कबीर दास कहते हैं कि पीड़ा पंजर या शरीर को दुःख देने वाली है परन्तु प्रेम की पीड़ा ममं या कलेजे को अभिभूत कर रखा है।
Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali)
कबीर दोहावली
मूल श्लोकः
सन्दभॆ- प्रस्तुत साखी का वण्यं-विषय सप्तम साखी के विषय से साम्य रखता है । कवि ब्रह्म अनुग्रह का आकांक्षी हैं, परन्तु शरीर रहते ही । कबीर पीर पिरावनीं, पंजर पीड़ न जाइ। एक ज पीड़ परीत की, रही कलेजा छाइ॥
Kabir 3.7
Audio
Translations & commentaries(2)
Sūtra — Translation
Padārtha — Word-meaning
पीर=पीट=पीड़ा। पिरावनी=पीड़ा देने वालो। पंजर=शरीर। परोती=प्रोति।