कबीरदास कहते हैं विरहाग्नि के लगने से तन मन इस प्रकार जला कि उनकी कोई सीमा नहीं रही। विरह की व्यथा को मृतक (शुन्य) क्या जाने? विरहाग्नि उसकी ताप की प्रवलता को जानती है।
Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali)
कबीर दोहावली
मूल श्लोकः
कबीर तन मन यौं जल्या, विरह अगनि सूँलागि। मृतक पीड न जांणई, जाणैगी यहु आणि॥
Kabir 3.22
Audio
Translations & commentaries(3)
Sūtra — Translation
Bhāṣya — Commentary
प्रेम की पीड़ा, विरह की व्यथा विरह ही जान बनता है, या विरहाग्नि स्वतः अपनी प्रवतता का अनुभव करेगी।
Padārtha — Word-meaning
जल्या = जला प्रदीप हुआ। अगनि = अग्नि, आग। मूँ = से। पीड़ = पीड़ा, व्यथा। जाँणाई = जानई—जानत है। जाणौगी = जानेगी।