पंच ज्ञानेंद्रिय एव मन राम नाम का स्मरण सतव रूप से कर रहा है। कबीर को समाधि अवस्था मे रामरत्न सम्प्राप्त हुआ। विशेष— प्रस्तुत साखी मे कबीर ने अपनी उस निष्ठा और एकाग्रता का उल्लेख किया है जिसको सामान्य रूप से सपूदा प्रत्येक सावन प्राणी को होता है। रहस्यवादी के लिए जीवन क्ष्ण धन्य होता है जब वह मनसा, वाचा कमणा ब्रह्म और रावना मे प्रव्रुत्त हो जाता है उसकी समस्त इन्द्रियॉ ब्रह्म के प्रति उन्मुख होकर, ब्रह्माकार बनने की चेष्टा मे अनुरक्त हो जाती है।(२) समाधि की अवस्था मे कबीर को ब्रह्मनुमूति प्राप्त हुई जो साधक की चरम उपलब्दि होता है।
Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali)
कबीर दोहावली
मूल श्लोकः
यंच संगी पिव करै,छठा जुसुमिरै मन। आई सूति कबीर की, पाया राम,रतन॥
Kabir 2.6
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Translations & commentaries(2)
Sūtra — Translation
Padārtha — Word-meaning
पंच ज्ञानेंद्रिय सगी=पंच । पिव=प्रिय=प्रह। नूति=समाधि। रतन= रत्न।