Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali) · अध्याय 2
सुमिरन कौ अंग
सुमिरन कौ अंग
- Kabir 2.1Open verse →
कबिर कहता जात हुँ, सुणता है सय कोइ । राम कहें भला होइगा, नहिं तर भला न छोइ ॥
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कबीरदास कहते है कि मैं यह बराबर केहता जा रहा हुँ और सब मेरा कथन सुनते जा रहे है। राम कहने से, जपने से ही कल्याण होगा। अन्यथा कल्याण नही होगा। विशेष—"कबीर......हूँ" से तात्पर्य है कि कबीर अनुभव तथा दृढ़ विश्वास को प्रकट कर रहे है ।(२) सुंणता है.......कोई = से तात्पर्य है सब मेरे कथन को सुन रहा है ।(३) राम.....होई = राम नाम जप ही कल्याण का स्त्रोत है । उनके अभाव मे माया के विकार अपना प्रभाव प्रसारित करते जायेंगे ।
- Kabir 2.2Open verse →
कबीर कहै मैं कथि गया, कथि गया ब्रह्म महेस । राम नाँव ततसार है, सब काहू उपदेश ॥
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कबीर कहते है कि मैं यह कह चुका हूँ और यही मेरा सब को उपदेश है कि संसार मे राम नाम ही तत्व और सार वस्तु हैँ । यही ब्रह्या और महेश का भी कयन है । विशेष—प्रस्तुत साखी मे कवि ने परम्परागत चिर समर्थित सत्य की अभिव्यक्ति की है । कबीर नाम के महत्व के सम्बन्ध मे परम्परागत सत्य को प्रकट करते हुए उसके महत्व को उपदेश के रूप मे व्यक्त करते हैं। राम नाम समस्त साधना का तत्व और सार है । (२) सत दरिया ने भी इसकी प्रस्तुत विशेषता की ओर संकेत करते हुए कहा है "राम नाम निजु सार है " कबीर दास दरिया के शब्दो का समर्थन करते हुए केहते है "नाम सरोवर सार है सोह सुरत लगाय"।
- Kabir 2.3Open verse →
जन फबीर मस्तक दिया, सोभा अधिक अपार ॥
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तीनो लोको मे राम नाम सार तत्व है । जब से कबीरदास ने उसे अपने मस्तक पर धारण किया है , तब से अपार शोभा से युक्त हो गया। विशेष—प्रस्तुत साखी मे कबीर ने राम नाम की दो विशेष्ताओ का उल्लेख किया है । प्रथम , राम नाम तत्व और सार है । द्वितीय वह तिलक के रुप मे मस्तक् पर धारण करने से व्यक्तित्व की शोभा अभिवृद्ध हो जाती है ।
- Kabir 2.4Open verse →
भगति भजन हरि नांव है , दूजा दुक्ख आपार। मनसा बाचा क्रमनां , कबीर सुमिरण सार ॥
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कबीर कहते है कि नाम स्मरण ही समस्त साधना का सार तत्व है। नाम-जप के अतिरिक्त समस्त साधना जंजाल है। मैने आघोपांत समस्त साधनाओ को शोघा (देखा) लिया, नाम के अतिरिक्त सब काल है, विनाशकारी है। विशेष — (१) सुमिरण सार है-समस्त साधनाओ का सार तत्व। नाम स्मरण समस्त साधना का सारांश है। सुन्दर दास का भी मत है कि "सकल सिरोमनि नाम है, सब धरमन के माहि । अनन्य भक्ति वह जानिये, सुमिरन भूलै नाहि।" (२)"और सकल जजाल" नाम जप के अतिरिक्त और सब जंजाल है, माया है,चाहाचार है।" (३) आदि ...... सोघिया" से तात्पर्य है आघोपांत सब कुछ सब साधना का मूल्यांकन किया। (४)"दूजा....काल" नाम के अतिरिक्त सब काल या विनाशकारी है।
- Kabir 2.5Open verse →
च्य्ंता तौ हरि नांव की, और न चिंता दास। जे कुछ चितवैं राम विन,सोइ काल की पास ॥
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हरिभक्त या हरि के दास को एक मात्र चिन्ता हरिनाम या नाम जप को रहती है। इसके अतिरिक्त उसे और कोई चिन्ता नही रहती है। राम के अतिरिक्त और जो कुछ देखा या चिन्तन किया जाता है वह काल का विनाश का वाण है। विशेष—(१) प्रस्तुत साखी मे कबीर ने हरि के नाम के साधक की निष्ठा तथा लगन की ओर संकेत किया है हरिदास एकग्रता के साथ,निष्ठा के साथ हरि का चिन्तन करता है । (२) राम के नाम या राम की स्थिति से विहीन जो कुछ है,वह सब विनाश या माया है। (३)'नारद पुराण' में भी इसी प्रकार उल्लेख हुआ है "हरे नमि हरे नमि , हरे नमिव के वल्भू। क्लौ नारत्येव नास्त्येव गतिरन्यया।"(४/४९/११५)। शब्दर्थ-च्यंता=चिन्ता। नांव =नाम। चितवे=देखे। पाप=पाश।
- Kabir 2.6Open verse →
यंच संगी पिव करै,छठा जुसुमिरै मन। आई सूति कबीर की, पाया राम,रतन॥
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पंच ज्ञानेंद्रिय एव मन राम नाम का स्मरण सतव रूप से कर रहा है। कबीर को समाधि अवस्था मे रामरत्न सम्प्राप्त हुआ। विशेष— प्रस्तुत साखी मे कबीर ने अपनी उस निष्ठा और एकाग्रता का उल्लेख किया है जिसको सामान्य रूप से सपूदा प्रत्येक सावन प्राणी को होता है। रहस्यवादी के लिए जीवन क्ष्ण धन्य होता है जब वह मनसा, वाचा कमणा ब्रह्म और रावना मे प्रव्रुत्त हो जाता है उसकी समस्त इन्द्रियॉ ब्रह्म के प्रति उन्मुख होकर, ब्रह्माकार बनने की चेष्टा मे अनुरक्त हो जाती है।(२) समाधि की अवस्था मे कबीर को ब्रह्मनुमूति प्राप्त हुई जो साधक की चरम उपलब्दि होता है।
- Kabir 2.7Open verse →
प्रसंग— प्रस्तुत परिच्छेद की चतुर्थ साखी मे मामारिक प्राणियो को उपदेश देते हुए कबीर ने कहा है 'मनसा वाचा क्रमना, कबीर सुमिरण सार।" और प्रस्तुत साखो मे कबीर की पंच ज्ञानेंद्रिय और मन पूरणतया पर ब्रह्म मे अनुरक्त हो गया है प्रस्तुत परिच्छेद मे कबीर ने नाम की महत्ता का अनेक बार महत्व वरणन किया है। " राम नॉम ततसार है," 'राम कहे भल होइगा," 'राम नांव निज सार," कबीर सुमिरण सार है," आदि महत्व को हृदयंगम कर लेने के अनन्तर कबीर मुक्ति प्रप्त हुई और उसे राम रतन की प्रप्ति हुई। मेरा मन सुमिरै राम कॅू, मेरा मन रामहिं प्पहि। अव मन रामहिं है रहा, सीस नवावौ काहि॥
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तेरा ध्यान करते-करते मैं 'तू'ही हो गया । मुझमे मेरा पार्थक्य अह या व्यतित्व की मित्रता शेष नही रह गाई ।(फलत:) मेरा बारंबार का आवागमन विनष्ट हो गया । अब तो जिधर देखता हूँ उधर तू ही तू है विशेष—कबीर की एक बड़ी ही प्रसिद्ध साखी है "लाली मेरे लाल की जित देखू तित लाल । लाली देखन मैं गई मैं भी हो गई लाल।" प्रस्तुत साखी मैं तू तू करता तूभया का भाव बढ़े ही माधुंर्य पूर्ण शब्दों मे, सरल शैली मे व्यक्त कर दिया गया है । कबीर को साखियो मे भाव साम्य है, पर शब्दों की भिन्नता । (२) मुझ... हूँ से तात्पर्य है कि मेरा व्यह, मेरी पार्थक्य की भावना का लोप हो गया । (३) बारी फेरी... गई से तात्पर्य है कि मेरा आवागमन् समाप्त हो गया ।
- Kabir 2.8Open verse →
संदर्भ—समाधि मे ब्रह्म का दर्शन प्राप्त कर लेने पर आत्मा ब्रह्म वाण हो जाती है। जब आत्मा परमात्मा मे समाहित हो गई , मन भेद सम्मान होगए और माया जीवन भेद के विनष्ट हो जाने मे उभय एक हो गए तो दान करे और कौन किसकी उपमाना? कबीर निरभै रामजपि, जय लग दीवै वाति । तेल घट्या बाती बुझी, (तय) सोवेगा दिन राति ॥
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कबीरदास का कथन है कि जब तक दीपक में बती है तब तक निर्भय होकर राम का जप कर। तेल के नि:शेष हो जाने पर बत्ती भुझ जायेगा और तू पांव पसार कर दिनरात सोयेगा। विशेष—प्रस्तुत साखी मे कवि ने निर्भय होकर ब्रह्मा नाम जप का उपदेश दिया है। यह उपदेश कवि ने एक बड़ी ही सरल तथा स्वाभविक अप्रस्तुत योजना के माध्यम से व्यक्ति की है। शरीर रुपी मे प्राण रुपी वर्तिका है और सामर्थ्य रुपी तेल विधमान है इस वसिका और तेल के घट जाने पर मानव मृत्यु को प्राप्त हो जाता है और वह अनन्त काल तक सोता रहता है ।(२) शरीर से आत्मा के विलग हो जाने पर शरीर निश्चेष्ट हो जाता । जड शरीर के माध्यम से धर्म साधना अस्मभव हो जाता है। इसीलिए कवि ने यहाँ पर जीवन रहते रहते साधन करने के लिए उपदेश दिया है। (३)"(तब) सोवेगा दिन राति" का तात्पर्य यह है कि मृत्यु को प्राप्त होगा । (४) निरक्षर कबीर की अप्रस्तुत योजना कितनी यथार्थ ओर प्रभावशाली है,यह प्रस्तुत साखी से स्पष्ट हो जाउयगा ।
- Kabir 2.9Open verse →
सन्दर्भ्—"गुरुदेव कौ अंग" की तेइसवी साखी मे कवि ने कहा है "चेननि चौकी बैठिकरि, सतगुरु दीन्हाँ घोर । निरभै होइ निसंक भजि केवल कहै कबीर। "प्रस्तुत साखी मे कवि ने पुन: निसक और "निरभै" होकर राम का जप करने का उपदेश दिया है। मानव का जब तक जीवन दीपक जल रहा है, तब तक मानव को नाम जप करना चाहिए। कबीर सूता क्या करे, जागि न जपै मुरारि । एक दिनां भी सोवणां,लवे पाँव पसारि ॥
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कबीर कहते है कि प्रणी! तू सोया हुआ क्या कर रहा है। जाग्रत होकर क्यो नही देखता है। जिसके साहचर्य ए॓ तू विमुक्त हुआ है, उसी के संग पुन: जा लग। विशेष—(१) प्रस्तुत साखी मे कवि ने कर्तव्य एवं नाम जप से विमुख निंदा से अभिभुत है प्राणियो को ज्ञान के नेत्र उद्घाटित करने के लिए आग्रह पूर्ण उपदेश दिया है।(२) 'सुता' से तात्पर्य है अज्ञान निशा मे, माया से परिवेप्ठित सोया हुआ था। चेतनाविहीन यहा 'सुता' शब्द का प्रयोग चेतना वहीन या निश्चेष्ट के लिये अधिक उपर्युक्त प्रतीत होता है। (३)'काहे न जागि' से तात्पर्य है कि प्रबुद्ध होकर ज्ञान के क्षेत्रो से या संचेत होकर क्यो नहीं विवेक पुण कार्य मे सलाग्न होता है।(४) जाकाॱॱ बीछुछ्था' से तात्पर्य है कि जिसके सम्पर्क से तू वियुक्त हुआ है। आत्मा परमात्मा से विमुक्त हो कर माया के द्वारा पथ-भ्रषट कर दी गई है। इसी भाव की अभिव्यक्ति एक साखी मे कबीर ने कहा है 'पुत पियारी पीना पि' गौहनि लागा घाइ। लोग मिठाई हाथि दे,अपर गया भुलाई।' माया कवि मिठाई पाकर आत्मरूपी बालक अपने पिता को बिसर गया। (५)'ताही प मग सागि' से तात्पर्य है कि कवि के साथ लगकर एकाकार हो जा। एक साथ मे इसी स्थिति का वर्णन करते हुए कबीर ने कहा है 'पानी ही थै हिम मय हिम ह्वै गया विलाय। जो कुछ था सोइ भया अब कुछ कहा न जाय।'
- Kabir 2.10Open verse →
कबीर सूता क्या करै, उठि न रोवै दुक्ख । जाका बासा गोर मैं, सो क्यू सौवै सुक्ख ॥
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कबीर दास कहते है कि हे प्राणी ! तू अज्ञान निशा मे पड़ा हुआ क्यो सो रहा है । तू उठकर अपने प्रिय के वियोग मे जो दु:ख का अनुभव हो रहा है उसके प्रति क्यो नहि खेद प्रकट करता। जिसका निवास स्थान कब्र है, वह सुख पूर्वक कैसे सोता है। विशेष — विगत साखी मे कबीर ने कहा है 'जाकि मग तै बीछुडया ताही कि संग लागि।' प्रियतम से वियुक्त मानव को अपने दु:खो के प्रति खेद प्रकट करना चाहिए। प्रियतम से वियोग होने का दु:ख सर्वत: महान विपत्ति है। परन्तु मानव उस दु:ख को भूलकर माया के आवरण मे अनुरुक्त रहता है। लोभ की मिठाई के पाते ही वह अपने आप को भूल जाता है। कबीर इस प्रकार मे अज्ञान निशा मे आत्म विस्मृत प्राणियो को संचेत करते हुए कर्तव्य पूर्ति की ओर उनमुक्त रहने का उपदेश दिया है। (२) 'जाका ॱॱॱ सुक्ख' से कबीर का तात्पर्य है कि जो मरण्शील है, जिसका निवास स्थान कब्र है। वह सुख पूर्वक कही पर भी हो सकता है।
- Kabir 2.11Open verse →
कबीर सूता क्या करै,ॱ गुण गोविन्द के गाइ । तेरे सिर परि जम खड़ा, खरचघ करे का खाई ॥
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कबीर कहते है कि हे प्राणी ! तू साधन की निद्रा मे पड़ा क्या कर रहा है। यम तेरे सर पर खड़ा है। तेरे सहारे गर्व करने सा हुआ है। विशेष—गोविन्द के गुणों का गान करना जीवन का परम पुण्य है। कबीर ने विगत साखियों में सततरूप से सचेत होकर साधन में रत रहने का उपदेश दिया है। कवि कभी कहता है 'जाका वासा गोर मैं सो क्यूँ सोवै सुक्ख', और कभी वह कहता है 'एक दिन' भी सोवणा लबे पाव पसारि।' उसी विचार परम्परा में वह कवि पुनः यहाँ पर कहता है कि 'तेरे सिर परि जम खड़ा खरच करे का खाइ।' (२) 'खरच करे का खाइ' में कवि ने महाजन और कर्जदार का रूपक प्रस्तुत किया है। (३) इसी प्रकार का भाव कबीर ने एक अन्य साखी में व्यक्त किया है 'काल सिहणौं यो खड़ा जागि पियारे म्यंत' तथा 'काल खड़ा सिर ऊपरैं ज्यूं तोरणि आया वीदं (काल-कौ अंग)। (४) सत्य यह है कि 'जाका वासा गोर में, सो क्यूं सोवै सुक्ख।' (५) प्रस्तुत साखी में अशिक्षित कबीर की अप्रस्तुत योजना की यथार्थता तथा सहजता दर्शनीय है।
- Kabir 2.12Open verse →
कबीर सूता क्या करैं, सूताँ होइ अकाज। ब्रह्मा का आसण खिस्या, सुण्त काल की गाज॥
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कबीर कहते हैं कि हे प्राणी। तू सोता हुआ क्या कर रहा है। सोते रहने से बड़ा अहित होता है। काल की गर्जना सुनकर ब्रह्मा का आसन विचलित हो गया। विशेष—प्रस्तुत साखी में कवि ने काल को प्रबलता और मानव की निष्क्रियता का उल्लेख बड़ी सहज शैली में किया है। (२) मानव काल की प्रबलता से परिचित होने पर भी ब्रह्मनाथ की साधन से विमुख रहता है और अज्ञान निशा में सुषुप्त रहता है। (३) इसीलिए कवि ने पीछे कहा है कि "भगति भजन हरि नाँव है, दूजा दुःख अपार। (४) प्रस्तुत साखी में कवि ने नाम महिमा के साथ ही साथ काल की प्रबलता तथा मृत्यु की अनिवार्य स्थिति का उल्लेख किया है।
- Kabir 2.13Open verse →
केसौ कहि कहि कूकिये, ना सौइयै असरार। रात दिवस कैं कृकणों, (मन) कबहूँ लागै पुकार॥
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केशव का नाम उच्चरित करते रहिए । इतना आग्रह है कि अज्ञान-निद्रा में मत सोइए । दिन-रात के नाम जप से कभी न कभी तो पुकार सुनी ही जायेगी । विशेष—(१) सुमिरण कौ अंग की अन्य सखियों के वर्ण्य विषय की तुलना में प्रस्तुत साखो के वर्ण्य-विषय में विशिष्ठता और अभिनवता है । कवि ने यहाँ मानव-समाज से विशेष प्रकार का इस प्रकार (आग्रह) किया है । आग्रह इस वान का है कि "ना सोइए" तथा 'रात दिवस कै कूकणौं (मन) कत्रहूँ लगै पुकार ।' (२) प्रस्तुत साखी में कवि के मस्तिष्क की स्थिरता तथा दृढ़ता के भाव के साथ ही साथ अनन्य विशवास तथा भरोसा का भाव प्रतिविम्बित होना है । कवि को आषवादी विचारधारा भी "कत्रहूँ लगै पुकार" से प्रतिभासित होना है ।
- Kabir 2.14Open verse →
जिहि घटि प्रीति न प्रेम रस,फुर्न रसना नहिं राम । ते नर इस स्ंसार में, उपजि पये बेकाम ॥
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कबीर का कथन है कि जिन प्राणियो ने प्रेम का आस्वादन नही किया और आस्वादन करके उसके आनन्द का अनुभव नही किया है । उन्का इस सन्सार मे जन्म लेना उसी प्रकार है यथा सुने घर मे पाहुन का आगमन निःसार होना है। विशेष —(१)यथा शून्य मंदिर मे अतिथि के आगमन पर न कोइ स्वागत कर सकता है न उसके विदा के क्षरगो मे ममत्व पुर्ण अश्रु-प्रवाह कर सकता है, न कोइ स्नेह दे सकता है, न आशा ही कर सकता है , उसी प्रकार है वह प्राणी जिसने यहाँ से प्रेम नही किया (२) 'ज्यूॱॱॱॱॱॱॱॱजाव" से तात्पर्य है यथा खाली हाथ आया है उसी प्रकार उपलब्धि विहीन होकर वह जायेगा । अर्थात उसका संसार मे उत्पन्न होना व्यर्थ ही है।
- Kabir 2.15Open verse →
पहली बुरा कमाइ करि,बाँधी विष की पोट । कोटि करम पेलै पलक मैं (जय) आया हरि ओट॥
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पहले बुरे कर्मो को अर्जित करके विष की पोटली बांधो। हरि की शरण मे आते ही कोटिशः दुष्कर्म पल मे क्षीण हो गाए। विशेष—(१)कबीर ने प्रस्तुत साखी मे अत्यन्त तर्कपूर्ण ढंग से, अभिनव शैली मे कर्म सिध्दान्त का प्रतिपादन किया है। मानव दुष्कर्मो के प्रभाव से विनाश कि पथ पर अग्रसर होकर माया का चेरा बन जाता है। परन्तु हरि की शरण मे जाने पर दुष्कर्मो के प्रभाव से विलमित्रत हो जाते हैं।(२) कबीर ने कर्म के सिद्धान्तों का प्रतिपादन करते हुए उसकी औषधि हरिनाम की ओर सकेत किया है। पूर्वज के साथ ही यहाँ कर्म सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया गया है।
- Kabir 2.16Open verse →
कबीर आपण राम कहि स्पौरां राम कहाई। जिहि मुखि राम न ऊबरै, तिहि मुख फेरि कहाइ॥
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राम नाम की लूट है, लूट सके तो लूट ले। अन्यथा जब तन से आत्मा विलग हो जायेगी तब पीछे पछताना पड़ेगा। विशेष— (१) राम नाम का ही सुलभ है। राम नाम बड़ा ही कल्याणकारी तत्व है। इस प्रकार के कल्याणकारी तत्व की उपेक्षा करने के कारण मानव का बड़ा अहित होता है। फिर भी मानव सचेत नहीं होता है (२) पीछे....छूटि न कवि ने यह बताने की चेष्टा की है कि प्राणान्त हो जाने पर पछताना पड़ेगा। प्राणगान्त हो जाने पर पछताने का का कौन सा अवसर है? मृत हो जाने पर संज्ञा विहीन होने पर पछताना शेष रहेगा? इस शंका का समाधान इस प्रकार हो सकता कि यह जीवन माया मे सलग्न रहकर, पथ भ्रष्ट होकर, लक्ष्य विहीन हो जायेगा और पंचतत्व को प्राप्त होकर पुनः जन्म-मरण के क्रम मे निवध्द होगा, एक बार सत्यता पूर्वक ब्रह्म का स्मरण करने पर मानव ब्रह्माकार हो जाता है। परन्तु इसके विपरीत माया मे सलग्न रहने के कारण वह दूसरे जन्म मे भी पश्चाताप की अग्नि मे प्रदग्ध होता रहता है।
- Kabir 2.17Open verse →
लूटि सकै तौ लूटियौ, राम नाम भंडार। काल कंठ तै गहैगा, रुंधै दसू दुवार॥
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राम नाम का गान करने से माया का पाश विरिछंन हो जाते हैं । फिर भी (मानव) राम के वियोग में नाम जप नहीं करना है । जव रात दिन हरि का ध्यान नही करेगा, तव फिर दुर्लभ अनन्त योग कैसे प्राप्त होगा । विशेष—(१) प्रस्तुत साखी में कबीर ने 'गुण' शब्द का प्रयोग दो अर्थों में किया है प्रथम गुण या अर्थ है हरीनाम के गुण या विशेष ना और द्वितीय स्थान पर 'गुण' शब्द का प्रयोग माया के पास के हेतु । हुआ है (२) गुण......कटे" अशिक्षित कवि कबीर की काव्य प्रतिभा के दर्शन होते हैं। प्रस्तुत पंक्ति से कबीर साहित्य में प्रयुक्त अलंकारों के सहज-रूप के दर्शन होते हैं। सहज अभिव्यक्ति के साथ सहज रूप में अलंकारों का प्रयोग कबीर की विशेषता है। (३) रटे...वियोग से तात्पर्य है राम के वियोग में नाम-जप नहीं करता है। इसी प्रकार प्रस्तुत परिच्छेद की बारहवीं साखी में कवि ने लिखा है "काहे न देखै जागि" और ग्यारहवीं साखी में भी इसी प्रकार कवि ने लिखा है "जागि न जपे मुरारी। (४) अह निमि हरि ध्यावैं नहीं' से तात्पर्य है रात दिन हरि के नाम का जप नहीं करता है। रात दिन के नाम-जप के विषय में कबीर ने बारम्बार उपदेश दिया है। प्रस्तुत परिच्छेद की १६ वीं साखी में कबीर ने इसी प्रकार लिखा है" राति दिवस कै कूकर्मौं (मत) कबहूँ लगै पुकार" (५) 'दुर्लभ जोग' ब्रह्म के साथ दुर्लभ योग या तादात्म्य संस्थापना। ब्रह्म स्वतः दुर्लभ है और उसके साथ योग सत्यापन और भी दुर्लभ है। यहाँ पर कवि ने इसी भाव की ओर संकेत किया है यजुर्वेद में उस ब्रह्म को सर्व व्यापकता के सम्बन्ध में कहा गया है 'सः क्षोतः प्रोतश्च विभुः प्रजासु'। फिर भी वह दुर्लभ उन लोगों के लिए है जो माया-से परिवैष्ठित ही है। (६) सम्पूर्ण साखी में कवि ने नाम-जप के कर्त्तव्य से विमुख प्राणियों को सचेत करने को चेष्ठा को है।
- Kabir 2.18Open verse →
संदर्भ — प्रस्तुत साखी मे कबीर ने काल को प्रबलता, मानव जीवन की क्षण भंगुरता, मानव की विवशता और राम नाम की सुलभता की ओर संकेत करते हुए अप्रत्यक्ष रूप से मानव समाज को चेतावनी प्रदान की हैं। कबीर कठिनाई खरी सुमिरतां हरि नाम। सूली ऊपरि नट विद्या, गिरूं त नहीं ठाम॥
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कबीर कहते हैं कि हरि नाम के स्मरण में अनेक कठिनाइयाँ है। यथा शूली के ऊपर नट अपनी कला का प्रदर्शन करता हुआ जब गिरता है तो उसके लिए कोई स्थान नहीं रहता है। विशेष—प्रस्तुत साखी में की कवि ने साधक तथा नट की तुलना की है साधना में साधक और कला के प्रदर्शन में एकाग्रता अत्याधिक अनिवार्य और संदिग्ध होता है। एकाग्रता विनष्ट होते ही दोनों ही रूपवंचित हो जाते हैं। योग से पवित्र भोगी और शूली पर से पवित्र नट प्राण रहित हो जाता है। इसीलिए कबीर ने ठीक ही कहा है कि ‘ गिरु तो नाही ठाम । (२) "कबीरॱॱॱॱ नाम से तात्पयं है कि हरि नाम स्म्र्र्ग मे बहुत सो कठिनाइयॉ है। काम,क्रोध,मद, मोह, लोभ आदि शत्रु आव्रमर्ग करते है और मन विश्वासघात करता है माया आनी ओर आक्र्शित करती है यही साघन के मार्ग मे कठिनाईयॉ है।
- Kabir 2.19Open verse →
संदर्भ—प्रस्तुत साखी में कबीर के नाम जप या साधन को दुरुहता की ओर संकेत किया है। साधना का मार्ग उसी प्रकार दुर्गम और दुःसाध्य है यथा शूली पर नट की कला का प्रदर्शन कठिन शूली के ऊपर अपनी कला का प्रदर्शन करने वाला नट लेशमात्र भी असावधान होते ही धराशायी हो जाता है उसी प्रकार साधक अपने से भ्रष्ट होते ही कही पर भी नहीं स्थान पाता है। कबीर राम ध्याइ लै, जिभ्या सौं करि मंत। हरि सागर जिनि बीसरै, छीलर देखी अन्ंत ॥
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कबीर दास काहते हैं कि मुख से अमृत तत्व पर ब्रह्य का गुण-गान करके उसे अपने प्रति आकर्षित कर ले । तथा फूटे हुए नग को कोने से कोना मिला कर जोड़ा जाता है, उसी प्रकार मन को ब्रह्य से जोड़ ले। विशेष-(१)कबीर जनता के कवि हैं । उन्होने जनमाधारख मे प्रचलित उक्तियो और अप्रस्तुत् योजना को लेकर अत्यन्त महत्वपूर्ण तथ्यों को व्यक्त करने को चेष्टा मे आशतीत सफलता प्राप्त की है फूटा नग ज्यूं , जोड़ी मन सधे माधि मिलाइ"मे यह प्रयुक्त अप्रस्तुत योजना सहज होनो के साथ ही साथ औचित्यपूर्ण भी है।(२)फूटे हूए नग को जोड़ने की प्रक्रिया एकाग्रता तथा कौशल को अपेक्षा करती हे । उसी प्रकार ब्रह्य से वियुक्त मन को कौशल एवं एकाग्रता के साथ जोड़ना आवश्यक है।(३)"राम रिझाइ लै वारम्वार प्रार्थना एवं नाम जप के द्वारा ब्रह्म को अपने प्रति आकर्षित एवं प्रसन्न कर ले । सेवा के द्वारा प्रियतम प्रबल को अपने प्रति रिझा लेना चाहिए।(४)मुखि...गाइ से तात्पर्य है मुख ने अमृत तत्व अथार्त ब्रह्य के गुणो का गान कर ले अमृत का अर्थ वह ब्र्ह्य जो अजर अमर अनादि और अन्त है।
- Kabir 2.20Open verse →
कबीर चित चमॅकिया,घहॅ ढिसी नागी लाइ । हाथु घडा,वेग लेहु वुक्ताई ॥
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कबीर कहते है कि माया(या वनाना या तृष्णा)वो अग्नि हरिरम की दुआ हओ।हमसे द्वार भगवान को पूजा-पिट करना हो । विशेष-(१)भग्वन् को प्रसाद् करने के लिये अछि काम करना पडता है । उस के लिए अछि परिवार ने हम को सहायता देती है। जीवन में घटित करने का प्रयत्न किया है वासनाओं और माया द्वारा प्रदग्ध अग्नि को नाम सुमिरण के जल के द्वारा ही प्रशान्त किया जा सकता है कबीर ने यहाँ पर अत्यन्त सुलभ उक्ति के द्वारा आध्यात्मिक जगत के भाव को प्रभावशाली बनने की चेष्ठा की है। (२) कबीर...लाइ से तात्पर्य है कि वासना की अग्नि चारों दिशाओं, सर्वत्र लगी है और उसके प्रभाव से मन चमत्कृत हो उठा है संसार के सर्वत्र माया की अग्नि प्रज्वलित है। और मन उसमें रमा हुआ था अत्त्यन्त अनुरक्त है। (३) वेगे लेहु बुझाइ-शीघ्र ही इस अग्नि बुझा लो। कबीर ने यहाँ वेगे शब्द का प्रयोग किया है। क्षणभङ्गुर जीवन किसी पल विनष्ट हो सकता हैं। अतः मानव के लिए यह आवश्यक है कि अत्यन्त शीघ्रता के साथ जीवन की बिगड़े क्रम में सुधार के करले। (४) हरि...घड़ा से तात्पर्य है कि हरि नाम रूपी जल का घड़ा हाथ में है।