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Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali)

कबीर दोहावली

मूल श्लोकः

सबकूॅ बूझत मैं फिरौं, रहण कहै नहीं कोइ। प्रीति न जोड़ी राम सूॅ, रहरण कहाँ थैं होइ॥

Kabir 14.3

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Translations & commentaries(2)

Sūtra Translation

Sūtrahi.wikisource· HI

―कबीर दास जी कहते हैं कि मैंने प्रत्येक व्यक्ति से पूछा किन्तु, किसी ने यह नहीं बताया कि इस संसार मे रहने का वास्तविक ढंग क्या है? किन्तु कोई उचित उत्तर दे नहीं पाया। ब्रह्म से किसी ने प्रेम तो किया नही फिर रहने की वास्तविक स्थिति किसी को कैसे ज्ञात हो सकती है।

Bhāṣya Commentary

Bhāṣyahi.wikisource· HI

―जीव की अपनी स्थिति अज्ञात रहती है। ​