.117.9Open verse →
सात्त्विक श्रद्धा धेनु सुहाई। जौं हरि कृपाँ हृदयँ बस आई।।
अर्थ · Hindi
सात्त्विक श्रद्धा धेनु सुहाई। जौं हरि कृपाँ हृदयँ बस आई।।
- RCM 7.117.10Open verse →
जप तप ब्रत जम नियम अपारा। जे श्रुति कह सुभ धर्म अचारा।।
अर्थ · Hindi
जप तप ब्रत जम नियम अपारा। जे श्रुति कह सुभ धर्म अचारा।।
- RCM 7.117.11Open verse →
तेइ तृन हरित चरै जब गाई। भाव बच्छ सिसु पाइ पेन्हाई।।
अर्थ · Hindi
तेइ तृन हरित चरै जब गाई। भाव बच्छ सिसु पाइ पेन्हाई।।
- RCM 7.117.12Open verse →
नोइ निबृत्ति पात्र बिस्वासा। निर्मल मन अहीर निज दासा।।
अर्थ · Hindi
नोइ निबृत्ति पात्र बिस्वासा। निर्मल मन अहीर निज दासा।।
- RCM 7.117.13Open verse →
परम धर्ममय पय दुहि भाई। अवटै अनल अकाम बनाई।।
अर्थ · Hindi
परम धर्ममय पय दुहि भाई। अवटै अनल अकाम बनाई।।
- RCM 7.117.14Open verse →
तोष मरुत तब छमाँ जुड़ावै। धृति सम जावनु देइ जमावै।।
अर्थ · Hindi
तोष मरुत तब छमाँ जुड़ावै। धृति सम जावनु देइ जमावै।।
- RCM 7.117.15Open verse →
मुदिताँ मथैं बिचार मथानी। दम अधार रजु सत्य सुबानी।।
अर्थ · Hindi
मुदिताँ मथैं बिचार मथानी। दम अधार रजु सत्य सुबानी।।
- RCM 7.117.16Open verse →
तब मथि काढ़ि लेइ नवनीता। बिमल बिराग सुभग सुपुनीता।।
अर्थ · Hindi
तब मथि काढ़ि लेइ नवनीता। बिमल बिराग सुभग सुपुनीता।।
- RCM 7.117.17Open verse →
जोग अगिनि करि प्रगट तब कर्म सुभासुभ लाइ।
अर्थ · Hindi
जोग अगिनि करि प्रगट तब कर्म सुभासुभ लाइ।
- RCM 7.117.18Open verse →
बुद्धि सिरावैं ग्यान घृत ममता मल जरि जाइ।।117(क)।।
अर्थ · Hindi
बुद्धि सिरावैं ग्यान घृत ममता मल जरि जाइ।।117(क)।।
- RCM 7.117.19Open verse →
तब बिग्यानरूपिनि बुद्धि बिसद घृत पाइ।
अर्थ · Hindi
तब बिग्यानरूपिनि बुद्धि बिसद घृत पाइ।
- RCM 7.117.20Open verse →
चित्त दिआ भरि धरै दृढ़ समता दिअटि बनाइ।।117(ख)।।
अर्थ · Hindi
चित्त दिआ भरि धरै दृढ़ समता दिअटि बनाइ।।117(ख)।।
- RCM 7.117.21Open verse →
तीनि अवस्था तीनि गुन तेहि कपास तें काढ़ि।
अर्थ · Hindi
तीनि अवस्था तीनि गुन तेहि कपास तें काढ़ि।
- RCM 7.117.22Open verse →
तूल तुरीय सँवारि पुनि बाती करै सुगाढ़ि।।117(ग)।।
अर्थ · Hindi
तूल तुरीय सँवारि पुनि बाती करै सुगाढ़ि।।117(ग)।।
- RCM 7.117.23Open verse →
एहि बिधि लेसै दीप तेज रासि बिग्यानमय।।
अर्थ · Hindi
एहि बिधि लेसै दीप तेज रासि बिग्यानमय।।
- RCM 7.117.24Open verse →
जातहिं जासु समीप जरहिं मदादिक सलभ सब।।117(घ)।।
अर्थ · Hindi
जातहिं जासु समीप जरहिं मदादिक सलभ सब।।117(घ)।।
- RCM 7.118.1Open verse →
सोहमस्मि इति बृत्ति अखंडा। दीप सिखा सोइ परम प्रचंडा।।
अर्थ · Hindi
सोहमस्मि इति बृत्ति अखंडा। दीप सिखा सोइ परम प्रचंडा।।
- RCM 7.118.2Open verse →
आतम अनुभव सुख सुप्रकासा। तब भव मूल भेद भ्रम नासा।।
अर्थ · Hindi
आतम अनुभव सुख सुप्रकासा। तब भव मूल भेद भ्रम नासा।।
- RCM 7.118.3Open verse →
प्रबल अबिद्या कर परिवारा। मोह आदि तम मिटइ अपारा।।
अर्थ · Hindi
प्रबल अबिद्या कर परिवारा। मोह आदि तम मिटइ अपारा।।
- RCM 7.118.4Open verse →
तब सोइ बुद्धि पाइ उँजिआरा। उर गृहँ बैठि ग्रंथि निरुआरा।।
अर्थ · Hindi
तब सोइ बुद्धि पाइ उँजिआरा। उर गृहँ बैठि ग्रंथि निरुआरा।।
- RCM 7.118.5Open verse →
छोरन ग्रंथि पाव जौं सोई। तब यह जीव कृतारथ होई।।
अर्थ · Hindi
छोरन ग्रंथि पाव जौं सोई। तब यह जीव कृतारथ होई।।
- RCM 7.118.6Open verse →
छोरत ग्रंथि जानि खगराया। बिघ्न अनेक करइ तब माया।।
अर्थ · Hindi
छोरत ग्रंथि जानि खगराया। बिघ्न अनेक करइ तब माया।।
- RCM 7.118.7Open verse →
रिद्धि सिद्धि प्रेरइ बहु भाई। बुद्धहि लोभ दिखावहिं आई।।
अर्थ · Hindi
रिद्धि सिद्धि प्रेरइ बहु भाई। बुद्धहि लोभ दिखावहिं आई।।
- RCM 7.118.8Open verse →
कल बल छल करि जाहिं समीपा। अंचल बात बुझावहिं दीपा।।
अर्थ · Hindi
कल बल छल करि जाहिं समीपा। अंचल बात बुझावहिं दीपा।।
- RCM 7.118.9Open verse →
होइ बुद्धि जौं परम सयानी। तिन्ह तन चितव न अनहित जानी।।
अर्थ · Hindi
होइ बुद्धि जौं परम सयानी। तिन्ह तन चितव न अनहित जानी।।
- RCM 7.118.10Open verse →
जौं तेहि बिघ्न बुद्धि नहिं बाधी। तौ बहोरि सुर करहिं उपाधी।।
अर्थ · Hindi
जौं तेहि बिघ्न बुद्धि नहिं बाधी। तौ बहोरि सुर करहिं उपाधी।।
- RCM 7.118.11Open verse →
इंद्रीं द्वार झरोखा नाना। तहँ तहँ सुर बैठे करि थाना।।
अर्थ · Hindi
इंद्रीं द्वार झरोखा नाना। तहँ तहँ सुर बैठे करि थाना।।
- RCM 7.118.12Open verse →
आवत देखहिं बिषय बयारी। ते हठि देही कपाट उघारी।।
अर्थ · Hindi
आवत देखहिं बिषय बयारी। ते हठि देही कपाट उघारी।।
- RCM 7.118.13Open verse →
जब सो प्रभंजन उर गृहँ जाई। तबहिं दीप बिग्यान बुझाई।।
अर्थ · Hindi
जब सो प्रभंजन उर गृहँ जाई। तबहिं दीप बिग्यान बुझाई।।
- RCM 7.118.14Open verse →
ग्रंथि न छूटि मिटा सो प्रकासा। बुद्धि बिकल भइ बिषय बतासा।।
अर्थ · Hindi
ग्रंथि न छूटि मिटा सो प्रकासा। बुद्धि बिकल भइ बिषय बतासा।।
- RCM 7.118.15Open verse →
इंद्रिन्ह सुरन्ह न ग्यान सोहाई। बिषय भोग पर प्रीति सदाई।।
अर्थ · Hindi
इंद्रिन्ह सुरन्ह न ग्यान सोहाई। बिषय भोग पर प्रीति सदाई।।
- RCM 7.118.16Open verse →
बिषय समीर बुद्धि कृत भोरी। तेहि बिधि दीप को बार बहोरी।।
अर्थ · Hindi
बिषय समीर बुद्धि कृत भोरी। तेहि बिधि दीप को बार बहोरी।।
- RCM 7.119.1Open verse →
ग्यान पंथ कृपान कै धारा। परत खगेस होइ नहिं बारा।।
अर्थ · Hindi
ग्यान पंथ कृपान कै धारा। परत खगेस होइ नहिं बारा।।
- RCM 7.119.2Open verse →
जो निर्बिघ्न पंथ निर्बहई। सो कैवल्य परम पद लहई।।
अर्थ · Hindi
जो निर्बिघ्न पंथ निर्बहई। सो कैवल्य परम पद लहई।।
- RCM 7.119.3Open verse →
अति दुर्लभ कैवल्य परम पद। संत पुरान निगम आगम बद।।
अर्थ · Hindi
अति दुर्लभ कैवल्य परम पद। संत पुरान निगम आगम बद।।
- RCM 7.119.4Open verse →
राम भजत सोइ मुकुति गोसाई। अनइच्छित आवइ बरिआई।।
अर्थ · Hindi
राम भजत सोइ मुकुति गोसाई। अनइच्छित आवइ बरिआई।।
- RCM 7.119.5Open verse →
जिमि थल बिनु जल रहि न सकाई। कोटि भाँति कोउ करै उपाई।।
अर्थ · Hindi
जिमि थल बिनु जल रहि न सकाई। कोटि भाँति कोउ करै उपाई।।
- RCM 7.119.6Open verse →
तथा मोच्छ सुख सुनु खगराई। रहि न सकइ हरि भगति बिहाई।।
अर्थ · Hindi
तथा मोच्छ सुख सुनु खगराई। रहि न सकइ हरि भगति बिहाई।।
- RCM 7.119.7Open verse →
अस बिचारि हरि भगत सयाने। मुक्ति निरादर भगति लुभाने।।
अर्थ · Hindi
अस बिचारि हरि भगत सयाने। मुक्ति निरादर भगति लुभाने।।
- RCM 7.119.8Open verse →
भगति करत बिनु जतन प्रयासा। संसृति मूल अबिद्या नासा।।
अर्थ · Hindi
भगति करत बिनु जतन प्रयासा। संसृति मूल अबिद्या नासा।।
- RCM 7.119.9Open verse →
भोजन करिअ तृपिति हित लागी। जिमि सो असन पचवै जठरागी।।
अर्थ · Hindi
भोजन करिअ तृपिति हित लागी। जिमि सो असन पचवै जठरागी।।
- RCM 7.119.10Open verse →
असि हरिभगति सुगम सुखदाई। को अस मूढ़ न जाहि सोहाई।।
अर्थ · Hindi
असि हरिभगति सुगम सुखदाई। को अस मूढ़ न जाहि सोहाई।।
- RCM 7.120.1Open verse →
कहेउँ ग्यान सिद्धांत बुझाई। सुनहु भगति मनि कै प्रभुताई।।
अर्थ · Hindi
कहेउँ ग्यान सिद्धांत बुझाई। सुनहु भगति मनि कै प्रभुताई।।
- RCM 7.120.2Open verse →
राम भगति चिंतामनि सुंदर। बसइ गरुड़ जाके उर अंतर।।
अर्थ · Hindi
राम भगति चिंतामनि सुंदर। बसइ गरुड़ जाके उर अंतर।।
- RCM 7.120.3Open verse →
परम प्रकास रूप दिन राती। नहिं कछु चहिअ दिआ घृत बाती।।
अर्थ · Hindi
परम प्रकास रूप दिन राती। नहिं कछु चहिअ दिआ घृत बाती।।
- RCM 7.120.4Open verse →
मोह दरिद्र निकट नहिं आवा। लोभ बात नहिं ताहि बुझावा।।
अर्थ · Hindi
मोह दरिद्र निकट नहिं आवा। लोभ बात नहिं ताहि बुझावा।।
- RCM 7.120.5Open verse →
प्रबल अबिद्या तम मिटि जाई। हारहिं सकल सलभ समुदाई।।
अर्थ · Hindi
प्रबल अबिद्या तम मिटि जाई। हारहिं सकल सलभ समुदाई।।
- RCM 7.120.6Open verse →
खल कामादि निकट नहिं जाहीं। बसइ भगति जाके उर माहीं।।
अर्थ · Hindi
खल कामादि निकट नहिं जाहीं। बसइ भगति जाके उर माहीं।।
- RCM 7.120.7Open verse →
गरल सुधासम अरि हित होई। तेहि मनि बिनु सुख पाव न कोई।।
अर्थ · Hindi
गरल सुधासम अरि हित होई। तेहि मनि बिनु सुख पाव न कोई।।
- RCM 7.120.8Open verse →
ब्यापहिं मानस रोग न भारी। जिन्ह के बस सब जीव दुखारी।।
अर्थ · Hindi
ब्यापहिं मानस रोग न भारी। जिन्ह के बस सब जीव दुखारी।।
- RCM 7.120.9Open verse →
राम भगति मनि उर बस जाकें। दुख लवलेस न सपनेहुँ ताकें।।
अर्थ · Hindi
राम भगति मनि उर बस जाकें। दुख लवलेस न सपनेहुँ ताकें।।
- RCM 7.120.10Open verse →
चतुर सिरोमनि तेइ जग माहीं। जे मनि लागि सुजतन कराहीं।।
अर्थ · Hindi
चतुर सिरोमनि तेइ जग माहीं। जे मनि लागि सुजतन कराहीं।।
- RCM 7.120.11Open verse →
सो मनि जदपि प्रगट जग अहई। राम कृपा बिनु नहिं कोउ लहई।।
अर्थ · Hindi
सो मनि जदपि प्रगट जग अहई। राम कृपा बिनु नहिं कोउ लहई।।
- RCM 7.120.12Open verse →
सुगम उपाय पाइबे केरे। नर हतभाग्य देहिं भटमेरे।।
अर्थ · Hindi
सुगम उपाय पाइबे केरे। नर हतभाग्य देहिं भटमेरे।।
- RCM 7.120.13Open verse →
पावन पर्बत बेद पुराना। राम कथा रुचिराकर नाना।।
अर्थ · Hindi
पावन पर्बत बेद पुराना। राम कथा रुचिराकर नाना।।
- RCM 7.120.14Open verse →
मर्मी सज्जन सुमति कुदारी। ग्यान बिराग नयन उरगारी।।
अर्थ · Hindi
मर्मी सज्जन सुमति कुदारी। ग्यान बिराग नयन उरगारी।।
- RCM 7.120.15Open verse →
भाव सहित खोजइ जो प्रानी। पाव भगति मनि सब सुख खानी।।
अर्थ · Hindi
भाव सहित खोजइ जो प्रानी। पाव भगति मनि सब सुख खानी।।
- RCM 7.120.16Open verse →
मोरें मन प्रभु अस बिस्वासा। राम ते अधिक राम कर दासा।।
अर्थ · Hindi
मोरें मन प्रभु अस बिस्वासा। राम ते अधिक राम कर दासा।।
- RCM 7.120.17Open verse →
राम सिंधु घन सज्जन धीरा। चंदन तरु हरि संत समीरा।।
अर्थ · Hindi
राम सिंधु घन सज्जन धीरा। चंदन तरु हरि संत समीरा।।
- RCM 7.120.18Open verse →
सब कर फल हरि भगति सुहाई। सो बिनु संत न काहूँ पाई।।
अर्थ · Hindi
सब कर फल हरि भगति सुहाई। सो बिनु संत न काहूँ पाई।।
- RCM 7.120.19Open verse →
अस बिचारि जोइ कर सतसंगा। राम भगति तेहि सुलभ बिहंगा।।
अर्थ · Hindi
अस बिचारि जोइ कर सतसंगा। राम भगति तेहि सुलभ बिहंगा।।
- RCM 7.121.1Open verse →
पुनि सप्रेम बोलेउ खगराऊ। जौं कृपाल मोहि ऊपर भाऊ।।
अर्थ · Hindi
पुनि सप्रेम बोलेउ खगराऊ। जौं कृपाल मोहि ऊपर भाऊ।।
- RCM 7.121.2Open verse →
नाथ मोहि निज सेवक जानी। सप्त प्रस्न कहहु बखानी।।
अर्थ · Hindi
नाथ मोहि निज सेवक जानी। सप्त प्रस्न कहहु बखानी।।
- RCM 7.121.3Open verse →
प्रथमहिं कहहु नाथ मतिधीरा। सब ते दुर्लभ कवन सरीरा।।
अर्थ · Hindi
प्रथमहिं कहहु नाथ मतिधीरा। सब ते दुर्लभ कवन सरीरा।।
- RCM 7.121.4Open verse →
बड़ दुख कवन कवन सुख भारी। सोउ संछेपहिं कहहु बिचारी।।
अर्थ · Hindi
बड़ दुख कवन कवन सुख भारी। सोउ संछेपहिं कहहु बिचारी।।
- RCM 7.121.5Open verse →
संत असंत मरम तुम्ह जानहु। तिन्ह कर सहज सुभाव बखानहु।।
अर्थ · Hindi
संत असंत मरम तुम्ह जानहु। तिन्ह कर सहज सुभाव बखानहु।।
- RCM 7.121.6Open verse →
कवन पुन्य श्रुति बिदित बिसाला। कहहु कवन अघ परम कराला।।
अर्थ · Hindi
कवन पुन्य श्रुति बिदित बिसाला। कहहु कवन अघ परम कराला।।
- RCM 7.121.7Open verse →
मानस रोग कहहु समुझाई। तुम्ह सर्बग्य कृपा अधिकाई।।
अर्थ · Hindi
मानस रोग कहहु समुझाई। तुम्ह सर्बग्य कृपा अधिकाई।।
- RCM 7.121.8Open verse →
तात सुनहु सादर अति प्रीती। मैं संछेप कहउँ यह नीती।।
अर्थ · Hindi
तात सुनहु सादर अति प्रीती। मैं संछेप कहउँ यह नीती।।
- RCM 7.121.9Open verse →
नर तन सम नहिं कवनिउ देही। जीव चराचर जाचत तेही।।
अर्थ · Hindi
नर तन सम नहिं कवनिउ देही। जीव चराचर जाचत तेही।।
- RCM 7.121.10Open verse →
नरग स्वर्ग अपबर्ग निसेनी। ग्यान बिराग भगति सुभ देनी।।
अर्थ · Hindi
नरग स्वर्ग अपबर्ग निसेनी। ग्यान बिराग भगति सुभ देनी।।
- RCM 7.121.11Open verse →
सो तनु धरि हरि भजहिं न जे नर। होहिं बिषय रत मंद मंद तर।।
अर्थ · Hindi
सो तनु धरि हरि भजहिं न जे नर। होहिं बिषय रत मंद मंद तर।।
- RCM 7.121.12Open verse →
काँच किरिच बदलें ते लेही। कर ते डारि परस मनि देहीं।।
अर्थ · Hindi
काँच किरिच बदलें ते लेही। कर ते डारि परस मनि देहीं।।
- RCM 7.121.13Open verse →
नहिं दरिद्र सम दुख जग माहीं। संत मिलन सम सुख जग नाहीं।।
अर्थ · Hindi
नहिं दरिद्र सम दुख जग माहीं। संत मिलन सम सुख जग नाहीं।।
- RCM 7.121.14Open verse →
पर उपकार बचन मन काया। संत सहज सुभाउ खगराया।।
अर्थ · Hindi
पर उपकार बचन मन काया। संत सहज सुभाउ खगराया।।
- RCM 7.121.15Open verse →
संत सहहिं दुख परहित लागी। परदुख हेतु असंत अभागी।।
अर्थ · Hindi
संत सहहिं दुख परहित लागी। परदुख हेतु असंत अभागी।।
- RCM 7.121.16Open verse →
भूर्ज तरू सम संत कृपाला। परहित निति सह बिपति बिसाला।।
अर्थ · Hindi
भूर्ज तरू सम संत कृपाला। परहित निति सह बिपति बिसाला।।
- RCM 7.121.17Open verse →
सन इव खल पर बंधन करई। खाल कढ़ाइ बिपति सहि मरई।।
अर्थ · Hindi
सन इव खल पर बंधन करई। खाल कढ़ाइ बिपति सहि मरई।।
- RCM 7.121.18Open verse →
खल बिनु स्वारथ पर अपकारी। अहि मूषक इव सुनु उरगारी।।
अर्थ · Hindi
खल बिनु स्वारथ पर अपकारी। अहि मूषक इव सुनु उरगारी।।
- RCM 7.121.19Open verse →
पर संपदा बिनासि नसाहीं। जिमि ससि हति हिम उपल बिलाहीं।।
अर्थ · Hindi
पर संपदा बिनासि नसाहीं। जिमि ससि हति हिम उपल बिलाहीं।।
- RCM 7.121.20Open verse →
दुष्ट उदय जग आरति हेतू। जथा प्रसिद्ध अधम ग्रह केतू।।
अर्थ · Hindi
दुष्ट उदय जग आरति हेतू। जथा प्रसिद्ध अधम ग्रह केतू।।
- RCM 7.121.21Open verse →
संत उदय संतत सुखकारी। बिस्व सुखद जिमि इंदु तमारी।।
अर्थ · Hindi
संत उदय संतत सुखकारी। बिस्व सुखद जिमि इंदु तमारी।।
- RCM 7.121.22Open verse →
परम धर्म श्रुति बिदित अहिंसा। पर निंदा सम अघ न गरीसा।।
अर्थ · Hindi
परम धर्म श्रुति बिदित अहिंसा। पर निंदा सम अघ न गरीसा।।
- RCM 7.121.23Open verse →
हर गुर निंदक दादुर होई। जन्म सहस्त्र पाव तन सोई।।
अर्थ · Hindi
हर गुर निंदक दादुर होई। जन्म सहस्त्र पाव तन सोई।।
- RCM 7.121.24Open verse →
द्विज निंदक बहु नरक भोग करि। जग जनमइ बायस सरीर धरि।।
अर्थ · Hindi
द्विज निंदक बहु नरक भोग करि। जग जनमइ बायस सरीर धरि।।
- RCM 7.121.25Open verse →
सुर श्रुति निंदक जे अभिमानी। रौरव नरक परहिं ते प्रानी।।
अर्थ · Hindi
सुर श्रुति निंदक जे अभिमानी। रौरव नरक परहिं ते प्रानी।।
- RCM 7.121.26Open verse →
होहिं उलूक संत निंदा रत। मोह निसा प्रिय ग्यान भानु गत।।
अर्थ · Hindi
होहिं उलूक संत निंदा रत। मोह निसा प्रिय ग्यान भानु गत।।
- RCM 7.121.27Open verse →
सब के निंदा जे जड़ करहीं। ते चमगादुर होइ अवतरहीं।।
अर्थ · Hindi
सब के निंदा जे जड़ करहीं। ते चमगादुर होइ अवतरहीं।।
- RCM 7.121.28Open verse →
सुनहु तात अब मानस रोगा। जिन्ह ते दुख पावहिं सब लोगा।।
अर्थ · Hindi
सुनहु तात अब मानस रोगा। जिन्ह ते दुख पावहिं सब लोगा।।
- RCM 7.121.29Open verse →
मोह सकल ब्याधिन्ह कर मूला। तिन्ह ते पुनि उपजहिं बहु सूला।।
अर्थ · Hindi
मोह सकल ब्याधिन्ह कर मूला। तिन्ह ते पुनि उपजहिं बहु सूला।।
- RCM 7.121.30Open verse →
काम बात कफ लोभ अपारा। क्रोध पित्त नित छाती जारा।।
अर्थ · Hindi
काम बात कफ लोभ अपारा। क्रोध पित्त नित छाती जारा।।
- RCM 7.121.31Open verse →
प्रीति करहिं जौं तीनिउ भाई। उपजइ सन्यपात दुखदाई।।
अर्थ · Hindi
प्रीति करहिं जौं तीनिउ भाई। उपजइ सन्यपात दुखदाई।।
- RCM 7.121.32Open verse →
बिषय मनोरथ दुर्गम नाना। ते सब सूल नाम को जाना।।
अर्थ · Hindi
बिषय मनोरथ दुर्गम नाना। ते सब सूल नाम को जाना।।
- RCM 7.121.33Open verse →
ममता दादु कंडु इरषाई। हरष बिषाद गरह बहुताई।।
अर्थ · Hindi
ममता दादु कंडु इरषाई। हरष बिषाद गरह बहुताई।।
- RCM 7.121.34Open verse →
पर सुख देखि जरनि सोइ छई। कुष्ट दुष्टता मन कुटिलई।।
अर्थ · Hindi
पर सुख देखि जरनि सोइ छई। कुष्ट दुष्टता मन कुटिलई।।
- RCM 7.121.35Open verse →
अहंकार अति दुखद डमरुआ। दंभ कपट मद मान नेहरुआ।।
अर्थ · Hindi
अहंकार अति दुखद डमरुआ। दंभ कपट मद मान नेहरुआ।।
- RCM 7.121.36Open verse →
तृस्ना उदरबृद्धि अति भारी। त्रिबिध ईषना तरुन तिजारी।।
अर्थ · Hindi
तृस्ना उदरबृद्धि अति भारी। त्रिबिध ईषना तरुन तिजारी।।
- RCM 7.121.37Open verse →
जुग बिधि ज्वर मत्सर अबिबेका। कहँ लागि कहौं कुरोग अनेका।।
अर्थ · Hindi
जुग बिधि ज्वर मत्सर अबिबेका। कहँ लागि कहौं कुरोग अनेका।।
- RCM 7.122.1Open verse →
एहि बिधि सकल जीव जग रोगी। सोक हरष भय प्रीति बियोगी।।
अर्थ · Hindi
एहि बिधि सकल जीव जग रोगी। सोक हरष भय प्रीति बियोगी।।
- RCM 7.122.2Open verse →
मानक रोग कछुक मैं गाए। हहिं सब कें लखि बिरलेन्ह पाए।।
अर्थ · Hindi
मानक रोग कछुक मैं गाए। हहिं सब कें लखि बिरलेन्ह पाए।।
- RCM 7.122.3Open verse →
जाने ते छीजहिं कछु पापी। नास न पावहिं जन परितापी।।
अर्थ · Hindi
जाने ते छीजहिं कछु पापी। नास न पावहिं जन परितापी।।
- RCM 7.122.4Open verse →
बिषय कुपथ्य पाइ अंकुरे। मुनिहु हृदयँ का नर बापुरे।।
अर्थ · Hindi
बिषय कुपथ्य पाइ अंकुरे। मुनिहु हृदयँ का नर बापुरे।।
- RCM 7.122.5Open verse →
राम कृपाँ नासहि सब रोगा। जौं एहि भाँति बनै संयोगा।।
अर्थ · Hindi
राम कृपाँ नासहि सब रोगा। जौं एहि भाँति बनै संयोगा।।
- RCM 7.122.6Open verse →
सदगुर बैद बचन बिस्वासा। संजम यह न बिषय कै आसा।।
अर्थ · Hindi
सदगुर बैद बचन बिस्वासा। संजम यह न बिषय कै आसा।।
- RCM 7.122.7Open verse →
रघुपति भगति सजीवन मूरी। अनूपान श्रद्धा मति पूरी।।
अर्थ · Hindi
रघुपति भगति सजीवन मूरी। अनूपान श्रद्धा मति पूरी।।
- RCM 7.122.8Open verse →
एहि बिधि भलेहिं सो रोग नसाहीं। नाहिं त जतन कोटि नहिं जाहीं।।
अर्थ · Hindi
एहि बिधि भलेहिं सो रोग नसाहीं। नाहिं त जतन कोटि नहिं जाहीं।।
- RCM 7.122.9Open verse →
जानिअ तब मन बिरुज गोसाँई। जब उर बल बिराग अधिकाई।।
अर्थ · Hindi
जानिअ तब मन बिरुज गोसाँई। जब उर बल बिराग अधिकाई।।
- RCM 7.122.10Open verse →
सुमति छुधा बाढ़इ नित नई। बिषय आस दुर्बलता गई।।
अर्थ · Hindi
सुमति छुधा बाढ़इ नित नई। बिषय आस दुर्बलता गई।।
- RCM 7.122.11Open verse →
बिमल ग्यान जल जब सो नहाई। तब रह राम भगति उर छाई।।
अर्थ · Hindi
बिमल ग्यान जल जब सो नहाई। तब रह राम भगति उर छाई।।
- RCM 7.122.12Open verse →
सिव अज सुक सनकादिक नारद। जे मुनि ब्रह्म बिचार बिसारद।।
अर्थ · Hindi
सिव अज सुक सनकादिक नारद। जे मुनि ब्रह्म बिचार बिसारद।।
- RCM 7.122.13Open verse →
सब कर मत खगनायक एहा। करिअ राम पद पंकज नेहा।।
अर्थ · Hindi
सब कर मत खगनायक एहा। करिअ राम पद पंकज नेहा।।
- RCM 7.122.14Open verse →
श्रुति पुरान सब ग्रंथ कहाहीं। रघुपति भगति बिना सुख नाहीं।।
अर्थ · Hindi
श्रुति पुरान सब ग्रंथ कहाहीं। रघुपति भगति बिना सुख नाहीं।।
- RCM 7.122.15Open verse →
कमठ पीठ जामहिं बरु बारा। बंध्या सुत बरु काहुहि मारा।।
अर्थ · Hindi
कमठ पीठ जामहिं बरु बारा। बंध्या सुत बरु काहुहि मारा।।
- RCM 7.122.16Open verse →
फूलहिं नभ बरु बहुबिधि फूला। जीव न लह सुख हरि प्रतिकूला।।
अर्थ · Hindi
फूलहिं नभ बरु बहुबिधि फूला। जीव न लह सुख हरि प्रतिकूला।।
- RCM 7.122.17Open verse →
तृषा जाइ बरु मृगजल पाना। बरु जामहिं सस सीस बिषाना।।
अर्थ · Hindi
तृषा जाइ बरु मृगजल पाना। बरु जामहिं सस सीस बिषाना।।
- RCM 7.122.18Open verse →
अंधकारु बरु रबिहि नसावै। राम बिमुख न जीव सुख पावै।।
अर्थ · Hindi
अंधकारु बरु रबिहि नसावै। राम बिमुख न जीव सुख पावै।।
- RCM 7.122.19Open verse →
हिम ते अनल प्रगट बरु होई। बिमुख राम सुख पाव न कोई।।
अर्थ · Hindi
हिम ते अनल प्रगट बरु होई। बिमुख राम सुख पाव न कोई।।
- RCM 7.122.20Open verse →
उबारि मथें घृत होइ बरु सिकता ते बरु तेल।
अर्थ · Hindi
उबारि मथें घृत होइ बरु सिकता ते बरु तेल।
- RCM 7.122.21Open verse →
बिनु हरि भजन न भव तरिअ यह सिद्धांत अपेल।।122(क)।।
अर्थ · Hindi
बिनु हरि भजन न भव तरिअ यह सिद्धांत अपेल।।122(क)।।
- RCM 7.122.22Open verse →
मसकहि करइ बिंरंचि प्रभु अजहि मसक ते हीन।
अर्थ · Hindi
मसकहि करइ बिंरंचि प्रभु अजहि मसक ते हीन।
- RCM 7.122.23Open verse →
अस बिचारि तजि संसय रामहि भजहिं प्रबीन।।122(ख)।।
अर्थ · Hindi
अस बिचारि तजि संसय रामहि भजहिं प्रबीन।।122(ख)।।
- RCM 7.122.24Open verse →
श्लोक
अर्थ · Hindi
श्लोक
- RCM 7.122.25Open verse →
विनिच्श्रितं वदामि ते न अन्यथा वचांसि मे।
अर्थ · Hindi
विनिच्श्रितं वदामि ते न अन्यथा वचांसि मे।
- RCM 7.122.26Open verse →
हरिं नरा भजन्ति येऽतिदुस्तरं तरन्ति ते।।122(ग)।।
अर्थ · Hindi
हरिं नरा भजन्ति येऽतिदुस्तरं तरन्ति ते।।122(ग)।।
- RCM 7.123.1Open verse →
कहेउँ नाथ हरि चरित अनूपा। ब्यास समास स्वमति अनुरुपा।।
अर्थ · Hindi
कहेउँ नाथ हरि चरित अनूपा। ब्यास समास स्वमति अनुरुपा।।
- RCM 7.123.2Open verse →
श्रुति सिद्धांत इहइ उरगारी। राम भजिअ सब काज बिसारी।।
अर्थ · Hindi
श्रुति सिद्धांत इहइ उरगारी। राम भजिअ सब काज बिसारी।।
- RCM 7.123.3Open verse →
प्रभु रघुपति तजि सेइअ काही। मोहि से सठ पर ममता जाही।।
अर्थ · Hindi
प्रभु रघुपति तजि सेइअ काही। मोहि से सठ पर ममता जाही।।
- RCM 7.123.4Open verse →
तुम्ह बिग्यानरूप नहिं मोहा। नाथ कीन्हि मो पर अति छोहा।।
अर्थ · Hindi
तुम्ह बिग्यानरूप नहिं मोहा। नाथ कीन्हि मो पर अति छोहा।।
- RCM 7.123.5Open verse →
पूछिहुँ राम कथा अति पावनि। सुक सनकादि संभु मन भावनि।।
अर्थ · Hindi
पूछिहुँ राम कथा अति पावनि। सुक सनकादि संभु मन भावनि।।
- RCM 7.123.6Open verse →
सत संगति दुर्लभ संसारा। निमिष दंड भरि एकउ बारा।।
अर्थ · Hindi
सत संगति दुर्लभ संसारा। निमिष दंड भरि एकउ बारा।।
- RCM 7.123.7Open verse →
देखु गरुड़ निज हृदयँ बिचारी। मैं रघुबीर भजन अधिकारी।।
अर्थ · Hindi
देखु गरुड़ निज हृदयँ बिचारी। मैं रघुबीर भजन अधिकारी।।
- RCM 7.123.8Open verse →
सकुनाधम सब भाँति अपावन। प्रभु मोहि कीन्ह बिदित जग पावन।।
अर्थ · Hindi
सकुनाधम सब भाँति अपावन। प्रभु मोहि कीन्ह बिदित जग पावन।।
- RCM 7.123.9Open verse →
आजु धन्य मैं धन्य अति जद्यपि सब बिधि हीन।
अर्थ · Hindi
आजु धन्य मैं धन्य अति जद्यपि सब बिधि हीन।
- RCM 7.123.10Open verse →
निज जन जानि राम मोहि संत समागम दीन।।123(क)।।
अर्थ · Hindi
निज जन जानि राम मोहि संत समागम दीन।।123(क)।।
- RCM 7.123.11Open verse →
नाथ जथामति भाषेउँ राखेउँ नहिं कछु गोइ।
अर्थ · Hindi
नाथ जथामति भाषेउँ राखेउँ नहिं कछु गोइ।
- RCM 7.123.12Open verse →
चरित सिंधु रघुनायक थाह कि पावइ कोइ।।123।।
अर्थ · Hindi
चरित सिंधु रघुनायक थाह कि पावइ कोइ।।123।।
- RCM 7.124.1Open verse →
सुमिरि राम के गुन गन नाना। पुनि पुनि हरष भुसुंडि सुजाना।।
अर्थ · Hindi
सुमिरि राम के गुन गन नाना। पुनि पुनि हरष भुसुंडि सुजाना।।
- RCM 7.124.2Open verse →
महिमा निगम नेति करि गाई। अतुलित बल प्रताप प्रभुताई।।
अर्थ · Hindi
महिमा निगम नेति करि गाई। अतुलित बल प्रताप प्रभुताई।।
- RCM 7.124.3Open verse →
सिव अज पूज्य चरन रघुराई। मो पर कृपा परम मृदुलाई।।
अर्थ · Hindi
सिव अज पूज्य चरन रघुराई। मो पर कृपा परम मृदुलाई।।
- RCM 7.124.4Open verse →
अस सुभाउ कहुँ सुनउँ न देखउँ। केहि खगेस रघुपति सम लेखउँ।।
अर्थ · Hindi
अस सुभाउ कहुँ सुनउँ न देखउँ। केहि खगेस रघुपति सम लेखउँ।।
- RCM 7.124.5Open verse →
साधक सिद्ध बिमुक्त उदासी। कबि कोबिद कृतग्य संन्यासी।।
अर्थ · Hindi
साधक सिद्ध बिमुक्त उदासी। कबि कोबिद कृतग्य संन्यासी।।
- RCM 7.124.6Open verse →
जोगी सूर सुतापस ग्यानी। धर्म निरत पंडित बिग्यानी।।
अर्थ · Hindi
जोगी सूर सुतापस ग्यानी। धर्म निरत पंडित बिग्यानी।।
- RCM 7.124.7Open verse →
तरहिं न बिनु सेएँ मम स्वामी। राम नमामि नमामि नमामी।।
अर्थ · Hindi
तरहिं न बिनु सेएँ मम स्वामी। राम नमामि नमामि नमामी।।
- RCM 7.124.8Open verse →
सरन गएँ मो से अघ रासी। होहिं सुद्ध नमामि अबिनासी।।
अर्थ · Hindi
सरन गएँ मो से अघ रासी। होहिं सुद्ध नमामि अबिनासी।।
- RCM 7.125.1Open verse →
मै कृत्कृत्य भयउँ तव बानी। सुनि रघुबीर भगति रस सानी।।
अर्थ · Hindi
मै कृत्कृत्य भयउँ तव बानी। सुनि रघुबीर भगति रस सानी।।
- RCM 7.125.2Open verse →
राम चरन नूतन रति भई। माया जनित बिपति सब गई।।
अर्थ · Hindi
राम चरन नूतन रति भई। माया जनित बिपति सब गई।।
- RCM 7.125.3Open verse →
मोह जलधि बोहित तुम्ह भए। मो कहँ नाथ बिबिध सुख दए।।
अर्थ · Hindi
मोह जलधि बोहित तुम्ह भए। मो कहँ नाथ बिबिध सुख दए।।
- RCM 7.125.4Open verse →
मो पहिं होइ न प्रति उपकारा। बंदउँ तव पद बारहिं बारा।।
अर्थ · Hindi
मो पहिं होइ न प्रति उपकारा। बंदउँ तव पद बारहिं बारा।।
- RCM 7.125.5Open verse →
पूरन काम राम अनुरागी। तुम्ह सम तात न कोउ बड़भागी।।
अर्थ · Hindi
पूरन काम राम अनुरागी। तुम्ह सम तात न कोउ बड़भागी।।
- RCM 7.125.6Open verse →
संत बिटप सरिता गिरि धरनी। पर हित हेतु सबन्ह कै करनी।।
अर्थ · Hindi
संत बिटप सरिता गिरि धरनी। पर हित हेतु सबन्ह कै करनी।।
- RCM 7.125.7Open verse →
संत हृदय नवनीत समाना। कहा कबिन्ह परि कहै न जाना।।
अर्थ · Hindi
संत हृदय नवनीत समाना। कहा कबिन्ह परि कहै न जाना।।
- RCM 7.125.8Open verse →
निज परिताप द्रवइ नवनीता। पर दुख द्रवहिं संत सुपुनीता।।
अर्थ · Hindi
निज परिताप द्रवइ नवनीता। पर दुख द्रवहिं संत सुपुनीता।।
- RCM 7.125.9Open verse →
जीवन जन्म सुफल मम भयऊ। तव प्रसाद संसय सब गयऊ।।
अर्थ · Hindi
जीवन जन्म सुफल मम भयऊ। तव प्रसाद संसय सब गयऊ।।
- RCM 7.125.10Open verse →
जानेहु सदा मोहि निज किंकर। पुनि पुनि उमा कहइ बिहंगबर।।
अर्थ · Hindi
जानेहु सदा मोहि निज किंकर। पुनि पुनि उमा कहइ बिहंगबर।।
- RCM 7.126.1Open verse →
कहेउँ परम पुनीत इतिहासा। सुनत श्रवन छूटहिं भव पासा।।
अर्थ · Hindi
कहेउँ परम पुनीत इतिहासा। सुनत श्रवन छूटहिं भव पासा।।
- RCM 7.126.2Open verse →
प्रनत कल्पतरु करुना पुंजा। उपजइ प्रीति राम पद कंजा।।
अर्थ · Hindi
प्रनत कल्पतरु करुना पुंजा। उपजइ प्रीति राम पद कंजा।।
- RCM 7.126.3Open verse →
मन क्रम बचन जनित अघ जाई। सुनहिं जे कथा श्रवन मन लाई।।
अर्थ · Hindi
मन क्रम बचन जनित अघ जाई। सुनहिं जे कथा श्रवन मन लाई।।
- RCM 7.126.4Open verse →
तीर्थाटन साधन समुदाई। जोग बिराग ग्यान निपुनाई।।
अर्थ · Hindi
तीर्थाटन साधन समुदाई। जोग बिराग ग्यान निपुनाई।।
- RCM 7.126.5Open verse →
नाना कर्म धर्म ब्रत दाना। संजम दम जप तप मख नाना।।
अर्थ · Hindi
नाना कर्म धर्म ब्रत दाना। संजम दम जप तप मख नाना।।
- RCM 7.126.6Open verse →
भूत दया द्विज गुर सेवकाई। बिद्या बिनय बिबेक बड़ाई।।
अर्थ · Hindi
भूत दया द्विज गुर सेवकाई। बिद्या बिनय बिबेक बड़ाई।।
- RCM 7.126.7Open verse →
जहँ लगि साधन बेद बखानी। सब कर फल हरि भगति भवानी।।
अर्थ · Hindi
जहँ लगि साधन बेद बखानी। सब कर फल हरि भगति भवानी।।
- RCM 7.126.8Open verse →
सो रघुनाथ भगति श्रुति गाई। राम कृपाँ काहूँ एक पाई।।
अर्थ · Hindi
सो रघुनाथ भगति श्रुति गाई। राम कृपाँ काहूँ एक पाई।।
- RCM 7.127.1Open verse →
सोइ सर्बग्य गुनी सोइ ग्याता। सोइ महि मंडित पंडित दाता।।
अर्थ · Hindi
सोइ सर्बग्य गुनी सोइ ग्याता। सोइ महि मंडित पंडित दाता।।
- RCM 7.127.2Open verse →
धर्म परायन सोइ कुल त्राता। राम चरन जा कर मन राता।।
अर्थ · Hindi
धर्म परायन सोइ कुल त्राता। राम चरन जा कर मन राता।।
- RCM 7.127.3Open verse →
नीति निपुन सोइ परम सयाना। श्रुति सिद्धांत नीक तेहिं जाना।।
अर्थ · Hindi
नीति निपुन सोइ परम सयाना। श्रुति सिद्धांत नीक तेहिं जाना।।
- RCM 7.127.4Open verse →
सोइ कबि कोबिद सोइ रनधीरा। जो छल छाड़ि भजइ रघुबीरा।।
अर्थ · Hindi
सोइ कबि कोबिद सोइ रनधीरा। जो छल छाड़ि भजइ रघुबीरा।।
- RCM 7.127.5Open verse →
धन्य देस सो जहँ सुरसरी। धन्य नारि पतिब्रत अनुसरी।।
अर्थ · Hindi
धन्य देस सो जहँ सुरसरी। धन्य नारि पतिब्रत अनुसरी।।
- RCM 7.127.6Open verse →
धन्य सो भूपु नीति जो करई। धन्य सो द्विज निज धर्म न टरई।।
अर्थ · Hindi
धन्य सो भूपु नीति जो करई। धन्य सो द्विज निज धर्म न टरई।।
- RCM 7.127.7Open verse →
सो धन धन्य प्रथम गति जाकी। धन्य पुन्य रत मति सोइ पाकी।।
अर्थ · Hindi
सो धन धन्य प्रथम गति जाकी। धन्य पुन्य रत मति सोइ पाकी।।
- RCM 7.127.8Open verse →
धन्य घरी सोइ जब सतसंगा। धन्य जन्म द्विज भगति अभंगा।।
अर्थ · Hindi
धन्य घरी सोइ जब सतसंगा। धन्य जन्म द्विज भगति अभंगा।।
- RCM 7.128.1Open verse →
मति अनुरूप कथा मैं भाषी। जद्यपि प्रथम गुप्त करि राखी।।
अर्थ · Hindi
मति अनुरूप कथा मैं भाषी। जद्यपि प्रथम गुप्त करि राखी।।
- RCM 7.128.2Open verse →
तव मन प्रीति देखि अधिकाई। तब मैं रघुपति कथा सुनाई।।
अर्थ · Hindi
तव मन प्रीति देखि अधिकाई। तब मैं रघुपति कथा सुनाई।।
- RCM 7.128.3Open verse →
यह न कहिअ सठही हठसीलहि। जो मन लाइ न सुन हरि लीलहि।।
अर्थ · Hindi
यह न कहिअ सठही हठसीलहि। जो मन लाइ न सुन हरि लीलहि।।
- RCM 7.128.4Open verse →
कहिअ न लोभिहि क्रोधहि कामिहि। जो न भजइ सचराचर स्वामिहि।।
अर्थ · Hindi
कहिअ न लोभिहि क्रोधहि कामिहि। जो न भजइ सचराचर स्वामिहि।।
- RCM 7.128.5Open verse →
द्विज द्रोहिहि न सुनाइअ कबहूँ। सुरपति सरिस होइ नृप जबहूँ।।
अर्थ · Hindi
द्विज द्रोहिहि न सुनाइअ कबहूँ। सुरपति सरिस होइ नृप जबहूँ।।
- RCM 7.128.6Open verse →
राम कथा के तेइ अधिकारी। जिन्ह कें सतसंगति अति प्यारी।।
अर्थ · Hindi
राम कथा के तेइ अधिकारी। जिन्ह कें सतसंगति अति प्यारी।।
- RCM 7.128.7Open verse →
गुर पद प्रीति नीति रत जेई। द्विज सेवक अधिकारी तेई।।
अर्थ · Hindi
गुर पद प्रीति नीति रत जेई। द्विज सेवक अधिकारी तेई।।
- RCM 7.128.8Open verse →
ता कहँ यह बिसेष सुखदाई। जाहि प्रानप्रिय श्रीरघुराई।।
अर्थ · Hindi
ता कहँ यह बिसेष सुखदाई। जाहि प्रानप्रिय श्रीरघुराई।।
- RCM 7.129.1Open verse →
राम कथा गिरिजा मैं बरनी। कलि मल समनि मनोमल हरनी।।
अर्थ · Hindi
राम कथा गिरिजा मैं बरनी। कलि मल समनि मनोमल हरनी।।
- RCM 7.129.2Open verse →
संसृति रोग सजीवन मूरी। राम कथा गावहिं श्रुति सूरी।।
अर्थ · Hindi
संसृति रोग सजीवन मूरी। राम कथा गावहिं श्रुति सूरी।।
- RCM 7.129.3Open verse →
एहि महँ रुचिर सप्त सोपाना। रघुपति भगति केर पंथाना।।
अर्थ · Hindi
एहि महँ रुचिर सप्त सोपाना। रघुपति भगति केर पंथाना।।
- RCM 7.129.4Open verse →
अति हरि कृपा जाहि पर होई। पाउँ देइ एहिं मारग सोई।।
अर्थ · Hindi
अति हरि कृपा जाहि पर होई। पाउँ देइ एहिं मारग सोई।।
- RCM 7.129.5Open verse →
मन कामना सिद्धि नर पावा। जे यह कथा कपट तजि गावा।।
अर्थ · Hindi
मन कामना सिद्धि नर पावा। जे यह कथा कपट तजि गावा।।
- RCM 7.129.6Open verse →
कहहिं सुनहिं अनुमोदन करहीं। ते गोपद इव भवनिधि तरहीं।।
अर्थ · Hindi
कहहिं सुनहिं अनुमोदन करहीं। ते गोपद इव भवनिधि तरहीं।।
- RCM 7.129.7Open verse →
सुनि सब कथा हृदयँ अति भाई। गिरिजा बोली गिरा सुहाई।।
अर्थ · Hindi
सुनि सब कथा हृदयँ अति भाई। गिरिजा बोली गिरा सुहाई।।
- RCM 7.129.8Open verse →
नाथ कृपाँ मम गत संदेहा। राम चरन उपजेउ नव नेहा।।
अर्थ · Hindi
नाथ कृपाँ मम गत संदेहा। राम चरन उपजेउ नव नेहा।।
- RCM 7.130001Open verse →
कलियुग केवल नाम अधारा। सुमिरि सुमिरि नर उतरहिं पारा॥
Meaning · English
In Kaliyuga the Name alone is the support; remembering, remembering it, men cross over (the ocean of samsara).
- RCM 7.130.2Open verse →
भव भंजन गंजन संदेहा। जन रंजन सज्जन प्रिय एहा।।
अर्थ · Hindi
भव भंजन गंजन संदेहा। जन रंजन सज्जन प्रिय एहा।।
- RCM 7.130.3Open verse →
राम उपासक जे जग माहीं। एहि सम प्रिय तिन्ह के कछु नाहीं।।
अर्थ · Hindi
राम उपासक जे जग माहीं। एहि सम प्रिय तिन्ह के कछु नाहीं।।
- RCM 7.130.4Open verse →
रघुपति कृपाँ जथामति गावा। मैं यह पावन चरित सुहावा।।
अर्थ · Hindi
रघुपति कृपाँ जथामति गावा। मैं यह पावन चरित सुहावा।।
- RCM 7.130.5Open verse →
एहिं कलिकाल न साधन दूजा। जोग जग्य जप तप ब्रत पूजा।।
अर्थ · Hindi
एहिं कलिकाल न साधन दूजा। जोग जग्य जप तप ब्रत पूजा।।
- RCM 7.130.6Open verse →
रामहि सुमिरिअ गाइअ रामहि। संतत सुनिअ राम गुन ग्रामहि।।
अर्थ · Hindi
रामहि सुमिरिअ गाइअ रामहि। संतत सुनिअ राम गुन ग्रामहि।।
- RCM 7.130.7Open verse →
जासु पतित पावन बड़ बाना। गावहिं कबि श्रुति संत पुराना।।
अर्थ · Hindi
जासु पतित पावन बड़ बाना। गावहिं कबि श्रुति संत पुराना।।
- RCM 7.130.8Open verse →
ताहि भजहि मन तजि कुटिलाई। राम भजें गति केहिं नहिं पाई।।
अर्थ · Hindi
ताहि भजहि मन तजि कुटिलाई। राम भजें गति केहिं नहिं पाई।।
- RCM 7.130.9Open verse →
पाई न केहिं गति पतित पावन राम भजि सुनु सठ मना।
अर्थ · Hindi
पाई न केहिं गति पतित पावन राम भजि सुनु सठ मना।
- RCM 7.130.10Open verse →
गनिका अजामिल ब्याध गीध गजादि खल तारे घना।।
अर्थ · Hindi
गनिका अजामिल ब्याध गीध गजादि खल तारे घना।।
- RCM 7.130.11Open verse →
आभीर जमन किरात खस स्वपचादि अति अघरूप जे।
अर्थ · Hindi
आभीर जमन किरात खस स्वपचादि अति अघरूप जे।
- RCM 7.130.12Open verse →
कहि नाम बारक तेपि पावन होहिं राम नमामि ते।।1।।
अर्थ · Hindi
कहि नाम बारक तेपि पावन होहिं राम नमामि ते।।1।।
- RCM 7.130.13Open verse →
रघुबंस भूषन चरित यह नर कहहिं सुनहिं जे गावहीं।
अर्थ · Hindi
रघुबंस भूषन चरित यह नर कहहिं सुनहिं जे गावहीं।
- RCM 7.130.14Open verse →
कलि मल मनोमल धोइ बिनु श्रम राम धाम सिधावहीं।।
अर्थ · Hindi
कलि मल मनोमल धोइ बिनु श्रम राम धाम सिधावहीं।।
- RCM 7.130.15Open verse →
सत पंच चौपाईं मनोहर जानि जो नर उर धरै।
अर्थ · Hindi
सत पंच चौपाईं मनोहर जानि जो नर उर धरै।
- RCM 7.130.16Open verse →
दारुन अबिद्या पंच जनित बिकार श्रीरघुबर हरै।।2।।
अर्थ · Hindi
दारुन अबिद्या पंच जनित बिकार श्रीरघुबर हरै।।2।।
- RCM 7.130.17Open verse →
सुंदर सुजान कृपा निधान अनाथ पर कर प्रीति जो।
अर्थ · Hindi
सुंदर सुजान कृपा निधान अनाथ पर कर प्रीति जो।
- RCM 7.130.18Open verse →
सो एक राम अकाम हित निर्बानप्रद सम आन को।।
अर्थ · Hindi
सो एक राम अकाम हित निर्बानप्रद सम आन को।।
- RCM 7.130.19Open verse →
जाकी कृपा लवलेस ते मतिमंद तुलसीदासहूँ।
अर्थ · Hindi
जाकी कृपा लवलेस ते मतिमंद तुलसीदासहूँ।
- RCM 7.130.20Open verse →
पायो परम बिश्रामु राम समान प्रभु नाहीं कहूँ।।3।।
अर्थ · Hindi
पायो परम बिश्रामु राम समान प्रभु नाहीं कहूँ।।3।।
- RCM 7.130.21Open verse →
मो सम दीन न दीन हित तुम्ह समान रघुबीर।
अर्थ · Hindi
मो सम दीन न दीन हित तुम्ह समान रघुबीर।
- RCM 7.130.22Open verse →
अस बिचारि रघुबंस मनि हरहु बिषम भव भीर।।130(क)।।
अर्थ · Hindi
अस बिचारि रघुबंस मनि हरहु बिषम भव भीर।।130(क)।।
- RCM 7.130.23Open verse →
कामिहि नारि पिआरि जिमि लोभहि प्रिय जिमि दाम।
अर्थ · Hindi
कामिहि नारि पिआरि जिमि लोभहि प्रिय जिमि दाम।
- RCM 7.130.24Open verse →
तिमि रघुनाथ निरंतर प्रिय लागहु मोहि राम।।130(ख)।।
अर्थ · Hindi
तिमि रघुनाथ निरंतर प्रिय लागहु मोहि राम।।130(ख)।।
- RCM 7.130.25Open verse →
श्लोक
अर्थ · Hindi
श्लोक
- RCM 7.130.26Open verse →
यत्पूर्वं प्रभुणा कृतं सुकविना श्रीशम्भुना दुर्गमं
अर्थ · Hindi
यत्पूर्वं प्रभुणा कृतं सुकविना श्रीशम्भुना दुर्गमं
- RCM 7.130.27Open verse →
श्रॆमद्रामपदाब्जभक्तिमनिशम प्राप्त्यै तू रामायणं।
अर्थ · Hindi
श्रॆमद्रामपदाब्जभक्तिमनिशम प्राप्त्यै तू रामायणं।
- RCM 7.130.28Open verse →
मत्वा तद्रघुनाथनामनिरतम स्वान्तस्तम:शान्तये
अर्थ · Hindi
मत्वा तद्रघुनाथनामनिरतम स्वान्तस्तम:शान्तये
- RCM 7.130.29Open verse →
भाषाबद्ध्मिदम चकार तुलसीदासस्तथा मानसं।।1।।
अर्थ · Hindi
भाषाबद्ध्मिदम चकार तुलसीदासस्तथा मानसं।।1।।
- RCM 7.130.30Open verse →
पुण्यं पापहरं सदा शिवकरं विज्ञानाभाक्तिप्रदम
अर्थ · Hindi
पुण्यं पापहरं सदा शिवकरं विज्ञानाभाक्तिप्रदम
- RCM 7.130.31Open verse →
मायामोहमलापहं सुविमलं प्रेमाम्बुपूरं शुभम।
अर्थ · Hindi
मायामोहमलापहं सुविमलं प्रेमाम्बुपूरं शुभम।
- RCM 7.130.32Open verse →
श्रॆमद्रामचरितमानसमिदम भक्त्यावगाहन्ति ये
अर्थ · Hindi
श्रॆमद्रामचरितमानसमिदम भक्त्यावगाहन्ति ये
- RCM 7.130.33Open verse →
ते सन्सारपतनगघोरकिरनैर्दह्यन्ति नो मानवाः।।2।।
अर्थ · Hindi
ते सन्सारपतनगघोरकिरनैर्दह्यन्ति नो मानवाः।।2।।