Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali) · अध्याय 24
Kavita Kosh दोहावली — पृष्ठ ७
कबीर दोहावली / पृष्ठ ७
- Kabir 24.1Open verse →
निबैंरी निहकामता, स्वामी सेती नेह । विषया सो न्यारा रहे, साधुन का मत येह ॥
- Kabir 24.2Open verse →
मानपमान न चित धरै, औरन को सनमान । जो कोर्ठ आशा करै, उपदेशै तेहि ज्ञान ॥
- Kabir 24.3Open verse →
और देव नहिं चित्त बसै, मन गुरु चरण बसाय । स्वल्पाहार भोजन करूँ, तृष्णा दूर पराय ॥
- Kabir 24.4Open verse →
जौन चाल संसार की जौ साधु को नाहिं । डिंभ चाल करनी करे, साधु कहो मत ताहिं ॥
- Kabir 24.5Open verse →
इन्द्रिय मन निग्रह करन, हिरदा कोमल होय । सदा शुद्ध आचरण में, रह विचार में सोय ॥
- Kabir 24.6Open verse →
शीलवन्त दृढ़ ज्ञान मत, अति उदार चित होय । लज्जावान अति निछलता, कोमल हिरदा सोय ॥
- Kabir 24.7Open verse →
कोई आवै भाव ले, कोई अभाव लै आव । साधु दोऊ को पोषते, भाव न गिनै अभाव ॥
- Kabir 24.8Open verse →
सन्त न छाड़ै सन्तता, कोटिक मिलै असंत । मलय भुवंगय बेधिया, शीतलता न तजन्त ॥
- Kabir 24.9Open verse →
कमल पत्र हैं साधु जन, बसैं जगत के माहिं । बालक केरि धाय ज्यों, अपना जानत नाहिं ॥
- Kabir 24.10Open verse →
बहता पानी निरमला, बन्दा गन्दा होय । साधू जन रमा भला, दाग न लागै कोय ॥
- Kabir 24.11Open verse →
बँधा पानी निरमला, जो टूक गहिरा होय । साधु जन बैठा भला, जो कुछ साधन होय ॥
- Kabir 24.12Open verse →
एक छाड़ि पय को गहैं, ज्यों रे गऊ का बच्छ । अवगुण छाड़ै गुण गहै, ऐसा साधु लच्छ ॥
- Kabir 24.13Open verse →
जौन भाव उपर रहै, भितर बसावै सोय । भीतर और न बसावई, ऊपर और न होय ॥
- Kabir 24.14Open verse →
उड़गण और सुधाकरा, बसत नीर के संग । यों साधू संसार में, कबीर फड़त न फंद ॥
- Kabir 24.15Open verse →
तन में शीतल शब्द है, बोले वचन रसाल । कहैं कबीर ता साधु को, गंजि सकै न काल ॥
- Kabir 24.16Open verse →
तूटै बरत आकाश सौं, कौन सकत है झेल । साधु सती और सूर का, अनी ऊपर का खेल ॥
- Kabir 24.17Open verse →
ढोल दमामा गड़झड़ी, सहनाई और तूर । तीनों निकसि न बाहुरैं, साधु सती औ सूर ॥
- Kabir 24.18Open verse →
आज काल के लोग हैं, मिलि कै बिछुरी जाहिं । लाहा कारण आपने, सौगन्ध राम कि खाहिं ॥
- Kabir 24.19Open verse →
जुवा चोरी मुखबिरी, ब्याज बिरानी नारि । जो चाहै दीदार को, इतनी वस्तु निवारि ॥
- Kabir 24.20Open verse →
कबीर मेरा कोइ नहीं, हम काहू के नाहिं । पारै पहुँची नाव ज्यों, मिलि कै बिछुरी जाहिं ॥
- Kabir 24.21Open verse →
सन्त समागम परम सुख, जान अल्प सुख और । मान सरोवर हंस है, बगुला ठौरे ठौर ॥
- Kabir 24.22Open verse →
सन्त मिले सुख ऊपजै दुष्ट मिले दुख होय । सेवा कीजै साधु की, जन्म कृतारथ होय ॥
- Kabir 24.23Open verse →
संगत कीजै साधु की कभी न निष्फल होय । लोहा पारस परस ते, सो भी कंचन होय ॥
- Kabir 24.24Open verse →
मान नहीं अपमान नहीं, ऐसे शीतल सन्त । भव सागर से पार हैं, तोरे जम के दन्त ॥
- Kabir 24.25Open verse →
दया गरीबी बन्दगी, समता शील सुभाव । येते लक्षण साधु के, कहैं कबीर सतभाव ॥
- Kabir 24.26Open verse →
सो दिन गया इकारथे, संगत भई न सन्त । ज्ञान बिना पशु जीवना, भक्ति बिना भटकन्त ॥
- Kabir 24.27Open verse →
आशा तजि माया तजै, मोह तजै अरू मान । हरष शोक निन्दा तजै, कहैं कबीर सन्त जान ॥
- Kabir 24.28Open verse →
आसन तो इकान्त करैं, कामिनी संगत दूर । शीतल सन्त शिरोमनी, उनका ऐसा नूर ॥
- Kabir 24.29Open verse →
यह कलियुग आयो अबै, साधु न जाने कोय । कामी क्रोधी मस्खरा, तिनकी पूजा होय ॥
- Kabir 24.30Open verse →
कुलवन्ता कोटिक मिले, पण्डित कोटि पचीस । सुपच भक्त की पनहि में, तुलै न काहू शीश ॥
- Kabir 24.31Open verse →
साधु दरशन महाफल, कोटि यज्ञ फल लेह । इक मन्दिर को का पड़ी, नगर शुद्ध करिलेह ॥
- Kabir 24.32Open verse →
साधु दरश को जाइये, जेता धरिये पाँय । डग-डग पे असमेध जग, है कबीर समुझाय ॥
- Kabir 24.33Open verse →
सन्त मता गजराज का, चालै बन्धन छोड़ । जग कुत्ता पीछे फिरैं, सुनै न वाको सोर ॥
- Kabir 24.34Open verse →
आज काल दिन पाँच में, बरस पाँच जुग पंच । जब तब साधू तारसी, और सकल पर पंच ॥
- Kabir 24.35Open verse →
साधु ऐसा चाहिए, जहाँ रहै तहँ गैब । बानी के बिस्तार में, ताकूँ कोटिक ऐब ॥
- Kabir 24.36Open verse →
सन्त होत हैं, हेत के, हेतु तहाँ चलि जाय । कहैं कबीर के हेत बिन, गरज कहाँ पतियाय ॥
- Kabir 24.37Open verse →
हेत बिना आवै नहीं, हेत तहाँ चलि जाय । कबीर जल और सन्तजन, नवैं तहाँ ठहराय ॥
- Kabir 24.38Open verse →
साधु-ऐसा चाहिए, जाका पूरा मंग । विपत्ति पड़े छाड़ै नहीं, चढ़े चौगुना रंग ॥
- Kabir 24.39Open verse →
सन्त सेव गुरु बन्दगी, गुरु सुमिरन वैराग । ये ता तबही पाइये, पूरन मस्तक भाग ॥
- Kabir 24.40Open verse →
चाल बकुल की चलत हैं, बहुरि कहावै हंस । ते मुक्ता कैसे चुंगे, पड़े काल के फंस ॥
- Kabir 24.41Open verse →
बाना पहिरे सिंह का, चलै भेड़ की चाल । बोली बोले सियार की, कुत्ता खवै फाल ॥
- Kabir 24.42Open verse →
साधु भया तो क्या भया, माला पहिरी चार । बाहर भेष बनाइया, भीतर भरी भंगार ॥
- Kabir 24.43Open verse →
तन को जोगी सब करै, मन को करै न कोय । सहजै सब सिधि पाइये, जो मन जोगी होय ॥
- Kabir 24.44Open verse →
जौ मानुष गृह धर्म युत, राखै शील विचार । गुरुमुख बानी साधु संग, मन वच, सेवा सार ॥
- Kabir 24.45Open verse →
शब्द विचारे पथ चलै, ज्ञान गली दे पाँव । क्या रमता क्या बैठता, क्या गृह कंदला छाँव ॥
- Kabir 24.46Open verse →
गिरही सुवै साधु को, भाव भक्ति आनन्द । कहैं कबीर बैरागी को, निरबानी निरदुन्द ॥
- Kabir 24.47Open verse →
पाँच सात सुमता भरी, गुरु सेवा चित लाय । तब गुरु आज्ञा लेय के, रहे देशान्तर जाय ॥
- Kabir 24.48Open verse →
गुरु के सनमुख जो रहै, सहै कसौटी दुख । कहैं कबीर तो दुख पर वारों, कोटिक सूख ॥
- Kabir 24.49Open verse →
मन मैला तन ऊजरा, बगुला कपटी अंग । तासों तो कौवा भला, तन मन एकहि रंग ॥
- Kabir 24.50Open verse →
भेष देख मत भूलिये, बूझि लीजिये ज्ञान । बिना कसौटी होत नहीं, कंचन की पहिचान ॥
- Kabir 24.51Open verse →
कवि तो कोटि-कोटि हैं, सिर के मुड़े कोट । मन के कूड़े देखि करि, ता संग लीजै ओट ॥
- Kabir 24.52Open verse →
बोली ठोली मस्खरी, हँसी खेल हराम । मद माया और इस्तरी, नहिं सन्तन के काम ॥
- Kabir 24.53Open verse →
फाली फूली गाडरी, ओढ़ि सिंह की खाल । साँच सिंह जब आ मिले, गाडर कौन हवाल ॥
- Kabir 24.54Open verse →
धारा तो दोनों भली, बिरही के बैराग । गिरही दासातन करे बैरागी अनुराग ॥
- Kabir 24.55Open verse →
घर में रहै तो भक्ति करूँ, ना तरू करू बैराग । बैरागी बन्ध करै, ताका बड़ा अभाग ॥
- Kabir 24.56Open verse →
उदर समाता माँगि ले, ताको नाहिं दोष । कहैं कबीर अधिका गहै, ताकि गति न मोष ॥
- Kabir 24.57Open verse →
अजहूँ तेरा सब मिटैं, जो मानै गुरु सीख । जब लग तू घर में रहै, मति कहुँ माँगे भीख ॥
- Kabir 24.58Open verse →
माँगन गै सो भर रहै, भरे जु माँगन जाहिं । तिनते पहिले वे मरे, होत करत है नाहिं ॥
- Kabir 24.59Open verse →
माँगन-मरण समान है, तोहि दई मैं सीख । कहैं कबीर समझाय के, मति कोई माँगे भीख ॥
- Kabir 24.60Open verse →
उदर समाता अन्न ले, तनहिं समाता चीर । अधिकहिं संग्रह ना करै, तिसका नाम फकीर ॥
- Kabir 24.61Open verse →
आब गया आदर गया, नैनन गया सनेह । यह तीनों तब ही गये, जबहिं कहा कुछ देह ॥
- Kabir 24.62Open verse →
सहत मिलै सो दूध है, माँगि मिलै सा पानि । कहैं कबीर वह रक्त है, जामें एंचातानि ॥
- Kabir 24.63Open verse →
अनमाँगा उत्तम कहा, मध्यम माँगि जो लेय । कहैं कबीर निकृष्टि सो, पर धर धरना देय ॥
- Kabir 24.64Open verse →
अनमाँगा तो अति भला, माँगि लिया नहिं दोष । उदर समाता माँगि ले, निश्च्य पावै योष ॥
- Kabir 24.65Open verse →
कबीरा संगत साधु की, नित प्रति कीर्ज जाय । दुरमति दूर बहावसी, देशी सुमति बताय ॥
- Kabir 24.66Open verse →
एक घड़ी आधी घड़ी, आधी में पुनि आध । कबीर संगत साधु की, करै कोटि अपराध ॥
- Kabir 24.67Open verse →
कबिरा संगति साधु की, जो करि जाने कोय । सकल बिरछ चन्दन भये, बांस न चन्दन होय ॥
- Kabir 24.68Open verse →
मन दिया कहुँ और ही, तन साधुन के संग । कहैं कबीर कोरी गजी, कैसे लागै रंग ॥
- Kabir 24.69Open verse →
साधुन के सतसंग से, थर-थर काँपे देह । कबहुँ भाव कुभाव ते, जनि मिटि जाय सनेह ॥
- Kabir 24.70Open verse →
साखी शब्द बहुतै सुना, मिटा न मन का दाग । संगति सो सुधरा नहीं, ताका बड़ा अभाग ॥
- Kabir 24.71Open verse →
साध संग अन्तर पड़े, यह मति कबहु न होय । कहैं कबीर तिहु लोक में, सुखी न देखा कोय ॥
- Kabir 24.72Open verse →
गिरिये परबत सिखर ते, परिये धरिन मंझार । मूरख मित्र न कीजिये, बूड़ो काली धार ॥
- Kabir 24.73Open verse →
संत कबीर गुरु के देश में, बसि जावै जो कोय । कागा ते हंसा बनै, जाति बरन कुछ खोय ॥
- Kabir 24.74Open verse →
भुवंगम बास न बेधई, चन्दन दोष न लाय । सब अंग तो विष सों भरा, अमृत कहाँ समाय ॥
- Kabir 24.75Open verse →
तोहि पीर जो प्रेम की, पाका सेती खेल । काची सरसों पेरिकै, खरी भया न तेल ॥
- Kabir 24.76Open verse →
काचा सेती मति मिलै, पाका सेती बान । काचा सेती मिलत ही, है तन धन की हान ॥
- Kabir 24.77Open verse →
कोयला भी हो ऊजला, जरि बरि है जो सेव । मूरख होय न ऊजला, ज्यों कालर का खेत ॥
- Kabir 24.78Open verse →
मूरख को समुझावते, ज्ञान गाँठि का जाय । कोयला होय न ऊजला, सौ मन साबुन लाय ॥
- Kabir 24.79Open verse →
ज्ञानी को ज्ञानी मिलै, रस की लूटम लूट । ज्ञानी को आनी मिलै, हौवै माथा कूट ॥
- Kabir 24.80Open verse →
साखी शब्द बहुतक सुना, मिटा न मन क मोह । पारस तक पहुँचा नहीं, रहा लोह का लोह ॥
- Kabir 24.81Open verse →
ब्राह्मण केरी बेटिया, मांस शराब न खाय । संगति भई कलाल की, मद बिना रहा न जाए ॥
- Kabir 24.82Open verse →
जीवन जीवन रात मद, अविचल रहै न कोय । जु दिन जाय सत्संग में, जीवन का फल सोय ॥
- Kabir 24.83Open verse →
दाग जु लागा नील का, सौ मन साबुन धोय । कोटि जतन परमोधिये, कागा हंस न होय ॥
- Kabir 24.84Open verse →
जो छोड़े तो आँधरा, खाये तो मरि जाय । ऐसे संग छछून्दरी, दोऊ भाँति पछिताय ॥
- Kabir 24.85Open verse →
प्रीति कर सुख लेने को, सो सुख गया हिराय । जैसे पाइ छछून्दरी, पकड़ि साँप पछिताय ॥
- Kabir 24.86Open verse →
कबीर विषधर बहु मिले, मणिधर मिला न कोय । विषधर को मणिधर मिले, विष तजि अमृत होय ॥
- Kabir 24.87Open verse →
सज्जन सों सज्जन मिले, होवे दो दो बात । गहदा सो गहदा मिले, खावे दो दो लात ॥
- Kabir 24.88Open verse →
तरुवर जड़ से काटिया, जबै सम्हारो जहाज । तारै पर बोरे नहीं, बाँह गहे की लाज ॥
- Kabir 24.89Open verse →
मैं सोचों हित जानिके, कठिन भयो है काठ । ओछी संगत नीच की सरि पर पाड़ी बाट ॥
- Kabir 24.90Open verse →
लकड़ी जल डूबै नहीं, कहो कहाँ की प्रीति । अपनी सीची जानि के, यही बड़ने की रीति ॥
- Kabir 24.91Open verse →
साधू संगत परिहरै, करै विषय का संग । कूप खनी जल बावरे, त्याग दिया जल गंग ॥
- Kabir 24.92Open verse →
संगति ऐसी कीजिये, सरसा नर सो संग । लर-लर लोई हेत है, तऊ न छौड़ रंग ॥
- Kabir 24.93Open verse →
तेल तिली सौ ऊपजै, सदा तेल को तेल । संगति को बेरो भयो, ताते नाम फुलेल ॥
- Kabir 24.94Open verse →
साधु संग गुरु भक्ति अरू, बढ़त बढ़त बढ़ि जाय । ओछी संगत खर शब्द रू, घटत-घटत घटि जाय ॥
- Kabir 24.95Open verse →
संगत कीजै साधु की, होवे दिन-दिन हेत । साकुट काली कामली, धोते होय न सेत ॥
- Kabir 24.96Open verse →
चर्चा करूँ तब चौहटे, ज्ञान करो तब दोय । ध्यान धरो तब एकिला, और न दूजा कोय ॥
- Kabir 24.97Open verse →
सन्त सुरसरी गंगा जल, आनि पखारा अंग । मैले से निरमल भये, साधू जन को संग ॥
- Kabir 24.98Open verse →
सतगुरु शब्द उलंघ के, जो सेवक कहूँ जाय । जहाँ जाय तहँ काल है, कहैं कबीर समझाय ॥
- Kabir 24.99Open verse →
तू तू करूं तो निकट है, दुर-दुर करू हो जाय । जों गुरु राखै त्यों रहै, जो देवै सो खाय ॥
- Kabir 24.100Open verse →
दया हृदय में राखिये तूं क्यों निरदय होय। सांई के सब जीव हैं कीरी कुंजर दोय ॥
- Kabir 24.101Open verse →
भाव भाव में सिद्धि है भाव भाव में भेद । जो मानो तो देव है नहीं तो भींत क लेव ॥ अगला भाग >>