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Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali)

कबीर दोहावली

मूल श्लोकः

प्रसंग— प्रस्तुत परिच्छेद की चतुर्थ साखी मे मामारिक प्राणियो को उपदेश देते हुए कबीर ने कहा है 'मनसा वाचा क्रमना, कबीर सुमिरण सार।" और प्रस्तुत साखो मे कबीर की पंच ज्ञानेंद्रिय और मन पूरणतया पर ब्रह्म मे अनुरक्त हो गया है प्रस्तुत परिच्छेद मे कबीर ने नाम की महत्ता का अनेक बार महत्व वरणन किया है। " राम नॉम ततसार है," 'राम कहे भल होइगा," 'राम नांव निज सार," कबीर सुमिरण सार है," आदि महत्व को हृदयंगम कर लेने के अनन्तर कबीर मुक्ति प्रप्त हुई और उसे राम रतन की प्रप्ति हुई। मेरा मन सुमिरै राम कॅू, मेरा मन रामहिं प्पहि। अव मन रामहिं है रहा, सीस नवावौ काहि॥

Kabir 2.7

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Translations & commentaries(2)

Sūtra Translation

Sūtrahi.wikisource· HI

तेरा ध्यान करते-करते मैं 'तू'ही हो गया । मुझमे मेरा पार्थक्य अह या व्यतित्व की मित्रता शेष नही रह गाई ।(फलत:) मेरा बारंबार का आवागमन विनष्ट हो गया । अब तो जिधर देखता हूँ उधर तू ही तू है विशेष—कबीर की एक बड़ी ही प्रसिद्ध साखी है "लाली मेरे लाल की जित देखू तित लाल । लाली देखन मैं गई मैं भी हो गई लाल।" प्रस्तुत साखी मैं तू तू करता तूभया का भाव बढ़े ही माधुंर्य पूर्ण शब्दों मे, सरल शैली मे व्यक्त कर दिया गया है । कबीर को साखियो मे भाव साम्य है, पर शब्दों की भिन्नता । (२) मुझ... हूँ से तात्पर्य है कि मेरा व्यह, मेरी पार्थक्य की भावना का लोप हो गया । (३) बारी फेरी... गई से तात्पर्य है कि मेरा आवागमन् समाप्त हो गया ।

Padārtha Word-meaning

Padārthahi.wikisource· HI

तू=तुम=राम । हूँ=अह । वारी=आवागमन ।फेरी=फिर गया, समाप्त हो गया । जित=जिधर । तिन=उधर ।