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Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali) · अध्याय 5

परचा कौ अंग

परचा कौ अंग

  1. कबीर कवल प्रकासिया, ऊग्या निर्मल सूर। निस अंधियारी मिटि गई, बागे अनहद नूर॥

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    जब से निर्मल सूर्य रूपी ब्रह्म का प्रकाश प्राप्त हुआ तब से हृदय कमल प्रकाशित हो गया। समस्त वासनाओं का अन्धकार मिट गया और अनहद नाद की तुरही बजने लगी।

  2. अनहद बाजै नीझर झरै, उपजै ब्रह्म गियान। आबगति अंतरि प्रगटै लागै प्रेम धियान॥

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    प्रेम पूर्वक ध्यान लगाने से अविगत ब्रह्म को अनुभूति होती है। अनहृदनाद प्रतिश्रुति होता है और अनहद का झरना बहने लगता है।

  3. आकासे मुखि औंधा कुवाँ, पाताले पनिहारि। ताका पांणीं को हंसा पीवै, बिरला आदि बिचारि॥

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    आकाश में निम्न सुख हुआ है नीचे आत्मारूपी पनिहारी जल जल को प्राप्त करने के लिए आकांक्षी है। इस कुएँ का जल कोई विरली शुद्धता ही ही ग्रहण करती है।

  4. सिबसकती दिसि कौण जु जोवै, पछिम दिसा उठै धूरि। जल मैं स्यंघ जु घर करै, मछली चढ़ै खजूरि॥

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    शिव और शक्ति को किस दिशा में देखा जा सकता है वह सर्वव्यापी है। जो दिशा विशेष में देखने की चेष्टा करेगा उसके पीछे धूल उड़ने लगेगी। आत्मारूपी मछली अनहदनाद के सहारे ब्रह्म में लीन होगी, शिव और शक्ति की अनुभूति करना उतना ही कठिन है जितना मछली का ख़जूर पर चढ़ना अथवा सिंह का जल में प्रवेश करना। ​

  5. अंमृत बरिसै हीरा निपजै, घंटा पढ़ै टकसाल। कबीर जुलाहा भया पारपू, अनभै उतर्या पार॥

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    ब्रह्म निन्द रूपी अमृत की वर्षा हो रही है और प्रभु दर्शन रूपी हीरा उत्पन्न हो रहा है। अनहद शब्द प्रति श्रुद हो रहा है। कबीर जुलाहा निर्भय होकर इस संसार सागर से पार उतर गया।

  6. ममिता मेरा क्या करै, प्रेम उघाड़ीं पौलि। दरसन भया दयाल का, सूल भई सुख सौड़ि॥

    अर्थ · Hindi — hi.wikisource

    माया मेरा क्या कर लेंगी अब तो प्रेम का द्वार उन्मुक्त हो गया अब तो दयालु ब्रह्म के दर्शन हो गए, अब दुख भी सुख प्रतीत होने लगे।