रात भर विरहिणी रोई यथा क्रौंच पक्षी अपने बच्चों के लिए रोती है। कबीर कहते हैं कि विरह के प्रज्वलित होने पर अंतर प्रज्वलित हो गया। विशेष—(१) प्रस्तुत साखी में कवि ने विरही साधक तथा क्रौंच की परिस्थिति और विरहानुभूति में साम्य उपस्थित करते हुए दोनों के विषाद का उल्लेख किया है। विरही आत्मा और क्रौंच दोनों प्रिय के वियोग में अत्यन्त व्याकुल रहते है। विरहनिशा भर आत्मा शिव के हेतु रुदन करती रही उसी प्रकार क्रौंच पक्षी की परिस्थिति है। (२) "रात्यू" से तात्पर्य रात भर। यहाँ पर "रात" का प्रयोग कवि ने उसी अर्थ में किया है जिस अर्थ में पाश्चात्य रहस्यवादियों ने "डार्क नाइट" आफ़ दिसोल" अर्थात् आत्मा की अन्धकारपूर्ण रात्रि" का प्रयोग (२) "अन्तर प्रजल्या" से तात्पर्य है अन्तस प्रज्वलित हो गया। विरह पुंज के प्रकट होने पर अन्तस प्रज्वलित हो गया। जो अन्तस वासनाओं का केन्द्र स्थल बना हुआ था, वह विरहाग्नि के प्रज्वलित होने पर अब प्रज्वलित हो उठा।
Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali)
कबीर दोहावली
मूल श्लोकः
रात्यू रूंनी बिरहिनीं, ज्यूं बंचौ कूं कुंज। कबीर अंतर प्रजल्या, प्रगठ्या विरहा पुंज॥
Kabir 3.1
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Translations & commentaries(3)
Sūtra — Translation
Bhāṣya — Commentary
क्रौंच पक्षी का विरह जगत प्रसिद्ध है। उसी प्रकार विरहिरनी आत्मा प्रियतम के वियोग में जीवन निशा या विरह निशा भर रुदन करती रही। साधना अन्तस में जब से विरह की भावना उद्दीप्त हुई तब से समस्त कलुष दूर हो गए।
Padārtha — Word-meaning
रात्यूं = रात में। रूनी = रोई। बचौं = कूं = को। कुंज प्रजल्या = प्रज्वलित हुआ। प्रगट्या = प्रकट हुआ। पुंज = घनीभूत।