ज्ञान एवं भक्ति का उज्ज्वल एवं निर्मल नीर शरीर रूपी कमंडल में भर लिया। शरीर एवं मन की पूर्ण शक्ति लगाकर जीवन के सुन्दरतम समय यौवनकाल में इसका पान किया किन्तु फिर भी इसकी प्यास शांत नही हुई।
Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali)
कबीर दोहावली
मूल श्लोकः
कया कमंडल भरि लिया, उज्जल निर्मल नीर। तन मन जोबन भरि पिया, प्यास न मिटी शरीर॥
Kabir 7.1
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Translations & commentaries(3)
Sūtra — Translation
Bhāṣya — Commentary
ज्ञान एवं भक्ति का उज्जवल द्वारा भी शरीर की तृष्णा शान्त नहीं होती।
Padārtha — Word-meaning
क्या = काया = शरीर।