Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali) · अध्याय 7
लाबि कौ अंग
लाबि कौ अंग
- Kabir 7.1Open verse →
कया कमंडल भरि लिया, उज्जल निर्मल नीर। तन मन जोबन भरि पिया, प्यास न मिटी शरीर॥
अर्थ · Hindi — hi.wikisource
ज्ञान एवं भक्ति का उज्ज्वल एवं निर्मल नीर शरीर रूपी कमंडल में भर लिया। शरीर एवं मन की पूर्ण शक्ति लगाकर जीवन के सुन्दरतम समय यौवनकाल में इसका पान किया किन्तु फिर भी इसकी प्यास शांत नही हुई।
- Kabir 7.2Open verse →
मन उलट्या, दरिया मिल्या, लागा मलिमलि न्हांन। थाहत थान न आबई, तूँ पूरा रहिमान॥
अर्थ · Hindi — hi.wikisource
मन सांसारिक झंझटों से हटकर प्रभु प्रेम रूपी समुद्र में जाकर मिल गया और वहाँ मल-मल कर स्नान करने लगा। हे प्रभु! आप अत्यन्त दयालु हैं बहुत प्रयत्न करने पर भी आपकी वास्तविक थाह नही मिलती है।
- Kabir 7.3Open verse →
हेरत हेरत हे सखी, रह्या कबीर हेराइ। बूँद समानी समद मैं सोकत हेरी जाइ॥
अर्थ · Hindi — hi.wikisource
कबीर की आत्मा परमात्मा को खोजते-खोजते उसी में लीन हों गई। आत्मा और परमात्मा का मेल हो गया। जो बूँद समुद्र में जाकर मिल जाती है उसका पता नहीं लगाया जा सकता है उसी प्रकार जिस आत्मा का परमात्मा में समावेश हो गया उसको भी नही खोजा जा सकता है।
- Kabir 7.4Open verse →
हेरत हेरत हे सखी, रहया कबीर हिराइ। समंद समाना बूँद मैं, सो कत हेर्या जाइ॥
अर्थ · Hindi — hi.wikisource
कबीर की आत्मा अन्य सांसारिक आत्माओं से कहती है कि हे सखी! परमात्मा को खोजते खोजते मैं स्वयं खो गई। समुद्र (परमात्मा) बूँद (आत्मा) के अन्तःकरण मे हो व्याप्त है उसको कैसे खोजा जा सकता है।