कबीरदास जी कहते हैं कि प्रभु भक्ति रूपी मदिरा को बेचने वाले सतगुरु की दुकान पर मदिरा पीने वाले बहुत से साधक बैठे हैं। किन्तु उस मदिरा का पानी वही पी सकता है जो अपने को साधना की कठिन से कठिन परिस्थितियों में डाल दे अन्यथा उस मदिरा को नहीं पिया जा सकता है। विशेष—साँग रूपक।
Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali)
कबीर दोहावली
मूल श्लोकः
संदर्भ—ब्रह्मानन्द के प्रेम का रस पाने में जितना सुमधुर होता है उसकी प्राप्ति उतनी ही कठिन होती है। उसके लिए सर्वस्व त्याग करना पड़ता है। कबीर भाठी कलाल की, बहुतक बैठे आइ। सिर सौपै सोई पिवै, नहीं तो पिया न जाइ॥
Kabir 6.3
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Translations & commentaries(2)
Sūtra — Translation
Padārtha — Word-meaning
भाठी = भट्ठी जिसमें मदिरा तैयार की जाती है। बहुतक = बहुत से।