कबीरदास जी कहते हैं कि मैंने संसार के सभी रसों का रसास्वादन करके देख लिया है किंतु हरि इसके समान और कोई रस नही है। यदि इस हरि रस का एक तिल मात्र अंश भी शरीर में व्याप्त हो जाय तो संपूर्ण शरीर पाप मुक्त होकर कंचन के समान शुद्ध हो जाय।
Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali)
कबीर दोहावली
मूल श्लोकः
संदर्भ—प्रभु प्राप्ति के लिए सर्वस्व त्याग करना पड़ता है प्रत्येक कष्ट लना पड़ता है। हरि रसपीया जांणिये, जे कबहूँ न जाइ खुमार। मैमंता घूमत रहै, नांही तन की सार॥
Kabir 6.4
Audio
Translations & commentaries(2)
Sūtra — Translation
Padārtha — Word-meaning
रसाहण = रसास्वादन।