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Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali)

कबीर दोहावली

मूल श्लोकः

विरह जलाई मैं जलौ, जलती जलहरि जाउँ। मों देख्याँ जलहरि जलै, सन्तौ कहाँ बुझाऊँ॥

Kabir 3.23

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Translations & commentaries(3)

Sūtra Translation

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विरह से प्रदग्ध मैं सतगुरु के पास विरहाग्नि प्रशान्त करने के लिए गई। परन्तु मैंने देखा कि सतगुरु स्वतः विरह ज्वर से पीड़ित है। है सन्तों! अब बताओं कि इस विरहाग्नि को कहाँ शांत करूँ?

Bhāṣya Commentary

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विरह का प्रभाव, क्षेत्र और स्वरूप व्यापक है, शिष्य ही नहीं, सद्गुरु भी विरह के प्रभाव से पीड़ित है।

Padārtha Word-meaning

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जलहरि = जलधरि = जलधार—तालाब। देख्या = देख्या—देखा। बुझाऊँ—शान्त करूँ।