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Ramcharitmanas · अध्याय 7

Uttara Kanda

उत्तरकाण्ड

Rama Rajya, the dialogue of Kakbhushundi and Garuda, Tulsidas's final reflections on bhakti.

  1. रहेउ एक दिन अवधि अधारा। समुझत मन दुख भयउ अपारा।।

    अर्थ · Hindi

    रहेउ एक दिन अवधि अधारा। समुझत मन दुख भयउ अपारा।।

  2. कारन कवन नाथ नहिं आयउ। जानि कुटिल किधौं मोहि बिसरायउ।।

    अर्थ · Hindi

    कारन कवन नाथ नहिं आयउ। जानि कुटिल किधौं मोहि बिसरायउ।।

  3. अहह धन्य लछिमन बड़भागी। राम पदारबिंदु अनुरागी।।

    अर्थ · Hindi

    अहह धन्य लछिमन बड़भागी। राम पदारबिंदु अनुरागी।।

  4. कपटी कुटिल मोहि प्रभु चीन्हा। ताते नाथ संग नहिं लीन्हा।।

    अर्थ · Hindi

    कपटी कुटिल मोहि प्रभु चीन्हा। ताते नाथ संग नहिं लीन्हा।।

  5. जौं करनी समुझै प्रभु मोरी। नहिं निस्तार कलप सत कोरी।।

    अर्थ · Hindi

    जौं करनी समुझै प्रभु मोरी। नहिं निस्तार कलप सत कोरी।।

  6. जन अवगुन प्रभु मान न काऊ। दीन बंधु अति मृदुल सुभाऊ।।

    अर्थ · Hindi

    जन अवगुन प्रभु मान न काऊ। दीन बंधु अति मृदुल सुभाऊ।।

  7. मोरि जियँ भरोस दृढ़ सोई। मिलिहहिं राम सगुन सुभ होई।।

    अर्थ · Hindi

    मोरि जियँ भरोस दृढ़ सोई। मिलिहहिं राम सगुन सुभ होई।।

  8. बीतें अवधि रहहि जौं प्राना। अधम कवन जग मोहि समाना।।

    अर्थ · Hindi

    बीतें अवधि रहहि जौं प्राना। अधम कवन जग मोहि समाना।।

  9. देखत हनूमान अति हरषेउ। पुलक गात लोचन जल बरषेउ।।

    अर्थ · Hindi

    देखत हनूमान अति हरषेउ। पुलक गात लोचन जल बरषेउ।।

  10. मन महँ बहुत भाँति सुख मानी। बोलेउ श्रवन सुधा सम बानी।।

    अर्थ · Hindi

    मन महँ बहुत भाँति सुख मानी। बोलेउ श्रवन सुधा सम बानी।।

  11. जासु बिरहँ सोचहु दिन राती। रटहु निरंतर गुन गन पाँती।।

    अर्थ · Hindi

    जासु बिरहँ सोचहु दिन राती। रटहु निरंतर गुन गन पाँती।।

  12. रघुकुल तिलक सुजन सुखदाता। आयउ कुसल देव मुनि त्राता।।

    अर्थ · Hindi

    रघुकुल तिलक सुजन सुखदाता। आयउ कुसल देव मुनि त्राता।।

  13. रिपु रन जीति सुजस सुर गावत। सीता सहित अनुज प्रभु आवत।।

    अर्थ · Hindi

    रिपु रन जीति सुजस सुर गावत। सीता सहित अनुज प्रभु आवत।।

  14. सुनत बचन बिसरे सब दूखा। तृषावंत जिमि पाइ पियूषा।।

    अर्थ · Hindi

    सुनत बचन बिसरे सब दूखा। तृषावंत जिमि पाइ पियूषा।।

  15. को तुम्ह तात कहाँ ते आए। मोहि परम प्रिय बचन सुनाए।।

    अर्थ · Hindi

    को तुम्ह तात कहाँ ते आए। मोहि परम प्रिय बचन सुनाए।।

  16. मारुत सुत मैं कपि हनुमाना। नामु मोर सुनु कृपानिधाना।।

    अर्थ · Hindi

    मारुत सुत मैं कपि हनुमाना। नामु मोर सुनु कृपानिधाना।।

  17. दीनबंधु रघुपति कर किंकर। सुनत भरत भेंटेउ उठि सादर।।

    अर्थ · Hindi

    दीनबंधु रघुपति कर किंकर। सुनत भरत भेंटेउ उठि सादर।।

  18. RCM 7.2.10Open verse →

    मिलत प्रेम नहिं हृदयँ समाता। नयन स्त्रवत जल पुलकित गाता।।

    अर्थ · Hindi

    मिलत प्रेम नहिं हृदयँ समाता। नयन स्त्रवत जल पुलकित गाता।।

  19. RCM 7.2.11Open verse →

    कपि तव दरस सकल दुख बीते। मिले आजु मोहि राम पिरीते।।

    अर्थ · Hindi

    कपि तव दरस सकल दुख बीते। मिले आजु मोहि राम पिरीते।।

  20. RCM 7.2.12Open verse →

    बार बार बूझी कुसलाता। तो कहुँ देउँ काह सुनु भ्राता।।

    अर्थ · Hindi

    बार बार बूझी कुसलाता। तो कहुँ देउँ काह सुनु भ्राता।।

  21. RCM 7.2.13Open verse →

    एहि संदेस सरिस जग माहीं। करि बिचार देखेउँ कछु नाहीं।।

    अर्थ · Hindi

    एहि संदेस सरिस जग माहीं। करि बिचार देखेउँ कछु नाहीं।।

  22. RCM 7.2.14Open verse →

    नाहिन तात उरिन मैं तोही। अब प्रभु चरित सुनावहु मोही।।

    अर्थ · Hindi

    नाहिन तात उरिन मैं तोही। अब प्रभु चरित सुनावहु मोही।।

  23. RCM 7.2.15Open verse →

    तब हनुमंत नाइ पद माथा। कहे सकल रघुपति गुन गाथा।।

    अर्थ · Hindi

    तब हनुमंत नाइ पद माथा। कहे सकल रघुपति गुन गाथा।।

  24. RCM 7.2.16Open verse →

    कहु कपि कबहुँ कृपाल गोसाईं। सुमिरहिं मोहि दास की नाईं।।

    अर्थ · Hindi

    कहु कपि कबहुँ कृपाल गोसाईं। सुमिरहिं मोहि दास की नाईं।।

  25. हरषि भरत कोसलपुर आए। समाचार सब गुरहि सुनाए।।

    अर्थ · Hindi

    हरषि भरत कोसलपुर आए। समाचार सब गुरहि सुनाए।।

  26. पुनि मंदिर महँ बात जनाई। आवत नगर कुसल रघुराई।।

    अर्थ · Hindi

    पुनि मंदिर महँ बात जनाई। आवत नगर कुसल रघुराई।।

  27. सुनत सकल जननीं उठि धाईं। कहि प्रभु कुसल भरत समुझाई।।

    अर्थ · Hindi

    सुनत सकल जननीं उठि धाईं। कहि प्रभु कुसल भरत समुझाई।।

  28. समाचार पुरबासिन्ह पाए। नर अरु नारि हरषि सब धाए।।

    अर्थ · Hindi

    समाचार पुरबासिन्ह पाए। नर अरु नारि हरषि सब धाए।।

  29. दधि दुर्बा रोचन फल फूला। नव तुलसी दल मंगल मूला।।

    अर्थ · Hindi

    दधि दुर्बा रोचन फल फूला। नव तुलसी दल मंगल मूला।।

  30. भरि भरि हेम थार भामिनी। गावत चलिं सिंधु सिंधुरगामिनी।।

    अर्थ · Hindi

    भरि भरि हेम थार भामिनी। गावत चलिं सिंधु सिंधुरगामिनी।।

  31. जे जैसेहिं तैसेहिं उटि धावहिं। बाल बृद्ध कहँ संग न लावहिं।।

    अर्थ · Hindi

    जे जैसेहिं तैसेहिं उटि धावहिं। बाल बृद्ध कहँ संग न लावहिं।।

  32. एक एकन्ह कहँ बूझहिं भाई। तुम्ह देखे दयाल रघुराई।।

    अर्थ · Hindi

    एक एकन्ह कहँ बूझहिं भाई। तुम्ह देखे दयाल रघुराई।।

  33. अवधपुरी प्रभु आवत जानी। भई सकल सोभा कै खानी।।

    अर्थ · Hindi

    अवधपुरी प्रभु आवत जानी। भई सकल सोभा कै खानी।।

  34. RCM 7.3.10Open verse →

    बहइ सुहावन त्रिबिध समीरा। भइ सरजू अति निर्मल नीरा।।

    अर्थ · Hindi

    बहइ सुहावन त्रिबिध समीरा। भइ सरजू अति निर्मल नीरा।।

  35. इहाँ भानुकुल कमल दिवाकर। कपिन्ह देखावत नगर मनोहर।।

    अर्थ · Hindi

    इहाँ भानुकुल कमल दिवाकर। कपिन्ह देखावत नगर मनोहर।।

  36. सुनु कपीस अंगद लंकेसा। पावन पुरी रुचिर यह देसा।।

    अर्थ · Hindi

    सुनु कपीस अंगद लंकेसा। पावन पुरी रुचिर यह देसा।।

  37. जद्यपि सब बैकुंठ बखाना। बेद पुरान बिदित जगु जाना।।

    अर्थ · Hindi

    जद्यपि सब बैकुंठ बखाना। बेद पुरान बिदित जगु जाना।।

  38. अवधपुरी सम प्रिय नहिं सोऊ। यह प्रसंग जानइ कोउ कोऊ।।

    अर्थ · Hindi

    अवधपुरी सम प्रिय नहिं सोऊ। यह प्रसंग जानइ कोउ कोऊ।।

  39. जन्मभूमि मम पुरी सुहावनि। उत्तर दिसि बह सरजू पावनि।।

    अर्थ · Hindi

    जन्मभूमि मम पुरी सुहावनि। उत्तर दिसि बह सरजू पावनि।।

  40. जा मज्जन ते बिनहिं प्रयासा। मम समीप नर पावहिं बासा।।

    अर्थ · Hindi

    जा मज्जन ते बिनहिं प्रयासा। मम समीप नर पावहिं बासा।।

  41. अति प्रिय मोहि इहाँ के बासी। मम धामदा पुरी सुख रासी।।

    अर्थ · Hindi

    अति प्रिय मोहि इहाँ के बासी। मम धामदा पुरी सुख रासी।।

  42. हरषे सब कपि सुनि प्रभु बानी। धन्य अवध जो राम बखानी।।

    अर्थ · Hindi

    हरषे सब कपि सुनि प्रभु बानी। धन्य अवध जो राम बखानी।।

  43. आए भरत संग सब लोगा। कृस तन श्रीरघुबीर बियोगा।।

    अर्थ · Hindi

    आए भरत संग सब लोगा। कृस तन श्रीरघुबीर बियोगा।।

  44. बामदेव बसिष्ठ मुनिनायक। देखे प्रभु महि धरि धनु सायक।।

    अर्थ · Hindi

    बामदेव बसिष्ठ मुनिनायक। देखे प्रभु महि धरि धनु सायक।।

  45. धाइ धरे गुर चरन सरोरुह। अनुज सहित अति पुलक तनोरुह।।

    अर्थ · Hindi

    धाइ धरे गुर चरन सरोरुह। अनुज सहित अति पुलक तनोरुह।।

  46. भेंटि कुसल बूझी मुनिराया। हमरें कुसल तुम्हारिहिं दाया।।

    अर्थ · Hindi

    भेंटि कुसल बूझी मुनिराया। हमरें कुसल तुम्हारिहिं दाया।।

  47. सकल द्विजन्ह मिलि नायउ माथा। धर्म धुरंधर रघुकुलनाथा।।

    अर्थ · Hindi

    सकल द्विजन्ह मिलि नायउ माथा। धर्म धुरंधर रघुकुलनाथा।।

  48. गहे भरत पुनि प्रभु पद पंकज। नमत जिन्हहि सुर मुनि संकर अज।।

    अर्थ · Hindi

    गहे भरत पुनि प्रभु पद पंकज। नमत जिन्हहि सुर मुनि संकर अज।।

  49. परे भूमि नहिं उठत उठाए। बर करि कृपासिंधु उर लाए।।

    अर्थ · Hindi

    परे भूमि नहिं उठत उठाए। बर करि कृपासिंधु उर लाए।।

  50. स्यामल गात रोम भए ठाढ़े। नव राजीव नयन जल बाढ़े।।

    अर्थ · Hindi

    स्यामल गात रोम भए ठाढ़े। नव राजीव नयन जल बाढ़े।।

  51. भरतानुज लछिमन पुनि भेंटे। दुसह बिरह संभव दुख मेटे।।

    अर्थ · Hindi

    भरतानुज लछिमन पुनि भेंटे। दुसह बिरह संभव दुख मेटे।।

  52. सीता चरन भरत सिरु नावा। अनुज समेत परम सुख पावा।।

    अर्थ · Hindi

    सीता चरन भरत सिरु नावा। अनुज समेत परम सुख पावा।।

  53. प्रभु बिलोकि हरषे पुरबासी। जनित बियोग बिपति सब नासी।।

    अर्थ · Hindi

    प्रभु बिलोकि हरषे पुरबासी। जनित बियोग बिपति सब नासी।।

  54. प्रेमातुर सब लोग निहारी। कौतुक कीन्ह कृपाल खरारी।।

    अर्थ · Hindi

    प्रेमातुर सब लोग निहारी। कौतुक कीन्ह कृपाल खरारी।।

  55. अमित रूप प्रगटे तेहि काला। जथाजोग मिले सबहि कृपाला।।

    अर्थ · Hindi

    अमित रूप प्रगटे तेहि काला। जथाजोग मिले सबहि कृपाला।।

  56. कृपादृष्टि रघुबीर बिलोकी। किए सकल नर नारि बिसोकी।।

    अर्थ · Hindi

    कृपादृष्टि रघुबीर बिलोकी। किए सकल नर नारि बिसोकी।।

  57. छन महिं सबहि मिले भगवाना। उमा मरम यह काहुँ न जाना।।

    अर्थ · Hindi

    छन महिं सबहि मिले भगवाना। उमा मरम यह काहुँ न जाना।।

  58. एहि बिधि सबहि सुखी करि रामा। आगें चले सील गुन धामा।।

    अर्थ · Hindi

    एहि बिधि सबहि सुखी करि रामा। आगें चले सील गुन धामा।।

  59. कौसल्यादि मातु सब धाई। निरखि बच्छ जनु धेनु लवाई।।

    अर्थ · Hindi

    कौसल्यादि मातु सब धाई। निरखि बच्छ जनु धेनु लवाई।।

  60. सासुन्ह सबनि मिली बैदेही। चरनन्हि लागि हरषु अति तेही।।

    अर्थ · Hindi

    सासुन्ह सबनि मिली बैदेही। चरनन्हि लागि हरषु अति तेही।।

  61. देहिं असीस बूझि कुसलाता। होइ अचल तुम्हार अहिवाता।।

    अर्थ · Hindi

    देहिं असीस बूझि कुसलाता। होइ अचल तुम्हार अहिवाता।।

  62. सब रघुपति मुख कमल बिलोकहिं। मंगल जानि नयन जल रोकहिं।।

    अर्थ · Hindi

    सब रघुपति मुख कमल बिलोकहिं। मंगल जानि नयन जल रोकहिं।।

  63. कनक थार आरति उतारहिं। बार बार प्रभु गात निहारहिं।।

    अर्थ · Hindi

    कनक थार आरति उतारहिं। बार बार प्रभु गात निहारहिं।।

  64. नाना भाँति निछावरि करहीं। परमानंद हरष उर भरहीं।।

    अर्थ · Hindi

    नाना भाँति निछावरि करहीं। परमानंद हरष उर भरहीं।।

  65. कौसल्या पुनि पुनि रघुबीरहि। चितवति कृपासिंधु रनधीरहि।।

    अर्थ · Hindi

    कौसल्या पुनि पुनि रघुबीरहि। चितवति कृपासिंधु रनधीरहि।।

  66. हृदयँ बिचारति बारहिं बारा। कवन भाँति लंकापति मारा।।

    अर्थ · Hindi

    हृदयँ बिचारति बारहिं बारा। कवन भाँति लंकापति मारा।।

  67. अति सुकुमार जुगल मेरे बारे। निसिचर सुभट महाबल भारे।।

    अर्थ · Hindi

    अति सुकुमार जुगल मेरे बारे। निसिचर सुभट महाबल भारे।।

  68. लंकापति कपीस नल नीला। जामवंत अंगद सुभसीला।।

    अर्थ · Hindi

    लंकापति कपीस नल नीला। जामवंत अंगद सुभसीला।।

  69. हनुमदादि सब बानर बीरा। धरे मनोहर मनुज सरीरा।।

    अर्थ · Hindi

    हनुमदादि सब बानर बीरा। धरे मनोहर मनुज सरीरा।।

  70. भरत सनेह सील ब्रत नेमा। सादर सब बरनहिं अति प्रेमा।।

    अर्थ · Hindi

    भरत सनेह सील ब्रत नेमा। सादर सब बरनहिं अति प्रेमा।।

  71. देखि नगरबासिन्ह कै रीती। सकल सराहहि प्रभु पद प्रीती।।

    अर्थ · Hindi

    देखि नगरबासिन्ह कै रीती। सकल सराहहि प्रभु पद प्रीती।।

  72. पुनि रघुपति सब सखा बोलाए। मुनि पद लागहु सकल सिखाए।।

    अर्थ · Hindi

    पुनि रघुपति सब सखा बोलाए। मुनि पद लागहु सकल सिखाए।।

  73. गुर बसिष्ट कुलपूज्य हमारे। इन्ह की कृपाँ दनुज रन मारे।।

    अर्थ · Hindi

    गुर बसिष्ट कुलपूज्य हमारे। इन्ह की कृपाँ दनुज रन मारे।।

  74. ए सब सखा सुनहु मुनि मेरे। भए समर सागर कहँ बेरे।।

    अर्थ · Hindi

    ए सब सखा सुनहु मुनि मेरे। भए समर सागर कहँ बेरे।।

  75. मम हित लागि जन्म इन्ह हारे। भरतहु ते मोहि अधिक पिआरे।।

    अर्थ · Hindi

    मम हित लागि जन्म इन्ह हारे। भरतहु ते मोहि अधिक पिआरे।।

  76. सुनि प्रभु बचन मगन सब भए। निमिष निमिष उपजत सुख नए।।

    अर्थ · Hindi

    सुनि प्रभु बचन मगन सब भए। निमिष निमिष उपजत सुख नए।।

  77. कंचन कलस बिचित्र सँवारे। सबहिं धरे सजि निज निज द्वारे।।

    अर्थ · Hindi

    कंचन कलस बिचित्र सँवारे। सबहिं धरे सजि निज निज द्वारे।।

  78. बंदनवार पताका केतू। सबन्हि बनाए मंगल हेतू।।

    अर्थ · Hindi

    बंदनवार पताका केतू। सबन्हि बनाए मंगल हेतू।।

  79. बीथीं सकल सुगंध सिंचाई। गजमनि रचि बहु चौक पुराई।।

    अर्थ · Hindi

    बीथीं सकल सुगंध सिंचाई। गजमनि रचि बहु चौक पुराई।।

  80. नाना भाँति सुमंगल साजे। हरषि नगर निसान बहु बाजे।।

    अर्थ · Hindi

    नाना भाँति सुमंगल साजे। हरषि नगर निसान बहु बाजे।।

  81. जहँ तहँ नारि निछावर करहीं। देहिं असीस हरष उर भरहीं।।

    अर्थ · Hindi

    जहँ तहँ नारि निछावर करहीं। देहिं असीस हरष उर भरहीं।।

  82. कंचन थार आरती नाना। जुबती सजें करहिं सुभ गाना।।

    अर्थ · Hindi

    कंचन थार आरती नाना। जुबती सजें करहिं सुभ गाना।।

  83. करहिं आरती आरतिहर कें। रघुकुल कमल बिपिन दिनकर कें।।

    अर्थ · Hindi

    करहिं आरती आरतिहर कें। रघुकुल कमल बिपिन दिनकर कें।।

  84. पुर सोभा संपति कल्याना। निगम सेष सारदा बखाना।।

    अर्थ · Hindi

    पुर सोभा संपति कल्याना। निगम सेष सारदा बखाना।।

  85. तेउ यह चरित देखि ठगि रहहीं। उमा तासु गुन नर किमि कहहीं।।

    अर्थ · Hindi

    तेउ यह चरित देखि ठगि रहहीं। उमा तासु गुन नर किमि कहहीं।।

  86. RCM 7.10.1Open verse →

    प्रभु जानी कैकेई लजानी। प्रथम तासु गृह गए भवानी।।

    अर्थ · Hindi

    प्रभु जानी कैकेई लजानी। प्रथम तासु गृह गए भवानी।।

  87. RCM 7.10.2Open verse →

    ताहि प्रबोधि बहुत सुख दीन्हा। पुनि निज भवन गवन हरि कीन्हा।।

    अर्थ · Hindi

    ताहि प्रबोधि बहुत सुख दीन्हा। पुनि निज भवन गवन हरि कीन्हा।।

  88. RCM 7.10.3Open verse →

    कृपासिंधु जब मंदिर गए। पुर नर नारि सुखी सब भए।।

    अर्थ · Hindi

    कृपासिंधु जब मंदिर गए। पुर नर नारि सुखी सब भए।।

  89. RCM 7.10.4Open verse →

    गुर बसिष्ट द्विज लिए बुलाई। आजु सुघरी सुदिन समुदाई।।

    अर्थ · Hindi

    गुर बसिष्ट द्विज लिए बुलाई। आजु सुघरी सुदिन समुदाई।।

  90. RCM 7.10.5Open verse →

    सब द्विज देहु हरषि अनुसासन। रामचंद्र बैठहिं सिंघासन।।

    अर्थ · Hindi

    सब द्विज देहु हरषि अनुसासन। रामचंद्र बैठहिं सिंघासन।।

  91. RCM 7.10.6Open verse →

    मुनि बसिष्ट के बचन सुहाए। सुनत सकल बिप्रन्ह अति भाए।।

    अर्थ · Hindi

    मुनि बसिष्ट के बचन सुहाए। सुनत सकल बिप्रन्ह अति भाए।।

  92. RCM 7.10.7Open verse →

    कहहिं बचन मृदु बिप्र अनेका। जग अभिराम राम अभिषेका।।

    अर्थ · Hindi

    कहहिं बचन मृदु बिप्र अनेका। जग अभिराम राम अभिषेका।।

  93. RCM 7.10.8Open verse →

    अब मुनिबर बिलंब नहिं कीजे। महाराज कहँ तिलक करीजै।।

    अर्थ · Hindi

    अब मुनिबर बिलंब नहिं कीजे। महाराज कहँ तिलक करीजै।।

  94. RCM 7.11.1Open verse →

    अवधपुरी अति रुचिर बनाई। देवन्ह सुमन बृष्टि झरि लाई।।

    अर्थ · Hindi

    अवधपुरी अति रुचिर बनाई। देवन्ह सुमन बृष्टि झरि लाई।।

  95. RCM 7.11.2Open verse →

    राम कहा सेवकन्ह बुलाई। प्रथम सखन्ह अन्हवावहु जाई।।

    अर्थ · Hindi

    राम कहा सेवकन्ह बुलाई। प्रथम सखन्ह अन्हवावहु जाई।।

  96. RCM 7.11.3Open verse →

    सुनत बचन जहँ तहँ जन धाए। सुग्रीवादि तुरत अन्हवाए।।

    अर्थ · Hindi

    सुनत बचन जहँ तहँ जन धाए। सुग्रीवादि तुरत अन्हवाए।।

  97. RCM 7.11.4Open verse →

    पुनि करुनानिधि भरतु हँकारे। निज कर राम जटा निरुआरे।।

    अर्थ · Hindi

    पुनि करुनानिधि भरतु हँकारे। निज कर राम जटा निरुआरे।।

  98. RCM 7.11.5Open verse →

    अन्हवाए प्रभु तीनिउ भाई। भगत बछल कृपाल रघुराई।।

    अर्थ · Hindi

    अन्हवाए प्रभु तीनिउ भाई। भगत बछल कृपाल रघुराई।।

  99. RCM 7.11.6Open verse →

    भरत भाग्य प्रभु कोमलताई। सेष कोटि सत सकहिं न गाई।।

    अर्थ · Hindi

    भरत भाग्य प्रभु कोमलताई। सेष कोटि सत सकहिं न गाई।।

  100. RCM 7.11.7Open verse →

    पुनि निज जटा राम बिबराए। गुर अनुसासन मागि नहाए।।

    अर्थ · Hindi

    पुनि निज जटा राम बिबराए। गुर अनुसासन मागि नहाए।।

  101. RCM 7.11.8Open verse →

    करि मज्जन प्रभु भूषन साजे। अंग अनंग देखि सत लाजे।।

    अर्थ · Hindi

    करि मज्जन प्रभु भूषन साजे। अंग अनंग देखि सत लाजे।।

  102. RCM 7.12.1Open verse →

    प्रभु बिलोकि मुनि मन अनुरागा। तुरत दिब्य सिंघासन मागा।।

    अर्थ · Hindi

    प्रभु बिलोकि मुनि मन अनुरागा। तुरत दिब्य सिंघासन मागा।।

  103. RCM 7.12.2Open verse →

    रबि सम तेज सो बरनि न जाई। बैठे राम द्विजन्ह सिरु नाई।।

    अर्थ · Hindi

    रबि सम तेज सो बरनि न जाई। बैठे राम द्विजन्ह सिरु नाई।।

  104. RCM 7.12.3Open verse →

    जनकसुता समेत रघुराई। पेखि प्रहरषे मुनि समुदाई।।

    अर्थ · Hindi

    जनकसुता समेत रघुराई। पेखि प्रहरषे मुनि समुदाई।।

  105. RCM 7.12.4Open verse →

    बेद मंत्र तब द्विजन्ह उचारे। नभ सुर मुनि जय जयति पुकारे।।

    अर्थ · Hindi

    बेद मंत्र तब द्विजन्ह उचारे। नभ सुर मुनि जय जयति पुकारे।।

  106. RCM 7.12.5Open verse →

    प्रथम तिलक बसिष्ट मुनि कीन्हा। पुनि सब बिप्रन्ह आयसु दीन्हा।।

    अर्थ · Hindi

    प्रथम तिलक बसिष्ट मुनि कीन्हा। पुनि सब बिप्रन्ह आयसु दीन्हा।।

  107. RCM 7.12.6Open verse →

    सुत बिलोकि हरषीं महतारी। बार बार आरती उतारी।।

    अर्थ · Hindi

    सुत बिलोकि हरषीं महतारी। बार बार आरती उतारी।।

  108. RCM 7.12.7Open verse →

    बिप्रन्ह दान बिबिध बिधि दीन्हे। जाचक सकल अजाचक कीन्हे।।

    अर्थ · Hindi

    बिप्रन्ह दान बिबिध बिधि दीन्हे। जाचक सकल अजाचक कीन्हे।।

  109. RCM 7.12.8Open verse →

    सिंघासन पर त्रिभुअन साई। देखि सुरन्ह दुंदुभीं बजाईं।।

    अर्थ · Hindi

    सिंघासन पर त्रिभुअन साई। देखि सुरन्ह दुंदुभीं बजाईं।।

  110. RCM 7.13.1Open verse →

    जय सगुन निर्गुन रूप रूप अनूप भूप सिरोमने।

    अर्थ · Hindi

    जय सगुन निर्गुन रूप रूप अनूप भूप सिरोमने।

  111. RCM 7.13.2Open verse →

    दसकंधरादि प्रचंड निसिचर प्रबल खल भुज बल हने।।

    अर्थ · Hindi

    दसकंधरादि प्रचंड निसिचर प्रबल खल भुज बल हने।।

  112. RCM 7.13.3Open verse →

    अवतार नर संसार भार बिभंजि दारुन दुख दहे।

    अर्थ · Hindi

    अवतार नर संसार भार बिभंजि दारुन दुख दहे।

  113. RCM 7.13.4Open verse →

    जय प्रनतपाल दयाल प्रभु संजुक्त सक्ति नमामहे।।1।।

    अर्थ · Hindi

    जय प्रनतपाल दयाल प्रभु संजुक्त सक्ति नमामहे।।1।।

  114. RCM 7.13.5Open verse →

    तव बिषम माया बस सुरासुर नाग नर अग जग हरे।

    अर्थ · Hindi

    तव बिषम माया बस सुरासुर नाग नर अग जग हरे।

  115. RCM 7.13.6Open verse →

    भव पंथ भ्रमत अमित दिवस निसि काल कर्म गुननि भरे।।

    अर्थ · Hindi

    भव पंथ भ्रमत अमित दिवस निसि काल कर्म गुननि भरे।।

  116. RCM 7.13.7Open verse →

    जे नाथ करि करुना बिलोके त्रिबिधि दुख ते निर्बहे।

    अर्थ · Hindi

    जे नाथ करि करुना बिलोके त्रिबिधि दुख ते निर्बहे।

  117. RCM 7.13.8Open verse →

    भव खेद छेदन दच्छ हम कहुँ रच्छ राम नमामहे।।2।।

    अर्थ · Hindi

    भव खेद छेदन दच्छ हम कहुँ रच्छ राम नमामहे।।2।।

  118. RCM 7.13.9Open verse →

    जे ग्यान मान बिमत्त तव भव हरनि भक्ति न आदरी।

    अर्थ · Hindi

    जे ग्यान मान बिमत्त तव भव हरनि भक्ति न आदरी।

  119. RCM 7.13.10Open verse →

    ते पाइ सुर दुर्लभ पदादपि परत हम देखत हरी।।

    अर्थ · Hindi

    ते पाइ सुर दुर्लभ पदादपि परत हम देखत हरी।।

  120. RCM 7.13.11Open verse →

    बिस्वास करि सब आस परिहरि दास तव जे होइ रहे।

    अर्थ · Hindi

    बिस्वास करि सब आस परिहरि दास तव जे होइ रहे।

  121. RCM 7.13.12Open verse →

    जपि नाम तव बिनु श्रम तरहिं भव नाथ सो समरामहे।।3।।

    अर्थ · Hindi

    जपि नाम तव बिनु श्रम तरहिं भव नाथ सो समरामहे।।3।।

  122. RCM 7.13.13Open verse →

    जे चरन सिव अज पूज्य रज सुभ परसि मुनिपतिनी तरी।

    अर्थ · Hindi

    जे चरन सिव अज पूज्य रज सुभ परसि मुनिपतिनी तरी।

  123. RCM 7.13.14Open verse →

    नख निर्गता मुनि बंदिता त्रेलोक पावनि सुरसरी।।

    अर्थ · Hindi

    नख निर्गता मुनि बंदिता त्रेलोक पावनि सुरसरी।।

  124. RCM 7.13.15Open verse →

    ध्वज कुलिस अंकुस कंज जुत बन फिरत कंटक किन लहे।

    अर्थ · Hindi

    ध्वज कुलिस अंकुस कंज जुत बन फिरत कंटक किन लहे।

  125. RCM 7.13.16Open verse →

    पद कंज द्वंद मुकुंद राम रमेस नित्य भजामहे।।4।।

    अर्थ · Hindi

    पद कंज द्वंद मुकुंद राम रमेस नित्य भजामहे।।4।।

  126. RCM 7.13.17Open verse →

    अब्यक्तमूलमनादि तरु त्वच चारि निगमागम भने।

    अर्थ · Hindi

    अब्यक्तमूलमनादि तरु त्वच चारि निगमागम भने।

  127. RCM 7.13.18Open verse →

    षट कंध साखा पंच बीस अनेक पर्न सुमन घने।।

    अर्थ · Hindi

    षट कंध साखा पंच बीस अनेक पर्न सुमन घने।।

  128. RCM 7.13.19Open verse →

    फल जुगल बिधि कटु मधुर बेलि अकेलि जेहि आश्रित रहे।

    अर्थ · Hindi

    फल जुगल बिधि कटु मधुर बेलि अकेलि जेहि आश्रित रहे।

  129. RCM 7.13.20Open verse →

    पल्लवत फूलत नवल नित संसार बिटप नमामहे।।5।।

    अर्थ · Hindi

    पल्लवत फूलत नवल नित संसार बिटप नमामहे।।5।।

  130. RCM 7.13.21Open verse →

    जे ब्रह्म अजमद्वैतमनुभवगम्य मनपर ध्यावहीं।

    अर्थ · Hindi

    जे ब्रह्म अजमद्वैतमनुभवगम्य मनपर ध्यावहीं।

  131. RCM 7.13.22Open verse →

    ते कहहुँ जानहुँ नाथ हम तव सगुन जस नित गावहीं।।

    अर्थ · Hindi

    ते कहहुँ जानहुँ नाथ हम तव सगुन जस नित गावहीं।।

  132. RCM 7.13.23Open verse →

    करुनायतन प्रभु सदगुनाकर देव यह बर मागहीं।

    अर्थ · Hindi

    करुनायतन प्रभु सदगुनाकर देव यह बर मागहीं।

  133. RCM 7.13.24Open verse →

    मन बचन कर्म बिकार तजि तव चरन हम अनुरागहीं।।6।।

    अर्थ · Hindi

    मन बचन कर्म बिकार तजि तव चरन हम अनुरागहीं।।6।।

  134. RCM 7.13.25Open verse →

    सब के देखत बेदन्ह बिनती कीन्हि उदार।

    अर्थ · Hindi

    सब के देखत बेदन्ह बिनती कीन्हि उदार।

  135. RCM 7.13.26Open verse →

    अंतर्धान भए पुनि गए ब्रह्म आगार।।13(क)।।

    अर्थ · Hindi

    अंतर्धान भए पुनि गए ब्रह्म आगार।।13(क)।।

  136. RCM 7.13.27Open verse →

    बैनतेय सुनु संभु तब आए जहँ रघुबीर।

    अर्थ · Hindi

    बैनतेय सुनु संभु तब आए जहँ रघुबीर।

  137. RCM 7.13.28Open verse →

    बिनय करत गदगद गिरा पूरित पुलक सरीर।।13(ख)।।

    अर्थ · Hindi

    बिनय करत गदगद गिरा पूरित पुलक सरीर।।13(ख)।।

  138. RCM 7.14.1Open verse →

    जय राम रमारमनं समनं। भव ताप भयाकुल पाहि जनं।।

    अर्थ · Hindi

    जय राम रमारमनं समनं। भव ताप भयाकुल पाहि जनं।।

  139. RCM 7.14.2Open verse →

    अवधेस सुरेस रमेस बिभो। सरनागत मागत पाहि प्रभो।।1।।

    अर्थ · Hindi

    अवधेस सुरेस रमेस बिभो। सरनागत मागत पाहि प्रभो।।1।।

  140. RCM 7.14.3Open verse →

    दससीस बिनासन बीस भुजा। कृत दूरि महा महि भूरि रुजा।।

    अर्थ · Hindi

    दससीस बिनासन बीस भुजा। कृत दूरि महा महि भूरि रुजा।।

  141. RCM 7.14.4Open verse →

    रजनीचर बृंद पतंग रहे। सर पावक तेज प्रचंड दहे।।2।।

    अर्थ · Hindi

    रजनीचर बृंद पतंग रहे। सर पावक तेज प्रचंड दहे।।2।।

  142. RCM 7.14.5Open verse →

    महि मंडल मंडन चारुतरं। धृत सायक चाप निषंग बरं।।

    अर्थ · Hindi

    महि मंडल मंडन चारुतरं। धृत सायक चाप निषंग बरं।।

  143. RCM 7.14.6Open verse →

    मद मोह महा ममता रजनी। तम पुंज दिवाकर तेज अनी।।3।।

    अर्थ · Hindi

    मद मोह महा ममता रजनी। तम पुंज दिवाकर तेज अनी।।3।।

  144. RCM 7.14.7Open verse →

    मनजात किरात निपात किए। मृग लोग कुभोग सरेन हिए।।

    अर्थ · Hindi

    मनजात किरात निपात किए। मृग लोग कुभोग सरेन हिए।।

  145. RCM 7.14.8Open verse →

    हति नाथ अनाथनि पाहि हरे। बिषया बन पावँर भूलि परे।।4।।

    अर्थ · Hindi

    हति नाथ अनाथनि पाहि हरे। बिषया बन पावँर भूलि परे।।4।।

  146. RCM 7.14.9Open verse →

    बहु रोग बियोगन्हि लोग हए। भवदंघ्रि निरादर के फल ए।।

    अर्थ · Hindi

    बहु रोग बियोगन्हि लोग हए। भवदंघ्रि निरादर के फल ए।।

  147. RCM 7.14.10Open verse →

    भव सिंधु अगाध परे नर ते। पद पंकज प्रेम न जे करते।।5।।

    अर्थ · Hindi

    भव सिंधु अगाध परे नर ते। पद पंकज प्रेम न जे करते।।5।।

  148. RCM 7.14.11Open verse →

    अति दीन मलीन दुखी नितहीं। जिन्ह के पद पंकज प्रीति नहीं।।

    अर्थ · Hindi

    अति दीन मलीन दुखी नितहीं। जिन्ह के पद पंकज प्रीति नहीं।।

  149. RCM 7.14.12Open verse →

    अवलंब भवंत कथा जिन्ह के।। प्रिय संत अनंत सदा तिन्ह कें।।6।।

    अर्थ · Hindi

    अवलंब भवंत कथा जिन्ह के।। प्रिय संत अनंत सदा तिन्ह कें।।6।।

  150. RCM 7.14.13Open verse →

    नहिं राग न लोभ न मान मदा।।तिन्ह कें सम बैभव वा बिपदा।।

    अर्थ · Hindi

    नहिं राग न लोभ न मान मदा।।तिन्ह कें सम बैभव वा बिपदा।।

  151. RCM 7.14.14Open verse →

    एहि ते तव सेवक होत मुदा। मुनि त्यागत जोग भरोस सदा।।7।।

    अर्थ · Hindi

    एहि ते तव सेवक होत मुदा। मुनि त्यागत जोग भरोस सदा।।7।।

  152. RCM 7.14.15Open verse →

    करि प्रेम निरंतर नेम लिएँ। पद पंकज सेवत सुद्ध हिएँ।।

    अर्थ · Hindi

    करि प्रेम निरंतर नेम लिएँ। पद पंकज सेवत सुद्ध हिएँ।।

  153. RCM 7.14.16Open verse →

    सम मानि निरादर आदरही। सब संत सुखी बिचरंति मही।।8।।

    अर्थ · Hindi

    सम मानि निरादर आदरही। सब संत सुखी बिचरंति मही।।8।।

  154. RCM 7.14.17Open verse →

    मुनि मानस पंकज भृंग भजे। रघुबीर महा रनधीर अजे।।

    अर्थ · Hindi

    मुनि मानस पंकज भृंग भजे। रघुबीर महा रनधीर अजे।।

  155. RCM 7.14.18Open verse →

    तव नाम जपामि नमामि हरी। भव रोग महागद मान अरी।।9।।

    अर्थ · Hindi

    तव नाम जपामि नमामि हरी। भव रोग महागद मान अरी।।9।।

  156. RCM 7.14.19Open verse →

    गुन सील कृपा परमायतनं। प्रनमामि निरंतर श्रीरमनं।।

    अर्थ · Hindi

    गुन सील कृपा परमायतनं। प्रनमामि निरंतर श्रीरमनं।।

  157. RCM 7.14.20Open verse →

    रघुनंद निकंदय द्वंद्वघनं। महिपाल बिलोकय दीन जनं।।10।।

    अर्थ · Hindi

    रघुनंद निकंदय द्वंद्वघनं। महिपाल बिलोकय दीन जनं।।10।।

  158. RCM 7.15.1Open verse →

    सुनु खगपति यह कथा पावनी। त्रिबिध ताप भव भय दावनी।।

    अर्थ · Hindi

    सुनु खगपति यह कथा पावनी। त्रिबिध ताप भव भय दावनी।।

  159. RCM 7.15.2Open verse →

    महाराज कर सुभ अभिषेका। सुनत लहहिं नर बिरति बिबेका।।

    अर्थ · Hindi

    महाराज कर सुभ अभिषेका। सुनत लहहिं नर बिरति बिबेका।।

  160. RCM 7.15.3Open verse →

    जे सकाम नर सुनहिं जे गावहिं। सुख संपति नाना बिधि पावहिं।।

    अर्थ · Hindi

    जे सकाम नर सुनहिं जे गावहिं। सुख संपति नाना बिधि पावहिं।।

  161. RCM 7.15.4Open verse →

    सुर दुर्लभ सुख करि जग माहीं। अंतकाल रघुपति पुर जाहीं।।

    अर्थ · Hindi

    सुर दुर्लभ सुख करि जग माहीं। अंतकाल रघुपति पुर जाहीं।।

  162. RCM 7.15.5Open verse →

    सुनहिं बिमुक्त बिरत अरु बिषई। लहहिं भगति गति संपति नई।।

    अर्थ · Hindi

    सुनहिं बिमुक्त बिरत अरु बिषई। लहहिं भगति गति संपति नई।।

  163. RCM 7.15.6Open verse →

    खगपति राम कथा मैं बरनी। स्वमति बिलास त्रास दुख हरनी।।

    अर्थ · Hindi

    खगपति राम कथा मैं बरनी। स्वमति बिलास त्रास दुख हरनी।।

  164. RCM 7.15.7Open verse →

    बिरति बिबेक भगति दृढ़ करनी। मोह नदी कहँ सुंदर तरनी।।

    अर्थ · Hindi

    बिरति बिबेक भगति दृढ़ करनी। मोह नदी कहँ सुंदर तरनी।।

  165. RCM 7.15.8Open verse →

    नित नव मंगल कौसलपुरी। हरषित रहहिं लोग सब कुरी।।

    अर्थ · Hindi

    नित नव मंगल कौसलपुरी। हरषित रहहिं लोग सब कुरी।।

  166. RCM 7.15.9Open verse →

    नित नइ प्रीति राम पद पंकज। सबकें जिन्हहि नमत सिव मुनि अज।।

    अर्थ · Hindi

    नित नइ प्रीति राम पद पंकज। सबकें जिन्हहि नमत सिव मुनि अज।।

  167. RCM 7.15.10Open verse →

    मंगन बहु प्रकार पहिराए। द्विजन्ह दान नाना बिधि पाए।।

    अर्थ · Hindi

    मंगन बहु प्रकार पहिराए। द्विजन्ह दान नाना बिधि पाए।।

  168. RCM 7.16.1Open verse →

    बिसरे गृह सपनेहुँ सुधि नाहीं। जिमि परद्रोह संत मन माही।।

    अर्थ · Hindi

    बिसरे गृह सपनेहुँ सुधि नाहीं। जिमि परद्रोह संत मन माही।।

  169. RCM 7.16.2Open verse →

    तब रघुपति सब सखा बोलाए। आइ सबन्हि सादर सिरु नाए।।

    अर्थ · Hindi

    तब रघुपति सब सखा बोलाए। आइ सबन्हि सादर सिरु नाए।।

  170. RCM 7.16.3Open verse →

    परम प्रीति समीप बैठारे। भगत सुखद मृदु बचन उचारे।।

    अर्थ · Hindi

    परम प्रीति समीप बैठारे। भगत सुखद मृदु बचन उचारे।।

  171. RCM 7.16.4Open verse →

    तुम्ह अति कीन्ह मोरि सेवकाई। मुख पर केहि बिधि करौं बड़ाई।।

    अर्थ · Hindi

    तुम्ह अति कीन्ह मोरि सेवकाई। मुख पर केहि बिधि करौं बड़ाई।।

  172. RCM 7.16.5Open verse →

    ताते मोहि तुम्ह अति प्रिय लागे। मम हित लागि भवन सुख त्यागे।।

    अर्थ · Hindi

    ताते मोहि तुम्ह अति प्रिय लागे। मम हित लागि भवन सुख त्यागे।।

  173. RCM 7.16.6Open verse →

    अनुज राज संपति बैदेही। देह गेह परिवार सनेही।।

    अर्थ · Hindi

    अनुज राज संपति बैदेही। देह गेह परिवार सनेही।।

  174. RCM 7.16.7Open verse →

    सब मम प्रिय नहिं तुम्हहि समाना। मृषा न कहउँ मोर यह बाना।।

    अर्थ · Hindi

    सब मम प्रिय नहिं तुम्हहि समाना। मृषा न कहउँ मोर यह बाना।।

  175. RCM 7.16.8Open verse →

    सब के प्रिय सेवक यह नीती। मोरें अधिक दास पर प्रीती।।

    अर्थ · Hindi

    सब के प्रिय सेवक यह नीती। मोरें अधिक दास पर प्रीती।।

  176. RCM 7.17.1Open verse →

    सुनि प्रभु बचन मगन सब भए। को हम कहाँ बिसरि तन गए।।

    अर्थ · Hindi

    सुनि प्रभु बचन मगन सब भए। को हम कहाँ बिसरि तन गए।।

  177. RCM 7.17.2Open verse →

    एकटक रहे जोरि कर आगे। सकहिं न कछु कहि अति अनुरागे।।

    अर्थ · Hindi

    एकटक रहे जोरि कर आगे। सकहिं न कछु कहि अति अनुरागे।।

  178. RCM 7.17.3Open verse →

    परम प्रेम तिन्ह कर प्रभु देखा। कहा बिबिध बिधि ग्यान बिसेषा।।

    अर्थ · Hindi

    परम प्रेम तिन्ह कर प्रभु देखा। कहा बिबिध बिधि ग्यान बिसेषा।।

  179. RCM 7.17.4Open verse →

    प्रभु सन्मुख कछु कहन न पारहिं। पुनि पुनि चरन सरोज निहारहिं।।

    अर्थ · Hindi

    प्रभु सन्मुख कछु कहन न पारहिं। पुनि पुनि चरन सरोज निहारहिं।।

  180. RCM 7.17.5Open verse →

    तब प्रभु भूषन बसन मगाए। नाना रंग अनूप सुहाए।।

    अर्थ · Hindi

    तब प्रभु भूषन बसन मगाए। नाना रंग अनूप सुहाए।।

  181. RCM 7.17.6Open verse →

    सुग्रीवहि प्रथमहिं पहिराए। बसन भरत निज हाथ बनाए।।

    अर्थ · Hindi

    सुग्रीवहि प्रथमहिं पहिराए। बसन भरत निज हाथ बनाए।।

  182. RCM 7.17.7Open verse →

    प्रभु प्रेरित लछिमन पहिराए। लंकापति रघुपति मन भाए।।

    अर्थ · Hindi

    प्रभु प्रेरित लछिमन पहिराए। लंकापति रघुपति मन भाए।।

  183. RCM 7.17.8Open verse →

    अंगद बैठ रहा नहिं डोला। प्रीति देखि प्रभु ताहि न बोला।।

    अर्थ · Hindi

    अंगद बैठ रहा नहिं डोला। प्रीति देखि प्रभु ताहि न बोला।।

  184. RCM 7.18.1Open verse →

    सुनु सर्बग्य कृपा सुख सिंधो। दीन दयाकर आरत बंधो।।

    अर्थ · Hindi

    सुनु सर्बग्य कृपा सुख सिंधो। दीन दयाकर आरत बंधो।।

  185. RCM 7.18.2Open verse →

    मरती बेर नाथ मोहि बाली। गयउ तुम्हारेहि कोंछें घाली।।

    अर्थ · Hindi

    मरती बेर नाथ मोहि बाली। गयउ तुम्हारेहि कोंछें घाली।।

  186. RCM 7.18.3Open verse →

    असरन सरन बिरदु संभारी। मोहि जनि तजहु भगत हितकारी।।

    अर्थ · Hindi

    असरन सरन बिरदु संभारी। मोहि जनि तजहु भगत हितकारी।।

  187. RCM 7.18.4Open verse →

    मोरें तुम्ह प्रभु गुर पितु माता। जाउँ कहाँ तजि पद जलजाता।।

    अर्थ · Hindi

    मोरें तुम्ह प्रभु गुर पितु माता। जाउँ कहाँ तजि पद जलजाता।।

  188. RCM 7.18.5Open verse →

    तुम्हहि बिचारि कहहु नरनाहा। प्रभु तजि भवन काज मम काहा।।

    अर्थ · Hindi

    तुम्हहि बिचारि कहहु नरनाहा। प्रभु तजि भवन काज मम काहा।।

  189. RCM 7.18.6Open verse →

    बालक ग्यान बुद्धि बल हीना। राखहु सरन नाथ जन दीना।।

    अर्थ · Hindi

    बालक ग्यान बुद्धि बल हीना। राखहु सरन नाथ जन दीना।।

  190. RCM 7.18.7Open verse →

    नीचि टहल गृह कै सब करिहउँ। पद पंकज बिलोकि भव तरिहउँ।।

    अर्थ · Hindi

    नीचि टहल गृह कै सब करिहउँ। पद पंकज बिलोकि भव तरिहउँ।।

  191. RCM 7.18.8Open verse →

    अस कहि चरन परेउ प्रभु पाही। अब जनि नाथ कहहु गृह जाही।।

    अर्थ · Hindi

    अस कहि चरन परेउ प्रभु पाही। अब जनि नाथ कहहु गृह जाही।।

  192. RCM 7.19.1Open verse →

    भरत अनुज सौमित्र समेता। पठवन चले भगत कृत चेता।।

    अर्थ · Hindi

    भरत अनुज सौमित्र समेता। पठवन चले भगत कृत चेता।।

  193. RCM 7.19.2Open verse →

    अंगद हृदयँ प्रेम नहिं थोरा। फिरि फिरि चितव राम कीं ओरा।।

    अर्थ · Hindi

    अंगद हृदयँ प्रेम नहिं थोरा। फिरि फिरि चितव राम कीं ओरा।।

  194. RCM 7.19.3Open verse →

    बार बार कर दंड प्रनामा। मन अस रहन कहहिं मोहि रामा।।

    अर्थ · Hindi

    बार बार कर दंड प्रनामा। मन अस रहन कहहिं मोहि रामा।।

  195. RCM 7.19.4Open verse →

    राम बिलोकनि बोलनि चलनी। सुमिरि सुमिरि सोचत हँसि मिलनी।।

    अर्थ · Hindi

    राम बिलोकनि बोलनि चलनी। सुमिरि सुमिरि सोचत हँसि मिलनी।।

  196. RCM 7.19.5Open verse →

    प्रभु रुख देखि बिनय बहु भाषी। चलेउ हृदयँ पद पंकज राखी।।

    अर्थ · Hindi

    प्रभु रुख देखि बिनय बहु भाषी। चलेउ हृदयँ पद पंकज राखी।।

  197. RCM 7.19.6Open verse →

    अति आदर सब कपि पहुँचाए। भाइन्ह सहित भरत पुनि आए।।

    अर्थ · Hindi

    अति आदर सब कपि पहुँचाए। भाइन्ह सहित भरत पुनि आए।।

  198. RCM 7.19.7Open verse →

    तब सुग्रीव चरन गहि नाना। भाँति बिनय कीन्हे हनुमाना।।

    अर्थ · Hindi

    तब सुग्रीव चरन गहि नाना। भाँति बिनय कीन्हे हनुमाना।।

  199. RCM 7.19.8Open verse →

    दिन दस करि रघुपति पद सेवा। पुनि तव चरन देखिहउँ देवा।।

    अर्थ · Hindi

    दिन दस करि रघुपति पद सेवा। पुनि तव चरन देखिहउँ देवा।।

  200. RCM 7.19.9Open verse →

    पुन्य पुंज तुम्ह पवनकुमारा। सेवहु जाइ कृपा आगारा।।

    अर्थ · Hindi

    पुन्य पुंज तुम्ह पवनकुमारा। सेवहु जाइ कृपा आगारा।।

  201. RCM 7.19.10Open verse →

    अस कहि कपि सब चले तुरंता। अंगद कहइ सुनहु हनुमंता।।

    अर्थ · Hindi

    अस कहि कपि सब चले तुरंता। अंगद कहइ सुनहु हनुमंता।।

  202. RCM 7.20.1Open verse →

    पुनि कृपाल लियो बोलि निषादा। दीन्हे भूषन बसन प्रसादा।।

    अर्थ · Hindi

    पुनि कृपाल लियो बोलि निषादा। दीन्हे भूषन बसन प्रसादा।।

  203. RCM 7.20.2Open verse →

    जाहु भवन मम सुमिरन करेहू। मन क्रम बचन धर्म अनुसरेहू।।

    अर्थ · Hindi

    जाहु भवन मम सुमिरन करेहू। मन क्रम बचन धर्म अनुसरेहू।।

  204. RCM 7.20.3Open verse →

    तुम्ह मम सखा भरत सम भ्राता। सदा रहेहु पुर आवत जाता।।

    अर्थ · Hindi

    तुम्ह मम सखा भरत सम भ्राता। सदा रहेहु पुर आवत जाता।।

  205. RCM 7.20.4Open verse →

    बचन सुनत उपजा सुख भारी। परेउ चरन भरि लोचन बारी।।

    अर्थ · Hindi

    बचन सुनत उपजा सुख भारी। परेउ चरन भरि लोचन बारी।।

  206. RCM 7.20.5Open verse →

    चरन नलिन उर धरि गृह आवा। प्रभु सुभाउ परिजनन्हि सुनावा।।

    अर्थ · Hindi

    चरन नलिन उर धरि गृह आवा। प्रभु सुभाउ परिजनन्हि सुनावा।।

  207. RCM 7.20.6Open verse →

    रघुपति चरित देखि पुरबासी। पुनि पुनि कहहिं धन्य सुखरासी।।

    अर्थ · Hindi

    रघुपति चरित देखि पुरबासी। पुनि पुनि कहहिं धन्य सुखरासी।।

  208. RCM 7.20.7Open verse →

    राम राज बैंठें त्रेलोका। हरषित भए गए सब सोका।।

    अर्थ · Hindi

    राम राज बैंठें त्रेलोका। हरषित भए गए सब सोका।।

  209. RCM 7.20.8Open verse →

    बयरु न कर काहू सन कोई। राम प्रताप बिषमता खोई।।

    अर्थ · Hindi

    बयरु न कर काहू सन कोई। राम प्रताप बिषमता खोई।।

  210. RCM 7.21.1Open verse →

    दैहिक दैविक भौतिक तापा। राम राज नहिं काहुहि ब्यापा।।

    अर्थ · Hindi

    दैहिक दैविक भौतिक तापा। राम राज नहिं काहुहि ब्यापा।।

  211. RCM 7.21.2Open verse →

    सब नर करहिं परस्पर प्रीती। चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती।।

    अर्थ · Hindi

    सब नर करहिं परस्पर प्रीती। चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती।।

  212. RCM 7.21.3Open verse →

    चारिउ चरन धर्म जग माहीं। पूरि रहा सपनेहुँ अघ नाहीं।।

    अर्थ · Hindi

    चारिउ चरन धर्म जग माहीं। पूरि रहा सपनेहुँ अघ नाहीं।।

  213. RCM 7.21.4Open verse →

    राम भगति रत नर अरु नारी। सकल परम गति के अधिकारी।।

    अर्थ · Hindi

    राम भगति रत नर अरु नारी। सकल परम गति के अधिकारी।।

  214. RCM 7.21.5Open verse →

    अल्पमृत्यु नहिं कवनिउ पीरा। सब सुंदर सब बिरुज सरीरा।।

    अर्थ · Hindi

    अल्पमृत्यु नहिं कवनिउ पीरा। सब सुंदर सब बिरुज सरीरा।।

  215. RCM 7.21.6Open verse →

    नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना। नहिं कोउ अबुध न लच्छन हीना।।

    अर्थ · Hindi

    नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना। नहिं कोउ अबुध न लच्छन हीना।।

  216. RCM 7.21.7Open verse →

    सब निर्दंभ धर्मरत पुनी। नर अरु नारि चतुर सब गुनी।।

    अर्थ · Hindi

    सब निर्दंभ धर्मरत पुनी। नर अरु नारि चतुर सब गुनी।।

  217. RCM 7.21.8Open verse →

    सब गुनग्य पंडित सब ग्यानी। सब कृतग्य नहिं कपट सयानी।।

    अर्थ · Hindi

    सब गुनग्य पंडित सब ग्यानी। सब कृतग्य नहिं कपट सयानी।।

  218. RCM 7.22.1Open verse →

    भूमि सप्त सागर मेखला। एक भूप रघुपति कोसला।।

    अर्थ · Hindi

    भूमि सप्त सागर मेखला। एक भूप रघुपति कोसला।।

  219. RCM 7.22.2Open verse →

    भुअन अनेक रोम प्रति जासू। यह प्रभुता कछु बहुत न तासू।।

    अर्थ · Hindi

    भुअन अनेक रोम प्रति जासू। यह प्रभुता कछु बहुत न तासू।।

  220. RCM 7.22.3Open verse →

    सो महिमा समुझत प्रभु केरी। यह बरनत हीनता घनेरी।।

    अर्थ · Hindi

    सो महिमा समुझत प्रभु केरी। यह बरनत हीनता घनेरी।।

  221. RCM 7.22.4Open verse →

    सोउ महिमा खगेस जिन्ह जानी। फिरी एहिं चरित तिन्हहुँ रति मानी।।

    अर्थ · Hindi

    सोउ महिमा खगेस जिन्ह जानी। फिरी एहिं चरित तिन्हहुँ रति मानी।।

  222. RCM 7.22.5Open verse →

    सोउ जाने कर फल यह लीला। कहहिं महा मुनिबर दमसीला।।

    अर्थ · Hindi

    सोउ जाने कर फल यह लीला। कहहिं महा मुनिबर दमसीला।।

  223. RCM 7.22.6Open verse →

    राम राज कर सुख संपदा। बरनि न सकइ फनीस सारदा।।

    अर्थ · Hindi

    राम राज कर सुख संपदा। बरनि न सकइ फनीस सारदा।।

  224. RCM 7.22.7Open verse →

    सब उदार सब पर उपकारी। बिप्र चरन सेवक नर नारी।।

    अर्थ · Hindi

    सब उदार सब पर उपकारी। बिप्र चरन सेवक नर नारी।।

  225. RCM 7.22.8Open verse →

    एकनारि ब्रत रत सब झारी। ते मन बच क्रम पति हितकारी।।

    अर्थ · Hindi

    एकनारि ब्रत रत सब झारी। ते मन बच क्रम पति हितकारी।।

  226. RCM 7.23.1Open verse →

    फूलहिं फरहिं सदा तरु कानन। रहहि एक सँग गज पंचानन।।

    अर्थ · Hindi

    फूलहिं फरहिं सदा तरु कानन। रहहि एक सँग गज पंचानन।।

  227. RCM 7.23.2Open verse →

    खग मृग सहज बयरु बिसराई। सबन्हि परस्पर प्रीति बढ़ाई।।

    अर्थ · Hindi

    खग मृग सहज बयरु बिसराई। सबन्हि परस्पर प्रीति बढ़ाई।।

  228. RCM 7.23.3Open verse →

    कूजहिं खग मृग नाना बृंदा। अभय चरहिं बन करहिं अनंदा।।

    अर्थ · Hindi

    कूजहिं खग मृग नाना बृंदा। अभय चरहिं बन करहिं अनंदा।।

  229. RCM 7.23.4Open verse →

    सीतल सुरभि पवन बह मंदा। गूंजत अलि लै चलि मकरंदा।।

    अर्थ · Hindi

    सीतल सुरभि पवन बह मंदा। गूंजत अलि लै चलि मकरंदा।।

  230. RCM 7.23.5Open verse →

    लता बिटप मागें मधु चवहीं। मनभावतो धेनु पय स्त्रवहीं।।

    अर्थ · Hindi

    लता बिटप मागें मधु चवहीं। मनभावतो धेनु पय स्त्रवहीं।।

  231. RCM 7.23.6Open verse →

    ससि संपन्न सदा रह धरनी। त्रेताँ भइ कृतजुग कै करनी।।

    अर्थ · Hindi

    ससि संपन्न सदा रह धरनी। त्रेताँ भइ कृतजुग कै करनी।।

  232. RCM 7.23.7Open verse →

    प्रगटीं गिरिन्ह बिबिध मनि खानी। जगदातमा भूप जग जानी।।

    अर्थ · Hindi

    प्रगटीं गिरिन्ह बिबिध मनि खानी। जगदातमा भूप जग जानी।।

  233. RCM 7.23.8Open verse →

    सरिता सकल बहहिं बर बारी। सीतल अमल स्वाद सुखकारी।।

    अर्थ · Hindi

    सरिता सकल बहहिं बर बारी। सीतल अमल स्वाद सुखकारी।।

  234. RCM 7.23.9Open verse →

    सागर निज मरजादाँ रहहीं। डारहिं रत्न तटन्हि नर लहहीं।।

    अर्थ · Hindi

    सागर निज मरजादाँ रहहीं। डारहिं रत्न तटन्हि नर लहहीं।।

  235. RCM 7.23.10Open verse →

    सरसिज संकुल सकल तड़ागा। अति प्रसन्न दस दिसा बिभागा।।

    अर्थ · Hindi

    सरसिज संकुल सकल तड़ागा। अति प्रसन्न दस दिसा बिभागा।।

  236. RCM 7.24.1Open verse →

    कोटिन्ह बाजिमेध प्रभु कीन्हे। दान अनेक द्विजन्ह कहँ दीन्हे।।

    अर्थ · Hindi

    कोटिन्ह बाजिमेध प्रभु कीन्हे। दान अनेक द्विजन्ह कहँ दीन्हे।।

  237. RCM 7.24.2Open verse →

    श्रुति पथ पालक धर्म धुरंधर। गुनातीत अरु भोग पुरंदर।।

    अर्थ · Hindi

    श्रुति पथ पालक धर्म धुरंधर। गुनातीत अरु भोग पुरंदर।।

  238. RCM 7.24.3Open verse →

    पति अनुकूल सदा रह सीता। सोभा खानि सुसील बिनीता।।

    अर्थ · Hindi

    पति अनुकूल सदा रह सीता। सोभा खानि सुसील बिनीता।।

  239. RCM 7.24.4Open verse →

    जानति कृपासिंधु प्रभुताई। सेवति चरन कमल मन लाई।।

    अर्थ · Hindi

    जानति कृपासिंधु प्रभुताई। सेवति चरन कमल मन लाई।।

  240. RCM 7.24.5Open verse →

    जद्यपि गृहँ सेवक सेवकिनी। बिपुल सदा सेवा बिधि गुनी।।

    अर्थ · Hindi

    जद्यपि गृहँ सेवक सेवकिनी। बिपुल सदा सेवा बिधि गुनी।।

  241. RCM 7.24.6Open verse →

    निज कर गृह परिचरजा करई। रामचंद्र आयसु अनुसरई।।

    अर्थ · Hindi

    निज कर गृह परिचरजा करई। रामचंद्र आयसु अनुसरई।।

  242. RCM 7.24.7Open verse →

    जेहि बिधि कृपासिंधु सुख मानइ। सोइ कर श्री सेवा बिधि जानइ।।

    अर्थ · Hindi

    जेहि बिधि कृपासिंधु सुख मानइ। सोइ कर श्री सेवा बिधि जानइ।।

  243. RCM 7.24.8Open verse →

    कौसल्यादि सासु गृह माहीं। सेवइ सबन्हि मान मद नाहीं।।

    अर्थ · Hindi

    कौसल्यादि सासु गृह माहीं। सेवइ सबन्हि मान मद नाहीं।।

  244. RCM 7.24.9Open verse →

    उमा रमा ब्रह्मादि बंदिता। जगदंबा संततमनिंदिता।।

    अर्थ · Hindi

    उमा रमा ब्रह्मादि बंदिता। जगदंबा संततमनिंदिता।।

  245. RCM 7.25.1Open verse →

    सेवहिं सानकूल सब भाई। राम चरन रति अति अधिकाई।।

    अर्थ · Hindi

    सेवहिं सानकूल सब भाई। राम चरन रति अति अधिकाई।।

  246. RCM 7.25.2Open verse →

    प्रभु मुख कमल बिलोकत रहहीं। कबहुँ कृपाल हमहि कछु कहहीं।।

    अर्थ · Hindi

    प्रभु मुख कमल बिलोकत रहहीं। कबहुँ कृपाल हमहि कछु कहहीं।।

  247. RCM 7.25.3Open verse →

    राम करहिं भ्रातन्ह पर प्रीती। नाना भाँति सिखावहिं नीती।।

    अर्थ · Hindi

    राम करहिं भ्रातन्ह पर प्रीती। नाना भाँति सिखावहिं नीती।।

  248. RCM 7.25.4Open verse →

    हरषित रहहिं नगर के लोगा। करहिं सकल सुर दुर्लभ भोगा।।

    अर्थ · Hindi

    हरषित रहहिं नगर के लोगा। करहिं सकल सुर दुर्लभ भोगा।।

  249. RCM 7.25.5Open verse →

    अहनिसि बिधिहि मनावत रहहीं। श्रीरघुबीर चरन रति चहहीं।।

    अर्थ · Hindi

    अहनिसि बिधिहि मनावत रहहीं। श्रीरघुबीर चरन रति चहहीं।।

  250. RCM 7.25.6Open verse →

    दुइ सुत सुन्दर सीताँ जाए। लव कुस बेद पुरानन्ह गाए।।

    अर्थ · Hindi

    दुइ सुत सुन्दर सीताँ जाए। लव कुस बेद पुरानन्ह गाए।।

  251. RCM 7.25.7Open verse →

    दोउ बिजई बिनई गुन मंदिर। हरि प्रतिबिंब मनहुँ अति सुंदर।।

    अर्थ · Hindi

    दोउ बिजई बिनई गुन मंदिर। हरि प्रतिबिंब मनहुँ अति सुंदर।।

  252. RCM 7.25.8Open verse →

    दुइ दुइ सुत सब भ्रातन्ह केरे। भए रूप गुन सील घनेरे।।

    अर्थ · Hindi

    दुइ दुइ सुत सब भ्रातन्ह केरे। भए रूप गुन सील घनेरे।।

  253. RCM 7.26.1Open verse →

    प्रातकाल सरऊ करि मज्जन। बैठहिं सभाँ संग द्विज सज्जन।।

    अर्थ · Hindi

    प्रातकाल सरऊ करि मज्जन। बैठहिं सभाँ संग द्विज सज्जन।।

  254. RCM 7.26.2Open verse →

    बेद पुरान बसिष्ट बखानहिं। सुनहिं राम जद्यपि सब जानहिं।।

    अर्थ · Hindi

    बेद पुरान बसिष्ट बखानहिं। सुनहिं राम जद्यपि सब जानहिं।।

  255. RCM 7.26.3Open verse →

    अनुजन्ह संजुत भोजन करहीं। देखि सकल जननीं सुख भरहीं।।

    अर्थ · Hindi

    अनुजन्ह संजुत भोजन करहीं। देखि सकल जननीं सुख भरहीं।।

  256. RCM 7.26.4Open verse →

    भरत सत्रुहन दोनउ भाई। सहित पवनसुत उपबन जाई।।

    अर्थ · Hindi

    भरत सत्रुहन दोनउ भाई। सहित पवनसुत उपबन जाई।।

  257. RCM 7.26.5Open verse →

    बूझहिं बैठि राम गुन गाहा। कह हनुमान सुमति अवगाहा।।

    अर्थ · Hindi

    बूझहिं बैठि राम गुन गाहा। कह हनुमान सुमति अवगाहा।।

  258. RCM 7.26.6Open verse →

    सुनत बिमल गुन अति सुख पावहिं। बहुरि बहुरि करि बिनय कहावहिं।।

    अर्थ · Hindi

    सुनत बिमल गुन अति सुख पावहिं। बहुरि बहुरि करि बिनय कहावहिं।।

  259. RCM 7.26.7Open verse →

    सब कें गृह गृह होहिं पुराना। रामचरित पावन बिधि नाना।।

    अर्थ · Hindi

    सब कें गृह गृह होहिं पुराना। रामचरित पावन बिधि नाना।।

  260. RCM 7.26.8Open verse →

    नर अरु नारि राम गुन गानहिं। करहिं दिवस निसि जात न जानहिं।।

    अर्थ · Hindi

    नर अरु नारि राम गुन गानहिं। करहिं दिवस निसि जात न जानहिं।।

  261. RCM 7.27.1Open verse →

    नारदादि सनकादि मुनीसा। दरसन लागि कोसलाधीसा।।

    अर्थ · Hindi

    नारदादि सनकादि मुनीसा। दरसन लागि कोसलाधीसा।।

  262. RCM 7.27.2Open verse →

    दिन प्रति सकल अजोध्या आवहिं। देखि नगरु बिरागु बिसरावहिं।।

    अर्थ · Hindi

    दिन प्रति सकल अजोध्या आवहिं। देखि नगरु बिरागु बिसरावहिं।।

  263. RCM 7.27.3Open verse →

    जातरूप मनि रचित अटारीं। नाना रंग रुचिर गच ढारीं।।

    अर्थ · Hindi

    जातरूप मनि रचित अटारीं। नाना रंग रुचिर गच ढारीं।।

  264. RCM 7.27.4Open verse →

    पुर चहुँ पास कोट अति सुंदर। रचे कँगूरा रंग रंग बर।।

    अर्थ · Hindi

    पुर चहुँ पास कोट अति सुंदर। रचे कँगूरा रंग रंग बर।।

  265. RCM 7.27.5Open verse →

    नव ग्रह निकर अनीक बनाई। जनु घेरी अमरावति आई।।

    अर्थ · Hindi

    नव ग्रह निकर अनीक बनाई। जनु घेरी अमरावति आई।।

  266. RCM 7.27.6Open verse →

    महि बहु रंग रचित गच काँचा। जो बिलोकि मुनिबर मन नाचा।।

    अर्थ · Hindi

    महि बहु रंग रचित गच काँचा। जो बिलोकि मुनिबर मन नाचा।।

  267. RCM 7.27.7Open verse →

    धवल धाम ऊपर नभ चुंबत। कलस मनहुँ रबि ससि दुति निंदत।।

    अर्थ · Hindi

    धवल धाम ऊपर नभ चुंबत। कलस मनहुँ रबि ससि दुति निंदत।।

  268. RCM 7.27.8Open verse →

    बहु मनि रचित झरोखा भ्राजहिं। गृह गृह प्रति मनि दीप बिराजहिं।।

    अर्थ · Hindi

    बहु मनि रचित झरोखा भ्राजहिं। गृह गृह प्रति मनि दीप बिराजहिं।।

  269. RCM 7.28.1Open verse →

    सुमन बाटिका सबहिं लगाई। बिबिध भाँति करि जतन बनाई।।

    अर्थ · Hindi

    सुमन बाटिका सबहिं लगाई। बिबिध भाँति करि जतन बनाई।।

  270. RCM 7.28.2Open verse →

    लता ललित बहु जाति सुहाई। फूलहिं सदा बंसत कि नाई।।

    अर्थ · Hindi

    लता ललित बहु जाति सुहाई। फूलहिं सदा बंसत कि नाई।।

  271. RCM 7.28.3Open verse →

    गुंजत मधुकर मुखर मनोहर। मारुत त्रिबिध सदा बह सुंदर।।

    अर्थ · Hindi

    गुंजत मधुकर मुखर मनोहर। मारुत त्रिबिध सदा बह सुंदर।।

  272. RCM 7.28.4Open verse →

    नाना खग बालकन्हि जिआए। बोलत मधुर उड़ात सुहाए।।

    अर्थ · Hindi

    नाना खग बालकन्हि जिआए। बोलत मधुर उड़ात सुहाए।।

  273. RCM 7.28.5Open verse →

    मोर हंस सारस पारावत। भवननि पर सोभा अति पावत।।

    अर्थ · Hindi

    मोर हंस सारस पारावत। भवननि पर सोभा अति पावत।।

  274. RCM 7.28.6Open verse →

    जहँ तहँ देखहिं निज परिछाहीं। बहु बिधि कूजहिं नृत्य कराहीं।।

    अर्थ · Hindi

    जहँ तहँ देखहिं निज परिछाहीं। बहु बिधि कूजहिं नृत्य कराहीं।।

  275. RCM 7.28.7Open verse →

    सुक सारिका पढ़ावहिं बालक। कहहु राम रघुपति जनपालक।।

    अर्थ · Hindi

    सुक सारिका पढ़ावहिं बालक। कहहु राम रघुपति जनपालक।।

  276. RCM 7.28.8Open verse →

    राज दुआर सकल बिधि चारू। बीथीं चौहट रूचिर बजारू।।

    अर्थ · Hindi

    राज दुआर सकल बिधि चारू। बीथीं चौहट रूचिर बजारू।।

  277. RCM 7.29.1Open verse →

    दूरि फराक रुचिर सो घाटा। जहँ जल पिअहिं बाजि गज ठाटा।।

    अर्थ · Hindi

    दूरि फराक रुचिर सो घाटा। जहँ जल पिअहिं बाजि गज ठाटा।।

  278. RCM 7.29.2Open verse →

    पनिघट परम मनोहर नाना। तहाँ न पुरुष करहिं अस्नाना।।

    अर्थ · Hindi

    पनिघट परम मनोहर नाना। तहाँ न पुरुष करहिं अस्नाना।।

  279. RCM 7.29.3Open verse →

    राजघाट सब बिधि सुंदर बर। मज्जहिं तहाँ बरन चारिउ नर।।

    अर्थ · Hindi

    राजघाट सब बिधि सुंदर बर। मज्जहिं तहाँ बरन चारिउ नर।।

  280. RCM 7.29.4Open verse →

    तीर तीर देवन्ह के मंदिर। चहुँ दिसि तिन्ह के उपबन सुंदर।।

    अर्थ · Hindi

    तीर तीर देवन्ह के मंदिर। चहुँ दिसि तिन्ह के उपबन सुंदर।।

  281. RCM 7.29.5Open verse →

    कहुँ कहुँ सरिता तीर उदासी। बसहिं ग्यान रत मुनि संन्यासी।।

    अर्थ · Hindi

    कहुँ कहुँ सरिता तीर उदासी। बसहिं ग्यान रत मुनि संन्यासी।।

  282. RCM 7.29.6Open verse →

    तीर तीर तुलसिका सुहाई। बृंद बृंद बहु मुनिन्ह लगाई।।

    अर्थ · Hindi

    तीर तीर तुलसिका सुहाई। बृंद बृंद बहु मुनिन्ह लगाई।।

  283. RCM 7.29.7Open verse →

    पुर सोभा कछु बरनि न जाई। बाहेर नगर परम रुचिराई।।

    अर्थ · Hindi

    पुर सोभा कछु बरनि न जाई। बाहेर नगर परम रुचिराई।।

  284. RCM 7.29.8Open verse →

    देखत पुरी अखिल अघ भागा। बन उपबन बापिका तड़ागा।।

    अर्थ · Hindi

    देखत पुरी अखिल अघ भागा। बन उपबन बापिका तड़ागा।।

  285. RCM 7.30.1Open verse →

    जहँ तहँ नर रघुपति गुन गावहिं। बैठि परसपर इहइ सिखावहिं।।

    अर्थ · Hindi

    जहँ तहँ नर रघुपति गुन गावहिं। बैठि परसपर इहइ सिखावहिं।।

  286. RCM 7.30.2Open verse →

    भजहु प्रनत प्रतिपालक रामहि। सोभा सील रूप गुन धामहि।।

    अर्थ · Hindi

    भजहु प्रनत प्रतिपालक रामहि। सोभा सील रूप गुन धामहि।।

  287. RCM 7.30.3Open verse →

    जलज बिलोचन स्यामल गातहि। पलक नयन इव सेवक त्रातहि।।

    अर्थ · Hindi

    जलज बिलोचन स्यामल गातहि। पलक नयन इव सेवक त्रातहि।।

  288. RCM 7.30.4Open verse →

    धृत सर रुचिर चाप तूनीरहि। संत कंज बन रबि रनधीरहि।।

    अर्थ · Hindi

    धृत सर रुचिर चाप तूनीरहि। संत कंज बन रबि रनधीरहि।।

  289. RCM 7.30.5Open verse →

    काल कराल ब्याल खगराजहि। नमत राम अकाम ममता जहि।।

    अर्थ · Hindi

    काल कराल ब्याल खगराजहि। नमत राम अकाम ममता जहि।।

  290. RCM 7.30.6Open verse →

    लोभ मोह मृगजूथ किरातहि। मनसिज करि हरि जन सुखदातहि।।

    अर्थ · Hindi

    लोभ मोह मृगजूथ किरातहि। मनसिज करि हरि जन सुखदातहि।।

  291. RCM 7.30.7Open verse →

    संसय सोक निबिड़ तम भानुहि। दनुज गहन घन दहन कृसानुहि।।

    अर्थ · Hindi

    संसय सोक निबिड़ तम भानुहि। दनुज गहन घन दहन कृसानुहि।।

  292. RCM 7.30.8Open verse →

    जनकसुता समेत रघुबीरहि। कस न भजहु भंजन भव भीरहि।।

    अर्थ · Hindi

    जनकसुता समेत रघुबीरहि। कस न भजहु भंजन भव भीरहि।।

  293. RCM 7.30.9Open verse →

    बहु बासना मसक हिम रासिहि। सदा एकरस अज अबिनासिहि।।

    अर्थ · Hindi

    बहु बासना मसक हिम रासिहि। सदा एकरस अज अबिनासिहि।।

  294. RCM 7.30.10Open verse →

    मुनि रंजन भंजन महि भारहि। तुलसिदास के प्रभुहि उदारहि।।

    अर्थ · Hindi

    मुनि रंजन भंजन महि भारहि। तुलसिदास के प्रभुहि उदारहि।।

  295. RCM 7.31.1Open verse →

    जब ते राम प्रताप खगेसा। उदित भयउ अति प्रबल दिनेसा।।

    अर्थ · Hindi

    जब ते राम प्रताप खगेसा। उदित भयउ अति प्रबल दिनेसा।।

  296. RCM 7.31.2Open verse →

    पूरि प्रकास रहेउ तिहुँ लोका। बहुतेन्ह सुख बहुतन मन सोका।।

    अर्थ · Hindi

    पूरि प्रकास रहेउ तिहुँ लोका। बहुतेन्ह सुख बहुतन मन सोका।।

  297. RCM 7.31.3Open verse →

    जिन्हहि सोक ते कहउँ बखानी। प्रथम अबिद्या निसा नसानी।।

    अर्थ · Hindi

    जिन्हहि सोक ते कहउँ बखानी। प्रथम अबिद्या निसा नसानी।।

  298. RCM 7.31.4Open verse →

    अघ उलूक जहँ तहाँ लुकाने। काम क्रोध कैरव सकुचाने।।

    अर्थ · Hindi

    अघ उलूक जहँ तहाँ लुकाने। काम क्रोध कैरव सकुचाने।।

  299. RCM 7.31.5Open verse →

    बिबिध कर्म गुन काल सुभाऊ। ए चकोर सुख लहहिं न काऊ।।

    अर्थ · Hindi

    बिबिध कर्म गुन काल सुभाऊ। ए चकोर सुख लहहिं न काऊ।।

  300. RCM 7.31.6Open verse →

    मत्सर मान मोह मद चोरा। इन्ह कर हुनर न कवनिहुँ ओरा।।

    अर्थ · Hindi

    मत्सर मान मोह मद चोरा। इन्ह कर हुनर न कवनिहुँ ओरा।।

  301. RCM 7.31.7Open verse →

    धरम तड़ाग ग्यान बिग्याना। ए पंकज बिकसे बिधि नाना।।

    अर्थ · Hindi

    धरम तड़ाग ग्यान बिग्याना। ए पंकज बिकसे बिधि नाना।।

  302. RCM 7.31.8Open verse →

    सुख संतोष बिराग बिबेका। बिगत सोक ए कोक अनेका।।

    अर्थ · Hindi

    सुख संतोष बिराग बिबेका। बिगत सोक ए कोक अनेका।।

  303. RCM 7.32.1Open verse →

    भ्रातन्ह सहित रामु एक बारा। संग परम प्रिय पवनकुमारा।।

    अर्थ · Hindi

    भ्रातन्ह सहित रामु एक बारा। संग परम प्रिय पवनकुमारा।।

  304. RCM 7.32.2Open verse →

    सुंदर उपबन देखन गए। सब तरु कुसुमित पल्लव नए।।

    अर्थ · Hindi

    सुंदर उपबन देखन गए। सब तरु कुसुमित पल्लव नए।।

  305. RCM 7.32.3Open verse →

    जानि समय सनकादिक आए। तेज पुंज गुन सील सुहाए।।

    अर्थ · Hindi

    जानि समय सनकादिक आए। तेज पुंज गुन सील सुहाए।।

  306. RCM 7.32.4Open verse →

    ब्रह्मानंद सदा लयलीना। देखत बालक बहुकालीना।।

    अर्थ · Hindi

    ब्रह्मानंद सदा लयलीना। देखत बालक बहुकालीना।।

  307. RCM 7.32.5Open verse →

    रूप धरें जनु चारिउ बेदा। समदरसी मुनि बिगत बिभेदा।।

    अर्थ · Hindi

    रूप धरें जनु चारिउ बेदा। समदरसी मुनि बिगत बिभेदा।।

  308. RCM 7.32.6Open verse →

    आसा बसन ब्यसन यह तिन्हहीं। रघुपति चरित होइ तहँ सुनहीं।।

    अर्थ · Hindi

    आसा बसन ब्यसन यह तिन्हहीं। रघुपति चरित होइ तहँ सुनहीं।।

  309. RCM 7.32.7Open verse →

    तहाँ रहे सनकादि भवानी। जहँ घटसंभव मुनिबर ग्यानी।।

    अर्थ · Hindi

    तहाँ रहे सनकादि भवानी। जहँ घटसंभव मुनिबर ग्यानी।।

  310. RCM 7.32.8Open verse →

    राम कथा मुनिबर बहु बरनी। ग्यान जोनि पावक जिमि अरनी।।

    अर्थ · Hindi

    राम कथा मुनिबर बहु बरनी। ग्यान जोनि पावक जिमि अरनी।।

  311. RCM 7.33.1Open verse →

    कीन्ह दंडवत तीनिउँ भाई। सहित पवनसुत सुख अधिकाई।।

    अर्थ · Hindi

    कीन्ह दंडवत तीनिउँ भाई। सहित पवनसुत सुख अधिकाई।।

  312. RCM 7.33.2Open verse →

    मुनि रघुपति छबि अतुल बिलोकी। भए मगन मन सके न रोकी।।

    अर्थ · Hindi

    मुनि रघुपति छबि अतुल बिलोकी। भए मगन मन सके न रोकी।।

  313. RCM 7.33.3Open verse →

    स्यामल गात सरोरुह लोचन। सुंदरता मंदिर भव मोचन।।

    अर्थ · Hindi

    स्यामल गात सरोरुह लोचन। सुंदरता मंदिर भव मोचन।।

  314. RCM 7.33.4Open verse →

    एकटक रहे निमेष न लावहिं। प्रभु कर जोरें सीस नवावहिं।।

    अर्थ · Hindi

    एकटक रहे निमेष न लावहिं। प्रभु कर जोरें सीस नवावहिं।।

  315. RCM 7.33.5Open verse →

    तिन्ह कै दसा देखि रघुबीरा। स्त्रवत नयन जल पुलक सरीरा।।

    अर्थ · Hindi

    तिन्ह कै दसा देखि रघुबीरा। स्त्रवत नयन जल पुलक सरीरा।।

  316. RCM 7.33.6Open verse →

    कर गहि प्रभु मुनिबर बैठारे। परम मनोहर बचन उचारे।।

    अर्थ · Hindi

    कर गहि प्रभु मुनिबर बैठारे। परम मनोहर बचन उचारे।।

  317. RCM 7.33.7Open verse →

    आजु धन्य मैं सुनहु मुनीसा। तुम्हरें दरस जाहिं अघ खीसा।।

    अर्थ · Hindi

    आजु धन्य मैं सुनहु मुनीसा। तुम्हरें दरस जाहिं अघ खीसा।।

  318. RCM 7.33.8Open verse →

    बड़े भाग पाइब सतसंगा। बिनहिं प्रयास होहिं भव भंगा।।

    अर्थ · Hindi

    बड़े भाग पाइब सतसंगा। बिनहिं प्रयास होहिं भव भंगा।।

  319. RCM 7.34.1Open verse →

    सुनि प्रभु बचन हरषि मुनि चारी। पुलकित तन अस्तुति अनुसारी।।

    अर्थ · Hindi

    सुनि प्रभु बचन हरषि मुनि चारी। पुलकित तन अस्तुति अनुसारी।।

  320. RCM 7.34.2Open verse →

    जय भगवंत अनंत अनामय। अनघ अनेक एक करुनामय।।

    अर्थ · Hindi

    जय भगवंत अनंत अनामय। अनघ अनेक एक करुनामय।।

  321. RCM 7.34.3Open verse →

    जय निर्गुन जय जय गुन सागर। सुख मंदिर सुंदर अति नागर।।

    अर्थ · Hindi

    जय निर्गुन जय जय गुन सागर। सुख मंदिर सुंदर अति नागर।।

  322. RCM 7.34.4Open verse →

    जय इंदिरा रमन जय भूधर। अनुपम अज अनादि सोभाकर।।

    अर्थ · Hindi

    जय इंदिरा रमन जय भूधर। अनुपम अज अनादि सोभाकर।।

  323. RCM 7.34.5Open verse →

    ग्यान निधान अमान मानप्रद। पावन सुजस पुरान बेद बद।।

    अर्थ · Hindi

    ग्यान निधान अमान मानप्रद। पावन सुजस पुरान बेद बद।।

  324. RCM 7.34.6Open verse →

    तग्य कृतग्य अग्यता भंजन। नाम अनेक अनाम निरंजन।।

    अर्थ · Hindi

    तग्य कृतग्य अग्यता भंजन। नाम अनेक अनाम निरंजन।।

  325. RCM 7.34.7Open verse →

    सर्ब सर्बगत सर्ब उरालय। बससि सदा हम कहुँ परिपालय।।

    अर्थ · Hindi

    सर्ब सर्बगत सर्ब उरालय। बससि सदा हम कहुँ परिपालय।।

  326. RCM 7.34.8Open verse →

    द्वंद बिपति भव फंद बिभंजय। ह्रदि बसि राम काम मद गंजय।।

    अर्थ · Hindi

    द्वंद बिपति भव फंद बिभंजय। ह्रदि बसि राम काम मद गंजय।।

  327. RCM 7.35.1Open verse →

    देहु भगति रघुपति अति पावनि। त्रिबिध ताप भव दाप नसावनि।।

    अर्थ · Hindi

    देहु भगति रघुपति अति पावनि। त्रिबिध ताप भव दाप नसावनि।।

  328. RCM 7.35.2Open verse →

    प्रनत काम सुरधेनु कलपतरु। होइ प्रसन्न दीजै प्रभु यह बरु।।

    अर्थ · Hindi

    प्रनत काम सुरधेनु कलपतरु। होइ प्रसन्न दीजै प्रभु यह बरु।।

  329. RCM 7.35.3Open verse →

    भव बारिधि कुंभज रघुनायक। सेवत सुलभ सकल सुख दायक।।

    अर्थ · Hindi

    भव बारिधि कुंभज रघुनायक। सेवत सुलभ सकल सुख दायक।।

  330. RCM 7.35.4Open verse →

    मन संभव दारुन दुख दारय। दीनबंधु समता बिस्तारय।।

    अर्थ · Hindi

    मन संभव दारुन दुख दारय। दीनबंधु समता बिस्तारय।।

  331. RCM 7.35.5Open verse →

    आस त्रास इरिषादि निवारक। बिनय बिबेक बिरति बिस्तारक।।

    अर्थ · Hindi

    आस त्रास इरिषादि निवारक। बिनय बिबेक बिरति बिस्तारक।।

  332. RCM 7.35.6Open verse →

    भूप मौलि मन मंडन धरनी। देहि भगति संसृति सरि तरनी।।

    अर्थ · Hindi

    भूप मौलि मन मंडन धरनी। देहि भगति संसृति सरि तरनी।।

  333. RCM 7.35.7Open verse →

    मुनि मन मानस हंस निरंतर। चरन कमल बंदित अज संकर।।

    अर्थ · Hindi

    मुनि मन मानस हंस निरंतर। चरन कमल बंदित अज संकर।।

  334. RCM 7.35.8Open verse →

    रघुकुल केतु सेतु श्रुति रच्छक। काल करम सुभाउ गुन भच्छक।।

    अर्थ · Hindi

    रघुकुल केतु सेतु श्रुति रच्छक। काल करम सुभाउ गुन भच्छक।।

  335. RCM 7.35.9Open verse →

    तारन तरन हरन सब दूषन। तुलसिदास प्रभु त्रिभुवन भूषन।।

    अर्थ · Hindi

    तारन तरन हरन सब दूषन। तुलसिदास प्रभु त्रिभुवन भूषन।।

  336. RCM 7.36.1Open verse →

    सनकादिक बिधि लोक सिधाए। भ्रातन्ह राम चरन सिरु नाए।।

    अर्थ · Hindi

    सनकादिक बिधि लोक सिधाए। भ्रातन्ह राम चरन सिरु नाए।।

  337. RCM 7.36.2Open verse →

    पूछत प्रभुहि सकल सकुचाहीं। चितवहिं सब मारुतसुत पाहीं।।

    अर्थ · Hindi

    पूछत प्रभुहि सकल सकुचाहीं। चितवहिं सब मारुतसुत पाहीं।।

  338. RCM 7.36.3Open verse →

    सुनि चहहिं प्रभु मुख कै बानी। जो सुनि होइ सकल भ्रम हानी।।

    अर्थ · Hindi

    सुनि चहहिं प्रभु मुख कै बानी। जो सुनि होइ सकल भ्रम हानी।।

  339. RCM 7.36.4Open verse →

    अंतरजामी प्रभु सभ जाना। बूझत कहहु काह हनुमाना।।

    अर्थ · Hindi

    अंतरजामी प्रभु सभ जाना। बूझत कहहु काह हनुमाना।।

  340. RCM 7.36.5Open verse →

    जोरि पानि कह तब हनुमंता। सुनहु दीनदयाल भगवंता।।

    अर्थ · Hindi

    जोरि पानि कह तब हनुमंता। सुनहु दीनदयाल भगवंता।।

  341. RCM 7.36.6Open verse →

    नाथ भरत कछु पूँछन चहहीं। प्रस्न करत मन सकुचत अहहीं।।

    अर्थ · Hindi

    नाथ भरत कछु पूँछन चहहीं। प्रस्न करत मन सकुचत अहहीं।।

  342. RCM 7.36.7Open verse →

    तुम्ह जानहु कपि मोर सुभाऊ। भरतहि मोहि कछु अंतर काऊ।।

    अर्थ · Hindi

    तुम्ह जानहु कपि मोर सुभाऊ। भरतहि मोहि कछु अंतर काऊ।।

  343. RCM 7.36.8Open verse →

    सुनि प्रभु बचन भरत गहे चरना। सुनहु नाथ प्रनतारति हरना।।

    अर्थ · Hindi

    सुनि प्रभु बचन भरत गहे चरना। सुनहु नाथ प्रनतारति हरना।।

  344. RCM 7.37.1Open verse →

    करउँ कृपानिधि एक ढिठाई। मैं सेवक तुम्ह जन सुखदाई।।

    अर्थ · Hindi

    करउँ कृपानिधि एक ढिठाई। मैं सेवक तुम्ह जन सुखदाई।।

  345. RCM 7.37.2Open verse →

    संतन्ह कै महिमा रघुराई। बहु बिधि बेद पुरानन्ह गाई।।

    अर्थ · Hindi

    संतन्ह कै महिमा रघुराई। बहु बिधि बेद पुरानन्ह गाई।।

  346. RCM 7.37.3Open verse →

    श्रीमुख तुम्ह पुनि कीन्हि बड़ाई। तिन्ह पर प्रभुहि प्रीति अधिकाई।।

    अर्थ · Hindi

    श्रीमुख तुम्ह पुनि कीन्हि बड़ाई। तिन्ह पर प्रभुहि प्रीति अधिकाई।।

  347. RCM 7.37.4Open verse →

    सुना चहउँ प्रभु तिन्ह कर लच्छन। कृपासिंधु गुन ग्यान बिचच्छन।।

    अर्थ · Hindi

    सुना चहउँ प्रभु तिन्ह कर लच्छन। कृपासिंधु गुन ग्यान बिचच्छन।।

  348. RCM 7.37.5Open verse →

    संत असंत भेद बिलगाई। प्रनतपाल मोहि कहहु बुझाई।।

    अर्थ · Hindi

    संत असंत भेद बिलगाई। प्रनतपाल मोहि कहहु बुझाई।।

  349. RCM 7.37.6Open verse →

    संतन्ह के लच्छन सुनु भ्राता। अगनित श्रुति पुरान बिख्याता।।

    अर्थ · Hindi

    संतन्ह के लच्छन सुनु भ्राता। अगनित श्रुति पुरान बिख्याता।।

  350. RCM 7.37.7Open verse →

    संत असंतन्हि कै असि करनी। जिमि कुठार चंदन आचरनी।।

    अर्थ · Hindi

    संत असंतन्हि कै असि करनी। जिमि कुठार चंदन आचरनी।।

  351. RCM 7.37.8Open verse →

    काटइ परसु मलय सुनु भाई। निज गुन देइ सुगंध बसाई।।

    अर्थ · Hindi

    काटइ परसु मलय सुनु भाई। निज गुन देइ सुगंध बसाई।।

  352. RCM 7.38.1Open verse →

    बिषय अलंपट सील गुनाकर। पर दुख दुख सुख सुख देखे पर।।

    अर्थ · Hindi

    बिषय अलंपट सील गुनाकर। पर दुख दुख सुख सुख देखे पर।।

  353. RCM 7.38.2Open verse →

    सम अभूतरिपु बिमद बिरागी। लोभामरष हरष भय त्यागी।।

    अर्थ · Hindi

    सम अभूतरिपु बिमद बिरागी। लोभामरष हरष भय त्यागी।।

  354. RCM 7.38.3Open verse →

    कोमलचित दीनन्ह पर दाया। मन बच क्रम मम भगति अमाया।।

    अर्थ · Hindi

    कोमलचित दीनन्ह पर दाया। मन बच क्रम मम भगति अमाया।।

  355. RCM 7.38.4Open verse →

    सबहि मानप्रद आपु अमानी। भरत प्रान सम मम ते प्रानी।।

    अर्थ · Hindi

    सबहि मानप्रद आपु अमानी। भरत प्रान सम मम ते प्रानी।।

  356. RCM 7.38.5Open verse →

    बिगत काम मम नाम परायन। सांति बिरति बिनती मुदितायन।।

    अर्थ · Hindi

    बिगत काम मम नाम परायन। सांति बिरति बिनती मुदितायन।।

  357. RCM 7.38.6Open verse →

    सीतलता सरलता मयत्री। द्विज पद प्रीति धर्म जनयत्री।।

    अर्थ · Hindi

    सीतलता सरलता मयत्री। द्विज पद प्रीति धर्म जनयत्री।।

  358. RCM 7.38.7Open verse →

    ए सब लच्छन बसहिं जासु उर। जानेहु तात संत संतत फुर।।

    अर्थ · Hindi

    ए सब लच्छन बसहिं जासु उर। जानेहु तात संत संतत फुर।।

  359. RCM 7.38.8Open verse →

    सम दम नियम नीति नहिं डोलहिं। परुष बचन कबहूँ नहिं बोलहिं।।

    अर्थ · Hindi

    सम दम नियम नीति नहिं डोलहिं। परुष बचन कबहूँ नहिं बोलहिं।।

  360. RCM 7.39.1Open verse →

    सनहु असंतन्ह केर सुभाऊ। भूलेहुँ संगति करिअ न काऊ।।

    अर्थ · Hindi

    सनहु असंतन्ह केर सुभाऊ। भूलेहुँ संगति करिअ न काऊ।।

  361. RCM 7.39.2Open verse →

    तिन्ह कर संग सदा दुखदाई। जिमि कलपहि घालइ हरहाई।।

    अर्थ · Hindi

    तिन्ह कर संग सदा दुखदाई। जिमि कलपहि घालइ हरहाई।।

  362. RCM 7.39.3Open verse →

    खलन्ह हृदयँ अति ताप बिसेषी। जरहिं सदा पर संपति देखी।।

    अर्थ · Hindi

    खलन्ह हृदयँ अति ताप बिसेषी। जरहिं सदा पर संपति देखी।।

  363. RCM 7.39.4Open verse →

    जहँ कहुँ निंदा सुनहिं पराई। हरषहिं मनहुँ परी निधि पाई।।

    अर्थ · Hindi

    जहँ कहुँ निंदा सुनहिं पराई। हरषहिं मनहुँ परी निधि पाई।।

  364. RCM 7.39.5Open verse →

    काम क्रोध मद लोभ परायन। निर्दय कपटी कुटिल मलायन।।

    अर्थ · Hindi

    काम क्रोध मद लोभ परायन। निर्दय कपटी कुटिल मलायन।।

  365. RCM 7.39.6Open verse →

    बयरु अकारन सब काहू सों। जो कर हित अनहित ताहू सों।।

    अर्थ · Hindi

    बयरु अकारन सब काहू सों। जो कर हित अनहित ताहू सों।।

  366. RCM 7.39.7Open verse →

    झूठइ लेना झूठइ देना। झूठइ भोजन झूठ चबेना।।

    अर्थ · Hindi

    झूठइ लेना झूठइ देना। झूठइ भोजन झूठ चबेना।।

  367. RCM 7.39.8Open verse →

    बोलहिं मधुर बचन जिमि मोरा। खाइ महा अति हृदय कठोरा।।

    अर्थ · Hindi

    बोलहिं मधुर बचन जिमि मोरा। खाइ महा अति हृदय कठोरा।।

  368. RCM 7.40.1Open verse →

    लोभइ ओढ़न लोभइ डासन। सिस्त्रोदर पर जमपुर त्रास न।।

    अर्थ · Hindi

    लोभइ ओढ़न लोभइ डासन। सिस्त्रोदर पर जमपुर त्रास न।।

  369. RCM 7.40.2Open verse →

    काहू की जौं सुनहिं बड़ाई। स्वास लेहिं जनु जूड़ी आई।।

    अर्थ · Hindi

    काहू की जौं सुनहिं बड़ाई। स्वास लेहिं जनु जूड़ी आई।।

  370. RCM 7.40.3Open verse →

    जब काहू कै देखहिं बिपती। सुखी भए मानहुँ जग नृपती।।

    अर्थ · Hindi

    जब काहू कै देखहिं बिपती। सुखी भए मानहुँ जग नृपती।।

  371. RCM 7.40.4Open verse →

    स्वारथ रत परिवार बिरोधी। लंपट काम लोभ अति क्रोधी।।

    अर्थ · Hindi

    स्वारथ रत परिवार बिरोधी। लंपट काम लोभ अति क्रोधी।।

  372. RCM 7.40.5Open verse →

    मातु पिता गुर बिप्र न मानहिं। आपु गए अरु घालहिं आनहिं।।

    अर्थ · Hindi

    मातु पिता गुर बिप्र न मानहिं। आपु गए अरु घालहिं आनहिं।।

  373. RCM 7.40.6Open verse →

    करहिं मोह बस द्रोह परावा। संत संग हरि कथा न भावा।।

    अर्थ · Hindi

    करहिं मोह बस द्रोह परावा। संत संग हरि कथा न भावा।।

  374. RCM 7.40.7Open verse →

    अवगुन सिंधु मंदमति कामी। बेद बिदूषक परधन स्वामी।।

    अर्थ · Hindi

    अवगुन सिंधु मंदमति कामी। बेद बिदूषक परधन स्वामी।।

  375. RCM 7.40.8Open verse →

    बिप्र द्रोह पर द्रोह बिसेषा। दंभ कपट जियँ धरें सुबेषा।।

    अर्थ · Hindi

    बिप्र द्रोह पर द्रोह बिसेषा। दंभ कपट जियँ धरें सुबेषा।।

  376. RCM 7.41.1Open verse →

    पर हित सरिस धर्म नहिं भाई। पर पीड़ा सम नहिं अधमाई।।

    अर्थ · Hindi

    पर हित सरिस धर्म नहिं भाई। पर पीड़ा सम नहिं अधमाई।।

  377. RCM 7.41.2Open verse →

    निर्नय सकल पुरान बेद कर। कहेउँ तात जानहिं कोबिद नर।।

    अर्थ · Hindi

    निर्नय सकल पुरान बेद कर। कहेउँ तात जानहिं कोबिद नर।।

  378. RCM 7.41.3Open verse →

    नर सरीर धरि जे पर पीरा। करहिं ते सहहिं महा भव भीरा।।

    अर्थ · Hindi

    नर सरीर धरि जे पर पीरा। करहिं ते सहहिं महा भव भीरा।।

  379. RCM 7.41.4Open verse →

    करहिं मोह बस नर अघ नाना। स्वारथ रत परलोक नसाना।।

    अर्थ · Hindi

    करहिं मोह बस नर अघ नाना। स्वारथ रत परलोक नसाना।।

  380. RCM 7.41.5Open verse →

    कालरूप तिन्ह कहँ मैं भ्राता। सुभ अरु असुभ कर्म फल दाता।।

    अर्थ · Hindi

    कालरूप तिन्ह कहँ मैं भ्राता। सुभ अरु असुभ कर्म फल दाता।।

  381. RCM 7.41.6Open verse →

    अस बिचारि जे परम सयाने। भजहिं मोहि संसृत दुख जाने।।

    अर्थ · Hindi

    अस बिचारि जे परम सयाने। भजहिं मोहि संसृत दुख जाने।।

  382. RCM 7.41.7Open verse →

    त्यागहिं कर्म सुभासुभ दायक। भजहिं मोहि सुर नर मुनि नायक।।

    अर्थ · Hindi

    त्यागहिं कर्म सुभासुभ दायक। भजहिं मोहि सुर नर मुनि नायक।।

  383. RCM 7.41.8Open verse →

    संत असंतन्ह के गुन भाषे। ते न परहिं भव जिन्ह लखि राखे।।

    अर्थ · Hindi

    संत असंतन्ह के गुन भाषे। ते न परहिं भव जिन्ह लखि राखे।।

  384. RCM 7.42.1Open verse →

    श्रीमुख बचन सुनत सब भाई। हरषे प्रेम न हृदयँ समाई।।

    अर्थ · Hindi

    श्रीमुख बचन सुनत सब भाई। हरषे प्रेम न हृदयँ समाई।।

  385. RCM 7.42.2Open verse →

    करहिं बिनय अति बारहिं बारा। हनूमान हियँ हरष अपारा।।

    अर्थ · Hindi

    करहिं बिनय अति बारहिं बारा। हनूमान हियँ हरष अपारा।।

  386. RCM 7.42.3Open verse →

    पुनि रघुपति निज मंदिर गए। एहि बिधि चरित करत नित नए।।

    अर्थ · Hindi

    पुनि रघुपति निज मंदिर गए। एहि बिधि चरित करत नित नए।।

  387. RCM 7.42.4Open verse →

    बार बार नारद मुनि आवहिं। चरित पुनीत राम के गावहिं।।

    अर्थ · Hindi

    बार बार नारद मुनि आवहिं। चरित पुनीत राम के गावहिं।।

  388. RCM 7.42.5Open verse →

    नित नव चरन देखि मुनि जाहीं। ब्रह्मलोक सब कथा कहाहीं।।

    अर्थ · Hindi

    नित नव चरन देखि मुनि जाहीं। ब्रह्मलोक सब कथा कहाहीं।।

  389. RCM 7.42.6Open verse →

    सुनि बिरंचि अतिसय सुख मानहिं। पुनि पुनि तात करहु गुन गानहिं।।

    अर्थ · Hindi

    सुनि बिरंचि अतिसय सुख मानहिं। पुनि पुनि तात करहु गुन गानहिं।।

  390. RCM 7.42.7Open verse →

    सनकादिक नारदहि सराहहिं। जद्यपि ब्रह्म निरत मुनि आहहिं।।

    अर्थ · Hindi

    सनकादिक नारदहि सराहहिं। जद्यपि ब्रह्म निरत मुनि आहहिं।।

  391. RCM 7.42.8Open verse →

    सुनि गुन गान समाधि बिसारी।। सादर सुनहिं परम अधिकारी।।

    अर्थ · Hindi

    सुनि गुन गान समाधि बिसारी।। सादर सुनहिं परम अधिकारी।।

  392. RCM 7.43.1Open verse →

    एक बार रघुनाथ बोलाए। गुर द्विज पुरबासी सब आए।।

    अर्थ · Hindi

    एक बार रघुनाथ बोलाए। गुर द्विज पुरबासी सब आए।।

  393. RCM 7.43.2Open verse →

    बैठे गुर मुनि अरु द्विज सज्जन। बोले बचन भगत भव भंजन।।

    अर्थ · Hindi

    बैठे गुर मुनि अरु द्विज सज्जन। बोले बचन भगत भव भंजन।।

  394. RCM 7.43.3Open verse →

    सनहु सकल पुरजन मम बानी। कहउँ न कछु ममता उर आनी।।

    अर्थ · Hindi

    सनहु सकल पुरजन मम बानी। कहउँ न कछु ममता उर आनी।।

  395. RCM 7.43.4Open verse →

    नहिं अनीति नहिं कछु प्रभुताई। सुनहु करहु जो तुम्हहि सोहाई।।

    अर्थ · Hindi

    नहिं अनीति नहिं कछु प्रभुताई। सुनहु करहु जो तुम्हहि सोहाई।।

  396. RCM 7.43.5Open verse →

    सोइ सेवक प्रियतम मम सोई। मम अनुसासन मानै जोई।।

    अर्थ · Hindi

    सोइ सेवक प्रियतम मम सोई। मम अनुसासन मानै जोई।।

  397. RCM 7.43.6Open verse →

    जौं अनीति कछु भाषौं भाई। तौं मोहि बरजहु भय बिसराई।।

    अर्थ · Hindi

    जौं अनीति कछु भाषौं भाई। तौं मोहि बरजहु भय बिसराई।।

  398. RCM 7.43.7Open verse →

    बड़ें भाग मानुष तनु पावा। सुर दुर्लभ सब ग्रंथिन्ह गावा।।

    अर्थ · Hindi

    बड़ें भाग मानुष तनु पावा। सुर दुर्लभ सब ग्रंथिन्ह गावा।।

  399. RCM 7.43.8Open verse →

    साधन धाम मोच्छ कर द्वारा। पाइ न जेहिं परलोक सँवारा।।

    अर्थ · Hindi

    साधन धाम मोच्छ कर द्वारा। पाइ न जेहिं परलोक सँवारा।।

  400. RCM 7.44.1Open verse →

    एहि तन कर फल बिषय न भाई। स्वर्गउ स्वल्प अंत दुखदाई।।

    अर्थ · Hindi

    एहि तन कर फल बिषय न भाई। स्वर्गउ स्वल्प अंत दुखदाई।।

  401. RCM 7.44.2Open verse →

    नर तनु पाइ बिषयँ मन देहीं। पलटि सुधा ते सठ बिष लेहीं।।

    अर्थ · Hindi

    नर तनु पाइ बिषयँ मन देहीं। पलटि सुधा ते सठ बिष लेहीं।।

  402. RCM 7.44.3Open verse →

    ताहि कबहुँ भल कहइ न कोई। गुंजा ग्रहइ परस मनि खोई।।

    अर्थ · Hindi

    ताहि कबहुँ भल कहइ न कोई। गुंजा ग्रहइ परस मनि खोई।।

  403. RCM 7.44.4Open verse →

    आकर चारि लच्छ चौरासी। जोनि भ्रमत यह जिव अबिनासी।।

    अर्थ · Hindi

    आकर चारि लच्छ चौरासी। जोनि भ्रमत यह जिव अबिनासी।।

  404. RCM 7.44.5Open verse →

    फिरत सदा माया कर प्रेरा। काल कर्म सुभाव गुन घेरा।।

    अर्थ · Hindi

    फिरत सदा माया कर प्रेरा। काल कर्म सुभाव गुन घेरा।।

  405. RCM 7.44.6Open verse →

    कबहुँक करि करुना नर देही। देत ईस बिनु हेतु सनेही।।

    अर्थ · Hindi

    कबहुँक करि करुना नर देही। देत ईस बिनु हेतु सनेही।।

  406. RCM 7.44.7Open verse →

    नर तनु भव बारिधि कहुँ बेरो। सन्मुख मरुत अनुग्रह मेरो।।

    अर्थ · Hindi

    नर तनु भव बारिधि कहुँ बेरो। सन्मुख मरुत अनुग्रह मेरो।।

  407. RCM 7.44.8Open verse →

    करनधार सदगुर दृढ़ नावा। दुर्लभ साज सुलभ करि पावा।।

    अर्थ · Hindi

    करनधार सदगुर दृढ़ नावा। दुर्लभ साज सुलभ करि पावा।।

  408. RCM 7.45.1Open verse →

    जौं परलोक इहाँ सुख चहहू। सुनि मम बचन ह्रृदयँ दृढ़ गहहू।।

    अर्थ · Hindi

    जौं परलोक इहाँ सुख चहहू। सुनि मम बचन ह्रृदयँ दृढ़ गहहू।।

  409. RCM 7.45.2Open verse →

    सुलभ सुखद मारग यह भाई। भगति मोरि पुरान श्रुति गाई।।

    अर्थ · Hindi

    सुलभ सुखद मारग यह भाई। भगति मोरि पुरान श्रुति गाई।।

  410. RCM 7.45.3Open verse →

    ग्यान अगम प्रत्यूह अनेका। साधन कठिन न मन कहुँ टेका।।

    अर्थ · Hindi

    ग्यान अगम प्रत्यूह अनेका। साधन कठिन न मन कहुँ टेका।।

  411. RCM 7.45.4Open verse →

    करत कष्ट बहु पावइ कोऊ। भक्ति हीन मोहि प्रिय नहिं सोऊ।।

    अर्थ · Hindi

    करत कष्ट बहु पावइ कोऊ। भक्ति हीन मोहि प्रिय नहिं सोऊ।।

  412. RCM 7.45.5Open verse →

    भक्ति सुतंत्र सकल सुख खानी। बिनु सतसंग न पावहिं प्रानी।।

    अर्थ · Hindi

    भक्ति सुतंत्र सकल सुख खानी। बिनु सतसंग न पावहिं प्रानी।।

  413. RCM 7.45.6Open verse →

    पुन्य पुंज बिनु मिलहिं न संता। सतसंगति संसृति कर अंता।।

    अर्थ · Hindi

    पुन्य पुंज बिनु मिलहिं न संता। सतसंगति संसृति कर अंता।।

  414. RCM 7.45.7Open verse →

    पुन्य एक जग महुँ नहिं दूजा। मन क्रम बचन बिप्र पद पूजा।।

    अर्थ · Hindi

    पुन्य एक जग महुँ नहिं दूजा। मन क्रम बचन बिप्र पद पूजा।।

  415. RCM 7.45.8Open verse →

    सानुकूल तेहि पर मुनि देवा। जो तजि कपटु करइ द्विज सेवा।।

    अर्थ · Hindi

    सानुकूल तेहि पर मुनि देवा। जो तजि कपटु करइ द्विज सेवा।।

  416. RCM 7.46.1Open verse →

    कहहु भगति पथ कवन प्रयासा। जोग न मख जप तप उपवासा।।

    अर्थ · Hindi

    कहहु भगति पथ कवन प्रयासा। जोग न मख जप तप उपवासा।।

  417. RCM 7.46.2Open verse →

    सरल सुभाव न मन कुटिलाई। जथा लाभ संतोष सदाई।।

    अर्थ · Hindi

    सरल सुभाव न मन कुटिलाई। जथा लाभ संतोष सदाई।।

  418. RCM 7.46.3Open verse →

    मोर दास कहाइ नर आसा। करइ तौ कहहु कहा बिस्वासा।।

    अर्थ · Hindi

    मोर दास कहाइ नर आसा। करइ तौ कहहु कहा बिस्वासा।।

  419. RCM 7.46.4Open verse →

    बहुत कहउँ का कथा बढ़ाई। एहि आचरन बस्य मैं भाई।।

    अर्थ · Hindi

    बहुत कहउँ का कथा बढ़ाई। एहि आचरन बस्य मैं भाई।।

  420. RCM 7.46.5Open verse →

    बैर न बिग्रह आस न त्रासा। सुखमय ताहि सदा सब आसा।।

    अर्थ · Hindi

    बैर न बिग्रह आस न त्रासा। सुखमय ताहि सदा सब आसा।।

  421. RCM 7.46.6Open verse →

    अनारंभ अनिकेत अमानी। अनघ अरोष दच्छ बिग्यानी।।

    अर्थ · Hindi

    अनारंभ अनिकेत अमानी। अनघ अरोष दच्छ बिग्यानी।।

  422. RCM 7.46.7Open verse →

    प्रीति सदा सज्जन संसर्गा। तृन सम बिषय स्वर्ग अपबर्गा।।

    अर्थ · Hindi

    प्रीति सदा सज्जन संसर्गा। तृन सम बिषय स्वर्ग अपबर्गा।।

  423. RCM 7.46.8Open verse →

    भगति पच्छ हठ नहिं सठताई। दुष्ट तर्क सब दूरि बहाई।।

    अर्थ · Hindi

    भगति पच्छ हठ नहिं सठताई। दुष्ट तर्क सब दूरि बहाई।।

  424. RCM 7.47.1Open verse →

    सुनत सुधासम बचन राम के। गहे सबनि पद कृपाधाम के।।

    अर्थ · Hindi

    सुनत सुधासम बचन राम के। गहे सबनि पद कृपाधाम के।।

  425. RCM 7.47.2Open verse →

    जननि जनक गुर बंधु हमारे। कृपा निधान प्रान ते प्यारे।।

    अर्थ · Hindi

    जननि जनक गुर बंधु हमारे। कृपा निधान प्रान ते प्यारे।।

  426. RCM 7.47.3Open verse →

    तनु धनु धाम राम हितकारी। सब बिधि तुम्ह प्रनतारति हारी।।

    अर्थ · Hindi

    तनु धनु धाम राम हितकारी। सब बिधि तुम्ह प्रनतारति हारी।।

  427. RCM 7.47.4Open verse →

    असि सिख तुम्ह बिनु देइ न कोऊ। मातु पिता स्वारथ रत ओऊ।।

    अर्थ · Hindi

    असि सिख तुम्ह बिनु देइ न कोऊ। मातु पिता स्वारथ रत ओऊ।।

  428. RCM 7.47.5Open verse →

    हेतु रहित जग जुग उपकारी। तुम्ह तुम्हार सेवक असुरारी।।

    अर्थ · Hindi

    हेतु रहित जग जुग उपकारी। तुम्ह तुम्हार सेवक असुरारी।।

  429. RCM 7.47.6Open verse →

    स्वारथ मीत सकल जग माहीं। सपनेहुँ प्रभु परमारथ नाहीं।।

    अर्थ · Hindi

    स्वारथ मीत सकल जग माहीं। सपनेहुँ प्रभु परमारथ नाहीं।।

  430. RCM 7.47.7Open verse →

    सबके बचन प्रेम रस साने। सुनि रघुनाथ हृदयँ हरषाने।।

    अर्थ · Hindi

    सबके बचन प्रेम रस साने। सुनि रघुनाथ हृदयँ हरषाने।।

  431. RCM 7.47.8Open verse →

    निज निज गृह गए आयसु पाई। बरनत प्रभु बतकही सुहाई।।

    अर्थ · Hindi

    निज निज गृह गए आयसु पाई। बरनत प्रभु बतकही सुहाई।।

  432. RCM 7.48.1Open verse →

    एक बार बसिष्ट मुनि आए। जहाँ राम सुखधाम सुहाए।।

    अर्थ · Hindi

    एक बार बसिष्ट मुनि आए। जहाँ राम सुखधाम सुहाए।।

  433. RCM 7.48.2Open verse →

    अति आदर रघुनायक कीन्हा। पद पखारि पादोदक लीन्हा।।

    अर्थ · Hindi

    अति आदर रघुनायक कीन्हा। पद पखारि पादोदक लीन्हा।।

  434. RCM 7.48.3Open verse →

    राम सुनहु मुनि कह कर जोरी। कृपासिंधु बिनती कछु मोरी।।

    अर्थ · Hindi

    राम सुनहु मुनि कह कर जोरी। कृपासिंधु बिनती कछु मोरी।।

  435. RCM 7.48.4Open verse →

    देखि देखि आचरन तुम्हारा। होत मोह मम हृदयँ अपारा।।

    अर्थ · Hindi

    देखि देखि आचरन तुम्हारा। होत मोह मम हृदयँ अपारा।।

  436. RCM 7.48.5Open verse →

    महिमा अमित बेद नहिं जाना। मैं केहि भाँति कहउँ भगवाना।।

    अर्थ · Hindi

    महिमा अमित बेद नहिं जाना। मैं केहि भाँति कहउँ भगवाना।।

  437. RCM 7.48.6Open verse →

    उपरोहित्य कर्म अति मंदा। बेद पुरान सुमृति कर निंदा।।

    अर्थ · Hindi

    उपरोहित्य कर्म अति मंदा। बेद पुरान सुमृति कर निंदा।।

  438. RCM 7.48.7Open verse →

    जब न लेउँ मैं तब बिधि मोही। कहा लाभ आगें सुत तोही।।

    अर्थ · Hindi

    जब न लेउँ मैं तब बिधि मोही। कहा लाभ आगें सुत तोही।।

  439. RCM 7.48.8Open verse →

    परमातमा ब्रह्म नर रूपा। होइहि रघुकुल भूषन भूपा।।

    अर्थ · Hindi

    परमातमा ब्रह्म नर रूपा। होइहि रघुकुल भूषन भूपा।।

  440. RCM 7.49.1Open verse →

    जप तप नियम जोग निज धर्मा। श्रुति संभव नाना सुभ कर्मा।।

    अर्थ · Hindi

    जप तप नियम जोग निज धर्मा। श्रुति संभव नाना सुभ कर्मा।।

  441. RCM 7.49.2Open verse →

    ग्यान दया दम तीरथ मज्जन। जहँ लगि धर्म कहत श्रुति सज्जन।।

    अर्थ · Hindi

    ग्यान दया दम तीरथ मज्जन। जहँ लगि धर्म कहत श्रुति सज्जन।।

  442. RCM 7.49.3Open verse →

    आगम निगम पुरान अनेका। पढ़े सुने कर फल प्रभु एका।।

    अर्थ · Hindi

    आगम निगम पुरान अनेका। पढ़े सुने कर फल प्रभु एका।।

  443. RCM 7.49.4Open verse →

    तब पद पंकज प्रीति निरंतर। सब साधन कर यह फल सुंदर।।

    अर्थ · Hindi

    तब पद पंकज प्रीति निरंतर। सब साधन कर यह फल सुंदर।।

  444. RCM 7.49.5Open verse →

    छूटइ मल कि मलहि के धोएँ। घृत कि पाव कोइ बारि बिलोएँ।।

    अर्थ · Hindi

    छूटइ मल कि मलहि के धोएँ। घृत कि पाव कोइ बारि बिलोएँ।।

  445. RCM 7.49.6Open verse →

    प्रेम भगति जल बिनु रघुराई। अभिअंतर मल कबहुँ न जाई।।

    अर्थ · Hindi

    प्रेम भगति जल बिनु रघुराई। अभिअंतर मल कबहुँ न जाई।।

  446. RCM 7.49.7Open verse →

    सोइ सर्बग्य तग्य सोइ पंडित। सोइ गुन गृह बिग्यान अखंडित।।

    अर्थ · Hindi

    सोइ सर्बग्य तग्य सोइ पंडित। सोइ गुन गृह बिग्यान अखंडित।।

  447. RCM 7.49.8Open verse →

    दच्छ सकल लच्छन जुत सोई। जाकें पद सरोज रति होई।।

    अर्थ · Hindi

    दच्छ सकल लच्छन जुत सोई। जाकें पद सरोज रति होई।।

  448. RCM 7.50.1Open verse →

    अस कहि मुनि बसिष्ट गृह आए। कृपासिंधु के मन अति भाए।।

    अर्थ · Hindi

    अस कहि मुनि बसिष्ट गृह आए। कृपासिंधु के मन अति भाए।।

  449. RCM 7.50.2Open verse →

    हनूमान भरतादिक भ्राता। संग लिए सेवक सुखदाता।।

    अर्थ · Hindi

    हनूमान भरतादिक भ्राता। संग लिए सेवक सुखदाता।।

  450. RCM 7.50.3Open verse →

    पुनि कृपाल पुर बाहेर गए। गज रथ तुरग मगावत भए।।

    अर्थ · Hindi

    पुनि कृपाल पुर बाहेर गए। गज रथ तुरग मगावत भए।।

  451. RCM 7.50.4Open verse →

    देखि कृपा करि सकल सराहे। दिए उचित जिन्ह जिन्ह तेइ चाहे।।

    अर्थ · Hindi

    देखि कृपा करि सकल सराहे। दिए उचित जिन्ह जिन्ह तेइ चाहे।।

  452. RCM 7.50.5Open verse →

    हरन सकल श्रम प्रभु श्रम पाई। गए जहाँ सीतल अवँराई।।

    अर्थ · Hindi

    हरन सकल श्रम प्रभु श्रम पाई। गए जहाँ सीतल अवँराई।।

  453. RCM 7.50.6Open verse →

    भरत दीन्ह निज बसन डसाई। बैठे प्रभु सेवहिं सब भाई।।

    अर्थ · Hindi

    भरत दीन्ह निज बसन डसाई। बैठे प्रभु सेवहिं सब भाई।।

  454. RCM 7.50.7Open verse →

    मारुतसुत तब मारूत करई। पुलक बपुष लोचन जल भरई।।

    अर्थ · Hindi

    मारुतसुत तब मारूत करई। पुलक बपुष लोचन जल भरई।।

  455. RCM 7.50.8Open verse →

    हनूमान सम नहिं बड़भागी। नहिं कोउ राम चरन अनुरागी।।

    अर्थ · Hindi

    हनूमान सम नहिं बड़भागी। नहिं कोउ राम चरन अनुरागी।।

  456. RCM 7.50.9Open verse →

    गिरिजा जासु प्रीति सेवकाई। बार बार प्रभु निज मुख गाई।।

    अर्थ · Hindi

    गिरिजा जासु प्रीति सेवकाई। बार बार प्रभु निज मुख गाई।।

  457. RCM 7.51.1Open verse →

    मामवलोकय पंकज लोचन। कृपा बिलोकनि सोच बिमोचन।।

    अर्थ · Hindi

    मामवलोकय पंकज लोचन। कृपा बिलोकनि सोच बिमोचन।।

  458. RCM 7.51.2Open verse →

    नील तामरस स्याम काम अरि। हृदय कंज मकरंद मधुप हरि।।

    अर्थ · Hindi

    नील तामरस स्याम काम अरि। हृदय कंज मकरंद मधुप हरि।।

  459. RCM 7.51.3Open verse →

    जातुधान बरूथ बल भंजन। मुनि सज्जन रंजन अघ गंजन।।

    अर्थ · Hindi

    जातुधान बरूथ बल भंजन। मुनि सज्जन रंजन अघ गंजन।।

  460. RCM 7.51.4Open verse →

    भूसुर ससि नव बृंद बलाहक। असरन सरन दीन जन गाहक।।

    अर्थ · Hindi

    भूसुर ससि नव बृंद बलाहक। असरन सरन दीन जन गाहक।।

  461. RCM 7.51.5Open verse →

    भुज बल बिपुल भार महि खंडित। खर दूषन बिराध बध पंडित।।

    अर्थ · Hindi

    भुज बल बिपुल भार महि खंडित। खर दूषन बिराध बध पंडित।।

  462. RCM 7.51.6Open verse →

    रावनारि सुखरूप भूपबर। जय दसरथ कुल कुमुद सुधाकर।।

    अर्थ · Hindi

    रावनारि सुखरूप भूपबर। जय दसरथ कुल कुमुद सुधाकर।।

  463. RCM 7.51.7Open verse →

    सुजस पुरान बिदित निगमागम। गावत सुर मुनि संत समागम।।

    अर्थ · Hindi

    सुजस पुरान बिदित निगमागम। गावत सुर मुनि संत समागम।।

  464. RCM 7.51.8Open verse →

    कारुनीक ब्यलीक मद खंडन। सब बिधि कुसल कोसला मंडन।।

    अर्थ · Hindi

    कारुनीक ब्यलीक मद खंडन। सब बिधि कुसल कोसला मंडन।।

  465. RCM 7.51.9Open verse →

    कलि मल मथन नाम ममताहन। तुलसीदास प्रभु पाहि प्रनत जन।।

    अर्थ · Hindi

    कलि मल मथन नाम ममताहन। तुलसीदास प्रभु पाहि प्रनत जन।।

  466. RCM 7.52.1Open verse →

    गिरिजा सुनहु बिसद यह कथा। मैं सब कही मोरि मति जथा।।

    अर्थ · Hindi

    गिरिजा सुनहु बिसद यह कथा। मैं सब कही मोरि मति जथा।।

  467. RCM 7.52.2Open verse →

    राम चरित सत कोटि अपारा। श्रुति सारदा न बरनै पारा।।

    अर्थ · Hindi

    राम चरित सत कोटि अपारा। श्रुति सारदा न बरनै पारा।।

  468. RCM 7.52.3Open verse →

    राम अनंत अनंत गुनानी। जन्म कर्म अनंत नामानी।।

    अर्थ · Hindi

    राम अनंत अनंत गुनानी। जन्म कर्म अनंत नामानी।।

  469. RCM 7.52.4Open verse →

    जल सीकर महि रज गनि जाहीं। रघुपति चरित न बरनि सिराहीं।।

    अर्थ · Hindi

    जल सीकर महि रज गनि जाहीं। रघुपति चरित न बरनि सिराहीं।।

  470. RCM 7.52.5Open verse →

    बिमल कथा हरि पद दायनी। भगति होइ सुनि अनपायनी।।

    अर्थ · Hindi

    बिमल कथा हरि पद दायनी। भगति होइ सुनि अनपायनी।।

  471. RCM 7.52.6Open verse →

    उमा कहिउँ सब कथा सुहाई। जो भुसुंडि खगपतिहि सुनाई।।

    अर्थ · Hindi

    उमा कहिउँ सब कथा सुहाई। जो भुसुंडि खगपतिहि सुनाई।।

  472. RCM 7.52.7Open verse →

    कछुक राम गुन कहेउँ बखानी। अब का कहौं सो कहहु भवानी।।

    अर्थ · Hindi

    कछुक राम गुन कहेउँ बखानी। अब का कहौं सो कहहु भवानी।।

  473. RCM 7.52.8Open verse →

    सुनि सुभ कथा उमा हरषानी। बोली अति बिनीत मृदु बानी।।

    अर्थ · Hindi

    सुनि सुभ कथा उमा हरषानी। बोली अति बिनीत मृदु बानी।।

  474. RCM 7.52.9Open verse →

    धन्य धन्य मैं धन्य पुरारी। सुनेउँ राम गुन भव भय हारी।।

    अर्थ · Hindi

    धन्य धन्य मैं धन्य पुरारी। सुनेउँ राम गुन भव भय हारी।।

  475. RCM 7.53.1Open verse →

    राम चरित जे सुनत अघाहीं। रस बिसेष जाना तिन्ह नाहीं।।

    अर्थ · Hindi

    राम चरित जे सुनत अघाहीं। रस बिसेष जाना तिन्ह नाहीं।।

  476. RCM 7.53.2Open verse →

    जीवनमुक्त महामुनि जेऊ। हरि गुन सुनहीं निरंतर तेऊ।।

    अर्थ · Hindi

    जीवनमुक्त महामुनि जेऊ। हरि गुन सुनहीं निरंतर तेऊ।।

  477. RCM 7.53.3Open verse →

    भव सागर चह पार जो पावा। राम कथा ता कहँ दृढ़ नावा।।

    अर्थ · Hindi

    भव सागर चह पार जो पावा। राम कथा ता कहँ दृढ़ नावा।।

  478. RCM 7.53.4Open verse →

    बिषइन्ह कहँ पुनि हरि गुन ग्रामा। श्रवन सुखद अरु मन अभिरामा।।

    अर्थ · Hindi

    बिषइन्ह कहँ पुनि हरि गुन ग्रामा। श्रवन सुखद अरु मन अभिरामा।।

  479. RCM 7.53.5Open verse →

    श्रवनवंत अस को जग माहीं। जाहि न रघुपति चरित सोहाहीं।।

    अर्थ · Hindi

    श्रवनवंत अस को जग माहीं। जाहि न रघुपति चरित सोहाहीं।।

  480. RCM 7.53.6Open verse →

    ते जड़ जीव निजात्मक घाती। जिन्हहि न रघुपति कथा सोहाती।।

    अर्थ · Hindi

    ते जड़ जीव निजात्मक घाती। जिन्हहि न रघुपति कथा सोहाती।।

  481. RCM 7.53.7Open verse →

    हरिचरित्र मानस तुम्ह गावा। सुनि मैं नाथ अमिति सुख पावा।।

    अर्थ · Hindi

    हरिचरित्र मानस तुम्ह गावा। सुनि मैं नाथ अमिति सुख पावा।।

  482. RCM 7.53.8Open verse →

    तुम्ह जो कही यह कथा सुहाई। कागभसुंडि गरुड़ प्रति गाई।।

    अर्थ · Hindi

    तुम्ह जो कही यह कथा सुहाई। कागभसुंडि गरुड़ प्रति गाई।।

  483. RCM 7.54.1Open verse →

    नर सहस्त्र महँ सुनहु पुरारी। कोउ एक होइ धर्म ब्रतधारी।।

    अर्थ · Hindi

    नर सहस्त्र महँ सुनहु पुरारी। कोउ एक होइ धर्म ब्रतधारी।।

  484. RCM 7.54.2Open verse →

    धर्मसील कोटिक महँ कोई। बिषय बिमुख बिराग रत होई।।

    अर्थ · Hindi

    धर्मसील कोटिक महँ कोई। बिषय बिमुख बिराग रत होई।।

  485. RCM 7.54.3Open verse →

    कोटि बिरक्त मध्य श्रुति कहई। सम्यक ग्यान सकृत कोउ लहई।।

    अर्थ · Hindi

    कोटि बिरक्त मध्य श्रुति कहई। सम्यक ग्यान सकृत कोउ लहई।।

  486. RCM 7.54.4Open verse →

    ग्यानवंत कोटिक महँ कोऊ। जीवनमुक्त सकृत जग सोऊ।।

    अर्थ · Hindi

    ग्यानवंत कोटिक महँ कोऊ। जीवनमुक्त सकृत जग सोऊ।।

  487. RCM 7.54.5Open verse →

    तिन्ह सहस्त्र महुँ सब सुख खानी। दुर्लभ ब्रह्मलीन बिग्यानी।।

    अर्थ · Hindi

    तिन्ह सहस्त्र महुँ सब सुख खानी। दुर्लभ ब्रह्मलीन बिग्यानी।।

  488. RCM 7.54.6Open verse →

    धर्मसील बिरक्त अरु ग्यानी। जीवनमुक्त ब्रह्मपर प्रानी।।

    अर्थ · Hindi

    धर्मसील बिरक्त अरु ग्यानी। जीवनमुक्त ब्रह्मपर प्रानी।।

  489. RCM 7.54.7Open verse →

    सब ते सो दुर्लभ सुरराया। राम भगति रत गत मद माया।।

    अर्थ · Hindi

    सब ते सो दुर्लभ सुरराया। राम भगति रत गत मद माया।।

  490. RCM 7.54.8Open verse →

    सो हरिभगति काग किमि पाई। बिस्वनाथ मोहि कहहु बुझाई।।

    अर्थ · Hindi

    सो हरिभगति काग किमि पाई। बिस्वनाथ मोहि कहहु बुझाई।।

  491. RCM 7.55.1Open verse →

    यह प्रभु चरित पवित्र सुहावा। कहहु कृपाल काग कहँ पावा।।

    अर्थ · Hindi

    यह प्रभु चरित पवित्र सुहावा। कहहु कृपाल काग कहँ पावा।।

  492. RCM 7.55.2Open verse →

    तुम्ह केहि भाँति सुना मदनारी। कहहु मोहि अति कौतुक भारी।।

    अर्थ · Hindi

    तुम्ह केहि भाँति सुना मदनारी। कहहु मोहि अति कौतुक भारी।।

  493. RCM 7.55.3Open verse →

    गरुड़ महाग्यानी गुन रासी। हरि सेवक अति निकट निवासी।।

    अर्थ · Hindi

    गरुड़ महाग्यानी गुन रासी। हरि सेवक अति निकट निवासी।।

  494. RCM 7.55.4Open verse →

    तेहिं केहि हेतु काग सन जाई। सुनी कथा मुनि निकर बिहाई।।

    अर्थ · Hindi

    तेहिं केहि हेतु काग सन जाई। सुनी कथा मुनि निकर बिहाई।।

  495. RCM 7.55.5Open verse →

    कहहु कवन बिधि भा संबादा। दोउ हरिभगत काग उरगादा।।

    अर्थ · Hindi

    कहहु कवन बिधि भा संबादा। दोउ हरिभगत काग उरगादा।।

  496. RCM 7.55.6Open verse →

    गौरि गिरा सुनि सरल सुहाई। बोले सिव सादर सुख पाई।।

    अर्थ · Hindi

    गौरि गिरा सुनि सरल सुहाई। बोले सिव सादर सुख पाई।।

  497. RCM 7.55.7Open verse →

    धन्य सती पावन मति तोरी। रघुपति चरन प्रीति नहिं थोरी।।

    अर्थ · Hindi

    धन्य सती पावन मति तोरी। रघुपति चरन प्रीति नहिं थोरी।।

  498. RCM 7.55.8Open verse →

    सुनहु परम पुनीत इतिहासा। जो सुनि सकल लोक भ्रम नासा।।

    अर्थ · Hindi

    सुनहु परम पुनीत इतिहासा। जो सुनि सकल लोक भ्रम नासा।।

  499. RCM 7.55.9Open verse →

    उपजइ राम चरन बिस्वासा। भव निधि तर नर बिनहिं प्रयासा।।

    अर्थ · Hindi

    उपजइ राम चरन बिस्वासा। भव निधि तर नर बिनहिं प्रयासा।।

  500. RCM 7.56.1Open verse →

    मैं जिमि कथा सुनी भव मोचनि। सो प्रसंग सुनु सुमुखि सुलोचनि।।

    अर्थ · Hindi

    मैं जिमि कथा सुनी भव मोचनि। सो प्रसंग सुनु सुमुखि सुलोचनि।।

  501. RCM 7.56.2Open verse →

    प्रथम दच्छ गृह तव अवतारा। सती नाम तब रहा तुम्हारा।।

    अर्थ · Hindi

    प्रथम दच्छ गृह तव अवतारा। सती नाम तब रहा तुम्हारा।।

  502. RCM 7.56.3Open verse →

    दच्छ जग्य तब भा अपमाना। तुम्ह अति क्रोध तजे तब प्राना।।

    अर्थ · Hindi

    दच्छ जग्य तब भा अपमाना। तुम्ह अति क्रोध तजे तब प्राना।।

  503. RCM 7.56.4Open verse →

    मम अनुचरन्ह कीन्ह मख भंगा। जानहु तुम्ह सो सकल प्रसंगा।।

    अर्थ · Hindi

    मम अनुचरन्ह कीन्ह मख भंगा। जानहु तुम्ह सो सकल प्रसंगा।।

  504. RCM 7.56.5Open verse →

    तब अति सोच भयउ मन मोरें। दुखी भयउँ बियोग प्रिय तोरें।।

    अर्थ · Hindi

    तब अति सोच भयउ मन मोरें। दुखी भयउँ बियोग प्रिय तोरें।।

  505. RCM 7.56.6Open verse →

    सुंदर बन गिरि सरित तड़ागा। कौतुक देखत फिरउँ बेरागा।।

    अर्थ · Hindi

    सुंदर बन गिरि सरित तड़ागा। कौतुक देखत फिरउँ बेरागा।।

  506. RCM 7.56.7Open verse →

    गिरि सुमेर उत्तर दिसि दूरी। नील सैल एक सुन्दर भूरी।।

    अर्थ · Hindi

    गिरि सुमेर उत्तर दिसि दूरी। नील सैल एक सुन्दर भूरी।।

  507. RCM 7.56.8Open verse →

    तासु कनकमय सिखर सुहाए। चारि चारु मोरे मन भाए।।

    अर्थ · Hindi

    तासु कनकमय सिखर सुहाए। चारि चारु मोरे मन भाए।।

  508. RCM 7.56.9Open verse →

    तिन्ह पर एक एक बिटप बिसाला। बट पीपर पाकरी रसाला।।

    अर्थ · Hindi

    तिन्ह पर एक एक बिटप बिसाला। बट पीपर पाकरी रसाला।।

  509. RCM 7.56.10Open verse →

    सैलोपरि सर सुंदर सोहा। मनि सोपान देखि मन मोहा।।

    अर्थ · Hindi

    सैलोपरि सर सुंदर सोहा। मनि सोपान देखि मन मोहा।।

  510. RCM 7.57.1Open verse →

    तेहिं गिरि रुचिर बसइ खग सोई। तासु नास कल्पांत न होई।।

    अर्थ · Hindi

    तेहिं गिरि रुचिर बसइ खग सोई। तासु नास कल्पांत न होई।।

  511. RCM 7.57.2Open verse →

    माया कृत गुन दोष अनेका। मोह मनोज आदि अबिबेका।।

    अर्थ · Hindi

    माया कृत गुन दोष अनेका। मोह मनोज आदि अबिबेका।।

  512. RCM 7.57.3Open verse →

    रहे ब्यापि समस्त जग माहीं। तेहि गिरि निकट कबहुँ नहिं जाहीं।।

    अर्थ · Hindi

    रहे ब्यापि समस्त जग माहीं। तेहि गिरि निकट कबहुँ नहिं जाहीं।।

  513. RCM 7.57.4Open verse →

    तहँ बसि हरिहि भजइ जिमि कागा। सो सुनु उमा सहित अनुरागा।।

    अर्थ · Hindi

    तहँ बसि हरिहि भजइ जिमि कागा। सो सुनु उमा सहित अनुरागा।।

  514. RCM 7.57.5Open verse →

    पीपर तरु तर ध्यान सो धरई। जाप जग्य पाकरि तर करई।।

    अर्थ · Hindi

    पीपर तरु तर ध्यान सो धरई। जाप जग्य पाकरि तर करई।।

  515. RCM 7.57.6Open verse →

    आँब छाहँ कर मानस पूजा। तजि हरि भजनु काजु नहिं दूजा।।

    अर्थ · Hindi

    आँब छाहँ कर मानस पूजा। तजि हरि भजनु काजु नहिं दूजा।।

  516. RCM 7.57.7Open verse →

    बर तर कह हरि कथा प्रसंगा। आवहिं सुनहिं अनेक बिहंगा।।

    अर्थ · Hindi

    बर तर कह हरि कथा प्रसंगा। आवहिं सुनहिं अनेक बिहंगा।।

  517. RCM 7.57.8Open verse →

    राम चरित बिचीत्र बिधि नाना। प्रेम सहित कर सादर गाना।।

    अर्थ · Hindi

    राम चरित बिचीत्र बिधि नाना। प्रेम सहित कर सादर गाना।।

  518. RCM 7.57.9Open verse →

    सुनहिं सकल मति बिमल मराला। बसहिं निरंतर जे तेहिं ताला।।

    अर्थ · Hindi

    सुनहिं सकल मति बिमल मराला। बसहिं निरंतर जे तेहिं ताला।।

  519. RCM 7.57.10Open verse →

    जब मैं जाइ सो कौतुक देखा। उर उपजा आनंद बिसेषा।।

    अर्थ · Hindi

    जब मैं जाइ सो कौतुक देखा। उर उपजा आनंद बिसेषा।।

  520. RCM 7.58.1Open verse →

    गिरिजा कहेउँ सो सब इतिहासा। मैं जेहि समय गयउँ खग पासा।।

    अर्थ · Hindi

    गिरिजा कहेउँ सो सब इतिहासा। मैं जेहि समय गयउँ खग पासा।।

  521. RCM 7.58.2Open verse →

    अब सो कथा सुनहु जेही हेतू। गयउ काग पहिं खग कुल केतू।।

    अर्थ · Hindi

    अब सो कथा सुनहु जेही हेतू। गयउ काग पहिं खग कुल केतू।।

  522. RCM 7.58.3Open verse →

    जब रघुनाथ कीन्हि रन क्रीड़ा। समुझत चरित होति मोहि ब्रीड़ा।।

    अर्थ · Hindi

    जब रघुनाथ कीन्हि रन क्रीड़ा। समुझत चरित होति मोहि ब्रीड़ा।।

  523. RCM 7.58.4Open verse →

    इंद्रजीत कर आपु बँधायो। तब नारद मुनि गरुड़ पठायो।।

    अर्थ · Hindi

    इंद्रजीत कर आपु बँधायो। तब नारद मुनि गरुड़ पठायो।।

  524. RCM 7.58.5Open verse →

    बंधन काटि गयो उरगादा। उपजा हृदयँ प्रचंड बिषादा।।

    अर्थ · Hindi

    बंधन काटि गयो उरगादा। उपजा हृदयँ प्रचंड बिषादा।।

  525. RCM 7.58.6Open verse →

    प्रभु बंधन समुझत बहु भाँती। करत बिचार उरग आराती।।

    अर्थ · Hindi

    प्रभु बंधन समुझत बहु भाँती। करत बिचार उरग आराती।।

  526. RCM 7.58.7Open verse →

    ब्यापक ब्रह्म बिरज बागीसा। माया मोह पार परमीसा।।

    अर्थ · Hindi

    ब्यापक ब्रह्म बिरज बागीसा। माया मोह पार परमीसा।।

  527. RCM 7.58.8Open verse →

    सो अवतार सुनेउँ जग माहीं। देखेउँ सो प्रभाव कछु नाहीं।।

    अर्थ · Hindi

    सो अवतार सुनेउँ जग माहीं। देखेउँ सो प्रभाव कछु नाहीं।।

  528. RCM 7.59.1Open verse →

    नाना भाँति मनहि समुझावा। प्रगट न ग्यान हृदयँ भ्रम छावा।।

    अर्थ · Hindi

    नाना भाँति मनहि समुझावा। प्रगट न ग्यान हृदयँ भ्रम छावा।।

  529. RCM 7.59.2Open verse →

    खेद खिन्न मन तर्क बढ़ाई। भयउ मोहबस तुम्हरिहिं नाई।।

    अर्थ · Hindi

    खेद खिन्न मन तर्क बढ़ाई। भयउ मोहबस तुम्हरिहिं नाई।।

  530. RCM 7.59.3Open verse →

    ब्याकुल गयउ देवरिषि पाहीं। कहेसि जो संसय निज मन माहीं।।

    अर्थ · Hindi

    ब्याकुल गयउ देवरिषि पाहीं। कहेसि जो संसय निज मन माहीं।।

  531. RCM 7.59.4Open verse →

    सुनि नारदहि लागि अति दाया। सुनु खग प्रबल राम कै माया।।

    अर्थ · Hindi

    सुनि नारदहि लागि अति दाया। सुनु खग प्रबल राम कै माया।।

  532. RCM 7.59.5Open verse →

    जो ग्यानिन्ह कर चित अपहरई। बरिआई बिमोह मन करई।।

    अर्थ · Hindi

    जो ग्यानिन्ह कर चित अपहरई। बरिआई बिमोह मन करई।।

  533. RCM 7.59.6Open verse →

    जेहिं बहु बार नचावा मोही। सोइ ब्यापी बिहंगपति तोही।।

    अर्थ · Hindi

    जेहिं बहु बार नचावा मोही। सोइ ब्यापी बिहंगपति तोही।।

  534. RCM 7.59.7Open verse →

    महामोह उपजा उर तोरें। मिटिहि न बेगि कहें खग मोरें।।

    अर्थ · Hindi

    महामोह उपजा उर तोरें। मिटिहि न बेगि कहें खग मोरें।।

  535. RCM 7.59.8Open verse →

    चतुरानन पहिं जाहु खगेसा। सोइ करेहु जेहि होइ निदेसा।।

    अर्थ · Hindi

    चतुरानन पहिं जाहु खगेसा। सोइ करेहु जेहि होइ निदेसा।।

  536. RCM 7.60.1Open verse →

    तब खगपति बिरंचि पहिं गयऊ। निज संदेह सुनावत भयऊ।।

    अर्थ · Hindi

    तब खगपति बिरंचि पहिं गयऊ। निज संदेह सुनावत भयऊ।।

  537. RCM 7.60.2Open verse →

    सुनि बिरंचि रामहि सिरु नावा। समुझि प्रताप प्रेम अति छावा।।

    अर्थ · Hindi

    सुनि बिरंचि रामहि सिरु नावा। समुझि प्रताप प्रेम अति छावा।।

  538. RCM 7.60.3Open verse →

    मन महुँ करइ बिचार बिधाता। माया बस कबि कोबिद ग्याता।।

    अर्थ · Hindi

    मन महुँ करइ बिचार बिधाता। माया बस कबि कोबिद ग्याता।।

  539. RCM 7.60.4Open verse →

    हरि माया कर अमिति प्रभावा। बिपुल बार जेहिं मोहि नचावा।।

    अर्थ · Hindi

    हरि माया कर अमिति प्रभावा। बिपुल बार जेहिं मोहि नचावा।।

  540. RCM 7.60.5Open verse →

    अग जगमय जग मम उपराजा। नहिं आचरज मोह खगराजा।।

    अर्थ · Hindi

    अग जगमय जग मम उपराजा। नहिं आचरज मोह खगराजा।।

  541. RCM 7.60.6Open verse →

    तब बोले बिधि गिरा सुहाई। जान महेस राम प्रभुताई।।

    अर्थ · Hindi

    तब बोले बिधि गिरा सुहाई। जान महेस राम प्रभुताई।।

  542. RCM 7.60.7Open verse →

    बैनतेय संकर पहिं जाहू। तात अनत पूछहु जनि काहू।।

    अर्थ · Hindi

    बैनतेय संकर पहिं जाहू। तात अनत पूछहु जनि काहू।।

  543. RCM 7.60.8Open verse →

    तहँ होइहि तव संसय हानी। चलेउ बिहंग सुनत बिधि बानी।।

    अर्थ · Hindi

    तहँ होइहि तव संसय हानी। चलेउ बिहंग सुनत बिधि बानी।।

  544. RCM 7.61.1Open verse →

    तेहिं मम पद सादर सिरु नावा। पुनि आपन संदेह सुनावा।।

    अर्थ · Hindi

    तेहिं मम पद सादर सिरु नावा। पुनि आपन संदेह सुनावा।।

  545. RCM 7.61.2Open verse →

    सुनि ता करि बिनती मृदु बानी। परेम सहित मैं कहेउँ भवानी।।

    अर्थ · Hindi

    सुनि ता करि बिनती मृदु बानी। परेम सहित मैं कहेउँ भवानी।।

  546. RCM 7.61.3Open verse →

    मिलेहु गरुड़ मारग महँ मोही। कवन भाँति समुझावौं तोही।।

    अर्थ · Hindi

    मिलेहु गरुड़ मारग महँ मोही। कवन भाँति समुझावौं तोही।।

  547. RCM 7.61.4Open verse →

    तबहि होइ सब संसय भंगा। जब बहु काल करिअ सतसंगा।।

    अर्थ · Hindi

    तबहि होइ सब संसय भंगा। जब बहु काल करिअ सतसंगा।।

  548. RCM 7.61.5Open verse →

    सुनिअ तहाँ हरि कथा सुहाई। नाना भाँति मुनिन्ह जो गाई।।

    अर्थ · Hindi

    सुनिअ तहाँ हरि कथा सुहाई। नाना भाँति मुनिन्ह जो गाई।।

  549. RCM 7.61.6Open verse →

    जेहि महुँ आदि मध्य अवसाना। प्रभु प्रतिपाद्य राम भगवाना।।

    अर्थ · Hindi

    जेहि महुँ आदि मध्य अवसाना। प्रभु प्रतिपाद्य राम भगवाना।।

  550. RCM 7.61.7Open verse →

    नित हरि कथा होत जहँ भाई। पठवउँ तहाँ सुनहि तुम्ह जाई।।

    अर्थ · Hindi

    नित हरि कथा होत जहँ भाई। पठवउँ तहाँ सुनहि तुम्ह जाई।।

  551. RCM 7.61.8Open verse →

    जाइहि सुनत सकल संदेहा। राम चरन होइहि अति नेहा।।

    अर्थ · Hindi

    जाइहि सुनत सकल संदेहा। राम चरन होइहि अति नेहा।।

  552. RCM 7.62.1Open verse →

    मिलहिं न रघुपति बिनु अनुरागा। किएँ जोग तप ग्यान बिरागा।।

    अर्थ · Hindi

    मिलहिं न रघुपति बिनु अनुरागा। किएँ जोग तप ग्यान बिरागा।।

  553. RCM 7.62.2Open verse →

    उत्तर दिसि सुंदर गिरि नीला। तहँ रह काकभुसुंडि सुसीला।।

    अर्थ · Hindi

    उत्तर दिसि सुंदर गिरि नीला। तहँ रह काकभुसुंडि सुसीला।।

  554. RCM 7.62.3Open verse →

    राम भगति पथ परम प्रबीना। ग्यानी गुन गृह बहु कालीना।।

    अर्थ · Hindi

    राम भगति पथ परम प्रबीना। ग्यानी गुन गृह बहु कालीना।।

  555. RCM 7.62.4Open verse →

    राम कथा सो कहइ निरंतर। सादर सुनहिं बिबिध बिहंगबर।।

    अर्थ · Hindi

    राम कथा सो कहइ निरंतर। सादर सुनहिं बिबिध बिहंगबर।।

  556. RCM 7.62.5Open verse →

    जाइ सुनहु तहँ हरि गुन भूरी। होइहि मोह जनित दुख दूरी।।

    अर्थ · Hindi

    जाइ सुनहु तहँ हरि गुन भूरी। होइहि मोह जनित दुख दूरी।।

  557. RCM 7.62.6Open verse →

    मैं जब तेहि सब कहा बुझाई। चलेउ हरषि मम पद सिरु नाई।।

    अर्थ · Hindi

    मैं जब तेहि सब कहा बुझाई। चलेउ हरषि मम पद सिरु नाई।।

  558. RCM 7.62.7Open verse →

    ताते उमा न मैं समुझावा। रघुपति कृपाँ मरमु मैं पावा।।

    अर्थ · Hindi

    ताते उमा न मैं समुझावा। रघुपति कृपाँ मरमु मैं पावा।।

  559. RCM 7.62.8Open verse →

    होइहि कीन्ह कबहुँ अभिमाना। सो खौवै चह कृपानिधाना।।

    अर्थ · Hindi

    होइहि कीन्ह कबहुँ अभिमाना। सो खौवै चह कृपानिधाना।।

  560. RCM 7.62.9Open verse →

    कछु तेहि ते पुनि मैं नहिं राखा। समुझइ खग खगही कै भाषा।।

    अर्थ · Hindi

    कछु तेहि ते पुनि मैं नहिं राखा। समुझइ खग खगही कै भाषा।।

  561. RCM 7.62.10Open verse →

    प्रभु माया बलवंत भवानी। जाहि न मोह कवन अस ग्यानी।।

    अर्थ · Hindi

    प्रभु माया बलवंत भवानी। जाहि न मोह कवन अस ग्यानी।।

  562. RCM 7.63.1Open verse →

    गयउ गरुड़ जहँ बसइ भुसुंडा। मति अकुंठ हरि भगति अखंडा।।

    अर्थ · Hindi

    गयउ गरुड़ जहँ बसइ भुसुंडा। मति अकुंठ हरि भगति अखंडा।।

  563. RCM 7.63.2Open verse →

    देखि सैल प्रसन्न मन भयऊ। माया मोह सोच सब गयऊ।।

    अर्थ · Hindi

    देखि सैल प्रसन्न मन भयऊ। माया मोह सोच सब गयऊ।।

  564. RCM 7.63.3Open verse →

    करि तड़ाग मज्जन जलपाना। बट तर गयउ हृदयँ हरषाना।।

    अर्थ · Hindi

    करि तड़ाग मज्जन जलपाना। बट तर गयउ हृदयँ हरषाना।।

  565. RCM 7.63.4Open verse →

    बृद्ध बृद्ध बिहंग तहँ आए। सुनै राम के चरित सुहाए।।

    अर्थ · Hindi

    बृद्ध बृद्ध बिहंग तहँ आए। सुनै राम के चरित सुहाए।।

  566. RCM 7.63.5Open verse →

    कथा अरंभ करै सोइ चाहा। तेही समय गयउ खगनाहा।।

    अर्थ · Hindi

    कथा अरंभ करै सोइ चाहा। तेही समय गयउ खगनाहा।।

  567. RCM 7.63.6Open verse →

    आवत देखि सकल खगराजा। हरषेउ बायस सहित समाजा।।

    अर्थ · Hindi

    आवत देखि सकल खगराजा। हरषेउ बायस सहित समाजा।।

  568. RCM 7.63.7Open verse →

    अति आदर खगपति कर कीन्हा। स्वागत पूछि सुआसन दीन्हा।।

    अर्थ · Hindi

    अति आदर खगपति कर कीन्हा। स्वागत पूछि सुआसन दीन्हा।।

  569. RCM 7.63.8Open verse →

    करि पूजा समेत अनुरागा। मधुर बचन तब बोलेउ कागा।।

    अर्थ · Hindi

    करि पूजा समेत अनुरागा। मधुर बचन तब बोलेउ कागा।।

  570. RCM 7.64.1Open verse →

    सुनहु तात जेहि कारन आयउँ। सो सब भयउ दरस तव पायउँ।।

    अर्थ · Hindi

    सुनहु तात जेहि कारन आयउँ। सो सब भयउ दरस तव पायउँ।।

  571. RCM 7.64.2Open verse →

    देखि परम पावन तव आश्रम। गयउ मोह संसय नाना भ्रम।।

    अर्थ · Hindi

    देखि परम पावन तव आश्रम। गयउ मोह संसय नाना भ्रम।।

  572. RCM 7.64.3Open verse →

    अब श्रीराम कथा अति पावनि। सदा सुखद दुख पुंज नसावनि।।

    अर्थ · Hindi

    अब श्रीराम कथा अति पावनि। सदा सुखद दुख पुंज नसावनि।।

  573. RCM 7.64.4Open verse →

    सादर तात सुनावहु मोही। बार बार बिनवउँ प्रभु तोही।।

    अर्थ · Hindi

    सादर तात सुनावहु मोही। बार बार बिनवउँ प्रभु तोही।।

  574. RCM 7.64.5Open verse →

    सुनत गरुड़ कै गिरा बिनीता। सरल सुप्रेम सुखद सुपुनीता।।

    अर्थ · Hindi

    सुनत गरुड़ कै गिरा बिनीता। सरल सुप्रेम सुखद सुपुनीता।।

  575. RCM 7.64.6Open verse →

    भयउ तासु मन परम उछाहा। लाग कहै रघुपति गुन गाहा।।

    अर्थ · Hindi

    भयउ तासु मन परम उछाहा। लाग कहै रघुपति गुन गाहा।।

  576. RCM 7.64.7Open verse →

    प्रथमहिं अति अनुराग भवानी। रामचरित सर कहेसि बखानी।।

    अर्थ · Hindi

    प्रथमहिं अति अनुराग भवानी। रामचरित सर कहेसि बखानी।।

  577. RCM 7.64.8Open verse →

    पुनि नारद कर मोह अपारा। कहेसि बहुरि रावन अवतारा।।

    अर्थ · Hindi

    पुनि नारद कर मोह अपारा। कहेसि बहुरि रावन अवतारा।।

  578. RCM 7.64.9Open verse →

    प्रभु अवतार कथा पुनि गाई। तब सिसु चरित कहेसि मन लाई।।

    अर्थ · Hindi

    प्रभु अवतार कथा पुनि गाई। तब सिसु चरित कहेसि मन लाई।।

  579. RCM 7.65.1Open verse →

    बहुरि राम अभिषेक प्रसंगा। पुनि नृप बचन राज रस भंगा।।

    अर्थ · Hindi

    बहुरि राम अभिषेक प्रसंगा। पुनि नृप बचन राज रस भंगा।।

  580. RCM 7.65.2Open verse →

    पुरबासिन्ह कर बिरह बिषादा। कहेसि राम लछिमन संबादा।।

    अर्थ · Hindi

    पुरबासिन्ह कर बिरह बिषादा। कहेसि राम लछिमन संबादा।।

  581. RCM 7.65.3Open verse →

    बिपिन गवन केवट अनुरागा। सुरसरि उतरि निवास प्रयागा।।

    अर्थ · Hindi

    बिपिन गवन केवट अनुरागा। सुरसरि उतरि निवास प्रयागा।।

  582. RCM 7.65.4Open verse →

    बालमीक प्रभु मिलन बखाना। चित्रकूट जिमि बसे भगवाना।।

    अर्थ · Hindi

    बालमीक प्रभु मिलन बखाना। चित्रकूट जिमि बसे भगवाना।।

  583. RCM 7.65.5Open verse →

    सचिवागवन नगर नृप मरना। भरतागवन प्रेम बहु बरना।।

    अर्थ · Hindi

    सचिवागवन नगर नृप मरना। भरतागवन प्रेम बहु बरना।।

  584. RCM 7.65.6Open verse →

    करि नृप क्रिया संग पुरबासी। भरत गए जहँ प्रभु सुख रासी।।

    अर्थ · Hindi

    करि नृप क्रिया संग पुरबासी। भरत गए जहँ प्रभु सुख रासी।।

  585. RCM 7.65.7Open verse →

    पुनि रघुपति बहु बिधि समुझाए। लै पादुका अवधपुर आए।।

    अर्थ · Hindi

    पुनि रघुपति बहु बिधि समुझाए। लै पादुका अवधपुर आए।।

  586. RCM 7.65.8Open verse →

    भरत रहनि सुरपति सुत करनी। प्रभु अरु अत्रि भेंट पुनि बरनी।।

    अर्थ · Hindi

    भरत रहनि सुरपति सुत करनी। प्रभु अरु अत्रि भेंट पुनि बरनी।।

  587. RCM 7.66.1Open verse →

    कहि दंडक बन पावनताई। गीध मइत्री पुनि तेहिं गाई।।

    अर्थ · Hindi

    कहि दंडक बन पावनताई। गीध मइत्री पुनि तेहिं गाई।।

  588. RCM 7.66.2Open verse →

    पुनि प्रभु पंचवटीं कृत बासा। भंजी सकल मुनिन्ह की त्रासा।।

    अर्थ · Hindi

    पुनि प्रभु पंचवटीं कृत बासा। भंजी सकल मुनिन्ह की त्रासा।।

  589. RCM 7.66.3Open verse →

    पुनि लछिमन उपदेस अनूपा। सूपनखा जिमि कीन्हि कुरूपा।।

    अर्थ · Hindi

    पुनि लछिमन उपदेस अनूपा। सूपनखा जिमि कीन्हि कुरूपा।।

  590. RCM 7.66.4Open verse →

    खर दूषन बध बहुरि बखाना। जिमि सब मरमु दसानन जाना।।

    अर्थ · Hindi

    खर दूषन बध बहुरि बखाना। जिमि सब मरमु दसानन जाना।।

  591. RCM 7.66.5Open verse →

    दसकंधर मारीच बतकहीं। जेहि बिधि भई सो सब तेहिं कही।।

    अर्थ · Hindi

    दसकंधर मारीच बतकहीं। जेहि बिधि भई सो सब तेहिं कही।।

  592. RCM 7.66.6Open verse →

    पुनि माया सीता कर हरना। श्रीरघुबीर बिरह कछु बरना।।

    अर्थ · Hindi

    पुनि माया सीता कर हरना। श्रीरघुबीर बिरह कछु बरना।।

  593. RCM 7.66.7Open verse →

    पुनि प्रभु गीध क्रिया जिमि कीन्ही। बधि कबंध सबरिहि गति दीन्ही।।

    अर्थ · Hindi

    पुनि प्रभु गीध क्रिया जिमि कीन्ही। बधि कबंध सबरिहि गति दीन्ही।।

  594. RCM 7.66.8Open verse →

    बहुरि बिरह बरनत रघुबीरा। जेहि बिधि गए सरोबर तीरा।।

    अर्थ · Hindi

    बहुरि बिरह बरनत रघुबीरा। जेहि बिधि गए सरोबर तीरा।।

  595. RCM 7.67.1Open verse →

    जेहि बिधि कपिपति कीस पठाए। सीता खोज सकल दिसि धाए।।

    अर्थ · Hindi

    जेहि बिधि कपिपति कीस पठाए। सीता खोज सकल दिसि धाए।।

  596. RCM 7.67.2Open verse →

    बिबर प्रबेस कीन्ह जेहि भाँती। कपिन्ह बहोरि मिला संपाती।।

    अर्थ · Hindi

    बिबर प्रबेस कीन्ह जेहि भाँती। कपिन्ह बहोरि मिला संपाती।।

  597. RCM 7.67.3Open verse →

    सुनि सब कथा समीरकुमारा। नाघत भयउ पयोधि अपारा।।

    अर्थ · Hindi

    सुनि सब कथा समीरकुमारा। नाघत भयउ पयोधि अपारा।।

  598. RCM 7.67.4Open verse →

    लंकाँ कपि प्रबेस जिमि कीन्हा। पुनि सीतहि धीरजु जिमि दीन्हा।।

    अर्थ · Hindi

    लंकाँ कपि प्रबेस जिमि कीन्हा। पुनि सीतहि धीरजु जिमि दीन्हा।।

  599. RCM 7.67.5Open verse →

    बन उजारि रावनहि प्रबोधी। पुर दहि नाघेउ बहुरि पयोधी।।

    अर्थ · Hindi

    बन उजारि रावनहि प्रबोधी। पुर दहि नाघेउ बहुरि पयोधी।।

  600. RCM 7.67.6Open verse →

    आए कपि सब जहँ रघुराई। बैदेही कि कुसल सुनाई।।

    अर्थ · Hindi

    आए कपि सब जहँ रघुराई। बैदेही कि कुसल सुनाई।।

  601. RCM 7.67.7Open verse →

    सेन समेति जथा रघुबीरा। उतरे जाइ बारिनिधि तीरा।।

    अर्थ · Hindi

    सेन समेति जथा रघुबीरा। उतरे जाइ बारिनिधि तीरा।।

  602. RCM 7.67.8Open verse →

    मिला बिभीषन जेहि बिधि आई। सागर निग्रह कथा सुनाई।।

    अर्थ · Hindi

    मिला बिभीषन जेहि बिधि आई। सागर निग्रह कथा सुनाई।।

  603. RCM 7.68.1Open verse →

    निसिचर निकर मरन बिधि नाना। रघुपति रावन समर बखाना।।

    अर्थ · Hindi

    निसिचर निकर मरन बिधि नाना। रघुपति रावन समर बखाना।।

  604. RCM 7.68.2Open verse →

    रावन बध मंदोदरि सोका। राज बिभीषण देव असोका।।

    अर्थ · Hindi

    रावन बध मंदोदरि सोका। राज बिभीषण देव असोका।।

  605. RCM 7.68.3Open verse →

    सीता रघुपति मिलन बहोरी। सुरन्ह कीन्ह अस्तुति कर जोरी।।

    अर्थ · Hindi

    सीता रघुपति मिलन बहोरी। सुरन्ह कीन्ह अस्तुति कर जोरी।।

  606. RCM 7.68.4Open verse →

    पुनि पुष्पक चढ़ि कपिन्ह समेता। अवध चले प्रभु कृपा निकेता।।

    अर्थ · Hindi

    पुनि पुष्पक चढ़ि कपिन्ह समेता। अवध चले प्रभु कृपा निकेता।।

  607. RCM 7.68.5Open verse →

    जेहि बिधि राम नगर निज आए। बायस बिसद चरित सब गाए।।

    अर्थ · Hindi

    जेहि बिधि राम नगर निज आए। बायस बिसद चरित सब गाए।।

  608. RCM 7.68.6Open verse →

    कहेसि बहोरि राम अभिषैका। पुर बरनत नृपनीति अनेका।।

    अर्थ · Hindi

    कहेसि बहोरि राम अभिषैका। पुर बरनत नृपनीति अनेका।।

  609. RCM 7.68.7Open verse →

    कथा समस्त भुसुंड बखानी। जो मैं तुम्ह सन कही भवानी।।

    अर्थ · Hindi

    कथा समस्त भुसुंड बखानी। जो मैं तुम्ह सन कही भवानी।।

  610. RCM 7.68.8Open verse →

    सुनि सब राम कथा खगनाहा। कहत बचन मन परम उछाहा।।

    अर्थ · Hindi

    सुनि सब राम कथा खगनाहा। कहत बचन मन परम उछाहा।।

  611. RCM 7.69.1Open verse →

    देखि चरित अति नर अनुसारी। भयउ हृदयँ मम संसय भारी।।

    अर्थ · Hindi

    देखि चरित अति नर अनुसारी। भयउ हृदयँ मम संसय भारी।।

  612. RCM 7.69.2Open verse →

    सोइ भ्रम अब हित करि मैं माना। कीन्ह अनुग्रह कृपानिधाना।।

    अर्थ · Hindi

    सोइ भ्रम अब हित करि मैं माना। कीन्ह अनुग्रह कृपानिधाना।।

  613. RCM 7.69.3Open verse →

    जो अति आतप ब्याकुल होई। तरु छाया सुख जानइ सोई।।

    अर्थ · Hindi

    जो अति आतप ब्याकुल होई। तरु छाया सुख जानइ सोई।।

  614. RCM 7.69.4Open verse →

    जौं नहिं होत मोह अति मोही। मिलतेउँ तात कवन बिधि तोही।।

    अर्थ · Hindi

    जौं नहिं होत मोह अति मोही। मिलतेउँ तात कवन बिधि तोही।।

  615. RCM 7.69.5Open verse →

    सुनतेउँ किमि हरि कथा सुहाई। अति बिचित्र बहु बिधि तुम्ह गाई।।

    अर्थ · Hindi

    सुनतेउँ किमि हरि कथा सुहाई। अति बिचित्र बहु बिधि तुम्ह गाई।।

  616. RCM 7.69.6Open verse →

    निगमागम पुरान मत एहा। कहहिं सिद्ध मुनि नहिं संदेहा।।

    अर्थ · Hindi

    निगमागम पुरान मत एहा। कहहिं सिद्ध मुनि नहिं संदेहा।।

  617. RCM 7.69.7Open verse →

    संत बिसुद्ध मिलहिं परि तेही। चितवहिं राम कृपा करि जेही।।

    अर्थ · Hindi

    संत बिसुद्ध मिलहिं परि तेही। चितवहिं राम कृपा करि जेही।।

  618. RCM 7.69.8Open verse →

    राम कृपाँ तव दरसन भयऊ। तव प्रसाद सब संसय गयऊ।।

    अर्थ · Hindi

    राम कृपाँ तव दरसन भयऊ। तव प्रसाद सब संसय गयऊ।।

  619. RCM 7.70.1Open verse →

    बोलेउ काकभसुंड बहोरी। नभग नाथ पर प्रीति न थोरी।।

    अर्थ · Hindi

    बोलेउ काकभसुंड बहोरी। नभग नाथ पर प्रीति न थोरी।।

  620. RCM 7.70.2Open verse →

    सब बिधि नाथ पूज्य तुम्ह मेरे। कृपापात्र रघुनायक केरे।।

    अर्थ · Hindi

    सब बिधि नाथ पूज्य तुम्ह मेरे। कृपापात्र रघुनायक केरे।।

  621. RCM 7.70.3Open verse →

    तुम्हहि न संसय मोह न माया। मो पर नाथ कीन्ह तुम्ह दाया।।

    अर्थ · Hindi

    तुम्हहि न संसय मोह न माया। मो पर नाथ कीन्ह तुम्ह दाया।।

  622. RCM 7.70.4Open verse →

    पठइ मोह मिस खगपति तोही। रघुपति दीन्हि बड़ाई मोही।।

    अर्थ · Hindi

    पठइ मोह मिस खगपति तोही। रघुपति दीन्हि बड़ाई मोही।।

  623. RCM 7.70.5Open verse →

    तुम्ह निज मोह कही खग साईं। सो नहिं कछु आचरज गोसाईं।।

    अर्थ · Hindi

    तुम्ह निज मोह कही खग साईं। सो नहिं कछु आचरज गोसाईं।।

  624. RCM 7.70.6Open verse →

    नारद भव बिरंचि सनकादी। जे मुनिनायक आतमबादी।।

    अर्थ · Hindi

    नारद भव बिरंचि सनकादी। जे मुनिनायक आतमबादी।।

  625. RCM 7.70.7Open verse →

    मोह न अंध कीन्ह केहि केही। को जग काम नचाव न जेही।।

    अर्थ · Hindi

    मोह न अंध कीन्ह केहि केही। को जग काम नचाव न जेही।।

  626. RCM 7.70.8Open verse →

    तृस्नाँ केहि न कीन्ह बौराहा। केहि कर हृदय क्रोध नहिं दाहा।।

    अर्थ · Hindi

    तृस्नाँ केहि न कीन्ह बौराहा। केहि कर हृदय क्रोध नहिं दाहा।।

  627. RCM 7.71.1Open verse →

    गुन कृत सन्यपात नहिं केही। कोउ न मान मद तजेउ निबेही।।

    अर्थ · Hindi

    गुन कृत सन्यपात नहिं केही। कोउ न मान मद तजेउ निबेही।।

  628. RCM 7.71.2Open verse →

    जोबन ज्वर केहि नहिं बलकावा। ममता केहि कर जस न नसावा।।

    अर्थ · Hindi

    जोबन ज्वर केहि नहिं बलकावा। ममता केहि कर जस न नसावा।।

  629. RCM 7.71.3Open verse →

    मच्छर काहि कलंक न लावा। काहि न सोक समीर डोलावा।।

    अर्थ · Hindi

    मच्छर काहि कलंक न लावा। काहि न सोक समीर डोलावा।।

  630. RCM 7.71.4Open verse →

    चिंता साँपिनि को नहिं खाया। को जग जाहि न ब्यापी माया।।

    अर्थ · Hindi

    चिंता साँपिनि को नहिं खाया। को जग जाहि न ब्यापी माया।।

  631. RCM 7.71.5Open verse →

    कीट मनोरथ दारु सरीरा। जेहि न लाग घुन को अस धीरा।।

    अर्थ · Hindi

    कीट मनोरथ दारु सरीरा। जेहि न लाग घुन को अस धीरा।।

  632. RCM 7.71.6Open verse →

    सुत बित लोक ईषना तीनी। केहि के मति इन्ह कृत न मलीनी।।

    अर्थ · Hindi

    सुत बित लोक ईषना तीनी। केहि के मति इन्ह कृत न मलीनी।।

  633. RCM 7.71.7Open verse →

    यह सब माया कर परिवारा। प्रबल अमिति को बरनै पारा।।

    अर्थ · Hindi

    यह सब माया कर परिवारा। प्रबल अमिति को बरनै पारा।।

  634. RCM 7.71.8Open verse →

    सिव चतुरानन जाहि डेराहीं। अपर जीव केहि लेखे माहीं।।

    अर्थ · Hindi

    सिव चतुरानन जाहि डेराहीं। अपर जीव केहि लेखे माहीं।।

  635. RCM 7.72.1Open verse →

    जो माया सब जगहि नचावा। जासु चरित लखि काहुँ न पावा।।

    अर्थ · Hindi

    जो माया सब जगहि नचावा। जासु चरित लखि काहुँ न पावा।।

  636. RCM 7.72.2Open verse →

    सोइ प्रभु भ्रू बिलास खगराजा। नाच नटी इव सहित समाजा।।

    अर्थ · Hindi

    सोइ प्रभु भ्रू बिलास खगराजा। नाच नटी इव सहित समाजा।।

  637. RCM 7.72.3Open verse →

    सोइ सच्चिदानंद घन रामा। अज बिग्यान रूपो बल धामा।।

    अर्थ · Hindi

    सोइ सच्चिदानंद घन रामा। अज बिग्यान रूपो बल धामा।।

  638. RCM 7.72.4Open verse →

    ब्यापक ब्याप्य अखंड अनंता। अखिल अमोघसक्ति भगवंता।।

    अर्थ · Hindi

    ब्यापक ब्याप्य अखंड अनंता। अखिल अमोघसक्ति भगवंता।।

  639. RCM 7.72.5Open verse →

    अगुन अदभ्र गिरा गोतीता। सबदरसी अनवद्य अजीता।।

    अर्थ · Hindi

    अगुन अदभ्र गिरा गोतीता। सबदरसी अनवद्य अजीता।।

  640. RCM 7.72.6Open verse →

    निर्मम निराकार निरमोहा। नित्य निरंजन सुख संदोहा।।

    अर्थ · Hindi

    निर्मम निराकार निरमोहा। नित्य निरंजन सुख संदोहा।।

  641. RCM 7.72.7Open verse →

    प्रकृति पार प्रभु सब उर बासी। ब्रह्म निरीह बिरज अबिनासी।।

    अर्थ · Hindi

    प्रकृति पार प्रभु सब उर बासी। ब्रह्म निरीह बिरज अबिनासी।।

  642. RCM 7.72.8Open verse →

    इहाँ मोह कर कारन नाहीं। रबि सन्मुख तम कबहुँ कि जाहीं।।

    अर्थ · Hindi

    इहाँ मोह कर कारन नाहीं। रबि सन्मुख तम कबहुँ कि जाहीं।।

  643. RCM 7.73.1Open verse →

    असि रघुपति लीला उरगारी। दनुज बिमोहनि जन सुखकारी।।

    अर्थ · Hindi

    असि रघुपति लीला उरगारी। दनुज बिमोहनि जन सुखकारी।।

  644. RCM 7.73.2Open verse →

    जे मति मलिन बिषयबस कामी। प्रभु मोह धरहिं इमि स्वामी।।

    अर्थ · Hindi

    जे मति मलिन बिषयबस कामी। प्रभु मोह धरहिं इमि स्वामी।।

  645. RCM 7.73.3Open verse →

    नयन दोष जा कहँ जब होई। पीत बरन ससि कहुँ कह सोई।।

    अर्थ · Hindi

    नयन दोष जा कहँ जब होई। पीत बरन ससि कहुँ कह सोई।।

  646. RCM 7.73.4Open verse →

    जब जेहि दिसि भ्रम होइ खगेसा। सो कह पच्छिम उयउ दिनेसा।।

    अर्थ · Hindi

    जब जेहि दिसि भ्रम होइ खगेसा। सो कह पच्छिम उयउ दिनेसा।।

  647. RCM 7.73.5Open verse →

    नौकारूढ़ चलत जग देखा। अचल मोह बस आपुहि लेखा।।

    अर्थ · Hindi

    नौकारूढ़ चलत जग देखा। अचल मोह बस आपुहि लेखा।।

  648. RCM 7.73.6Open verse →

    बालक भ्रमहिं न भ्रमहिं गृहादीं। कहहिं परस्पर मिथ्याबादी।।

    अर्थ · Hindi

    बालक भ्रमहिं न भ्रमहिं गृहादीं। कहहिं परस्पर मिथ्याबादी।।

  649. RCM 7.73.7Open verse →

    हरि बिषइक अस मोह बिहंगा। सपनेहुँ नहिं अग्यान प्रसंगा।।

    अर्थ · Hindi

    हरि बिषइक अस मोह बिहंगा। सपनेहुँ नहिं अग्यान प्रसंगा।।

  650. RCM 7.73.8Open verse →

    मायाबस मतिमंद अभागी। हृदयँ जमनिका बहुबिधि लागी।।

    अर्थ · Hindi

    मायाबस मतिमंद अभागी। हृदयँ जमनिका बहुबिधि लागी।।

  651. RCM 7.73.9Open verse →

    ते सठ हठ बस संसय करहीं। निज अग्यान राम पर धरहीं।।

    अर्थ · Hindi

    ते सठ हठ बस संसय करहीं। निज अग्यान राम पर धरहीं।।

  652. RCM 7.74.1Open verse →

    सुनु खगेस रघुपति प्रभुताई। कहउँ जथामति कथा सुहाई।।

    अर्थ · Hindi

    सुनु खगेस रघुपति प्रभुताई। कहउँ जथामति कथा सुहाई।।

  653. RCM 7.74.2Open verse →

    जेहि बिधि मोह भयउ प्रभु मोही। सोउ सब कथा सुनावउँ तोही।।

    अर्थ · Hindi

    जेहि बिधि मोह भयउ प्रभु मोही। सोउ सब कथा सुनावउँ तोही।।

  654. RCM 7.74.3Open verse →

    राम कृपा भाजन तुम्ह ताता। हरि गुन प्रीति मोहि सुखदाता।।

    अर्थ · Hindi

    राम कृपा भाजन तुम्ह ताता। हरि गुन प्रीति मोहि सुखदाता।।

  655. RCM 7.74.4Open verse →

    ताते नहिं कछु तुम्हहिं दुरावउँ। परम रहस्य मनोहर गावउँ।।

    अर्थ · Hindi

    ताते नहिं कछु तुम्हहिं दुरावउँ। परम रहस्य मनोहर गावउँ।।

  656. RCM 7.74.5Open verse →

    सुनहु राम कर सहज सुभाऊ। जन अभिमान न राखहिं काऊ।।

    अर्थ · Hindi

    सुनहु राम कर सहज सुभाऊ। जन अभिमान न राखहिं काऊ।।

  657. RCM 7.74.6Open verse →

    संसृत मूल सूलप्रद नाना। सकल सोक दायक अभिमाना।।

    अर्थ · Hindi

    संसृत मूल सूलप्रद नाना। सकल सोक दायक अभिमाना।।

  658. RCM 7.74.7Open verse →

    ताते करहिं कृपानिधि दूरी। सेवक पर ममता अति भूरी।।

    अर्थ · Hindi

    ताते करहिं कृपानिधि दूरी। सेवक पर ममता अति भूरी।।

  659. RCM 7.74.8Open verse →

    जिमि सिसु तन ब्रन होइ गोसाई। मातु चिराव कठिन की नाईं।।

    अर्थ · Hindi

    जिमि सिसु तन ब्रन होइ गोसाई। मातु चिराव कठिन की नाईं।।

  660. RCM 7.75.1Open verse →

    राम कृपा आपनि जड़ताई। कहउँ खगेस सुनहु मन लाई।।

    अर्थ · Hindi

    राम कृपा आपनि जड़ताई। कहउँ खगेस सुनहु मन लाई।।

  661. RCM 7.75.2Open verse →

    जब जब राम मनुज तनु धरहीं। भक्त हेतु लीला बहु करहीं।।

    अर्थ · Hindi

    जब जब राम मनुज तनु धरहीं। भक्त हेतु लीला बहु करहीं।।

  662. RCM 7.75.3Open verse →

    तब तब अवधपुरी मैं ज़ाऊँ। बालचरित बिलोकि हरषाऊँ।।

    अर्थ · Hindi

    तब तब अवधपुरी मैं ज़ाऊँ। बालचरित बिलोकि हरषाऊँ।।

  663. RCM 7.75.4Open verse →

    जन्म महोत्सव देखउँ जाई। बरष पाँच तहँ रहउँ लोभाई।।

    अर्थ · Hindi

    जन्म महोत्सव देखउँ जाई। बरष पाँच तहँ रहउँ लोभाई।।

  664. RCM 7.75.5Open verse →

    इष्टदेव मम बालक रामा। सोभा बपुष कोटि सत कामा।।

    अर्थ · Hindi

    इष्टदेव मम बालक रामा। सोभा बपुष कोटि सत कामा।।

  665. RCM 7.75.6Open verse →

    निज प्रभु बदन निहारि निहारी। लोचन सुफल करउँ उरगारी।।

    अर्थ · Hindi

    निज प्रभु बदन निहारि निहारी। लोचन सुफल करउँ उरगारी।।

  666. RCM 7.75.7Open verse →

    लघु बायस बपु धरि हरि संगा। देखउँ बालचरित बहुरंगा।।

    अर्थ · Hindi

    लघु बायस बपु धरि हरि संगा। देखउँ बालचरित बहुरंगा।।

  667. RCM 7.75.8Open verse →

    लरिकाईं जहँ जहँ फिरहिं तहँ तहँ संग उड़ाउँ।

    अर्थ · Hindi

    लरिकाईं जहँ जहँ फिरहिं तहँ तहँ संग उड़ाउँ।

  668. RCM 7.75.9Open verse →

    जूठनि परइ अजिर महँ सो उठाइ करि खाउँ।।75(क)।।

    अर्थ · Hindi

    जूठनि परइ अजिर महँ सो उठाइ करि खाउँ।।75(क)।।

  669. RCM 7.75.10Open verse →

    एक बार अतिसय सब चरित किए रघुबीर।

    अर्थ · Hindi

    एक बार अतिसय सब चरित किए रघुबीर।

  670. RCM 7.75.11Open verse →

    सुमिरत प्रभु लीला सोइ पुलकित भयउ सरीर।।75(ख)।।

    अर्थ · Hindi

    सुमिरत प्रभु लीला सोइ पुलकित भयउ सरीर।।75(ख)।।

  671. RCM 7.76.1Open verse →

    कहइ भसुंड सुनहु खगनायक। रामचरित सेवक सुखदायक।।

    अर्थ · Hindi

    कहइ भसुंड सुनहु खगनायक। रामचरित सेवक सुखदायक।।

  672. RCM 7.76.2Open verse →

    नृपमंदिर सुंदर सब भाँती। खचित कनक मनि नाना जाती।।

    अर्थ · Hindi

    नृपमंदिर सुंदर सब भाँती। खचित कनक मनि नाना जाती।।

  673. RCM 7.76.3Open verse →

    बरनि न जाइ रुचिर अँगनाई। जहँ खेलहिं नित चारिउ भाई।।

    अर्थ · Hindi

    बरनि न जाइ रुचिर अँगनाई। जहँ खेलहिं नित चारिउ भाई।।

  674. RCM 7.76.4Open verse →

    बालबिनोद करत रघुराई। बिचरत अजिर जननि सुखदाई।।

    अर्थ · Hindi

    बालबिनोद करत रघुराई। बिचरत अजिर जननि सुखदाई।।

  675. RCM 7.76.5Open verse →

    मरकत मृदुल कलेवर स्यामा। अंग अंग प्रति छबि बहु कामा।।

    अर्थ · Hindi

    मरकत मृदुल कलेवर स्यामा। अंग अंग प्रति छबि बहु कामा।।

  676. RCM 7.76.6Open verse →

    नव राजीव अरुन मृदु चरना। पदज रुचिर नख ससि दुति हरना।।

    अर्थ · Hindi

    नव राजीव अरुन मृदु चरना। पदज रुचिर नख ससि दुति हरना।।

  677. RCM 7.76.7Open verse →

    ललित अंक कुलिसादिक चारी। नूपुर चारू मधुर रवकारी।।

    अर्थ · Hindi

    ललित अंक कुलिसादिक चारी। नूपुर चारू मधुर रवकारी।।

  678. RCM 7.76.8Open verse →

    चारु पुरट मनि रचित बनाई। कटि किंकिन कल मुखर सुहाई।।

    अर्थ · Hindi

    चारु पुरट मनि रचित बनाई। कटि किंकिन कल मुखर सुहाई।।

  679. RCM 7.77.1Open verse →

    अरुन पानि नख करज मनोहर। बाहु बिसाल बिभूषन सुंदर।।

    अर्थ · Hindi

    अरुन पानि नख करज मनोहर। बाहु बिसाल बिभूषन सुंदर।।

  680. RCM 7.77.2Open verse →

    कंध बाल केहरि दर ग्रीवा। चारु चिबुक आनन छबि सींवा।।

    अर्थ · Hindi

    कंध बाल केहरि दर ग्रीवा। चारु चिबुक आनन छबि सींवा।।

  681. RCM 7.77.3Open verse →

    कलबल बचन अधर अरुनारे। दुइ दुइ दसन बिसद बर बारे।।

    अर्थ · Hindi

    कलबल बचन अधर अरुनारे। दुइ दुइ दसन बिसद बर बारे।।

  682. RCM 7.77.4Open verse →

    ललित कपोल मनोहर नासा। सकल सुखद ससि कर सम हासा।।

    अर्थ · Hindi

    ललित कपोल मनोहर नासा। सकल सुखद ससि कर सम हासा।।

  683. RCM 7.77.5Open verse →

    नील कंज लोचन भव मोचन। भ्राजत भाल तिलक गोरोचन।।

    अर्थ · Hindi

    नील कंज लोचन भव मोचन। भ्राजत भाल तिलक गोरोचन।।

  684. RCM 7.77.6Open verse →

    बिकट भृकुटि सम श्रवन सुहाए। कुंचित कच मेचक छबि छाए।।

    अर्थ · Hindi

    बिकट भृकुटि सम श्रवन सुहाए। कुंचित कच मेचक छबि छाए।।

  685. RCM 7.77.7Open verse →

    पीत झीनि झगुली तन सोही। किलकनि चितवनि भावति मोही।।

    अर्थ · Hindi

    पीत झीनि झगुली तन सोही। किलकनि चितवनि भावति मोही।।

  686. RCM 7.77.8Open verse →

    रूप रासि नृप अजिर बिहारी। नाचहिं निज प्रतिबिंब निहारी।।

    अर्थ · Hindi

    रूप रासि नृप अजिर बिहारी। नाचहिं निज प्रतिबिंब निहारी।।

  687. RCM 7.77.9Open verse →

    मोहि सन करहीं बिबिध बिधि क्रीड़ा। बरनत मोहि होति अति ब्रीड़ा।।

    अर्थ · Hindi

    मोहि सन करहीं बिबिध बिधि क्रीड़ा। बरनत मोहि होति अति ब्रीड़ा।।

  688. RCM 7.77.10Open verse →

    किलकत मोहि धरन जब धावहिं। चलउँ भागि तब पूप देखावहिं।।

    अर्थ · Hindi

    किलकत मोहि धरन जब धावहिं। चलउँ भागि तब पूप देखावहिं।।

  689. RCM 7.78.1Open verse →

    एतना मन आनत खगराया। रघुपति प्रेरित ब्यापी माया।।

    अर्थ · Hindi

    एतना मन आनत खगराया। रघुपति प्रेरित ब्यापी माया।।

  690. RCM 7.78.2Open verse →

    सो माया न दुखद मोहि काहीं। आन जीव इव संसृत नाहीं।।

    अर्थ · Hindi

    सो माया न दुखद मोहि काहीं। आन जीव इव संसृत नाहीं।।

  691. RCM 7.78.3Open verse →

    नाथ इहाँ कछु कारन आना। सुनहु सो सावधान हरिजाना।।

    अर्थ · Hindi

    नाथ इहाँ कछु कारन आना। सुनहु सो सावधान हरिजाना।।

  692. RCM 7.78.4Open verse →

    ग्यान अखंड एक सीताबर। माया बस्य जीव सचराचर।।

    अर्थ · Hindi

    ग्यान अखंड एक सीताबर। माया बस्य जीव सचराचर।।

  693. RCM 7.78.5Open verse →

    जौं सब कें रह ग्यान एकरस। ईस्वर जीवहि भेद कहहु कस।।

    अर्थ · Hindi

    जौं सब कें रह ग्यान एकरस। ईस्वर जीवहि भेद कहहु कस।।

  694. RCM 7.78.6Open verse →

    माया बस्य जीव अभिमानी। ईस बस्य माया गुनखानी।।

    अर्थ · Hindi

    माया बस्य जीव अभिमानी। ईस बस्य माया गुनखानी।।

  695. RCM 7.78.7Open verse →

    परबस जीव स्वबस भगवंता। जीव अनेक एक श्रीकंता।।

    अर्थ · Hindi

    परबस जीव स्वबस भगवंता। जीव अनेक एक श्रीकंता।।

  696. RCM 7.78.8Open verse →

    मुधा भेद जद्यपि कृत माया। बिनु हरि जाइ न कोटि उपाया।।

    अर्थ · Hindi

    मुधा भेद जद्यपि कृत माया। बिनु हरि जाइ न कोटि उपाया।।

  697. RCM 7.79.1Open verse →

    ऐसेहिं हरि बिनु भजन खगेसा। मिटइ न जीवन्ह केर कलेसा।।

    अर्थ · Hindi

    ऐसेहिं हरि बिनु भजन खगेसा। मिटइ न जीवन्ह केर कलेसा।।

  698. RCM 7.79.2Open verse →

    हरि सेवकहि न ब्याप अबिद्या। प्रभु प्रेरित ब्यापइ तेहि बिद्या।।

    अर्थ · Hindi

    हरि सेवकहि न ब्याप अबिद्या। प्रभु प्रेरित ब्यापइ तेहि बिद्या।।

  699. RCM 7.79.3Open verse →

    ताते नास न होइ दास कर। भेद भगति भाढ़इ बिहंगबर।।

    अर्थ · Hindi

    ताते नास न होइ दास कर। भेद भगति भाढ़इ बिहंगबर।।

  700. RCM 7.79.4Open verse →

    भ्रम ते चकित राम मोहि देखा। बिहँसे सो सुनु चरित बिसेषा।।

    अर्थ · Hindi

    भ्रम ते चकित राम मोहि देखा। बिहँसे सो सुनु चरित बिसेषा।।

  701. RCM 7.79.5Open verse →

    तेहि कौतुक कर मरमु न काहूँ। जाना अनुज न मातु पिताहूँ।।

    अर्थ · Hindi

    तेहि कौतुक कर मरमु न काहूँ। जाना अनुज न मातु पिताहूँ।।

  702. RCM 7.79.6Open verse →

    जानु पानि धाए मोहि धरना। स्यामल गात अरुन कर चरना।।

    अर्थ · Hindi

    जानु पानि धाए मोहि धरना। स्यामल गात अरुन कर चरना।।

  703. RCM 7.79.7Open verse →

    तब मैं भागि चलेउँ उरगामी। राम गहन कहँ भुजा पसारी।।

    अर्थ · Hindi

    तब मैं भागि चलेउँ उरगामी। राम गहन कहँ भुजा पसारी।।

  704. RCM 7.79.8Open verse →

    जिमि जिमि दूरि उड़ाउँ अकासा। तहँ भुज हरि देखउँ निज पासा।।

    अर्थ · Hindi

    जिमि जिमि दूरि उड़ाउँ अकासा। तहँ भुज हरि देखउँ निज पासा।।

  705. RCM 7.80.1Open verse →

    मूदेउँ नयन त्रसित जब भयउँ। पुनि चितवत कोसलपुर गयऊँ।।

    अर्थ · Hindi

    मूदेउँ नयन त्रसित जब भयउँ। पुनि चितवत कोसलपुर गयऊँ।।

  706. RCM 7.80.2Open verse →

    मोहि बिलोकि राम मुसुकाहीं। बिहँसत तुरत गयउँ मुख माहीं।।

    अर्थ · Hindi

    मोहि बिलोकि राम मुसुकाहीं। बिहँसत तुरत गयउँ मुख माहीं।।

  707. RCM 7.80.3Open verse →

    उदर माझ सुनु अंडज राया। देखेउँ बहु ब्रह्मांड निकाया।।

    अर्थ · Hindi

    उदर माझ सुनु अंडज राया। देखेउँ बहु ब्रह्मांड निकाया।।

  708. RCM 7.80.4Open verse →

    अति बिचित्र तहँ लोक अनेका। रचना अधिक एक ते एका।।

    अर्थ · Hindi

    अति बिचित्र तहँ लोक अनेका। रचना अधिक एक ते एका।।

  709. RCM 7.80.5Open verse →

    कोटिन्ह चतुरानन गौरीसा। अगनित उडगन रबि रजनीसा।।

    अर्थ · Hindi

    कोटिन्ह चतुरानन गौरीसा। अगनित उडगन रबि रजनीसा।।

  710. RCM 7.80.6Open verse →

    अगनित लोकपाल जम काला। अगनित भूधर भूमि बिसाला।।

    अर्थ · Hindi

    अगनित लोकपाल जम काला। अगनित भूधर भूमि बिसाला।।

  711. RCM 7.80.7Open verse →

    सागर सरि सर बिपिन अपारा। नाना भाँति सृष्टि बिस्तारा।।

    अर्थ · Hindi

    सागर सरि सर बिपिन अपारा। नाना भाँति सृष्टि बिस्तारा।।

  712. RCM 7.80.8Open verse →

    सुर मुनि सिद्ध नाग नर किंनर। चारि प्रकार जीव सचराचर।।

    अर्थ · Hindi

    सुर मुनि सिद्ध नाग नर किंनर। चारि प्रकार जीव सचराचर।।

  713. RCM 7.81.1Open verse →

    लोक लोक प्रति भिन्न बिधाता। भिन्न बिष्नु सिव मनु दिसित्राता।।

    अर्थ · Hindi

    लोक लोक प्रति भिन्न बिधाता। भिन्न बिष्नु सिव मनु दिसित्राता।।

  714. RCM 7.81.2Open verse →

    नर गंधर्ब भूत बेताला। किंनर निसिचर पसु खग ब्याला।।

    अर्थ · Hindi

    नर गंधर्ब भूत बेताला। किंनर निसिचर पसु खग ब्याला।।

  715. RCM 7.81.3Open verse →

    देव दनुज गन नाना जाती। सकल जीव तहँ आनहि भाँती।।

    अर्थ · Hindi

    देव दनुज गन नाना जाती। सकल जीव तहँ आनहि भाँती।।

  716. RCM 7.81.4Open verse →

    महि सरि सागर सर गिरि नाना। सब प्रपंच तहँ आनइ आना।।

    अर्थ · Hindi

    महि सरि सागर सर गिरि नाना। सब प्रपंच तहँ आनइ आना।।

  717. RCM 7.81.5Open verse →

    अंडकोस प्रति प्रति निज रुपा। देखेउँ जिनस अनेक अनूपा।।

    अर्थ · Hindi

    अंडकोस प्रति प्रति निज रुपा। देखेउँ जिनस अनेक अनूपा।।

  718. RCM 7.81.6Open verse →

    अवधपुरी प्रति भुवन निनारी। सरजू भिन्न भिन्न नर नारी।।

    अर्थ · Hindi

    अवधपुरी प्रति भुवन निनारी। सरजू भिन्न भिन्न नर नारी।।

  719. RCM 7.81.7Open verse →

    दसरथ कौसल्या सुनु ताता। बिबिध रूप भरतादिक भ्राता।।

    अर्थ · Hindi

    दसरथ कौसल्या सुनु ताता। बिबिध रूप भरतादिक भ्राता।।

  720. RCM 7.81.8Open verse →

    प्रति ब्रह्मांड राम अवतारा। देखउँ बालबिनोद अपारा।।

    अर्थ · Hindi

    प्रति ब्रह्मांड राम अवतारा। देखउँ बालबिनोद अपारा।।

  721. RCM 7.82.1Open verse →

    भ्रमत मोहि ब्रह्मांड अनेका। बीते मनहुँ कल्प सत एका।।

    अर्थ · Hindi

    भ्रमत मोहि ब्रह्मांड अनेका। बीते मनहुँ कल्प सत एका।।

  722. RCM 7.82.2Open verse →

    फिरत फिरत निज आश्रम आयउँ। तहँ पुनि रहि कछु काल गवाँयउँ।।

    अर्थ · Hindi

    फिरत फिरत निज आश्रम आयउँ। तहँ पुनि रहि कछु काल गवाँयउँ।।

  723. RCM 7.82.3Open verse →

    निज प्रभु जन्म अवध सुनि पायउँ। निर्भर प्रेम हरषि उठि धायउँ।।

    अर्थ · Hindi

    निज प्रभु जन्म अवध सुनि पायउँ। निर्भर प्रेम हरषि उठि धायउँ।।

  724. RCM 7.82.4Open verse →

    देखउँ जन्म महोत्सव जाई। जेहि बिधि प्रथम कहा मैं गाई।।

    अर्थ · Hindi

    देखउँ जन्म महोत्सव जाई। जेहि बिधि प्रथम कहा मैं गाई।।

  725. RCM 7.82.5Open verse →

    राम उदर देखेउँ जग नाना। देखत बनइ न जाइ बखाना।।

    अर्थ · Hindi

    राम उदर देखेउँ जग नाना। देखत बनइ न जाइ बखाना।।

  726. RCM 7.82.6Open verse →

    तहँ पुनि देखेउँ राम सुजाना। माया पति कृपाल भगवाना।।

    अर्थ · Hindi

    तहँ पुनि देखेउँ राम सुजाना। माया पति कृपाल भगवाना।।

  727. RCM 7.82.7Open verse →

    करउँ बिचार बहोरि बहोरी। मोह कलिल ब्यापित मति मोरी।।

    अर्थ · Hindi

    करउँ बिचार बहोरि बहोरी। मोह कलिल ब्यापित मति मोरी।।

  728. RCM 7.82.8Open verse →

    उभय घरी महँ मैं सब देखा। भयउँ भ्रमित मन मोह बिसेषा।।

    अर्थ · Hindi

    उभय घरी महँ मैं सब देखा। भयउँ भ्रमित मन मोह बिसेषा।।

  729. RCM 7.83.1Open verse →

    देखि चरित यह सो प्रभुताई। समुझत देह दसा बिसराई।।

    अर्थ · Hindi

    देखि चरित यह सो प्रभुताई। समुझत देह दसा बिसराई।।

  730. RCM 7.83.2Open verse →

    धरनि परेउँ मुख आव न बाता। त्राहि त्राहि आरत जन त्राता।।

    अर्थ · Hindi

    धरनि परेउँ मुख आव न बाता। त्राहि त्राहि आरत जन त्राता।।

  731. RCM 7.83.3Open verse →

    प्रेमाकुल प्रभु मोहि बिलोकी। निज माया प्रभुता तब रोकी।।

    अर्थ · Hindi

    प्रेमाकुल प्रभु मोहि बिलोकी। निज माया प्रभुता तब रोकी।।

  732. RCM 7.83.4Open verse →

    कर सरोज प्रभु मम सिर धरेऊ। दीनदयाल सकल दुख हरेऊ।।

    अर्थ · Hindi

    कर सरोज प्रभु मम सिर धरेऊ। दीनदयाल सकल दुख हरेऊ।।

  733. RCM 7.83.5Open verse →

    कीन्ह राम मोहि बिगत बिमोहा। सेवक सुखद कृपा संदोहा।।

    अर्थ · Hindi

    कीन्ह राम मोहि बिगत बिमोहा। सेवक सुखद कृपा संदोहा।।

  734. RCM 7.83.6Open verse →

    प्रभुता प्रथम बिचारि बिचारी। मन महँ होइ हरष अति भारी।।

    अर्थ · Hindi

    प्रभुता प्रथम बिचारि बिचारी। मन महँ होइ हरष अति भारी।।

  735. RCM 7.83.7Open verse →

    भगत बछलता प्रभु कै देखी। उपजी मम उर प्रीति बिसेषी।।

    अर्थ · Hindi

    भगत बछलता प्रभु कै देखी। उपजी मम उर प्रीति बिसेषी।।

  736. RCM 7.83.8Open verse →

    सजल नयन पुलकित कर जोरी। कीन्हिउँ बहु बिधि बिनय बहोरी।।

    अर्थ · Hindi

    सजल नयन पुलकित कर जोरी। कीन्हिउँ बहु बिधि बिनय बहोरी।।

  737. RCM 7.84.1Open verse →

    ग्यान बिबेक बिरति बिग्याना। मुनि दुर्लभ गुन जे जग नाना।।

    अर्थ · Hindi

    ग्यान बिबेक बिरति बिग्याना। मुनि दुर्लभ गुन जे जग नाना।।

  738. RCM 7.84.2Open verse →

    आजु देउँ सब संसय नाहीं। मागु जो तोहि भाव मन माहीं।।

    अर्थ · Hindi

    आजु देउँ सब संसय नाहीं। मागु जो तोहि भाव मन माहीं।।

  739. RCM 7.84.3Open verse →

    सुनि प्रभु बचन अधिक अनुरागेउँ। मन अनुमान करन तब लागेऊँ।।

    अर्थ · Hindi

    सुनि प्रभु बचन अधिक अनुरागेउँ। मन अनुमान करन तब लागेऊँ।।

  740. RCM 7.84.4Open verse →

    प्रभु कह देन सकल सुख सही। भगति आपनी देन न कही।।

    अर्थ · Hindi

    प्रभु कह देन सकल सुख सही। भगति आपनी देन न कही।।

  741. RCM 7.84.5Open verse →

    भगति हीन गुन सब सुख ऐसे। लवन बिना बहु बिंजन जैसे।।

    अर्थ · Hindi

    भगति हीन गुन सब सुख ऐसे। लवन बिना बहु बिंजन जैसे।।

  742. RCM 7.84.6Open verse →

    भजन हीन सुख कवने काजा। अस बिचारि बोलेउँ खगराजा।।

    अर्थ · Hindi

    भजन हीन सुख कवने काजा। अस बिचारि बोलेउँ खगराजा।।

  743. RCM 7.84.7Open verse →

    जौं प्रभु होइ प्रसन्न बर देहू। मो पर करहु कृपा अरु नेहू।।

    अर्थ · Hindi

    जौं प्रभु होइ प्रसन्न बर देहू। मो पर करहु कृपा अरु नेहू।।

  744. RCM 7.84.8Open verse →

    मन भावत बर मागउँ स्वामी। तुम्ह उदार उर अंतरजामी।।

    अर्थ · Hindi

    मन भावत बर मागउँ स्वामी। तुम्ह उदार उर अंतरजामी।।

  745. RCM 7.85.1Open verse →

    एवमस्तु कहि रघुकुलनायक। बोले बचन परम सुखदायक।।

    अर्थ · Hindi

    एवमस्तु कहि रघुकुलनायक। बोले बचन परम सुखदायक।।

  746. RCM 7.85.2Open verse →

    सुनु बायस तैं सहज सयाना। काहे न मागसि अस बरदाना।।

    अर्थ · Hindi

    सुनु बायस तैं सहज सयाना। काहे न मागसि अस बरदाना।।

  747. RCM 7.85.3Open verse →

    सब सुख खानि भगति तैं मागी। नहिं जग कोउ तोहि सम बड़भागी।।

    अर्थ · Hindi

    सब सुख खानि भगति तैं मागी। नहिं जग कोउ तोहि सम बड़भागी।।

  748. RCM 7.85.4Open verse →

    जो मुनि कोटि जतन नहिं लहहीं। जे जप जोग अनल तन दहहीं।।

    अर्थ · Hindi

    जो मुनि कोटि जतन नहिं लहहीं। जे जप जोग अनल तन दहहीं।।

  749. RCM 7.85.5Open verse →

    रीझेउँ देखि तोरि चतुराई। मागेहु भगति मोहि अति भाई।।

    अर्थ · Hindi

    रीझेउँ देखि तोरि चतुराई। मागेहु भगति मोहि अति भाई।।

  750. RCM 7.85.6Open verse →

    सुनु बिहंग प्रसाद अब मोरें। सब सुभ गुन बसिहहिं उर तोरें।।

    अर्थ · Hindi

    सुनु बिहंग प्रसाद अब मोरें। सब सुभ गुन बसिहहिं उर तोरें।।

  751. RCM 7.85.7Open verse →

    भगति ग्यान बिग्यान बिरागा। जोग चरित्र रहस्य बिभागा।।

    अर्थ · Hindi

    भगति ग्यान बिग्यान बिरागा। जोग चरित्र रहस्य बिभागा।।

  752. RCM 7.85.8Open verse →

    जानब तैं सबही कर भेदा। मम प्रसाद नहिं साधन खेदा।।

    अर्थ · Hindi

    जानब तैं सबही कर भेदा। मम प्रसाद नहिं साधन खेदा।।

  753. RCM 7.86.1Open verse →

    अब सुनु परम बिमल मम बानी। सत्य सुगम निगमादि बखानी।।

    अर्थ · Hindi

    अब सुनु परम बिमल मम बानी। सत्य सुगम निगमादि बखानी।।

  754. RCM 7.86.2Open verse →

    निज सिद्धांत सुनावउँ तोही। सुनु मन धरु सब तजि भजु मोही।।

    अर्थ · Hindi

    निज सिद्धांत सुनावउँ तोही। सुनु मन धरु सब तजि भजु मोही।।

  755. RCM 7.86.3Open verse →

    मम माया संभव संसारा। जीव चराचर बिबिधि प्रकारा।।

    अर्थ · Hindi

    मम माया संभव संसारा। जीव चराचर बिबिधि प्रकारा।।

  756. RCM 7.86.4Open verse →

    सब मम प्रिय सब मम उपजाए। सब ते अधिक मनुज मोहि भाए।।

    अर्थ · Hindi

    सब मम प्रिय सब मम उपजाए। सब ते अधिक मनुज मोहि भाए।।

  757. RCM 7.86.5Open verse →

    तिन्ह महँ द्विज द्विज महँ श्रुतिधारी। तिन्ह महुँ निगम धरम अनुसारी।।

    अर्थ · Hindi

    तिन्ह महँ द्विज द्विज महँ श्रुतिधारी। तिन्ह महुँ निगम धरम अनुसारी।।

  758. RCM 7.86.6Open verse →

    तिन्ह महँ प्रिय बिरक्त पुनि ग्यानी। ग्यानिहु ते अति प्रिय बिग्यानी।।

    अर्थ · Hindi

    तिन्ह महँ प्रिय बिरक्त पुनि ग्यानी। ग्यानिहु ते अति प्रिय बिग्यानी।।

  759. RCM 7.86.7Open verse →

    तिन्ह ते पुनि मोहि प्रिय निज दासा। जेहि गति मोरि न दूसरि आसा।।

    अर्थ · Hindi

    तिन्ह ते पुनि मोहि प्रिय निज दासा। जेहि गति मोरि न दूसरि आसा।।

  760. RCM 7.86.8Open verse →

    पुनि पुनि सत्य कहउँ तोहि पाहीं। मोहि सेवक सम प्रिय कोउ नाहीं।।

    अर्थ · Hindi

    पुनि पुनि सत्य कहउँ तोहि पाहीं। मोहि सेवक सम प्रिय कोउ नाहीं।।

  761. RCM 7.86.9Open verse →

    भगति हीन बिरंचि किन होई। सब जीवहु सम प्रिय मोहि सोई।।

    अर्थ · Hindi

    भगति हीन बिरंचि किन होई। सब जीवहु सम प्रिय मोहि सोई।।

  762. RCM 7.86.10Open verse →

    भगतिवंत अति नीचउ प्रानी। मोहि प्रानप्रिय असि मम बानी।।

    अर्थ · Hindi

    भगतिवंत अति नीचउ प्रानी। मोहि प्रानप्रिय असि मम बानी।।

  763. RCM 7.87.1Open verse →

    एक पिता के बिपुल कुमारा। होहिं पृथक गुन सील अचारा।।

    अर्थ · Hindi

    एक पिता के बिपुल कुमारा। होहिं पृथक गुन सील अचारा।।

  764. RCM 7.87.2Open verse →

    कोउ पंडिंत कोउ तापस ग्याता। कोउ धनवंत सूर कोउ दाता।।

    अर्थ · Hindi

    कोउ पंडिंत कोउ तापस ग्याता। कोउ धनवंत सूर कोउ दाता।।

  765. RCM 7.87.3Open verse →

    कोउ सर्बग्य धर्मरत कोई। सब पर पितहि प्रीति सम होई।।

    अर्थ · Hindi

    कोउ सर्बग्य धर्मरत कोई। सब पर पितहि प्रीति सम होई।।

  766. RCM 7.87.4Open verse →

    कोउ पितु भगत बचन मन कर्मा। सपनेहुँ जान न दूसर धर्मा।।

    अर्थ · Hindi

    कोउ पितु भगत बचन मन कर्मा। सपनेहुँ जान न दूसर धर्मा।।

  767. RCM 7.87.5Open verse →

    सो सुत प्रिय पितु प्रान समाना। जद्यपि सो सब भाँति अयाना।।

    अर्थ · Hindi

    सो सुत प्रिय पितु प्रान समाना। जद्यपि सो सब भाँति अयाना।।

  768. RCM 7.87.6Open verse →

    एहि बिधि जीव चराचर जेते। त्रिजग देव नर असुर समेते।।

    अर्थ · Hindi

    एहि बिधि जीव चराचर जेते। त्रिजग देव नर असुर समेते।।

  769. RCM 7.87.7Open verse →

    अखिल बिस्व यह मोर उपाया। सब पर मोहि बराबरि दाया।।

    अर्थ · Hindi

    अखिल बिस्व यह मोर उपाया। सब पर मोहि बराबरि दाया।।

  770. RCM 7.87.8Open verse →

    तिन्ह महँ जो परिहरि मद माया। भजै मोहि मन बच अरू काया।।

    अर्थ · Hindi

    तिन्ह महँ जो परिहरि मद माया। भजै मोहि मन बच अरू काया।।

  771. RCM 7.88.1Open verse →

    कबहूँ काल न ब्यापिहि तोही। सुमिरेसु भजेसु निरंतर मोही।।

    अर्थ · Hindi

    कबहूँ काल न ब्यापिहि तोही। सुमिरेसु भजेसु निरंतर मोही।।

  772. RCM 7.88.2Open verse →

    प्रभु बचनामृत सुनि न अघाऊँ। तनु पुलकित मन अति हरषाऊँ।।

    अर्थ · Hindi

    प्रभु बचनामृत सुनि न अघाऊँ। तनु पुलकित मन अति हरषाऊँ।।

  773. RCM 7.88.3Open verse →

    सो सुख जानइ मन अरु काना। नहिं रसना पहिं जाइ बखाना।।

    अर्थ · Hindi

    सो सुख जानइ मन अरु काना। नहिं रसना पहिं जाइ बखाना।।

  774. RCM 7.88.4Open verse →

    प्रभु सोभा सुख जानहिं नयना। कहि किमि सकहिं तिन्हहि नहिं बयना।।

    अर्थ · Hindi

    प्रभु सोभा सुख जानहिं नयना। कहि किमि सकहिं तिन्हहि नहिं बयना।।

  775. RCM 7.88.5Open verse →

    बहु बिधि मोहि प्रबोधि सुख देई। लगे करन सिसु कौतुक तेई।।

    अर्थ · Hindi

    बहु बिधि मोहि प्रबोधि सुख देई। लगे करन सिसु कौतुक तेई।।

  776. RCM 7.88.6Open verse →

    सजल नयन कछु मुख करि रूखा। चितइ मातु लागी अति भूखा।।

    अर्थ · Hindi

    सजल नयन कछु मुख करि रूखा। चितइ मातु लागी अति भूखा।।

  777. RCM 7.88.7Open verse →

    देखि मातु आतुर उठि धाई। कहि मृदु बचन लिए उर लाई।।

    अर्थ · Hindi

    देखि मातु आतुर उठि धाई। कहि मृदु बचन लिए उर लाई।।

  778. RCM 7.88.8Open verse →

    गोद राखि कराव पय पाना। रघुपति चरित ललित कर गाना।।

    अर्थ · Hindi

    गोद राखि कराव पय पाना। रघुपति चरित ललित कर गाना।।

  779. RCM 7.89.1Open verse →

    मैं पुनि अवध रहेउँ कछु काला। देखेउँ बालबिनोद रसाला।।

    अर्थ · Hindi

    मैं पुनि अवध रहेउँ कछु काला। देखेउँ बालबिनोद रसाला।।

  780. RCM 7.89.2Open verse →

    राम प्रसाद भगति बर पायउँ। प्रभु पद बंदि निजाश्रम आयउँ।।

    अर्थ · Hindi

    राम प्रसाद भगति बर पायउँ। प्रभु पद बंदि निजाश्रम आयउँ।।

  781. RCM 7.89.3Open verse →

    तब ते मोहि न ब्यापी माया। जब ते रघुनायक अपनाया।।

    अर्थ · Hindi

    तब ते मोहि न ब्यापी माया। जब ते रघुनायक अपनाया।।

  782. RCM 7.89.4Open verse →

    यह सब गुप्त चरित मैं गावा। हरि मायाँ जिमि मोहि नचावा।।

    अर्थ · Hindi

    यह सब गुप्त चरित मैं गावा। हरि मायाँ जिमि मोहि नचावा।।

  783. RCM 7.89.5Open verse →

    निज अनुभव अब कहउँ खगेसा। बिनु हरि भजन न जाहि कलेसा।।

    अर्थ · Hindi

    निज अनुभव अब कहउँ खगेसा। बिनु हरि भजन न जाहि कलेसा।।

  784. RCM 7.89.6Open verse →

    राम कृपा बिनु सुनु खगराई। जानि न जाइ राम प्रभुताई।।

    अर्थ · Hindi

    राम कृपा बिनु सुनु खगराई। जानि न जाइ राम प्रभुताई।।

  785. RCM 7.89.7Open verse →

    जानें बिनु न होइ परतीती। बिनु परतीति होइ नहिं प्रीती।।

    अर्थ · Hindi

    जानें बिनु न होइ परतीती। बिनु परतीति होइ नहिं प्रीती।।

  786. RCM 7.89.8Open verse →

    प्रीति बिना नहिं भगति दिढ़ाई। जिमि खगपति जल कै चिकनाई।।

    अर्थ · Hindi

    प्रीति बिना नहिं भगति दिढ़ाई। जिमि खगपति जल कै चिकनाई।।

  787. RCM 7.89.9Open verse →

    बिनु गुर होइ कि ग्यान ग्यान कि होइ बिराग बिनु।

    अर्थ · Hindi

    बिनु गुर होइ कि ग्यान ग्यान कि होइ बिराग बिनु।

  788. RCM 7.89.10Open verse →

    गावहिं बेद पुरान सुख कि लहिअ हरि भगति बिनु।।89(क)।।

    अर्थ · Hindi

    गावहिं बेद पुरान सुख कि लहिअ हरि भगति बिनु।।89(क)।।

  789. RCM 7.89.11Open verse →

    कोउ बिश्राम कि पाव तात सहज संतोष बिनु।

    अर्थ · Hindi

    कोउ बिश्राम कि पाव तात सहज संतोष बिनु।

  790. RCM 7.89.12Open verse →

    चलै कि जल बिनु नाव कोटि जतन पचि पचि मरिअ।।89(ख)।।

    अर्थ · Hindi

    चलै कि जल बिनु नाव कोटि जतन पचि पचि मरिअ।।89(ख)।।

  791. RCM 7.90.1Open verse →

    बिनु संतोष न काम नसाहीं। काम अछत सुख सपनेहुँ नाहीं।।

    अर्थ · Hindi

    बिनु संतोष न काम नसाहीं। काम अछत सुख सपनेहुँ नाहीं।।

  792. RCM 7.90.2Open verse →

    राम भजन बिनु मिटहिं कि कामा। थल बिहीन तरु कबहुँ कि जामा।।

    अर्थ · Hindi

    राम भजन बिनु मिटहिं कि कामा। थल बिहीन तरु कबहुँ कि जामा।।

  793. RCM 7.90.3Open verse →

    बिनु बिग्यान कि समता आवइ। कोउ अवकास कि नभ बिनु पावइ।।

    अर्थ · Hindi

    बिनु बिग्यान कि समता आवइ। कोउ अवकास कि नभ बिनु पावइ।।

  794. RCM 7.90.4Open verse →

    श्रद्धा बिना धर्म नहिं होई। बिनु महि गंध कि पावइ कोई।।

    अर्थ · Hindi

    श्रद्धा बिना धर्म नहिं होई। बिनु महि गंध कि पावइ कोई।।

  795. RCM 7.90.5Open verse →

    बिनु तप तेज कि कर बिस्तारा। जल बिनु रस कि होइ संसारा।।

    अर्थ · Hindi

    बिनु तप तेज कि कर बिस्तारा। जल बिनु रस कि होइ संसारा।।

  796. RCM 7.90.6Open verse →

    सील कि मिल बिनु बुध सेवकाई। जिमि बिनु तेज न रूप गोसाई।।

    अर्थ · Hindi

    सील कि मिल बिनु बुध सेवकाई। जिमि बिनु तेज न रूप गोसाई।।

  797. RCM 7.90.7Open verse →

    निज सुख बिनु मन होइ कि थीरा। परस कि होइ बिहीन समीरा।।

    अर्थ · Hindi

    निज सुख बिनु मन होइ कि थीरा। परस कि होइ बिहीन समीरा।।

  798. RCM 7.90.8Open verse →

    कवनिउ सिद्धि कि बिनु बिस्वासा। बिनु हरि भजन न भव भय नासा।।

    अर्थ · Hindi

    कवनिउ सिद्धि कि बिनु बिस्वासा। बिनु हरि भजन न भव भय नासा।।

  799. RCM 7.90.9Open verse →

    बिनु बिस्वास भगति नहिं तेहि बिनु द्रवहिं न रामु।

    अर्थ · Hindi

    बिनु बिस्वास भगति नहिं तेहि बिनु द्रवहिं न रामु।

  800. RCM 7.90.10Open verse →

    राम कृपा बिनु सपनेहुँ जीव न लह बिश्रामु।।90(क)।।

    अर्थ · Hindi

    राम कृपा बिनु सपनेहुँ जीव न लह बिश्रामु।।90(क)।।

  801. RCM 7.90.11Open verse →

    अस बिचारि मतिधीर तजि कुतर्क संसय सकल।

    अर्थ · Hindi

    अस बिचारि मतिधीर तजि कुतर्क संसय सकल।

  802. RCM 7.90.12Open verse →

    भजहु राम रघुबीर करुनाकर सुंदर सुखद।।90(ख)।।

    अर्थ · Hindi

    भजहु राम रघुबीर करुनाकर सुंदर सुखद।।90(ख)।।

  803. RCM 7.91.1Open verse →

    निज मति सरिस नाथ मैं गाई। प्रभु प्रताप महिमा खगराई।।

    अर्थ · Hindi

    निज मति सरिस नाथ मैं गाई। प्रभु प्रताप महिमा खगराई।।

  804. RCM 7.91.2Open verse →

    कहेउँ न कछु करि जुगुति बिसेषी। यह सब मैं निज नयनन्हि देखी।।

    अर्थ · Hindi

    कहेउँ न कछु करि जुगुति बिसेषी। यह सब मैं निज नयनन्हि देखी।।

  805. RCM 7.91.3Open verse →

    महिमा नाम रूप गुन गाथा। सकल अमित अनंत रघुनाथा।।

    अर्थ · Hindi

    महिमा नाम रूप गुन गाथा। सकल अमित अनंत रघुनाथा।।

  806. RCM 7.91.4Open verse →

    निज निज मति मुनि हरि गुन गावहिं। निगम सेष सिव पार न पावहिं।।

    अर्थ · Hindi

    निज निज मति मुनि हरि गुन गावहिं। निगम सेष सिव पार न पावहिं।।

  807. RCM 7.91.5Open verse →

    तुम्हहि आदि खग मसक प्रजंता। नभ उड़ाहिं नहिं पावहिं अंता।।

    अर्थ · Hindi

    तुम्हहि आदि खग मसक प्रजंता। नभ उड़ाहिं नहिं पावहिं अंता।।

  808. RCM 7.91.6Open verse →

    तिमि रघुपति महिमा अवगाहा। तात कबहुँ कोउ पाव कि थाहा।।

    अर्थ · Hindi

    तिमि रघुपति महिमा अवगाहा। तात कबहुँ कोउ पाव कि थाहा।।

  809. RCM 7.91.7Open verse →

    रामु काम सत कोटि सुभग तन। दुर्गा कोटि अमित अरि मर्दन।।

    अर्थ · Hindi

    रामु काम सत कोटि सुभग तन। दुर्गा कोटि अमित अरि मर्दन।।

  810. RCM 7.91.8Open verse →

    सक्र कोटि सत सरिस बिलासा। नभ सत कोटि अमित अवकासा।।

    अर्थ · Hindi

    सक्र कोटि सत सरिस बिलासा। नभ सत कोटि अमित अवकासा।।

  811. RCM 7.92.1Open verse →

    प्रभु अगाध सत कोटि पताला। समन कोटि सत सरिस कराला।।

    अर्थ · Hindi

    प्रभु अगाध सत कोटि पताला। समन कोटि सत सरिस कराला।।

  812. RCM 7.92.2Open verse →

    तीरथ अमित कोटि सम पावन। नाम अखिल अघ पूग नसावन।।

    अर्थ · Hindi

    तीरथ अमित कोटि सम पावन। नाम अखिल अघ पूग नसावन।।

  813. RCM 7.92.3Open verse →

    हिमगिरि कोटि अचल रघुबीरा। सिंधु कोटि सत सम गंभीरा।।

    अर्थ · Hindi

    हिमगिरि कोटि अचल रघुबीरा। सिंधु कोटि सत सम गंभीरा।।

  814. RCM 7.92.4Open verse →

    कामधेनु सत कोटि समाना। सकल काम दायक भगवाना।।

    अर्थ · Hindi

    कामधेनु सत कोटि समाना। सकल काम दायक भगवाना।।

  815. RCM 7.92.5Open verse →

    सारद कोटि अमित चतुराई। बिधि सत कोटि सृष्टि निपुनाई।।

    अर्थ · Hindi

    सारद कोटि अमित चतुराई। बिधि सत कोटि सृष्टि निपुनाई।।

  816. RCM 7.92.6Open verse →

    बिष्नु कोटि सम पालन कर्ता। रुद्र कोटि सत सम संहर्ता।।

    अर्थ · Hindi

    बिष्नु कोटि सम पालन कर्ता। रुद्र कोटि सत सम संहर्ता।।

  817. RCM 7.92.7Open verse →

    धनद कोटि सत सम धनवाना। माया कोटि प्रपंच निधाना।।

    अर्थ · Hindi

    धनद कोटि सत सम धनवाना। माया कोटि प्रपंच निधाना।।

  818. RCM 7.92.8Open verse →

    भार धरन सत कोटि अहीसा। निरवधि निरुपम प्रभु जगदीसा।।

    अर्थ · Hindi

    भार धरन सत कोटि अहीसा। निरवधि निरुपम प्रभु जगदीसा।।

  819. RCM 7.93.1Open verse →

    सुनि भुसुंडि के बचन सुहाए। हरषित खगपति पंख फुलाए।।

    अर्थ · Hindi

    सुनि भुसुंडि के बचन सुहाए। हरषित खगपति पंख फुलाए।।

  820. RCM 7.93.2Open verse →

    नयन नीर मन अति हरषाना। श्रीरघुपति प्रताप उर आना।।

    अर्थ · Hindi

    नयन नीर मन अति हरषाना। श्रीरघुपति प्रताप उर आना।।

  821. RCM 7.93.3Open verse →

    पाछिल मोह समुझि पछिताना। ब्रह्म अनादि मनुज करि माना।।

    अर्थ · Hindi

    पाछिल मोह समुझि पछिताना। ब्रह्म अनादि मनुज करि माना।।

  822. RCM 7.93.4Open verse →

    पुनि पुनि काग चरन सिरु नावा। जानि राम सम प्रेम बढ़ावा।।

    अर्थ · Hindi

    पुनि पुनि काग चरन सिरु नावा। जानि राम सम प्रेम बढ़ावा।।

  823. RCM 7.93.5Open verse →

    गुर बिनु भव निधि तरइ न कोई। जौं बिरंचि संकर सम होई।।

    अर्थ · Hindi

    गुर बिनु भव निधि तरइ न कोई। जौं बिरंचि संकर सम होई।।

  824. RCM 7.93.6Open verse →

    संसय सर्प ग्रसेउ मोहि ताता। दुखद लहरि कुतर्क बहु ब्राता।।

    अर्थ · Hindi

    संसय सर्प ग्रसेउ मोहि ताता। दुखद लहरि कुतर्क बहु ब्राता।।

  825. RCM 7.93.7Open verse →

    तव सरूप गारुड़ि रघुनायक। मोहि जिआयउ जन सुखदायक।।

    अर्थ · Hindi

    तव सरूप गारुड़ि रघुनायक। मोहि जिआयउ जन सुखदायक।।

  826. RCM 7.93.8Open verse →

    तव प्रसाद मम मोह नसाना। राम रहस्य अनूपम जाना।।

    अर्थ · Hindi

    तव प्रसाद मम मोह नसाना। राम रहस्य अनूपम जाना।।

  827. RCM 7.94.1Open verse →

    तुम्ह सर्बग्य तन्य तम पारा। सुमति सुसील सरल आचारा।।

    अर्थ · Hindi

    तुम्ह सर्बग्य तन्य तम पारा। सुमति सुसील सरल आचारा।।

  828. RCM 7.94.2Open verse →

    ग्यान बिरति बिग्यान निवासा। रघुनायक के तुम्ह प्रिय दासा।।

    अर्थ · Hindi

    ग्यान बिरति बिग्यान निवासा। रघुनायक के तुम्ह प्रिय दासा।।

  829. RCM 7.94.3Open verse →

    कारन कवन देह यह पाई। तात सकल मोहि कहहु बुझाई।।

    अर्थ · Hindi

    कारन कवन देह यह पाई। तात सकल मोहि कहहु बुझाई।।

  830. RCM 7.94.4Open verse →

    राम चरित सर सुंदर स्वामी। पायहु कहाँ कहहु नभगामी।।

    अर्थ · Hindi

    राम चरित सर सुंदर स्वामी। पायहु कहाँ कहहु नभगामी।।

  831. RCM 7.94.5Open verse →

    नाथ सुना मैं अस सिव पाहीं। महा प्रलयहुँ नास तव नाहीं।।

    अर्थ · Hindi

    नाथ सुना मैं अस सिव पाहीं। महा प्रलयहुँ नास तव नाहीं।।

  832. RCM 7.94.6Open verse →

    मुधा बचन नहिं ईस्वर कहई। सोउ मोरें मन संसय अहई।।

    अर्थ · Hindi

    मुधा बचन नहिं ईस्वर कहई। सोउ मोरें मन संसय अहई।।

  833. RCM 7.94.7Open verse →

    अग जग जीव नाग नर देवा। नाथ सकल जगु काल कलेवा।।

    अर्थ · Hindi

    अग जग जीव नाग नर देवा। नाथ सकल जगु काल कलेवा।।

  834. RCM 7.94.8Open verse →

    अंड कटाह अमित लय कारी। कालु सदा दुरतिक्रम भारी।।

    अर्थ · Hindi

    अंड कटाह अमित लय कारी। कालु सदा दुरतिक्रम भारी।।

  835. RCM 7.95.1Open verse →

    गरुड़ गिरा सुनि हरषेउ कागा। बोलेउ उमा परम अनुरागा।।

    अर्थ · Hindi

    गरुड़ गिरा सुनि हरषेउ कागा। बोलेउ उमा परम अनुरागा।।

  836. RCM 7.95.2Open verse →

    धन्य धन्य तव मति उरगारी। प्रस्न तुम्हारि मोहि अति प्यारी।।

    अर्थ · Hindi

    धन्य धन्य तव मति उरगारी। प्रस्न तुम्हारि मोहि अति प्यारी।।

  837. RCM 7.95.3Open verse →

    सुनि तव प्रस्न सप्रेम सुहाई। बहुत जनम कै सुधि मोहि आई।।

    अर्थ · Hindi

    सुनि तव प्रस्न सप्रेम सुहाई। बहुत जनम कै सुधि मोहि आई।।

  838. RCM 7.95.4Open verse →

    सब निज कथा कहउँ मैं गाई। तात सुनहु सादर मन लाई।।

    अर्थ · Hindi

    सब निज कथा कहउँ मैं गाई। तात सुनहु सादर मन लाई।।

  839. RCM 7.95.5Open verse →

    जप तप मख सम दम ब्रत दाना। बिरति बिबेक जोग बिग्याना।।

    अर्थ · Hindi

    जप तप मख सम दम ब्रत दाना। बिरति बिबेक जोग बिग्याना।।

  840. RCM 7.95.6Open verse →

    सब कर फल रघुपति पद प्रेमा। तेहि बिनु कोउ न पावइ छेमा।।

    अर्थ · Hindi

    सब कर फल रघुपति पद प्रेमा। तेहि बिनु कोउ न पावइ छेमा।।

  841. RCM 7.95.7Open verse →

    एहि तन राम भगति मैं पाई। ताते मोहि ममता अधिकाई।।

    अर्थ · Hindi

    एहि तन राम भगति मैं पाई। ताते मोहि ममता अधिकाई।।

  842. RCM 7.95.8Open verse →

    जेहि तें कछु निज स्वारथ होई। तेहि पर ममता कर सब कोई।।

    अर्थ · Hindi

    जेहि तें कछु निज स्वारथ होई। तेहि पर ममता कर सब कोई।।

  843. RCM 7.96.1Open verse →

    स्वारथ साँच जीव कहुँ एहा। मन क्रम बचन राम पद नेहा।।

    अर्थ · Hindi

    स्वारथ साँच जीव कहुँ एहा। मन क्रम बचन राम पद नेहा।।

  844. RCM 7.96.2Open verse →

    सोइ पावन सोइ सुभग सरीरा। जो तनु पाइ भजिअ रघुबीरा।।

    अर्थ · Hindi

    सोइ पावन सोइ सुभग सरीरा। जो तनु पाइ भजिअ रघुबीरा।।

  845. RCM 7.96.3Open verse →

    राम बिमुख लहि बिधि सम देही। कबि कोबिद न प्रसंसहिं तेही।।

    अर्थ · Hindi

    राम बिमुख लहि बिधि सम देही। कबि कोबिद न प्रसंसहिं तेही।।

  846. RCM 7.96.4Open verse →

    राम भगति एहिं तन उर जामी। ताते मोहि परम प्रिय स्वामी।।

    अर्थ · Hindi

    राम भगति एहिं तन उर जामी। ताते मोहि परम प्रिय स्वामी।।

  847. RCM 7.96.5Open verse →

    तजउँ न तन निज इच्छा मरना। तन बिनु बेद भजन नहिं बरना।।

    अर्थ · Hindi

    तजउँ न तन निज इच्छा मरना। तन बिनु बेद भजन नहिं बरना।।

  848. RCM 7.96.6Open verse →

    प्रथम मोहँ मोहि बहुत बिगोवा। राम बिमुख सुख कबहुँ न सोवा।।

    अर्थ · Hindi

    प्रथम मोहँ मोहि बहुत बिगोवा। राम बिमुख सुख कबहुँ न सोवा।।

  849. RCM 7.96.7Open verse →

    नाना जनम कर्म पुनि नाना। किए जोग जप तप मख दाना।।

    अर्थ · Hindi

    नाना जनम कर्म पुनि नाना। किए जोग जप तप मख दाना।।

  850. RCM 7.96.8Open verse →

    कवन जोनि जनमेउँ जहँ नाहीं। मैं खगेस भ्रमि भ्रमि जग माहीं।।

    अर्थ · Hindi

    कवन जोनि जनमेउँ जहँ नाहीं। मैं खगेस भ्रमि भ्रमि जग माहीं।।

  851. RCM 7.96.9Open verse →

    देखेउँ करि सब करम गोसाई। सुखी न भयउँ अबहिं की नाई।।

    अर्थ · Hindi

    देखेउँ करि सब करम गोसाई। सुखी न भयउँ अबहिं की नाई।।

  852. RCM 7.96.10Open verse →

    सुधि मोहि नाथ जन्म बहु केरी। सिव प्रसाद मति मोहँ न घेरी।।

    अर्थ · Hindi

    सुधि मोहि नाथ जन्म बहु केरी। सिव प्रसाद मति मोहँ न घेरी।।

  853. RCM 7.97.1Open verse →

    तेहि कलिजुग कोसलपुर जाई। जन्मत भयउँ सूद्र तनु पाई।।

    अर्थ · Hindi

    तेहि कलिजुग कोसलपुर जाई। जन्मत भयउँ सूद्र तनु पाई।।

  854. RCM 7.97.2Open verse →

    सिव सेवक मन क्रम अरु बानी। आन देव निंदक अभिमानी।।

    अर्थ · Hindi

    सिव सेवक मन क्रम अरु बानी। आन देव निंदक अभिमानी।।

  855. RCM 7.97.3Open verse →

    धन मद मत्त परम बाचाला। उग्रबुद्धि उर दंभ बिसाला।।

    अर्थ · Hindi

    धन मद मत्त परम बाचाला। उग्रबुद्धि उर दंभ बिसाला।।

  856. RCM 7.97.4Open verse →

    जदपि रहेउँ रघुपति रजधानी। तदपि न कछु महिमा तब जानी।।

    अर्थ · Hindi

    जदपि रहेउँ रघुपति रजधानी। तदपि न कछु महिमा तब जानी।।

  857. RCM 7.97.5Open verse →

    अब जाना मैं अवध प्रभावा। निगमागम पुरान अस गावा।।

    अर्थ · Hindi

    अब जाना मैं अवध प्रभावा। निगमागम पुरान अस गावा।।

  858. RCM 7.97.6Open verse →

    कवनेहुँ जन्म अवध बस जोई। राम परायन सो परि होई।।

    अर्थ · Hindi

    कवनेहुँ जन्म अवध बस जोई। राम परायन सो परि होई।।

  859. RCM 7.97.7Open verse →

    अवध प्रभाव जान तब प्रानी। जब उर बसहिं रामु धनुपानी।।

    अर्थ · Hindi

    अवध प्रभाव जान तब प्रानी। जब उर बसहिं रामु धनुपानी।।

  860. RCM 7.97.8Open verse →

    सो कलिकाल कठिन उरगारी। पाप परायन सब नर नारी।।

    अर्थ · Hindi

    सो कलिकाल कठिन उरगारी। पाप परायन सब नर नारी।।

  861. RCM 7.98.1Open verse →

    बरन धर्म नहिं आश्रम चारी। श्रुति बिरोध रत सब नर नारी।।

    अर्थ · Hindi

    बरन धर्म नहिं आश्रम चारी। श्रुति बिरोध रत सब नर नारी।।

  862. RCM 7.98.2Open verse →

    द्विज श्रुति बेचक भूप प्रजासन। कोउ नहिं मान निगम अनुसासन।।

    अर्थ · Hindi

    द्विज श्रुति बेचक भूप प्रजासन। कोउ नहिं मान निगम अनुसासन।।

  863. RCM 7.98.3Open verse →

    मारग सोइ जा कहुँ जोइ भावा। पंडित सोइ जो गाल बजावा।।

    अर्थ · Hindi

    मारग सोइ जा कहुँ जोइ भावा। पंडित सोइ जो गाल बजावा।।

  864. RCM 7.98.4Open verse →

    मिथ्यारंभ दंभ रत जोई। ता कहुँ संत कहइ सब कोई।।

    अर्थ · Hindi

    मिथ्यारंभ दंभ रत जोई। ता कहुँ संत कहइ सब कोई।।

  865. RCM 7.98.5Open verse →

    सोइ सयान जो परधन हारी। जो कर दंभ सो बड़ आचारी।।

    अर्थ · Hindi

    सोइ सयान जो परधन हारी। जो कर दंभ सो बड़ आचारी।।

  866. RCM 7.98.6Open verse →

    जौ कह झूँठ मसखरी जाना। कलिजुग सोइ गुनवंत बखाना।।

    अर्थ · Hindi

    जौ कह झूँठ मसखरी जाना। कलिजुग सोइ गुनवंत बखाना।।

  867. RCM 7.98.7Open verse →

    निराचार जो श्रुति पथ त्यागी। कलिजुग सोइ ग्यानी सो बिरागी।।

    अर्थ · Hindi

    निराचार जो श्रुति पथ त्यागी। कलिजुग सोइ ग्यानी सो बिरागी।।

  868. RCM 7.98.8Open verse →

    जाकें नख अरु जटा बिसाला। सोइ तापस प्रसिद्ध कलिकाला।।

    अर्थ · Hindi

    जाकें नख अरु जटा बिसाला। सोइ तापस प्रसिद्ध कलिकाला।।

  869. RCM 7.99.1Open verse →

    नारि बिबस नर सकल गोसाई। नाचहिं नट मर्कट की नाई।।

    अर्थ · Hindi

    नारि बिबस नर सकल गोसाई। नाचहिं नट मर्कट की नाई।।

  870. RCM 7.99.2Open verse →

    सूद्र द्विजन्ह उपदेसहिं ग्याना। मेलि जनेऊ लेहिं कुदाना।।

    अर्थ · Hindi

    सूद्र द्विजन्ह उपदेसहिं ग्याना। मेलि जनेऊ लेहिं कुदाना।।

  871. RCM 7.99.3Open verse →

    सब नर काम लोभ रत क्रोधी। देव बिप्र श्रुति संत बिरोधी।।

    अर्थ · Hindi

    सब नर काम लोभ रत क्रोधी। देव बिप्र श्रुति संत बिरोधी।।

  872. RCM 7.99.4Open verse →

    गुन मंदिर सुंदर पति त्यागी। भजहिं नारि पर पुरुष अभागी।।

    अर्थ · Hindi

    गुन मंदिर सुंदर पति त्यागी। भजहिं नारि पर पुरुष अभागी।।

  873. RCM 7.99.5Open verse →

    सौभागिनीं बिभूषन हीना। बिधवन्ह के सिंगार नबीना।।

    अर्थ · Hindi

    सौभागिनीं बिभूषन हीना। बिधवन्ह के सिंगार नबीना।।

  874. RCM 7.99.6Open verse →

    गुर सिष बधिर अंध का लेखा। एक न सुनइ एक नहिं देखा।।

    अर्थ · Hindi

    गुर सिष बधिर अंध का लेखा। एक न सुनइ एक नहिं देखा।।

  875. RCM 7.99.7Open verse →

    हरइ सिष्य धन सोक न हरई। सो गुर घोर नरक महुँ परई।।

    अर्थ · Hindi

    हरइ सिष्य धन सोक न हरई। सो गुर घोर नरक महुँ परई।।

  876. RCM 7.99.8Open verse →

    मातु पिता बालकन्हि बोलाबहिं। उदर भरै सोइ धर्म सिखावहिं।।

    अर्थ · Hindi

    मातु पिता बालकन्हि बोलाबहिं। उदर भरै सोइ धर्म सिखावहिं।।

  877. RCM 7.100.1Open verse →

    पर त्रिय लंपट कपट सयाने। मोह द्रोह ममता लपटाने।।

    अर्थ · Hindi

    पर त्रिय लंपट कपट सयाने। मोह द्रोह ममता लपटाने।।

  878. RCM 7.100.2Open verse →

    तेइ अभेदबादी ग्यानी नर। देखा में चरित्र कलिजुग कर।।

    अर्थ · Hindi

    तेइ अभेदबादी ग्यानी नर। देखा में चरित्र कलिजुग कर।।

  879. RCM 7.100.3Open verse →

    आपु गए अरु तिन्हहू घालहिं। जे कहुँ सत मारग प्रतिपालहिं।।

    अर्थ · Hindi

    आपु गए अरु तिन्हहू घालहिं। जे कहुँ सत मारग प्रतिपालहिं।।

  880. RCM 7.100.4Open verse →

    कल्प कल्प भरि एक एक नरका। परहिं जे दूषहिं श्रुति करि तरका।।

    अर्थ · Hindi

    कल्प कल्प भरि एक एक नरका। परहिं जे दूषहिं श्रुति करि तरका।।

  881. RCM 7.100.5Open verse →

    जे बरनाधम तेलि कुम्हारा। स्वपच किरात कोल कलवारा।।

    अर्थ · Hindi

    जे बरनाधम तेलि कुम्हारा। स्वपच किरात कोल कलवारा।।

  882. RCM 7.100.6Open verse →

    नारि मुई गृह संपति नासी। मूड़ मुड़ाइ होहिं सन्यासी।।

    अर्थ · Hindi

    नारि मुई गृह संपति नासी। मूड़ मुड़ाइ होहिं सन्यासी।।

  883. RCM 7.100.7Open verse →

    ते बिप्रन्ह सन आपु पुजावहिं। उभय लोक निज हाथ नसावहिं।।

    अर्थ · Hindi

    ते बिप्रन्ह सन आपु पुजावहिं। उभय लोक निज हाथ नसावहिं।।

  884. RCM 7.100.8Open verse →

    बिप्र निरच्छर लोलुप कामी। निराचार सठ बृषली स्वामी।।

    अर्थ · Hindi

    बिप्र निरच्छर लोलुप कामी। निराचार सठ बृषली स्वामी।।

  885. RCM 7.100.9Open verse →

    सूद्र करहिं जप तप ब्रत नाना। बैठि बरासन कहहिं पुराना।।

    अर्थ · Hindi

    सूद्र करहिं जप तप ब्रत नाना। बैठि बरासन कहहिं पुराना।।

  886. RCM 7.100.10Open verse →

    सब नर कल्पित करहिं अचारा। जाइ न बरनि अनीति अपारा।।

    अर्थ · Hindi

    सब नर कल्पित करहिं अचारा। जाइ न बरनि अनीति अपारा।।

  887. RCM 7.101.1Open verse →

    बहु दाम सँवारहिं धाम जती। बिषया हरि लीन्हि न रहि बिरती।।

    अर्थ · Hindi

    बहु दाम सँवारहिं धाम जती। बिषया हरि लीन्हि न रहि बिरती।।

  888. RCM 7.101.2Open verse →

    तपसी धनवंत दरिद्र गृही। कलि कौतुक तात न जात कही।।

    अर्थ · Hindi

    तपसी धनवंत दरिद्र गृही। कलि कौतुक तात न जात कही।।

  889. RCM 7.101.3Open verse →

    कुलवंति निकारहिं नारि सती। गृह आनिहिं चेरी निबेरि गती।।

    अर्थ · Hindi

    कुलवंति निकारहिं नारि सती। गृह आनिहिं चेरी निबेरि गती।।

  890. RCM 7.101.4Open verse →

    सुत मानहिं मातु पिता तब लौं। अबलानन दीख नहीं जब लौं।।

    अर्थ · Hindi

    सुत मानहिं मातु पिता तब लौं। अबलानन दीख नहीं जब लौं।।

  891. RCM 7.101.5Open verse →

    ससुरारि पिआरि लगी जब तें। रिपरूप कुटुंब भए तब तें।।

    अर्थ · Hindi

    ससुरारि पिआरि लगी जब तें। रिपरूप कुटुंब भए तब तें।।

  892. RCM 7.101.6Open verse →

    नृप पाप परायन धर्म नहीं। करि दंड बिडंब प्रजा नितहीं।।

    अर्थ · Hindi

    नृप पाप परायन धर्म नहीं। करि दंड बिडंब प्रजा नितहीं।।

  893. RCM 7.101.7Open verse →

    धनवंत कुलीन मलीन अपी। द्विज चिन्ह जनेउ उघार तपी।।

    अर्थ · Hindi

    धनवंत कुलीन मलीन अपी। द्विज चिन्ह जनेउ उघार तपी।।

  894. RCM 7.101.8Open verse →

    नहिं मान पुरान न बेदहि जो। हरि सेवक संत सही कलि सो।।

    अर्थ · Hindi

    नहिं मान पुरान न बेदहि जो। हरि सेवक संत सही कलि सो।।

  895. RCM 7.101.9Open verse →

    कबि बृंद उदार दुनी न सुनी। गुन दूषक ब्रात न कोपि गुनी।।

    अर्थ · Hindi

    कबि बृंद उदार दुनी न सुनी। गुन दूषक ब्रात न कोपि गुनी।।

  896. RCM 7.101.10Open verse →

    कलि बारहिं बार दुकाल परै। बिनु अन्न दुखी सब लोग मरै।।

    अर्थ · Hindi

    कलि बारहिं बार दुकाल परै। बिनु अन्न दुखी सब लोग मरै।।

  897. RCM 7.102.1Open verse →

    अबला कच भूषन भूरि छुधा। धनहीन दुखी ममता बहुधा।।

    अर्थ · Hindi

    अबला कच भूषन भूरि छुधा। धनहीन दुखी ममता बहुधा।।

  898. RCM 7.102.2Open verse →

    सुख चाहहिं मूढ़ न धर्म रता। मति थोरि कठोरि न कोमलता।।1।।

    अर्थ · Hindi

    सुख चाहहिं मूढ़ न धर्म रता। मति थोरि कठोरि न कोमलता।।1।।

  899. RCM 7.102.3Open verse →

    नर पीड़ित रोग न भोग कहीं। अभिमान बिरोध अकारनहीं।।

    अर्थ · Hindi

    नर पीड़ित रोग न भोग कहीं। अभिमान बिरोध अकारनहीं।।

  900. RCM 7.102.4Open verse →

    लघु जीवन संबतु पंच दसा। कलपांत न नास गुमानु असा।।2।।

    अर्थ · Hindi

    लघु जीवन संबतु पंच दसा। कलपांत न नास गुमानु असा।।2।।

  901. RCM 7.102.5Open verse →

    कलिकाल बिहाल किए मनुजा। नहिं मानत क्वौ अनुजा तनुजा।

    अर्थ · Hindi

    कलिकाल बिहाल किए मनुजा। नहिं मानत क्वौ अनुजा तनुजा।

  902. RCM 7.102.6Open verse →

    नहिं तोष बिचार न सीतलता। सब जाति कुजाति भए मगता।।3।।

    अर्थ · Hindi

    नहिं तोष बिचार न सीतलता। सब जाति कुजाति भए मगता।।3।।

  903. RCM 7.102.7Open verse →

    इरिषा परुषाच्छर लोलुपता। भरि पूरि रही समता बिगता।।

    अर्थ · Hindi

    इरिषा परुषाच्छर लोलुपता। भरि पूरि रही समता बिगता।।

  904. RCM 7.102.8Open verse →

    सब लोग बियोग बिसोक हुए। बरनाश्रम धर्म अचार गए।।4।।

    अर्थ · Hindi

    सब लोग बियोग बिसोक हुए। बरनाश्रम धर्म अचार गए।।4।।

  905. RCM 7.102.9Open verse →

    दम दान दया नहिं जानपनी। जड़ता परबंचनताति घनी।।

    अर्थ · Hindi

    दम दान दया नहिं जानपनी। जड़ता परबंचनताति घनी।।

  906. RCM 7.102.10Open verse →

    तनु पोषक नारि नरा सगरे। परनिंदक जे जग मो बगरे।।5।।

    अर्थ · Hindi

    तनु पोषक नारि नरा सगरे। परनिंदक जे जग मो बगरे।।5।।

  907. RCM 7.103.1Open verse →

    कृतजुग सब जोगी बिग्यानी। करि हरि ध्यान तरहिं भव प्रानी।।

    अर्थ · Hindi

    कृतजुग सब जोगी बिग्यानी। करि हरि ध्यान तरहिं भव प्रानी।।

  908. RCM 7.103.2Open verse →

    त्रेताँ बिबिध जग्य नर करहीं। प्रभुहि समर्पि कर्म भव तरहीं।।

    अर्थ · Hindi

    त्रेताँ बिबिध जग्य नर करहीं। प्रभुहि समर्पि कर्म भव तरहीं।।

  909. RCM 7.103.3Open verse →

    द्वापर करि रघुपति पद पूजा। नर भव तरहिं उपाय न दूजा।।

    अर्थ · Hindi

    द्वापर करि रघुपति पद पूजा। नर भव तरहिं उपाय न दूजा।।

  910. RCM 7.103.4Open verse →

    कलिजुग केवल हरि गुन गाहा। गावत नर पावहिं भव थाहा।।

    अर्थ · Hindi

    कलिजुग केवल हरि गुन गाहा। गावत नर पावहिं भव थाहा।।

  911. RCM 7.103.5Open verse →

    कलिजुग जोग न जग्य न ग्याना। एक अधार राम गुन गाना।।

    अर्थ · Hindi

    कलिजुग जोग न जग्य न ग्याना। एक अधार राम गुन गाना।।

  912. RCM 7.103.6Open verse →

    सब भरोस तजि जो भज रामहि। प्रेम समेत गाव गुन ग्रामहि।।

    अर्थ · Hindi

    सब भरोस तजि जो भज रामहि। प्रेम समेत गाव गुन ग्रामहि।।

  913. RCM 7.103.7Open verse →

    सोइ भव तर कछु संसय नाहीं। नाम प्रताप प्रगट कलि माहीं।।

    अर्थ · Hindi

    सोइ भव तर कछु संसय नाहीं। नाम प्रताप प्रगट कलि माहीं।।

  914. RCM 7.103.8Open verse →

    कलि कर एक पुनीत प्रतापा। मानस पुन्य होहिं नहिं पापा।।

    अर्थ · Hindi

    कलि कर एक पुनीत प्रतापा। मानस पुन्य होहिं नहिं पापा।।

  915. RCM 7.104.1Open verse →

    नित जुग धर्म होहिं सब केरे। हृदयँ राम माया के प्रेरे।।

    अर्थ · Hindi

    नित जुग धर्म होहिं सब केरे। हृदयँ राम माया के प्रेरे।।

  916. RCM 7.104.2Open verse →

    सुद्ध सत्व समता बिग्याना। कृत प्रभाव प्रसन्न मन जाना।।

    अर्थ · Hindi

    सुद्ध सत्व समता बिग्याना। कृत प्रभाव प्रसन्न मन जाना।।

  917. RCM 7.104.3Open verse →

    सत्व बहुत रज कछु रति कर्मा। सब बिधि सुख त्रेता कर धर्मा।।

    अर्थ · Hindi

    सत्व बहुत रज कछु रति कर्मा। सब बिधि सुख त्रेता कर धर्मा।।

  918. RCM 7.104.4Open verse →

    बहु रज स्वल्प सत्व कछु तामस। द्वापर धर्म हरष भय मानस।।

    अर्थ · Hindi

    बहु रज स्वल्प सत्व कछु तामस। द्वापर धर्म हरष भय मानस।।

  919. RCM 7.104.5Open verse →

    तामस बहुत रजोगुन थोरा। कलि प्रभाव बिरोध चहुँ ओरा।।

    अर्थ · Hindi

    तामस बहुत रजोगुन थोरा। कलि प्रभाव बिरोध चहुँ ओरा।।

  920. RCM 7.104.6Open verse →

    बुध जुग धर्म जानि मन माहीं। तजि अधर्म रति धर्म कराहीं।।

    अर्थ · Hindi

    बुध जुग धर्म जानि मन माहीं। तजि अधर्म रति धर्म कराहीं।।

  921. RCM 7.104.7Open verse →

    काल धर्म नहिं ब्यापहिं ताही। रघुपति चरन प्रीति अति जाही।।

    अर्थ · Hindi

    काल धर्म नहिं ब्यापहिं ताही। रघुपति चरन प्रीति अति जाही।।

  922. RCM 7.104.8Open verse →

    नट कृत बिकट कपट खगराया। नट सेवकहि न ब्यापइ माया।।

    अर्थ · Hindi

    नट कृत बिकट कपट खगराया। नट सेवकहि न ब्यापइ माया।।

  923. RCM 7.105.1Open verse →

    गयउँ उजेनी सुनु उरगारी। दीन मलीन दरिद्र दुखारी।।

    अर्थ · Hindi

    गयउँ उजेनी सुनु उरगारी। दीन मलीन दरिद्र दुखारी।।

  924. RCM 7.105.2Open verse →

    गएँ काल कछु संपति पाई। तहँ पुनि करउँ संभु सेवकाई।।

    अर्थ · Hindi

    गएँ काल कछु संपति पाई। तहँ पुनि करउँ संभु सेवकाई।।

  925. RCM 7.105.3Open verse →

    बिप्र एक बैदिक सिव पूजा। करइ सदा तेहि काजु न दूजा।।

    अर्थ · Hindi

    बिप्र एक बैदिक सिव पूजा। करइ सदा तेहि काजु न दूजा।।

  926. RCM 7.105.4Open verse →

    परम साधु परमारथ बिंदक। संभु उपासक नहिं हरि निंदक।।

    अर्थ · Hindi

    परम साधु परमारथ बिंदक। संभु उपासक नहिं हरि निंदक।।

  927. RCM 7.105.5Open verse →

    तेहि सेवउँ मैं कपट समेता। द्विज दयाल अति नीति निकेता।।

    अर्थ · Hindi

    तेहि सेवउँ मैं कपट समेता। द्विज दयाल अति नीति निकेता।।

  928. RCM 7.105.6Open verse →

    बाहिज नम्र देखि मोहि साईं। बिप्र पढ़ाव पुत्र की नाईं।।

    अर्थ · Hindi

    बाहिज नम्र देखि मोहि साईं। बिप्र पढ़ाव पुत्र की नाईं।।

  929. RCM 7.105.7Open verse →

    संभु मंत्र मोहि द्विजबर दीन्हा। सुभ उपदेस बिबिध बिधि कीन्हा।।

    अर्थ · Hindi

    संभु मंत्र मोहि द्विजबर दीन्हा। सुभ उपदेस बिबिध बिधि कीन्हा।।

  930. RCM 7.105.8Open verse →

    जपउँ मंत्र सिव मंदिर जाई। हृदयँ दंभ अहमिति अधिकाई।।

    अर्थ · Hindi

    जपउँ मंत्र सिव मंदिर जाई। हृदयँ दंभ अहमिति अधिकाई।।

  931. RCM 7.106.1Open verse →

    एक बार गुर लीन्ह बोलाई। मोहि नीति बहु भाँति सिखाई।।

    अर्थ · Hindi

    एक बार गुर लीन्ह बोलाई। मोहि नीति बहु भाँति सिखाई।।

  932. RCM 7.106.2Open verse →

    सिव सेवा कर फल सुत सोई। अबिरल भगति राम पद होई।।

    अर्थ · Hindi

    सिव सेवा कर फल सुत सोई। अबिरल भगति राम पद होई।।

  933. RCM 7.106.3Open verse →

    रामहि भजहिं तात सिव धाता। नर पावँर कै केतिक बाता।।

    अर्थ · Hindi

    रामहि भजहिं तात सिव धाता। नर पावँर कै केतिक बाता।।

  934. RCM 7.106.4Open verse →

    जासु चरन अज सिव अनुरागी। तातु द्रोहँ सुख चहसि अभागी।।

    अर्थ · Hindi

    जासु चरन अज सिव अनुरागी। तातु द्रोहँ सुख चहसि अभागी।।

  935. RCM 7.106.5Open verse →

    हर कहुँ हरि सेवक गुर कहेऊ। सुनि खगनाथ हृदय मम दहेऊ।।

    अर्थ · Hindi

    हर कहुँ हरि सेवक गुर कहेऊ। सुनि खगनाथ हृदय मम दहेऊ।।

  936. RCM 7.106.6Open verse →

    अधम जाति मैं बिद्या पाएँ। भयउँ जथा अहि दूध पिआएँ।।

    अर्थ · Hindi

    अधम जाति मैं बिद्या पाएँ। भयउँ जथा अहि दूध पिआएँ।।

  937. RCM 7.106.7Open verse →

    मानी कुटिल कुभाग्य कुजाती। गुर कर द्रोह करउँ दिनु राती।।

    अर्थ · Hindi

    मानी कुटिल कुभाग्य कुजाती। गुर कर द्रोह करउँ दिनु राती।।

  938. RCM 7.106.8Open verse →

    अति दयाल गुर स्वल्प न क्रोधा। पुनि पुनि मोहि सिखाव सुबोधा।।

    अर्थ · Hindi

    अति दयाल गुर स्वल्प न क्रोधा। पुनि पुनि मोहि सिखाव सुबोधा।।

  939. RCM 7.106.9Open verse →

    जेहि ते नीच बड़ाई पावा। सो प्रथमहिं हति ताहि नसावा।।

    अर्थ · Hindi

    जेहि ते नीच बड़ाई पावा। सो प्रथमहिं हति ताहि नसावा।।

  940. RCM 7.106.10Open verse →

    धूम अनल संभव सुनु भाई। तेहि बुझाव घन पदवी पाई।।

    अर्थ · Hindi

    धूम अनल संभव सुनु भाई। तेहि बुझाव घन पदवी पाई।।

  941. RCM 7.106.11Open verse →

    रज मग परी निरादर रहई। सब कर पद प्रहार नित सहई।।

    अर्थ · Hindi

    रज मग परी निरादर रहई। सब कर पद प्रहार नित सहई।।

  942. RCM 7.106.12Open verse →

    मरुत उड़ाव प्रथम तेहि भरई। पुनि नृप नयन किरीटन्हि परई।।

    अर्थ · Hindi

    मरुत उड़ाव प्रथम तेहि भरई। पुनि नृप नयन किरीटन्हि परई।।

  943. RCM 7.106.13Open verse →

    सुनु खगपति अस समुझि प्रसंगा। बुध नहिं करहिं अधम कर संगा।।

    अर्थ · Hindi

    सुनु खगपति अस समुझि प्रसंगा। बुध नहिं करहिं अधम कर संगा।।

  944. RCM 7.106.14Open verse →

    कबि कोबिद गावहिं असि नीती। खल सन कलह न भल नहिं प्रीती।।

    अर्थ · Hindi

    कबि कोबिद गावहिं असि नीती। खल सन कलह न भल नहिं प्रीती।।

  945. RCM 7.106.15Open verse →

    उदासीन नित रहिअ गोसाईं। खल परिहरिअ स्वान की नाईं।।

    अर्थ · Hindi

    उदासीन नित रहिअ गोसाईं। खल परिहरिअ स्वान की नाईं।।

  946. RCM 7.106.16Open verse →

    मैं खल हृदयँ कपट कुटिलाई। गुर हित कहइ न मोहि सोहाई।।

    अर्थ · Hindi

    मैं खल हृदयँ कपट कुटिलाई। गुर हित कहइ न मोहि सोहाई।।

  947. RCM 7.107.1Open verse →

    मंदिर माझ भई नभ बानी। रे हतभाग्य अग्य अभिमानी।।

    अर्थ · Hindi

    मंदिर माझ भई नभ बानी। रे हतभाग्य अग्य अभिमानी।।

  948. RCM 7.107.2Open verse →

    जद्यपि तव गुर कें नहिं क्रोधा। अति कृपाल चित सम्यक बोधा।।

    अर्थ · Hindi

    जद्यपि तव गुर कें नहिं क्रोधा। अति कृपाल चित सम्यक बोधा।।

  949. RCM 7.107.3Open verse →

    तदपि साप सठ दैहउँ तोही। नीति बिरोध सोहाइ न मोही।।

    अर्थ · Hindi

    तदपि साप सठ दैहउँ तोही। नीति बिरोध सोहाइ न मोही।।

  950. RCM 7.107.4Open verse →

    जौं नहिं दंड करौं खल तोरा। भ्रष्ट होइ श्रुतिमारग मोरा।।

    अर्थ · Hindi

    जौं नहिं दंड करौं खल तोरा। भ्रष्ट होइ श्रुतिमारग मोरा।।

  951. RCM 7.107.5Open verse →

    जे सठ गुर सन इरिषा करहीं। रौरव नरक कोटि जुग परहीं।।

    अर्थ · Hindi

    जे सठ गुर सन इरिषा करहीं। रौरव नरक कोटि जुग परहीं।।

  952. RCM 7.107.6Open verse →

    त्रिजग जोनि पुनि धरहिं सरीरा। अयुत जन्म भरि पावहिं पीरा।।

    अर्थ · Hindi

    त्रिजग जोनि पुनि धरहिं सरीरा। अयुत जन्म भरि पावहिं पीरा।।

  953. RCM 7.107.7Open verse →

    बैठ रहेसि अजगर इव पापी। सर्प होहि खल मल मति ब्यापी।।

    अर्थ · Hindi

    बैठ रहेसि अजगर इव पापी। सर्प होहि खल मल मति ब्यापी।।

  954. RCM 7.107.8Open verse →

    महा बिटप कोटर महुँ जाई।।रहु अधमाधम अधगति पाई।।

    अर्थ · Hindi

    महा बिटप कोटर महुँ जाई।।रहु अधमाधम अधगति पाई।।

  955. RCM 7.108.1Open verse →

    नमामीशमीशान निर्वाणरूपं। विंभुं ब्यापकं ब्रह्म वेदस्वरूपं।

    अर्थ · Hindi

    नमामीशमीशान निर्वाणरूपं। विंभुं ब्यापकं ब्रह्म वेदस्वरूपं।

  956. RCM 7.108.2Open verse →

    निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरींह। चिदाकाशमाकाशवासं भजेऽहं।।

    अर्थ · Hindi

    निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरींह। चिदाकाशमाकाशवासं भजेऽहं।।

  957. RCM 7.108.3Open verse →

    निराकारमोंकारमूलं तुरीयं। गिरा ग्यान गोतीतमीशं गिरीशं।।

    अर्थ · Hindi

    निराकारमोंकारमूलं तुरीयं। गिरा ग्यान गोतीतमीशं गिरीशं।।

  958. RCM 7.108.4Open verse →

    करालं महाकाल कालं कृपालं। गुणागार संसारपारं नतोऽहं।।

    अर्थ · Hindi

    करालं महाकाल कालं कृपालं। गुणागार संसारपारं नतोऽहं।।

  959. RCM 7.108.5Open verse →

    तुषाराद्रि संकाश गौरं गभीरं। मनोभूत कोटि प्रभा श्री शरीरं।।

    अर्थ · Hindi

    तुषाराद्रि संकाश गौरं गभीरं। मनोभूत कोटि प्रभा श्री शरीरं।।

  960. RCM 7.108.6Open verse →

    स्फुरन्मौलि कल्लोलिनी चारु गंगा। लसद्भालबालेन्दु कंठे भुजंगा।।

    अर्थ · Hindi

    स्फुरन्मौलि कल्लोलिनी चारु गंगा। लसद्भालबालेन्दु कंठे भुजंगा।।

  961. RCM 7.108.7Open verse →

    चलत्कुंडलं भ्रू सुनेत्रं विशालं। प्रसन्नाननं नीलकंठं दयालं।।

    अर्थ · Hindi

    चलत्कुंडलं भ्रू सुनेत्रं विशालं। प्रसन्नाननं नीलकंठं दयालं।।

  962. RCM 7.108.8Open verse →

    मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं। प्रियं शंकरं सर्वनाथं भजामि।।

    अर्थ · Hindi

    मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं। प्रियं शंकरं सर्वनाथं भजामि।।

  963. RCM 7.108.9Open verse →

    प्रचंडं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं। अखंडं अजं भानुकोटिप्रकाशं।।

    अर्थ · Hindi

    प्रचंडं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं। अखंडं अजं भानुकोटिप्रकाशं।।

  964. RCM 7.108.10Open verse →

    त्रयःशूल निर्मूलनं शूलपाणिं। भजेऽहं भवानीपतिं भावगम्यं।।

    अर्थ · Hindi

    त्रयःशूल निर्मूलनं शूलपाणिं। भजेऽहं भवानीपतिं भावगम्यं।।

  965. RCM 7.108.11Open verse →

    कलातीत कल्याण कल्पान्तकारी। सदा सज्जनान्ददाता पुरारी।।

    अर्थ · Hindi

    कलातीत कल्याण कल्पान्तकारी। सदा सज्जनान्ददाता पुरारी।।

  966. RCM 7.108.12Open verse →

    चिदानंदसंदोह मोहापहारी। प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी।।

    अर्थ · Hindi

    चिदानंदसंदोह मोहापहारी। प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी।।

  967. RCM 7.108.13Open verse →

    न यावद् उमानाथ पादारविन्दं। भजंतीह लोके परे वा नराणां।।

    अर्थ · Hindi

    न यावद् उमानाथ पादारविन्दं। भजंतीह लोके परे वा नराणां।।

  968. RCM 7.108.14Open verse →

    न तावत्सुखं शान्ति सन्तापनाशं। प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासं।।

    अर्थ · Hindi

    न तावत्सुखं शान्ति सन्तापनाशं। प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासं।।

  969. RCM 7.108.15Open verse →

    न जानामि योगं जपं नैव पूजां। नतोऽहं सदा सर्वदा शंभु तुभ्यं।।

    अर्थ · Hindi

    न जानामि योगं जपं नैव पूजां। नतोऽहं सदा सर्वदा शंभु तुभ्यं।।

  970. RCM 7.108.16Open verse →

    जरा जन्म दुःखौघ तातप्यमानं। प्रभो पाहि आपन्नमामीश शंभो।।

    अर्थ · Hindi

    जरा जन्म दुःखौघ तातप्यमानं। प्रभो पाहि आपन्नमामीश शंभो।।

  971. RCM 7.108.17Open verse →

    श्लोक

    अर्थ · Hindi

    श्लोक

  972. RCM 7.108.18Open verse →

    रुद्राष्टकमिदं प्रोक्तं विप्रेण हरतोषये।

    अर्थ · Hindi

    रुद्राष्टकमिदं प्रोक्तं विप्रेण हरतोषये।

  973. RCM 7.108.19Open verse →

    ये पठन्ति नरा भक्त्या तेषां शम्भुः प्रसीदति।।9।।

    अर्थ · Hindi

    ये पठन्ति नरा भक्त्या तेषां शम्भुः प्रसीदति।।9।।

  974. RCM 7.108.20Open verse →

    सुनि बिनती सर्बग्य सिव देखि ब्रिप्र अनुरागु।

    अर्थ · Hindi

    सुनि बिनती सर्बग्य सिव देखि ब्रिप्र अनुरागु।

  975. RCM 7.108.21Open verse →

    पुनि मंदिर नभबानी भइ द्विजबर बर मागु।।108(क)।।

    अर्थ · Hindi

    पुनि मंदिर नभबानी भइ द्विजबर बर मागु।।108(क)।।

  976. RCM 7.108.22Open verse →

    जौं प्रसन्न प्रभु मो पर नाथ दीन पर नेहु।

    अर्थ · Hindi

    जौं प्रसन्न प्रभु मो पर नाथ दीन पर नेहु।

  977. RCM 7.108.23Open verse →

    निज पद भगति देइ प्रभु पुनि दूसर बर देहु।।108(ख)।।

    अर्थ · Hindi

    निज पद भगति देइ प्रभु पुनि दूसर बर देहु।।108(ख)।।

  978. RCM 7.108.24Open verse →

    तव माया बस जीव जड़ संतत फिरइ भुलान।

    अर्थ · Hindi

    तव माया बस जीव जड़ संतत फिरइ भुलान।

  979. RCM 7.108.25Open verse →

    तेहि पर क्रोध न करिअ प्रभु कृपा सिंधु भगवान।।108(ग)।।

    अर्थ · Hindi

    तेहि पर क्रोध न करिअ प्रभु कृपा सिंधु भगवान।।108(ग)।।

  980. RCM 7.108.26Open verse →

    संकर दीनदयाल अब एहि पर होहु कृपाल।

    अर्थ · Hindi

    संकर दीनदयाल अब एहि पर होहु कृपाल।

  981. RCM 7.108.27Open verse →

    साप अनुग्रह होइ जेहिं नाथ थोरेहीं काल।।108(घ)।।

    अर्थ · Hindi

    साप अनुग्रह होइ जेहिं नाथ थोरेहीं काल।।108(घ)।।

  982. RCM 7.109.1Open verse →

    एहि कर होइ परम कल्याना। सोइ करहु अब कृपानिधाना।।

    अर्थ · Hindi

    एहि कर होइ परम कल्याना। सोइ करहु अब कृपानिधाना।।

  983. RCM 7.109.2Open verse →

    बिप्रगिरा सुनि परहित सानी। एवमस्तु इति भइ नभबानी।।

    अर्थ · Hindi

    बिप्रगिरा सुनि परहित सानी। एवमस्तु इति भइ नभबानी।।

  984. RCM 7.109.3Open verse →

    जदपि कीन्ह एहिं दारुन पापा। मैं पुनि दीन्ह कोप करि सापा।।

    अर्थ · Hindi

    जदपि कीन्ह एहिं दारुन पापा। मैं पुनि दीन्ह कोप करि सापा।।

  985. RCM 7.109.4Open verse →

    तदपि तुम्हार साधुता देखी। करिहउँ एहि पर कृपा बिसेषी।।

    अर्थ · Hindi

    तदपि तुम्हार साधुता देखी। करिहउँ एहि पर कृपा बिसेषी।।

  986. RCM 7.109.5Open verse →

    छमासील जे पर उपकारी। ते द्विज मोहि प्रिय जथा खरारी।।

    अर्थ · Hindi

    छमासील जे पर उपकारी। ते द्विज मोहि प्रिय जथा खरारी।।

  987. RCM 7.109.6Open verse →

    मोर श्राप द्विज ब्यर्थ न जाइहि। जन्म सहस अवस्य यह पाइहि।।

    अर्थ · Hindi

    मोर श्राप द्विज ब्यर्थ न जाइहि। जन्म सहस अवस्य यह पाइहि।।

  988. RCM 7.109.7Open verse →

    जनमत मरत दुसह दुख होई। अहि स्वल्पउ नहिं ब्यापिहि सोई।।

    अर्थ · Hindi

    जनमत मरत दुसह दुख होई। अहि स्वल्पउ नहिं ब्यापिहि सोई।।

  989. RCM 7.109.8Open verse →

    कवनेउँ जन्म मिटिहि नहिं ग्याना। सुनहि सूद्र मम बचन प्रवाना।।

    अर्थ · Hindi

    कवनेउँ जन्म मिटिहि नहिं ग्याना। सुनहि सूद्र मम बचन प्रवाना।।

  990. RCM 7.109.9Open verse →

    रघुपति पुरीं जन्म तब भयऊ। पुनि तैं मम सेवाँ मन दयऊ।।

    अर्थ · Hindi

    रघुपति पुरीं जन्म तब भयऊ। पुनि तैं मम सेवाँ मन दयऊ।।

  991. RCM 7.109.10Open verse →

    पुरी प्रभाव अनुग्रह मोरें। राम भगति उपजिहि उर तोरें।।

    अर्थ · Hindi

    पुरी प्रभाव अनुग्रह मोरें। राम भगति उपजिहि उर तोरें।।

  992. RCM 7.109.11Open verse →

    सुनु मम बचन सत्य अब भाई। हरितोषन ब्रत द्विज सेवकाई।।

    अर्थ · Hindi

    सुनु मम बचन सत्य अब भाई। हरितोषन ब्रत द्विज सेवकाई।।

  993. RCM 7.109.12Open verse →

    अब जनि करहि बिप्र अपमाना। जानेहु संत अनंत समाना।।

    अर्थ · Hindi

    अब जनि करहि बिप्र अपमाना। जानेहु संत अनंत समाना।।

  994. RCM 7.109.13Open verse →

    इंद्र कुलिस मम सूल बिसाला। कालदंड हरि चक्र कराला।।

    अर्थ · Hindi

    इंद्र कुलिस मम सूल बिसाला। कालदंड हरि चक्र कराला।।

  995. RCM 7.109.14Open verse →

    जो इन्ह कर मारा नहिं मरई। बिप्रद्रोह पावक सो जरई।।

    अर्थ · Hindi

    जो इन्ह कर मारा नहिं मरई। बिप्रद्रोह पावक सो जरई।।

  996. RCM 7.109.15Open verse →

    अस बिबेक राखेहु मन माहीं। तुम्ह कहँ जग दुर्लभ कछु नाहीं।।

    अर्थ · Hindi

    अस बिबेक राखेहु मन माहीं। तुम्ह कहँ जग दुर्लभ कछु नाहीं।।

  997. RCM 7.109.16Open verse →

    औरउ एक आसिषा मोरी। अप्रतिहत गति होइहि तोरी।।

    अर्थ · Hindi

    औरउ एक आसिषा मोरी। अप्रतिहत गति होइहि तोरी।।

  998. RCM 7.110.1Open verse →

    त्रिजग देव नर जोइ तनु धरउँ। तहँ तहँ राम भजन अनुसरऊँ।।

    अर्थ · Hindi

    त्रिजग देव नर जोइ तनु धरउँ। तहँ तहँ राम भजन अनुसरऊँ।।

  999. RCM 7.110.2Open verse →

    एक सूल मोहि बिसर न काऊ। गुर कर कोमल सील सुभाऊ।।

    अर्थ · Hindi

    एक सूल मोहि बिसर न काऊ। गुर कर कोमल सील सुभाऊ।।

  1000. RCM 7.110.3Open verse →

    चरम देह द्विज कै मैं पाई। सुर दुर्लभ पुरान श्रुति गाई।।

    अर्थ · Hindi

    चरम देह द्विज कै मैं पाई। सुर दुर्लभ पुरान श्रुति गाई।।

  1001. RCM 7.110.4Open verse →

    खेलउँ तहूँ बालकन्ह मीला। करउँ सकल रघुनायक लीला।।

    अर्थ · Hindi

    खेलउँ तहूँ बालकन्ह मीला। करउँ सकल रघुनायक लीला।।

  1002. RCM 7.110.5Open verse →

    प्रौढ़ भएँ मोहि पिता पढ़ावा। समझउँ सुनउँ गुनउँ नहिं भावा।।

    अर्थ · Hindi

    प्रौढ़ भएँ मोहि पिता पढ़ावा। समझउँ सुनउँ गुनउँ नहिं भावा।।

  1003. RCM 7.110.6Open verse →

    मन ते सकल बासना भागी। केवल राम चरन लय लागी।।

    अर्थ · Hindi

    मन ते सकल बासना भागी। केवल राम चरन लय लागी।।

  1004. RCM 7.110.7Open verse →

    कहु खगेस अस कवन अभागी। खरी सेव सुरधेनुहि त्यागी।।

    अर्थ · Hindi

    कहु खगेस अस कवन अभागी। खरी सेव सुरधेनुहि त्यागी।।

  1005. RCM 7.110.8Open verse →

    प्रेम मगन मोहि कछु न सोहाई। हारेउ पिता पढ़ाइ पढ़ाई।।

    अर्थ · Hindi

    प्रेम मगन मोहि कछु न सोहाई। हारेउ पिता पढ़ाइ पढ़ाई।।

  1006. RCM 7.110.9Open verse →

    भए कालबस जब पितु माता। मैं बन गयउँ भजन जनत्राता।।

    अर्थ · Hindi

    भए कालबस जब पितु माता। मैं बन गयउँ भजन जनत्राता।।

  1007. RCM 7.110.10Open verse →

    जहँ जहँ बिपिन मुनीस्वर पावउँ। आश्रम जाइ जाइ सिरु नावउँ।।

    अर्थ · Hindi

    जहँ जहँ बिपिन मुनीस्वर पावउँ। आश्रम जाइ जाइ सिरु नावउँ।।

  1008. RCM 7.110.11Open verse →

    बूझत तिन्हहि राम गुन गाहा। कहहिं सुनउँ हरषित खगनाहा।।

    अर्थ · Hindi

    बूझत तिन्हहि राम गुन गाहा। कहहिं सुनउँ हरषित खगनाहा।।

  1009. RCM 7.110.12Open verse →

    सुनत फिरउँ हरि गुन अनुबादा। अब्याहत गति संभु प्रसादा।।

    अर्थ · Hindi

    सुनत फिरउँ हरि गुन अनुबादा। अब्याहत गति संभु प्रसादा।।

  1010. RCM 7.110.13Open verse →

    छूटी त्रिबिध ईषना गाढ़ी। एक लालसा उर अति बाढ़ी।।

    अर्थ · Hindi

    छूटी त्रिबिध ईषना गाढ़ी। एक लालसा उर अति बाढ़ी।।

  1011. RCM 7.110.14Open verse →

    राम चरन बारिज जब देखौं। तब निज जन्म सफल करि लेखौं।।

    अर्थ · Hindi

    राम चरन बारिज जब देखौं। तब निज जन्म सफल करि लेखौं।।

  1012. RCM 7.110.15Open verse →

    जेहि पूँछउँ सोइ मुनि अस कहई। ईस्वर सर्ब भूतमय अहई।।

    अर्थ · Hindi

    जेहि पूँछउँ सोइ मुनि अस कहई। ईस्वर सर्ब भूतमय अहई।।

  1013. RCM 7.110.16Open verse →

    निर्गुन मत नहिं मोहि सोहाई। सगुन ब्रह्म रति उर अधिकाई।।

    अर्थ · Hindi

    निर्गुन मत नहिं मोहि सोहाई। सगुन ब्रह्म रति उर अधिकाई।।

  1014. RCM 7.111.1Open verse →

    तब मुनिष रघुपति गुन गाथा। कहे कछुक सादर खगनाथा।।

    अर्थ · Hindi

    तब मुनिष रघुपति गुन गाथा। कहे कछुक सादर खगनाथा।।

  1015. RCM 7.111.2Open verse →

    ब्रह्मग्यान रत मुनि बिग्यानि। मोहि परम अधिकारी जानी।।

    अर्थ · Hindi

    ब्रह्मग्यान रत मुनि बिग्यानि। मोहि परम अधिकारी जानी।।

  1016. RCM 7.111.3Open verse →

    लागे करन ब्रह्म उपदेसा। अज अद्वेत अगुन हृदयेसा।।

    अर्थ · Hindi

    लागे करन ब्रह्म उपदेसा। अज अद्वेत अगुन हृदयेसा।।

  1017. RCM 7.111.4Open verse →

    अकल अनीह अनाम अरुपा। अनुभव गम्य अखंड अनूपा।।

    अर्थ · Hindi

    अकल अनीह अनाम अरुपा। अनुभव गम्य अखंड अनूपा।।

  1018. RCM 7.111.5Open verse →

    मन गोतीत अमल अबिनासी। निर्बिकार निरवधि सुख रासी।।

    अर्थ · Hindi

    मन गोतीत अमल अबिनासी। निर्बिकार निरवधि सुख रासी।।

  1019. RCM 7.111.6Open verse →

    सो तैं ताहि तोहि नहिं भेदा। बारि बीचि इव गावहि बेदा।।

    अर्थ · Hindi

    सो तैं ताहि तोहि नहिं भेदा। बारि बीचि इव गावहि बेदा।।

  1020. RCM 7.111.7Open verse →

    बिबिध भाँति मोहि मुनि समुझावा। निर्गुन मत मम हृदयँ न आवा।।

    अर्थ · Hindi

    बिबिध भाँति मोहि मुनि समुझावा। निर्गुन मत मम हृदयँ न आवा।।

  1021. RCM 7.111.8Open verse →

    पुनि मैं कहेउँ नाइ पद सीसा। सगुन उपासन कहहु मुनीसा।।

    अर्थ · Hindi

    पुनि मैं कहेउँ नाइ पद सीसा। सगुन उपासन कहहु मुनीसा।।

  1022. RCM 7.111.9Open verse →

    राम भगति जल मम मन मीना। किमि बिलगाइ मुनीस प्रबीना।।

    अर्थ · Hindi

    राम भगति जल मम मन मीना। किमि बिलगाइ मुनीस प्रबीना।।

  1023. RCM 7.111.10Open verse →

    सोइ उपदेस कहहु करि दाया। निज नयनन्हि देखौं रघुराया।।

    अर्थ · Hindi

    सोइ उपदेस कहहु करि दाया। निज नयनन्हि देखौं रघुराया।।

  1024. RCM 7.111.11Open verse →

    भरि लोचन बिलोकि अवधेसा। तब सुनिहउँ निर्गुन उपदेसा।।

    अर्थ · Hindi

    भरि लोचन बिलोकि अवधेसा। तब सुनिहउँ निर्गुन उपदेसा।।

  1025. RCM 7.111.12Open verse →

    मुनि पुनि कहि हरिकथा अनूपा। खंडि सगुन मत अगुन निरूपा।।

    अर्थ · Hindi

    मुनि पुनि कहि हरिकथा अनूपा। खंडि सगुन मत अगुन निरूपा।।

  1026. RCM 7.111.13Open verse →

    तब मैं निर्गुन मत कर दूरी। सगुन निरूपउँ करि हठ भूरी।।

    अर्थ · Hindi

    तब मैं निर्गुन मत कर दूरी। सगुन निरूपउँ करि हठ भूरी।।

  1027. RCM 7.111.14Open verse →

    उत्तर प्रतिउत्तर मैं कीन्हा। मुनि तन भए क्रोध के चीन्हा।।

    अर्थ · Hindi

    उत्तर प्रतिउत्तर मैं कीन्हा। मुनि तन भए क्रोध के चीन्हा।।

  1028. RCM 7.111.15Open verse →

    सुनु प्रभु बहुत अवग्या किएँ। उपज क्रोध ग्यानिन्ह के हिएँ।।

    अर्थ · Hindi

    सुनु प्रभु बहुत अवग्या किएँ। उपज क्रोध ग्यानिन्ह के हिएँ।।

  1029. RCM 7.111.16Open verse →

    अति संघरषन जौं कर कोई। अनल प्रगट चंदन ते होई।।

    अर्थ · Hindi

    अति संघरषन जौं कर कोई। अनल प्रगट चंदन ते होई।।

  1030. RCM 7.112.1Open verse →

    कबहुँ कि दुख सब कर हित ताकें। तेहि कि दरिद्र परस मनि जाकें।।

    अर्थ · Hindi

    कबहुँ कि दुख सब कर हित ताकें। तेहि कि दरिद्र परस मनि जाकें।।

  1031. RCM 7.112.2Open verse →

    परद्रोही की होहिं निसंका। कामी पुनि कि रहहिं अकलंका।।

    अर्थ · Hindi

    परद्रोही की होहिं निसंका। कामी पुनि कि रहहिं अकलंका।।

  1032. RCM 7.112.3Open verse →

    बंस कि रह द्विज अनहित कीन्हें। कर्म कि होहिं स्वरूपहि चीन्हें।।

    अर्थ · Hindi

    बंस कि रह द्विज अनहित कीन्हें। कर्म कि होहिं स्वरूपहि चीन्हें।।

  1033. RCM 7.112.4Open verse →

    काहू सुमति कि खल सँग जामी। सुभ गति पाव कि परत्रिय गामी।।

    अर्थ · Hindi

    काहू सुमति कि खल सँग जामी। सुभ गति पाव कि परत्रिय गामी।।

  1034. RCM 7.112.5Open verse →

    भव कि परहिं परमात्मा बिंदक। सुखी कि होहिं कबहुँ हरिनिंदक।।

    अर्थ · Hindi

    भव कि परहिं परमात्मा बिंदक। सुखी कि होहिं कबहुँ हरिनिंदक।।

  1035. RCM 7.112.6Open verse →

    राजु कि रहइ नीति बिनु जानें। अघ कि रहहिं हरिचरित बखानें।।

    अर्थ · Hindi

    राजु कि रहइ नीति बिनु जानें। अघ कि रहहिं हरिचरित बखानें।।

  1036. RCM 7.112.7Open verse →

    पावन जस कि पुन्य बिनु होई। बिनु अघ अजस कि पावइ कोई।।

    अर्थ · Hindi

    पावन जस कि पुन्य बिनु होई। बिनु अघ अजस कि पावइ कोई।।

  1037. RCM 7.112.8Open verse →

    लाभु कि किछु हरि भगति समाना। जेहि गावहिं श्रुति संत पुराना।।

    अर्थ · Hindi

    लाभु कि किछु हरि भगति समाना। जेहि गावहिं श्रुति संत पुराना।।

  1038. RCM 7.112.9Open verse →

    हानि कि जग एहि सम किछु भाई। भजिअ न रामहि नर तनु पाई।।

    अर्थ · Hindi

    हानि कि जग एहि सम किछु भाई। भजिअ न रामहि नर तनु पाई।।

  1039. RCM 7.112.10Open verse →

    अघ कि पिसुनता सम कछु आना। धर्म कि दया सरिस हरिजाना।।

    अर्थ · Hindi

    अघ कि पिसुनता सम कछु आना। धर्म कि दया सरिस हरिजाना।।

  1040. RCM 7.112.11Open verse →

    एहि बिधि अमिति जुगुति मन गुनऊँ। मुनि उपदेस न सादर सुनऊँ।।

    अर्थ · Hindi

    एहि बिधि अमिति जुगुति मन गुनऊँ। मुनि उपदेस न सादर सुनऊँ।।

  1041. RCM 7.112.12Open verse →

    पुनि पुनि सगुन पच्छ मैं रोपा। तब मुनि बोलेउ बचन सकोपा।।

    अर्थ · Hindi

    पुनि पुनि सगुन पच्छ मैं रोपा। तब मुनि बोलेउ बचन सकोपा।।

  1042. RCM 7.112.13Open verse →

    मूढ़ परम सिख देउँ न मानसि। उत्तर प्रतिउत्तर बहु आनसि।।

    अर्थ · Hindi

    मूढ़ परम सिख देउँ न मानसि। उत्तर प्रतिउत्तर बहु आनसि।।

  1043. RCM 7.112.14Open verse →

    सत्य बचन बिस्वास न करही। बायस इव सबही ते डरही।।

    अर्थ · Hindi

    सत्य बचन बिस्वास न करही। बायस इव सबही ते डरही।।

  1044. RCM 7.112.15Open verse →

    सठ स्वपच्छ तब हृदयँ बिसाला। सपदि होहि पच्छी चंडाला।।

    अर्थ · Hindi

    सठ स्वपच्छ तब हृदयँ बिसाला। सपदि होहि पच्छी चंडाला।।

  1045. RCM 7.112.16Open verse →

    लीन्ह श्राप मैं सीस चढ़ाई। नहिं कछु भय न दीनता आई।।

    अर्थ · Hindi

    लीन्ह श्राप मैं सीस चढ़ाई। नहिं कछु भय न दीनता आई।।

  1046. RCM 7.113.1Open verse →

    सुनु खगेस नहिं कछु रिषि दूषन। उर प्रेरक रघुबंस बिभूषन।।

    अर्थ · Hindi

    सुनु खगेस नहिं कछु रिषि दूषन। उर प्रेरक रघुबंस बिभूषन।।

  1047. RCM 7.113.2Open verse →

    कृपासिंधु मुनि मति करि भोरी। लीन्हि प्रेम परिच्छा मोरी।।

    अर्थ · Hindi

    कृपासिंधु मुनि मति करि भोरी। लीन्हि प्रेम परिच्छा मोरी।।

  1048. RCM 7.113.3Open verse →

    मन बच क्रम मोहि निज जन जाना। मुनि मति पुनि फेरी भगवाना।।

    अर्थ · Hindi

    मन बच क्रम मोहि निज जन जाना। मुनि मति पुनि फेरी भगवाना।।

  1049. RCM 7.113.4Open verse →

    रिषि मम महत सीलता देखी। राम चरन बिस्वास बिसेषी।।

    अर्थ · Hindi

    रिषि मम महत सीलता देखी। राम चरन बिस्वास बिसेषी।।

  1050. RCM 7.113.5Open verse →

    अति बिसमय पुनि पुनि पछिताई। सादर मुनि मोहि लीन्ह बोलाई।।

    अर्थ · Hindi

    अति बिसमय पुनि पुनि पछिताई। सादर मुनि मोहि लीन्ह बोलाई।।

  1051. RCM 7.113.6Open verse →

    मम परितोष बिबिध बिधि कीन्हा। हरषित राममंत्र तब दीन्हा।।

    अर्थ · Hindi

    मम परितोष बिबिध बिधि कीन्हा। हरषित राममंत्र तब दीन्हा।।

  1052. RCM 7.113.7Open verse →

    बालकरूप राम कर ध्याना। कहेउ मोहि मुनि कृपानिधाना।।

    अर्थ · Hindi

    बालकरूप राम कर ध्याना। कहेउ मोहि मुनि कृपानिधाना।।

  1053. RCM 7.113.8Open verse →

    सुंदर सुखद मिहि अति भावा। सो प्रथमहिं मैं तुम्हहि सुनावा।।

    अर्थ · Hindi

    सुंदर सुखद मिहि अति भावा। सो प्रथमहिं मैं तुम्हहि सुनावा।।

  1054. RCM 7.113.9Open verse →

    मुनि मोहि कछुक काल तहँ राखा। रामचरितमानस तब भाषा।।

    अर्थ · Hindi

    मुनि मोहि कछुक काल तहँ राखा। रामचरितमानस तब भाषा।।

  1055. RCM 7.113.10Open verse →

    सादर मोहि यह कथा सुनाई। पुनि बोले मुनि गिरा सुहाई।।

    अर्थ · Hindi

    सादर मोहि यह कथा सुनाई। पुनि बोले मुनि गिरा सुहाई।।

  1056. RCM 7.113.11Open verse →

    रामचरित सर गुप्त सुहावा। संभु प्रसाद तात मैं पावा।।

    अर्थ · Hindi

    रामचरित सर गुप्त सुहावा। संभु प्रसाद तात मैं पावा।।

  1057. RCM 7.113.12Open verse →

    तोहि निज भगत राम कर जानी। ताते मैं सब कहेउँ बखानी।।

    अर्थ · Hindi

    तोहि निज भगत राम कर जानी। ताते मैं सब कहेउँ बखानी।।

  1058. RCM 7.113.13Open verse →

    राम भगति जिन्ह कें उर नाहीं। कबहुँ न तात कहिअ तिन्ह पाहीं।।

    अर्थ · Hindi

    राम भगति जिन्ह कें उर नाहीं। कबहुँ न तात कहिअ तिन्ह पाहीं।।

  1059. RCM 7.113.14Open verse →

    मुनि मोहि बिबिध भाँति समुझावा। मैं सप्रेम मुनि पद सिरु नावा।।

    अर्थ · Hindi

    मुनि मोहि बिबिध भाँति समुझावा। मैं सप्रेम मुनि पद सिरु नावा।।

  1060. RCM 7.113.15Open verse →

    निज कर कमल परसि मम सीसा। हरषित आसिष दीन्ह मुनीसा।।

    अर्थ · Hindi

    निज कर कमल परसि मम सीसा। हरषित आसिष दीन्ह मुनीसा।।

  1061. RCM 7.113.16Open verse →

    राम भगति अबिरल उर तोरें। बसिहि सदा प्रसाद अब मोरें।।

    अर्थ · Hindi

    राम भगति अबिरल उर तोरें। बसिहि सदा प्रसाद अब मोरें।।

  1062. RCM 7.114.1Open verse →

    काल कर्म गुन दोष सुभाऊ। कछु दुख तुम्हहि न ब्यापिहि काऊ।।

    अर्थ · Hindi

    काल कर्म गुन दोष सुभाऊ। कछु दुख तुम्हहि न ब्यापिहि काऊ।।

  1063. RCM 7.114.2Open verse →

    राम रहस्य ललित बिधि नाना। गुप्त प्रगट इतिहास पुराना।।

    अर्थ · Hindi

    राम रहस्य ललित बिधि नाना। गुप्त प्रगट इतिहास पुराना।।

  1064. RCM 7.114.3Open verse →

    बिनु श्रम तुम्ह जानब सब सोऊ। नित नव नेह राम पद होऊ।।

    अर्थ · Hindi

    बिनु श्रम तुम्ह जानब सब सोऊ। नित नव नेह राम पद होऊ।।

  1065. RCM 7.114.4Open verse →

    जो इच्छा करिहहु मन माहीं। हरि प्रसाद कछु दुर्लभ नाहीं।।

    अर्थ · Hindi

    जो इच्छा करिहहु मन माहीं। हरि प्रसाद कछु दुर्लभ नाहीं।।

  1066. RCM 7.114.5Open verse →

    सुनि मुनि आसिष सुनु मतिधीरा। ब्रह्मगिरा भइ गगन गँभीरा।।

    अर्थ · Hindi

    सुनि मुनि आसिष सुनु मतिधीरा। ब्रह्मगिरा भइ गगन गँभीरा।।

  1067. RCM 7.114.6Open verse →

    एवमस्तु तव बच मुनि ग्यानी। यह मम भगत कर्म मन बानी।।

    अर्थ · Hindi

    एवमस्तु तव बच मुनि ग्यानी। यह मम भगत कर्म मन बानी।।

  1068. RCM 7.114.7Open verse →

    सुनि नभगिरा हरष मोहि भयऊ। प्रेम मगन सब संसय गयऊ।।

    अर्थ · Hindi

    सुनि नभगिरा हरष मोहि भयऊ। प्रेम मगन सब संसय गयऊ।।

  1069. RCM 7.114.8Open verse →

    करि बिनती मुनि आयसु पाई। पद सरोज पुनि पुनि सिरु नाई।।

    अर्थ · Hindi

    करि बिनती मुनि आयसु पाई। पद सरोज पुनि पुनि सिरु नाई।।

  1070. RCM 7.114.9Open verse →

    हरष सहित एहिं आश्रम आयउँ। प्रभु प्रसाद दुर्लभ बर पायउँ।।

    अर्थ · Hindi

    हरष सहित एहिं आश्रम आयउँ। प्रभु प्रसाद दुर्लभ बर पायउँ।।

  1071. RCM 7.114.10Open verse →

    इहाँ बसत मोहि सुनु खग ईसा। बीते कलप सात अरु बीसा।।

    अर्थ · Hindi

    इहाँ बसत मोहि सुनु खग ईसा। बीते कलप सात अरु बीसा।।

  1072. RCM 7.114.11Open verse →

    करउँ सदा रघुपति गुन गाना। सादर सुनहिं बिहंग सुजाना।।

    अर्थ · Hindi

    करउँ सदा रघुपति गुन गाना। सादर सुनहिं बिहंग सुजाना।।

  1073. RCM 7.114.12Open verse →

    जब जब अवधपुरीं रघुबीरा। धरहिं भगत हित मनुज सरीरा।।

    अर्थ · Hindi

    जब जब अवधपुरीं रघुबीरा। धरहिं भगत हित मनुज सरीरा।।

  1074. RCM 7.114.13Open verse →

    तब तब जाइ राम पुर रहऊँ। सिसुलीला बिलोकि सुख लहऊँ।।

    अर्थ · Hindi

    तब तब जाइ राम पुर रहऊँ। सिसुलीला बिलोकि सुख लहऊँ।।

  1075. RCM 7.114.14Open verse →

    पुनि उर राखि राम सिसुरूपा। निज आश्रम आवउँ खगभूपा।।

    अर्थ · Hindi

    पुनि उर राखि राम सिसुरूपा। निज आश्रम आवउँ खगभूपा।।

  1076. RCM 7.114.15Open verse →

    कथा सकल मैं तुम्हहि सुनाई। काग देह जेहिं कारन पाई।।

    अर्थ · Hindi

    कथा सकल मैं तुम्हहि सुनाई। काग देह जेहिं कारन पाई।।

  1077. RCM 7.114.16Open verse →

    कहिउँ तात सब प्रस्न तुम्हारी। राम भगति महिमा अति भारी।।

    अर्थ · Hindi

    कहिउँ तात सब प्रस्न तुम्हारी। राम भगति महिमा अति भारी।।

  1078. RCM 7.115.1Open verse →

    जे असि भगति जानि परिहरहीं। केवल ग्यान हेतु श्रम करहीं।।

    अर्थ · Hindi

    जे असि भगति जानि परिहरहीं। केवल ग्यान हेतु श्रम करहीं।।

  1079. RCM 7.115.2Open verse →

    ते जड़ कामधेनु गृहँ त्यागी। खोजत आकु फिरहिं पय लागी।।

    अर्थ · Hindi

    ते जड़ कामधेनु गृहँ त्यागी। खोजत आकु फिरहिं पय लागी।।

  1080. RCM 7.115.3Open verse →

    सुनु खगेस हरि भगति बिहाई। जे सुख चाहहिं आन उपाई।।

    अर्थ · Hindi

    सुनु खगेस हरि भगति बिहाई। जे सुख चाहहिं आन उपाई।।

  1081. RCM 7.115.4Open verse →

    ते सठ महासिंधु बिनु तरनी। पैरि पार चाहहिं जड़ करनी।।

    अर्थ · Hindi

    ते सठ महासिंधु बिनु तरनी। पैरि पार चाहहिं जड़ करनी।।

  1082. RCM 7.115.5Open verse →

    सुनि भसुंडि के बचन भवानी। बोलेउ गरुड़ हरषि मृदु बानी।।

    अर्थ · Hindi

    सुनि भसुंडि के बचन भवानी। बोलेउ गरुड़ हरषि मृदु बानी।।

  1083. RCM 7.115.6Open verse →

    तव प्रसाद प्रभु मम उर माहीं। संसय सोक मोह भ्रम नाहीं।।

    अर्थ · Hindi

    तव प्रसाद प्रभु मम उर माहीं। संसय सोक मोह भ्रम नाहीं।।

  1084. RCM 7.115.7Open verse →

    सुनेउँ पुनीत राम गुन ग्रामा। तुम्हरी कृपाँ लहेउँ बिश्रामा।।

    अर्थ · Hindi

    सुनेउँ पुनीत राम गुन ग्रामा। तुम्हरी कृपाँ लहेउँ बिश्रामा।।

  1085. RCM 7.115.8Open verse →

    एक बात प्रभु पूँछउँ तोही। कहहु बुझाइ कृपानिधि मोही।।

    अर्थ · Hindi

    एक बात प्रभु पूँछउँ तोही। कहहु बुझाइ कृपानिधि मोही।।

  1086. RCM 7.115.9Open verse →

    कहहिं संत मुनि बेद पुराना। नहिं कछु दुर्लभ ग्यान समाना।।

    अर्थ · Hindi

    कहहिं संत मुनि बेद पुराना। नहिं कछु दुर्लभ ग्यान समाना।।

  1087. RCM 7.115.10Open verse →

    सोइ मुनि तुम्ह सन कहेउ गोसाईं। नहिं आदरेहु भगति की नाईं।।

    अर्थ · Hindi

    सोइ मुनि तुम्ह सन कहेउ गोसाईं। नहिं आदरेहु भगति की नाईं।।

  1088. RCM 7.115.11Open verse →

    ग्यानहि भगतिहि अंतर केता। सकल कहहु प्रभु कृपा निकेता।।

    अर्थ · Hindi

    ग्यानहि भगतिहि अंतर केता। सकल कहहु प्रभु कृपा निकेता।।

  1089. RCM 7.115.12Open verse →

    सुनि उरगारि बचन सुख माना। सादर बोलेउ काग सुजाना।।

    अर्थ · Hindi

    सुनि उरगारि बचन सुख माना। सादर बोलेउ काग सुजाना।।

  1090. RCM 7.115.13Open verse →

    भगतिहि ग्यानहि नहिं कछु भेदा। उभय हरहिं भव संभव खेदा।।

    अर्थ · Hindi

    भगतिहि ग्यानहि नहिं कछु भेदा। उभय हरहिं भव संभव खेदा।।

  1091. RCM 7.115.14Open verse →

    नाथ मुनीस कहहिं कछु अंतर। सावधान सोउ सुनु बिहंगबर।।

    अर्थ · Hindi

    नाथ मुनीस कहहिं कछु अंतर। सावधान सोउ सुनु बिहंगबर।।

  1092. RCM 7.115.15Open verse →

    ग्यान बिराग जोग बिग्याना। ए सब पुरुष सुनहु हरिजाना।।

    अर्थ · Hindi

    ग्यान बिराग जोग बिग्याना। ए सब पुरुष सुनहु हरिजाना।।

  1093. RCM 7.115.16Open verse →

    पुरुष प्रताप प्रबल सब भाँती। अबला अबल सहज जड़ जाती।।

    अर्थ · Hindi

    पुरुष प्रताप प्रबल सब भाँती। अबला अबल सहज जड़ जाती।।

  1094. RCM 7.115.17Open verse →

    -पुरुष त्यागि सक नारिहि जो बिरक्त मति धीर।।

    अर्थ · Hindi

    -पुरुष त्यागि सक नारिहि जो बिरक्त मति धीर।।

  1095. RCM 7.115.18Open verse →

    न तु कामी बिषयाबस बिमुख जो पद रघुबीर।।115(क)।।

    अर्थ · Hindi

    न तु कामी बिषयाबस बिमुख जो पद रघुबीर।।115(क)।।

  1096. RCM 7.115.19Open verse →

    सोउ मुनि ग्याननिधान मृगनयनी बिधु मुख निरखि।

    अर्थ · Hindi

    सोउ मुनि ग्याननिधान मृगनयनी बिधु मुख निरखि।

  1097. RCM 7.115.20Open verse →

    बिबस होइ हरिजान नारि बिष्नु माया प्रगट।।115(ख)।।

    अर्थ · Hindi

    बिबस होइ हरिजान नारि बिष्नु माया प्रगट।।115(ख)।।

  1098. RCM 7.116.1Open verse →

    इहाँ न पच्छपात कछु राखउँ। बेद पुरान संत मत भाषउँ।।

    अर्थ · Hindi

    इहाँ न पच्छपात कछु राखउँ। बेद पुरान संत मत भाषउँ।।

  1099. RCM 7.116.2Open verse →

    मोह न नारि नारि कें रूपा। पन्नगारि यह रीति अनूपा।।

    अर्थ · Hindi

    मोह न नारि नारि कें रूपा। पन्नगारि यह रीति अनूपा।।

  1100. RCM 7.116.3Open verse →

    माया भगति सुनहु तुम्ह दोऊ। नारि बर्ग जानइ सब कोऊ।।

    अर्थ · Hindi

    माया भगति सुनहु तुम्ह दोऊ। नारि बर्ग जानइ सब कोऊ।।

  1101. RCM 7.116.4Open verse →

    पुनि रघुबीरहि भगति पिआरी। माया खलु नर्तकी बिचारी।।

    अर्थ · Hindi

    पुनि रघुबीरहि भगति पिआरी। माया खलु नर्तकी बिचारी।।

  1102. RCM 7.116.5Open verse →

    भगतिहि सानुकूल रघुराया। ताते तेहि डरपति अति माया।।

    अर्थ · Hindi

    भगतिहि सानुकूल रघुराया। ताते तेहि डरपति अति माया।।

  1103. RCM 7.116.6Open verse →

    राम भगति निरुपम निरुपाधी। बसइ जासु उर सदा अबाधी।।

    अर्थ · Hindi

    राम भगति निरुपम निरुपाधी। बसइ जासु उर सदा अबाधी।।

  1104. RCM 7.116.7Open verse →

    तेहि बिलोकि माया सकुचाई। करि न सकइ कछु निज प्रभुताई।।

    अर्थ · Hindi

    तेहि बिलोकि माया सकुचाई। करि न सकइ कछु निज प्रभुताई।।

  1105. RCM 7.116.8Open verse →

    अस बिचारि जे मुनि बिग्यानी। जाचहीं भगति सकल सुख खानी।।

    अर्थ · Hindi

    अस बिचारि जे मुनि बिग्यानी। जाचहीं भगति सकल सुख खानी।।

  1106. RCM 7.117.1Open verse →

    सुनहु तात यह अकथ कहानी। समुझत बनइ न जाइ बखानी।।

    अर्थ · Hindi

    सुनहु तात यह अकथ कहानी। समुझत बनइ न जाइ बखानी।।

  1107. RCM 7.117.2Open verse →

    ईस्वर अंस जीव अबिनासी। चेतन अमल सहज सुख रासी।।

    अर्थ · Hindi

    ईस्वर अंस जीव अबिनासी। चेतन अमल सहज सुख रासी।।

  1108. RCM 7.117.3Open verse →

    सो मायाबस भयउ गोसाईं। बँध्यो कीर मरकट की नाई।।

    अर्थ · Hindi

    सो मायाबस भयउ गोसाईं। बँध्यो कीर मरकट की नाई।।

  1109. RCM 7.117.4Open verse →

    जड़ चेतनहि ग्रंथि परि गई। जदपि मृषा छूटत कठिनई।।

    अर्थ · Hindi

    जड़ चेतनहि ग्रंथि परि गई। जदपि मृषा छूटत कठिनई।।

  1110. RCM 7.117.5Open verse →

    तब ते जीव भयउ संसारी। छूट न ग्रंथि न होइ सुखारी।।

    अर्थ · Hindi

    तब ते जीव भयउ संसारी। छूट न ग्रंथि न होइ सुखारी।।

  1111. RCM 7.117.6Open verse →

    श्रुति पुरान बहु कहेउ उपाई। छूट न अधिक अधिक अरुझाई।।

    अर्थ · Hindi

    श्रुति पुरान बहु कहेउ उपाई। छूट न अधिक अधिक अरुझाई।।

  1112. RCM 7.117.7Open verse →

    जीव हृदयँ तम मोह बिसेषी। ग्रंथि छूट किमि परइ न देखी।।

    अर्थ · Hindi

    जीव हृदयँ तम मोह बिसेषी। ग्रंथि छूट किमि परइ न देखी।।

  1113. RCM 7.117.8Open verse →

    अस संजोग ईस जब करई। तबहुँ कदाचित सो निरुअरई।।

    अर्थ · Hindi

    अस संजोग ईस जब करई। तबहुँ कदाचित सो निरुअरई।।

  1114. RCM 7.117.9Open verse →

    सात्त्विक श्रद्धा धेनु सुहाई। जौं हरि कृपाँ हृदयँ बस आई।।

    अर्थ · Hindi

    सात्त्विक श्रद्धा धेनु सुहाई। जौं हरि कृपाँ हृदयँ बस आई।।

  1115. RCM 7.117.10Open verse →

    जप तप ब्रत जम नियम अपारा। जे श्रुति कह सुभ धर्म अचारा।।

    अर्थ · Hindi

    जप तप ब्रत जम नियम अपारा। जे श्रुति कह सुभ धर्म अचारा।।

  1116. RCM 7.117.11Open verse →

    तेइ तृन हरित चरै जब गाई। भाव बच्छ सिसु पाइ पेन्हाई।।

    अर्थ · Hindi

    तेइ तृन हरित चरै जब गाई। भाव बच्छ सिसु पाइ पेन्हाई।।

  1117. RCM 7.117.12Open verse →

    नोइ निबृत्ति पात्र बिस्वासा। निर्मल मन अहीर निज दासा।।

    अर्थ · Hindi

    नोइ निबृत्ति पात्र बिस्वासा। निर्मल मन अहीर निज दासा।।

  1118. RCM 7.117.13Open verse →

    परम धर्ममय पय दुहि भाई। अवटै अनल अकाम बनाई।।

    अर्थ · Hindi

    परम धर्ममय पय दुहि भाई। अवटै अनल अकाम बनाई।।

  1119. RCM 7.117.14Open verse →

    तोष मरुत तब छमाँ जुड़ावै। धृति सम जावनु देइ जमावै।।

    अर्थ · Hindi

    तोष मरुत तब छमाँ जुड़ावै। धृति सम जावनु देइ जमावै।।

  1120. RCM 7.117.15Open verse →

    मुदिताँ मथैं बिचार मथानी। दम अधार रजु सत्य सुबानी।।

    अर्थ · Hindi

    मुदिताँ मथैं बिचार मथानी। दम अधार रजु सत्य सुबानी।।

  1121. RCM 7.117.16Open verse →

    तब मथि काढ़ि लेइ नवनीता। बिमल बिराग सुभग सुपुनीता।।

    अर्थ · Hindi

    तब मथि काढ़ि लेइ नवनीता। बिमल बिराग सुभग सुपुनीता।।

  1122. RCM 7.117.17Open verse →

    जोग अगिनि करि प्रगट तब कर्म सुभासुभ लाइ।

    अर्थ · Hindi

    जोग अगिनि करि प्रगट तब कर्म सुभासुभ लाइ।

  1123. RCM 7.117.18Open verse →

    बुद्धि सिरावैं ग्यान घृत ममता मल जरि जाइ।।117(क)।।

    अर्थ · Hindi

    बुद्धि सिरावैं ग्यान घृत ममता मल जरि जाइ।।117(क)।।

  1124. RCM 7.117.19Open verse →

    तब बिग्यानरूपिनि बुद्धि बिसद घृत पाइ।

    अर्थ · Hindi

    तब बिग्यानरूपिनि बुद्धि बिसद घृत पाइ।

  1125. RCM 7.117.20Open verse →

    चित्त दिआ भरि धरै दृढ़ समता दिअटि बनाइ।।117(ख)।।

    अर्थ · Hindi

    चित्त दिआ भरि धरै दृढ़ समता दिअटि बनाइ।।117(ख)।।

  1126. RCM 7.117.21Open verse →

    तीनि अवस्था तीनि गुन तेहि कपास तें काढ़ि।

    अर्थ · Hindi

    तीनि अवस्था तीनि गुन तेहि कपास तें काढ़ि।

  1127. RCM 7.117.22Open verse →

    तूल तुरीय सँवारि पुनि बाती करै सुगाढ़ि।।117(ग)।।

    अर्थ · Hindi

    तूल तुरीय सँवारि पुनि बाती करै सुगाढ़ि।।117(ग)।।

  1128. RCM 7.117.23Open verse →

    एहि बिधि लेसै दीप तेज रासि बिग्यानमय।।

    अर्थ · Hindi

    एहि बिधि लेसै दीप तेज रासि बिग्यानमय।।

  1129. RCM 7.117.24Open verse →

    जातहिं जासु समीप जरहिं मदादिक सलभ सब।।117(घ)।।

    अर्थ · Hindi

    जातहिं जासु समीप जरहिं मदादिक सलभ सब।।117(घ)।।

  1130. RCM 7.118.1Open verse →

    सोहमस्मि इति बृत्ति अखंडा। दीप सिखा सोइ परम प्रचंडा।।

    अर्थ · Hindi

    सोहमस्मि इति बृत्ति अखंडा। दीप सिखा सोइ परम प्रचंडा।।

  1131. RCM 7.118.2Open verse →

    आतम अनुभव सुख सुप्रकासा। तब भव मूल भेद भ्रम नासा।।

    अर्थ · Hindi

    आतम अनुभव सुख सुप्रकासा। तब भव मूल भेद भ्रम नासा।।

  1132. RCM 7.118.3Open verse →

    प्रबल अबिद्या कर परिवारा। मोह आदि तम मिटइ अपारा।।

    अर्थ · Hindi

    प्रबल अबिद्या कर परिवारा। मोह आदि तम मिटइ अपारा।।

  1133. RCM 7.118.4Open verse →

    तब सोइ बुद्धि पाइ उँजिआरा। उर गृहँ बैठि ग्रंथि निरुआरा।।

    अर्थ · Hindi

    तब सोइ बुद्धि पाइ उँजिआरा। उर गृहँ बैठि ग्रंथि निरुआरा।।

  1134. RCM 7.118.5Open verse →

    छोरन ग्रंथि पाव जौं सोई। तब यह जीव कृतारथ होई।।

    अर्थ · Hindi

    छोरन ग्रंथि पाव जौं सोई। तब यह जीव कृतारथ होई।।

  1135. RCM 7.118.6Open verse →

    छोरत ग्रंथि जानि खगराया। बिघ्न अनेक करइ तब माया।।

    अर्थ · Hindi

    छोरत ग्रंथि जानि खगराया। बिघ्न अनेक करइ तब माया।।

  1136. RCM 7.118.7Open verse →

    रिद्धि सिद्धि प्रेरइ बहु भाई। बुद्धहि लोभ दिखावहिं आई।।

    अर्थ · Hindi

    रिद्धि सिद्धि प्रेरइ बहु भाई। बुद्धहि लोभ दिखावहिं आई।।

  1137. RCM 7.118.8Open verse →

    कल बल छल करि जाहिं समीपा। अंचल बात बुझावहिं दीपा।।

    अर्थ · Hindi

    कल बल छल करि जाहिं समीपा। अंचल बात बुझावहिं दीपा।।

  1138. RCM 7.118.9Open verse →

    होइ बुद्धि जौं परम सयानी। तिन्ह तन चितव न अनहित जानी।।

    अर्थ · Hindi

    होइ बुद्धि जौं परम सयानी। तिन्ह तन चितव न अनहित जानी।।

  1139. RCM 7.118.10Open verse →

    जौं तेहि बिघ्न बुद्धि नहिं बाधी। तौ बहोरि सुर करहिं उपाधी।।

    अर्थ · Hindi

    जौं तेहि बिघ्न बुद्धि नहिं बाधी। तौ बहोरि सुर करहिं उपाधी।।

  1140. RCM 7.118.11Open verse →

    इंद्रीं द्वार झरोखा नाना। तहँ तहँ सुर बैठे करि थाना।।

    अर्थ · Hindi

    इंद्रीं द्वार झरोखा नाना। तहँ तहँ सुर बैठे करि थाना।।

  1141. RCM 7.118.12Open verse →

    आवत देखहिं बिषय बयारी। ते हठि देही कपाट उघारी।।

    अर्थ · Hindi

    आवत देखहिं बिषय बयारी। ते हठि देही कपाट उघारी।।

  1142. RCM 7.118.13Open verse →

    जब सो प्रभंजन उर गृहँ जाई। तबहिं दीप बिग्यान बुझाई।।

    अर्थ · Hindi

    जब सो प्रभंजन उर गृहँ जाई। तबहिं दीप बिग्यान बुझाई।।

  1143. RCM 7.118.14Open verse →

    ग्रंथि न छूटि मिटा सो प्रकासा। बुद्धि बिकल भइ बिषय बतासा।।

    अर्थ · Hindi

    ग्रंथि न छूटि मिटा सो प्रकासा। बुद्धि बिकल भइ बिषय बतासा।।

  1144. RCM 7.118.15Open verse →

    इंद्रिन्ह सुरन्ह न ग्यान सोहाई। बिषय भोग पर प्रीति सदाई।।

    अर्थ · Hindi

    इंद्रिन्ह सुरन्ह न ग्यान सोहाई। बिषय भोग पर प्रीति सदाई।।

  1145. RCM 7.118.16Open verse →

    बिषय समीर बुद्धि कृत भोरी। तेहि बिधि दीप को बार बहोरी।।

    अर्थ · Hindi

    बिषय समीर बुद्धि कृत भोरी। तेहि बिधि दीप को बार बहोरी।।

  1146. RCM 7.119.1Open verse →

    ग्यान पंथ कृपान कै धारा। परत खगेस होइ नहिं बारा।।

    अर्थ · Hindi

    ग्यान पंथ कृपान कै धारा। परत खगेस होइ नहिं बारा।।

  1147. RCM 7.119.2Open verse →

    जो निर्बिघ्न पंथ निर्बहई। सो कैवल्य परम पद लहई।।

    अर्थ · Hindi

    जो निर्बिघ्न पंथ निर्बहई। सो कैवल्य परम पद लहई।।

  1148. RCM 7.119.3Open verse →

    अति दुर्लभ कैवल्य परम पद। संत पुरान निगम आगम बद।।

    अर्थ · Hindi

    अति दुर्लभ कैवल्य परम पद। संत पुरान निगम आगम बद।।

  1149. RCM 7.119.4Open verse →

    राम भजत सोइ मुकुति गोसाई। अनइच्छित आवइ बरिआई।।

    अर्थ · Hindi

    राम भजत सोइ मुकुति गोसाई। अनइच्छित आवइ बरिआई।।

  1150. RCM 7.119.5Open verse →

    जिमि थल बिनु जल रहि न सकाई। कोटि भाँति कोउ करै उपाई।।

    अर्थ · Hindi

    जिमि थल बिनु जल रहि न सकाई। कोटि भाँति कोउ करै उपाई।।

  1151. RCM 7.119.6Open verse →

    तथा मोच्छ सुख सुनु खगराई। रहि न सकइ हरि भगति बिहाई।।

    अर्थ · Hindi

    तथा मोच्छ सुख सुनु खगराई। रहि न सकइ हरि भगति बिहाई।।

  1152. RCM 7.119.7Open verse →

    अस बिचारि हरि भगत सयाने। मुक्ति निरादर भगति लुभाने।।

    अर्थ · Hindi

    अस बिचारि हरि भगत सयाने। मुक्ति निरादर भगति लुभाने।।

  1153. RCM 7.119.8Open verse →

    भगति करत बिनु जतन प्रयासा। संसृति मूल अबिद्या नासा।।

    अर्थ · Hindi

    भगति करत बिनु जतन प्रयासा। संसृति मूल अबिद्या नासा।।

  1154. RCM 7.119.9Open verse →

    भोजन करिअ तृपिति हित लागी। जिमि सो असन पचवै जठरागी।।

    अर्थ · Hindi

    भोजन करिअ तृपिति हित लागी। जिमि सो असन पचवै जठरागी।।

  1155. RCM 7.119.10Open verse →

    असि हरिभगति सुगम सुखदाई। को अस मूढ़ न जाहि सोहाई।।

    अर्थ · Hindi

    असि हरिभगति सुगम सुखदाई। को अस मूढ़ न जाहि सोहाई।।

  1156. RCM 7.120.1Open verse →

    कहेउँ ग्यान सिद्धांत बुझाई। सुनहु भगति मनि कै प्रभुताई।।

    अर्थ · Hindi

    कहेउँ ग्यान सिद्धांत बुझाई। सुनहु भगति मनि कै प्रभुताई।।

  1157. RCM 7.120.2Open verse →

    राम भगति चिंतामनि सुंदर। बसइ गरुड़ जाके उर अंतर।।

    अर्थ · Hindi

    राम भगति चिंतामनि सुंदर। बसइ गरुड़ जाके उर अंतर।।

  1158. RCM 7.120.3Open verse →

    परम प्रकास रूप दिन राती। नहिं कछु चहिअ दिआ घृत बाती।।

    अर्थ · Hindi

    परम प्रकास रूप दिन राती। नहिं कछु चहिअ दिआ घृत बाती।।

  1159. RCM 7.120.4Open verse →

    मोह दरिद्र निकट नहिं आवा। लोभ बात नहिं ताहि बुझावा।।

    अर्थ · Hindi

    मोह दरिद्र निकट नहिं आवा। लोभ बात नहिं ताहि बुझावा।।

  1160. RCM 7.120.5Open verse →

    प्रबल अबिद्या तम मिटि जाई। हारहिं सकल सलभ समुदाई।।

    अर्थ · Hindi

    प्रबल अबिद्या तम मिटि जाई। हारहिं सकल सलभ समुदाई।।

  1161. RCM 7.120.6Open verse →

    खल कामादि निकट नहिं जाहीं। बसइ भगति जाके उर माहीं।।

    अर्थ · Hindi

    खल कामादि निकट नहिं जाहीं। बसइ भगति जाके उर माहीं।।

  1162. RCM 7.120.7Open verse →

    गरल सुधासम अरि हित होई। तेहि मनि बिनु सुख पाव न कोई।।

    अर्थ · Hindi

    गरल सुधासम अरि हित होई। तेहि मनि बिनु सुख पाव न कोई।।

  1163. RCM 7.120.8Open verse →

    ब्यापहिं मानस रोग न भारी। जिन्ह के बस सब जीव दुखारी।।

    अर्थ · Hindi

    ब्यापहिं मानस रोग न भारी। जिन्ह के बस सब जीव दुखारी।।

  1164. RCM 7.120.9Open verse →

    राम भगति मनि उर बस जाकें। दुख लवलेस न सपनेहुँ ताकें।।

    अर्थ · Hindi

    राम भगति मनि उर बस जाकें। दुख लवलेस न सपनेहुँ ताकें।।

  1165. RCM 7.120.10Open verse →

    चतुर सिरोमनि तेइ जग माहीं। जे मनि लागि सुजतन कराहीं।।

    अर्थ · Hindi

    चतुर सिरोमनि तेइ जग माहीं। जे मनि लागि सुजतन कराहीं।।

  1166. RCM 7.120.11Open verse →

    सो मनि जदपि प्रगट जग अहई। राम कृपा बिनु नहिं कोउ लहई।।

    अर्थ · Hindi

    सो मनि जदपि प्रगट जग अहई। राम कृपा बिनु नहिं कोउ लहई।।

  1167. RCM 7.120.12Open verse →

    सुगम उपाय पाइबे केरे। नर हतभाग्य देहिं भटमेरे।।

    अर्थ · Hindi

    सुगम उपाय पाइबे केरे। नर हतभाग्य देहिं भटमेरे।।

  1168. RCM 7.120.13Open verse →

    पावन पर्बत बेद पुराना। राम कथा रुचिराकर नाना।।

    अर्थ · Hindi

    पावन पर्बत बेद पुराना। राम कथा रुचिराकर नाना।।

  1169. RCM 7.120.14Open verse →

    मर्मी सज्जन सुमति कुदारी। ग्यान बिराग नयन उरगारी।।

    अर्थ · Hindi

    मर्मी सज्जन सुमति कुदारी। ग्यान बिराग नयन उरगारी।।

  1170. RCM 7.120.15Open verse →

    भाव सहित खोजइ जो प्रानी। पाव भगति मनि सब सुख खानी।।

    अर्थ · Hindi

    भाव सहित खोजइ जो प्रानी। पाव भगति मनि सब सुख खानी।।

  1171. RCM 7.120.16Open verse →

    मोरें मन प्रभु अस बिस्वासा। राम ते अधिक राम कर दासा।।

    अर्थ · Hindi

    मोरें मन प्रभु अस बिस्वासा। राम ते अधिक राम कर दासा।।

  1172. RCM 7.120.17Open verse →

    राम सिंधु घन सज्जन धीरा। चंदन तरु हरि संत समीरा।।

    अर्थ · Hindi

    राम सिंधु घन सज्जन धीरा। चंदन तरु हरि संत समीरा।।

  1173. RCM 7.120.18Open verse →

    सब कर फल हरि भगति सुहाई। सो बिनु संत न काहूँ पाई।।

    अर्थ · Hindi

    सब कर फल हरि भगति सुहाई। सो बिनु संत न काहूँ पाई।।

  1174. RCM 7.120.19Open verse →

    अस बिचारि जोइ कर सतसंगा। राम भगति तेहि सुलभ बिहंगा।।

    अर्थ · Hindi

    अस बिचारि जोइ कर सतसंगा। राम भगति तेहि सुलभ बिहंगा।।

  1175. RCM 7.121.1Open verse →

    पुनि सप्रेम बोलेउ खगराऊ। जौं कृपाल मोहि ऊपर भाऊ।।

    अर्थ · Hindi

    पुनि सप्रेम बोलेउ खगराऊ। जौं कृपाल मोहि ऊपर भाऊ।।

  1176. RCM 7.121.2Open verse →

    नाथ मोहि निज सेवक जानी। सप्त प्रस्न कहहु बखानी।।

    अर्थ · Hindi

    नाथ मोहि निज सेवक जानी। सप्त प्रस्न कहहु बखानी।।

  1177. RCM 7.121.3Open verse →

    प्रथमहिं कहहु नाथ मतिधीरा। सब ते दुर्लभ कवन सरीरा।।

    अर्थ · Hindi

    प्रथमहिं कहहु नाथ मतिधीरा। सब ते दुर्लभ कवन सरीरा।।

  1178. RCM 7.121.4Open verse →

    बड़ दुख कवन कवन सुख भारी। सोउ संछेपहिं कहहु बिचारी।।

    अर्थ · Hindi

    बड़ दुख कवन कवन सुख भारी। सोउ संछेपहिं कहहु बिचारी।।

  1179. RCM 7.121.5Open verse →

    संत असंत मरम तुम्ह जानहु। तिन्ह कर सहज सुभाव बखानहु।।

    अर्थ · Hindi

    संत असंत मरम तुम्ह जानहु। तिन्ह कर सहज सुभाव बखानहु।।

  1180. RCM 7.121.6Open verse →

    कवन पुन्य श्रुति बिदित बिसाला। कहहु कवन अघ परम कराला।।

    अर्थ · Hindi

    कवन पुन्य श्रुति बिदित बिसाला। कहहु कवन अघ परम कराला।।

  1181. RCM 7.121.7Open verse →

    मानस रोग कहहु समुझाई। तुम्ह सर्बग्य कृपा अधिकाई।।

    अर्थ · Hindi

    मानस रोग कहहु समुझाई। तुम्ह सर्बग्य कृपा अधिकाई।।

  1182. RCM 7.121.8Open verse →

    तात सुनहु सादर अति प्रीती। मैं संछेप कहउँ यह नीती।।

    अर्थ · Hindi

    तात सुनहु सादर अति प्रीती। मैं संछेप कहउँ यह नीती।।

  1183. RCM 7.121.9Open verse →

    नर तन सम नहिं कवनिउ देही। जीव चराचर जाचत तेही।।

    अर्थ · Hindi

    नर तन सम नहिं कवनिउ देही। जीव चराचर जाचत तेही।।

  1184. RCM 7.121.10Open verse →

    नरग स्वर्ग अपबर्ग निसेनी। ग्यान बिराग भगति सुभ देनी।।

    अर्थ · Hindi

    नरग स्वर्ग अपबर्ग निसेनी। ग्यान बिराग भगति सुभ देनी।।

  1185. RCM 7.121.11Open verse →

    सो तनु धरि हरि भजहिं न जे नर। होहिं बिषय रत मंद मंद तर।।

    अर्थ · Hindi

    सो तनु धरि हरि भजहिं न जे नर। होहिं बिषय रत मंद मंद तर।।

  1186. RCM 7.121.12Open verse →

    काँच किरिच बदलें ते लेही। कर ते डारि परस मनि देहीं।।

    अर्थ · Hindi

    काँच किरिच बदलें ते लेही। कर ते डारि परस मनि देहीं।।

  1187. RCM 7.121.13Open verse →

    नहिं दरिद्र सम दुख जग माहीं। संत मिलन सम सुख जग नाहीं।।

    अर्थ · Hindi

    नहिं दरिद्र सम दुख जग माहीं। संत मिलन सम सुख जग नाहीं।।

  1188. RCM 7.121.14Open verse →

    पर उपकार बचन मन काया। संत सहज सुभाउ खगराया।।

    अर्थ · Hindi

    पर उपकार बचन मन काया। संत सहज सुभाउ खगराया।।

  1189. RCM 7.121.15Open verse →

    संत सहहिं दुख परहित लागी। परदुख हेतु असंत अभागी।।

    अर्थ · Hindi

    संत सहहिं दुख परहित लागी। परदुख हेतु असंत अभागी।।

  1190. RCM 7.121.16Open verse →

    भूर्ज तरू सम संत कृपाला। परहित निति सह बिपति बिसाला।।

    अर्थ · Hindi

    भूर्ज तरू सम संत कृपाला। परहित निति सह बिपति बिसाला।।

  1191. RCM 7.121.17Open verse →

    सन इव खल पर बंधन करई। खाल कढ़ाइ बिपति सहि मरई।।

    अर्थ · Hindi

    सन इव खल पर बंधन करई। खाल कढ़ाइ बिपति सहि मरई।।

  1192. RCM 7.121.18Open verse →

    खल बिनु स्वारथ पर अपकारी। अहि मूषक इव सुनु उरगारी।।

    अर्थ · Hindi

    खल बिनु स्वारथ पर अपकारी। अहि मूषक इव सुनु उरगारी।।

  1193. RCM 7.121.19Open verse →

    पर संपदा बिनासि नसाहीं। जिमि ससि हति हिम उपल बिलाहीं।।

    अर्थ · Hindi

    पर संपदा बिनासि नसाहीं। जिमि ससि हति हिम उपल बिलाहीं।।

  1194. RCM 7.121.20Open verse →

    दुष्ट उदय जग आरति हेतू। जथा प्रसिद्ध अधम ग्रह केतू।।

    अर्थ · Hindi

    दुष्ट उदय जग आरति हेतू। जथा प्रसिद्ध अधम ग्रह केतू।।

  1195. RCM 7.121.21Open verse →

    संत उदय संतत सुखकारी। बिस्व सुखद जिमि इंदु तमारी।।

    अर्थ · Hindi

    संत उदय संतत सुखकारी। बिस्व सुखद जिमि इंदु तमारी।।

  1196. RCM 7.121.22Open verse →

    परम धर्म श्रुति बिदित अहिंसा। पर निंदा सम अघ न गरीसा।।

    अर्थ · Hindi

    परम धर्म श्रुति बिदित अहिंसा। पर निंदा सम अघ न गरीसा।।

  1197. RCM 7.121.23Open verse →

    हर गुर निंदक दादुर होई। जन्म सहस्त्र पाव तन सोई।।

    अर्थ · Hindi

    हर गुर निंदक दादुर होई। जन्म सहस्त्र पाव तन सोई।।

  1198. RCM 7.121.24Open verse →

    द्विज निंदक बहु नरक भोग करि। जग जनमइ बायस सरीर धरि।।

    अर्थ · Hindi

    द्विज निंदक बहु नरक भोग करि। जग जनमइ बायस सरीर धरि।।

  1199. RCM 7.121.25Open verse →

    सुर श्रुति निंदक जे अभिमानी। रौरव नरक परहिं ते प्रानी।।

    अर्थ · Hindi

    सुर श्रुति निंदक जे अभिमानी। रौरव नरक परहिं ते प्रानी।।

  1200. RCM 7.121.26Open verse →

    होहिं उलूक संत निंदा रत। मोह निसा प्रिय ग्यान भानु गत।।

    अर्थ · Hindi

    होहिं उलूक संत निंदा रत। मोह निसा प्रिय ग्यान भानु गत।।

  1201. RCM 7.121.27Open verse →

    सब के निंदा जे जड़ करहीं। ते चमगादुर होइ अवतरहीं।।

    अर्थ · Hindi

    सब के निंदा जे जड़ करहीं। ते चमगादुर होइ अवतरहीं।।

  1202. RCM 7.121.28Open verse →

    सुनहु तात अब मानस रोगा। जिन्ह ते दुख पावहिं सब लोगा।।

    अर्थ · Hindi

    सुनहु तात अब मानस रोगा। जिन्ह ते दुख पावहिं सब लोगा।।

  1203. RCM 7.121.29Open verse →

    मोह सकल ब्याधिन्ह कर मूला। तिन्ह ते पुनि उपजहिं बहु सूला।।

    अर्थ · Hindi

    मोह सकल ब्याधिन्ह कर मूला। तिन्ह ते पुनि उपजहिं बहु सूला।।

  1204. RCM 7.121.30Open verse →

    काम बात कफ लोभ अपारा। क्रोध पित्त नित छाती जारा।।

    अर्थ · Hindi

    काम बात कफ लोभ अपारा। क्रोध पित्त नित छाती जारा।।

  1205. RCM 7.121.31Open verse →

    प्रीति करहिं जौं तीनिउ भाई। उपजइ सन्यपात दुखदाई।।

    अर्थ · Hindi

    प्रीति करहिं जौं तीनिउ भाई। उपजइ सन्यपात दुखदाई।।

  1206. RCM 7.121.32Open verse →

    बिषय मनोरथ दुर्गम नाना। ते सब सूल नाम को जाना।।

    अर्थ · Hindi

    बिषय मनोरथ दुर्गम नाना। ते सब सूल नाम को जाना।।

  1207. RCM 7.121.33Open verse →

    ममता दादु कंडु इरषाई। हरष बिषाद गरह बहुताई।।

    अर्थ · Hindi

    ममता दादु कंडु इरषाई। हरष बिषाद गरह बहुताई।।

  1208. RCM 7.121.34Open verse →

    पर सुख देखि जरनि सोइ छई। कुष्ट दुष्टता मन कुटिलई।।

    अर्थ · Hindi

    पर सुख देखि जरनि सोइ छई। कुष्ट दुष्टता मन कुटिलई।।

  1209. RCM 7.121.35Open verse →

    अहंकार अति दुखद डमरुआ। दंभ कपट मद मान नेहरुआ।।

    अर्थ · Hindi

    अहंकार अति दुखद डमरुआ। दंभ कपट मद मान नेहरुआ।।

  1210. RCM 7.121.36Open verse →

    तृस्ना उदरबृद्धि अति भारी। त्रिबिध ईषना तरुन तिजारी।।

    अर्थ · Hindi

    तृस्ना उदरबृद्धि अति भारी। त्रिबिध ईषना तरुन तिजारी।।

  1211. RCM 7.121.37Open verse →

    जुग बिधि ज्वर मत्सर अबिबेका। कहँ लागि कहौं कुरोग अनेका।।

    अर्थ · Hindi

    जुग बिधि ज्वर मत्सर अबिबेका। कहँ लागि कहौं कुरोग अनेका।।

  1212. RCM 7.122.1Open verse →

    एहि बिधि सकल जीव जग रोगी। सोक हरष भय प्रीति बियोगी।।

    अर्थ · Hindi

    एहि बिधि सकल जीव जग रोगी। सोक हरष भय प्रीति बियोगी।।

  1213. RCM 7.122.2Open verse →

    मानक रोग कछुक मैं गाए। हहिं सब कें लखि बिरलेन्ह पाए।।

    अर्थ · Hindi

    मानक रोग कछुक मैं गाए। हहिं सब कें लखि बिरलेन्ह पाए।।

  1214. RCM 7.122.3Open verse →

    जाने ते छीजहिं कछु पापी। नास न पावहिं जन परितापी।।

    अर्थ · Hindi

    जाने ते छीजहिं कछु पापी। नास न पावहिं जन परितापी।।

  1215. RCM 7.122.4Open verse →

    बिषय कुपथ्य पाइ अंकुरे। मुनिहु हृदयँ का नर बापुरे।।

    अर्थ · Hindi

    बिषय कुपथ्य पाइ अंकुरे। मुनिहु हृदयँ का नर बापुरे।।

  1216. RCM 7.122.5Open verse →

    राम कृपाँ नासहि सब रोगा। जौं एहि भाँति बनै संयोगा।।

    अर्थ · Hindi

    राम कृपाँ नासहि सब रोगा। जौं एहि भाँति बनै संयोगा।।

  1217. RCM 7.122.6Open verse →

    सदगुर बैद बचन बिस्वासा। संजम यह न बिषय कै आसा।।

    अर्थ · Hindi

    सदगुर बैद बचन बिस्वासा। संजम यह न बिषय कै आसा।।

  1218. RCM 7.122.7Open verse →

    रघुपति भगति सजीवन मूरी। अनूपान श्रद्धा मति पूरी।।

    अर्थ · Hindi

    रघुपति भगति सजीवन मूरी। अनूपान श्रद्धा मति पूरी।।

  1219. RCM 7.122.8Open verse →

    एहि बिधि भलेहिं सो रोग नसाहीं। नाहिं त जतन कोटि नहिं जाहीं।।

    अर्थ · Hindi

    एहि बिधि भलेहिं सो रोग नसाहीं। नाहिं त जतन कोटि नहिं जाहीं।।

  1220. RCM 7.122.9Open verse →

    जानिअ तब मन बिरुज गोसाँई। जब उर बल बिराग अधिकाई।।

    अर्थ · Hindi

    जानिअ तब मन बिरुज गोसाँई। जब उर बल बिराग अधिकाई।।

  1221. RCM 7.122.10Open verse →

    सुमति छुधा बाढ़इ नित नई। बिषय आस दुर्बलता गई।।

    अर्थ · Hindi

    सुमति छुधा बाढ़इ नित नई। बिषय आस दुर्बलता गई।।

  1222. RCM 7.122.11Open verse →

    बिमल ग्यान जल जब सो नहाई। तब रह राम भगति उर छाई।।

    अर्थ · Hindi

    बिमल ग्यान जल जब सो नहाई। तब रह राम भगति उर छाई।।

  1223. RCM 7.122.12Open verse →

    सिव अज सुक सनकादिक नारद। जे मुनि ब्रह्म बिचार बिसारद।।

    अर्थ · Hindi

    सिव अज सुक सनकादिक नारद। जे मुनि ब्रह्म बिचार बिसारद।।

  1224. RCM 7.122.13Open verse →

    सब कर मत खगनायक एहा। करिअ राम पद पंकज नेहा।।

    अर्थ · Hindi

    सब कर मत खगनायक एहा। करिअ राम पद पंकज नेहा।।

  1225. RCM 7.122.14Open verse →

    श्रुति पुरान सब ग्रंथ कहाहीं। रघुपति भगति बिना सुख नाहीं।।

    अर्थ · Hindi

    श्रुति पुरान सब ग्रंथ कहाहीं। रघुपति भगति बिना सुख नाहीं।।

  1226. RCM 7.122.15Open verse →

    कमठ पीठ जामहिं बरु बारा। बंध्या सुत बरु काहुहि मारा।।

    अर्थ · Hindi

    कमठ पीठ जामहिं बरु बारा। बंध्या सुत बरु काहुहि मारा।।

  1227. RCM 7.122.16Open verse →

    फूलहिं नभ बरु बहुबिधि फूला। जीव न लह सुख हरि प्रतिकूला।।

    अर्थ · Hindi

    फूलहिं नभ बरु बहुबिधि फूला। जीव न लह सुख हरि प्रतिकूला।।

  1228. RCM 7.122.17Open verse →

    तृषा जाइ बरु मृगजल पाना। बरु जामहिं सस सीस बिषाना।।

    अर्थ · Hindi

    तृषा जाइ बरु मृगजल पाना। बरु जामहिं सस सीस बिषाना।।

  1229. RCM 7.122.18Open verse →

    अंधकारु बरु रबिहि नसावै। राम बिमुख न जीव सुख पावै।।

    अर्थ · Hindi

    अंधकारु बरु रबिहि नसावै। राम बिमुख न जीव सुख पावै।।

  1230. RCM 7.122.19Open verse →

    हिम ते अनल प्रगट बरु होई। बिमुख राम सुख पाव न कोई।।

    अर्थ · Hindi

    हिम ते अनल प्रगट बरु होई। बिमुख राम सुख पाव न कोई।।

  1231. RCM 7.122.20Open verse →

    उबारि मथें घृत होइ बरु सिकता ते बरु तेल।

    अर्थ · Hindi

    उबारि मथें घृत होइ बरु सिकता ते बरु तेल।

  1232. RCM 7.122.21Open verse →

    बिनु हरि भजन न भव तरिअ यह सिद्धांत अपेल।।122(क)।।

    अर्थ · Hindi

    बिनु हरि भजन न भव तरिअ यह सिद्धांत अपेल।।122(क)।।

  1233. RCM 7.122.22Open verse →

    मसकहि करइ बिंरंचि प्रभु अजहि मसक ते हीन।

    अर्थ · Hindi

    मसकहि करइ बिंरंचि प्रभु अजहि मसक ते हीन।

  1234. RCM 7.122.23Open verse →

    अस बिचारि तजि संसय रामहि भजहिं प्रबीन।।122(ख)।।

    अर्थ · Hindi

    अस बिचारि तजि संसय रामहि भजहिं प्रबीन।।122(ख)।।

  1235. RCM 7.122.24Open verse →

    श्लोक

    अर्थ · Hindi

    श्लोक

  1236. RCM 7.122.25Open verse →

    विनिच्श्रितं वदामि ते न अन्यथा वचांसि मे।

    अर्थ · Hindi

    विनिच्श्रितं वदामि ते न अन्यथा वचांसि मे।

  1237. RCM 7.122.26Open verse →

    हरिं नरा भजन्ति येऽतिदुस्तरं तरन्ति ते।।122(ग)।।

    अर्थ · Hindi

    हरिं नरा भजन्ति येऽतिदुस्तरं तरन्ति ते।।122(ग)।।

  1238. RCM 7.123.1Open verse →

    कहेउँ नाथ हरि चरित अनूपा। ब्यास समास स्वमति अनुरुपा।।

    अर्थ · Hindi

    कहेउँ नाथ हरि चरित अनूपा। ब्यास समास स्वमति अनुरुपा।।

  1239. RCM 7.123.2Open verse →

    श्रुति सिद्धांत इहइ उरगारी। राम भजिअ सब काज बिसारी।।

    अर्थ · Hindi

    श्रुति सिद्धांत इहइ उरगारी। राम भजिअ सब काज बिसारी।।

  1240. RCM 7.123.3Open verse →

    प्रभु रघुपति तजि सेइअ काही। मोहि से सठ पर ममता जाही।।

    अर्थ · Hindi

    प्रभु रघुपति तजि सेइअ काही। मोहि से सठ पर ममता जाही।।

  1241. RCM 7.123.4Open verse →

    तुम्ह बिग्यानरूप नहिं मोहा। नाथ कीन्हि मो पर अति छोहा।।

    अर्थ · Hindi

    तुम्ह बिग्यानरूप नहिं मोहा। नाथ कीन्हि मो पर अति छोहा।।

  1242. RCM 7.123.5Open verse →

    पूछिहुँ राम कथा अति पावनि। सुक सनकादि संभु मन भावनि।।

    अर्थ · Hindi

    पूछिहुँ राम कथा अति पावनि। सुक सनकादि संभु मन भावनि।।

  1243. RCM 7.123.6Open verse →

    सत संगति दुर्लभ संसारा। निमिष दंड भरि एकउ बारा।।

    अर्थ · Hindi

    सत संगति दुर्लभ संसारा। निमिष दंड भरि एकउ बारा।।

  1244. RCM 7.123.7Open verse →

    देखु गरुड़ निज हृदयँ बिचारी। मैं रघुबीर भजन अधिकारी।।

    अर्थ · Hindi

    देखु गरुड़ निज हृदयँ बिचारी। मैं रघुबीर भजन अधिकारी।।

  1245. RCM 7.123.8Open verse →

    सकुनाधम सब भाँति अपावन। प्रभु मोहि कीन्ह बिदित जग पावन।।

    अर्थ · Hindi

    सकुनाधम सब भाँति अपावन। प्रभु मोहि कीन्ह बिदित जग पावन।।

  1246. RCM 7.123.9Open verse →

    आजु धन्य मैं धन्य अति जद्यपि सब बिधि हीन।

    अर्थ · Hindi

    आजु धन्य मैं धन्य अति जद्यपि सब बिधि हीन।

  1247. RCM 7.123.10Open verse →

    निज जन जानि राम मोहि संत समागम दीन।।123(क)।।

    अर्थ · Hindi

    निज जन जानि राम मोहि संत समागम दीन।।123(क)।।

  1248. RCM 7.123.11Open verse →

    नाथ जथामति भाषेउँ राखेउँ नहिं कछु गोइ।

    अर्थ · Hindi

    नाथ जथामति भाषेउँ राखेउँ नहिं कछु गोइ।

  1249. RCM 7.123.12Open verse →

    चरित सिंधु रघुनायक थाह कि पावइ कोइ।।123।।

    अर्थ · Hindi

    चरित सिंधु रघुनायक थाह कि पावइ कोइ।।123।।

  1250. RCM 7.124.1Open verse →

    सुमिरि राम के गुन गन नाना। पुनि पुनि हरष भुसुंडि सुजाना।।

    अर्थ · Hindi

    सुमिरि राम के गुन गन नाना। पुनि पुनि हरष भुसुंडि सुजाना।।

  1251. RCM 7.124.2Open verse →

    महिमा निगम नेति करि गाई। अतुलित बल प्रताप प्रभुताई।।

    अर्थ · Hindi

    महिमा निगम नेति करि गाई। अतुलित बल प्रताप प्रभुताई।।

  1252. RCM 7.124.3Open verse →

    सिव अज पूज्य चरन रघुराई। मो पर कृपा परम मृदुलाई।।

    अर्थ · Hindi

    सिव अज पूज्य चरन रघुराई। मो पर कृपा परम मृदुलाई।।

  1253. RCM 7.124.4Open verse →

    अस सुभाउ कहुँ सुनउँ न देखउँ। केहि खगेस रघुपति सम लेखउँ।।

    अर्थ · Hindi

    अस सुभाउ कहुँ सुनउँ न देखउँ। केहि खगेस रघुपति सम लेखउँ।।

  1254. RCM 7.124.5Open verse →

    साधक सिद्ध बिमुक्त उदासी। कबि कोबिद कृतग्य संन्यासी।।

    अर्थ · Hindi

    साधक सिद्ध बिमुक्त उदासी। कबि कोबिद कृतग्य संन्यासी।।

  1255. RCM 7.124.6Open verse →

    जोगी सूर सुतापस ग्यानी। धर्म निरत पंडित बिग्यानी।।

    अर्थ · Hindi

    जोगी सूर सुतापस ग्यानी। धर्म निरत पंडित बिग्यानी।।

  1256. RCM 7.124.7Open verse →

    तरहिं न बिनु सेएँ मम स्वामी। राम नमामि नमामि नमामी।।

    अर्थ · Hindi

    तरहिं न बिनु सेएँ मम स्वामी। राम नमामि नमामि नमामी।।

  1257. RCM 7.124.8Open verse →

    सरन गएँ मो से अघ रासी। होहिं सुद्ध नमामि अबिनासी।।

    अर्थ · Hindi

    सरन गएँ मो से अघ रासी। होहिं सुद्ध नमामि अबिनासी।।

  1258. RCM 7.125.1Open verse →

    मै कृत्कृत्य भयउँ तव बानी। सुनि रघुबीर भगति रस सानी।।

    अर्थ · Hindi

    मै कृत्कृत्य भयउँ तव बानी। सुनि रघुबीर भगति रस सानी।।

  1259. RCM 7.125.2Open verse →

    राम चरन नूतन रति भई। माया जनित बिपति सब गई।।

    अर्थ · Hindi

    राम चरन नूतन रति भई। माया जनित बिपति सब गई।।

  1260. RCM 7.125.3Open verse →

    मोह जलधि बोहित तुम्ह भए। मो कहँ नाथ बिबिध सुख दए।।

    अर्थ · Hindi

    मोह जलधि बोहित तुम्ह भए। मो कहँ नाथ बिबिध सुख दए।।

  1261. RCM 7.125.4Open verse →

    मो पहिं होइ न प्रति उपकारा। बंदउँ तव पद बारहिं बारा।।

    अर्थ · Hindi

    मो पहिं होइ न प्रति उपकारा। बंदउँ तव पद बारहिं बारा।।

  1262. RCM 7.125.5Open verse →

    पूरन काम राम अनुरागी। तुम्ह सम तात न कोउ बड़भागी।।

    अर्थ · Hindi

    पूरन काम राम अनुरागी। तुम्ह सम तात न कोउ बड़भागी।।

  1263. RCM 7.125.6Open verse →

    संत बिटप सरिता गिरि धरनी। पर हित हेतु सबन्ह कै करनी।।

    अर्थ · Hindi

    संत बिटप सरिता गिरि धरनी। पर हित हेतु सबन्ह कै करनी।।

  1264. RCM 7.125.7Open verse →

    संत हृदय नवनीत समाना। कहा कबिन्ह परि कहै न जाना।।

    अर्थ · Hindi

    संत हृदय नवनीत समाना। कहा कबिन्ह परि कहै न जाना।।

  1265. RCM 7.125.8Open verse →

    निज परिताप द्रवइ नवनीता। पर दुख द्रवहिं संत सुपुनीता।।

    अर्थ · Hindi

    निज परिताप द्रवइ नवनीता। पर दुख द्रवहिं संत सुपुनीता।।

  1266. RCM 7.125.9Open verse →

    जीवन जन्म सुफल मम भयऊ। तव प्रसाद संसय सब गयऊ।।

    अर्थ · Hindi

    जीवन जन्म सुफल मम भयऊ। तव प्रसाद संसय सब गयऊ।।

  1267. RCM 7.125.10Open verse →

    जानेहु सदा मोहि निज किंकर। पुनि पुनि उमा कहइ बिहंगबर।।

    अर्थ · Hindi

    जानेहु सदा मोहि निज किंकर। पुनि पुनि उमा कहइ बिहंगबर।।

  1268. RCM 7.126.1Open verse →

    कहेउँ परम पुनीत इतिहासा। सुनत श्रवन छूटहिं भव पासा।।

    अर्थ · Hindi

    कहेउँ परम पुनीत इतिहासा। सुनत श्रवन छूटहिं भव पासा।।

  1269. RCM 7.126.2Open verse →

    प्रनत कल्पतरु करुना पुंजा। उपजइ प्रीति राम पद कंजा।।

    अर्थ · Hindi

    प्रनत कल्पतरु करुना पुंजा। उपजइ प्रीति राम पद कंजा।।

  1270. RCM 7.126.3Open verse →

    मन क्रम बचन जनित अघ जाई। सुनहिं जे कथा श्रवन मन लाई।।

    अर्थ · Hindi

    मन क्रम बचन जनित अघ जाई। सुनहिं जे कथा श्रवन मन लाई।।

  1271. RCM 7.126.4Open verse →

    तीर्थाटन साधन समुदाई। जोग बिराग ग्यान निपुनाई।।

    अर्थ · Hindi

    तीर्थाटन साधन समुदाई। जोग बिराग ग्यान निपुनाई।।

  1272. RCM 7.126.5Open verse →

    नाना कर्म धर्म ब्रत दाना। संजम दम जप तप मख नाना।।

    अर्थ · Hindi

    नाना कर्म धर्म ब्रत दाना। संजम दम जप तप मख नाना।।

  1273. RCM 7.126.6Open verse →

    भूत दया द्विज गुर सेवकाई। बिद्या बिनय बिबेक बड़ाई।।

    अर्थ · Hindi

    भूत दया द्विज गुर सेवकाई। बिद्या बिनय बिबेक बड़ाई।।

  1274. RCM 7.126.7Open verse →

    जहँ लगि साधन बेद बखानी। सब कर फल हरि भगति भवानी।।

    अर्थ · Hindi

    जहँ लगि साधन बेद बखानी। सब कर फल हरि भगति भवानी।।

  1275. RCM 7.126.8Open verse →

    सो रघुनाथ भगति श्रुति गाई। राम कृपाँ काहूँ एक पाई।।

    अर्थ · Hindi

    सो रघुनाथ भगति श्रुति गाई। राम कृपाँ काहूँ एक पाई।।

  1276. RCM 7.127.1Open verse →

    सोइ सर्बग्य गुनी सोइ ग्याता। सोइ महि मंडित पंडित दाता।।

    अर्थ · Hindi

    सोइ सर्बग्य गुनी सोइ ग्याता। सोइ महि मंडित पंडित दाता।।

  1277. RCM 7.127.2Open verse →

    धर्म परायन सोइ कुल त्राता। राम चरन जा कर मन राता।।

    अर्थ · Hindi

    धर्म परायन सोइ कुल त्राता। राम चरन जा कर मन राता।।

  1278. RCM 7.127.3Open verse →

    नीति निपुन सोइ परम सयाना। श्रुति सिद्धांत नीक तेहिं जाना।।

    अर्थ · Hindi

    नीति निपुन सोइ परम सयाना। श्रुति सिद्धांत नीक तेहिं जाना।।

  1279. RCM 7.127.4Open verse →

    सोइ कबि कोबिद सोइ रनधीरा। जो छल छाड़ि भजइ रघुबीरा।।

    अर्थ · Hindi

    सोइ कबि कोबिद सोइ रनधीरा। जो छल छाड़ि भजइ रघुबीरा।।

  1280. RCM 7.127.5Open verse →

    धन्य देस सो जहँ सुरसरी। धन्य नारि पतिब्रत अनुसरी।।

    अर्थ · Hindi

    धन्य देस सो जहँ सुरसरी। धन्य नारि पतिब्रत अनुसरी।।

  1281. RCM 7.127.6Open verse →

    धन्य सो भूपु नीति जो करई। धन्य सो द्विज निज धर्म न टरई।।

    अर्थ · Hindi

    धन्य सो भूपु नीति जो करई। धन्य सो द्विज निज धर्म न टरई।।

  1282. RCM 7.127.7Open verse →

    सो धन धन्य प्रथम गति जाकी। धन्य पुन्य रत मति सोइ पाकी।।

    अर्थ · Hindi

    सो धन धन्य प्रथम गति जाकी। धन्य पुन्य रत मति सोइ पाकी।।

  1283. RCM 7.127.8Open verse →

    धन्य घरी सोइ जब सतसंगा। धन्य जन्म द्विज भगति अभंगा।।

    अर्थ · Hindi

    धन्य घरी सोइ जब सतसंगा। धन्य जन्म द्विज भगति अभंगा।।

  1284. RCM 7.128.1Open verse →

    मति अनुरूप कथा मैं भाषी। जद्यपि प्रथम गुप्त करि राखी।।

    अर्थ · Hindi

    मति अनुरूप कथा मैं भाषी। जद्यपि प्रथम गुप्त करि राखी।।

  1285. RCM 7.128.2Open verse →

    तव मन प्रीति देखि अधिकाई। तब मैं रघुपति कथा सुनाई।।

    अर्थ · Hindi

    तव मन प्रीति देखि अधिकाई। तब मैं रघुपति कथा सुनाई।।

  1286. RCM 7.128.3Open verse →

    यह न कहिअ सठही हठसीलहि। जो मन लाइ न सुन हरि लीलहि।।

    अर्थ · Hindi

    यह न कहिअ सठही हठसीलहि। जो मन लाइ न सुन हरि लीलहि।।

  1287. RCM 7.128.4Open verse →

    कहिअ न लोभिहि क्रोधहि कामिहि। जो न भजइ सचराचर स्वामिहि।।

    अर्थ · Hindi

    कहिअ न लोभिहि क्रोधहि कामिहि। जो न भजइ सचराचर स्वामिहि।।

  1288. RCM 7.128.5Open verse →

    द्विज द्रोहिहि न सुनाइअ कबहूँ। सुरपति सरिस होइ नृप जबहूँ।।

    अर्थ · Hindi

    द्विज द्रोहिहि न सुनाइअ कबहूँ। सुरपति सरिस होइ नृप जबहूँ।।

  1289. RCM 7.128.6Open verse →

    राम कथा के तेइ अधिकारी। जिन्ह कें सतसंगति अति प्यारी।।

    अर्थ · Hindi

    राम कथा के तेइ अधिकारी। जिन्ह कें सतसंगति अति प्यारी।।

  1290. RCM 7.128.7Open verse →

    गुर पद प्रीति नीति रत जेई। द्विज सेवक अधिकारी तेई।।

    अर्थ · Hindi

    गुर पद प्रीति नीति रत जेई। द्विज सेवक अधिकारी तेई।।

  1291. RCM 7.128.8Open verse →

    ता कहँ यह बिसेष सुखदाई। जाहि प्रानप्रिय श्रीरघुराई।।

    अर्थ · Hindi

    ता कहँ यह बिसेष सुखदाई। जाहि प्रानप्रिय श्रीरघुराई।।

  1292. RCM 7.129.1Open verse →

    राम कथा गिरिजा मैं बरनी। कलि मल समनि मनोमल हरनी।।

    अर्थ · Hindi

    राम कथा गिरिजा मैं बरनी। कलि मल समनि मनोमल हरनी।।

  1293. RCM 7.129.2Open verse →

    संसृति रोग सजीवन मूरी। राम कथा गावहिं श्रुति सूरी।।

    अर्थ · Hindi

    संसृति रोग सजीवन मूरी। राम कथा गावहिं श्रुति सूरी।।

  1294. RCM 7.129.3Open verse →

    एहि महँ रुचिर सप्त सोपाना। रघुपति भगति केर पंथाना।।

    अर्थ · Hindi

    एहि महँ रुचिर सप्त सोपाना। रघुपति भगति केर पंथाना।।

  1295. RCM 7.129.4Open verse →

    अति हरि कृपा जाहि पर होई। पाउँ देइ एहिं मारग सोई।।

    अर्थ · Hindi

    अति हरि कृपा जाहि पर होई। पाउँ देइ एहिं मारग सोई।।

  1296. RCM 7.129.5Open verse →

    मन कामना सिद्धि नर पावा। जे यह कथा कपट तजि गावा।।

    अर्थ · Hindi

    मन कामना सिद्धि नर पावा। जे यह कथा कपट तजि गावा।।

  1297. RCM 7.129.6Open verse →

    कहहिं सुनहिं अनुमोदन करहीं। ते गोपद इव भवनिधि तरहीं।।

    अर्थ · Hindi

    कहहिं सुनहिं अनुमोदन करहीं। ते गोपद इव भवनिधि तरहीं।।

  1298. RCM 7.129.7Open verse →

    सुनि सब कथा हृदयँ अति भाई। गिरिजा बोली गिरा सुहाई।।

    अर्थ · Hindi

    सुनि सब कथा हृदयँ अति भाई। गिरिजा बोली गिरा सुहाई।।

  1299. RCM 7.129.8Open verse →

    नाथ कृपाँ मम गत संदेहा। राम चरन उपजेउ नव नेहा।।

    अर्थ · Hindi

    नाथ कृपाँ मम गत संदेहा। राम चरन उपजेउ नव नेहा।।

  1300. RCM 7.130001Open verse →

    कलियुग केवल नाम अधारा। सुमिरि सुमिरि नर उतरहिं पारा॥

    Meaning · English

    In Kaliyuga the Name alone is the support; remembering, remembering it, men cross over (the ocean of samsara).

  1301. RCM 7.130.2Open verse →

    भव भंजन गंजन संदेहा। जन रंजन सज्जन प्रिय एहा।।

    अर्थ · Hindi

    भव भंजन गंजन संदेहा। जन रंजन सज्जन प्रिय एहा।।

  1302. RCM 7.130.3Open verse →

    राम उपासक जे जग माहीं। एहि सम प्रिय तिन्ह के कछु नाहीं।।

    अर्थ · Hindi

    राम उपासक जे जग माहीं। एहि सम प्रिय तिन्ह के कछु नाहीं।।

  1303. RCM 7.130.4Open verse →

    रघुपति कृपाँ जथामति गावा। मैं यह पावन चरित सुहावा।।

    अर्थ · Hindi

    रघुपति कृपाँ जथामति गावा। मैं यह पावन चरित सुहावा।।

  1304. RCM 7.130.5Open verse →

    एहिं कलिकाल न साधन दूजा। जोग जग्य जप तप ब्रत पूजा।।

    अर्थ · Hindi

    एहिं कलिकाल न साधन दूजा। जोग जग्य जप तप ब्रत पूजा।।

  1305. RCM 7.130.6Open verse →

    रामहि सुमिरिअ गाइअ रामहि। संतत सुनिअ राम गुन ग्रामहि।।

    अर्थ · Hindi

    रामहि सुमिरिअ गाइअ रामहि। संतत सुनिअ राम गुन ग्रामहि।।

  1306. RCM 7.130.7Open verse →

    जासु पतित पावन बड़ बाना। गावहिं कबि श्रुति संत पुराना।।

    अर्थ · Hindi

    जासु पतित पावन बड़ बाना। गावहिं कबि श्रुति संत पुराना।।

  1307. RCM 7.130.8Open verse →

    ताहि भजहि मन तजि कुटिलाई। राम भजें गति केहिं नहिं पाई।।

    अर्थ · Hindi

    ताहि भजहि मन तजि कुटिलाई। राम भजें गति केहिं नहिं पाई।।

  1308. RCM 7.130.9Open verse →

    पाई न केहिं गति पतित पावन राम भजि सुनु सठ मना।

    अर्थ · Hindi

    पाई न केहिं गति पतित पावन राम भजि सुनु सठ मना।

  1309. RCM 7.130.10Open verse →

    गनिका अजामिल ब्याध गीध गजादि खल तारे घना।।

    अर्थ · Hindi

    गनिका अजामिल ब्याध गीध गजादि खल तारे घना।।

  1310. RCM 7.130.11Open verse →

    आभीर जमन किरात खस स्वपचादि अति अघरूप जे।

    अर्थ · Hindi

    आभीर जमन किरात खस स्वपचादि अति अघरूप जे।

  1311. RCM 7.130.12Open verse →

    कहि नाम बारक तेपि पावन होहिं राम नमामि ते।।1।।

    अर्थ · Hindi

    कहि नाम बारक तेपि पावन होहिं राम नमामि ते।।1।।

  1312. RCM 7.130.13Open verse →

    रघुबंस भूषन चरित यह नर कहहिं सुनहिं जे गावहीं।

    अर्थ · Hindi

    रघुबंस भूषन चरित यह नर कहहिं सुनहिं जे गावहीं।

  1313. RCM 7.130.14Open verse →

    कलि मल मनोमल धोइ बिनु श्रम राम धाम सिधावहीं।।

    अर्थ · Hindi

    कलि मल मनोमल धोइ बिनु श्रम राम धाम सिधावहीं।।

  1314. RCM 7.130.15Open verse →

    सत पंच चौपाईं मनोहर जानि जो नर उर धरै।

    अर्थ · Hindi

    सत पंच चौपाईं मनोहर जानि जो नर उर धरै।

  1315. RCM 7.130.16Open verse →

    दारुन अबिद्या पंच जनित बिकार श्रीरघुबर हरै।।2।।

    अर्थ · Hindi

    दारुन अबिद्या पंच जनित बिकार श्रीरघुबर हरै।।2।।

  1316. RCM 7.130.17Open verse →

    सुंदर सुजान कृपा निधान अनाथ पर कर प्रीति जो।

    अर्थ · Hindi

    सुंदर सुजान कृपा निधान अनाथ पर कर प्रीति जो।

  1317. RCM 7.130.18Open verse →

    सो एक राम अकाम हित निर्बानप्रद सम आन को।।

    अर्थ · Hindi

    सो एक राम अकाम हित निर्बानप्रद सम आन को।।

  1318. RCM 7.130.19Open verse →

    जाकी कृपा लवलेस ते मतिमंद तुलसीदासहूँ।

    अर्थ · Hindi

    जाकी कृपा लवलेस ते मतिमंद तुलसीदासहूँ।

  1319. RCM 7.130.20Open verse →

    पायो परम बिश्रामु राम समान प्रभु नाहीं कहूँ।।3।।

    अर्थ · Hindi

    पायो परम बिश्रामु राम समान प्रभु नाहीं कहूँ।।3।।

  1320. RCM 7.130.21Open verse →

    मो सम दीन न दीन हित तुम्ह समान रघुबीर।

    अर्थ · Hindi

    मो सम दीन न दीन हित तुम्ह समान रघुबीर।

  1321. RCM 7.130.22Open verse →

    अस बिचारि रघुबंस मनि हरहु बिषम भव भीर।।130(क)।।

    अर्थ · Hindi

    अस बिचारि रघुबंस मनि हरहु बिषम भव भीर।।130(क)।।

  1322. RCM 7.130.23Open verse →

    कामिहि नारि पिआरि जिमि लोभहि प्रिय जिमि दाम।

    अर्थ · Hindi

    कामिहि नारि पिआरि जिमि लोभहि प्रिय जिमि दाम।

  1323. RCM 7.130.24Open verse →

    तिमि रघुनाथ निरंतर प्रिय लागहु मोहि राम।।130(ख)।।

    अर्थ · Hindi

    तिमि रघुनाथ निरंतर प्रिय लागहु मोहि राम।।130(ख)।।

  1324. RCM 7.130.25Open verse →

    श्लोक

    अर्थ · Hindi

    श्लोक

  1325. RCM 7.130.26Open verse →

    यत्पूर्वं प्रभुणा कृतं सुकविना श्रीशम्भुना दुर्गमं

    अर्थ · Hindi

    यत्पूर्वं प्रभुणा कृतं सुकविना श्रीशम्भुना दुर्गमं

  1326. RCM 7.130.27Open verse →

    श्रॆमद्रामपदाब्जभक्तिमनिशम प्राप्त्यै तू रामायणं।

    अर्थ · Hindi

    श्रॆमद्रामपदाब्जभक्तिमनिशम प्राप्त्यै तू रामायणं।

  1327. RCM 7.130.28Open verse →

    मत्वा तद्रघुनाथनामनिरतम स्वान्तस्तम:शान्तये

    अर्थ · Hindi

    मत्वा तद्रघुनाथनामनिरतम स्वान्तस्तम:शान्तये

  1328. RCM 7.130.29Open verse →

    भाषाबद्ध्मिदम चकार तुलसीदासस्तथा मानसं।।1।।

    अर्थ · Hindi

    भाषाबद्ध्मिदम चकार तुलसीदासस्तथा मानसं।।1।।

  1329. RCM 7.130.30Open verse →

    पुण्यं पापहरं सदा शिवकरं विज्ञानाभाक्तिप्रदम

    अर्थ · Hindi

    पुण्यं पापहरं सदा शिवकरं विज्ञानाभाक्तिप्रदम

  1330. RCM 7.130.31Open verse →

    मायामोहमलापहं सुविमलं प्रेमाम्बुपूरं शुभम।

    अर्थ · Hindi

    मायामोहमलापहं सुविमलं प्रेमाम्बुपूरं शुभम।

  1331. RCM 7.130.32Open verse →

    श्रॆमद्रामचरितमानसमिदम भक्त्यावगाहन्ति ये

    अर्थ · Hindi

    श्रॆमद्रामचरितमानसमिदम भक्त्यावगाहन्ति ये

  1332. RCM 7.130.33Open verse →

    ते सन्सारपतनगघोरकिरनैर्दह्यन्ति नो मानवाः।।2।।

    अर्थ · Hindi

    ते सन्सारपतनगघोरकिरनैर्दह्यन्ति नो मानवाः।।2।।