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Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali) · अध्याय 14

सूषिम मारग कौ अंग

सूषिम मारग कौ अंग

  1. Kabir 14.1Open verse →

    कौण देस कहाँ आइया, कहु क्यूॅ जांणयां जाई। उहु मार्ग पावैं नहीं, भूलि पड़े इस मांहि॥

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    ―आत्मा किसी प्रदेश का निवासी है और कहाँ आकर बस गया है कहो इस तत्व को कैसे जाना जा सकता है? जीव को ब्रह्म के पास जाने का मार्ग नहीं मिल पाता इसलिए वह भ्रम मे पडा हुआ इस संसार मे भटक रहा है। शव्दार्थ—उहु मार्गं=वह मार्गं, ब्रह्म प्राप्ति का मार्गं।

  2. Kabir 14.2Open verse →

    उतीथै कोइ न आवई, जाकूँ बूॅझौं धाइ। इतथै सबै पठाइये, भार लदा लदाइ॥

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    ―कबीर दास जी कहते हैं कि ब्रह्म के पास पहुँच कर कोई वहाँ से लौटता नही है जिससे जाकर मैं पूछ सकूँ कि ब्रह्म के पास जाने का कौन सा मार्ग है? क्या तरीका है? इस संसार से हो कुकर्मों का बोझा लाद-लाद कर सभी प्राणी जाते हैं। शव्दार्थ―उती थैं=उधर से। इतीथै=इधर से।

  3. Kabir 14.3Open verse →

    सबकूॅ बूझत मैं फिरौं, रहण कहै नहीं कोइ। प्रीति न जोड़ी राम सूॅ, रहरण कहाँ थैं होइ॥

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    ―कबीर दास जी कहते हैं कि मैंने प्रत्येक व्यक्ति से पूछा किन्तु, किसी ने यह नहीं बताया कि इस संसार मे रहने का वास्तविक ढंग क्या है? किन्तु कोई उचित उत्तर दे नहीं पाया। ब्रह्म से किसी ने प्रेम तो किया नही फिर रहने की वास्तविक स्थिति किसी को कैसे ज्ञात हो सकती है।

  4. Kabir 14.4Open verse →

    चलौ चलौ सब कोइ कहै, मोहिं अंदेसा और। साहिब सूँ परचा नहीं, ए जाहिंगे किस ठौर॥

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    ―इस संसार के सभी प्रारणी ब्रह्म के पास जाने की बात तो करते हैं किन्तु इस बात मे सदेह है कि क्या वे वास्तव मे वहाँ तक पहुँच भी सकेंगे क्योकि ब्रह्म से उनका परिचय तो है नही फिर ये सब कहाँ जाकर रहेंगे?

  5. Kabir 14.5Open verse →

    आइवे कौं जागा नहीं, रहिवे कौं नहीं ठौर। कहै कबीरा सन्त हौ, अबिगत की गति और॥

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    कबीरदास जी कहते हैं कि ब्रह्म के पास तक आने के लिए ज्ञान नेत्र खुले नही और इस संसार की विषय वासना मे भी सर्वदा रहने के लिए स्थान नहीं है। हे सन्तो! ब्रह्म प्राप्ति का मार्ग सामान्य रूप से आने वाला नहीं है, अगम्य है।

  6. Kabir 14.6Open verse →

    कबीर मारिग कठिन है, कोई न सकई जाय। गये ते बहुड़ नहीं, कूसल कहै को आय॥

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    ―कवीर दास जो कहते हैं कि परमात्मा के पास तक पहुँचने का मार्ग अत्यधिक कठिन है वहाँ कोई आसानी से पहुँच नहीं सकता है। और जो वहाँ कठिन साधना करके पहुँच भी गये तो वे आवागमन से मुक्त होकर वहाँ से वापस आए हो नहीं फिर वहाँ के कुशल समाचार कौन आकर कहे।

  7. Kabir 14.7Open verse →

    जन कबीर का सिषर घर, बाट सलैली सैल। पाँव न टिकै पपीलिका, लोगनि लादे बैल॥

    अर्थ · Hindi — hi.wikisource

    ―भक्त कबीर का तो वास्तविक घर ब्रह्मरंधू रूपी शिखर पर स्थिति है और वहाँ का मार्ग नाना प्रकार की बाधाओ के कीचड से परिपूर्ण है। वहाँ पर चीटी जैसा छोटा जीव भी अपने पैर रखकर नहीं जा सकता फिर और मनुष्य तो नाना प्रकार के सासारिक कुकर्मों का बोझ लादे हुए हैं कैसे वहाँ पहुँच सकते हैं।

  8. Kabir 14.8Open verse →

    जहाँ न चींटी चढ़ि सकै, राई ना ठहराइ। मन पवन का गमि नहीं, वहाँ पहुॅचे जाइ॥

    अर्थ · Hindi — hi.wikisource

    ―कबीर दास जी कहते हैं कि जिस शून्य स्थल पर चीटी तक नही चढ सकतो और राई भी नहीं ठहर सकती मन और पवन को जहाँ तक गति नही है उस सूक्ष्म और सकीणं स्थाव तक मैं पहुँच चुका हूँ।

  9. Kabir 14.9Open verse →

    कबीर मारग अगम है, सब मुनिजन बैठे थाकि। तहाँ कबीरा चलिगया, गहि सतगुर की सांषि॥

    अर्थ · Hindi — hi.wikisource

    ―कबीर दास जी कहते हैं कि ब्रह्म-प्राप्ति तक का मार्ग अत्यन्त कठिन है, साधक मुनि भी वहाँ की दुर्गंमता के कारण थक कर बैठ गये हैं जाने की आशा छोड बैठे हैं। ऐसे दुर्गम स्थान पर भी कबीर दास जी सतगुरु के उपदेशो को ग्रहण करके पहुँच गये हैं।

  10. Kabir 14.10Open verse →

    सुर नर था के मुनि जनाँ, जहाँ न कोइ जाइ। मोटे भाग कबीर के, तहाँ रहे घर छाइ॥१०॥

    अर्थ · Hindi — hi.wikisource

    ―जिस स्थान तक पहुँचने के लिए देवता, मनुष्य और मुनि सभी थक जाते हैं और थकावट के कारण वहाँ तक पहुँच नहीं पाते हैं। वहीं पर सौभाग्यवश कवीर दास पहुँच भी गए हैं और उनका स्थायी निवास भी हो गया है।