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Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali)

कबीर दोहावली

मूल श्लोकः

लूटि सकै तौ लूटियौ, राम नाम भंडार। काल कंठ तै गहैगा, रुंधै दसू दुवार॥

Kabir 2.17

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Translations & commentaries(2)

Sūtra Translation

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राम नाम का गान करने से माया का पाश विरिछंन हो जाते हैं । फिर भी (मानव) राम के वियोग में नाम जप नहीं करना है । जव रात दिन हरि का ध्यान नही करेगा, तव फिर दुर्लभ अनन्त योग कैसे प्राप्त होगा । विशेष—(१) प्रस्तुत साखी में कबीर ने 'गुण' शब्द का प्रयोग दो अर्थों में किया है प्रथम गुण या अर्थ है हरीनाम के गुण या विशेष ना और द्वितीय स्थान पर 'गुण' शब्द का प्रयोग माया के पास के हेतु । हुआ है (२) गुण......कटे" ​अशिक्षित कवि कबीर की काव्य प्रतिभा के दर्शन होते हैं। प्रस्तुत पंक्ति से कबीर साहित्य में प्रयुक्त अलंकारों के सहज-रूप के दर्शन होते हैं। सहज अभिव्यक्ति के साथ सहज रूप में अलंकारों का प्रयोग कबीर की विशेषता है। (३) रटे...वियोग से तात्पर्य है राम के वियोग में नाम-जप नहीं करता है। इसी प्रकार प्रस्तुत परिच्छेद की बारहवीं साखी में कवि ने लिखा है "काहे न देखै जागि" और ग्यारहवीं साखी में भी इसी प्रकार कवि ने लिखा है "जागि न जपे मुरारी। (४) अह निमि हरि ध्यावैं नहीं' से तात्पर्य है रात दिन हरि के नाम का जप नहीं करता है। रात दिन के नाम-जप के विषय में कबीर ने बारम्बार उपदेश दिया है। प्रस्तुत परिच्छेद की १६ वीं साखी में कबीर ने इसी प्रकार लिखा है" राति दिवस कै कूकर्मौं (मत) कबहूँ लगै पुकार" (५) 'दुर्लभ जोग' ब्रह्म के साथ दुर्लभ योग या तादात्म्य संस्थापना। ब्रह्म स्वतः दुर्लभ है और उसके साथ योग सत्यापन और भी दुर्लभ है। यहाँ पर कवि ने इसी भाव की ओर संकेत किया है यजुर्वेद में उस ब्रह्म को सर्व व्यापकता के सम्बन्ध में कहा गया है 'सः क्षोतः प्रोतश्च विभुः प्रजासु'। फिर भी वह दुर्लभ उन लोगों के लिए है जो माया-से परिवैष्ठित ही है। (६) सम्पूर्ण साखी में कवि ने नाम-जप के कर्त्तव्य से विमुख प्राणियों को सचेत करने को चेष्ठा को है।

Padārtha Word-meaning

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वियोग = वियोग। अह निसि = अहर्निश-दिनरात। दुर्लभ = दुर्लभ।