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Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali)

कबीर दोहावली

मूल श्लोकः

संदर्भ — प्रस्तुत साखी मे कबीर ने काल को प्रबलता, मानव जीवन की क्षण भंगुरता, मानव की विवशता और राम नाम की सुलभता की ओर संकेत करते हुए अप्रत्यक्ष रूप से मानव समाज को चेतावनी प्रदान की हैं। कबीर कठिनाई खरी सुमिरतां हरि नाम। सूली ऊपरि नट विद्या, गिरूं त नहीं ठाम॥

Kabir 2.18

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Translations & commentaries(2)

Sūtra Translation

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कबीर कहते हैं कि हरि नाम के स्मरण में अनेक कठिनाइयाँ है। यथा शूली के ऊपर नट अपनी कला का प्रदर्शन करता हुआ जब गिरता है तो उसके लिए कोई स्थान नहीं रहता है। विशेष—प्रस्तुत साखी में की कवि ने साधक तथा नट की तुलना की है साधना में साधक और कला के प्रदर्शन में एकाग्रता अत्याधिक अनिवार्य और संदिग्ध होता है। एकाग्रता विनष्ट होते ही दोनों ही रूपवंचित हो जाते हैं। योग से पवित्र भोगी और शूली पर से पवित्र नट प्राण रहित हो जाता है। इसीलिए कबीर ने ​ठीक ही कहा है कि ‘ गिरु तो नाही ठाम । (२) "कबीरॱॱॱॱ नाम से तात्पयं है कि हरि नाम स्म्र्र्ग मे बहुत सो कठिनाइयॉ है। काम,क्रोध,मद, मोह, लोभ आदि शत्रु आव्रमर्ग करते है और मन विश्वासघात करता है माया आनी ओर आक्र्शित करती है यही साघन के मार्ग मे कठिनाईयॉ है।

Padārtha Word-meaning

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सुमिरता = स्मरन करने मे। सूली=शूली। ठाम=स्थान।