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Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali) · अध्याय 3

बिरह कौ अंग

बिरह कौ अंग

  1. रात्यू रूंनी बिरहिनीं, ज्यूं बंचौ कूं कुंज। कबीर अंतर प्रजल्या, प्रगठ्या विरहा पुंज॥

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    रात भर विरहिणी रोई यथा क्रौंच पक्षी अपने बच्चों के लिए रोती है। कबीर कहते हैं कि विरह के प्रज्वलित होने पर अंतर प्रज्वलित हो गया। विशेष—(१) प्रस्तुत साखी में कवि ने विरही साधक तथा क्रौंच की परिस्थिति और विरहानुभूति में साम्य उपस्थित करते हुए दोनों के विषाद का उल्लेख किया है। विरही आत्मा और क्रौंच दोनों प्रिय के वियोग में अत्यन्त व्याकुल रहते है। विरहनिशा भर आत्मा शिव के हेतु रुदन करती रही उसी प्रकार क्रौंच पक्षी की परिस्थिति है। (२) "रात्यू" से तात्पर्य रात भर। यहाँ पर "रात" का प्रयोग कवि ने उसी अर्थ में किया है जिस अर्थ में पाश्चात्य रहस्यवादियों ने "डार्क नाइट" ​आफ़ दिसोल" अर्थात् आत्मा की अन्धकारपूर्ण रात्रि" का प्रयोग (२) "अन्तर प्रजल्या" से तात्पर्य है अन्तस प्रज्वलित हो गया। विरह पुंज के प्रकट होने पर अन्तस प्रज्वलित हो गया। जो अन्तस वासनाओं का केन्द्र स्थल बना हुआ था, वह विरहाग्नि के प्रज्वलित होने पर अब प्रज्वलित हो उठा।

  2. अंबर कुंजा कुरलियां, गरजि भरे सत्र ताल। जिनि थैं गोविन्द वीछुटे, तिनके कौंण हवाल॥

    अर्थ · Hindi — hi.wikisource

    क्रौंच पक्षी ने आकाश में आर्त क्रन्दन किया जिससे आर्द्र होकर घनश्याम ने सरोवरों को जल से ओत-प्रोत कर दिया। परन्तु जो गोविन्द अर्थात् भगवान से विमुख है, उनकी तथा दशा होगी। भगवान से वियुक्त उन प्राणियों पर कौन कृपा भाव प्रदर्शित करेगा।

  3. चकवी बिछुटी रैणी की, आइ मिलि परभाति। जे जन बिछुटे राम सूं, ते दिन मिले न राति॥

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    रात्रि को बिछुड़ी हुई चाकवी, प्रनात के क्षणों में प्रियतम से पुनः मिल गई। परन्तु माया के प्रभाव से भगवान के सम्पर्क से पृथक प्राणी ब्रह्म की शरण में कभी नहीं पहुँच पाता है।

  4. वासर सुख नाँ रैन सुख, ना सुख सुपिनै माहि। कबीर बिछुढ्या राम सूँ, नौ सुख धूप न छाँह॥

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    हे राम! हे प्रिय! बहुत काल से अर्थात् जाने कब से तुम्हारी बाट जोह रही हूँ, तुम्हारी प्रतीक्षा में अनुरक्त हूँ। तुमसे एकात्मकता संस्थापित करने के लिए मेरा जी व्यग्र है और मन में शांति नहीं है।

  5. ​ बिरहिन ऊठै भी पडै, दरसन कारनि राम। मृवां पीछे देहुगे सो दरसन किहि काम॥

    अर्थ · Hindi — hi.wikisource

    हे राम! विरहिनी तुम्हारे दर्शन के लिए उठते हैं और पुनः गिर पड़ती है। यदि मृत्यु के अनन्तर तुम्हारे दर्शन हुए भी तो किस काम के उससे क्या लाभ होगा। ​

  6. मृवा पीछै जिनि मिलै कहै कबीरा राम । पाथर घाटा लोह सव (तथ) पारस कौणे काम ॥

    अर्थ · Hindi — hi.wikisource

    विरहिणी की आत्मा इच्छा करती है कि इस शरीर की जलाकर मसि(स्याही)बना डालूँ और अपनी हडूडियों को लेखनी बना कर राम के पास विरह निवेदन करती हुई पत्र लिखूँ।

  7. सन्दभॆ- प्रस्तुत साखी का वण्यं-विषय सप्तम साखी के विषय से साम्य रखता है । कवि ब्रह्म अनुग्रह का आकांक्षी हैं, परन्तु शरीर रहते ही । कबीर पीर पिरावनीं, पंजर पीड़ न जाइ। एक ज पीड़ परीत की, रही कलेजा छाइ॥

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    कबीर दास कहते हैं कि पीड़ा पंजर या शरीर को दुःख देने वाली है परन्तु प्रेम की पीड़ा ममं या कलेजे को अभिभूत कर रखा है।

  8. प्रसंग प्रेम एवं विरह की पीड़ा ने पिंजर या शरीर एवं ममं को अभिभूत कर रखा है। चोट सताँणी विरह की,सब तन जर जर होइ । मारणहारा जाँणि है, कै जिहि लागी सोइ ॥

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    सतगुरु ने जब खीच कर शब्द बाण मुझे मारा तो मै ज्ञान से सम्पन्न हो गया। शब्द बाण के फल स्वरुप मर्म अहत् हो गया और कलेजा पीड़ा अभीभूत हो गया।

  9. प्रसंग— विरह की चोट एव पीड़ा से विरही का समस्त शरीर जंजर हो रहा है। जिहि सरि मारि काल्हि, सो सर मेरे मन समझा। तिहि सरि मारि ,सरबिन सचपाँऊ नहीं ॥

    अर्थ · Hindi — hi.wikisource

    विरह चुरा है,ऐसा मत कहो। विरह शरीर का सुलतान है। जिस शरीर मे विरह की गति नही है,वह शरीर स्मशान सहश है।

  10. Kabir 3.10Open verse →

    इस तन का दीवा करौ,वाती मेल्यूँ जीव। लोही सीचौं तेल ज्यूँ,कब मुख देखौ पीव ॥

    अर्थ · Hindi — hi.wikisource

    चिरहिणी कहती है कि इन तन को पोरक चना ढानूं अौर उनके प्रारगा की पतिवा टालपर रऊ नेन मे निपित करते हुए,प्रिय का मुख देखने के लिए मै फिर प्रतीक्षित रहुंगी।

  11. Kabir 3.11Open verse →

    नैनां नीझर लाइया,रहट बहै निस जाम। पपीहा ज्यूँ पिव पिव करौं,कबरु मिलहुगे राम ॥

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    प्रिय के वियोग मे नेत्रो से आँसू-निर्भर दिनरात प्रवाहित रह्ते है और प्राण पपीहे के सदृश प्रिय का नाम रटते हैं । हे प्रिय कत्ब मिलोगे । शब्दार्य—नीझर =निझर= झरना । रहट = कुआं जल निकालने का यंत्र । निसजाम= निशयाम । कवरु = अरे कब ।

  12. Kabir 3.12Open verse →

    आपडिंयां प्रेम कसाइयां, लोग जांरगौ दुखडि़याँ । साँईं अपणै, कारणौ, रोइ रोइ रतडि़याँ ॥

    अर्थ · Hindi — hi.wikisource

    नेत्र प्रेम-विरहाग्नि मे सतप्त होने के कारण लाल हो गए । स्वामी के वियोग के कारण रो रोकर लाल हो गए हैं और लोग जानते हैँ नेत्र दुख रहे हैं ।

  13. Kabir 3.13Open verse →

    सोइ आंसू सजरणां सोई लोक बिड़ँहि । जे लोइगा लोंहीं चुवै,तौ जारणौ हेत हियाँहि ॥

  14. Kabir 3.14Open verse →

    संदर्भ— आँसु आँसु मे भेद है । वही सच्चे आँसू है जो हृदय से प्रस्फुटित होते हैं । कबीर हसणां दूरि करि, करि रोवण सै चित्त । बिन रोयां क्यूँ पाइए, प्रेम पीयारा मित्त ॥

    अर्थ · Hindi — hi.wikisource

    यदि प्रिय के विरह मे रोता है तो वल घटता हे वक्ति क्षोण होती है हंसता हूँ लोकिक आनन्दो मे संलग्न होता हूँ तो प्रिय राम से दूर होना है अत: प्रिय का ध्यान मन ही मन , विरहानुभूति अंतस मे होनी चाहिए । प्रकटिन होने के लिए अवकाश नही है। य या धुन अंदर ही अन्दर काष्ठ को खा जाता हे उसी प्रकार विरहाग्नि अदर ही अदर प्रदग्ध रहे ।

  15. Kabir 3.15Open verse →

    हॉसि हॉसि कंत न पाइए, जिनि पाया तिनि रोइ । जो हाँसेही हरि मिलै, दुतौ नही दुहागनि कोइ ॥

    अर्थ · Hindi — hi.wikisource

    प्रिय या व्रहा साघना से साम्प्राप्ति होता है । वह लौकिक ऐश्बर्य से दूर है । भावर्थ— लोकिक आमोद-प्रमोद के मध्य मे प्रिय की प्राप्ति नही होती है प्रिय प्राप्त किया जाना है विरहानुभूति के द्वारा । यदि हंम खेल कर ही प्रिय मिलता तो कौन अभाग्यशाली रहता। शब्दर्थ—कत=प्रियतम । जिनि=जिन जिसने । तिनि=तिसने । हासे-हो=हंसने से ही । दुहागनि=दुहागिन=दुर्भाग्य्शलिनी ।

  16. Kabir 3.16Open verse →

    हाँसी खेलौं हरि मिलै, कारण सहै परसान । काम क्रोध त्रिप्णां तजै,तहि मिलै भगवान ॥

    अर्थ · Hindi — hi.wikisource

    यहानुभूति हंमो-खेल और माया मे अनुरन रह कर नही होनी हे । कम, क्रोध तथा तृप्णा का महज कर देने ने हो सहानुभूति होनी है।

  17. Kabir 3.17Open verse →

    पुत पियारो पिता कौ,गौहनि लागा घाइ । लोभ मिठाई हाथ दे, आपण गया भुलाइ ॥

    अर्थ · Hindi — hi.wikisource

    अन्ततोगत्वा सचेत होकर बालक रूपी अत्मा ने रोषपूर्वक लोभ-मिठाई को पटक(फेक)दिया और रोते- रोते उसे परमपिता की प्राप्ति या अनुभूति हो गई।

  18. Kabir 3.18Open verse →

    नैनां अतरि आचरूँ, निस दिन निरपौं तोहि । कब हरि दरसन देहुगे, सो दिन आवै मोहि ॥

    अर्थ · Hindi — hi.wikisource

    हे प्रभु ! आपको अपने नैनो में बसा लूं,और प्रतिक्षण आपके दर्शन करता रहूँ।। भवार्थ— हे प्रभु । आपको अपने नेत्रो मे बसा लूं; जिसमे मैं आपको प्रतिक्षण देखा करूं। हे हरि !वह दिन कब आएगा,जब आपके दर्शन प्राप्त होगा।

  19. Kabir 3.19Open verse →

    कबीर देखत दिन गया,निस भी देखत जाइ। विरहरिग पिव पावे नहीं, जियरा तलपे माइ ॥

    अर्थ · Hindi — hi.wikisource

    प्रतीक्षा करते-करते जीवन बीत गया। विरहणों विरह मे उपलित हे। भावर्थ—कबीर कहते हे कि प्रिय की प्रतिक्षा करते-करते दिन भी गनीत हो गया और राथि भी अतीत हो गई । विरहिरणो प्रिय के वियोग मे अत्यन्त व्यर्ग है । ​

  20. Kabir 3.20Open verse →

    विरहणी थी तौ क्यूँ रही, जली न पिठ के नालि। रहु रहु मुगध गहेलडी, प्रेम न लाजूँ मारि॥

    अर्थ · Hindi — hi.wikisource

    कबीरदास कहते हैं कि यदि तू विरहिणी थी तो प्रिय के साथ प्रिय की स्मृति में क्यों न जल गई। हे मुग्धा ठहर-ठहर तू प्रेम को लज्जित मत कर।

  21. Kabir 3.21Open verse →

    हौं विरहा की लाकड़ी, समझि समभि धूँधाऊँ। छूटि पड़ौ या विरह तै, जे सारी ही जलि जाऊँ॥

    अर्थ · Hindi — hi.wikisource

    मैं विरहिणी गीली लकड़ी के समान हूँ जो भभक कर नहीं, धीरे-धीरे जलती है। यदि भभक कर जल जाऊँ तो विरह से छुटकारा मिल जायगा। जो मुझे न प्रिय है, न अभीप्सित है।

  22. Kabir 3.22Open verse →

    कबीर तन मन यौं जल्या, विरह अगनि सूँलागि। मृतक पीड न जांणई, जाणैगी यहु आणि॥

    अर्थ · Hindi — hi.wikisource

    कबीरदास कहते हैं विरहाग्नि के लगने से तन मन इस प्रकार जला कि उनकी कोई सीमा नहीं रही। विरह की व्यथा को मृतक (शुन्य) क्या जाने? विरहाग्नि उसकी ताप की प्रवलता को जानती है।

  23. Kabir 3.23Open verse →

    विरह जलाई मैं जलौ, जलती जलहरि जाउँ। मों देख्याँ जलहरि जलै, सन्तौ कहाँ बुझाऊँ॥

    अर्थ · Hindi — hi.wikisource

    विरह से प्रदग्ध मैं सतगुरु के पास विरहाग्नि प्रशान्त करने के लिए गई। परन्तु मैंने देखा कि सतगुरु स्वतः विरह ज्वर से पीड़ित है। है सन्तों! अब बताओं कि इस विरहाग्नि को कहाँ शांत करूँ?

  24. Kabir 3.24Open verse →

    परबति परबति मैं फिर्या, नैन गँवाये रोइ। सो बूटी पाँऊँ नहीं, जातै जीबनि होइ॥

    अर्थ · Hindi — hi.wikisource

    प्रियतम की खोज में एक पर्वत से दूसरे पर्वत, दूसरे से तीसरे पर्वत तक अर्थात् स्थान-स्थान पर भटकता रहा और प्रिय के वियोग में रो रोकर नैन खो दिए परन्तु वह तत्व न प्राप्त हुआ जिससे जीवन प्राप्त होता।

  25. Kabir 3.25Open verse →

    फाड़ि पुटोला धज करौं, कामलड़ी पहिराउँ। जिहि जिहि भेषां हरि मिलैं, सोइ-सोइ भेष कराउँ॥

    अर्थ · Hindi — hi.wikisource

    अपने रेशमी वस्त्रों को फाड कर फेंक दूँ और कमली धारण कर लूँ। जिस-जिस भैष से हरि मिल सके वही-वही भेष धारण कर लूँ।

  26. Kabir 3.26Open verse →

    नैन हमारे जलि गये, छिन-छिन लोडै तउज्झ। नां तूँ मिलै न मैं खुसी, देसी वेदन भुज्झ॥

    अर्थ · Hindi — hi.wikisource

    हे प्रिय! ये नेत्र आपकी प्रतीक्षा करते-करते प्रदग्ध हो उठे। न तेरे दर्शन प्राप्त होते हैं न प्रसन्नता प्राप्त होती है। मैं विरह वेदना से पीड़ित हूँ।

  27. Kabir 3.27Open verse →

    भेला पाया श्रम सौं, भौसागर के मांहि। जे छाँड़ौं तौ डूबिहौं, गर्हौं त डसिये बाँह॥

    अर्थ · Hindi — hi.wikisource

    बड़े परिश्रम करने के अनन्तर भव सागर में सतगुरु रूपी जहाज़ मिल गया। अब यदि इसे छोड़ता हूँ तो भवसागर में डूब जाऊँगा और यदि इस जहाज़ को ग्रहण करता हूँ तो उसके शब्द रूप सर्प, भुवग मुझे डस लेंगे।

  28. Kabir 3.28Open verse →

    रैणा दूर विछोहिया, रहु रे संषम झूरि। देवलि देवलि धाहुड़ी, देसी ऊगे सूरि॥

    अर्थ · Hindi — hi.wikisource

    हे कृश चक्रवाक। रात्रि ने तुझे प्रिय से वियुक्त कर दिये हैं। तू घर-घर चीत्कार करता फिरा। सूर्य के उदय होते ही पुनः प्रिय से समागम होगा।

  29. Kabir 3.29Open verse →

    सुखिया सब संसार है, खावै अरू सोवै। दुखिया दास कबीर है, जागै अरू रोवै॥

    अर्थ · Hindi — hi.wikisource

    कबीर दास कहते हैं कि समस्त संसार खाता है, पीता है, सोता है और सुख पूर्वक जीवनयापन करता है। केवल मैं दुःखी हूँ और रोता हूँ।