कबीर कहते है कि प्रणी! तू सोया हुआ क्या कर रहा है। जाग्रत होकर क्यो नही देखता है। जिसके साहचर्य ए॓ तू विमुक्त हुआ है, उसी के संग पुन: जा लग। विशेष—(१) प्रस्तुत साखी मे कवि ने कर्तव्य एवं नाम जप से विमुख निंदा से अभिभुत है प्राणियो को ज्ञान के नेत्र उद्घाटित करने के लिए आग्रह पूर्ण उपदेश दिया है।(२) 'सुता' से तात्पर्य है अज्ञान निशा मे, माया से परिवेप्ठित सोया हुआ था। चेतनाविहीन यहा 'सुता' शब्द का प्रयोग चेतना वहीन या निश्चेष्ट के लिये अधिक उपर्युक्त प्रतीत होता है। (३)'काहे न जागि' से तात्पर्य है कि प्रबुद्ध होकर ज्ञान के क्षेत्रो से या संचेत होकर क्यो नहीं विवेक पुण कार्य मे सलाग्न होता है।(४) जाकाॱॱ बीछुछ्था' से तात्पर्य है कि जिसके सम्पर्क से तू वियुक्त हुआ है। आत्मा परमात्मा से विमुक्त हो कर माया के द्वारा पथ-भ्रषट कर दी गई है। इसी भाव की अभिव्यक्ति एक साखी मे कबीर ने कहा है 'पुत पियारी पीना पि' गौहनि लागा घाइ। लोग मिठाई हाथि दे,अपर गया भुलाई।' माया कवि मिठाई पाकर आत्मरूपी बालक अपने पिता को बिसर गया। (५)'ताही प मग सागि' से तात्पर्य है कि कवि के साथ लगकर एकाकार हो जा। एक साथ मे इसी स्थिति का वर्णन करते हुए कबीर ने कहा है 'पानी ही थै हिम मय हिम ह्वै गया विलाय। जो कुछ था सोइ भया अब कुछ कहा न जाय।'
Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali)
कबीर दोहावली
मूल श्लोकः
सन्दर्भ्—"गुरुदेव कौ अंग" की तेइसवी साखी मे कवि ने कहा है "चेननि चौकी बैठिकरि, सतगुरु दीन्हाँ घोर । निरभै होइ निसंक भजि केवल कहै कबीर। "प्रस्तुत साखी मे कवि ने पुन: निसक और "निरभै" होकर राम का जप करने का उपदेश दिया है। मानव का जब तक जीवन दीपक जल रहा है, तब तक मानव को नाम जप करना चाहिए। कबीर सूता क्या करे, जागि न जपै मुरारि । एक दिनां भी सोवणां,लवे पाँव पसारि ॥
Kabir 2.9
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Translations & commentaries(3)
Sūtra — Translation
Bhāṣya — Commentary
कबीर ने प्रस्तुत परिच्छेद की द्शम साखो मे कहा है "कबीर निरभै राम जी, जब लग दीवै वाति। तेल घटया बाति बुझी, (तव) सोवेगा दिन राति।" "सोवेगा दिन राति" चेतावनी प्रस्तुत करने के बाद प्रस्तुत साखी मे कवि ने अज्ञान निशा मे प्रस्तुत, माया मे सलग्न मानव को कतंव्य पथ से विमुख प्रारगी से जाग्रत होकर कर्तव्य पध को देखने का आगृह किया है।
Padārtha — Word-meaning
सूना= सोता= सोया= सुप्त । जागि = जागकर । जाका = जिसका । तै = तै । बीछुड़या = बिछड़ा । ताही = उसी लागि = लाग = लग।