कबीरदास का कथन है कि जब तक दीपक में बती है तब तक निर्भय होकर राम का जप कर। तेल के नि:शेष हो जाने पर बत्ती भुझ जायेगा और तू पांव पसार कर दिनरात सोयेगा। विशेष—प्रस्तुत साखी मे कवि ने निर्भय होकर ब्रह्मा नाम जप का उपदेश दिया है। यह उपदेश कवि ने एक बड़ी ही सरल तथा स्वाभविक अप्रस्तुत योजना के माध्यम से व्यक्ति की है। शरीर रुपी मे प्राण रुपी वर्तिका है और सामर्थ्य रुपी तेल विधमान है इस वसिका और तेल के घट जाने पर मानव मृत्यु को प्राप्त हो जाता है और वह अनन्त काल तक सोता रहता है ।(२) शरीर से आत्मा के विलग हो जाने पर शरीर निश्चेष्ट हो जाता । जड शरीर के माध्यम से धर्म साधना अस्मभव हो जाता है। इसीलिए कवि ने यहाँ पर जीवन रहते रहते साधन करने के लिए उपदेश दिया है। (३)"(तब) सोवेगा दिन राति" का तात्पर्य यह है कि मृत्यु को प्राप्त होगा । (४) निरक्षर कबीर की अप्रस्तुत योजना कितनी यथार्थ ओर प्रभावशाली है,यह प्रस्तुत साखी से स्पष्ट हो जाउयगा ।
Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali)
कबीर दोहावली
मूल श्लोकः
संदर्भ—समाधि मे ब्रह्म का दर्शन प्राप्त कर लेने पर आत्मा ब्रह्म वाण हो जाती है। जब आत्मा परमात्मा मे समाहित हो गई , मन भेद सम्मान होगए और माया जीवन भेद के विनष्ट हो जाने मे उभय एक हो गए तो दान करे और कौन किसकी उपमाना? कबीर निरभै रामजपि, जय लग दीवै वाति । तेल घट्या बाती बुझी, (तय) सोवेगा दिन राति ॥
Kabir 2.8
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Translations & commentaries(2)
Sūtra — Translation
Padārtha — Word-meaning
निरभै=निभंय। जपि=जप। लग=तक । दोपै=दीपक मे वाति=वाती=वतिका। घटना=घटा। राती=रात