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Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali)

कबीर दोहावली

मूल श्लोकः

​ जिहि घटि प्रीति न प्रेम रस,फुर्न रसना नहिं राम । ते नर इस स्ंसार में, उपजि पये बेकाम ॥

Kabir 2.14

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Translations & commentaries(3)

Sūtra Translation

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कबीर का कथन है कि जिन प्राणियो ने प्रेम का आस्वादन नही किया और आस्वादन करके उसके आनन्द का अनुभव नही किया है । उन्का इस सन्सार मे जन्म लेना उसी प्रकार है यथा सुने घर मे पाहुन का आगमन निःसार होना है। विशेष —(१)यथा शून्य मंदिर मे अतिथि के आगमन पर न कोइ स्वागत कर सकता है न उसके विदा के क्षरगो मे ममत्व पुर्ण अश्रु-प्रवाह कर सकता है, न कोइ स्नेह दे सकता है, न आशा ही कर सकता है , उसी प्रकार है वह प्राणी जिसने यहाँ से प्रेम नही किया (२) 'ज्यूॱॱॱॱॱॱॱॱजाव" से तात्पर्य है यथा खाली हाथ आया है उसी प्रकार उपलब्धि विहीन होकर वह जायेगा । अर्थात उसका संसार मे उत्पन्न होना व्यर्थ ही है।

Bhāṣya Commentary

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अत्यन्त रोचक एवं सुन्दर अप्रस्तुत योजना से सम्पन्न प्रस्तुत साखी मे कबीर ने प्रेम तथा के मधुर स्वाद का उल्लेख किया है। जिन्हे यह महत्वपुर्ण अनुभव तथा सौभग्यपुर्ण परिस्थिति क आनन्द नही मिला, उन अभागो का इस संसार मे आना उसी प्रकार अर्थ विहीन है यथा सूने गृह मे अतिथि क आगमन प्नयॊजन रहित होता है ।

Padārtha Word-meaning

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चपिया =चखिया=आस्वदन किया। लीया=लिया। स्वा =स्वाद। पाहुन्खा=पाहुना अतिथि । ज्यूं=ज्यों। त्युं=त्यों । जाव=जाय।