केशव का नाम उच्चरित करते रहिए । इतना आग्रह है कि अज्ञान-निद्रा में मत सोइए । दिन-रात के नाम जप से कभी न कभी तो पुकार सुनी ही जायेगी । विशेष—(१) सुमिरण कौ अंग की अन्य सखियों के वर्ण्य विषय की तुलना में प्रस्तुत साखो के वर्ण्य-विषय में विशिष्ठता और अभिनवता है । कवि ने यहाँ मानव-समाज से विशेष प्रकार का इस प्रकार (आग्रह) किया है । आग्रह इस वान का है कि "ना सोइए" तथा 'रात दिवस कै कूकणौं (मन) कत्रहूँ लगै पुकार ।' (२) प्रस्तुत साखी में कवि के मस्तिष्क की स्थिरता तथा दृढ़ता के भाव के साथ ही साथ अनन्य विशवास तथा भरोसा का भाव प्रतिविम्बित होना है । कवि को आषवादी विचारधारा भी "कत्रहूँ लगै पुकार" से प्रतिभासित होना है ।
Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali)
कबीर दोहावली
मूल श्लोकः
केसौ कहि कहि कूकिये, ना सौइयै असरार। रात दिवस कैं कृकणों, (मन) कबहूँ लागै पुकार॥
Kabir 2.13
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Translations & commentaries(3)
Sūtra — Translation
Bhāṣya — Commentary
प्रस्तुत साखी में कवि नाम जप के महत्व को उल्लेख करता है । उसका आग्रह पूर्ण अभिमत है कि अज्ञान निशा में सोने से कोई लाभ नही है । रात दिन नाम-जप करने का प्रतिफल यह हो सकता है कि ब्रह्म तक कभी न कभी तो प्रार्थना पहुंच ही जायेगी ।
Padārtha — Word-meaning
केसौ= केशव । कूकिये= आनन्द से भरे स्वर में पुकारिए । सोइयै= सोइए । असरार = इसरार- आग्रह । कूकणौं= कूक्ने से । पुकार= अर्ज, प्रार्थना । कबहूँ= कभी तो ।