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Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali)

कबीर दोहावली

मूल श्लोकः

मृवा पीछै जिनि मिलै कहै कबीरा राम । पाथर घाटा लोह सव (तथ) पारस कौणे काम ॥

Kabir 3.6

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Translations & commentaries(3)

Sūtra Translation

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विरहिणी की आत्मा इच्छा करती है कि इस शरीर की जलाकर मसि(स्याही)बना डालूँ और अपनी हडूडियों को लेखनी बना कर राम के पास विरह निवेदन करती हुई पत्र लिखूँ।

Bhāṣya Commentary

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विरहिणी की आकांक्षा का अभिनव स्वरूप । शरीर को विरह की अग्नि मे जलाकर भस्म कर डालने की इच्छा, जिसमे धुवा आकाश की ओर जाय और धुंवे के प्रभाव से प्रिय का ध्यान प्रियतमा की सतप्तावस्या की ओर आकर्षित हो ।

Padārtha Word-meaning

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लेखणि=लेखनी, कलम। करंक=हड्डी।