कबीरदास जी कहते हैं कि ब्रह्म के पास तक आने के लिए ज्ञान नेत्र खुले नही और इस संसार की विषय वासना मे भी सर्वदा रहने के लिए स्थान नहीं है। हे सन्तो! ब्रह्म प्राप्ति का मार्ग सामान्य रूप से आने वाला नहीं है, अगम्य है।
Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali)
कबीर दोहावली
मूल श्लोकः
आइवे कौं जागा नहीं, रहिवे कौं नहीं ठौर। कहै कबीरा सन्त हौ, अबिगत की गति और॥
Kabir 14.5
Audio
Translations & commentaries(3)
Sūtra — Translation
Bhāṣya — Commentary
―निर्गुण ब्रह्म की गति अगम्य है। साधना मे वाह्याडम्बरों की आवश्यकता नहीं है।
Padārtha — Word-meaning
―जागा नही=ज्ञान नेत्र नही खुले।