हरिभक्त या हरि के दास को एक मात्र चिन्ता हरिनाम या नाम जप को रहती है। इसके अतिरिक्त उसे और कोई चिन्ता नही रहती है। राम के अतिरिक्त और जो कुछ देखा या चिन्तन किया जाता है वह काल का विनाश का वाण है। विशेष—(१) प्रस्तुत साखी मे कबीर ने हरि के नाम के साधक की निष्ठा तथा लगन की ओर संकेत किया है हरिदास एकग्रता के साथ,निष्ठा के साथ हरि का चिन्तन करता है । (२) राम के नाम या राम की स्थिति से विहीन जो कुछ है,वह सब विनाश या माया है। (३)'नारद पुराण' में भी इसी प्रकार उल्लेख हुआ है "हरे नमि हरे नमि , हरे नमिव के वल्भू। क्लौ नारत्येव नास्त्येव गतिरन्यया।"(४/४९/११५)। शब्दर्थ-च्यंता=चिन्ता। नांव =नाम। चितवे=देखे। पाप=पाश।
Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali)
कबीर दोहावली
मूल श्लोकः
च्य्ंता तौ हरि नांव की, और न चिंता दास। जे कुछ चितवैं राम विन,सोइ काल की पास ॥
Kabir 2.5
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Translations & commentaries(2)
Sūtra — Translation
Bhāṣya — Commentary
विगत साखी की द्वितीय पंक्ति मे कबीर ने राम नाम की महिमा का उल्लेख करते हुए कहा है "आदि अन्त सब सोधिया , दूजा देखौं काल" प्रस्तुत साखी मे कबीर ने उसी भाव को दुसरे शब्दो मे व्यक्त करते हुए कहा है" जे कुछ चितवै रामविन, सोई काल की पास।" सच्चे साधक को हरिनाम की चिन्ता रहती है। हरिनाम के अतिरिक्त जो कुछ अन्य है वह काल या विनाशकारी है।