कबीरदास कहते हैं कि यदि तू विरहिणी थी तो प्रिय के साथ प्रिय की स्मृति में क्यों न जल गई। हे मुग्धा ठहर-ठहर तू प्रेम को लज्जित मत कर।
Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali)
कबीर दोहावली
मूल श्लोकः
विरहणी थी तौ क्यूँ रही, जली न पिठ के नालि। रहु रहु मुगध गहेलडी, प्रेम न लाजूँ मारि॥
Kabir 3.20
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Translations & commentaries(3)
Sūtra — Translation
Bhāṣya — Commentary
सच्ची विरहिणी तो विरहाग्नि में स्वतः प्रदग्ध हो जाती है। तू प्रेम को क्यों लज्जित करता है।
Padārtha — Word-meaning
रही = जीवित रही। नालि। मुगध = मुग्धा, नायिका जिसमें लज्जाधिक्य होता है। गहेलडी। लाजूँ लज्जित कर।