कबीरदास जी कहते हैं मैं ईश्वर को भक्ति का रस इतना अधिक पिया है कि सांसारिक कठिनाइयों से उत्पन्न थकावट बिल्कुल समाप्त हो गई है किंचितमात्र भी बाकी नहीं रही। जिस प्रकार कुम्हार के द्वारा पकाया हुआ घड़ा पुनः चाक पर नहीं चढ़ाया जाता है उसी प्रकार हरि-भक्ति-रस का पान करने के बाद आत्मा को इस संसार में नहीं भटकना पड़ता।
Kabir Dohas (Granthavali + Dohavali)
कबीर दोहावली
मूल श्लोकः
कबीर हरि रस यौं पिया, बाकी रही न थाकि। पाका कलस कुँभार का, बहुरि न चढ़ई चाकि॥
Kabir 6.1
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Translations & commentaries(2)
Sūtra — Translation
Padārtha — Word-meaning
थाकि=थकान। पाका=पक्का। कलस=कलश=घड़ा।