Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali) · अध्याय 8
जर्णा कौ अंग
जर्णा कौ अंग
- Kabir 8.1Open verse →
भारी कहौं त बहु डरौं, हलका कहूँ तो झूठ। मैं का जांणौं राम कू, नैनूँ कपहूँ न दीठ॥
अर्थ · Hindi — hi.wikisource
यदि उस परमात्मा को भारी कहा जाय तो बहुत डर लगता है क्योकि वह निराकार है फिर भारी कैसे हो सकता है? और यदि हल्का कहूँ तो यह भी असत्य हो है। क्योंकि मैंने अपने भौतिक नेत्रों से परमात्मा को देखा ही नहीं है फिर उनके अस्तित्व के विषय में कह कैसे सकता हूँ।
- Kabir 8.2Open verse →
दीठा है तो कस कहूं, कह्या न को पतियाइ। हरि जैसा है तैसा रहै, तू हरिष हरिष गुण गाइ॥
अर्थ · Hindi — hi.wikisource
यदि उस परमात्मा के दर्शन भी हो गए हो तो भी उस अवर्णनीय का वर्णन कैसे किया जा सकता है और यदि किसी प्रकार वर्णन भी कर दिया जाय तो कहने पर विश्वास कौन मान सकता है। परमात्मा जिस प्रकार का है उसे उसी प्रकार का रहने दो हे मन! तू प्रसन्नतापूर्वक उस परमात्मा के गुणों का स्मरण कर।
- Kabir 8.3Open verse →
ऐसा अद्भुत जिनि क्थौ, अद्भुत राखि लुकाइ। वेद कुरानौ गमि नहीं, वह्या न को पतियाइ॥
अर्थ · Hindi — hi.wikisource
जो ब्रह्म इतना रहस्यमय है रे मन! उसके वर्णन का प्रयास तू न कर। उस रहस्य को रहस्य ही बना रहने दें। वेद और कुरानादि धार्मिक ग्रन्थ जिसके गुणों का वर्णन नहीं कर सके उसका वर्णन कैसे किया जा सकता है और करने पर भी उसका विश्वास कौन करेगा?
- Kabir 8.4Open verse →
करता की गति अगम है, तूँ चलि अपणै उनमान। धीरैं धीरैं पाव दे, पहुँचैंगे परवान॥
अर्थ · Hindi — hi.wikisource
सम्पूर्ण विश्व के कर्ता परमात्मा की गति अगम्य है हे जीव? तू अपनी शक्ति के अनुसार ही उसको खोजने के लिए चल। धीरे-धीरे चलते रहने पर भी किसी न किसी दिन तो उसके दर्शन हो ही जाएँगे।
- Kabir 8.5Open verse →
पहुँचैंगे तब कहैंगे, अमड़ैंगे उस ठाँइ। अजहूँ बेरा समन्द मैं, बोलि बिगूचैँ काँइ॥
अर्थ · Hindi — hi.wikisource
कबीरदास जी कहते हैं कि उस परमात्मा के विषय में तभी कहा जा सकता है जब हम उस तक पहुँच जाएंगे। अभी तो मैं मंझधार में पड़ा हूँ। साधना के मार्ग में बीच में ही पड़ा हूँ इसलिये इस समय ईश्वर के विषय में कुछ कह कर अन्य मनुष्यों को धोखा क्यों दे।