हे राम! हे प्रिय! बहुत काल से अर्थात् जाने कब से तुम्हारी बाट जोह रही हूँ, तुम्हारी प्रतीक्षा में अनुरक्त हूँ। तुमसे एकात्मकता संस्थापित करने के लिए मेरा जी व्यग्र है और मन में शांति नहीं है।
Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali)
कबीर दोहावली
मूल श्लोकः
वासर सुख नाँ रैन सुख, ना सुख सुपिनै माहि। कबीर बिछुढ्या राम सूँ, नौ सुख धूप न छाँह॥
Kabir 3.4
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Translations & commentaries(3)
Sūtra — Translation
Bhāṣya — Commentary
प्रस्तुत साखी में आत्मा रूपी विरहिणी की विरह भावना बड़े मार्मिक शब्दों में व्यक्त हुई है।
Padārtha — Word-meaning
जोवती = जोहती = प्रतीक्षा करती। वाट = मार्ग। जिव = जी, प्राण। विश्राम = शान्ति।