मैं विरहिणी गीली लकड़ी के समान हूँ जो भभक कर नहीं, धीरे-धीरे जलती है। यदि भभक कर जल जाऊँ तो विरह से छुटकारा मिल जायगा। जो मुझे न प्रिय है, न अभीप्सित है।
Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali)
कबीर दोहावली
मूल श्लोकः
हौं विरहा की लाकड़ी, समझि समभि धूँधाऊँ। छूटि पड़ौ या विरह तै, जे सारी ही जलि जाऊँ॥
Kabir 3.21
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Translations & commentaries(3)
Sūtra — Translation
Bhāṣya — Commentary
सच्ची विरहिणी प्रिय के वियोग में शनैः-शनैः जलती है। विरहिणी ये विरहप्रियता प्रमुख होती है ।
Padārtha — Word-meaning
विरहा = विरह = वियोग। लाकडी = लकड़ी = ईंधन। समझि-समझि = धीरे-धीरे। धूँ घाऊँ धूँ, धूँ करके जलना = धीरे-धीरे जलना। पटौ पडूँ या = इन। सारी = समस्त। जलि = जल।